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वर्जिनिटी का नहीं है सवाल … सवाल ना का है . !

प्रो परिमळा अंबेकर


‘‘व्हेन यू लास्ट युवर वर्जिनिटी … जोर -जोर से वकील साब अपने क्लाइंट से पूछे जा रहे थे । और इस सवाल पर क्लांइट तो क्या उस कोर्टरूम का हर बंदा, यहॉ तक कि जज साब भी हक्का-बक्का थे… वकील के इस प्रश्न पर … लडकी विविश होकर पिता की ओर देखती है . पिता …हताश, बेटी के दिये जानेवाले उत्तर को सुनने की पीडा से मुक्ति चाहते हुए … कोर्टरूम से उठकर चल पडता है । सिनेमा का मुख्य किरदार, वह लडकी, जिसने अपने को बचाने के लिये गिलास का बोतल हवश से पीड़ित  लडके के सरपर दे मारा था, अपनी वर्जिनिटी के खोने का पहला रपट वकील और जज साहब के सामने बयान करती है … ”

 पिंक का क्लाइमैक्स और एंड, एक दूसरे में अंतर्भूत होकर प्रस्तुत होते हैं । और इस क्लाईमैक्स का पहला पडाव तब शुरू होता ,है जब अद्भुत नाटकीय और निर्विकार शैली में वकील दीपक सहगल, कटघरे में खडे मीनल अरोरा से पूछता है ‘‘ बताइए मीनल अरोरा, क्या आप वर्जिन है , हॉं या ना में जवाब दीजिये, डोंट शेक योर हेड ‘‘ मीनल के ना कहते ही बंदूक की नली से निकली गोली सा दूसरा प्रश्न करता है सहेगल .. ‘‘ देन व्हेन यू लॉस्ट योर व्हर्जिनिटी …वॉट वाज योर येज .. ” लडकी उत्तर में अपने बालिग होने की उम्र को बताती है । अनिरूद्ध रॉय चौधरी द्वारा दिग्दर्शित सिनेमा ‘पिंक’ के कोर्टरूम ड्रामा में गुंथे गये संवादों का गुंथन, धीरे धीरे स्त्री की व्यवहार स्वछंदता को, अपने जीवन के निर्णय को खुद लेने की उसकी सामाजिक स्वतंत्रता को  स्क्रीन पर  दर्शकों के सामने कलात्मकता से स्पष्ट रूप देता है।

कोर्टरूम के संवाद भारतीय समाज में स्त्री के प्रति  लगभग नकारात्मक वातावरण की भीषणता का पर्दाफाश करते हुए, स्त्री स्वछंदता और उसकी मानवीय जीवन की मुक्त खुले वातावरण की मांग की सकारात्मक सोच को प्रस्तुत करते हैं । और इसके लिये आवश्यक पुरूष मानसिकता के बदलाव की नीति को भी सम्मुख रखता है । जैसे कि … वकील का पूछना, 1 क्या आपने शराब पी रक्खी थी, 2 सभ्य घरकी लडकियॉं शराब नहीं पीती, 3 आप रोज कितन बजे घर लौटती हैं, 4 देर रात लौटना, अच्छे लक्षण नहीं,  5 आप साथी लडको से हॅंस-हॅंस कर बात करती है , उन्हें छू छू कर बोलती हैं, 6 नहीं हॅंसना लडकों को छूना …बस वे औरतें हीं करती हैं जिन्हें अपना जिस्म बेचना होता है …7 जो अपने हॅंसी के बदले पैसे मॉंगती वसूलती हैं 8 और सबसे अहम सवाल है लडकी के यौनिकता का,  पवित्रता का … वकील प्रश्न को व्यंग्यात्मक अंदाज में पूछता है, जैसे वह कह रहा हों ‘‘ समाज पूछना चाहता है मिस् अरोरा कि आपके वर्जिनिटी का अधिकार तो उनके हाथों है, आपको किसने दिया अधिकार उसे खोने का… समाज और धर्म की बपौती को आप कैसे बिना अनुमति के लाइसेंस के उसे खो सकती हो मिस मीनल .. ? आदि…आदि …

कारण पिंक सिनेमा,  कबीराना अंदाज की सृजनात्मक सिनेमिक प्रक्रिया है, जहॉं    कबीर अपने दर्शन की बारीकी को कहने के लिये उलटबासी रचता है, कहता है,  ‘‘बरसे कंबल भीजे आकासा …  ”

फिल्म का उद्देश्य है 
1 स्त्री की यौन-स्वतंत्रता के प्रति समाज की सहज मानसिकता का बनना , 2 देहउपभोग को लेकर उसकी अपनी खुद की इच्छा अनिच्छा को भी समाज का उसी अंदाज में स्वीकार करना, जैसे कि पुरूष की इच्छा अनिच्छा को सदियों से करते आया है , 3 उसकी ना में पुरूष को अपनी अहं की क्षति या चुनौती न देखकर, सहजीवन के दूसरे हिस्से की मान्यता के रूप में देखना  … 4 यौन उपभोग के दूसरे हिस्से का स्त्रीदेह , चाहे प्रेमिका का क्यूॅं न हो, सहजीवन को स्वीकार कर जी रही मेट्रो कल्चर की औरत ही क्यूॅं न हो , मुक्त स्वछंद पसंदीदा शैली में अपने को गढने वाली इक्कीसवी सदी की लडकी ही क्यूॅं न हो, पैसा देकर खरीदा गया वैश्या स्त्री देह ही क्यूॅं न हो या ..या ..उपभोग के लिये मिली हुयी वैवाहिक शास्त्र प्रदत्त धर्मपत्नी ही क्यूॅं न हो… !! उसकी ना को सुने ,गुनना और मानना ।

वकील का पुरूष होना या स्त्री का होना जैसे आयाम यहॉं मायने नहीं रखते , मुद्दा सोचने का यह है कि, सिनेमा पिंक अपने तहत स्त्री से बिंधे गये वर्जिनिटी के सवालों से भी ऊपर उठकर ,देहशुद्धता के सवालों को लांघकर, देहस्वछंदता की उसकी अपनी स्वतंत्रता के प्रश्नों को पुराना बताती है । देहभोग की उसकी अपनी इच्छा और अनिच्छा के अत्यंत ही वर्जिन प्रश्न को बडे ही सलीके से प्रेषित करती  है। देहसंबंधों को बनाने की उसकी अपनी मानसिकता , उसकी अपनी संवेदना को,  पुरूष समाज द्वारा स्वीकार किये जाने की अत्यंत ही मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक सवाल को ‘पिंक‘ , सिनेमा के परदे पर उकेरती  है ।

पिंक के माध्यम से मैं उन फेमिनिस्ट राय पर आपत्ति  करना चाहती हूॅं जो, जेंडर विमर्श के निर्णयों को स्त्री और पुरूष के किरदारों में बॉंटकर देखते हुये,पारंपरिक पुरूषवादी वर्चस्व संस्कृति के विरोध की अपनी बनी बनायी खांचे से बाहर आ नहीं पा रही हैं।

रितेश शाह के उठाये इस कदम में हम विमेन क्राइम के विरूद्ध में , समाज में नयी और सहज सोच को बनाने के पीछे की लेखकीय सरोकार को देख सकते हैं । कुछ और मुद्दे जो कोर्टरूम संवादों में उभरे थे,  1 नार्थइस्ट बेल्ट की जातीय व्यक्तित्व के प्रति देश का प्रिजुडाइ्ज्ड मानसिकता का बना बनाया नमूना… इनके साथ क्या यार सबकुछ चलता है … 2 भारतीय मर्द की मानसिकता, जो घर की औरत को अपनी मर्यादा और खानदानी मान का हिस्सा माने और बाहर की औरतें … होती ही हैं उपभोग की वस्तु, पुंसवादी वर्चस्व के सामने झुकनेवाली अदली …बंदी… और क्या कुछ नहीं … ! इसीलिये , स्त्री की ओर से ना का सुनने के लिये केवल पुरूष वर्ग को नहीं संपूर्ण भारतीय समाज की मानसिकता को बदलना पडेगा । स्त्री से कहा गया ना, एक व्यक्ति की सहज प्रतिक्रिया बननी है न कि कोयी प्रतिष्ठा या चैलेंज का प्रश्न बने । स्त्री और पुरूष के व्यक्तित्व की स्वीकृति जबतक  समान भावबोध के और मानसिकता के धरातल पर नहीं होगी  तब तक अपना समाज स्त्री के नकार को या ना को प्रेस्टीज  इश्शु मानेगा , अपना अपमान मानेगा ।

किसी ने सही कहा, ‘‘ पिंक सिनेमा नहीं, एक मूवमेंट है .., स्त्रीअपराध के विरूद्ध लडना है तो बस माइंडसेट को बदलना है । ‘‘ इस माइंडसेट का बदलाव रखता है भारतीय  स्त्री भी पुरूष भी । जैसे पिंक सिनेमा का किरदार फलक के  पति के कहनेपर कि ‘‘… मीनल की तो बात और है तुम भी फलक ऐसी भी क्या एंजाइमेंट है … ‘‘ फलक बिना कुछ कहे सीधे बाहर निकल पडती है । फलक और एंड्रिया का स्टैंड निर्णायक है, बदलाव की दिशा में ।

और भी बहुत कुछ अंश है पिंक के जिनपर भी चर्चा जरूरी है … । 


लेखिका गुलबर्गा विश्वविद्यालय गुलबर्गा में हिन्दी की प्राध्यापिका हैं. संपर्क: parimalaambekar@yahoo.in

जाघों से परे ‘पार्च्ड’ की कहानी: योनि नहीं है रे नारी, वह भी मानवी प्रतिष्ठित

संजीव चन्दन 


रिहाई के 3 दशक बाद


8 वें दशक में अरूणा राजे की फिल्म थी रिहाई. यह फिल्म प्रवासी मजदूरों के गांव में पीछे छूट गयी पत्नियों की कहानी है. प्रवासी मजदूर घर की आर्थिक रीढ़ हैं, उनके भेजे पैसों से घर चलता है. घर और पत्नी से दूर रहते हुए वे अपनी यौन जरूरतों की पूर्ती के लिए कोठों पर जाते हैं. इस बीच लगभग महिलाओं और पीछे छूट गये बच्चों और बूढ़ों के गांव में नासिरूद्दीन शाह के रूप में एक युवक आता है, जो एक- एक कर सभी महिलाओं, छूट गई पत्नियों को शिड्यूस करता है, सहमति से या थोड़ी जबरदस्ती कर, वह सब के साथ संबंध बना पाने  में सफल होता है. फिल्म का अंत प्रदेश से वापस आये पति (विनोद खन्ना) और विवाहेत्तर यौन संबंध बना चुकी पत्नी ( हेमामालिनी) के बीच ‘स्त्रीअधिकार’ संबंधी बहस के साथ होता है और साथ ही पति के मान जाने के साथ भी. पूरी फिल्म एक बाहरी, शहरी और कुलीन दृष्टि से बनी फिल्म है. कथानक और दृश्य संयोजन की दृष्टि से भी- ग्रामीण महिलाओं के यौन संबंधों पर कुलीन कल्पना की चरम उपस्थिति है एक महिला के साथ मिट्टी के गड्ढे में सेक्स, जहां वह मिट्टी काटने जाती है. रिहाई के पात्रों का सामाजिक परिवेश भी स्पष्ट है. प्रवासी पति लकड़ी का काम करते हैं- कारीगरी और मजदूरी, पत्नियां गांव में श्रमकार्य करती हैं- इस परिवेश के साथ जाति लोकेशन भी प्राय: स्पष्ट है.

उसके लगभग तीन दशक बाद फिल्म बनी है लीना यादव के निर्देशन में ‘ पार्च्ड’. कहानी का परिवेश ग्रामीण और पात्रों का सामाजिक लोकेशन प्रायः वही, जो रिहाई का है. इस फिल्म की नायिकायें, उनका पति, परिवार और कुनबा गांव में ही रहता है- गुजरात के एक गांव में. घर की आर्थिक गतिविधियां संचालित करती हैं स्त्रियां- एक गैरसरकारी संगठन के लिए सिलाइ, बुनाई,एम्ब्रायडरी का काम करके. मर्द, पति- पुत्र आदि, आर्थिक रूप से महिलाओं पर निर्भर हैं. यह फिल्म उनकी यौनिकता को सहज ढंग से अपने कथानक के केंन्द्र में रखती है-  थोड़ी- बहुत काल्पनिक विसंगतियों के बावजूद इस फिल्म को रिहाई से अलग ‘बाहरी दृष्टि’ से मुक्त कहा जा सकता है, यही फिल्म की खासियत है और सार्थकता भी. अभी विस्तार से इसे समझने के पहले, जरा इसपर भी गौर करते हैं कि यह फिल्म अभी लगभग साथ में बनी फिल्म ‘पिंक’ से अलग और स्त्री की दृष्टि से बेहतर क्यों है?

पिंक से बेहतर क्यों 

पार्च्ड की महिलायें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं, अपने निर्णय खुद लेती हैं और बेटे के इस ललकार को कि ‘देखते हैं बिना मर्द के यह घर कैसे चलता है’  उपेक्षा और आत्मविश्वास से उड़ा देती हैं. जबकि पिंक की नायिकाओं को अपनी एजेंसी नायक के महानायकत्व की पुष्टि के लिए गंवा देनी पड़ती है. पिंक में स्त्री की पक्षधरता के लिए पुरूष का ‘संरक्षक’ अवतार उन्हें अपने पितृसत्ताक डैने में समेट लेता है -उत्पीड़क भी हम, संरक्षक भी हम- पिता रक्षति कौमार्ये, भर्ता रक्षति यौवने.रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा:, न स्त्री स्वातंत्र्यमहर्ति.

योनि नहीं है रे नारी, वह भी मानवी प्रतिष्ठित

पार्च्ड की कहानी सेक्स को धूरी में रखकर घूमती है- स्त्री की यौनिकता के इर्द-गिर्द. शुरू के दृश्यों से ही स्त्रियों के आपसी अंतरंग बातचीत, हंसी- मजाक के परिवेश उपस्थित होते हैं, जिसमें उम्र की सीमायें टूटकर परस्पर साख्य बनता दिखता है. चारो स्त्रियों के जीवन की कहानी उनकी यौनिकता की धूरी से संचालित होती है. सबसे छोटी लड़की ‘जानकी’ जब अपने प्रेम और पढ़ाई को छोड़कर विवाह करके ससुराल में बसने के लिए विवश की जाती है, तो उसका सामना एक ऐसे पति से होता है, जो अपनी ‘मर्दानगी’ की जांच के लिए एक बार ‘यौनकर्मी’ के पास जाता है, तो जाता ही रहता है- विवाह के बाद भी. उसके लिए जानकी का मतलब है- उसकी ‘मर्दानगी’ की परीक्षा का एक और टारगेट- जिसे वह पहली रात में क्षत- विक्षत करता है- भावना और शरीर, दोनो ही स्तरों पर.


दूसरी स्त्री है, जानकी की सास ‘रानी’.अपनी उम्र के चौथे दशक में पहुंची रानी के पास मोबाइल है, जिसपर कोई पुरूष आवाज उसे निरंतर फोन करता है, प्रेम निवेदन करता है. विधवा जानकी पहले तो इस आवाज के प्रति उत्सुक होती है, फिर खिझती है- कोई किशोर समझकर डपटती है और फिर हमउम्र आशिक जानकर उसका निवेदन स्वीकार कर लेती है. रानी अपने विधवा होने के अहसास के साथ अपनी यौन- इच्छाओं के प्रति दोहरे भाव में है. पति, जो अब नहीं है, शराब- हिंसा और सेक्स को एक साथ उसपर इस्तेमाल करते हुए उसकी यौनिकता को कुचल चुका है- जो नियमित तौर पर बाजार की स्त्रियों के पास भी जाता है- रानी अपने बेटे को भी अपने बाप के रास्ते पर जाते देखती है. रानी की यौनिकता का एक और पहलू है, अपनी सहेली ‘लाजो’ के प्रति ‘ साख्य’. पति से प्रताड़ित होकर आई अपनी सखी लाजो के अर्धनग्न शरीर पर मलहम लगाते हुए संकोच के साथ ही सही वह लाजो को अपना ब्लाउज भी उतारने देती है.

तीसरी स्त्री है ‘ लाजो’. लाजो रानी की सहेली है. उसकी कोई संतान नहीं है और जैसा कि इस देश की अधिकांश समझ है , बच्चा नहीं होने के लिए स्त्री ही दोषी होती है- लाजो भी ऐसा ही समझती है. उसका पति भी हिंसक, शराबी है और उसे ‘बांझ’ होने का अहसास देता रहता है. रानी से उसकी दोस्ती प्रागाढ़ है- पति से पीट कर और शरीर पर जख्म लिये जब वह रानी के पास आती है तभी रानी उसके अर्धनग्न शरीर पर कोई लेप करती है, उसके ब्लाउज उतारकर तो वह रानी के ब्लाउज भी उतार देती है- यह उनकी दोस्ती का ऐंद्रिक स्वरूप है. जब उसे यह पता चलता है कि बच्चा न होने के लिए सिर्फ स्त्री ही कारण नहीं होती है,बल्कि पुरूष भी कारण हो सकता है, तो वह पहले तो आश्चर्य से भर जाती है, लेकिन यही जानकारी उसे किसी और पुरूष के पास जाने के लिए प्रेरित करती है, ताकि वह उसके सहवास से एक संतान पा सके.संतान पाने की उसकी कामना इसलिए नहीं है कि वह अपने पति या समाज को बता सके कि वह बांझ नहीं है, या इसलिए भी नहीं कि वह अपने पति का वंश चलाने के लिए प्रतिबद्ध है. बल्कि संतान की कामना उसकी अपनी है- अपने मातृत्व के लिए.

रिहाई का एक दृश्य

वह उस समय और भी अचंभित रह जाती है, जब संतान के लिए किसी तांत्रिकनुमा रहस्यमय पुरूष/प्रेमी के पास एक गुफा में पहुचती है और सहवास के लिए आदतन लेट कर अपने कपड़े पांवों से ऊपर उठाती है, तो पुरूष उसके पैरों पर अपना सिर रख देता है, इस अचंभे के साथ उसकी आंखों में आंसू आ जाते हैं- सम्मान के प्रत्युत्तर में और अपने अस्तित्व के अहसास के साथ. पुरूष आद्यांत चूमता है, प्यार करता है, और कुछ मिनटों के इंटेस ऐंद्रिक दृश्य में वह भी सक्रिय होती है- यौन संबंध में अपनी रूटीन पैसिव भूमिका से बाहर निकलकर. उसे आश्चर्य,दुःख और क्षोभ तब भी होता है, जब वह अपने पति से अपने गर्भवती होने की सूचना देती है- पति उस संतान को अपना नहीं मानता, वह सवाल करती है कि ,’यह गर्भ तुम्हारा क्यों नहीं हो सकता!’ दरअसल उसके पति को यह पता है कि संतान न होने का कारण वह स्वयं है, लेकिन अबतक वह लाजो को इसके ग्लानिर्भाव से भरता रहा था. और अंतत: लाजो का पति अपनी ही क्रूरता की मौत मरता है.

बिजली  गांव में ही नृत्य-नौटंकी कंपनी में काम करती है. वह पहले रानी और फिर लाजो की भी मित्र बन जाती है- धीरे- धीरे इन सबकी नेता भी, सबको अपनी कुंठाओं से बाहर निकालने का मार्ग दिखाती हुई, खुद के लिए भी तय करती हुई. कंपनी में काम करते हुए उसका एक और पेशा वेश्यावृत्ति ( यौनकर्म नहीं) भी है. प्रतिदिन- रात अलग-अलग पुरूषों के साथ उसे जाता हुआ देखने वाला उसका प्रेमी उसे हमेशा महत्वपूर्ण महसूस कराता है. वह अपने अस्तित्व के प्रति विश्वास के भाव से भरे जाती है, जब उसका वही प्रेमी उसकी आंखों की प्रशंसा करता है- पहली बार उसकी देह पर टिकी निगाहों से अलग यह निगाह उसे आह्लादित कर देती है, लेकिन जल्द ही वह ख्वाब से यथार्थ में वापस धकेल दी जाती है, जब उसका प्रेमी उसकी देह के आर्थिक दोहन की भावी योजना उसके सामने रखता है. इस बीच कंपनी में नई लड़की के आने और ग्राहकों के उसपर लट्टू  होने से वह व्यथित है- व्यथा, कुंठा और आक्रोश में ही एक गलत ग्राहक के चुनाव के बाद वह अप्राकृतिक यौन संबंध और सामूहिक बलात्कार का शिकार होती है- इस पीड़ा और अपमान के क्षण में ही उसे अपने प्रेमी का ताना सुनाई पड़ता है- दृश्य में उसका चेहरा नहीं दिखता, वह चेहरा विहीन एक पुरूष मात्र हो जाता है.



बहनचो…. नहीं, भाई चो…..गालियों का उलटा संसार बनाम स्त्री का प्रतिकार….

इन चार स्त्रियों की कहानी, पीड़ा की कहानी, संघर्ष और प्रतिकार की कहानी इनकी यौनिकता के इर्द- गिर्द ही आकार लेती है- क्योंकि आर्थिक रूप से बहुत हद तक स्वतंत्र इन स्त्रियों की पीड़ा और उनके दोयम होने के अहसास देते मर्दवादी वर्चस्व के मूल में इनकी यौनिकता है- लेकिन इनकी दुनिया इससे आगे भी है- इनके यौन- अंगो, इनकी यौन- आकांक्षाओं से आगे, जिसे वे हासिल कर लेना चाहती हैं. लेकिन यह समाज, उसका दैनंदिन, उसकी भाषा उन्हें खीच- खीचकर उन्हें उनके ही यौन अंगों में सिमटा देना चाहता है, उनके अपने ही अंगों से उन्हें डरा देना चाहता है. फिल्म के एक दृश्य में बिजली के नेतृत्व में पार्च्ड की चार नायिकायें न सिर्फ गाड़ी की ड्राइविंग सीट पर बैठकर आजादी के सारे पर निकलती हैं, बल्कि आजादी की आवो- हवा में सांस लेते हुए इस समाज के द्वारा अपने लिए तय दायरे और अपने के खिलाफ उसके भाषाई आतंक का प्रतिकार करती है- स्त्रियों को केंद्र में रखकर बनी गालियों को उलट कर गालियां रचती हैं, मर्दों को केंद्रित गालियां.

साख्य का साहस: सास- बहु का याराना 

हवाखोरी के इस सैर का सबसे बड़ा हासिल है, दो पीढ़ियों का आपसी साख्य- सास- बहु का याराना. रानी अपनी बहु जानकी को अपने बेटे के लिए चुन कर लाई है. उससे प्यार करती है, और परंपरा निभाती हुई उसपर शासन भी. वह चाहती है जानकी उसके बेटे को संभाल ले इसलिए उसपर खीझती भी है, लेकिन बेटे और अपने मृत पति का साम्य देखते हुए उसके प्रति सहज संबंध भी महसूस करती है. हवाखोरी के लिए निकलते हुए जब जानकी भी उसके साथ ले आयी जाती है, तो सहजता और भी स्पष्ट होती है- जिसका अंतिम प्राकट्य है अपनी बहु के साथ उसका खड़ा होना, बेटे के घर छोड़ने और उसकी धमकी के दौरान जानकी का ढाल बन जाना और अंतत: अपनी बहु का उसके प्रेमी से विवाह करा देना, इस हिदायत के साथ कि इसे पढ़ाना जरूर .



‘ हां, कहने के साहस से ही ना कहने की ताकत आती है:

फिल्म की तीनो नायिकायें अपनी उम्र के ऐसे पड़ाव पर हैं, जहां उन्हें उनके रिटायर होने, एक उम्र जी लेने का अहसास घेर लेता है उन्हें- उम्र के चौथे दशक के आस- पास. इस उम्र की शहरी मध्यवर्गीय महिलायें अपनी जिंदगी दी लेना चाहती हैं, हाल ही में इस वर्ग से रचना कर्मियों ने चालिस की औरतों पर कवितायें लिखकर इस उम्र का उत्सव मनाया, लेकिन यह सुविधा इन नायिकाओं को नहीं है. बिजली को उसके स्टेज और उसके व्यवसास से उसका रिटायरमेंट उसे साल रहा है, तो रानी अपने अकेलेपन और अपनी उम्र से आक्रांत है. उसकी आक्रांतता फोन पर उससे आशिकी का इजहार कर रहे गुमनाम आशिक पर प्रकट होता है, जब बिना उसे देखे- जाने उसे लगता है कि वह कहीं चालीस पार और छेड़ने वाला कहां 16- 17 का लड़का- वह उस पर खीझती है, इसके बावजूद कि वह चाहती है कि कोई उसे प्यार करे. आगे चलकर अपने आशिक को वह हां कहने का साहस कर पाती है. और यही हां कहने  का साहस पैदा कर लाजो जान पाती है कि वह भी मां बन सकती है. हां कहने के साहस के बाद ही फिल्म की नायिकायें पूरे मर्दवादी समाज को समवेत ना कहने का साहस कर पाती हैं- यह ना कहने का सबसे बड़ा साहस है, जो पिंक के नारेनुमा ना से बड़ा है- संरक्षकत्व में ना कहने से ज्यादा बड़ा – फिल्म का सबसे बड़ा कथन है -‘ मर्द नहीं इंसान बनना सीख.’ मर्द के आदमी न बनने तक यह समवेत ना ज्यादा पावरफुल है- पार्च्ड का वह ‘ ना’ भी ज्यादा असरकारी है पिंक की कचहरी में ना के ड्रामे से ज्यादा, जब बिजली अपनी आंखों के रास्ते दिल में उतरने वाले प्रेमी का असली मकसद जानती है और ना कहती है.

पार्च्ड एक फिल्म के रूप में, एक टेक्सट के रूप में अपने चरित्रों के बेहद करीब है. आर्थिक रूप से आंशिक तौर पर स्वतंत्र ग्रामीण महिलाओं के यथार्थ पर अपना बाहरी नजरिया नहीं हावी होने देती, जैसा कि रिहाई के मामले में अपनी सदिच्छाओं के बावजूद यह संभव नहीं हो पाया था- यह फिल्मकारों की दृष्टि और विषय से ट्रीटमेंट का भी अंतर है. फिल्म में स्पष्टत: तो सामाजिक लोकेशन का जिक्र नहीं है- लेकिन परिवेश नायिकाओं के लोकेशन का संकेत जरूर दे रहा है. इस सामाजिक लोकेशन की स्त्रियों पर बात होना अभी शेष है- इस लोकेशन की महिलाओं की आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक स्थितियों पर शोध अभी शेष है.

पार्च्ड की कहानी उसी समाज के एक बड़े हिस्से का यथार्थ है, जहां ब्राह्मण,क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र होना रंगों से भी तय होता है- जहां इसी फिल्म में रानी की सशक्त भूमिका निभा चुकी तनिष्ठा चटर्जी से उसके काले रंग पर तंज किया जाता है और उसकी जाति और उसके कलर का कांबिनेशन का विमर्श किया जाता है!

किस हाल में हैं बोधगया भूमि मुक्ति आन्दोलन की जमीन मालकिनें !

संजीव चंदन 


वह इस माहाद्वीप का पहला भूमि आन्दोलन माना जाता है , जिससे मुक्त हुई जमीनों के  आधिकार महिलाओं ने अपने लिए भी प्राप्त किये . ७वें ८ वें दशक का यह आन्दोलन एक नजीर बना महिला आन्दोलनों के लिए कि कैसे विपरीत परिस्थितियों में भी महिलाओं के आर्थिक अधिकार हासिल किये जा सकते हैं . बोधगया का यह भूमि मुक्ति आन्दोलन यद्यपि महिला आन्दोलन की अगुआई में नहीं जयप्रकाश नारायण के आन्दोलन से पैदा हुआ ‘युवा संगठन ‘ संघर्ष वाहिनी’ ने की थी . जमीन का मालिकाना हक़ प्राप्त महिलाओं की क्या है वर्तमान स्थिति !  स्त्रीकाल  के लिए एक रपट 
किस हाल में हैं जमीन की मालकिनें 


जब मैं उस इलाके में गया तो एक पूर्व धारणा लेकर गया था कि जमीनें मूल मालिकों के हाथ से निकल गई हैं . संघर्ष वाहिणी के नेता कारू हालांकि सूचित कर देते हैं कि यह आंशिक सच है , २५% तक जमीनें जरूर निकल गई होंगी , लेकिन वे सब किसी न किसी मजबूरी में , बीमारी या शादी –विवाह में . महिलाओं ने अधिकाँश जमीनें बचा रखी हैं, पुरुषों के हाथ की जमीनें शराब आदि की आदतों के कारण भी निकली हैं . कोसा बीजा पंचायत की पार्वती देवी को दो बीघा जमीन मिली थी . खेत के पास ही उन्होंने अपना छोटा सा घर बना रखा है . उनके खेत धान के पौधों से लहलहा रहे हैं. चार बेटों में से एक मकान बनाने का कारीगर है और बाकी खेतों में काम करते हैं . इस इलाके में जमीन की कीमत प्रति बीघा १ करोड़ से भी अधिक हो चुकी है . पार्वती देवी कहती हैं , ‘ जमीन इज्जत होती है , उसे मैं किसी सूरत में नहीं बिकने दूंगी . पार्वती देवी ने इस आन्दोलन में बढ़ –चढ़कर हिस्सा लिया था .

पार्वती देवी



शंकर मठ के खिलाफ था आन्दोलन


बोध गया का शंकर मठ उस इलाके में हजारो एकड़ जमीन का जमींदार हुआ करता था. इस मठ को १५० से एकड़ जमीन दी थी शेरशाह सूरी के वंशज ने , जिसके बाद इसका मालिकाना फैलाव ३० हजार एकड़ से अधिक खेती और गैर खेती की जमीनों तक होता गया था. इलाके के दलित , खासकर भुइयां ( मुसहर ) जाति के दलित मठ की जमीनों में बंधुआ मजदूर की तरह काम करते थे. शेरघाटी , बाराचट्टी , बोधगया और मोहनपुर प्रखंड में मठ ने अपनी ‘ कचहरियाँ’ बना रखी थी , जो इन मजदूरों पर नियंत्रण का काम करती थी . इसी भूमिहीन मजदूर जाति के स्त्री पुरुष इस आन्दोलन में हरावल की तरह शामिल हुए. ७वें दशक के प्रारम्भ में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ( सी पी आई ) ने मठ की जमीनों की हदबंदी और भूमिहीनों में उसके वितरण के सवाल पर आन्दोलन शुरू किए. इस आन्दोलन में सी पी आई के एक नेता ‘ चुरामन माली’ की ह्त्या हो गई . बाद में भूमि मुक्ति के इस  आन्दोलन को दो  चरणों में जयप्रकाश नारायण के अनुयाइयों ने नेतृत्व दिया . पहले चरण में जे. जगन्नाथन और उनकी पत्नी कृष्णम्मा ने लोगों को संगठित किया , लेकिन अंतिम निर्णायक लड़ाई लड़ी गई १९७८ के बाद संघर्ष वाहिनी के नेतृत्व में. सालों चली इस लड़ाई में मठ की कचहरियाँ तोड़ दी गई . ८ अगस्त १९७९ को आन्दोलनकारियों पर पुलिस ने गोली चलाई , जिसमें पाचू मांझी और राम देव  मांझी की हत्या हो गई . १९८१ में लगभग १,५०० एकड़ जमीन बांटी गई ,  बाद में और भी किस्तों में बंटी, और अंततः १९८७ में तत्कालीन मुख्यमंत्री बिन्देश्वरी दुबे के समय में ३५,००० बीघा  जमीन भूमिहीनों में बाँट दी गई.

मांजर देवी , आन्दोलन की एक स्थानीय नेता

आसान नहीं थी डगर महिलाओं के लिए


इस आन्दोलन में बड़ी संख्या में महिलाओं की भागीदारी थी . आन्दोलन के एक नेता उपेन्द्र सिंह कहते हैं , ‘ हमलोग महिलाओं को आगे रखते थे . यह रणनीति थी . सरकार और मठ ताकि आन्दोलनकारियों पर हमले का आरोप लगा कर उनका दमन न कर सकें, लेकिन इससे ज्यादा महत्वपूर्ण था कि महिलाओं ने इस आंदोलन को नेतृत्व दिया था .’ जब जमीन के पट्टे लिखे जाने लगे तब महिलाओं ने सवाल खड़े किये कि यह जमीन सिर्फ पुरुष भूमिहीनों को क्यों दिए जाये ? इस सवाल के बाद उन्हें समाज के पुरुष वर्चस्व से दो –चार होना पडा . उन्हें जवाब मिला कि जमीन परिवार के मुखिया को ही दिए जायेंगे , जो कि पुरुष होता है . दवाब डाले जाने पर अधिकारियों ने धमकी दी कि जमीन किसी को नहीं दी जायेगी. १९८२ में शेरघाटी के प्राशास्कों का महिलाओं ने घेराव किया और अपनी बात रखी.

पार्वती देवी का घर



यद्यपि संघर्षवाहिनी के पुरुष आन्दोलनकारियों ने महिलाओं के हक़ में राय दी लेकिन स्थानीय विरोध प्रबल  था. तर्क दिया गया कि महिलायें खेत नहीं जोत सकती हैं. महिलाओं ने जवाब दिया कि रोपने –काटने –ओसाने का काम महिलायें करती हैं . एक विचित्र प्रसंग १९८५ में आया जब बैंक  एक स्कीम के तहत बैल खरीदने के लिए ऋण दे रहे थे . समाज के पुरुषों ने कहा कि महिलाओं के नाम से जमीन के पट्टे होने से दिक्कत आती है कि वे बाहर नहीं जा सकती हैं. महिलाओं ने व्यंग्य किया कि फिर हम खेतों में काम करने कैसे जाती थीं .

सर्वोदयी गाँव के बच्चे




मांजर देवी आन्दोलन पर एक सवाल !


इस आन्दोलन की जुझारू नेता थीं पीपरघट्टी की मांजर देवी . भुइंया जाति की यह जुझारू महिला उनदिनों सुर्ख़ियों में रहती थीं –देश –विदेश के मीडिया माध्यमों में . इन्होने महिलाओं को जमीन का हक़ दिलवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी . आज चलने से लाचार मांजर देवी की हालत बदहाल है . उन्हें आन्दोलन से मुक्त हुई जमीन नहीं मिली थी क्योंकि वे इस आन्दोलन में प्रमुख भूमिका में थी इसलिए जमीन पर दूसरों का दावा पहले होने दिया . उन्हें दो बीघा जमीन मिली भूदान में . नेता होने के कारण आस पास के दबंगों ने इन्हें निशाना बनाया . इनके पूरे परिवार पर डकैती का केस दर्ज करवा दिया गया . वे कहती हैं , ‘ ऐसा आन्दोलन के कमजोर होने पर हुआ . मेरी अधिकाँश जमीनें केस मुकदमे में निकल गई. धनवाद से अंजलि जी मिलती हैं और कोइ  नहीं . तब भी मुझे उस आन्दोलन में होने का गर्व है.’ संघर्ष वाहिणी की तत्कालीन नेता और धनवाद महिला मंच की अंजलि कहती हैं , ‘ मैं ८ अगस्त को गई थी . मांजर जी से भी मिली . हम चाहते हैं कि वहाँ एक केंद्र खोला जाय ‘ जयप्रभा’ ( जयप्रकाश और प्रभावती के नाम पर )  नाम से ताकि लोग जनोन्मुखी कामों से जुड़ें .

भुइंया जाति की नई पीढी

जहां २ बीघा  से ५ बीघा  हो गयी जमीन 


बोधगया इलाके में एक गाँव ऐसा भी है , जहां के पूर्व भूमिहीनों ने प्राप्त दो बीघा जमीन को ५ बीघा बना लिया . मूलतः खेत मजदूर रहे इस जाति की मेहनत का फल है सर्वोदयपूरी कोशला नाम का यह गाँव . यद्यपि इन्हें जमीने भूदान में मिली थी , आन्दोलन में नहीं, लेकिन मेहनत से आज अधिकाँश लोगों ने अपनी जमीनें बढ़ा ली . देश भर  में सभी भूमिहीनों को ५ एकड़ जमीन के लिए  मुहीम छेड़ने की घोषणा करने वाले आर पी आई के नेता रामदास आठवले कहते हैं , जमीन एक बड़ी ताकत होती है . आज भी यह उत्पादन का सबसे बड़ा क्षेत्र है. महाराष्ट्र में और बाद में बोधगया में भूमिहीनों को मिली जमीनों ने असर दिखाना शुरू कर दिया है .’ हालांकि एक फर्क है बोधगया और महाराष्ट्र में . बोधगया के इलाके में इन दलितों ने शिक्षा पर जोर नहीं दिया , इलाके से अफसर तो दूर कोइ ढंग की सरकारी नौकरी में नहीं है , जबकि महाराष्ट्र के दलितों ने शिक्षा को सबसे पहले प्राथमिकता दी .

पिंक के बहाने ‘अच्छी औरतें’ और ‘बुरी औरतें’

डिसेन्ट कुमार साहू


पी.एच.डी समाजकार्य
ई-मेल – dksahu171@gmail.com
महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा

शिक्षा और रोजगार ऐसे कारक हैं जिनके कारण सोशल स्पेस में महिलाओं की उपस्थिति बढ़ी है. हालांकि शिक्षा की अंतर्वस्तु और रोजगार की प्रकृति का विश्लेषण करें तो पता चलता है कि इन दोनों ही कारकों ने बहुत हद तक यथास्थितिवाद की स्थिति बनाकर रखी है. घोषित-अघोषित कई ऐसे नियम हमारे समाज में हैं जो महिलाओं को आत्मनिर्भर, सशक्त, विचारशील होने से रोकते आ रहे हैं,जेंडर और यौनिकता से जुड़े कायदे उन घोषित-अघोषित नियमों में प्रमुख हैं. इन कायदों को मानने पर हमें ‘अच्छा’ और तोड़ने पर ‘बुरा’ घोषित किया जाता है। फिल्म पिंक के बहाने ‘अच्छी औरत’ तथा ‘बुरी औरत’ के मापदण्डों पर चर्चा कर लेनी चाहिए, इन मापदण्डों को बनाए रखने से किसे फायदा है? तथा अच्छी औरत का अच्छी बनी रहना इस समाज के लिए कितना जरूरी है? फिल्म देखने वाले लगभग सभी लोगों ने इसे अच्छी और यथार्थ फिल्म का दर्जा दिया. लेकिन क्या वे समाज के यथार्थ की बात करते हुए खुद को खंगाल पाते हैं? क्या वे फिल्म की नायिकाओं के साथ ईमानदारी से खड़े  होते हैं या भावुकतावश ही खुद को उनके साथ पा रहे हैं. क्योंकि मीनल का हमला किसी राजबीर के सर पर नहीं बल्कि उस मानसिकता पर है जो औरत को सिर्फ एक जिस्म, एक वस्तु समझता है. जो किसी लड़की के हँसने, बात करने, शराब पीने और उसके कपड़ों के माप से उसका चरित्र निर्धारण कर लेता है.

फिल्म समाज के ढांचे को उघाड़ती है, हमें मौका देती है एक इंसान के मन में बैठे मर्दवादी मन को टटोलने की. हम इस समाज में वही पुरुष हैं जिन्हें लड़कियों के ना को हाँ समझना सिखाया जाता है। क्यों? क्योंकि लड़कियों को सिखाया जाता है- शर्माना, यौनिक इच्छाओं से संबन्धित पहल ना करना. वहीं दूसरी ओर हमारा समाज पुरुष यौनिक छवि को आक्रामक और निडर के रूप में गढ़ता है.  ऐसे में उनके द्वारा किये जाने वाले हिंसक तथा आक्रामक व्यवहारों के लिए लड़कियों को ही दोष दिया जाता है तथा इस घटना को ‘सबक सिखाने’, औकात दिखाने’ के रूप में परिभाषित किया जाता है ताकि भविष्य में उन कायदों को कोई और न तोड़े. हम सबका समाजीकरण जेंडर और यौनिकता के कायदों के अनुसार होता रहता है. हम उन कायदों के अनुसार ही चलते हैं. ये कायदे अपने मानने वालों को भी प्रभावित करती है और न मानने वालों को भी। इसका सबसे बड़ा उदाहरण LGBTQ समूह है जो इन कायदों को तोड़ने के कारण ही समाज में बहिष्कृत जिंदगी जी रहे हैं. इन कायदों के अनुसार लिंग के दोहरे मापदंड हैं इसलिए पुरुषों की तुलना में महिलाएं ज्यादा नियंत्रित और शोषित की जाती हैं.

समाज में जो आदर्श ‘अच्छी महिलाओं’ के लिए गढ़े गये हैं तथा जिसके आधार पर उनसे वैसा ही बनने का आग्रह किया जाता है, उन आदर्श अच्छी महिलाओं की तुलना में ‘पिंक’ की पात्र ‘बुरी महिलाओं’ के वर्ग में आती हैं. ये बुरी महिलाएं जेंडर तथा यौनिकता के उन कायदों को तोड़ती हैं जिसे समाज में स्त्रियों के शोषण व नियंत्रण के लिए बनाया गया है. फिल्म की तीनों पात्र कामकाजी महिला हैं जो अपनी घरों से बाहर रहती हैं, अपनी जिंदगी से जुड़ी फैसले खुद लेती हैं, छोटे कपड़े पहनती हैं, शराब पीती हैं, उनके विवाह पूर्व यौन सबंध हैं, वे अपने यौन साथी का चुनाव करने के लिए स्वतंत्र हैं, इसके साथ ही उनमें असहमति की हिम्मत है. ये वो कायदे हैं जिसे ना तोड़ने के लिए परिवार, पड़ोस, समाज, मीडिया, फिल्म व टी.वी. सीरियलों के द्वारा हमारे सामने ‘आदर्श’ पेश किया जाता है. याद कीजिए उन फिल्मों व सीरियलों को जिसमें ‘बुरी औरतों’ का चित्रण इन्हीं कायदों को तोड़ने वाली के रूप में किया जाता रहा है. अच्छी वही हैं जो इन कायदों को तोड़ती नहीं हैं। क्योंकि इन्हीं कायदों पर तो जाति, धर्म, वर्ग की विशाल दीवार खड़ी है.

भारतीय समाज में अच्छी और बुरी औरत के गढ़न में यौनिकता की मुख्य भूमिका होती है. यही कारण है कि फिल्म में लड़कियों को घर से निकलवाने की कोशिश करने से लेकर न्यायालय में दोषी ठहराने तक की प्रक्रिया में उन्हें ‘चरित्रहीन’ घोषित करने की कोशिश की जाती है. किसी महिला के चरित्र पर उंगली उठाना सबसे आसान और प्रभावकारी तरीका होता है, यह आरोप सिर्फ लड़की के जीवन को प्रभावित ही नहीं करता बल्कि उसका परिवार भी समाज में कलंकित महसूस करता है. अपनी पुस्तक ‘हम हिंदुस्तानी’ में सुधीर कक्कड़ व कैथरीना कक्कड़ भारतीय समाज में स्त्री यौनिकता पर लिखते हुए कहते हैं ‘लड़कों के विपरीत, जो लड़कियां यौन-अभिलाषा को जरा भी सार्वजनिक कर देती हैं, वे न केवल अपनी प्रतिष्ठा को जोखिम में डाल देती हैं, बल्कि उनके यौन शोषण का शिकार होने की संभावना बन जाती है.’ अर्थात जब औरतें अपनी स्वतन्त्रता, अपनी आनंद के लिए जीने लगती हैं तो समाज में ऐसी महिलाओं को आसानी से उपलब्ध यौन वस्तु के रूप में देखा जाने लगता है तथा उसके ना को भी अपने पुरुषवादी मानसिकता के कारण हाँ समझा जाता है. आखिर सवाल उठता है वो कौन से कारण हैं जो हमें ‘अच्छी औरत’ के कायदे की ओर खीचते हैं?

जेंडर और यौनिकता के कायदे सीखते हुए हम लगातार शक्तिशाली (powerful) या शक्तिहीन  (powerless) के अनुभवों से गुजरते हैं. यह हमारे खुद के अनुभव भी होते हैं और यह स्थिति हम दूसरों में भी देखते हैं. जैसे- कोई लड़की किसी भी रूप में जेंडर और यौनिकता के कायदों को तोड़ती है तो उसे हमारे समाज में अच्छा नहीं माना जाता, ऐसी लड़कियों को परिवार में सम्मान नहीं दिया जाता, पारिवारिक निर्णयों में उनकी सहभागिता नहीं ली जाती या ज़्यादातर ऐसे मामलों में लड़कियों को परिवार से बहिष्कृत कर दिया जाता है अर्थात सामाजिक संरचना में इनकी स्थिति शक्तिहीन की होती है. लड़कों के साथ भी यही स्थिति हो सकती है या होती भी है लेकिन लड़कियों की तुलना में उनकी स्थिति ज्यादा बेहतर होती है. इस तरह हमारे परिवार तथा समाज के सत्ता केंद्र में वही होते हैं जो कायदे नहीं तोड़ते. दंड के रूप में शक्तिहीन की स्थिति व पुरस्कार के रूप में शक्तिशाली की स्थिति हमें उन कायदों को मानने के लिए आकर्षित करती है.

जेंडर व यौनिकता के कायदों पर ही पितृसत्तात्मक समाज खड़ा है और इसका सीधा संबंध स्त्री की प्रजनन शुद्धता से जुड़ा है. रक्त शुद्धता को बनाए रखने के लिए ही स्त्री की यौनिकता को नियंत्रित किया जाता है. इस ढांचे को बनाएँ रखने के लिए जरूरी है कि इन कायदों को सहज और प्राकृतिक रूप में फैलाया जाए. अगर किसी तरह की चुनौती मिलती भी है तो उन क्रियाओं को ‘असामाजिक’ व ‘अनैतिक’ घोषित कर दिया जाता है. अच्छी औरतों के अच्छी बनी रहने से ही ये सामाजिक संरचना चल रही है, जिस दिन इन मानकों की परवाह ना करते हुए स्त्रियाँ अपनी स्वतंत्रता, अपनी आनंद के लिए जीने लगेंगी जाति, धर्म तथा वर्ग के ढांचे टूट जाएगें.

अशोक विजय दशमी : दशहरा

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दशहरा पूरे देश में बड़े धूमधाम से मनाया जाता रहा है. मुख्यतःइस पर्व को बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में रावन के वध और अयोध्यापति राम की जीत  के रूप में मनाया जाता है, ये बात और है कि कौन बुरा था और कौन अच्छा इस पर सभ्य समाज में  एक लम्बी बहस की जरुरत है.जब पूरा देश रावण को जलाए जाने पर ढोल ताशे बजा-बजा कर खुशी मनाता है, तब एक शहर इस उत्सव से दूर दीक्षाभूमि में लाखों  लोग बौद्ध धम्म प्रवर्तन हेतु अपनी दस्तक देते है.



महाराष्ट्र के विशाल नगर नागपुर में हर वर्ष दशहरा के उपलक्ष्य  में अपने ऐतिहासिक दिन को याद करने और बौद्ध धर्म अपनाने हेतु लाखों  की संख्या लोग में एकत्र होते है. माना जाता है कि इस दिन मौर्यवंशीय सम्राट अशोक ने कलिंग  युद्ध की विजय के बाद हुए रक्तपात से खिन्न हो कर शान्ति और विकास के लिए बौद्ध धम्म स्वीकार किया और दस दिन तक राज्य की ओर से भोजन दान  एवं दीपोत्सव किया.


14 अक्तूबर 1956 को डा भीमराव आंबेडकर ने पांच लाख अनुयायियों के साथ  हिन्दू धर्म को त्याग कर, बौद्ध धम्म में विश्वास करने वाले पूर्वज नागों  की जमीन नागपुर में बौद्ध धम्म स्वीकार कियाआधुनिक भारत के इतिहास में दुबारा से बौद्ध धम्म की पताका फहराई गयी. बौद्ध धम्म को मानने वाले देश चीन, जापान, थाईलैंड से प्रति वर्ष हजारों  की संख्या में अक्तूबर के महीने में सैलानी नागपुर की दीक्षाभूमि में दर्शन के लिए आते है.
डा. आंबेडकर ने दीक्षा लेते समय २२ प्रतिज्ञाएं ली, जिसका सार था ईश्वरवाद-अवतारवाद, आत्मा स्वर्ग- नरक, अंधविश्वास और धार्मिक पाखंड से मुक्ति और जीवन में सादगीपूर्ण सद्व्यव्यवहार का संचार. हिन्दू धर्म की मान्यताओं  से दूर जाति-उपजातियों  से उपजे भेदभाव को समाप्त करके उन्होंने एक प्रबुद्ध भारत की ओर एक कदम उठाया था.

नागपुर स्थित दीक्षाभूमि में तीन दिन बड़ा उत्सव होता है . महाराष्ट्र के दूर- दराज जिलों, गावो कस्बों से नंगे पांव लाखो लोग  दीक्षा भूमि के दर्शन करने आते है और 48 घंटे दीक्षाभूमि  में तिल रखने की जगह नहीं मिलती. न केवल महाराष्ट्र से बल्कि  पूरे  भारत के कोने कोने मसलन उत्तेर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, पंजाब-हरियाणा, राजस्थान, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु से हजारो लोग दीक्षाभूमि में धम्म की वंदना करने आते है. इस उत्सव में सबसे खूबसूरत चीज जो देखने को मिलती है, भीड़भाड़ में कोई छेड़छाड़ नहीं होती न ही कोई फसाद .

 दलित आन्दोलन की झलक पल -पल पर देखने  को मिलती है. महिलाओ के मंडप, छात्रो के मंडप,  पुस्तकों के मंडप, अन्धविश्वास निवारण मंडप, बुद्धिस्ट विचारो के कैम्प, कर्मचारियों के कैम्प, पत्रिकाओ के स्टाल, समता सैनिक दल का मार्च, आरपीआई  का मार्च, महिलाओ का मार्च , युवाओं के मार्च नारे लगाते लोग दीखते हैं तो नागपुर की सडको पर जहां -जहां से लोग गुजरते हैं,उनके लिए भोजन की व्यवस्था वही के लोग करते हैं , महिलाएं  भोजन दान करती हैं. जितना विशाल उत्सव  होता है, उतना ही विशाल पुस्तकों , पोस्टर, बिल्लो का बाजार होता है, जो अपनी विशिष्ट छाप  छोड़ता है.

यह उत्सव अब पूरे देश में मनाया जाता है. आंबेडकरवादी  विचारधारा को मानने वाले संगठन, संस्थाए, पार्टी, समूह दल अपने अपने राज्यों में दशहरा के दिन अशोक विजयदशमी मानते है. बनारस, आगरा, दिल्ली , हरियाणा, आन्ध्र, तमिलनाडु. कानपुर, लखनऊ में धूमधाम से मनाया जाता है. अफसोसजनक बात है कि लाखो कि संख्या में दस्तक लेनेवाले उत्सव के बारे में मिडिया , टीवी चैनल में कोई उत्साह नहीं है, न ही उसके बारे में कोई रिपोर्टिंग ही होती है. मुख्यधारा के अखबार दुर्गा पूजा, रावणदहन से भरे हुए मिलेंगे, लेकिन हमारी मूल सभ्यता और विचारधारा पर कोई लेख टिप्पणी भी देखने को नहीं मिलेंगी. अशोक विजयदशमी की याद में आज हम बौद्ध , दलित आदिवासी, घुमंतू जातीय लोगो और उनकी महिलाओं  की अस्मिताओं के प्रति सजग हो कर पितृसत्तात्मक  पर्व और मिथकों पर बहस चलानी होगी, बहस हमें इस बात पर भी चलानी चाहिए कि एक लोकतान्त्रिक देश में त्योहारों के नाम पर हम हिंसात्मक अभिव्यक्तियों को क्यों अभ्यास  करे?

समग्र क्रांति का स्वप्न: अखिल भारतीय दलित महिला सम्मेलन

निशा शेंडे

स्त्री अध्धयन विभाग अमरावती ‘विश्वविद्यालय’ में प्राध्यापिका
shende_nisha7@yahoo.com

20 जुलाई 1942 को पहला अखिल भारतीय दलित  महिला फेडरेशन की परिषद संपन्न हुई. यह वर्ष हम इसी परिषद की 75वीं वर्षगांठ मना रहे हैं. दलित महिलाओं की उन्नति, प्रगति सक्षमता की लड़ाई की शुरुआत इसी परिषद के माध्यम से हुई है. इस परिषद का वर्णन स्वर्ण अक्षरों  में किया जाना चाहिये. जिस जोशपूर्ण वातावरण में यह परिषद संपन्न हुई वहां से लेकर आज तक का दलित महिला आन्दोलन की उपलब्धियों के बारे में ऑडिट होना जरूरी है.


20 जुलाई 1942 को नागपुर में सुलोचनाबाई डोंगरे की अध्यक्षता में यह परिषद संपन्न हुई. इस परिषद की विशेषता यह थी कि परिषद में डॉ. बाबासाहब आंबेडकर स्वयं उपस्थित थे. दलित महिलाओं का अलग संगठन हो, यह इच्छा स्वयं डॉ. बाबासाहब आंबेडकर  की थी. ‘महिलाओं की प्रगति से ही समाज की प्रगति आंकी जा सकती है’ यह विचार डॉ. बाबासाहब आंबेडकर रखते थे. इसलिए व्यवस्था परिवर्तन की सोच, अस्पृश्य महिलाओं की उन्नति, उनका सम्मान प्राप्त करने हेतु उनका सार्वजनिक जीवन में आना महत्वपूर्ण था. सार्वजनिक आन्दोलन में महिलाओं की भागीदारी अपनी अहम् भूमिका निभाती है. और वह भागीदारी शेडयूल कास्ट की महिलाओं को करनी चाहिये. इस पर डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने भूमिका रखी कि  ‘अस्पृश्यता की वजह से जिन अस्पृश्य महिलाओं  का वजूद की खत्म हुआ था. उच्च ब्राह्मणवादी संस्कृति ने उनकी इतनी प्रताड़ना की थी कि वह स्वयं इंसान होना ही भूल गई थी. जानवर से भी बदतर जीवन शेडयूल कास्ट की महिलायें जी रही थी.’

मानवीय दृष्टिकोण या मानवीयता का अंश इस चातुर्य वर्ण  व्यवस्था में कहीं दूर दूर तक नजर नहीं आ रहा था. अस्पृश्य वर्ग की स्थिति बेहाल थी. ऐसी स्थिति में महिलाओं की स्थिति के बारे में हम सोच सकते हैं कि वह किन हालातों की और जातिवादी व्यवस्था की शिकार थी. आज उपलब्ध सभी भाषाओँ की दलित साहित्य में इस जीवन की वेदना प्रतिबिंबित हुई है. इस अवांछनीय सामाजिक परिस्थिति का अंग दलित समाज कैसे जीवनयापन कर रहा था? उसकी सोच-समझ, विचार करने की शक्ति ही हिंदू धर्म ने छीन ली थी. इस कठोर, घोर उपेक्षा तथा ब्राह्मनी हिंदू धर्म के वातावरण में दलित समाज की आंकाक्षा जागृत करने का श्रेय हम डॉ. बाबासाहब आंबेडकर को देते हैं.


इस क्रांतिकारी आंदोलन की शुरुआत महिलाओं ने की. लगभग पच्चीस हजार महिलायें इस परिषद में  रूप से सहभागी हुई थी. उनका उत्साह एक नई क्रांति का बिगुल बजा रहा था. यह एक क्रांतिकारी सम्मेलन था. दलित, शोषित, वंचित, पिछड़े समाज की महिलाओं की आवाज संपूर्णक्रांति की मांग करती नजर आ रही थी. यह परिषद अपने आप में दुनिया की ऐतिहासिक परिषद थी. इस परिषद में हुई घोषणा एवं मांगें महत्वपूर्ण थी. आज दलित महिलायें सामाजिक आंदोलन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी हैं. इस क्रियाशीलता की नींव 1942 की अखिल भारतीय दलित महिला सम्मेलन में डाली गई थी.

इस परिषद में उपस्थित महिलाओं का हौसला देखते बन रहा था. ये महिलायें अस्पृश्य समाज की, दलित, शोषित थी. यह जातिव्यवस्था तथा पितृसत्ता  से पीड़ित थीं. इन महिलाओं की परिस्थिति के बारे में पता चलता है, जो  काफी संघर्षपूर्ण था. आर्थिक, सामाजिक अस्पृश्यता के कारण विकट परिस्थितियों से जूझती ये महिलायें जातिभेद और पितृसत्ता का विरोध कर रही थी. इन महिलाओं की विशेषता यह थी कि ये केवल महिलाओं की परिस्थिति के बारे में ही सिर्फ नहीं सोच रही थी अपितु ये समाज में क्रांतिकारी बदलाव चाह रही थीं तथा डॉ. बाबासाहब आंबेडकर के आंदोलन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी थी.

भारत में 1975 का दशक स्त्रीमुक्ति का दशक जाहिर हुआ था. भारतीय स्त्रीमुक्ति का इतिहास 1975 से लिखना शुरू हुआ. पर 1942 में दलित महिलाओं ने स्त्रीमुक्ति आवाज बुलंद की थी. स्त्रीमुक्ति का आंदोलन सवर्ण जाति की महिलाओं के हाथ में था जहां केवल पारिवारिक हिंसा, बलात्कार तथा दहेज़ प्रथा के बारे में सोचा जा रहा था. जबकि दलित महिलायें पितृसत्ता, हिंदू धर्मव्यवस्था तथा जाति व्यवस्था को ललकार रही थी. महिलाओं का शोषण धार्मिक आधार पर हो रहा है, इस बात पर जोर डाल रही थी. मनुस्मृति की निंदा कर रही थी. इस परिषद में जाति, लिंगभाव तथा आरक्षण के प्रस्ताव संपन्न हुए.

संसदीय आरक्षण का यह अहम् मुद्दा इस परिषद का  अंग था. महिलाओं में सक्षमता निर्माण करना, जाति तथा हिंसा के प्रश्न तथा हिंदूधर्मव्यवस्था त्याग करके डॉ. बाबासाहब आंबेडकर की राह पर चलना यह उनका महत्वपूर्ण कार्य बन चुका था. इसी परिषद के माध्यम से डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने दलित महिलाओं को सामाजिक तथा राजकीय आंदोलन से परिचित करवाया.

20 अप्रैल 1942 के परिषद के फलस्वरूप महिलाओं की विभिन्न जगहों पर सभा आयोजित होने लगी. जिनमें स्वतःस्फूर्त महिलायें भागीदारी करने लगी तथा वैचारिकता में महत्वपूर्ण सोच आने लगी. आज हम 33% महिला आरक्षण की मांग करते हुए आरक्षण के भीतर दलित महिलाओं के आरक्षण की अलग मांग कर रहे हैं.

नये हिंदी सिनेमा में नयी स्त्री

सुधा अरोडा


सुधा अरोडा सुप्रसिद्ध कथाकार और विचारक हैं. सम्पर्क : 1702 , सॉलिटेअर , डेल्फी के सामने , हीरानंदानी गार्डेन्स , पवई , मुंबई – 400 076
फोन – 022 4005 7872 / 097574 94505 / 090043 87272.

सिनेमा की पहुंच समाज के बहुत बड़े वर्ग तक है इसीलिये मनोरंजन के साथ साथ सामाजिक दायित्व निभाने का सवाल भी यहां जुड़ जाता है.जब कोई फिल्म रोचक अंदाज़ में सामाजिक विसंगतियों के चित्र और कुछ सकारात्मक संदेश  सही सही संप्रेषित करने में समर्थ होती है तो उसे व्यापक स्तर पर सराहना भी मिलती है.
हिन्दी सिनेमा में नायिका एक ऐसा मिथक है जिसकी अनुपस्थिति में कोई फिल्म बन ही नहीं सकती लेकिन अब तक जिसकी उपस्थिति नायक समेत पेड़ों और फव्वारों के चारों ओर चक्कर लगाने के लिये ही होती रही है.नायक की नायिका और कहानी का मूलाधार होने के बावजूद सिनेमा की नायिका को बार-बार कंडीशंड किया जाता रहा.स्वयं नायिका ही इस मिथक को बार-बार तोड़ती रही.अगर कभी कहानी ने उसे घेरे में जकड़ने की कोशिश की तो उसने एक विद्रोह भी रचा.यह अलग बात है कि बॉक्स ऑफिस के भूत के डर से फिल्मकारों ने स्त्री को परम्पराओं से बाहर निकलने ही नहीं दिया  क्योंकि दर्शक वैसी ही सहनशीला नारी की छवि देखना और उस पर सहानुभूति जताना चाहता है जो उसके मानदंडों पर सही ठहरती हो.दर्शक सब कुछ पचा सकता है – एक अकेला नायक सौ-पचास गुंडों को धराशायी कर दे, कोठे पर लगातार बुरी नज़रों की शिकार ‘पवित्र तवायफ’ बड़े बड़े डायलॉग मारे, सबकुछ धड़ल्ले से चल जाएगा .हिंदी फिल्मों की नायिकाओं  ने एक लंबे अरसे तक अपनी महिमामंडित छवि को पुष्ट करने के लिये त्याग, ममता और आंसुओं से सराबोर अपनी तस्वीर दिखाई और बाॅक्स आॅफिस पर खूब वाहवाही बटोरी.

भारतीय सिनेमा लंबे समय तक पुरुष वर्चस्व का सिनेमा रहा है.निर्माता से दर्शक तक यहां पुरुष की केन्द्रीयता रही है और ऐसे में जाहिर है पुरुष को एक सहचरी ही चाहिए, स्वतंत्र व्यक्तित्व नहीं .नायिका पति को आगे बढ़ने का मौका देती हुई नौकरी और अपना फलता फूलता कैरियर होम कर देती है .अभिमान वाली जया भादुड़ी इसकी मेटाफर है.‘अल्लाह तेरो नाम’ और ‘ना मैं धन चाहूं , ना रतन चाहूं’ की बीते समय की नायिकाएं हों या ‘दिलवाले दुलहनियाँ’ की और ‘कुछ कुछ होता है’ की लंदन रिटर्न, गाती वह ‘ओम जय जगदीश हरे’ ही है.यही उसकी भारतीयता है! भारत का दर्शक ऐसी ही पराश्रित नायिकाओं का मुरीद रहा है.

शायद यही सबसे बड़ा कारण है कि नायिकाएं हीरो को बचाने के लिए खलनायक के सामने नाच-गाना, समर्पण और कभी-कभी धोखा देकर नायक को छुड़ा लेने तक के लटके झटके बरसों से सिनेमा में करती रही है और दर्शकों का जी नहीं ऊब रहा क्योंकि उसे ऐसी ही स्त्रियाँ रुचती हैं .उसे परंपरा में लिथड़ी नायिकाएँ पसंद हैं.परंपरा का नाम सिंदूर, करवाचैथ और मंगलसूत्र ही होता है क्योंकि इन्हीं में पुरुष होता है और ये ही वे बंधन हैं, जिसे स्त्री तोड़ना नहीं चाहती .ये ही वे हथियार हैं जिससे वह अपनी इच्छाओं का गला घोंट लेती है .चाहे महल में वह भूखी सो जाय, चाहे पति के लात-घूंसों को खाकर ही अपने को बचाए रखे लेकिन वह मर नहीं पाती क्योंकि उसके पास अपने नाम से न कोई घर होता है , न संपत्ति .लिहाजा वह खलनायक या जालिमों के हाथ से बचाई जाती है, नायक उसका संरक्षक हो जाता है और वह उसके पाँवों पर गिर जाती है.साहब बीवी और गुलाम की छोटी बहू को देखिये – शराबी पति के लिये शराब तक पीने को तैयार हो जाती है और उसके पैरों पर गिरकर गाती है – न जाओ सैंया , छुड़ा के बैयां , कसम तुम्हारी , मैं रो पड़ूंगी ! फिर भी वो जमींदार पति ही क्या जो पसीज जाये ! वह सिंदूर भरी मांग से लिथड़ी रोती-कलपती , मिन्नतें करती , सुरीले सुर में गाती सुंदरी नायिका को छोड़कर, तवायफ़ के कोठे पर चला ही जाता है .नायिकाएं तब भी ‘तुम्हीं मेरे मंदिर, तुम्हीं मेरी पूजा, तुम्हीं देवता हो’ गा गाकर, गले में मंगलसूत्र भरपूर दिखातीं रहीं .मूक फिल्मों से शुरु होकर अछूत कन्या और मदर इंडिया से गुज़रते हुए सुजाता, बंदिनी, दिल एक मंदिर, मैं चुप रहूंगी तक सिंदूर से मांग भरी नायिकाएं दशकों तक बड़े परदे पर सबकी आराध्य बनी रहीं.


पुरातनपंथी मध्यवर्गीय परिवार के दमघोटू माहौल में ताने बाने से छलनी अपने नसीब को कोसती और विधि के विधान को स्वीकारती ‘‘मैं चुप रहूंगी’’ वाली फिल्मों का दौर भी हमने देखा है जब ऐसे संयुक्त परिवार में जाकर अपनी सहनशीलता के सुपर पावर की बदौलत झुकी आँखों वाली बहू दर्शकों की चहेती होती थी!  घर के सबसे क्रूर सदस्य को अपनी जान की बाज़ी लगा कर बचा लेती नायिका के कंधे पर फिल्म की ‘‘हैप्पी एंडिंग’’ का दारोमदार था ! वह खुद ही गले में रस्सी बाँध कर उसके सिरे को खुला छोड़ देती थी फिर संयुक्त परिवार में जिसका जी चाहे, उसे हाँक लेता था ! ऐसी फिल्मों की एक लंबी कतार है जिनमें स्त्री का ममतामयी मां, पत्नी, बहन और बेटी का उजला धुला रूप दशकों तक दर्शकों को लुभाता रहा.
पांच दषक पहले गीत भी ऐसे ही रचे गये –
‘‘ तुम्हीं मेरे मंदिर, तुम्हीं मेरी पूजा, तुम ही देवता हो !
कोई मेरी आंखों से देखे तो समझे कि तुम मेरे क्या हो!  (फिल्म – खानदान में नूतन और सुनील दत्त)
‘‘ कैसा मुझे वरदान मिला है, तुम क्या मिले भगवान मिला है! अब तो जनम भर संग रहेगा, इस मेंहदी का रंग रहेगा  तेरे चरण की मैं दासी रे दासी ….जीवन डोर तुम्हीं संग बांधी !’’

सौ साल के हिंदी सिनेमा में स्त्री की छवि निरंतर बदल रही है.दर्शक और महिलाएं बरसों तक फिल्में देखने के बाद अपने आंसुओं से भरे रुमालों को निचोड़ने में ही फिल्म की सफलता को आंकते रहे.मेंहदी, सिंदूर, टिकुली और मंगलसूत्र में सजी दासी बनी इस नायिका ने प्रेम भी किया और घर से विद्रोह भी ! पर करवाचैथ का सारा ताम-झाम , जेवर और जरीदार साड़ियों से लंदी फंदी नायिकाओं ,भव्य रंगीन दृष्यों और गीतों की संभाव्यता के कारण , बागी आधुनिक नायिका को भी, सिनेमा अपने पारंपरिक और समर्पित खांचे में दिखाता रहा.‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगें’ से लेकर ‘हम दिल दे चुके सनम’ में करवाचैथ के सुहावने मंजर देखे जाते रहे .भारतीय सिनेमा के इतिहास पर समग्रता में एक नज़र अगर डाली जाय तो हम ऐसी नायिकाओं को भी पाएंगे जो इस मिथक को तोड़ भी रही हैं और अपनी स्थितियों में मुक्ति का एक आख्यान भी बनती रही हैं.बेशक सिनेमा का मनोरंजनशास्त्र जनमानस में पैठी हुई प्रवृत्तियों के संदोहन पर टिका हो.सबसे पहले हंटरवाली नाडिया को हम एक ऐसी स्त्री के रूप में सिनेमा के पर्दे पर पाते हैं जो अब तक पुरुष के लिए आरक्षित और स्त्री के लिए वर्जित क्षेत्र में दखल देती है .जो हंटर अभी तक स्त्री की पीठ पर बजते थे नाडिया ने उससे पुरुष की पीठ रंग डाली .वह कल्पना के नहीं बल्कि वास्तविक घोडे दौड़ाती थी और जिस दौर में पूरब से पश्चिम , उत्तर से दक्षिण तक की भारतीय स्त्रियाँ घूँघट और ओढ़नी-चुनरी में लिपटी थीं , निडर नाडिया ने ‘फीअरलेस’ बनकर सिर खोलकर लोगों को चुनौती दी और उन मूल्यों को बचाया जो आमतौर पर पुरुषों की बपौती माने जाते थे .पर यह एक औसत नहीं , अपवाद स्वरूप चरित्र था जो बाॅक्स आॅफिस की संभावनाओं को देखते हुए रचा गया .

इसके बाद आता है नरगिस का दौर .भारतीय सिनेमा की इस नायिका ने अपनी लंबी पारी में मध्यवर्गीय स्त्री के सपनों और आकांक्षाओं के साथ-साथ उसकी चारित्रिक दृढता को एक अलग ही मुकाम पर पहुंचाया .कम खाकर ईमानदारी से जीना और अपनी एक सामाजिक भूमिका तलाशना इस नायिका का सर्वाधिक लोकप्रिय रूप है .नरगिस का केवल एक दौर नहीं था बल्कि उसका एक व्यापक उत्तर काल भी है जब दामिनी , लज्जा , मृत्युदंड , प्रतिघात , ज़ख्मी औरत , अंजाम , खून भरी मांग , अस्तित्व की नायिकाओं ने दयनीय और सहने वाली इमेज को धराशायी कर अपनी सारी वल्नरेबिलिटी सहित पुरुष सशक्त को चुनौती दी और समाज के सामने कुछ सवाल रखे .पांच दशक पहले तक नायिकांए मीनाकुमारी और नरगिस जैसी सलज्ज थीं जो भारतीय पोशाक साड़ी में लैस होती थीं और सारी रूमानियत अपनी आंखों से ज़ाहिर कर देती थीं .अपनी देह, ज़ीरो फ़िगर और यौनिकता के प्रति सचेत नायिकाएं तब स्वीकार्य नहीं थीं.इसके लिए तो हेलेन, बिन्दु या अरुणा ईरानी ही काफी थीं और वे फिल्म की नायिका कभी नहीं रहीं.आज नायिका और खलनायिका के बीच सिर्फ कपड़ों का ही नहीं, मानसिकता का भी अंतर मिट गया है.आज कम कपड़ों में आइटम साॅन्ग करने के लिये हेलेन और बिंदु की तरह सिर्फ़ राखी सावंत या मलाइका खान की भी ज़रूरत नहीं रही .उसके लिये करीना कपूर, ऐश्वर्या राय, कैटरीना कैफ़ या विद्या बालन तक, जो अपनी शर्तों पर किसी भी रोल को अस्वीकार करने की कूवत रखती हैं, चालू किस्म के आइटम साॅन्ग – ‘चिपका ले सैंया फेविकाॅल से’ और ‘कारे कजरारे’ से लेकर ‘शीला की जवानी’ ‘चिकनी चमेली’ और ‘मला जाउ दे’ की उत्तेजक लावणी तक के लिये अपने को सहर्श प्रस्तुत कर देती हैं.

ग्रामीण नायिकाएँ खासतौर पर उन समस्याओं से जुडी रहीं जो आमतौर पर ग्रामीण नायकों से सम्बद्ध थीं , मसलन कृषि की समस्याएँ, शोषण और घरेलू कलह आदि लेकिन आश्चर्यजनक रूप से ग्रामीण नायिकाएँ एक खुले माहौल में सांस लेती प्रतीत होती हैं .वे शहरी नायिकाओं की तरह कठपुतली नहीं बल्कि सहनायक की तरह मौजूद होती हैं .आर्देशिर ईरानी की ‘किसान कन्या’ से महबूब खान की ‘औरत’ और ‘मदर इंडिया’ और जे. पी. दत्ता की गुलामी में रीना रॉय को भी इसे बेहतर ढंग से देखा जा सकता है.‘मदर इंडिया’ तो स्त्री अस्मिता का एक माइलस्टोन ही है जहां एक मां, दूसरी स्त्री का सम्मान बचाने के लिए अपने सगे को भी नहीं बख्शती और अपने बेटे को बंदूक का निशाना बना लेती है .विभाजन के तौर पर हम ग्रामीण नायिकाओं को श्रम-संस्कृति और शहरी नायिकाओं को मांसलता और यौनिकता के प्रतिनिधि के तौर पर रख सकते हैं.ऐसा इसलिए भी है कि एक उत्पादन के आदिम चरण पर खड़ी है तो दूसरी बाज़ार और वितरण के आधुनिक और प्रचलित चरण पर .शोषण से दोनों को निजात नहीं है पर अधिकांश फ़िल्म निर्माताओं का मक़सद सामाजिक नहीं, शुद्ध व्यावसायिक है.
सत्यम शिवम सुंदरम की उस नायिका को देखें ,जो अपने जले हुए चेहरे को पल्लू से छिपाकर नायक से मिलती है .उसमें उसकी अपनी त्रासदी से लड़ने की चाहत , एक युवा शरीर की आवश्यकताएँ , स्त्री यौनिकता का एक अलग आख्यान है लेकिन वह अंत में अपराधिनी ही साबित होती है क्योंकि उसका पति ‘अर्धसत्य’ से प्यार करता है , ‘पूर्णसत्य’ उसके लिए स्वीकार्य नहीं होता .स्त्री की सहनशीलता और यातना से जूझते चरित्र के बरअक्स एक विद्रोही रूप भी गढ़ा गया – सीता के सामने गीता और चालबाज की अंजू के सामने मंजू .पर ये भी वास्तविक चरित्रों से ज्यादा बाॅक्स आॅफिस के आंकड़ों को भुनाने के लिये थे .

आज स्थितियां बदल रही हैं.दरअसल बदलती हुई स्थितियों में स्त्री की जद्दोजहद अपने अस्तित्व को तलाशने की एक अनवरत प्रक्रिया पर्दे पर भी देखी जा सकती है.इसे ‘गॉडमदर’ , ‘फायर’ ,‘मृत्युदंड’ और ‘इश्किया’ से लेकर ‘डर्टी पिक्चर’ तक और अब लिव इन और मुक्त स्वच्छंद प्रेम के समय में ‘लव आजकल‘ और ‘शुद्ध देसी रोमांस’ और ताज़ा फिल्म ‘क्वीन’ में देखा जा सकता है.यहां आज के समय में पैदा हुई नये किस्म की त्रासदियाँ हैं लेकिन मुक्ति के अपने रास्ते और आज़ादी की अपनी पहचान भी हैं.जैसे-जैसे कहानियाँ स्त्री की तलाश करती जा रही हैं वैसे-वैसे नायिकाएँ बदल रही हैं.जैसे-जैसे स्त्री की उपस्थितियों और उसकी भूमिकाओं का मूल्यांकन होता जाएगा वैसे-वैसे नयी स्त्रियाँ आती जाएंगी और नायिकाओं का चेहरा और चरित्र बदलता जाएगा.इसकी आज सख्त ज़रूरत भी है.दरअसल नये माहौल में स्त्री के बदलते चेहरे को पहचानने की कोशिश की जा रही है और इसमें अनंत संभावनाएं हैं, इसमें संदेह नहीं।

त्याग और सहनशीलता के विलोम के रूप में ‘सीता और गीता’ में ऐसी दबी सहमी दासीनुमा सीता के बरअक्स हंटरवाली छाप गीता की ज़रूरत महसूस हुई जो पुरुषनुमा मैनरिज़्म और प्रतिशोध के दमनकारी तेवर के साथ उपस्थित थी ! धीरे धीरे स्थितियां बदलीं और इसका एक बेहतर और विश्वश्नीय आकलन हुआ ‘गाॅडमदर’ में जहां वह अपने आत्मसम्मान और प्रखर मेधा और कूटनीति के साथ उपस्थित थी ।गंभीर फिल्में तब भी बनीं, सामाजिक मुद्दों से तब भी मुठभेड़ की गयी! ‘धूल का फूल’ में भी क्वांरी मां के बच्चे को स्वीकृति दी गई, ‘क्या कहना’ में वही स्वीकृति कुछ और मुखर हुई.‘भूमिका’ में अपनी अस्मिता तलाषती स्मिता पाटिल, ‘अर्थ’ में पतिप्रेम से उबरती षबाना और ‘अस्तित्व’ में अपनी आकांक्षाओं को स्वीकारती तब्बू कुछ स्वतंत्रचेता स्त्रियों की छवि बनाती रहीं.


दरअसल बदलती हुई स्थितियों में स्त्री की जद्दोजहद अपने अस्तित्व को तलाशने की एक अनवरत प्रक्रिया पर्दे पर भी देखी जा सकती है.इसे ‘गॉडमदर’, ‘फायर’ ,‘मृत्युदंड’ और ‘इश्किया’ से लेकर ‘डर्टी पिक्चर’ तक और अब लिव इन और मुक्त स्वच्छंद प्रेम के समय में ‘लव आजकल‘ और ‘शुद्ध देसी रोमांस’ और ताज़ा फिल्म ‘क्वीन’ में देखा जा सकता है.आज के बदले हुए माहौल में ऐसी नायिका का स्वागत है जो न मिमियाती हुई सीता है और न भृकुटियां तरेरती चाबुक फटकारती गीता ! आज वह अपने को पहचान रही है.अपने खिलाफ़ बारीक साजिशों और प्रताड़ना से वाकिफ़ होती है, सामाजिक प्रतिष्ठा और सम्मान के चलते स्त्री पर थोपी हुई पाबंदियों को देखती है, अपनी आज़ादी की हवा को पहचानती है।तीन दशक पहले क्या हमने कभी सोचा था कि ‘‘अजीब दास्तां है ये ….’’ और ‘‘ दिल एक मंदिर है ….’’ जैसे गीत गाती स्त्रियों के देश में कभी हाइवे, क्वीन, पिंक और पाच्र्ड जैसी फ़िल्में भी बनेंगी ? बेषक भारतीय सिनेमा में यह एक बड़ा बदलाव आया है।


यह दौर निश्चित रूप से नायिकाओं की स्टीरियोटाइप इमेज से बाहर स्त्री की अस्मिता को पहचानने और उसकी आकांक्षा को तरजीह देने का है.हिन्दुस्तानी जनता द्वारा इस छवि को स्वीकार्यता देना भारतीय सिनेमा के लिये गर्व की बात है.भला हो निर्माताओं – निर्देशकों का जिन्होंने समय रहते यह पहचान लिया कि सामूहिक नृत्य के नाम विदेशी  बालाओं की बिकनी पहने परेड अब दर्शकों को लुभा पाने में कामयाब नहीं है इसलिये ‘लुटेरा’ फ़िल्म में साठ के दशक की रूमानियत दिखाई गई और ‘क्वीन’ में बिना किसी के प्रेम में पड़े एक लड़की की अपने आप से पहचान करवाई गई.फिल्मों में नायिका का रूप रंग, ज़ीरो फिगर आज पीछे छूट गया है.‘इंगलिश विंगलिश ’ की नायिका एक अधेड़ गृहिणी है जो अपने बच्चों और पति की मेधा से अपने को पीछे छूटता देखती है, तो इस उम्र में अंग्रेज़ी भाषा सीखने की कोशिश करती है और अपने बूते पर अपने लिये सम्मान हासिल कर दिखाती है.‘कहानी’ में एक गर्भवती नायिका अपने पहरावे और बिखरे हुए बालों से बेखबर अपने पति के अपराधी को पकड़ने के मिशन में जुटी है और पूरी फिल्म अपनी चुस्त पटकथा और निर्देशन के बूते पर बग़ैर किसी ग्लैमर और नाच गाने के दर्षकों को बांधे रखती है.

‘क्वीन’ फिल्म में एक दक़ियानूसी मध्यवर्गीय परिवार से आयी एक लड़की, जिसे उसके होने वाले पति ने रिजेक्ट कर दिया है, अकेले ही हनीमून पर विदेश  जाने का फैसला लेती है.अब उसके सामने उसके छोटे से कस्बे के बरक्स कहीं बड़ी आज़ाद ख़याल दुनिया है जो पहले उसे चैंकाती है, फिर अपनी ज़द में ले लेती है.वह अपनी आंकाक्षाओं को एक स्वतंत्र इकाई के रूप में पहली बार पहचानती है और अपना निर्णय ख़ुद लेने का साहस दिखाती है.फिल्म ‘हाईवे’ सिर्फ़ एक खुले लंबे रास्ते का विस्तार ही नहीं है, वह खुली हवा और आज़ादी का प्रतीक भी है.यहां एक रईस परिवार की लड़की अपने आलीशान बंगले और संभ्रांत दिखने वाले लोगों की वहशी  कैद और जकड़न से निकलकर बेरोकटोक हवा में सांस लेने का सुकून पाती है.यह फिल्म एक मिथ को तोड़ती है कि एक अपराधी सिर्फ़ अपराधी ही नहीं होता ! कई बार परिस्थितियां उसके मानवीय और संवेदनात्मक पक्ष को कुंद कर देती हैं.जहां रिश्तों का संभ्रांत मुखौटा लगाये चेहरे एक कमउम्र लड़की को भी सिर्फ़ जिस्म के रूप में देखते हैं, वहां एक मुजरिम उसे एक मासूम इंसान की तरह देखता है, जिंस की तरह नहीं.यह फिल्म रोचक अंदाज़ में यह संदेश  देने में भी समर्थ है कि घरों की चहारदीवारी के भीतर चल रहे शोषण को आखिर कब तक लड़कियां घर की झूठी इज़्जत के नाम पर छिपाती रहेंगी ? एक ऐसा घर-घर का सच जिसे अब तक कहा नहीं गया था।

लड़कियां चुस्त कपड़ों और ज़ीरो फ़िगर से आगे एक ज़हीन दिमाग़ और सोच भी रखती हैं बेशक उनकी काया मोटी और रंगरूप बहुत आकर्षक  न हो -‘दम लगाके हईशा ’ फिल्म से बेहतर तरीके से इसे नहीं बताया जा सकता.यह भी हमारे समाज की एक रूढ़िगत सोच है जिसके कारण हर लड़का अपने लिये गोरी चिट्टी काया वाली सुंदर कन्या चाहता है बेशक वह दिमाग़ से शून्य  हो.यहां एक स्थूल काया और ज़हीन दिमाग़ है.सदियों से सुनाई जाती हिदायतों को सुनने से बरजती बीस साल पहले के माहौल में आज की लड़की निश्चित  रूप से जानती है कि उसके मोटापे और उसके साथ बीती रात के लिए अपने दोस्तों के बीच उसे ज़लील करता पति सिर्फ तमाचे का ही हक़दार है ! आहत होकर अपने अगले कदम के बारे में भी मज़बूती से फैसला लेती है और पति को अपनी गलती महसूस करते देख अपना जुड़ाव जताने में भी दूसरी बार नहीं सोचती -‘‘मैं वहां जाना नहीं चाहती ! मुझे रोक लो!’’ बिना किसी क्लाइमेक्स और मेलोड्रामा के, सीट पर टेंशन में आगे की ओर खिसक कर फिल्म देखने के बजाय, अपनी सीट पर पसर कर मुस्कुराते और शाखा बाबू की आचार विचार की कार्यशाला में विशुद्ध हिंदी और ठसकेदार पुरबी पर ठहाके लगाते हुए दर्शक  फिल्म देखते और सराहते हैं !

धीरे धीरे हमारे फिल्म निर्माताओं को भी समझ में आने लगा है कि सिर्फ़ आइटम सांग और द्विअर्थी संवाद किसी फिल्म के चलने की गारंटी नहीं देते.‘पीकू’ देखते हुए लगा जैसे हमारे घर के डाइनिंग टेबल पर होने वाला वार्तालाप सीधे हमारे खाने की मेज़ से उठा लिया गया है.फ़िल्मी चकाचौंध , ग्लैमर, हिंसा, नायिका का ज़ीरो फिगर और एक गाने में दस बार बदलते कॉस्ट्यूम की जगह सुंदरता के प्रतिमानों को ध्वस्त करती ये नायिकाएं आज की सामान्य लड़की का प्रतिनिधित्व करती हैं.रंगीन फूल पत्ते वाले कुर्ते और साडी़ पहने या राजस्थानी घाघरा और ढीला ढाला टाॅप पहने अंग्रेज़ी गाने पे बेलौस नाचती आत्मविश्वास से भरपूर एक नॉर्मल लड़की पहली बार फिल्म की हीरोइन बनी है!

हाल ही में रिलीज़ हुई दो फ़िल्में अपने विषय के कारण भरपूर चर्चा में रही हैं.दोनों फ़िल्मों में तीन तीन लड़कियां हैं – ज़ाहिर है, तीन प्रतिनिधि चरित्र .पिंक में महानगर में नौकरी करती तीन लड़कियों में एक पंजाबी, एक मुस्लिम और एक नाॅर्थ ईस्ट की .पर्चेड  में एक विधवा, एक पति की प्रताड़ना से त्रस्त बांझ और एक अपनी देह को अपनी मर्ज़ी से जीने वाली बिंदास लड़की.दोनों फ़िल्में आधुनिक दौर की हैं.पिंक फ़िल्म में जहां मनोरंजन, व्यवसाय और मुनाफ़े का नज़रिया अहम है, ‘पर्चेड’ एक कला फ़िल्म की श्रेणी में रखी जा सकती है हालांकि उसमें भी अन्तराष्ट्रीय बाज़ार को ध्यान में रखा गया है.एक स्त्री के अपनी यौनिकता पर अधिकार और प्रताड़ना या वंचना से बाहर आकर अपनी तरह से जीने के उल्लास को फ़िल्म रेखांकित करती है.फ़िल्म ‘पर्चेड’ में आया गांव और ग्रामीण स्त्री कितनी वास्तविक है और कितनी सिनेमाई, यह लंबी बहस का मुद्दा है।

पिंक फिल्म बाॅक्स आॅफ़िस पर सफल फ़िल्म है क्योंकि वह दर्शकों को अंत तक बांधे रखती है.आज की कामकाजी लड़कियों की अलग फ़लैट लेकर रहने की आज़ादी, एक छोटे से क़दम से उन्हें परेशानी में डाल देती है.एक घटना को  कोर्टरूम ड्रामा बनाकर पिंक फिल्म दर्शकों को उलझाए रखती है.फिल्म ‘‘तलवार’’ की अप्रत्याशित सफलता के बाद निर्देशक निर्माता ने दर्शकों की नब्ज पहचान ली और अमिताभ जैसे कलाकार को फिल्म का नायक बनाकर आधुनिक लड़कियों की समस्या पर एक कहानी बुन दी गई.फ़िल्म का सबसे बढ़िया संवाद — ‘‘नो एक शब्द नहीं, पूरा वाक्य है!’’ भी उसी नायक के हवाले कर दिया जिसने फिल्म की मार्किट वैल्यू बेशक बढ़ा दी पर स्त्री चरित्रों को कमजोर और असंतुलित कर दिया.यह मेसेज फिल्म के वकील महानायक की जगह अगर विक्टिम लड़की देती तो बात में कुछ ज़्यादा वज़न होता .बेशक उसे वकील साहब अपने पुरअसर अंदाज़ में दोबारा घोषित कर देते.

फिल्म हिट है इसमें कोई शक नहीं ! एक महत्वपूर्ण मेसेज की अति नाटकीय अदायगी के सारे झोल इसकी वजह से छिप गए हैं.अमिताभ की स्क्रीन वैल्यू से निर्माता निर्देशक इस कदर आक्रांत न होते तो फिल्म में तीन लड़कियों के किरदार सलीके से इस मेसेज को ज़्यादा बेहतर तरीके से दर्शकों तक पहुंचा पाते ! जितनी मशक्कत इस फिल्म के लेखक ने वकील दीपक सहगल के चरित्र का ग्राफ बनाने और धीमी आवाज से सप्तम के सुर तक संवाद लेखन का रिदम तैयार करने में लगाई, उससे चौथाई भी कहानी की मुख्य विक्टिम मीनल के मनोविज्ञान और उसकी दुविधा का ग्राफ बनाने में लगाते, तो उसे हकलाते हुए ‘‘न न… न्नो’’ बोलते तो न दिखाते.पुलिस स्टेशन जाने की शुरुआती हिचक से गुजर चुकने और कोर्ट केस एक बार शुरू हो जाने के बाद कोई भी सच्ची लड़की इतना डरते हुए नहीं बोलेगी.वास्तविकता बेशक भयावह है और आज गांव की या शहरी , कामकाजी या घरेलू किसी भी लड़की के साथ कहीं भी हादसा हो सकता है, बलात्कारी तक छूट जाते हैं, उनका पूरा परिवार कोर्ट कचहरी से जूझता थक जाता है और न्याय तब भी नहीं मिलता .लेकिन फ़िल्म में निर्माता निर्देशक का पहला सरोकार फ़िल्म में लगाई गई पूंजी आौर उससे मुनाफ़ा कमाना होता है .फ़िल्म अगर कोई संदेश  देने में सफल हो पाती है तो यह मनोरंजन के साथ एक अतिरिक्त बोनस है.पिंक फ़िल्म लड़कियों के ‘नहीं’ कहने और ‘नहीं’ को ‘नहीं’ समझे जाने के अधिकार के संदेश  को दर्शकों तक बखूबी पहुंचा  देती है.
बाॅक्स आॅफ़िस पर भी कामयाब होती ये फ़िल्में इस धारणा को पुख़्ता करती हैं कि आज हिंदी फिल्मों में उभरती नयी नायिकाओं के किरदार को और अपनी ज़मीन पहचानती लड़कियों की अलग किस्म की मानसिकता को आम दर्शक अपनी स्वीकृति देता है !जैसे-जैसे कहानियाँ नयी स्त्री की तलाश करती जा रही हैं, वैसे-वैसे नायिकाएँ बदल रही हैं.जैसे-जैसे स्त्री की उपस्थिति और उसकी भूमिकाओं का मूल्यांकन होता जाएगा, वैसे-वैसे नयी स्त्रियाँ आती जाएंगी और नायिकाओं का चेहरा और चरित्र बदलता जाएगा.इसकी आज सख्त ज़रूरत भी है.दरअसल नये माहौल में स्त्री के बदलते चेहरे को पहचानने की कोशिश  की जा रही है और इसमें अनंत संभावनाएं हैं, इसमें कोई संदेह नहीं.

शिवमूर्ति की कहानियाँ :स्त्री प्रश्न

रेणु चौधरी

जे.एन.यु.में शोधरत है
renu.jnu14@gmail.com

शिवमूर्ति हमारे समय के महत्वपूर्ण कथाकार हैं ये महानगर जीवन के नहीं ग्रामीण जीवन के कथाकार हैं. उनकी कहानियों में ग्रामीण परिवेश से जुड़ी स्त्री-जीवन की समस्याएँ चित्रित हैं. शिवमूर्ति की कहानियों में ग्रामीण जीवन की विषमताएँ और अंतर्विरोध अपने नग्न यथार्थ के रुप में अभिव्यक्त हुआ है. जहाँ जाति व्यवस्था की गहरी जड़ें मानवीय संबंधों को छिन्न-भिन्न करती दिखाई देती है. जहाँ स्त्री, दलित को गहन यातनाओं और विवशताओं से लगातार जीना पड़ता है. ‘कसाईबाड़ा’, ‘अकालदण्ड’, ‘तिरिया चरित्तर’ आदि कहानियों में इस यथार्थ को स्पष्टता के साथ देखा जा सकता है. इन कहानियों की स्त्रियाँ विमली, शनिचरी के साथ समाज, कानून, सरकारी तंत्र का व्यवहार और हथकण्डे ग्रामीण जीवन का कटु यथार्थ सामने ला कर रख देते हैं. ‘कसाईबाड़ा’ कहानी में  शनिचरी की हत्या कर ग्राम-प्रधान उसकी ही बेटी को वेश्या बनने पर विवश कर देता है. इसी प्रकार ‘तिरिया चरित्तर’ कहानी की नायिका विमली के साथ उसका ससुर ही अमानवीय कार्य करता है, गाँव, देश, समाज की बात तो छोड़ ही दीजिए. स्त्रियाँ घर में भी सुरक्षित नहीं हैं. इस पितृसत्तात्मक समाज में पुरुष अपने को श्रेष्ठ दिखाने के लिए जीवन-भर के लिए उसके चरित्र ही नहीं माथे पर भी दाग टांक देता है. ‘अकालदण्ड’ की सुरजी या फिर ‘केशर-कस्तूरी’ की केशर, इनके साथ जो कुछ भी घटित होता है वे पितृसत्तात्मक  समाज की क्रूरतम विकृतियाँ हैं, जिन्हें शिवमूर्ति यथार्थवादी ढंग से प्रस्तुत करते हैं. ये सभी कहानियाँ आजादी के बाद के भारतीय गाँव की कहानियाँ है. जहाँ विकास के नाम पर गाँव का दोहन तो हुआ ही, लेकिन निचली पायदान पर खड़ा व्यक्ति, व्यक्ति नहीं रह पाता है. जीवन इतना विषाक्त हो जाता है कि साधारण जन के लिए सांस लेना भी दूभर है. पंचायती राज के नाम पर स्त्रियों और दलितों का शोषण आम बात हो गयी है जिसे शिवमूर्ति अपनी कहानियों में पुरजोर ढंग से उठाते हैं.


शिवमूर्ति शोषण के विरूद्ध कहीं भी ‘लाऊड’ नहीं होते. शोर का प्रतिरोध शोर नहीं, एक धीमी सी चुप्पी होती है. शिवमूर्ति की कहानियाँ बिना ‘लाऊड’ हुए, धीमे से अपना असर पाठक के मन में पैदा करती हैं. पाठक उनकी कहानियों से सीधे जुड़ जाता है. वे शिल्प और भाषा के जंगल में पाठकों को नहीं छोड़ते, बल्कि उनके साथ स्वयं एक यात्री बनकर सफर करते हैं. जंगल के सुख-दुख, यंत्रणा-यातना, भय-डर को भोगते हैं. समाज में जिस प्रकार स्त्री की छवि पहले थी, शिवमूर्ति उसी रुप में उसे देखते हैं तथा स्त्री-जीवन को एक नई वास्तविकता के साथ चित्रित करने की कोशिश करते हैं. शिवमूर्ति ने अपनी कहानियों में उन सामाजिक समस्याओं को केन्द्रीयता दी है जो भारतीय समाज का अभिन्न अंग होते हुए भी प्रत्येक भारतीय के जीवन की समस्याएँ हैं. स्त्री सदियों से जिस पीड़ा एवं दंश को झेलती रही है, शिवमूर्ति ने उसके विविध पक्षों को अपनी कहानियों में बहुत ही मार्मिक ढंग से उकेरा है. दरअसल शिवमूर्ति को अपने समय और समाज की बुनियादी विसंगतियों का तीखा एहसास है जिसके कारण वे रचना में एक संघर्ष खड़ा करते हैं.शिवमूर्ति ने अपनी कहानियों में स्त्री-जीवन के हर एक पहलू को चित्रित किया है. उन्होंने स्त्री-जीवन की प्रत्येक समस्याएँ, उनमें विद्यमान साहस, त्याग, करूणा, दृढता और संयम जैसे उच्च मानवीय गुणों के साथ-साथ ईर्ष्या-द्वेष, रुढिवादिता, धर्मभीरुता अंधविश्वास जैसी दुर्बलताओं का भी जीवंत चित्रण किया है.

 शिवमूर्ति स्त्री-जीवन के जिस यथार्थ को अपनी कहानियों में लेकर आते हैं, वह आजादी के बाद के सामाजिक परिवेश का स्वरुप है. आजादी के पहले वैश्विक परिदृश्य पर कई नारीवादी आंदोलन हो चुके थे. इन आंदोलनों का प्रभाव साहित्य पर भी पड़ने लगा था. हिन्दी में महिला कथाकारों का एक वर्ग भी उभर चुका था, जो स्त्री के सामाजिक, आर्थिक और निजी जीवन को कहानी का विषय बनाने लगी थी. महिला कथाकारों की रचनाओं में स्त्री-जीवन को स्त्री चेतना की दृष्टिकोण से चित्रित किया जाने लगा था. ‘‘स्वतंत्रता-प्राप्ति के पश्चात् नारी घर से बाहर आकर सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक क्षेत्रों में भाग लेने के बाद भी परंपरागत संस्कारों से पूर्णतया अलग नहीं हो पायी है. भारत की सामाजिक व्यवस्था में आये परिवर्तनों ने नारी के व्यक्तित्व के विकास में कतिपय आधार तो बदले किन्तु पारिवारिक दृष्टि से नारी आज भी परिवार का केन्द्र बिन्दु है और पुरुष परिवार का अधिकारी.’’1
शिवमूर्ति की कहानियों की मूल शक्ति है उनकी अपने आस-पास की रोजमर्रा के यथार्थ को जानने की तीव्र संवेदनीय दृष्टि. उन्होंने अपनी कहानियों में समाज के निचले पायदान या हाशिए के समाज के स्त्री-जीवन का यथार्थ चित्रण किया है. शिवमूर्ति की कहानियों में स्त्री और ‘दलित स्त्री’ का स्वरुप विशेष रुप से विद्यमान हैं. वह उनकी समस्याओं से पाठक को रुबरु कराते हैं. समाज में चली आ रही कुरीतियों पर से वह पर्दा हटाते हैं. ‘कसाईबाड़ा’, ‘अकालदण्ड’ और ‘सिरी उपमा जोग’ कहानियों में हर रुप से स्त्री दमित है. उसका शोषण हो रहा है और ये शोषण करने वाले कुछ गाँव के लोग हैं या कुछ अपने परिवार के लोग हैं. शिवमूर्ति की कहानियों में स्त्री-अस्मिता और जाति का सवाल अहम मुद्दा है. ‘सिरी उपमा जोग’ एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है, जिसने दो शादियाँ की है. जब वह कुछ नहीं था, तब उसकी ग्रामीण पत्नी ने उसका साथ दिया. लेकिन जैसे ही वह अफसर बन जाता है तो पत्नी उसे जाहिल और गवाँरु लगने लगी| ऐसी स्थिति में मानवीय संवेदना को खत्म होते शिवमूर्ति ने दिखाया है.
पितृसतात्मक समाज में यौन शुचिता स्त्री की सबसे बड़ी पूँजी मानी जाती है. ‘भरतनाट्यम’ कहानी की स्त्री पात्र ऐसे समाज की कड़ी निंदा करते हुए सारे नैतिकता के बंधनों को तोड़ देती है. स्त्री की गुलामी एक दिन में नहीं, बल्कि एक लम्बी ऐतिहासिक प्रक्रिया के दौरान कायम हुई है. आधुनिक समाज में भी यही पुरुष सत्तात्मक व्यवस्था कायम है. ऐसी स्थिति में यह तय करना कठिन हो जाता है कि स्त्री के मुक्ति किससे चाहिए. शिवमूर्ति की कहानियाँ इस यथार्थ को खोजने के क्रम में अन्य कई तरह के स्त्री प्रतिरोधों को सामने लाती है. केशर-कस्तूरी कहानी में केशर के मौसा जब उसके पति को गैर जिम्मेदार बताते हुए उसके दूसरे विवाह का प्रस्ताव रखते हैं, जिसके पीछे सिर्फ यह कारण है कि वह कमाता नहीं है, तो केशर उनका खुल कर विरोध करती है. यह सिर्फ उस समाज के लिए नहीं है, बल्कि पूरी व्यवस्था के लिए चुनौती है. वह पूछती है कि क्या कमाना ही मनुष्य का जीवन आधार है? केशर अपने पिता के घर जाने से भी इनकार कर देती है.

शिवमूर्ति एक मात्र ऐसे कथाकार हैं, जिनकी कहानियों की अधिकतर नायिकाएँ ही कहानियों की नायक हैं. जहाँ वे केन्द्र में नहीं है, वहाँ भी उनकी भूमिका कम महत्वपूर्ण नहीं है. अधिकतर पुरुष पात्र या तो लम्पट होते हैं या भ्रष्ट. अगर कहीं वे सकारात्मक भूमिका में आते भी हैं तो ऐसा लगता है कि स्त्री पात्रों को और मजबूत करने के लिए आए हैं. दलित चिंतक और आलोचक ओमप्रकाश वाल्मीकि कहते हैं ‘‘उनकी कहानियाँ नायिका प्रधान हैं. ‘तिरिया चरित्तर’, ‘सिरी उपमाजोग’ ‘कसाईबाड़ा’, ‘तर्पण’ आदि में स्त्री की वेदना, उसका संघर्ष, अपमान, प्रताड़ना, कामवासना, पारस्परिक रिश्तों की जकड़न, पारिवारिक विघटन सभी कुछ गहरी वेदना के साथ अभिव्यक्त होते हैं.’’2 यह वेदना वही अनुभव कर सकता है, जो गहरे रुप में स्त्रियों से जुड़ा हो. यह जुड़ाव वहाँ से आता है, जहाँ संवेदनशीलता होती है.

 शिवमूर्ति एक संवेदनशील कथाकार एवं व्यक्ति है. उनकी स्वीकारोक्ति भी है ‘पता नहीं मेरा अवचेतन मन स्त्रियों को ही मेरी कहानियों के मुख्य पात्र के रुप में क्यों चुनता है. शायद स्त्री की पीड़ा, उनके द्वारा घर बाहर दोनों जगह झेला जाने वाला अन्याय, इसका कारण है.’ अर्थात शिवमूर्ति यह मानते हैं कि स्त्रियाँ दोहरी मार को झेलती है. एक तो घर में दूसरा बाहर यानि समाज में.’ इन दोनों स्थितियों को 1984 ई. में ‘सारिका’ में प्रकाशित कहानी ‘सिरी उपमा जोग’ की नायिका का एक पात्र बड़ी बेबाकी से प्रस्तुत करता है ‘‘सरब सिरी उपमा जोग’, खत लिखा लालू की माई की तरफ से, लालू के बप्पा को पाँव छूना पहुँचे…आगे समाचार मालूम हो कि हम लोग यहाँ पर राजी-खुशी से हैं और आपकी राजी-खुशी भगवान से नेक मनाया करते हैं. आगे, लालू के बप्पा को मालूम हो कि हम अपनी याद दिलाकर आपको दुःखी नहीं करना चाहते, लेकिन कुछ ऐसी मुसीबत आ गई है कि लालू को आपके पास भेजना जरुरी हो गया है. लालू दस महीने का था, तब आप आखिरी बार गाँव आए थे. उस बात को दस साल होने जा रहे हैं. इधर दो-तीन साल से आपके चाचाजी ने हम लोगों को सताना शुरु कर दिया है. किसी न किसी बहाने से हमको, लालू को और कभी-कभी कमला को भी मारते-पीटते रहते हैं. जानते हैं कि आपने हम लोगों को छोड़ दिया है, इसलिए गाँव भर में कहते हैं कि ‘लालू’ आपका बेटा नहीं है….|’’3 यह पूरा पत्र पढ़कर एक झटके में यह समझा जा सकता है कि स्त्रियाँ एक ही जीवन में कितने जीवन के दुखों को झेलती है. लालू के बप्पा अर्थात नायक ए.डी.एम बनकर उसी जिले में आया है जहाँ दस साल पहले वह पत्नी और अपने दोनों बच्चों को छोड़कर गया था. आज उसी के चाचा उसकी पत्नी को एवं बच्चों को मारते-पिटते हैं ताकि जो थोड़ी- बहुत जमीन जायदाद पर उनकी पत्नी एवं बच्चे लालू का हक हैं, वे भी खत्म हो जाए. वैसे तो यह कहानी 1984 की है, लेकिन आज तीस साल बाद भी गाँव में कुछ नहीं बदला है. आज भी स्त्रियाँ इसी नारकीय जीवन को जीने के लिए अभिशप्त है. सदियों से स्त्रियों की स्थिति समाज में दोयम दर्जे की रही है, इसे शिवमूर्ति ने बहुत ही बारीकी से देखा है.


शिवमूर्ति बार-बार अपने साक्षात्कारों में गाँव की स्त्रियों की जीवंतता के बारे में, उनके परिश्रम और जीवन के प्रति उनके सकारात्मक लगाव को उद्धृत करते हैं. ‘सिरी उपमा जोग’ में भी वे दिखलाते हैं कि लालू की माँ कितनी मेहनती, जिंदगी के प्रति आस्थावान और आत्मविश्वास से जुड़ी है. नायक याद करता है ‘‘बहुत गरीबी के दिन थे, जब उनका गौना हुआ था. इंटर पास किया था उस साल. लालू की माई बलिष्ठ कद-काठी की हिम्मत और जीवट वाली महिला थी, निरक्षर लेकिन आशा और आत्मविश्वास की मूर्ति. उसे देखकर उनके मन में श्रद्धा होती थी उसके प्रति. इतनी आस्था हो जिंदगी और परिश्रम में तो संसार की कोई भी वस्तु अलभ्य नहीं रह सकती. बी.ए. पास करते-करते कमला पैदा हो गई थी. उसके बाद बेरोजगारी के वर्षों में लगातार हिम्मत बँधाती रहती थी. अपने गहने बेचकर प्रतियोगिता परीक्षा के शुल्क और पुस्तकों की व्यवस्था की थी उसने. खेती-बारी का सारा काम अपने जिम्मे लेकर उन्हें परीक्षा की तैयारी के लिए मुक्त कर दिया था. रबी की सिंचाई के दिनों में सारे दिन बच्ची को पेड़ के नीचे लिटाकर कुएँ पर पुर हाँका करती थी. बाजार से हरी सब्जी खरीदना सम्भव नहीं था,लेकिन छप्पर पर चढ़ी हुई नेनुआ की लताओं को वह अगहन-पूस तक बाल्टी भर-भर कर सींचती रहती थी, जिससे उन्हें हरी सब्जी मिलती रहे. रोज सबेरे ताजी रोटी बनाकर उन्हें खिला देती और खुद बासी खाना खाकर लड़की को लेकर खेत पर चली जाती थी. एक बकरी लाई थी वह अपने मायके से, जिससे उन्हें सबेरे थोड़ा दूध या चाय मिल सके. रात को सोते समय पूछती, अभी कितनी किताब और पढ़ना बाकी है, साहब वाली नौकरी पाने के लिए.’’4 लेकिन यही नायक जब नौकरी पाता है तो धीरे-धीरे लालू की माँ के साथ उसका व्यवहार बदलने लगता है. जिस स्त्री का संग-साथ पाकर वह लताओं की तरह आसमान की बुलदिंयों की तरफ बढा. जिससे कमला और लालू जैसे फूल से बच्चों का जन्म हुआ. उसी के गँवारपन पर वह खीजने लगता है. उसकी देह से उसे भूसे जैसी गंध आने लगती है. धीरे-धीरे वह उससे दूर होता है और फिर सारे संबंध तोड़कर जीवन की दौड़ में दौड़ने लगता है.



बेरोजगारी के दिनों पर शिवमूर्ति की दो कहानियाँ ‘भरतनाट्यम’ और ‘सिरी उपमा जोग’ है, तो साथ में ‘केशर-कस्तूरी’ में भी केशर के बहाने उसका कुछ दंश देखने को मिलता है. ‘सिरी उपमा जोग’ अफसर बन जाने के बाद, बेरोजगारी और अपने परिवार को याद करने की अर्थात संघर्ष के दिनों को याद करने की कहानी है तो ‘भरतनाट्यम’ पीड़ा को भोगते हुए लिपिबद्ध करते जाने की. इन दोनों कहानियों में स्त्रियाँ अहम् रोल निभाती हैं.‘सिरी उपमा जोग’ में लालू की माई अपने अफसर बनने वाले पति में होने वाले परिवर्तन को पहले ही भाँप लेती है. तभी तो कहती है ‘‘मैं तो शहर में आपके साथ रहने लायक भी नहीं हूँ.’’5 क्योंकि गाँव की यह हिम्मती और जीवट वाली भोली-भाली महिला यह आगे ही भाप लेती है कि अफसर के साथ एक देहाती महिला का निर्वाह नहीं हो सकता. वह सिर्फ उनके दुःखों की साथी है. उन्हें हौसला और ढाँढ़स बंधा सकती है. उन्हें आगे बढ़ने के लिए हिम्मत दे सकती है. खुद उनके साथ आगे नहीं जा सकती है. वह जानती है कि उसका पति शहर में शादी कर चुका है. इस बात को वह सहज ढंग से स्वीकार भी कर लेती है. वह चिट्ठी लिखती है ‘‘कमला नई अम्मा के बारे में पूछती है. कभी ले आइए उनको गाँव. दिखा-बता जाइए कि गाँव में भी उनकी खेती-बारी, घर-दुवार है. लालू अब दौड़ लेता है. तेवारी बाबा उसका हाथ देखकर बता रहे थे कि लड़का भी बाप की तरह तोता-चशमा होगा. जैसे तोते को पालिए-पोसिए, खिलाइए-पिलाइए, लेकिन मौका पाते ही उड़ जाता है. पोस नहीं मानता. वैसे ही यह भी…तो मैंने कहा, बाबा, तोता पंछी होता है, फिर भी अपनी आन नहीं छोड़ता, जरुर उड़ जात है, तो आदमी होकर भला कोई कैसे अपनी आन छोड़ दे? पोसना कैसे छोड़ दे? मैं तो इसे इसके बापू से भी बड़ा साहब बनाऊँगी….’’6 तो यह है उसकी जीजिविषा. वह अपनी आन नहीं छोड़ना चाहती. मनुष्य होने की आन. जबकि नायक अपराधबोध ग्रस्त होकर स्वयं स्वीकार करता है कि ‘‘क्या मिला उसको उन्हें आगे बढ़कर? वे बेरोजगार रहते, गाँव में दोनों सुख की नींद सोते. तीनों लोकों का सुख उसकी मुट्ठी में रहता. छोटे से संसार में आत्मतुष्ट हो जीवन काट देती. उन्हें आगे बढ़ाकर वह पीछे छूट गई. माथे का सिंदूर और हाथ की चूड़ियाँ निरंतर दुःख दे रही हैं उसे.’’7 जबकि शहर की पत्नी जरा भी सहिष्णुता नहीं दिखलाती. वह एकदम लालू की माई की उलट है.
‘भरतनाट्यम’ भी बेरोजगारी और बेरोजगार युवा ज्ञान की कहानी है. यह कहानी भी पिता, पुत्र और पत्नी के इर्द-गिर्द ही घूमती रहती है. कहानी की शुरुआत ही होती है बाप के डाँटने से. यह कहानी टूटते हुए मूल्यों की है. पिता के प्रति सम्मान और प्रेम का भाव गायब है. शिक्षा-व्यवस्था के प्रति नाराजगी है. जीवन में आदर्शों के खत्म होते चले जाने की दास्तान है. बेरोजगारी का दंश है और सबसे बड़ी बात कि एक स्त्री के अंदर लड़के की चाहत के फलस्वरुप नैतिकता के सारे बंधन तोड़ कर निकल जाने का साहस है. यह साहस कहानी को एक नया आयाम देती है. यहाँ एक नये ढंग का सामाजिक यथार्थ प्रकट होता है.यह कहानी कई स्तरों पर चलती है. कई छोटी-छोटी कहानियाँ मिलकर एक लम्बी कहानी बन पड़ी है. यह कहानी पति-पत्नी के संबंधों की है. उनके आपसी समझ और प्रेम की है. पत्नी पढ़ी-लिखी नहीं है. इसकी वजह से वह अपनी तरफ से कुछ बातों को तय करती है, जैसे गाँव की महिलाएँ करती है. जैसे लड़का न होने के लिए वह एक्स और वाई क्रोमोजोम के बदले इसमें विश्वास करती है कि ‘‘यदि पति तगड़ा है तो लड़का होगा, पत्नी तगड़ी है तो लड़की.’’8 और इस बात को सिद्ध करने के लिए अपने जेठ-जेठानी का उदाहरण भी देती है. वह अपने पति को चोरी से दूध भी पिलाती है ताकि ‘‘अधिक स्वस्थ होकर मैं उसे एक बेटा दे सकूँ.’’9 इतना ही नहीं एक दिन घर को खाली पाकर उन्हें(जेठ) अपने साथ संबंध बनाने के लिए तैयार भी कर लेती है और पकड़े जाने पर स्वीकार भी करती है कि ‘‘उनकी कोई गलती नहीं है. मैं ही उनका हाथ पकड़कर मंडहे से लिवा लाई थी, बेटा पाने के लिए’’10 और अंत में वह खलील दर्जी के साथ कलकता भाग जाती है, बेटा पाने की आस में.

कहानी में चाहे जितनी भी कहानियाँ हो. यह कहानी एक स्त्री की सदियों से दबाए गए इच्छा को बिना किसी स्त्री विमर्श के हमारे सामने प्रस्तुत करती है कि स्त्री की देह और उसकी इच्छा पर उसका अधिकार होना चाहिए. उसका भाग जाना और जेठ से शारीरिक संबंध बनाना सामाजिक रुप से अनैतिक हो सकता है लेकिन एक स्त्री के नजरिए से देखा जाए तो यह कहीं से भी अनैतिक नहीं है. उसकी परवरिश ही ऐसी है. उसे अपने ससुराल में लड़की पैदा किए जाने के लिए बार-बार लांक्षित होना पड़ता है. इसके लिए उसके पति को भी लांक्षित होना पड़ता है. जबकि वह मानती है कि इसमें उसका कोई दोष नहीं है. सारा दोष पति का है. यह मानने के पीछे उसके अपने तर्क है. किसी भी ग्रामीण पृष्ठभूमि की स्त्रियों के यहाँ समाज में लड़के का क्या महत्व है? यह किसी उत्तर भारत के व्यक्ति से पूछ कर देखिए. लड़के को लेकर उनकी क्या मानसिकता है, यह कहानी उसके कई परतो को भी खोलती है. वह स्वयं इस मामले में पत्नी को मौन समर्थन देता हुआ सामने आता है. वह कहता भी है ‘‘चली गई, चलो, जहाँ भी रहे, सुखी रहे….लेकिन भागना ही था तो एक दिन पहले भाग जाती. मैं टूटने से बच जाता…घूस देने से…पथभ्रष्ट होने से…पता मालूम होता तो ये ब्रेजियर, ब्लाउज वगैरह पार्सल कर देता…लिखता कि बेटा होने पर खबर करे. मैं खिलौने लेकर आऊँगा.’’11 अर्थात वह पत्नी के इस कृत्य को कहीं से भी गलत नहीं पाता है. बल्कि उसे ‘सर्पोट’ ही करता है. नहीं तो क्या कारण है कि वह खिलौने लेकर आने की सोचता है. कहीं न कहीं उसके मन में भी लड़के की चाहत है. और होती क्यों नहीं? वह भी तो उसी के बहाने अपने पिता से लांक्षित होता रहता है. जब तब संपति से बेदखल कर दिए जाने की घोषणा के साथ.

ज्ञान पढ़ा-लिखा नौजवान है. वह नसबंदी के फायदे नुकसान जानता है. तीन-तीन बेटियों के पैदा होने के बाद भी वह अपनी नसबंदी नहीं कराता. जबकि कायदे से तो उसे दो बेटी के बाद ही नसबंदी करा लेना चाहिए था. कहीं न कहीं वह खुद बेटे की हसरत को अपने अंदर दबाए बैठा है. इसलिए वह अपनी पत्नी को रंगे-हाथों पकड़े जाने के बाद भी उस पर गुस्सा नहीं होता. बल्कि उसके न रहने पर अपने आलम्बन के छूट जाने का भय उसे सताता है. वह अपने लिए स्वयं तर्क देता है ‘‘इस तरह के छिटपुट यौन-संबंधों को मैं गम्भीरता से नहीं लेता. इसे मेरा दमित पुंसत्व कहिए या लिबरल आउटलुक. मैं पाप-पुण्य, जायज-नाजायज, पवित्र-अपवित्र और सतीत्व-असतीत्व के मानदंडों से भी सहमत नहीं हूँ. माँगकर रोटी खा ली या कामतुष्टि पा ली एक ही बात है. प्राचीन काल की नियोग प्रथा को मैं आज के युग में भी उतना ही उपयोगी मानता हूँ. मैं भयभीत हुआ था तो सिर्फ इस बात से कि इन दिनों मैं जिस हताशा और निपट एकाकीपन की अँधेरी गुफा में फँसा हूँ, वहाँ पत्नी ही एकमात्र ऐसा आलम्ब है, जिसके आँचल में मुँह छिपा लेने पर घड़ी-दो घड़ी सुकून मिल जाता है. यह आलम्ब भी छूट गया तो झेल नहीं पाऊँगा. पैर उखड़ जाएँगे और मैं डूब जाऊँगा.’’12 यानी पत्नी के आँचल का बने रहना उसके लिए बहुत जरुरी है ताकि वह टूटने से बच जाए. वास्तव में कहानियाँ कहीं आसमान में पैदा नहीं होती. वह इसी संसार की उपज होती हैं. ऐसी घटनाएँ एक नहीं कई है जो समाज में घटित होती है. शिवमूर्ति इस घटना को वहाँ से लेते हैं और अपनी कहानी में डाल देते हैं.

1987 की ही उनकी एक और कहानी है जो हंस में प्रकाशित हुई थी. शीर्षक है-‘अकालदण्ड’. इसकी नायिका का नाम है-सुरजी. कहानी तो अकाल के बारे में है. लेकिन कहानी के केन्द्र में है सुरजी और सुरजी की गोरी चमड़ी और दप-दप जलती रुप राशि, सुरजी जवान है. सुंदर है. बलिष्ठ है. आकर्षक है. इस अकाल में भी उसकी देहष्ठि निरोग है और इसी देह का तो रोना है. यह देह न होता तो स्त्रियाँ कितने आत्याचारों से बच जाती. सुरजी हो या विमली (तिरिया-चरित्तर की नायिका या रुपमती, (कसाईबाड़ा की नायिका की बेटी) या सुगनी या अन्य नायिकाएँ, सभी सेक्रेटरी, अपने ससुर, गाँव के प्रधान या अन्य पुरुष पात्रों की कुदृष्टि की शिकार होती है. जो शिकार होने से बच जाती हैं, उन पर उन्हीं के नजदीकी लोग लांछन या चरित्रहीनता का अरोप लगाकर समाज में बदनाम करवा देते हैं. कहीं इसका कारण जमीन-जायदाद है तो कहीं कुछ. स्त्रियाँ हमेशा सतायी जाती हैं. जो स्त्रियाँ प्रतिवाद करती हैं, उन्हें कहानी के पुरुष पात्र किसी न किसी प्रकार दबाकर मजा चखाना चाहते हैं. इस अभियान में वे सफल होते भी दिखते हैं.

सुरजी प्रतिरोध करती है. ‘सिक्रेटरी बाबू’ सुरजी के प्रतिरोध को किसी भी हालात में स्वीकार में बदलना चाहते हैं. छल, बल और कल किसी भी तरीके से. पहले तो वह सुबह-सुबह सुरजी को पकड़ता है. उसे प्रलोभन देता है. फिर उसके घर में घुसकर उसके साथ जबरदस्ती करना चाहता है. वहाँ भी सफल नहीं होता तो रंगी बाबू को ढाल बनाकर सुरजी पर आक्रमण करता है. लेकिन यहाँ प्रतिरोध अपने चरम पर होता है और सुरजी हंसिए से उनकी देह का नाजुक हिस्सा अलग कर देती है. सुरजी प्रतिरोध के चरम पर एक दिन में नहीं पहुँचती. पहले तो वह इस हादसे के बारे में किसी से नहीं कहती . सोचती है ‘‘सिक्रेटरी के खिलाफ इस गाँव में बोलने वाला कौन है? उल्टे अपने ही ‘पत-पानी’ से हाथ धोना पड़ेगा.’’13 सुरजी एक सामान्य ग्रामीण महिला है. उसे अपनी ‘मरजाद’ का पता है. उसे यह भी पता है कि सिक्रेटरी और रंगी बाबू दोनों रंगे सियार है. एक सांपनाथ तो दूसरा नागनाथ. लेकिन सुरजी या गाँव की स्त्रियाँ या कहीं की भी स्त्रियाँ तब तक प्रतिरोध पर नहीं उतरती जब तक उनकी सहनशक्ति उनके साथ होती है. कोई भी स्त्री प्रतिरोध पर तभी उतरती है, जब उसके बच निकलने के सारे दरवाजे बंद हो जाते हैं. नहीं तो जो सुरजी ‘‘बूढ़ी न होती तो वह कब की अपने मायके निकल गई होती.’’14 सोचती है. वह सेकरेटरी बाबू का नाजुक हिस्सा काटने की हिम्मत ही नहीं कर पाती क्योंकि इतना तो वह भी जानती है कि इसके बाद बचे रहना मुश्किल ही होगा.



शिवमूर्ति की कहानी ‘तिरिया चरित्तर’ में भी स्त्री-जीवन का यथार्थ चित्रण हुआ है. महेश कटारे कहते हैं कि ‘‘तिरिया चरित्तर’ की विमली जो बड़ी हिम्मत और जतन से स्वयं को अपने अनदेखे पति के लिए सुरक्षित रखती है, अपने ही ससुर के धार्मिक कपट और वासना का शिकार हो, दण्ड भोगती हैं, किन्तु वह प्रतिरोध भी करती है. यही प्रतिरोध उसे प्रेमचंद की धनिया, नागार्जुन की उग्रतारा या रांगेय राघव की गजल से जोड़ता है.’’15 यह कहानी बहुत ही प्रमाणिक ढंग से पितृसत्तात्मक समाज के व्यवहार पर रोशनी डालती है. इस कहानी में पंचायत के बीभत्स स्वरुप को दिखाया है. यह वही पंचायत है जिसके बारे में प्रेमचंद ने एक आदर्श छवि प्रस्तुत करते हुए ‘पंच-परमेश्वर’ जैसी कहानी लिखी थी. कहानी के पात्र जुम्मन के माध्यम से कहलवाते हैं ‘‘…आज मुझे ज्ञात हुआ कि पंच के पद पर बैठ कर न कोई किसी का दोस्त होता है, न दुश्मन. न्याय के सिवा उसे और कुछ नहीं सूझता. आज मुझे विश्वास हो गया कि पंच की जबान से खुदा बोलता है.’’16 लेकिन आज पंचायत का यह रुप बदल गया है. ससुर द्वारा बहू का बलात्कार और उस पर ससुर के पक्ष में पंचायत का यह फैसला हमारे समय की कई महत्वपूर्ण घटनाओं की याद दिलाता है. यह फैसला किसी खाप पंचायत के फैसले से कम नहीं मालूम होता है. यह फैसला इस बात की ओर इशारा करता है कि हमारा समाज आज भी स्त्री के प्रति किस कदर मध्यकालीन नैतिकता के हिंसक व्यवहार से भरा है. ‘तिरिया चरित्तर’ के संदर्भ में स्त्रियों को लेकर जो लोगों के मन में अवधारणाएँ बनी हुई है. शिवमूर्ति इस कहानी के माध्यम से उसे पूरी तरह से तोड़ते दिखाई पड़ते हैं. इस कहानी के माध्यम से यह सिद्ध करने की कोशिश करते हैं कि सिर्फ स्त्री का ही चरित्र निकृष्ट एवं दोयम दर्जें का नहीं हो सकता है, बल्कि एक पुरुष का भी चरित्र स्त्री के बरक्स लम्पट या चरित्रहीन हो सकता है.

शिवमूर्ति पुरुष को तिरियाचरित्र से युक्त दिखाकर भारतीय परंपरा के उस वर्चस्व को खारिज करते हैं जो सदियों से स्त्रियों के प्रति बना हुआ है. स्त्रियाँ ही सिर्फ ‘त्रिया-चरित्र’ नहीं करती. पुरुष भी करते हैं और जब पुरूष करता है तो वह कितना नीचे गिर जाता है, इसे ही दिखलाने की कोशिश ‘विसराम’ के रुप में शिवमूर्ति करते हैं.आज विमर्श के युग में जिस प्रकार से स्त्रियाँ सामने आकर मुखर हो रही हैं, उसके कुछ अंश शिवमूर्ति की कहानियों में 80 के दशक में ही झलक रहे थे. शिवमूर्ति ही नहीं उस दशक के कथाकारों में संजीव, ममता कालिया, चित्रा मुद्गल आदि कहानीकार स्त्रियों की मुक्ति की पैरवी लगातार अपनी कहानियों में करते रहे. लेकिन इनकी अधिकतर नायिकाएँ पढ़ी-लिखी और शहरी जीवन से निकलकर आती है. वे नौकरीपेशा है. वे स्त्रियों की मुक्ति की अवधारणा को समझती हैं. उस पर विचार-विमर्श करती है. शिवमूर्ति की कहानियाँ एकदम इसके उलट हैं. वे अनपढ़ हैं. गरीब हैं. गाँव की हैं. इससे पहले अमरकांत, शेखर जोशी, काशीनाथ सिंह, रेणु और प्रेमचंद के यहाँ स्त्रियाँ हैं, जो अपनी मुक्ति की बात तो करती है पर इतने मुखर ढंग से नहीं. प्रेमचंद से शिवमूर्ति तक आते-आते हिन्दी कहानी में प्रतिरोध की संस्कृति का अग्रगामी विकास हुआ. इस विकास को गति देने में शिवमूर्ति की कहानियों का विशेष महत्व है.

शिवमूर्ति ने स्त्री-जीवन की समस्याओं को बहुत ही करीब से देखा है और उसके मार्मिक पहलू को बड़ी ही ईमानदारी के साथ अपनी कहानियों में अभिव्यक्त किया है. शिवमूर्ति की कहानियों की स्त्रियाँ ग्रामीण समाज की है, जहाँ शिक्षा का अभाव है. ग्रामीण समाज की स्त्रियाँ आज भी शिक्षा से वंचित है. वह चारदीवारी में रहने के लिए अभिशप्त है. कब तक किसी को बांधकर रखा जा सकता है. आज ग्रामीण समाज की स्त्रियाँ हो या शहरी समाज की सभी अपने अधिकारों के प्रति सजग हो गई है. अगर ऐसा न होता तो ‘कसाईबाड़ा’ की शनिचरी परधान के खिलाफ अनशन नहीं करती, कहीं न कहीं उसके अंदर यह चेतना आयी है. वह गलत और सही का फैसला करने लगी है. वह पुरूष के हथकंडे को समझ गई है. वह जान गई है कि देवता का मुखौटा पहने, ये सारे राक्षस है जो उनकी बहू-बेटियों को खाने के लिए आगे बढ़े आ रहे हैं. उनके लिए सारे रिश्ते-नाते बेमानी हो गए हैं. वे गाँव की लड़कियों को ‘सामूहिक विवाह’ के नाम पर बेच देते हैं. उस पैसे से मकान बनवाते हैं. जो उनका विरोध करता है, उन्हें रातों-रात गायब करवा देते हैं. विरोध की आवाज को बंद करवाने के उनके पास हजारों तरीके है. साम, दाम, दण्ड, भेद किसी भी तरीके से. बस उनके भोग की संस्कृति चलती रहे और दुनिया चुप रहे. पुरूषवादी मानसिकता के साथ-साथ यह ‘सत्ता’ की संस्कृति भी है. सत्ता बहुत ही क्रूर होती है. वह अपने विरोधियों को कुचलने के लिए उनकी हत्या तक करवा देती है.

शिवमूर्ति अपनी कहानियों में इस मानसिकता और संस्कृति के खिलाफ खड़े होते हैं. यह समाज आज भी पुरुषवादी समाज है. पुरुष इतनी जल्दी अपनी सत्ता को नहीं छोड़ सकता, इसलिए स्त्री आज भी शोषण का शिकार ज्यादा हो रही है. इस शोषण में समाज के साथ-साथ उसके घर-परिवार वाले भी शामिल है. शोषण सिर्फ शारीरिक और आर्थिक मोर्चे पर ही नहीं हो रहा है. मानसिक शोषण भी शोषण का एक तरीका है. ‘सिरी उपमा जोग’ कहानी के बहाने शिवमूर्ति इस तरफ इशारा करते हैं किस तरह लालू की माई शारीरिक के साथ-साथ मानसिक रूप से लालू के दादा के द्वारा सताई जा रही है.शिवमूर्ति का सारा लेखन इस स्त्री शोषण के खिलाफ एक परचम की तरह खड़ा है. वे स्त्रियों के सम्मान तथा उनके हक-अधिकार के लिए लगातार अपनी कलम चलाए जा रहे हैं. स्वाधीनता आंदोलन के समय में किसी ने प्रेमचंद से पूछा था कि आप कमरे में रहकर किस तरह देश की आजादी की बात कर सकते हैं. प्रेमचंद ने उत्तर दिया था- अपनी कलम के द्वारा. स्त्रियों की मुक्ति के संदर्भ में शिवमूर्ति वही काम करते हैं. शिवमूर्ति प्रेमचंद की उसी परंपरा के लेखक एवं कथाकार है, जो स्त्रियों को भोग्या नहीं बल्कि अपनी तरह इंसान समझते हैं.शिवमूर्ति की कहानियों में अभिव्यक्त स्त्री-जीवन की जब हम बात करते हैं तो कहीं न कहीं शिवमूर्ति अपने समकालीन कहानिकारों से अपनी एक अलग पहचान बनाते हैं. शिवमूर्ति की कहानियों की स्त्री पात्र कर्मठ और जीवंत हैं. वे अपने समकालीन कथाकारों से इस मायने में भी अलग है, क्योंकि इन्होंने अपनी कहानियों में उत्पीड़ित समाज के सवालों को अपने कथासाहित्य का विषय बनाया है. जो कि उनके समकालीन कथाकारों में नहीं दिखाई पड़ता है. इनकी कहानियों की स्त्रियाँ ज्यादातर निम्न वर्ग या दलित वर्ग की हैं जो सदियों से हाशिए पर रही हैं. जिसका शोषण कहीं भी और कोई भी करता रहा है. इसी हाशिए के समाज को अपने समय का सबसे बड़ा प्रश्न मानकर शिममूर्ति ने अपनी कहानियों में अभिव्यक्त करने की कोशिश की है.

सन्दर्भ ग्रन्थ –
1.डॉ  गणेश दास – स्वातंत्र्योतर हिंदी कहानी में नारी के विविध रूप, पृष्ठ सं -११
2. संपादक, ऋत्विक- लहमी,अक्टूबर- दिसम्बर, पृष्ठ सं ४२
3. शिवमूर्ति – केशर-कस्तूरी पृष्ठ सं -62
4. वही, पृष्ठ सं ६३-६४
5. वही, पृष्ठ सं-65
6. वही, पृष्ठ सं-67
7. वही, पृष्ठ सं -67
8. वही, पृष्ठ सं- 88
9. वही, पृष्ठ सं 88
10. वही, पृष्ठ सं- 89
11. वही, पृष्ठ सं-92
12. वही, पृष्ठ सं 89-90
13. वही, पृष्ठ सं-27
14. वही, पृष्ठ सं-28
15. संपादक –किशन कालजयी- संवेद , फरवरी- अप्रैल २०१४ पृष्ठ सं 119
16. उदृत, पृष्ठ सं 108




दुर्गी छिनार नहीं रही…

नवल किशोर कुमार 


पत्रकार-साहित्यकार, ‘अपना बिहार’ वेब पोर्टल के संपादक. संपर्क :8578001501 nawal.buildindia@gmail.com.

दुर्गी सचमुच पूरे गांव की दुर्गा है. तीखे नैन नक्श, उन्नत उरोज और मांसल बाहें-कुदरती सुंदरता की मूर्ति. सबकुछ है उसके पास, नहीं है तो केवल वह जिसके साथ बियाह के बाद वह भोजपुर से मगध के इस गांव में आयी थी. दुर्गी किसी को कुछ नहीं कहती न ही रोना रोती है. पूछने पर अपने हाथ में पड़े घट्ठे दिखाते हुए कहती है कि ‘मरद नहीं है तो का हुआ, हम हैं. कोई निस्तनिया हमरा हाथ लगा के त दिखाये.’ अक्सर गांव के पुरबारी टोला के भूमिहार के लौंडे ताना मारते हैं. दुर्गी हसिया दिखाकर नपुंसक बना देनेवाली गाली देती है.सुबह से लेकर रात तक खटना और जीना यही तो कहानी है दुर्गी की. वैसे दुर्गी की कहानी यही नहीं है कि उसका मरद परदेस में है. दो साल पहले वह आरा के इटारहा के ब्रह्मबाबा के पास गयी थी. जाते समय बखोरापुर की काली माई का आशीर्वाद भी लिया था दुर्गी ने. इटाहरा के ब्रह्मबाबा ने कहा था उसका मरद एक दिन जरुर लौटेगा. वहीं ब्रहमबाबा के पेड़ के पास सिंदूर चढाने के बाद भर मांग लगाकर लौटी थी दुर्गी. तब बगल वाले नारायण चमार की मां नेउसे ताना भी मारा था, “का हे रमेशवा बहु, बाबा कुछ कहलथुन कि कहिया ले लौटतव तोर दुलहवा”.दुर्गी ने कुछ नहीं कहा चुपचाप अपने घर चली गयी. ऐसे मौकों पर दुर्गी किसी से कुछ भी नहीं कहती. का जाने किसी की नजर लग जाये. वैसे भी ई जीवन में उसे कुछ तो मिला नहीं. फ़िर भी जिए जा रही है बेचारी. लेकिन दुर्गी खुद को बेचारी नहीं मानती. और वो माने भी क्यों. आखिर धर्मनाथ मिसिर की पोती और आरा के जाने माने पंडित सिद्धेश्वर मिसिर की बेटी इतनी जल्दी हार माने भी तो क्यों और कैसे.

उसे आज भी याद है जब उसने रमेश यादव को पहली बार देखा था. सांवला सा रंग बिल्कुल रामचंदर या फ़िर किशन भगवान के जैसन. सिद्धनाथ मिसिर ने उसे अपने घर में नौकरी दी थी. जहां जाते रमेश को साथ ले जाते. खूब मेहनत करता था रमेश. पंडित जी भी खूब खुश रहते. रमेश की खासियत थी. जब कोई काम न होता, पंडित जी के घर के बाहर बथानी में पड़ा रहता. एक बार तो दुर्गी ने उसे गौमाता के साथ बात करते पकड़ लिया था. वह कोई बिरहा गा रहा था और जवाब में गौमाता भी उसका साथ दे रही थी. उस दिन पहली बार रमेश ने दुर्गी को देखा था. एकदम सचमुच की मिस्टर इंडिया वाली श्रीदेवी के जैसी लग रही थी दुर्गी. बाद में मैट्रिक की परीक्षा के दौरान रमेश ने दुर्गी की खूब मदद की. दुर्गी का मौसेरा भाई चिट बनाता और रमेश उसे पहुँचाने स्कूल की चाहरदीवारी छड़पता. यही से शुरु हुई दुर्गी और रमेश की प्रेम कहानी. दुर्गी को आज भी याद है वह दिन, जब पहली बार उसने रमेश को छुआ था. उस दिन भूमिहार टोले के लोगों से सिद्धेश्वर मिसिर की भिड़ंत हो गयी थी. मामला जमीन का था. लाठी पैना भी खूब चला था. मिसिर जी को तो कुछ नहीं हुआ रमेश जख्मी हो गया था. बाहर बथानी में सोया था, माथा में मुरेठा बांध के.

दुर्गी तब उसके पास पहुंची थी. बोली, ‘दवाई ले लिए हो कि नहीं. रमेश ने कहा कि नहीं लेकिन सब ठीक हो जाएगा. हाथ से खून बह रहा था. दुर्गी तब दौड़कर घर के अंदर गयी और नाखून पालिश ले आयी. नाखून पालिश का रंग रमेश के बदन पर खिल रहा था. तब पहली बार रमेश ने दुर्गी का हाथ हौले से दबाया था. दुर्गी तब खूब घुमक्कड़ थी. उसने जिद ठान ली थी कि इस बार पूजा करने आरण्य मंदिर ही जाएगी. मिसिर जी और मिसिराइन समझाकर हार गये तब उन्होंने रमेश के साथ जाने की इजाजत दी. वही आरण्य देवी से दुर्गी ने रमेश को मांग लिया और जब लौटी तो पूरे गांव में बवाल मच गया. अरे सुनते हो मिसिर जी की बेटी ने रमेशवा से बियाह कर लिया. कौन रमेशवा? अरे वही कोईलवर के रामधनी गोप के बेटवा. आजकल मिसिर जी के यहां बेगारी करता है. बेगारी करते-करते बेटिये को पटा लिया. मिसिर जी को पहले ही खबर मिल चुकी थी. गांव की सीमा पर खड़े हो गये दोनाली बंदूक लेकर. गांव के भूमिहारों के लड़के भी बड़े ताव में थे- साली पंडिताइन होके गोवार से कैसे बियाह कर लेगी. भुमिहार-बाभन में ओकरा मन लाय क कोई नहीं मिला.दुर्गी जानती थी कि ऐसा ही कुछ होने वाला है. इसलिए रमेश के साथ सीधे वह पटना आयी और फ़िर रमेश के घर गयी. रमेश के परिवार में केवल बाबूजी थे. पहले एमसीसी के साथ थे, लेकिन रमेश को उससे कोई मतलब नहीं होता था.रामधनी गोप बहु को देखकर खुश हुए और घर के दरवाजे पर चार नाल बंदूक खड़ी कर दी. दुर्गी को अब भी याद है अकेले उसके ससुर  ने 100 राऊंड फ़ायरिंग की थी, तब जाकर उसका घर बसा था. शादी के बाद दुर्गी दो बार गर्भवती भी हुई. लेकिन किस्मत को मंजूर नहीं था. पहली बार 4 महीना और दूसरी बार तो डेढ महीने में ही धुलैया कराना पड़ा था. फ़िर इसी बीच रमेश कमाने दिल्ली चला गया. जाना तो दुर्गी भी चाहती थी कि दिल्ली जाये और खूब घूमे. रमेश की भी यही तमन्ना थी. लेकिन तब दुर्गी उम्मीद से थी. इसलिए अकेले जाना मजबूरी ही थी.

आज दुर्गापूजा है. दुर्गी भी नौ दिनों का व्रत रखती है. कलश स्थापना वाले  दिन गणेश पंडित के यहां से कलश और दीया लेकर आयी. बिहटा स्टेशन के पास लगे बाजार से उसने पूजा का समान भी खरीदा और साथ में पकाने के लिए 2 सेर चावल, पाव भर दाल और दस रुपए का करुआ तेल. बाजार से शकरकंद भी लिया था उसने. रास्ते में शिवचंद्र बहु मिल गयी. देखते ही उसने दुर्गी को टोका, ‘दीदी, कोई चिट्ठी पत्री आई दिल्ली से?” दुर्गी ने कोई जवाब नहीं दिया. वह जल्दी से जल्दी घर जाना चाहती थी, दरवाजे पर गोबर की गंध ताजा थी , लेकिन कुत्तों ने अपने पांव के निशान बना दिये थे. दुर्गी के मुंह से निकला – “मोछकबरा कुत्तवन सब के खाली इहें देखल है.“ सामान अपनी घर के पूजा वाले कमरे में दुर्गा माता के चरणों में रखकर दुर्गी फ़िर से दरवाजा और आंगन लीपने लगी. पंडित जी आने वाले थे और दुर्गी को अभी मुंह धोना और नहाना बाकी था.बाबाजी आ गये तब कलश स्थापना का कार्यक्रम शुरू हो गया. बगल के भोला गोप, हरलाखी रजक, कायथ टोला वाले श्रीवास्तव जी सब पहुंच चुके थे. दुर्गी भी नहाकर और एकरंगा कपड़ा पहनकर पूजा के लिए तैयार हो गयी थी. लेकिन उसे लाज भी आ रही थी. बिना ब्लाउज और साया के साड़ी पहनना और गांव के बड़े-बुजुर्ग के सामने होने में लाज तो आयेगी ही. फ़िर सोची धर्म का काम है, इसमें कैसी लाज.

पूजा के बीच ही भूमिहार टोला के लौंडे आ गये. एक ने दुर्गी की ओर इशारा किया और कहा कि छिनार सब का यही काम है. संयोग ही था कि उस समय पूजा चल रहा था और वहां बैठे लोग चुप रहे. दुर्गी को इन सबकी आदत हो गयी थी. गाय और भैंस के लिये चारा लाने के दौरान कई बार उसपर आरोप लगे. मिथिलेश यादव के साथ उसकी कहानी आज भी गांव में लोग चटखारे लेकर सुनाते हैं. महिलायें भी कहती है कि गांव के बाहरस्कूल वाले खंडहर में दोनों ने खूब गुलछर्रे उड़ाये. देखो तो कैसी साधुआइन बनी फ़िरती है. साबून से चेहरा चमका लेने से मन के अंदर का मैल थोड़े न साफ़ होता है. जब से रमेश दिल्ली गया है दुर्गी तो एकदम छिनार हो गयी है. कूरियर कंपनी का मालिक फ़ेड्रिक डिसूजा गोवा का होने के बावजूद हिन्दी और बिहार की भोजपुरी अच्छे तरीके से बोल लेता है. रमेश डिसूजा का दाहिना हाथ बन गया है. पगार 8 हजार हर महीने मिल जाती है. उसी में वह 4 हजार अपनेउपर खर्च करता है और शेष पैसे वह दुर्गी को भेज देता है. उसे केवल एक बात का मलाल है. दुर्गी दिल्ली नहीं आना चाहती है. जाने क्यों गांव में ही पड़ी रहती है.पिछले साल सावन में जब रमेश गांव आया था तब गांव वालों ने दुर्गी के त्रिया चरित्र के बारे में खूब बताया था. रमेश का मन खट्टा हो गया था.लेकिन वह दुर्गी से प्यार भी करता है. इसलिए कुछ कह नहीं सकता. घर में ‘माला डी’( गर्भ निरोधक दवा) का टेबलेट देख उसका माथा भी ठनका था. लेकिन उसने दुर्गी से कुछ भी नहीं पूछा.

रक्षाबंधन के एक दिन बाद अचानक ही रमेश ने थैला लिया और आरा स्टेशन पहुंच  गया. रास्ते में गांव के लक्ष्मण सिंह मिल गये तो उनसे कहलवा दिया कि हम दिल्ली वापस जा रहे हैं.दुर्गी जब घास का गट्ठर लिए घर आयी. उसे विश्वास था कि रमेश आज की रात तो उसे भरपूर प्यार करेगा. बहुत दिन हुए उसकी छाती से लगकर सोये हुए. उसकी मूछें दुर्गी को तकलीफ़ नहीं देती थी. वह तो खुद कहती थी कि जिसके मुंछ नहीं है वह कैसा मरद. पड़ोस की एतवारी फ़ुआ ने उसे रमेश के चले जाने की सूचना दी. दुर्गी के सारे सपने पल भर में बिखर गये. धम्म से बैठ गयी धरती पर. थोड़ी देर बाद घर के अंदर गयी. खटिया पर जाकर लेट गयी. आंखों से आंसू की धार बह रही थी. सोचने लगी रमेश अब पहले जैसा नहीं रहा. वह चाहे तो मुझे भूल सकता है लेकिन मैं कैसे भूल जाऊं. वही तो मेरी जिंदगी है.गांव के मधेसर सिंह सबसे अमीर आदमी थे. पूरे इलाके में उनकी इज्जत थी.दुर्गी भी उन्हें बाप जैसा मानती थी. उस दिन मधेसर सिंह ने दुर्गी को बुलवाया था. मुड़िकटवा पईन के पास वाली जमीन बेच दो. मैं अच्छे पैसे दे दूंगा और फ़िर तुम चाहो तो मैं एक पक्का मकान भी दे सकता हूं. यह कहते कहते मधेसर सिंह उसके करीब आ गये. उसने दुर्गी के कंधे पर हाथ रखकर कहा अगर मंजूर हो तो शाम में चली आना. मेरा बेटा बैरिस्टर है. कागजात बना देगा. दुर्गी के मन में अफ़सोस हुआ कि वह अपना हंसिया क्यों भूल गयी. अगर होता तो साले की गर्दन काट देती. मन मसोसकर चली गयी.

 घर जाकर उसने रमेश की तस्वीर से कहा कि जमीन नहीं बेचूंगी. फ़िर चाहे कुछ भी हो जाये.दीया-बाती की बेला हो रही थी. दुर्गी ने एक ढिबरी बाहर के बथानी में जलाया. तभी मधेसर सिंह आता दिखा. उसका मन जोर से धड़का. अंदर गयी और अपना हंसिया, कुदारी और बरछी निकालकर कमरे में एक जगह छिपा दिया. मधेसर सिंह के साथ कुछ लोग और थे. वे बाहर ही रहे. दुर्गी समझ चुकी थी. मधेसर सिंह जबरदस्ती करेगा. इसलिए पहले से तैयार थी.गांव में हल्ला हो गया. दुर्गी ने मधेसर सिंह का लिंग काट दिया. थाना के लोग पहुंचे. मधेसर सिंह दुर्गी के कमरे में छटपटा रहा था. दुर्गी एक कोनेमें हाथ में हंसिया लिये खड़ी थी. दारोगा विश्वजीत सिंह ने दुर्गी से कुछ भी नहीं कहा. मधेसर सिंह को उठाया और अस्पताल भेज दिया.मधेसर सिंह के नपुंसक  होने की जानकारी रमेश को भी मिल गयी. वह जल्द से जल्द अपने घर आना चाहता था. उसके मालिक डिसूजा ने एडवांस देते हुए सलाह दी कि अपनी वाइफ़ को दिल्ली ले आए . रहने का इंतजाम मैं करवा दूंगा.पूर्वा एक्सप्रेस में वह जैसे-तैसे चढ गया. पूरी रात जेनरल बोगी के बाथरुम के बाहर बैठा रहा रमेश. सुबह पांच बजे के करीब आरा स्टेशन पर वह उतरा. उसके पैर घर जाना नहीं चाहते थे. सोच रहा था कि वह गांव वालों को क्या मुंह दिखायेगा. पुलिस उससे जाने कैसे-कैसे सवाल करेगी. रास्ते में भूमिहार टोला का नवेन्दू मिल गया. उसी की मोटरसाइकिल पर बैठ वह गांव पहुंचा. जानकारी मिली कि दुर्गी को थाना ले जाया गया है.रमेश को देख दुर्गी का चेहरा खिल उठा था. उसे विश्वास था कि रमेश उसे यहां से जरुर ले जाएगा. लेकिन दारोगा जिद पर अड़ा था. इसने गांव के सबसे प्रतिष्ठित व्यक्ति का लिंग काटा है, इसकी सजा तो उसे मिलेगी.



फ़िर बात हुई कि 20 हजार रुपए दिये जाने पर मामले को दूसरे तरीके से लिखा जा सकता है कि मधेसर सिंह ने पीड़िता के घर मे घुसकर इज्जत लूटने की कोशिश की और बचाव में पीड़िता ने उसका लिंग  काट लिया. पैसे नहीं दिये जाने की स्थितिमें केस पहले से तैयार था-‘दुर्गी कलंकिनी है’. पहले तो मधेसर सिंह को प्यार में फ़ंसाया और फ़िर ब्लैकमेल करने लगी. पैसे नहीं दिये जाने पर उसने उसे हमेशा-हमेशा के लिए नामर्द बना दिया.रमेश ने बटुआ में देखा तो कुल 4000 रुपए थे. सब निकाल वह दारोगा के पैरों में लोट गया. दुर्गी यह सब अपनी आंखों से देख रही थी. बाद में दारोगा ने दुर्गी को जाने की इजाजत दे दी. दोनों लौट रहे थे. थाना के बाहर एक रिक्शा पर एक साथ. दुर्गी रमेश के हाथो को जोर से पकड़ना चाहती थी वही रमेश मारे शर्म के धरती में धंसा जा रहा था.सिधेसर मिसिर भी परेशान थे. दो बेटियों की शादी नहीं हो रही थी. दुर्गी के कारण पूरे इलाके में उनकी नाक पहले ही कट चुकी थी. फ़िर नये मामले के कारण तो वे किसी से आंख मिलाकर बात भी नहीं कर पाते थे. मिसिराइन ने तो घर के बाहर निकलना ही बंद कर दिया. दोनों बेटियां सुलक्षणा और सुपर्णा ने भी कालेज जाना छोड़ दिया था. आखिर कितना सुन सकती थी कि इनकी बहन ने एक भूमिहार का लिंग  काट लिया है. लेकिन मन ही मन मिसिर जी खुश भी थे. उन्हें गर्व था कि उनकी बेटी ने सचमुच दुर्गा का अवतार लिया है. वे चाहते थे कि दुर्गी घर आकर रहे. रमेश भी रहे. लेकिन फ़िर डरते कि सुलक्षणा और सुपर्णा की शादी कैसे हो पायेगी. इसलिए मन मसोसकर रह गये.उस दिन पहली बार मिसिर जी ने गांव के दो लौंडों भरपेट मारा. दोनों ने मिसिर जी की बेटी को छेड़ा था.

हालांकि बाद में पंचायत में मामला शांत हुआ. लेकिन मिसिर जी ने ठान लिया था कि अब जीवन ऐसे नहीं जिया जा सकता. लोहा को लोहा ही काटता है. भूमिहार सब कुत्ते की पूंछ की तरह हैं. ये कभी नहीं सुधरेंगे. उस दिन पहली बार लाल झंडे के लोग रात में उसके घर आये थे.रमेश ने अपना फ़ैसला सुना दिया था. इस बार वह अकेले नहीं जाएगा. मामला शांत होते ही दुर्गी भी दिल्ली जायेगी. घर में ‘माला डी’ वाली बात का उसने जिक्र तक नहीं किया. दुर्गी दो राहे पर खड़ी थी. घर छोड़ेगी तब भूमिहार टोला के लोग सब जमीन हड़प लेंगे और नहीं गयी तब जीना हराम करते रहेंगे.दुर्गी ने रमेश से कहा – मुझे अपने साथ ले चलो, लेकिन पहले यहां की सारी जमीन संपत्ति बेच दो. इनके रहते घर छोड़ना मुमकिन नहीं है. रमेश को यह सलाह अच्छी लगी. लेकिन सवाल यही था कि उसकी जमीन कौन खरीदेगा.दुर्गी ने जवाब दिया कि मिथिलेश यादव बड़े पैसा वाला है. वह खरीद लेगा और वह मुंहजोर भी है. भुमिहार टोला के लोग केवल उसी से डरते हैं. मिथिलेश यादव का नाम सुन रमेश का मन खट्टा हो गया था. लेकिन वह दुर्गी पर इल्जाम लगाये भी तो कैसे. कहीं अगर बात झुठ निकली तब दुर्गी क्या सोचेगी. होसकता है ‘माला डी’ की गोली उस समय की हो जब शुरु-शुरु में उसने लाकर दियेथे. आखिर उसने भी तो प्यार के लिए अपने मां-बाप और जाति समाज सबको छोड़ा था. यह ख्याल आते ही दुर्गी पर उसे दुगना प्यार आया, उसने दुर्गी को उस रोज जी भरकर प्यार किया- मन ही मन सोचता – खटियातोड़ प्यार!

रमेश मिथिलेश यादव के घर पहुंचा. दुआ सलाम के बाद तय हुआ कि पूरी जमीन और घर के बदले वह 4 लाख रुपए दे सकता है. रमेश जानता था कि जमीन का भाव आसमान छू रहा है और मिथिलेश आधा से अधिक कीमत दे रहा है. दुर्गी को इससे ऐतराज नहीं था. उसका कहना था कि चार लाख रुपए में दिल्ली में रहने के लिए एक मुट्ठी जमीन तो मिल ही जाएगी. उस दिन आरा के रजिस्ट्री ऑफिस  में दुर्गी और रमेश दोनों भूमिहीन हो गये थे. पैसे बैंक में जमा हो चुके थे. दुर्गी के हाथ के कुछ बकाये शेष थे. उन्हें चुकाने के बाद दोनों ने तय किया कि अगली पूर्णिमा वाले दिन वे गांव को हमेशा-हमेशा के लिए छोड़ देंगे. इस बीच दोनों ने निर्णय लिया कि दिल्ली जाने से पहले मिसिर जी के घर जाया जाए. फ़िर मालूम नहीं कब मुलाकात हो न हो. संदूक से चमचम लाल साड़ी, भर हाथ चुड़ी और भर मांग सिंदूर सजा जब दुर्गी रमेश के साथ बाहर निकली तो देखने वालों की आंखें फ़टी की फ़टी रह गयी. गांव से बाहर निकलने पर एक टेम्पो रिजर्व कराया रमेश ने. वह भी पूरे 300 रुपए में. दुर्गी को यह अच्छा नहीं लगा. अगर ऐसे ही पैसे खर्च हो गये तब दिल्ली में जमीन कैसे खरीदा जा सकेगा.

टेम्पो पर सवार हो दुर्गी अपने दुल्हा के साथ पहली बार नैहर जा रही थी. दो सेर ‘सिरनी’ लिया था रमेश ने अपने ससुराल के लिए. नैहर में नजर पड़ते ही मिसिर जी घर से बाहर निकल गये. मिसिराइन कोने में बैठकर रोने लगी. दुर्गी की आंखों से आंसू बह निकले. लंबे समय के बाद मिसिराइन ने उसे गले लगाया था. बाहर बथानी में रमेश चौकी पर आंखें मुंद मानों खतरे के टल जाने के सपने देख रहा था. उसकी आंखों के सामने मधेसर का चेहरा और दुर्गी का साहस पीपड़वाले भूत के जैसे नंगा नाच कर रहा था. थोड़ी देर बाद मिसिर जी आये. रमेशने पांव छूकर आशीर्वाद लिया जाना चाहा. मिसिर जी भी अपने दामाद को गलेलगाना चाहते थे. लेकिन “कुजात” का ख्याल आते ही रुक गये. सुलक्षणा औरसुपर्णा भी बहनोई के साथ ठिठोली करना चाहती थीं, लेकिन शायद इसके लिए मौका अनुकूल नहीं था.मधेसर सिंह की नामर्दगी और दुर्गी की वीरता पटना में चर्चा का विषय  बन चुका था. अखबारों ने दुर्गी को दुर्गा का अवतार माना था. टेलीविजन चैनलपर बार-बार खबरें आ रही थीं.

दलितों पिछड़ों की राजनीति करने वाले एक नेताने दुर्गी के सम्मान में एक कार्यक्रम का आयोजन भी किया था. “अब तो जागोबहनों” नामक संस्था की पूरी टीम दुर्गी से मिलना चाहती थी.अहले सुबह मिसिर जी ने रमेश को समझाया. देखो मेरी बेटी ने तुमसे बियाह कर जो किया है उसका दंश हम झेल रहे हैं. सुलक्षणा और सुपर्णा के लिए वर ढूंढना मुश्किल हो गया है. अब मधेसर सिंह की घटना से पूरा समाज थू-थू कर रहा है. तुम ही बताओ मैं क्या करूं. तुम दोनों घर छोड़कर चले जाओ. वर्ना इस उमर में जाति समाज से अलग होकर नहीं जी सकता. मेरे पास कुछ रुपए हैं.उन्हें रखो.दरवाजे की ओट से दुर्गी तब सब सुन रही थी. उसने वहीं से कहा कि बाबू पैसा रहने दिजिये. हम लोग चले जायेंगे. रमेश तब खामोश ही रहा. फ़िर थोड़ी देर बाद दुर्गी दरवाजे के बाहर खड़ी थी. रमेश के हाथों में हाथ डाले सबके सामने. मिसिर जी और मिसिराइन सहित पूरा गांव देख रहा था. गांव की औरतें बोल रही थीं, ‘कुजात आदमी से बियाह के बाद सचमुच छिनार हो गयी है दुर्गी.अब उसे तो तनिक भी लाज नहीं आती.‘घर और जमीन की राजिस्ट्री हो चुकी थी. दुर्गी और रमेश कल की सुबह हमेशा-हमेशा के लिए गांव छोड़कर चले जायेंगे. भूमिहार टोले में कई लड़के बात कर रहे थे. मधेसर बाबू का बदला कैसे लिया जाय. कल तो वह छिनार चली जाएगी. आज की रात ही धावा बोलना होगा. मधेसर सिंह का बेटा समरेन्द्र भीखूब ताव में था. वह अपने घर दोनाली बंदूक ले आया. कोई कट्टा तो कोई भाला. कुल 9 लोग थे. योजना यह थी कि दुर्गी के सामने ही उसके भतार के पिछवाड़े गोली मारेंगे. फ़िर बाद में योजना यह बनी कि पहले उस छिनार को मजा चखायेंगे.सब निकल पड़े. गांव का पूल पार करने के समय ही गांव की महिलाओं ने उन्हें देख लिया. वे सब शौच के लिये पईन पर आयी थीं. चन्द्रदीप यादव की मेहरारु लगभग दौड़ते हुए दुर्गी के घर गयी

 रमेश ने हिम्मत से काम लिया. मिथिलेशयादव और उसके अन्य साथी भी गांव की सड़क पर हरवे हथियार से लैस खड़े थे.मिथिलेश ने रमेश को कहा कि तु लोग गांव से चल जा. हमनी सब देख लेम उस ससुरन के. दुर्गी भी यही चाहती थी लेकिन रमेश के माथे पर तो खून सवार था.गांव में हड़कंप मचा था. भूमिहार टोले के लौंडों को इस बात का गुमान था कि हथियार केवल उनके पास ही हैं और कोई मारे डर के बोलेगा नहीं. इसलिए गांव की सीमा में पहूंचते ही सबने राम इकबाल पासी की दुकान पर बैठकर पहले दारू पिया और फ़िर पैसे मांगने पर राम इकबाल के सामने ही दो फ़ायरिंग किया. रामइकबाल कुछ न बोल सका. मन तो उसका कर रहा था कि गला हसूलिये से उतार दें साले की. लेकिन सब संख्या में 20 से अधिक थे.उधर दुर्गी अपना सामान बांध रही थी. उसे जल्दी थी. बहुत दिनों के बादउ सने रमेश को फ़िर से पाया था. वह उसे खोना नहीं चाहती थी. लेकिन रमेश गांव वालों के साथ मैदान में कूद चुका था. सामने से भूमिहार टोले केहमलावर आते दिखायी दिये. पहली फ़ायरिंग भूमिहारों ने किया. जवाब में रमेशने एक साथ 4-4 हवाई फ़ायरिंग की. भूमिहार सहम गये. तबतक गांव के दलित टोले के लोगों ने गांव को घेर लिया था.आवाज आयी, मारो स्सालों को. गोलियां चलने लगीं. मिथिलेश यादव ने 3 को मौत के घाट उतारा था, वही रमेश ने भी 2 लोगों को गोली मारी थी.

इस लड़ाई में यादव टोला का एक नौजवान भी मारा गया. थोड़ी ही देर में लाशों का ढेर लग गया था. दलित टोले के 4 लोगों को गोलियां लगी थीं, लेकिन वे जिंदा थे. दो भूमिहार भी जीवित ही थे. यादवों ने योजना बनायी कि सबको मार दिया जाय और लाशों को यही पईन में पत्थर बांध कर बहा दिया जाय लेकिन ऐसा नहीं हो सका. दारोगा विश्वजीत सिंह पूरे पलटन के साथ गांव में आ चुका था. पूरे इलाके में खबर आग की तरह फ़ैली कि यादवों ने एक साथ 18भूमिहारों को मार गिराया है. खबर मिलते ही आरा से पुलिस की पांच गाड़ियां पहुंच  गयीं. फ़िर अगले दिन प्राथमिकी दर्ज करायी गयी. एक प्राथमिकी मधेसर सिंह की पत्नी की ओर से तो दूसरी प्राथमिकी दुर्गी ने कराया था.मामले को लेकर राजनीति उफ़ान पर थी. प्रदेश के बड़े-बड़े भूमिहार और दलितों एव पिछड़ों के नेता गांव पहुंचे. दुर्गी रमेश के बगैर फ़िर अकेली हो गयी थी. मधेसर सिंह की जोरु ने उसे मुख्य अभियुक्त बनाया था. मिथिलेश सिंह भी जेल में था. पूरा यादव टोला खाली पड़ा था.अनहोनी की संभावना देख सिधेसर मिसिर बेटी को लाने पहुंचे. बहुत समझाया दुर्गी को लेकिन वह नहीं मानी. कहने लगी कि अब तो यहां मेरी अर्थी ही जाएगी. गांव वालों ने भी खूब समझाया. लेकिन सब बेकार.

चन्द्रदीप यादव की पत्नी ने लाज त्यागते हुए मिसिर जी के सामने कहा कि कनिया अभी चल जा, जब समय ठीक होई त फ़िर चल अईह. मिसिर जी ने भी कहा कि अब हम तुम्हें कोई ताना नहीं देंगे. तुम हमारी बेटी हो, तुम्हारा यहां रहना ठीक नहीं है.दुर्गी को नहीं जाना था, वह नहीं गयी. वह अपने घर में हसिया, बरछी और रमेश के बाबू जी की बंदूक हमेशा अपने साथ रखती थी. वह हर शाम तूफ़ान केआने का इंतजार करती और फ़िर जागी आंखों में सारी रात गुजार देती.उस दिन रात करीब साढे ग्यारह बजे किसी ने दुर्गी का दरवाजा खटखटाया.दुर्गी ने कोठा पर चढकर देखा. कुछ पुलिस वाले खड़े थे. उपर से ही बोली क्या बात है? आप लोग इतनी रात क्यों आये हैं? दारोगा विश्वजीत सिंह ने आवाज दिया कि दरवाजा खोलो. हमें जानकारी मिली है कि तुम्हारे घर में उग्रवादी छुपे बैठे हैं. दुर्गी ने कहा कि यहां उसके अलावा कोई और नहीं है. मैं दरवाजा नहीं खोलूंगी.विश्वजीत सिंह के कहने पर पुलिस वालों ने दुर्गी के घर का दरवाजा तोड़ डाला.इससे पहले कि दुर्गी कुछ करती विश्वजीत सिंह ने उसे पकड़ लिया और जबरन जीप में डाल दिया. थाना में उसे एक कमरे में रखा गया. थोड़ी देर बाद विश्वजीत सिंह और मधेसर सिंह का बेटा समरेन्द्र सिंह कमरे में दाखिल हुए. दुर्गी ने विरोध किया. लेकिन भूखे और हिंसक लोमड़ियों का मुकाबला वह अकेले कैसे कर पाती.सुबह-सुबह उसे छोड़ दिया गया.

घर गयी. किसी से कुछ नहीं कहा. दिन भर पड़ी रही और रात के खौफ़नाक मंजर को याद करती रही, ‘कहां एक ये भूमिहार और ब्राह्मण जो कहते हैं नारी को देवी शक्ति मानते हैं और दूसरी ओर उसकी इज्जत भी लूटते हैं. इन सबसे अच्छे तो दलित और पिछड़े हैं जो कम से कमअपनी मां-बेटियों की इज्जत करना तो जानते हैं.‘दो दिनों बाद दारोगा विश्वजीत सिंह फ़िर दुर्गी के घर पहुंचा. इस बार दुर्गी ने कोई विरोध नहीं किया. दारोगा भी खुश था. उसे अपनी मर्दानगी पर नाज हो रहा था. स्साली एक बार में ही दीवानी हो गयी है. दुर्गी कमरे में एक मचिया पर बैठ गयी. दारोगा उसे बाहों में जकड़ना चाहता था. दुर्गी ने भी उसे मना नहीं किया और न ही कोई विरोध. दारोगा दुर्गी के उपर था और तभी दुर्गी ने हसिये से वार किया. दारोगा का गर्दन आधे पर लटक गया. फ़िर दुर्गी ने उसके गर्दन को पूरी तरह से अलग किया. दुर्गी हाथ में दारोगा का सिर लिए चली जा रही थी. गांव वाले बदहवास थे. भूमिहार टोले के लोग भी खामोश. इस बार किसी ने भी नहीं कहा, ‘दुर्गी’ छिनार जा रही है…’

प्रेम के स्टीरियोटाइप से मुक्ति ही प्रेम है

नीलिमा चौहान


पेशे से प्राध्यापक नीलिमा ‘आँख की किरकिरी ब्लॉग का संचालन करती हैं. संपादित पुस्तक ‘बेदाद ए इश्क’ प्रकाशित संपर्क : neelimasayshi@gmail.com.

जब आप भावनात्मक तौर पर  प्रीऑक्यूपाइड होंं , सीने पर चंद ज़िंदा घाव होते हों और ऐसे में आप प्यार पर प्यारी और आदर्शात्मक मशवरात की  महफिल में प्यार पर ही चंद लफ्ज कहने को बुला लिए जाते हों – जनाब इससे ज्यादा इम्तिहान की घड़ी और क्या ही होगी मुझ जैसे जज्बातों का जखीरा लादे चलने वालों के लिए । वो क्या है न कि नफरत के वर्तमान परिवेश में लोग प्यार करें न करें  पर प्यार पर वही सुनना चाहते हैं जो वे सुनते आए हैं ।नफरत से निकृष्टता के बारे में अधिक लोड न लेने वाले समाज में प्रेम और उत्कृष्टता के बारे में ख़ासी उत्कटता देखना भी एक तरह से आश्‍वस्‍त करता है ।

बहरहाल , मसला यह  अलौकिकता , रहस्यमयता , उर्जा , आभा जैसे गुणों से उदात्तता के उच्चतर सोपानों पर रखे गए प्रेम के भाव की सर्वमान्यता के बावजूद भी कुछ ऐसे सवाल भी इस दैवीय भाव पर उठाए जाने चाहिए जो दरअसल आदर्शोन्मुखी परिचर्चाओं में या तो उठाए नहीं जाते या बस सरलीकृत कर दिए जाते हैंं ।

जनाब प्रेम है जरूर एक उच्चतर रेज़रबारीक धवल भाव पर इसको शातिराना लिबास ओढ़ाने में हमारी संरचनाओं ने कोई कोर कसर नहीं उठा रखी है । ख़ासतौर पर तब जब स्त्रीत्व और मातृत्व के संदर्भों में इस भाव को शोषण के एक मासूम औज़ार के रूप में छदम तरीके से इस्तेमाल किया जाता रहा है । स्त्रीयोचित भूमिकाओं की जड़ में मजबूत सीमेंट की माफिक । इंतजामे खानादारी को स्त्री की पसंदीदा भूमिका और विद्वत्ता या धनोपार्जन के लिए जद्दोजहद को पुरुषोचित गुण ही नहीं माना जाता रहा है बल्कि इन भूमिकाओं में एकदूसरे को सहयोग देने को प्यार नाम के लफ्ज से ढापा गया है  । जबकि स्त्री पुरुष के आपसी प्यार की परकाष्ठा या उत्कृष्टता एकदूसरे की जेंडरीकृत भूमिकाओं के प्रति कम जड़ होने में मानी जानी चाहिए थी । खासतौर् पर स्त्री की रसोईआदि संबंधी भूमिकाओं में प्रेम के इज़हार का आरोपण करना और उसमें और अधिक पारंगत होते जाने की जिद या सुविधा प्रद्त्तता को उत्कृष्टता से मिसआइडेंटिफाई करना उतनी मासूमियत है नहीं जितनी इसमें देखी जाती है । रसोई की भूमिकाओं में पारंगतता और ज्ञान और दूसरे क्षेत्रों में पारंगतता में अंतर तो रहेगा ही । घर से कंफाइंड भूमिकाओं मेंं उत्कृष्टटता के मकाम की  कोशिश में एक सीमा के बाद एक सेल्फ एब्ज़ाज़ार्प्शन का निरर्थक बिंदु तो आता ही है ।

मेरी राय में गार्हस्थिक प्रेम में स्त्री को गृह से इतर की दुनिया में संघर्ष और पहचान बनाने के लिए उत्प्रेरित करने में प्रेम की उत्कृष्टता का जैसा परिचय है वैसा घर की परिधि में तलाशना असंभाव्य माना जाना चाहिए ।

इतिहास में एक ही पुरुष द्वारा सैंकड़ों  औरतों से प्यार करने के के उदाहरण कलमबद्ध मिलेंगे लेकिन अनेक पुरुषों से प्यार करने वाली औरतों के उदाहरण या तो प्राप्य नहीं होंगे या दस्तावेजीकृत नहीं पाए जाएंगे ।गोपियों द्वारा अपने गार्हस्थिक प्रेम से इतर कृष्ण  के प्रति प्रेमाभिव्यक्ति के पौराणिक उदाहरणों की अलौकिक रहस्यमयता के मायाजाल और अमृता प्रीतम के दो पुरुषों के प्रति निर्विकार निर्दंद्व प्रेम भावना के कतिपय उदाहरण हैं किंतु वे इतने अल्पमात्रा में उपस्थित हैं कि अपवाद मात्र कहे जा सकते हैं । परंतु पुरुष सत्ता और प्रेम की त्रिज्या वाले अनेक स्वाभाविक उदाहरण सहज प्राप्य होंगे। स्त्रियों की भावनात्मक क्षमता और प्रजनन की प्रक्रिया के प्राकृतिक यथार्थ के सामने असहायता से जनित हालात उसे एकांतिक प्रेम के लिए प्रतिबद्ध रखने का काम करते हैं । स्त्री इसी समर्पित प्रेम की परिधि में स्व के होम के ज़रिये सार्थकता की तलाश में रहती है । प्रेम उसे एक सीमा से परे उत्कृष्टता के सोपानों तक ले जाने में इसलिए नाकामयाब होता है क्योंकि प्रेम की अभिव्यक्ति की अनेक वांछित  छवियाँ गार्हस्थिक प्रेम से विदा हो रहती हैं । जबकि पुरुष प्रेम के एक या कई प्रकरणों के बाद भी घर की परिधि से असंबद्ध महसूस करते हुए अपने उत्तरोत्तर विकास के अवसर हासिल करता रह सकता है ।

गोया प्रेम को हमेशा से पुरुष की दृष्टि से देखा गया है और उसमें दंभ , उच्चता  , पौरुष की मात्रा अधिक रही है । उसके लिए प्रेम विजय का घोष है जीवन के क्षंंणांश का हासिल है और आगे बढ़ जाने तक पढ़ाव है । जबकि स्त्री के लिए प्रेम का मायना है आजीवन का निवेश और उस पूंजी का संरक्षण करने की जड़ प्रतिबद्धता  । स्त्री को प्रेम में उत्कृष्टता (?)हासिल करने के लिए आत्म विलयन और समर्पण की जिन संरचनागत अग्निपरीक्षाओं से गुज़रना होता है उतना परित्याग व प्रेम की प्रतिपुष्टि पुरुष से न तो अपेक्षित होती है न ही आवश्यक ।

प्रेम के विवाहेतर रूप और जीवनगत उत्कृष्टता में कोई सीधा सहसंबंध स्थापित करना और उसे जीवन मेंं मूल्य या चलन के तौर पर देखने के अभ्यास से हम संभवत: सदियों दूर है । जड़ संरचनाओं में दोनों ही लिंगों के व्यक्ति के लिए जमात के ठप्पे से महरूम प्रेम को इतने स्पीड ब्रेकरों , चुंगीख़ानों और पगडंडियों से ग़ुज़रना पड़ जाता है कि प्रेम जीवन को, आत्मा को, भावना को उत्कृष्टता के सोपानों की ओर ले जाने में असमर्थ साबित होता है । स्त्री के लिए आत्मिक ,भावनात्मक या बाह्य कामनाओं की प्रतिपूर्ति और उसके ज़रिये उर्ध्‍व विकास के लिए उत्प्रेरित होना एक जटिल परिकल्पना भर है । पुरुष के लिए यह असमर्थित संबंध कम अवरोधपूर्ण हालातोंं का शिकार होते हैं लेकिन वे आत्मा की खाद बन उत्कृटता की ओर उत्प्रेरित कर पाएँ इतना सलोना और अनुकूलित परिवेश बनने के रास्ते में भी कई अवरोध हाज़िर हैं ।प्रेम की अनुभूति से जनित मुक्तावस्था , उधर्वावस्था के मार्ग में व्यावहारिक भौतिक और ढाँचागत अड़चनें हैं । इन अड़चनों का इलाज व्यक्ति के भाव जगत के भीतर तो है ही साथ ही संरचनाओं को लचीली , संवेदनापूर्ण और प्रेमिल होने के लिए प्रशिक्षित करने में भी निहित है | उत्कृष्तता के भ्रामक अवधारणा होने की भी उतनी ही संभावना मानी जानी चाहिए जितनी प्रेम के आधुनिक संरचनागत रूपगत अवधारणा की ।

साफतौर पर देखा जा सकता है जनाब कि प्रेम आज की सभी मूल्यगत अवधारणाओं की तरह प्रदूषित और प्रवंचनापूर्ण अवधारणा है । कैमिकल लोचे से शुरू होने वाली प्रेम भावना एक तरह की परतंत्रता से दूसरी तरह की परतंत्रता के लिए हाज़िर होने की माफिक । स्त्री के लिए एक ऐसा व्यामोह जिसकी उच्चता  और श्रेष्ठता की ख़ातिर औरत के द्वारा अपनी कई अस्तित्वगत विशेषताओं की शहादत हमारी जमात में एक स्वीकार्य , स्वाभाविक और अपेक्षित अभिव्यक्ति दिखाई देती है ।

लुब्बोलुआब यह कि अपनी कक्षाओं में जिस प्रेम भावना पर व्याख्यान देने को कवियों की गर्दन पर बंदूक रखकर गोली चलाने की मानिंद चतुराई भरे काम की तरह सालों से करते आए थे , उस प्रेम पर चंद समय में सदन द्वारा अपेक्षित वक्तव्य से परे हटकर बोलने का जोखिम उठाते नहीं बन पड़ा ।

एक पेंचभरी , चालबाज़ ,विचलनभरी समाज निर्मित अवधारणा जो है यह । किस सिरे से इसपर समझ हासिल हो जनाब ?

तो जी प्रेम पर औचक कुछ भी कह देने की अनुभूति ऐसी आशंका भरी और बेमंज़िल है  मानो भरे समंदर मेंं बस एक लाइफ जैकेट के सहारे गिरे छूट गए हों ।