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ताकि पीड़िताओं को बार –बार बलात्कार से न गुजरना पड़े

संजीव चंदन

बलात्कार पीडिताओं को लेकर भारतीय समाज अजीब मर्दवादी मानसिकता में जीता है. अभी कल ही खबर आई कि बलात्कार पीडिता को उसके बलात्कारी के साथ शादी करवा दी गई और वह शादी के 7 महीने के भीतर आत्महत्या को विवश हो गई- मर गई. यह उसके खिलाफ यौन हिंसा को गैरजिम्मेवार तरीके से डील करने से हुआ- उसकी ह्त्या का दोषी समाज और उसकी मानसिकता है, वह शादी के बाद रोज -रोज बलात्कृत होती होगी. इस समाज कि यह कैजुअल सोच बलात्कार की घटनाओं के बाद पीडिता को न्याय दिलाने वाली एजेंसियों के रवैये में भी दिखता है . चिकित्सा, जांच और न्याय एजेंसी के  इस रवैये के खिलाफ महाराष्ट्र के एक डाक्टर ने मुहीम छेड़ रखी थी और इस पर उन्हें बहुत हद तक सफलता भी मिली है . 

महिलाओं के प्रति असंवेदनशील व्यवस्था को बदलने की मुहीम में महाराष्ट्र के वर्धा में महात्मा गांधी इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल सायन्सेज ( एम जी आई एम एस ) के फोरेंसिक विभाग में कार्यरत डाक्टर इन्द्रजीत खांडेकर  ने कई बड़े बदलावों को अंजाम दिये, उनमें बलात्कार पीडिताओं के फिंगर टेस्ट को बंद करवाने से लेकर गैरकानूनी सवालों के दायरे में उसकी जांच को बंद करवाने जैसे बदलाव शामिल हैं. जेंडर जस्ट न्याय और चिकित्सा के लिए संघर्षरत इस डाक्टर की पहलों से आये बदलाव पर एक विशेष रिपोर्ट . 



अमानवीय फिंगर टेस्ट का खात्मा 

डाक्टर खांडेकर ने कई पन्नों में फैले अपने अध्ययन के आधार पर यह स्थापित किया कि यौन हमलों की शिकार महिलाओं को जांच के नाम पर काफी अमानवीय प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है. बिना किसी फोरेंसिक फॉरमेट के उनकी जांच होती है . उन्होंने इसके लिए केंद्र और महाराष्ट्र सरकार से पत्राचार किये , जो शुरू में बिना जवाब के पड़े रहे . 2010  में डा. खांडेकर के अध्ययन के आधार पर फ़ॉर्मेट बनाने के लिए एक जनहित याचिका बॉम्बे उच्च न्यायालय के नागपुर खंडपीठ  में डा. रंजना पारधी और एडवोकेट विजय पटाइत ने किये .

(पढ़ें : बलात्कार बलात्कार में फर्क होता है साहेब )

डा खांडेकर  की सबसे बड़ी आपत्ति यौन हमलों की शिकार महिलाओं के फिंगर टेस्ट पर थी , जो उनके अनुसार दोहरी यातना से गुजरने जैसा था. फिंगर टेस्ट पीडिता की योनी में दो ऊँगल डालकर की जाती है. इस पी आई एल में केंद्र सरकार का रवैया काफी टाल-मटोल वाला रहा . उसने कोर्ट में अपने एफीडेविट में कहा कि महाराष्ट्र सरकार जो भी फॉरमेट बनायेगी, वह केंद्र सरकार मान लेगी. इस एफीडेविट के पूर्व राज्य और केंद्र सरकार जो फॉरमेट लेकर कोर्ट में आई उसमें ‘ फिंगर टेस्ट’ शामिल था. डा खांडेकर और याचिकाकर्ताओं की आपत्ति के बाद महाराष्ट्र सरकार मई , 2013 में डा खांडेकर की सहमति से जांच का फॉरमेट लेकर आई, जिसमें फिंगर टेस्ट न सिर्फ ख़त्म किया गया था बल्कि कई स्त्री के पक्ष में कालम बनाये गये थे  , जिससे पीडिता को न्याय मिले. केन्द्रीय स्तर पर डिपार्टमेंट ऑफ़ हेल्थ रीसर्च  (DHR) ,  इन्डियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रीसर्च ने एक समिति बनाई , जिसमे डाक्टर खांडेकर को भी शामिल किया गया . निर्भया काण्ड (दिल्ली गैंग रेप) की पहली बरसी (2013) पर इस समिति का फ़ॉरमेट लागू किया गया, लेकिन जल्द ही केंद्र सरकार का स्वास्थ्य मंत्रालय मार्च, 2014 में अपने फोर्मेट लेकर आई . डा खांडेकर कहते हैं कि ‘दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस नये फॉरमेट में सैम्पलिंग की प्रक्रिया गायब है.’ दरअसल पीडिता के कपड़ों, खून आदि के साथ 15-20 चीजें सैम्पल के तौर पर ली जाती हैं , जिसकी अभियुक्तों को सजा दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका होती है .

आज भी पूछे जाते हैं अपमानजनक सवाल 
बलात्कार के बाद सबसे कठिन लड़ाई होती है, दोषियों को सजा दिलवाने की . पुलिस डाक्टरों से पीडिता की जांच के लिए तीन अपमानजनक और स्त्रीविरोधी सवाल पूछती है. 1.. क्या पीडिता यौन सम्बन्ध की आदि है ? 2. बलात्कार हुआ या नहीं?  3. पीडिता यौन संबंध में सक्षम है या नहीं? डा खांडेकर ने 2011 में पुलिस की यह पद्धति हटाने के लिए महाराष्ट्र और केंद्र, दोनो सरकारों को लिखा. सितम्बर 2013 में महाराष्ट्र सरकार ने एक आदेश के माध्यम से जांच के लिए नये सवाल डा खांडेकर की  सलाह पर बनाये. नये नियम के अनुसार पुलिस अब चार सवाल सम्बंधित डाक्टर से पूछती है : 1. क्या पीडिता के साथ हाल में कोई  बलपूर्वक यौन संबंध बनाया गया है ? 2. पीडिता के ऊपर कितने , कैसे और कहाँ जख्म हुए हैं ? 3. क्या कोई बाहरी वस्तु, जैसे, बाल, खून या वीर्य पीडिता के शरीर पर पाये गये हैं ? 4 . पीडिता से जरूरी सैम्पल जैसे, कपडे, खून आदि .

पढ़ें: यौन हिंसा और न्याय की मर्दवादी भाषा )

हालांकि केंद्र सरकार ने इसपर आज भी चुप्पी बनाये रखी है और देश के दूसरे राज्यों में तथा केन्द्रीय जांच एजेंसियों के बीच सवालों का पुराना पैटर्न बदस्तूर जारी है. सुप्रीम कोर्ट के वकील अरविंद जैन कहते हैं, ‘ यह रवैया न सिर्फ केंद्र सरकार की पुरुषवादी प्रवृत्ति के कारण उस तक ही सीमित है बल्कि उच्चतम न्यायालय में भी यह कई मामलों में सामने आता रहता है . एविडेंस एक्ट 1944 से पीडिता की  यौन संबंध की आदत  वाले सवाल 1994 में ही ख़त्म कर दिये गये थे , लेकिन आज भी कई निर्णयों में सर्वोच्च न्यायालय पीडिता के यौन संबंधों के इतिहास को प्राथमिकता देते हुए पाया जाता है.’ खांडेकर कहते हैं ‘ जरूरत है कानूनों को प्रैक्टिकल सिलेबस में शामिल करने की.

गैर जरूरी वीर्य सैम्पल की परंपरा
डा. खांडेकर की ही पहल पर यौन हिंसा के अभियुक्तों का वीर्य सैम्पल लिए जाने की परम्परा को महाराष्ट्र सरकार ने ख़त्म कर दिया. खांडेकर कहते हैं, ‘ यह न सिर्फ गैरजरूरी समय खाता है बल्कि दोहरा स्त्रीविरोधी माहौल भी बनाता है.’ राज्य और केंद्र सरकार को लिखे अपने पत्र में उन्होंने तफसील के साथ बताया है कि कैसे इस सैम्पल के लिए बलात्कार के अभियुक्तों को पोर्न दिखाया जाता ह. यह सैम्पल सिर्फ ब्लड ग्रूप जानने के लिए लिया जाता है, जिसे अभियुक्त के ब्लड और पीडिता के कपड़ों पर प्राप्त सीमेन के जरिये जाना जा सकता है .
आश्चर्यजनक तौर पर केंद्र सरकार ने इसपर चुप्पी बना रखी है .

देश का पहला क्लिनिकल फोरेंसिक मेडिसिन यूनिट : 
डा खांडेकर ने 2011 में एक जनहित याचिका बॉम्बे उच्च न्यायालय के नागपुर बेंच में दायर की और मांग की कि देश भर में यौन हिंसा सहित दूसरी हिंसा की जांच के लिए एक क्लिनिकल फोरेंसिक मेडिसिन बनाया जाय और सिलेबस तथा करिकुलम में इसे शामिल किया जाय .  दरअसल अभी तक यौन हिंसा की पीड़िताओं की जांच स्त्री रोग विशेषज्ञ, बाल यौन हिंसा के पीड़ितों की जांच बाल रोग विशेषज्ञ आदि के द्वारा करवाने की परम्परा रही है , जिन्हें फोरेंसिक जानकारियाँ नहीं होती हैं. इस प्रकार उनकी रिपोर्ट न्यायिक प्रक्रिया में ज्यादा प्रभावी नहीं होती . खांडेकर कहते हैं , ‘ इसका मूल जड़ है मेडिकल का सिलेबस . जो पढाता है ( यानी फोरेंसिक शिक्षक ) वह प्रैक्टिकल नहीं करता और जो प्रैक्टिकल करता है वह पढाता नहीं. खांडेकर ने अपने मेडिकल कालेज ( एम जी आई एम एस ) में देश का पहला क्लिनिकल फोरेंसिक मेडिसिन यूनिट बनाया , जो अस्पताल के  आपात विभाग ( इमरजेंसी) का हिस्सा है. इस यूनिट में सर्जरी , ओर्थोपेडिक, स्त्रीरोग , बालरोग और फोरेंसिक के डाक्टरों की टीम २४ घंटे काम करती है . नागपुर हाईकोर्ट के आदेश पर मेडिकल कौंसिल ऑफ़ इण्डिया ने डा खांडेकर से ९ जून  २०१४ को बातचीत की ताकि इस मॉडल को पूरे देश में लागू किया जा सके .

अपराध की जांच की ट्रेनिंग देते डा. खांडेकर

(पढ़ें : बलात्कार पर नजरिया और सलमान खान )

गैरजरूरी पोस्टमार्टम, अपठनीय हैण्डराइटिंग के खिलाफ मुहीम और अन्य बड़ी पहल 
डा . खांडेकर जेंडर जस्टिस आधारित  न्याय और चिकित्सा की अपनी पहलों के साथ लगातार सक्रिय हैं . उनकी पहल पर महाराष्ट्र सरकार गैरजरूरी पोस्टमार्टम ख़त्म करने पर विचार कर रही है. खांडेकर के अनुसार इससे ६०% पोस्टमार्टम कम हो जायेंगे और इनपर जाया होने वाले समय , ऊर्जा और धन की बचत होगी. एक जरूरी पहल के तौर पर डाक्टरों की हैण्डराइटिंग तथा हस्ताक्षर के कारण पीड़ितों को न्याय मिलने में होने वाली देरी को कम करने की मुहीम भी उल्लेखनीय है. अपने मेडिकल कालेज में इन्होने देश का पहला सॉफ्टवेयर विकसित करवाया है , जो मैन्युअल फोरेंसिक रिपोर्ट की प्रथा को ख़त्म करदेने वाला है . महाराष्ट्र सरकार इसे भी पूरे राज्य में लागू करने की तैयारी कर रही है.

(पढ़ें : दाम्पत्य में बलात्कार का लायसेंस)

डाक्टर की अगली मुहीम है देश के पाठ्य पुस्तकों में जरूरी जानकारियाँ शामिल करवाना , जिससे बच्चे यौन विचलन और हिंसा के शिकार न हों .

साहस का सौंदर्यशास्त्र गढ़ती नायिकाएं

मेधा

 
आलोचक , सत्यवती महाविद्यालय ,दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाती है . संपर्क :medhaonline@gmail.com



पुरानी कहावत है -‘भेस-वेश से भीख मिलती है’। वेश को लेकर एक कहावत और भी है- ‘जैसा देश वैसा वेश।’ दोनों ही कहावतों में वेश की बात तो है ही, वेश से जो साधा जाता है, उसका भी संकेत है। पहली कहावत कहती है कि आपका वेश देखकर लोग आपके बारे में धारणा ही नहीं बनाते उस धारणा के इर्द-गिर्द ही आपके साथ बरताव भी करते हैं। दूसरी कहावत इसी बात को आगे बढ़ाती है। वह कहती है कि वेश को लेकर हर देश में अलग धारणा होती है। सो जिस देश में पहुंचो वेश वैसा बना लो। मतलब साफ है वेश से आपकी सूरत और आपकी सीरत का गहरा नाता है। तो फिर बात इससे शुरू करें कि सुंदर देश और सुंदर वेश कौन सा है? जो कपड़े सबसे ज्यादा बिकते हैं या कह लें अगर पैसे कौड़ी हों तो जिन्हें लोग सबसे पहले खरीदें वह सबसे सुंदर कपड़ा है। इसी तर्क से सबसे महंगे कपड़े सबसे सुंदर कपड़े हैं। सबसे सुंदर और सबसे महंगा का एक देश है। इस देश को अब मॉडलिंग और व्यवसायिक सिनेमा के नाम से जाना जाता है। एश्वर्या राय और उन जैसी अन्य मॉडलों और सिने तारिकाएं इस देश की नायक हैं। इस देश में देह की एक धारणा है जहां स्त्री घुटने से ऊपर और गर्दन के नीचे तक ही होती है। इस देश में स्त्री के सौंदर्य का जो प्रतिमान है उसी के अनुकूल इसके नायकों का वेश बनता है। मॉडलिंग और सिनेमा के देश के इन नायकों ने अपने को अपने देश के वेश में ढाला।


इस दुनिया में कमनीयता और यौवन एक गुण है इसलिए अपनी उम्र को रोकना, देह पर पड़ती लकीरों को यथासंभव छुपाना और कदाचित सदा हरित दिखाना यहां एक धर्म बन जाता है। इस धर्म को निभाती हैं ये तारिकाएं और मध्यवर्गीय कामना का प्रतीक बन जाती हैं। और इस देश का बड़बोला मध्यवर्ग भला कब सोच सकता है कि स्त्री का जीवशास्त्र उसके समाजशास्त्र से अलग होता है। उसमें कोख है तो रोग भी है। मध्यवर्ग अपने मानस में स्त्री को लेकर सामंती है। वह पूछने के बहाने स्त्री में सब खोजता है- ‘कनक छरि सी कामिनी, काहे को कटि छिन’। तारिकाएं या मॉडल बनी औरत मध्यवर्ग की इस धारणा को जितना निभाती है, उतनी ही उसे अपने देश से भीख भी मिलती है। सारी दुनिया सर आंखों पर बिठाती है। यहां यह कहना जरूरी नहीं कि मध्यवर्ग की इस धारणा को कंपनियों ने बनाया है जो तारिकाओं के सहारे उसके मन-मानस में उतारा जाता है।

लेकिन विचित्र यह कि मेधा पाटकर और उन जैसी जनसंघर्ष की अन्य नायिकाओं को भी नैतिक धरातल पर इस देश का मध्यवर्ग स्वीकार करता है। स्त्री पात्रों में मध्यवर्ग का नायक एक नहीं अनेक है। इसके नायक एश्वर्या, विपाशा हैं तो मेधा पाटकर और अरूंधती राय भी हैं। लेकिन इनका देश अलग है। यह दुनिया वंचितों की दुनिया है और इसके नायकों की दुनिया वंचितों के संघर्ष की दुनिया है। इस देश के कई हित मध्यवर्गीय हितों से अलग और अक्सर विपरीत पड़ते हैं। यहां हारी-बीमारी और अभाव है। देह यहां दर्शन का कम, हाड़तोड़ मेहनत-मजदूरी का औजार ज्यादा है। इस देश तक आते-आते देह की धारणा बदल जाती है। यहां बुजुर्ग होना एक गुण है। यहां प्रखर होना और सामने वाले के दुख में हर तरह से शामिल होने का आभास देना, विश्वास पैदा करना गुण है। इसलिए उन्हें सिने तारिकाओं की मानिंद अपनी देह पर पड़ती उम्र और अनुभव की लकीरों और झुर्रियों को छुपाने की जरूरत नहीं। दुनिया दोनों को पहचानती है। लेकिन एक की पहचान सौंदर्य के रूप में होती है, तो दूसरे की वंचितों के संघर्ष के रूप में। एक मध्यवर्गीय कामना का प्रतीक है, तो दूसरा मध्यवर्ग की नैतिक दीप्ती का। तो क्या यह मान लिया जाए कि जो कमनीय नहीं वह सुंदर नहीं। क्या सुंदरता और संघर्ष में कोई छत्तीस का आंकड़ा है? मध्यवर्ग की आंखों को जो जंचता है, दिल के किसी कोने में वही क्यों खटकता है?

दरअसल मध्यवर्गीय सुंदरता को चुनौती देती जनसंघर्ष की ये नायिकाएं सौंदर्य की एक समानानंतर कसौटी गढ़ रही हैं। यह सच है कि सौंदर्य के प्रचलित मापदंड अपने समय के ताकतवर मुहावरों से निर्धारित होते हैं। मौजूदा वक्त का ताकतवर मुहावरा वैश्वीकरण और बाजारवाद है। इसलिए आज ‘पॉपुलर कल्चर’ और मध्यवर्गीय जीवन के सौंदर्य प्रतिमान इन मुहावरों से तय हो रहे हैं। मुकाबले की होड़ है और बाजार में कुलांचे भरती निजी पूंजी का तर्क समाज में अनूदित होता है- सबसे आगे, सबसे बढ़कर कौन के जुमले में। इस समाज में सौंदर्य से भी यही पूछा जाता है। सौंदर्य ऐसा जो कुछेक को प्राप्त हो मसलन ऐश्वर्या, प्रियंका चोपड़ा, कैटरीना कैफ। और मास मीडिया इस सौंदर्य की कामना को 14 साल से लेकर 80 साल के स्त्री-पुरुष में जगाता है और इसके आधार पर उसे एक उपभोक्ता में बदल अधिकतम मुनाफा कमाता है।

लेकिन सौंदर्य के प्रचलित मानक के बरक्स एक दूसरा मानक जनसंघर्ष की नायिकाएं गढ़ रही हैं। घोर असमानता और भयानक उपभोग की इस संस्कृति में जनसंघर्ष की ये नायिकाएं ठीक उसी तरह सौंदर्य के मानक गढ़ रही हैं जैसे कि आजादी के संघर्ष के दौरान गांधी नेहरू और जिन्ना जैसे नेताओं ने विक्टोरियाई अभिजात्य सौंदर्य के प्रतिमान के बरक्स नया सौंदर्य मानक गढ़ा था। यह अनायास नहीं कि बहुचर्चित पुस्तक फ्रीडम एट मीडनाइट’ के लेखकद्वय लापीयर और कॉलिन्स जब गांधी के चेहरे-मोहरे और हाव-भाव का वर्णन करते हैं तो उनकी कलम वर्णन के तनाव को ठीक से थाम नहीं पाती। दोनों ने अभिजात्य सौंदर्य से प्रेरित हो उनके रूप-रंग के बारे में लिखा है-‘‘प्रकृति ने गांधी के चेहरे को शायद जान-बूझकर कुरूप बनाया था। उनके दोनों कान उनके आवश्यकता से अधिक बड़े सिर के दोनों ओर शकरदान के हैंडिल की तरह निकले हुए थे। चपटे फैले हुए नथुनों वाली उनकी नाक उनकी सफेद छिदरी मूंछ पर भारी चोंच की तरह झुकी रहती थी…..।’’ लेकिन प्रचलित मानक पर गांधी को कुरूप कहते-कहते वे अचानक ही ठीठक जाते हैं और उन्हें लिखना पड़ता है-‘‘फिर भी गांधी के चेहरे पर एक विचित्र सौंदर्य की आभा थी क्योंकि वह निरन्तर बहुत चंचल रहते थे और उस पर मैजिक लैन्टर्न की जल्दी-जल्दी बदलती हुई आकृतियों की तरह उनकी बदलती मनोदशाओं और उनकी शरारत-भरी मुसकराहट का प्रतिबिंब झलकता है।’’ नैतिक बल से उपजे सौंदर्य के इस मानक को आजादी के दौर में देश की जनता ने भी अपनाया। विदेशी ताम-झाम और ग्लैमर को स्वदेशी के सौंदर्य ने आग लगा दिया। अपने देश में ही नहीं दुनिया भर में सौंदर्य के दमनकारी मानकों के बरक्स नया सौंदर्यशास्त्र गढ़ा जाता रहा है। अमेरिका को ही लें। चमड़ी के काले रंग को वहां बदसूरती का पर्याय माना जाता रहा है। सुंदर वही जो तन से गोरा है। इस विचार ने सदियों तक वहां अफ्रीकी अमेरिकियों का दमन ही नहीं किया स्वयं काले लोगों ने इस नस्लभेदी सौंदर्य प्रतिमान को आत्मसात कर लिया था। इसे चुनौती तब जाकर मिली जब वहां ‘ब्लैक इज ब्यूटीफूल’ आंदोलन चला।



गांधी ने कोट-पतलून के बदले लंगोटी पहनी। कोट-पतलून को उतार कर अधनंगे फकीर का वेश धारण किया तो नेहरू और जिन्ना ने भी साम्राज्यपरस्त सौंदर्य की दलील देते वेश को बदला और देशी रूप धरा। आजादी के नेताओं का सौंदर्य प्रतिमान एक समानानंतर सौंदर्य प्रतिमान था।

आज मेधा पाटकर, शर्मिला इरोम, सीके जानू, अरुणा राय, जैसी शख्सियतें सौंदर्य का समानानंतर संसार खड़ा कर रही हैं। एक ऐसा संसार जिसमें यह एलान तो है ही कि सुंदरता पर अधिकार महज समृद्धि का नहीं, साथ ही सौंदर्य का यह दर्शन जन- जन के करीब है। यह न्याय, समता और गरिमा की आभा से दीप्त है। सैकड़ों आदिवासियों के साथ तेजधार नर्मदा में कमर भर पानी में खड़ी मेधा पाटकर की तस्वीर भी आंखों को बांधती है। पूर्वोत्तर की छोटी गांधी शर्मिला इरोम मनुष्य विरोधी औपनिवेशिक आर्म्ड फोर्स स्पेशल पॉवर्स एक्ट के विरोध में सोलह साल तक सत्याग्रह किया।  यह नैतिक साहस ही है कि सोलह साल तक भूख हड़ताल पर बैठी इस साधारण स्त्री का सौंदर्य आज भी अग्निशिखा सा दीप्त है। घरेलू नौकरानी की नियति लेकर जन्मी आदया आदिवासी सी. के. जानू आज केरल के साढ़े तीन लाख भूमिहीन आदिवासियों की तकदीर बदलने के संघर्ष में लगी है। साहस के सौंदर्य को उसके पूरे व्यक्तित्व में महसूस किया जा सकता है। कहते हैं सुंदरता के पीछे दुनिया चलती है तो फिर एक दुनिया तो इनके पीछे भी चल रही है।



जनसंघर्ष की इन नायिकाओं ने मध्यवर्गीय कामना के प्रतीक के रूप में स्त्री-देह के प्रयोग को एक तरह से चुनौती दी है। इनकी आभा के सामने क्या ऐश्वर्या और उनकी समानधर्मा महिलाएं टिक सकेंगी? इन ‘निर्भीक विद्रोहिणियों’ ने जबरदस्ती ओढ़ायी गई भीरूता को जीत लिया है। ‘वे एक बड़ी लड़ाई को प्रतिश्रुत हैं।’ आजादी की दूसरी लड़ाई की इन नायिकाओं के सत्याग्रह, आत्मबल, निर्भीकता और नैतिक साहस की आभा एक रोज देखने वालों की आंखें भी बदल देंगी। दक्षिण अफ्रीका की कवयित्री ग्लोरिया म्तुंगवा ने ऐसी ही ‘निर्भीक विद्रोहिणियों’ के सौंदर्य को सलाम करते हुए लिखा है-
‘‘वह बहुत सुंदर लग रही है
उसके सौंदर्य को अब तक के प्रतिमानों से नहीं नापा जा सकता
उसका मानदंड मानवता के प्रति उसका समर्पण है।’’

सेलेब्रटिंग कैंसर

विभा रानी

लेखिका, रंगमंच में सशक्त उपस्थिति, संपर्क :मो- 09820619161 gonujha.jha@gmail.com



‘आपको क्यों लगता है कि आपको कैंसर है?’
‘मुझे नहीं लगता.‘
‘फिर क्यों आई मेरे पास?’
‘भेजा गया है.‘
‘किसने भेजा?’
‘आपकी गायकोनोलिज्स्ट ने.‘
और छ्ह साल पुरानी केस-हिस्ट्री– ‘बाएँ ब्रेस्ट के ऊपरी हिस्से में चने के दाल के आकार की एक गांठ. अब भीगे छोले के आकार की. ….कोई दर्द नहीं, ग्रोथ भी बहुत स्लो. मुंबई-चेन्नै में दिखाया- आपके हॉस्पिटल में भी. लेडी डॉक्टर्स से भी. हंसी आती है, साइज की इस घरेलू तुलना से. हंसी आती है अपनी बेवकूफी पर भी कि ब्रेस्ट-युट्रेश की बात आने पर सबसे पहले हम गायनोकॉलॉजिस्ट के पास ही दौड़ती हैं.‘


यह है हम आमजन का सामान्य मेडिकल ज्ञान- फिजीशियन, सर्जन, गायनोकॉलॉजिस्ट में अटके-भटके. छह साल मैं भी इस-उसको दिखाती रही. सखी-सहेलियों के संग गायनोकॉलॉजिस्ट भी बोलीं- ‘उम्र के साथ दो-चार ग्लैंड्स हो ही जाते हैं. डोंट वरी.‘ और मैं निश्चिंत अपनी नौकरी, लेखन, थिएटर, घर-परिवार में लगी रही.
धन्यवाद की पात्र रहीं गायनोकॉलॉजी विभाग की नर्स! डॉक्टर से मिलने की वजह जानकर बोली- ‘मैडम! आप सीधा ओंकोलोजी विभाग में जाइए. ये भी आपको वहीं भेजेंगी. आपका समय बचेगा’
दिल धड़का- “ओंकोलॉजी!” फिर खुद ही हंसी में उड़ा दिया- “विभा डार्लिंग! आज तक कभी तुझे कुछ हुआ है जो अब होगा.”

डॉक्टर मुझसे भी महान! बोला– ‘मुझे फायब्रोइड लगता है. डजंट मैटर. आप जिंदगी भर इसके साथ रह सकती हैं.” मेरा खुला या भौंचक चेहरा देखकर टालू अंदाज में कहा- “फिर भी, गो फॉर मैमोग्राफी, मैमो-सोनोग्राफी, बायप्सी एंड कम विथ रिपोर्ट.‘ मेरे लिए हर क्षेत्र अनुभव का नया जखीरा. इसके लुत्फ के लिए मैं हमेशा तैयार! मेरे शैड्यूल में एक महीने, यानि दीवाली तक मेरे पास समय नहीं. आज संयोग से कोई मीटिंग, रिहर्सल नहीं- सो काल करे सो आज कर, आज करे सो अब्ब’. मैमोग्राफी विभाग ने कहा, ‘बिना एप्पोइंटमेंटवाले पेशेंट को वेट करना होता है. मैं तैयार, पर  अकेली, अजीब घबडाहट और बेफिक्री का भाव लिए. अपने किसी काम के लिए किसी को साथ ले जाना मुझे उस व्यक्ति के समय की बरबादी लगती.अस्पताल जाना भी उनमें से एक था. अजय (पति) को फोन कर दिया कि कुछ टेस्ट के लिए रुक गई हूँ. करवाकर आऊँगी. मैंने ही इसे गंभीरता से नहीं लिया था तो वे क्या लेते!

 मजाक में कहती रहती थी- “मेरा ब्रेस्ट! रोलर प्रेस्ड!!” इस रोलर प्रेस्ड ब्रेस्ट ने मैमोग्राफी की तकलीफ को चौगुना कर दिया. टेक्नीशियनों की भी उलझन चुनौती की तरह मुंह बाए थी-” करो इस सपाट छाती की मैमोग्राफी.“ चुनौती स्वीकारी गयी और मेरी तकलीफ कई गुना बढ़ा गई. मैंने लिखा-
यह स्तन है या नींबू या नारंगी!
यह मशीन है या किसी आतताई के हाथ,
जिसकी नजर में स्तन हैं
मांस का लोथड़ा भर!
चक्की के ये दो पाट!
आओ, और भर दो इन दो पाटों के बीच
अपने जीते-जागते बदन को-खुद ही!
भरो चीख भरी सिसकारियाँ,
कोई नहीं आएगा इन बड़े बड़े डैनेवाले गिद्धों से
तुम्हें बचाने!
स्त्रियॉं का यह अंग किस-किस रूप में छलता है
खुद को!

बायप्सी की तकलीफ का भी अंदाजा था नहीं. डॉक्टर ने कहा था- “एक इंजेक्शन देकर फ्लूइड का सैम्पल लेंगे. बस!” लेकिन जब सुई चारों कोनों से कट कट मांस काटती गई तब बायोप्सी के दर्द का पता चला. ट्रे में खून से लिथड़ी रुई ने नर्वसनेस को और बढ़ा दिया.  तन-मन से कमजोर अब मैं घर जाने के लिए अस्पताल से बाहर आई. गाड़ी लेकर गई नहीं थी. ऑटोवाले रुक नहीं रहे थे. एक रुका, पर जाने से मना कर दिया. मैंने कहा, ‘भैया, अस्पताल से आई हूँ. चक्कर आ रहा है, ले चलो.‘ उसने फटाक से कहा- “तो अस्पताल से लेना था न!” मैं बोली- “वहाँ कोई ऑटो रुक नहीं रहा था, इसलिए रोड तक आई हूँ. देख नहीं रहे, गाड़ी का सहारा लिए खड़ी हूँ.“ उसने फिर से एक पल देखा, बेमन से बिठाया, घर छोड़ा. लेकिन, जबतक मैं लिफ्ट में चली नहीं गई, रुका रहा. छोटे छोटे मानवीय संवेदना के पल मन को छूते हैं.



चेक-अप करवाकर मैं भोपाल चली गई- ऑफिस के काम से. ऑफिस और मेरी व्यस्तता का चोली दामन का साथ है. उसमें भी तब, जब आपके कार्यालय का निरीक्षण हो और सारी जिम्मेदारी आप पर हो. लिहाजा, व्यस्तता में भूल गई सब. चार दिन बाद अचानक याद आने पर अजय को फोन किया. वे बोले- ‘रिपोर्ट पोजिटिव है, तुम आ जाओ, फिर देखते हैं.‘ यह 18 अक्तूबर, 2013 की रात थी. ऑफिस के काम से चूर इस रिपोर्ट से दिल एकबारगी फिर ज़ोर से धड़का. रात थी. पार्टी चल रही थी. मैं भी पार्टी में शामिल हुई. मन न होते हुए भी खा रही थी, हंस-बोल रही थी. दिन रात कुछ न कुछ तकलीफ़ों के बावजूद आज तक मेरी सभी रिपोर्ट्स ठीक-ठाक आती थीं. मन हंसा- ‘कुछ तो निकला.‘ दूसरा मन कह रहा था, गलत होगी रिपोर्ट! फिर भी अजय से कहा, “मेरे पहुँचने तक फैमिली डॉक्टर से दिखा लो.” दूसरे दिन फ़ैमिली डॉक्टर ने भी कन्फ़र्म कर दिया. मतलब, “वेलकम टु द वर्ल्ड ऑफ कैंसर!”

डॉक्टर भी रिपोर्ट देख चकरा गया- ‘कभी-कभी गट फीलिंग्स भी धोखा दे देती है.‘ डॉक्टर ने बड़े साफ और संक्षिप्त शब्दों में बीमारी, इलाज और इलाज के पहले की जांच- प्रक्रिया बता दी. कैंसर के सेल बड़ी तेजी से बदन में फैलते हैं, इसलिए, शुभस्य शीघ्रम…..! इस बीच मुझे ऑफिस के महत्वपूर्ण काम निपटाने थे, एक दिन के लिए दिल्ली जाना था- ऑफिस के एक टेस्ट में भाग लेने. लौटकर विभागीय मीटिंग करनी थी, क्योंकि छुट्टी लंबी लेनी थी. डॉक्टर ने 30 अक्तूबर की डेट दी. ना! इस दिन कैसे करा सकती हूँ! चेन्नै-प्रवास के कारण तीन साल से अजय के जन्म दिन पर नहीं रह पा रही थी. इसबार तो रह लूँ. तो 1 नवंबर, 2013 तय हुआ- ऑपरेशन के लिए.

अभीतक केवल ऑफिसवालों को बताया था. रिशतेदारों की घबडाहट का अंदाजा हमें था. वर्षों पहले कैंसर से मामा जी को खोने के बाद दो साल पहले ही अपने बड़े भाई और बड़ी जिठानी को कैंसर से खो चुकी थी. घाव ताजा थे, दोनों ही पक्षों से. इसलिए दोनों ही ओर के लोगों को संभालना और उनके सवालों के जवाब देना…बड़ी कठिन स्थिति थी. हमने निर्णय लिया कि इलाज का प्रोटोकॉल तय होने के बाद ही घरवालों या हित-मित्रों को बताया जाए.


आशंका के अनुरूप छोटी जिठानी और दीदियों के हाल-बेहाल! मैं हंस रही थी, वे रो रही थीं. मैंने ही कहा- ‘मुझे हिम्मत देने के बजाय आपलोग ही हिम्मत हार बैठेंगी तो मेरा क्या होगा?” मैंने तय किया था, बीमारी की तकलीफ से भले आँसू आएँ, बीमारी के कारण नही रोऊंगी. जब भी हालात से विचलित होती, सोचती, मुझसे भी खराब स्थिति में लोग हैं. मन को  ताकत मिलती. यहाँ भी सोचा, ब्रेस्ट कैंसर से भी खतरनाक और आगे की स्टेज के रोगी हैं. वे भी तो जीते हैं. उनका भी तो इलाज होता है. पहली बार मैंने अपने बाबत सोचा- मुझे मजबूत बने रहना है. अपने लिए, पति के लिए, बेटियों के लिए.

‘शहर में जब चर्चा चली तो किस्से-आम होने लगे. हम कैंसर या किसी भी बीमारी पर बात करते डरते- कतराते हैं. इससे दूसरों को जानकारी नहीं मिल पाती. मुझे लगता है, हमें अपनी बीमारी पर जरूर बातचीत करनी चाहिए, ताकि हमारे अनुभवों से लोग सीख-समझ सकें और बीमारी से लड़ने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो सकें. याद रखिए, धन तो आप कहीं से भी जुटा लेंगे, लेकिन मन की ताकत सिर्फ आप अपने से ही जुटा सकते हैं. आपके हालात पर जेनुइनली रोनेवाले भी बहुत मिलेंगे, लेकिन आपको ही उन्हें बताना है कि ऐसे समय में आपको उनके आँसू नहीं, उनके मजबूत मन चाहिए.

निस्संदेह कैंसर भयावह रोग है. यह इंसान को तन-मन-धन तीनों से तोड़ता है और अंत में एक खालीपन छोड़ जाता है. लेकिन इसके साथ ही यह भी बड़ा सच है कि हम मेडिकल या अन्य क्षेत्रों के प्रति जागरूक नही होते. जबतक बात अपने पर नहीं आती, तबतक अपने काम के अलावा किसी भी विषय पर सोचते नहीं. इससे भ्रांतियाँ अधिक पैदा होती हैं. कैंसर के बारे में भी लोग बहुत कम जानते हैं. इसलिए इसके पता चलते ही रोगी सहित घर के लोग नर्वस हो जाते हैं. हम भी नर्वस थे. मेरा एक मन कर रहा था, हम सभी एक-दूसरे के गले लगकर खूब  रोएँ. लेकिन हम सभी- मैं, अजय, मेरी दोनों बेटियाँ- तोषी और कोशी – अपने-अपने स्तर पर मजबूत बने हुए थे.

मेरा कैंसर भी डॉक्टर से शायद आँख-मिचौनी खेल रहा था. ऑपरेशन के समय डॉक्टर ने मुझे केमो पोर्ट नहीं लगाया- ‘आपका केस बहुत फेयर है. सैंपल रिपोर्ट आने के बाद हो सकता है, आपको केमो की जरूरत ही न पड़े. केवल रेडिएशन देकर छुट्टी.‘ किसी भी मरीज के लिए इससे अच्छी खबर और क्या हो सकती है!

ऑपरेशन के बाद अलग अलग कोंप्लीकशंस के बाद आईसीयू की यात्रा करती एक्यूट यूरिन इन्फेक्शन से जूझने के अलावा हालत बहुत सुधर चुकी थी. मेरे मित्र रवि शेखर एक म्यूजिक बॉक्स छोड़ गए. सुबह से शाम तक धीमे स्वर में वह मुझे अपने से जोड़े रखता. नर्स ने एक्सरसाइज़ बता दिए. दस दिन बाद घर पहुंची, एक पूर्णकालिक मरीज बनकर. अजय और बच्चे मेरे कमरे, खाने, दवाई के प्रबंध में जुट गए. मुझे सख्त ताकीद, कोई काम न करने की, खासकर प्रत्यक्ष हीट से बचने के लिए किचन में न जाने की. पूरे जीवन जितना नहीं खाया-पिया, आराम नहीं किया, अब मैं कर रही थी. शायद आपकी अपने ऊपर की ज्यादती प्रकृति भी नहीं सहती. उससे उबरने के इंतज़ाम वह कर देती है. तो क्या मेरा कैंसर प्रकृति का दिया इलाज है? या जीवन और नौकरी में आए वे पल और झंझावात, जिन्हें समझनेवाला कोई नहीं और जो गहरे जाकर गाँठ बना गया? या मैंने ही किसी के साथ नहीं बांटा- “रहिमन निज मन की व्यथा, मन ही राखो गोय. सुनि इठलैन्हि लोग सब, बाँटि न लैंहे कोय.”

सैंपल रिपोर्ट आ गई- पहला स्टेज, ग्रेड III! डॉक्टर ने समझाया- “चोरी होने पर पुलिस को बुलाते हैं, आतंकवादी के मामले में कमांडोज़. ग्रेड 3 यही आतंकवादी हैं, जो आपके ब्रेस्ट और आर्मपिट नोड्स में आ चुके हैं. इसलिए केमो अनिवार्य!” केमो स्पेशलिस्ट ने एक संभावित तारीख और निर्देश दे दिए- 23 नवम्बर- ‘सर्जरी के तीन से चार सप्ताह के भीतर केमो शुरू हो जाना चाहिए. चूंकि, केमो कैंसर सेल के साथ-साथ शरीर के स्वस्थ सेल को भी मारता है, इसलिए इसके साइड इफ़ेक्ट्स हैं- भूख न लगना, कमजोरी, चक्कर आना, बाल गिरना आदि.‘

तीसरा सप्ताह चढ़ा कि नहाने के समय हाथ में मुट्ठी-मुट्ठी बाल आने लगे. केमो की तैयारी के लिए पहले ही मैंने बाल एकदम छोटे करा लिए थे-पिक्सी कट. लंबे बालों के गिरने से बेहतर है छोटे बालों का गिरना. फिर भी बालों के प्रति एक अजीब से भावात्मक लगाव के कारण और बाल गिरेंगे, यह जानते हुए भी मैं अपने-आपको रोक ना सकी और फूट-फूटकर रोने लगी. अजय और कोशी भागे-भागे आए. कारण जानकर दिलासे देने लगे. कोशी ने अवांछित बाल हटाकर खोपड़ी को समरूप-सा कर दिया. लेकिन, आईना देख खुद को ही नहीं सह पाई. झट सर पर दुपट्टा लपेट लिया. रात में तोषी के आने पर मैंने कहा कि मेरा चेहरा बहुत भयावना लग रहा है. उसने मुझे अपने गले से लगाते हुए कहा, ‘ऐसा कुछ नहीं है, तुम अभी भी वैसी ही प्यारी लग रही हो.‘

एक-दो दिन बाद स्थिर होकर खुद को देखा- नाटक ‘मि. जिन्ना’ करते समय अक्सर गांधी की भूमिका की सोचती. तब हिम्मत नहीं थी. लेकिन अब मुझे अपनी टकली खोपड़ी से प्यार हो गया. उसे ढंकती नहीं, न घर में न बाहर में. यह अपना आत्म-विश्वास है. मुझे देखनेवाले कहते हैं- ‘यह ‘कट’ आप पर बहुत सूट कर रहा है.‘ किसी ने मौंक कहा, किसी ने कहा, “आप बिलकुल वाटरवाली शबाना आज़मी लग रही हैं.” शबाना से मेरी तुलना शुरू से की जाती रही है. लेकिन अब मैंने कहना शुरू कर दिया था, “मैं नहीं, वो मुझसे मिलती हैं.” (आखिरकार अब मेरी भी एक हैसियत है-लेखक, कवि, ट्रेनर, थिएटर एक्टर.)

केमो पोर्ट न लगाने के कारण इंट्रावेनस केमो दिया गया. लेकिन तीसरे केमो तक आते-आते सारी नसें फायर कर गईं. नसें काली पड़ गईँ और काफी दर्द रहने लगा. डॉक्टर बोले- ‘आपकी नसें काफी सेंसिटिव हैं. आमतौर पर ऐसा छह महीने बाद होता है, आपके साथ डेढ़ महीने में ही हो गया. अभी 13 केमो बाकी हैं, सो केमो पोर्ट लगाना होगा. इसके लिए और मार्जिन टेस्ट के लिए फिर से ऑपरेशन!

मेडिकल और शिक्षा- दो ऐसे क्षेत्र हैं, जहाँ आप डॉक्टर और शिक्षालयों के गुलाम हो जाते हैं. मार्जिन टेस्ट में ऑपरेशनवाली जगह से ही वहाँ का सैंपल लेकर टेस्ट के लिए भेजा गया, ताकि कैंसर –सेल्स की स्थिति का पता चल सके. रिपोर्ट आ गई. डॉक्टर ने बताया कि आप अब खतरे से बाहर हैं. लेकिन केमो, रेडिएशन, खाना-पीना, आराम- शिड्यूल के मुताबिक! पहले 4 केमो के एक सेट के बाद दूसरे सेट में 12 केमो- साप्ताहिक. केमो से भूख बहुत लगती और अस्पताल का खाना! केमो में दिन भर लगता. चुराकर घर से खाना ले जाती. हर केमो की अपनी दुश्वारियां. कभी सबकुछ सामान्य रहता. कभी एकदम कंप्लीकेटेड. एक साइकिल में ज़बान ऐंठ गई तो एक में शरीर में जर्क आने लगा.


इसी बीच इंफेक्शन हो गया और फिर 10 दिन अस्पताल में. जांच पर जांच और बिल पर बिल. मैं सोचती रहती, “क्या ये सभी जांच जरूरी भी थे?” फिर से वही बात आने लगी दिमाग में, “शिक्षा और चिकित्सा- ये दो क्षेत्र ऐसे हैं, जहां आप कुछ नहीं कर सकते.“ इंफेक्शन और इसके इलाज के कारण मेरा केमो 15 दिन आगे टल गया. मेरे साथ की दूसरी महिलाओं का आखिरी केमो आता. केमो से निकलने की ख़ुशी चहरे पर साफ़ नज़र आती. वे बाकियों को दिलासे देतीं. मुझे भी मिले और मैंने भी दिए.

16 केमो के बाद रेडिएशन. फिर से उसका पूरा प्रोटोकॉल. 35 सिटिंग. सोमवार से शुक्रवार. प्रतिदिन. उसके लिए अलग से काउन्सिलिंग. अलग से बचाव के उपाय! प्रभावित जगह पर पानी, साबुन, क्रीम का प्रयोग वर्जित. ब्रेस्ट के कारण गले पर भी असर पड़ा. आवाज़ फट से गई. धीरे धीरे रेडियेशन से जगह झुलसकर काली पड़ने लगी. साइकिल पूरा होने पर एक महीने का पूर्ण आराम.

ये सब तो शिड्यूल में था. जो नहीं था और जिसे मैंने अपने लिए तय किया था, वह था खुद को बिजी रखना. केमो के दो सप्ताह तक मैं उठने की हालत में नहीं रहती. उसके बाद एक सप्ताह “बेहतर” रहती. साप्ताहिक केमो मे तो और भी मुश्किल थी. जबतक तबीयत थोड़ी संभलती, फिर से नए केमो का दिन आ जाता. लेकिन अपने इन तथाकथित ‘बेहतर’ दिनों को मैंने तीन भागों में बाँट दिया- लिखना, पढ़ना और वीडियो बनाना. खूब किताबें पढ़ीं- हिन्दी, अँग्रेजी, मैथिली की. लिखा भी- कई कहानियाँ, कविताएँ और नाटक “मटन मसाला चिकन चिली.” उसे प्रोड्यूस किया. CAN शीर्षक से इस मौके पर लिखी कविताओं का संग्रह तैयार है-अँग्रेजी और हिन्दी में- द्विभाषी. “सेलेब्रेटिंग कैंसर” नाम से ही आत्मकथात्मक किताब लिख रही हूँ. यह एक प्रयास है रचनात्मक तरीके से लोगों को कैंसर के बारे में बताने का, कैंसर से न डरने का, इससे लड़ने का साहस और इसके प्रति सकारात्मकता तैयार करने का. इंस्टाग्राम पर 15 सेकेण्ड के वीडियो बनाने की सुविधा है. चुनौतियों में जीना स्वभाव में है. भोजपुरी गीतों और बच्चों की बातों को लेकर वीडियो बनाने और यूट्यूब पर पोस्ट करने लगी. फिर उन्हें एडिट करके कई फ़िल्में बनाकर पोस्ट कीं. हर रोज खूब फल खाना पड़ता. ‘सत्यमेव जयते’ प्रोग्राम में घर में खाद बनाने की विधि बताई गई. मैंने फलों के छिलके से खाद बनाना शुरू कर दिया. थोड़ी बहुत बागवानी भी कर लेती. पोए साग की पहली फसल मेरी खुशी कई गुना बढ़ा गई.

इसी समय शुरू किया- “अवितोको क्रिएटिव इवानिंग” कार्यक्रम! “रूम थिएटर” की अवधारणा पर आधारित! चूंकि इन्फेक्शन के डर से घर से निकलने की इजाज़त नहीं थी, इसलिए इसे घर पर ही शुरू किया. शनिवार को केमो लेती. केमो के बाद रात भर नींद नहीं आती. पर, इतवार को ‘रूम थिएटर’ के लिए तैयार हो जाती. अमूमन 36 घंटे के बाद मैं सो पाती. सभी ने मेरा बहुत साथ दिया और घर पर ही हमने ‘एक्सपेरिमेंटिंग थिएटर’ से लेकर ‘मंटो’ पर नाटक की कई प्रस्तुतियाँ कीं. 25-30 लोगों के बैठने की क्षमतावाले घर में 60-70 लोग आए.



अप्रैल, 2013 के गीताश्री के संपादकत्व में निकलनेवाली हिन्दी पत्रिका ‘बिंदिया’ में मेरा एक लेख छपा. दरअसल, उन्होने ही मुझे इस पर लिखने के लिए प्रेरित किया, जबकि मैं उसके छपने के बाद के परिणाम को लेकर थोड़ी परेशान थी. अंतत: वही हुआ. उसके छपते और उसे फेसबुक पर पोस्ट करते ही जैसे भूचाल आ गया. फोन, मेल, फेसबुक मेसेज! सभी मुझे इस तरह दिलासे देने और रोने लगे, जैसे मैं सचमुच मर गई होऊँ! उनके फोन दिलासे के बदले हतोत्साहित करते. अजय ने कड़े शब्दों में मुझे किसी का फोन लेने या किसी से बात करने से मना कर दिया. कुछ मेरे पास आना चाहते थे. मुझे पता था, वे मुझसे मिलने के बहाने मेरी  और भी कुरूप पड़ गई सूरत को देखना चाहते हैं. उन सबने कैंसर के बारे में सुन भर रखा था, उसे नजदीक से देखा नहीं था और मैं उनके लिए एक रेडीमेड उपकरण बनकर आ गई थी. वे सब आए. मैं उनसे मिली- अपनी गंजी खोपड़ी, सूनी पलकों और भौंहों, लेकिन जीवंत मुस्कान और जीवन की एक नई आस के साथ- उन्हें ही दिलासे देती और खूब मुसकुराती हुई.

आज इन सबसे निकल आई हूँ. केमो, रेडिएशन का प्रोटोकॉल पूरा करने और एक महीना आराम करने के बाद ऑफिस आना शुरू किया. मेरे साथ मेरा काम मेरा इंतज़ार करते रहते हैं या मैं काम के बगैर जी नहीं सकती, पता नहीं. दफ्तर के दौरे के साथ-साथ साहित्यिक और नाट्य दौरे शुरू हो चुके हैं. सितंबर, 2014 में एसआरएम, चेन्नै का पहला दौरा- विशिष्ट अतिथि के रूप में! दिसंबर, 2014 में आजमगढ़ में नाटक ‘भिखारिन’ का पहला शो. रायपुर साहित्य महोत्सव का संयोजन और इन सबसे ऊपर ऑफिस की तमाम जिम्मेदारियाँ. जीवन की दूसरी पारी का व्यस्ततम दौर शुरू हो चुका है. दवा और फॉलो- अप चल रहा है. खान-पान और आराम अभी भी बहुत ज़रूरी है. कमजोरी अभी भी है. लेकिन, खुद को व्यस्त रखना बहुत सी परेशानियों से निजात दिलाता है. अजय, तोषी, कोशी सभी मुझे समझाते रहते हैं. मैं थोड़ा उनको और थोड़ा खुद को समझाती-समझती रहती हूँ.


कुछ दिन लगते हैं, अपने-आपसे लड़ने में, खुद को तैयार करने में. लेकिन, अपना मानसिक संबल और घरवालों का संग-साथ कैंसर क्या, किसी भी दुश्वारियों से निजात की संजीवनी है. यह आपको कई रास्ते देता है- आत्म मंथन, आत्म-चिंतन, आराम, खाने-पीने और सबकी सहानुभूति भी बटोरने का (हाहाहा). यह ना सोचें कि आप डिसफिगर हो रही हैं. यह सोचें कि आपको जीवन जीने का एक और मौका मिला है, जो शत-प्रतिशत आपका है. इसे जिएँ- भरपूर ऊर्जा और आत्म-विश्वास से और बता दीजिये कैंसर को कि आपमें उससे लड़ने का माद्दा है. सो, कम एंड लेट्स सेलेब्रेट कैंसर!
क्या फर्क पड़ता है कि
सीना सपाट है या उभरा
चेहरा सुंदर है या बिगड़ा
सर पर बाल हैं या है यह टकला
जीवन इससे बढ़कर है
यौवनमय, स्फूर्त और ताज़ा,
आइये, मनाएँ इसे भरपूर,
जिएं इसे भरपूर !

स्त्रीविमर्श में जाति, वर्ग और धार्मिक पहचान की महत्वपूर्ण भूमिका होनी चाहिए : नमिता सिंह

 वरिष्ठ रचनाकार और हिन्दी मासिक ‘वर्तमान साहित्य’ की पूर्व संपादक से स्त्रीविमर्श और स्त्री आन्दोलन पर बात कर रही हैं युवा लेखिका और ‘हमरंग’ के संपादन मंडल की सदस्य अनिता चौधरी की बातचीत : 


आज स्त्री आन्दोलन किस दिशा में चल रहा है ? या इसकी गति क्या है ?

आज हम अपने देश की बात करें तो स्त्री आन्दोलन एकांगी चल रहा है. उसके अपने कारण है. आज पूरे देश में रेप की घटनाएँ हो रही है. इस रूप में स्त्रियों के साथ जो व्यवहार पूरा समाज कर रहा है. अगर स्त्री आन्दोलन ऐसा ही चलता है तो वह जस्टिफाइड है क्योंकि समाज, स्त्रियों की एक सम्मानजनक स्थिति के लिए तैयार नहीं हो पा रहा है. इसके लिए बहुत बातचीत भी हो रही है. जब कभी कोई रेप की बड़ी घटना होती है. मोलीस्ट्रेशन की बात होती है, बड़ा  हल्ला-गुल्ला भी होता है. कैंडिल मार्च भी निकाले जाते है. लेकिन जब हम स्त्रियों के प्रति माइंड सैट करने की बात करते है तो वह एक दिन की बात नहीं होती.  एक सुनियोजित रूप में वातावरण तैयार करने की बात होती है इसके लिए लम्बे प्रयास करने होते है. इसलिए हम स्त्री आन्दोलन की बात करें तो आज जो स्त्रियों के प्रति हिंसा की घटना है. उससे जुडा हुआ लग रहा है.

अक्सर यह सुनने में आता है कि दशकों से स्त्री-विमर्श हो रहा है क्या अब भी इसकी आवश्यकता है ? 

स्त्री विमर्श का मतलब है कि स्त्रियों की स्थितियों पर बातचीत और उनके लिए एक न्यायोचित माहौल बनाने की बातचीत. यह बातचीत भी पिछले ढेड़ सौ या पौने दो सौ सालों से शुरू हुई है. उससे पहले इस तरह की कोई बात नहीं होती थी. खासतौर से उन्नीसवी शताब्दी में जब सुधारवादी आन्दोलन शुरू हुए, उस वक्त जो सबसे पहला कार्यक्रम बना, समाज सुधार में स्त्रियों की स्थिति. स्त्रियों के बंदी जीवन में समानता का कहीं कोई अवसर नहीं था. शिक्षा उनके लिए निषेध थी. उनकी कोई आवाज ही नहीं थी. तब से तो बात शुरू हुई. धीरे-धीरे आज हम इस स्थिति पर पहुँचे है कि स्त्रियों को संविधान में बराबर के अधिकार है. स्त्रियों के लिए राज्य की ओर से भी शिक्षा के लिए प्रबंध किये गए है और एक बड़ा मध्य वर्ग बना है. जिसमें सामान्यत: स्त्री और पुरुष की समानता की बात होती है. यह समानता की बात शिक्षा के स्तर पर भी होती है. लेकिन पूरे समाज का एक रवैया जो एक स्त्री को भी अपने बराबर समझने की बात करे, वह तो आज भी नहीं है. आज भी स्त्रियां असम्मानजनक स्थितियों में जी रही है. स्त्रियों के लिए समाज में एक सामान वातावरण बनाने के लिए जमीनी कोशिशें करनी पड़ेंगी, इसके बाद भी कितना लंबा वक्त लगेगा.  जिससे हम कुछ अचीव कर पाये इसलिए स्त्री विमर्श को कम करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता है.

दो पीढियां : नमिता सिंह, अनिता चौधरी

स्त्री सुरक्षा को लेकर जो कानून बनाए गए है | उनका असर आप समाज में कितना देखती है ?

स्त्रियों के लिए क़ानून तो बहुत पहले से ही बनाए जा रहे थे  लेकिन उनमें बहुत लूप होल्स  थे | धीरे-धीरे बात होती गई. महिला संगठनों ने भी इस पर बात की . दिसंबर २०१२ में निर्भया कांड से लोगों में ज्यादा जागरूकता आई. तब जस्टिस वर्मा कमेटी के सभी बिन्दुओं पर व्यापक रूप से चर्चा की गई और क़ानूनों में भी बदलाब किये गए  लेकिन क़ानून बना देने से भी तो कुछ नहीं होता. उसमें जो कठोर प्रावधान बने तो उसका नतीजा यह हुआ कि अब गैंगरेप करने के बाद लड़की की ह्त्या कर दी जाती है. जिससे सबूत भी मिट जाते है और जुर्म साबित भी नहीं होता है. कहने का मतलब यह कि समाज की स्थिति भी ज्यों की त्यों है. उसकी सोच में  एक रत्ती भर का परिवर्तन नहीं आया है. अंतर सिर्फ यह है कि अगर सबूत है और जुर्म  साबित हो जाता है तो उसको सजा मिल जायेगी. वरना आज से दस या बारह साल पहले जो आंकड़े लिए जाते थे तो उसमें कन्वेंशन रेट बढ़ा है. आज वह न्याय माँगते-माँगते तंग आ जाती है. जिसका अंत फिर सुसाइड में होता है. कितने ऐसे केस हुए है जहाँ बलात्कार की पीडिता ने अंत में आत्महत्या ही कर ली. इसलिए बदलाव तो यह आया है कि अब रेप होते है और सुबह ह्त्या हो जाती है. जिससे सबूत ही न रहे.

ऑनर किलिंग या साम्प्रदायिकता जैसे मुद्दों पर कितनी महिला लेखक है जो इन्हें अपनी लेखनी में शामिल नहीं कर रही है | आपको इसके क्या कारण नजर आते है ?

अगर मैं साम्प्रदायिकता की बात करू तो यह जरुर है कि बहुत महिलायें इन मुद्दों पर नहीं लिख रही है. उसका एक कारण यह है कि सांप्रदायिकता के प्रति लोगों का दृष्टिकोण बहुत साफ़ नहीं है. लोगों ने साम्प्रदायिकता को खाली एक दंगा या लड़ाई-झगडे के रूप में देखा है. दूसरा कारण राजनैतिक है जो विशेष रूप से सत्ता या व्यवस्था के साथ जुड़ा हुआ है. हमारे यहाँ पर लोग राजनीति से बहुत दूर रहते है और इसे बहुत बुरी चीज समझते और अक्सर कहते है कि    हमें राजनैतिक नहीं होना है. जब आप राजनैतिक ही नहीं होगें तभी तो आपको सम्मान और पुरूस्कार मिलेंगें. जब आप व्यवस्था पर चोट करोगे और उसे साम्प्रदायिकता का भागीदार बनाओगे तो वो आपको सम्मान देगा ?दूसरा यह है कि इस रूप में हमारी महिला लेखिकाएं सामाजिक आन्दोलनों से नहीं जुडी हैं. मैं अपने को बहुत सौभाग्यशाली समझती हूँ कि लेखन के साथ साथ मैं आन्दोलनों से भी जुड़ी रही. खासतौर यहाँ कुंवरपाल का भी योगदान रहा था. हमने साथ मिलकर साम्प्रदायिकता के माहौल में सद्भावना और एकता के लिए राजनैतिक स्तर पर काम करने और इन चीजों से रूबरू होने की वजह से हम पुरुस्कारों और सम्मानों से दूर रहे. इसलिए हमारी महिला लेखिकायें और बहुत से पुरुष भी इन मुद्दों पर नहीं आते है कि यह खतरे की चीज है |जहाँ तक ऑनर किलिंग की बात है. इसे समझाने की जरुरत है कि खुद लेखक भी इसी समाज का प्राणी है. उसने अपने आप को सामाजिक और राजनैतिक रूप से इतना शिक्षित नहीं किया है  कि वह इन सवालों पर आपके साथ आ सके. अभी हमारे समाज में बहुत से लेखक व लेखिकाएं हैं . जहाँ जातियों से अलग या इंटररिलिजन शादियाँ हो जाए तो उसे खुद भी अच्छा नहीं समझते हैं.  इसके लिए बहुत ही उदारवादी सोच व विचारधारा की जरुरत होती है. तब आप इस पर उतनी ही प्रखरता से बात कर पाओगे और उसे संवेदना के स्तर पर महसूस करोगे. इस विषय पर कुछ एक कहानियाँ है, बहुत ज्यादा तो नहीं है. हाँलाकि यह एक व्यापक रूप से विषय नहीं बना है. लेखक अपने आस-पास जो देखता है उसी पर लिख देता है लेकिन जब तक लेखक के पास पूरा वैचारिकता का आधार न हो तो वह मुश्किल होता है इन मुदद्दों पर अड़े रहना.


ऑनर किलिंग या साम्प्रदायिकता जैसी घटनाओं के पीछे आप धर्म या धार्मिक मान्यताओं को कितना जिम्मेदार मानती है ?

पहले धार्मिक मान्यतायें ऐसी थी जो आप को एक अच्छा इंसान बनने के लिए प्रेरित करती थी. आज धार्मिकता का स्वरुप वह नहीं रह गया है. आज यह सीधे-सीधे सत्ता और राजनीति के मंतव्यों से जुडी हुई है क्योंकि राजनीति ही धार्मिकता का माहौल बना रही है जिसका निश्चित ही अपना मकसद होता है. इसलिए ये जो धार्मिक मान्यताएं है, साम्प्रदायिकता में बदल गयी है क्योंकि वह व्यवस्था से जुड़ जाती है. जहाँ तक आपने ऑनर किलिंग की बात कही है. ये कमन्युनीटी खाप पंचायते हैं.जो जाटों की पंचायते है और मुस्लिम समुदाय की भी अपनी पंचायतें हैं जहाँ पर वे फतवे देते हैं. ये पंचायतें बहुत ही सामाजिक संकीर्णता की बात करती है. ये खाप पंचायतें वहां स्त्री विरोधी निर्णय लेकर जो पूरा माहौल बनाती हैं तो उसका विरोध कोई क्यों नहीं करता है. वे विरोध इसलिए नहीं करते हैं कि हमारे जो राजनेता हैं वे खाप पंचायतों के बीच में जाकर कहते हैं कि वे उनके बहुत बड़े हिमायती है. जबकि वे स्त्री विरोधी बातें कर रहे हैं | चूकिं राजनेताओं का खाप पंचायतों के रूप में एक बहुत बड़ा वोट बैंक हैं. ठीक यही स्थिति मुस्लिम समुदाय की भी है. उनके धार्मिक नेता भी फतवे जारी करते हैं. अगर विरोध किया तो उनके वोट चले जायेंगे इसलिए ये संस्थाएं वोट बैंक की राजनीति से जुड़ जाती हैं. एक प्रभावी रूप से उसका प्रतिवाद नहीं हो पाता.

वर्तमान समय में युवा पीढ़ी या ख़ास तौर से युवातियाँ, शादी जैसी संस्थाओं से विमुख हो रही हैं. आप इसके क्या कारण मानती हैं ?


खासतौर पर जब युवतियां शादी जैसी संस्था से दूरी बना रही है. उसका कारण है कि भारतीय पारम्परिक संस्कार में शादी के बाद, उस रुढीवादी पुरुष को पत्नी रूपी महिला पर डोमिनेंट होने का जो पारिवारिक वातावरण मिल जाता है.आज लड़की उस वातावरण से वैचारिक रूप से मुक्त होना चाहती है. उसने एजूकेशन के साथ जो विचारधारा पढी है उसी के अनुसार जीवन जीना चाहती है. लेकिन हमारे भारतीय परिवार और परम्परा की अवधारणा के अंतर्गत शादी के बाद पति को पत्नी पर कई सारे अधिकार मिल जाते है जो हर स्तर के होते है. चाहे वह सेक्स के रूप में हो या परिवार में डोमिनेंस के रूप में. आज की कोई भी पढी-लिखी लड़की किसी भी वर्ग की हो, उसकी भी अपनी मर्जी और इच्छा है. कोई जरुरी है, पति के चाहने पर बच्चे पैदा हो. वह नहीं चाहती तो यहीं पर क्लैश हो जाता है. यहाँ पर पति में अपने अधिकार की भावना जागृत हो जाती है. लड़कियों के पढ़ने-लिखने से उनमें एक स्वाभिमान, अपनेपन, अस्मिता और अपने व्यक्तित्व के प्रति सजगता की जो स्थिति आई है वहां पर इस तरह के क्लैशेज होना बहुत स्वाभिक है. इसलिए कई बार ठोस स्थूल कारण नहीं होने पर भी तलाक हो जाता है, इसीलिए वे कहती है कि हम इस तरह से बंधन में नहीं रह सकती. हम स्त्री सशक्तिकरण और  स्त्रियों के प्रति हिंसा बात करते है लेकिन जब तक हमारे पुरूष समाज की एजूकेशन नहीं होगी तब तक ये चीजें सही नहीं हो सकती है. इसीलिए तलाक हो रहे है, अलग-अलग रहने की बात हो रही है, लिव इन रिलेशनशिप हो रही है या फिर शादी ही न करो. इन जड़ परम्पराओं या संस्कारों की वजह से भी इस युवा पर दूसरा समाधान तो है नहीं और न ही कोई आइडियोलोजी है इसीलिए उसे लगा कि सात फेरे लेना जिन्दगी का इतना बड़ा जहर बन जाए, इससे अच्छा है हम इससे दूर हो जाए.  यह केवल ग्लोबल इफेक्ट ही नहीं है इसमें लड़कियां पढ़-लिखकर एक चेतना संपन्न हो गयी है. यह भी एक कारण है. यह बदलाव सिर्फ हाई क्लास की लड़कियों में ही नहीं हैं. पहले की अनपढ़ और पढी-लिखी लड़कियां भी इस तरह के निर्णय ले रही है ,क्योंकि वह इस तरह के वातावरण को देख रही है तो उनकी मानसिकता में बदलाव है लेकिन यह बदलाव लड़कियों के स्तर पर तो हो रहा है. पूरे समाज के स्तर पर नहीं हो रहा है इसीलिए कॉण्ट्राडिक्शन्स पैदा हो रहे है. मैं हमेशा कहती रही हूँ कि जब भी हम स्त्री सशक्तिकरण और स्त्री विमर्श की बात करें तो यह केवल स्त्री समूहों के लिए नहीं है. पूरे समाज को एडजस्ट करने वाली बात कहें.

 धार्मिक संवाहक महिलायें ही मानी जाती है | अगर आप इस बात से सहमत है | तो क्यों ? अगर नहीं तो क्यों ?

हाँ मैं इस बात से पूरी तरह से सहमत हूँ कि हमारे समाज में महिलायें ही संवाहक हैं. हमारे यहाँ जब से मानव समाज बना है. समाज में वर्ण आश्रम हुआ है. यह परम्परा तब से चली आ रही है.जब हमारा पुरुषवादी समाज बना और इसकी सामन्ती स्तिथियाँ आई. ब्राह्मणों और राजसत्ता में एक संघर्ष हुआ. उसके बाद क्षत्रीयों ने कहा कि यह राजसत्ता हमारी है, इसे  हम चलाएंगे, तुम समाज को चलाओ. अब समाज को चलाने में जो सबसे कमजोर तबका था वे स्त्रियों थी, जिन्हें आसानी से हेंडिल किया सकता था इसलिए ब्राह्मणों का वर्चस्व परिवारों की स्त्रियों के बीच रहा है. अगर हम एक दो पीढ़ी पीछे पास्ट में देखें तो कुछ लोग बहुत पढ़े-लिखे होने के साथ-साथ, बड़े उच्च पदों में हुआ करते थे लेकिन घर की औरतें बहुत ही पारम्परिक तरीके से परदे के पीछे रहा करती थीं. जो बिलकुल साक्षर नहीं होती थीं और बहुत ही धार्मिक कर्मकांडों को करने वाली थीं क्योंकि हमारे समाज में इसी प्रकार का डिवीजन हुआ कि पुरुष बाहर का ही देखेंगे, चाहे वह किसी भी क्षेत्र में कितना भी आगे बढे या उन्नति करे और स्त्रियाँ बिलकुल उन धार्मिक परम्पराओं को ही मानेंगी, जिन्हें हम भारतीय परम्परा कहते है. इन परम्पराएं को स्त्रियों ही शेप दे रही हैं. आज लड़कियां पढ़-लिखकर थोड़ा नौकरी कर रही है इस रूप में स्वतंत्र है लेकिन उनकी मानसिक स्थिति को बदलने की कोशिश नहीं की गई है. वे सारा कुछ उन्हीं परम्पराओं से ले रही हैं जो उनके तत्व कहे जा सकते हैं. आज, इन्हीं औरतों के बल पर धर्म आधारित आन्दोलन संचालित हो रहे हैं जो पूरी राजनैतिक व्यवस्था से जुड़े है. इस पर कभी किसी ने विचार करने की भी कोशिश नहीं की है और साथ ही इस बात पर भी महत्व नहीं दिया कि घर की औरतें की एजूकेशन और उनके लिए सही परिप्रेक्ष्य में देखना होना चाहिए.


आपको नहीं लगता है कि सम्पूर्ण स्त्री आन्दोलनों को इस दिशा में कोई सशक्त कदम उठाने चाहिए | और वो क्या कदम हो सकते है |   

आज से दस या बारह साल पहले स्त्री विमर्श पर बात करते थे (हांलाकि आज भी करते हैं) | तो हम कहते थे कि स्त्रियों की आपस में एकता होनी चाहिए. पूरी दुनिया की औरतों की एक सी कठिनाईयां, कष्ट और समस्याएं है | हमने देखा कि समाज में आज भी वर्णवादी व्यवस्था बहुत निर्मम है. दलितों की स्थितियां देखी या २००२ में गुजरात देखा उससे पहले भिमंडी देखा. यह सब देखकर हमारी स्त्री विमर्श की अवधारणा बिलकुल समाप्त हो गयी इसलिए स्त्रियों पर बात करते वक्त हमारा बयान वर्ग आधारित होना चाहिए. बिना वर्ग आधारित स्त्री विमर्श किये, हम सही नतीजों पर नहीं पहुंच सकते है. हमें दलित स्त्रियों की अलग तरह से बात करनी पड़ेगी और वहीँ हमें ग्रामीण स्त्रियों की बात दूसरी तरीके से करनी होगी, जहाँ ईशूज भी दूसरे हो जायेंगे. शायद जो पहले महत्वपूर्ण नहीं थे, लेकिन दूसरी जगह महत्वपूर्ण हो जायेंगे. इस तरह से जब हम धार्मिक पहलू पर बात करेंगे तो हमारी एप्रोच मिडिल क्लास औरतों के लिए दूसरी हो जायेगी जहाँ पर कि हमें कहना पड़ेगा कि धर्म के आधार पर एक समूह की औरतों पर अत्याचार होता है. उसके लिए कौन जिम्मेदार है ? कैसे हम उसका निराकरण कर सकते है ? यह हमारी क्लास बेस्ड एप्रोच होनी चाहिए. उसके बिना हम सही नतीजों पर नहीं पहुँच सकते और न ही सही तरीके से बात कर सकते है.


अधिकतर कहानियों में कहानी के बिंदु घरेलू होते है, राजनैतिक नहीं होते है | इसके क्या कारण है कि स्त्रियां राजनैतिक मुद्दों पर नहीं लिखती है जो लिखती है उनका प्रतिशत न के बराबर रहता है ? 

आज कुछ लेखिकाएं इन मुद्दों को ले रही है लेकिन अभी भी बहुत बड़ी संख्या में महिला लेखिकाएं ऐसी है जो घरेलू और आपसी मुद्दों को ही लेती हैं. उसका कारण यह कि औरतें अपने दुखों से ही इतनी परेशान होती है लेकिन कुछ लेखिकाएं है जिनकी नजर सभी जगहों पर नजर जा रही है. उन्होंने आदिवासियों पर, विस्थापन पर और जाति व्यवस्था की विद्रूपताओं पर लिखा है और उनमें राजनैतिक विषय भी है. लेकिन मैं इस बात को मानती हूँ कि राजनीति में लिखना जो है अपने आप को अग्निपथ से निकलना है और जितनी बड़ी लेखिकाएं हैं वो सब महिलायें बड़े-बड़े सम्मानों और पुरुस्कारों से विभूषित हो चुकी है. वे नहीं लिख सकती क्योंकि इन्हें व्यवस्था और पूरी सत्ता पर चोट करनी पड़ेगी. अगर आज हम गंभीर लेखन के जरिये  सांप्रदायिकता पर चोट कर रहे है तो कैसे सत्ता व्यवस्था को छोड़ देंगे. मेरा उपन्यास ‘लेडीज क्लब’ और बहुत सारी कहानियाँ है जैसे- राजा का चौक है उसमें हम कैसे इन मुद्दों को छोड़ सकते है. अगर इन सब बातों पर लिखते है तो सत्ता व्यवस्था से अलग नहीं हो सकते है. मेरा मतलब है कि जब आप इन सब मुद्दों पर लिखेंगे तो आपको रायपुर कैसे बुलाया जाएगा (हंसते हुए) ? दूसरी एक बात और है| जैसे मैत्रेयी है, उन्होंने अपनी इमेज एक नारीवादी लेखिका के तौर पर बनाई है.अब सवाल उस इमेज को बनाए रखने का भी है | अगर आप स्त्रीवादी है और आपके लेखन में इससे इतर कोई बात आ रही है जैसे हम यह दिखा रहे है कि स्त्रियों पर भी आजकल के माहौल, ग्लोबलाइजेशन या बाजारवादी संस्कृति का असर है.उससे भी कभी-कभी औरतें भी शोषक के रूप में व्यवहार करने लगती है.इससे उनकी जो इमेज बनी हुई है वह खराब होगी. कई बार ऐसा होता है कि आपको अपनी इमेज को बनाये रखने के लिए एक ख़ास तरह का लेखन करना पड़ता है  तो यह भी एक मजबूरी हो जाती है कि जो इमेज बन गयी है उसको भी सुरक्षित रखने की जरूरत होती है. इसीलिए एक लेखक के तौर पर हमारा दृष्टिकोण सारभौमिक हो.जिससे हम राजनीति और साम्प्रदायिकता जैसे मुद्दों पर भी बात कर सके.

आंबेडकरी गीतों में रमाबाई और भीमराव आंबेडकर : चौथी क़िस्त

शर्मिला रेगे की किताब  ‘अगेंस्ट द मैडनेस ऑफ़ मनु : बी आर आम्बेडकर्स राइटिंग ऑन ब्रैहम्निकल  पैट्रीआर्की’की भूमिका का अनुवाद हम धारावाहिक प्रकाशित कर रहे हैं. मूल अंग्रेजी से अनुवाद डा. अनुपमा गुप्ता  ने  किया है.  इस किताब को स्त्रीकाल द्वारा  सावित्रीबाई  फुले  वैचारिकी  सम्मान, 2015 से  सम्मानित किया  गया  था. 

 

अब हम अपना ध्यान इन दोनों महिलाओं की भूमिकाओं में प्रस्तुतिकरण में इस असाधारण विरोध पर केंद्रित करते हैं. रमाबाई को जहां ‘रमई’ (समुदाय की मां) की उपाधि मिली वहीं सविताबाई की भूमिका पर संदेह वह बहस बढ़ती गई. इससे हम यह दलील दे सकते हैं कि आंबेडकरी पुस्तिकाओं व संगीत रचनाओं में निजी/वैवाहिक का स्वरूप् ब्राह्मण मध्यम वर्ग को आधुनिकता में गढे गये सरण्यभावी विवाह के आदर्श पर सवाल उठाता है. आंबेडकर और रमाबाई पर रची गई संगीत रचनाओं में दम्पति के बीच का साख्य निजी दायरों को लक्ष्य कर सार्वजनिक क्षेत्र में प्रवेश कर जाता है. यह संकेत देता है कि समुदाय घर-परिवार व राजनीतिक क्षेत्र एक दूसरे से अलग नहीं किये जा सकते.

रमाबाई

इस पुस्तिकाओं में रमाबाई के जीवन का चित्रण एक त्याग की मूर्ति मां व पत्नी की तरह नहीं किया गया है. बल्कि इनमें उनके व्यक्तित्व में आये परिवर्तनों को उभारा गया है. किस तरह एक छोटी अनाथ लड़की ‘रामी’ जिसने आंबेडकर से विवाह किया, एक राजनीतिक बिरादरी की मां ‘रमई की पदवी पा लेती है. गीतों और पुस्तिकाओं में रमाबाई के शुरूआती वैवाहिक जीवन के विवरण है, जिनमें वे आंबेडकर से यही अपेक्षा रखती हैं कि अमेरिका से लौट कर वे अपनी गृहस्थी संभाले लेंगे, कि बाॅम्बे के सीडेन हेम महाविद्यालय में व्याख्याता के तौर पर कार्य करते हुए एक सामान्य जीवन बितायेंगे’. वे उनकी उच्च शिक्षा की अभिलाषा पर सवाल उठाती हैं, नाराज होती हैं और  कई-कई दिनों तक उनसे बात नहीं करती है. लेकिन अंततः रमाबाई अध्ययन के लिये आंबेडकर की भूख को समझ जाती हैं और बिना शर्त उन्हें सहयोग देती हैं. 50 रूपए महीने में पूरा कर खर्च संभालती हैं, बल्कि उसमें से पांच रूपए आकस्मिक खर्चों के लिये बचा भी लेती है. 1916 में अंबेडकर के लंदन जाने के बाद जिस गरिमा से रमाबाई निर्धनता में भी आत्मबल संभाले रहती हैं उसकी इन गीतों में विशेष स्तुति की गई है. भोजन के लिये हर दिन का संघर्ष और रोज चार भाखरी (ज्वार की रोटी) पर जीवित रहने वाले परिवार का दान लेने से इंकार कर देना भी प्रमुखता से वर्णित किया गया है.

आंबेडकर के राजनीतिक आंदोलन में रमाबाई की बढ़ती रूचि को 1920 की मनगांव परिषद के बारे में उनकी जिज्ञासा से, साहू महाराज के कार्ये में उनके सवालों में,1927 के महाड सत्याग्रह मेें भाग लेने मेें उनकी उत्सुकता से (हालांकि आंबेडकर के सुझाव के विपरीत उन्होंने स्त्रियों का नेतृत्व नहीं किया बल्कि भोजन व्यवस्था संभाली) तथा मुम्बई के जे.जे. अस्पताल में स्त्रियोें की सभा को संबोधित करने से मापा जा सकता है. 1920 में लंदन जाने के पहले आंबेडकर ने श्राद्व के कार्यक्रम का आयोजन किया (उनके पिता की बरसी पर) और हिन्दू कर्मकांडों की परम्परा तोड़ने के लिये ब्राह्मण भोज न कर के वंचित जाति के लिये स्थापित छात्रावास से चालीस छात्रों को भोज के लिये आमंत्रित किया. रमाबाई ने पपरंपरागत मिठाईयां परोसने की योजना बनाई थी  लेकिन अंबेडकर ने तर्क दिया कि इन छात्रों को मांस व मछली परोसी जानी चाहिए, जो उन्हें छात्रावास के भोजन में नहीं मिल पाते. रमाबाई पहले तो इस तर्क में बहुत क्षुब्ध  हुई और श्राद्व की रीतियों में पूरनपोली की बजाय मांस-भोज पर प्रश्न उठाने लगीं किन्तु बाद में उन्होंने अंबेडकर के कहे अनुसार ही किया.


अब चाहे यह घटना हो या ऐसी ही अन्य घटनायें, जैसे रमाबाई की तीर्थयात्रा करने की हार्दिक इच्छा और चाहे इस पर अंबेडकर का तर्को द्वारा उनको समझाने की कोशिशे हो, आंबेडकरी  संगीत व प्रकाशित विवरणों में आंबेडकर और रमाबाई के बीच रिश्तों को कभी बख्शा नहीं गया. बल्कि वे विवरण, भावार्थों और मूल्यों की वैसा ही विस्तार देते हैं जैसे कि उन्हें जिया और महसूस किया गया है. जिस तरह उनकी जिंदगी की कुछ घटनाओं ने उनके जीवन पथ तथा सोच को दिशा दी. आंबेडकर की नाराजगी के बावजूद रमाबाई की शिक्षा में अरूचि, पुस्तकों पर खर्च को लेकर रमाबाई का  खींजझना लेकिन बाद में सहयोग देना, यहां तक कि अपनी सोने की चूड़ियां बेंच कर आंबेडकर के पुस्तकालय ‘राजगृह को सम्भव बनाना’ इन घटनाओं पर बने गीतों में यही दिखाई देता है कि कैसे उनका रिश्ता तर्कों और संवाद के जरिये विकसित हुआ.

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डा. भीमराव आंबेडकर के स्त्रीवादी सरोकारों की ओर

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‘निजी’ आधार पर डा. आंबेडकर की ‘राजनीतिक छवि’ का स्त्रीवादी (?) नकार : दूसरी क़िस्त


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पीड़ाजन्य अनुभव और डा आंबेडकर का स्त्रीवाद


रमाबाई वराले जो 1929 में अपने लेखक पति बलवंत वराले के साथ पिछड़ी जातियों के छात्रों के लिये अंबेडकर द्वारा धारावाड़ में शुरू किया गया छात्रावास चलाती थीं, अपने संस्मरणों में लिखती हैं कि विभिन्न अछूत जातियों की स्त्रियों  के लिये पहली बार आयोजित एक भोज में किस तरह रमाबाई मुख्य अतिथि बनी थीं. धारावाड़ के युवा अंबेडकरी  कार्यकर्ता इस सार्वजनिक भोज के लिये काफी उत्साहित थे ,लेकिन रमाबाई के इसमें शामिल होने के बारे में उन्हें संदेह था. रमाबाई महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र से थीं, जहां भोजन के बारे में कड़े जातीय नियम पाले जाते थे. वराले याद करती हैं कि रमाबाई के इस तरह कार्यक्रम का नेतृत्व करने पर आंबेडकर प्रसन्न होकर बोले थे. यह महार भाटिन (ब्राह्मण महार स्त्री) किस तरह बदल गई है.

कई गीतों में दिखाया गया है कि किस तरह उनके घर में बिरादरी के लोगों को भी परिवारजनों को भांति स्वीकार कर लिया जाता था. भंगी  जाति के एक आठ वर्षीय बच्चे को अपने घर में उन्होंने जगह दी भी और पिछड़ी जाति छात्रवास को चलाने के लिये अपने गहने गिरवी रख दिये थे. इन घटनाओं से पता चलता है कि उन्होंने अपने घर को  राजनीतिक बिरादरी के लिये भी खोल रखा था. ये गीत कहते हैं  कि रमाबाई का यह योगदान उस प्रेम समर्पण और श्रद्धा से जन्मा था ,जो वे अपने असाधारण पति के प्रति महसूस करती थीं. फिर भी उन्हें अंधभक्त की तरह पेश नहीं किया गया है ,बल्कि ऐसे व्यक्तित्व के रूप में जिसने अपने राजनीतिक विचार स्वयं गढ़े हों. इन गीतों में आंबेडकर की रमाबाई पर पूर्ण निर्भरता और उनकी मृत्यु पर आंबेडकर का गहरा शोक चित्रित किया गया है. आंबेडकर अपनी एक पुस्तक पाकिस्तान या भारत का विभाजन रमाबाई को समर्पित करते हुए कहते हैं, ‘उसके बहुत भले दिल, उदात्त मस्तिष्क, पावन चरित्र शीतल धैर्य और मेरे साथ मुसीबतें सहने के लिये उसका हमेशा तैयार रहना उन सब को घेरे हुए थी. इन सब के लिये मेरे आभार का प्रतीक यह समर्पण है.’

इस तरह बुद्ध की पत्नी यशोधरा और सावित्री बाई फुले की विरासत को संभालकर आगे ले जाने वाली रमाबाई को एक युग पुरूष‘ को गढ़ने का श्रेय आंबेडकरी  साहित्य में दिया गया है. इसके उलट सविता बाई आंबेडकर  के बारे में आंबेडकरी  समुदाय संदेह और गुस्से का इजहार करता है और कभी-कभी एक सधी  हुई चुप लगा जाता है. इसका कारण सविताबाई का वह वक्तव्य हो सकता है, जब अंबेडकर की मृत्यु के तीस वर्ष बाद उन्होंने अपनी आत्मकथा लिखने की इच्छा जाहिर की. उन्होंने दावा किया कि इसके जरिये वे सच्चाई को समुदाय के सम्मुख रखना चाहती हैं तथा आंबेडकर की मृत्यु में उनकी भूमिका पर उठे शक के बादलों को हटाना चाहती है. सुरक्षात्मक अंदाज में लिखते हुए सविताबाई आंबेडकर के मन में उनके लिये भावनओं पर जोर देती है, दोनों के बीच पत्र व्यवहार का हवाला देती है और अपने वैवाहिक जीवन के कई संस्मरणों से इसे एक आदर्श सख्य भाव विवाह साबित करती हैं . वे इसी निष्कर्ष पर पहुंचती हैं  कि अपने राजनीतिक लाभ के लिये कुछ लोगों ने यशवंत के मन में और समुदाय में उनके बारे में कई भ्रांतियां फैलाई. 2003 में सविताबाई की मृत्यु के बाद कुछ पुस्तिकायें प्रकाशित हुई, जिसमें अंबेडकर की मृत्यु मेें उनकी भूमिका को लेकर फैले हुए सच और झूठों की तर्कपूर्ण समालोचना की गई. एक ऐसी ही पुस्तिका में उनके आंबेडकर से रिश्ते के अत्यंत निजी होने की बात की गई है. ऐसा रिश्ता, जिसमें घर तथा राजनीतिक बिरादरी के बीच पुल बनाने की कोशिश दाम्पत्य का अनिवार्य हिस्सा कभी नहीं थी, और इसलिये इस रिश्ते को समुदाय ने नकार दिया.

आंबेडकर के जीवन की संगीत व शब्दों में अभिव्यक्ति में रमाबाई और सविताबाई दाम्पत्य के दो विपरीत ध्रुवों   की तरह चित्रित हुई है. आंबेडकरी  आंदोलन में सक्रिय कई शिक्षकों में से एक गायकवाड़ गुरूजी के संस्मरणों में हमें आंबेडकर के जीवनकाल में लिखे गये दलित स्त्रियों के गीत मिलते हैं. इनमें से कुछ में रमाबाई व सविताबाई के इस  परस्पर विरोधी स्वरूपों में कुछ मेल-मिला करने की कोशिश की गई है. रमाबाई की मृत्यु के तेरह वर्ष बाद आंबेडकर सविताबाई से मिले और उनका विवाह हुआ. एक गीत में रमाबाई व सविताबाई के बीच बहनापे  की कल्पना की गई है, हालांकि स्पष्ट है कि वे दोनों आपस में कभी मिली ही नहीं होंगी.
‘‘रमाबाई और सविताबाई, जाति से अलग होके भी
एक ही थाली मेें खाती हैं अपने भीम की खातिर’’
एक अन्य गीत में एक दलित स्त्री, ब्राह्मण सविताबाई को दलित समुदाय के तौर-तरीके अपनाने की सलाह देती है.
ओ बामन घर की बेटी, अपनी साड़ी से खुद को ठीक से ढंकों
बाबा अपने काम में खोये हैं अपनी कुर्सी पर, उनका ध्यान तुम पर नहीं है.

1990 के दशक में रचे गये कुछ नये गीत अंबेडकरी  गायन पार्टियों ने कैसैट्स पर रिकार्ड किये, जिनमें उन मतभेदों पर चिंता जताई गई है, जो आधुनिक शिक्षा व रहन -सहन तथा जेण्डरीकृत चेतना द्वारा जन्मी राजनीतिक प्रतिबद्धता के बीच खड़े हो गये हैं जैसा कि पहले भी कहा गया, युवा स्त्रियों को रमाबाई की तरह बनने की प्रेरणा देते कई गीत हैं ,लेकिन युवकों को बाबा साहेब के पदचिन्हों पर चलने की प्रेरणा उतनी दमदार नहीं है. वैसे ही जो ब्राह्मण पत्नी हैं, उसे विषकन्या करार दिया जाता है ,जो पुरूष को समुदाय के प्रति जिम्मेदारियों से विमुख कर देती हैं.

गैर दलित स्त्रीवादियों के नजरिये, जैसा कि हमने उर्मिला पवार के कथ्य में देखा के विपरीत आं बेडकरी  समुदाय में दाम्पतय की अवधारणा ऐसी है कि अंबेडकरी  के जीवन में निजी व राजनीतिक की जांच पड़ताल ‘स्वयं सिद्व’ सच्चाइयों के पैमानों पर नहीं की जा सकती. दलितों पर निजीत्व और सामूहिकता को अलग-अलग कर के देखने के लिये डाले जाते रहे दबाव के विपरीत, आंबेडकर परिवार के जीवनवृत्त सार्वजनिक और निजी की नर्मित और पुननिर्मित के कई सक्रिय माडल प्रदान करते हैं. आंबेडकर के निजी जीवन को समझते समय इन  निष्कर्षों को निकालने में आती यह मुश्किल सिंगुबाई मुतिसापुर की एक दलित गायिका/संगीतकार ने सबसे अच्छी तरह व्यक्त की है.
मेरे पिता उसे पिता कहते रहे, मेरी मां उसे पिता कहती है
मैं भी उसे पिता ही कहती हूँ 
मेरे बेटे के लिये भी वह पिता ही है.
पूरे संसार में फूंक के तो दिखाओ और एक ऐसा रिश्ता.
क्या किसी और के साथ है ऐसा रिश्ता, जो हमारा है हमारे  भीम के साथ
साथ साधु-संत आये और गये लेकिन मेरी प्रार्थनाओं का कोई फल नहीं मिला. ओ मेरे कुनबे कल कहां थे तुम?
आज कहां तक आ गये. तुम्हारे गोबर सने हाथों में उसने रख दी कलम.
आंबेडकर की निजी जिंदगी को यह जोशभरा लगाव जो संगीत-साहित्य में झलकता है, साफ बताता है कि आंबेडकरी समुदाय स्त्री-अधिकारों और जेण्डर मुद्दों पर आंबेडकर के नजरिये को समझने में उन अकादमियां से मीलों आगे है, जिसे आंबेडकर में बड़ी सीमित रूचि रही है. कुछ खास अपवादों को छोड़कर अधिकांश अकादमिक साहित्य आंबेडकर के स्त्रीवाद में योगदान को नजरअंदाज करते रहे हैं और इसमें आंबेडकरी सिद्धांतों पर लिखी गयी पाठमालायेंभी शामिल है.

प्रतिसमुदायों की सूचना अैर उनसे सीखना


‘आंबेडकरऔर स्त्रीमुक्ति’ विषय पर संगीत और पुस्तिका साहित्य का प्रथम शक्तिशाली उभार 1990 के दशक के आखिरी वर्षों में देखने को मिलता है. आज ये गीत व पुस्तिकायें आंबेडकरी  पचांग में शामिल खास अवसरों पर वितरित होती हैं . माध्यम वर्ग की सामान्य समझ इन समारोहों को विवेकहीन/भावुक करार देती हैं और ऐसे अवसरों पर यातायात व स्वच्छता की समस्याओं के चलते इनकी काफी आलोचना होती है. कुछ सामाजिक वैज्ञानिकों को छोड़कर अधिकांश इन जनसभाओं को आंबेडकर की व्यक्तिपूजा या नेतृत्व द्वारा जनता को बरगलाने से जोड़ते हैं. वैसे भी दलित जनों को अतिभावुक और ऐतिहासिक दृष्टि से शून्य माना जाता है. इन लेखों में अक्सर आंबेडकर की विवेकी दृष्टि की तुलना इन सालाना जलसों की विवेकहीनता से की जाती है और आशय यह होता है कि दलित आंबेडकर की विरासत को आगे नहीं ले जा रहे हैं लेकिन इन जलसों के रिकाॅर्ड जो आंबेडकरी पंचाग की वजह भी हैं और उसकी परिणिति भी कुछ अलग ही किस्सा बयान करते हैं.
पिछले दशक में आयोजित आंबेडकरी जलसों की रिपोर्टों को यदि सहानुभूति पूर्वक देखा-परखा जाये तो नागपुर और मुम्बई में होेने वाले इन जनमेलों की वजह से होने वाली यातायात समस्या, रेलगाड़ियों में भीड़ और कचरे के ढेरों की आलोचना को इस तरह भी देखा जा सकता है जैसे कुछ खास दिनों पर कुछ अचिन्हित सार्वजनिक जगहों को अपनी उपस्थिति से दलितों ने चिन्हित  कर दिया हो और इसी बात के लिये उनकी निंदा की जा ही हो. कुछ अन्य लेखों में मैने दलील  दी है कि आंबेडकरी पंचाग की तिथियां आंबेडकरी यूटोपिया को वास्तविक जगहों से जोड़ती हैं और इस तरह एक आंबेडकरी प्रति संसार को गढ़ती हैं, या ऐसे वास्तविक स्थानों  की  रचना करती हैं, जो कभी-कभी ही लोगों से गुलजार लेने के बावजूद भी  अपनी लगातार उपस्थिति दर्ज कराये रहते हैं. आंबेडकर को सीधे संबोधित प्रज्ञा दया पवार का यह मंत्र इस स्थिति को भली-भांति व्यक्त करता है.
”हर साल 6 दिसंबर को बिना नागा मैं अपने बेटे प्रतीक हजारो मांओ, बहनों और भाइयों के साथ एक मोमबत्ती जलाती हूं और आपको सादर नमन करती हूं. आपकी स्पष्ट छवि मुझे प्रतीक तथा हजारों, लाखों करोड़ों आंबेडकरियों की गर्वित आंखों में दिखाई देती है. यह बहुत आशा भरा पल होता है जो हर दिन के संघर्षों के बीच डरावनी वास्तविकता के बीच हमें आने वाले कल के सपने देखने के लिये प्रेरित करता है. सच में आपने हम सब को बहुत सुंदर बना दिया है.”

आंबेडकरी (आंबेडकर के‘पढ़ो, संगठित हो और विरोध करो’ के आहान पर आधारित समुदाय) यूटोपिया एक आदर्श समाज के लिये प्रयत्नों की अभिव्यक्ति है, लेकिन अन्य यूटोपिया की तरह ही इसका कोई तयशुदा पता या भौतिक स्थान नहीं है. संगीत व आंबेडकरी साहित्य, जो आंबेडकरी संघर्ष के सबसे खास हथियार रहे हैं. इस यूटोपिया तथा जनमानस के बीच जुड़ाव तंतु का काम करते हैं, लोगों को उस संभावित राजनीतिक नैतिक पहचान से जोड़ते हैं, जिसे वे अपना सकें. इस संगीत व इन पुस्तिकाओं ने ही आंबेडकरी समुदाय को जन्म दिया है,  जिसके अपने खास दावे हैं और एक वैकल्पिक संस्थागत प्रचार तंत्र है.इसकी शुरूआत हुई स्वायत्त दलित स्त्री संगठनों के बीच सहयोग सूत्र जुड़ने से,  दलित स्त्री फेडरेशन व विचार मंचों के बनने से और बाद में दलित राजनीतिक दलों (भारतीय रिपब्लिकन पार्टी, बहुजन महासंघ व रिपब्लिकन पार्टी आॅफ इंडिया) की महिला शाखाओं के पुनर्जीवित होने से. दिसंबर 1996 में डा. प्रमिला सम्पत द्वारा चंद्रपुर में ‘विकास वंचित दलित महिला परिषद’ का आयोजन किया गया, जिसमें 25 दिसंबर का दिन भारतीय स्त्री मुक्ति दिवस के रूप में मनाने का प्रस्ताव रखा गया.यह प्रस्ताव ही स्त्री आंदोलन की जमीन पर आंबेडकर और स्त्रीवाद को लेकर शुरू हुए विचारात्मक व क्रियात्मक तनावों- मतभेदों की नींव बना. इस सम्मेलन के कुछ वर्षों बाद आंबेडकरी आंदोलन की याद दिलाते रहने वाले उसे पुर्नव्यखायपित व पुर्नसूचीबद्व करने वाले अहम औजार यानि आंबेडकरी पंचागों ने 25 दिसंबर को भारतीय स्त्री मुक्ति दिवस के रूप में उल्लिखित  करना शुरू कर दिया.

क्रमशः 

वहशी राष्ट्रवाद: अपने ही नागरिकों के खिलाफ जंग

इति शरण

युवा पत्रकार. सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ता. संपर्क : ई मेल- itisharan@gmail.com

देश में कुछ दिनों पहले असहिष्णुता का मामला खूब गरमाया था, जिसके विरोध में कलाकार, बुद्धिजीवी, लेखक अपना पुरस्कार लौटा रहें थे। आज भी देश में विभिन्न रूपों में असहिष्णुता का वातावरण बना हुआ है। यह असहिष्णुता का वातावरण पूरी तरह से सत्ता पोषित है। सत्ता जब संकट में होती है, तो वह ऐसे ही घिनौने वातावरण का निर्माण करके देश में घृणा और आतंक का माहौल पैदा करती है, अपने बचाव के लिए देश के लोगों को बांटने का काम करती है। धर्म, जाति, संप्रदाय, के आधार पर लोगों को लड़वाती है। सरकार जब जनता की नजरों में गिरने लगती है और हर मोर्चे पर नाकामयाबी से बुरी तरह घिरने लगती है तब वह देश को एक और नए संकट की ओर धकेलने लगती है। आज वर्तमान में हमारे यहां सत्ता का यही चरित्र देखने को मिल रहा है।

बदकिस्मती से सीमा पार की सरकार भी उतनी ही जनविरोधी, कट्टर और हर मोर्चे पर विफल सरकार है। दोनों ही देशों की सरकार इस वक़्त भयावह और चौतरफा संकट से घिरी हुई है। अपने संकट को कम करने और उसे ढकने के लिए दोनों ओर से युद्ध जैसा माहौल बनाये रखने की भरपूर प्रयास किये जा रहे हैं। इसी का नतीजा था, सरहद पार से हमारे यहां हुआ उरी हमला और उसके जवाबी कार्रवाई में हमारी तरफ से किया गया सर्जिकल अटैक। इन हमलों से दोनों देशों की सरकारों को कुछ फायदा जरूर हुआ हो हुआ मगर देश और जनता कई स्तरों पर असहनीय तकलीफें झेल रही हैं।

ये दोनो देश अंतरराष्ट्रीय दवाबों के कारण सीधे युद्ध तो नहीं कर सकते, मगर आज अपनी ही जनता के खिलाफ दोनो देशों  की सरकारें एक तरह से युद्ध की स्थिति पैदा करवा रही हैं। यही कारण है कि आज सरहद इस पार और उस पार भी कलाकारों पर हमले किये जा रहे हैं। हमारे यहां पाकिस्तानी  कलाकारों, पाकिस्तानी फिल्मों का विरोध हो रहा, तो सरहद पार हमारी फिल्मों और मीडिया पर भी प्रतिबंध लगाना जारी है।

मुंबई में ‘मामी फिल्मोत्सव’ में एक बेहतरीन और क्लासिक पाकिस्तानी फिल्म ‘जागो हुआ सवेरा’ के प्रदर्शन पर रोक लगा दिया गया। जिस फवाद खान को हमारी देश कि जनता ने सर आँखों पर उठा रखा था, आज उसी फवाद को नफ़रत की निगाह से देखा जाने लगा है। अचानक लोगों को वह एक दुश्मन देश का नागरिक नज़र आने लगा। फिल्म निर्देशक करण जौहर को अचानक इस पाक कलाकार को अपनी फिल्म में लेने पर अफसोस होने लगा और उन्होंने आगे से अपनी फिल्म में किसी भी पाकिस्तानी कलाकार को शामिल ना करने की कसमें भी खा ली हैं।

आज कला और कलाकारों को ही नफरत का जरिया बनाया जा रहा है, जबकि हर तरह की नफरतों के नकाब उतारने का नाम ही है कला। वह सीमाओं से परे और किसी भी संकट के समय संपूर्ण रूप से मानवीयता और मानवीय सरोकारों के झंडे बुलंद करती नजर आती है। युद्ध के समय कला ही नफरत की  आग पर पानी डालने का काम करती है। युद्ध के हर दौर में कलाकारों ने अपनी लेखनी, अपने नाटक, अपनी गीतों के जरिये शांति लाने में अपनी भूमिका निभाई है। कहा भी जाता है एक बंदूक की ताकत से ज्यादा मजबूत होती है कलम की ताकत। ‘क्या जुल्मतों के दौर में भी गीत गाये जाएंगे, हाँ जुल्मतों के दौर के ही गीत गायें जाएंगे।’

मगर आज उसी कला जगत और कलाकारों पर हमला हो रहा है और यह किसी न किसी रूप में सत्ता प्रायोजित है। जब सत्ता पोषित इस फासीवादी और घिनौने सामाजिक/राजनीतिक माहौल के प्रतिरोध में कोई संस्था सामने आ रही है, तो उनपर ही हमले किए जा रहे हैं। इसका ही परिणाम था इंदौर में भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) के 14वें राष्‍ट्रीय सम्‍मेलन में कुछ संघी विचारधाराओं के लोगों का हमला। वे लोग कार्यक्रम के बीच में मंच पर चढ़ आयें और हंगामा करने लगें। जबकि इप्टा के इस कार्यक्रम का आयोजन  ‘सबके लिए एक सुंदर दुनिया’ के संदेश के साथ किया गया था। हाल ही में मुंबई में भी कुछ ऐसी ही घटना देखने को मिली, जब एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान कुछ इसी तरह की विचारधारा के लोगों ने हिंसक हमला कर दिया था। फरवरी के महीने के दौरान इप्टा जेएनयू की टीम जब एक मजदूर संगठन के आमंत्रण पर उत्तराखंड के पौरी में नाटक करने गई उस वक़्त भी उनका विरोध किया गया, आयोजकों को धमकी दी गई। नाटक के दौरान बिजली काट दी गई। बाद में जेएनयू की टीम ने मोबाइल की रौशनी में नाटक किया। वहीं उत्तर प्रदेश के वृंदावन में होने वाले नास्तिक सम्मेलन को विश्व हिंदू परिषद और स्थानीय धर्माचार्यों के विरोध के कारण रद्द करना पड़ा।

एक तरफ हिन्दुवादी संगठन नारी सुरक्षा का दिखावा करता है और दूसरी तरफ एक स्त्री को अभद्र गाली देने से भी पीछे नहीं रहता। जब बॉलिवुड अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा पाक कलाकारों के समर्थन में सामने आई तो इसी विचारधारा के लोग प्रियंका को गंदी-गंदी अभद्र गालियां देने लगे। एक तरफ ये भारत माता की जय के नारे लगवाते हैं और दूसरी तरफ देश की स्त्री का इस कदर अपमान करते हैं। यह है इनका दोहरा रूप।

इन घटनाओं को देखकर 1989 की याद आती है, जब नुक्कड़ नाटक ‘हल्ला बोल’ के प्रदर्शन के दौरान शासक पार्टी के गुंडों ने नाटक कर रहें कलाकारों पर हमला कर दिया था। इस हमले में रंगकर्मी सफ़दर हाशमी बुरी तरह से ज़ख्मी हुए। उसी रात को सिर में लगी भयानक चोट की वजह से सफ़दर हाशमी की मृत्यु हो गई। आज एक बार फिर कुछ वैसा ही हमला जारी है।

सनद रहे कि हमारी आज की यह कट्टर हिंदूत्ववादी सरकार हिटलर की मानवद्रोही प्रवृत्ति पर चलने तथा आज की एक सबसे क्रूर और आक्रामक सरकार अर्थात इजरायल सरकार जैसी ही दिखने में विश्वास रखती है। राजनीति में आने से पहले हिटलर खुद एक पेंटर था। मगर राजनीति में आने के बाद उसने और उसकी नाज़ी पार्टी ने कला के सभी रूपों पर हमला शुरू कर दिया था। एक कलाकार होने के नाते हिटलर कला की ताकत से वाक़िफ था। वह जानता था कि कला उसकी तानाशाही के लिए खतरा बन सकती है, इसलिए सत्ता में आने के बाद उसने इसे कुचलने का अभियान चलाना ही मुनासिब समझा। आज हमारी सरकार और सरकार संरक्षित कुछ गुंडा गिरोह क्या हिटलर के नक्शे कदम पर चलती नहीं दिख रही है ?

नफरत का यह माहौल सिर्फ पाकिस्तान के लिए ही नहीं फैलाया जा रहा, बल्कि एक अघोसित युद्ध की स्थिति तो चीन के साथ भी पैदा की जा रही है। देश में बड़े स्तर पर चीनी सामानों का विरोध हो रहा है। यह विरोध कोई आम आदमी के दिमाग की उपज नहीं है, बल्कि यह विरोध भी हमारी सत्ता की सोची समझी रणनीति का हिस्सा है, यह विरोध भी सत्ता पोषित ही है।

अपनी तमाम नाकामियों पर पर्दा डालने के लिए यह एक छद्म युद्ध का माहौल तैयार करने की कोशिश की जा रही है। देशभक्ति का एक झूठा पाठ पढ़ाया जा रहा है। अगर आप देश भक्त हैं, तो चीनी सामानों का विरोध करें। मगर मुझे समझ नहीं आता यह कैसा विरोध है ? इस विरोध की आड़ में तो सिर्फ़ छोटे थोक विक्रेताओं और रेडी पर सामना बेचने वाले दूकानदारों के आर्थिक हितों पर ही हमला बोला जा रहा है। क्यों नहीं बड़ी-बड़ी चीनी कंपनियों के माल तथा उनका कारोबार करने वाले बड़े भारतीय व्यापारिक घरानों का बहिष्कार किया जा रहा ? हमारे इस तरह के अविवेकी विरोध से चीन कोई बड़ा नुकसान नहीं होने वाला, बल्कि हमारे ही देश के सबसे निचले स्तर के कारोबारियों को उजाड़ने का काम ज़रूर हो रहा है। दिवाली में चाइनीज लाइट बेचने वाले एक दुकानदार ने बताया, हर दिवाली में चाइनीज लाइट बेंचकर 40-50 हजार रुपए कमा लेता था, उन पैसों से उसके घर में दिवाली मनती थी, मगर इस बार कोई चाइनीज लाइट खरीद ही नहीं रहा।  उसने बताया, कमाई तो दूर की बात है, इन लाइटों को खरीदने पर हमने जो पैसे लगाए हैं उसका पूरा नुकसान ही उठाना पड़ेगा। हमारे इस बर्ताव से चीन में भारत की एक नकारात्मक छवि बन रही। हम जान कर एक देश के सामने खुद को दुश्मन की तरह पेश कर रहें। पाकिस्तानी की तरह यहां भी युद्ध का माहौल बनाया जा रहा है।

चीन के बारे में कहा जा रहा कि पाकिस्तानी की तरफ उसका रुख नर्म हैं, और उसकी नीति भारत विरोधी है। जाहिर है भारत के प्रति चीन की यह कोई नई नीति नहीं हैं। चीन पहले भी पाकिस्तान के समर्थन में दिखा है। यह चीन का कोई नया स्टैंड नहीं। उसने कहा है कि पाकिस्तान भी आतंकवाद का शिकार हो रहा। काफी समय से भारत और चीन के संबंध में तनाव की स्थिति देखी जा रही, मगर इस सबके बीच इधर दोनों देशों के बीच व्यापार संबंध में सुधार भी आया है। अब अगर ऐसी स्थिति जारी रही तो भारी आर्थिक तनाव पैदा होने का खतरा हो सकता है जिसका सबसे अधिक खामियाजा हर हालत में हमें ही उठाना होगा। और यह कैसी विडंबना है कि एक तरह हमारी सरकार चीनी सामना के बहिष्कार का माहौल बना रही, वहीं दूसरी तरह भारतीय सेना तथा चीनी सेना का संयुक्त सैन्य अभ्यास भी चल रहा है। दोनों देश की सेनाओं ने जम्मू-कश्मीर के पूर्वी लद्दाख में मिलकर सैन्य अभ्यास किया है। यह भारत सरकार के दोयम स्टैंड का प्रदर्शन तो नहीं है ?

अभी देश के दो बड़े राज्यों उत्तर प्रदेश और पंजाब में चुनाव होने वाला है, हमारी मोदी सरकार इस वक़्त देश में हर मोर्चे पर अपनी घोर विफलताओं और आक्रमक जन विरोधी रवैये को लेकर खुद को बेहद कमजोर महसूस कर रही। उसके खिलाफ विरोध के स्वर और उसके अंदरूनी तनाव भी अब खुलकर सामने आए हैं। बिहार के चुनाव में इस सरकार की बुरी स्थिति साफ देखने को मिली थी। कयास लगाये जा रहे हैं कि आने वाले इन चुनावों में उसकी स्थिति उससे भी बुरी होने जा रही है। चहुंतरफा संकट से घिरी इस सरकार को अपनी मौत साफ़ नज़र आ रही है और यही कारण है कि अपनी मौत टालने की ख़ातिर अब वह कोई भी हथकंडे अपनाने से बाज़ नहीं आने वाली। उसी का नतीजा है अंध राष्ट्रवाद का आतंक कायम करना, सीमा और देश के भीतर भी युद्ध जैसी स्थिति को निरंतर बनाये रखना और जो भी शक्तियां सरकार के इन घिनौने हथकंडे के विरोध में सामने आयें उन पर निरंतर हमले करवाना। कला और कलाकारों पर सबसे ज़्यादा हमला इसलिए भी क्योंकि वे ही हैं जो सत्ता की साजिशों पर सबसे अधिक पैनी नज़र रखते हैं और उसके विरुद्ध जन प्रतिकार की सबसे सशक्त धारा का निर्माण भी करते हैं।

पीड़ाजन्य अनुभव और डा आंबेडकर का स्त्रीवाद

डा. भीम राम आंबेडकर के स्त्रीवादी सरोकारों की ओर, क़िस्त तीन
शर्मिला रेगे की किताब  ‘अगेंस्ट द मैडनेस ऑफ़ मनु : बी आर आम्बेडकर्स राइटिंग ऑन ब्रैहम्निकल  पैट्रीआर्की’की भूमिका का अनुवाद हम धारावाहिक प्रकाशित कर रहे हैं. मूल अंग्रेजी से अनुवाद डा. अनुपमा गुप्ता  ने  किया है.  इस किताब को स्त्रीकाल द्वारा  सावित्रीबाई  फुले  वैचारिकी  सम्मान, 2015 से  सम्मानित किया  गया  था. 

1910-1950 के बीच लिखी गई मराठी स्त्रियों की आत्म कथाओं में इस सख्यभावी विवाह के कई अलग-अलग विवरण मिलते हैं, जाति का जिक्र बहुत कम होता है और यदि होता भी है तो इस तरह जैसे यह शब्द किन्हीं और लोगों के लिये इस्तेमाल किया जाता हो, जैसे मिलों में काम करने वाली, सब्जी बेचने वाली या फिर अतीत में जन्मी स्त्रियों के लिये. इस तरह जेण्डर और आधुनिकता पर मुखर हुए लेखन ने ब्राह्मण  स्त्रियों की सह अपराधिता को वर्ग-अधिकारों और  ब्राह्मण पितृसत्ता के पीछे छुपा दिया और इन स्त्रियों को परम्परा से संघर्षरत और आधुनिकाओं के रूप में स्थापित कर दिया. गैर दलित स्त्रीवादी भी अपने वर्ग की इस विखंडित आधुनिकता से अछूते नहीं रह सके. उन्होंने आंबेडकर की जिंदगी में सख्य-भावी विवाह के अभाव को ‘पत्नी’ की बजाये‘समुदाय’ को प्राथमिकता देने से जोड़ा और इसलिये स्त्रियों  के मुद्दे को टालने का इलजाम उन पर लगा दिया गया, उन्हें पर्याप्त रूप से स्त्रीवादी न मानने की यही वजह बना ली गई.

इसके उलट,आंबेडकर  ने आधुनिकता की एक ऐसी अवधारणा दी, जिसमें नये पश्चिमी विचारों तथा भारतीय इतिहास की समता व शान्तिकारक भौतिक परम्पराओं, जैसे बौद्व धर्म, को आपस में जोड़ दिया गया. ऐसा उन्होंने जाति आधारित शोषण को रेखांकित करके, वर्ण व्यवस्था को नकार कर और जाति के खात्मे को समतावादी समाज की ओर एक मात्र रास्ते की तरह वकालत करके किया. हिन्दू आध्यात्म के केंद्रीय मूल्यों का पुनः परीक्षण करते हुए वे एक नये भारतीय ज्ञानोदय के अग्रदूत बने. जाति और जेण्डर की नई संहिता की तथा आधुनिकता के क्रांतिकारी मायनों की बात की गई. कतिपय विद्वानों ने भारत की राजनीतिक आधुनिकता के इस रचनाकार्य को कलमबद्व किाय है जिसमें आंबेडकर ने जहां आभार प्रदर्शन की भाषा का विरोध करना सिखाया, जाति की श्रेणी बद्वधता में समाहित नकारात्मक अधिकारों की पोल खोली तथा स्वाभिमान, समता व अधिकारों की नई भाषा इजाद की. उर्मिला पवार व मीनाक्षी मून के आंबेडकरी  स्त्रियों पर शोध ने जाति-विरोधी आधुनिकता के निर्माण में दलित स्त्रियों के योगदान को पुन: स्थापित किया है. हालांकि अभी हमें इस दिशा में शोध की और भी ज्यादा जरूरत है कि किस तरह सार्वजनिक/निजी अवधारणा के जेण्डरीकृत आदर्शों और व्यवहारों ने वैकिल्पक आधुनिकताओं को रचने में मदद की. इन्होंने राजनीतिक/सामाजिक, उपनिवेशी/राष्ट्रीय, भारतीय परंपरा//पश्चिमी आधुनिकता और समुदाय/देश के द्वैतों से कहीं आगे जाने की कोशिश की. उदाहरण के लिये आंबेडकरी  प्रति समुदायों में उथल-पुथल के चलते तथा राष्ट्र व जाति के बीच द्वंद के कारण वैवाहिक संबंधों और गृहस्थी के सामने क्या परिवर्तन  गये थे? या किस तरह ब्राह्मण जाति के लिये पैदा हुई चुनौतियों ने ‘कुनबे’ की अवधारणाओं से जुड़े सिद्वांतों पर सवाल उठाये, क्या थोपे गये व चुने गये रिश्तों में द्वंद पैदा हुआ? सामूहिक सरोकारों के समन्वय ने क्या ‘नवीन’ गृहस्थियों और सामाजिकता को जन्म दिया? उपनिवेशी भारत में राष्ट्रीय व जाति विरोधी आंदोलनों के नेताओं की जीवनियों व आत्मकथाओं के तुलनात्मक अध्ययन से उस प्रक्रिया को समझने में काफी मदद मिल सकती है जिसने विभिन्न सामाजिक हलकों में निजी व सार्वजनिक की भिन्न-भिन्न पहलचान की परिभाषित किया.
अकादमिक क्षेत्र में जीवनी और इतिहास के बीच संबंध धीरे-धीरे गंभीर अध्ययन का विषय बनता गया है जिसके दो केंद्र बिन्दु थे.

जहां ‘महान नेताओं’ जैसे गांधी, नेहरू, सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जीवनियों व आत्मकथाओं को गंभीरता से लिया गया, वहीं इस राष्ट्रीय कुलीन वर्ग के ध्येयों से मतभेद रखने वाले राजनीतिज्ञों को नजरअंदाज किया गया. आंबेडकर के जीवनीकार गेल आमवेट ने रेखांकित किया है कि किस तरह उनकी भिन्न जातीय पृष्ठभूमि ने उनके राजनीतिक लक्ष्यों को प्रभावित किया. ‘‘चौदहवें बच्चे को जन्म देते समय उनकी मां की असमय मृत्यु, चैदह भाई-बहनों में सिर्फ सात का बच पाना, परिवार के भरण-पोषण के लिये मजदूरी करते समय बड़े भाई की मौत, उनके स्वयं के पांच में से चार बच्चों की अकाल मृत्यु……. ये अनुभव राष्ट्रीय कुलीनों के अनुभवों से बहुत अलग थे.’’ आमवेट ने नेहरू और गांधी के राष्ट्र के लिये त्याग के चयन को उनके परिवारों के आरामदेह रहन-सहन के बरक्स रखा है. इसके विपरीत आंबेडकर  की गृहस्थी को जीविका के लिये आर्थिक संघर्ष करना पड़ा. आंबेडकर  तथा गांधी-नेहरू के जीवन में अंतर का कारण आमवेट ने जाति और अस्पृश्यता के अनुभवों को बताया है. वे तर्क देती हैंः-

आंबेडकर  ने एक भारतीय और उपनिवेशी होने के नाते कुछ भेदभाव जरूर रखा था और इसलिये वे अपनी राष्ट्रीयता को अभिव्यक्त कर पाये. लेकिन ये अनुभव उनके अछूत होने के नाते सहे गये भेदभावों की तुलना में बहुत छोटे थे…. अलग पांत में बैठने को मजबूर किया जाना, अपनी पसंद के पाठयक्रमों में अध्ययन न कर पाना, दूसरे छात्रों द्वारा प्रताड़ित किया जाना, गरिमापूर्वक रहने व कार्य करने की जगह न ढूंढ़ पाना, इन सब अनुभवों को घोर व्यक्तिगत अपमान की तरह आंका गया न कि समाज में लंबे समय से चलने आ रहे जाने समझे अपेक्षित व्यहार की तरह. इन अनुभवों नेआंबेडकर  को जीवन के हर क्षेत्र में जातिगत भेदभाव को पहचानना सिखा दिया.
और इस भेदभाव की जननी अस्पृश्यता और ब्राह्मणवादी  ताकतों ने उनके लेखन व राजनीति को नकार दिया तो क्या आश्चर्य?मध्यम तथा प्रभुत्व संपन्न वर्ग के जीवन चरित ‘उन दिनों’ और ‘इन दिनों’ के युग्म से आकार लेते हैं, जिनमें एक आदर्श अतीत का बखान है. इसके विपरीत शोषित जातियों में जीवनी लेखन का काम सिर्फ इसी कारण स्थापित रखा जा सकता है कि ‘उन दिनों’ के शोषण व अपमान को ‘इन दिनों’ के स्वाभिमान समता और अधिकारों में परिवर्तित करने का काम ज्यादा जरूरी है और तुरंत किया जाना चाहिए.

सी.बी. खैरमोड़े द्वारा मराठी में लिखी गयी आंबेडकर की जीवनी से हम जान सकते हैं कि आंबेडकर अपनी आत्मकथा अंगे्रजी में लिखना चाहते थे और साथ ही गांधी की जीवनी भी. अनुसूचित जाति फेडरेशन के राष्ट्रीय संयुक्त सचिव और सुप्रतिष्ठित  दलित मराठी लेखक शंकर राव खरात उल्लेख करते हैं कि अम्बेडकर की मृत्यु के पश्चात उनके अध्ययन कक्ष से तीन नोट बुक्स मिली थीं, जो उनकी आत्मकथा के तीन खंडों के लिखे चिन्हित की गई थीं, लेकिन शायद एक राजनीतिक समुदाय गढ़ने, प्रभुत्वशाली ब्राम्हण इतिहास के पुनर्लेखन, हिन्दू कोड बिल लिखने और उसके लिये समर्थन जुटाने की फौरी जरूरतों के चलते उनके पास अपने बारे में लिखने का वक्त ही नहीं बचा था. इसमें कोई शक नहीं कि इतिहास को समझने की  हमारी कोशिश में यह हमारे लिये एक बड़ा नुकसान है, हालांकि वृहद जीवनियों और शहिरों द्वारा रची संगीत रचनाओं से आंबेडकरी की निजी व राजनीतिक जिंदगी पर काफी प्रकाश पड़ता है.
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डा. भीमराव आंबेडकर के स्त्रीवादी सरोकारों की ओर

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‘निजी’ आधार पर डा. आंबेडकर की ‘राजनीतिक छवि’ का स्त्रीवादी (?) नकार : दूसरी क़िस्त

 

आंबेडकर के उस लेखन और उस भाषणों को पढ़े, जिनमें उन्होंने अपनी निजी यादों को बांटा है-चाहे वह सतारा में बचपन में भोगा अस्पृश्यता का दंश  से या बड़ौदा में महाराज के यहां काम करते हुए ‘पारसी-इन’ से निकाल बाहर किया जाना हो (यह 1917 में कोलम्बिया विश्वविद्यालय से लौटने के बाद हुआ) या फिर कि वह घटना हो, जिसमें चालीस गांव के अछूत समुदाय के लोग उनके लिये एक गाड़ी चालक का बंदोबस्त नहीं कर पाये और उन्हें तुरत-फुरत जोड़कर बनाये गये तांगे में एक नौसिखिया चालक से काम चलाना पड़ा. यह स्पष्ट है कि निजी अनुभव सामाजिक की व्याख्या के स्रोत नहीं होते. बजाये इसके आंबेडकर  उन प्रक्रियाओं पर ध्यान केन्द्रित करते हैं, जो अनुभवों को परिभाषित करके परिवर्तन के बारे में नये तरीके से सोचने का रास्ता खोलती हैं. अनुभव, ज्ञान और परिवर्तन के बीच संबंध की यही वजह आंबेडकरी  अवधारणा है, जिसमें राजनीतिक आंदोलनों में निजी व सार्वजनिक को गढ़े जाने के भिन्न तरीकों की जांच पड़ताल महत्वपूर्ण हो जाती है.

शुरू में आंबेडकरी  आंदोलन के समृद्व दृश्य इतिहास से दो छवियों को लेते हैं. इनमें से एक आंबेडकर  परिवार की तस्वीर है, जिसमें रमाबाई बीच में है. आंबेडकर  और उनका बेटा यशवंत रमाबाई के बगल में  बायें ओर हैं. उनकी देवरानी लक्ष्मीबाई और बेटा मुकुंद दायी ओर है, ये लोग आंबेडकर  के भाई आनंद राव की मृत्यु के बाद परिवार में ही रहते रहे. आंबेडकर  का पालतू कुत्ता रमाबाई के पैरों के पास बैठा है. दूसरी तस्वीर एक लोकप्रिय पोस्टर है, जिसमें आंबेडकर  और रमाबाई के विवाह के भव्य आयोजन की कल्पना की गई है. इसमें वे मखमल के तकिये और सोने से मढ़ी कुर्सियों पर बैठे हैं. आंबेडकर  को एक किताब पकड़े हुए दिखाया गया है. खैरमोड़े की लिखी जीवनी के जरिये हम जानते हैं कि असल में इस विवाह को रस्में बहुत ही सादा तरीके से भायकला सब्जी मंडी में पूरी की गई थीं.

पारिवारिक चित्र आंबेडकर  के पारिवारिक माहौल का एक मानवीय पहलू पेश करता है, जो उनकी असाधारण राजनीतिक व अन्य उपलब्धियों से परे है. एक ओर यह हमारे सामने उस विशिष्ट व्यक्ति के रोजमर्रा के साधारण पारिवारिक जीवन की छवि रखता है, वहीं दूसरी ओर उन छोटी-छोटी खुशियों और चुनौतियों के बारे मेें खामोश रहता है, जिनसे घर बनता या बिगड़ता है. उदाहरण के लिये आंबेडकर  के पुस्तक प्रेम की वजह से बिगड़ा हुआ घरेलू बजट या भाई बलराम का अलग घर बसा लेना. पारिवारिक हंसी-खुशी के भी कुछ पल दिखाई देते हैं  जैसे किताबों पर ज्यादा खर्चे के लिये उलाहने मिलने पर आंबेडकर  का बाजार से बहुत ज्यादा सब्जियां और मछली खरीद लाना. बेटे राजरत्न की 1926 में मृत्यु पर परिवार मेें शोक का पारावार न था. बेटे की मौत के बाद आंबेडकर  ने चिकित्सक की सलाह को जीवन मंत्र बना लिया. रमाबाई को गर्भवती होने से बचना होगा. खैरमोड़े ने तफसील में बताया है कि रमाबाई के पढ़ने-लिखने से इंकार करने और हर वर्ष पंढरपुर की तीर्थ यात्रा की इच्छा जताने पर आंबेडकर  किस तरह नाराज होते थे. सबसे मार्मिक विवरण रमाबाई की मृत्यु पर आंबेडकर  के शोक का है. सिर मुड़ाये हुए, कफनी पहने हुए आंबेडकर  जैसे रमाबाई और यशवंत के स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही पर प्श्चाताप के रूप् में सन्यास लेने चले थे.

खैरमोड़े लिखित जीवनी के खण्ड-2 के अध्यायों के शीर्षक ‘रमाबाई का संसार’ तथा ‘नया संसार’ हमें प्रेरित करते हैं कि रमाबाई द्वारा जोड़कर रखे गये कुनबे व आंबेडकरी  जनों की राजनीतिक बिरादरी द्वारा बनते जाते एक नये वृहद परिवार के बीच रिश्तों को खंगाले.इसके लिये हमें स्मृति, जीवनी, कल्पना (जिस तरह रिश्ते हमारे मनों में जीवंत होते हैं) और रिश्तेदारियों के बीच घालमेल की जांच करनी होगी. हालांकि अभी हमारा लक्ष्य उर्मिला पवार द्वारा अभिव्यक्त आंबेडकर के स्त्रीवादी योगदान को नजरअंदाज किये जाने पर विचार करना है. इसे ध्यान में रखते हुए दूसरी तस्वीर पर आते हैं जो सभी अम्बेडकरी सभाओं में बहुत लोकप्रिय पोस्टर है.

प्रचलित आंबेडकरी  संस्कृति में आंबेडकर  के निजी जीवन के बारे में कई दुविधा में डालने वाली विविध कल्पनायें शामिल हैं.  काल्पनिक वैवाहिक तस्वीर में आंबेडकर  को किताब थामे हुए आखिर क्यों दिखाया गया है? उस किताब पर सुनहरे हर्फो  में ‘भारतीय कानून’ लिखा दिखाई देता है. यह दिलचस्प है, क्योंकि यह चित्र आंबेडकर की जिंदगी का वह बहुत पहले का पल दिखा रहा है, जब उन्होंने कानूनों और संविधान लिखने की शुरूआत ही नहीं की थी. कानून की किताब उनके हाथ में दिखाया जाना क्या वैसा ही है, जैसे अक्सर मूर्तियों में उन्हें भारतीय संविधान की प्रति लिये हुए दिखाया जाता है? एक काल्पनिक वैवाहिक चित्र में कानून की पुस्तक की उपस्थिति निजी/दाम्पत्य के दायरे में कुछ दिलचस्प संभावनाओं की बात करती है. क्या यह अप्रत्यक्ष रूप् से रमाबाई का उनके लेखन मेें योगदान दिखा रही है? या यह इशारा कर रही है किआंबेडकर के रोज बढ़ते पुस्तकों के भण्डार को संभालने के लिये बड़ा घर खरीदने के लिये किस तरह रमाबाई ने अपने जेवरात बेच दिये थे? इसकी व्याख्या हम चाहे जैसे करें, लेकिन विवाह के समय एक किताब की उपस्थिति एक बुद्धिजीवी के दाम्पत्य में निजी को राजनीतिक में पृथक रखने को असंभव करार दे रही है. यह अहम है कि रमाबाई सहज और खुश दिखाई दे रही हैं, पति की गोद में रखी किताब से कतई परेशान नहीं हैं. विवाह की राजनीतिक मान्यता को दर्शाने के लिये कानून तथा वरद मुद्रा में बुद्ध को पृष्ठभूमि में दिखाने की वजह से (आंबेडकर  के बौद्ध धर्म स्वीकार करने के बहुत पहले) वास्तुविक समय और परिस्थिति से परे चले जाया गया है. यहां ध्यान देने की बात यह है कि इस लोकप्रिय पोस्टर में वह सामूहिक कल्पना दर्ज हुई है जिसमें रमाबाई को आंबेडकर  के राजनीतिक योगदानों के पीछे मुख्य भूमिका निभाते हुए देखा गया है. चाहे वह संविधान हो या फिर बौद्व धर्मान्तरण. रमाबाई का आंबेडकर  की राजनीतिक परियोजनाओं से अटूट संबंध उन पुस्तिकाओं, गीतों व कैसेट्स में भी अनुभव किया जा सकता है ,जो रमाबाई के जीवन पर आधारित है और हर वर्ष निर्मित व वितरित की जाती है.



इन गीतों में रमाबाई को सभी दलितों की मां के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, आंबेडकर  के चरित्र व राजनीति में उनका ‘अप्रत्यक्ष’ योगदान याद किया जाता है, उनके जीवन के महत्वपूर्ण पड़ावों का वर्णन होता है, उन्हें अनोखा और असाधारण माना जाता है और इन पहलुओं को युवा दलित स्त्रियों के लिये एक आदर्श तथा प्रेरणास्रोत के रूप में प्रस्तुत किया जाता है. रमाबाई की मृत्यु के तेरह वर्ष पश्चात 1948 में आंबेडकर ने दूसरा विवाह किया. सविताबाई/ माई साहेब/शारदा कबीर एक ब्राह्मण  चिकित्सक थी और कुछ (हालांकि संख्या में कम) पुस्तिकायें व गीत उन पर भी बनाये गये हैं. लेकिन अधिकांश ऐसी रचनाओं में उनकी निंदा विश्वासघाती कह कर गई है. कुछ में तो उन्हें हत्यारिन कहा गया है.2003 में उनकी मृत्यु पर आंबेडकर  के जीवन और मृत्यु में उनकी भूमिका पर एक तर्क संगत बहस की कोशिश की गई थी.
क्रमशः 

औरतें – क़िस्त चौथी ( स्पैनिश कहानियां )

एदुआर्दो गालेआनो / अनुवादक : पी. कुमार  मंगलम 

अनुवादक का नोट 

“Mujeres” (Women-औरतें) 2015 में आई थी। यहाँ गालेआनो की अलग-अलग किताबों और उनकी लेखनी के वो हिस्से शामिल किए गए जो औरतों की कहानी सुनाते हैं। उन औरतों की, जो इतिहास में जानी गईं और ज्यादातर उनकी भी जिनका प्रचलित इतिहास में जिक्र नहीं आता।  इन्हें  जो चीज जोड़ती है वह यह है कि  इन सब ने अपने समय और स्थिति में अपने लिए निर्धारित भूमिकाओं को कई तरह से नामंजूर किया।

 

दुनिया सिकुडती जाती है

आज मातृभाषाओं का दिन है.हर दो हफ्ते पर एक भाषा मर जाती है.यह दुनिया और सिमट जाती है, जब वह अपने कुछ इंसानी लफ्जों और मुहावरों को खो देती है, उसी तरह जैसे वह पौधों और जीवों की विविधता के रंगों को खो रही है.आन्खेला लोइज ने 1974 में इस दुनिया को विदा कहा. वह दक्षिण अमरीका या कहें दुनिया के ही आखिरी छोर पर बसे Tierra del Fuego (तिएर्रा देल फुएगो-आग़ की जमीन) में रह रहे ओनास मूलवासियों के आख़िरी लोगों में से थीं. और अपनी जबान बोलने वाली आख़िरी इंसान भी.
आन्खेला अकेले ही गाया करती थीं. वह ये गीत किसी के लिए भी नहीं गाती थीं. उस जबान में जो अब किसी को याद नहीं थी.मैं उनके निशानों पर चलती जाती हूँ, जो अब रहे नहीं, चले गए हैं मैं भूली-बिसरी गुमनाम-सी हूँ अब
अपने गुजरे दिनों में ओनास लोग कई देवी-देवताओं को पूजते थे. सबसे प्रमुख देवता Pemaulk (पेमौल्क) कहलाता था.पेमौल्क का मतलब “शब्द” था!

मोहतरमा जो तीन सदियों की गवाह बनीं


एलिस 1686 में एक गुलाम के रूप में जन्मी थीं और एक सौ सोलह साल की उम्र में एक गुलाम ही मरीं.
1802 में उनकी मृत्यु के साथ अमरीका में अफ्रीकी लोगों की याद का एक हिस्सा भी मर गया था. एलिस को न पढ़ना आता था न लिखना, लेकिन वह उन कई आवाजों से भरी हुई थीं, जो दूर से आई दास्तानों तथा पास की जिन्दगी के किस्सों-इतिहासों को सुनाया और गाया करती थीं. इनमें से कुछ कहानियाँ उन गुलामों की सुनाई होतीं जिन्हें भागने में एलिस मदद किया करती थीं.नब्बे की होने पर उनकी आँखों की रोशनी जाती रही.
एक सौ दो आते आते रोशनी वापस आ गई थी.-यह ईश्वर था- एलिस ने कहा. वह मुझे कभी निराश नहीं करता.
उन्हें सब फेरी डंक्स वाली एलिस बुलाया करते. अपने मालिक के हुक्म पर वह उस ferry (यानी नाव) पर काम करती थीं जो यात्रियों को डेलावेयर नदी के इस पार से उस पार ले आया-ले जाया करती. जब सवारी, जो हमेशा गोर होते थे, इस जर्जर बुढ़िया का मजाक उड़ाती तब वह उन्हें नदी के दूसरे छोर पर छोड़ आया करतीं. वे चिल्ला-चिल्लाकर उन्हें वापस बुलाया करते, लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं थी. वह जो कभी अंधी रही थी, आखिर बहरी जो थी.

मूलवासियों का दिन

रिगोबेर्ता मेंचू ग्वातेमाला में जन्मी थीं. स्पेनी आक्रमणकारी पेद्रो दे आल्वारादो की ‘विजय’ के चार सौ सालों बाद. अमरीकी राष्ट्रपति द्वाईट आइजनावर की ‘विजय’ के चार साल के बाद.
1982 में जब सेना ने माया आदिवासी लोगों की पहाड़ियों को उजाड़ा तब रिगोबेर्ता के करीब–करीब पूरे परिवार को मार डाला गया था. उनका वह कस्बा भी नक़्शे से गायब कर दिया गया जहाँ नन्ही रिगोबेर्ता की नाभीनाल गड़ी थी ताकि उसकी जड़ें जमीन में गहरे फैल सकें. दस साल बाद उन्हें शान्ति का नोबेल मिला. रिगोबेर्ता ने कहा:-हालाँकि यह पाँच सौ सालों की देरी से आया है, मैं इस पुरस्कार को माया लोगों के लिए आदर और सम्मान कीतरह स्वीकार करती हूँ. माया लोग सचमुच धैर्य का समाज हैं. वे पाँच सौ सालों का कत्लेआम झेलकर आज भी खड़े हैं.वे जानते हैं कि समय मकड़ी की तरह धीरे-धीरे बुनता है.

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फ्लोरेंस


दुनिया की सबसे मशहूर नर्स फ्लोरेंस नाइटिंगेल ने नब्बे साल की अपनी जिन्दगी का बड़ा हिस्सा भारत को दिया था. वह, हालाँकि, कभी उस मुल्क को नहीं जा पाईं जिसे वह प्यार करती थीं.
फ्लोरेंस खुद बीमार हो गई थीं. क्रीमिया के युद्ध में उन्हें छूत की एक असाध्य बीमारी ने आ घेरा था. तब, हालाँकि, लन्दन के अपने कमरे से ही कितने ही लेख और चिट्ठियों के जरिए वह भारत की सच्चाइयाँ ब्रिटिश जनमत के सामने ला रही थीं.भुखमरी पर ब्रिटिश साम्राज्य की असंवेदनशीलता:
फ्रांस-प्रसिया के मुकाबले पाँच गुना ज्यादा लोगों की मौत. किसी को कोई खबर नहीं. हमने उड़ीसा की भुखमरी पर कुछ नहीं कहा, जब एक-तिहाई आबादी को वहाँ के खेत-मैदानों को अपनी हड्डियों से सफ़ेद कर देने पर मजबूर किया गया.
गावों में संपत्ति का बँटवारा:
यहाँ तो तम्बूरा बजने के लिए खुद ही रकम अदा करता है. एक गरीब किसान हर वो काम करने की रकम अदा करता है, जो वह खुद करता है या जिसे जमींदार खुद न कर उससे करवाता है.
भारत में अंग्रेजी न्याय:
हमें बताया जाता है कि गरीब किसान को अंग्रेजी न्याय का सहारा हासिल है. ऐसा कुछ नहीं है. कोई भी इंसान वह रखने का दावा नहीं कर सकता जिसका वह इस्तेमाल नहीं कर सकता.
गरीबों का सब्र
किसान-विद्रोह पूरे भारत के लिए एक आम बात बन सकते हैं. कोई भी यह दावा नहीं कर सकता कि ये लाखों भारतीय, जो अभी खामोश हैं और सब्र रखे हुए हैं वे हमेशा ऐसे रहेंगे. एक दिन गूंगे बोलेंगे और बहरों को सुनना होगा.

लेखक के बारे में

एदुआर्दो गालेआनो (3 सितंबर, 1940-13 अप्रैल, 2015, उरुग्वे) अभी के सबसे पढ़े जाने वाले लातीनी अमरीकी लेखकों में शुमार किये जाते हैं। साप्ताहिक समाजवादी अखबार  एल सोल  (सूर्य) के लिये कार्टून बनाने से शुरु हुआ उनका लेखन अपने देश के समाजवादी युवा संगठन  से गहरे जुड़ाव के साथ-साथ चला। राजनीतिक संगठन से इतर भी कायम संवाद से विविध जनसरोकारों को उजागर करना उनके लेखन की खास विशेषता रही है। यह 1971 में आई उनकी किताब लास बेनास आबिएर्तास दे अमेरिका लातिना (लातीनी अमरीका की खुली धमनियां) से सबसे पहली बार  जाहिर हुआ। यह किताब कोलंबस के वंशजों की  ‘नई दुनिया’  में चले दमन, लूट और विनाश का बेबाक खुलासा है। साथ ही,18 वीं सदी की शुरुआत में  यहां बने ‘आज़ाद’ देशों में भी जारी रहे इस सिलसिले का दस्तावेज़ भी। खुशहाली के सपने का पीछा करते-करते क्रुरतम तानाशाहीयों के चपेट में आया तब का लातीनी अमरीका ‘लास बेनास..’ में खुद को देख रहा था। यह अकारण नहीं है कि 1973 में उरुग्वे और 1976 में अर्जेंटीना में काबिज हुई सैन्य तानाशाहीयों ने इसे प्रतिबंधित करने के साथ-साथ गालेआनो को ‘खतरनाक’ लोगों की फेहरिस्त में रखा था। लेखन और व्यापक जनसरोकारों के संवाद के अपने अनुभव को साझा करते गालेआनो इस बात पर जोर देते हैं कि “लिखना यूं ही नहीं होता बल्कि इसने कईयों को बहुत गहरे प्रभावित किया है”।


अनुवादक का परिचय : पी. कुमार. मंगलम  जवाहर लाल नेहरु विश्विद्यालय से लातिनी अमरीकी साहित्य में रिसर्च कर रहे हैं .  

क्रमशः

सुनंदा का दरवाजा

प्रो.परिमळा अंबेकर

हिन्दी विभाग , गुलबर्गा वि वि, कर्नाटक में प्राध्यापिका और विभागाध्यक्ष . आलोचना और कहानी लेखन  संपर्क:09480226677

आशी….. आशी…. । अश्विनी के कमरे का अधभिडा दरवाजा खोलकर सुनंदा हडबडा कर भीतर गयी। उसकी पुकार कमरे की चाहरदीवारी से टकराकर लौट आयी। कमरे के कोने में पडा खाली सुनसान बिस्तर जैसे उसेे चिढा रहा था। सुनंदा पैर से सर तक सुन्न !! खाली बिस्तर…. खाली कमरा… !! उसके  दिल की धड..धड धडक…..खाली कमरे को भरने लगा। अंतडियों को मरोडकर निकली चीख उसके गले में आकर अटक गयी।  आगे बढकर बिस्तर का हत्था पकडे-पकडे सुनंदा बैठ गयी! आशी… आशी…. शब्द उसके सूखे जर्द होंटों पर बुदबदाने लगे। कल शाम से ही एक अजीब सा डर, जो काला चद्दर बनकर उसके मन और बुद्धी को ढापे ढापे चल रहा था , आज दिन के उजाले में वही डर सुनंदा के सामने नंगा होकर नाच रहा था। आज उसकी आशी…. उसके दरवाजे को लांघकर चली गयी थी .. !!

आये हर रिश्ते को नकारती बेटी अश्विनी सुनंदा के सामने पहाड बनकर खडी थी।  जो न चढते बनता… न उतरते बनता। आये दिन एक अजीब किरचन उसके मन में वक्त बेवक्त किरकते जाती… जैसे गहरे पानी के नीचे कोई  खंजर हिल रहा हो ..!! सुनंदा नहीं चाहती थी कि कोई ऐसा दरवाजा वह खोले जिसके बाहर के सच को देखने के लिए , मजबूर न हो जाय , वह विवश न हो जाय !! लेकिन कल पिंकी से खुली बात ने  जैसे सुनंदा के पैर की जमीन ही हिला डाली। शाम से पिंकी की आवाज तलवार बनकर लटक रही थी उसके सर पर । ‘‘ अव्वा…आशक्का… शादी नहीं करती, बोलती है।‘‘ सुनंदा को लगा जैसे सांस लेना मुश्किल हो रहा हो। सांस जैसे फेफडे में ही घुमडने लगा है। पिंकी फिर बोल पडी थी। ‘‘ अव्वा…. अक्का… आॅफिस के अपन बाॅस के साथ …. ‘‘  पिंकी रूक रूककर बोलते जा रही थी, लेकिन सुनंदा के कान बजने  लगे। ‘‘ आशक्का का वह बाॅस… अव्वा जात से  …. !!  पिंकी की धुनीधुनी आवाज उसके कान के परदे पर फडफडाने लगी… कटे परों की गौरया की तर।  पिंकी के चेहरे को टकटकी बांधे देखती खडी रह गयी सुनंदा।
 
सुनंदा की शादी हुये आज को बीस-बाइस बरस हो गये। एक दो साल के अंतराल में सुनंदा तीन बच्चों की माॅं बन गयी। पहली दो बेटियाॅं पीठ पर पीठ आ गयी थीं। हर बुरा होने और गलत घटने के पीछे बहू का दोष दिखानेवाली उसकी सांस जैसे सुनंदा के गले पर सवार हो गयी।  न कोई मंदिर रहा होगा, न कोई टेकडी बची होगी, जहाॅं सुनंदा  ने अपनी  मिन्नत का आॅंचल न पसारा हो। तीसरी बार जब उसकी गोदभरी तो बेटा नसीब हआ उसे। उसे लगा अब सारी मुश्किलें दूर हो गयीं। लेकिन उसकी  नसीब में मुश्किलें तो घर के मकडी के जालें थीं, जितना साफ करे उतना फैलें। सुनंदा अपढ ,अपने बच्चों के भविष्य की चिंता में सूखी जा रही थी। अवराद से शहर कलबुर्गि का फासला बस आधे घंटे का था। वह चाहती कलबुर्गि में घर बसाये । लेकिन, खेतीबाडी का घर, घर  पर बीमार ससूर, केवल पीता.. बतियाता.. रहता पति… , घर के सदस्यों की किटपिट !! विवश थी सुनंदा। मन को मनवाने के लिये उसे एक बहाना मिलगया जो काफी था … उस छोटे से गाॅंव में सरकारी हाईस्कूल जो बसा हुआ था.

उसकी शादी अजीब सी शादी थी। तब वह रही होगी उन्नीस बीस बरस की। शांत, स्वभाव से मर्जीखोर। सबकी  मर्जी रखती। यहाॅं तक कि उसकी शादी भी उसके इस मर्जीखोर स्वभाव का बस एक नमूना रहा था। बडी दीदी मंगला की शादी हुई । अपनी हैसियत से भी बढकर शादी बनायी थी माॅं और बाबूजी ने। लडका गाॅंव का, खानदान देखी पहेचानी….सबकुछ ठीक- ठाक रहा।  लेकिन, कौन जाने, कहर इस कदर टूटेगा। आठ महीने का बच्चा पेट में और इधर मंगला ने आॅंखे मूॅंद ली !! गाॅंव वाले पीठ पीछे बात भी बनाने लगे । मंगला के पति और ससुराल का दोष गिनाया जाने लगा। लेकिन गाॅंव की यादाश्त की आयु भला होती कितनी है ? मौत के मातम पर शहनायी के सुर चढने में देर नही लगी ….!! अपने विधुर बेटे के लिये बहू का हाथ मांगने फिर से आ धमके ससुराल वाले। मंगला न रही तो क्या छोटी सुनंदा ही सही। दहेज का जोर नहीं… शादी का खर्चा नहीं… फिर से कर्जे का टंटा नहीं ..!! घर आया रिश्ता ठुकराया  कैसे जाय …? और सुनंदा के लिये … ? आखिर माॅं और बाबूजी की मान मर्जी ठहरी … !! कभी कभी सुनंदा को लगता, कितनी सरल और सहजता से पूछ लिया था माॅं ने उससे या उससे पूछने का केवल रस्म अदायगी हुई थी ?  न कोई अचकचाहट , न दुविधा !! ना कैसे कर सकती थी  सुनंदा। मर्जीखोर सुनंदा … !! लेकिन … उसकी मर्जी का क्या … ? किसी ने नहीं पूछा… किसी ने नहीं जाना। जरूरी भी नहीं समझा…. !! लेकिन….. ? लेकिन क्या ? कुछ लेकिन उत्तर के मोहताज नहीं होते है… बस नहीं होते !



लेकिन… फिर वही,  लेकिन उसके सामने आज फिर अलग रूपोंअंदाज में उठ  खडा हुआ था। जिसका उत्तर अब खुद सुनंदा को देना था. पिंकी की बातें उसको भीतर तक हिलाकर रख दिये थे । शाम से वह जड खोदे पौधे की तरह मुरझा गयी थी । एक ही आवाज उसके सामने गूॅंजे जा रहा था। आखिर वह शहर आयी क्यूॅं ..? सुनंदा को लगा जैसे जीवन भर घिसा उसका चंदन मोरी में बहे जा रहा है। सास -ससूर के न रहने पर सुनंदा ने पति को बच्चों के भविष्य का वास्ता देकर कलबुर्गि ले आयी थी। सबकुछ पटरी पर बैठ ही रहा  था. लेकिन… पति के व्यसनों भरा बेतरतीब जिंदगी के चलते वह बच्चों का ब्याह तक नहीं कर सका। विधवा सुनंदा, एक साल तक घर से बाहर निकलने से कतराती रही। झूठे पति का सच्चा शोक मनाती रही। यह सब कबतक चलता ? आशी के लिये लडका ढूॅंढना  है , पिंकी की पढायी,  अमित की इंजिनियरिंग सीठ की चिंता।

रात घिरने लगा था। आशी के कमरे की ओर जाते सुनंदा के कदम में कील गडे जा रहे थे। दूसरों की मर्जी जीती आयी सुनंदा, अपनी मर्जी को माॅंगने के लिए अपने आप से लड रही थी !! अपनी शादी के लिये तो उसने ऐसे सर हिला दिया था जैसे मदारी का बंदर !! भीतर से किवाड को बंद कर लिया। धीरे से सरकते हुए उसके पैरों के पास जाकर बैठ गयी। झट उसके पैरों को अपने हाथों में ले लिया। अनायास उसके होंठ हिलने लगे , वह बडबडाने लगी  – ‘‘आशी मै तमाम जिंदगी  दूसरों के पैर पडते ही आयी हूॅं, आज तेरा ही सही … कल सुबह दस बजे लडकेवाले आ रहे हैं, अमित उन्हे लेने जा रहा है। जरा सोच ले बेटा… ‘‘  बेटी के उत्तर को सुनने का धैर्य उस समय उसमें नहीं  था। झट कमरे से बाहर निकल आ गयी थी सुनंदा !!
2
उस दिन सुबह सुबह …..झुककर रंगोली की लकीरें खीचती सुनंदा ने आहट पाकर सर उठाकर देखा, सामने आशी खडी थी !! बगल में बच्ची भी … । झुकी कमर को हाथ का सहारा दिया, और सीधे खडी हो गयी वह। एक पल बस देखती ही रही। पीछे किसी और के आने की आहट की कल्पना से झांककर देखा। पर वहाॅं कोई नहीं था। एक लंबे निश्वास की गर्मी एक अजीब हॅंसी बनकर उसके होटों पर तैर गयी। आशी के आॅंखों का रूखापन उससे बहुत कुछ कह रहा था। लेकिन बदले में सुनने का धैर्य आज भी सुनंदा में नहीं रहा था। उसेे लगा …. बीस साल पहले उससे बिछुडी दीदी मंगला और उसका बच्चा आज फिर उसके सामने आकर खडे हैं। अंतराल की आग से सूखीं उसकी आॅंखें फिर से नम हो गयीं। रंगोली की लकीरों के इसपार खडी सुनंदा की दोनों बाहें धीरे -धीरे उपर उठकर सामने की ओर पसर  गये  !!
3
साहबान…. कदरदान…. देखा आपने… नहीं नहीं सुना आपने… यह है कहानी दरवाजे  की… सुनंदा के घर के दरवाजे की…. जो कभी बंद नहीं हुई … पराये बने अपनों के लिये भी नहीं !! उस्ताद हाॅं में हामी भरते ही, फिर से मदारी जोर- जोर से ऐलान करने लगा !! सायबान यह दरवाज्जा काठ के पटों के जोडन से या.. लोहे के पतरों के ठोकन से नहीं बना है….. । उस्ताद प्रश्न किया … बोल मदारी, तो यह दरवाजा  बना कैसे ..? अपने उस्ताद के प्रश्न से और उत्साहित हुआ मदारी , गले का बलगम साफकर , हाथ की लकडी को नचाते हुवे कहने लगा ‘‘ सुनिये उस्ताद … और सुनिये सब सायबानों … अपने जिगर के पट्टों को चीरकर … कीले से ठोंककर बनाया है सुनंदा ने …इस दरवाजे को !! कोठरी  की अंधियारे को गलाकर, उजाले की रंगत चढाया है इसपर … और … उस्ताद… इसपर जडी है कुंडी…. कुंडी पर ताला… लेकिन यह ताला तो ऐसा ताला है कदरदान … जो हर किसी की चाबी से खुले … !!



बंबई पवई के हीरानंदानी गार्डेन्स के सामने मदारी का खेल पूरे रंगत को चढा था। उस्ताद ने फिर सवाल किया  ‘‘… बोल मदारी ऐसे दरवाजे कहाॅं मिलेंगे … क्या सुनंदा जैसे लोग बनाते है इन्हें या सरकार की कोरट कचहरी में बनते हैं ऐसे दरवाजे.. मदारी.. ऐसे दरवाजे बनाने के लिये कहता कौन है ? उस्ताद के तरकश से सीधे आते सवालों को देख मदारी सर खुजाने लगा ‘‘ अरे.. यह क्या …? उस्ताद का यह सवाल तो खेल के पिलान में नहीं  था ? उस्ताद मुझे फसाना चाहता है .. ?  बना बनाया खेल बिगडता देखकर मदारी चट् गडे बंबू उखाडने लगा … और उस्ताद की ओर घूरते हुए चलता बना।

1990 के बाद का हिंदी समाज और अद्विज हिंदी लेखन

प्रमोद रंजन

 संपादक,फारवर्ड प्रेस. बहुजन साहित्य की अवधारणा सहित चार अन्य किताबें प्रकाशित. ईमेल आईडी janvikalp@gmail.com



1990 का दशक वैश्विक परिदृश्य अनेक सकारात्मक-नकारात्मक परिवर्तनों का  वाहक बना था. भारत भी इससे अछूता नहीं रहा. विशेषकर उत्तर के राजानीतिक और धार्मिक जीवन में तो यह दशक एक जलजला लेेकर ही आया. मंडल कमीशन के आधार पर अन्य पिछड़ा वर्गों को आरक्षण दिए जाने (7 अगस्त, 1990), उदारीकरण की नीतियां लागू किये जाने (24 जुलाई, 1991), अयोध्या में बाबरी मस्जिद को ढाहे जाने (6 दिसंबर, 1992) ने गंगा-यमुना के मैदानों में ऐसी उथल पुथल मचायी, जिससे हिंदी पट्टी के नाम से जाने जाने वाले इन प्रदेशों का शायद ही कोई नागरिक अछूता रहा हो.

प्रोफेसर देवेंद्र चौबे ने इस घटनाक्रम की व्याख्या इस प्रकार की है ‘‘भारतीय समाज और राजनीति में मंडल कमीशन अर्थात् 1990 के बाद परिवर्तन की जो प्रक्रियाएं दिखलाई पड़ती हैं वह तो है ही, लेकिन भारतीय परिदृश्य के समानांतर अगर हम वैश्विक परिदृश्य पर नजर डालें तो साफ पता चलता है कि परिवर्तन की ये प्रक्रियाएं दूसरे विश्वयुद्ध के बाद ही शुरू हो गई थीं. जब जर्मनी और इटली में नस्ल या अफ्रीका और लैटिन अमेरिका सहित अनेक देशों में रंग के नाम पर किए जा रहे उत्पीड़न के खिलाफ उत्पीड़ित समुदाय उठ खड़ा होता है और प्रतिरोध की एक समानांतर ताकत विकसित करता है. भारतीय प्रसंग में 1947 में देश विभाजन, नई सामाजिक-आर्थिक, राजनीतिक स्थितियां भी सांस्कृतिक व्यवस्था के लिए एक प्रस्थान बिंदु था. ..1990 के बाद परिवर्तन की जो प्रक्रिया दिखलाई पड़ती है उसकी एक अंतर्धारा पहले से ही चली आ रही थी जिसकी व्यापक परिणति साहित्य और विचारधारा की दुनिया में 90 के बाद दिखलाई पड़ती है. अगर हम ध्यान दें तो पता चलता है कि इन आंदोलनों और संघर्षों ने भारतीय समाज और राजनीति के क्षेत्र में कुछ ऐसे लोगों को जन्म दिया, जिन्होंने संरचनात्मक स्तर पर बदलाव लाने की प्रक्रिया शुरू की. चाहे वह दलित प्रसंग में कांशीराम हो या नक्सलवाद के संदर्भ में चारू मजूमदार अथवा पिछड़े वर्ग के सामाजिक परिवर्तन के एक मुख्य कारक के रूप में कर्पूरी ठाकुर. इस तरह के कई और लोग अथवा नायक हैं जिन्होंने भारतीय समाज, राजनीति, विचार और उसकी संरचना को बुनियादी स्तर पर बदलने की कोशिश की. इसी का परिणाम था कि 1990 तक आते-आते एक बड़े बदलाव के संकेत दिखलाई पड़ने लगे. मंडल कमीशन को लेकर हुआ आंदोलन, बाबरी मस्जिद का ध्वंस होना और आर्थिक उदारीकरण तथा भूमंडलीकरण की प्रक्रियाएं आदि इन बदलावों के प्रत्यक्ष कारक बने.’’(1)

भूमंडलीकरण के आलोचक रहे अभय कुमार दुबे भी इस निरंतरता को रेखांकित करते हुए कहते हैं कि ‘‘पहली नजर में लगता है कि भूमंडलीकरण का यह पल अचानक कहीं से आया और हम पर हावी हो गया. लेकिन, असल में इस लम्हे के लिए धीरे-धीरे कई साल से राष्ट्रातीत और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक जमीन पक रही थी.‘ (2) अभय उन बुद्धिजीवियों को भी आड़े हाथों लेते हैं जो यह कहते हैं कि ‘‘अगर 15 अगस्त राजनीतिक आजादी का दिन माना जाएगा तो 24 जुलाई को आर्थिक आजादी का प्रतीक माना जाना चाहिए.‘‘ उनका मानना है कि यह कथित ‘‘आर्थिक आजादी परमिट कोटा राज खत्म करके ऐसा निजाम बनाने की कोशिश भर नहीं थी, जिसमें राष्ट्र और नागरिकों का लाभ सर्वोपरि होता. इस आर्थिक आजादी का मतलब न केवल भारतीय अर्थव्यवस्था का विश्व बाजार से जुड़ते चले जाना है, वरन् भारतीय वित्तमंत्री को अंतररार्ष्ट्रीय मुद्रा कोष  और विश्व व्यापार संगठन के दफ्तर में जा कर अपने कामों का हिसाब देना है. उसे अंतराष्ट्रीय रेटिंग ऐजेंसियों द्वारा दी गयी सनद पर मोहताज रहना है. इसका मतलब यह भी है कि भारतीय अर्थव्यवस्था को धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी के रहमो-करम पर निर्भर होते चले जाना है.‘‘ (3) मीडिया शिक्षण से जुड़े आनंद प्रधान भी मानते हैं कि ‘‘मुक्त बाजार एक विचारधारा है जो ‘विचारधारा के अंत’ के बाद विश्वविजेता बन कर उभरा है. इसलिए यह मुक्त बाजार हवा में नहीं बना या बन रहा है, बल्कि भूमंडलीकरण, उदारीकरण, निजीकरण के जरिए विश्व स्तर पर और विभिन्न देशों के अंदर स्वयं को संगठित और सशक्त कर रहा है. रूप (फार्म) के स्तर पर भूमंडलीकरण का आकर्षक चोला पहने, मुक्त बाजार चाहे अपनी वल्दियत छुपाने की कितनी भी कोशिश करे, उसका सार या अंतर्वस्तु  साम्राज्यवाद की पुनःस्थापना है.’’(4)

उदारीकरण के बाद आये विभिन्न परिवर्तनों में से एक – बढ़ती अश्लीलता और घरों में बंद रहने वाली भारतीय स्त्री की छवि का टूटना भी लेखकों की चिंता का प्रमुख कारण है.  उदारीकरण के बाद फिल्म, टीवी सीरियलों व समाचार माध्यमों की प्रकृति में आये परिवर्तनों को चिन्हित करते हुए समरेंद्र सिंह कहते हैं कि ‘‘उदारीकरण और ध्रुवीकरण के प्रभाव में स्त्री के बचे-खुचे स्वाभिमान और सम्मान को उससे छीन लिया गया और उसे ‘सेक्सी-सेक्सी‘ और मस्त-मस्त चीज में परिवर्तित कर दिया गया.‘‘(5)  इसी क्रम में अरूण कुमार त्रिपाठी कहते हैं कि ‘‘डांस बारों की लड़कियों में ज्यादा संख्या उनकी है जो या तो दलित हैं या फिर नट जैसी नाचने-गानेवाली आदिवासी (घुंमंतु) जातियां हैं… गरीब वर्गों के पारंपरिक व्यवसाय के खत्म होते जाने और उदारीकरण के दौर में स्त्रियों पर देह-प्रदर्शन और देह-व्यापार का दबाव बढा है.‘‘(6)

इसी दौर में लागू हुए मंडल कमीशन के बारे में ख्यात वामपंथी कथाकार भीष्म साहनी कहते हैं कि ‘‘जिस ढंग से आपने इन नौकरियों की बात उठाई है, आप इन्हें कुछ नौकरियां दे भी देंगे तो क्या सचमुच इनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति में अंतर आएगा? हां! इसका लाभ एक जरूर होगा कि ये लोग अपने अधिकारों के प्रति अधिक सचेत हो जाएं और शायद इनमें किसी हद तक एकजुटता भी आए, पर इनका उत्पीड़न करने वाले तत्व भी अधिक उत्तेजित हो उठेंगे. तब पिछड़े हुए गांवों में इनकी रक्षा कौन करेगा? इन नौकरियों से इनकी आर्थिक स्थिति कितनी मजबूत हो जाएगी कि वे इस उत्पीड़न का डटकर मुकाबला कर सकेंगे? आपने जल्दबाजी में जो कदम उठाया है उसका एक नतीजा तो जरूर निकलेगा कि हमारे समाज में जात-पात का जंतु और अधिक खूंखार बनेगा….इस स्थिति में यही बेहतर होगा कि इस समय मंडल कमीशन की सिफारिशों के क्रियान्विति को स्थगित किया जाए.’’  (7) वे आरक्षण का विरोध करने वाले संगठनों के सुर में सुर मिलाते हुए कहते हैं कि ‘‘सवाल ऊंची या नीची जात का नहीं है, हमारा देश, अपनी अनगिनत कमजोरियों-बुराइयों के बावजूद अपने पिछड़ेपन से जूझ रहा है, हमारे विद्यार्थी कड़ी मेहनत करते हैं, शिक्षा के क्षेत्र में होड़ बढती जा रही है, पढाई का बोझ बच्चों पर उत्तरोत्तर बढता जा रहा है. उस स्थिति में हमारा कोई अधिकार नहीं है कि हम किसी योग्य विद्यार्थी को उसकी संभावनाओं से वंचित करें. समाज को उनके प्रति भी उतना ही बड़ा दायित्व है जितना उन पिछड़ी जातियों के प्रति जो शताब्दियों से उपेक्षित और वंचित रही हैं. पर आप एक के मुंह से कौर छीनकर दूसरे के मुंह में डालें, इसका तो आभास मात्र भी देना गलत है.’’ (8) ख्यात मार्क्सवादी आलोचक रामविलास शर्मा कहते हैं कि क्या ‘‘कुछ बिरादरियों को संगठित करने से क्या जात-बिरादरीवाद खत्म हो सकता है? हमारा कहना है यह है कि इसे खत्म करने के लिए वर्ग के आधार पर लोगों को संगठित करना चाहिए. गरीब किसानों को जाति के आधार पर विभाजित करने से किसको लाभ होता है? इसे धनी किसानों और पुराने जमींदारों का लाभ होता है.’’  (9)जबकि नामवर सिंह कहते हैं कि ‘‘जबसे आरक्षण चला है, तब से जातिवाद बढ़ा है‘‘.(10)

इसी प्रकार दक्षिणपंथ के हिमायती माने जाने वाले ख्यात कथाकार शैलेश मटियानी मंडल कमीशन की अनुशंसाओं को लागू किये जाने पर में कटू शब्दों का प्रयोग करते हुए कहते हैं कि ‘‘मंडल आयोग की सबसे भयानक विसंगति ही यही है कि इसने जाति व्यवस्था की टूटती दीवारों को नए सिरे से अभेद्य बनाए जाने की दुरभिसंधि का रास्ता खोला है. आर्थिक आधार पर आरक्षण से इंकार, स्पष्ट है कि उद्देश्य सिर्फ जातियों के वोटों के धनाढ्य सौदागरों के निहित स्वार्थों की पूर्ति है-पिछड़ी जातियों को सामाजिक परिप्रेक्ष्य में आगे लाना नहीं. पिछड़ी जातियों के धनाढ्यों के मोहनों के लिए भी आरक्षण और सवर्ण जातियों के लल्लुओं तक को साफ इंकार के द्वारा मंडल आयोग ने सामाजिक न्याय के सारे पाखंड को खुद ही उजागर कर दिया है. वास्तविकता यह है कि मंडल आयोग की निष्पत्तियां सामाजिक न्याय नहीं, बल्कि जातीय घृणा और प्रतिशोध की तर्क प्रणालियों पर आधारित हैं. ढाई हजार वर्षों का बदला चुकाने की सारी विकल्पविह्वलता सामाजिक परिवर्तन का जातिवादी निदान खोज निकालने के उस लल्लूचिंतन की उपज है, जिसे सामाजिक न्याय का मुखौटा ओढ़ाया गया है. जाति आधारित बंदरबांट को सामाजिक न्याय की संज्ञा देना सामाजिक न्याय का माखौल उड़ाना है.’’(11)

उपरोक्त उद्धरणों में हम देखते हैं कि भारतीय राजनीति और सामाजिक जीवन को गहराई से प्रभावित करने वाले इन जटिल बदलावों को सभी सामाजिक पृष्ठभूमि से आने वाले हिंदी साहित्यकारों ने अपने-अपने तरह से गहराई से रेखांकित किया है. लेकिन इन विश्लेषणों में प्रायः उनके सामुदायिक हित हावी रहे हैं. अधिकांश द्विज लेखकों ने इसके अश्लीलता और धर्मनिरपेक्षता वाले पक्ष पर अधिक बल दिया है तथा ‘बाजार के प्रभुत्व‘ से आक्रांत रहे हैं. मंडल कमीशन का जिक्र आते ही इनके भवें तन जाती हैं. भीष्म साहनी, शैलेश मटियानी, रामविलास शर्मा, नामवर सिंह जैसे अनेक बड़े द्विज लेखक भी इस मामले में विचारधारओं की सीमा-रेखा मिटा देते हैं तथा मंडल कमीशन का पुरजोर विरोध करते हैं. हालांकि द्विज लेखकों में इसके ऐसे अपवाद भी मौजूद हैं, जिन्होंने अपने सामुदायिक हितों से इतर जाकर भी सामाजिक न्याय का पक्ष लिया है. लेकिन सामान्यतः इस तबके से आने वाले प्रमुख लेखक अपने लेखन में एक ओर जहां ‘धर्म निरपेक्ष‘ हैं तथा मंदिर आंदोलन के विरोधी हैं वहीं वे बाजार व्यवस्था से नफरत करते हैं. इसी प्रकार वे मंडल कमीशन की अनुशंसाओं के लागू होने को समाज में एक किस्म के उत्पात की शुरूआत मानते हैं.

दलित व पिछड़े वर्ग के लेखकों का मत

1990 के बाद का दशक दलित साहित्य के तेज उभार का भी दशक है, जिसके पाश्र्व में फुले-आम्बेडकरवाद और अर्जक संघ-बामसेफ के आंदोलनों के साथ-साथ मंडल आंदोलन की उर्जा भी काम कर रही थी, जिसका प्रतिबिंब ‘हंस’ के पन्नों पर भी दिख रहा था. प्रेमकुमार मणि बताते हैं कि ‘‘हिंदी में दलित साहित्य की चर्चा 1980 के बाद तीव्र हुई. 1990 में मंडल आंदोलन के बाद राजनीति में जब जाति विमर्श शुरू हुआ, तब साहित्य में यह विमर्श तीव्रतर हुआ’’(12)
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इन दोनों तबकों – दलित और ओबीसी– से आने वाले लेखकों में 1990 के बाद हुए सकरात्मक परिवर्तनों को श्रेय अपने तबके रखने की होड़ भी दिखती है. मसलन, कंवल भारती कहते हैं कि ‘‘साहित्य और राजनीति का विकास होता है सामाजिक आंदोलन से, किंतु दलित आंदोलन की तरह या उसके समानांतर पिछड़े वर्गों का कोई आंदोलन देशव्यापी नहीं हो सका. मंडल आंदोलन भी दलित आंदोलन का ही हिस्सा था. ओबीसी ने इस आंदोलन में भाग तक नहीं लिया था.‘‘(13)  तो, अन्य पिछड़ा वर्ग से आने वाले आलोचक चौथीराम यादव कहते हैं कि ‘‘देश में जितने भी सांस्कृतिक आंदोलन हुए, उनमें ओबीसी नायकों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही है….शुरूआत में दलित आंदोलन और दलित साहित्य का ओबीसी नायकों ने विकास किया. इसे अगर देश के स्तर पर देखें तो जोतिबा फुले ओबीसी थे. शाहू जी महाराज ओबीसी थे. पेरियार ओबीसी थे और उत्तर भारत में ललई सिंह यादव, रामस्वरूप वर्मा और सभी लोग दलित आंदोलन के मजबूत पक्षधर थे. इन लोगों ने आंदोलन चलाया और उसको आगे बढ़ाया.‘‘(14)

इन दावों-प्रतिदावों से इतर एक बात जो स्पष्ट दिखती है वह यह है कि 1990 के दशक में हुए परिवर्तनों पर इन तबकों – विशेषकर अन्य पिछड़ा वर्ग और दलित समुदाय – से आने वाले लेखकों की राय द्विज लेखकों की तुलना में अनुपातिक रूप से कहीं अधिक सकारात्मक है. उनकी नजर उदारीकरण के नकारात्मक परिवर्तनों के साथ-साथ इस पर भी रहती है कि खुली अर्थव्यस्था भारतीय समाज की जकड़न को भी तोड़ेगी. वे जहां बाबरी मस्जिद के विध्वंस पर चिंतित होते हैं वहीं यह भी रेखांकित करते हैं कि मंडल आयोग की अनुशंसाएं लागू होने के बाद जमीनी स्तर पर सामाजिक परिवर्तन की लहर चलने लगी है. वे यह भी चिन्हित करते हैं कि इस प्रक्रिया में उपभोक्तवाद की बुराइयों के साथ-साथ भारतीय समाज में आधुनिकता की बयार भी आ रही हैै. वे एक ओर इसे लोकतंत्र द्वारा वंचित तबकों के लिए किये जाने वाले कल्याणकारी कामों में बाधक व ‘आरक्षण‘ पर लटकी तलवार की तरह देखते तो दूसरी ओर इसके चाल-चलन को देसी सामंत-पूंजीवाद से मुक्ति का साधन भी मानते है.

उदारीकरण पर अद्विज वैचारिकी की बहुआयमिता को अन्य पिछड़ा वर्ग से आने वाले समाजशास्त्री योगेंद्र यादव के लेखक की बानगी से से समझा जा सकता है. वे 1990 के दौर में हुए परिवर्तनों को ‘मकार’ का नाम देते हुए कहते  हैं कि उस दौर में ‘‘राष्ट्रीय क्षितिज पर एक साथ तीन मकार उभरे. यह सोवियत संघ के विघटन का भी समय था, जिसने भारतीय समाज में समाजवादी मुहावरे का बोलबाला कर दिया था. ये तीन मकार हैं, मंडल, मंदिर और मार्केट. विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार ने अगस्त, 1990 में जब अचानक पिछड़ों के लिए आरक्षण की सिफारिशों को लागू कर दिया तब मंडल पिछड़ों के उस आंदोलन का पर्याय बन गया. मंदिर से तात्पर्य संघ परिवार के रामजन्मभूमि आंदोलन से है, जिसकी परिणति छः दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद ध्वंस में हुई. तीसरा मकार यानी मार्केट से आशय आर्थिक उदारीकरण और भूमंडलीय अर्थव्यवस्था से जुड़ी नीतियों से है….इन तीन मकारों के कारण राजनीतिक विमर्श में बुनियादी बदलाव आया. यह बदलाव किस हद तक था इसे सैद्धांतिक शुद्धतावाद की पैरोकार कम्युनिस्ट पार्टियों की सोच में आये कुछ परिवर्तनों से समझा जा सकता है. अनेक दशकों तक वर्ग संघर्ष के सिद्धांत से बंधी रही भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने मंडल आंदोलन के बाद यह सच्चाई मान ली कि भारतीय समाज में सामाजिक असमानता की जनक जाति भी है.’’(15)  योगेंद्र यादव तथ्य की ओर भी ध्यान दिलाते हैं कि स्वदेशी का नारा लगाने वाली भाजपा ने भी चुपचाप उदारीकरण की नीतियां अपना लीं तथा ‘‘मंडल आयोग के खिलाफ प्रदर्शनों को उकसाने के बावजूद भाजपा ने आधिकारिक रूप से उसे स्वीकार कर लिया तथा वह लगातार संगठन के भीतर पिछड़े वर्गों के उभार को समायोजित करने की भरसक कोशिशों में लगी हुई है.‘‘ (16) योगेंद्र इन सकरात्मक परिवर्तनों के खतरों पर भी नजर रखते हैं. उनका मानना है कि इसने ‘‘अब तक वंचित रहे जिन लोगों को राजसत्ता तक पहूंचाया है, उन्हें शायद अंत में पता चले कि इतिहास ने एक बार फिर उन्हें धोखा दे दिया है.’’ (17) हंस के संपादक राजेंद्र यादव इसमें एक और आयाम जोड़ते हैं तथा इसके साथ उदारीकरण के आगमन को पूंजी और अपराध के गठजोड़ के रूप देखते हैं. वे महसूस करते हैं कि इससे समाज में स्मृतिलोप बढ़ रहा है. 1995 में हुए एक चर्चित हत्यांकांड का हवाला देते हुए हंस के सितंबर, 1995 अंक में वे कहते हैं कि ‘‘पिछले डेढ़ महीने से भारतीय राजनीति पर नैना साहनी या तन्दूर कांड छाया हुआ है. सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी का सक्रिय सदस्य और युवा कांग्रेस का अध्यक्ष सुशील शर्मा मुख्य अभियुक्त है. उसने अपनी ‘पत्नी’ नैना साहनी की गोल मार्केट स्थित फ्लैट में हत्या की और लाश के टुकड़े करके अपने मित्र के ‘बगिया‘ रेस्त्रां में उन टुकड़ों को मक्खन लपेट-लपेटकर तन्दूर में जलाने की कोशिश की. सब्जी बेचने वाली एक महिला ने इस कांड की सूचना पुलिस को दी और ‘अशोक यात्री निवास’ के अधिकारियों की धर-पकड़ शुरू हुई, लाश को पुलिस ने कब्जे में ले लिया. पिछले दिनों, महीने भर बाद उसका दाह-संस्कार कर दिया गया. उधर सुशील शर्मा फरार होकर मद्रास में प्रकट हुआ, जहां उसने कोर्ट से जमानत ले ली. बाद में उसे गिरफ्तार करके दिल्ली लाया गया. अब यहां पर उस पर हत्या का मुकदमा चल रहा है. यह सब मैं इसलिए लिख रहा हूं कि एक से एक भयानक घटनाओं के सिलसिले के बीच अगले किसी कांड के आते ही हम सब यह भूल जाएंगे और साल-छह महीने बाद याद करना भी मुश्किल होगा कि नैना साहनी कौन थी. पटना के बाॅबी या भागलपुर के पापिया बोस हत्याकांड, या लातूर के सेक्स स्कैंडल को आज हम कहां याद रख पाते हैं? फिर हम आर्थिक राजनैतिक और सत्ता की जिन आपराधिक और रोमांचक प्रचंडताओं में जी रहे हैं, वहां अभी और भी बड़े-बड़े कांड देखने हैं. यहां पैंसठ करोड़ का बोफोर्स घपला देश की सत्ता बदल सकता था वहां आज बीस-बीस हजार करोड़ खाकर नेता डकार नहीं ले रहे. भ्रष्टाचार की यह अभूतपूर्व सामाजिक स्वीकृति सचमुच हमें स्वर्णयुग में ले आई है. आर्थिक उदारीकरण के तहत सुविधाओं और सपनों के फ्लडगेट (परनाले) खोले जाएंगे तो भ्रष्टाचारों और अपराधों की बाढ़ तो आएगी ही. यह ग्लोबल फिनोमिना है.‘‘(18)

लेकिन राजेंद्र यादव मंडल आंदोलन के मुद्दे पर कहते हैं कि ‘‘आरक्षण अगर नहीं होगा, तो दलित और स्त्री सामाजिक न्याय की लड़ाई कैसे लड़ेंगे? यह असमान शक्तियों की लड़ाई है. कमजोरों को ताकतवरों से लड़ने के लिए कोई तो सहारा चाहिए. जिसको आपने कभी बढ़ने नहीं दिया, जिनको आपने कभी अवसर नहीं, उन्हें शिक्षा और नौकरियों आदि में आरक्षण नहीं मिलेगा, तो वे कभी आगे आ ही नहीं सकते. अगर आप कहेंगे कि पहले शिक्षा लो, पहले मेरिट लाओ, पहले काम का अनुभव लाओ, तब तो आप इन चीजों की दौड़ से उनसे इतना आगे निकल चुके होंगे और इनका स्वरूप इतना बदल चुके होंगे कि वे तो आपके बराबर कभी आ ही नहीं सकते. जब तक आप अवसर नहीं देंगे, वे आगे नहीं आ सकते.’’(19)

योगेंद्र और राजेंद्र यादव से आगे बढ़ते हुए दलित लेखक कंवल भारती 90 के दशक में देश में हुए अनेक ऐसे परिवर्तनों का भी उल्लेख करते हैं कि जो प्रायः इस विषय पर विचार करने वाले लेखकों की नजरों से ओझल रह जाते हैं. वे बताते हैं कि ‘‘भारतीय राजनीति में 1990 का दशक सामाजिक न्याय और सामाजिक परिवर्तन का दशक माना जाएगा, क्योंकि इसी दशक में मंडल आयोग की शिफारिशें लागू हुईं और दलित-पिछड़ी जतियों को शासन में भागीदारी हासिल हुई. इसी दशक में दलित राष्ट्रपति का मुद्दा भारतीय राजनीति में गर्म हुआ और इसी दशक में दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों का राजनैतिक ध्रुवीकरण अस्तित्व में आया. उत्तर प्रदेश में दलित महिला को मुख्यमंत्री और केंद्र में पिछड़े वर्ग की सरकार बनाने वाला भी यह दशक है और अति दलितों तथा महिलाओं के लिए पृथक आरक्षण की मांग भी इसी दशक में मुखर हुई. भारतीय राजनीति में 1990 का दशक ही हिंन्दुत्व के आंदोलन का भी दशक है. इसी दशक में राममन्दिर का धर्मोन्माद पैदा हुआ और राम रथ की यात्राएं निकलीं. इसी दशक में हिंदू लहर ने आयोध्या की बाबरी मस्जिद तोड़ा और सारे भारत का सामाजिक सद्भाव बिगाड़ा.‘‘(20)

भारती जी की स्थापना है कि ‘‘सामाजिक परिवर्तन और हिंदुत्व का आंदोलन दोनों आकस्मिक घटनाएं नहीं हैं, वरन् इन दोनों के बीच गहरा संबंध है. ये दोनों क्रांति और प्रतिक्रांति की घटनाएं हैं. स्थापित व्यवस्था के विरूद्ध दलित-पिछड़ी जातियों की क्रांति ने सामाजिक परिवर्तन को जन्म दिया और उनके विरूद्ध भारतीय जनता पार्टी, विश्व हिंदू परिषद् तथा अन्य संगठनों ने हिन्दुत्व का आंदोलन चलाकर प्रतिक्रांति की.’’(21)


हिंदी में अनुदित और समादृत हो चुके मराठी लेखक शरणकुमार लिंबाले भी इस दौर में हिंदुत्व के उभार पर चिंता जताते हुए कहते हैं कि ‘‘उन्होंने राम मंदिर का प्रश्न उठाकर लोगों को इमोशनली ब्लैकमेल किया. बाबरी मस्जिद के ध्वस्त होने से लेकर गुजरात के दंगों तक का दौर उग्र हिंदुत्व का है. इस दौरान प्रगतिशील हिंदुओं ने मौन साध लिया.’’(22)

अन्य पिछड़ा वर्ग से आने वाले आलोचक हरिनारायण ठाकुर मंडल कमीशन के लागू होने को बड़ा परिवर्तनकारी  मुकाम बताते हुए लिखते हैं कि ‘‘निश्चय ही यह क्रांति दलित और पिछड़ों के इतिहास में सबसे बड़ी क्रांति थी, जिससे देश में न केवल राजनीतिक बदलाव आया, बल्कि दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यकों की बहुत बड़ी तादाद एक मंच पर दिखाई पड़ने लगी. इससे इन वर्गों में मनो-सामाजिक स्तर भी बदलाव आने लगे.’’(23)  इस प्रकार हम देखते हैं कि दलित और अन्य पिछड़ा वर्ग से आने वाले लेखक उदारीकरण के सकरात्मक-नकारात्मक -दोनों पहलुओं को रेखांकित करते हैं. लेकिन मंदिर आंदोलन के विरोध और मंडल आंदोलन के समर्थन में उनमें कोई मतभेद नहीं है.

आदिवासी लेखकों का रूख

आदिवासी समुदाय से आने वाले अधिकांश लेखक 90 के दशक में हुए परिवर्तनों से अपने सामुदायिक हितों को हुए भयवाह नुकसान का जिक्र करते हैं तथा अपनी संस्कृति पर हो रहे हमले से बेचैन तथा उसकी रक्षा के लिए चिंतित हैं. वे भी इन नीतियों को आक्रामक और अराजक तरीके लागू किये जाने पर कड़ी आपत्ति दर्ज करते हैं. इस प्रसंग में यह उल्लेखनीय है कि अन्य पिछड़ा वर्ग और दलित लेखकों की तुलना में आदिवासी लेखकों द्वारा किया गया उदारीकरण का विरोध न सिर्फ बहुत तीखा है बल्कि इस मामले में उनके विचार उपरोक्त तबकों के लेखकों से काफी अलग हैं. वे इसे आदिवासी समुदाय के विनाश की परियोजना के रूप में देखते हैं. दरअसल, हिंदी में आदिवासी साहित्य का प्रादूर्भाव का एक प्रमुख उद्देश्य उदारीकरण का प्रतिकार भी रहा है. जैसा कि आदिवासी साहित्य को परिभाषित करते हुए गंगा सहाय मीणा का भी निष्कर्ष है कि ‘‘1991 के बाद आर्थिक उदारीकरण की नीतियों से तेज हुई आदिवासी शोषण की प्रक्रिया के प्रतिरोधस्वरूप आदिवासी अस्मिता और अस्तित्व की रक्षा के लिए राष्ट्रीय स्तर पर पैदा हुई रचनात्मक उर्जा आदिवासी साहित्य है.’’(24)  आदिवासी साहित्य को और व्याख्यायित करते हुए आदिवासी लेखिक वंदना टेटे लिखती हैं कि ‘‘आधुनिक आदिवासी साहित्य, जिसकी काल-परिधि औपनिवेशिक दिनों को छूती है, मूल रूप से असहमति का सृजन है. आदिवासी समाज उन मूल्यों से असहमत है, जिससे दुनिया को अंततः नष्ट होना है. वह दुनिया को बचने के लिए सृजन कर रहा है. उसकी चिंताओं में पूरी सृष्टि, समष्टि और प्रकृति है. जिसका एक प्रमुख अंग इंसान भी है. आदिवासी साहित्य के केंद्र में इंसान है ही नहीं. वहां समष्टि है, प्रकृति है, समूची दुनिया है.‘‘(25)

पूरी दुनिया, समष्टि के बचाव के लिए फिक्रमंद आदिवासी दर्शन कथित भूमंडलीकरण की मार से किस प्रकार लहुलुहान हुआ है, इसे युवा आदिवासी लेखक ग्लैडसन डुंगडुंग इस प्रकार बयान करते हैं ‘‘आर्थिक उदारीकरण के बाद देश में विदेशी पूंजीनिवेश बढ़ता गया और नक्सलवाद दलित बस्तियों से निकलकर आदिवासियों के गांवों में पहुंच गया. इसी बीच झारखण्ड एवं छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों की स्थापना हुई जहां देश की आकूत खनिज संपदा मौजूद है. इन राज्यों की सरकारों ने औद्योगिक घरानों के साथ एम.ओ.यू. की झड़ी लगा दी है लेकिन आदिवासी समाज के बीच मानव संसाधन का विकास नहीं किया. फलस्वरूप, औद्योगिकरण आदिवासियों के विनाश का कारण बनता जा रहा है.’’(26)

आदिवासी कवियत्री निर्मला पुतुल अपनी एक कविता में बाजार के प्रलोभनों दुष्प्रभावों का प्रतिकार करते हुए कहती  हैं -‘‘ऐसे में जब बाजार से गुजरते/एक गिलास पानी मिलना कठिन हो गया है/ और पेप्सी आसान/नहीं चाहकर हम आसान रास्ते अपना लेते हैं दोस्त! और वे लोग/जो हमारे भीतर/जल-जंगल-जमीन बचाने का जज्बा देखते हैं/झारखण्डी अस्मिता और देशज संस्कृति तलाशते हैं/उन्हीं की संगति ने हमारी भाषा बिगाड़ दी/और प्यास बुझाने के लिए/पेप्सी और स्प्राइट का चस्का लगा दिया.’’(27)

आदिवासी लेखिका रोज केरकेट्टा की चिंता है कि ‘‘बीसवीं सदी के अंतिम दशकों से झारखंड में भी वैश्वीकरण की नीति को स्वीकार कर लिया गया है विरोध का स्वर भी उठा है परंतु स्वर को सुनने के लिए आधुनिक कान तैयार नहीं हैं. अतः यहां की राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक स्थिति में तेजी से परिवर्तन एवं गिरावट आ रही है….20वीं सदी में शहर और गांव के बीच की खाई चौड़ी हुई है और 21 वीं सदी में यह खाई ज्यादा चौड़ी और गहरी हो जाएगी.‘‘(28)  वे कहती हैं कि ‘‘भूमंडलीकरण स्त्रियों के हित में नही है. यह झारखंडी महिलाओं के हित में और भी नहीं है….हमें इन निरीह महिलाओं और बच्चियों के लिए सोचने और काम करने की जरूरत है.’’(29)  रोज केरकेट्टा के सरोकारों को तथ्यों से पुष्ट करते हुए आदिवासी पत्रकार हेराल्ड एस. तोपनो बताते हैं कि ‘‘आदिवासी बच्चों की मृत्युदर अचानक बढ़ गई है. कई घातक बीमारियों ने भी आदिवासियों को विलुप्त होने के कगार पर ला खड़ा किया है. चेंचु जो एक प्राचीन जनजाति है, वह जल्दी ही खत्म हो जाएगी. 1981 की जनगणना के मुताबिक चेंचु जनजाति के सिर्फ 39 सदस्य कोरापुट, गंजाम और सुंदरगढ़ जिले में थे. संबंलपुर और सरगुजा क्षेत्र में केवल 142 बिरहोर जनजाति के लोग थे. बैगा आदिवासियों की संख्या केवल 188 थी, जो कोरापुट, सुंदरगढ़ ईलाके रह रहे हैं. मनकिड़िया एक घुमंतु (नोमाड) जनजाति है, जो मयुरभंज और क्योंझर जिले में निवास करते हैं. वे बंदरों का शिकार कर जीविकोपार्जन करते हैं. इनकी जनसंख्या मात्र 200 है. कोरवा और धारा जनजातियां 1000 हैं. इन लुप्त होती जा रही जनजातियों को बचाने और उनकी जनसंख्या वृद्धि के लिए सरकार कोई भी ठोस कदम नहीं उठा रही है.‘‘(30)

मत-मतांतर 


विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) ने 1996 और 1998 के आम चुनावों के बाद उदारीकरण/निजीकरण के बारे में मतदाताओं की राय जानने के लिए एक सर्वेक्षण किया था. इस सर्वेक्षण का मुख्य उद्देश्य यह जानना था कि क्या कांग्रेस सरकार द्वारा शुरू की गयी नयी आर्थिक नीतियां चुनावी मुद्दा बन सकी हैं. इस सर्वेक्षण के नतीजे बड़े रोचक थे. इस सर्वेक्षण के बारे सीएसडीएस के प्रोफेसर संजय कुमार बताते हैं कि 1998 तक ‘‘पचास प्रतिशत से भी ज्यादा आदिवासी यह बता पाने की स्थिति में नहीं थे कि विदेशी कंपनियों को व्यापार की खुली छूट दी जानी चाहिए या नहीं. कुछ आदिवासियों में जो इस मुद्दे पर अपनी राय रखते हैं, केेवल 15 प्रतिशत इसके पक्ष में थे कि भारत में विदेशी कंपनियां खोली जानी चाहिए. दलित मतदाताओं की राय भी कुछ इसी तरह की रही. इस मुद्दे पर सबसे अधिक मतभेद ऊंची जाति के मतदाताओं में रहा. साथ ही इस नीति के सबसे बड़े समर्थक भी इसी वर्ग से रहे. अगर हम अन्य पिछड़ा वर्ग के मतदाताओं को देखें तो पाएंगे कि पचास प्रतिशत से कुछ कम लोग इस मामले में अपनी कोई राय ही नहीं रखते, साथ ही सहमत लोगों से असहमत लोगों की संख्या भी अधिक निकाली…सुधार नीतियों के प्रति असहमति भाव सबसे अधिक आदिवासी समुदाय में ही है.‘‘(31)

आम मतदातओं के बीच किए गये इस सर्वेक्षण के आंकड़ों का मिलान इन तबकों से आने वाले विद्वान लेखकों के मतों समक्ष रख कर किया जाए तो इन तबकों के सामुदायिक हितों की भी एक कामचलताऊ तस्वीर बनती है. जाहिर है आम मतदाताओं की तुलना में लेखकगण इन हितों को बेहतर समझते हैं तथा चुंकि उन पर अपने लोगों को दिशा देने की जिम्मेवारी भी है, इसलिए वे न सिर्फ उदारीकरण से हुए परिर्तनों की बारीकियों में जाते हैं बल्कि इससे होने वाले अपने सामुदायिक नफा-नुकसान की विस्तृत समालोचना भी करते हैं.

आदिवासी लेखकों के उदारीकरण से असहत मतों के समांतर दलित और पिछड़े समुदाय से आने वाले प्रमुख लेखकों का मानना है कि 1990 के दशक में जो परिवर्तन हुए – विशेषक नई आर्थिक नीति के संदर्भ में – उनसे अद्विज समाज को नुकसान ही नहीं, फायदा भी हुआ है. ऐसे लेखकों का मानना है कि उदारीकरण ने व्यक्ति स्वतंत्र्य को बढ़ावा दिया है. बंद बाजार व्यवस्था में आर्थिक गतिविधियों पर द्विज वर्चस्व बना रहता है तथा अद्विजों को अपने श्रम और व्यापारिक कौशल को अभिव्यक्त करने का अवसर ही नहीं मिलता है. इसके विपरीत निजीकरण तथा भारतीय बाजार के दरवाजे विदेशों के लिए भी खोल देेने से एक ऐसी प्रतिद्वंद्विता का दबाव पैदा होता है, जिससे अद्विज तबकों के भी लाभान्वित होने की संभावना बढ़ जाती है. मसलन, अन्य पिछड़ा वर्ग से आने वाले  प्रेमकुमार मणि उदारीकरण के विरोध को एक पक्षीय मानते हैं. अपने एक लेख में वे उस दौरान के परिदृश्य को चित्रित करते हुए बताते हैं कि उदारीकरण के साथ ही ‘‘राज्य संपोषित अथवा केन्द्रित अर्थव्यवस्था, अब बाजार केन्द्रित, मार्केट सेन्ट्रिक हो गयी थी. अचानक हुई इस उलट-पुलट ने दलित-पिछड़ों को भौंचक कर दिया. उन्हें यह लगा कि उनके सामूहिक हितों, कलेक्टिव इंटरेस्ट की धज्जियां उड़ा दी गयी है . सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम एक-एक कर उखड़ने लगे और एनडीए राज में जब व्यापक विनिवेश नीति अपनाई गयी तब ऐसा लगा कि बहुजनों का मटिया-मेट हो जायेगा.

यह वह समय था जब बहुजनों की पहली या दूसरी पीढ़ी स्कूल जा रही थी. अंग्रेजी पर इस तबके की पकड़ मजबूत नहीं थी और ज्यादा से ज्यादा एक छोटा वर्नाकुलर लिटरेट तबका बन सका था, जिसके ज्यादातर लोग सरकारी नौकरियों में थे. उदारीकरण के बाद इनके बीच निराशा की स्थिति थी क्योंकि सरकारी नौकरियां घटने लगी थीं. दलित-पिछड़ों के बीच यह बात चर्चा में थी कि सत्ता में बैठे ब्राह्मणों ने षडयंत्र किया है. आरक्षण ने सरकारी नौकरियों में उनकी भागीदारी को संकुचित किया तो उन्होंने विश्वामित्र की तरह एक अभिनव स्वतंत्र बाजार की संरचना कर डाली. यह बाजार उच्चे तबके अर्थात सवर्णों का अभयारण्य है, ऐसा प्रचारित हुआ.
ल्ेकिन क्या यह दृष्टि का केवल एक कोण ही नहीं है?’’ (32) वे मानते हैं कि ‘‘अभी संक्रमण काल है और इसकी मुश्किलें हैं. बहुजन बाजार के बीच उपभोक्ता के रूप में खड़ा है, लेकिन उपभोक्तावाद की हाय-तौबा वह नहीं मचा रहा है. वह बाजार का अध्ययन कर रहा है. उसमें घुसने की तैयारी कर रहा है. ग्लोबल इकॉनॉमी ने इंडियन इकोनॉमी के ब्राह्मणवादी चरित्र को खारिज कर एक अनुकूल स्थिति का सृजन किया है.‘‘(33)

उदारीकरण का मुखर समर्थक दलित लेखक चंद्रभान प्रसाद भी इसी प्रकर के तर्क उदारीकरण के समर्थन में रखते हुए कहते हैं कि ‘‘उदारीकरण और वैश्वीकरण या नव पूंजीवाद ही सदियों से शोषण, दमन और भेदभाव का शिकार बने दलितों की मुक्ति की राह है. भारत में 1990 से लागू हुई नवउदारवादी नीतियां जातीय विषमता को खत्म करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं.‘‘ (34) प्रसाद अपने दावे की पुष्टि के लिए इस संबंध में हुए सर्वेक्षणों का भी हवाला देते हैं. वे बताते हैं कि ‘‘अमेरिका के पेनीसिल्वानिया विश्वविद्यालय सेंटर फार एडवांस्ड स्टडीज आॅफ इंडिया के वित्तीय सहयोग से हुए सर्वेक्षण में उत्तर प्रदेश के 20000 परिवारों का सर्वे किया गया और पाया कि दलितों की स्थिति में बदलाव हुआ है. आजमगढ़ के ग्रामीण इलाकों में अब पहले की तुलना में ज्यादा दलित दूल्हे बारात में कार में बैठकर जाते हैं.

प्रसाद के मुताबिक इस परिवर्तन की वजह यह है कि अब दलितों की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है और वे बेहद गरीबी के दलदल से बाहर निकल आए हैं. अब उन्हें रोजाना जमींदारों के हाथों अपमानित भी नहीं होना पड़ता. अब उन्हें जमींदार के लिए बेगार भी नहीं करनी पड़ती. … धीर-धीरे ही सही दलितों की परंपरागत पेशों से ही जुड़े रहने की मजबूरी खत्म हो रही है.‘‘(35)

चंद्रभान जिस सर्वेक्षण का हवाला देते हैं वह आजमगढ़ के गांवों में किया गया था. जिन गांवों में यह किया गया था. उन गांवों के बारे में उनका दावा है कि ‘‘वहां एक महत्वपूर्ण परिवर्तन यह देखने को मिला कि खेती करने में सदियों से चली आ रही बैलगाड़ी का इस्तेमाल बंद हो गया है. दलितों ने खेतिहर मजदूर के तौर पर काम करना बंद कर दिया है. इसलिए किसान ट्रेक्टर खरीदकर या किराए पर लेकर अपना काम चलाते हैं. कुछ खेती करनेवाले दलित परिवारों के पास अपने ट्रैक्टर हैं. अब दलित मरे हुए जानवरों को उठाने का काम भी कम ही करते हैं. अब ऊंची जाति के लोग उनसे यह काम जबरदस्ती नहीं करवा सकते. इतना ही नहीं दलितों के खानपान में आर्थिक स्थिति सुधरने के कारण बदलाव आने लगा है. अब वे अच्छा अनाज और दाल आदि खाने में सक्षम हैं… इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि समाज में बढ़ती समृद्धि ने दलितों को भी आर्थिक रूप से सशक्त बनाया है और यह प्रक्रिया जारी है. इसमें नवउदारवाद ने अहम् भूमिका निभाई है. ..अगले पचास सालों में जाति खत्म भले ही न हो लेकिन आर्थिक गतिविधियों का प्रसार उसे बेअसर जरूर बना देगा.‘(36)

बहुजन वैचारिकी के उपरोक्त्त लेखकों के साथ-साथ दक्षिणपंथ से जुड़े रहे दलित लेखक रामशंकर कठेरिया भी यही बात मानते हैं. हालांकि उनका संगठन एक समय ‘स्वदेशी’ के प्रचार में जोर शोर से लगा था लेकिन अपनी किताब में वे कहते हैं कि ‘‘भूंडलीकरण के इस दौर में वैज्ञानिक और तकनीकी दृष्टि से जो विकास हुआ है, आधुनिकीकरण जिस प्रकार चारों ओर साफ तौर पर दिखता है, दलित उससे काफी हद तक वंचित हैं. किंतु यह भी एक वास्तविकता है कि जिस प्रकार शिक्षा-संस्थानों में विभिन्न प्रावधानों द्वारा दलितों के लिए शिक्षा का पथ प्रशस्त किया है, उससे वैश्वीकरण और आधुनिकीकरण की मुख्यधारा में दलितों की सहभागिता क्रमशः बढ़ी है. बहुत से अच्छे अध्यापक, वकील, इंजीनियर, डाॅक्टर, वैज्ञानिक दलित समुदाय से आए और उन्होंने अपने-अपने क्षेत्रों में अपना वर्चस्व स्थापित किया.‘‘ (37) हलांकि मार्क्सवाद से प्रभावित दलित-ओबीसी लेखक भी उदारीकरण की मुखालफत करते हैं. मसलन, मार्क्सवादी दलित लेखक आनंद तेलतुंबड़े अपना विरोध दर्ज करते कहते हैं कि ‘‘कुछ बुद्धिजीवियों का कहना है कि इससे दलितों की अक्षमता दूर करने में मदद मिल सकती है. हालांकि यह तर्क पूरी तरह गलत नहीं है, लेकिन यह देश में पूंजीवाद के पिछले एक सदी के अनुभवों पर आधारित नहीं है. जिस प्रकार से पूंजीवाद ने कुशलता के साथ जाति का इस्तेमाल किया है, वैश्वीकरण जो वर्तमान सूचना संचार के युग में पूंजीवाद का ही स्वरूप है, इस पर कोई सकारात्मक असर नहीं डालने वाला है.‘‘(38)

अद्विज लेखकों के बीच सभी प्रकार के मत-मतांतरों से गुजरते हुए हम पाते हैं विभिन्न विचारधाराओं से आने वाले दलित और पिछड़े समुदायों से आने वाले लेखक ‘‘दलित-बहुजन मुक्त अर्थव्यवस्था का न ज्यादा अभिनंदन कर रहे हैं और ना ही उससे ज्यादा भयभीत हैं. उन्हें महसूस हो रहा है कि ग्लोबल अर्थव्यवस्था ने देशी बनिया ब्राह्मणवादी अर्थव्यवस्था को चुनौती दी है और वे उम्मीद कर रहे हैं कि अंततः वह उसे ध्वंस्त कर देगी. वह बाजार के बीच उपभोक्ता के रूप में खड़ा है, लेकिन उपभोक्तावाद की हाय-तौबा वह नहीं मचा रहा है. वह बाजार का अध्ययन कर रहा है. उसमें घुसने की तैयारी कर रहा है.‘‘ (39) लेकिन आदिवासी लेखकों के विचार इस मामले में अलग हैं. वे यह समझते हैं कि उदारीकरण उपजे कथित विकास से उनकी संस्कृति और परंपरा ही नहीं, अपने भौतिक हितों पर कुठाराघात होगा. अद्विज तबकों द्वारा लिखे गये रचानात्मक साहित्य में भी स्वाभिक तौर पर उनके उपरोक्त विचार प्रमुखता पाते हैं.


संदर्भ

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