विमर्श से परे: स्त्री और पुरुष-पहली किश्त

सुधा अरोडा
सुधा अरोडा सुप्रसिद्ध कथाकार और विचारक हैं. सम्पर्क : 1702 , सॉलिटेअर , डेल्फी के सामने , हीरानंदानी गार्डेन्स , पवई , मुंबई - 400 076 फोन - 022 4005 7872 / 097574 94505 / 090043 87272.
( अक्सर देखता हूं कि अपने फेसबुक स्टेट्स में या फिर स्त्रीकाल के पोस्ट में या किसी सभा में मैं स्त्रीवाद की बात करता हूं , तो पुरुष स्रोता या पठक पुरुष -विमर्श या पुरुषवाद के आग्रह के साथ उपस्थित होते हैं . सुधा जी का यह आलेख वैसे आग्रह रखने वाले पुरुष मित्रों को जरूर पढना चाहिए . पढना उन्हें भी चाहिए , जो दहेज कानून के द्वारा पुरुष -प्रताडना की बात करते हैं , भारत के न्यायालयों में बैठे मर्द  को भी. साथ ही उन्हें भी जो स्त्रीवाद को अनिवार्यतः पुरुष -विरोध के रूप में देखते हैं.  इसे हम तीन किश्तों में प्रकाशित कर रहे हैं )                                                                 
स्त्री और पुरुष की जब भी बात हम करते हैं तो हमारे सामने सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक पदानुक्रम, (हायार्की) वर्चस्व और प्राधिकार (डॉमिनेस) की एक ऐसी तस्वीर सामने आती है,  जिसमें एक का चेहरा हमेशा दूसरे की रंगत लिये होता है । इस रंगत में स्त्री हमेशा  पुरुष के प्रभाव को ढोती हुई दिखती है ! इसके पीछे मोटे तौर पर एक बड़ा कारण जैविक संरचना है । जैविक से होकर आगे बढ़ती हुई सामाजिक संरचना स्त्री को मानसिक नियंत्रण के लिये विवश करती दिखती है । अधिकांश स्थितियों में वह प्राकृतिक रूप से नियंत्रित रहती है और कुछ में उसे जबरन नियंत्रित किया जाता है। विवाह संस्था, परिवार और सामाजिकता में स्त्री की स्थिति इसी नियंत्रण का परिचायक है। शायद इसीलिये प्राचीन काल से लेकर अब तक स्त्री की हैसियत एक उत्पीड़ित और नियंत्रित मनुष्य की है और अलग अलग तरीके से इसको हम विमर्श में भी देखते हैं । अगर कहीं इस खांचे से अलग किसी स्त्री को हम देखते हैं तो हमारी पुरातनपंथी सोच समाज के रसातल में जाने की दुहाई देने लगती है। अक्क महादेवी से लेकर मीरा तक ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिन्हें स्त्री की आज़ादी के खिलाफ़ पुराना समाज अतिशय प्रतिक्रियावादी ढंग से आंकता है । बीसवीं शताब्दी में पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में श्रम करने वाली स्त्रियों ने जब पुरुष वर्चस्व पर सवाल उठाया तब भी इसी तरह की प्रतिक्रिया हुई और परिवार के ध्वस्त होने की चीख माहौल में गूंजने लगी। स्त्री विमर्श के बरक्स पुरुश विमर्श का एजेंडा भी पूर्वाग्रहित प्रतिकियावाद का एक नमूना भर है। भले ही कुछ स्त्रियां कुछ कारणों से पुरुषो पर शासन करने का मकसद रखती हों पर पुरुष विमर्श  की अवधारणा के लिये दिये गये तर्क ज़मीन के एक छोटे से टुकड़े पर भी दखल नहीं दे पाते।
ऐसे कुछ तथ्यों को हमें सामने रखना ही पड़ेगा जो सच्चाई के कई आयामों को हमारे सामने लाते हैं । ऐसे तथ्य हमें सरकारी रपटों और संस्थानों के आंकड़ों के जरिये मिलते हैं । इस क्रम में वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइज़ेषन यानी डब्ल्यू .एच.ओ. की जून 2013 की रिपोर्ट मेरे सामने है – विश्व  की हर तीन में से एक स्त्री घरेलू हिंसा की शिकार है , इसमें एशिया और मिडल ईस्ट देश  में तादाद ज़्यादा है। डब्ल्यू .एच.ओ. के स्त्री बाल स्वास्थ्य विभाग की प्रमुख फ्लेविया बुस्त्रेओ ने कहा - ये आंकड़े चौंकाने वाले हैं और इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात है कि यह किसी एक देश  का नहीं, पूरे विश्व का फिनॉमिना है।
स्त्री की समस्या वैश्विक  है। सदियों से उसे दोयम दर्ज़ा दिया गया । धर्म , रूढ़ियों , सामाजिक परम्पराओं में उसे निचली पायदान पर रखने के हर संभव प्रयास किये गये । उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में, पूरे विश्व  में, व्यवस्था के खिलाफ़ स्त्रियों की एकजुट आवाज़ सुनाई दी । अरब देशों में सुन्नत की प्रथा के खिलाफ़, चीन में पैरों को बांधकर छोटा रखने की प्रथा के खिलाफ़, विकसित देशो में नारी अधिकारों को लेकर – विश्व  भर में आंदोलन खड़े हुए । स्त्रियों ने व्यवस्था के सामने अपने सवाल रखे । यह सिलसिला आज भी जारी है ।
एक ओर स्त्री पर हिंसा के आंकड़े बढ़ते जा रहे हैं, दूसरी ओर साहित्य के बाज़ार में पुरुष विमर्श  का एक नया झुनझुना विमर्शकारों को लुभा रहा है। सोचने की बात है कि आज अलग से इसकी ज़रूरत क्यों महसूस की जा रही है ? क्या इसका कारण यह है कि सदियों से स्थापित पुरुष सत्ता को आज स्थानांतरण का खतरा दिखाई दे रहा है ? या इस सत्ता  की मजबूत दीवार में तरेड़ें दिखाई देने लगी हैं ? या फिर यह कि स्त्री यौनिकता के नाम पर एक निरंकुश  देहवादी विमर्श  चल ही रहा है , जिसने स्त्री विमर्श  को र्प्याप्त भटकाया है, लगे हाथ उसे और भरमाने के लिये पुरुष विमर्श  का धुंधलका भी उस पर फैला दिया जाये ।
एक सही और अनिवार्य विमर्श  के आज की तरह फैशन बनने से पहले , विमर्शों की शुरुआत ठीक-ठीक कब हुई , इसे रेखांकित कर पाना एक कठिन काम है लेकिन इतना तो तय है कि विमर्श का एक सिरा पीड़ित और दूसरा सिरा पीड़ा की ओर हुआ करता है और पीड़ित तथा पीड़ा के बीच निजी किस्म का सवाल कभी नहीं होता । मसलन भारतीय दार्शनिक विमर्श में मृत्यु और नश्वरता एक बड़ा सवाल था लेकिन किसी एक व्यक्ति की मृत्यु को लेकर विमर्श नहीं था । सारे संसार के अस्तित्व और मनुष्य की क्षणभंगुरता के बीच मृत्यु एक ऐसा सत्य था जिसके आगे मनुष्य एकदम लाचार था । इसीलिए मृत्यु के जितने भी आख्यान हैं, वे दरअसल मनुष्य की लाचारी के आख्यान हैं। इसी तरह दो मित्र या दो रिश्तेदार एक दूसरे को धोखा दें , तो वह विमर्श नहीं हो सकता । यह मानवीय गिरावट का एक पक्ष ही माना जाएगा । सभी दोस्त सभी दोस्तों को धोखा नहीं देते , इसलिए यह विमर्श का कारण नहीं हो सकता । लेकिन सभी पुरुष बल्कि कहना चाहिए कि ज़्यादातर पुरुष स्त्रियों को मनसा, वाचा, कर्मणा अपने कब्जे में रखते हैं और स्त्री का उनके नियंत्रण से बाहर होना या अपनी एक अलग पहचान बनाना और सम्मान पाना उन्हें गवारा नहीं होता, तब वे हिंसा के हर संभव तरीके - जिसके रूप और प्रकार कई हैं - को अपनाते हैं, यह विमर्श का हिस्सा हो सकता है । स्त्रियाँ क्यों कब्जे में रही आई हैं, क्यों नियंत्रण में रहना स्वीकार करती हैं, क्यों अपनी आवाज बुलंद नहीं करतीं, और क्यों कुछ स्त्रियां पुरूषवादी चोला पहनकर अपनी ही उत्पीड़ित जमात को ध्वस्त करने लगती हैं, यह विमर्श का कारण हो सकता है और इसे होना चाहिये ।
पुरुष विमर्श और स्त्री विमर्श - दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। स्त्री विमर्श भी दरअसल पुरुष की मानसिकता , व्यवहार और व्यवस्था का आकलन ही रहा है । हमारी सामाजिक संरचना पितृसत्तात्मक रही है,  जिसमें सारा अधिकार पुरुषो के हाथ में होता है । यह अधिकार बोध उन्हें शोषण  और प्रताड़ना का हक दे देता है । ज़ाहिर है , वे किसी भी रूप में हुक्मउदूली बर्दाश्त  नहीं कर सकते,  चाहे वह किसी स्त्री का इनकार और प्रतिरोध हो या मातहत का ।अगर हम कारणों की तह तक जायें तो सारा असामंजस्य और असंतुलन सामाजिक व्यवस्था में ही है, जिसके कारण पुरूष अपनी वर्चस्ववादी भूमिका से बाहर आकर सोच ही नहीं पाता । बचपन से ही उसे सत्ता  , ताकत और स्त्री से बेहतर होने की घुट्टी इस कदर पिला दी जाती है,  जिसका असर , बालिग होने के बाद भी , उसके ज़ेहन में बरकरार रहता है और अन्ततः अपने और अपने प
सर्वेश की फोटोग्राफी 
रिवार के लिये वह ऐसा त्रासद माहौल खडा कर देता है,  जो ध्वंस की ओर ही ले जाता है ।
सिमोन की विख्यात पंक्ति है  - ‘One is not born a woman, but becomes one.’  जिस तरह लड़की पैदा नहीं होती , उसे बनाया जाता है , वैसे ही लड़का भी पैदा नहीं होता , उसे बचपन से ही ठोक पीट कर लड़का बनाया जाता है । वह रोये तो उसके आंसू छीन लिये जाते हैं - क्या लड़कियों की तरह रोता है ! यानी रोना गले तक आये तो भी आंसू मत बहा , क्योंकि आंसुओं पर लड़कियों की बपौती है । उससे कोमल, नरम, भीगे रंग छीन लिये जाते हैं - तू क्या लड़की है जो पीला गुलाबी रंग पहनेगा ? उसके लिये गाढ़े रंग हैं - काला , भूरा , गहरा नीला रंग ही उस पर फबेगा , आसमानी या गुलाबी में तो वह लड़की दिखेगा ! उसे सॉफ्ट टॉयज़ नहीं दिये जाते - तू क्या लड़की है, जो गुड़िया से खेलेगा ! उसके हाथ में पज़ल्स, ब्लॉक्स, बंदूक और मशीनी  औजार थमा दिये जाते हैं । कुल जमा बात यह कि एक बच्चे को शुरू  से ही कठोर, रुश्क-शुष्क , वर्चस्ववादी हिंसक होने का रोल थमा दिया जाता है ।
माना कि प्रकृति ने स्त्री और पुरुष की जैविक संरचना में आधारभूत अंतर रखा है पर प्रकृति ने जिस अंतर को एक दूसरे के पूरक के रूप में गढ़ा है, हम उसे ठोक-पीट कर दो परस्पर प्रतिद्वंद्वी या विपरीत खेमे में  बदल देते हैं । दोनों युद्धरत पक्ष ताउम्र सींग लड़ाते आपस में लहूलुहान होते रहते हैं या एक फुंफकारता है और दूसरा अपने बचाव में आड़ लेता उम्र गुज़ार देता है। दरअसल पुरुष स्वयं भी उसी सामाजिक व्यवस्था , परंपरागत सोच और रूढिग्रस्त संस्कारों का शिकार (विक्टिम) है !एक ओर लड़के की बचपन से ही ऐसी कंडीशनिंग, दूसरी ओर सदियों से लड़कियों के लिये मनाहियों और हिदायतों की लंबी फेहरिस्त । जब परिवार बना तभी से यह दोयम दर्जा तय हुआ । पुरुष ने स्त्री को घर के काम दिये । वह बाहर गया । जाने-आने के बीच उसके काम के घंटे निश्चित हुये, लेकिन स्त्री के काम के घंटे तय नहीं हुये क्योंकि वह बाहर गई ही नहीं । इसीलिए एक स्त्री के काम के घंटे जागने से शुरू होते हैं और सोने तक चलते रहते हैं । चूंकि पुरुष के काम के घंटे तय थे इसलिए उसका परिश्रमिक तय था । पारिश्रमिक तय होने से उसका दर्जा भी तय था । लेकिन स्त्री का कुछ भी तय नहीं था बल्कि उसपर सब थोपा हुआ था इसलिए उसका दर्जा शुरू से ही कमतर हो गया, जो पारिवारिक रूप से आज भी वैसा ही चला आ रहा है ।
पुरुष विमर्श  पर बात इसलिये तो की जा सकती है कि किसी भी तरह, किसी भी ज़रिये से स्थितियां बदले ( जो कार्यकर्ताओं की एक बहुत बड़ी जमात की अथक कोशिशों  के बावजूद बदल नहीं पा रही हैं ) पर इसलिये नहीं कि दो प्रतिशत पुरुष अपनी पत्नियों या प्रेमिकाओं द्वारा वहां सताये जाते रहे हैं, जहां उनकी सत्ता कमज़ोर है और वे उनके हाथों का खिलौना बने प्रताड़ित हो रहे हैं । यह दो प्रतिशत एक पूरे विमर्श  को नये सिरे से गढ़ने का आधार नहीं बन सकता और न इस पर विमर्श  की बात की जानी चाहिये । ज़रूरी यह है कि सदियों से जो रवायतें चली आ रही हैं और पुरुष जिनका अनिवार्य हिस्सा रहा है , उस पर वह अर्न्तमंथन करे कि आखिर क्यों वह परम्परागत वर्चस्व को छोड़ कर एक बराबरी का दर्जा अपने ‘बेटर हाफ’ को नहीं दे पा रहा है , और अपनी सत्ता बनाये रखने के लिये पूरे परिवार के ढांचे को विध्वंस की कगार पर ले जाता है । पुरुष से सहयोग की, बदलने की हम गुजारिश  कर सकते हैं, लेकिन उसे बदल पाना हमारे हाथ में नहीं है ! इसके लिये उसे स्वयं ही प्रयास करना पड़ेगा कि समाज में स्त्रियों के प्रति अपनी सोच और अपने व्यवहार को लेकर पुरुष वर्ग जागरुक हो और अपने सत्ताप्रमुख आचरण के कारणों की जांच परख करे।
ऐसा सुना जाता है कि हजारों वर्ष पहले भारत में स्त्री-पुरुष संबंध विवाह बंधन में नहीं बंधे थे बल्कि एक स्त्री पर कई पुरुषों का अधिकार होता था । बच्चों के पालन-पोषण का भार अकेले स्त्री पर हुआ करता था ।  जाहिर है , पितृत्व की अनिश्चितता के कारण । मिथक के अनुसार भूख से अकुलाये एक बच्चे ने अपनी माँ से खाना मांगा लेकिन उसी वक्त एक पुरुष आया और माँ का हाथ पकड़कर उससे यौनाचार करने लगा । भूख से व्याकुल यह बच्चा जब बड़ा हुआ तो उसने विवाह नाम की एक संस्था बनाई, जिसमें विवाहित स्त्री को कोई दूसरा पुरुष नहीं ले जा सकता था और न ही वह स्त्री  विवाह की मर्यादाओं को तोड़ सकती थी ।
यानी विवाह उस स्त्री को किसी दूसरे पुरुष की ज़ोर-जबर्दस्ती से बचाने वाली संस्था थी, लेकिन उसकी आंतरिक स्थिति ऐसी थी कि स्त्री अपने ऊपर विवाह के बाद के अत्याचारों के खिलाफ भी बोल नहीं सकती थी । चाहे वह यौन-हिंसा या यौन-असंतुष्टि को झेलते हुये दम तोड़ दे , चाहे आधा पेट खाकर ताउम्र अपने परिवार के लिये खाना पकाती रहे लेकिन पति उसका परमेश्वर ही होगा । उसके लिये स्वर्ग उसका पति-गृह रहेगा जिसके बिना उसका निस्तार नहीं होगा और सिंदूर , चूड़ियाँ या मंगलसूत्र उसके शुभ चिह्न होंगे जिनकी अनुपस्थिति में उसे अपसगुनी मान लिया जाएगा ।आज तक किसी ग्रंथ में किसी स्त्री की अतृप्ति का कोई सवाल कभी नहीं उठा , बल्कि उसे नियंत्रित करने के उपाय ही सामने आए । ग्रन्थों में पुरुषों की आकांक्षा और व्यथा का जितना विषद वर्णन मिलता है , स्त्री की व्यथा या आकांक्षा को बड़ी मेहनत से ढूँढना पड़ेगा । ऐसा इसलिए है क्योंकि स्त्री को ही नियंत्रित होना है , पुरूष को नहीं । पुरुष स्वच्छंदता , स्वतंत्रता का कामी रहा आया है । इसीलिए ब्राह्मण ग्रन्थों में स्त्री को बचपन में पिता , जवानी में पति और बुढ़ापे में बच्चों की आश्रिता बता कर महिमा मंडित किया गया । पुरुष-विमर्श के उद्भावकों को इस पर विचार कर लेना चाहिए कि स्त्री-विमर्श , स्त्री की ऐतिहासिक रूप से चली आ रही राजनीतिक , सांस्कृतिक , आर्थिक और सामाजिक पराधीनता से पैदा होता है । इसके बरक्स पुरुष-विमर्श के भौतिक और दार्शनिक आधार क्या हैं ? उसके ऐतिहासिक साक्ष्य कहाँ मिलते हैं ? और उसके दायरे में किस प्रकार के पुरुष हैं ? इन कुछ ज़रूरी सवालों का जवाब देने के बाद ही वे अपनी उद्भावना को विमर्श का जामा पहना सकेंगे ।
अरुणा बुरटे का रेखांकन

इस तरह की घटनायें अक्सर सुनने में आती रही हैं कि किसी पत्नी ने अपने पति को पीटा और घर से निकाल दिया । पति पीड़ित हो गया लेकिन एक तो मर्द होने का तुर्रा और उसपर स्त्री के हाथों पिटने की शर्मिंदगी ने उन्हें उसी तरह चुप्पा बनाए रखा जैसे इसके ठीक विपरीत कारणों ने स्त्रियों को चुप रहने पर मजबूर किया था । दहेज-उत्पीड़न के नाम पर कुछ पतियों को जेल जाना पड़ा और बमुश्किल उनकी जान छूटी । सवाल उठता है कि एक जेनुइन कानून को फर्जी हथियार बनानेवालों की कुछेक घटनाओं के बावजूद , देश में लाखों लड़कियां ही क्यों दहेज की वेदी पर चढ़ती  रहीं , उनके लिये ही स्टोव फटते रहे, किरासिन का तेल डाल कर वे खुद जलीं या उनकी सास-ननद-पति ने उन्हें जलाया और कुछ सालों बाद वे सब मृतक स्त्री की आत्म हत्या का बेनिफिट ऑफ डाउट पाकर बरी भी हो गये और हत्यारे पति ने धूमधाम से दूसरी शादी भी रचा ली ! हां , वह इस बार इतना सतर्क जरूर रहा कि दूसरी पत्नी पढी लिखी नौकरानी का ओहदा निभाती रहे और उसके लिये अपने को जलाने या शिकायत दर्ज करने की नौबत न आये । इसके बरक्स क्या एक प्रतिशत पुरुषों के त्रस्त होने से या दहेज प्रताड़ना की धारा को हथियार बनाने के खिलाफ , एक विमर्श बन सकता है ?
अक्टूबर सन् 2005 में घरेलू-हिंसा निवारण अधिनियम लागू हुआ लेकिन अनवरत हिंसा का शिकार होने बावजूद स्त्रियाँ इसका उपयोग नहीं करतीं क्योंकि इससे घर टूटता है । हालांकि जिनके सिर के ऊपर से पानी गुजरा उन्होंने आवाज भी उठाई और हो सकता है इतने बड़े देश में कुछ महिलाओं ने इसका गलत फायदा भी उठाया हो लेकिन क्या इसी आधार पर पुरुष-विमर्श चला देना चाहिए ? 498 ए की धारा के खिलाफ़ एक पुरुष संगठन भी बनाया गया,  जो इस धारा द्वारा त्रस्त पुरुषों के मामले सामने लाता है, लेकिन यह संगठन पूरी तरह स्त्रीविरोधी है ।आज तक हम यही सुनते आए हैं कि फलां जगह स्त्री छेड़छाड़ की शिकार हुई , लेकिन कोई पुरुष भी कभी छेड़छाड़ का शिकार हो गया हो यह खबर हंसी के अलावा शायद ही कोई संवेदना पैदा कर पाती है । क्योंकि छेड़छाड़ हमेशा कमजोर पक्ष के साथ होती है । इस मामले में यह एक शाश्वत  सत्य है । जाहिर है इस आधार पर भी पुरुष-विमर्श को कोई जमीन नहीं मिल सकती ।

दरअसल स्त्रियों में आया बदलाव हमारी सामाजिक व्यवस्था के गले से नीचे नहीं उतर रहा । यह व्यवस्था स्त्रियों को हमेशा  से हीनतर , कमतर मानती रही है और इसे मानने के कारण हमारे  धर्मग्रंथों से लेकर सामाजिक व्यवस्था में निहित हैं । ज़्यादा नहीं , सौ साल पहले के भारत में स्त्रियों की स्थिति को देखें - भारतीय स्त्रियों को अपनी सामाजिक स्थिति और अपनी यातना की पहचान ही नहीं थी । अपने घर की चहार दीवारी की परेशानियों से बिला शिकायत जूझना उनकी मजबूरी थी और उन्हें यथासंभव संवार कर चलना उनका स्वभाव । घर से बाहर उनकी गति नहीं थी इसलिये जहां , जितना , जैसा मिला ,सब शिरोधार्य था . सहनशीलता और त्याग उनके आभूषण थे । अगर सम्मान मिला तो अहोभाग्य , दुत्कार मिली तो नियति - क्योंकि अपने जीवन से एक स्त्री की अपेक्षाएं कुछ थी ही नहीं . एक मध्यवर्ग की स्त्री अगर प्रतिभावान और रचनात्मक हुई तो वह रसोई और बच्चों की देखभाल के बाद दोपहर के बचे हुए समय में , घर के फेंके जाने वाले सामान से चित्रकला या क्रोशिए से बॉर्डर या कवर बिनतीं , साड़ियां , चादरें और तकिया गिलाफ काढ़तीं - इस तरह अपना पूरा समय वे घर की चहारदीवारी के भीतर की स्पेस को सजाने-संवारने- निखारने में बिता देतीं । पुरुषघर के लिये अर्थ उपार्जन करने बाहर जाता और स्त्रियों का दायरा ढेर सारे नियम कानून बंदिशों के साथ घर के भीतर की चौहद्दी में कैद था । शिकायत का अवकाश  ही नहीं था । हां , कुछ दबंग औरतें उस काल में भी थीं ,जो घर के पुरुषों को अपने अनुसार चलातीं और आदेश देती थीं पर उनका प्रतिशत इतना कम था कि उसे अपवादस्वरूप ही देखा जा सकता है ।  
अपने अधिकारों के प्रति अज्ञानता , अपने घरेलू श्रम को कम करके आंकना , बचपन में विवाह , विधवा हो जाने पर सामान्य जीवन जीने पर अंकुश आदि ऐसी कुरीतियां थीं जिसके चलते उन्हें शिक्षित करना उस कालखंड की अनिवार्यता बन गई . स्त्री शिक्षित हुईं . शिक्षा से स्त्रियों का जागरुक होना स्वाभाविक था . लेकिन बाहरी स्पेस में उनका काम स्कूल में अध्यापन करने तक ही सीमित रहा . शिक्षा के बाद की दूसरी सीढ़ी आई , उन्हें आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ाया गया और शिक्षण से आगे , बैंकों में , सरकारी दफ्तरों में , कॉरपोरेट जगत में और अन्य सभी क्षेत्रों में स्त्रियों ने दखल देना  शुरू  किया . आर्थिक रूप से हर समय अपना भिक्षापात्र पति के आगे फैलाने वाली स्त्री ने घर को चलाने में अपना आर्थिक योगदान भी दिया . पर इससे उसके घरेलू श्रम में कोई कटौती नहीं हुई . इस दोहरी जिम्मेदारी को भी उसने बखूबी निभाया . माना कि भारतीय समाज में वैवाहिक सम्बन्धों में बेहतरी के लिये समीकरण बदले हैं , पर वह स्त्रियों के एक बहुत छोटे से वर्ग के लिये ही है - जहां पुरुषों में कुछ सकारात्मक बदलाव आये हैं . मध्यवर्गीय स्त्री के एक बड़े वर्ग के लिये आज स्थितियां पहले से भी बहुत ज्यादा जटिल होती जा रही हैं . अगर ऐसा न होता तो  2011 में मुंबई महानगर में चार महीनों में चार सी.ए. , एम.बी.ए. , आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर , नौकरीपेशा लड़कियां इस तरह आत्महत्या नहीं करतीं । घरेलू हिंसा पर खूब बात की जाती रही है । हर देश में हिंसा के सालाना आंकड़े मौजूद हैं पर मार पीट वाली हिंसा से कहीं ज़्यादा , लगभग शत प्रतिशत स्त्रियां जिस भावात्मक हिंसा या अनचीन्हीं मानसिक प्रताड़ना का शिकार होती हैं , इसके आंकड़े कहां मिलेंगे , जब पीड़ित खुद उसे पहचान नहीं पा रहा ।

यौन या भावात्मक शोषण से निबटने के लिये पहले लैंगिक वर्चस्व और लैंगिक शोषण की पहचान करनी होगी जिसकी नींव पर यह समाज बाहर से दिखती खुशहाली पर टिका हुआ है, जबकि स्त्री संबंधी सारी समस्याओं की जड लैंगिक वर्चस्व है । इसकी पहचान के बगैर शोषण और हिंसा की दिशा में कदम बढाना वैसा ही है जैसे खराब जड़ को नजरअंदाज कर आप सूखती शाखों और मुरझाये पत्तों का इलाज करते रहें । इस विषय पर मेरा एक लंबा आलेख है - जिसके निशान नहीं दीखते यानी चुप्पी की हिंसा .... हिंदी समय की साइट पर इसे पढ़ा जा सकता है !


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