न्यायपालिका में मौजूद जातिवादी मानसिकता - अरविंद जैन

प्रो. परिमला अंबेकर
अध्यक्ष, हिन्दी विभाग 
गुलबर्गा विश्वविद्यालय, गुलबर्गा 
 ‘भारतीय समाज में दो तरह की संस्कृतियां मौजूद रहीं हैं, ब्राह्मणवादी और लोक संस्कृति। पहली सतावाद और यथास्थितिवाद को बनाये रखना चाहती है। उसके पास देश की पचास प्रतिशत संपदा पर कब्जा है, शिक्षा, विज्ञान, तकनीक आदि सभी माध्यमों में। दूसरी संस्कृति सदियों से जातिवाद के विरोध में संघर्ष करती रही है। वह भारत को उन्नत लोकतंत्र में तब्दील होते देखना चाहती है। आदिवासी, दलित और ओबीसी इसका आधार क्षेत्र है।’ उक्त बातें दलित स्त्रीवादी सुजिता पारमिता ने कही। वे गुलबर्गा विश्वविद्यालय, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर एवं स्त्रीकाल पत्रिका के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी को संबोधित कर रही थी। ‘स्त्रियां और भागीदारी’ नामक यह सेमिनार गुलबर्गा विवि के सेमिनार हाल में दिनांक 25-26 मार्च को तीन सत्रों में समपन्न हुआ, जिसे लगभग दो दर्जन वक्ताओं ने अपने हस्तक्षेप से एक जीवंत मुकाम तक पहुंचाया।
उद्घाटन सत्र में मंच पर आसीन वक्तागण।

सेमिनार में उपस्थित श्रोतागण।
कार्यक्रम का उद्घाटन कुलपति प्रो. ईटी पुट्टय्या के द्वीप प्रज्जवलन के साथ हुआ। उन्होंने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण सच है कि दक्षिण वालों के प्रति उत्तर वालों का नजरिया भेदभाव का रहा है। स्वागत भाषण करते हुये प्रो. परिमला आंबेकर ने अर्ज किया कि दक्षिण की भाषाई कमजोरियों को नजरअंदाज करें तो उनके लेखन की अपनी एक अलग जमीन रही है। संगोष्ठी में इस मौके पर ‘द्वैतानुबंध’ एवं ‘प्रतिबद्धता एवं प्रतिबंध’ नामक पुस्तक का लोकार्पण उक्त लोगों के अलावा नीलिमा सिंहा, ओम थानवी एवं संजीव चंदन ने संयुक्त रूप से किया। संगोष्ठी के पहले सत्र में ‘स्त्री सत्ता एवं भागीदारी: यथार्थ व विभ्रम’ में बीज वक्तव्य में कथाकार अर्चना वर्मा ने स्त्री असमानता के मानकों की चर्चा करते हुये समय, राजनीति और संस्कृति की चर्चा की। कहा कि मिथक और पुराण किसी संस्कृति के अंतःकरण कहे जाते हैं लेकिन उसके सारे प्रतीक स्त्री विरोध के बुनियाद पर टिके हैं। मुख्य अतिथि ओम थानवी ने स्त्री प्रतीकों की व्याख्या में अंतर्निहित अप्रोच का संदर्भ दिया। साथ ही, यह भी दलील दी कि दलित और सवर्ण स्त्रियों का विभाजन ठीक नहीं है। श्रीनिवास सिरनूकर ने हालिवुड फिल्मों के बहाने दक्षिण और उत्तर भारत की सांस्कृतिक एकसूत्रता की बात कही। संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुये नीलिमा सिन्हा ने माना कि प्रतिनिधित्व का सवाल स्त्री के संदर्भ में बहुत मौजू है क्योंकि स्त्री के बारे में हर तरह की राय का निर्धारण पुरुष सत्ता ही करती रही है। वैवाहिक विज्ञापनों की चर्चा करते हुये उन्होंने कहा कि यह अंततः पितृसत्तात्मक समाज की ही उपज है। महाभारत का स्त्रीवादी पाठ करते हुये उन्होंने कहा कि स्त्री सत्ता के मूल्यांकन की बात करेंगे तो अकादमिक जगत को परेशानी होगी ही।
संगोष्ठी के दूसरे सत्र में उपर्युक्त विषयों से उपजे सवालों पर बहुत ही सार्थक हस्तक्षेप ‘साहित्य, कला और स्त्री का योगदान:स्पेस की भागीदारी’ नामक सत्र में हुआ। इस सत्र की अध्यक्षता हेमलता माहेश्वर ने कहा कि समाज की सभी संस्थाओं में आज भी स्त्रियों की उपस्थिति निराशाजनक है। उन्होंने कहा कि स्त्रियों को मिथकों और प्रतीकों को तोड़ना चाहिये और जिस संविधान ने हमें मनुष्य बनना सिखाया है, उसके प्रति हमारा नजरिया किसी भी धार्मिक प्रतीक के समानान्तर अधिक आदर वाला होना चाहिये। प्रसिद्ध लेखक ने मोहनदास नैमिशराय ने कहा कि पूरा दलित स्त्री जीवन यहां की सवर्ण स्त्रियों के लिये रा मैटेरियल की तरह है। यह दुखद है कि अभी भी महिलाओं में एक आंतरिक गुलामी टूट नहीं रही है। सवर्ण समाज की महिलाओं को दलित समाज का परिवेश और भाषा की समझ होनी चाहिये। प्रो. परिमला अंबेकर ने कहा कि श्रम एवं भोग में भी स्त्रियों की समान भागीदारी आवश्यक है।

मंच पर आसीन जयश्री राय, हेमलता माहेश्वर, मोहनदास नैमिशराय और सुजाता पारमिता।
 संगोष्ठी का तीसरा सत्र ‘भाषा, संवाद और मीडिया’ विषय पर एकाग्र रहा। इसकी अध्यक्षता कानूनविद् अरविंद जैने ने की। एक्टीविस्ट पत्रकार निवेदिता ने कहा कि दुनिया में ऐसी कोई भाषा विकसित नहीं हुई जहां लैंगिक विभेद न हो। उन्होंने समाचार माध्यमों में प्रकाशित खबरों और लेखों के हवाले से बताया कि वहां गहरा स्त्री विरोधी स्वर मुखर है। शैलेन्द्र सिंह ने कहा कि स्त्रियों की भागीदारी की बात करते हुये हिस्सेदारी, साझेदारी, समझदारी और कल्याणकारी इन चार चीजों को ध्यान में रखना चाहिये। ज्योति कुलकर्णी ने कहा कि स्त्रियों के पास संकट तो है लेकिन समाधान का सूत्र भी वही से निकलना है। जाहिर है कि इसके लिये समाज के विभिन्न पायदानों पर बड़ी संख्या में स्त्रियों की उपस्थिति हो।
पने अध्यक्षीय उद्बोधन में अरविंद जैन ने न्यायपालिका में मौजूद लैंगिक असमानता और जातीय विभेद के कारणों को रेखांकित किया। कहा कि इन कानूनों में आज भी अंग्रेजी का वर्चस्व है जिसे इन अंग्रेजीदा लोगों ने लूट का पर्याय बना रखा है। उन्होंने कहा कि आजादी के पहले से स्त्रियों के प्रति न्यायपालिका का नकारात्मक सोच बना हुआ है, ज्यादातर कानून आज भी अठारह सौ साठ-सत्तर वाले ही हैं। उन्होंने यह भी बताया कि सामंतवादी सोच के लोगों के लिये इन कानूनों में कई चोर दरवाजे हैं। उन्होंने वेश्यावृति, भु्रणहत्या, दहेज हत्या और बाल विवाह से जुड़े कानूनों को निशाने पर लेते हुये कहा कि यह दुखद है कि इन जघन्य अपराधों के लिये आज तक किसी को फांसी की सजा नहीं हुई। उन्होंने आरक्षण का दलित, स्त्री और आदिवासी के हितों में सही अनुपालन नहीं किये जाने की सबसे बड़ी वजह न्यायपालिका में मौजूद जातिवादी मानसिकता को बताया। सेमिनार में सांस्कृतिक संध्या के दौरान कलकता के रोनिन चक्रवर्ती और विवि के विधार्थियों ने माइम की प्रस्तुति दी।
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