मनुवादी न्याय का शीर्ष तंत्र

( भगाणा की दलित लड्कियों के साथ बलात्कार के खिलाफ साथियों ने आन्दोलन छेड ही रखा था कि 'योगगुरु' रामदेव ने दलित स्त्रियों के लिए अपमान जनक प्रलाप
अरविन्द जैन 
किये . ऐसी प्रवृत्तियों के खिलाफ तंत्र जहां नाकाम है, वहीं समाज के ब्राहमणवादी और पितृसत्ताक चरित्र से संचालित भी होता है. कानूनों के  स्त्रीवादी व्याख्याकार वरीष्ठ अधिवक्ता अरविंद जैन ने सरवोच्च नयायालय द्वारा अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार अधिनियम की दलित स्त्रियों के खिलाफ व्याख्या और किये गये प्रावधानों की तीखी आलोचना की थी . यह आलोचना आज फिर से प्रासंगिक है. मुकेश मानस जी ने इसका हिन्दी अनुवाद उपलब्ध कराया, इसे उन्होंने पहले भी 'मगहर' में प्रकाशित किया है. अरविन्द जैन से उनके मोबाइल न 9810201120 पर संपर्क किया जा सकता है ) 


आज के संसदीय लोकतंत्र पर मुट्ठी भर लोगों ने कब्जा कर लिया है। उन्होंने संसद में क्षेत्रीय पार्टियों के नेताओं की भागीदारी को लगभग समाप्त कर दिया है। आज का संसदीय लोकतंत्र सामाजिक द्वन्द्वों और अन्तरविरोधों से ग्रस्त है। अगर इन सामाजिक द्वन्द्वों और अन्तरविरोधों को सही समय पर सुलझाया नहीं गया तब शोषितों के पास इसके आधार को ध्वस्त करने के अलावा कोई विकल्प नहीं रह जाएगा। प्रशासन के असंवेदनशील रवैये कानून के सही ढंग से लागू न होने तथा अपराधी एवं कुछ नौकरशाहों के मजबूत नापाक गठजोड़ के कारण दलितों का उत्पीड़न यौन शोषण और उनके खिलाफ भेद-भाव बढ़ता जा रहा है। न्याय व्यवस्था में भी दलित विरोधी उच्च जातिवादी मानसिकता के कारण न्याय न के बराबर मिल पाता है।

बेलछी से गोहाना तक  भारत में हर 18 मिनट में किसी न किसी दलित पर जुर्म ढाया जाता है। प्रतिदिन औसतन 11 दलितों को पीटा जाता है.  3 दलित महिलाओं के साथ बलात्कार किया जाता है . हर सप्ताह 13 दलितों की हत्या होती है और  6 का अपहरण एवं 5 के घर जलाये जाते हैं। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के मुताबिक 1995 से 2009 के दौरान 80489 दलितों पर किए गए अत्याचार/अपराध के मामले दर्ज़ हुए। इनमें दो हजार मामले हत्या के एवं 7500 मामले बलात्कार से संबंधित दर्ज़ किये गये। केवल 2008 में ही 30913 मामले दर्ज़ किये गये हैं।

दलित महिलाओं को निर्वस्त्र कर नंगा घुमाया जाता है उन्हें दिन-दहाड़े असहाय चश्मदीद के सामने मार दिया जाता है और ताज्जुब की बात है कि यह आजादी के छः दशक बाद भी हो रहा है। आंख निकालना, जिंदा जला देना, हाथ पैर काट डालना, महिलाओं के साथ बलात्कार करना, गांव बर्वाद कर देना (बेलछी, सुन्दूर,गोहाना) और उन्हें आतंकित करना ताकि वे यह सब चुपचाप सहते रहें तथा इस दुराग्रह पूर्ण घृणा का प्रतिरोध नहीं कर पाएं। सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक सत्ता प्राप्त व्यक्ति भी इस छूआछूत रूपी कैंसर के शिकार हैं।
दलितों का दमन, उत्पीड़न एवं अवमानना हमारे देश के इतिहास का एक शर्मनाक अध्याय है। उत्तर भारत में अनुसूचित जाति के लड़के/लड़कियां अगर गैर-अनुसूचित जातियों के लड़के/लड़कियों से प्यार करते हैं या शादी करना चाहते हैं तो ज्यादातर मामलों में दोनों को परिवार के सदस्यों के द्वारा मार दिया जाता है। जिसे वे गर्व से 'ऑनरकिलिंगकहते हैं इन अमानवीय क्रूर हत्याओं में भला क्या शान हो सकती है. 

कुख्यात लक्ष्मणपुर बाथे जनसंहार (दिसंबर 1997 में 58 दलितों को रणवीर सेना के द्वारा उसी गांव में मार दिया गया एवं तीन मल्लाहों को सोन नदी के दक्षिणी छोर पर गला रेतकर मार दिया गया। इस तरह से इस जनसंहार में कुल 61 लोगों की जान ली गई। सदियों से इस तरह के उत्पीड़न को अंजाम दिया जा रहा है।

धार्मिक मिथक एवं मिथक शास्त्र की गहरी जड़ें

पुलिस मामले को दर्ज़ नहीं करती। अगर दर्ज़ करती भी है तो उदासीनता के साथ। गरीब-पीड़ितों को धमकाया जाता है। अपराधी माफिया को संरक्षण दिया जाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि अनुसूचित जाति एवं जनजाति (उत्पीड़न निरोधक) एक्ट, 1989 केवल कागज़ी शेर है। दलितों पर अत्याचार राष्ट्रीय रिकार्ड एवं इतिहास की वस्तु बन चुका है। उनके उत्पीड़न की मजबूत जड़ धार्मिक मिथकों एवं मिथकशास्त्र में निहित है।

हिन्दुओं के बीच जाति व्यवस्था चातुर्वर्ण्य के रूप में सीढ़ीनुमा असमानता पर आधारित है, जिसमें अनुसूचित जाति एवं जनजाति (शूद्रों) को सामाजिक स्तर के सबसे निचले पायदान पर रखा गया है। श्रेणीबद्ध असमानता हिन्दू धर्म के विभिन्न तबकों को एक-दूसरे से अलग रखने की अक्षुण्ण दीवार है। दलितों को दास की तरह समाज की सेवा करने के लिए निकृष्ट काम दिये गए। दलितों को पानी, शिक्षा,  संस्कृति, जीवन एवं आर्थिक उद्यम से वंचित रखा गया है। मनुस्मृति में दलितों को अच्छे कपड़े, गहने,  खाने आदि से निषेधित किया।

डॉ. अम्बेडकर के शब्दों में जाति व्यवस्था एक क्रूर यंत्र है , जिसके द्वारा मानवता को दमित एवं दास बनाया गया। इसका सही नाम 'कुख्यात' होना चाहिए।  अस्पृश्यता एक ऐसी अमानवीय घटना है ,जो विश्व के अन्य हिस्सों में नहीं मिलती। इस तरह की घटना दूसरे समाज के प्रारंभिक  प्राचीन एवं आधुनिक समाज में देखने को नहीं  मिलती है। अस्पृश्यता की समस्या साधन-सम्पन्न एवं साधन-विहीन जातियों के बीच का संघर्ष है। एक वर्ग के द्वारा दूसरे वर्ग के साथ अमानवीय अन्याय किया जाता है। संघर्ष की शुरुआत समानता एवं समान व्यवहार की मांग से होती है जो उच्च जातीय हिन्दुओं को नागवार है और यही कारण है कि वे गुस्से में आकर दलितों का अपमान एवं मान-मर्दन करने लगते हैं। ग्रामीण भारत में दलितों को भयानक से भयानक भेदभाव, निषेघ, प्रतिबंद्ध, दुराग्रह झेलना पड़ता है।

अस्पृश्यता का खत्मा

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 में अस्पृश्यता को खत्म कर दिया गया है तथा इसका किसी भी रूप में प्रचलन प्रतिबंधित कर दिया गया है। अस्पृश्यता (अपराध) एक्ट, 1955 में लागू किया गया जिसका 1976 में नाम बदलकर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट एक्ट कर दिया गया। संसद ने बाद में अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निरोधक) एक्ट 1989 पारित किया। कानूनन खात्मे के बावजूद अस्पृश्यता आज भी धड़ल्ले से प्रयोग में है। इस एक्ट के तहत 80 प्रतिशत से ज्यादा मामलों में अपराधी को इच्छाशक्ति एवं एक खास नजरिया न होने के अभाव में छोड़ दिया जाता है। इस समस्या का समाधान कभी-कभी केवल दण्ड विधिशास्त्रा से नहीं किया जा सकता। समाजशास्त्राीय दृष्टिकोण एवं संवैधानिक प्रतिबद्धता से इसका पुनर्मूल्यांकन करने की जरूरत है।

अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निरोधक) एक्ट 1989 को इसलिए लागू किया गया ताकि अनुसूचित जाति एवं जनजाति पर हो रहे उत्पीड़न को रोका जा सके। इस एक्ट की धारा दो में उत्पीड़न को परिभाषित किया गया है। ताकि धारा तीन के तहत इसे दंडनीय अपराध माना जाय। इसके विवरण इस प्रकार हैं:

 उत्पीड़न के अपराध के लिए सजा : अनुसूचित जाति और जनजाति न रहने पर अगर इस अपराध को करता है तो भारतीय दंड संहिता के तहत 10 साल की जेल हो सकती है। अनुसूचित जाति एवं जनजाति या उनकी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने पर उन्हें आजीवन करावास की सजा जुर्माने के साथ दी जायेगी।

जंतर मंतर पर धरने पर बैठी भगाणा  की पीडित दलित लडकियां 

दलित महिलाओं का बलात्कार क्यों

सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार जो भी अनुसूचित जाति/जनजाति का नहीं है और किसी व्यक्ति या संपत्ति के विरुद्ध अपराध करता है तो उसे (भारतीय दंड विधान के तहत 10 साल या अधिक की सजा) लेकिन पीड़ित को साबित करना होगा कि यह अपराध उसके अनुसूचित जाति/ जनजाति का होने के कारण किया गया। केवल पीड़ित (लड़की) का अनुसूचित जाति/ जनजाति के सदस्य होने भर से यह उत्पीड़न का मामला नहीं बनता।

सभी लोग जानते हैं कि अगर पीड़िता अनुसूचित जाति से संबंधित न होती तो इस तरह का अपराध करने की जुर्रत भी कोई नहीं कर सकता है। आजादी के 60 साल के बाद भी खासकर भारतीय गांवों में लोगों की पहचान उनकी जाति एवं धर्म यहां तक की शहरों में भी एक खास तरह की वेशभूषा एवं सामाजिक धार्मिक प्रतीकों से उसके धर्म एवं जाति का पता चलता है। अगर दोषी अपराध करने से पहले उसकी जाति जानता है तो कानून एवं अदालत इसका अनुसूचित जाति एवं जनजाति एक्ट के तहत संज्ञान लेती है।

कानून टूटा-फूटा और जटिल है

मानवीय सर्वोच्च न्यायालय ने धारा 3 (2)(अ) एक्ट के तहत यह बताया है कि अनुसूचित जाति एवं जनजाति होने के कारण अगर इस अपराध को अंजाम दिया जायेगा तब ही यह अस्पृश्यता विरोधी कानून के अंतर्गत आयेगा। अगर पीड़िता यह साबित नहीं कर पाती कि किसी खास जाति के होने के कारण उसपर अपराध हुआ है तो 3 (2)(अ) के तहत कोई भी कार्यवाही नहीं की जा सकती (दिनेश उर्फ बुद्धा बनाम राजस्थान सरकार) (2006 )

माननीय सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर से यह बताया है कि अनुसूचित जाति की लड़की के साथ बलात्कार किया गया लेकिन अनुसूचित जाति/जनजाति (अपराध निरोधक) एक्ट, 1989 की धारा 3 (2)(अ) के तहत यह साबित नहीं किया जा सकता कि उस पीड़िता के साथ बालात्कार इसलिए हुआ कि वह एक खास जाति से है। केवल अनुसूचित जाति की होने से इस कानून का प्रावधान इस मामले में लागू नहीं हो सकता। पीड़िता पारधी समुदाय से है लेकिन उसके पास कोई साक्ष्य नहीं है कि उपरोक्त कानून के तरह अपने पर हुए जुर्म को साबित कर सके। उच्च न्यायालय के पास भी कोई साक्ष्य नहीं है जिसके तहत यह बताया जा सके कि वह एक खास जाति से थी इसलिए उसपर यह अपराध किया गया। अतः अनुसूचित जाति/जनजाति (अपराध निरोधक) एक्ट, 1989 को संज्ञान में नहीं लिया जा सकता एवं याचिकाकर्त्ता के मामले में धारा 3 (2)(अ) को खारिज किया जाता है। (रामदास एवं अन्य बनाम महाराष्ट्र सरकार) . 

पैमाने पर एक नजर

16 वर्षीय युवती के बलात्कार के मामले में जहां प्रिंसिपल सेशन जज ने आरोपी को आई. पी. सी. धारा 3 (2 अ) अट्रोसिटी एक्ट के तहत मामला दर्ज़ किया एवं उसे आजीवन कारावास तथा 10 हजार रुपये का जुर्माना किया गया। साथ-ही साथ 6 माह का सश्रम कारावास भी मिला। लेकिन माननीय न्यायमूर्ति सी. नागप्पा और न्यायमूर्त्ति चित्रा वेंकटरमण ने इसे खारिज कर दिया और बताया कि केवल अनुसूचित जाति की लड़की होने से धारा 3 (2)(अ)  लागू नहीं किया जा सकता और कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित किया जा सकता है कि किसी खास जाति की होने के कारण ही यह जुर्म किया गया है। अतः धारा 3(2) (अ) लागू नहीं किया जा सकता और कोई सक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित किया जा सकता है कि किसी खास जाति की होने के कारण ही यह जुर्म किया गया है। अतः धारा 3 (2)(अ) अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निरोधक कानून को खारिज किया जाता है। (एस. बाला रमण बनाम राज्य )
ज्ञानी न्यायमूर्ति ने न केवल आरोप को एवं उसकी धारा अट्रोसिटी एक्ट को खारिज किया बल्कि सजा को घटा कर सात साल सश्रम करावास एवं 10 हजार रुपये जुर्माना तय किया। (उपरोक्त वर्णित माननीय सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को आधार बनाकर)।

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले कोई अंधी गली नहीं है।

सी. टी. स्वीनरन सुपुत्र दामोदरण नायर बनाम केरल सरकार (2009)  का मामला जिसमें 20.1.2005  को रात 12 : 30 बजे आरोपी ने कोझीकोड कारपोरेशन में म. न. वी/ 1985 के दरवाजे को तोड़कर मृतक पी. के साथ  बलात्कार किया। आरोपी हिन्दू नायर समुदाय से है। मेडिकल कॉलेज हॉस्पीटल में पी. एक सहायक नर्स थी जिसकी दो बेटियां थीं। छोटी बेटी आर. का अन्तरजातीय विवाह आरोपी के ही भाई वेणुगोपाल से था। कोझीकोड के सेशन जज ने दलित अत्याचार निरोधक एक्ट के तहत दो साल की सश्रम कारावास और सेक्शन 457 आई. पी. सी. के तहत एक हजार रुपये का जुर्माना किया। धारा 376 आई. पी. सी. के तहत आरोपी को दस साल की सश्रम कारावास और 5 हजार रुपये का जुर्माना किया गया। (दलित  अत्याचार निरोधक एक्ट की धारा 3(2)(अ) के तहत आरोपी को आजीवन कारावास एवं 10 हजार रुपये की सजा दी गई।मूर्धन्य लोक अभियोजक श्री एस. यू. नाजार ने माना कि भारतीय दंड विधान के तहत साक्ष्य के मद्दे नजर यह नहीं साबित किया जा सकता कि यह अपराध इसलिए किया गया क्योंकि पीड़िता अनुसूचित जाति की थी। आगे यह बताया गया कि आरोपी ने कोई ऐसा जुर्म नहीं किया है जिसे धारा 3(2)(अ) अट्रोसिटी  एक्ट 1989 के तहत सजा दी जाय।

रामदास बनाम महाराष्ट्र सरकार ( 2007)  केरल उच्च न्यायालय के फैसले को आधार बनाकर माननीय न्यायमूर्त्ति पायस सी. कुरियाकोज एवं न्यायमूर्ति पी. एस. गोपीनाथन ने एस. सी/ एस. टी. एक्ट 1989 की धारा 3.2 ) अ) को खारिज करते हुए केवल आई. पी. सी. की धारा 457, 376 को साबित किया। ज्ञात हो कि इस मामले में पीड़िता की छोटी बेटी से आरोपी जो की हिन्दू नायर समुदाय से है, भाई की शादी हुई थी। यह विश्वास ही नहीं किया जा सकता है कि आरोपी को पीड़िता की जाति का पता ना हो। उसने बलात्कार करने का साहस इसलिए किया क्योंकि पीड़िता अनुसूचित जाति की थी। इस तरह के मामलों में यह मान लेना चाहिए कि पीड़िता का बलात्कार इसलिए हुआ क्योंकि वह अनुसूचित जाति से है। इस तरह के अपराध हमेशा उच्च जातियांे के द्वारा नीची जाति की महिलाओं पर वर्चस्व दिखाने के लिए किए जाते हैं। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय के ये फैसले अंधी गली नहीं है जिससे माननीय न्यायमूर्त्ति अनभिज्ञ हों और हर मामले के तथ्य एवं परिस्थितियों को दरकिनार कर सके।
उसका बलात्कार (जानबूझकर) नहीं किया गया कि वह अनुसूचित जाति से है
एक अन्य मामलें मे धु्रवेन्द्र सिंह एवं अन्य ने पूजा के साथ छेड़-छाड़ किया फिर बलात्कार किया और ये धमकी दी की अगर इस मामले को किसी से बताया गया तो उसके भाईयों को मार दिया जाएगा। जब भी वह विद्यालय जाती थी सभी आरोपी उसके साथ बलात्कार करते थे और यह सिलसिला बहुत दिनों तक चलता रहा।

राजस्थान उच्च न्यायालय के माननीय न्यायमूर्त्ति एस. के. गर्ग के मुताबिक अरोपी धु्रवेन्द्र सिंह, सुशील एवं सी. मुमुन्सी पर अट्रोसिटी एक्ट की धारा तबतक नहीं लगाई जब तक कि ये न पता चले की पीड़िता के साथ इसलिए बलात्कार किया गया क्योंकि वह अनुसूचित जाति की है। वर्तमान मामले में कोई भी ऐसा साक्ष्य नहीं है जिससे ये साबित हो कि पूजा का बलात्कार इसलिए किया गया क्योंकि वह अनुसूचित जाति की थी। इसलिए मूर्धन्य स्पेशल जज जिन्होंने ैब्ध्ैज् एक्ट की धारा 3(2)(अ) के तहत जो सजा दिया उसे खारिज किया जाता है और आरोपियों को इस कथित अभियोग से मुक्त किया जाता है। इस मामले में पप्पू बनाम राजस्थान सरकार को संज्ञान में लिया जाना चाहिए जिसमें यह बताया गया है कि ऐसे मामलों में  अट्रोसिटी एक्ट की धारा 3(2)(अ) को संज्ञान में लेने के बजाय जरूरत है इस तरह के अपराध के तथ्यों पर सही ढंग से प्रकाश डालने की एवं यह साबित करने की कि अपराध इसलिए किया गया क्योंकि पीड़िता अनुसूचित जाति से है। (धु्रवेन्द्र सिंह एवं अन्य बनाम राजस्थान सरकार (2001) 

सर्वोच्च न्यायलय के फैसले से पहले का एक मामला

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के माननीय न्यायमूर्ति उमेश्वर पाण्डेय ने सही ही कहा है कि ये आरोपि घटना के समय 25 साल का था और इस जघन्य अपराध को बर्बर तरीके से अंजाम दिया जिसने 11 वर्षीय लड़की का अपनी यौन कुंठा को शांत करने के लिए बलात्कार किया। यह घटना इतनी क्रूर एवं अमानवीय थी कि पीड़िता को बहुत दिनों तक अस्पताल में रखना पड़ा। यह सर्वविदित है कि यह नाबालिग लड़की दलितवर्ग से है और आरोपी एक गैर-दलितवर्ग से है, उसी कारण से आरोपी ने पीड़िता के साथ यह क्रूर एवं जघन्य अपराध करने का दुस्साहस किया। अतः आरोपी को कोई भी सहानुभूति नहीं मिलनी चाहिए और उसे इस मामले में सजा मिलनी चाहिए। (उदय बहादुर पुत्र रामदेव बढ़ई बनाम उत्तर प्रदेश , 2005 ) 

प्रमाणित नहीं किया जा सकता जबतक कि उपस्थिति न हो

माननीय न्यायमूर्ति दलबीर भंडारी एवं दीपक वर्मा ने धूर्ततापूर्ण व्याख्या करते हुए कहा कि अट्रोसिटी एक्ट की उपधारा 10 सार्वजनिक स्थल की बात न करके लोकदृष्टि के दायरे के अंदर की बात करती है ,जिसका मतलब होता है घटना के वक्त जनता की उपस्थिति आवश्यक है और कोई भी आरोप पर संज्ञान तब तक नहीं लिया जा सकता जब तक कि उस घटना का कोई चश्मदीद गवाह न हो। (अस्मतुन निशा बनाम आंध्र प्रदेश ....अपराधिक अपिल संख्या 766, 2011) 

न्यायमूर्त्ति भंडारी के इस फैसले का आधार केरल उच्च न्यायालय का फैसला (ई. कृष्णण नैनार बनाम एम. ए. कुट्टापन एवं अन्य जिसमें यह बताया गया कि उपधारा 10 के तहत अवमानना तभी की जा सकती है जब वह (जिसके खिलाफ अवमानना की गई हो) उपस्थित हो,  जिसका आधार है लोकदृष्टि के दायरे के अंदर की कोई भी जगह है। (1999 ) संक्षेप में कहा जाये तो जनता के बीच बिना उस आरोपी की उपस्थिति के जिसने यह अपराध किया है, क्या  प्रमाणित  किया जा सकता है? 

 सर्वोच्च न्यायालय की क्या महान व्याख्या!

विरले ही उदाहरण मिलेंगे जिसमें उच्च न्यायलय से लेकर सर्वोच्च न्यायलय ने किसी अपराध की जमीनी व्याख्या की हो। और तो और न्यायालय ने गरीब पीड़ितों पर यह साबित करने का बोझ डाल दिया कि उसका बलात्कार केवल इसलिए हुआ कि वह दलित है। कानून की इससे घटिया प्रक्रिया और क्या हो सकती है! न्यायालय  को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय के समझ चुनौतियों का सामना करते हुए कानून की जमीनी व्याख्या की जानी चाहिए। संवैधानिक सपने एवं जमीनी वास्तविकता के मद्देनजर हमें यह भी याद करने की जरूरत है कि यह शोषण शाश्वत नहीं है और ऐतिहासिक बदलाव की प्रक्रिया में दासता की बेड़ियां ध्वस्त होंगी। दलित समाज में निचले पायदान पर नहीं रहेंगे। जाति व्यवस्था को ध्वस्त करते हुए अस्पृश्यता का खात्मा एक दूभर सपना हो सकता है लेकिन शिक्षाप्रतिरोध एवं सामाजिक चेतना निश्चय ही दलितों को इतना सबल बनायेगी कि वे आर्थिक एवं राजनैतिक सत्ता पर समान दावा प्रस्तुत करेंगे।
हाल के इतिहास में दलितों ने कुछ राज्यों में राजनीतिक सत्ता पर कब्जा किया है लेकिन उच्च जातियों के बदले एवं कुण्ठा की भावना से उन पर एवं उनकी महिलाओं पर उत्पीड़न बढ़ा है। यह और भी ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण है कि दलितों की रक्षा एवं न्याय के लिए दलितों के नेताओं ने उचित कदम नहीं उठाया है क्योंकि गरीबों में भी गरीब की पुकार बदलाव में खो गई है। यहां दलित भाईयों एवं बहनों के दुःख दर्द को तथ्य एवं आकड़ों के आधार पर अलग से व्याख्यायित करने की जरूरत नहीं है।
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