* जब अपने संकल्प के साथ एक निर्भ्रान्त जीवन शुरू किया... *


(भारतीय भाषाओं से दलित कवयित्रियों की कवितायें )
अनुवाद और प्रस्तुति  : फारूक शाह 


एक काम के दौरान भारतीय दलित स्त्री लेखन का संकलन और उसकी पड़ताल करने का अवसर मिला था. कई कारणों से नारीवादी साहित्य आन्दोलन में दलित - शोषित तथा हाशिए के स्तर का प्रतिनिधित्व बहुत अल्प रहा है. ऐसी स्थिति में दलित साहित्य आन्दोलन के अन्तर्गत स्त्री विमर्श का यह जो प्रवाह निर्मित हुआ है वह अपनी आरंभिक स्थिति से ही उल्लेखनीय संभावनाएं प्रकट करता दिखाई देता है. भारतीय दलित स्त्री लेखन को देखें तो कुछ बातें स्पष्ट रूप से सामने आती हैं. उसमें से मुख्य यह कि जाति और जेंडर के विमर्श के साथ साथ सामाजिक, सांस्कृतिक, अर्थनीतिक व राजनीतिक संकुल मुद्दों को ध्यान में रखकर यह विमर्श हाशिये के प्रदेश से आमूलचूल परिवर्तन की बात ला रहा है. दलित स्त्री के सामने बहुस्तरीय मुश्किलें रही हैं. जातिवादी पितृसत्तात्मक संरचना ने उसे न तो स्वावलंबन की सुविधाएं दीं और न उस दिशा में आगे बढ़ने के लिए जरूरी शिक्षा पाने का अवसर दिया. फिर भी आर्थिक पिछड़ेपन के बावजूद अपनी संघर्शीलता, आन्दोलन सामर्थ्य और दूरदर्शिता के कारण दलित स्त्रियों ने अनेक क्षेत्रों में सफलता हासिल की है. यह बताने की जरूरत नहीं कि दलित स्त्री ही सबसे ज्यादा हिंसा, यौनशोषण और आर्थिक शोषण का शिकार बनती रही है. घरसे लेकर बाहर तक सभी जगह निशाने पर रहती हैं. सिर पर मैला उठाने से लेकर जमींदारों के खेत, धनपतियों के कारखानें में कमरतोड़ परिश्रम करती वह मुक्ति की अवधारणा के पाखंड और वास्तविकता को भली भांति पहचानती हैं.

जाति-व्यवस्था या पितृसत्तात्मक संरचना में कामचलाऊ सुधार करने से समतामूलक समाज का निर्माण संभव नहीं. व्यापक एकता, सशक्त संगठन, दीर्घकालीन रणनीति और बहुयामी संघर्ष से ही कुछ मार्ग निकल सकता है. इसलिए इस विमर्श की क्षितिजे मानव मुक्ति के अन्य आंदोलनों के साथ संवाद रचती फैलती हैं. दलित स्त्री लेखन ने अन्य मुक्ति आंदोलनों के साथ खुद को जोड़कर मुक्ति की अवधारणा का तो विस्तार बढ़ाया ही है, परिवर्तन के लिए चल रहे समग्र संघर्ष को भी बहुमुखी और सघन बनाया है. इस प्रक्रिया का लक्ष्य पारंपरिक सत्ता-संरचना के स्वरूप और अंतर्वस्तु के बदलाव का है. इस दौरान यह पूरा साहित्य प्रवाह प्रचलित रूढ़ मानदंडों और मान्यताओं से अलग मौलिक भूमि पर रहकर अनिष्ट यथार्थ की अनेक स्तरीय मीमांसा के लिए प्रतिबद्ध दिखाई देता है. हाशिये के समुदायों, समाजों के यथार्थ की पड़ताल कर मुक्ति के उपायों की ओर गति करता है. भारतीय भाषाओं में में जो दलित नारी लेखन हो रहा है वह और दलित, आदिवासी तथा अन्य तमाम उत्पीड़ित और दमित समुदायों की नारी के प्रश्नों को साथ लेकर समग्र जेंडर के बारे में संघर्ष दर्शाता है. इसलिए मध्य वर्गीय व उच्च वर्गीय स्त्री समस्याएँ भी उसकी मीमांसा के दायरे में आ जाती हैं. और मानवता के संकट समान प्रश्न भी उसकी चिंता के केंद्र में रहते हैं. मानव मुक्ति के व्यापक दर्शन की संभावनाओं की थाह लेने का प्रयत्न इस लेखन में दिखाई देता है.


पड़ताल के समय जो कुछ सामग्री भारतीय भाषाओं से मिली थी उसमें से कुछ कविताएँ यहाँ पर साझा कर रहे हैं. उपर्युक्त परिप्रेक्ष्य में इन रचनाओं के भावविश्व और अंतर्वस्तु को देखा जा सकता हैं :   

                        
*जैसी हूँ वैसी ही 
     
(तेलुगु कविता)
      
   जाजुला गौरी 

चतुर्वर्ण व्यवस्था ने
धकेल दिया मुझे
छोर पर
बना दिया मुझे पंचमा
कर्म के सिद्धांत ने मुझे 
दिया अछूतपन
और निराधार होने की दशा

मेरे भोलेपन से
खेल खेलता ब्राह्मणवाद
निरंतर मुझे
भ्रष्ट करता रहा
उसकी आज्ञा मानकर
क्षत्रियों ने खींचा मुझे
पंचो की चौपाल तक 
खदेड़ दिया मुझे
मेरे गाँव से दूर 

इन दोनों के वारिस
वैश्यवाद ने भी
खाने का नसीब
न पाने वाली मुझको
धकेल दिया ऐसे काम की और
जहाँ काली मजदूरी के बदले में
दिया जाता हो
निरा छल-कपट
उन्होंने तराजू में तौलकर
कर दिया मुझे चूर चूर

पंचम वर्ण चिपका कर
निरंतर बेगारी करवा कर
मेरे लहू की
आखरी बूंद तक पी कर
शूद्रता ने भी किया
मेरा धार्मिक बहिष्कार
और मेरा पंचम भाई कहता है कि
मेरी बची-कुची हड्डियों का
वह कर देगा चूरा

एकता का मंत्र बहुत दिनों से
मेरा पीछा कर रहा है
इस पीडा को अब
ज्यादा सहन नहीं कर सकूंगी
समय आ गया है
मेरे लिए मेरी जगह ढूँढ़ने का
ठगी गई हूँ
मानवता विहीन मानवजात के
सहअस्तित्व से
कुचली गई हूँ कल, आज और
आने वाले कल के बीच
अब मैं जैसी हूँ
वैसी ही खुद रक्षण करूँगी

    ( अनुवाद-सहयोग : जाजुला गौरी ) 


*बचपन
   (पंजाबी कविता)
         सरोज  

एक सांवली मटमैली नदी
मेरे मन में तेजी से
बहने लगती
रोज, सबसे पहले जाग जाती

बिना मुँह धोये उठाने जाती गोबर
उपले बनाती मैदान में
अपने बचपन जैसी लम्बी चुनरी को
सिर पर संभालती
उपलों पर उँगलियों से उकेरती जाती चित्र
घर आकर धोती जूठे बर्तन
बचीकूची चाय की चुसकियाँ भरती
और घिसा हुआ यूनिफार्म पहन
चली जाती स्कूल

सबसे पहले दिखाती होमवर्क
प्रार्थना सभा में
पीछे खिसकती रहती                                      
अपने घिसे हुए यूनिफार्म को
छुपाने की कोशिश करती

एक सांवली मटमैली नदी
सुबह सबसे पहले जाग जाती
सबसे पहले स्कूल जाती
सबसे पहले जवाब देती
प्रार्थना सभा में पीछे खिसकती रहती
सुबह सुबह, हर रोज सबके सामने

           ( अनुवाद-सहयोग : गुरमीत कडियालवी )

*अग्नि 
    (
उड़िया कविता) 
         प्रतिभा भोई 

जब मैंने 
अपने संकल्प के साथ 
एक निर्भ्रान्त जीवन 
शुरू किया 
तब कहीं कोई एक कोने से 
आग सुलग उठी 

जब मैंने सिर उठाकर 
सीना तानकर खड़े होकर 
गाँव के रस्तों पर चलना शुरू किया 
तब कहीं कोई कोने में 
धधकता हुआ बारूद
इकट्‌ठा होने लगा 

जब मैंने मुँह खोलकर 
जरा सी उँची आवाज़ में 
शब्द का उच्चारण किया तो 
कहीं किसी कोने में 
वज्राघात हुआ 

दूसरे ने मेरी पीठ पर
घूंसा मारा 
जवाब में मैंने भी हाथ उठाया तो 
कहीं किसी कोने में
किसी की छाती में 
क्रोध का अग्नि सुलगने लगा 

याद रहे, 
मैं अछूत हूँ 
इसका मतलब यह नहीं कि 
मेरे हृदय में कई सदियों से छुपा हुआ 
होने का अहसास भी मर गया है 
या फिर मैं हो गई हूँ   
बिलकुल प्रतिक्रिया शून्य 

              (*
अनुवादसहयोग : बासुदेव सुनानी )
भगाणा की पीडिताओं के संघर्ष में स्त्रियां 





* सवर्ण भगवान 
    प्रियंका कल्पित 


पूरा समूह 
मुझे फेँक गया 
कूड़े करकट मेँ 
मुंह बंद 
और हाथ-पांव भी बंधे हुए 
गोबर के कीचड़ मेँ पड़ी हूं 
लथपथ 

मुझसे टकराने वाले ने 
पीछे मुड़कर देखा 
मेरे हाथ मेँ झाडू 
और गांव के बीचोबीच 
मुझ पर अत्याचार टूट पड़ा 

मेरे भीतर प्रश्न 
मंडराने लगा 
लोग तो ठीक 
सामने मंदिर मेँ बैठे 
भगवान ने भी 
मुझे क्योँ न बचायी ? 
क्या उसके भी आड़े आया होगा 
मेरा अछूतपन ? 

इसीलिए तो 
दीवार की दरारों से 
अनुकंपा का हाथ 
आगे बढ़ाने की बजाए   
उसकी पत्थर की आंखे 
हो गई थी एकदम 
अंगारे-सी लाल 
और देख रही थी मेरे सामने ! 



*बरतन वाली स्त्री
   (पंजाबी कविता)
      
चरनजोत कौरजोत’

वह स्त्री
जीवन के आखरी पडाव पर है
बूढ़ापे की लकड़ी से
कुछ टटोलती
ढ़ूंढ़ रही है कुछ

वह स्त्री
जिन्दगी की सांझ ढलते ही
दो टुकडे रोटी के लिए
धुंधली आँखों से
उजाले को ढूँढ़ रही है

पत्थर जैसे हाथ से
लोगों के जूठे बरतन साफ करने की
पीड़ा सहन करती
मुरझाए चहरे वाली
वटवृक्ष सी टेढ़ी मेढ़ी
अवमानना पाती आ रही
तिरस्कृत
अकेली अकेली बुदबुदाती बातें करती
वह दूसरी कोई नहीं
मेरे गाँव की दलित स्त्री है

          (अनुवाद-सहयोग : गुरमीत कडियालवी)

*साफ-सफाई 
   (
तेलुगु कविता) 
        जूपाका सुभद्रा 

जलते हैं मेरे पाँव के तलुए
सूरज की जलती धूप में
खाली मटका लेकर
जब पानी भरने निकलती हूँ
जरा खडे रहकर
मुझे मेरे संघर्ष की बात कहने दो

मुँह अंधेरे जागती हूँ
और जाती हूँ जमींदार के घर
आंगन साफ करूँ और कूड़ा उठाऊँ
ढोर को पीने का पानी
टंकी में भरूँ
बाड़े से गोबर और गंदगी हटाऊँ
और सबकुछ सिर पर उठाकर
फेंक आऊँ दूर

मेरे अपने घर तो काम करने का
वक्त ही न मिले
मजदूरी के बदले में
मिलता बासी खाना

ठूंठे जैसा झाडू और छाज पकड़
मेरी कच्ची-पक्की झोंपड़ी बुहारू
तभी दहलीज पर ढल पडूँ
पटेल मेरे पीछे पड़ा है

ऊँची साँस, जैसे तैसे कर
धूल में बिखरे अन्न को इकट्ठा करूँ
उसे झाड़झपट कूटने लगूँ
फिर भी एक मुट्ठी भी
इकट्ठा ना हो पाता
ढेर एक बालू छानकर
मिट्टी से अलग करूँ
फिर भी दानों का नाप
न निकाल सकूँ
बताओ, कब पूरे होगे
जिन्दगी के ऐसे बंधन ?

          (डॉ. के. पुरुषोत्तम के इंग्लिश अनुवाद के आधार पर)


*टूटी हुई झोंपड़ी का गीत 
    (
कन्नड़ कविता ) 
          अनुसूया कांबले


मेरी कविताएँ –
अंधेरे में लपलपाती ज्वालाएँ,
टूटी हुई झोंपड़ी के गीत,
झूठे उसूल बोने वालों के सामने
फेंके गए सचेत प्रश्न.

मेरी कविताएँ -
उजले रास्ते के मुसाफिर,
गाँव को सजाने वालों के आत्मकथ्य,
फेंके गए जूठे फलों जैसे इन्सानों को
ढूँढती रहती काली चींटियाँ.

मेरी कविताएँ -
खीँच लेने के बाद भी
उग निकलती घास,
रात-दिन कमरतोड़ मेहनत करके -  
थके लोगों के पसीने की बूंदें,
उठा कर ले आती रोज रोज
भूख की क्रूरता के बीच

मेरी कविताएँ -
जूझ रहे लोगों की पदचांप.
पवित्रता के बद्ध पंखों को
तोड़ने वाली, 
तथाकथित पाखंडी संस्कृति पर
सवालिया निशान लगाने वाली,
छाती का दूध पीकर पलें  
फिर भी पल्लू को चुराने वाले जो हैं
उनके सामने खिले गुलमहोर.

मेरी कविताएँ -
सुबह-सुबह मुँह अंधेरे सुगंधित फूल,  
खिलखिलाते बच्चों के
नाजुक कोमल मार्ग,
मठ, मंदिर, गिरिजाघरों में जो
रक्त के छींटे हैं
उन्हें पोंछने के लिए आए
श्वेत कबूतर.


( अनुवाद-सहयोग : महादेवी कणवी ) 



*तृषा
    दक्षा दामोदरा


पथ के उपेक्षित पत्थर की तरह 
युगोँ से ठुकराये गए मनुष्यो की 
एषणाओँ को पुकारना है 
देना चाहती हैँ वे आवाज 
लेकिन उन्हेँ याद नहीँ रहा है नाम

कण्ठ मेँ जम गए हैँ 
न जाने कितने ही शोष 
न जाने कितने ही जन्मोँ से ! 
रक्त की प्रत्येक बूंद 
बह निकलती है आंसूओँ के साथ 
फिर भी  होता नहीँ उनका शमन

सांस भी यहां दमती  है 
पांव मेँ सुप्त पड़े तेजवंत तोखार की 
हेषाओँ को 
दौड़ पड़ना है... ज्वाल की जलगति से 
आगे बढ़ जाना है 
उन्हेँ धंसती हुई बाढ़ की तरह 
पर खो गया है वह गांव


एकदम विवश हैँ
कहां जाए?
अंतरपट का हरेक तार
कोराकट्ट
विदीर्ण होता जाए
गात्र को चीरती निकलती व्याकुल तृषा
तृषा तृषा
बरसती  धुआंधार
युगोँ से ठुकराये गए मनुष्योँ के
दोनोँ तट पर
तृषा बहती जाती है 



*स्त्रीवादी साहित्य पर सेमिनार
    (मलयालम् कविता)
         वलसला बेबी

स्त्रियों के जलते प्रश्न
उन तितलियों जैसे
जो सुलगकर मरती हैं
तपती कड़ाही से आग में

एजेण्डे पर पहला प्रश्न :
अब नहीं चाहिए घर घर में  
नाईट गाउन
सिर्फ बरमूड़ा !

एजेण्डे पर दूसरा प्रश्न :
अब नहीं चाहिए लम्बे बाल
सबके लिए बस बॉयकट

एजेण्डा पर तीसरा प्रश्न :
अब नहीं चाहिए रसोईघर
धिक्कार हो ऐसी क्षुल्लक चीजों पर

एजेण्डे पर चौथा, पाँचवाँ
छट्ठा, सातवाँ... अठारहवाँ
अठारहवें प्रश्न पर हो गए सांसद
आरक्षण द्वारा !
कम से कम तीस
महनती व्यक्ति चाहिए

हर सुबह
निराशा से भरी है, आपको पता है ?
शांत आन्दोलन चलाएँ
भारत को बचाएँ
यहाँ आओ प्रिय जन,
बाय बाय कोमरेड !

आप अपनी चर्चा जारी रखें
आओ पिछली कतार में
आप कौन सा प्रश्न लेकर आए हैं ?
'फटेहाल झोंपड़ियों और
दो पैसे का प्रश्न  
घूरते फ्लेटों ने घेर लिया है
नहीं टोइलेट जैसी सुविधाएँ.'

'अब
यह सब भूल जाओ !'

    ( अजय शेखर के इंग्लिश अनुवाद के आधार पर )



*उनसे पूछें 
   (बांग्ला कविता) 
        स्मृतिकना होवलादर  

भूमंडलीकरण के इस दौर में
दलित, शोषित और उत्पीड़ितों को
कई सारी चीज़े आपस में बाँटनी होगी,
चलो, हम उनसे पूछें...

भारतीय लोगों की पहचान क्या है ?
किसने लिखा है इतिहास अपने प्रेम से
और पाई है आज़ादी,
किसलिए वे सब बिना घरबार के भटक रहे हैं ?
चलो, हम उनसे पूछें...

रंगबिरंगी कई सारे झंडे
फहरा रहे हैं ऊँचे और ऊँचे,
शोषित कुचले लोगों ने
अपने प्राणों की आहुति दी,
पर बदले में क्या मिला ?
उनकी अपनी जमीन जोतने का अधिकार
उन्हें खोना पड़ा,
शोषक और शोषित के बीच का संघर्ष
अनवरत चलता ही आया है,
रहते हैं ग़रीब आखिर तो ग़रीब ही.

हमने आज़ादी पाई
हमारा रक्त अर्पण करके
पर यह आज़ादी है कि ग़ुलामी ?
चलो, हम उनसे पूछें...

                                         (
डॉ. जयदीप सारंगी के इंग्लिश अनुवाद के आधार पर )  
फारूक शाह 

फारूक शाह से  farook.shah.75@facebook.com पर संपर्क किया जा सकता है . 
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