यौन हिंसा और न्याय की मर्दवादी भाषा : पहली क़िस्त

अरविंद जैन
स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब 'औरत होने की सजा' हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com
 न्याधाशीशों ने फिर से अपनी मर्दवादी जुबान खोली. खबर है कि गुजरात के जज महोदय ने गुलबर्ग सोसायटी में हुए हत्याकांड, आगजनी और बलात्कार पर अपना न्याय देते हुए कहा कि 'आगजनी और हत्याकांड के बीच बलात्कार नहीं हो सकता है.' उन्हीं जज साहब ने अभियुक्तों से यह भी कहा कि हम आपके चेहरे पर मुस्कान देखना चाहते हैं.'जजसाहबों का मर्दवादी मिजाज न्याय नहीं है, ऐसे अनेक निर्णय हैं, जिनमें वे बलात्कार पर निर्णय देते हुए खासे कवित्वपूर्ण हो जाते रहे हैं. इसके पहले भी भंवरी देवी बलात्कार काण्ड में निर्णय देते हुए जज साहब ने कहा था कि ' जो पुरुष  किसी नीची जाति की महिला का जूठा नहीं खा सकता  वह उसका बलात्कार कैसे कर सकता है?' यह विचित्र देश है. कल ही नायक का तमगा लिए सलमान खान साहब ने भी बलात्कार के दर्द की तुलना अपने काम के थकान से पैदा दर्द से करते पाये गये. यह एक मानसिकता है. न्यायालयों की इसी सोच और भाषा पर स्त्रीवादी ऐडवोकेट अरविंद जैन ने काफी विस्तार से लिखा था कभी, काफी चर्चित लेख. स्त्रीकाल के पाठकों के लिए उसे धारवाहिक प्रकाशित कर रहे हैं हम.

“The Ideology of rape is aided by more than a system of linient laws that serve to protect offenders and is abetted by more than the fiat of total male control over the lawful use of power. The ideology of rape is fueled by cultural, values that are perpetuated at every level of our society, and nothing less than a frontal attack is needed to repel this cultural attack.”
(Susan Brownmiller in Against Our will : Men,
Women and Rape, Page 389)
“Viewing of violent pornography results in higher rates of aggression against women by male subjects.”
(Diana E.H. Russell in pornography : Women
violence and Civil liberties, page 374)
“There are certainly more rapes committed in marriage than out side.” (Havelock Ellis)
  

बलात्कार के (सरकारी) आँकड़े पूर्ण रूप से अविश्वसनीय हैं क्योंकि बलात्कार की सभी दुर्घटनाएँ आँकड़ों पर पहुँचती ही नहीं. फिर भी जो आँकड़े उपलब्ध हैं, उनके आधार पर कहा जा सकता है कि इस प्रकार की दुर्घटनाएँ निरन्तर बढ़ रही हैं. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट (1996) के अनुसार, देश भर में 1996 में 14,849 बलात्कार हुए, जबकि 1990 में यह संख्या 10,068 थी. यानी 1990 के मुकाबले 1996 में 47.5 प्रतिशत अधिक बलात्कार हुए. 1995 में बलात्कार के अपराधों की संख्या 13,774 थी, इसलिए पिछले वर्ष से 1996 में सिर्फ 7.8 प्रतिशत अधिक अपराध हुए. कहा यह भी जा सकता है कि अपराधों की 'रिपोर्टिंग बढ़ रही है. कुछ संवेदनशाली विद्वानों का कहना है, ''अपराधों की बढ़ोतरी को जनसंख्या के अनुपात में देखें तो अपराध कहाँ बढ़ रहे हैं ?  एक और तर्क (कुतर्क) यह भी दिया जाता है कि कुल अपराधों की तुलना में स्त्री के प्रति अपराध का प्रतिशत तो सिर्फ  6.8 ही है.

आँकड़ों का आतंक

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा जारी 1996 की रिपोर्ट के पृष्ठ संख्या 88 पर तालिका 7.2 में बलात्कार के आँकड़े कहते हैं कि 1994 में 12,351, 1995 में 13,774 और 1996 में 14,849 बलात्कार हुए. लेकिन इसी रिपोर्ट के पृष्ठ संख्या 90 पर तालिका 7.4 कहती है कि 1994 में 13,218, 1995 में 13,774 और 1996 में 14,649 बलात्कार के मामले दर्ज किए गए. एक तालिका के अनुसार 1994 में 12,351 बलात्कार हुए और दूसरी के अनुसार 13,218 यानी 867 बलात्कार के मामलों का घपला है. किसे सही माना जाए और किसे गलत ? राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की 1994 वाली रिपोर्ट के पृष्ठ संख्या 212 पर 1994 में बलात्कार के अपराध का आँकड़ा 12,351 ही है. 1995 की रिपोर्ट के पृष्ठ संख्या 222 में भी 1994 में हुए बलात्कारों की संख्या 12,351 ही दिखाई गई है. लेकिन क्रमश: पृष्ठ 216 और 226 में बनाई तालिका में यह संख्या 13,218 प्रकाशित हुई है. 1994 की रिपोर्ट (पृष्ठ 212) के अनुसार 1993 में 11,242, 1992 में 11,112 बलात्कार के केस दर्ज हुए लेकिन इसी रिपोर्ट के पृष्ठ 216 पर बनी तालिका के अनुसार 1993 में 12,223 और 1992 में 11,734 बलात्कार हुए। मतलब यह है कि 1993 में 981 और 1992 में 622 बलात्कार के मामलों का घपला है. 1992 से 1996 तक कुल 2,493 बलात्कार के मामलों का यह अन्तर किसी की भी समझ से बाहर का मामला है. आँकड़ों के इस 'घपले पर राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो ही स्थिति स्पष्ट कर सकता है. तीन सालों में आँकड़े क्या 'भूलवश छपते रहे हैं और छपते रहेंगे ? यह मात्र एक उदाहरण है, घपले अभी और भी हैं. शेष फिर कभी.

 यौन हिंसा की शिकार युवा स्त्री

1996 में हुए 14,849 बलात्कारों में से 8,281 (55.76 प्रतिशत) 16 से 30 वर्ष की महिलाओं के साथ और 3,475 (23.4 प्रतिशत) 10 से 16 वर्ष की किशोरियों के साथ हुए। दोनों को जमा करें तो मालूम होगा कि 79.16 प्रतिशत बलात्कार की शिकार स्त्रियाँ 10 से 30 वर्ष की थी.  30 वर्ष से अधिक उम्र की स्त्रियों के साथ बलात्कार के अपराध 608 (4.1 प्रतिशत) हैं. संक्षेप में, लगभग 80 प्रतिशत बलात्कार 10 से 30 वर्ष की महिलाओं के साथ और करीब 20 प्रतिशत बलात्कार 10 वर्ष से कम उम्र की बच्चियों और 30 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं के साथ हुए. स्पष्ट है कि युवा स्त्रियों के साथ बलात्कार की सम्भावना सबसे अधिक रहती है.

गत वर्ष की तुलना में 

हालाँकि प्रतिशत की भाषा में 10 वर्ष से कम उम्र की बच्चियों के साथ हुए बलात्कार लगभग 4 प्रतिशत ही हैं, लेकिन यह प्रतिशत लगातार बढ़ रहा है. इसलिए गम्भीर चिन्ता का विषय है.बच्चियों के बढ़ते बलात्कार को अधिक गम्भीर कहने का मतलब यह नहीं है कि शेष बलात्कारों को गम्भीर अपराध न माना जाए. 1996 में 10 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों के साथ हुए बलात्कार का आँकड़ा 1990 से 394 से बढक़र 608 हो गया है. 1990 के मुकाबले 1996 में 54.3 प्रतिशत अधिक बलात्कार हुए मगर 1995 में हुए 747 बलात्कारों की तुलना में 18.6 प्रतिशत घट गए हैं. 1991 में आश्चर्यजनक रूप से यह संख्या पिछले वर्ष की अपेक्षा 47.12 प्रतिशत बढक़र 1,099 हो गई थी. इन दोनों ही सालों में हुई आश्चर्यजनक बढ़ोतरी या घटोतरी विश्वास योग्य नहीं लग रही. 1996 के आँकड़ों की तुलना अगर 1991 के आँकड़ों से करें तो सारे प्रतिशत उलट-पुलट हो जाते है. 10 वर्ष से कम उम्र की बच्चियों से बलात्कार में 44.3 प्रतिशत की कमी और 30 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं से बलात्कार में 88 प्रतिशत वृद्धि यह असम्भव नहीं मगर...विश्वास योग्य भी नहीं. इसके विपरीत, 1996 में 30 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं के साथ 2,485 बलात्कार हुए। 1995 में यह संख्या 1955 है.

 कहने का अभिप्राय यह है कि 1996 में 1,995 की तुलना में बलात्कार 27.1 प्रतिशत अधिक हुए हैं. 1991 में 1990 की तुलना में जहाँ 10 वर्ष से कम उम्र की बच्चियों के साथ बलात्कार 178.9 प्रतिशत बढ़ गया था, वहीं 30 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं के साथ 14.4 प्रतिशत और 16 से 30 वर्ष की महिलाओं के साथ 10.8 प्रतिशत घट गया था. 1992 में अचानक 10 वर्ष की उम्र की बच्चियों से बलात्कार 1,099 से घटकर 532 (51.5 प्रतिशत कम) हो गया लेकिन 16.30 वर्ष के वर्ग में 30 प्रतिशत और 30 वर्ष से अधिक वर्ग में 22.8 यानी 52.8 प्रतिशत बढ़ गया. अगर ये आँकड़े सचमुच विश्वनीय हैं तो इसका विस्तार से विवेचन आवश्यक है कि इन वर्षों में ऐसा होने के पीछे कौन से कारण या स्थितियाँ सक्रिय थी. कहीं यह आँकड़ों की उलटफेर ही तो नहीं है ? 1991 के आँकड़ों में कहीं कुछ गम्भीर गड़बड़ है। इसके आधार पर तो नतीजे एकदम काल्पनिक लगते हैं. क्या नहीं ?

सात सालों में हिंसा

खैर...1990 से 1996 तक हुए बलात्कार के अपराधों को देखें तो सात सालों में 86,291 बलात्कार हुए. 4,748 (5.5 प्रतिशत) 10 वर्ष से कम उम्र की बच्चियों के साथ, 20,114 (23.3 प्रतिशत) 10 से 16 वर्ष की किशोरियों के साथ, 48,918 (56.7 प्रतिशत) 16 से 30 वर्ष की महिलाओं के साथ और 12,511 (14.5 प्रतिशत) 30 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं के साथ हुए. साफ दिखाई देता है कि 16 से 30 वर्ष की युवा स्त्रियाँ सबसे अधिक बलात्कार की शिकार बनी.  80 प्रतिशत बलात्कार के मामलों में महिलाओं की उम्र 10 से 30 साल है. 22.8 प्रतिशत बलात्कार के मामले सिर्फ 16 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों के साथ हुए. उल्लेखनीय है कि 16 वर्ष से कम उम्र की लडक़ी से सहवास बलात्कार ही माना जाता है, भले ही सहमति हो.

प्रतिशत की भाषा

हालाँकि बलात्कार की शिकार अधिकांश महिलाओं की उम्र 16 से 30 साल के बीच रहती है लेकिन 1990 की तुलना में 1996 में इस वर्ग में सबसे कम 37.4 प्रतिशत बढ़ोतरी हुई है. सबसे अधिक अपराध (65.1 प्रतिशत) 10 से 16 वर्ष की किशोरियों के साथ बढ़े. 30 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं के साथ 6.12 प्रतिशत और 10 वर्ष से कम उम्र की बच्चियों के साथ 54.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. मतलब यह है बलात्कार के मामलों में 16-30 वर्ष की स्त्रियों की संख्या सबसे अधिक रही है, परन्तु 1990 की अपेक्षा 1996 में 10-16 वर्ष की किशोरियों के साथ हुए बलात्कारों का प्रतिशत सबसे अधिक बढ़ा है. कहा जा सकता है कि इस वर्ग की लड़कियों के साथ बलात्कार की आपराधिक प्रवृत्ति बढ़ रही है. जहाँ कुल अपराधों का 1996 में प्रतिशत (1990 की तुलना में) 47.5 प्रतिशत बढ़ा है, वहाँ 10-16 वर्ष की किशोरियों के साथ बलात्कार की दुर्घटनाएँ 65.1 प्रतिशत अधिक हो गई हैं.
1990 से 1996 तक हुए बलात्कारों में 71 प्रतिशत बलात्कार 16 साल से अधिक उम्र की स्त्रियों के साथ और 29 प्रतिशत बलात्कार 16 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों के साथ हुए हैं. 1990 में यही प्रतिशत क्रमश: 75 प्रतिशत और 25 प्रतिशत के लगभग था. अभिप्राय यह है कि पिछले सात सालों में जहाँ 4 प्रतिशत बलात्कार 16 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों के साथ बढ़े हैं, वहीं 16 वर्ष से अधिक उम्र की स्त्रियों के साथ हुए बलात्कारों में 4 प्रतिशत की कमी हुई है. यह 4 प्रतिशत का परिवर्तन बेहद महत्त्वपूर्ण बदलाव की ओर संकेत देता है। इस बदलाव के सामाजिक-सांस्कृतिक कारणों को रेखांकित करने के लिए अपराध और संचार माध्यमों की भूमिका को भी देखना पड़ेगा.

रिपोर्ट के अनुसार देश के 23 महानगरों में वर्ष 1996 के दौरान 545 बलात्कार 16 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों के साथ, और 456 केस 16 से 30 वर्ष की स्त्रियों के साथ और 95 मामले 30 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं के साथ हुए. शहरी क्षेत्रों में 16 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों से बलात्कार अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा लगभग दो गुना है. 16 वर्ष से बड़ी उम्र की स्त्रियाँ शहरी क्षेत्रों में अन्य की तुलना में 20 प्रतिशत कम बलात्कार की शिकार हुई हैं. 1996 में हुए 14,849 बलात्कार के मामलों में से मध्य प्रदेश में 3,265 (22 प्रतिशत), उत्तर प्रदेश में 1,854 (12.5 प्रतिशत), बिहार में 1,453 (9.8 प्रतिशत), महाराष्ट्र में 1,444 (9.7 प्रतिशत), राजस्थान में 1,162 (7.8 प्रतिशत) और पश्चिम बंगाल में 855 (5.8) प्रतिशत हुए। दिल्ली में 484 (3.3 प्रतिशत) बलात्कार के केस दर्ज किए गए. जनसंख्या के अनुसार अपराध दर, सबसे अधिक मध्य प्रदेश (4.4 प्रतिशत) और दिल्ली (4.37 प्रतिशत) में रही. 1994 की अपेक्षा 1996 में जहाँ उपरोक्त राज्यों में (बिहार और दिल्ली के अलावा) बलात्कार के अपराधों में कमी आई है, वहाँ बिहार और दिल्ली के साथ-साथ केरल, हरियाणा, उड़ीसा, पंजाब, सिक्किम और त्रिपुरा में भी बलात्कार के अपराधों में बढ़ोतरी हुई है. इसके आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक कारणों की जाँच-पड़ताल अनिवार्य है.

दिल्ली और हरियाणा में भारतीय जनता पार्टी का शासन रहा है और बिहार में लालू यादव का. बिहार में 1994 में जहाँ 823 (6.7 प्रतिशत) बलात्कार रिकॉर्ड हुए थे, वहाँ 1996 में यह संख्या बढक़र 1,453 (9.8 प्रतिशत) पर पहुँच गई है. दिल्ली में 1994 में 261 (2.1 प्रतिशत) से बढक़र 1996 में 484 (3.3 प्रतिशत) वृद्धि हुई है. आश्चर्यजनक रूप से हरियाणा में भी 1994 में 198 बलात्कार का आँकड़ा बढक़र 336 पर पहुँच गया.
इसी सन्दर्भ में थोड़ा और पीछे मुडक़र देखने पर पता चलता है कि जहाँ 1976 में 3,893 बलात्कार के मामले दर्ज हुए थे, वहाँ 1978 में यह संख्या बढक़र 4,559, 1980 में 5023, 1984 में 6,203, 1985 में 6,356 और 1988 में 6,888 हो गई थी. अगर 1976को आधार वर्ष मानें तो 1996 में 282 प्रतिशत बलात्कार हुए हैं. दिल्ली में 1985 में 88, 1986 में 97, 1987 में 104, 1988 में 127, 1989 में 161, 1990 में 196, 1991 में 214 बलात्कार बढक़र 1996 में 419 हो गए। 1985 की अपेक्षा 1996 में यह भयावह वृद्धि 376 प्रतिशत बैठती है.

सबसे आगे कौन?

16 वर्ष से कम उम्र की बच्चियों से बलात्कार के मामले में भी मध्य प्रदेश (873), उत्तर प्रदेश (535), महाराष्ट्र (453), आन्ध्र प्रदेश (269), दिल्ली (269), पश्चिम बंगाल (251) और बिहार (217) सबसे आगे रहे। उपरोक्त राज्यों में ही कुल बलात्कारों का प्रतिशत 70.7 बैठता है। 30 वर्ष से कम उम्र की महिलाओं के साथ मध्य प्रदेश (95), महाराष्ट्र (60), दिल्ली (67), उत्तर प्रदेश (49), आन्ध्र प्रदेश (48) और पंजाब में (46) बलात्कार दर्ज हुए. 16 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों के लिए सबसे अधिक खतरनाक शहर इस देश की राजधानी दिल्ली ही है, जहाँ 1996 में 232 बलात्कार हुए। इसके बाद बम्बई में (97), बंगलौर में (24), भोपाल में (19) और पुणे में (24) मामले रिकॉर्ड किए गए. उल्लेखनीय है कि अधिकांश महानगरों में 98 प्रतिशत बलात्कार 30 वर्ष तक की महिलाओं के साथ और 2 प्रतिशत इससे बड़ी उम्र की स्त्रियों के साथ हुए. कुछ महानगरों में, जैसे—हैदराबाद, लुधियाना, मद्रास, मदुरै, सूरत, बड़ौदा में 100 प्रतिशत बलात्कार सिर्फ 30 वर्ष से कम उम्र की स्त्रियों के साथ ही हुए। बलात्कार ही नहीं, स्त्री के प्रति हिंसा और अपराध में भी दिल्ली सबसे आगे है. यहाँ अपराध 23.5 प्रतिशत है जबकि महाराष्ट्र में 14.3, मध्य प्रदेश में 12.9 और उत्तर प्रदेश में 11.8 प्रतिशत है.

अनुसूचित जाति की महिलाओं के साथ 1994 में 992, 1995 में 873 और 1996 में 949 बलात्कार हुए. इनमें से 34 प्रतिशत बलात्कार अकेले उत्तर प्रदेश में हुए. अनुसूचित जनजाति की महिलाओं के साथ 1996 में 385, 1995 में 369 और 1996 में 314 बलात्कार की दुर्घटनाएँ हुईं, जिनमें से करीब 53 प्रतिशत अकेले मध्य प्रदेश में हुई. हालाँकि हर साल यह संख्या घट रही है, लेकिन स्थिति चिन्ताजनक है. अनुसूचित जाति पर हुए अपराधों में उत्तर प्रदेश (35 प्रतिशत), राजस्थान (21 प्रतिशत) और मध्य प्रदेश (13 प्रतिशत) सबसे प्रमुख हैं। इन तीनों प्रदेशों का कुल हिस्सा ही 69 प्रतिशत बैठता है. अनुसूचित जनजातियों के विरुद्ध अपराधों में मध्य प्रदेश (29.4 प्रतिशत), राजस्थान (28 प्रतिशत), गुजरात (7.4 प्रतिशत), महाराष्ट्र (6.8 प्रतिशत) और उत्तर प्रदेश (6.7 प्रतिशत) प्रमुख हैं. जनजातियों के विरुद्ध अपराधों का करीब 78 प्रतिशत अपराध इन पाँच राज्यों में हो रहा है. राजस्थान में जनजातियों व अनुसूचित जातियों के प्रति अपराध समान रूप से जारी है. बलात्कारियों का वर्ग, वर्ण और जाति के आधार पर विवेचन उपलब्ध नहीं है.


न्याय में देर या अँधेर?

ब्यूरो रिपोर्ट के अनुसार 1995-96 में पुलिस के पास जाँच के लिए क्रमश: 18,914 और 19,963 बलात्कार के मामले आए. इनमें से सिर्फ 72-73 प्रतिशत मामलों में जाँच-पड़ताल होने के बाद सिर्फ 62-63 प्रतिशत मामले लटके पड़े रहे. दूसरी तरफ देश-भर में 1995 में 47,084 और 1996 में 51,734 बलात्कार केस सुनवाई के लिए थे. इनमें से केवल 16-17 प्रतिशत की सुनवाई हो पाई, शेष 83 प्रतिशत मामले अधर में लटके रहे. 1995 में जहाँ 5 प्रतिशत अपराधियों को सजा हुई, वहाँ 1996 में यह सजा घटकर 4.5 प्रतिशत ही रह गई. 1996 में अन्त तक बलात्कार के 43,016, अपहरण के 36,470 दहेज हत्या के 14,133, छेड़छाड़ के 72,539, यौन उत्पीडऩ के 8,656, पति व सम्बन्धियों द्वारा क्रूरता के 83,195, वेश्यावृत्ति के 4,799, दहेज के 6,175, अश्लील प्रदर्शन के 500 और सती के 3 मुकदमों का फैसला होना बाकी था. अदालतों ने 1995-96 में वेश्यावृत्ति के 60-61 प्रतिशत मामलों का फैसला सुनाते हुए करीब 53-54 प्रतिशत अपराधियों को सजा सुनाई. कहने की आवश्यकता नहीं है कि इनमें से अधिकांश अपराधी स्वयं वेश्या (स्त्री) ही रही होंगी. सती के तीनों मुकदमों में कोई फैसला नहीं हो पाया. अदालतों में सालों की देरी और कानूनी चोर दरवाजों से अधिकांश अपराधियों के साफ बच निकल जाने का परिणाम है कि स्त्री के प्रति यौन हिंसा लगातार बढ़ रही है.

घर या वधस्थल

उपरोक्त आँकड़ों के विवेचन, विश्लेषण और अध्ययन के आधार पर नि:सन्देह यह स्पष्ट होता है कि 16 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों के साथ यौन हिंसा के अपराध लगातार बढ़ रहे हैं विशेषकर महानगरों में, अधिकांश बलात्कारी नजदीकी रिश्तेदार, पड़ोसी, दोस्त या परिचित होता है. पिता, भाई, चाचा, ताऊ, मामा वगैरह द्वारा भी बलात्कारों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही है. कम उम्र की बच्चियों की प्राय: बलात्कार के बाद हत्या कर दी जाती है या आघात से मृत्यु हो जाती है. कुछ मामलों में बलात्कार की शिकार लडक़ी सामाजिक अपमान और लज्जा के कारण आत्महत्या कर लेती है.


मीडिया की भूमिका

यह मात्र संयोग नहीं है कि जैसे-जैसे अश्लील और यौन साहित्य, फिल्म, वीडियो वगैरह बढ़े हैं, वैसे-वैसे यौन अपराध बढ़ते गए हैं. बड़ी उम्र की लड़कियों या स्त्रियों के विरोध-प्रतिरोध और शिकायत से बचने के लिए 16 वर्ष से कम उम्र की अबोध बच्चियों से बलात्कार के अपराध बढ़े हैं. इन्हें बहलाना, फुसलाना या काबू करना
अपेक्षाकृत आसान है. दूसरा कारण अक्षत योनि की आदिम आकांक्षा भी है और विक्षिप्त यौन कुंठाएँ भी. इसके अलावा किशोर उम्र के लडक़ों द्वारा कम उम्र की बच्चियों के साथ यौन अपराध की प्रवृत्ति भी लगातार बढ़ रही है. नाबालिग किशोर युवकों द्वारा कम उम्र की बच्चियों से दुष्क र्म (बलात्कार) भी हर साल बढ़ता जा रहा है. संचार माध्यमों में बढ़ा 'सेक्स और हिंसा का प्रदर्शन, समाज में भी यौन अपराधों के बढऩे में 'उत्प्रेरक का काम करता है. जैसे-जैसे नारी चेतना और मुक्ति के स्वर पहले से अधिक मुखर होकर सामने आए हैं वैसे-वैसे स्त्री के विरुद्ध हिंसा (यौन हिंसा) बढ़ी है. जितना विरोध और प्रतिरोध बढ़ रहा है, उससे ज्यादा यौन अपराध बढ़ रहे हैं.

यौन हिंसा का मुख्य कारण काम-पिपासा शान्त करना या मानसिक विक्षिप्तता कम, बदला लेना अधिक है. अपराधियों को सुधारवादी-उदारवादी न्याय नीति के अन्तर्गत कम सजा देने सेे 'न्याय का लक्ष्य भले ही पूरा हो जाए मगर इस प्रकार के अपराधों को बढ़ावा ही मिलता है. दंड-भय ही न रहे तो अपराध कैसे कम (समाप्त) होंगे !कानून व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन के साथ-साथ जरूरी है सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक सोच में बदलाव. बलात्कारियों का मृत्युदंड की 'हवाई घोषणाओं से क्या होना है? यौन हिंसा के ये आँकड़े और आँकड़ों का तुलनात्मक जमा-घटा सिर्फ संकेत मात्र है. स्त्री के विरुद्ध पुरुष द्वारा की जा रही यौन हिंसा की वास्तविक स्थिति (सरकारी) आँकड़ों से कहीं अधिक विस्फोटक, भयावह और खतरनाक है.
क्रमशः 
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