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ऊप्स मूमेंट : स्त्री को देह बनाते कैमरे

मनीषा मिश्रा के साथ संजीव चन्दन

पुरुषों की सत्ता सिर्फ भौतिक प्रक्रिया नहीं है, यह स्त्रियों का अनुकूलन करती है समाज में पुरुष वर्चस्व के प्रति. यह हर पल उसकी दैहिक स्थिति का उसे अहसास देकर , कई बार स्वतंत्रता का भ्रम देकर उसे देह केन्द्रित करते हुए उसके दोयम हैसियत को सुनिश्चित करती रहती है. कुछ दिन पहले ही एक अपेक्षाकृत प्रगतिशील माने जाने वाले अखबार में एक खबर देखने को मिली , ‘करीना कपूर का ऊप्स मूमेंट’ . खबर के साथ तस्वीर थी , जिसमें करीना की ब्लाउज के स्ट्रेप्स पर एक पिन लगी थी , जिसे ऊप्स मूमेंट बताया गया था. इस नए शब्द से परिचय के बाद जब हमने देखा तो पता चला कि ऊप्स मूमेंट की तस्वीरें प्रायः हर प्रमुख वेबसाईट पर है , टाइम्स और इण्डिया , इन्डियन एक्सप्रेस , नवभारत टाइम्स आदि के. इन तस्वीरों को देखते हुए सहज ही समझा जा सकता है की कैमरे की लेंस , जो पुरुष है , पुरुष के द्वारा संचालित है , स्त्री को कैसे देह तक सीमित करने के अभियान से संचालित होती है. यह स्त्री के अनुकूलन की प्रक्रिया भी है. कैमरे ने काम करती अभिनेत्रियों , पार्टी में उपस्थित अभिनेत्रियों , रियलिटी शो की अभिनेत्रियों ,खेलती खिलाडियों के देह दृश्य को चुराकर प्रस्तुत किया है , इस धारणा के साथ कि उसका दर्शक/ पाठक पुरुष है.

किसी स्त्री / सेलिब्रेटी के ब्लाउज में दीखता साधारण पिन आखिर ऊप्स मूमेंट क्यों है , क्या यह निम्नवर्गीय स्त्रियों का अपमान नहीं है , जो एक दो कपड़ों को सालों पहनती हैं , पिन या पैबंद इ साथ

मेल गेज
1975 में अपने एक आलेख में Laura Mulvey ने मेल गेज को स्त्रीवादी दृष्टि से व्याख्यायित किया था. उन्होंने स्पष्ट किया था कि सिनेमा के कैमरों के पीछे चुकी पुरुष आंखे होती हैं इसलिए सिनेमा ‘दृश्य रति’ के साधन होते हैं. खुद स्त्री भी , जो सिनेमा में काम कर रही होती है , अपने भीतर मेल गेज आत्मसात कर लेती है, उसे यह आभास होता है कि उसे कोइ पुरुष आँख देख रहा होता है , इसलिए उसे उसके अनुरूप दिखाना चाहिए ,धीरे –धीरे अपने को देखने का तरीका भी उनके खुद के भीतर के मेल गेज से तय होता है. दृश्य रति के लिए सीन चुराते कैमरे का दर्शन यही है. स्त्रियों ऊप्स मूमेंट की इन तस्वीरों को देखते हुए समझा जा सकता है कि न सिर्फ कैमरा बल्कि समाज का पुरुष –दर्शन उन्हें उनकी देह तक केन्द्रित करने के अभियान में लगा है.इस प्रक्रम में कई बार वे स्वयं भी अपने भीतर के मेल गेज से संचालित होती हैं , यानी एक –दो मामले जान बूझ कर कैमरों को खुराक देने के भी सामने आये हैं.

सिर्फ कैमरा या दर्शक ही नहीं मेल गेज से संचालित होते हुए दृश्य रति का आनंद लेता है साथी कलाकार भी , हां आमीर खान जैसा सुपर स्टार भी , जो संवेदनशील माना जाता है , नायिका , कैटरीना यद्यपि इस चोरी से बेपरवाह हैं लेकिन मीडिया की ये तस्वीरे आगे से उन्हें सहज नहीं रहने देंगी .

जब हम अपने आस-पास यह देख रहे होते हैं कि स्त्रियाँ यौन हिंसा का शिकार हो रही हैं , उनपर शाब्दिक , मानसिक और शारीरिक प्रहार हो रहे हैं तो इसमें भूमिका के तौर पर न सिर्फ सामंती पुरुष की मानसिकता दिखती है , बल्कि आधुनिक उपकरणों से लैस आधुनिक पुरुष की मानसिकता भी दिखती है. बड़े –बड़े कुबोल सुनने को मिल रहे हैं , कोइ नेतृत्वकर्ता विरोधी राजनीतिक स्त्रियों पर बालात्कार की बात कर रहा है तो कोइ एक प्रदेश की लड़कियों को दूसरे प्रदेश के लड़कों को सौपने की बात कर रहा है, उस प्रदेश के लड़कों को जहां , लडकियां जन्म के साथ ही मार दी जाती हैं. कोइ बड़ा नेता भारतीय संस्कृति की दुहाई देते हुए कंडोमो के बहाने स्त्रियों की यौनिकता पर हमला कर रहा है. दरअसल जब कभी आधुनिक यौन –व्यवहारों पर कोई टिप्पणी की जाती है ,तो स्त्रियों की यौनिकता को खतरनाक और नकारात्मक सिद्ध करने की प्रवृत्ति अन्तर्निहित होती है . जबकि पुरुषों की आक्रामक यौनिकता समाज के लिए ज्यादा खतरनाक है .

वातावरण बनाती मीडिया

आम तौर पर तो ऐसे बयानों के प्रति मीडिया का रुख स्त्रियों के पक्ष में होता है , लेकिन यही मीडिया बाजार के दर्शन से संचालित होते हुए अपने पाठकों , दर्शकों को पुरुष मानते हुए निरंतर ऐसे प्रसंगों का आयोजन करती रहती है, जिसमें स्त्री एक देह में तब्दिल होकर पुरुष यौनिकता को संतुष्ट करती रहती है. ऐसा ही एक आयोजन है , ऊप्स मूमेंट की तस्वीरें जारी करना. ऐसा करते हुए मीडिया भाषा के स्तर पर भी स्त्रीविरोध का वातावरण बनाती है. देह दृश्यों को चुराते हुए कैप्शन लिखना ‘ SHOWING ASSETS’ ऐसे ही अभियान का हिस्सा है , यह वही  भाषा है , जो किसी पुरुष  नेता को किसी महिला  नेता के लिए ‘ टंच माल’ कहने का प्रशिक्षण देती है.
उल्लेखनीय तो यह भी है कि यही ऊप्स मूमेंट पुरुषों के मामले में अपना अर्थ बदल लेते हैं . पुरुष के मामले में ऊप्स मूमेंट है उनका ‘ स्लिप ऑफ टंग’ , उनका गिर पड़ना या किसी साथी महिला को घूरते हुए कैमरे में कैद होना. इस आलेख की व्याख्याओं के लिए अखबारों के वेब साईट पर पाए जाने वाले प्रायः कम अश्लील तस्वीरों को शामिल किया गया है . तस्वीरों के साथ कैप्शन हमारे हैं , इस व्याख्या के अनुरूप.

सवाल है कि यह सांस्कृतिक आक्रमण क्या सिर्फ सम्बंधित महिला पर ही होता है ! नहीं मेल गेज को संतुष्ट करता हुआ यह प्रक्रम सभी दर्शक महिलाओं का अनुकूलन करती है और उन्हें अपनी देह के प्रति हीनता भाव से भर देती है या अतिरिक्त सजग कर देती है. करीना कपूर की ब्लाउज में साधारण पिन का लगा होना , और उसका कैमरे में कैद हो जाना न सिर्फ सामान्य महिलाओं के सौन्दर्य बोध पर प्रहार करता है , बल्कि उनकी हैसियत के प्रति उन्हें आगाह भी कर देता है. इसके साथ ही ऐसे दृश्य महिलाओं को उनके सोशल स्टेट्स से अलग करते हुए उन्हें एक स्त्री होने और एक देह होने के अहसास से भर देते हैं. यह उस मीडिया और उसके कैमरे द्वारा किया जाता है , जो नेताओं के कुबोलों पर तो खूब सक्रिय होती है , लेकिन अपने यहाँ ऐसे ही स्त्रीविरोधी माहौल को पोषित करते हुए स्त्रीकर्मी को आत्मह्त्या करने तक को बाध्य करती है ( तनु शर्मा प्रकरण). मेरे खुद के अनुभव में यह शामिल है कि महाराष्ट्र में एक बड़े अखबार के सम्पादक के पास जब मैं बैठा था , वहा महिला खिलाड़ियों की कुछ तस्वीरें आईं , वे सारी तस्वीरें खेल कम और देह दर्शन की तस्वीरें ज्यादा थीं. यह सब इस कारण से है कि यह समाज , यह बाजार पुरुष दृष्टि और उसके दर्शन से संचालित है, जहां किसी शक्तिशाली दिखती स्त्री की आत्महत्या का प्रयास कोइ चौकाने वाली बात नहीं होती.

पुरुषों का ऊप्स मूमेंट यूं ही गिर पड़ना या स्लिप ऑफ टंग होता है

संजीव चन्दन और मनीषा मिश्रा से क्रमशः themarginalised@gmail.com तथा manishamishra559@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है .

हम चार दशक पीछे चले गए हैं :

आयडवा और पी यू सी एल की  अपील

( याद होगा कि महिला आंदोलनों की वजह से महिलाओं के खिलाफ उत्पीडन को लेकर क़ानून सख्त हुए थे, कुछ कानूनों में अभी तक बदलाव हो
रहे हैं. लेकिन ये सारे बदलाव और पुरुष के द्वारा महिला के खिलाफ हिंसा को
रोकने के लिए बने / बनाए जा रहे सख्त क़ानून निरीह ( !) पुरुषों की एक ऐसी
जमात पैदा करते हैं , जो इन कानूनों के माध्यम से पुरुषों की प्रताड़ना के
तर्क और शोर –शराबे के साथ उपस्थित होते हैं. न्यायपालिका में बैठा पुरुष
इस बार इन शोर –शाराबो से खासे प्रभावित होकर बेहद मर्दवादी भाषा में दिशा
निर्देश लेकर आया है. उच्चतम न्यायालय के न्याधीश चन्द्रमौली कुमार प्रसाद
और पिनाकी चन्द्र घोष ने ये निर्देश अर्नेश कुमार बनाम बिहार सरकार के
मामले में दिये हैं  . ऐसी सोच इस मानसिकता से पैदा होती है कि ‘महिलाओं पर
पुरुषों के द्वारा थोड़ी बहुत हिंसा जायज है’  . आज जब दहेज़ मौतों की संख्या नेशनल क्राइम ब्यूरो के २०१० के आंकड़े के अनुसार ८३९१ है , यानी हर ९० मिनट में एक दहेज़ ह्त्या हो जाती है , तब इसमें सजा का दर निरंतर घटता जा रहा है , २०१२ के १४.८% सजा के मुकाबले २०१३ में ११. ९१ % मामलो में सजा हुई . बहुत से मामले तो पुलिस , कोर्ट –कचहरी के अमानवीय रुख के कारण थानों तक पहुंचते ही नहीं हैं. सेंटर फॉर सोशल रीसर्च के एक अध्ययन के अनुसार ४९८ (अ) के  ३० सैम्पल मामलों में से एक भी ऐसा मामला नहीं था , जिसमें सिर्फ इस धारा के कारण सजा हुई हो. जबकि इसमें से अनेक मामलों में केस दर्ज करने के पूर्व तक महिलायें  कम से कम ३ सालों से शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न सहती रही हैं, इनमें से मात्र ६.५% मामले ही फर्जी थे. तो इतने कम मामलों के लिए न्यायालयों में बैठा पुरुष चिंतित है , बल्कि क्रोधित है . २००३ में ही सरकार की एक समिति ने इस धारा को समझौते के योग्य ( Compoundable ) बनाने की सिफारिश की थी . २०१० में उच्चतम न्यायालय ने ४९८ ( अ ) में संशोधन के निर्देश दिए , ताकि इसका बेजा इस्तेमाल रुक सके, २०१२ में लॉ कमीशन ऑफ इण्डिया ने भी ऐसी ही संस्तुति की. और अब यह ताजा निर्णय. इस निर्णय के खिलाफ पी यु सी एल और आल इंडिया डेमोक्रेटिक असोसिएशन (  आयडवा ) ने आक्रोश जाहिर करते हुए अपील जारी की है. पटना में स्त्री अधिकार कार्यकर्ता इकट्ठे हो रहे हैं   / संजीव चन्दन )


पी यू सी एल की पहल

भारतीय दंड संहिता की धारा  498 (अ) – दहेज कानून , के मामले में उच्चतम न्यायालय के न्याधीश चन्द्रमौली कुमार प्रसाद और पिनाकी चन्द्र घोष के न्यायिक निर्णय पर गौर करें . यह निर्णय उन्होंने अर्नेश कुमार बनाम बिहार सरकार के मामले में दिया है . य़ह एक खतरनाक निर्णय है , जो हमें 4 दशक पीछे धकेल देता है. यह निर्णय न सिर्फ दहेज की धारा 498 ( अ ) तक या दहेज निवारण कानून ( Dowry Prohibition Act) की धारा चार तक ही सीमित है बल्कि यह सात सालों तक की सजा वाले प्रावधान के दूसरे अपराधों को भी अपने दायरे में लेता है. जरूरत है कि बिहार सरकार से  इस निर्णय में सुधार के लिए आवेदन करने ( curative
petition) के लिए हम आग्रह  करें. संयोग से बिहार सरकार एन डी ए के भागीदार पर्टियों की सरकार नहीं है , इसलिए हमें इससे सम्वाद बनाने में मुश्किल भी नहीं होगी . इसके अलावा हमें भारतीय महिला आयोग को भी समझाना होगा कि उनके हस्तक्षेप की भी जरूरत है.

न्यायिक निर्णय के पहलू

जहां तक दंड संहिता 498 ( अ) का सवाल है , इसके तहत कोई गिरफ्तारी अब नहीं होगी. न्यायालय के निर्देश ई क़ॆ अनुसार, ‘ गिरफ्तार न करने के निर्णय को केस दर्ज होने के दो सप्ताह के अन्दर स्थानीय मजिस्ट्रेट को केस की कापी के साथ भेजना होगा , जिसकी अवधि  पुलिस अधिक्षक  के द्वारा लिखित कारणों के साथ  बढाई जा सकती है.’ इसका मतलब है कि यदि पुलिस दो सप्ताह के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचती है कि गिरफ्तारी जरूरी है , उसे मजिस्ट्रेट से अनुमति लेनी होगी. इस तरह एक संज्ञेय अपराध असंज्ञेय अपराध में तब्दिल हो जाता है और इस तरह यह गिरफ्तारियों को हतोत्साहित करता है .

निर्देश के बिन्दु  जे अनुसार ‘ निर्देशों के अनुपालन में कोताही करने पर  सम्बन्धित पुलिस अधिकारी विभागीय कारवाई का पात्र होगा और वह न्यायालय की अवज्ञा के लिए सजा का भी पात्र होगा, जो सम्बन्धित उच्च न्यायालय के द्वारा निर्धारित होगी.’ इस प्रकार के प्रावधान के बाद पुलिस क्योंकर कोई कारवाई करना चाहेगी.  हमें वास्तव में यह कहना चाहिए कि सी आर पी सी की धारा 41 ( जो पुलिस को गिरफ्तार करने की शक्ति देती है ) को ही सी आर पी सी से समाप्त कर देना चाहिए और किसी की भी गिरफ्तारी पर रोक लगनी चाहिए. क्योंकि यदि आप घरेलू हिंसा के मामले में एक अपवाद पैदा कर रहे हैं , तो इसे सबके लिए कर दो, खासकर माओवाद और आतंकवाद के नाम पर होने वाली गिरफ्तारियों के मामले में . यहां जो यह प्रावधान किया गया है कि दो सप्ताह में मजिस्ट्रेट को यह सूचित करना है कि कोई गिरफ्तारी नहीं होगी , यह पुलिस को गिद्ध की तरह झपट्टा मारने की व्यव्स्था देता है कि किसी को भी ,  सौ प्रतिशत विकलांग साइ बाबा  जैसों को उनके कालेज से, या जो देश के विभिन्न जेलों में बन्द हैं उन्हें उनके घरों से उठा ले जाये.
मैं सही मायने में गुस्से में हूं , यह निर्णय आपराध –कानूनों की समाप्ति  है.

हमलोग अपने वकीलों से सलाह ले रहे हैं कि आखिर यह हुआ क्या है , इसका क्या असर है और इसके अनुरूप ह्म अपने बयान जारी करेंगे .

न्यायालीय निर्णय के कुछ अंश :

‘ कुछ वर्षों में वैवाहिक-विवादों के मामले अभूतपूर्व रूप से बढे हैं. इस देश में विवाह संस्था को बहुत आदर प्राप्त है. भारतीय दंड संहिता की धारा 498 ( अ ) की व्यवस्था स्त्रियों का उसके पति और रिश्तेदारों के द्वारा होने वाले उत्पीडन के खतरे को कम करने के घोषित उद्देश्य से की गई थी.  यह एक तथ्य है कि 498 ( अ ) एक संज्ञेय और गैर जमानती अपराध है , जिसने इसे उन दोहरे प्रभाव वाले प्रावधानों में मह्त्वपूर्ण बना दिया है , जिनका अस्ंतुष्ट पत्नियों द्वारा एक हथियार की तरह इस्तेमाल होता है , न कि अपनी रक्षा के प्रावधान की तरह. उत्पीडन का सबसे आसान तरीका है कि पति और उसके रिश्तेदारों को इस प्रावधान के तहत गिरफ्तार करवा दिया जाय. कई मामलों में पति के बिस्तर पकड चुके दादा , दादियों और दशकों से विदेशों में रह रही बहनों, तक की गिरफ्तारी हुई है. गृह मंत्रालय के  नेशनल क्राइम रेकार्ड ब्युरो  के 2012 के आंकडों के अनुसार 2012 में 1,97,762 लोग 498 ( अ ) के तहत गिरफ्तार किये गये हैं , जो 2011 की तुलना में 9.4% अधिक है. इनमें एक चौथाई महिलायें गिरफ्तार हुई हैं , जो यह बतलाता है कि पतियों की मातायें और बहनें बडी तत्परता से उनके गिरफ्तारी के जाल में फंसाई गई हैं . यह संख्या भारतीय दंड संहिता के तहत हुई कुल गिरफ्तारियों की 6% है. यह भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धारओं में हुए अपराधों का 4.5% है , जो चोरी और घायल करने के अपराधों से भी ज्यादा है.  इस धारा के तहत चार्जशीट दाखिल होने के मामले में यह शिखर पर  है ( 93.6% ), जबकि 15% ही इसमें दोषी ठहराये जाते हैं, सभी मामलों मे न्यूनतम है. इसके 3,72,706 मामले अभी विचाराधीन हैं , जिसमें से 3,17,000 मामलों में दोषमुक्ति का निर्णय ही सम्भाव्य है.’

‘ हिरासत की शक्ति बहुत संगीन है . यह व्यक्ति की स्वतन्त्रता को प्रभावित करता है और इसका इस्तेमाल बहुत ही सजगता से होना चाहिए. हमारा अनुभव कहता है की इसका प्रयोग उतनी गंभीरता के साथ नहीं होता है, इसके लिए  जितनी गंभीरता की जरूरत है. कई मामलों में हिरासत बहुत ही सतही और लापरवाह तरीके से एक रूटीन की तरह की जाती है. इसके पहले कि कोइ मजिस्ट्रेट सी आर पी सी की धारा १६७ के तहत गिरफ्तारियों को अधिकृत करे , उसे पूरी तरह संतुष्ट हो लेना चाहिए कि जो गिरफ्तारी हुई है , वह क़ानून के दायरे में है और व्यक्ति के संवैधानिक अधिकार सुनिश्चित कर लिए गए हैं. यदि पुलिस अधिकारी के द्वारा की गई गिरफ्तारी सी आर पी सी की धारा ४१ के प्रावधानों को पूरी नहीं करती है , तो मजिस्ट्रेट बाध्य है कि वह गिरफ्तारी को अधिकृत न करे और अभियुक्त को मुक्त कर दे. दूसरे शब्दों में , जब एक अभियुक्त मजिस्ट्रेट के सामने लाया जाता है , तब पुलिस अधिकारी , जिसने उसे गिरफ्तार किया है , को उसकी गिरफ्तारी के तथ्य ,  कारण और गिरफ्तारी के निष्कर्ष को रखना होगा और मजिस्ट्रेट को तब संतुष्ट होना होगा की गिरफ्तारी के जो कारण बताये गए हैं , वे पर्याप्त हैं , तभी वह उसे अधिकृत कर सकेगा. इसके पहले कि हिरासत के लिए  मजिस्ट्रेट अनुमति दे , उसे अपनी संतुष्टि के आधार को रिकार्ड पर रखना होगा , भले ही संक्षिप्त , लेकिन यह संतुष्टि उसके आदेश में प्रतिबिंबित होने चाहिए. इसे पुलिस अधिकारी के अनुमान पर आधारित नहीं होना चाहिए. उदाहरण के लिए , यदि पुलिस अधिकारी को यह लगता है कि अभियुक्त को आगे किसी अपराध करने से रोकने के लिए , या समुचित जांच के लिए या साक्ष्यों से छेड़छाड़ की आशंका को रोकने के लिए  गिरफ्तारी जरूरी है , तो उसे मजिस्ट्रेट के सामने उसके तथ्य , उसके कारण और कागजात पेश करने होंगे, जिनके आधार पर वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा है. मजिस्ट्रेट इसके पहले किगिरफ्तारी को अधिकृत करे , उन सबको पढ़ना होगा और अपनी संतुष्टि को रिकार्ड में लाने के बाद ही उसे अनुमति देनी होगी.  यदि कोइ संदिग्ध मजिस्ट्रेट के पास लाया जाता है , हिरासत की स्वीकृति के लिए , तो मजिस्ट्रेट को यह देख लेना चाहिए कि गिरफ्तारी के ख़ास कारण रिकार्ड पर रखे गए हैं की नहीं, और यदि रखे गए हैं , तो वे कारण प्रथम दृष्टया प्रासंगिक हैं , और यह भी कि पुलिस अधिकारी के द्वारा एक तार्किक निष्कर्ष दिया गया है कि संदर्भित कोइ कारण गिरफ्तारी की जरूरत को पुष्ट करता है. कम से कम इतनी न्यायिक समीक्षा एक मजिस्ट्रेट जरूर करे.’

तथाकथित गैरजरूरी गिरफ्तारियो और लापरवाह तथा यांत्रिक हिरासत को रोकने के लिए न्यायालय ने निम्नलिखित निर्देश दिए हैं.
क़  ) सभी राज्य सरकारों अपने पुलिस अधिकारियों को निर्देशित करें की वे  498 ( अ ) के तहत मामले रजिस्टर किये जाने के बाद  स्वतः गिरफ्तारियां न करें , बल्कि वे पहले उपर्युक्त मापदंड, जो सी आर पी सी की धारा ४१ से स्पष्ट हैं, के तहत संतुष्ट हो लें.
ख )   सभी पुलिस अधिकारियों को चेक लिस्ट दिए जाएँ, जिनमें धारा ४१ ( १) और (२) की उपधाराएं उल्लिखित हों.
ग )  पुलिस अधिकारी आगे की हिरासत के लिए मजिस्ट्रेट के सामने अभियुक्त को ले जाने के पहले पूरी तरह  भरे गए चेकलिस्ट और गिरफ्तारी के आधार और कागजात को पेश करेगा.
घ )  मजिस्ट्रेट हिरासत को अधिकृत करने के पहले पुलिस अधिकारी के द्वारा पेश किये रिपोर्ट को पढ़े और संतुष्ट होने पर ही हिरासत को अधिकृत करे.
च )    गिरफ्तार न करने के निर्णय को केस दर्ज होने के दो सप्ताह के अन्दर स्थानीय मजिस्ट्रेट को केस की कापी के साथ भेजना होगा , जिसकी अवधि  पुलिस अधीक्षक  के द्वारा लिखित कारणों के साथ  बढाई जा सकती है.’
छ  )  सी आर पी सी की धारा ४१ के तहत अभियुक्त को उपस्थित होने की नोटिस केस दर्ज होने के दो सप्ताह के भीतर दी जाय , जिसकी अवधि  पुलिस अधिक्षक  के द्वारा लिखित कारणों के साथ  बढाई जा सकती है.
ज )  निर्देशों के अनुपालन में कोताही करने पर  सम्बन्धित पुलिस अधिकारी विभागीय कारवाई का पात्र होगा  और वह न्यायालय की अवज्ञा के लिए सजा का भी पात्र होगा, जो सम्बन्धित उच्च न्यायालय के द्वारा निर्धारित होगी.
झ )  हिरासत को बिना कारण रिकार्ड किये हुए अधिकृत करने पर संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट सम्बंधित उच्च न्यायालय के द्वारा विभागीय कारवाई का पात्र  होगा.
ट  ) हमलोग यह भी यहीं सुनिश्चित कर दें कि उपर्युक्त निर्देश सिर्फ भारतीय दंड संहिता की धारा  ४९८ (अ) के या दहेज़ निवारण क़ानून की धारा ४ के तहत ही सिर्फ लागू नहीं होगा, बल्कि यह उन मामलों पर भी लागू होगा जिनमें सजा का प्रावधान ७ साल का है , या जिनमें सजा ७ साल तक बढ़ाई जा सकती है, बिना आर्थिक दंड  के या आर्थिक दंड  के साथ
ठ ) हमलोग यह निर्देशित करते हैं की इस निर्णय की कॉपी सभी राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों के के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक तथा सभी उच्च न्यायालयों के रजिस्ट्रार जनरल को अग्रसारित किये जाएँ ताकि इसका आगे प्रसार हो सके और इसका पालन सुनिश्चित किया जा सके.

आयडवा का बयान
आयडवा उच्चतम न्यायालय के द्वारा दहेज़ उत्पीडन के मामले में की गई टिप्पणी (मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक़ ) के प्रति गंभीर दुःख और निराशा व्यक्त करती है. न्यायालयों को यह पूरा अधिकार है की वह किसी ख़ास केस में ख़ास आदेश पारित करे, जबकि इसका कोइ कारण नहीं है कि वे आदेश सभी दहेज़ उत्पीड़नों के मामले में लागू हों, और अनुपालन न होने की स्थिति में न्यायालय की अवमानना की धमकी के साथ उन्हें अनिवार्य  किया जाय.
खैर , यह हमारा अनुभव है कि कई राज्यों में पहले से ही दिशानिर्देश हैं कि ४९८ ( अ ) , दहेज़ , के मामले कैसे देखे जाएँ. वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को पहले से ही गिरफ्तारी करने या न करने के कारण ऍफ़ आ आर दर्ज होने के बाद लिखने होते हैं , जो न्यायालय के द्वारा समीक्षा के विषय होते हैं. प्रायः गिरफ्तारियां पुलिस के द्वारा पर्याप्त छानबीन के बाद ही की जाती हैं. इसलिए हमारा मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश स्थितियों की समझ के आधार पर नहीं है, और यह जमीनी सच्चाई के प्रति नासमझी को अभिव्यक्त करता है.
हमलोग इस बात से भी व्यथित हैं कि माननीय न्यायालय ने यह टिप्पणी की है की ४९८ (अ) असंस्तुष्ट पत्नियों के दवारा हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है. इस तरह की भाषा,  हिंसा की शिकार स्त्रियों को नीचा दिखाती है और देश के उच्चतम न्यायालय को यह शोभा नहीं देती है, जिससे हम मानवाधिकारों की रक्षा की उम्मीद करते हैं.  हम भयभीत हैं कि यह उन प्रतिगामी शक्तियों की मदद करेगी , जो पहले से ही इस धारा को कमजोर करने , जमानती और आपसी समाधान के योग्य बनाने के लिए दवाब बना रही हैं.

यद्यपि न्यायालय ने गिरफ्तार लोगों के अपमानित होने पर अपनी चिंता जाहिर की है , हम स्पष्ट करना चाहते हैं कि हजारो महिलाएं, जो प्रतिदिन शारीरिक और मानसिक हिंसा के कारण रोज –रोज अपमान और शर्म से गुजरती हैं.प्रायः सभी अध्ययन यही कहते हैं कि उनमें से बहुत कम ही पुलिस थानों तक पहुँच पाती हैं, और उनसे भी कम न्यायालयों से न्याय प्राप्त कर पाती हैं. हम माननीय न्यायाधीशों से अनुरोध करते हैं कि वे अपने आदेश पर पुनर्विचार करें, खासकर पुलिस थानों के यथार्थ को देखते हुए, जो यह बतलाते हैं कि देश भर में महिलाओं के खिलाफ बढ़ाते अपराध का कारण ४९८ ( अ) का बेजा इस्तेमाल नहीं है, बल्कि इनका इस्तेमाल ही नहीं हो पाना है.

पवन करण की पांच कवितायें

पवन करण


पवन करण हिन्दी के महत्वपूर्ण कवि है, ग्वालियर में रहते हैं. इनसे इनके ई मेल आई डी pawankaran64@rediffmail.com पर संम्पर्क किया जा सकता है.

( इतिहास की चुप्पियों और वर्तमान के शोर के बीच स्त्री संवेदना से गहरे जुड़कर पवन  करण की कवितायें  सीधे दिल में उतरती है.  ग़ालिब के मशहूर  शेर के उस मिसरे की तरह, कोई मेरे दिल  पूछे तेरे तीरे नीमकश को वो खलिश कहां से होती, जो जिग़र के पार  होता . कवितायेँ  दिल के आर -पार  नहीं जाती भीतर गहरे उतरती हैं,  इसलिए उनकी कवितायेँ हिन्दी कविताओं के  परंपरागत चौखट में अट नहीं पाती। उन्होंने कविता के लिए नए विषय चुने और उसे नयी भाषा में लिखा।  कविताओं को पढ़ते हुए आप महसूस करेंगे कि उन्होंने उन जगहों को छुआ है जिसपर हमारी नजर नहीं जाती। उनकी कविताओं से गुजरना परम्पराओं की जड़ों तक पहुंचना  है। वे अपने इर्द -गिर्द की घटनाओं के दर्शक नहीं हैं,उनके बीच के हैं। उन्होंने लोक -जीवन की इस धारा  में गहराई तक गोते लगाए हैं .  उनकी सूर्या सावित्री इसलिए नहीं जानी  जाती की वह  यमराज से वापस ले आयी सत्यवान के प्राण बल्कि उसने परम्परओं को चुनौती दी। दरसअल पवन कारण की कविता में प्रेम -चेतना मनुष्य की मूल गंध है। कविता जितनी बाहर है उतनी उनके भीतर है. निवेदिता )

1. विश्वपला 

नास्तिक की तरह घूमते हुए वेदो की गलियां
तुम मिली मुझे विश्वपला

ऋगवेद में संपन्न हो चुके यज्ञ की
वेदी की राख को बैसाखी से कुरेदते देख
मैने तुमसे पूछा अरे विश्वपला
तुम्हारे पास अब भी बैसाखी कैसे

तुम्हारे लगडे़पन को तो, लोहे का पैर लगा, दूर करके
अश्विनी कुमार ने बजा दिया था जहां में अपना डंका

फिर तुम यह बैसाखी क्यों पकडे बैठी हो विश्वपला
क्यो इससे कुरेदने में लगी हो वेदी की राख
चलो उठो मुझे भी दौड़कर दिखाओ
यजुर्वेद का यह चमत्कार मैं भी तो देखूं

विश्वपला तुम मेरी तरफ नजर उठाकर
क्यों नहीं देखती यह वेदी कुरेदना
क्यों नहीं रोकती वैसाखी दूर क्यों नहीं फैकती

विश्वपला यह इक्कीसवी सदी है
और तुम यहां तब से बैठी इस बैसाखी से
यज्ञ की राख ही कुरेद रही हो अपना हाथ बढ़ाओ
और मेरे साथ इस सदी में अपने कदम चलो

क्या तुम चलने लायक नहीं हुई विश्वपला
क्या तुम अब भी लगडी हो
अपनी चुप्पी तोड़ो, मुंह खोलो अपना विश्वपला
सच सच बताओं मुझ कवि को बताओ
क्या तुम्हारे भी साथ तब भी वही हुआ
जो अब तक इस सदी में भी जारी है

(विश्वपला़: वेद कालीन लगडी स़्त्री जिसे लोहे का पैर लगाकर अश्विनी कुमार नामक दो वै़द्यों ने दौड़ने लायक कर दिया जिनके लिये यज्ञ में ऋचाएं गायी जाती हैं। )

2. सूर्या सावित्री

विवाह की वेदी तक पहुंचने से पहले
और उसके बाद भी उन्हें कभी
बताया ही नहीं गया उसके बारे में

उन्हें तो बस उस सावित्री के बारे में
बताया गया जो यमराज से
वापस ले आयी सत्यवान के प्राण

क्यों छुपाई गई स्त्रियों से हमेशा
सूर्या सावित्री की पहचान
क्यों नहीं बताया गया उन्हें,
तब से उसकी लिखी ऋचाएं अब तक
विवाह मंडप में गाई जातीं लगातार

जिसने तब पिता द्वारा चयनित
सोम को अपनाने से कर दिया इंकार
और अपने सहपाठी पूषा को चुना
साथ बिताने के लिये अपना जीवन

क्या बस इसीलिये विवाह की वेदी के आगे
वचन हारतीं स्त्रियों को नहीं बताया गया
उसके बारे में कि कहीं उनमें से कोई
या कई पिता द्वारा चयनित वर से
न कर दें विवाह करने से इंकार
और कहें नहीं पिता पसंद भी मेरी होगी
और सूर्या सावित्री की तरह शर्तें भी मेरीे

(विवाह सू़त्र ऋगवेद के दसवें मंडल की सूक्त संख्या जिसमें 47 मंत्र हैं, इन मंत्रों की रचना सूर्या सावित्री नामक एक किशोरी ने अपनी शादी के लिये की । सूर्या नाम की यह कन्या सविता मुनी की बेटी होने की वजह से सूर्या सावित्री कहलायी)

3. भाई

मेरे भाई की नाक एवरेस्ट से ऊंची
और चांद से ज्यादा चमकीली
किसी से प्यार करूंगी तो कट जायेगी
अपनी कटी हुई नाक के साथ मेरा भाई
कैसे जियेगा वह तो मर जायेगा जीते जी

उसकी आंख दूरबीन से तेज
निशाना गुलेल सा सटीक
मैं घने झुरमुट में भी किसी से मिलूंगी
वह देख लेगा, वह वहीं से खीचकर
मारेगा पत्थर जो ठीक माथे पर
लगेगा मेरे उसके लगते ही
मेरे भाई का माथा हो जायेगा ऊंचा

कोई हाथ, हाथ में लेकर चलूंगी
गुस्से में उसके हाथ मेरी और उसकी
गर्दन मरोड़ देंगे फैक देंगे किसी
नाले में, कई दिन तक वह अपने
हाथ नहीं धोयेगा, दिखायेगा सबूत
खाप उसके हाथों को चूमेगी जहां तक
घूम सकता वह घूमेगा छाती फुलाकर

कलदार सा खनकदार भाई का नाम
मगर वह कब तक काम आयेगा मेरे
प्रेम तो फिर भी रहेगा साथ
प्रेम के बिना मैं कैसे जियुंगी
प्रेम करूंगी तो जाउंगी मारी

4. सोनागाछी

बंगाल ही नहीं  भारत भर के
कारीगरों ने इस बार नहीं गढ़ीं
मिट्टी से मूर्तियां

सोनागाछी ही नहीं भारत भर की
उन बस्तियों से निकालकर
बाहर लाये वे वेश्याओं को
उन्होंने रखा इस बात का ख्यााल
उनमें से कोई बूढ़ी-पुरानी
दर्द से कराहती, खांसती-मरती
नहीं छूटे उस अंधेरे में भीतर के

कारीगरों ने इस बार उन सबका
किया ठीक वैसा ही श्रृंगार जैसा
करते आये वे मूर्तियों का अब तक
और उन्हें बिठाया जगमगाते
उन मंडपों में ले जाकर, आखिर
उन्हें हमने ही तो गढ़ा अब तक

लगातार हमारा होना झेलती
कोई देवी नहीं थी इससे पहले
हमारे पास, इस बार उन्होंने
गढ़ी दसवी देवी
जिसका नाम पड़ा देवी सोनागाछी

5. छिनाल

उसकी भीतरी संरचना ही ऐसी थी
कि वह चाहती थी एक पुरूष
जो उसे प्यार करे भरपूर
रखे हरदम उसका खयाल
रहे उसके साथ, उसके करीब हमेशा

पति हो तो बेहतर, प्रेमी हो
न हो तो बस पुरूष ही हो, मगर हो
इस गफलत में उसने
खाये लगातार ठेवे पर ठेवे
छिनाल कहकर पुकारा गया उसे

उसके भीतर से एक-एक कर
बाहर आते पुरूषों नें ही नहीं
अपने को भीतर ही भीतर मारतीं
औरतों ने भी नहीं बख्शा उसे
उन्होंने भी उसे इसी शब्द से तांसा

और तो और खुद उसने भी
इसे अपनी ही जैसी औरत के
सिर पर खीचकर दे मारा

स्त्री विमर्श की पठनीय किताबें

( स्त्री अध्ययन आज भारत में भी एक अकादमिक हकीकत है . विभिन्न विश्वविद्यालयों के स्त्री -अधययन विभागों में अलग -अलग भाषा माध्यमों में स्त्रीवाद की  पढाई हो रही है. यहां पठनीय स्त्री विमर्श की किताबों के लिंक दिये जा रहे हैं , ताकि स्त्रीवाद के अध्येता यहां उन किताबों को  ऑनलाइन पढ़ सकें . यह सूची निरंतर बढ़ती जायेगी . आप भी ऐसी किताबों की सूची और लिंक हमें मेल करें, ताकि यह पठनीय किताबों का आर्काइव बन सके . )

    1.    औरत होने की सजा, अरविन्द जैन
   
    2.     दलित स्त्रीवाद , स्त्रीकाल का विशेषांक , अतिथि संपादक , अनिता भारती

    3.    स्त्रीवादी विमर्श , समाज और साहित्य  , क्षमा शर्मा

    4.    स्त्री चिंतन की चुनौतियां , रेखा कस्तवार 

    5.    इकीसवीं सदी की ओर , सुमन कृष्णकांत ( सम्पादक )

    6.    Against Our Will , Men , Women and Rape , Susan Brownmiller

    7.   Gender Trouble, Feminism and the Subversion of Identity, Judith Butler

    8.   Feminism is for Everybody, Passionate Politics, Bell Hook
 
    9. अतीत होती सदी और स्त्री का भविष्य , राजेन्द्र यादव और अर्चना वर्मा 

   10.  स्त्री : मुक्ति का स्वप्न , वसुधा का विशेषांक , अतिथि सम्पादक : अरविन्द जैन , लीलाधर मन्डलोई

   11. न्याय क्षेत्रे : अन्याय क्षेत्रे , अरविन्द जैन

   12. औरत ; उत्तर कथा,  राजेन्द्र यादव अर्चना वर्मा

   13.Gender , Religion and Modern Hindi Drama , Diana Dimitrova

   14. The Beauty Myth: How Images of Beauty are Used Against Women, Naomi Wolf

   15. Vindication of the Rights of Women, Marry wollstencraft

  16. Writing Caste ‘ Writing Gender , Sharmila Rege

  १७.  उपनिवेश में स्त्री ,  प्रभा खेतान

  १८. कामसूत्र से कामसूत्र तक , संपादक, मैरी  इ जॉन और जानकी नायर

 १९.  Women Writing in India: 600 B.C. to the early twentieth century,  edited by Susie J. Tharu, Ke Lalita

२०. Women Writing in India: 600 B.C. to the early twentieth century ,edited by Susie J. Tharu, Ke Lalita

२१. Sexual Politics , Kate Millett

२२. स्त्री संघर्ष का इतिहास : राधा कुमार

२३. हिन्दू धर्म की  रिडल : डा बाबा साहब आम्बेडकर

२४. परिधि पर स्त्री : मृणाल पांडे

२५. Gendering Caste, through a feminist lens, Uma Chakrawarti

२६. One’s Own Room,Virginia Wolf,

२७. The History of Doing: An Illustrated Account of Movements for Women’s Rights , Radha Kumar

28. Contemporary Feminist Theories, Edited by Stevi Jackson, Jackie, Jones,

29. कथा जगत की बागी मुस्लिम औरतें , राजेन्द्र यादव

30 . द्विखंडिता , तसलीमा नसरीन , सुशील गुप्ता

31.  Feminism and Film Theory , Constance Penley

32. Visual pleasure and narrative cinema, Laura Mulvey

सांस्कृतिक ढकोसलों पर कुठाराघात करती फिल्म : ‘ क्वीन ‘

डॉ. महेश गुप्ता

डॉ. महेश गुप्ता


डा महेश गुप्ता कवि और कलाकार हैं . रंगमंच से भी इनका जुड़ाव रहा है , हिन्दी और गुजराती में मंचन, अभिनय दिग्दर्शन और नाट्य लेखन करते रहे हैं. इनकी गुजराती धारावाहिक सीरियल ‘जननी जोड़’ तथा गुजराती टेलीफिल्म ‘परिवर्तन’ में मुख्य भूमिका रही है . गुजराती नाट्य-पत्रिका ‘नांदीकार’ के सह संपादक. संप्रति : राजभाषा अधिकारी, भारतीय स्टेट बैंक,भोपाल.

( पिछले दिनों मार्च में रिलीज हुई फिल्म ‘क्वीन’ को स्त्रीवादी नजरिये से देख रहे हैं डा महेश गुप्ता . यह फिल्म मध्यम वर्गीय लड़की के लिए खुले आसमान का परिदृश्य उपस्थित करती है, उसकी  निर्धारित भूमिका , स्टीरियो टाइप से अलग . ‘स्त्रीकाल’  के लिए फिल्मों की स्त्रीवादी समीक्षाएं आमंत्रित हैं. )

मध्यमवर्गीय भारतीय स्त्री की युवा मनोदशा को केंद्र में रखकर बोलीवुड फिल्म ‘ क्वीन ‘ न केवल भारतीय सिनेमा को बल्कि तथाकथित संस्कृति पर गर्व करनेवाले हमारे समाज को एक सही राह दिखाती है. यहाँ कल्पना, वास्तविकता एवं उद्देश्यपरक घटकों का कलात्मक संगम दृष्टिगोचर होता है.

फिल्म का कथानक कुछ इस प्रकार है : फिल्म की नायिका रानी , राजौरी गार्डन , दिल्ली में रहने वाली एक 21 वर्षीय पंजाबी लड़की है. वह एक बहुत ही रूढ़िवादी परिवार से है. उसका छोटा भाई सुरक्षा की दृष्टि से हर जगह उसके साथ रहता है. शादी से दो दिन पहले, उसका मंगेतर विजय उसे कहता है कि अब उसका विचार बदल गया है और अब वह उससे शादी करना नहीं चाहता. दोनों की जीवन शैलियों का परस्पर कोई मेल नहीं है. यह बताने के लिए वह उससे एक स्थानीय कैफे में मिलता है. इस घटनाक्रम से हैरान रानी एक दिन के लिए अपने आप को कमरे में बंद कर लेती है.

वह इस घटनाक्रम पर काबू पाने का फैसला करती है और अपनी पसंदीदा जगह पेरिस की यात्रा के लिए पहले से बुक करवाए हुए हनीमून टूर पर जाने की योजना बनाती है जो उसने पहले कभी नहीं देखा था. अपने मंगेतर विजय की पसंदीदा जगह, एम्स्टर्डम की यात्रा भी इसमें शामिल की जाती है. प्रारंभिक झिझक के बाद, उसके माता-पिता इस बात पर सहमत होते हैं और रानी रवाना होती है.पेरिस में उसकी मुलाकात विजयलक्ष्मी से होती है जो स्पेनिश / फ्रेंच माँ और भारतीय पिता की संतान है. रानी जिस होटल में रहती है वहीं विजयलक्ष्मी काम करती है. पेरिस में रानी को कुछ परेशानियों से भी दो – चार होना पड़ता है. एक बार स्थानीय पुलिस के साथ और एक बार एक किसी पॉकेटमार के साथ. रानी जल्द ही भारत लौटने का मन बनाती है. इस बीच विजयलक्ष्मी उसकी अच्छी दोस्त बन जाती है और उसकी विश्वासपात्र भी. दोनों पेरिस की सैर करते हैं , स्वतन्त्र रूप से मौज करते हैं. यहाँ रोमांच की एल लंबी श्रृंखला चलती है. एक बार खरीदारी करते समय , रानी द्वारा विदेशी वस्त्रों वाली अपनी तस्वीर गलती से विजयलक्ष्मी के बजाय विजय को भेज दी जाती है. विजय को अपनी गलती का एहसास होता है. विजय इस तस्वीर को देखकर बहुत प्रभावित होता है और उससे मिलने की कोशिश करता है.

रानी का एम्स्टर्डम जाने का समय हो आता है. एम्स्टर्डम पहुँचने पर उसे पता चलता है कि उसे होटल के कमरे को तीन अन्य लोग, ताका, टिम और ओलेकजान्डर के साथ साझा करना है. वह काफी परेशान होती है मगर जल्द ही, चारों अच्छे दोस्त बन जाते हैं. खरीदारी, सैर–सपाटा, क्लब, नर्तन आदि में समय गुजरता है. रानी को गोलगप्पे बनाकर बेचने का मौका मिलता है जिससे उसे आर्थिक लाभ तो होता ही है साथ ही आत्मविश्वास भी बढ़ने लगता है. अपने मित्रों की पृष्ठभूमि के बारे में जानकर उसे एहसास होता है कि दुनिया के अन्य भागों में लोग कैसी-कैसी विपरीत परिस्थितियों में भी मौज से जीते हैं. उसे जीवन का एक नया पाठ मिलता है.

स बीच विजय उसे ढूँढता हुआ वहां आ पहुंचता है. वह माफी मांगता है और संबंधों पर पुनर्विचार करने के लिए कहता है. वह रानी को हड़पने की कोशिश भी करता है जिस पर रानी के दोस्त प्रतिकार करते हैं लेकिन रानी उन्हें विजय को छोड देने को कहती है. रानी विजय से कहती है कि वह दूसरे दिन मिलेगी. दोनों अगले दिन मिलते हैं. मुलाकात सुखद नहीं रहती और रानी कहती है कि उसे रॉक शो जाना है और वह उससे दिल्ली में बात करेगी. रॉक शो में वह अपने दोस्तों के साथ आखिरी बार मिलती है. भारत लौटने पर, वह विजय के घर अकेले मिलने जाती है. बिना कुछ कहे, बस उसे उसकी सगाई की अंगूठी लौटाती है और गले मिलकर धन्यवाद कहती है. रानी अपने घर की ओर आगे बढ़ती है, एक राहत के साथ, सुकून के साथ, प्रसन्नचित्त.

कथानक के माध्यम से एक मध्यम वर्गीय स्त्री  की मनोदशा और सामाजिक विडम्बना को भलीभांति चित्रित किया गया है. यहाँ प्रश्न केवल पुरुष प्रधान उस समाज का नहीं जहाँ वह स्त्री को जॉब करने तक की आज़ादी देने से भी कतराता है, बल्कि उस संकुचित मनोदशा वाले पुरुष समाज का है जो स्त्री के रूप तक ही अपनी सोच को मर्यादित रखता है. यहाँ सहज ही याद आ जाती हैं सुशीला टाकभौरे की कुछ पंक्तियाँ :

मुझे अनंत असीम दिगंत चाहिए
छत का खुला आसमान नहीं
आसमान की खुली छत चाहिए

निश्चित तौर पर यहाँ रानी को आसमान की खुली छत प्राप्त हो पाती है, और प्राप्त हो पाती है वह स्वतंत्रता जो किसी भी स्त्री  का एक दमित स्वप्न है. भारतीय सिनेमा में इस प्रकार की फिल्म का बनना एक संयोग के साथ-साथ आशा की चिंगारी भी है. फिल्म को जिस प्रकार रेटिंग प्राप्त हुई एवं दर्शकों ने जिस तादाद में इसे देखा वह इस बात को उजागर करता है कि भारतीय समाज ब करवट ले रहा है. मीडिया का सदुपयोग करते हुए एक ताकतवर मनोहर अभिव्यक्ति कैसे की जा सकती है इसका प्रमाण है यह फिल्म. फिल्म के कथानक से भी अधिक महत्वपूर्ण बन पड़े हैं वे छोटे छोटे दृश्य जो सहज ही बहुत कुछ कह जाते हैं और मजबूर कर जाते हैं भारतीय समाज को आत्ममंथन हेतु. शादी के बाद अपने आप को कमरे में बंद कर लेने वाली रानी जब सुबह मिठाई के पैकेट से एक मिठाई खाती है तब वह वास्तविक धरातल पर खड़ी उस नारी-सी दिखाई देती है जिसे शादी टूटने का दुःख अवश्य है लेकिन दिल के किसी कोने में जिन्दा रहने की तमन्ना अभी शेष है. शादी टूटने को जिस गंभीरता से वह लेती है उतनी गंभीरता से उसके परिवार के अन्य सदस्य कहाँ ले पाते हैं. परिवार के लिए यह घटना केवल इज्जत के सन्दर्भ में ही अधिक महत्वपूर्ण है. रानी जब नॉन वेज प्लेट को टेबल पर देख कर भागती है और बाहर जाकर उल्टी करने लगती है तो लोग उसकी तस्वीर लेने लगते हैं जैसे ऐसा दृश्य पहले कभी देखा ही न हो. शराब के नशे में चूर रानी जब बाहर आकर कार के पास खड़े हुए व्यक्ति के समक्ष तरह-तरह की हरकतें करने लगती है, तब उस व्यक्ति का पूर्णतः अन्यमनस्क रहना और रानी की ओर ध्यान तक न देना व्यक्ति स्वातंत्र्य की घोषणा नहीं तो और क्या है ? उम्र के दायरों से बाहर व्याप्त यौन कुंठा पर फ़िल्मकार तब आघात करता है जब नेट के माध्यम से रानी से बात करते हुए रानी के पिता और उसका छोटा भाई विजयलक्ष्मी के विषय में दिलचस्पी दिखाने लगते हैं और उसकी दादी इसे ब्लू फिल्म करार देती है .

विजयलक्ष्मी का पात्र स्वच्छंद अवश्य है लेकिन अश्लील कतई नहीं. यह फिल्म अपने परिवार की हिदायतों को आँख मूंदकर अपनाने वाली रूढिवादी, भोलीभाली नायिका रानी के रूपांतरण की यात्रा की यात्रा है जो अपने मंगेतर द्वारा प्यार से दी गई उपाधि के कारण ही नहीं वरन सही मायने में ‘ क्वीन ‘ सिद्ध होती है. कॉमेडी, ट्रेजेडी, नात्यात्मकता और भावना से भरपूर यह फिल्म हमें सामाजिक परिवेश और नारी स्वतंत्रता के विषय में गंभीर रूप से विचार करने हेतु मजबूर करती है.

एम्स्टर्डम में रानी जब एक कमरे में अन्य पुरुषों के साथ कमरा साझा करने से कतराती है और कमरे से बाहर सो जाती है एवं टीम द्वारा उठाए जाने पर जब वह चीखती है तब जिस तरह टीम उसे संभालता है या जिस तरह टीम सहित कमरे में रहने वाले अन्य पुरुष पात्र ( ताका और ओलेकजान्डर ) कमरे से बाहर सोने को तैयार हो जाते हैं वह प्रसंग सांस्कृतिक भिन्नता को सहर्ष स्वीकार करने का एक अनुकरणीय उदहारण प्रस्तुत करता है. जब रानी खाना खाते समय मिर्च वगैरह की मांग करती है, तब जिस प्रकार होटल का मालिक उस पर बिदकता है और सभी व्यंजनों को मिर्च मसाले से भर देने के भारतीय रवैये पर आश्चर्य व्यक्त करता है वह हास्य के फौवारे तो उपस्थित करता ही है लेकिन जब वह रानी के पैसे लौटाने लगता है तब व्यावसायिक नीतिमत्ता के अनुकरणीय मानदंड स्थापित करता है. इतना ही नहीं वह रानी को अपने अनुसार व्यंजन बनाकर बेचने हेतु ऑफर भी देता है. गोल गप्पे बनाए जाते हैं. कुछ समय तक कोई नहीं खाता लेकिन फिर नए स्वाद पर जब भीड़ उमड़ पड़ती है तब किसी भी नए स्वाद या विचार के स्वीकार हेतु सहर्ष प्रस्तुत लोकसंस्कृति के दर्शन होते हैं. हींग का अंग्रेजी समानार्थी जानने के लिए जब रानी फोन करती है तब अंत में मिलने वाला जवाब कि हींग को अंग्रेजी में हींग ही कहते है, हास्य की सृष्टि का सर्जन करने के साथ-साथ विदेश में रहने वाले भारतीयों के भाषाई ज्ञान पर भी एक करारा व्यंग्य है. जिस प्रकार रानी के आगमन पर विदेश स्थित परिचित परिवार के सदस्य झूठी भावनाएं व्यक्त करते हैं और अलग कमरे में रानी को शगुन में दी जाने वाली राशि पर जो चर्चा करते हैं उससे यही सिद्ध होता है कि व्यक्ति भारत में रहे या विदेश में, उसकी मानसिक दरिद्रता वही बनी रहती है.

कुल मिलकर स्त्रीवादी आन्दोलन, महिला सशक्तिकरण या समाज सुधार हेतु किसी उपन्यास से कहीं अधिक ताकतवर अभिव्यक्ति होकर उभरती है फिल्म ‘ क्वीन ‘. अपने जीवन को जीने के चुनाव हेतु भारतीय महिलाओं को प्राप्त स्वतंत्रता पर यह फिल्म कई प्रश्न खड़े करती है. यह फिल्म हमारे समाज को आत्ममंथन हेतु मजबूर करती है एवं विवश करती है यह सोचने पर कि हमें कहाँ और क्या सुधार करने की आवश्यकता है. रानी तो एक प्रतीक है उस समाज के दलित स्त्री पात्रों का जिन्हें आवश्यकता है जागृत होने की, अपने जीवन के विषय में सोचने की और उस सोच को कार्यान्वित करने हेतु हिम्मत करने की.
एक गंभीर विषय को लेकर चली यह फिल्म दर्शकों को कहीं भी बोझिल नहीं लगती वरन मुक्त हास्य की संभावनाएं हर जगह साथ लिए रहती है. दिमाग को घर पर रखकर देखी जाने वाली बोलीवुड की फिल्मों के बीच एक अर्से के बाद एक अर्थपूर्ण फिल्म की प्रस्तुति बोलीवुड से और अधिक अर्थपूर्ण फिल्मों की प्रस्तुति हेतु आशास्पद माहौल तैयार करती है जिससे सामाजिक परिवर्तनों का पथ प्रशस्त हो सके.

जीना जिन्दगी को आत्मकथा के नजरिये से -अंतिम किश्त

अर्चना वर्मा

अर्चना वर्मा प्रसिद्ध कथाकार और स्त्रीवादी विचारक हैं. संपर्क : जे-901, हाई-बर्ड, निहो स्कॉटिश गार्डेन, अहिंसा खण्ड-2, इन्दिरापुरम, ग़ाज़ियाबाद – 201014, इनसे इनके ई मेल आइ डी mamushu46@gmail.com पर भी संपर्क किया जा सकता है.

 ( ‘अन्या से अनन्या’ (प्रभा खेतान) ‘एक कहानी यह भी’ (मन्नू भण्डारी)
‘लगता नहीं है दिल मेरा’ (कृष्णा अग्नहोत्री) ‘जो कहा नहीं गया’ (कुसुम
अंसल)’हादसे’ (रमणिका गुप्ता) ‘कस्तूरी कुण्डल बसै’ (मैत्रेयी पुष्पा), तथा
अनुवादों में आँधेरे आलो (बेबी हालदार -बंगाली), ‘रसीदी टिकट’ (अमृता
प्रीतम-पंजाबी), ‘नंगे पाँवों का सफ़र’ (दिलीपकौर टिवाणा-पंजाबी),
‘खानाबदोश’ (अजीत कौर- पंजाबी), ‘कहती हूँ सुनो’ (हंसा वाडकर-मराठी)
‘स्मृतिचित्र’ (लक्ष्मी -मराठी) ‘नटी विनोदिनी’ (विनोदिनी–बंगाली), ‘आमार
जीबोन’ (राशुन्दरी देवी-बंगाली) आदि स्त्री – आत्मकथाओं के आलोक में
अर्चना वर्मा का यह आलेख महान पुरुषों’ की महानता ग्रंथि और उसके लिए
उन्हें प्राप्त सामाजिक -सांस्कृतिक सुविधा और समर्थन तथा स्त्री -आत्मकथाओ
के लिए  सामाजिक -सांस्कृतिक अवरोध  की व्याख्या करता है . दो किश्तों में प्रकाश्य  आलेख की अंतिम किश्त . पहली किश्त पर क्लिक करें

विचार के विकास के इतिहास में उत्तर
आधुनिक मोड़ पर आत्म और अस्मिता के विषय मेँ मान्यता है कि अस्मिता जन्मजात
नहीं, रचित होती है लेकिन जीवनकथा कोटि के साहित्य के विद्वानों ने उसके
सैद्धान्तीकरण में अस्मिता की भौतिक वास्तविकता पर बल दिया है – विशेषतः
नस्ल, सांस्कृतिक प्रजाति, वर्ग, लिंग और लैंगिकता के भौतिक नतीजों पर।
आत्मकथात्मक वृत्तान्त अपनी संस्कृति में उपलब्ध अस्मिता-कोटियों और
परम्परा-प्रसूत सांस्कृतिक वृत्तान्तों से प्रभावित होते हैँ। निजी प्रज्ञा
और व्यक्तिगत प्रयास/प्रतिरोध/आग्रह/संघर्ष/संकल्प से इस भौतिकता का
उल्लंघन, वैकल्पिक अस्मिता की रचना संभव होती है लेकिन नस्ल, सांस्कृतिक
प्रजाति, वर्ग, लिंग और लैंगिकता जैसी कोटियों से इतना तो तय हो ही जाता है
कि किस प्रकार के नियामक या दमनशील विमर्शों के विरुद्ध यह
प्रयास/प्रतिरोध/आग्रह/संघर्ष/संकल्प सक्रिय होगा और न केवल यह कि वह कैसा
रूप ग्रहण करेगा बल्कि शायद यह भी कि उससे जन्म लेने वाली वैकल्पिक अस्मिता
का रूप क्या होगा।

इन भौतिक वास्तविकताओं पर नज़र रखते हुए
आत्मकथाओं में व्यक्त स्त्री-आत्म तथा पुरुष-आत्म के अन्तर को देखा गया है।
पितृसत्ता में पुरुषों को सीमाओं के भीतर अपनी अस्मिता की उपलब्धि के लिये
संघर्ष की इजाज़त है, जबकि स्त्रियों पर उनकी अस्मिता लाद दी गयी है। पुरुष
के पास अवसर है कि जो उसको बनना है, बने जबकि स्त्री को बता दिया गया है
कि वह क्या है। जिन रिश्तोंी के ताने बाने मेँ वह जीवित हैं, उसके
विन्यासों के भीतर ही उसे अपनी निजता ओर वैयक्तिकता को उपलब्ध और अभिव्यक्त
करना है। ऐसा कोई नियम तो नहीं लेकिन अधिकांशतः एक
निश्शंक/निर्द्वन्द्व/आत्मकेन्द्रित/समंजित/समन्वित/एकीकृत अस्मिता की
अभिव्यक्ति पुरुष की आत्मकथा का लक्षण है और सम्बन्धों के ताने-बाने में
बँटे हुए आत्म का निरूपण स्त्री की आत्मकथा का। सम्बन्धजाल के भीतर
आत्म-निरुपण स्त्री की आत्मकथा की शैली का लक्षण है। न केवल सर्जनात्मक चयन
बल्कि सामाजिक मनोवैज्ञानिक ज़रूरत के द्वारा भी स्त्री अपनी जीवनकथाओं को
आत्म की रचना या तलाश के वृत्तान्त की तरह नहीं देखतीं, ‘ऐसा हुआ’ के
वृत्तान्त की तरह दर्ज करके रह जाती है।
अपने ‘आत्म’ की अनुभूति स्त्री को
आबद्ध-स्वयं या सम्बद्ध-स्वयं की तरह उपलब्ध होती है। आबद्ध-स्वयं अपनी
विवशताओं का बन्दी है। सम्बद्ध-स्वयं में सम्बन्धों का दबाव तो है किन्तु
स्वेच्छा और परस्परता की भावना के साथ।विच्छिन्न/ अलगावपूर्ण/
स्वयंपर्याप्त/ अहम्-केन्द्रित आत्म इसका विलोम है।
आत्मानुभूति/आत्मज्ञान/आत्मोपलब्धि की ये दो शैलियाँ हैं। पुनः, ऐसा कोई
नियम नहीं कि ज्ञान के ये दो प्रकार अनिवार्यतः दोनो प्रकारों की लैंगिक
अस्मिताओं अलग अलग जुड़े हुए हों लेकिन अधिकतर ऐसा देखा गया है कि
विच्छिन्न/ अलगावपूर्ण/ आत्मकेन्द्रित/एकोन्मुख/अहंप्रधान ज्ञान की
सार्वजनिक भाषा पुरुष के आत्मवृत्तान्त में अधिक पाई जाती है। वह श्रोता को
संगी की अपेक्षा शत्रु के रूप में कल्पित करती है और चुनौती की आवाज़ में
बोलती है। जैसे रूसो के ‘कन्फ़ेशन्स’ में – “एकत्र हों मेरे चारो ओर मेरे
अनगिनत साथी और सुनें मेरी आत्मस्वीकृति – मेरी अयोग्यताओं पर सिर धुनें और
मेरी अपूर्णताओं पर शरमाएँ।और फिर उनमें से हर एक स्पष्टता के साथ,
सिंहासन के चरणों में अपने हृदय के रहस्य का उद्घाटन करे और यदि साहस हो तो
कहे कि मैँ इस आदमी से अच्छा हूँ।”

स्त्री के आत्मवृत्तान्त की भाषा इससे अलग
सार्वजनिक भाषा के औपचारिक विन्यास और व्यक्तिगत भाषा के बीच एक निरन्तरता
बनाए रखने वाली अनुरोध की भाषा है।स्त्री के ‘आत्मज्ञान’ का विकास जिन
विभिन्न सरणियों से होकर गुजरता है उनमें पहली भाषापूर्व मौन अबोधता की है
जहाँ से शुरू करके वह समाज के नियामक विमर्शों और संस्कारों द्वारा प्रदत्त
ज्ञान तक, प्रदत्त ज्ञान से अनुभव द्वारा संचित और ग्रहीत ज्ञान तक, दोनो
के सामंजस्य/असमंजसता/समन्विति/टकराहट से रचित आत्मज्ञान तक, आत्मज्ञान से
उन रीतियों और प्रथाओं के ज्ञान तक पहुँचती है जिनसे सामाजिक स्वीकृति
मिलेगी। यह अन्तिम परिणति अनेक आवाज़ों का समुच्चय कही जा सकती है जो अन्ततः
समन्वित होकर उसकी अपनी ज्ञान-गढ़न्त बनती है।उसकी अपनी ज्ञान-गढ़न्त का
अर्थ प्रदत्त-ग्रहीत-अनुभूत ज्ञान की ऐसी निष्पत्ति जिसमें ज्ञाता और ज्ञेय
सम्बद्ध हो जाते हैँ। यह निष्पत्ति केवल कोई घरेलू आवाज़ मात्र नहीं,
सार्वजनिक विमर्श का विषय है लेकिन उसमें भी वह परिस्थितिजन्य हितों और
व्यक्तियों के–तथाकथित व्यक्तिगत मामलों के–सन्दर्भों को ध्यान में रखते
हुए ही संप्रेषण पर बल देती है। व्यक्तिगत और राजनीतिक का समन्वय(‘पर्सनल
इज़ पोलिटिकल’) या ‘भिन्नताओं का समारोह’ (सेलीब्रेशन ऑफ़ डाइवर्सिटीज़) जैसी
निष्पत्तियाँ इसी स्वभाव का नतीजा हैं। ‘सम्बद्ध’ आत्म की इस ज्ञानगढन्त
में परस्परता की आकांक्षा मौजूद होती है। वह अमूर्त/ सैद्धान्तिक/ तटस्थ/
सार्वभौम चौखटा-स्वरूप निष्पत्ति नहीं है। इसीलिये उनकी आत्मकथाओं के
विन्यास गैरपरम्परागत और विविध हुआ करते हैं और विधागत कानूनों या आधिकारिक
अहम् के मर्दाने प्रत्ययों में आसानी से दाखिल नहीं होते।
लैंगिकताद्वय द्वन्द्वात्मक विभक्ति की अन्तिम

ओर स्थायी कोटि नहीं है, अन्य अनेक वैकल्पिक लैंगिकताएँ संभव हैँ, यह
मानते हुए भी देखा जा सकता है आत्म व अहम् की एक स्त्री-कोटि है जिसमें
प्रवृत्ति/रुचि/रुख/रुझान के अनुसार पुरुष भी शामिल हो सकते हैं और दूसरी
पुरुषकोटि है जिसमेँ ठीक उन्हीं कारणों से स्त्रियाँ भी शामिल हो सकती हैं।
पुरुषकोटि की आत्मकथाओं में अपनी स्वयंता की एकान्विति और समन्वय को बढ़ावा
और उसकी दिशा मेँ विकास का उद्यम होता है जबकि स्त्री की आत्मकथाओं का
सामान्य निष्कर्ष स्वयं को पाने की तलाश का नतीजा स्वयं को खो देना यानी कि
अपने आपे के बाहर कहीं पाना है। स्त्री के लिये इससे अलग और अलावा अपने
आपे की तलाश में निकलना वस्तुतः असंभव की तलाश में निकलना है। अपने आबद्ध
या सम्बद्ध-स्वयं के सहज भाव-क्षेत्र में रहते हुए एकान्वित अहं की तलाश का
अर्थ शब्दशः पागलपन की तरफ़ जाने वाली आत्मकथा हो सकता है। हिन्दी की अबतक
उपलब्ध आत्मकथाओं मेँ चाहे नहीं, लेकिन दुनिया की बहुत सी भाषाओं में
स्त्री की आत्मकथा का अधिकांश पागलपन तक जाने की कहानी भी है लेकिन बहुत
बार इस पागलपन का कारण एकान्वित अहं की तलाश नहीं बल्कि उत्पीड़न की हदों के
बर्दाश्ते-बाहर हो जाने का नतीजा है।
स्त्री की आत्मकथा वस्तुतः
कथाबहुल, अस्मिताबहुल संभावनाओं के लपेटे में रचित ऐसा आत्मबिम्ब है जिसमें
प्रत्येक कथा, या कथा का प्रत्येक खण्ड उसके ‘स्वयं’ को ही प्रतिबिम्बित
करता है लेकिन ये सब की सब कहानियाँ आंशिक और अस्थायी हैं। स्वयं के किसी
एक श्रेणी – पत्नी, माँ, बहन, बेटी, दासी आदि– तक सीमित रह जाने से इंकार
करने वाली ये भूमिकाबहुल कहानियाँ विखण्डन और अनिश्च्य से शुरू और उसी मेँ
ख़त्म होती हैँ। प्रायः एकरैखिक, कालानुक्रमिक, वैयक्तिक, विगत के अनुभवों
के संचित पुंज और पहले से मौजूद किसी ऐसे एकान्वित स्वयं की उपलब्धि तक
नहीं जातीं जिसे उद्घाटित भर करना है और जो प्रायः आत्मकथा लेखन का
परम्परागत अनुकरणीय आदर्श है।

‘अन्या से अनन्या’ (प्रभा खेतान), ‘एक कहानी यह भी (मन्नू
भण्डारी) की ‘तद्भव’ मेँ प्रकाशित अपनी समीक्षा में अभय कुमार दूबे ने
दर्ज किया था कि वास्तव में ये स्त्री के आत्म-सशक्तीकरण
(self-empowerment) की कहानियाँ हैँ लेकिन इनकी लेखिकाओं में स्वयं इस बात
की पहचान नहीं है। यह टिप्पणी वास्तव में स्त्री के सम्बद्ध-स्वयं की
संरचना से पुरुष-आत्म के अपरिचय का नतीजा है। इन कहानियों मेँ अंकित मुक्ति
वस्तुतः उत्पीड़न और यंत्रणा के तात्कालिक संदर्भ से मुक्ति तथा विखण्डित
आत्म के साथ सामंजस्य और समायोजन की, संघात से उबरने की कहानियाँ हैं, उनके
साथ संबद्धता से मुक्ति की नहीं। आर्थिक स्वतंत्रता, आत्म-निर्भरता,
आत्म-निर्णय की क्षमता इत्यादि स्त्री के आत्म-सशक्तीकरण के महज़ आंशिक
उपकरण हैं, उसके ‘स्वयं’ की सम्पूर्णता का पर्याय नहीं।

आत्मकथा का औचित्य क्या है? किसी की निजी
ज़िन्दग़ी के स्याह-सफ़ेद मेँ ताकाझाँकी के पाठकीय कौतूहल और दिलचस्पी को
तृप्त करने के मनोरंजन-मसाले के अलावा भी आत्मकथा कुछ सामाजिक, नैतिक,
राजनैतिक, उपचारगत कार्य संपन्न करती है।अस्मिता और अनुभव की गढ़न्त सामाजिक
तौर पर होती है और ऐतिहासिक सांस्कृतिक सन्दर्भों के भीतर दैनिक जीवन तथा
वैयक्तिक अस्मिता में ढल जाती है। आत्मकथा का औचित्य उसके
लेखक-प्रवक्ता-चरित्र के आत्मचिन्तन/अन्तर्दर्शन/आत्मान्वेषण/अन्तरीक्षण की
अभिव्यक्ति में है।आत्मकथा का लेखक सदैव खुद को एक नैतिक औचित्य की सीमाओं
में रखता है और प्रवक्ता के माध्यम से उसे व्यक्त करता है, चरित्र ने भले
ही उन सीमाओं का उल्लंघन करते हुए ही अपनी जीवनकथा को गढ़ा हो। चूँकि
लेखक-प्रवक्ता-चरित्र तीनो एक ही हैं, लेकिन रचना की प्रक्रिया के स्तर पर
अभिन्न नहीं हैं अतः प्रवक्ताप्रवक्ता ‘चरित्र के आचरण का ‘साक्षी’ है और
लेखक उसका ‘निर्णायक’ और न्यायाधीश। लेकिन यह निर्णय और न्याय चरित्र के
विपक्ष में नहीं, उसके आचरण के नैतिक औचित्य का उद्घा टन करने के लिये है।
अपने किये-धरे लेखा-जोखा, सामाजिक अनौचित्य का हिसाब और पाठक के समक्ष अपने
कर्मों की सफ़ाई आत्मकथा को उसका कारण देती है।

लिंग/लैंगिकता/कामभावना के सिलसिले में समाज

के नैतिक पाखण्डों का पूरा बोझा स्त्री की कमज़ोर पीठ पर है।समाज के नियामक
विमर्शों की जकड़ का दमघोट दबाव उसके अस्तित्व की नाप से कहीं अधिक छोटा है
और उसे साँस लेने भर की जगह भी नहीं देता।उसकी
भूमिकाओं/दायित्त्वों/कर्त्तव्यों/कसौटियों का फैलाव उसकी सकत और सामर्थ्य
से बहुत अधिक बड़ा है। वह सामाजिक नैतिकता का पर्याय बन चुका है। उसका
दारोमदार सदियों से स्त्री की चुप्पी और स्वीकार पर टिका रहता आया है।
स्त्री-विमर्श के दायरे में प्रतिरोध के हथियार की तरह स्त्री की आत्मकथा
इस चुप्पी को तोड़ने और इस दोमुँहे नैतिक पाखण्ड को पलीता लगाने का काम करती
है। अन्याय और उत्पीड़न की तथाकथित नैतिक कसौटियों पर अनैतिक साबित होना
प्रतिरोध की राजनीति मेँ कहीं अधिक नैतिक हो सकता है। नैतिक प्रतिरोध की
तरह अनैतिक का चुनाव, और चुनाव से भी बढ़कर उसका बयान सामाजिक असहिष्णुता,
तिरस्कार से लेकर सार्वजनिक चीरहरण, दाग, दाह, संगसार, फाँसी जैसे
विधिसम्मत दण्ड का भागी होता है लेकिन तथाकथित समाजसम्मत सही रास्ते पर लगे
रहने की असफलता, अपने अनुभव के प्रकाश में नियामक विमर्शों की कसौटियों का
मूल्यांकन और विचलन का औचित्य इस ध्वंस को एक पवित्रता दे देता है।
सम्वेद से साभार

जीना ज़िन्दग़ी को आत्मकथा के नज़रिये से – पहली किश्त

अर्चना वर्मा

अर्चना वर्मा प्रसिद्ध कथाकार और स्त्रीवादी विचारक हैं. संपर्क : जे-901, हाई-बर्ड, निहो स्कॉटिश गार्डेन, अहिंसा खण्ड-2, इन्दिरापुरम, ग़ाज़ियाबाद – 201014, इनसे इनके ई मेल आइ डी mamushu46@gmail.com पर भी संपर्क किया जा सकता है.

 ( ‘अन्या से अनन्या’ (प्रभा खेतान) ‘एक कहानी यह भी’ (मन्नू भण्डारी)
‘लगता नहीं है दिल मेरा’ (कृष्णा अग्नहोत्री) ‘जो कहा नहीं गया’ (कुसुम
अंसल)’हादसे’ (रमणिका गुप्ता) ‘कस्तूरी कुण्डल बसै’ (मैत्रेयी पुष्पा), तथा
अनुवादों में आँधेरे आलो (बेबी हालदार -बंगाली), ‘रसीदी टिकट’ (अमृता
प्रीतम-पंजाबी), ‘नंगे पाँवों का सफ़र’ (दिलीपकौर टिवाणा-पंजाबी),
‘खानाबदोश’ (अजीत कौर- पंजाबी), ‘कहती हूँ सुनो’ (हंसा वाडकर-मराठी)
‘स्मृतिचित्र’ (लक्ष्मी -मराठी) ‘नटी विनोदिनी’ (विनोदिनी–बंगाली), ‘आमार
जीबोन’ (राशुन्दरी देवी-बंगाली) आदि स्त्री – आत्मकथाओं के आलोक में
अर्चना वर्मा का यह आलेख महान पुरुषों’ की महानता ग्रंथि और उसके लिए
उन्हें प्राप्त सामाजिक -सांस्कृतिक सुविधा और समर्थन तथा स्त्री -आत्मकथाओ
के लिए  सामाजिक -सांस्कृतिक अवरोध  की व्याख्या करता है . दो किश्तों में प्रकाश्य )

किसी सुदूर भविष्य की कल्पना में डूब कर वे तीनो पुरुषसुलभ परिहास और कविजनोचित कौतुक से सोचते थे कि एक दिन जब वे इतने बड़े कवि बन चुकेंगे, और जब उनकी जीवनी लिखी जाएगी, और कोई प्रेमी पाठक या शोधार्थी सामग्री की खोजबीन और जोड़-बटोर के लिये निकल ही पड़ेगा, उस दिन कहीं उसे

निराश न होना पड़े, तो जीवनी को दिलचस्प और पठनीय बनाने का दायित्त्व भावी साहित्यिक इतिहास के प्रति उनका कर्तव्य है। इसे वे ‘बायोग्राफ़िकल पॉइण्ट ऑफ़ व्यू’ से जीना कहते थे और एक दूसरे का मूल्यांकन भी इन शब्दों में करते थे कि तुम तो कसम खाकर अपनी बायोग्राफ़ी चौपट करने पर तुले हो या फिर अमुक या तमुक आजकल अपनी बायोग्राफ़ी की तरक्की मेँ जोर-शोर से जुटा है, फलाने या ढिमाके की तुलना मेँ तुम तो रहे वही बिल्कुल लद्धड़ इत्यादि। पता नहीं कुछ कर गुजरने के बाद या बिना कुछ किये धरे ही।

वे तब युवा रहे होंगे। उस सुदूर भविष्य (अब अतीत) तक जाकर वे प्रतिष्ठित और स्थापित हुए भी लेकिन जीवनी उनमें से अभी तक किसी की नहीं लिखी गयी। जीवन को सचमुच उन्होंने बायोग्राफ़िकल पॉइण्ट ऑफ़ व्यू से जिया कि नहीं, जीवनी को दिलचस्प और पठनीय बनाने लायक कुछ किया कि नहीं, जीवनी व आत्मकथा के अभाव में कौन जाने, लेकिन ‘दिलचस्प’ ओर ‘पठनीय’ के बारे में बेखटके कहा जा सकता है कि उसका मतलब व्यक्तिगत-सामाजिक-रचनात्मक जीवन में ऐसा उत्पात जो अगर मारधाड़ से भरपूर नहीं भी तो कम से कम सनसनीखेज-हैरतअंगेज साबित होता हो और जहाँ सनसनी और हैरत हो वहाँ स्त्री न हो, कम से कम पुरुष की जीवनी या आत्मकथा में ऐसा कैसे संभव है?
कल्पना कीजिये, हमारे उल्लिखित अनाम पात्रों की तरह एक स्त्री जीवन के साथ प्रयोग करते हुए जीना तय करती है। एक दिलचस्प और पठनीय जीवनी के लिये अपने जीवन में कुछ तथ्यों/सत्यों/यथार्थों को निष्पन्न करते हुए अनुभव-सामग्री संचित करना चाहती है।क्या और कैसा होगा वह संचय? पुरुष के जीवन को जो उत्पात, सनसनी और हैरत पठनीय और दिलचस्प बनाते हैं, स्त्री के जीवन मेँ वह सनसनीखेज-हैरतअंगेज उत्पात बलात्कार या छलात्कार जैसा कोई हादसा बनकर आते हैँ या फिर निषिद्ध फल का स्वाद वर्जित वर्षा में स्नान जैसी कोई पवित्र आत्मोपलब्धि जो अपनी गोपनता में पवित्र है लेकिन जो व्यक्त होते ही पारिवारिक सामाजिक दायरों में गर्हित, निन्दनीय और दण्डित अतः हादसे की ही तरह सांघातिक हो उठेगी। स्त्री के सन्दर्भ मेँ समाज के दमनशील नियामक विमर्शों और आचरण-संहिताओं के दबाव में स्त्री का जीवन हादसे के बिना भी हादसे की निरन्तर आशंका के कारण एक अनवरत दुर्घटना और सतत संघात है। भय और आशंका की जारी मनःस्थिति में जीवन के साथ प्रयोग करते हुए जीने का अर्थ जीवन में संघात को स्वयं निमंत्रण देना या कम से कम उसका खतरा मोल लेना ही हो सकता है लेकिन इससे मुँह मोड़ लेने का अर्थ भी अनुभव से, अवसर से वंचित रह जाना होगा जो अपने आप मेँ एक छोटा मोटा हादसा ही है। स्त्री का जीवन कुछ अपवादस्वरूप इलाकों को छोड़कर संघातों का अनन्त वास्तविक या संभावित सिलसिला है। वह निमंत्रण का मोहताज नहीं, अनिमंत्रित ही हर समय आशंका, आभास या आघात बनकर मौजूद है। और अवसर से, अनुभव से वंचित रह जाना सुरक्षाकवच है जिसे पहनकर वह वंचित तो ज़रूर रह जाती है, सुरक्षित फिर भी रह पाती है या नहीं, इसकि कोई गारण्टी नहीं।लेकिन अपनी आत्मकथाओं में स्त्री एक सुखद आश्चयर्य की तरह निडर उपस्थित नज़र आती है, कथानक मेँ अपने भय और आशंका को अभिव्यक्त करने के बावजूद निडर, निषेधों और वर्जनाओं के उल्लंघन का बयान करने की बहादुरी से लैस।

कथानक के स्तर पर स्त्री अपनी आत्मकथा में प्रायः संघात के असर में टूटती, जूझती,निकलती या डूबती दिखाई देती है। संघात की वजहें निजी पारिवारिक सम्बन्धों से लेकर सामाजिक राजनीतिक पैमाने की प्रायोजित हिंसा और मानवाधिकार हनन के मामलों तक प्रसरित हैं। घरेलू हिंसा, बलात्कार, छलात्कार, अगम्यागमन, युद्ध, बाल-यौन-शोषण जैसे हादसों के बीच स्त्री की देह को हिंसा और रक्तपात का प्राथमिक दुर्घटनास्थल कहा गया है। स्त्री की यौन-शुचिता की संस्कृति वाले समाज में अपने घावों पर लज्जित मौन की विवशता ऊपर से! जबरन आ पड़े हादसों के मामले में तो शायद फिर भी कहीं किसी करुणा और सहानुभूति की गुंजाइश हो, अपनी आकांक्षा के अनुगमन में चल निकलना तो अनिवार्य दण्डनीयता के औचित्य का उद्घोाष है।
स्त्रीजीवन के यथार्थ की इस पृष्ठभूमि के बाद आरंभिक प्रसंग में निहित सवाल सीधे शब्दों में यूँ पूछा जा सकता है कि आत्मकथा की लेखन-सामग्री जी चुकने के बाद संचित होती है या कि आत्मकथा की सामग्री संचित करने की प्रक्रिया में जिया जाता है? बात दर-अस्ल उतनी हास्यास्पद नहीं जितनी हमारे उल्लिखित अनाम पात्रों के परिहासप्रिय मन्तव्य में रही होगी या अभी आपको सुनने पर पहली बार में लग रही होगी। इसका अर्थ सजग भाव से, सचेत निर्णयों के साथ इस तरह जीना है कि मानो जीने की प्रक्रिया मेँ जीवन लिखा जा रहा हो, जीवन को यूँ देखना है कि उसका अर्थ महज़ बीतते हुए एक दिन शेष हो जाना नहीं, बल्कि मानो प्रतिक्षण के आचरण से जीवन का सृजन किया जा रहा हो। स्त्री के जीवन अपने आपे को इस तरह सिरजने की संभावना है या नहीं? अगर है तो कितनी दूर तक जाती है?जो आत्मकथाएँ हमारे पास हैँ वे इस संभावना का कोई साक्ष्य देती हैँ या नहीं? स्त्री का आत्म-सृजन जीने की प्रक्रिया मेँ सजग सचेत निर्णय द्वारा घटित होता है याकि आत्मकथा लेखन की प्रक्रिया में अतीत के पुनर्संयोजन द्वारा संभव किया जाता है?
जीने की प्रक्रिया मेँ अनुभव का संचय और आत्मबोध का विकास आत्मकथा का निरन्तर सृजन करता रहता है, फिर भले ही वह दर्ज की जाए या नहीं। यह एक अपनी कहानी हर एक के पास है, लिखित हो या मौखिक या फिर अव्यक्त। शायद इसी सहजता की वजह से विमर्शों की राजनीति में साहित्यिक औजार की तरह आत्मकथा नितान्त अपनी विधा की तरह स्वयं चुन गयी है। इतिहास में जिनके अस्तित्व का कोई निशान मौजूद नहीं वे अपने अस्तित्व को दर्ज करके अपने इतिहास का सूत्रपात करते हैं। शायद इसी राजनीति की वजह से विधा के तौर पर आत्मकथा विमर्शों में इतनी चर्चा और शोध का विषय है, भले ही जितनी चर्चा और शोध है उतनी मात्रा मेँ आत्मकथा-साहित्य हिन्दी में मौजूद न हो। विशेषतः स्त्री की आत्मकथाएँ गिनती में खासी कम है और इस गिनती बढ़ने की रफ़्तार भी बहुत धीमी है। वही गिनीचुनी आत्मकथाएँ बार बार गिनाईं और दोहराई जाती रहती हैं। इस आलेख की निष्पत्तियों के आधार समय समय पर पढ़ी गयी आत्मकथाओं में ‘अन्या से अनन्या’ (प्रभा खेतान) ‘एक कहानी यह भी’ (मन्नू भण्डारी) ‘लगता नहीं है दिल मेरा’ (कृष्णा अग्नहोत्री) ‘जो कहा नहीं गया’ (कुसुम अंसल)’हादसे’ (रमणिका गुप्ता) ‘कस्तूरी कुण्डल बसै’ (मैत्रेयी पुष्पा), तथा अनुवादों में आँधेरे आलो (बेबी हालदार -बंगाली), ‘रसीदी टिकट’ (अमृता प्रीतम-पंजाबी), ‘नंगे पाँवों का सफ़र’ (दिलीपकौर टिवाणा-पंजाबी), ‘खानाबदोश’ (अजीत कौर- पंजाबी), ‘कहती हूँ सुनो’ (हंसा वाडकर-मराठी) ‘स्मृतिचित्र’ (लक्ष्मी -मराठी) ‘नटी विनोदिनी’ (विनोदिनी–बंगाली), ‘आमार जीबोन’ (राशुन्दरी देवी-बंगाली)के विहंगम संदर्भों में हैं।
आत्मकथा भी प्रथमतः और अन्ततः एक कथा ही है। उसे ‘आत्म’ कथा बनाने वाला तथ्य केवल लेखक का यह दावा है कि वह उसकी अपनी, अपने जीवन की सच्ची कथा है। कथा यानी व्यतिक्रम। ढर्रा-रोज़मर्रा में ऐसा कोई उलटफेर या ऐसा कुछ अप्रत्याशित जो उसे दैनन्दिन का विलोम बनाए।आत्म की दैनंदिनी उसकी कथा है और वह कथा अपने व्यतिक्रमों से कहने-सुनने-लिखने-छपाने या छिपाने लायक बनती है। उसका आत्मकथा होना मानो लेखक या लेखिका का अपने पाठक के साथ एक अनुबन्ध है कि वह जो कहेगा या कहेगी, सच-सच और सिर्फ़ सच कहेगा या कहेगी। इस अनुबन्ध के अलावा उसके सच का और कोई साक्ष्य नहीं।जहाँ दैनन्दिनी में व्यतिक्रम की अधिकतम संभाव्य परिभाषा किसी न किसी किस्म का सांघातिक अनुभव हो वहाँ ‘सच और सिर्फ़ सच’ का अनुबन्ध सबसे पहले सन्दिग्ध हो उठता है। आत्मकथा अकेले की कथा नहीं होती। वहाँ उल्लिखित और चित्रित हर तथ्य व घटना में अन्य अनेक शामिल होते हैँ। उन तथ्यों का सत्य उनमें से किसी के लिये असुविधाजनक और बाधक भी साबित होगा। संघात निजत्व को चकनाचूर कर देनेवाला ऐसा विकराल अनुभव है जो निजी स्तर पर भाषा तथा वृत्तान्त को असंभव बना देता है, कहने की असंभवता के कारण तो वह ‘अकथनीय’ है ही, स्त्री की समूची ज़िन्दग़ी को यौनशुचिता की तराजू पर तोलने वाले समाज की संस्कृति के नियामक विमर्शों के दबाव में भी वह अकथनीय है। कोई स्त्री अगर सच कहने का फैसला कर ही बैठी हो तो ख़तरा केवल उसके अपने आपे तक के लिये नहीं होता। उसके सच को सन्दिग्ध/दण्डनीय/निरस्तित्व बनाना पितृसत्ता की आसान रणनीति है। तसलीमा नसरीन ने अपनी आत्मकथाओं के जो नतीजे भुगते हैँ वे साहित्यजगत की स्त्री-आबादी में जल्दी भुलाए नहीं जा सकते।लेकिन यह भी सच है कि तथ्य और गल्प का मसला आत्मकथा के सिलसिले मेँ इतनी आसानी से हल नहीं हो सकता। किसी भी एक तथ्यात्मक घटना में संलग्न अनेक व्यक्तियों के पास उसी एक तथ्य के अलग अलग सत्य हो सकते हैँ क्योँकि घटना के भीतर अपनी अपनी जगह के अनुसार संलग्नता के भी अलग अलग परिप्रेक्ष्य हो जाया करते हैं। एक के परिप्रेक्ष्य से दूसरे को सरासर झूठा सिद्ध किया जा सकता है। आत्मकथा की लेखिका की मंशा से उसका परिप्रेक्ष्य तय होता है। मैले कपड़ों की सार्वजनिक धुलाई का धोबीघाट या अपनी दुनिया की रंगचुंग साज सँवार – निजी कहानी की सार्वजनिक सुनवाई का एक परिप्रेक्ष्य अपने पक्ष की सफा़ई और दूसरे पर दोषारोपण है। “भूलें अपनी या प्रवंचना औरों की दिखलाऊँ मैँ” कहकर प्रसाद ने इसी विडम्बना की ओर संकेत किया था। अपने कुँए या किले या पिंजरे से खुद को बाहर निकालने की ज़रूरत के सिलसिले में दूसरों को और अपने आप को एक दूसरे की पारस्परिकता में समझना; दृष्टिकोण/ व्यवहार /गन्तव्य को बदलना और उस बदलाव की व्याख्या का सामाजिक दायित्त्व निभाना एक बिल्कुल ही दूसरे किस्म का परिप्रेक्ष्य है। एक निश्चित वास्तविक स्त्री-व्यक्ति के जीवन का बयान होने के कारण उसके भौतिक परिणाम भी होते हैं और बदले हुए व्यवहार का अर्थ अगर प्रतिरोध, विद्रोह, या ध्वंस हो तो ये भौतिक परिणाम भी उसी अनुपात मेँ पारिवारिक-सामाजिक प्रतिशोध या दण्ड या सम्बल-सहयोग-समर्थन का रूप ले सकते हैं। व्यक्तिगत होते हुए भी आत्मकथा यूँ सामाजिक जीवन और परिवर्तन का दस्तावेज होती है और कई बार कारक भी।

आत्मकथा साहित्य से अधिक इतिहास की एक किस्म है और इतिहास की धारा मेँ लेखक की निजी जगह के परिप्रेक्ष्य से सामाजिक प्रवृत्तियों का दस्तावेज कही जा सकती है। सत्य एक अतिशय आत्मपरक और व्याख्याबहुल मामला है। निजी ज़िन्दग़ी के बयान मेँ तथ्यपरकता की कोई वस्तुगत कसौटी संभव नहीं। घटनाओं का तटस्थ बयान नहीं किया जा सकता इसलिये तथ्यात्मक तौर पर सर्वथा सही प्रतीत होने वाली आत्मकथाओँ के भीतर भी कथा के तत्त्व होते हैं।सम्बद्ध व्यक्तियों के रहते तक उनके वैकल्पिक तथ्य निरूपण की वास्तविकता को विवादग्रस्त बना सकते हैं लेकिन अंतिम निर्णय फिर भी संभव नहीं। यह एक के मुकाबले दूसरे के बयान के वज़न का मामला है और दोनो ही एक दूसरे को सन्दिग्ध कर सकते हैं। जाँच के लिये दुर्लभ संयोगवश कथाकार दम्पत्ति राजेन्द्र यादव (मुड़ मुड़ के देखता हूँ) और मन्नू भण्डारी (एक कहानी यह भी) की आत्मकथाएँ उदाहरणार्थ मौजूद हैं। दोनो किताबों के प्रकाशन के बाद पत्र-पत्रिकाओं में वाद-विवाद और पत्रों-साक्षात्कारों का वह सिलसिला मौजूद है जो दोनो के बीच एक ही सम्बन्ध के अलग अलग चित्रों में अपनी अपनी स्मृति/समझ/मूल्य/मूल्यवत्ता के अनुसार अलग अलग तथ्यों को चुनता, रेखांकित करता या बलाघात का विषय बनाता है। एक के पक्ष से दूसरे को सच्चा या झूठा साबित करके न्यायाधीश के पद पर बैठने का लोभ अगर न हो तो दोनो में जीवन की अलग अलग दृष्टियाँ, मूल्य और संवेदनाओं के बीच इतनी लम्बी चौड़ी दरार–लगभग खाई– और संवाद-संप्रेषण का पूर्ण अभाव देखा जा सकता है कि मुद्दा मेरे जैसे पाठक के लिये कौन सच्चा कौन झूठा का नहीं, इस विस्मय का हो जाता है कि इसके बावजूद स्वेच्छा से पैंतीस वर्ष का साथ कैसे दोनो ने निभाया और अलगाव के बाद भी दोस्ती और निर्भरता को कायम रखा। भावना के मसले तर्क की सीमाओँ में सुलझते नहीं दिखते, तर्क और विवेक का दावा रखने वाले लेखक जीवों के बीच भी नहीं।
सम्बद्धताओं के दायरे के बाहर आत्मकथा भी केवल कथा ही है और सच तो यह है कि केवल कथा को भी आत्मकथा की तरह पढ़ने की प्रवृत्ति/मंशा/लालसा पाठक में दिखाई देती है। इसलिये आत्मकथा का सत्य उसकी तथ्यपरकता के बाहर खोजना अधिक उचित है। वृत्तान्त की सत्यता का अर्थ शब्दशः यथातथ्यता नहीं, बल्कि लेखक/लेखिका द्वारा स्वेच्छा से कुछ तथ्यों का त्याग; स्मृति की भूल से या जानते बूझते हुए अतीत/तथ्य का विरूपण भी लेखक/लेखिका के बारे में कुछ न कुछ उद्घाटित करता है। आत्मकथा का सत्य उसकी तथ्यपरकता से कहीं अधिक उसकी संवेदना मेँ रहता है और उसकी पढ़न्त में पाठक की संवेदना के प्रत्युत्तर से सत्यापित होता है। उसकी विश्वखसनीयता लेखक और पाठक के अनुबन्ध का फल है। इसलिये उसका गल्प भी उसके सत्य का ही विस्तार माना जा सकता है।
वह आत्म दरअसल क्या है जिसकी कथा कही जानी है? क्या वह स्त्री/पुरुष के सन्दर्भ में अलग अलग है? अगर हाँ, तो उसका निरूपण क्या उनकी आत्मकथाओं के आकार प्रकार को भी अलग अलग बनत देता है?
आत्मकथा का अर्थ वह कथा जिस का लेखक, प्रवक्ता और चरित्र एक ही व्यक्ति है और वही एक तीनो भूमिकाएँ एक साथ निभाता है। लेखक प्रवक्ता के माध्यम से चरित्र की कहानी सुनाता है।इस प्रक्रिया में उसकी स्वयंता विभक्त हो जाती है। वह एक होकर भी अभिन्न नहीं रहता, स्रष्टा, भोक्ता और वक्ता में बँट जाता है। इस अर्थ मेँ आत्मकथा स्वयंलिखित जीवनी है। जिस आत्म की जीवनी लिखी जा रही है वह भाषाजगत में प्रविष्ट होने के बाद ‘मैँ’, ‘तुम’, ‘वह,’ ‘वे’ के दायरे में अपनी स्वयंता को अर्जित करते हुए खुद को ‘मैं’ की तरह पहचानता है और पहचान के क्षण से ‘आत्म’ या ‘स्वयम् होना शुरू करता है। इस तरह अर्जित अहम् अपने अतीत का फल है, बूँद बूँद कर संचित अधिगम (learning) के स्मृतिपुंज का जमा-घटा-गुणा-भाग। अब तक का जिया गया जीवन संचित अतीत है और व्यवहार जगत में उसका अर्थ स्मृति-संचय है। स्मृति और कल्पना का गठबन्धन इस संचय को यथावत नहीं रहने देता। घटित होने के क्षण से लेकर लिखे जाने के क्षण तक में तथ्यों का स्वयंघटित संयोजन-पुनर्योजन और अचेतन की अबूझ तर्कातीत प्रक्रिया द्वारा उनका बिम्बों/आद्यबिम्बों/मिथकों/स्वप्नों में कायाकल्प, अपनी संस्कृति में उपलब्ध और सामूहिक अवचेतन में उपस्थित वृत्तान्तों/महावृत्तान्तों के साथ संश्ले्ष-विश्ले्ष इस स्मृति-संचय को एक जटिल तथा संचित होते हुए भी प्रवहमान प्रक्रिया बनाते हैं। इसीलिये कहते हैं कि स्मृति का अर्थ घटित हो चुकी कल्पना है और कल्पना का अर्थ अभी घटित होने को बाकी स्मृति है।
स्मृति यानी एक क्षण, एक दृश्यि, एक तथ्य जो एक विजड़न का विषय बनाया जाकर विस्मृति के सागर में डूबने से बचा लिया गया है, आत्मकथा के सन्दर्भ में वह कथा का रूपाकार है, कथा की जीवनशैली जो दिमाग़ में लगातार चलती रहती है और कहने के साथ बदलती भी रहती है। इस वृत्तान्त मेँ इतने बहुत से परस्पर विरोधी हितों की टकराहट के शामिल रहते हुए असंभव है कि जीवन कभी जैसा का तैसा पूरी तरह से स्वीकार्य होगा। इस अधूरेपन, इस खलिश, इस अस्वीकृति, इस टकराहट में आत्मकथा के लेखन की ज़रुरत की तड़प और छटपटाहट का उत्स है, स्त्री की आत्मकथा मेँ और भी अधिक।
उपलब्ध आत्मकथाओं के साक्ष्य पर ‘आत्म’ के अर्जन और निरूपण की दो स्थितियाँ दिखाई देती हैं। पहली स्थिति में निश्चित प्रवृत्तियों, रुचियों-रूझानों, अरुचियों-निषेधों से सम्पन्न पहले से मौजूद ‘आत्म’ जिसे केवल शब्दों में निरूपित किया जाना है और दूसरी जिसमें निरन्तर रचित होती हुई कथा की प्रक्रिया में निरन्तर रचित होता हुआ आत्म अभिव्यक्ति पाता है। आत्म की तलाश में कथा कही जाती है।पहली तरह की आत्मकथाओं में पहले से मौजूद ‘आत्म’ समाज के नियामक विमर्शों के, मूल्यों और सत्यों की सनातन अवधारणाओं के दबाव में निर्मित, परम्परागत कायदे कानूनों के साथ समंजित या फिर असमंजस के बावजूद समर्पित आत्म है। दूसरी तरह की आत्मकथाओं में क्रमशः आत्माविष्कार, आत्म-साक्षात्कार व आत्मोपलब्धि की कहानियाँ भी हैं तो दूसरी ओर आत्म का असमंजस, बेचैनी, छटपटाहट, ध्वंस, दण्ड, अन्ततः सामंजस्य अथवा अन्तिम अस्वीकार के साथ मानसिक विक्षेप, हत्या, आत्म-हत्या जैसी परिणतियों की कहानियाँ भी।
(संवेद से साभार )

‘सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान’

स्त्रीकाल के द्वारा 2015 के फरवरी –मार्च में दिये जाने वाले ‘सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान’ के लिए आवेदन / संस्तुतियां  30 नवम्बर 2014 तक आमंत्रित हैं.

प्रतिवर्ष यह सम्मान हिन्दी की  मूल या भारतीय भाषाओं से हिन्दी  में  अनुदित स्त्रीवादी वैचारिकी  की किसी एक किताब के लिए उसके लेखक ( स्त्री या पुरुष ) को दिया जायेगा .सम्मानित लेखक को 12 हजार रुपये की राशि प्रदान की जायेगी . प्रथम सम्मान के लिए  2008 से 2013 तक  छपी किताब शामिल किये जायेंगे.

आवेदन या संस्तुतियां  भेजने की अंतिम तिथि : 30 नवम्बर 2014 

निम्नांकित पते पर आवेदन और संस्तुतियां भेजें  :
अनिता सिंह , द्वारा नरेश शर्मा Wz43c , पोसंगीपुर , जनकपुरी , नई दिल्ली -110058

किताबों की  दो प्रतियां अपेक्षित हैं . 5  सदस्यों की सदस्यता वाला एक  निर्णायक मन्डल  सम्मान की जाने वाली  एक किताब को संस्तुतित / चयनित करेगा . 

इस संदर्भ में किसी भी विशेष जानकारी या स्पष्टता के लिए प्रथम  ‘सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान’ के  समन्वयकों से सम्पर्क करें:
 निवेदिता : niveditashakeel@gmail.com
 राजीव सुमन rajeevsuman@gmail.com
 धर्मवीर सिंह : singhdharmveer85@yahoo.in
शिवम शर्मा : chhoteshivam@gmail.com ( भारतीय भाषाओं के लिए )

फूटते पेट वाली औरत और मर्दवाद

रति सक्सेना


डा रति सक्सेना संस्कृत की विदुषी हैं, कवयित्री हैं, आलोचक हैं.  साहित्य और संस्कृति की संस्था कृत्या की मैनेजिंग ट्रस्टी हैं.  इनकी हिन्दी में चार ( माया महा ठगिनी, अजन्मी कविता की कोख से जन्मी कविता, और सपने देखतासमुद्र, एक खिड़की आठ सलाखें), अंग्रेजी में दो और मलयालम में एक (अनूदित) एक द्विभाषी कविता पुस्तक , झील में मसालों की खुशबू कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं । इतालवी भाषा में भी एक कविता संग्रह और अथर्ववेद की प्रेम कविता का अनुवाद प्रकाशित हो के  हैं। (हिन्दी में दो और कविता संग्रह तथा अंग्रेजी में एक कविता संग्रह शीघ्र प्रकाशित होने वाले हैं ) वेदों को आधार बना कर लिखे गए लेख अपने विशेष दृष्टिकोण के कारण पठनीय रहें हैं . रति सक्सेना www.kritya.in नामक द्विभाषी कविता की पत्रिका की संपादिका है जो पिछले 10 वर्षों से चली आ रही है। कृत्या नामक संस्था द्वारा पिछले 8 वर्षों से स्तरीय कवितोत्सव मनाए जा रहे हैं, जो अपने स्तरीय प्रदर्शन के कारण वैश्विक स्तर पर प्रसिद्ध हैं। इनसे इनके ई मेल आइ डी : saksena.rati@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है

( रति सकेसना के ये दो संस्मरण   औरत की दुनिया , औरत बनने की कथा , मर्दवाद के प्रयोगशाला , पीढियों के फर्क और मर्द्वाद की पीढीवार निरंतरता , आदि को बेहद संजीदा ढंग से अभिव्यक्त करते हैं.)

1. फूटते पेट वाली औरत

दुखते जोड़ों को घसीटते घसीटते दिन भर तो कम में मशगूल रहती थी वह, लेकिन जरूर कुछ ना कुछ सोचा करती होगी, प्लाट बुनती होगी फिल्मी लेखकों की तरह, मन ही मन आवाज भी दुहराया करती होगीं, तभी तो साँझ ढलते ही वह भी ढल जाती आँगन में बिछी चोड़ी सी चारपाई पर लगे बिछे पर , और हाथ पैरों पर तेल चुपड़ते हुए जोर जोर से नवासे नवासियों को पुकारने लगती,, अरे भई, जिसे कहानी सुननी हो, सुन लो, मेरा तो पेट फूल रहा है, कहीं फट ही नहीं जाये कहानी के मारे…

बस फिर क्या गर्मियों की छुट्तियों में नानी के घर आये बच्चों में होड़ लगती कि कौन कितना चिपट कर कहानी सुने, जिसे जहाँ जगह मिलती घुस जाता, कोई पेट पर लदता तो कोई बाये कंधे को सिहाना लगाता, तो कोई पैताने उड़ंगा बैठ जाता।

नानी के भी तो १२ नवासे नावसियाँ थीं. और नानी के पास हर बार नई कहानी, ना जाने किस कारखाने से लाती थीं वे, हालांकि कुछ बेहद देसी कहानियाँ थीं, जो बार बार दुहराई जाने पर भी उबाऊ नहीं होती, लेकिन इन दो चार कहानियों के बल पर बच्चों को कितने दिन बाँध पाती , तो बस उसने अपना कारखाना शुरु कर दिया, उसके पात्र महाभारत से उतर कर वर्तमान में आते फिर कही भी चल देते, चाचा चौधरी तक खोज ना पायें, ऐसी थी उसकी कहानियाँ…

उसके नवासी नवासे बढ़े हो गये कब के, बड़े बड़े पदों पर हैं, लेकिन नानी का पेट फूलना और उसमें से कहानियों का निकलना उनकी सबसे खुबसूरत यादे हैं,..

अब मेरा पेट फूलता है,

मेरी खाट खाली है,

मेरे नवासे नवासियों को वक्त ही कहां इस बेहूदगी के लिये

2. मर्दवाद

उस पीढ़ी की हूँ जब औरत को कमजोर बनाना सामाजिक भूमिका का अंग हुआ करता था, भोजन से लेकर कामकाज तक, घर में कोई भाई ना होने के कारण मुझे व्यक्तिगत रूप से कभी यह अन्तर महसूस नहीं हुआ, लेकिन घोर बचपने में भी चकित रह गई थी, जब एक सखी ने आकर खुशी खुशी बताया था कि आज उसे करछी भर दूध मिला, जिसमें रोटी भिगो कर खाने का स्वाद वह स्कूल तक ले आई… मेरे लिये यह बात चकित करने वाली थी, क्यों कि मुझे रोजाना कप भर दूध पीने की बन्दिश खलती थी,,,, हमारे दूध के लिये आनाकानी करनेपर माँ कहती .. पी लो. पीलो… ससुराल में तो पीने को मिलेगा नहीं तब नखरे करना,,, उस वक्त तो बहुत गुस्सा आता लेकिन उनकी बात सोलह आने सच थी…

मैंने तो अपने बचपन में बीकानेर में सासों के मुँह से बीन्दनियों की बुराई कुछ इस तरह से सुनी थी कि .’.म्हारी बीन्दनी चुरा कर मट्ठा पीये है’…. मुझे उस वक्त भी आश्चर्य होता था  कि बीन्दनी चार चार गाय भेंसों को दुहे मट्ठा चलाये, घी निकाले लेकिन चुल्लू भर मट्ठे को होंठो से छुला ना पाये… जी यही समाज था…और इसे अच्छी बात मानी जाती थी…. माँ की ये बड़बड़ाहट कि पिता ने लड़कियों को सिर पर चढ़ा दिया है, ससुराल जायेंगी तो भुगतेंगी, सही प्रतीत हुआ…

घर परिवार में हर जगह औरत को कमजोर बनाने का अभियान इस कदर चलता था कि औरत भी उसी षडयन्त्र का हिस्सा थी. हमारी पीढ़ी ने कोशिश की लड़कियों को कम से कम भोजन तो अच्छा दिया जाये, उनकी शिक्षा भी उनकी रुचि के अनुसार ठीक ठाक हो…. लेकिन बेटियों के लिये एक कशमकश सामने रख दी कि जो उन्होंने अपने घर में देखा,वह सच है या जो वे दूसरे घर में देख  रही हैं वह?

अब घर से बाहर की बात… माँ ने साइकिल दिलाई,पिता ने साइकिल पर कालेज जाने की छूट दी… लेकिन बहुत कम उम्र में ही समझ आ गया था कि यदि साइकिल पर जाना है तो लड़कों के कालेज निकलने से काफी पहले के समयपर निकलों या लड़कियों के झुण्ड में चलो… नहीं तो साइकिल से ही डुप्पट्टा उड़ा लिया जायेगा या किसी अंग पर हाथ मार दिया जायेगा…. घिन आती थी, लेकिन किसी से शिकायत की हिम्मत भी नहीं होती थी, नहीं तो साइकिल छुड़वा कर घर पर बैठा नहीं दिया जाये…

जब राजस्थान यूनिवर्सिटी बस से जाना शुरु किया तो घर से बहुत जल्दी चल देते थे, दफ्तरी बाबुओ की शिफ्ट से कहीं पहले, क्यों कि उन दिनों युवा लड़के बस आवाजें कसते थे, लेकिन बाबुओं की मानसिकता चुपचाप हाथ मारनेकी होती थी….अकसर बसों की सीट को एक एक युवक हथिया लेता, लड़कियाँ या तो आधा घण्टे खड़ी रहें या किसी लड़के की बगल में बैठ बकवास सुने…मजा तब आता था कि जब कोई ग्रामीण औरत घाघरा लपेट कर किसी युवक के बगल में बैठ जाती थी, ग्रामीण महिलाऔं की जबान और कद काठी दोनो ही मजबूत हुआ करती थी…और हम पढ़ी लिखी  लड़कियाँ उनकी छत्रछाया में आश्रय लेती थी.

भाग्य से बेहद अच्छे प्रोफेसर मिले थे, मेरे गाइड यूनिवर्सिटी के भीतर अपने बंगले में ही पी एच डी की तैयारी करवाते थे, और जब तक वे देखते पढ़ते उनकी पत्नी बगल में ही जमीन में बैठी तरकारी काटती रहती, जब कभी उनकी पत्नी मैके जाती तो सुधीर कुमार गुप्त जी के घर के बाहर नोटिस लग जाता ,, कृपया शोधार्थी फलां तारीख के बाद ही आये, फला तारीख तक शोध कार्य नही चलेगा…. फोन आदि का जमाना ही नहीं था…अब जाकर महसूस होता है कि कितने सजग और महान गुरु थे हमारे, नहीं तो उस वक्त हम उनकी डाँट के कारण हिटलर ही समझते थे….

केरल में इस तरह की घटनायें काफी सुनी, सच कहा जाये तो मैंने यहाँ घर चल कर आई पोस्ट डाक्टरेट को इस लिये नहीं स्वीकारा कि यह ज्ञात हुआ कि वेदान्त विभाग के हेड आफ डिपार्टमेन्ट हद दर्जे के कमीने हैं, लड़कियों को बहुत छेड़ते छाड़ते हैं, यहाँ तक कि बस में चुकोटी भी काटते हैं…. इतनी हिम्मत ही नहीं थी कि ऐसे बदनाम व्यक्ति के विभाग में काम करूं.. और इसलिये जिन्दगी का बड़ा मौका जानबूझ कर  खोया….
फिर तो यहाँ की पर्ते भी खुलने लगी कि किस तरह स्कूल की लडकियाँ अपने साथ कम्पास या पिन लेकर चलती है, जिससे छेड़ छाड़ करने वालों से बच सकें,

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अय्यप्पा पणिक्कर ने इन महारथियों पर कविता भी लिख दी… जो हास्य में व्यंग्य के विद्रूप को दिखाती हैं….
बाहर की दुनिया बेहद जटिल है, और हर जगह अपने को बचाना औरत की मजबूरी होती है,,,,सच पूछो तो अपने को कठोर करने की कोशिश में कभी वह कर्कश भी हो जाती है, इसे भी समझा….अकेले यात्रा करना, रात को देर से लौटना बेहद कठिन है, कम से कम अपने देश में…. यह अच्छी तरह से समझ में आ गया…
यही नहीं यह भी समझ में आया कि साधारण कामगारों से काम करवाने में भी उसे अपने घर के पुरुषों की मदद लेनी पड़ती है,,, जैसे यदि किसी कामगार से घर की औरत ये कहे कि यह ठीक नहीं हुआ तो वो भड़क उठेगा , लेकिन यदि यदि वही बात घर का मर्द कहे तो वो चुपचाप कर लेगा…

मर्दवाद हर कदम में दिखा, कभी मर्द के रूप में तो कभी औरत के रूप में  मैं यह भी सोचती हूँ कि औरत को कमजोर बनाना एक सोची समझी चाल है, और औरत का मजबूत बनने का दिखावा करना अपने स्वत्व को खोने की कोशिश है…और औरत का वास्तब में मजबूत बनाने में औरत और मर्द दोनों की सार्थक भूमिका की मंग रखती है…

एक ऐसा इतिहास कि जो लिखा न गया किताबों में

फारूक शाह


मिजाज से फकीर और विचार से दार्शनिक फारूक शाह हिंदी और गुजराती के  कवि और आलोचक हैं .  ये   विशेष तौर पर हाशिये के लेखन ( दलित , दलित स्त्री और स्त्री लेखन ) , तथा मध्यकालीन निर्गुण -सूफी -जोगी साहित्य के प्रति समर्पित हैं ,  शोधरत हैं, और भारतीय भाषाओं में हो रहे  हाशिये के लेखन तथा संत साहित्य को   हिंदी में तथा गुजराती में प्रस्तुत करते रहे हैं .
लेखन और सम्पादन : ‘वही’ (कविता और लोकसंस्कृति की गुजराती पत्रिका) के संपादक. हिन्दी पत्रिका ‘वंचित जनता’ के साहित्य विभाग के संपादक.  *कविता संग्रह : ‘नकशानी एक रेखा’ (कविता संग्रह) *संपादन ‘सुण शबद कहे जो संत-फ़कीर’ (गुज. संत-सूफी-जोगी शबद) ‘कोयल आंबलियामां रमती’ (बेटी विषयक लोकगीत) ‘पाये पाये मानब मुक्तिर खोज’ ( अनुवाद और संपादन : दलित-शोषित बांग्ला साहित्य) ‘विश्वे व्यापवानी आकांक्षाए ऊभेली…’ (अनुवाद और संपादन : भारतीय भाषाओं से दलित स्त्री लेखन) ‘चित्त नवुं चन्द्रमा पण नवो’ (लल द्यद की कश्मीरी कविताओं का अनुवाद) ‘सोई सरवर ढूंढि लहे…’ (बाबा फरीद के पंजाबी सलोक के अनुवाद) .
स्त्रीकाल के पाठकों के लिए दलित स्त्री के बारे में इनकी तीन कवितायें . फारूक शाह  से farook_shah@gmail.com  पर सम्पर्क किया जा सकता है.

1. उत्पत्ति विचार 

पहले कुछ भी नहीं था
बाद में विश्व का सर्जन हुआ
हरेक जीव को जीने का अधिकार प्रकृति ने दिया
बाद में कई युग बीत गए
कहते है कि वानर से बन गया मानव
मानव जंगली था
फिर सभ्य हुआ
पहले हिंसक था
फिर रचनात्मक बना
बाद में उस रचनात्मकता के शास्त्र बने
शास्त्रों को प्रचारित करने वाला पुरोहित अस्तित्व में आया
उसने मानव को दो हिस्सों मेँ बाँट दिया
नर और नारी
नर का राज रहा
नारी ने नौकरी की

बाद में नर को भी बाँटा गया
जाति में
नर के साथ नारी भी जाति में बँट गई
फिर उच्च और नीच की श्रेणियाँ कायम हुई
फिर नारी जो नौकर थी और उच्च या नीच जाति थी
उसमें उच्च उच्च रही
नीच नीच रही
दोनों में सींचा गया
आपस के भेदभाव का संस्कार
फिर उनके रक्त निचोड़ने की पद्धतियाँ
बनाई गई
नीच के हिस्से जाति आई, बाहर की मजदूरी आई
और कई सारी दिक्कतें
देह को लेकर चारों ओर से आ घमकी
रक्त निचोड़ा गया सभी का

बाद में एक लम्बा समय-खण्ड गुज़र गया
तभी आशा का प्रकाश फैलाने वाले
कुछ लोग आये
उन्होंने कुछ रक्त विहीन देहों के दिलों में
आशा की ज्योत प्रज्वलित की
बाद में उन रक्त विहीन देहों के तल से
पैदा हो गई आग
फुफकारती तेज तर्रार आग
उस आग से उन्होंने पहले तो जलाया
अपने दिमाग में जमे हुए दु:खों को
फिर सूखी हुई रक्त-नलिकाओं में भर दिया
आग से उत्पन्न तेजपुंज
बाद में जलाया अपने आसपास उगाई गई
कंटीली झाड़ियों को
बाद में वे सब
जो कुछ भी जीवन के विरोध में हैं उसको जलाने के लिए
कटिबद्ध होकर जूझ रही हैं

2.  शायद अब

शायद अब समय आ गया है
हीनताओं की आपाधापी से
गरीबी की लाचारी से
जाति के धिक्कार से
गिद्धों के बीच फँसी गोरैया जैसी हालत से
इन्सान होने की शंकाओं से
और औरत होने के दंशों से
शायद अब तू बाहर आ सके

तेरे आसपास मंडराते आये हैं अविरत
अगणित सांप
अपनी जीभ लपकारते
विष टपकता मुँह डुलाते
डरावनी चेष्टाएँ करते

तेरे आसपास अज्ञान का अभिशाप
अपने तीक्ष्ण दाँत भींचता
क्षत-विक्षत करता आया है
सदियों से

तेरे आसपास शोषण के
प्रताड़ित करने के
सरंजामों का ढेर
करता आया है समाज
हमेशा से

तू बच्ची से बूढ़ी होती चली आ रही है
एक कृतक गढ़े हुए मिथक जैसी
तू सदा हीन ख्याल की तरह
सोची और समझी गई
तेरा अस्तित्व, तेरा आत्मबोध
तेरा अपना मनोजगत
अभी तक अनुपस्थित रहता आया है
इस पृथ्वी पर

फिर भी तू एक भ्रमणा हमेशा पालती रही
अपने भीतर कि तू कुछ है
तुझे पता ही न चला कि
तेरे होने का, तेरे मन का
तू जिसे अपना जीवन मानती हो उसका
तू जिन्हें अपनी महत्त्वाकांक्षाएँ समझती आई हो उन सब का
उपयोग होता आया है
तेरे अस्तित्व के विरुद्ध
तुझे थी – न थी करने वाला वातावरण रचने के लिए
उन सब बातों का इस्तेमाल होता आया है

तू हरेक युग में हर जगह थी
और तू होते हुए भी कहीं भी नहीं थी
ऐसा इसलिए लगता रहा कि
हकीकत में तुझे अवकाश में खड़ी की गई
बात की तरह प्रस्तुत करने की प्रथा
हमेशा से चली आई है

शायद अब समय आ गया है
तेरे बारे में जो भ्रांतियों की परम्पराएँ
सदियों से चलाई जा रही हैं
उन सब भ्रांतियों के परदें फाड़कर
बाहर आने का
शायद अब समय आ गया है
अपने होने का सत्य
अपने भीतर ही ढ़ूंढ़कर
अपने कण्ठ से
उसे व्यक्त करने का
तेरा सत्य तुझे व्यक्त करना चाहिए
क्योंकि दुनिया अभी तक उससे बेखबर है
तू इतना तो कर सकेगी न ?
इतनी कृपा करने का साहस तो तू जुटा ही सकती है

3.  निर्तिहास

एक इतिहास को लिए
अपने चहरे की उलझनों में
सफ़र करती रही
दलित शोषित समुदाय की स्त्री

एक ऐसा इतिहास
कि जो कभी
लिखा न गया किताबों में
जिसने भी कोशिश की
उसे लिखने की
उसके हाथों को काट दिया
क्रूर ठेकेदारों ने
जिसने भी प्रयत्न किया
उसके उच्चारण का
पाशविक दुकानदारों ने उसका
गला घोंट दिया
जिसने भी चेष्टा की उस इतिहास की ओर
संकेत करने की
तहस-नहस कर दिया रक्तपिपासु दरिंदों ने
उसके वजूद को

और इतिहास कोई रुकी हुई नदी जैसा नहीं होता
या तो कोई कोने में पड़ी
चेतनहीन चीज जैसा
हकीकत में वह होता है
दीमक के आदमखोर गिरोह जैसा
और होता है उन प्रचण्ड मस्तकधारी
डरावने प्रेतों की
युगों युगों तक फैली कतारों जैसा
जो अभिशाप उगलते रहते हैं

ये दीमक, ये प्रेत
दलित शोषित स्त्री के चेहरे की त्वचा में
सिमटने की जिद धरे न जाने क्यों आज तक
चले आये होंगे बेशर्मी से ?

स्त्री आखिर तो स्त्री होती है
उसके अंदर शक्ति होती है प्राकृतिक रूप से
उसे भूखी रखने से या उसके चेहरे से
अभिव्यक्त होने मथती भावनाओं को नोंचते रहने से
या उसके हाथ-पैर को शोषते रहने से
या तो उसके अंदर शक्ति के अभाव का वहम डालने का
षड़यंत्र चला-चलाकर
कब तक शक्ति को दबाया जा सकता है ?

कुदरत प्रतीक्षा रत है
ममता में डूबी माताएं
भीगी पलकें बिछाए राह देख रही हैं
बचपन की उजाड़ डगर पर छोटे-छोटे पाँव भरते
बेगुनाह बच्चे
आश भरे नयनों से घूर रहे हैं पालने-पोषने वाली को

गुज़री हुई और आने वाली पीढ़ियों की चेतना
बेचैन हो तड़प रही है
कोई उपाय के लिए
दबाई गई शक्ति जागृत हो सकती है
होनी ही चाहिए
जागृत होकर अणु-अणु से प्रबल प्राण विस्तारती
उखाड़ के फेंक देंगी
कीड़ें-मकोड़ों जैसे दीमक और प्रेतों को
पृथ्वी को इतिहास विहीन बना देंगी
अपनी ममता का समुद्र बहाकर
नए सिरे से वह निर्माण करेंगी इस विश्व में ऐसा जीवन
जैसा कि होना चाहिए