पीड़ाजन्य अनुभव और डा आंबेडकर का स्त्रीवाद

डा. भीम राम आंबेडकर के स्त्रीवादी सरोकारों की ओर, क़िस्त तीन
शर्मिला रेगे की किताब  'अगेंस्ट द मैडनेस ऑफ़ मनु : बी आर आम्बेडकर्स राइटिंग ऑन ब्रैहम्निकल  पैट्रीआर्की'की भूमिका का अनुवाद हम धारावाहिक प्रकाशित कर रहे हैं. मूल अंग्रेजी से अनुवाद डा. अनुपमा गुप्ता  ने  किया है.  इस किताब को स्त्रीकाल द्वारा  सावित्रीबाई  फुले  वैचारिकी  सम्मान, 2015 से  सम्मानित किया  गया  था. 

1910-1950 के बीच लिखी गई मराठी स्त्रियों की आत्म कथाओं में इस सख्यभावी विवाह के कई अलग-अलग विवरण मिलते हैं, जाति का जिक्र बहुत कम होता है और यदि होता भी है तो इस तरह जैसे यह शब्द किन्हीं और लोगों के लिये इस्तेमाल किया जाता हो, जैसे मिलों में काम करने वाली, सब्जी बेचने वाली या फिर अतीत में जन्मी स्त्रियों के लिये. इस तरह जेण्डर और आधुनिकता पर मुखर हुए लेखन ने ब्राह्मण  स्त्रियों की सह अपराधिता को वर्ग-अधिकारों और  ब्राह्मण पितृसत्ता के पीछे छुपा दिया और इन स्त्रियों को परम्परा से संघर्षरत और आधुनिकाओं के रूप में स्थापित कर दिया. गैर दलित स्त्रीवादी भी अपने वर्ग की इस विखंडित आधुनिकता से अछूते नहीं रह सके. उन्होंने आंबेडकर की जिंदगी में सख्य-भावी विवाह के अभाव को ‘पत्नी’ की बजाये‘समुदाय’ को प्राथमिकता देने से जोड़ा और इसलिये स्त्रियों  के मुद्दे को टालने का इलजाम उन पर लगा दिया गया, उन्हें पर्याप्त रूप से स्त्रीवादी न मानने की यही वजह बना ली गई.

इसके उलट,आंबेडकर  ने आधुनिकता की एक ऐसी अवधारणा दी, जिसमें नये पश्चिमी विचारों तथा भारतीय इतिहास की समता व शान्तिकारक भौतिक परम्पराओं, जैसे बौद्व धर्म, को आपस में जोड़ दिया गया. ऐसा उन्होंने जाति आधारित शोषण को रेखांकित करके, वर्ण व्यवस्था को नकार कर और जाति के खात्मे को समतावादी समाज की ओर एक मात्र रास्ते की तरह वकालत करके किया. हिन्दू आध्यात्म के केंद्रीय मूल्यों का पुनः परीक्षण करते हुए वे एक नये भारतीय ज्ञानोदय के अग्रदूत बने. जाति और जेण्डर की नई संहिता की तथा आधुनिकता के क्रांतिकारी मायनों की बात की गई. कतिपय विद्वानों ने भारत की राजनीतिक आधुनिकता के इस रचनाकार्य को कलमबद्व किाय है जिसमें आंबेडकर ने जहां आभार प्रदर्शन की भाषा का विरोध करना सिखाया, जाति की श्रेणी बद्वधता में समाहित नकारात्मक अधिकारों की पोल खोली तथा स्वाभिमान, समता व अधिकारों की नई भाषा इजाद की. उर्मिला पवार व मीनाक्षी मून के आंबेडकरी  स्त्रियों पर शोध ने जाति-विरोधी आधुनिकता के निर्माण में दलित स्त्रियों के योगदान को पुन: स्थापित किया है. हालांकि अभी हमें इस दिशा में शोध की और भी ज्यादा जरूरत है कि किस तरह सार्वजनिक/निजी अवधारणा के जेण्डरीकृत आदर्शों और व्यवहारों ने वैकिल्पक आधुनिकताओं को रचने में मदद की. इन्होंने राजनीतिक/सामाजिक, उपनिवेशी/राष्ट्रीय, भारतीय परंपरा//पश्चिमी आधुनिकता और समुदाय/देश के द्वैतों से कहीं आगे जाने की कोशिश की. उदाहरण के लिये आंबेडकरी  प्रति समुदायों में उथल-पुथल के चलते तथा राष्ट्र व जाति के बीच द्वंद के कारण वैवाहिक संबंधों और गृहस्थी के सामने क्या परिवर्तन  गये थे? या किस तरह ब्राह्मण जाति के लिये पैदा हुई चुनौतियों ने ‘कुनबे’ की अवधारणाओं से जुड़े सिद्वांतों पर सवाल उठाये, क्या थोपे गये व चुने गये रिश्तों में द्वंद पैदा हुआ? सामूहिक सरोकारों के समन्वय ने क्या ‘नवीन’ गृहस्थियों और सामाजिकता को जन्म दिया? उपनिवेशी भारत में राष्ट्रीय व जाति विरोधी आंदोलनों के नेताओं की जीवनियों व आत्मकथाओं के तुलनात्मक अध्ययन से उस प्रक्रिया को समझने में काफी मदद मिल सकती है जिसने विभिन्न सामाजिक हलकों में निजी व सार्वजनिक की भिन्न-भिन्न पहलचान की परिभाषित किया.
अकादमिक क्षेत्र में जीवनी और इतिहास के बीच संबंध धीरे-धीरे गंभीर अध्ययन का विषय बनता गया है जिसके दो केंद्र बिन्दु थे.

जहां ‘महान नेताओं’ जैसे गांधी, नेहरू, सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जीवनियों व आत्मकथाओं को गंभीरता से लिया गया, वहीं इस राष्ट्रीय कुलीन वर्ग के ध्येयों से मतभेद रखने वाले राजनीतिज्ञों को नजरअंदाज किया गया. आंबेडकर के जीवनीकार गेल आमवेट ने रेखांकित किया है कि किस तरह उनकी भिन्न जातीय पृष्ठभूमि ने उनके राजनीतिक लक्ष्यों को प्रभावित किया. ‘‘चौदहवें बच्चे को जन्म देते समय उनकी मां की असमय मृत्यु, चैदह भाई-बहनों में सिर्फ सात का बच पाना, परिवार के भरण-पोषण के लिये मजदूरी करते समय बड़े भाई की मौत, उनके स्वयं के पांच में से चार बच्चों की अकाल मृत्यु....... ये अनुभव राष्ट्रीय कुलीनों के अनुभवों से बहुत अलग थे.’’ आमवेट ने नेहरू और गांधी के राष्ट्र के लिये त्याग के चयन को उनके परिवारों के आरामदेह रहन-सहन के बरक्स रखा है. इसके विपरीत आंबेडकर  की गृहस्थी को जीविका के लिये आर्थिक संघर्ष करना पड़ा. आंबेडकर  तथा गांधी-नेहरू के जीवन में अंतर का कारण आमवेट ने जाति और अस्पृश्यता के अनुभवों को बताया है. वे तर्क देती हैंः-



आंबेडकर  ने एक भारतीय और उपनिवेशी होने के नाते कुछ भेदभाव जरूर रखा था और इसलिये वे अपनी राष्ट्रीयता को अभिव्यक्त कर पाये. लेकिन ये अनुभव उनके अछूत होने के नाते सहे गये भेदभावों की तुलना में बहुत छोटे थे.... अलग पांत में बैठने को मजबूर किया जाना, अपनी पसंद के पाठयक्रमों में अध्ययन न कर पाना, दूसरे छात्रों द्वारा प्रताड़ित किया जाना, गरिमापूर्वक रहने व कार्य करने की जगह न ढूंढ़ पाना, इन सब अनुभवों को घोर व्यक्तिगत अपमान की तरह आंका गया न कि समाज में लंबे समय से चलने आ रहे जाने समझे अपेक्षित व्यहार की तरह. इन अनुभवों नेआंबेडकर  को जीवन के हर क्षेत्र में जातिगत भेदभाव को पहचानना सिखा दिया.
और इस भेदभाव की जननी अस्पृश्यता और ब्राह्मणवादी  ताकतों ने उनके लेखन व राजनीति को नकार दिया तो क्या आश्चर्य?मध्यम तथा प्रभुत्व संपन्न वर्ग के जीवन चरित ‘उन दिनों’ और ‘इन दिनों’ के युग्म से आकार लेते हैं, जिनमें एक आदर्श अतीत का बखान है. इसके विपरीत शोषित जातियों में जीवनी लेखन का काम सिर्फ इसी कारण स्थापित रखा जा सकता है कि ‘उन दिनों’ के शोषण व अपमान को ‘इन दिनों’ के स्वाभिमान समता और अधिकारों में परिवर्तित करने का काम ज्यादा जरूरी है और तुरंत किया जाना चाहिए.

सी.बी. खैरमोड़े द्वारा मराठी में लिखी गयी आंबेडकर की जीवनी से हम जान सकते हैं कि आंबेडकर अपनी आत्मकथा अंगे्रजी में लिखना चाहते थे और साथ ही गांधी की जीवनी भी. अनुसूचित जाति फेडरेशन के राष्ट्रीय संयुक्त सचिव और सुप्रतिष्ठित  दलित मराठी लेखक शंकर राव खरात उल्लेख करते हैं कि अम्बेडकर की मृत्यु के पश्चात उनके अध्ययन कक्ष से तीन नोट बुक्स मिली थीं, जो उनकी आत्मकथा के तीन खंडों के लिखे चिन्हित की गई थीं, लेकिन शायद एक राजनीतिक समुदाय गढ़ने, प्रभुत्वशाली ब्राम्हण इतिहास के पुनर्लेखन, हिन्दू कोड बिल लिखने और उसके लिये समर्थन जुटाने की फौरी जरूरतों के चलते उनके पास अपने बारे में लिखने का वक्त ही नहीं बचा था. इसमें कोई शक नहीं कि इतिहास को समझने की  हमारी कोशिश में यह हमारे लिये एक बड़ा नुकसान है, हालांकि वृहद जीवनियों और शहिरों द्वारा रची संगीत रचनाओं से आंबेडकरी की निजी व राजनीतिक जिंदगी पर काफी प्रकाश पड़ता है.
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डा. भीमराव आंबेडकर के स्त्रीवादी सरोकारों की ओर

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‘निजी’ आधार पर डा. आंबेडकर की ‘राजनीतिक छवि’ का स्त्रीवादी (?) नकार : दूसरी क़िस्त




आंबेडकर के उस लेखन और उस भाषणों को पढ़े, जिनमें उन्होंने अपनी निजी यादों को बांटा है-चाहे वह सतारा में बचपन में भोगा अस्पृश्यता का दंश  से या बड़ौदा में महाराज के यहां काम करते हुए 'पारसी-इन' से निकाल बाहर किया जाना हो (यह 1917 में कोलम्बिया विश्वविद्यालय से लौटने के बाद हुआ) या फिर कि वह घटना हो, जिसमें चालीस गांव के अछूत समुदाय के लोग उनके लिये एक गाड़ी चालक का बंदोबस्त नहीं कर पाये और उन्हें तुरत-फुरत जोड़कर बनाये गये तांगे में एक नौसिखिया चालक से काम चलाना पड़ा. यह स्पष्ट है कि निजी अनुभव सामाजिक की व्याख्या के स्रोत नहीं होते. बजाये इसके आंबेडकर  उन प्रक्रियाओं पर ध्यान केन्द्रित करते हैं, जो अनुभवों को परिभाषित करके परिवर्तन के बारे में नये तरीके से सोचने का रास्ता खोलती हैं. अनुभव, ज्ञान और परिवर्तन के बीच संबंध की यही वजह आंबेडकरी  अवधारणा है, जिसमें राजनीतिक आंदोलनों में निजी व सार्वजनिक को गढ़े जाने के भिन्न तरीकों की जांच पड़ताल महत्वपूर्ण हो जाती है.

शुरू में आंबेडकरी  आंदोलन के समृद्व दृश्य इतिहास से दो छवियों को लेते हैं. इनमें से एक आंबेडकर  परिवार की तस्वीर है, जिसमें रमाबाई बीच में है. आंबेडकर  और उनका बेटा यशवंत रमाबाई के बगल में  बायें ओर हैं. उनकी देवरानी लक्ष्मीबाई और बेटा मुकुंद दायी ओर है, ये लोग आंबेडकर  के भाई आनंद राव की मृत्यु के बाद परिवार में ही रहते रहे. आंबेडकर  का पालतू कुत्ता रमाबाई के पैरों के पास बैठा है. दूसरी तस्वीर एक लोकप्रिय पोस्टर है, जिसमें आंबेडकर  और रमाबाई के विवाह के भव्य आयोजन की कल्पना की गई है. इसमें वे मखमल के तकिये और सोने से मढ़ी कुर्सियों पर बैठे हैं. आंबेडकर  को एक किताब पकड़े हुए दिखाया गया है. खैरमोड़े की लिखी जीवनी के जरिये हम जानते हैं कि असल में इस विवाह को रस्में बहुत ही सादा तरीके से भायकला सब्जी मंडी में पूरी की गई थीं.



पारिवारिक चित्र आंबेडकर  के पारिवारिक माहौल का एक मानवीय पहलू पेश करता है, जो उनकी असाधारण राजनीतिक व अन्य उपलब्धियों से परे है. एक ओर यह हमारे सामने उस विशिष्ट व्यक्ति के रोजमर्रा के साधारण पारिवारिक जीवन की छवि रखता है, वहीं दूसरी ओर उन छोटी-छोटी खुशियों और चुनौतियों के बारे मेें खामोश रहता है, जिनसे घर बनता या बिगड़ता है. उदाहरण के लिये आंबेडकर  के पुस्तक प्रेम की वजह से बिगड़ा हुआ घरेलू बजट या भाई बलराम का अलग घर बसा लेना. पारिवारिक हंसी-खुशी के भी कुछ पल दिखाई देते हैं  जैसे किताबों पर ज्यादा खर्चे के लिये उलाहने मिलने पर आंबेडकर  का बाजार से बहुत ज्यादा सब्जियां और मछली खरीद लाना. बेटे राजरत्न की 1926 में मृत्यु पर परिवार मेें शोक का पारावार न था. बेटे की मौत के बाद आंबेडकर  ने चिकित्सक की सलाह को जीवन मंत्र बना लिया. रमाबाई को गर्भवती होने से बचना होगा. खैरमोड़े ने तफसील में बताया है कि रमाबाई के पढ़ने-लिखने से इंकार करने और हर वर्ष पंढरपुर की तीर्थ यात्रा की इच्छा जताने पर आंबेडकर  किस तरह नाराज होते थे. सबसे मार्मिक विवरण रमाबाई की मृत्यु पर आंबेडकर  के शोक का है. सिर मुड़ाये हुए, कफनी पहने हुए आंबेडकर  जैसे रमाबाई और यशवंत के स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही पर प्श्चाताप के रूप् में सन्यास लेने चले थे.

खैरमोड़े लिखित जीवनी के खण्ड-2 के अध्यायों के शीर्षक ‘रमाबाई का संसार’ तथा ‘नया संसार’ हमें प्रेरित करते हैं कि रमाबाई द्वारा जोड़कर रखे गये कुनबे व आंबेडकरी  जनों की राजनीतिक बिरादरी द्वारा बनते जाते एक नये वृहद परिवार के बीच रिश्तों को खंगाले.इसके लिये हमें स्मृति, जीवनी, कल्पना (जिस तरह रिश्ते हमारे मनों में जीवंत होते हैं) और रिश्तेदारियों के बीच घालमेल की जांच करनी होगी. हालांकि अभी हमारा लक्ष्य उर्मिला पवार द्वारा अभिव्यक्त आंबेडकर के स्त्रीवादी योगदान को नजरअंदाज किये जाने पर विचार करना है. इसे ध्यान में रखते हुए दूसरी तस्वीर पर आते हैं जो सभी अम्बेडकरी सभाओं में बहुत लोकप्रिय पोस्टर है.

प्रचलित आंबेडकरी  संस्कृति में आंबेडकर  के निजी जीवन के बारे में कई दुविधा में डालने वाली विविध कल्पनायें शामिल हैं.  काल्पनिक वैवाहिक तस्वीर में आंबेडकर  को किताब थामे हुए आखिर क्यों दिखाया गया है? उस किताब पर सुनहरे हर्फो  में ‘भारतीय कानून’ लिखा दिखाई देता है. यह दिलचस्प है, क्योंकि यह चित्र आंबेडकर की जिंदगी का वह बहुत पहले का पल दिखा रहा है, जब उन्होंने कानूनों और संविधान लिखने की शुरूआत ही नहीं की थी. कानून की किताब उनके हाथ में दिखाया जाना क्या वैसा ही है, जैसे अक्सर मूर्तियों में उन्हें भारतीय संविधान की प्रति लिये हुए दिखाया जाता है? एक काल्पनिक वैवाहिक चित्र में कानून की पुस्तक की उपस्थिति निजी/दाम्पत्य के दायरे में कुछ दिलचस्प संभावनाओं की बात करती है. क्या यह अप्रत्यक्ष रूप् से रमाबाई का उनके लेखन मेें योगदान दिखा रही है? या यह इशारा कर रही है किआंबेडकर के रोज बढ़ते पुस्तकों के भण्डार को संभालने के लिये बड़ा घर खरीदने के लिये किस तरह रमाबाई ने अपने जेवरात बेच दिये थे? इसकी व्याख्या हम चाहे जैसे करें, लेकिन विवाह के समय एक किताब की उपस्थिति एक बुद्धिजीवी के दाम्पत्य में निजी को राजनीतिक में पृथक रखने को असंभव करार दे रही है. यह अहम है कि रमाबाई सहज और खुश दिखाई दे रही हैं, पति की गोद में रखी किताब से कतई परेशान नहीं हैं. विवाह की राजनीतिक मान्यता को दर्शाने के लिये कानून तथा वरद मुद्रा में बुद्ध को पृष्ठभूमि में दिखाने की वजह से (आंबेडकर  के बौद्ध धर्म स्वीकार करने के बहुत पहले) वास्तुविक समय और परिस्थिति से परे चले जाया गया है. यहां ध्यान देने की बात यह है कि इस लोकप्रिय पोस्टर में वह सामूहिक कल्पना दर्ज हुई है जिसमें रमाबाई को आंबेडकर  के राजनीतिक योगदानों के पीछे मुख्य भूमिका निभाते हुए देखा गया है. चाहे वह संविधान हो या फिर बौद्व धर्मान्तरण. रमाबाई का आंबेडकर  की राजनीतिक परियोजनाओं से अटूट संबंध उन पुस्तिकाओं, गीतों व कैसेट्स में भी अनुभव किया जा सकता है ,जो रमाबाई के जीवन पर आधारित है और हर वर्ष निर्मित व वितरित की जाती है.


इन गीतों में रमाबाई को सभी दलितों की मां के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, आंबेडकर  के चरित्र व राजनीति में उनका ‘अप्रत्यक्ष’ योगदान याद किया जाता है, उनके जीवन के महत्वपूर्ण पड़ावों का वर्णन होता है, उन्हें अनोखा और असाधारण माना जाता है और इन पहलुओं को युवा दलित स्त्रियों के लिये एक आदर्श तथा प्रेरणास्रोत के रूप में प्रस्तुत किया जाता है. रमाबाई की मृत्यु के तेरह वर्ष पश्चात 1948 में आंबेडकर ने दूसरा विवाह किया. सविताबाई/ माई साहेब/शारदा कबीर एक ब्राह्मण  चिकित्सक थी और कुछ (हालांकि संख्या में कम) पुस्तिकायें व गीत उन पर भी बनाये गये हैं. लेकिन अधिकांश ऐसी रचनाओं में उनकी निंदा विश्वासघाती कह कर गई है. कुछ में तो उन्हें हत्यारिन कहा गया है.2003 में उनकी मृत्यु पर आंबेडकर  के जीवन और मृत्यु में उनकी भूमिका पर एक तर्क संगत बहस की कोशिश की गई थी.
क्रमशः 

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