बलात्कार-बलात्कार में फर्क होता है साहेब !

पूजा सिंह
पत्रकार. पिछले १० वर्षों में तहलका , शुक्रवार, आई ए एन एस में पत्रकारिता . संपर्क :aboutpooja@gmail.com
महमूद फारूकी को बलात्कार के मामले में हुई सजा कई मायनों में ऐतिहासिक है. यह पहला मौका है जब देश में किसी को ओरल के लिए बलात्कार का दंड मिला है. लेकिन इस एक घटना से कई अन्य सच सामने आये हैं. फिल्म पीपली लाइव के सह-निर्देशक महमूद फारूकी को पिछले दिनों एक अमेरिकी छात्रा के साथ बलात्कार करने के इल्जाम में सात वर्ष कैद की सजा सुनायी गयी. यह मामला कई मायनों में ऐतिहासिक रहा. पहली बात यह कि देश में यह पहला मामला था जब ओरल सेक्स को बलात्कार मानकर सजा सुनायी गयी. दूसरी बात, यह उन अंगुलियों पर गिने जा सकने वाले मामलों में से एक है जहां देश के उस उच्च वर्ग के किसी व्यक्ति को बलात्कार के आरोप में सजा हुई. यह वह वर्ग है जो अन्यथा अपने आप को देश की कानून व्यवस्था से परे मानकर चलता है.

कुछ वर्ष पूर्व वरिष्ठ पत्रकार तरुण तेजपाल द्वारा अपनी एक कनिष्ठ पत्रकार के साथ डिजिटल रेप का मामला चर्चा में आया था जिसकी सुनवायी अभी जारी है. महत्त्वपूर्ण बात यह है कि ये दोनों ही मामले बलात्कार कानून में बदलाव के बाद के हैं. शायद इसके पहले इन्हें पूरी तरह बलात्कार माना ही नहीं जाता. दरअसल दिसंबर 2012 के निर्भया सामूहिक बलात्कार कांड के बाद वर्ष 2013 में बलात्कार संबंधी कानून में बदलाव लाया गया. पहली बार कानून ने यह माना कि स्त्री के संपूर्ण शरीर पर पूरी तरह उसका अधिकार है और उसका किसी भी प्रकार अतिक्रमण करना उसके साथ जबरदस्ती माना जायेगा. हमारे देश में इससे पहले बलात्कार की जो परिभाषा थी उसके तहत केवल वजाइनल रेप को ही मान्यता थी. यानी बलात्कार सिद्ध होने के लिए यह आवश्यक था कि जबरन संभोग किया गया हो.

फारूकी मामले में पीडि़ता की अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर कहती हैं कि इस मामले में फारूकी ने पीडि़ता के साथ जबरन ओरल सेक्स किया. यानी 2013 के पहले की स्थिति में यह बलात्कार नहीं था. विडंबना है कि ऐसी घटनायें कानून में परिभाषित ही नहीं थीं. वहीं तरुण तेजपाल पर लगे आरोप की बात करें तो डिजिटल रेप भी पहले हमारे कानून में अपरिभाषित था. इस मामले में पीडि़ता का आरोप है कि तेजपाल ने उसके निजी अंगों पर अपनी अंगुलियों से हमला किया. नये कानून के तहत इन दोनों तरह की घटनाओं को बलात्कार माना गया है और इसमें उतनी ही सजा होती है जो आमतौर पर फोर्स्ड इंटरकोर्स के मामलों में होती है.  यह बहुत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि देश के विभिन्न हिस्सों में बहुत बड़ी संख्या में ऐसे मामले होते हैं जिन्हें इस कदर गंभीरता से नहीं लिया जाता.

मुझे याद है अपने गांव के पड़ोस के एक परिवार का किस्सा जहां एक सात-आठ साल की बच्ची ने करीब 60 साल के बुजुर्ग पड़ोसी के बारे में अपनी मां को रोते हुए बताया था कि वह जबरदस्ती अपना लिंग उसके हाथ में पकड़ा रहे थे. यह मामला गांव में थोड़ी चीख चिल्लाहट और मारपीट की धमकियों के साथ खत्म हो गया. थानेदार ने बुजुर्ग को सार्वजनिक रूप से दो थप्पड़ मारकर बच्ची से दूर रहने की ताकीद कर दी. आज अगर कोई व्यक्ति ऐसा करता है तो शायद वह बलात्कार की सजा पायेगा. वृंदा ग्रोवर कहती हैं कि उनकी जानकारी में यह देश में पहला मामला है जहां ओरल सेक्स के लिए किसी को बलात्कार की सजा हुई है. वह कहती हैं कि ऐसे अपराध समाज में हमेशा से मौजूद हैं लेकिन अपरिभाषित होने के कारण इनको हल्का अपराध माना जाता था.


फारूकी मामले में पीड़िता की एक बात काबिलेगौर है. उसने अपने बयान में कहा कि वह बलात्कार के दौरान प्रतिरोध इसलिए नहीं कर पायी क्योंकि उसे निर्भया कांड के बाद बनी डाक्युमेंटरी याद आ गयी, जिसमें निर्भया के अपराधी ने कहा था कि अगर वह प्रतिरोध नहीं करती तो उसे जिंदा छोड़ देते. सोशल मीडिया को अगर बेंचमार्क मानें तो फारूकी प्रकरण एक स्पष्ट रेखा खींचता है. बलात्कार के चुनिंदा मामलों पर अन्यथा उबल पड़ने वाला, फेसबुक पर स्टेटस की बाढ़ ला देने वाला मध्य वर्ग इस बार अन्यथा खामोश नजर आया. पालिटिकली करेक्ट होने की कोशिश लोगों ने इस मामले की अनदेखी की. बहुत कम लोग होंगे जिन्होंने सोशल मीडिया पर इस विषय पर अपनी राय रखी हो. गनीमत तो यह है कि किसी ने फारूकी के बचाव का प्रयास नहीं किया.

मथुरा कांड : जब न्याय शर्मिंदा हुआ

मार्च 1972 में महाराष्ट के चंद्रपुर जिले में एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना में मथुरा नामक एक 14 वर्षीय किशोरी के साथ दो पुलिसकर्मियों ने थाने में बलात्कार किया. देश की सबसे बड़ी अदालत ने यह कहकर उनको रिहा कर दिया कि मथुरा सेक्स संबंधों की आदी थी. चूंकि उसके शरीर पर चोट के कोई निशान नहीं थे इसलिए बहुत संभव है उसने ही दोनों पुलिसवालों को यौन संबंध बनाने के लिए उकसाया हो. सन 1974 में आये इस फैसले पर उस वक्त ध्यान नहीं दिया गया. सितंबर 1979 में दिल्ली विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों उपेंद्र बख्शी, लोकिता सरकार व रघुनाथ केलकर तथा पुणे निवासी वसुधा धगंवर ने सुप्रीम कोर्ट को एक खुला खत लिखा. इसके बाद फैसले की समीक्षा करने की मांग शुरू हो गयी. इसकी मीडिया कवरेज के बाद जबरदस्त आक्रोश पैदा हुआ.

इसके बाद अंतत: कानून में परिवर्तन किया गया. एविडेंस एक्ट में परिवर्तन करके यह प्रावधान किया गया कि अगर पीड़िता कहती है कि उसने यौन संबंध की सहमति नहीं दी है तो अदालत द्वारा इस बात को माना जाना चाहिये. इसके अलावा बलात्कार कानूनों में संशोधन कर हिरासत में बलात्कार को परिभाषित किया गया, इसे दंडनीय बनाया गया व दोषमुक्ति सिद्ध करने का दायित्व आरोप लगाने वाले के बजाय आरोपी पर डज्ञल दिया गया. इसके अलावा पीड़ित की पहचान जाहिर न करने, कैमरे के सामने सुनवायी तथा कड़े दंड का प्रावधान भी मथुरा कांड के बाद ही किया गया.


निर्भया कांड के बाद हुए बदलाव

दिल्ली में हुए इस भयंकर कांड के बाद तत्काल एक न्यायिक जांच समिति गठित की गयी. आम जनता ने उसके समक्ष कानून में बदलाव लाने के 80,000 से अधिक सुझाव भेजे. समिति ने अपनी जांच में महिला अपराधों के लिए पुलस व प्रशासन को जिम्मेदार बताया.इसके बाद कानून में कुछ अहम बदलाव किये गये. मसलन बलात्कार के मामलों की सुनवायी के लिए छह नई अदालतें. ईव टीजिंग, एसिड अटैक, पीछा करने, ताक झांक करने आदि को लेकर कड़े कानून बनाये गये. जुवेनाइल कानून में बदलाव करके जघन्य अपराधों के मामले में 16 साल की उम्र के किशोर को वयस्क की तरह सजा देने की बात कही गयी.
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