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जूते

कौशल पंवार


कौशल पंवार दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कालेज में संस्कृत पढाती हैं. उनसे उनके मोबाइल न.  09999439709 पर सम्पर्क किया जा सकता है.

( कौशल पंवार की यह कहानी जाति दंश के साथ गरीबी में जीने वाले बहन और भाई के प्रेम की  कहानी है, एक  साथ बुने जा रहे सपने और सपने के लिए एक -दूसरे में अपने हिस्से को छोडने की लगी होड की कहानी भी , वह हिस्सा , जो हासिल भी बहुत मुश्किल से है. यह कहानी एक बहन के उस दंश की भी कहानी है, जो अपने  आंशिक रूप से कामयाब जीवन के बाद , उसकी  नीव के पत्थर अपने भाई के लिए कुछ करना चाहती है, तब वह भाई ही नहीं रहा. गहरी सम्वेदना की यह कहानी स्त्रीकाल के पाठकों के लिए : कौशल की पहली अभिव्यक्ति को भी सम्भवतः स्त्रीकाल ने ही प्राकशित किया था, जो इन्होंने पत्रिका के   ‘ जीवन’ कालम  के लिए के लिए लिखा था , आत्मकथात्मक अभिव्यक्ति .)

पांच बजे के आस-पास मेरी बेटी टी.वी. देख रही थी। मैं पास ही सोफे पर बैठी लैपटाप पर अपना मेल चैक कर रही थी। बेटा मंयक ट्यूशन के लिए चला गया था सो हम दोनों ही घर में थे। वह बार-बार चैनल बदल रही थी। तभी मेरी भी नजर उस ओर चली गयी। सामने एल.सी.ड़ी. पर कोई फिल्म चल रही थी जिसमे टीचर अपने स्टूडैंट से कह रह था –  “तुम मैराथन दौड़ में हिस्सा नहीं ले सकते, तुम्हारे पास न तो मैराथन लायक जूते है और न ही मंहगी सी कोई टीसर्ट ही है।” बच्चा चुपचाप सुनकर निराश होकर कमरे से बाहर आ गया था।

अच्छे जूते नहीं है। यह  वाक्य मेरी जेहन में बैठ गया था। जूतों का संबंध मुझसे गहराई से जुड़ा हुआ था। मैने अपना लैपटाप बंद कर दिया था और बाल्कनी में चेयर डालकर बैठ गयी थी। बेटी फिल्म देखती रही। मैने उसे पानी के लिए आवाज दी पर उसका सारा ध्यान शायद फिल्म देखने में होगा इसलिए उसको सुनायी नहीं दिय। मै उठी, पानी की बोटल फ्रीज से निकाली  फिर वही उसके पास आकर बैठ गयी और एकटक टीवी स्क्रीन पर चल रही तस्वीरों को देखने लगी पर ध्यान कहीं ओर ही था, टी.वी. की तरफ तो केवल आंखे थी। हाथ में बोटल पकड़े-पकड़े मैं जूतों के बारे में ही सोचती रही थी पानी पीने के लिए मैं उठी थी, भूल ही गयी थी।

नमी पाकर चिल्ड बोतल से टपकती पानी की बूंद मेरे बाजू पर गिरी। तभी मुझे याद आया मुझे प्यास लगी थी । मैने बोतल से ही पानी पीया और उसे कुर्सी के नीचे ही रख दिया था। फिल्म चल रही थी, वहीं दूसरी ओर मेरे दिमाग में भी फिल्म की रील की तरह एक-एक सीन आंखों के आगे आ रहे थे ; सीन में मैं भागी जा रही थी कालेज के बरामदे में होती हुई सीधा एडब्लाक पहुंची थी। थोड़ी देर खड़ी होकर अपनी उखड़ती सांसों को मैने दुरुस्त किया और धीरे-धीरे अंदर आफिस में गयी।  सामने की कुर्सी पर कलर्क बैठा था। मैने डरी-डरी लड़खड़ती आवाज में पूछा – ““सर मैं फीस……..बस इतना ही मुश्किल से कह पायी थी कि तभी उसने दबंग आवाज में पुछा – “रोल नं…….” पूरा वाक्य नहीं बोला था । मैने कहा – “सर, १६३४…”

इतना सुनते ही वह फाइल में से कुछ टैटोलने लगा था। कभी एक फाइल देखता, उसे रखता, फिर दूसरी उठाता, उसे भी देखता। उसने दोबारा पूछा – “क्लास ?”

“सैंकिंड इयर सर…” मैने जवाब दिया ।

उसने फाइल बंद कर दी थी । वह मुझे ऊपर से नीचे तक घूरने लगा था। मैने अपने हाथ में पकड़ी किताबों की पालिथिन को कस कर पकड़ ली थी कि जैसे कि अभी यह मुझे आफिस से फीस न देने के कारण धक्के मारकर बाहर निकाल देगा। फिर मुझे उसकी आवाज सुनाई दी – “फीस भर तो दी, अब ओर क्या चाहिए तुम्हे ? सुबह-सुबह धक्के मरवा दिये फाइलों मे ? चाय भी नहीं पी थी अभी।”

मैने उनसे सम्भलते हुए पूछ ही लिया कि, “सर मेरी फीस किसने दी ?”

कलर्क ने सुनकर अजीब सी आंखों से मुझे ताका और कहा -“ “कल कोई आया था, वही भरकर गया है तुम्हारी फीस, तुम्हें नहीं बताया उसने ?” इतना कहरकर उसने चटकारा सा लिया। मुझे जवाब मिल गया था। मैं उल्टे पैर आफिस से बाहर आ गयी थी ।

  निश्चिंत हो गयी थी मैं कि चलो अब कम से कम इस साल की फीस तो भरी, वरना पता नहीं कालेज दोबारा आ भी पाती या नहीं ? मै बाहर निकलते हुए खुशी से झुमती-फुदकती बरामदे से निकल रही थी। ऐसे चहक रही थी जैसे किसी ने आकर बिन मांगे ही मुराद पूरी कर दी पर थोड़ी ही देर में खुशी में ब्रेक लग गया जब याद आया कि फीस कालेज में किसने भरी ? सारा सीन आंखों में घूम गया था मेरे…।

मैं पिछले कई दिनों से कालेज नहीं जा रही थी । सुभाष से भी मिलने नहीं गयी थी। जब भी वह मिलने आता तो मैं बाहर निकल जाती। मैं उससे आंखें मिलाने का साहस नहीं जुटा पा रही थी। मैं उसके घर की सारी स्थिति को जानती थी। उसकी मां दूसरों के घरों में जो कमा कर लाती, उसी से घर का गुजारा चल रहा था ऊपर से उनके पिता जी की दवायी का खर्चा भी इधर-उधर से उधार मांग कर ही चल रहा था। इसलिए किस मुंह से उसे अपनी परेशानी बताती कि मेरी कालेज की फीस अभी तक नहीं गयी इसलिए कालेज नहीं जा पा रही हूँ।

जब भी मेरा और सुभाष का आमना-सामना होता तो मैं कभी पेट दर्द का बहाना बना देती तो कभी किसी ओर चीज का। मैं  जानती थी कि वह सुनकर परेशान हो जायेगा। उसे अपनी वजह से परेशान नहीं करना चाहती थी। अगर उसे पता लगा तो…..? तो वह कुछ भी करेगा पर फीस मेरे हाथों में लाकर रख देगा। इसलिए मैने उसे बिल्कुल नहीं पता लगने दिया कि कालेज न जाने की वजह क्या है ?

एक दिन सुभाष बहुत खुश था। वह  घर आया। उसका चेहरा खुशी के मारे दमक रहा था। मैं घर की छत पर पड़ी लकड़िया उठाने गयी थी चूल्हा जलाने के लिए। जैसे ही नीचे की ओर झुकी तो सामने गली से ही सुभाष आता दिखायी दिया था। कुछ लकड़िया हाथ में उठा रखी थी। हाथ में पकड़े हुए ही मैं उसे देखती ही रही। उसे मिले कई दिन गुजर गये थे इसलिए मन ही नहीं किया नजरों को चुराने का। वैसे भी इतना खुश वह कभी-कभी ही होता था या तो तब जब वह किसी की सहायता करता और ढेरों सपने किसी की आंखों में देखता या फिर रिजल्ट आने पर ही इतना खुश होता था वह भी मेरा। मैने तो अपना रिजल्ट कभी खुद देखा ही नहीं था। वह ही हमेशा देखता था और बहुत खुश होता था। अपनी कम्पार्टमैण्ट आने का दुख उसे कम होता बल्कि मेरे पास होने की खुशी ज्यादा होती थी। पर आज क्या कारण हो सकता है, मुझे समझ नहीं आ रहा था। पहले तो मैं उसके चेहरे को पढ कर ही बता दिया करती थी कि ये वजह  है पर आज पता नहीं लगा था।

 मैं छत से नीचे उतर आयी थी। चूल्हे के नजदीक जलावन को रख दिया था। दरवाजे की ओर गयी – “कैसे हो भैया…… ?” मैने उसकी ओर बढ़कर कहा ।

“मेरी छुटकी गुड़िया मैं एकदम पहले जैसा हूं….” कहते हुए वह खाट पर बैठ गया ।

मैं भी घडे से पानी का गिलास भरकर ले आयी थी। उसे गिलास पकड़ाते हुए कहा – “घर में सब ठीक-ठाक। मेरी बात का जवाब दिये बिना उसने पूछा था – “कालेज क्यों नहीं जा रही हो…..? एक दो दिन से तबीयत खराब है। उसने मेरे सिर पर चम्पत लगाते हुए मेरे शब्दों को दोहराते हुए कहा – “एक दो दिन…. तुम्हें कालेज गये आज पूरे सात दिन हो गये है ! मैने अपनी नजरे नीची कर ली थी जैसे अपनी गलती का अहसास हो गया हो।

मां पास में ही चूल्हे पर रोटियां सेंक रही थी । चूल्हे से आटे की महक और पास ही कूंण्ड़ी में कूटी गयी लहसून और लाल मिर्च की चटनी की महक फैल रही थी । रोटियां बनाते-बनाते मां ने कारण बताना चाहा पर मैने बात को टालते हुए कहा – “भैया, गर्म-गर्म रोटी खाओंगे ? मां ने लहसून की चटनी भी बना रखी है। मां को कहा – “मां, दो ना सुभाष को रोटी।“ मां का ध्यान एक पल के लिए हट गया था । तवे पर रखी रोटी जल गयी थी। सपनों के जलने जैसी महसूस हुई मां को वह। मां ने जल्दी से हाथ से रोटी को पल्टा और उसे सेंका। अगली रोटी का आटा लिया और उसे हथेलियों के बीच में रखकर गोल-गोल घुमाने लगी। आर्थिक तंगी को भी मानों अपने से दूर गोल-गोल घूमाकर दूर कर देना चाह रही थी मां। पर ऐसा नहीं कर पा रही थी। मां ने एक रोटी थाली में रखी और चटानी को उसके ऊपर रखकर सुभाष को दे दी।

सुभाष ने रोटी का बड़ा सा टुकड़ा मुंह में ठूंसा और मुझसे कहा-पूछोगी नहीं छूटकी गुड़िया कि मैं आज खुश क्यों हूं ? हां बताओ क्या हुआ आज जो इतना खुश हो ? उसने अपने पैरों की ओर देखा और कहा-मुझे मां ने जूते खरीदने के पैसे दिये है। मै जूते खरीदूंगा और कालेज में जूते पहनकर जाउंगा ? अब तुम मुझसे नहीं कहोगी कि कालेज में जूते पहनकर जाया करो, गठ्ठी हुई चप्पल नहीं। मैं हंस पड़ी । सुनकर बहुत खुश हुई। मेरा भाई भी कालेज में जूते पहनकर जाया करेगा। अब सब लड़कियां मुझे नहीं कहेगी कि इतनी ठेठ गर्मी में तुम्हारा भाई चप्पलों में कालेज कैसे चला जाता है, वह एक जोड़ी जूते भी नहीं खरीद सकता ? मुझे सुनकर बहुत बुरा लगता और शर्मिंदगी भी होती कि हमारे मां-बाप इतनी मेहनत करके भी एक जोड़ी जूते तक क्यों नहीं खरीद सकते ? दूसरी तरफ सभी लड़के-लड़किया सज-धज कर, अच्छे से तैयार होकर कालेज जाते है ? मैने सोचा चलो एक समस्या तो हल हुई। सोचते-सोचते मैं बरामदे में सामने की दिवार से टकरा गयी। माथे पर हल्की सी गांठ पड़ गयी पर मन की गांठ खुल चुकी थी।

अपने ऊपर बहुत गुस्सा आया। मुझे नये-नये जूते दिखाई दे रहे थे पर वे सुभाष के पैरों में नहीं थे। इतनी गर्मी की लू जिसमें सब कुछ झूलस रहा था। घर से सड़क तक चप्पलों में आना फिर कालेज में आना-जाना सोचते-सोचते अपने आप पर बहुत गुस्सा आ रहा था। हम और हमारे मां बाप दिन-रात काम पर लगे रहते हैं फिर भी हमारे पास कुछ नहीं है जो ओरों के पास है। पिता जी के कहे शब्द याद आ गये कि संसाधन बनते नहीं बनाये जाते हैं। बाबा साहब ऐसे ही तो नहीं बने होंगे डाक्टर ? हमारे समाज की शान। मैने सोचा और कालेज के गेट से बाहर निकल आयी। मन में आगे बढ़ने का उत्साह मिल चुका था। आगे का रास्ता तय था। कदम बढ़ाना अभी भी बाकी था जो बिना सुभाष के संभव नहीं था। अपने ऊपर फक्र महसूस हुआ। मैं कितनी अमीर हूँ, पता चल गया था मुझे। मेरे पास क्या कमी है ? मेरे पास वह था जो ओरों के पास नहीं था। वह थी शिक्षा और ज्ञान। कितनी लड़कियां हैं, जो मेरी तरह कालेज तक पंहुची है ? ज्यादातर हमउम्र दूसरों के घरों में कूड़ा-गोबर मल मूत्र उठाने का काम करती हैं। वे सब कहां पढ़ पायी है ? उनको ये अवसर दिया ही नहीं है इस व्यवस्था और घर की मजबूरियों ने। मैं कालेज में पढ़ पा रही हूँ। सुभाष जैसा भाई है, जो हर जरुरत को पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ता।

 यही सब दिमाग में चल ही रहा था कि पता नहीं लगा मैं कब बस-स्टैंड पर पहुंची। सामने सुभाष खड़ा मुस्करा रहा था। मेरी नजरे उसके पैरों में पड़ी चप्पलों की ओर गयी। मेरी आंखे उसे देखकर नम हो गयी थी। पर सुभाष की आंखों में ढेर सारे सपने थे, जिनकों उड़ान देने की जिम्मेदारी अब मेरी थी। सुभाष ने अपनी किताब मेरे सिर पर मारी। कहा – “मेरी गुड़िया, जब झूठ नहीं बोलना आता तो झूठ बोलने की कोशिश क्यों करती है ? मैं तुम्हे बहुत ऊपर उंचाईयों पर देखना चाहता हूँ। जहां पर मेरा समाज अभी तक नहीं पहुंचा है। तुम्हें मेरा, पिताजी का और बाबा साहब का सपना पूरा करना है जो मुश्किल नहीं तो आसान भी नहीं होगा। इन छोटी-छोटी चीजों की वजह से तुम कालेज ना जा पाओ, ऐसा कभी नहीं होगा। मेरे जीते जी तो बिल्कुल नहीं।” “रही बात जूतों की, तो जूते तो तुम्हारी  मेहनत की पहली तनख्वाह से खरीद कर पहनाना। मैं इन्तजार करुंगा। पर मैं तो आज भी इन्तजार कर रही हूं। मेरा इन्तजार आज भी अधूरा है। मेरे पास आज जूते खरीदने के लिए पैसे हैं, जूते हैं, पर वो पांव नहीं रहे जिनमें जूते होने चाहिए थे।”

प्रमोद कुमार तिवारी की कवितायें

प्रमोद कुमार तिवारी


प्रमोद कुमार तिवारी केंद्रीय विश्वविद्यालय गुजरात में हिंदी पढाते हैं , इनसे pramodktiwari@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है

( प्रमोद कुमार तिवारी की इन चार कविताओं , ‘दीदी’, ‘जीभ थी ही नहीं तो कटी कैसे’ , ‘जे एन यू की लडकी’ और फसल औरतें और गीत’ , में हमारे आस -पास की स्त्रियां हैं, हमारे घरों में कैद स्त्री , हमारे गांव में डायन करार दी जाती स्त्री , अवसर पाकर मुक्त उल्लास और सपनों से भरी स्त्री , श्रम करती स्त्री . प्रमोद की कविताओं में ग्रामीण परिवेश के  पात्र और  बिम्ब होते हैं , तो लोकभाषा की खुशबू  भी होती है , लेकिन साथ ही ये कवितायें  ग्रामीण समाज में सामंती पितृसत्तात्मक मूल्यबोध के खिलाफ कथ्य भी हैं . भोजपुरी में भी कवितायें कहते हैं प्रमोद . )

1.  दीदी

दीदी मुझसे एक खेल खेलने को कहती
एक-एक कर
वह चींटों के पैर तोड़ती जाती
ग़ौर से देखती
उनके घिसट कर भागने को
और खुश होती।
दीदी मुझसे एक खेल खेलने को कहती
एक दिन देखा छुटकी की आँख बचाकर
दीदी ने उसकी गुड़िया की गर्दन मरोड़ दी।
पड़ोस की फुलमतिया कहती है
तेरी दीदी के सर पर चुड़ैल रहती है
कलुआ ने आधी रात को तड़बन्ना वाले मसान पर
उसे नंगा नाचते देखा था।
दादाजी ने जो जमीन उसके नाम लिखी थी
हर पूर्णमासी की रात दीदी वहीं सोती है
तभी तो उसमें केवल कांटे उगते हैं।
स्वांग खेलते समय दीदी अक्सर भूतनी बनती
झक सफेद साड़ी में कमर तक लंबे बाल फैला
वह हँसती जब मुर्दनी हँसी
तो औरतें बच्चों का मुंह  दूसरी ओर कर देतीं।
माँ रोज एक बार कहती है
कलमुँही की गोराई तो देखो
जरूर पहले राकस जोनी में थी
मुई! जनमते ही माँ को खा गई
ससुराल पहुचते ही भतार को चबा गई
अब हम सब को खाकर मरेगी
माँ रोज एक बार कहती है।
दीदी को दो काम बहुत पसंद हैं
बिल्कुल अकेले रहना
और रोने का कोई अवसर मिले
तो ख़ूब रोना
अंजू बुआ की विदाई के समय
जब अचानक छाती पीट-पीट रोने लगी दीदी
तो सहम गई थीं अंजू बुआ भी।
पत्थर से चेहरे पर बड़ी-बड़ी आँखों से
दीदी जब एकटक देखती है मुझे
मैं छुपने के लिए जगह तलाशने लगता हूँ।
दीदी के साथ मैं कभी नहीं सोता
वह रात को रोती है
एक अजीब घुटी हुई आवाज में।
जो सुनाई नहीं पड़ती बस शरीर हिलता है।
आधी रात को ही एक बार उसने
छोटे मामा को काट खाया था
और इतने ज़ोर से रोई थी
कि अचकचाकर बैठ गया था मैं।
दीदी मुझे बहुत प्यार करती है
गोद में उठा मिठाई खाने को देती है

उस समय मन ही मन हनुमान चालीसा पढ़ता रहता हूँ
और पहले मिठाई को जेब में
फिर चुपके से नाली में डाल आता हूँ।
दीदी मेरे सारे सवाल हल कर देती है
पर छुटकी बताती है
सवाल दीदी नहीं, चुड़ैल हल करती है।

दीदी से सभी डरते हैं
बस! पटनावाली सुमनी को छोड़कर
सुमनी बताती है
माँ ने ही अपनी सहेली के बीमार लड़के से
दीदी की शादी करायी थी!
सुमनी तो पागल है
जाने क्या-क्या बोलती रहती है
कहती है
घिसट कर ही सही
किसी के संग भाग गई होती
तो दीदी
ऐसी नहीं होती।

2.जीभ थी ही नहीं तो कटी कैसे

(सोनभद्र जिले ,उत्तरप्रदेश ,के करहिया गाँव की उस जागेश्वरी के लिए, जिसकी जीभ भरी पंचायत में 3 अगस्त 2010 को काट दी गई)

आदरणीय पंचो! जागेश्वरी डायन है
इसके कई सबूत हैं हमारे पास
पहला तो यही कि उसके चार बच्चे हैं
हमारी एक भी संतान नहीं और उसके चार-चार बच्चे।
दूसरा, जागेश्वरी बोलती है और जवाब देती है
आप ही बताइए, पूरे गाँव में है कोई स्त्री
जो हमारे सामने कर ले ऐसी जुर्रत
तीसरा, जागेश्वरी सुंदर है
चौथा, जागेश्वरी का नाम जागेश्वरी है
जो कायदे से बिगनी, गोबरी आदि होना चाहिए था
पाँचवा, आप खुद देख लें कि साज-शृंगार का इतना शौक है इसे
कि बाँह तक पर गोदवाए हैं फूल ।
अब क्या बताऊँ, हमें तो कहते भी शर्म आती है
पर महादेव कह रहा था कि
कई बार जागेश्वरी उसके सपने में आई
और ईख के खेत में चलने के लिए खींचने लगी।
और बासमती तो कह रही थी
कि उसने अपने रोते बेटे को
अगर नहीं छीना होता उसकी गोद से
तो चबा गई होती उसको!
रमकलिया भी कह रही थी

कि उसके मरद पर भी
मंतर पढ़ दिया है इसने
हरदम इसी को घूरता रहता है।
पंचो! इस सहदेव की बात छोड़ो
आपै बताओ
भला जागेश्वरियों के पास
कहीं जीभ, दाँत और नाखून होते हैं?
इन पंचों के पूर्वजों के पूर्वजों ने
सदियों पहले कर दी थी व्यवस्था
साफ बात है
जब जीभ थी ही नहीं
तो कटी कैसे
ये सब साजिश है
पंच परमेश्वरों और सभ्य पुरुषों को
बदनाम करने की।

3. जे.एन.यू. की लड़की

देखा मैंने उसे
जे.एन.यू. की सबसे ऊंची चटृान पर
डैनों की तरह हाथ फैलाये
उड़ने को आतुर

देख रही थी वह
अपने पैरों के नीचे
हाथ बाँधे  खड़ी
सबसे बडे़ लोकतंत्र की राजधानी को
जहाँ रही है चीरहरण की लंबी परंपरा

अलकों के पीछे चमकता चेहरा…
जैसे काले बादलों को चीर के
निकल रहल होे
चांद नहीं! सूरज
ग़ज़ब की सुन्दर लगी वो
चेहरे पर थी
उल्लास की चिकनाई, विश्वास की चमक
पैरों में बेफिक्री की चपलता

दिखी वो रात के एक बजे
सुनसान पगडंडियों पर कुलांचे भरती
याद आ गयीं ‘कलावती बुआ’
घर से निकलने से पहले
छः साल के चुन्नू की मिन्नतें करतीं
साथ चलने को।

पहली बार जाना
हँसती हैं लड़कियाँ भी
राह चलते छेड़ देती हैं
ये भी कोई तराना।

पर्वतारोहण अभियान से पहले
उठाए थी बड़ा सा बैग कंधे  पर
चेहरे की चमक कह रही थी
ये तो कुछ भी नहीं
सदियों से चले आ रहे बोझ के आगे
हाँफता समय चकित नजरों से देख रहा था
उसकी गति को।

तन कर खड़ी थी मंच पर
लगा दादी ने ले लिया बदला
जिसकी कमर टेढ़ी हो गई थी
रूढ़ियों के भार से
प्राणों में समेट लिया
उसकी पवित्र खिलखिलाहट को
देर तक महसूसा
माँ का प्रतिकार
जिसकी चंचलता
चढ़ा दी गई थी
शालीनता की सूली पर

बहुत-बहुत बधाई ऐ लड़की!
देखना! बचाना अपनी आग को
जमाने की पुरानी ठंडी हवाओं से
उम्र के जटिल जालों से
दूर रखना अपने सपनों को
हो सके तो बिखेर देना
अपने सपनों को हवाओं में
दुनिया के कोने-कोने में फैल  जाएँ
तुम्हारी स्वतंत्रता के कीटाणु
अशेष शुभकामनाएँ!

4. फसल, औरतें और गीत

एक बूढ़ी औरत सोह रही है खेत
साथ ही सुरीले कंठ से छीट रही है उसमें
आदिम गीतों के
न पुराने होने वाले कच्चे बीज।
एक आल्हर युवती
रोप रही है धान
साथ ही रोपती जा रही है,
लोकगीतों की हरियाली
खेतों में
नहीं श्रोता चरवाहों के मन में।
गीतों में भरी है कथा
कि कैसे रोपी जाती हैं उसकी सहेलियाँ
नइहर से उखाड़कर
अपेक्षाओं से लदे ससुराल में।
भारी काम के लंबे दर्द को
हर रहा है गीतों का सुरीलापन
मरहम लगा रहे हैं
सदियों की दासता को आवाज़ देनेवाले शब्द।
दोनों औरतों ने पूरा किया काम
अलगाए एक दूसरे के बोझ
फिर  दोनों ने सुर मिलाए
ज्यों-ज्यों बढ़ते गए सुर
घटता गया सिर का बोझ
साझी व्यथा ने बढ़ा दिया
करूण स्वरों का सुरीलापन
दोनों औरतों ने बाँट लिया
थोड़ा-थोड़ा हरापन और पकापन
जब वे गाँव में पहुँची तो
बूढ़ी और युवती कम
सखियाँ अधिक थीं
दोनों के चेहरे लग रहे थे
एक से।

जब ‘दुल्हन’ घर छोड़ कर चल देती है…

 असीमा भट्ट
( असीमा भट्ट चेखव की कहानी दुल्हन’ की नायिका की तरह पहले तो प्रेम  और विवाह के प्रचलित फ्रेम में स्वप्न देखती और जीती युवती रही हैं , जो उसी नायिका की तरह इन सब को छोड निकल पडती हैं जिंदगी के दूसरे मायनों की खोज में ,उनके प्रति आशक्त. इस आलेख में असीमा अपनी प्रिय नायिका और अपने प्रिय लेखक को याद कर रही हैं. असीमा पट्ना में पत्रकारिता के बाद  दिल्ली में एन एस डी में प्रशिक्षण प्राप्त कर थिएटर करते हुए आजकल मुम्बई में रह रही हैं, फिल्म , थियेटर और लेखन को समर्पित होकर )

१९९३ में मैंने चेखव की कुछ कहानियाँ पढ़ी थी, बल्कि यह कहूं कि चेखव से मेरा पहला साक्षात्कार हुआ. उनकी वन्या, तितली, क्लर्क की मौत और दुल्हन आदि कहानियों में सबसे अधिक प्रभावित मैं ‘दुल्हन’ कहानी से हुई थी. यही वजह है कि ‘दुल्हन’ याद भी रह गयी.

‘दुल्हन’ एक ऐसी लड़की (नाद॒या) की कहानी है, जो कुछ ही दिनों में दुल्हन बनने वाली है. दुल्हन के जो सपने होते हैं, उमंगे होती हैं, वो सब ‘नाद॒या’  में भी है. सगाई के बाद घर में शादी का माहौल है. शादी की होने वाली तैयारियों को लेकर वह बेहद खुश है लेकिन कहानी जहाँ ख़त्म होती है, वह दिलचस्प है कि ‘नाद॒या’ बिना व्याह किये घर छोड़कर चल देती है जिंदगी के एक नये सफर पर…जीवन के किसी और ही उद्देश्य के लिए. उस होने वाली ‘दुल्हन’ में ‘दुल्हन’ बनने की रूचि ही ख़त्म हो चुकी होती है.  इस कहानी को एक बार में समझना कठिन है. एक बार में पढ़कर कोई भी यह सोच सकता है कि आखिर इसमें पागलपन के सिवा है क्या ? जिस लड़की की अच्छी–खासी शादी होने वाली थी. वह अचानक घर छोड़कर चली जाती है वो भी कहाँ और किसलिए …. कोई नहीं जानता. वह खुद भी नहीं जानती .

दरअसल कमोवेश  ‘चेखव’ के सभी पात्र करीब करीब ऐसे ही होते हैं. चेखव समाज के यथार्थ से गहरे जुड़े थे. जैसे तालस्ताय, गोर्की और हमारे, ‘सबके’ प्रेमचंद .चेखव के बारे में कम शब्दों में कहा जाये तो चेखव के दादा मिखायल लोविच, गुलाम (एक बंधुआ) थे, उन्होंने ३५०० रूबल देकर अपनी आज़ादी खरीदी थी. पिता एगोरोविच चेखव जनरल स्टोर की दुकान चलाते थे. चेखव के चार भाई और एक बहन थी. चेखव पेशे से डाक्टर अवश्य थे ,लेकिन साहित्य और नाटक में दिलचस्पी होने की वजह से उन्होंने अपना अधिक समय दिया नाटक और साहित्य को. उन्होंने रुसी समाज को बेहद करीब से देखा था, उस समाज के अंदर जो क्रूरता और बर्बरता थी उसे उन्होंने अपनी कहानियों और नाटकों के पात्रों के माध्यम से दर्शाया.

जिस तरह गोर्की ‘मेरा बचपन’ में रूस की सामाजिक व्यवस्था की धज्जियाँ उघाड़ कर रख देते हैं उसी तरह चेखव बहुत ही खामोशी से व्यवस्था की परत दर परत उघाड़ते हैं. खुद चेखव ने एक जगह लिखा कि – ‘मेरे दिमाग में ऐसे लोगों, चरित्रों की पूरी पलटन  भरी है, जो दिन-रात अपनी मुक्ति के लिए प्रार्थना करती है.’ साथ ही उन्होंने लिखा है कि – ‘मैंने अभी तक जो कुछ भी लिखा है, पांच-दस साल में लोग सब भूल जायेंगे. लेकिन संतोष मुझे यही है कि जो रास्ता खोल दिया है, वह जीवित रहेगा. यही मेरी लेखक की दृष्टि से सबसे बड़ी सफलता होगी.’  एक लेखक अपनी लेखकीय कोशिश से अवगत है, यह बहुत बड़ी बात होती है, जो भविष्य की कोख में झांक सकता है और जानता है कि आने वाली नस्लें कैसी होगी. और उसके लिए उम्मीद छोड़ जाता है. ‘दुल्हन’ कहानी मुक्ति और भविष्य का सशक्त उदाहरण है. मुक्ति के कई मायने होते हैं. इंसान कई बार सामाजिक बन्धनों, ढकोसलों, रुढियों के बंधन से मुक्ति चाहता है तो कभी अपने अंदर के अज्ञान से, तो कभी कभी खुद से खुद की मुक्ति चाहता है.

नाद॒या तेइस साल की है. जो कि सोलह साल की उम्र से व्यग्रता से शादी के सपने देख रही थी, ‘आंद्रेइच’ से उसकी सगाई हो चुकी है. वह आंद्रेई को पसंद करती थी. शादी की तारीख सात जुलाई तय कर दी जाती है.
कहानी का एक दिलचस्प पात्र है – ‘साशा’, जो नादया की दादी की दूर के गरीब रिश्तेदार का बेटा है. साशा की माँ मरते वक्त साशा को नादया की दादी के हवाले सौंप गयी थी. साशा देखने में रुग्न और साधारण है, लेकिन उसकी बातें असाधारण हैं. वह अख्खड़/अराजक किस्म का कलाकार है. छुट्टियों में बीमारी से आराम पाने के लिए नाद॒या के घर आता है. संभ्रांत परिवारों की त्रासदी पर रौशनी डालता हुआ नाद॒या से कहता है – ‘यहाँ की हर चीज़ बड़ी अजीब लगती है, निकम्मे कहीं के. कोई कभी काम नहीं करता. तुम्हारी माँ रानी की तरह टहलने के आलावा कुछ नहीं करती है. दादी भी कुछ नहीं करती है और न तुम. और तुम्हारा मंगेतर, वह भी कुछ नहीं करता है. साशा अक्सर ऐसी बातों की ओर इशारा करता है जो एक घिसी-पिटी जिंदगी होती है. वह खोखले समाज के रहन-सहन और उसकी कुरीतियों पर बेबाक राय देता है. नाद॒या उसकी बातों की आदी हो चुकी है फिर भी वह अपने मंगेतर का अपमान नहीं सह पाती.  वह चिढ जाती है और साशा से शिकायत करती है कि – ‘तुम मेरे मंगेतर से जलते हो, तुमने मेरे आंद्रेई के बारे में जाने क्या क्या कहा, लेकिन तुम उसे जरा भी नहीं जानते.’साशा कहता है – “तुम कभी थकती नहीं,  बोरियत नहीं होती तुम्हे अपनी जिंदगी से ?’”

‘नाद्या’ अपने मंगेतर के प्यार में गिरफ्त है, जो कि तगड़ा, खूबसूरत और घुंघराले बालों वाला नौजवान है, जिसे वह अभिनेता या कलाकार मानती है, हमेशा उसका पक्ष लेती है. वह अपने मंगेतर के बारे में कुछ भी सुनना नहीं चाहती लेकिन वही नादया बाद में साशा से कहती है – ‘पता नहीं, मैंने इस मूर्ख को कैसे प्यार किया?’

परिस्थियाँ बदलती हैं या जीवन के पक्ष बदलते हैं, तो अपने-आप हर बातों के मायने भी बदल जाते हैं. आम से आम इंसान की सोच बदल जाती है और वो खास हो जाता है. ‘नाद्या’ को साशा की जो बातें विचित्र और पागलपन भरी लगती थी, उन्हीं बातों ने उसके दृष्टिकोण और जीवन दोनों को बदल दिया कि – ‘सबसे बड़ी बात है जीवन को उलट-पुलट देना.’अपनी शादी के लिए बेचैन और उतावली ‘नाद्,या’ जब शादी के कुछ ही दिन रह गये थे,  बेहद उदास हो जाती है. शादी की होने वाली तैयारियों से उसे चिढ सी हो रही है. वह माँ से कहती है – ‘मैं बहुत उदास हूँ. मैं किसी ऐतिहासिक बात की कल्पना करने की कोशिश करती हूँ.’

वह चिडचिडी हो चुकी है . उसे लगता है कि उसे समझने में हर कोई असमर्थ और अयोग्य है और तब वह साशा से कहती है, – ‘क्या तुम मेरे रोजमर्रा की बातें सुनोगे? मेरा जीवन बहुत ही नीरस है” इस वाक्य में रोज़ के एक ढर्रे पर चलने वाली जिंदगी की एकरसता का आभास होता है. आदमी कितना भी खुश, सुखी और संतुष्ट क्यों न हो उसमें अगर कोई परिवर्तन न हो, साशा के शब्दों में ‘उलट-पुलट’ न हो तो वह जीवन नहीं है.
साशा नाद्या को ‘नयी राह’ दिखाता है, वह कहता है, – ‘तुम कहीं चली जाओ और पढो. केवल सुविज्ञ और संत व्यक्ति दिलचस्त होते हैं, और जितने भी ऐसे आदमी होंगे उतना ही शीघ्र पृथ्वी स्वर्ग होगा. गतिरुद्ध और नीरस जिंदगी से हर इंसान ऊब जाता है.‘

जब ‘नाद्या’ पहली बार साशा से कहती है – ‘मैं शादी करने जा रही हूँ.” साशा कहता है – ‘उससे क्या होगा, सभी शादी करते हैं, मेरी प्यारी. तुम्हारी बेकार सी जिंदगी घृणात्मक और अनैतिक है.  तुम देखती नहीं तुम्हारे लिए दूसरे लोग काम करते हैं और तुम दूसरों की जिंदगी नष्ट कर रही हो. क्या यह गंदा और घिनौना नहीं है.
नाद्या को लगता है वह यह सब पहले कहीं पढ़ चुकी है. वह अपने मंगेतर के बारे में सोचती है. अपनी शादी के बारे में सोचती है. वह अपनी माँ की नीरस शादी को देख रही है उसमें ऊब और चिड़चिड़ाहट के अलावा कुछ भी अनुभव नहीं करती. इस कहानी में नाद्या  की दादी और उसकी माँ नीना भी अहम किरदार है. तीन पीढ़ियों का अंतराल साफ़ दिखाई देता है. उसकी माँ के वाक्यों से इस कहानी को गहराई से समझा जा सकता है.
“मैंने अपनी जिंदगी तबाह कर ली, मैं जिंदगी चाहती हूँ, जिंदगी …. मैं अभी जवान हूँ. मैं जिंदगी चाहती हूँ. जीना चाहती हूँ” ‘नाद्या’  को तब समझ में आता है कि उसकी जिंदगी भी उसकी माँ की तरह बेरंग और बेकार होने वाली है. साशा से कहती है – “मैं इस तरह नहीं रह सकती, पता नहीं, पहले यहाँ कैसे रहती थी. बिलकुल समझ नहीं पाती. मैं अपने मंगेतर से नफ़रत करती हूँ. अपने आप से नफ़रत करती हूँ…. मैं इस पूरी काहिल और खोखली जिंदगी से नफ़रत करती हूँ. साशा कहता है – “तुम चली जाओ और पढो. कहीं भी चली जाओ. अपने आप रास्ता निकल आएगा. जैसे ही तुम अपनी जिंदगी बदल दोगी. उलट-पलट दोगी. हर चीज़ बदल जायेगी,’  और वह चली जाती है. बाहर की दुनिया में, ठीक उस दिन, जिस दिन उसकी शादी होंने वाली है. उसे अपनी जिंदगी का मकसद समझ में आ जाता है. उसे महसूस होता है कि अब तक कितनी अवांक्षित, बेमानी और बेकार थी उसकी ज़िन्दगी.

चेखव

जब वह वापस शहर लौटती है, तब देखती है कि वहां की नौकरानियों के रहने का एक ही ढंग है. तहखाने में गंदगी वैसे ही भरे हैं. उसे लगता है शहर बूढा हो रहा है या फिर से ताजगी और जवानी का इंतजार कर रहा है. काश पाक और नई जिंदगी आ जाए, तब हम सिर ऊँचा कर आगे बढ़ सकें, किस्मत की आँखों में आँखे डाल सकें. खुश रह सकें. ऐसी जिंदगी देर, सवेर आकर रहेगी, जरूर आयेगी.’ अचानक दादी का रोना सुनाई देता है. दादी के पास एक ‘तार’ पड़ा है जिसमें लिखा है – “साशा क्षय (टीबी) रोग से मर गया.”‘नाद्या’  अब समझ गयी थी, अच्छी तरह … “जीवन में उलट-पलट का मतलब”  … और वह चल पड़ती है. उसकी कल्पना में नई, वृहत और विशाल जिंदगी थी, हालाँकि यह जिंदगी अस्पष्ट और रहस्यमय थी, फिर भी उसे बुला रही थी, खीच रही थी…

‘नाद्या’  मात्र इस कहानी की नायिका नहीं है बल्कि समाज और उसके अंदर स्त्रियों को लेकर जो उदासीनता है. उसकी एक प्रतिनिधि है. स्त्री के  व्यक्तित्व और उसके तलाश की बात जब उठती है तो अक्सर लोगों को ऐसा लगता है कि वह मात्र प्रेम कर सकती है और एक प्रेमी से दूसरे प्रेमी बदल सकती है जबकि नाद्या अपने अस्तित्व की तलाश अपने अंदर करती हुई. बाहर की दुनिया में बेझिझक शामिल होती है.

दरअसल यह कहानी इस तरफ भी इशारा करती है कि लड़कियों को बचपन से ही मानसिक और मनोवैज्ञानिक रूप से इस तरह से तैयार किया जाता है कि शादी जिंदगी की सबसे बड़ी उपलब्धि है. जैसे लडकियाँ बनी ही हैं सिर्फ शादी करने के लिए… जिंदगी में इसके अलावा जैसे और कोई दूसरा काम नहीं, उद्देश्य नहीं, जैसे कि वह पैदा ही हुई है,  शादी करने के लिए.  इस तरह से उन्हें जिंदगी के यथार्थ और और बाहर की दुनिया से बिलकुल अनजान रखा जाता है, पूरी साजिश के तहत….

चेखव की महिला पात्रों के बारे में उनकी प्रेमिका ‘लीडिया एविलोव’ ने लिखा है कि कात्या (एक नीरस कहानी) ओल्गा इवानोवना (दुल्हन) या कुत्ते वाली महिला की विन्रम महिला पात्र चेखव की विश्वप्रसिद्ध स्त्री चरित्र है. यह प्रेम करती है, भावुक है और जिज्ञासापूर्ण खोज के माध्यम भविष्य के अन्तर में झांक कर कुछ पाना चाहती है. चेखव की ऐसी अनगिनत महिला पात्र पूरे विश्व में जिज्ञासापूर्ण खोज में शामिल हैं और यही वजह है कि आज की तारीख में पूरे विश्व में ‘नोरा’ और ‘नाद् या’ जैसी स्त्रियों की संख्या लगातार बढ़ रही है. कुछ की अपनी वजूद है तो कुछ अपनी वजूद की तलाश के लिए संघर्षरत हैं….जहाँ जीवन का मकसद खोखली शादी से इतर और भी बहुत कुछ है, ‘खोज जीवन है….जिंदगी को उलट–पलट कर देना जीवन है.’  बिना किसी डर के,  बिना किसी चिंता के…

असीमा भट्ट से उनके ई मेल asimabhatt@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है .

विष्णु नागर की कवितायें

 ( विष्णु नागर के लिए  और उनकी कविताओं के लिए आलोचक विजय कुमार से बढिया
नहीं कहा जा सकता : आप क्या हैं? कोई पीर , कोई दरवेश  , कोई साधु या पडोस
में रहने वाला कोई अनासक्त योगी? या किसी दूसरी दुनिया से इस जन्म का
स्वप्न देखता हुआ कोई अकिंचन जीवधारी ? आपको एक साथ पढना कठिन काम है ,
यह इतना जबरदस्त नुकीलापन आपके भीतर कहां से आता है? …………. ये
साहित्यिक हाट में नहीं, जिंदगी की गहराइयों में समाने वाली कवितायें हैं.
आज पहला डा शिवकुमार मिश्र स्मृति सम्मान कविता के लिए विष्णु  नागर ,
आलोचना के लिए  वैभव सिंह  तथा कथा के लिए प्रकाश कांत को दिया जा रहा है.
विष्णू नागर की 5 स्त्रीवादी कवितायें स्त्रीकाल के पाठ्कों के लिए .  )

1. किसी दिन उनकी स्त्री बन कर रहना

हां मुझे स्त्रियां अच्छी लगती हैं
उनकी सुन्दरता, उनका यौवन, उनका उत्साह ,उनका आग्रह
उनकी मुस्कुराहट , उनकी बातें , उनका संग –साथ
उनका पास से गुजर जाना, उनका स्पर्श पा जाना
उनका सपने में चला आना , उनकी यादों में खो जाना
उन्हें कनखियों से देखना , आड से छिप कर देखना
कभी उनके साथ चलना , कभी उनके पीछे-पीछे
उनके नेतृत्व में चलने में गौरव महसूस करना

कभी उनके साथ चाय पीना, कभी उनकी शिकायतें सुनना
उनके साथ गाना , उनके देर तक संगीत की तरह सुनते चले जाना
उनके क्रोध , उनकी निराशाओं में साझा करना
उनके मौन में , उनकी मुखरता में उनका साथ देना

उनकी बातों में छिपे अर्थ खोजने में
कभी –कभी बहुत दूर चले जाना, कभी जल्दी हार जाना
कभी उन्हें समझकर न समझना , कभी उनसे उलझना –लडना और हारना
कभी उनका पहल करना , कभी उनका भ्रम में रखना
कभी उनके साथ भावुक हो जाना , कभी रोने लग जाना
उनके लिए इंतजार करना , उनसे कभी इंतजार करवाना
उनके संघर्षों में साथ देना , उनके लिए जगह बनाने के लिए खडे हो जाना
उनकी आजादियों पर खुश होना ,
उनकी गुलामियों के खिलाफ खुलकर बोलना
उनके कन्धे पर हाथ रखना, उन्हें अपने में समेट लेना , उनमें सिमट जाना
और कभी –कभी उनके साथ खुद भी
स्त्री की तरह सोचने-देखने लग जाना
किसी दिन खुद भी उनकी स्त्री बनकर , उनके साथ रहना

2. विगत प्रेम

वह सुबह ऐसे उठता है जैसे अगर सूरज पर नहीं तो
अपनी पत्नी पर तो जरूर एहसान कर रहा है

वह चाय ऐसे मांगता है जैसे किसी से पुराना कर्ज मांग रहा हो
वह अखबार ऐसे पढता है जैसे जांघ खुजलाने के साथ
किया जानेवाला कोई अनिवार्य कर्म हो
वह फोन ऐसे करता है , जैसे इस दुनिया पर
आजकल उसी का राज चल रहा है
वह मुस्कियाता ऐसे है जैसे पाद अटक गया हो बीच में
वह रोटी ऐसे खाता है जैसे समय की बर्बादी हो रही है
मानवीयता के नाते ही वह इतना सब सह रहा है
लेकिन उसकी पत्नी को उसके इस वर्णन पर सख्त ऐतराज है
वह कहती है वह जैसा भी है, उसका सुहाग है .

3. तुम मेरे प्रेमी होते

तुम मेरे प्रेमी होते
तो तुम्हें सपने देखने की जरूरत ही नहीं पडती
तुम मेरे प्रेमी होते
तो तुम्हारे सामने रास्ते ही रास्ते
मंजिलें ही मंजिलें होतीं
हर मंजिल एक रास्ता होती
हर रास्ता एक मंजिल हो जाता
बल्कि तुम रास्तों और मंजिलों की भाषा भूल जाते
तुम दूरियों को मीलों मे नापना भूल जाते
तुम दूरियों को दूरियों की तरह देखना भूल जाते

तुम आग हो जाते
तो मैं पानी
तुम पानी हो जाते तो मैं आग

पानी और आग इतने एक हो जाते
कि लोग आग से पूछते कि पानी को कहां छोड आये
यही पानी के साथ भी होता
बल्कि लोग दोनों को एक ही समझते

लेकिन तुम मेरे पति होना चाहते थे
आग को पानी से बुझा देना चाहते थे
हवा को आग के करीब आने से रोक देना चाहते थे
तुम प्यार को मन्दिर और मस्जिद में बदल देना चाहते थे
मंत्र और नमाज में बदल देना चाहते थे
तुम मुझे खा –पीकर खर्च कर देना चाहते थे
और तुमने खो दिया
मगर मैंने अपने को अब फिर से पा लिया है.

4, वह समझती थी
मैं उसे धमकाता था
और वह समझती थी
यह भी प्यार करने का मेरा एक तरीका है

5. आलोचक
पत्नी से बडा कोई आलोचक नहीं होता
उसके आगे नामवर सिंह तो क्या
रामचन्द्र शुक्ल भी पानी भरते हैं
अब ये उनका सौभाग्य है
कि पत्नियों के ग्रंथ मौखिक होते हैं , कहीं छपते नहीं.

विष्णु नागर से उनके मोबाइल नम्बर 9810892198 पर सम्पर्क किया जा सकता है.

कुँए में मेंढक

पुटला हेमलता/अनुवाद : डॉ. जी. वी. रत्नाकर

( पुटला हेमलता द्वारा लिखित तेलगू की यह कहानी भारतीय भाषाओं में हो रहे दलित स्त्री लेखन का एक हिस्सा है. इसे स्त्रीकाल के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं फारूक शाह )

फारूक शाह का नोट

दलित नारी लेखन में जाति और जेंडर के प्रश्नों के साथ-साथ समाज, संस्कृति और व्यवस्था में हाशिये  के  रूढ़ विषम पहलुओं की समीक्षा मिलना भी एक मूलभूत तत्त्व है. व्यवस्था के अबूझ पक्ष सवालों की तरह उजागर होते है. जिनके जवाब ढूँढने अभी बाक़ी है. इस तरह इतिहास शोधन और न्याय-परक नव्य इतिहास बोध के स्तर इस लेखन से निर्मित होते हैं. तेलुगु के नारीवादी लेखिका पुतला हेमलता की एक कहानी देखें, इस कहानी में अनाथ बच्चा श्रीनू, कि जिसे ओबुलम्मा ने पाला-पोषा है. उसे बाहरी दुनिया के खतरों से सुरक्षित रखने के लिए ओबुलम्मा उसे पकड़े रखने की कोशिश करती है. फिर भी श्रीनू ऊपर आकाश और नीचे धरती के बीच निराधार है. वह ख़ुद इस बात को महसूस करता है. परिस्थितियों के कारण बचपन में ही प्रौढ़ सा बन गया है श्रीनू. उसने रेलवे स्टेशन और ओबुलम्मा की खोली के अलावा कुछ देखा नहीं. उसके लिए दुनिया का नाप उतना ही, जितनी कि उसके हिस्से में आई. रेल में फली बेचने वाला छोटा सा बच्चा स्टेशन के अलावा आसपास के गाँव-शहर भी देखना चाहता है, और वह अंधेरों से घिर जाता है. छोटी सी दुनिया को नापता श्रीनू अचानक, अनजाने ही, एक यांत्रिक क्रिया के चलते काल के मुंह में चला जाता है. कहानी व्यवस्था की पहेलियों या नियति के मोड़ पर आकर रुक जाती है… इस तरह  कुएँ के मेंढक की नियति झेलते लाखों–करोड़ों बच्चें है. बच्चों का अनाथ होना, दूसरों के हाथों उनका पालन-पोषण होना और उन बच्चों की असमय मृत्यु होना – ऐसा समाज और संस्कृति का एक ऐतिहासिक पक्ष रहा है. हम सोचें  तो व्यवस्था से गढ़ी हुई ऐसी कई सारी नियति अबूझ ही रहती हैं. अबूझ स्थितियों के बयान से उपाय की ओर सक्रिय होने का आह्वान मिलता है. कहानी का यह मुख्य सूर है. इस कहानी का अनुवाद हमारे लिए तेलुगु कविमित्र डॉ. जी.वी. रत्नाकर ने किया है. प्रस्तुत है कहानी ‘कुएँ में मेंढक’ :

कुँए में मेंढक

 रेल ने जैसे ही स्टेशन छोड़ा, स्टेशन की भीड़ छंटने लगी. कुली भी अपना-अपना सामान उठाकर बाहर की ओर जाने लगे. चहल-पहल कम हो गई.

 श्रीनू अपनी फली की टोकरी लिए प्लेटफ़ॉर्म पर एक कोने में बैठा है. एक हाथ से सिक्के गिन, वह अपनी जेब में डाल रहा है. उसने टोकरी से एक कवर निकाला और सभी सिक्के उसमें डाल दिए. फिर उस कवर को संभालकर रख दिया. वह सोचने लगा – “अभी तक कोटि क्यों नहीं आया ? पंद्रह मिनट के बाद एक पेसेन्ज़र ट्रेन आने वाली है, तब अगर थोड़े रुपये का सौदा कर लूं तो घर में शायद गालियाँ कम खानी पड़े.” और एक बार पैसे के कवर को देखा, उसे सुकून महसूस हुआ. कवर ठीक से जेब में रख वह तिरुपति एक्सप्रेस में चढ़ गया और… ‘फली ले लो… ताजी ताजी फली ले लो…’ – ऐसी आवाज लगाने लगा. चार साल का एक लड़का टोकरी को लालच भरी नज़र से देख रहा था. श्रीनू उस लड़के के मनोभाव को भांप गया और ज्यादा जोर से आवाज लगाने लगा.

“माँ, मुझे भी फली चाहिए…” कहते हुए लड़का रोने लगा. माँ कुछ देर तो मनाती रही, पर आखिर हारकर उसने श्रीनू को एक रुपये की फली देने को कहा और दो रुपये दिए.

श्रीनू ने फली का पैकेट बांधकर बच्चे को दिया. जब चिल्लर के लिए जेब में हाथ डाला तो पाया कि सिक्के गायब थे. शायद चोरी हो गए थे. श्रीनू की हालत खराब हो गई. काटो तो खून न निकले. आँखों से आंसू बहने लगे. वह अच्छी तरह जानता था कि रेलवे स्टेशन पर कई जेब-कतरे होते हैं. फिर उसे लगा कि गरीब की जेब भला, कोई क्यों काटेंगा ? पर आज उसे पहली बार यह अहसास हुआ कि गरीब की जेब भी काटी जाती है. रेल से कब उतरा उसे होश न रहा. आंसू पोंछते हुए वह तुर्रा के पेड़ के नीचे बैठ गया. नज़रों के सामने ओबुलम्मा का चेहरा तैरने लगा.

श्रीनू का जन्म कब और कहां हुआ ? पता नहीं. कोई रेलवे स्टेशन पर छोड़ गया था. ओबुलम्मा, जो वडा बेचती थी, उसने बच्चे को पाला-पोषा और नाम रखा ‘श्रीनिवास राव’. लेकिन सभी लोग उसे ‘श्रीनूगाडु’ कहकर ही बुलाते थे. जब कोई पूछता तो बड़े गर्व से वह अपना नाम ‘श्रीनिवास राव’ बताता. ओबुलम्मा का पच्चीस साल का बेटा बहुत पहले गाँव छोड़कर चला गया था. फिर भी ओबुलम्मा को आस बंधी रहती थी कि वह एक दिन तो जरूर लौटकर आएगा. जब श्रीनू दस साल का हो गया तब ओबुलम्मा ने उसे रेल में फली बेचने का काम सौंपा.

पहले तो उसे बहुत अच्छा लगा. लेकिन बाद में कई सारी मुसीबतों का सामना करना पड़ा. पहले-पहल तो श्रीनू से बड़े फली बेचने वाले उसे रेल के डिब्बे से जबरदस्ती उतार देते थे. क्योंकि वह उम्र में सबसे छोटा था. और अगर वह बिना सौदा किए घर जाता तो ओबुलम्मा उसे पीटती थी.

धीरे-धीरे श्रीनू को दुनियादारी की समझ आने लगी. जो औरों पर धाक जमाता है उसी की चलती है. श्रीनू की हालत कुँए में मेंढक जैसी हो गई. उसकी दुनिया मात्र स्टेशन तक सीमित थी. हर रोज वह रेलवे स्टेशन पर कई तरह के लोगों को देखा करता. विदेशियों को वह तरह-तरह की वेशभूषा में निहारता रहता.

“अभी पंद्रह मिनट में ही पेसेन्ज़र ट्रेन आने वाली है, अब तक कितनी कमाई हुई ?” कोटिगाडु ने पूछा. श्रीनू ने अनसुना कर कोटि से ही सवाल किया – “उसकी बहन का गाँव कैसा है ?”

कोटि ने बड़े उत्साह से झुककर कहा – “ओहो… हैदराबाद ? क्या बताऊँ ? तुम ही अपनी आँखों से देखना… बड़ी-बड़ी सड़कें, रंग-बिरंगी रोशनियाँ, यात्रा गए पर गए हों ऐसा सारा माहौल. अरे हाँ, तूने कभी रंगीन सोड़ा पीया है ?” कोटि ने होठों पर जीभ फेरते हुए पूछा.
“नहीं.” श्रीनू ने जवाब दिया.
“अरे श्रीनू, तू वरंगल तक पेसेन्ज़र ट्रेन में फली तो बेच सकता है ना ?” कोटि ने पूछा.

“रहने दे ! ओबुलम्मा नहीं मानेंगी. वह राक्षसनी है.” श्री ने हताशा भरे स्वर में कहा और कोटिगाडु की ओर देखने लगा.

वह बड़बड़ाने लगा – “मुझे बचपन से ही शहर पसंद है. जब से पैदा हुआ हूँ, इस गाँव को छोड़ कोई दूसरा गाँव ही नहीं !”

उसका चेहरा देखकर कोटिगाडु को हँसी आ गई. वह कहने लगा – “मैं तो पेसेन्ज़र ट्रेन में कई बार वरंगल जाता हूँ. एक घंटे का तो सफ़र है. इस दौरान हम आराम से फली बेच सकते हैं. बहुत ही मज़ा आता है.”

धन… धन… की आवाज करती ट्रेन आ पहुँची.

“श्रीनू, देखो, तुम औरतों के डिब्बे में चले जाओ ! मैं जनरल डिब्बे में जाता हूँ.” कोटि ने कहा.

सारा दिन श्रीनू बहुत ही उदास रहा. खाना भी ठीक से नहीं खाया. खाट पर लेटकर वह आसमान की ओर देखता रहा. सांझ से ही ओबुलम्मा श्रीनू के व्यवहार को देख रही थी.

“श्रीनू, बेटा क्या बात है ?” उसने पूछा. श्रीनू एक मिनट के लिए रुका, फिर जवाब दिया  – “मां, मैं भी कोटि के साथ वरंगल तक फली बेचने जाया करूंगा. हमें बहुत नफ़ा होगा.” बोलते समय उसकी आंखें उलझन के कारण विस्फारित होने लगी.

ओबुलम्मा को हंसी आ गई. श्रीनू के सिर पर हाथ रखते वह बोली – “बेटा, तुम छोटे हो, नादान हो, इसलिए मैंने तुम्हें आज तक कहीं दूर जाने नहीं दिया. वैसे भी मैं एक बेटा तो खो चुकी हूँ. अब तुम्हें खोना नहीं चाहती. मैं कठोर भले ही लगूं, लेकिन मेरे हृदय में भी दया और ममता है. कोटि के साथ तुम्हें जरूर जाने दूँगी. ठीक लगे तो रोज जाना वरना नहीं.”

अविश्वास से श्रीनू ने माँ की ओर देखा. खुशी के मारे वह सो न पाया. रात भर सपने देखता रहा कि वह वरंगल तक फली बेचकर आता है… और ढेर सारे रुपये ओबुलम्मा के हाथ में रख देता है…

 “बेटा… संभालकर कोटि के साथ जाना.” पानी भरने जाते हुए ओबुलम्मा ने कहा.

कोटिगाडु के साथ श्रीनू उत्साह से चल पड़ा. जिस ट्रेन में वे जा रहे थे उसने आलेर स्टेशन छोड़ा. कोटि दूसरे डिब्बे में था. श्रीनू तो फूला समा नहीं रहा था. दरवाजे पर खड़ा-खड़ा बाहर के पेड़, बिजली के खम्भे देख रहा था. वहां पर दो शराबी आपस में गाली-गलौच कर रहे थे.

श्रीनू यथार्थ भूमि को छोड़ कल्पना-लोक में विचरने लगा. उसके पीछे जो शराबी थे वे मारपीट पर उतर आए. एक के पाँव की मार श्रीनू की पीठ पर पड़ी. उसने उठने की कोशिश की. तभी एक शराबी उस पर आ पड़ा. श्रीनू डिब्बे से बाहर उछलकर गिर गया. उसका सिर धड़ाम से एक पत्थर के साथ टकराया. सिर से खून बहने लगा. उसने बलपूर्वक आंखें खोली. उसे तेज रफ़्तार से जाती ट्रेन, अपनी ओर घूरती यात्रियों की आंखें और खुले आकाश के अलावा दूसरा कुछ भी न दिखाई दिया. उसकी पलकें हमेशा के लिए बंद हो गई.

ओबुलम्मा कुएँ से पानी निकाल रही थी. देखा तो पानी में मेंढक था. उसने मेंढक को बाल्टी में ही रहने दिया. तभी कोटिगाडु, श्रीनू के मरने की खबर लेकर आया. कोटि के चेहरे की उदासी देख ओबुलम्मा उसकी ओर भागी. बाल्टी का मेंढक आश्चर्य से चारों ओर देख रहा था. वह मेंढक, जो कुएँ में ही पैदा हुआ था, पला-बढ़ा था और कुआं ही जिसकी दुनिया थी. पर आज उसे चारों ओर का दृश्य विचित्र लगाने लगा. उसके लिए यह दुनिया नयी थी. वह कभी सोच भी नहीं सकता था कि बाहर की दुनिया इतनी बड़ी हो सकती है. सृष्टि के रमणीय वातावरण को देखने वह अचानक ही उछला, पर गलती से वापस कुँए में ही जा गिरा. उसने देखा, नीचे गोल-गोल घुमता पानी था… ऊपर प्लैट जैसा आसमान.

मंडल और महिला आरक्षण

वासंती रामन

( इस सरकार में ६ महिला मंत्रियो को विशिष्ट विभागों का पदभार दिया गया है . यह लोकसभा भी महिला सदस्यों के मामले में पिछली से मामूली ही सही बढ़त बनाए हुए है. लेकिन ५० प्रतिशत महिला आबादी की तुलना में सीटो का यह अनुपात नगण्य है . पुरुष , महिला सांसद का अनुपात १०० : १२ का है. विदेश मंत्री  सुषमा स्वराज ने महिला आरक्षण बिल को अपनी प्राथमिकता बतलाई है . हमलोग आमीन कहते हुए इस प्राथमिकता का ५ सालों में नंबर आने का इन्तजार करे. यह आलेख पड़ताल करता है कि  आरक्षण के भीतर  आरक्षण के प्रति ब्राहमावादी व्यवस्था कैसे नकारात्मक रूख लिए हुए है और महिला आन्दोलन भी कैसे मंडल आंदोलनों के दौरान नकारात्मक भूमिका में था.  हालांकि राज्यसभा में आरक्षण के भीतर आरक्षण के बिना ही महिला आरक्षण बिल पारित हो चूका है, लेकिन समझना जरूरी है कि यह व्यवस्था क्यों अड़ी हुई है मौजूदा स्वरुप में किसी बदलाव के खिलाफ , तब भी, जब लोकसभा में गैरद्विज सदस्यों की संख्या ज्यादा है.  स्त्रीकाल ने महिला आरक्षण संबंधी सुझावों- विवादों को सिलसिलेवार छापा था . हमें इस वेब साईट पर  पिछले सारे अंको की बेहतर प्रस्तुति के लिए तकनीकी स्तर पर काम करना शेष है , फिर भी वासंती रामन के आलेख पाठकों के लिए स्कैन फॉर्म में मौजूदा व्यवस्था में ही प्रस्तुत कर रहे  हैं .)

‘ भारतीय महिला आन्दोलन राजनीति और विकास में नागरिकों की समान भागीदारी के दावे पर जोर देने के लिए प्रस्फुटित हो रहे अनेक प्रयासों में एक था . इस लक्ष्य ने आन्दोलन को रुढ़िवादी व प्रतिक्रयावादी ताकतों के विरुद्ध ला खड़ा किया .’

‘आखिर कार यह नजर अंदाज नहीं करना चाहिए की पिछड़ी जातिया और मुस्लिम ही ( अपनी संख्या तथा उससे भी महत्वपूर्ण अपनी सामाजिक स्थिति के कारण ) सवर्ण वर्चस्व को वास्तविक चुनौती दे सकते हैं न की अनुसूचित जाति समुदाय . इसीलिए सवर्ण वर्चस्व के कट्टर पैरोकार भी जहां अनूसूचित जाति-जनजाति को संरक्षण देते दिखाई देते है , वही अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यकों की मांगो का विरोध करने में जुनून की हद तक चले जाते है. ‘

‘किन्तु अधिक दिलचस्प यह था की राजनीति प्रेरित कतिपय बुद्धिजीवियों और क्रान्तिकारी वामदलों के अलावा समूचा भारतीय सवर्ण मध्यम वर्ग और उच्चवर्ग एक स्वर में ‘ योग्यता’ का समर्थन कर रहा था . …… आँखे खोल देने वाली बात यह थी कि जब छात्र संघों के चुनाव में महिला विद्यार्थियों  के प्रति भेदभाव का मुद्दा उठा , मंडल के खिलाफ बढ़ -चढ़ कर बोलने वाली छात्राओं ( जो अधिकाशतः सवर्ण थी ) ने पाया की उनके सवर्ण पुरुष साथी उनके साथ नहीं है , बल्कि इस मुद्दे पर दलित छात्रो ने उनका साथ दिया . ‘

सरकार व मजूमदार ने बड़ी सरलता के साथ इस बात पर ध्यान खींचा कि स्वतन्त्रता पूर्व की पीढी होने के कारण स्वयं उन्होंने पहले कभी विशेष प्रतिनिधित्व का समर्थन नहीं किया था तथा अकादमिक चर्चाओं में अजा , जजा के लिए आरक्षण की आलोचना वे यही तर्क देकर करते रहे है कि, ‘ यह उपनिवेशवादी मानसिकता का नमूना है .’

और क्या सचमच  महिला आन्दोलन भारतीय महिला एकता का सच्चा प्रवक्ता है , दुर्भाग्य से अबतक महिला संगठन के नेताओं के वकतव्य , जो विधेयक के समर्थन में  आये हैं , वे समस्या की जटिलता की उनकी समझ का खुलासा करते दिखाई नहीं देते , न ही उनमें कोइ पिछड़ा वर्ग तथा अल्पसंख्यकों में जेंडर विविधता का कोइ उल्लेख है .

( वासंती रामन सी डवल्यु डी एस में सीनियर फेलो हैं)

बदलाव की बयार : जद्दोजहद अभी बाकी है

अमृता ठाकुर

( यह आलेख हरियाणा के सतरोल खाप के द्वारा , महिला विंग बनाने , अन्तरजातीय विवाहों को मान्यता देने आदि के फैसलों के बाद एक केस स्टडी है . इस आलेख में  पितृसत्ता के द्वारा अपनी हेजेमनी बनाए रखने के नए -नए तरीके अपनाने की पड़ताल है , लेकिन कोइ भी आधुनिक बदलाव दूरगामी असर भी लेकर आता है , उसके संकेत भी हैं इसमें . अमृता ने एक पत्रकार की दृष्टि  के साथ -साथ अकादमिक दृष्टि से भी इन फैसलों को पढ़ा है . यह आलेख स्त्री अध्ययन के विद्यार्थियों को भी पढ़ना चाहिए .  )

विवाह क्या  है व्यक्तिगत मामला, सामाजिक मामला,  या पारिवारिक मामला.  हकीकत यह है कि विकसित समाज व्यक्तिगत आजादी को जितना महत्व देता है बंद समाज अपना वजूद खोने के डर से व्यक्तिगत आजादी पर उतने ही पहरे लगाता।  विवाह जैसी संस्था हमेशा से व्यक्तिगत आजादी और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच झूलती रही है। खासतौर पर उस समाज में जहां स्त्री  को दोयम दर्जा दिया  जाता है। स्त्री मात्र वंश आगे वढाने वाली मशीन होती है . जहां विवाह के ऊपर समाज का शिकंजा मजबूती से कसा होता है, उस शिकंजे पर थोडा सा भी प्रहार उस समाज को हिला देता और वह बौखला कर प्रहार करने वाले को नस्तेनाबूत करने का भरसक प्रयास करता है। समय -समय पर ऐसे ही बंद समाज के प्रतिनिधियो ने चुनौती देने वाले प्रेमियों को सामाजिक बहिष्कार से लेकर मृत्युदंड और सामूहिक बलात्कार जैसी सजाएं दी हैं। और वह अब उतनी ही मजबूती से अपनी इस परंपरा को थामे रखने का पक्षधर है। पर क्या  समय के साथ इनकी सोच में बदलाव आया  है। सतरोल खाप की अंतरजातीय विवाह की स्वीकृति और महिलाओं के लिए अलग विंग की घोषणा कुछ ऐसी ही खुशफहमी पैदा करती है।  यह बडी बात थी। कई और खुशफहमियाँ मन में जन्म लेने लगीं। लगा अब शायद प्रेमियों की लाशे पेडो पर लटकी हुई नहीं मिलेंगी। लडकी को प्रेम करने के जुर्म में बलात्कार नहीं झेलना पडेगा । अब ऊंची जाति की लडकी या  लडके से प्रेम करने के एवज में गांव के गांव नहीं जलाए जायेगे। खुशफहमियों का क्या  है ! बस वक्त और वजह खोजती रहती है, और हो जाती है । एक और खबर आई। औरतों ने सर से घूंघट का बोझ उतारा। हरियाणा के गांव की महिलाओं ने सर पर घूंघट न रखने का फैसला किया । महिला अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले मेरे मन को इस खबर ने भी सकून का एहसास करवाया । पर पता नहीं विश्वास नहीं हो रहा था कि जो समाज समय की ओर पीठ करके चल रहा है वह अचानक कदम मिला कर कैसे चलने लगा गया  क्या  यह बदलाव की बयार  है या बस मन का भ्रम ! यह  देखने हम सतरोल खाप में शामिल कुछ गांवों का जायजा लेने निकले-

…..  लंबा कुर्तानुमा ब्लाउज, खूब घेर वाला लहंगा। हाथ और पैर में मोटे मोटे चांदी के कडे। लंबी तगडी कद काठी। एक ने गोद में बच्चा भी लिया  हुआ था। बातचीत में इतनी मशगुल की आस पास का ख्याल  ही नहीं। बगल से गुजरती बुजुर्ग महिला ने उनमें से किसी एक महिला को टोका –‘गाय नै बाछडा दे दिया तेरी सासू ने कही थी……।‘  जवाब न मिलने पर मुंह बिचकाती बगल से गुजर गई। वो तीनों औरतें पैंतीस से चालीस के उम्र की थी। चलती हुईं बातचीत की उसी तारतम्यता को बनाए हुए तीनों औरतों ने अचानक चेहरे के सामने एक बित्ते का घूंघट खींच लिया । मैनें आस पास देखा कहीं कोई नहीं। फिर किससे परदा ! थोडी दूर पर एक चबूतरा से बना था जहां कुछ कुर्सियाँ पडी थीं। औरतों ने अपनी चाल तेज कर दी थी। तेजी से वहां निकल कर फिर अपना घूंघट ऊपर कर लिया । ये  गांव का चौपाल है। औरतों की भागीदारी तो बहुत दूर की बात है औरते यहां से गुजरती भी हैं तो एक बित्ते का घूंघट चेहरे के सामने खींच देती हैं क्या  पता कोई बुजुर्ग वहां बैठा हो! यह वो चौपाल है, जहां दूसरों की जिंदगी को प्रभावित करने वाले फैसले लिए जाते है। ऐसे एकतरफे फैसले जिसमें औरतें अपना पक्ष नहीं रख सकती, चुप चाप फैसलों को स्वीकारती हैं। पर शायद अब वह अपना पक्ष रख पाएंगी। यह  दूसरी बात है कि उसके पक्ष को कितना महत्व दिया  जाएगा,  यह  वहां औरतों की स्थिति को देख कर समझा  जा सकता है। 650 साल के इतिहास में पहली बार सतरोल खाप ने महिलाओं के पक्ष को पंचों के सामने रखने के लिए, महिला विंग का गठन किया और सुदेश चौधरी का उसका प्रधान बनाया ।

 सडक के दोनो ओर फैले खेत। आलू की फसल तैया र थी। खेत के मेडों के पास कई जोटा बग्गी खडी थी। औरतें आलू की सफाई में लगी हुई थीं। कहीं कहीं उनके साथ पुरुष भी दिखे। ‘हरियाणा की औरतें बहुत मेहनती होती हैं।‘ गाडी चला रहे ड्राईवर ने कहा। ‘ पर यहां के आदमी….’  इतना कह कर चुप हो गया । वह खुद भी हरियाणा का ही है। हमारा पहला ठिकाना था बीबीपुर के सरपंच सुनील जागलान का घर। गाडी जब उनके घर के आस पास रुकी तो आस पडोस के किवाड में भी हलचल हुई। कुछ घुंघट से ढंके सिर झांकते  नजर आए। कुछ बच्चे  दौड कर गाडी के पास आ गए। सुनील जागलान घर में नहीं थे। उनकी बहन ऋतु से बातचीत का मौका मिला। एम ए -बी एड ऋतु विवाह का इंतजार कर रही है। पर साथ ही महिलाओं के सशत्तिकरण के कार्य  में भाई का साथ दे रही है। ऋतु अब पंचायत में पंचों के सामने मुंह खोलने की हिम्मत भी करने लगी है। जब पहली बार उसने ऐसा किया  तो उसे खुद विश्वास नहीं हो रहा था कि वह  पंचायात  में पंचों के सामने कैसे बोल पाई.  उसमें इतनी हिम्मत कैसे आई !  उसपर शायद उतना सोचा विचारा नहीं बस बोल दिया , क्योंकि  वहां पक्ष रखना जरूरी था।  बकौल ऋतु ‘ औरतें अब बोलने लगीं हैं। सोचने लगी हैं। अपनी जिंदगी के आस पास के मसलों पर जागती है।‘  ऑनर किलिंग के मामलें कैसे खत्म होंगे ? इस सवाल पर ऋतु बिल्कुल रटे रटाए लफ्जों को दोहरा देती है, ‘ और प्रेम व्रेम गांव के अंदर पॉसिबल नहीं है। इसमें खाप की क्या  गलती है। परिवारों की गलती है। वे इस तरह के मामले खाप के पास लाते। सच तो यह है कि यह सब पश्चिमी सभ्यता के दुष्प्रभाव की वजह से है। लडकियाँ परिवार के विरुद्ध जा कर प्रेम कर रहीं हैं। बेटी गांव की इज्जत होती है। पहले इतने रेप केसेज नहीं होते थे। गांवों में आपस में भाईचारा था। अब यह खत्म हो रहा है।‘  अंतर्जातीय्ा विवाह को खाप ने स्वीकृति दे दी है,  और सुनील कह रहे हैं कि वह इसकी पहल अपने घर से ही यानी आपके विवाह से ही करेंगे,  इस सवाल पर ऋतु थोडी गंभीर हो गई। ‘ मैने भी सुना। पर मै  अपने लाईफ में यह  नहीं चाहती।जो करना है वह अपने बच्चों के साथ करें।‘ युवा सुनील जागलान के पंचों में तीन महिलाएं भी शामिल है। यह  महिला सशत्तिकरण की उनकी सोच को दर्शाता है। पर वास्तविक बदलाव कितनी सूक्ष्मता की अपेक्षा करता है यह समझना भी जरूरी है। उनकी पत्नी हमें कहीं नजर नहीं आई। सुना वो सामने नहीं आती, पिछलीं बार भी दिखीं तो लंबे घूघट में ही, वह भी केवल ‘ हूं हां के साथ ही।

अगला पडाव सुदेश चौधरी। एक अखबार के लोकल रिपोर्टर का दफ्तर और सुदेश चौधरी का दफ्तर -टू इन वन। सुदेश चौधरी और अखबार का संवाददाता व दो तीन अन्य पुरुष वहां बैठे थे। सतरोल खाप की उस बैठक में वह अकेली औरत थी। बकौल सुदेश , ‘ उस बैठक में मैं पहले चौपाल के नीचे खडी हुई थी। अजीब तो लग रहा था। सभी पुरुष थे मैं अकेली महिला थी। बैठक में बातचीत हो रही थी। फिर मेरा नाम खाप के सदस्यों के सामने रखा गया कि महिला विंग की प्रधान यह  होंगी। सबने सहमति दे दी।  मै चौपाल के ऊपर चढी।‘  सुदेश के चौपाल पर चढने पर बाकी वहां बैठे पुरुषों की प्रतिक्रिया  के सवाल पर सुदेश का कहना था , ‘ समान्य ही था हां कुछेक माथों पर थोडी सिलवट दिखीं थीं। पर क्योंकि खाप के प्रधान ने ही मेरा नाम कहा था तो फिर विरोध नहीं हो सकता था।‘  सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में सुदेश की पहचान सभी गांववालों के बीच पहले से ही मौजूद है। वास्तव में सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में उनकी पहचान उनके औरत होने की पहचान पर काफी हद तक हावी है। कोई हर दुख ,मुसीबत,  जरूरत में साथ खडा हो,  औरत ही सही, उसका विरोध कैसे किया  जा सकता। सवाल है, ‘  क्या  एक समान्य लडकी यह  औरत अपने पक्ष को रखने के लिए पंचायत के उस चौपाल पर पैर रख सकती है?  हालांकि सुदेश चौधरी ,जो इतिहास में एम ए हैं महिला स्वतंत्रता पर आजाद खयाल रखती हैं। महिलाओं पर कपडों और सेलफोन जैसी पाबंदियों की सख्त खिलाफ हैं , लेकिन शादी ब्याह  के मामले में खासतौर पर प्रेम विवाह के मामले में खाप की ही तरह प्रेम को शर्तों में बांधती हैं। उनका कहना है कि प्रेम विवाह गोत्र से बाहर, गांव से लगे सभी पडोसी गांवों से दूर, और अभिभावक की स्वीकृति के बाद ही होनी चाहिए। खाप की सबसे ज्यादा मार तो प्रेमी युगलों पर ही पडती है। बकौल सुदेश लड़के लडकियों में अच्छे संस्कार भरे जाएंगे, हम उन्हें समझाएगे  की शादी ब्याह  में क्या  बातें ध्यान  रखें,  अभिभावक की इच्छा के अनुसार चलें, अच्छे संस्कार डलेंगे तो लडकियाँ इस तरह से शादी करेंगी ही नहीं और ऑनर किलिंग जैसी घटना भी नहीं होगीं। खाप में एक महिला को शामिल करने के पीछे महिला सशत्तिकरण का कौन सा उद्देश्य, कितना काम कर रहा था,  वह तो स्पष्ट ही था। तथाकथित पश्चिमी सोच से युवाओं को बचा कर रूढिवादी परंपरा के बंधन में जकडे रहने के लिए मानसिक रूप से तैयार  करना। सुदेश इस कर्तव्य को अच्छे से निभा भी रही हैं। अक्सर महिलाओं और लडकियों के साथ बैठक करतीं और खाप और उसके नियम कानून के फायदे का ब्योरा  देकर खाप की दीवारों केा मजबूत करतीं।

ज्ञात हो की हाल ही में हरियाणा के बडे खापों में से एक , सतरोल खाप,  ने अपने एक ऐतिहासिक फैसले में अन्तर्जातीय  विवाहो को मंजूरी दे दी है।  खाप के इन 42 गांवों में भाईचारा माना जाता रहा है,  इनमें आपस में शादियाँ नहीं होती।  सतरोल खाप के प्रमुख इंद्र सिंह मोर ने अंतर्जातीय विवाह व गोत्र और गुहांड के अलावा भाईचारे के अन्य गांवों में विवाह से बैन हटाने की घोषणा की। अब इस फैसले का मूल्यांकन हरियाणा की स्थिति पर नजर डालते हुए करें। हरियाणा में लिंगानुपात की स्थिति सबसे खराब है। प्रति हजार पुरुष पर 877 महिलाएं है। बडी संख्या  में पुरुष कुंवारें हैं , यहाँदूसरे राज्यों से लडकियाँ खरीद कर,  या ब्याह कर लाई जा रही हैं। इंद्र सिंह मानते हैं कि यह बैन हटाना एक व्यवहारिक जरूरत थी। इंद्र सिंह के अपने गांव में, जहां की  आबादी 18000 है ,200 बहुएं पूर्वोत्तर राज्यों से लाई गई हैं। बकौल इंद्रसिंह , ‘ ये  लडकियाँ आराम से परिवार में घुल मिल जाती हैं, फिर क्या दिक्कत है, दूसरी जाति में शादी करने से।  लेकिन भाईचारे वाले गांव, एक गोत्र में और अभिभावकों की मंजूरी के बिना शादी नहीं होनी चाहिए। खाप के नियमों को तोडेगा कोई तो उसका विरोध किया जाएगा।‘ बारह गांवों ने इस फैसले का विरोध किया  है। पर इंद्रसिंह ने साफ कहा है कि इसे वापिस नहीं लिया  जाएगा। इंद्रसिंह के इस फैसले का विरोध करने वालेां में एक , हांसी  (हिसार जिला) ब्लॉक काउंसिल के पूर्व अध्यक्ष बीर सिंह कौशिक का कहना है कि, ‘  अगर महिलाओं को इतनी आजादी दे दी जाएगी तो वे अपनी पसंद से शादियाँ करने लगेंगी और समाज और मर्यादा  की सभी अवधारणाएं नष्ट हो जाएंगी। यह परंपरा के विरुद्ध है।

सुनील जागलान से बातचीत हमारी यात्रा  का अंतिम पडाव था। युवा ,  उत्साही, आधुनिक विचारों से कदम मिला कर चलने की कोशिश करने वाले सपरंच । पूरा कमरा कई तरह के पदक व शिल्ड से भरा हुआ। बकौल सुनील , ‘ सामाजिक बंधन मनवाने और दिल में बिठाने की बात है। लडके लडकियों को गोत्र और भाईचारे वाले गांव की जानकारी होनी चाहिए ताकी वह सोच समझ कर रिश्ते बनाएं। वह गलत काम नहीं करेंगे, तो फिर खाप क्यों कडे फैसले लेगा। और खाप क्यों है,  खाप इसलिए है कि सरकार अपनी भूमिका ठीक से नहीं निभा रही। सरकार अपनी भूमिका ठीक से निभाए, हर गांव में पुलिस स्टेशन हो न्याय व्यवस्था  हो तो खाप की जरूरत नहीं ।‘ पर कई बार तो खाप ने कानून से इत्तर अपने फैसले सुनाएं हैं,  तो केवल व्यस्था  को इस बात के लिए दोषी कैसे ठहराया  जा सकता है ? मेरे इस तर्क पर एक चुप्पी कमरे में पसर गई। सुनील जागलान खाप के फैसलों से पूरी तरह इत्तेफाक रखते हैं। मेरे यह पूछने पर की  क्या  खाप अब प्रेम का विरोध नहीं करेगा ! सुनील झट से बोल पडे , ‘ हां! हां! किसने मना किया ,  प्रेम करने से,  करो ना! खाप बस मना कर रहा है कि गांव कें अंदर और आस पास के गांव के लडके लडकी न हो। उसके बाहर शादी करो ना! गांव के अंदर और आस- पास के गांव के साथ तो भाई बहन का रिश्ता हो जाएगा ना!’  अपने तर्क को वैज्ञानिक जामा पहनाने की कोशिश करते हुए बोलें-‘ रिश्ते जितने दूरी में हों बच्चे स्वस्थ्य और इेंटेलीजेंट होते हैं। इसमें पिछडापन क्या ! यह तो विज्ञान के साथ चलना हुआ। यह  हमारी परंपरा है। परंपरा को जिंदा रखने की कोशिश है।‘  अपने इस जवाब पर संतुष्टि  की रेखाएं उनके चेहरे पर साफ दिख रही थी। और प्रेम, प्रेम तो उसी से होता है ना , जिसके साथ आप उठते बैठते है,  पंद्रह गांव दूर के लडके लडकी के बीच प्रेम कैसे होगा ? अच्छा यह बताइए आप तो युवा हैं आप नहीं चाहते थे कि आप की पत्नी ऐसी हो जिससे आपके विचार मिलते हो। मतलब एक दूसरे को अचछी तरह से समझते हों ! ’  मेरे इस सवाल पर सुनील जरा अटक गएं। उन्हें यह समझ ही नहीं आया  कि पत्नी से विचार मिलने जैसी क्या  बात होती है,  पत्नी का काम घर परिवार संभालना, सास ससुर की सेवा करना है, इसमें विचार मिलने की कहां बात से आती है।  फिर कुछ उपलब्धियाँ गिनाई ,जो उन्होंने महिला सशत्तिकरण के लिए किए हैं। उनकी पत्नी कहीं नजर नहीं आईं। देखना चाहती थी , सुना था बहुत खूबसूरत हैं। पर शायद सामने आती भी तो लंबे से घूंघट में चेहरा दिखता कहां।
बदलाव की यह बया र मंद – मंद बहती हुई कुरुक्षेत्र के बीर पिपली गाँव  की गलियों तक पहुंची हुई है। यहां 31 महिलाओं के पतियों ने अपनी अपनी पत्नियों के घूंघट उठाकर उन्हें इस कैद से मुक्ति  दी।  इन महिलाओं में 60 साल की रोशनी देवी से लेकर चालीस साल तक की महिलाएं हैं। रोशनी देवी ने चालीस साल उसी घूंघट के अंधेरे में बिताए हैं। शादी के चालीस साल के दौरान रौशनी ने इसी घूंघट तले रोजमर्रा के काम निपटाए। किलोमीटर चल कर पानी लाईं। इस दौरान कई बार ठोकर खाकर गिरीं भीं। चोटें खाईं। जाट समुदाय से आने वाली रोशनी ने जब भी पर्दा उठाने की कोशिश की हर बार तो हर बार बुजुर्गो ने ऐसा न करने के लिए दबाव बनाया  । अब उन्हें इस घूंघट से मुक्ति  तो मिल गई,  या  कहिए पति ने घूंघट सर पर न रखने की छूट उन्हें दे दी।  अब बच्चे भी तो बडे हो गए हैं,  और उम्र भी ढल गई।  रोशनी नहीं चाहती कि उसके बच्चों को घूंघट की यह कैद मिले।      इक्कीसवी सदी में स्त्री  पुरुष संबंधों को नियंत्रण में रखने वाले इन पंचायतो ने खुद में बदलाव के संकेत दिए है। पर हकीकत यह है कि ऊपरी तौर पर दिखने वाला बदलाव वास्तव में मजबूरी है। लिंगानुपात में आए असंतुलन की वजह से लडकों का विवाह नहीं हो पा रहा,  ऑनर किलिंग, बलात्कार जैसी घटनाओं में लगातार बढोतरी ऐसे क्रांतिकारी फैसले लेने के लिए खाप को मजबूर कर रहा है। सोच में कोई विशेष बदलाव नजर नहीं आ रहा है- आज भी लडकी, यानी  गांव और परिवार की इज्जत, और इज्जत इंसान की जिंदगी से ज्यादा  महत्वपूर्ण हैं। यह परंपरा कहीं न कहीं घबरा रही है कि उसकी पकड से युवा सोच छूट न जाए। कहीं इतना हो हल्ला न हो कि कानून के शिकंजे में इस परंपरा के प्राण पखेरू उखड जाएं। इस परंपरा में निहित सोच पुरातन जरूर है, लेकिन इस परंपरा को बचाए रखने के लिए ढूंढा गया  तरीका विज्ञानिक हैं। युवाओं को मानसिक रूप से इस सोच को आत्मसात् करने के लिए तैयार  किया  जा रहा है। घूंघट स्वयम  पुरुष उठा कर विद्रोह की सोच को दबाने की कोशिश कर रहा। ताकि स्त्री  इस पहल को अपना अधिकार नहीं एहसान समझे । और एहसान के तले कुछ समय विद्रोह को दबा कर शांत हो जाए। लेकिन मजबूरी ही सही परंपराओं की मुट्ठी से परिवर्तन की आंधी को रोका नहीं जा सकता उसे आनी है और वह आएगी ही। कई बार मजबूरी परिवर्तन  का आधार बनती है, शायद ऐसा ही इस बार हो रहा है।

अमृता स्त्रियों की पत्रिका बिंदिया से संबद्ध हैं

बेहाल गाँव, बेहाल बेटियां , गायब पौधे… धरहरा , जहाँ बेटी पैदा होने पर नहीं लग पाते हैं पेड़ : सुशासन का सच

 संजीव चंदन        

यह गाँव अचानक से देश -विदेश में चर्चित हो गया, जब 2010 में सूबे के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गाँव की बेटी ‘लवी’ के जन्मदिन पर गाँव में जाकर वृक्षारोपण किया. तब जाकर लोगों को पता चला कि इस गाँव के लोग एक बेटी के जन्म पर दस पेड़ लगाते  हैं. इसके बाद 2011 से 2012-हर साल नीतीश कुमार ने क्रमशः ‘रिमु राज’ और अंजलि कुमारी के जन्म पर पौधे लगाए. गाँव भ्रूणहत्या के खिलाफ तथा पर्यावरण संरक्षण के पक्ष में एक स्टेटमेंट बन चुका है. यह मुख्यमंत्री के विकास कार्यक्रम और राजनीतिक दर्शन का प्रतीक बन चुका है. इसीलिए यह आदर्श गाँव है उनके विकास कार्यक्रम और राजनीतिक दर्शन को समझने के लिए भी. पाठक यहाँ किसी राय या निष्कर्ष पर नहीं पहुंचे. आइये हमारे साथ गाँव चलते हैं.

भागलपुर जीरो माइल से गंगा पार करने के बाद ८ से १० किलोमीटर की दूरी तय करनी होती है ‘धरहरा’ पहुँचने के लिए. इस बीच सड़क के दोनों किनारों पर लगाये गये पौधों की कतार में आप कोई पौधा खोजने की कोशिश नहीं करें , निराश होंगे. वहां लकड़ी के बाड़ और थोड़े-थोड़े अंतराल पर चापानल देख कर आप आश्वस्त हो सकते हैं कि सरकार वृक्षारोपण के प्रति गंभीर है और वह मनरेगा के पैसों का सही इस्तेमाल कर रही है. इसके डिटेल में न जाना उचित है और न धरहरा जाते हुए डिटेल में जाया जा सकता है कि कितनी राशि के गायब पौधे इन बाड़ों में लगाये गये हैं या कितनी राशि के गायब पौधों को  जीवित रखने की अंतिम कोशिश इन चापानलों के माध्यम से की गई है या फिर कितने मजदूरों को इस योजना में काम मिला है. ध्यान रहे हमलोग उस गाँव में जा रहे हैं, जो बेटियों के जन्म से जोड़कर वृक्षारोपण करता है , एक साथ पर्यावरण संरक्षा के लिए तथा भ्रूण हत्या के खिलाफ कटिबद्ध गाँव. वहां पहुँचने के पूर्व इन गायब या जल गये पौधों से कोई राय बना लेना ठीक नहीं होगा.

धरहरा, यानी मकंदपुर पंचायत का एक गाँव . मकंदपुर रास्ते में ही है. मैंने दारू पीनी छोड़ दी है. यदि आपको तलब है तो आप आश्वस्त रहें बिहार सरकार ने हर तीन पंचायत में एक ब्रांडेड  दारू की दूकान को लायसेंस दे रखा है, मकंदपुर एरिया में भी एक ठेका है. ग्रामीणों की माने तो लायसेंसधारी दुकानदारों ने कई गांवों में किराना दुकानदारों के माध्यम से मनपसंद ब्रांड उपलब्ध करा रखा है – ‘सर्विस ऐट डोर स्टेप’!  धरहरा के ग्रामीणों के अनुसार यह व्यवस्था उनके गांव में नहीं है.

1900 दर्ज मतदाताओं और चार से पांच हजार आबादी वाले इस गाँव में १२०० मतदाता कुशवाहा ( पिछड़ी) जाति के हैं १७५ मतदाता राजपूत जाति के शेष ५२५ मतदाता अति पिछड़ी जाति , दलित , अति दलित जाति  तथा पश्मान्दा मुसलमान आदि में बटें हैं. गाँव की ७५% जमीनों पर राजपूत जाति के लोगों का मालिकाना है, शेष अधिकांश पर मालिकाना है  कुछ कुशवाहा किसानों का  लगभग ६० से ७० प्रतिशत आबादी भूमिहीन है. खबरों और दावों को मानें तो इस गाँव में बेटी के जन्म पर १० से १५ पेड़ लगाने की परम्परा की शुरुआत ‘ निर्मला देवी ‘ के परिवार से हुई. नीतीश कुमार ने इन्हें बुलाकर पुरष्कृत किया और नीव डाली बेटी के जन्म पर वृक्षारोपण के मॉडल गाँव के रूप में धरहरा को विकसित करने की.

 निर्मला देवी सहित कई ग्रामीणों के यहाँ आपको मिलेंगी  अख़बारों के वे कतरनें, जिसमें सूबे के मुख्यमंत्री पौधा लगा रहे हैं और साथ में कैप्शन : ‘ बेटियों का मान बढ़ने वाले धरहरा को सलाम ‘ ‘सी.एम ने भी सराहा धरहरा के जज्बे को’ आदि. आदि . उत्साहित ग्रामीण आपको घुमायेंगे उन विशेष जगहों पर जहाँ सी.एम ने पौधे लगाये हैं, इस घोषणा के साथ शिलापट्ट भी लगे हैं वहां. नीतीश कुमार के ब्रांड अम्बेसडर गाँव की ब्रांड अम्बेसडर निर्मला देवी से मिलने पर आपको यकीन हो जाएगा कि इस गाँव के हर घर में बेटी पैदा होने पर १० पौधे लगाये जाते हैं. निर्मला देवी कहती हैं कि ‘ किसी भी जाति धर्म के लोग अपनी बेटी के जन्म पर पौधे लगाकर उत्सव मानते हैं. गाँव में बड़े बगीचों -दर्जनों एकड़ जमीन में फैले बगीचों और वीकीपीडिया पर इस गाँव में आम और लीची के पेड़ों की बताई गई संख्या ( १ लाख ) के प्रभाव में बेटी और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील गाँव और सरकार के प्रति आप श्रद्धा से भर जायेंगे .

लेकिन जरा ठहरिये, आपको उत्सुकता और गर्व से गाँव घुमा रहे लोगों को थोड़ा और कुरेदिए , उन्हें आश्वस्त करिए कि आप हकीकत जानने आये हैं और हकीकत ही लिखेंगे तो आपसे वे खुलेंगे . तब आपको पता चलेगा कि आम और लीची के पेड़ों वाले भागलपुर के दर्जनों गाँव में से एक धरहरा में बड़े-बड़े बगीचों पर बमुश्किल एक दर्जन परिवार का मालिकाना है, उसमें से ८० % बगीचे का आकार राजपूत जाति के लोगों के अधिकार में है. आपको पता चलेगा कि तीन सालों से मुख्यमंत्री ने  दो बार राजपूत परिवार की बेटियों और एक बार कुशवाहा परिवार की बेटी के जन्म पर पेड़ लगाये हैं. आपको यह भी पता चलेगा कि लगभग सौ एकड़ में फैले जिस बगीचे से होकर आप निर्मला देवी के घर पहुंचे हैं, वह किसी राजपूत परिवार की मिलकियत है और निर्मला देवी के खुद के बगीचे भी आकर -प्रकार में कमतर नहीं हैं.

 मेरे साथ पहली बार गाँव के ही कुशवाहा जाति के युवा संजय सिंह घूम रहे थे. उनकी मानें तो गाँव के 60 से 70 % लोग भूमिहीन हैं और उनके द्वारा बेटी के जन्म पर पेड़ लगाना संभव ही नहीं है. ‘ कहाँ लगायेंगे वे पेड़ रहने को तो उनके पास बमुश्कील से कुछ एक  धूर जमीन है?’ संजय पूछते हैं. संजय का  सवाल नीतीश कुमार की राजनीति को कठघरे में खड़ा करता है. सवाल है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद भू सुधार का वायदा करने वाले नीतीश ने आखिर क्यों बंदोपाध्याय कमिटी की संस्तुतियों को ठंढे बक्से में डाल दिया ! संजय जैसे लोग इससे ही जुड़े सवाल करते हैं कि क्या भूमिहीनों के बीच जमीन की बन्दोवस्ती जैसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम नीतीश कुमार उन्हीं लोगों के दवाब में नजरअंदाज करते हैं, जिनके दवाब में उन्होंने कई हत्याओं के अभियुक्त की हत्या की जांच सी.बी.आई को सौप दी, उसके समर्थकों को पटना और आरा  में खुलेआम तांडव    की छूट दे दी और कुशवाहा जाति के जनप्रतिनिधियों की औरंगाबाद में हत्या की जांच की मांग कर रहे लोगों पर लाठी बरसवाकर दर्जनों लोगों के हाथ-पैड तुडवा डाले ! मेरे साथ घूम रहे सामजिक कार्यकर्ता डा. मुकेश  सवाल करते हैं कि ‘क्या सूबे के नेता के पास इतनी दृष्टि भी नहीं है या उनके सलाहकार उन्हें सलाह नहीं देते हैं कि भूमिहीनों के लिए कोई एक -डेढ़ एकड़ जमीन गाँव में मुहैया करा दें जहाँ वे भी अपनी बेटियों के जन्म पर पेड़ लगा सकें !’  मुकेश अपने प्रश्नों के साथ सही सवाल उठा रहे हैं कि आखिर जब तक पूरे गाँव के लोग अपनी बेटियों के लिए पेड़ नहीं लगा पायेंगे तो प्रतीक बने इस गाँव में उनकी बेटियां कैसे बराबरी और सम्मान का दर्जा पा सकेंगी ! फिर पूरे गाँव के द्वारा बेटी के जन्म पर वृक्षारोपण की खोखले  अफवाह का क्या सन्दर्भ हो सकता है, जिस गाँव में बमुश्किल १० से १५ प्रतिशत लोग ऐसी हैसियत में हैं, जो इस सरकारी कर्मकांड में शामिल हो सकें .


इसके पहले कि बेटी के जन्मोत्सव से जुड़े पर्यावरण संरक्षण के इस अभियान के प्रभावों को धरहरा की जेंडर स्थिति की कसौटी पर कसा जाय जरा उन भूमिहीन घरों से घूम आते हैं, जिनमें से अधिकांश या तो नीतीश कुमार के नायाब सोशल  इंजीनिअरिंग के तहत चिह्नित ‘ महादलित’ परिवार के घर हैं या फिर मुसलमान परिवार के, जिनके वोट बैंक को टार्गेट कर नीतीश कुमार अपनी धर्मनिरपेक्षता की राजनीति को नरेन्द्र मोदी के इर्द -गिर्द घुमाते हैं. महादलित परिवार के कच्चे पक्के मकानों के सामने धरहरा की बेटियां खेलती नजर आ सकती हैं, या छोटी उम्र में अपने भाई -बहनों को खेलाती ताकि उनके माँ-बाप अपने काम निपटा सकें. वे अपने घर के सामने के बगीचे में तब तक ही खेल सकती हैं, जब तक उनपर फलों के मौसम नहीं आये हों, अन्यथा पहरेदार उन्हें उन बगीचों में घुसने नहीं देते, जो उनके नहीं हैं, या जो उन बेटियों के हैं जिनके पिताओं के पास कई एकड़ में फैले बगीचे हैं.

बमुश्किल पोषाहार के लिए स्कूल का समय निकल पाती इन बेटियों को अपने गाँव से जुड़े ‘शोर ‘ का पता नहीं है. महादलित परिवार के कुछ सदस्य उत्सुकता बस हमलोगों के पास चले आते हैं. उनसे पता चलता है कि गाँव में मुख्यमंत्री के आने के बाद वे भीड़ के तौर पर कार्यक्रम स्थल पर उपस्थित होते हैं. उनमें से कोई मुख्यमंत्री से व्यक्तिगत तौर पर पास जाकर नहीं मिला है और न ही मुख्यमंत्री ने अपने इस ‘मॉडल गाँव ‘ के अपने प्रिय लोगों ‘ महादलितों’ के टोले में आकर उनका हाल-चाल पूछना उचित समझा है. उन्हें जरूरी नहीं लगता कि वे इनके पास आकर इनकी ‘बेटियों’ के लिए वृक्षारोपण की इनकी चिंता में शामिल हों या इन्हें अपने मुहीम में शामिल करें. क्या नीतीश कुमार जिन्हें अपना चिर प्रतिद्वंद्वी मानते हैं, लालू प्रसाद यादव, कभी किसी गाँव में हर साल आते और अपने प्रिय लोगों ( वोट बैंक ही सही ) से नहीं मिलते या उनके टोले में नहीं जाते, ऐसा संभव था ! गाँव के ही  प्रमोद पोद्दार नीतीश और लालू की राजनीति के इस फर्क को चिह्नित करते हैं.

मर्दों के लिए घर आशियाना और औरतों के लिए जेलखाना है : अरविन्द जैन

( कल ही दिल्ली की एक अदालत ने यह व्यवस्था दी है कि पति के द्वारा जबरन संभोग बलात्कार नहीं है , और दो दिन  पहले ही मध्यप्रदेश में एक पति के द्वारा अपने अन्य परिवार -सद्स्यों के साथ मिलकर एक महिला का सामूहिक बलात्कार किया गया . ये बलात्कार की कुछ ऐसी घटनायें हैं , जिनमें परिवार ही स्त्री उत्पीडन का सबसे बडा केंद्र दिखा है, जिसके साथ सांस्कृतिक तर्क और उससे संचालित कानून की व्यवस्था भी है. महभारत में एक कथा है कि भीष्म किसी ‘ओघवती’ की कहानी सुनाते हैं , जिसमें अतिथि की सेवा के लिए उसका पति उसे सौंप देता है . यह कथा पति के मोक्ष के लिए पत्नी के बलात्कार को सांस्कृतिक तर्क देती है . स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किया है . उनसे स्त्रीकाल के लिए विवाह , परिवार के भीतर स्त्री पर बलात्कार और कानून एवम संस्कृति में अंतर्निहित पितृसत्तात्मक षडयंत्र पर बातचीत का एक अंश. अ‍रविंद जैन से उनके मोबाइल न . 9810201120 पर संपर्क किया जा सकता है  )

हेमेंन्द्रनाथ मजूमदार

क्या आप मह्सूस करते हैं कि बलात्कार के लिए, भारतीय समाज की संस्कृति ही तर्क और संरक्षण मुहैय्या कराती है?

यह जान कर आश्चर्य होगा  आपको कि २०१४ के मौजूदा कानून के अनुसार भी विवाह के लिए लड़की की उम्र 18 साल होनी चाहिए ,मगर 18 से कम होने पर भी विवाह “गैरकानूनी” नहीं माना-समझा जाता और भारतीय दण्ड संहिता की धारा 375 के अनुसार ‘सहमति की उम्र’ 18 साल है पर इसी कानून के अपवाद अनुसार “15 वर्ष से अधिक उम्र की पत्नी के साथ यौन संबंध, किसी भी स्थिति में बलात्कार नहीं है”। क्यों?
आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि 1860 में सहमति की उम्र सिर्फ 10 साल थी जो 1891 में 12 साल, 1925 में 14 साल और 1949 में 16 साल की गई थी। 1949 के बाद इस पर, कभी कोई विचार ही नहीं किया गया। अध्यादेश (3.2.2013) और बाद में नए अधिनियम (२०१३) में इसे 16 से बढ़ा कर 18 किया गया।
अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (संयुक्त राष्ट्र) की एक रिपोर्ट के अनुसार “दुनिया की ९८ प्रतिशत पूँजी पर पुरुषों का कब्जा है. पुरुषों के बराबर आर्थिक और राजनीतिक सत्ता पाने में औरतों को अभी हज़ार वर्ष और लगेंगे.” पितृसत्तात्मक समाजों के अब तक यह पूँजी पीढ़ी-दर-पीढ़ी पुरुषों को पुत्राधिकार में मिलती रही है, आगे भी मिलती रहेगी. आश्चर्यजनक है कि श्रम के अतिरिक्त मूल्य को ही पूँजी माना जाता है, मगर श्रम की परिभाषा मे घरेलू श्रम या कृषि श्रम शामिल नहीं किया जाता. परिणामस्वरूप आधी दुनिया के श्रम का अतिरिक्त मूल्य यानी पूँजी को बिना हिसाब-किताब के ही परिवार का मुखिया या पुरुष हड़प कर जाते हैं.
सारी दुनिया की धरती और (स्त्री) देह यानी उत्पादन और उत्पत्ति के सभी साधनों पर पुरुषों का     ’सर्वाधिकार सुरक्षित्” है. उत्पादन के साधनों पर कब्जे के लिये उत्तराधिकार कानून और उत्पत्ति यानी स्त्री देह पर स्वामित्व के लिये विवाह संस्था की स्थापना (षड्‌यन्त्र) बहुत सोच-समझकर की गयी है.
दरअसल भारतीय विधि-व्यवस्था में भी उत्तराधिकार के लिए वैध संतान और वैध संतान के लिए वैध विवाह होना अनिवार्य है. न्याय की नज़र में, वैध संतान सिर्फ पुरुष की और ‘अवैध’ स्त्री की होती है. वैध संतान का ‘प्राकृतिक संरक्षक’ पुरुष (पिता) और ‘अवैध’ की संरक्षक स्त्री (माँ) होती है। विवाह संस्था की स्थापना से बाहर पैदा हुए बच्चे ‘नाजायज’, ‘अवैध’, ‘हरामी’ और ‘बास्टर्ड’ कहे-माने जाते हैं. इसलिए पिता की संपत्ति के कानूनी वारिस नहीं हो सकते. हाँ, माँ की सम्पत्ति (अगर हो तो) में बराबर के हकदार होंगे. ‘वैध-अवैध’ बच्चों के बीच यही कानूनी भेदभाव (सुरक्षा कवच) ही तो है, जो विश्व-भर में ‘विवाह संस्था’ को, अभी तक बनाए-बचाए हुए है. वैध संतान की सुनिश्चितता के लिए यौन-शुचिता, पवित्रता, सतीत्व, नैतिकता, मर्यादा और इसके लिए स्त्री देह पर ‘पूर्ण स्वामित्व’ तथा नियंत्रण बनाए रखना पुरुष का ‘परम धर्म’ घोषित किया गया है. मतलब जो वैध और कानूनी है, वो पुरुष का और जो अवैध है या गैरकानूनी है, वो स्त्री का. जी हाँ! फिलहाल यही और ऐसा ही है हमारा कानून। ईमानदारी से बोलूँ तो मर्दों के लिए घर आशियाना और औरतों के लिए जेलखाना है.

  आपने तो न्यायालयों की भाषा पर भी काम किया है, क्या न्यायालयों की  मर्दवादी भाषा इसी संस्कृति से पोषित नहीं है?

उत्तराधिकार कानूनों के माध्यम से पूँजी और पूँजी के आधार पर राजसत्ता, संसद, समाज, सम्पत्ति, शिक्षा – सब पर मर्नियम, कायदे-क़ानून, परम्परा, नैतिकता-आदर्श और न्याय सिद्धांत- सब पुरुषों ने ही बनाए हैं और वे ही उन्हें समय-समय पर परिभाषित और परिवर्तित करते रहते हैं हमेशा अपने वर्ग-हितों की रक्षा करते हुए. ‘भ्रूण हत्या’ से लेकर ‘सती’ बनाए जाने तक, प्रायः सभी क़ानून, महिला कल्याण के नाम पर सिर्फ उदारवादी-सुधारवादी ‘मेकअप’ ही दिखाई देते  हैं . मौजूदा विधान-संविधान-क़ानून महिलाओं को कानूनी सुरक्षा कम देते हैं, आतंकित, भयभीत और पीड़ित अधिक करते हैं. निःसंदेह औरत को उत्पीडित करने की सामाजिक-धार्मिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक प्रक्रिया में पूँजीवादी समाज क़ानून को हथियार की तरह इस्तेमाल करता रहा है. इसलिए ‘लॉ’ का असली अर्थ ही है-‘लॉ अगेंस्ट वूमैन’. समता की परिभाषा (बकौल सुप्रीम कोर्ट) है- सामान लोगों में समानता.
नारी सम्बन्धी अधिकांश फैसलों के लिए आधारभूमि तो धर्मशास्त्र ही हैं जो मर्दों के लिए ‘अफीम’ मगर औरतों के लिए ज़हर से भी अधिक खतरनाक सिद्ध हुए हैं. तमाम न्यायाशास्त्रों के सिद्धांत पुरुष हितों को ही ध्यान में रखकर गढ़े-गढ़ाए गए हैं. मथुरा से लेकर भंवरी बाई और सुधा गोयल से लेकर रूप कंवर सती कांड तक की न्याय- यात्रा में हजारों-हजार ऐसे मुकदमे, आंकड़े, तर्क-कुतर्क, जाल-जंजाल और सुलगते सवाल समाज के सामने आज भी मुंह बाए खड़े हैं। अन्याय, शोषण और हिंसा की शिकार स्त्रियों के लिए घर-परिवार की दहलीज से अदालत के दरवाजे के बीच बहुत लम्बी-चौड़ी गहरी खाई है, जिसे पार कर पाना बेहद दुसाध्य काम है। न्यायलयों की मर्द वादी भाषा इसी महान सभ्यता और संस्कृति की देन  है.

कानून की भाषा ही नहीं, परिभाषा भी घोर ‘मर्दवादी’ और पुरुष हितों को पोषित करने वाली लगती है. “औरत होने की सजा” के “यौन हिंसा और न्याय की भाषा” नामक लेख में, मैंने इस पर विस्तार से चर्चा की है. कानूनी भाषा ही नहीं, व्यवहार में भी पुरुष वर्चस्व साफ़ झलकता है. पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायधीशों पर यौन शोषण के आरोप, वरिष्ठ अधिवक्ताओं पर यौन शोषण-उत्पीड़न के आरोप और आए दिन महिला अधिवक्ताओं के साथ होने वाले यौन शोषण-अत्याचार के दुखद हाद्सो के बावजूद, समाज-मीडिया-न्यायपालिका की रहस्यमयी ख़ामोशी का मतलब क्या है? क्या यह सब होने-देखने के लिए ही औरतें अभिशप्त हैं? आखिर कब तक? दूर-दूर तक विरोध-प्रतिरोध  या प्रतिशोध की चिंगारी तक दिखाई नहीं दे रही. संभावनाओं का गर्भ में ही, गला घोंटा जा रहा है.  अक्सर महसूस होता है कि औरतों को अपनी आत्मरक्षा के लिए, कानूनी अधिकारों का इस्तेमाल हथियारों की तरह और हथियारों का इस्तेमाल कानूनी अधिकारों की तरह करना होगा.

 बलात्कार के खिलाफ मानस बनाने के लिए जहां समाज, न्यायालय और संस्कृति के प्लेटफार्म पर काम करने की जरूरत है, वहीं क्या आप यह देखते हैं कि परिवार न सिर्फ इसके लिए अपने ‘पवित्र डोमेन’ में तर्क बनाता है, बल्कि बलात्कारियों को सांस्कृतिक संरक्षण भी देता है?    विवाह के भीतर बलात्कार के लिए क्या यही संस्कृति और परिवार का ‘पवित्र डोमेन’ जिम्मेवार नहीं है?

 सच कहूँ तो भारतीय समाज दोहरी चरित्र(हीन) नैतिकता में जीने वाला समाज है. भारत में वैवाहिक पार्टनर के बीच यौन संबंध ही ‘नैतिक’ है, बाकी सब ‘अनैतिक’. हालांकि कानून का ‘नैतिकता’ या ‘अनैतिकता’ से कोई लेना-देना नहीं है. विवाह-पूर्व वयस्क स्त्री-पुरुष द्वारा सहमति से यौन संबंध (या परस्पर सहवास) ‘अनैतिक’ माने-समझे जाते हैं मगर कोई कानूनन अपराध नहीं.
बाल विवाह की ‘सामजिक कुप्रथा’ अभी भी जिन्दा है. समाज ही नहीं, बाकायदा कानून-विधि-विधान में फल-फूल रही. वर्तमान कानून के अनुसार विवाह के लिए लड़के की उम्र २१ साल और लड़की की उम्र १८ साल होनी चाहिए पर यदि कोई १८ साल से कम उम्र का लड़का,१८ साल से कम उम्र कि लड़की से विवाह करे, तो ना कोई कानूनी जुर्म है और ना कोई सजा. १८ साल से कम उम्र की लड़की से विवाह दंडनीय अपराध है और सहमती की उम्र भी १८ साल है, मगर १५ साल से बड़ी उम्र की अपनी पत्नी से जबरदस्ती यौन सम्बन्ध ‘बलात्कार’ नहीं. भारतीय कानून-विधान-संविधान पत्नी से ‘बलात्कार का कानूनी लाइसेंस या अधिकार’ और समाज ‘बलात्कार की संस्कृति’ को बढ़ावा देता है. स्त्री देह शोषण के लिए विवाह और वेश्यावृति की जड़ें तो भारतीय समाज की महान सभ्यता और संस्कृति का स्वर्णिम अध्याय कहा जाता है. विवाह संस्था में स्त्री, पति की निजी संपत्ति है और वेश्यावृति के प्राचीनतम धंधे में स्त्री. सार्वजनिक संपत्ति. देवदासी से लेकर आधुनिकतम ‘एस्कॉर्ट्स’ तक, मर्दों का ‘आनंद बाज़ार’ ही नहीं ‘व्यवसाय भी है.  हालांकि वेश्या या ‘काल-गर्ल’ से यौन सम्बन्ध बनाना, भले ही ‘अनैतिक’ बताया जाता है मगर पुरुष ग्राहक पर कोई अपराध नहीं. पकड़ी गई तो वेश्या को ही जेल जाना होगा.
ऐसे आधे-अधूरे और गड्ढे भरे कानूनों से ना तो ‘बाल विवाह’, ‘बाल तस्करी’, ‘बाल वेश्यव्रती’ को रोका जा सकता है और ना ही स्त्री विरोधी हिंसा-यौन हिंसा को. वैधानिक प्रावधानों में अंतर्विरोधी और विसंगतिपूर्ण ‘सुधारवादी मेकअप’ से, स्त्री के विरुद्ध हिंसा-यौन हिंसा, कम होने की बजाये बढ़ी है, बढती रही है और बढती रहेगी।

  हिन्दू धर्म शास्त्रों में अतिथि के द्वारा पत्नी की कामना करने पर उसे अतिथि को पेश करना स्वर्ग के लिए जरूरी बताया गया, क्या ऐसे तर्क मानस का निर्माण नहीं करते हैं, विवाह के भीतर बलात्कार के लिए.

प्राचीन भारत से लेकर अब तक, पति के लिए पत्नी उसकी अपनी ‘निजी संपत्ति’ है, जिसे वह अपने हितों को पूरा करने के लिए ‘उपयोग-दुरूपयोग’ की इज़ाज़त दे सकता है. वैवाहिक जीवन में बलात्कार की छूट के कारण भारतीय शादीशुदा महिलाओं की स्थिति ‘सेक्सवर्कर’ और घरेलू दासियों से भी बदतर है। ‘सेक्स वर्कर’ को ना कहने का अधिकार तो है , शादीशुदामहिला को वो भी नहीं है।अपने लाभ या राज्य-विस्तार के लिए, साधन-संपन्न अतिथि को पत्नी पेश करने से लेकर अपनी बेटियों के डोले तक भेजे जाते रहे हैं. काशीनाथ विश्वनाथ राजवाड़े ने “भारत में विवाह संस्था का इतिहास” में प्रामाणिक दस्तावेज सहित विस्तार से विवेचना की है. स्त्री देह को पाने-हथियाने और बलात्कार करने के, सैंकड़ों उदाहरण हिन्दू धर्मशास्त्रों और मिथकों में मौजूद हैं. जब घर में स्त्री देह का जबरन भोग-उपभोग, हिंसा-यौन हिंसा या उत्पीड़न मान्य है, तो घर से बाहर भी अधिकार मानने- समझने की ‘मानसिकता’ भी स्वाभाविक रूप से बनेगी ही. क्या कागजी विकल्प, मौलिक अधिकारों की बराबरी कर सकते हैं ? परंपरा , संस्कृति , संस्कार , रीति – रिवाजों और रूढि़वादियों व धर्मशास्त्रियों द्वारा बनाए गए नियमों के आधार पर वैवाहिक बलात्कार को जायज नहीं ठहराया जा सकता। कोई भी ‘असली धर्म’ इसका समर्थन नहीं करता परन्तु धर्म के तथाकथित ठेकेदारों ने सब ‘धर्मभ्रष्ट’ किया हुआ है.

  ‘व्यभिचार’ का कानून भी तो विह के भीतर पति की इच्छा से दूसरे पुरुष के साथ यौन संबंध का तर्क देता है, यानी एक हद तक बलात्कार के लिए स्पेस बनाता है?

‘व्यभिचार’ (धारा-497 आई.पी.सी.) सम्बन्धी कानून के अनुसार पुरुष (भले ही विवाहित हो) किसी भी अविवाहित, विधवा या तलाकशुदा स्त्री (स्त्रियों) के साथ सहमती से यौन रिश्ते (आप कहते रहें ‘अनैतिक’) बना सकता है। दूसरे पुरुष की पत्नी के साथ यौन संबंध ‘व्यभिचार’ है (अगर उसके पति की सहमति या मिलीभगत नहीं है) लेकिन यदि पति (मालिक) भी सहमत हो तो, यह कोई अपराध नहीं। यानि आपस में पति-पत्नियाँ बदलना विधान-सम्मत है. ‘व्यभिचार’ एक मायने में स्वेच्छा से ‘सहम’ नहीं, मानसिक अनुकूलन के बाद ‘बलात्कार’ ही है. समलैंगिक संबंधों को भी अपराध-मुक्त करने के लिए, सुप्रीम कोर्ट से लेकर संसद तक बहस जारी है. कभी भी ‘अध्यादेश’ जारी हो सकता है. कानूनी जाल-जंजाल में, ऐसे और भी बहुत से प्रावधान हैं मगर उन पर फिर कभी…..
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भारत में विवाह के भीतर बलात्कार के खिलाफ कनून बनने के मार्ग में क्या -क्या बाधायें हैं.

सामजिक-आर्थिक-राजनीतिक सत्ता पर, पुरुषों का कब्जा है. संसद में मर्दों का बहुमत है, सो ऐसा कोई कानून नहीं बनायेंगे, जो पित्रसत्ता की जड़ों में मट्ठा डालने का काम करे. ‘महिला आरक्षण विधेयक’- अभी नहीं, कभी नहीं. सारे कानून मर्दों के हितों और वर्चस्व को बनाये-बचाये रखने वाले ही बने-बनाये गए हैं. हालांकि उपरी तौर पर ढिंढोरा यह पीटा जाता है कि ‘स्त्री सशक्तिकरण’ के लिए, संसद ने ना जाने कौन-कौन से विधेयक पारित किये है. वास्तविकता यह है कि दांपत्य में यौन संबंधों के बारे में सदियों पुरानी सामंती सोच और सीलन भरे संस्कारों में, कोई बदलाव नहीं हो पा रहा। मालूम नहीं इस सवाल पर सबने, क्यों ‘मौनव्रत’ धारण कर लिया है।

देश में अपराधियों का राजनीतिकरण और राजनीति का अपराधीकरण इतना बढ़ गया है कि
वर्तमान दहशतज़दा माहौल में यौन हिंसा की शिकार औरत की चीख, आखिर कौन और कब सुनेगा ? मेरे विचार से स्त्री के दमन, उत्पीड़न और शोषण के खिलाफ़ कानून बनने-बनाने में सबसे बड़ी बाधा है- राजनीति और सत्ता में ‘मर्दवादी’ नेताओं की षड्यंत्रपूर्ण चुप्पी और अपने अधिकारों के प्रति स्त्री आन्दोलन के दिशाहीन भटकाव.

दुख तो यह भी है कि महिला प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री, गवर्नर, सुप्रीम और हाईकोर्ट की न्यायमूर्तियां और अन्य सांसद, मंत्री, अफसर वगैरह के होने के बावजूद, आम औरतों के हालात बद से बदतर होते गये हैं। कुर्सी मिलते ही औरत, औरत नहीं रहती, सत्ता के इशारे पर नाचने वाली ‘गुड़िया’ बन जाती है, गुड़िया।

अफसोस कि तमाम प्रतिभाशाली और क्रांतिकारी बेटे-बेटियां, जो सचमुच स्वाधीनता संघर्ष के दौरान बुने सपनों को साकार कर सकते थे या जिनमें देश की नियति बदलने की सारी संभावनाएं मौजूद थीं, सत्ता संस्थानों ने खरीद लिए, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय आवारा पूंजी की गुलामी करने लगे या पेशेवर दलाल हो गये। कुछ ने सपनों के स्वर्ग अमेरिका, फ्रांस, इंग्लैंड या कहीं और जाकर ‘आत्महत्या’ कर ली। जिनके बस का दलाल होना नहीं था, वो ‘फर्जी मुठभेड़’ में मारे गये या फिर अराजक जीवन की दारु पीते-पीते एक दिन, खून की उल्टियां करते बरामद हुए। ऐसी विश्वासघाती और आत्मघाती होनहार पीढ़ियों को या राष्ट्र कर्णधारों को क्या कहे?

जाति और धर्म संस्थानों को स्त्री के प्रति यौन हिंसा के बडे  उत्प्रेरक के तौर पर माना जाता है, इन्हें कानूनों से किस हद तक ठीक किया जा सकता है ?

 धार्मिक पाखंड, कर्मकांड, अन्धविश्वास और तर्कहीन आस्थाओं के शिकार, मर्द और स्त्रियाँ दोनों ही हैं. धर्म मर्दों के लिए अनाथालय सिद्ध हुआ है, मगर स्त्रियों के लिए ‘वेश्यालय’. स्त्रियों की शस्त्रों से अधिक हत्या तो, धार्मिक शास्त्रों ने की है. मर्दों की आँखों में फिट जाऔर धर्म  के ‘टेलीलेंस’ का फोकस, हर स्त्री देह पर एक जैसा ही होता है। स्त्री को देखते ही ‘टेलीलेंस’ की लार टपकने लगती है और दिमाग में हिंसक घोड़े हिनहिनाने लगते हैं। स्त्री फ़िल्मी हिरोइन (सीता, पार्वती, द्रोपदी, तुलसी, आनंदी या किसी भी भूमिका में हो) हो या टेनिस-हाकी-क्रिकेट खिलाड़ी, राजनेता हो या समाजसेविका, पुलिस अफसर-डॉक्टर- वकील- इंजिनियर हो या एयर होस्टेस- नर्स-स्टेनो, अध्यापक हो या छात्रा, शिक्षित हो या अनपढ़, अमीर हो या गरीब, सवर्ण हो या दलित, शहरी हो या ग्रामीण, हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई हो या नास्तिक। गंगा-यमुना में नहा रही हो या पांच सितारा स्विमिंग पूल में, सड़क किनारे या गांव के तालाब पर- कैमरा क्लिक,क्लिक करने लगता है। मीलों की दूरी से फिल्म शूट होने लगती है और स्त्री को पता तक नहीं चलता कि कब सीडी या एम् एम् एस, पितृसत्ता के ‘आनंद बाज़ार’ में छप गया।
दरअसल पुरुषों को घर में घूंघट या बुर्केवाली औरत (सती-सावित्री) चाहिए और अपने धंधा चलाने या ब्रांड बेचने के लिए बिकनीवाली। सो स्त्रियों को सहमती के लिए लाखों डॉलर, पाउंड, दीनार या सोने का लालच (विश्व सुन्दरी के ईनाम और प्रतिष्ठा) और जो सहमत नहीं उनके साथ जबरदस्ती यानी हिंसा, यौन-हिंसा, दमन, उत्पीड़न, शोषण के तमाम हथकंडे।
स्वयं सहमत हुई या की गई (नायिकाओं) स्त्रियों का तर्क होता है कि “हम देह नहीं सिर्फ देह की (कामुक-उतेजक) छवि बेच रही हैं, जो सचमुच देह बेचने या गुजारे के लिए विवाह बंधन में बंधने से कहीं ज्यादा फायदेमंद और सम्मानजनक है। देखो हत्या, दहेज हत्या, घरेलू हिंसा, यौन-हिंसा, दमन, उत्पीड़न और शोषण की शिकार ब्याही-अनब्याही आम स्त्रियाँ घुटघुट कर दम तोड़ रही हैं या सालों से इन्साफ के मंदिरों के चक्कर काटती घूम रही हैं।“ आपके ही धर्म ग्रंथों-शास्त्रों में भी लिखा है ‘सलज्जा गणिका नष्टा, निर्लज्श्च कुलांगना’। समझ नहीं आ रहा कि  (अ)न्यायशास्त्रों में घुस कर बैठे, आदिकालीन धर्मशास्त्रों की भरी-भरकम गठरी- आखिर हम कब तक ढोते रहेंगे.
दिक्कत यही है कि अधिकांश कानूनों की बहुमंजिला ईमारत, ऐसे ही धर्म ग्रंथों-शास्त्रों, परम्पराओं और रीति-रिवाजों के नीवं पर बनी-बनाई गई है. शिक्षा-दीक्षा के कारण स्त्रियाँ बदली हैं, बदल रही हैं मगर भारतीय पुरुष अपनी मानसिक बनावट-बुनावट बदलाने को तैयार नहीं है. उसके लिए यह सत्ता से भी अधिक, लिंग वर्चस्व की लड़ाई है. समानता के संघर्ष में स्त्रियों का दबाव-तनाव बढ़ता है तो कुछ ‘कॉस्मेटिक सर्जरी’ की तरह नए विधि-विधान बना दिए जाते हैं और कुछ और सुधारों के सपने दिखा दिए जाते हैं.