डा. भीमराव आंबेडकर के स्त्रीवादी सरोकारों की ओर: पहली क़िस्त

शर्मिला रेगे की किताब  'अगेंस्ट द मैडनेस ऑफ़ मनु : बी आर आम्बेडकर्स राइटिंग ऑन ब्रैहम्निकल  पैट्रीआर्की'की भूमिका का अनुवाद हम धारावाहिक प्रकाशित कर रहे हैं. मूल अंग्रेजी से अनुवाद डा. अनुपमा गुप्ता  ने  किया है.  इस किताब को स्त्रीकाल द्वारा  सावित्रीबाई  फुले  वैचारिकी  सम्मान, 2015 से  सम्मानित किया  गया  था.  

भारतीय विश्वविद्यालयों के सामाजिक विज्ञान और मानव शास्त्र के मौजूदा पाठ्यक्रमों में डा. बी.आर. आंबेडकर से हमारा परिचय अक्सर नहीं हो पाता. यह हैरतअंगेज है कि आंबेडकर के लेखन और व्याख्यानों को कभी पढ़े बिना ही विद्यार्थी और मेरे जैसे शिक्षक स्नातकोत्तर और शोध उपाधियों को हासिल कर लेते हैं और अकादमिक हलकों मेें स्त्री उपाधियों को हासिल कर लेते हैं और अकादमिक हलकों में स्त्री-अध्ययन पर कर्य करते रहते हैं. हालांकि 1990 के बाद वाले वर्षों में यह तस्वीर कुछ बदली है क्योंकि अकादमिक क्षेत्र में आये दलित विद्वान समाजशास्त्र, राजनीति शास्त्र, संस्कृति व साहित्य पाठ्यक्रमों में आंबेडकर के लेखन को अब शामिल कर रहे हैं. आत्म निरीक्षण की इस शुरूआत में ही मैं यह स्पष्ट कर देना चाहती हूं कि किस तरह हमारी उच्च शिक्षा संस्थाओं में अज्ञान गढ़ा जा रहा है और जहां हमसब जाति और शिक्षा में विशेषाधिकार बनाये रखने के गुनाह में भागीदार बने रहते हैं. मेरा यह काम फुले-अम्बेडकरी आंदोलन में मेरे उन गुरूओं के कर्ज को रेखांकित करने के लिए भी है,  जिनका कार्य मुझे व कई अन्य लोगों को आंबेडकर के कार्य तथा लेखन से परिचित कराता है और व्याख्या के अलग ही अंदाज से भी पहचान करवाता है. इन गुरूओं में शामिल है. आंबेडकरी कार्यकर्ता, लेखक शाहिर और नायक दल.



आंबेडकर के ' ब्राह्मणवादी श्रेणीगत पितृसत्ता' पर लेखन को पढ़ते हुए इसी पृष्ठभूमि को ध्यान में रखा जाना चाहिये. यह शब्द स्त्रीवादी विदुषी उमा  चक्रवर्ती ने 1993 में पहली बार प्रयोग किया था. मेरा लक्ष्य यही है कि आंबेडकर के स्त्रीवादी सरोकारों पर जल्द से जल्द ध्यान दिया जाना चाहिए और इसके लिए मैं देश के राजनीतिक अतीत व वर्तमान की  तीन ऐसी घटनाओं को माध्यम बनाऊंगी, जो ऊपर से देखने पर बिल्कुल भिन्न प्रतीत होती है. इसमें से हर एक घटना समय व स्थान की दृष्टि से बिल्कुल अलग पड़ाव पर है और जाति व जेण्डर के बीच भिन्न-भिन्न रिश्तों को दर्शाती है.पहला वाक्या ब्राह्मण परिषदों से जुड़ा है, जिसमें वास्तविक और काल्पनिक दोनों परिषदें शामिल हैं. दूसरे में गैर दलित और दलित स्त्रीवादियों के बीच एक संवाद को लिया गया है. तीसरी घटना दलित स्त्रियों पर बलात्कार और उस पर मुकाबले के बारे में तत्कालीन राजनीति में हुए आडम्बर को दिखाती  है.पहले 1950 की ब्राह्मण परिषद के तीसरे व चौथे संकल्पों की बात करते हैं. यह एक ऐसा प्रपंच है, जिसमें एक काल्पनिक भविष्य का दृश्य निर्मित किया गया है और जिसे 1920 के दशक के महाराष्ट्र के गैर ब्राम्हण आंदोलन के जाने-माने नेता दिनकर राव जवलकर ने रचा था.

ब्राह्मण परिषद में पेश किये जाने वाले काल्पनिक प्रस्तावों का खाका कुछ इस तरह खींचा गया है: " ब्राह्मण स्त्रियों द्वारा अपने पतियों को पीटे जाने के कई मामले अदालत मेें पेश किये गये हैं. अतः ब्राह्मण पति वर्ग की रक्षा के लिए तुरंत एक कानून बनाया जाना चाहिए. मुझे यह कहते हुए लज्जा अनुभव होती है कि यूरोपीय सभ्यता के अनुसरण के कारण ब्राम्हण स्त्रियाॅ धूम्रपान करती है, नाट्य मंचों पर अभिनय प्रदर्शन करती हैं और सैलूनों में जा कर देह पर उस्तरा फिरवाती हैं. हालात ऐसे हैं कि समूची बावनखानी (पेशवाकाल में वेश्याओं का इलाका) में ब्राह्मण स्त्रियों का ही वर्चस्व है. एक ब्राह्मण वेश्या ने तो सूचनापट्ट लगाकर घोषित कर दिया है कि वह पेशवा के वंश से हैं."  (फड़के 1984:149) विस्टल भाई पटेल ने 1918 में अंतरजातीय विवाहों को मान्यता देने संबंधी जो विधेयक प्रस्तुत किया था, बी.जी. तिलक ने उसका कड़ा विरोध किया. इसी विरोध के जवाब में जवलकर ने उपर्युक्त प्रस्ताव पेश किया,  जिसमें 1950 में ब्राह्मण  स्त्रियों को  पतियों को पीटने वाली, धूम्रपान करे वाली और गैर ब्राह्मण पुरूषों के साथ संकर विवाह करने वाली वेश्याओं की तरह चित्रित किया गया. ब्राह्मण पुरूष,  जो अब अपनी स्त्रियों को नियंत्रित करने में अक्षम थे, ‘मूछ वाली औरतों’ की तरह चित्रित किये गये. (वहीं 148)

इस  परिषद में वर्णित काल्पनिक भविष्य  के लगभग 50 वर्ष बाद 2009 में पुणें में हुई ब्राह्मण महासभा मेें सचमुच ही प्रस्ताव रखा गया कि ‘ब्राह्मण समाज की पवित्रता को अक्षुण्ण  रखने के लिये तथा देशहित के वृहद लय के लिये समाज के सभी भाई-बहन समाज के भीतर ही विवाहों को प्राथमिकता देंगे.’ इस महासभा में छपी ‘बदलते वक्त में ब्राह्मणों  के लिए आचार संहिता’ में स्त्रियों के लिये खास पोशाक तथा परिवार-समाज के प्रति उनके कर्तव्यों पर जोर दिया गया है. यह न केवल जाति-आधारित समाज में अंतरजातीय विवाहों के खिलाफ पल रही दलील की ओर इशारा करता है बल्कि आज के प्रभुवर्ग और बीसवी सदी के पूर्वार्ध में रचित उन गैर ब्राह्मण कल्पनाओं में अनोखी समानता दिखाता है जो ब्राह्मण स्त्रियों को भोग-विलास में लिप्त मानता है.हालांकि ब्राह्मण  स्त्रियों का यह उपहास गैर-ब्राह्मण समुदाय की ओर से उभरा जिसका मानना था कि समाज में मुख्य मतभेद अविवेकी ब्राह्मणों और विवेकी हिन्दुओं के बीच है. यहां गैर ब्राह्मण ज्योतिबा फुले (1827-90) की विचारधारा से अलग जाते दिखाई देते हैं. फुले के अनुसार यह मतभेद शूद्र-अतिशूद्र-महिला वर्ग तथा शेठ जी-भटजी वर्ग के बीच था. जाति अवधारणा की  क्रांतिकारी आलोचना में जेण्डर मुद्दे जाति के इशारे में ही स्थापित हुए दिखाई देते हैं.वर्तमान में ब्राह्मण महासभा जहां ‘राष्ट्रीय हितों’ के लिये जाति के भीतर विवाहों पर बल देती है, ब्राह्मण स्त्रियों पर नये-नये प्रतिबंध थोपती हैं. वहीं 20वीं सदी के पूर्वार्ध  में गैर ब्राह्मण बुद्धिजीवियों ने ब्राह्मण स्त्रियों की पाश्चात्य आधुनिका को भोग विलास से जोड़ दिया और स्वयं की पितृसत्तात्मक प्रवृत्तियों की ओर एक नजर तक नहीं डाली.



अब दूसरे वाक्ये पर आते हैं. 2009 में मुंबई में दलित व गैर दलित स्त्रीवादियों के बीच एक संवाद सत्र आयोजित किया गया. इसमें गैर दलित स्त्रीवादियों ने 2006 के खेरलांजी बलात्कारों व हत्याकांड पर अपनी खामोशी की सफाई देते हुए कहा कि मीडिया ने सही वक्त पर सबको सूचित नहीं किया और इस तरह दलित स्त्रीवादियों के साथ एकत्व व सहयोग की डोर बांधने का यह अवसर उनके हाथ से निकल गया. दलित-स्त्रीवादियों ने इस बात की आलोचना की कि दलित स्त्रियों के खिलाफ हिंसा के विरोध में उन्हें अन्य स्त्रीवादियों का कोई सहयोग नहीं मिलता. उन्होंने सेक्स-वर्कस तथा बार-बालाओं पर गैर दलित स्त्रीवादियों के नजरिये की भी निंदा की,  क्योंकि इस नजरिये में श्रम व रति कर्म के जाति से संबंधों तथा शक्तिशाली वर्गों द्वारा निर्मित हिंसा के औजारों के बारे में इन स्त्रीवादियों की नासमझी झलकती है. कुछ दलित स्त्रीवादियों ने दलित पुरूष कार्यकर्ताओं की पत्नियों की ‘गृहस्थिन’ वाली छवि के गढ़ने को भी इस आलोचना के दायरे में समेटा और चेताया क ऐसे दलित पुरूष स्त्री मुक्ति कोे दलित स्त्रियों के लिए नकली/आवास्तविक बताते हैं. यह संवाद सत्र दलित व गैर दलित स्त्रीवादियों के मध्य शक्ति संबंधों की बजाय दोनों समुदायों में पितृसत्ता की सादृश्यता पर ज्यादा केंद्रित रहा. गैर दलित स्त्रीवादियों ने फिर एक बार दलित स्त्रियों के सन्मुख स्त्रीवाद और समुदाय के बीच चुनाव करने को मुख्य मुद्दा बनाया. ऐसे संवादों को दलित स्त्रीवादियों, दलित पुरूष कार्यकर्ताओं व गैर दलित स्त्रीवादियों के बीच समन्वय का एक महत्वपूर्ण जरिया बनाने के लिए दलित स्त्रीवादियों द्वारा अभिव्यक्त आलोचना व मतभेद पर लगातार ऐतिहासिक पुनदृष्टि की जरूरत होगी.

जाति व जेण्डर के आमने-सामने आ जाने की तीसरी घटना हाल में ही दलित स्त्रियों को बलात्कार के बाद हर्जाना देने की राजनीति पर मीडिया तथा सिविल सोसाइटी की प्रतिक्रिया से संबंधित है. 2009 में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने राज्य सरकार द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में बलात्कार की शिकार को उत्पीड़न कानून के अंतर्गत उल्लिखित  अनिवार्य हर्जाना वितरित किया. उत्तर प्रदेश की कांग्रेस  अध्यक्षा रीता बहुगुणा ने इसे हर्जाने द्वारा बलात्कार के अपराध की अनदेखी कर लेने की नीति बताया और तंज किया कि क्यों न दलित मुख्यमंत्री का बलात्कार हो और फिर उन्हें हर्जाने की पेशकश की जाये? इसके बाद मीडिया ने एक तरफ तो इस बात पर शोक जताया कि स्त्री होते हुए भी दोनो राजनीतिज्ञों ने बलात्कार के मामले पर जनता को बरगलाया है, वहीं दूसरी तरफ इशारा किया कि दोनो महिलायें जाति मुद्दों पर आमने-सामने आ गई है. मायावती (दलित) तथा रीता बहुगुणा (ब्राह्मण) के बीच जेण्डर की समानता या जाति की भिन्नता को उभारना उन असल राजनीतिक हथकंडों को सफाई से छुपा ले जाता है,  जिनके द्वारा राज्य व राजनीतिक दल ऐसे मुद्दों के इर्द-गिर्द अपने लाभ के लिए एकत्र हो जाते हैं और दलित स्त्रियों के खिलाफ वैदिक हिंसा को छोटा/स्वीकार्य अपराध बना देते हैं.
ये तीन अलग-अलग वाकये स्त्रीवादी राजनीति के कई द्वद्वों,  जैसे ब्राह्मण/अब्राह्मण, स्त्री आंदोलन/समुदाय और जाति/स्त्री की संकुचित सीमाओं को सामने ले आते हैं.

महिला आरक्षण विधेयक पर जारी लगातार बहस ने बखूबी दिखा दिया है कि स्त्री और जाति के बीच ये झूठा  द्वैत दरअसल पिछड़ी जातियों तथा अन्य जातियों की स्त्रियों की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को राजनीतिक दलों के भीतर ही बांध कर रखने की जुगत है. हमारे राजनीतिक अतीत व वर्तमान से लिये गये ये वाकये स्त्री अधिकारों और वंचित जातियों के बीच जानबूझ कर पैदा किये गये अंतर्द्वंद्व  की पृष्ठभूमि का जायजा देते हैं. वे भारत में जाति और जेण्डर के षड्यंत्र से निपटने की जरूरत को रेखांकित करते हैं और इसीलिये अम्बेडकर के स्त्रीवादी लेखन पर तुरंत ध्यान देने की जरूरत है.  वर्तमान में स्त्रीवादी बहस व स्त्री अध्ययन पाठयक्रम अम्बेडकर के लेखन व राजनीति से लगभग पूरी तरह कटे हुए हैं. वहीं यदि तुलना करें तो गांधी, नेहरू व लोहिया अब भी चर्चा में बने हुए हैं. जाने-माने दलित लेखक व बुद्विजीवी बाबूराव बगुल आंबेडकर के लेखन की इस अकादमिक उपेक्षा के पीछे मुख्यधारा की उस प्रवृत्ति को देखते हैं, जिसमें राष्ट्रीय आंदोलन को पुरखों की स्तुति वाली एक ऐतिहासिक किंवदंती बढ़ना दिया गया है, जबकि फुले आंबेडकर विचारधारा को गैर राष्ट्रीय व व्यक्तिवादी फलसफे का नाम दे दिया गया है.

लेखिका शर्मिला रेगे
 1970 के वर्षों में दलित पैंथर  विचारधारा व गतिविधियां तथा दलित साहित्य कम से कम महाराष्ट्र में तो अकादमिया के लिये चुनौती बन कर उभरे और उनके बीच चयन करने की नौबत आ गई. इसके चलते समाज शास्त्र व साहित्य विभागों ने दलित लेखन को अपने शोध व पाठ्यक्रमों में जगह दी जबकि दलित पैंथर द्वारा खड़े किये गये अक्ल को चुनौती देते सवालों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया. हालांकि 1990 के दशक से देशभर में ‘जाति के धर्म निरपेक्ष उभार’ से आकार ग्रहण करता हुआ तथा संयुक्त राष्ट्र के जातिवाद पर अंतरराष्ट्रीय  सम्मेलन जैसे मंचों पर बढ़ावा पाकर दलित अध्ययन अब सामने आ रहा है. स्थानीय दलित आंदोलन तथा दलित स्त्रीवाद के साथ जुड़ने से भारत के विभिन्न भागों में दलित अध्ययन के कई नये रास्ते निकल रहे हैं. इस संयोजन से आंबेडकरके स्त्रीवाद को पढ़ पाने के रास्ते निकलते हैं और इससे फुले-आंबेडकरी, दलित स्त्रीवादी व गैर-दलित स्त्रीवादियों के बीच नये संवादों की संभावनाये खुलती हैं.
 क्रमशः
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