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आंबेडकरी गीतों में रमाबाई और भीमराव आंबेडकर : चौथी क़िस्त

शर्मिला रेगे की किताब  ‘अगेंस्ट द मैडनेस ऑफ़ मनु : बी आर आम्बेडकर्स राइटिंग ऑन ब्रैहम्निकल  पैट्रीआर्की’की भूमिका का अनुवाद हम धारावाहिक प्रकाशित कर रहे हैं. मूल अंग्रेजी से अनुवाद डा. अनुपमा गुप्ता  ने  किया है.  इस किताब को स्त्रीकाल द्वारा  सावित्रीबाई  फुले  वैचारिकी  सम्मान, 2015 से  सम्मानित किया  गया  था. 

 

अब हम अपना ध्यान इन दोनों महिलाओं की भूमिकाओं में प्रस्तुतिकरण में इस असाधारण विरोध पर केंद्रित करते हैं. रमाबाई को जहां ‘रमई’ (समुदाय की मां) की उपाधि मिली वहीं सविताबाई की भूमिका पर संदेह वह बहस बढ़ती गई. इससे हम यह दलील दे सकते हैं कि आंबेडकरी पुस्तिकाओं व संगीत रचनाओं में निजी/वैवाहिक का स्वरूप् ब्राह्मण मध्यम वर्ग को आधुनिकता में गढे गये सरण्यभावी विवाह के आदर्श पर सवाल उठाता है. आंबेडकर और रमाबाई पर रची गई संगीत रचनाओं में दम्पति के बीच का साख्य निजी दायरों को लक्ष्य कर सार्वजनिक क्षेत्र में प्रवेश कर जाता है. यह संकेत देता है कि समुदाय घर-परिवार व राजनीतिक क्षेत्र एक दूसरे से अलग नहीं किये जा सकते.

रमाबाई

इस पुस्तिकाओं में रमाबाई के जीवन का चित्रण एक त्याग की मूर्ति मां व पत्नी की तरह नहीं किया गया है. बल्कि इनमें उनके व्यक्तित्व में आये परिवर्तनों को उभारा गया है. किस तरह एक छोटी अनाथ लड़की ‘रामी’ जिसने आंबेडकर से विवाह किया, एक राजनीतिक बिरादरी की मां ‘रमई की पदवी पा लेती है. गीतों और पुस्तिकाओं में रमाबाई के शुरूआती वैवाहिक जीवन के विवरण है, जिनमें वे आंबेडकर से यही अपेक्षा रखती हैं कि अमेरिका से लौट कर वे अपनी गृहस्थी संभाले लेंगे, कि बाॅम्बे के सीडेन हेम महाविद्यालय में व्याख्याता के तौर पर कार्य करते हुए एक सामान्य जीवन बितायेंगे’. वे उनकी उच्च शिक्षा की अभिलाषा पर सवाल उठाती हैं, नाराज होती हैं और  कई-कई दिनों तक उनसे बात नहीं करती है. लेकिन अंततः रमाबाई अध्ययन के लिये आंबेडकर की भूख को समझ जाती हैं और बिना शर्त उन्हें सहयोग देती हैं. 50 रूपए महीने में पूरा कर खर्च संभालती हैं, बल्कि उसमें से पांच रूपए आकस्मिक खर्चों के लिये बचा भी लेती है. 1916 में अंबेडकर के लंदन जाने के बाद जिस गरिमा से रमाबाई निर्धनता में भी आत्मबल संभाले रहती हैं उसकी इन गीतों में विशेष स्तुति की गई है. भोजन के लिये हर दिन का संघर्ष और रोज चार भाखरी (ज्वार की रोटी) पर जीवित रहने वाले परिवार का दान लेने से इंकार कर देना भी प्रमुखता से वर्णित किया गया है.

आंबेडकर के राजनीतिक आंदोलन में रमाबाई की बढ़ती रूचि को 1920 की मनगांव परिषद के बारे में उनकी जिज्ञासा से, साहू महाराज के कार्ये में उनके सवालों में,1927 के महाड सत्याग्रह मेें भाग लेने मेें उनकी उत्सुकता से (हालांकि आंबेडकर के सुझाव के विपरीत उन्होंने स्त्रियों का नेतृत्व नहीं किया बल्कि भोजन व्यवस्था संभाली) तथा मुम्बई के जे.जे. अस्पताल में स्त्रियोें की सभा को संबोधित करने से मापा जा सकता है. 1920 में लंदन जाने के पहले आंबेडकर ने श्राद्व के कार्यक्रम का आयोजन किया (उनके पिता की बरसी पर) और हिन्दू कर्मकांडों की परम्परा तोड़ने के लिये ब्राह्मण भोज न कर के वंचित जाति के लिये स्थापित छात्रावास से चालीस छात्रों को भोज के लिये आमंत्रित किया. रमाबाई ने पपरंपरागत मिठाईयां परोसने की योजना बनाई थी  लेकिन अंबेडकर ने तर्क दिया कि इन छात्रों को मांस व मछली परोसी जानी चाहिए, जो उन्हें छात्रावास के भोजन में नहीं मिल पाते. रमाबाई पहले तो इस तर्क में बहुत क्षुब्ध  हुई और श्राद्व की रीतियों में पूरनपोली की बजाय मांस-भोज पर प्रश्न उठाने लगीं किन्तु बाद में उन्होंने अंबेडकर के कहे अनुसार ही किया.


अब चाहे यह घटना हो या ऐसी ही अन्य घटनायें, जैसे रमाबाई की तीर्थयात्रा करने की हार्दिक इच्छा और चाहे इस पर अंबेडकर का तर्को द्वारा उनको समझाने की कोशिशे हो, आंबेडकरी  संगीत व प्रकाशित विवरणों में आंबेडकर और रमाबाई के बीच रिश्तों को कभी बख्शा नहीं गया. बल्कि वे विवरण, भावार्थों और मूल्यों की वैसा ही विस्तार देते हैं जैसे कि उन्हें जिया और महसूस किया गया है. जिस तरह उनकी जिंदगी की कुछ घटनाओं ने उनके जीवन पथ तथा सोच को दिशा दी. आंबेडकर की नाराजगी के बावजूद रमाबाई की शिक्षा में अरूचि, पुस्तकों पर खर्च को लेकर रमाबाई का  खींजझना लेकिन बाद में सहयोग देना, यहां तक कि अपनी सोने की चूड़ियां बेंच कर आंबेडकर के पुस्तकालय ‘राजगृह को सम्भव बनाना’ इन घटनाओं पर बने गीतों में यही दिखाई देता है कि कैसे उनका रिश्ता तर्कों और संवाद के जरिये विकसित हुआ.

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डा. भीमराव आंबेडकर के स्त्रीवादी सरोकारों की ओर

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‘निजी’ आधार पर डा. आंबेडकर की ‘राजनीतिक छवि’ का स्त्रीवादी (?) नकार : दूसरी क़िस्त


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पीड़ाजन्य अनुभव और डा आंबेडकर का स्त्रीवाद


रमाबाई वराले जो 1929 में अपने लेखक पति बलवंत वराले के साथ पिछड़ी जातियों के छात्रों के लिये अंबेडकर द्वारा धारावाड़ में शुरू किया गया छात्रावास चलाती थीं, अपने संस्मरणों में लिखती हैं कि विभिन्न अछूत जातियों की स्त्रियों  के लिये पहली बार आयोजित एक भोज में किस तरह रमाबाई मुख्य अतिथि बनी थीं. धारावाड़ के युवा अंबेडकरी  कार्यकर्ता इस सार्वजनिक भोज के लिये काफी उत्साहित थे ,लेकिन रमाबाई के इसमें शामिल होने के बारे में उन्हें संदेह था. रमाबाई महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र से थीं, जहां भोजन के बारे में कड़े जातीय नियम पाले जाते थे. वराले याद करती हैं कि रमाबाई के इस तरह कार्यक्रम का नेतृत्व करने पर आंबेडकर प्रसन्न होकर बोले थे. यह महार भाटिन (ब्राह्मण महार स्त्री) किस तरह बदल गई है.

कई गीतों में दिखाया गया है कि किस तरह उनके घर में बिरादरी के लोगों को भी परिवारजनों को भांति स्वीकार कर लिया जाता था. भंगी  जाति के एक आठ वर्षीय बच्चे को अपने घर में उन्होंने जगह दी भी और पिछड़ी जाति छात्रवास को चलाने के लिये अपने गहने गिरवी रख दिये थे. इन घटनाओं से पता चलता है कि उन्होंने अपने घर को  राजनीतिक बिरादरी के लिये भी खोल रखा था. ये गीत कहते हैं  कि रमाबाई का यह योगदान उस प्रेम समर्पण और श्रद्धा से जन्मा था ,जो वे अपने असाधारण पति के प्रति महसूस करती थीं. फिर भी उन्हें अंधभक्त की तरह पेश नहीं किया गया है ,बल्कि ऐसे व्यक्तित्व के रूप में जिसने अपने राजनीतिक विचार स्वयं गढ़े हों. इन गीतों में आंबेडकर की रमाबाई पर पूर्ण निर्भरता और उनकी मृत्यु पर आंबेडकर का गहरा शोक चित्रित किया गया है. आंबेडकर अपनी एक पुस्तक पाकिस्तान या भारत का विभाजन रमाबाई को समर्पित करते हुए कहते हैं, ‘उसके बहुत भले दिल, उदात्त मस्तिष्क, पावन चरित्र शीतल धैर्य और मेरे साथ मुसीबतें सहने के लिये उसका हमेशा तैयार रहना उन सब को घेरे हुए थी. इन सब के लिये मेरे आभार का प्रतीक यह समर्पण है.’

इस तरह बुद्ध की पत्नी यशोधरा और सावित्री बाई फुले की विरासत को संभालकर आगे ले जाने वाली रमाबाई को एक युग पुरूष‘ को गढ़ने का श्रेय आंबेडकरी  साहित्य में दिया गया है. इसके उलट सविता बाई आंबेडकर  के बारे में आंबेडकरी  समुदाय संदेह और गुस्से का इजहार करता है और कभी-कभी एक सधी  हुई चुप लगा जाता है. इसका कारण सविताबाई का वह वक्तव्य हो सकता है, जब अंबेडकर की मृत्यु के तीस वर्ष बाद उन्होंने अपनी आत्मकथा लिखने की इच्छा जाहिर की. उन्होंने दावा किया कि इसके जरिये वे सच्चाई को समुदाय के सम्मुख रखना चाहती हैं तथा आंबेडकर की मृत्यु में उनकी भूमिका पर उठे शक के बादलों को हटाना चाहती है. सुरक्षात्मक अंदाज में लिखते हुए सविताबाई आंबेडकर के मन में उनके लिये भावनओं पर जोर देती है, दोनों के बीच पत्र व्यवहार का हवाला देती है और अपने वैवाहिक जीवन के कई संस्मरणों से इसे एक आदर्श सख्य भाव विवाह साबित करती हैं . वे इसी निष्कर्ष पर पहुंचती हैं  कि अपने राजनीतिक लाभ के लिये कुछ लोगों ने यशवंत के मन में और समुदाय में उनके बारे में कई भ्रांतियां फैलाई. 2003 में सविताबाई की मृत्यु के बाद कुछ पुस्तिकायें प्रकाशित हुई, जिसमें अंबेडकर की मृत्यु मेें उनकी भूमिका को लेकर फैले हुए सच और झूठों की तर्कपूर्ण समालोचना की गई. एक ऐसी ही पुस्तिका में उनके आंबेडकर से रिश्ते के अत्यंत निजी होने की बात की गई है. ऐसा रिश्ता, जिसमें घर तथा राजनीतिक बिरादरी के बीच पुल बनाने की कोशिश दाम्पत्य का अनिवार्य हिस्सा कभी नहीं थी, और इसलिये इस रिश्ते को समुदाय ने नकार दिया.

आंबेडकर के जीवन की संगीत व शब्दों में अभिव्यक्ति में रमाबाई और सविताबाई दाम्पत्य के दो विपरीत ध्रुवों   की तरह चित्रित हुई है. आंबेडकरी  आंदोलन में सक्रिय कई शिक्षकों में से एक गायकवाड़ गुरूजी के संस्मरणों में हमें आंबेडकर के जीवनकाल में लिखे गये दलित स्त्रियों के गीत मिलते हैं. इनमें से कुछ में रमाबाई व सविताबाई के इस  परस्पर विरोधी स्वरूपों में कुछ मेल-मिला करने की कोशिश की गई है. रमाबाई की मृत्यु के तेरह वर्ष बाद आंबेडकर सविताबाई से मिले और उनका विवाह हुआ. एक गीत में रमाबाई व सविताबाई के बीच बहनापे  की कल्पना की गई है, हालांकि स्पष्ट है कि वे दोनों आपस में कभी मिली ही नहीं होंगी.
‘‘रमाबाई और सविताबाई, जाति से अलग होके भी
एक ही थाली मेें खाती हैं अपने भीम की खातिर’’
एक अन्य गीत में एक दलित स्त्री, ब्राह्मण सविताबाई को दलित समुदाय के तौर-तरीके अपनाने की सलाह देती है.
ओ बामन घर की बेटी, अपनी साड़ी से खुद को ठीक से ढंकों
बाबा अपने काम में खोये हैं अपनी कुर्सी पर, उनका ध्यान तुम पर नहीं है.

1990 के दशक में रचे गये कुछ नये गीत अंबेडकरी  गायन पार्टियों ने कैसैट्स पर रिकार्ड किये, जिनमें उन मतभेदों पर चिंता जताई गई है, जो आधुनिक शिक्षा व रहन -सहन तथा जेण्डरीकृत चेतना द्वारा जन्मी राजनीतिक प्रतिबद्धता के बीच खड़े हो गये हैं जैसा कि पहले भी कहा गया, युवा स्त्रियों को रमाबाई की तरह बनने की प्रेरणा देते कई गीत हैं ,लेकिन युवकों को बाबा साहेब के पदचिन्हों पर चलने की प्रेरणा उतनी दमदार नहीं है. वैसे ही जो ब्राह्मण पत्नी हैं, उसे विषकन्या करार दिया जाता है ,जो पुरूष को समुदाय के प्रति जिम्मेदारियों से विमुख कर देती हैं.

गैर दलित स्त्रीवादियों के नजरिये, जैसा कि हमने उर्मिला पवार के कथ्य में देखा के विपरीत आं बेडकरी  समुदाय में दाम्पतय की अवधारणा ऐसी है कि अंबेडकरी  के जीवन में निजी व राजनीतिक की जांच पड़ताल ‘स्वयं सिद्व’ सच्चाइयों के पैमानों पर नहीं की जा सकती. दलितों पर निजीत्व और सामूहिकता को अलग-अलग कर के देखने के लिये डाले जाते रहे दबाव के विपरीत, आंबेडकर परिवार के जीवनवृत्त सार्वजनिक और निजी की नर्मित और पुननिर्मित के कई सक्रिय माडल प्रदान करते हैं. आंबेडकर के निजी जीवन को समझते समय इन  निष्कर्षों को निकालने में आती यह मुश्किल सिंगुबाई मुतिसापुर की एक दलित गायिका/संगीतकार ने सबसे अच्छी तरह व्यक्त की है.
मेरे पिता उसे पिता कहते रहे, मेरी मां उसे पिता कहती है
मैं भी उसे पिता ही कहती हूँ 
मेरे बेटे के लिये भी वह पिता ही है.
पूरे संसार में फूंक के तो दिखाओ और एक ऐसा रिश्ता.
क्या किसी और के साथ है ऐसा रिश्ता, जो हमारा है हमारे  भीम के साथ
साथ साधु-संत आये और गये लेकिन मेरी प्रार्थनाओं का कोई फल नहीं मिला. ओ मेरे कुनबे कल कहां थे तुम?
आज कहां तक आ गये. तुम्हारे गोबर सने हाथों में उसने रख दी कलम.
आंबेडकर की निजी जिंदगी को यह जोशभरा लगाव जो संगीत-साहित्य में झलकता है, साफ बताता है कि आंबेडकरी समुदाय स्त्री-अधिकारों और जेण्डर मुद्दों पर आंबेडकर के नजरिये को समझने में उन अकादमियां से मीलों आगे है, जिसे आंबेडकर में बड़ी सीमित रूचि रही है. कुछ खास अपवादों को छोड़कर अधिकांश अकादमिक साहित्य आंबेडकर के स्त्रीवाद में योगदान को नजरअंदाज करते रहे हैं और इसमें आंबेडकरी सिद्धांतों पर लिखी गयी पाठमालायेंभी शामिल है.

प्रतिसमुदायों की सूचना अैर उनसे सीखना


‘आंबेडकरऔर स्त्रीमुक्ति’ विषय पर संगीत और पुस्तिका साहित्य का प्रथम शक्तिशाली उभार 1990 के दशक के आखिरी वर्षों में देखने को मिलता है. आज ये गीत व पुस्तिकायें आंबेडकरी  पचांग में शामिल खास अवसरों पर वितरित होती हैं . माध्यम वर्ग की सामान्य समझ इन समारोहों को विवेकहीन/भावुक करार देती हैं और ऐसे अवसरों पर यातायात व स्वच्छता की समस्याओं के चलते इनकी काफी आलोचना होती है. कुछ सामाजिक वैज्ञानिकों को छोड़कर अधिकांश इन जनसभाओं को आंबेडकर की व्यक्तिपूजा या नेतृत्व द्वारा जनता को बरगलाने से जोड़ते हैं. वैसे भी दलित जनों को अतिभावुक और ऐतिहासिक दृष्टि से शून्य माना जाता है. इन लेखों में अक्सर आंबेडकर की विवेकी दृष्टि की तुलना इन सालाना जलसों की विवेकहीनता से की जाती है और आशय यह होता है कि दलित आंबेडकर की विरासत को आगे नहीं ले जा रहे हैं लेकिन इन जलसों के रिकाॅर्ड जो आंबेडकरी पंचाग की वजह भी हैं और उसकी परिणिति भी कुछ अलग ही किस्सा बयान करते हैं.
पिछले दशक में आयोजित आंबेडकरी जलसों की रिपोर्टों को यदि सहानुभूति पूर्वक देखा-परखा जाये तो नागपुर और मुम्बई में होेने वाले इन जनमेलों की वजह से होने वाली यातायात समस्या, रेलगाड़ियों में भीड़ और कचरे के ढेरों की आलोचना को इस तरह भी देखा जा सकता है जैसे कुछ खास दिनों पर कुछ अचिन्हित सार्वजनिक जगहों को अपनी उपस्थिति से दलितों ने चिन्हित  कर दिया हो और इसी बात के लिये उनकी निंदा की जा ही हो. कुछ अन्य लेखों में मैने दलील  दी है कि आंबेडकरी पंचाग की तिथियां आंबेडकरी यूटोपिया को वास्तविक जगहों से जोड़ती हैं और इस तरह एक आंबेडकरी प्रति संसार को गढ़ती हैं, या ऐसे वास्तविक स्थानों  की  रचना करती हैं, जो कभी-कभी ही लोगों से गुलजार लेने के बावजूद भी  अपनी लगातार उपस्थिति दर्ज कराये रहते हैं. आंबेडकर को सीधे संबोधित प्रज्ञा दया पवार का यह मंत्र इस स्थिति को भली-भांति व्यक्त करता है.
”हर साल 6 दिसंबर को बिना नागा मैं अपने बेटे प्रतीक हजारो मांओ, बहनों और भाइयों के साथ एक मोमबत्ती जलाती हूं और आपको सादर नमन करती हूं. आपकी स्पष्ट छवि मुझे प्रतीक तथा हजारों, लाखों करोड़ों आंबेडकरियों की गर्वित आंखों में दिखाई देती है. यह बहुत आशा भरा पल होता है जो हर दिन के संघर्षों के बीच डरावनी वास्तविकता के बीच हमें आने वाले कल के सपने देखने के लिये प्रेरित करता है. सच में आपने हम सब को बहुत सुंदर बना दिया है.”

आंबेडकरी (आंबेडकर के‘पढ़ो, संगठित हो और विरोध करो’ के आहान पर आधारित समुदाय) यूटोपिया एक आदर्श समाज के लिये प्रयत्नों की अभिव्यक्ति है, लेकिन अन्य यूटोपिया की तरह ही इसका कोई तयशुदा पता या भौतिक स्थान नहीं है. संगीत व आंबेडकरी साहित्य, जो आंबेडकरी संघर्ष के सबसे खास हथियार रहे हैं. इस यूटोपिया तथा जनमानस के बीच जुड़ाव तंतु का काम करते हैं, लोगों को उस संभावित राजनीतिक नैतिक पहचान से जोड़ते हैं, जिसे वे अपना सकें. इस संगीत व इन पुस्तिकाओं ने ही आंबेडकरी समुदाय को जन्म दिया है,  जिसके अपने खास दावे हैं और एक वैकल्पिक संस्थागत प्रचार तंत्र है.इसकी शुरूआत हुई स्वायत्त दलित स्त्री संगठनों के बीच सहयोग सूत्र जुड़ने से,  दलित स्त्री फेडरेशन व विचार मंचों के बनने से और बाद में दलित राजनीतिक दलों (भारतीय रिपब्लिकन पार्टी, बहुजन महासंघ व रिपब्लिकन पार्टी आॅफ इंडिया) की महिला शाखाओं के पुनर्जीवित होने से. दिसंबर 1996 में डा. प्रमिला सम्पत द्वारा चंद्रपुर में ‘विकास वंचित दलित महिला परिषद’ का आयोजन किया गया, जिसमें 25 दिसंबर का दिन भारतीय स्त्री मुक्ति दिवस के रूप में मनाने का प्रस्ताव रखा गया.यह प्रस्ताव ही स्त्री आंदोलन की जमीन पर आंबेडकर और स्त्रीवाद को लेकर शुरू हुए विचारात्मक व क्रियात्मक तनावों- मतभेदों की नींव बना. इस सम्मेलन के कुछ वर्षों बाद आंबेडकरी आंदोलन की याद दिलाते रहने वाले उसे पुर्नव्यखायपित व पुर्नसूचीबद्व करने वाले अहम औजार यानि आंबेडकरी पंचागों ने 25 दिसंबर को भारतीय स्त्री मुक्ति दिवस के रूप में उल्लिखित  करना शुरू कर दिया.

क्रमशः 

वहशी राष्ट्रवाद: अपने ही नागरिकों के खिलाफ जंग

इति शरण

युवा पत्रकार. सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ता. संपर्क : ई मेल- itisharan@gmail.com

देश में कुछ दिनों पहले असहिष्णुता का मामला खूब गरमाया था, जिसके विरोध में कलाकार, बुद्धिजीवी, लेखक अपना पुरस्कार लौटा रहें थे। आज भी देश में विभिन्न रूपों में असहिष्णुता का वातावरण बना हुआ है। यह असहिष्णुता का वातावरण पूरी तरह से सत्ता पोषित है। सत्ता जब संकट में होती है, तो वह ऐसे ही घिनौने वातावरण का निर्माण करके देश में घृणा और आतंक का माहौल पैदा करती है, अपने बचाव के लिए देश के लोगों को बांटने का काम करती है। धर्म, जाति, संप्रदाय, के आधार पर लोगों को लड़वाती है। सरकार जब जनता की नजरों में गिरने लगती है और हर मोर्चे पर नाकामयाबी से बुरी तरह घिरने लगती है तब वह देश को एक और नए संकट की ओर धकेलने लगती है। आज वर्तमान में हमारे यहां सत्ता का यही चरित्र देखने को मिल रहा है।

बदकिस्मती से सीमा पार की सरकार भी उतनी ही जनविरोधी, कट्टर और हर मोर्चे पर विफल सरकार है। दोनों ही देशों की सरकार इस वक़्त भयावह और चौतरफा संकट से घिरी हुई है। अपने संकट को कम करने और उसे ढकने के लिए दोनों ओर से युद्ध जैसा माहौल बनाये रखने की भरपूर प्रयास किये जा रहे हैं। इसी का नतीजा था, सरहद पार से हमारे यहां हुआ उरी हमला और उसके जवाबी कार्रवाई में हमारी तरफ से किया गया सर्जिकल अटैक। इन हमलों से दोनों देशों की सरकारों को कुछ फायदा जरूर हुआ हो हुआ मगर देश और जनता कई स्तरों पर असहनीय तकलीफें झेल रही हैं।

ये दोनो देश अंतरराष्ट्रीय दवाबों के कारण सीधे युद्ध तो नहीं कर सकते, मगर आज अपनी ही जनता के खिलाफ दोनो देशों  की सरकारें एक तरह से युद्ध की स्थिति पैदा करवा रही हैं। यही कारण है कि आज सरहद इस पार और उस पार भी कलाकारों पर हमले किये जा रहे हैं। हमारे यहां पाकिस्तानी  कलाकारों, पाकिस्तानी फिल्मों का विरोध हो रहा, तो सरहद पार हमारी फिल्मों और मीडिया पर भी प्रतिबंध लगाना जारी है।

मुंबई में ‘मामी फिल्मोत्सव’ में एक बेहतरीन और क्लासिक पाकिस्तानी फिल्म ‘जागो हुआ सवेरा’ के प्रदर्शन पर रोक लगा दिया गया। जिस फवाद खान को हमारी देश कि जनता ने सर आँखों पर उठा रखा था, आज उसी फवाद को नफ़रत की निगाह से देखा जाने लगा है। अचानक लोगों को वह एक दुश्मन देश का नागरिक नज़र आने लगा। फिल्म निर्देशक करण जौहर को अचानक इस पाक कलाकार को अपनी फिल्म में लेने पर अफसोस होने लगा और उन्होंने आगे से अपनी फिल्म में किसी भी पाकिस्तानी कलाकार को शामिल ना करने की कसमें भी खा ली हैं।

आज कला और कलाकारों को ही नफरत का जरिया बनाया जा रहा है, जबकि हर तरह की नफरतों के नकाब उतारने का नाम ही है कला। वह सीमाओं से परे और किसी भी संकट के समय संपूर्ण रूप से मानवीयता और मानवीय सरोकारों के झंडे बुलंद करती नजर आती है। युद्ध के समय कला ही नफरत की  आग पर पानी डालने का काम करती है। युद्ध के हर दौर में कलाकारों ने अपनी लेखनी, अपने नाटक, अपनी गीतों के जरिये शांति लाने में अपनी भूमिका निभाई है। कहा भी जाता है एक बंदूक की ताकत से ज्यादा मजबूत होती है कलम की ताकत। ‘क्या जुल्मतों के दौर में भी गीत गाये जाएंगे, हाँ जुल्मतों के दौर के ही गीत गायें जाएंगे।’

मगर आज उसी कला जगत और कलाकारों पर हमला हो रहा है और यह किसी न किसी रूप में सत्ता प्रायोजित है। जब सत्ता पोषित इस फासीवादी और घिनौने सामाजिक/राजनीतिक माहौल के प्रतिरोध में कोई संस्था सामने आ रही है, तो उनपर ही हमले किए जा रहे हैं। इसका ही परिणाम था इंदौर में भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) के 14वें राष्‍ट्रीय सम्‍मेलन में कुछ संघी विचारधाराओं के लोगों का हमला। वे लोग कार्यक्रम के बीच में मंच पर चढ़ आयें और हंगामा करने लगें। जबकि इप्टा के इस कार्यक्रम का आयोजन  ‘सबके लिए एक सुंदर दुनिया’ के संदेश के साथ किया गया था। हाल ही में मुंबई में भी कुछ ऐसी ही घटना देखने को मिली, जब एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान कुछ इसी तरह की विचारधारा के लोगों ने हिंसक हमला कर दिया था। फरवरी के महीने के दौरान इप्टा जेएनयू की टीम जब एक मजदूर संगठन के आमंत्रण पर उत्तराखंड के पौरी में नाटक करने गई उस वक़्त भी उनका विरोध किया गया, आयोजकों को धमकी दी गई। नाटक के दौरान बिजली काट दी गई। बाद में जेएनयू की टीम ने मोबाइल की रौशनी में नाटक किया। वहीं उत्तर प्रदेश के वृंदावन में होने वाले नास्तिक सम्मेलन को विश्व हिंदू परिषद और स्थानीय धर्माचार्यों के विरोध के कारण रद्द करना पड़ा।

एक तरफ हिन्दुवादी संगठन नारी सुरक्षा का दिखावा करता है और दूसरी तरफ एक स्त्री को अभद्र गाली देने से भी पीछे नहीं रहता। जब बॉलिवुड अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा पाक कलाकारों के समर्थन में सामने आई तो इसी विचारधारा के लोग प्रियंका को गंदी-गंदी अभद्र गालियां देने लगे। एक तरफ ये भारत माता की जय के नारे लगवाते हैं और दूसरी तरफ देश की स्त्री का इस कदर अपमान करते हैं। यह है इनका दोहरा रूप।

इन घटनाओं को देखकर 1989 की याद आती है, जब नुक्कड़ नाटक ‘हल्ला बोल’ के प्रदर्शन के दौरान शासक पार्टी के गुंडों ने नाटक कर रहें कलाकारों पर हमला कर दिया था। इस हमले में रंगकर्मी सफ़दर हाशमी बुरी तरह से ज़ख्मी हुए। उसी रात को सिर में लगी भयानक चोट की वजह से सफ़दर हाशमी की मृत्यु हो गई। आज एक बार फिर कुछ वैसा ही हमला जारी है।

सनद रहे कि हमारी आज की यह कट्टर हिंदूत्ववादी सरकार हिटलर की मानवद्रोही प्रवृत्ति पर चलने तथा आज की एक सबसे क्रूर और आक्रामक सरकार अर्थात इजरायल सरकार जैसी ही दिखने में विश्वास रखती है। राजनीति में आने से पहले हिटलर खुद एक पेंटर था। मगर राजनीति में आने के बाद उसने और उसकी नाज़ी पार्टी ने कला के सभी रूपों पर हमला शुरू कर दिया था। एक कलाकार होने के नाते हिटलर कला की ताकत से वाक़िफ था। वह जानता था कि कला उसकी तानाशाही के लिए खतरा बन सकती है, इसलिए सत्ता में आने के बाद उसने इसे कुचलने का अभियान चलाना ही मुनासिब समझा। आज हमारी सरकार और सरकार संरक्षित कुछ गुंडा गिरोह क्या हिटलर के नक्शे कदम पर चलती नहीं दिख रही है ?

नफरत का यह माहौल सिर्फ पाकिस्तान के लिए ही नहीं फैलाया जा रहा, बल्कि एक अघोसित युद्ध की स्थिति तो चीन के साथ भी पैदा की जा रही है। देश में बड़े स्तर पर चीनी सामानों का विरोध हो रहा है। यह विरोध कोई आम आदमी के दिमाग की उपज नहीं है, बल्कि यह विरोध भी हमारी सत्ता की सोची समझी रणनीति का हिस्सा है, यह विरोध भी सत्ता पोषित ही है।

अपनी तमाम नाकामियों पर पर्दा डालने के लिए यह एक छद्म युद्ध का माहौल तैयार करने की कोशिश की जा रही है। देशभक्ति का एक झूठा पाठ पढ़ाया जा रहा है। अगर आप देश भक्त हैं, तो चीनी सामानों का विरोध करें। मगर मुझे समझ नहीं आता यह कैसा विरोध है ? इस विरोध की आड़ में तो सिर्फ़ छोटे थोक विक्रेताओं और रेडी पर सामना बेचने वाले दूकानदारों के आर्थिक हितों पर ही हमला बोला जा रहा है। क्यों नहीं बड़ी-बड़ी चीनी कंपनियों के माल तथा उनका कारोबार करने वाले बड़े भारतीय व्यापारिक घरानों का बहिष्कार किया जा रहा ? हमारे इस तरह के अविवेकी विरोध से चीन कोई बड़ा नुकसान नहीं होने वाला, बल्कि हमारे ही देश के सबसे निचले स्तर के कारोबारियों को उजाड़ने का काम ज़रूर हो रहा है। दिवाली में चाइनीज लाइट बेचने वाले एक दुकानदार ने बताया, हर दिवाली में चाइनीज लाइट बेंचकर 40-50 हजार रुपए कमा लेता था, उन पैसों से उसके घर में दिवाली मनती थी, मगर इस बार कोई चाइनीज लाइट खरीद ही नहीं रहा।  उसने बताया, कमाई तो दूर की बात है, इन लाइटों को खरीदने पर हमने जो पैसे लगाए हैं उसका पूरा नुकसान ही उठाना पड़ेगा। हमारे इस बर्ताव से चीन में भारत की एक नकारात्मक छवि बन रही। हम जान कर एक देश के सामने खुद को दुश्मन की तरह पेश कर रहें। पाकिस्तानी की तरह यहां भी युद्ध का माहौल बनाया जा रहा है।

चीन के बारे में कहा जा रहा कि पाकिस्तानी की तरफ उसका रुख नर्म हैं, और उसकी नीति भारत विरोधी है। जाहिर है भारत के प्रति चीन की यह कोई नई नीति नहीं हैं। चीन पहले भी पाकिस्तान के समर्थन में दिखा है। यह चीन का कोई नया स्टैंड नहीं। उसने कहा है कि पाकिस्तान भी आतंकवाद का शिकार हो रहा। काफी समय से भारत और चीन के संबंध में तनाव की स्थिति देखी जा रही, मगर इस सबके बीच इधर दोनों देशों के बीच व्यापार संबंध में सुधार भी आया है। अब अगर ऐसी स्थिति जारी रही तो भारी आर्थिक तनाव पैदा होने का खतरा हो सकता है जिसका सबसे अधिक खामियाजा हर हालत में हमें ही उठाना होगा। और यह कैसी विडंबना है कि एक तरह हमारी सरकार चीनी सामना के बहिष्कार का माहौल बना रही, वहीं दूसरी तरह भारतीय सेना तथा चीनी सेना का संयुक्त सैन्य अभ्यास भी चल रहा है। दोनों देश की सेनाओं ने जम्मू-कश्मीर के पूर्वी लद्दाख में मिलकर सैन्य अभ्यास किया है। यह भारत सरकार के दोयम स्टैंड का प्रदर्शन तो नहीं है ?

अभी देश के दो बड़े राज्यों उत्तर प्रदेश और पंजाब में चुनाव होने वाला है, हमारी मोदी सरकार इस वक़्त देश में हर मोर्चे पर अपनी घोर विफलताओं और आक्रमक जन विरोधी रवैये को लेकर खुद को बेहद कमजोर महसूस कर रही। उसके खिलाफ विरोध के स्वर और उसके अंदरूनी तनाव भी अब खुलकर सामने आए हैं। बिहार के चुनाव में इस सरकार की बुरी स्थिति साफ देखने को मिली थी। कयास लगाये जा रहे हैं कि आने वाले इन चुनावों में उसकी स्थिति उससे भी बुरी होने जा रही है। चहुंतरफा संकट से घिरी इस सरकार को अपनी मौत साफ़ नज़र आ रही है और यही कारण है कि अपनी मौत टालने की ख़ातिर अब वह कोई भी हथकंडे अपनाने से बाज़ नहीं आने वाली। उसी का नतीजा है अंध राष्ट्रवाद का आतंक कायम करना, सीमा और देश के भीतर भी युद्ध जैसी स्थिति को निरंतर बनाये रखना और जो भी शक्तियां सरकार के इन घिनौने हथकंडे के विरोध में सामने आयें उन पर निरंतर हमले करवाना। कला और कलाकारों पर सबसे ज़्यादा हमला इसलिए भी क्योंकि वे ही हैं जो सत्ता की साजिशों पर सबसे अधिक पैनी नज़र रखते हैं और उसके विरुद्ध जन प्रतिकार की सबसे सशक्त धारा का निर्माण भी करते हैं।

पीड़ाजन्य अनुभव और डा आंबेडकर का स्त्रीवाद

डा. भीम राम आंबेडकर के स्त्रीवादी सरोकारों की ओर, क़िस्त तीन
शर्मिला रेगे की किताब  ‘अगेंस्ट द मैडनेस ऑफ़ मनु : बी आर आम्बेडकर्स राइटिंग ऑन ब्रैहम्निकल  पैट्रीआर्की’की भूमिका का अनुवाद हम धारावाहिक प्रकाशित कर रहे हैं. मूल अंग्रेजी से अनुवाद डा. अनुपमा गुप्ता  ने  किया है.  इस किताब को स्त्रीकाल द्वारा  सावित्रीबाई  फुले  वैचारिकी  सम्मान, 2015 से  सम्मानित किया  गया  था. 

1910-1950 के बीच लिखी गई मराठी स्त्रियों की आत्म कथाओं में इस सख्यभावी विवाह के कई अलग-अलग विवरण मिलते हैं, जाति का जिक्र बहुत कम होता है और यदि होता भी है तो इस तरह जैसे यह शब्द किन्हीं और लोगों के लिये इस्तेमाल किया जाता हो, जैसे मिलों में काम करने वाली, सब्जी बेचने वाली या फिर अतीत में जन्मी स्त्रियों के लिये. इस तरह जेण्डर और आधुनिकता पर मुखर हुए लेखन ने ब्राह्मण  स्त्रियों की सह अपराधिता को वर्ग-अधिकारों और  ब्राह्मण पितृसत्ता के पीछे छुपा दिया और इन स्त्रियों को परम्परा से संघर्षरत और आधुनिकाओं के रूप में स्थापित कर दिया. गैर दलित स्त्रीवादी भी अपने वर्ग की इस विखंडित आधुनिकता से अछूते नहीं रह सके. उन्होंने आंबेडकर की जिंदगी में सख्य-भावी विवाह के अभाव को ‘पत्नी’ की बजाये‘समुदाय’ को प्राथमिकता देने से जोड़ा और इसलिये स्त्रियों  के मुद्दे को टालने का इलजाम उन पर लगा दिया गया, उन्हें पर्याप्त रूप से स्त्रीवादी न मानने की यही वजह बना ली गई.

इसके उलट,आंबेडकर  ने आधुनिकता की एक ऐसी अवधारणा दी, जिसमें नये पश्चिमी विचारों तथा भारतीय इतिहास की समता व शान्तिकारक भौतिक परम्पराओं, जैसे बौद्व धर्म, को आपस में जोड़ दिया गया. ऐसा उन्होंने जाति आधारित शोषण को रेखांकित करके, वर्ण व्यवस्था को नकार कर और जाति के खात्मे को समतावादी समाज की ओर एक मात्र रास्ते की तरह वकालत करके किया. हिन्दू आध्यात्म के केंद्रीय मूल्यों का पुनः परीक्षण करते हुए वे एक नये भारतीय ज्ञानोदय के अग्रदूत बने. जाति और जेण्डर की नई संहिता की तथा आधुनिकता के क्रांतिकारी मायनों की बात की गई. कतिपय विद्वानों ने भारत की राजनीतिक आधुनिकता के इस रचनाकार्य को कलमबद्व किाय है जिसमें आंबेडकर ने जहां आभार प्रदर्शन की भाषा का विरोध करना सिखाया, जाति की श्रेणी बद्वधता में समाहित नकारात्मक अधिकारों की पोल खोली तथा स्वाभिमान, समता व अधिकारों की नई भाषा इजाद की. उर्मिला पवार व मीनाक्षी मून के आंबेडकरी  स्त्रियों पर शोध ने जाति-विरोधी आधुनिकता के निर्माण में दलित स्त्रियों के योगदान को पुन: स्थापित किया है. हालांकि अभी हमें इस दिशा में शोध की और भी ज्यादा जरूरत है कि किस तरह सार्वजनिक/निजी अवधारणा के जेण्डरीकृत आदर्शों और व्यवहारों ने वैकिल्पक आधुनिकताओं को रचने में मदद की. इन्होंने राजनीतिक/सामाजिक, उपनिवेशी/राष्ट्रीय, भारतीय परंपरा//पश्चिमी आधुनिकता और समुदाय/देश के द्वैतों से कहीं आगे जाने की कोशिश की. उदाहरण के लिये आंबेडकरी  प्रति समुदायों में उथल-पुथल के चलते तथा राष्ट्र व जाति के बीच द्वंद के कारण वैवाहिक संबंधों और गृहस्थी के सामने क्या परिवर्तन  गये थे? या किस तरह ब्राह्मण जाति के लिये पैदा हुई चुनौतियों ने ‘कुनबे’ की अवधारणाओं से जुड़े सिद्वांतों पर सवाल उठाये, क्या थोपे गये व चुने गये रिश्तों में द्वंद पैदा हुआ? सामूहिक सरोकारों के समन्वय ने क्या ‘नवीन’ गृहस्थियों और सामाजिकता को जन्म दिया? उपनिवेशी भारत में राष्ट्रीय व जाति विरोधी आंदोलनों के नेताओं की जीवनियों व आत्मकथाओं के तुलनात्मक अध्ययन से उस प्रक्रिया को समझने में काफी मदद मिल सकती है जिसने विभिन्न सामाजिक हलकों में निजी व सार्वजनिक की भिन्न-भिन्न पहलचान की परिभाषित किया.
अकादमिक क्षेत्र में जीवनी और इतिहास के बीच संबंध धीरे-धीरे गंभीर अध्ययन का विषय बनता गया है जिसके दो केंद्र बिन्दु थे.

जहां ‘महान नेताओं’ जैसे गांधी, नेहरू, सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जीवनियों व आत्मकथाओं को गंभीरता से लिया गया, वहीं इस राष्ट्रीय कुलीन वर्ग के ध्येयों से मतभेद रखने वाले राजनीतिज्ञों को नजरअंदाज किया गया. आंबेडकर के जीवनीकार गेल आमवेट ने रेखांकित किया है कि किस तरह उनकी भिन्न जातीय पृष्ठभूमि ने उनके राजनीतिक लक्ष्यों को प्रभावित किया. ‘‘चौदहवें बच्चे को जन्म देते समय उनकी मां की असमय मृत्यु, चैदह भाई-बहनों में सिर्फ सात का बच पाना, परिवार के भरण-पोषण के लिये मजदूरी करते समय बड़े भाई की मौत, उनके स्वयं के पांच में से चार बच्चों की अकाल मृत्यु……. ये अनुभव राष्ट्रीय कुलीनों के अनुभवों से बहुत अलग थे.’’ आमवेट ने नेहरू और गांधी के राष्ट्र के लिये त्याग के चयन को उनके परिवारों के आरामदेह रहन-सहन के बरक्स रखा है. इसके विपरीत आंबेडकर  की गृहस्थी को जीविका के लिये आर्थिक संघर्ष करना पड़ा. आंबेडकर  तथा गांधी-नेहरू के जीवन में अंतर का कारण आमवेट ने जाति और अस्पृश्यता के अनुभवों को बताया है. वे तर्क देती हैंः-

आंबेडकर  ने एक भारतीय और उपनिवेशी होने के नाते कुछ भेदभाव जरूर रखा था और इसलिये वे अपनी राष्ट्रीयता को अभिव्यक्त कर पाये. लेकिन ये अनुभव उनके अछूत होने के नाते सहे गये भेदभावों की तुलना में बहुत छोटे थे…. अलग पांत में बैठने को मजबूर किया जाना, अपनी पसंद के पाठयक्रमों में अध्ययन न कर पाना, दूसरे छात्रों द्वारा प्रताड़ित किया जाना, गरिमापूर्वक रहने व कार्य करने की जगह न ढूंढ़ पाना, इन सब अनुभवों को घोर व्यक्तिगत अपमान की तरह आंका गया न कि समाज में लंबे समय से चलने आ रहे जाने समझे अपेक्षित व्यहार की तरह. इन अनुभवों नेआंबेडकर  को जीवन के हर क्षेत्र में जातिगत भेदभाव को पहचानना सिखा दिया.
और इस भेदभाव की जननी अस्पृश्यता और ब्राह्मणवादी  ताकतों ने उनके लेखन व राजनीति को नकार दिया तो क्या आश्चर्य?मध्यम तथा प्रभुत्व संपन्न वर्ग के जीवन चरित ‘उन दिनों’ और ‘इन दिनों’ के युग्म से आकार लेते हैं, जिनमें एक आदर्श अतीत का बखान है. इसके विपरीत शोषित जातियों में जीवनी लेखन का काम सिर्फ इसी कारण स्थापित रखा जा सकता है कि ‘उन दिनों’ के शोषण व अपमान को ‘इन दिनों’ के स्वाभिमान समता और अधिकारों में परिवर्तित करने का काम ज्यादा जरूरी है और तुरंत किया जाना चाहिए.

सी.बी. खैरमोड़े द्वारा मराठी में लिखी गयी आंबेडकर की जीवनी से हम जान सकते हैं कि आंबेडकर अपनी आत्मकथा अंगे्रजी में लिखना चाहते थे और साथ ही गांधी की जीवनी भी. अनुसूचित जाति फेडरेशन के राष्ट्रीय संयुक्त सचिव और सुप्रतिष्ठित  दलित मराठी लेखक शंकर राव खरात उल्लेख करते हैं कि अम्बेडकर की मृत्यु के पश्चात उनके अध्ययन कक्ष से तीन नोट बुक्स मिली थीं, जो उनकी आत्मकथा के तीन खंडों के लिखे चिन्हित की गई थीं, लेकिन शायद एक राजनीतिक समुदाय गढ़ने, प्रभुत्वशाली ब्राम्हण इतिहास के पुनर्लेखन, हिन्दू कोड बिल लिखने और उसके लिये समर्थन जुटाने की फौरी जरूरतों के चलते उनके पास अपने बारे में लिखने का वक्त ही नहीं बचा था. इसमें कोई शक नहीं कि इतिहास को समझने की  हमारी कोशिश में यह हमारे लिये एक बड़ा नुकसान है, हालांकि वृहद जीवनियों और शहिरों द्वारा रची संगीत रचनाओं से आंबेडकरी की निजी व राजनीतिक जिंदगी पर काफी प्रकाश पड़ता है.
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डा. भीमराव आंबेडकर के स्त्रीवादी सरोकारों की ओर

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‘निजी’ आधार पर डा. आंबेडकर की ‘राजनीतिक छवि’ का स्त्रीवादी (?) नकार : दूसरी क़िस्त

 

आंबेडकर के उस लेखन और उस भाषणों को पढ़े, जिनमें उन्होंने अपनी निजी यादों को बांटा है-चाहे वह सतारा में बचपन में भोगा अस्पृश्यता का दंश  से या बड़ौदा में महाराज के यहां काम करते हुए ‘पारसी-इन’ से निकाल बाहर किया जाना हो (यह 1917 में कोलम्बिया विश्वविद्यालय से लौटने के बाद हुआ) या फिर कि वह घटना हो, जिसमें चालीस गांव के अछूत समुदाय के लोग उनके लिये एक गाड़ी चालक का बंदोबस्त नहीं कर पाये और उन्हें तुरत-फुरत जोड़कर बनाये गये तांगे में एक नौसिखिया चालक से काम चलाना पड़ा. यह स्पष्ट है कि निजी अनुभव सामाजिक की व्याख्या के स्रोत नहीं होते. बजाये इसके आंबेडकर  उन प्रक्रियाओं पर ध्यान केन्द्रित करते हैं, जो अनुभवों को परिभाषित करके परिवर्तन के बारे में नये तरीके से सोचने का रास्ता खोलती हैं. अनुभव, ज्ञान और परिवर्तन के बीच संबंध की यही वजह आंबेडकरी  अवधारणा है, जिसमें राजनीतिक आंदोलनों में निजी व सार्वजनिक को गढ़े जाने के भिन्न तरीकों की जांच पड़ताल महत्वपूर्ण हो जाती है.

शुरू में आंबेडकरी  आंदोलन के समृद्व दृश्य इतिहास से दो छवियों को लेते हैं. इनमें से एक आंबेडकर  परिवार की तस्वीर है, जिसमें रमाबाई बीच में है. आंबेडकर  और उनका बेटा यशवंत रमाबाई के बगल में  बायें ओर हैं. उनकी देवरानी लक्ष्मीबाई और बेटा मुकुंद दायी ओर है, ये लोग आंबेडकर  के भाई आनंद राव की मृत्यु के बाद परिवार में ही रहते रहे. आंबेडकर  का पालतू कुत्ता रमाबाई के पैरों के पास बैठा है. दूसरी तस्वीर एक लोकप्रिय पोस्टर है, जिसमें आंबेडकर  और रमाबाई के विवाह के भव्य आयोजन की कल्पना की गई है. इसमें वे मखमल के तकिये और सोने से मढ़ी कुर्सियों पर बैठे हैं. आंबेडकर  को एक किताब पकड़े हुए दिखाया गया है. खैरमोड़े की लिखी जीवनी के जरिये हम जानते हैं कि असल में इस विवाह को रस्में बहुत ही सादा तरीके से भायकला सब्जी मंडी में पूरी की गई थीं.

पारिवारिक चित्र आंबेडकर  के पारिवारिक माहौल का एक मानवीय पहलू पेश करता है, जो उनकी असाधारण राजनीतिक व अन्य उपलब्धियों से परे है. एक ओर यह हमारे सामने उस विशिष्ट व्यक्ति के रोजमर्रा के साधारण पारिवारिक जीवन की छवि रखता है, वहीं दूसरी ओर उन छोटी-छोटी खुशियों और चुनौतियों के बारे मेें खामोश रहता है, जिनसे घर बनता या बिगड़ता है. उदाहरण के लिये आंबेडकर  के पुस्तक प्रेम की वजह से बिगड़ा हुआ घरेलू बजट या भाई बलराम का अलग घर बसा लेना. पारिवारिक हंसी-खुशी के भी कुछ पल दिखाई देते हैं  जैसे किताबों पर ज्यादा खर्चे के लिये उलाहने मिलने पर आंबेडकर  का बाजार से बहुत ज्यादा सब्जियां और मछली खरीद लाना. बेटे राजरत्न की 1926 में मृत्यु पर परिवार मेें शोक का पारावार न था. बेटे की मौत के बाद आंबेडकर  ने चिकित्सक की सलाह को जीवन मंत्र बना लिया. रमाबाई को गर्भवती होने से बचना होगा. खैरमोड़े ने तफसील में बताया है कि रमाबाई के पढ़ने-लिखने से इंकार करने और हर वर्ष पंढरपुर की तीर्थ यात्रा की इच्छा जताने पर आंबेडकर  किस तरह नाराज होते थे. सबसे मार्मिक विवरण रमाबाई की मृत्यु पर आंबेडकर  के शोक का है. सिर मुड़ाये हुए, कफनी पहने हुए आंबेडकर  जैसे रमाबाई और यशवंत के स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही पर प्श्चाताप के रूप् में सन्यास लेने चले थे.

खैरमोड़े लिखित जीवनी के खण्ड-2 के अध्यायों के शीर्षक ‘रमाबाई का संसार’ तथा ‘नया संसार’ हमें प्रेरित करते हैं कि रमाबाई द्वारा जोड़कर रखे गये कुनबे व आंबेडकरी  जनों की राजनीतिक बिरादरी द्वारा बनते जाते एक नये वृहद परिवार के बीच रिश्तों को खंगाले.इसके लिये हमें स्मृति, जीवनी, कल्पना (जिस तरह रिश्ते हमारे मनों में जीवंत होते हैं) और रिश्तेदारियों के बीच घालमेल की जांच करनी होगी. हालांकि अभी हमारा लक्ष्य उर्मिला पवार द्वारा अभिव्यक्त आंबेडकर के स्त्रीवादी योगदान को नजरअंदाज किये जाने पर विचार करना है. इसे ध्यान में रखते हुए दूसरी तस्वीर पर आते हैं जो सभी अम्बेडकरी सभाओं में बहुत लोकप्रिय पोस्टर है.

प्रचलित आंबेडकरी  संस्कृति में आंबेडकर  के निजी जीवन के बारे में कई दुविधा में डालने वाली विविध कल्पनायें शामिल हैं.  काल्पनिक वैवाहिक तस्वीर में आंबेडकर  को किताब थामे हुए आखिर क्यों दिखाया गया है? उस किताब पर सुनहरे हर्फो  में ‘भारतीय कानून’ लिखा दिखाई देता है. यह दिलचस्प है, क्योंकि यह चित्र आंबेडकर की जिंदगी का वह बहुत पहले का पल दिखा रहा है, जब उन्होंने कानूनों और संविधान लिखने की शुरूआत ही नहीं की थी. कानून की किताब उनके हाथ में दिखाया जाना क्या वैसा ही है, जैसे अक्सर मूर्तियों में उन्हें भारतीय संविधान की प्रति लिये हुए दिखाया जाता है? एक काल्पनिक वैवाहिक चित्र में कानून की पुस्तक की उपस्थिति निजी/दाम्पत्य के दायरे में कुछ दिलचस्प संभावनाओं की बात करती है. क्या यह अप्रत्यक्ष रूप् से रमाबाई का उनके लेखन मेें योगदान दिखा रही है? या यह इशारा कर रही है किआंबेडकर के रोज बढ़ते पुस्तकों के भण्डार को संभालने के लिये बड़ा घर खरीदने के लिये किस तरह रमाबाई ने अपने जेवरात बेच दिये थे? इसकी व्याख्या हम चाहे जैसे करें, लेकिन विवाह के समय एक किताब की उपस्थिति एक बुद्धिजीवी के दाम्पत्य में निजी को राजनीतिक में पृथक रखने को असंभव करार दे रही है. यह अहम है कि रमाबाई सहज और खुश दिखाई दे रही हैं, पति की गोद में रखी किताब से कतई परेशान नहीं हैं. विवाह की राजनीतिक मान्यता को दर्शाने के लिये कानून तथा वरद मुद्रा में बुद्ध को पृष्ठभूमि में दिखाने की वजह से (आंबेडकर  के बौद्ध धर्म स्वीकार करने के बहुत पहले) वास्तुविक समय और परिस्थिति से परे चले जाया गया है. यहां ध्यान देने की बात यह है कि इस लोकप्रिय पोस्टर में वह सामूहिक कल्पना दर्ज हुई है जिसमें रमाबाई को आंबेडकर  के राजनीतिक योगदानों के पीछे मुख्य भूमिका निभाते हुए देखा गया है. चाहे वह संविधान हो या फिर बौद्व धर्मान्तरण. रमाबाई का आंबेडकर  की राजनीतिक परियोजनाओं से अटूट संबंध उन पुस्तिकाओं, गीतों व कैसेट्स में भी अनुभव किया जा सकता है ,जो रमाबाई के जीवन पर आधारित है और हर वर्ष निर्मित व वितरित की जाती है.



इन गीतों में रमाबाई को सभी दलितों की मां के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, आंबेडकर  के चरित्र व राजनीति में उनका ‘अप्रत्यक्ष’ योगदान याद किया जाता है, उनके जीवन के महत्वपूर्ण पड़ावों का वर्णन होता है, उन्हें अनोखा और असाधारण माना जाता है और इन पहलुओं को युवा दलित स्त्रियों के लिये एक आदर्श तथा प्रेरणास्रोत के रूप में प्रस्तुत किया जाता है. रमाबाई की मृत्यु के तेरह वर्ष पश्चात 1948 में आंबेडकर ने दूसरा विवाह किया. सविताबाई/ माई साहेब/शारदा कबीर एक ब्राह्मण  चिकित्सक थी और कुछ (हालांकि संख्या में कम) पुस्तिकायें व गीत उन पर भी बनाये गये हैं. लेकिन अधिकांश ऐसी रचनाओं में उनकी निंदा विश्वासघाती कह कर गई है. कुछ में तो उन्हें हत्यारिन कहा गया है.2003 में उनकी मृत्यु पर आंबेडकर  के जीवन और मृत्यु में उनकी भूमिका पर एक तर्क संगत बहस की कोशिश की गई थी.
क्रमशः 

औरतें – क़िस्त चौथी ( स्पैनिश कहानियां )

एदुआर्दो गालेआनो / अनुवादक : पी. कुमार  मंगलम 

अनुवादक का नोट 

“Mujeres” (Women-औरतें) 2015 में आई थी। यहाँ गालेआनो की अलग-अलग किताबों और उनकी लेखनी के वो हिस्से शामिल किए गए जो औरतों की कहानी सुनाते हैं। उन औरतों की, जो इतिहास में जानी गईं और ज्यादातर उनकी भी जिनका प्रचलित इतिहास में जिक्र नहीं आता।  इन्हें  जो चीज जोड़ती है वह यह है कि  इन सब ने अपने समय और स्थिति में अपने लिए निर्धारित भूमिकाओं को कई तरह से नामंजूर किया।

 

दुनिया सिकुडती जाती है

आज मातृभाषाओं का दिन है.हर दो हफ्ते पर एक भाषा मर जाती है.यह दुनिया और सिमट जाती है, जब वह अपने कुछ इंसानी लफ्जों और मुहावरों को खो देती है, उसी तरह जैसे वह पौधों और जीवों की विविधता के रंगों को खो रही है.आन्खेला लोइज ने 1974 में इस दुनिया को विदा कहा. वह दक्षिण अमरीका या कहें दुनिया के ही आखिरी छोर पर बसे Tierra del Fuego (तिएर्रा देल फुएगो-आग़ की जमीन) में रह रहे ओनास मूलवासियों के आख़िरी लोगों में से थीं. और अपनी जबान बोलने वाली आख़िरी इंसान भी.
आन्खेला अकेले ही गाया करती थीं. वह ये गीत किसी के लिए भी नहीं गाती थीं. उस जबान में जो अब किसी को याद नहीं थी.मैं उनके निशानों पर चलती जाती हूँ, जो अब रहे नहीं, चले गए हैं मैं भूली-बिसरी गुमनाम-सी हूँ अब
अपने गुजरे दिनों में ओनास लोग कई देवी-देवताओं को पूजते थे. सबसे प्रमुख देवता Pemaulk (पेमौल्क) कहलाता था.पेमौल्क का मतलब “शब्द” था!

मोहतरमा जो तीन सदियों की गवाह बनीं


एलिस 1686 में एक गुलाम के रूप में जन्मी थीं और एक सौ सोलह साल की उम्र में एक गुलाम ही मरीं.
1802 में उनकी मृत्यु के साथ अमरीका में अफ्रीकी लोगों की याद का एक हिस्सा भी मर गया था. एलिस को न पढ़ना आता था न लिखना, लेकिन वह उन कई आवाजों से भरी हुई थीं, जो दूर से आई दास्तानों तथा पास की जिन्दगी के किस्सों-इतिहासों को सुनाया और गाया करती थीं. इनमें से कुछ कहानियाँ उन गुलामों की सुनाई होतीं जिन्हें भागने में एलिस मदद किया करती थीं.नब्बे की होने पर उनकी आँखों की रोशनी जाती रही.
एक सौ दो आते आते रोशनी वापस आ गई थी.-यह ईश्वर था- एलिस ने कहा. वह मुझे कभी निराश नहीं करता.
उन्हें सब फेरी डंक्स वाली एलिस बुलाया करते. अपने मालिक के हुक्म पर वह उस ferry (यानी नाव) पर काम करती थीं जो यात्रियों को डेलावेयर नदी के इस पार से उस पार ले आया-ले जाया करती. जब सवारी, जो हमेशा गोर होते थे, इस जर्जर बुढ़िया का मजाक उड़ाती तब वह उन्हें नदी के दूसरे छोर पर छोड़ आया करतीं. वे चिल्ला-चिल्लाकर उन्हें वापस बुलाया करते, लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं थी. वह जो कभी अंधी रही थी, आखिर बहरी जो थी.

मूलवासियों का दिन

रिगोबेर्ता मेंचू ग्वातेमाला में जन्मी थीं. स्पेनी आक्रमणकारी पेद्रो दे आल्वारादो की ‘विजय’ के चार सौ सालों बाद. अमरीकी राष्ट्रपति द्वाईट आइजनावर की ‘विजय’ के चार साल के बाद.
1982 में जब सेना ने माया आदिवासी लोगों की पहाड़ियों को उजाड़ा तब रिगोबेर्ता के करीब–करीब पूरे परिवार को मार डाला गया था. उनका वह कस्बा भी नक़्शे से गायब कर दिया गया जहाँ नन्ही रिगोबेर्ता की नाभीनाल गड़ी थी ताकि उसकी जड़ें जमीन में गहरे फैल सकें. दस साल बाद उन्हें शान्ति का नोबेल मिला. रिगोबेर्ता ने कहा:-हालाँकि यह पाँच सौ सालों की देरी से आया है, मैं इस पुरस्कार को माया लोगों के लिए आदर और सम्मान कीतरह स्वीकार करती हूँ. माया लोग सचमुच धैर्य का समाज हैं. वे पाँच सौ सालों का कत्लेआम झेलकर आज भी खड़े हैं.वे जानते हैं कि समय मकड़ी की तरह धीरे-धीरे बुनता है.

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फ्लोरेंस


दुनिया की सबसे मशहूर नर्स फ्लोरेंस नाइटिंगेल ने नब्बे साल की अपनी जिन्दगी का बड़ा हिस्सा भारत को दिया था. वह, हालाँकि, कभी उस मुल्क को नहीं जा पाईं जिसे वह प्यार करती थीं.
फ्लोरेंस खुद बीमार हो गई थीं. क्रीमिया के युद्ध में उन्हें छूत की एक असाध्य बीमारी ने आ घेरा था. तब, हालाँकि, लन्दन के अपने कमरे से ही कितने ही लेख और चिट्ठियों के जरिए वह भारत की सच्चाइयाँ ब्रिटिश जनमत के सामने ला रही थीं.भुखमरी पर ब्रिटिश साम्राज्य की असंवेदनशीलता:
फ्रांस-प्रसिया के मुकाबले पाँच गुना ज्यादा लोगों की मौत. किसी को कोई खबर नहीं. हमने उड़ीसा की भुखमरी पर कुछ नहीं कहा, जब एक-तिहाई आबादी को वहाँ के खेत-मैदानों को अपनी हड्डियों से सफ़ेद कर देने पर मजबूर किया गया.
गावों में संपत्ति का बँटवारा:
यहाँ तो तम्बूरा बजने के लिए खुद ही रकम अदा करता है. एक गरीब किसान हर वो काम करने की रकम अदा करता है, जो वह खुद करता है या जिसे जमींदार खुद न कर उससे करवाता है.
भारत में अंग्रेजी न्याय:
हमें बताया जाता है कि गरीब किसान को अंग्रेजी न्याय का सहारा हासिल है. ऐसा कुछ नहीं है. कोई भी इंसान वह रखने का दावा नहीं कर सकता जिसका वह इस्तेमाल नहीं कर सकता.
गरीबों का सब्र
किसान-विद्रोह पूरे भारत के लिए एक आम बात बन सकते हैं. कोई भी यह दावा नहीं कर सकता कि ये लाखों भारतीय, जो अभी खामोश हैं और सब्र रखे हुए हैं वे हमेशा ऐसे रहेंगे. एक दिन गूंगे बोलेंगे और बहरों को सुनना होगा.

लेखक के बारे में

एदुआर्दो गालेआनो (3 सितंबर, 1940-13 अप्रैल, 2015, उरुग्वे) अभी के सबसे पढ़े जाने वाले लातीनी अमरीकी लेखकों में शुमार किये जाते हैं। साप्ताहिक समाजवादी अखबार  एल सोल  (सूर्य) के लिये कार्टून बनाने से शुरु हुआ उनका लेखन अपने देश के समाजवादी युवा संगठन  से गहरे जुड़ाव के साथ-साथ चला। राजनीतिक संगठन से इतर भी कायम संवाद से विविध जनसरोकारों को उजागर करना उनके लेखन की खास विशेषता रही है। यह 1971 में आई उनकी किताब लास बेनास आबिएर्तास दे अमेरिका लातिना (लातीनी अमरीका की खुली धमनियां) से सबसे पहली बार  जाहिर हुआ। यह किताब कोलंबस के वंशजों की  ‘नई दुनिया’  में चले दमन, लूट और विनाश का बेबाक खुलासा है। साथ ही,18 वीं सदी की शुरुआत में  यहां बने ‘आज़ाद’ देशों में भी जारी रहे इस सिलसिले का दस्तावेज़ भी। खुशहाली के सपने का पीछा करते-करते क्रुरतम तानाशाहीयों के चपेट में आया तब का लातीनी अमरीका ‘लास बेनास..’ में खुद को देख रहा था। यह अकारण नहीं है कि 1973 में उरुग्वे और 1976 में अर्जेंटीना में काबिज हुई सैन्य तानाशाहीयों ने इसे प्रतिबंधित करने के साथ-साथ गालेआनो को ‘खतरनाक’ लोगों की फेहरिस्त में रखा था। लेखन और व्यापक जनसरोकारों के संवाद के अपने अनुभव को साझा करते गालेआनो इस बात पर जोर देते हैं कि “लिखना यूं ही नहीं होता बल्कि इसने कईयों को बहुत गहरे प्रभावित किया है”।


अनुवादक का परिचय : पी. कुमार. मंगलम  जवाहर लाल नेहरु विश्विद्यालय से लातिनी अमरीकी साहित्य में रिसर्च कर रहे हैं .  

क्रमशः

सुनंदा का दरवाजा

प्रो.परिमळा अंबेकर

हिन्दी विभाग , गुलबर्गा वि वि, कर्नाटक में प्राध्यापिका और विभागाध्यक्ष . आलोचना और कहानी लेखन  संपर्क:09480226677

आशी….. आशी…. । अश्विनी के कमरे का अधभिडा दरवाजा खोलकर सुनंदा हडबडा कर भीतर गयी। उसकी पुकार कमरे की चाहरदीवारी से टकराकर लौट आयी। कमरे के कोने में पडा खाली सुनसान बिस्तर जैसे उसेे चिढा रहा था। सुनंदा पैर से सर तक सुन्न !! खाली बिस्तर…. खाली कमरा… !! उसके  दिल की धड..धड धडक…..खाली कमरे को भरने लगा। अंतडियों को मरोडकर निकली चीख उसके गले में आकर अटक गयी।  आगे बढकर बिस्तर का हत्था पकडे-पकडे सुनंदा बैठ गयी! आशी… आशी…. शब्द उसके सूखे जर्द होंटों पर बुदबदाने लगे। कल शाम से ही एक अजीब सा डर, जो काला चद्दर बनकर उसके मन और बुद्धी को ढापे ढापे चल रहा था , आज दिन के उजाले में वही डर सुनंदा के सामने नंगा होकर नाच रहा था। आज उसकी आशी…. उसके दरवाजे को लांघकर चली गयी थी .. !!

आये हर रिश्ते को नकारती बेटी अश्विनी सुनंदा के सामने पहाड बनकर खडी थी।  जो न चढते बनता… न उतरते बनता। आये दिन एक अजीब किरचन उसके मन में वक्त बेवक्त किरकते जाती… जैसे गहरे पानी के नीचे कोई  खंजर हिल रहा हो ..!! सुनंदा नहीं चाहती थी कि कोई ऐसा दरवाजा वह खोले जिसके बाहर के सच को देखने के लिए , मजबूर न हो जाय , वह विवश न हो जाय !! लेकिन कल पिंकी से खुली बात ने  जैसे सुनंदा के पैर की जमीन ही हिला डाली। शाम से पिंकी की आवाज तलवार बनकर लटक रही थी उसके सर पर । ‘‘ अव्वा…आशक्का… शादी नहीं करती, बोलती है।‘‘ सुनंदा को लगा जैसे सांस लेना मुश्किल हो रहा हो। सांस जैसे फेफडे में ही घुमडने लगा है। पिंकी फिर बोल पडी थी। ‘‘ अव्वा…. अक्का… आॅफिस के अपन बाॅस के साथ …. ‘‘  पिंकी रूक रूककर बोलते जा रही थी, लेकिन सुनंदा के कान बजने  लगे। ‘‘ आशक्का का वह बाॅस… अव्वा जात से  …. !!  पिंकी की धुनीधुनी आवाज उसके कान के परदे पर फडफडाने लगी… कटे परों की गौरया की तर।  पिंकी के चेहरे को टकटकी बांधे देखती खडी रह गयी सुनंदा।
 
सुनंदा की शादी हुये आज को बीस-बाइस बरस हो गये। एक दो साल के अंतराल में सुनंदा तीन बच्चों की माॅं बन गयी। पहली दो बेटियाॅं पीठ पर पीठ आ गयी थीं। हर बुरा होने और गलत घटने के पीछे बहू का दोष दिखानेवाली उसकी सांस जैसे सुनंदा के गले पर सवार हो गयी।  न कोई मंदिर रहा होगा, न कोई टेकडी बची होगी, जहाॅं सुनंदा  ने अपनी  मिन्नत का आॅंचल न पसारा हो। तीसरी बार जब उसकी गोदभरी तो बेटा नसीब हआ उसे। उसे लगा अब सारी मुश्किलें दूर हो गयीं। लेकिन उसकी  नसीब में मुश्किलें तो घर के मकडी के जालें थीं, जितना साफ करे उतना फैलें। सुनंदा अपढ ,अपने बच्चों के भविष्य की चिंता में सूखी जा रही थी। अवराद से शहर कलबुर्गि का फासला बस आधे घंटे का था। वह चाहती कलबुर्गि में घर बसाये । लेकिन, खेतीबाडी का घर, घर  पर बीमार ससूर, केवल पीता.. बतियाता.. रहता पति… , घर के सदस्यों की किटपिट !! विवश थी सुनंदा। मन को मनवाने के लिये उसे एक बहाना मिलगया जो काफी था … उस छोटे से गाॅंव में सरकारी हाईस्कूल जो बसा हुआ था.

उसकी शादी अजीब सी शादी थी। तब वह रही होगी उन्नीस बीस बरस की। शांत, स्वभाव से मर्जीखोर। सबकी  मर्जी रखती। यहाॅं तक कि उसकी शादी भी उसके इस मर्जीखोर स्वभाव का बस एक नमूना रहा था। बडी दीदी मंगला की शादी हुई । अपनी हैसियत से भी बढकर शादी बनायी थी माॅं और बाबूजी ने। लडका गाॅंव का, खानदान देखी पहेचानी….सबकुछ ठीक- ठाक रहा।  लेकिन, कौन जाने, कहर इस कदर टूटेगा। आठ महीने का बच्चा पेट में और इधर मंगला ने आॅंखे मूॅंद ली !! गाॅंव वाले पीठ पीछे बात भी बनाने लगे । मंगला के पति और ससुराल का दोष गिनाया जाने लगा। लेकिन गाॅंव की यादाश्त की आयु भला होती कितनी है ? मौत के मातम पर शहनायी के सुर चढने में देर नही लगी ….!! अपने विधुर बेटे के लिये बहू का हाथ मांगने फिर से आ धमके ससुराल वाले। मंगला न रही तो क्या छोटी सुनंदा ही सही। दहेज का जोर नहीं… शादी का खर्चा नहीं… फिर से कर्जे का टंटा नहीं ..!! घर आया रिश्ता ठुकराया  कैसे जाय …? और सुनंदा के लिये … ? आखिर माॅं और बाबूजी की मान मर्जी ठहरी … !! कभी कभी सुनंदा को लगता, कितनी सरल और सहजता से पूछ लिया था माॅं ने उससे या उससे पूछने का केवल रस्म अदायगी हुई थी ?  न कोई अचकचाहट , न दुविधा !! ना कैसे कर सकती थी  सुनंदा। मर्जीखोर सुनंदा … !! लेकिन … उसकी मर्जी का क्या … ? किसी ने नहीं पूछा… किसी ने नहीं जाना। जरूरी भी नहीं समझा…. !! लेकिन….. ? लेकिन क्या ? कुछ लेकिन उत्तर के मोहताज नहीं होते है… बस नहीं होते !



लेकिन… फिर वही,  लेकिन उसके सामने आज फिर अलग रूपोंअंदाज में उठ  खडा हुआ था। जिसका उत्तर अब खुद सुनंदा को देना था. पिंकी की बातें उसको भीतर तक हिलाकर रख दिये थे । शाम से वह जड खोदे पौधे की तरह मुरझा गयी थी । एक ही आवाज उसके सामने गूॅंजे जा रहा था। आखिर वह शहर आयी क्यूॅं ..? सुनंदा को लगा जैसे जीवन भर घिसा उसका चंदन मोरी में बहे जा रहा है। सास -ससूर के न रहने पर सुनंदा ने पति को बच्चों के भविष्य का वास्ता देकर कलबुर्गि ले आयी थी। सबकुछ पटरी पर बैठ ही रहा  था. लेकिन… पति के व्यसनों भरा बेतरतीब जिंदगी के चलते वह बच्चों का ब्याह तक नहीं कर सका। विधवा सुनंदा, एक साल तक घर से बाहर निकलने से कतराती रही। झूठे पति का सच्चा शोक मनाती रही। यह सब कबतक चलता ? आशी के लिये लडका ढूॅंढना  है , पिंकी की पढायी,  अमित की इंजिनियरिंग सीठ की चिंता।

रात घिरने लगा था। आशी के कमरे की ओर जाते सुनंदा के कदम में कील गडे जा रहे थे। दूसरों की मर्जी जीती आयी सुनंदा, अपनी मर्जी को माॅंगने के लिए अपने आप से लड रही थी !! अपनी शादी के लिये तो उसने ऐसे सर हिला दिया था जैसे मदारी का बंदर !! भीतर से किवाड को बंद कर लिया। धीरे से सरकते हुए उसके पैरों के पास जाकर बैठ गयी। झट उसके पैरों को अपने हाथों में ले लिया। अनायास उसके होंठ हिलने लगे , वह बडबडाने लगी  – ‘‘आशी मै तमाम जिंदगी  दूसरों के पैर पडते ही आयी हूॅं, आज तेरा ही सही … कल सुबह दस बजे लडकेवाले आ रहे हैं, अमित उन्हे लेने जा रहा है। जरा सोच ले बेटा… ‘‘  बेटी के उत्तर को सुनने का धैर्य उस समय उसमें नहीं  था। झट कमरे से बाहर निकल आ गयी थी सुनंदा !!
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उस दिन सुबह सुबह …..झुककर रंगोली की लकीरें खीचती सुनंदा ने आहट पाकर सर उठाकर देखा, सामने आशी खडी थी !! बगल में बच्ची भी … । झुकी कमर को हाथ का सहारा दिया, और सीधे खडी हो गयी वह। एक पल बस देखती ही रही। पीछे किसी और के आने की आहट की कल्पना से झांककर देखा। पर वहाॅं कोई नहीं था। एक लंबे निश्वास की गर्मी एक अजीब हॅंसी बनकर उसके होटों पर तैर गयी। आशी के आॅंखों का रूखापन उससे बहुत कुछ कह रहा था। लेकिन बदले में सुनने का धैर्य आज भी सुनंदा में नहीं रहा था। उसेे लगा …. बीस साल पहले उससे बिछुडी दीदी मंगला और उसका बच्चा आज फिर उसके सामने आकर खडे हैं। अंतराल की आग से सूखीं उसकी आॅंखें फिर से नम हो गयीं। रंगोली की लकीरों के इसपार खडी सुनंदा की दोनों बाहें धीरे -धीरे उपर उठकर सामने की ओर पसर  गये  !!
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साहबान…. कदरदान…. देखा आपने… नहीं नहीं सुना आपने… यह है कहानी दरवाजे  की… सुनंदा के घर के दरवाजे की…. जो कभी बंद नहीं हुई … पराये बने अपनों के लिये भी नहीं !! उस्ताद हाॅं में हामी भरते ही, फिर से मदारी जोर- जोर से ऐलान करने लगा !! सायबान यह दरवाज्जा काठ के पटों के जोडन से या.. लोहे के पतरों के ठोकन से नहीं बना है….. । उस्ताद प्रश्न किया … बोल मदारी, तो यह दरवाजा  बना कैसे ..? अपने उस्ताद के प्रश्न से और उत्साहित हुआ मदारी , गले का बलगम साफकर , हाथ की लकडी को नचाते हुवे कहने लगा ‘‘ सुनिये उस्ताद … और सुनिये सब सायबानों … अपने जिगर के पट्टों को चीरकर … कीले से ठोंककर बनाया है सुनंदा ने …इस दरवाजे को !! कोठरी  की अंधियारे को गलाकर, उजाले की रंगत चढाया है इसपर … और … उस्ताद… इसपर जडी है कुंडी…. कुंडी पर ताला… लेकिन यह ताला तो ऐसा ताला है कदरदान … जो हर किसी की चाबी से खुले … !!



बंबई पवई के हीरानंदानी गार्डेन्स के सामने मदारी का खेल पूरे रंगत को चढा था। उस्ताद ने फिर सवाल किया  ‘‘… बोल मदारी ऐसे दरवाजे कहाॅं मिलेंगे … क्या सुनंदा जैसे लोग बनाते है इन्हें या सरकार की कोरट कचहरी में बनते हैं ऐसे दरवाजे.. मदारी.. ऐसे दरवाजे बनाने के लिये कहता कौन है ? उस्ताद के तरकश से सीधे आते सवालों को देख मदारी सर खुजाने लगा ‘‘ अरे.. यह क्या …? उस्ताद का यह सवाल तो खेल के पिलान में नहीं  था ? उस्ताद मुझे फसाना चाहता है .. ?  बना बनाया खेल बिगडता देखकर मदारी चट् गडे बंबू उखाडने लगा … और उस्ताद की ओर घूरते हुए चलता बना।

1990 के बाद का हिंदी समाज और अद्विज हिंदी लेखन

प्रमोद रंजन

 संपादक,फारवर्ड प्रेस. बहुजन साहित्य की अवधारणा सहित चार अन्य किताबें प्रकाशित. ईमेल आईडी janvikalp@gmail.com



1990 का दशक वैश्विक परिदृश्य अनेक सकारात्मक-नकारात्मक परिवर्तनों का  वाहक बना था. भारत भी इससे अछूता नहीं रहा. विशेषकर उत्तर के राजानीतिक और धार्मिक जीवन में तो यह दशक एक जलजला लेेकर ही आया. मंडल कमीशन के आधार पर अन्य पिछड़ा वर्गों को आरक्षण दिए जाने (7 अगस्त, 1990), उदारीकरण की नीतियां लागू किये जाने (24 जुलाई, 1991), अयोध्या में बाबरी मस्जिद को ढाहे जाने (6 दिसंबर, 1992) ने गंगा-यमुना के मैदानों में ऐसी उथल पुथल मचायी, जिससे हिंदी पट्टी के नाम से जाने जाने वाले इन प्रदेशों का शायद ही कोई नागरिक अछूता रहा हो.

प्रोफेसर देवेंद्र चौबे ने इस घटनाक्रम की व्याख्या इस प्रकार की है ‘‘भारतीय समाज और राजनीति में मंडल कमीशन अर्थात् 1990 के बाद परिवर्तन की जो प्रक्रियाएं दिखलाई पड़ती हैं वह तो है ही, लेकिन भारतीय परिदृश्य के समानांतर अगर हम वैश्विक परिदृश्य पर नजर डालें तो साफ पता चलता है कि परिवर्तन की ये प्रक्रियाएं दूसरे विश्वयुद्ध के बाद ही शुरू हो गई थीं. जब जर्मनी और इटली में नस्ल या अफ्रीका और लैटिन अमेरिका सहित अनेक देशों में रंग के नाम पर किए जा रहे उत्पीड़न के खिलाफ उत्पीड़ित समुदाय उठ खड़ा होता है और प्रतिरोध की एक समानांतर ताकत विकसित करता है. भारतीय प्रसंग में 1947 में देश विभाजन, नई सामाजिक-आर्थिक, राजनीतिक स्थितियां भी सांस्कृतिक व्यवस्था के लिए एक प्रस्थान बिंदु था. ..1990 के बाद परिवर्तन की जो प्रक्रिया दिखलाई पड़ती है उसकी एक अंतर्धारा पहले से ही चली आ रही थी जिसकी व्यापक परिणति साहित्य और विचारधारा की दुनिया में 90 के बाद दिखलाई पड़ती है. अगर हम ध्यान दें तो पता चलता है कि इन आंदोलनों और संघर्षों ने भारतीय समाज और राजनीति के क्षेत्र में कुछ ऐसे लोगों को जन्म दिया, जिन्होंने संरचनात्मक स्तर पर बदलाव लाने की प्रक्रिया शुरू की. चाहे वह दलित प्रसंग में कांशीराम हो या नक्सलवाद के संदर्भ में चारू मजूमदार अथवा पिछड़े वर्ग के सामाजिक परिवर्तन के एक मुख्य कारक के रूप में कर्पूरी ठाकुर. इस तरह के कई और लोग अथवा नायक हैं जिन्होंने भारतीय समाज, राजनीति, विचार और उसकी संरचना को बुनियादी स्तर पर बदलने की कोशिश की. इसी का परिणाम था कि 1990 तक आते-आते एक बड़े बदलाव के संकेत दिखलाई पड़ने लगे. मंडल कमीशन को लेकर हुआ आंदोलन, बाबरी मस्जिद का ध्वंस होना और आर्थिक उदारीकरण तथा भूमंडलीकरण की प्रक्रियाएं आदि इन बदलावों के प्रत्यक्ष कारक बने.’’(1)

भूमंडलीकरण के आलोचक रहे अभय कुमार दुबे भी इस निरंतरता को रेखांकित करते हुए कहते हैं कि ‘‘पहली नजर में लगता है कि भूमंडलीकरण का यह पल अचानक कहीं से आया और हम पर हावी हो गया. लेकिन, असल में इस लम्हे के लिए धीरे-धीरे कई साल से राष्ट्रातीत और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक जमीन पक रही थी.‘ (2) अभय उन बुद्धिजीवियों को भी आड़े हाथों लेते हैं जो यह कहते हैं कि ‘‘अगर 15 अगस्त राजनीतिक आजादी का दिन माना जाएगा तो 24 जुलाई को आर्थिक आजादी का प्रतीक माना जाना चाहिए.‘‘ उनका मानना है कि यह कथित ‘‘आर्थिक आजादी परमिट कोटा राज खत्म करके ऐसा निजाम बनाने की कोशिश भर नहीं थी, जिसमें राष्ट्र और नागरिकों का लाभ सर्वोपरि होता. इस आर्थिक आजादी का मतलब न केवल भारतीय अर्थव्यवस्था का विश्व बाजार से जुड़ते चले जाना है, वरन् भारतीय वित्तमंत्री को अंतररार्ष्ट्रीय मुद्रा कोष  और विश्व व्यापार संगठन के दफ्तर में जा कर अपने कामों का हिसाब देना है. उसे अंतराष्ट्रीय रेटिंग ऐजेंसियों द्वारा दी गयी सनद पर मोहताज रहना है. इसका मतलब यह भी है कि भारतीय अर्थव्यवस्था को धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी के रहमो-करम पर निर्भर होते चले जाना है.‘‘ (3) मीडिया शिक्षण से जुड़े आनंद प्रधान भी मानते हैं कि ‘‘मुक्त बाजार एक विचारधारा है जो ‘विचारधारा के अंत’ के बाद विश्वविजेता बन कर उभरा है. इसलिए यह मुक्त बाजार हवा में नहीं बना या बन रहा है, बल्कि भूमंडलीकरण, उदारीकरण, निजीकरण के जरिए विश्व स्तर पर और विभिन्न देशों के अंदर स्वयं को संगठित और सशक्त कर रहा है. रूप (फार्म) के स्तर पर भूमंडलीकरण का आकर्षक चोला पहने, मुक्त बाजार चाहे अपनी वल्दियत छुपाने की कितनी भी कोशिश करे, उसका सार या अंतर्वस्तु  साम्राज्यवाद की पुनःस्थापना है.’’(4)

उदारीकरण के बाद आये विभिन्न परिवर्तनों में से एक – बढ़ती अश्लीलता और घरों में बंद रहने वाली भारतीय स्त्री की छवि का टूटना भी लेखकों की चिंता का प्रमुख कारण है.  उदारीकरण के बाद फिल्म, टीवी सीरियलों व समाचार माध्यमों की प्रकृति में आये परिवर्तनों को चिन्हित करते हुए समरेंद्र सिंह कहते हैं कि ‘‘उदारीकरण और ध्रुवीकरण के प्रभाव में स्त्री के बचे-खुचे स्वाभिमान और सम्मान को उससे छीन लिया गया और उसे ‘सेक्सी-सेक्सी‘ और मस्त-मस्त चीज में परिवर्तित कर दिया गया.‘‘(5)  इसी क्रम में अरूण कुमार त्रिपाठी कहते हैं कि ‘‘डांस बारों की लड़कियों में ज्यादा संख्या उनकी है जो या तो दलित हैं या फिर नट जैसी नाचने-गानेवाली आदिवासी (घुंमंतु) जातियां हैं… गरीब वर्गों के पारंपरिक व्यवसाय के खत्म होते जाने और उदारीकरण के दौर में स्त्रियों पर देह-प्रदर्शन और देह-व्यापार का दबाव बढा है.‘‘(6)

इसी दौर में लागू हुए मंडल कमीशन के बारे में ख्यात वामपंथी कथाकार भीष्म साहनी कहते हैं कि ‘‘जिस ढंग से आपने इन नौकरियों की बात उठाई है, आप इन्हें कुछ नौकरियां दे भी देंगे तो क्या सचमुच इनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति में अंतर आएगा? हां! इसका लाभ एक जरूर होगा कि ये लोग अपने अधिकारों के प्रति अधिक सचेत हो जाएं और शायद इनमें किसी हद तक एकजुटता भी आए, पर इनका उत्पीड़न करने वाले तत्व भी अधिक उत्तेजित हो उठेंगे. तब पिछड़े हुए गांवों में इनकी रक्षा कौन करेगा? इन नौकरियों से इनकी आर्थिक स्थिति कितनी मजबूत हो जाएगी कि वे इस उत्पीड़न का डटकर मुकाबला कर सकेंगे? आपने जल्दबाजी में जो कदम उठाया है उसका एक नतीजा तो जरूर निकलेगा कि हमारे समाज में जात-पात का जंतु और अधिक खूंखार बनेगा….इस स्थिति में यही बेहतर होगा कि इस समय मंडल कमीशन की सिफारिशों के क्रियान्विति को स्थगित किया जाए.’’  (7) वे आरक्षण का विरोध करने वाले संगठनों के सुर में सुर मिलाते हुए कहते हैं कि ‘‘सवाल ऊंची या नीची जात का नहीं है, हमारा देश, अपनी अनगिनत कमजोरियों-बुराइयों के बावजूद अपने पिछड़ेपन से जूझ रहा है, हमारे विद्यार्थी कड़ी मेहनत करते हैं, शिक्षा के क्षेत्र में होड़ बढती जा रही है, पढाई का बोझ बच्चों पर उत्तरोत्तर बढता जा रहा है. उस स्थिति में हमारा कोई अधिकार नहीं है कि हम किसी योग्य विद्यार्थी को उसकी संभावनाओं से वंचित करें. समाज को उनके प्रति भी उतना ही बड़ा दायित्व है जितना उन पिछड़ी जातियों के प्रति जो शताब्दियों से उपेक्षित और वंचित रही हैं. पर आप एक के मुंह से कौर छीनकर दूसरे के मुंह में डालें, इसका तो आभास मात्र भी देना गलत है.’’ (8) ख्यात मार्क्सवादी आलोचक रामविलास शर्मा कहते हैं कि क्या ‘‘कुछ बिरादरियों को संगठित करने से क्या जात-बिरादरीवाद खत्म हो सकता है? हमारा कहना है यह है कि इसे खत्म करने के लिए वर्ग के आधार पर लोगों को संगठित करना चाहिए. गरीब किसानों को जाति के आधार पर विभाजित करने से किसको लाभ होता है? इसे धनी किसानों और पुराने जमींदारों का लाभ होता है.’’  (9)जबकि नामवर सिंह कहते हैं कि ‘‘जबसे आरक्षण चला है, तब से जातिवाद बढ़ा है‘‘.(10)

इसी प्रकार दक्षिणपंथ के हिमायती माने जाने वाले ख्यात कथाकार शैलेश मटियानी मंडल कमीशन की अनुशंसाओं को लागू किये जाने पर में कटू शब्दों का प्रयोग करते हुए कहते हैं कि ‘‘मंडल आयोग की सबसे भयानक विसंगति ही यही है कि इसने जाति व्यवस्था की टूटती दीवारों को नए सिरे से अभेद्य बनाए जाने की दुरभिसंधि का रास्ता खोला है. आर्थिक आधार पर आरक्षण से इंकार, स्पष्ट है कि उद्देश्य सिर्फ जातियों के वोटों के धनाढ्य सौदागरों के निहित स्वार्थों की पूर्ति है-पिछड़ी जातियों को सामाजिक परिप्रेक्ष्य में आगे लाना नहीं. पिछड़ी जातियों के धनाढ्यों के मोहनों के लिए भी आरक्षण और सवर्ण जातियों के लल्लुओं तक को साफ इंकार के द्वारा मंडल आयोग ने सामाजिक न्याय के सारे पाखंड को खुद ही उजागर कर दिया है. वास्तविकता यह है कि मंडल आयोग की निष्पत्तियां सामाजिक न्याय नहीं, बल्कि जातीय घृणा और प्रतिशोध की तर्क प्रणालियों पर आधारित हैं. ढाई हजार वर्षों का बदला चुकाने की सारी विकल्पविह्वलता सामाजिक परिवर्तन का जातिवादी निदान खोज निकालने के उस लल्लूचिंतन की उपज है, जिसे सामाजिक न्याय का मुखौटा ओढ़ाया गया है. जाति आधारित बंदरबांट को सामाजिक न्याय की संज्ञा देना सामाजिक न्याय का माखौल उड़ाना है.’’(11)

उपरोक्त उद्धरणों में हम देखते हैं कि भारतीय राजनीति और सामाजिक जीवन को गहराई से प्रभावित करने वाले इन जटिल बदलावों को सभी सामाजिक पृष्ठभूमि से आने वाले हिंदी साहित्यकारों ने अपने-अपने तरह से गहराई से रेखांकित किया है. लेकिन इन विश्लेषणों में प्रायः उनके सामुदायिक हित हावी रहे हैं. अधिकांश द्विज लेखकों ने इसके अश्लीलता और धर्मनिरपेक्षता वाले पक्ष पर अधिक बल दिया है तथा ‘बाजार के प्रभुत्व‘ से आक्रांत रहे हैं. मंडल कमीशन का जिक्र आते ही इनके भवें तन जाती हैं. भीष्म साहनी, शैलेश मटियानी, रामविलास शर्मा, नामवर सिंह जैसे अनेक बड़े द्विज लेखक भी इस मामले में विचारधारओं की सीमा-रेखा मिटा देते हैं तथा मंडल कमीशन का पुरजोर विरोध करते हैं. हालांकि द्विज लेखकों में इसके ऐसे अपवाद भी मौजूद हैं, जिन्होंने अपने सामुदायिक हितों से इतर जाकर भी सामाजिक न्याय का पक्ष लिया है. लेकिन सामान्यतः इस तबके से आने वाले प्रमुख लेखक अपने लेखन में एक ओर जहां ‘धर्म निरपेक्ष‘ हैं तथा मंदिर आंदोलन के विरोधी हैं वहीं वे बाजार व्यवस्था से नफरत करते हैं. इसी प्रकार वे मंडल कमीशन की अनुशंसाओं के लागू होने को समाज में एक किस्म के उत्पात की शुरूआत मानते हैं.

दलित व पिछड़े वर्ग के लेखकों का मत

1990 के बाद का दशक दलित साहित्य के तेज उभार का भी दशक है, जिसके पाश्र्व में फुले-आम्बेडकरवाद और अर्जक संघ-बामसेफ के आंदोलनों के साथ-साथ मंडल आंदोलन की उर्जा भी काम कर रही थी, जिसका प्रतिबिंब ‘हंस’ के पन्नों पर भी दिख रहा था. प्रेमकुमार मणि बताते हैं कि ‘‘हिंदी में दलित साहित्य की चर्चा 1980 के बाद तीव्र हुई. 1990 में मंडल आंदोलन के बाद राजनीति में जब जाति विमर्श शुरू हुआ, तब साहित्य में यह विमर्श तीव्रतर हुआ’’(12)
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इन दोनों तबकों – दलित और ओबीसी– से आने वाले लेखकों में 1990 के बाद हुए सकरात्मक परिवर्तनों को श्रेय अपने तबके रखने की होड़ भी दिखती है. मसलन, कंवल भारती कहते हैं कि ‘‘साहित्य और राजनीति का विकास होता है सामाजिक आंदोलन से, किंतु दलित आंदोलन की तरह या उसके समानांतर पिछड़े वर्गों का कोई आंदोलन देशव्यापी नहीं हो सका. मंडल आंदोलन भी दलित आंदोलन का ही हिस्सा था. ओबीसी ने इस आंदोलन में भाग तक नहीं लिया था.‘‘(13)  तो, अन्य पिछड़ा वर्ग से आने वाले आलोचक चौथीराम यादव कहते हैं कि ‘‘देश में जितने भी सांस्कृतिक आंदोलन हुए, उनमें ओबीसी नायकों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही है….शुरूआत में दलित आंदोलन और दलित साहित्य का ओबीसी नायकों ने विकास किया. इसे अगर देश के स्तर पर देखें तो जोतिबा फुले ओबीसी थे. शाहू जी महाराज ओबीसी थे. पेरियार ओबीसी थे और उत्तर भारत में ललई सिंह यादव, रामस्वरूप वर्मा और सभी लोग दलित आंदोलन के मजबूत पक्षधर थे. इन लोगों ने आंदोलन चलाया और उसको आगे बढ़ाया.‘‘(14)

इन दावों-प्रतिदावों से इतर एक बात जो स्पष्ट दिखती है वह यह है कि 1990 के दशक में हुए परिवर्तनों पर इन तबकों – विशेषकर अन्य पिछड़ा वर्ग और दलित समुदाय – से आने वाले लेखकों की राय द्विज लेखकों की तुलना में अनुपातिक रूप से कहीं अधिक सकारात्मक है. उनकी नजर उदारीकरण के नकारात्मक परिवर्तनों के साथ-साथ इस पर भी रहती है कि खुली अर्थव्यस्था भारतीय समाज की जकड़न को भी तोड़ेगी. वे जहां बाबरी मस्जिद के विध्वंस पर चिंतित होते हैं वहीं यह भी रेखांकित करते हैं कि मंडल आयोग की अनुशंसाएं लागू होने के बाद जमीनी स्तर पर सामाजिक परिवर्तन की लहर चलने लगी है. वे यह भी चिन्हित करते हैं कि इस प्रक्रिया में उपभोक्तवाद की बुराइयों के साथ-साथ भारतीय समाज में आधुनिकता की बयार भी आ रही हैै. वे एक ओर इसे लोकतंत्र द्वारा वंचित तबकों के लिए किये जाने वाले कल्याणकारी कामों में बाधक व ‘आरक्षण‘ पर लटकी तलवार की तरह देखते तो दूसरी ओर इसके चाल-चलन को देसी सामंत-पूंजीवाद से मुक्ति का साधन भी मानते है.

उदारीकरण पर अद्विज वैचारिकी की बहुआयमिता को अन्य पिछड़ा वर्ग से आने वाले समाजशास्त्री योगेंद्र यादव के लेखक की बानगी से से समझा जा सकता है. वे 1990 के दौर में हुए परिवर्तनों को ‘मकार’ का नाम देते हुए कहते  हैं कि उस दौर में ‘‘राष्ट्रीय क्षितिज पर एक साथ तीन मकार उभरे. यह सोवियत संघ के विघटन का भी समय था, जिसने भारतीय समाज में समाजवादी मुहावरे का बोलबाला कर दिया था. ये तीन मकार हैं, मंडल, मंदिर और मार्केट. विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार ने अगस्त, 1990 में जब अचानक पिछड़ों के लिए आरक्षण की सिफारिशों को लागू कर दिया तब मंडल पिछड़ों के उस आंदोलन का पर्याय बन गया. मंदिर से तात्पर्य संघ परिवार के रामजन्मभूमि आंदोलन से है, जिसकी परिणति छः दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद ध्वंस में हुई. तीसरा मकार यानी मार्केट से आशय आर्थिक उदारीकरण और भूमंडलीय अर्थव्यवस्था से जुड़ी नीतियों से है….इन तीन मकारों के कारण राजनीतिक विमर्श में बुनियादी बदलाव आया. यह बदलाव किस हद तक था इसे सैद्धांतिक शुद्धतावाद की पैरोकार कम्युनिस्ट पार्टियों की सोच में आये कुछ परिवर्तनों से समझा जा सकता है. अनेक दशकों तक वर्ग संघर्ष के सिद्धांत से बंधी रही भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने मंडल आंदोलन के बाद यह सच्चाई मान ली कि भारतीय समाज में सामाजिक असमानता की जनक जाति भी है.’’(15)  योगेंद्र यादव तथ्य की ओर भी ध्यान दिलाते हैं कि स्वदेशी का नारा लगाने वाली भाजपा ने भी चुपचाप उदारीकरण की नीतियां अपना लीं तथा ‘‘मंडल आयोग के खिलाफ प्रदर्शनों को उकसाने के बावजूद भाजपा ने आधिकारिक रूप से उसे स्वीकार कर लिया तथा वह लगातार संगठन के भीतर पिछड़े वर्गों के उभार को समायोजित करने की भरसक कोशिशों में लगी हुई है.‘‘ (16) योगेंद्र इन सकरात्मक परिवर्तनों के खतरों पर भी नजर रखते हैं. उनका मानना है कि इसने ‘‘अब तक वंचित रहे जिन लोगों को राजसत्ता तक पहूंचाया है, उन्हें शायद अंत में पता चले कि इतिहास ने एक बार फिर उन्हें धोखा दे दिया है.’’ (17) हंस के संपादक राजेंद्र यादव इसमें एक और आयाम जोड़ते हैं तथा इसके साथ उदारीकरण के आगमन को पूंजी और अपराध के गठजोड़ के रूप देखते हैं. वे महसूस करते हैं कि इससे समाज में स्मृतिलोप बढ़ रहा है. 1995 में हुए एक चर्चित हत्यांकांड का हवाला देते हुए हंस के सितंबर, 1995 अंक में वे कहते हैं कि ‘‘पिछले डेढ़ महीने से भारतीय राजनीति पर नैना साहनी या तन्दूर कांड छाया हुआ है. सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी का सक्रिय सदस्य और युवा कांग्रेस का अध्यक्ष सुशील शर्मा मुख्य अभियुक्त है. उसने अपनी ‘पत्नी’ नैना साहनी की गोल मार्केट स्थित फ्लैट में हत्या की और लाश के टुकड़े करके अपने मित्र के ‘बगिया‘ रेस्त्रां में उन टुकड़ों को मक्खन लपेट-लपेटकर तन्दूर में जलाने की कोशिश की. सब्जी बेचने वाली एक महिला ने इस कांड की सूचना पुलिस को दी और ‘अशोक यात्री निवास’ के अधिकारियों की धर-पकड़ शुरू हुई, लाश को पुलिस ने कब्जे में ले लिया. पिछले दिनों, महीने भर बाद उसका दाह-संस्कार कर दिया गया. उधर सुशील शर्मा फरार होकर मद्रास में प्रकट हुआ, जहां उसने कोर्ट से जमानत ले ली. बाद में उसे गिरफ्तार करके दिल्ली लाया गया. अब यहां पर उस पर हत्या का मुकदमा चल रहा है. यह सब मैं इसलिए लिख रहा हूं कि एक से एक भयानक घटनाओं के सिलसिले के बीच अगले किसी कांड के आते ही हम सब यह भूल जाएंगे और साल-छह महीने बाद याद करना भी मुश्किल होगा कि नैना साहनी कौन थी. पटना के बाॅबी या भागलपुर के पापिया बोस हत्याकांड, या लातूर के सेक्स स्कैंडल को आज हम कहां याद रख पाते हैं? फिर हम आर्थिक राजनैतिक और सत्ता की जिन आपराधिक और रोमांचक प्रचंडताओं में जी रहे हैं, वहां अभी और भी बड़े-बड़े कांड देखने हैं. यहां पैंसठ करोड़ का बोफोर्स घपला देश की सत्ता बदल सकता था वहां आज बीस-बीस हजार करोड़ खाकर नेता डकार नहीं ले रहे. भ्रष्टाचार की यह अभूतपूर्व सामाजिक स्वीकृति सचमुच हमें स्वर्णयुग में ले आई है. आर्थिक उदारीकरण के तहत सुविधाओं और सपनों के फ्लडगेट (परनाले) खोले जाएंगे तो भ्रष्टाचारों और अपराधों की बाढ़ तो आएगी ही. यह ग्लोबल फिनोमिना है.‘‘(18)

लेकिन राजेंद्र यादव मंडल आंदोलन के मुद्दे पर कहते हैं कि ‘‘आरक्षण अगर नहीं होगा, तो दलित और स्त्री सामाजिक न्याय की लड़ाई कैसे लड़ेंगे? यह असमान शक्तियों की लड़ाई है. कमजोरों को ताकतवरों से लड़ने के लिए कोई तो सहारा चाहिए. जिसको आपने कभी बढ़ने नहीं दिया, जिनको आपने कभी अवसर नहीं, उन्हें शिक्षा और नौकरियों आदि में आरक्षण नहीं मिलेगा, तो वे कभी आगे आ ही नहीं सकते. अगर आप कहेंगे कि पहले शिक्षा लो, पहले मेरिट लाओ, पहले काम का अनुभव लाओ, तब तो आप इन चीजों की दौड़ से उनसे इतना आगे निकल चुके होंगे और इनका स्वरूप इतना बदल चुके होंगे कि वे तो आपके बराबर कभी आ ही नहीं सकते. जब तक आप अवसर नहीं देंगे, वे आगे नहीं आ सकते.’’(19)

योगेंद्र और राजेंद्र यादव से आगे बढ़ते हुए दलित लेखक कंवल भारती 90 के दशक में देश में हुए अनेक ऐसे परिवर्तनों का भी उल्लेख करते हैं कि जो प्रायः इस विषय पर विचार करने वाले लेखकों की नजरों से ओझल रह जाते हैं. वे बताते हैं कि ‘‘भारतीय राजनीति में 1990 का दशक सामाजिक न्याय और सामाजिक परिवर्तन का दशक माना जाएगा, क्योंकि इसी दशक में मंडल आयोग की शिफारिशें लागू हुईं और दलित-पिछड़ी जतियों को शासन में भागीदारी हासिल हुई. इसी दशक में दलित राष्ट्रपति का मुद्दा भारतीय राजनीति में गर्म हुआ और इसी दशक में दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों का राजनैतिक ध्रुवीकरण अस्तित्व में आया. उत्तर प्रदेश में दलित महिला को मुख्यमंत्री और केंद्र में पिछड़े वर्ग की सरकार बनाने वाला भी यह दशक है और अति दलितों तथा महिलाओं के लिए पृथक आरक्षण की मांग भी इसी दशक में मुखर हुई. भारतीय राजनीति में 1990 का दशक ही हिंन्दुत्व के आंदोलन का भी दशक है. इसी दशक में राममन्दिर का धर्मोन्माद पैदा हुआ और राम रथ की यात्राएं निकलीं. इसी दशक में हिंदू लहर ने आयोध्या की बाबरी मस्जिद तोड़ा और सारे भारत का सामाजिक सद्भाव बिगाड़ा.‘‘(20)

भारती जी की स्थापना है कि ‘‘सामाजिक परिवर्तन और हिंदुत्व का आंदोलन दोनों आकस्मिक घटनाएं नहीं हैं, वरन् इन दोनों के बीच गहरा संबंध है. ये दोनों क्रांति और प्रतिक्रांति की घटनाएं हैं. स्थापित व्यवस्था के विरूद्ध दलित-पिछड़ी जातियों की क्रांति ने सामाजिक परिवर्तन को जन्म दिया और उनके विरूद्ध भारतीय जनता पार्टी, विश्व हिंदू परिषद् तथा अन्य संगठनों ने हिन्दुत्व का आंदोलन चलाकर प्रतिक्रांति की.’’(21)


हिंदी में अनुदित और समादृत हो चुके मराठी लेखक शरणकुमार लिंबाले भी इस दौर में हिंदुत्व के उभार पर चिंता जताते हुए कहते हैं कि ‘‘उन्होंने राम मंदिर का प्रश्न उठाकर लोगों को इमोशनली ब्लैकमेल किया. बाबरी मस्जिद के ध्वस्त होने से लेकर गुजरात के दंगों तक का दौर उग्र हिंदुत्व का है. इस दौरान प्रगतिशील हिंदुओं ने मौन साध लिया.’’(22)

अन्य पिछड़ा वर्ग से आने वाले आलोचक हरिनारायण ठाकुर मंडल कमीशन के लागू होने को बड़ा परिवर्तनकारी  मुकाम बताते हुए लिखते हैं कि ‘‘निश्चय ही यह क्रांति दलित और पिछड़ों के इतिहास में सबसे बड़ी क्रांति थी, जिससे देश में न केवल राजनीतिक बदलाव आया, बल्कि दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यकों की बहुत बड़ी तादाद एक मंच पर दिखाई पड़ने लगी. इससे इन वर्गों में मनो-सामाजिक स्तर भी बदलाव आने लगे.’’(23)  इस प्रकार हम देखते हैं कि दलित और अन्य पिछड़ा वर्ग से आने वाले लेखक उदारीकरण के सकरात्मक-नकारात्मक -दोनों पहलुओं को रेखांकित करते हैं. लेकिन मंदिर आंदोलन के विरोध और मंडल आंदोलन के समर्थन में उनमें कोई मतभेद नहीं है.

आदिवासी लेखकों का रूख

आदिवासी समुदाय से आने वाले अधिकांश लेखक 90 के दशक में हुए परिवर्तनों से अपने सामुदायिक हितों को हुए भयवाह नुकसान का जिक्र करते हैं तथा अपनी संस्कृति पर हो रहे हमले से बेचैन तथा उसकी रक्षा के लिए चिंतित हैं. वे भी इन नीतियों को आक्रामक और अराजक तरीके लागू किये जाने पर कड़ी आपत्ति दर्ज करते हैं. इस प्रसंग में यह उल्लेखनीय है कि अन्य पिछड़ा वर्ग और दलित लेखकों की तुलना में आदिवासी लेखकों द्वारा किया गया उदारीकरण का विरोध न सिर्फ बहुत तीखा है बल्कि इस मामले में उनके विचार उपरोक्त तबकों के लेखकों से काफी अलग हैं. वे इसे आदिवासी समुदाय के विनाश की परियोजना के रूप में देखते हैं. दरअसल, हिंदी में आदिवासी साहित्य का प्रादूर्भाव का एक प्रमुख उद्देश्य उदारीकरण का प्रतिकार भी रहा है. जैसा कि आदिवासी साहित्य को परिभाषित करते हुए गंगा सहाय मीणा का भी निष्कर्ष है कि ‘‘1991 के बाद आर्थिक उदारीकरण की नीतियों से तेज हुई आदिवासी शोषण की प्रक्रिया के प्रतिरोधस्वरूप आदिवासी अस्मिता और अस्तित्व की रक्षा के लिए राष्ट्रीय स्तर पर पैदा हुई रचनात्मक उर्जा आदिवासी साहित्य है.’’(24)  आदिवासी साहित्य को और व्याख्यायित करते हुए आदिवासी लेखिक वंदना टेटे लिखती हैं कि ‘‘आधुनिक आदिवासी साहित्य, जिसकी काल-परिधि औपनिवेशिक दिनों को छूती है, मूल रूप से असहमति का सृजन है. आदिवासी समाज उन मूल्यों से असहमत है, जिससे दुनिया को अंततः नष्ट होना है. वह दुनिया को बचने के लिए सृजन कर रहा है. उसकी चिंताओं में पूरी सृष्टि, समष्टि और प्रकृति है. जिसका एक प्रमुख अंग इंसान भी है. आदिवासी साहित्य के केंद्र में इंसान है ही नहीं. वहां समष्टि है, प्रकृति है, समूची दुनिया है.‘‘(25)

पूरी दुनिया, समष्टि के बचाव के लिए फिक्रमंद आदिवासी दर्शन कथित भूमंडलीकरण की मार से किस प्रकार लहुलुहान हुआ है, इसे युवा आदिवासी लेखक ग्लैडसन डुंगडुंग इस प्रकार बयान करते हैं ‘‘आर्थिक उदारीकरण के बाद देश में विदेशी पूंजीनिवेश बढ़ता गया और नक्सलवाद दलित बस्तियों से निकलकर आदिवासियों के गांवों में पहुंच गया. इसी बीच झारखण्ड एवं छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों की स्थापना हुई जहां देश की आकूत खनिज संपदा मौजूद है. इन राज्यों की सरकारों ने औद्योगिक घरानों के साथ एम.ओ.यू. की झड़ी लगा दी है लेकिन आदिवासी समाज के बीच मानव संसाधन का विकास नहीं किया. फलस्वरूप, औद्योगिकरण आदिवासियों के विनाश का कारण बनता जा रहा है.’’(26)

आदिवासी कवियत्री निर्मला पुतुल अपनी एक कविता में बाजार के प्रलोभनों दुष्प्रभावों का प्रतिकार करते हुए कहती  हैं -‘‘ऐसे में जब बाजार से गुजरते/एक गिलास पानी मिलना कठिन हो गया है/ और पेप्सी आसान/नहीं चाहकर हम आसान रास्ते अपना लेते हैं दोस्त! और वे लोग/जो हमारे भीतर/जल-जंगल-जमीन बचाने का जज्बा देखते हैं/झारखण्डी अस्मिता और देशज संस्कृति तलाशते हैं/उन्हीं की संगति ने हमारी भाषा बिगाड़ दी/और प्यास बुझाने के लिए/पेप्सी और स्प्राइट का चस्का लगा दिया.’’(27)

आदिवासी लेखिका रोज केरकेट्टा की चिंता है कि ‘‘बीसवीं सदी के अंतिम दशकों से झारखंड में भी वैश्वीकरण की नीति को स्वीकार कर लिया गया है विरोध का स्वर भी उठा है परंतु स्वर को सुनने के लिए आधुनिक कान तैयार नहीं हैं. अतः यहां की राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक स्थिति में तेजी से परिवर्तन एवं गिरावट आ रही है….20वीं सदी में शहर और गांव के बीच की खाई चौड़ी हुई है और 21 वीं सदी में यह खाई ज्यादा चौड़ी और गहरी हो जाएगी.‘‘(28)  वे कहती हैं कि ‘‘भूमंडलीकरण स्त्रियों के हित में नही है. यह झारखंडी महिलाओं के हित में और भी नहीं है….हमें इन निरीह महिलाओं और बच्चियों के लिए सोचने और काम करने की जरूरत है.’’(29)  रोज केरकेट्टा के सरोकारों को तथ्यों से पुष्ट करते हुए आदिवासी पत्रकार हेराल्ड एस. तोपनो बताते हैं कि ‘‘आदिवासी बच्चों की मृत्युदर अचानक बढ़ गई है. कई घातक बीमारियों ने भी आदिवासियों को विलुप्त होने के कगार पर ला खड़ा किया है. चेंचु जो एक प्राचीन जनजाति है, वह जल्दी ही खत्म हो जाएगी. 1981 की जनगणना के मुताबिक चेंचु जनजाति के सिर्फ 39 सदस्य कोरापुट, गंजाम और सुंदरगढ़ जिले में थे. संबंलपुर और सरगुजा क्षेत्र में केवल 142 बिरहोर जनजाति के लोग थे. बैगा आदिवासियों की संख्या केवल 188 थी, जो कोरापुट, सुंदरगढ़ ईलाके रह रहे हैं. मनकिड़िया एक घुमंतु (नोमाड) जनजाति है, जो मयुरभंज और क्योंझर जिले में निवास करते हैं. वे बंदरों का शिकार कर जीविकोपार्जन करते हैं. इनकी जनसंख्या मात्र 200 है. कोरवा और धारा जनजातियां 1000 हैं. इन लुप्त होती जा रही जनजातियों को बचाने और उनकी जनसंख्या वृद्धि के लिए सरकार कोई भी ठोस कदम नहीं उठा रही है.‘‘(30)

मत-मतांतर 


विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) ने 1996 और 1998 के आम चुनावों के बाद उदारीकरण/निजीकरण के बारे में मतदाताओं की राय जानने के लिए एक सर्वेक्षण किया था. इस सर्वेक्षण का मुख्य उद्देश्य यह जानना था कि क्या कांग्रेस सरकार द्वारा शुरू की गयी नयी आर्थिक नीतियां चुनावी मुद्दा बन सकी हैं. इस सर्वेक्षण के नतीजे बड़े रोचक थे. इस सर्वेक्षण के बारे सीएसडीएस के प्रोफेसर संजय कुमार बताते हैं कि 1998 तक ‘‘पचास प्रतिशत से भी ज्यादा आदिवासी यह बता पाने की स्थिति में नहीं थे कि विदेशी कंपनियों को व्यापार की खुली छूट दी जानी चाहिए या नहीं. कुछ आदिवासियों में जो इस मुद्दे पर अपनी राय रखते हैं, केेवल 15 प्रतिशत इसके पक्ष में थे कि भारत में विदेशी कंपनियां खोली जानी चाहिए. दलित मतदाताओं की राय भी कुछ इसी तरह की रही. इस मुद्दे पर सबसे अधिक मतभेद ऊंची जाति के मतदाताओं में रहा. साथ ही इस नीति के सबसे बड़े समर्थक भी इसी वर्ग से रहे. अगर हम अन्य पिछड़ा वर्ग के मतदाताओं को देखें तो पाएंगे कि पचास प्रतिशत से कुछ कम लोग इस मामले में अपनी कोई राय ही नहीं रखते, साथ ही सहमत लोगों से असहमत लोगों की संख्या भी अधिक निकाली…सुधार नीतियों के प्रति असहमति भाव सबसे अधिक आदिवासी समुदाय में ही है.‘‘(31)

आम मतदातओं के बीच किए गये इस सर्वेक्षण के आंकड़ों का मिलान इन तबकों से आने वाले विद्वान लेखकों के मतों समक्ष रख कर किया जाए तो इन तबकों के सामुदायिक हितों की भी एक कामचलताऊ तस्वीर बनती है. जाहिर है आम मतदाताओं की तुलना में लेखकगण इन हितों को बेहतर समझते हैं तथा चुंकि उन पर अपने लोगों को दिशा देने की जिम्मेवारी भी है, इसलिए वे न सिर्फ उदारीकरण से हुए परिर्तनों की बारीकियों में जाते हैं बल्कि इससे होने वाले अपने सामुदायिक नफा-नुकसान की विस्तृत समालोचना भी करते हैं.

आदिवासी लेखकों के उदारीकरण से असहत मतों के समांतर दलित और पिछड़े समुदाय से आने वाले प्रमुख लेखकों का मानना है कि 1990 के दशक में जो परिवर्तन हुए – विशेषक नई आर्थिक नीति के संदर्भ में – उनसे अद्विज समाज को नुकसान ही नहीं, फायदा भी हुआ है. ऐसे लेखकों का मानना है कि उदारीकरण ने व्यक्ति स्वतंत्र्य को बढ़ावा दिया है. बंद बाजार व्यवस्था में आर्थिक गतिविधियों पर द्विज वर्चस्व बना रहता है तथा अद्विजों को अपने श्रम और व्यापारिक कौशल को अभिव्यक्त करने का अवसर ही नहीं मिलता है. इसके विपरीत निजीकरण तथा भारतीय बाजार के दरवाजे विदेशों के लिए भी खोल देेने से एक ऐसी प्रतिद्वंद्विता का दबाव पैदा होता है, जिससे अद्विज तबकों के भी लाभान्वित होने की संभावना बढ़ जाती है. मसलन, अन्य पिछड़ा वर्ग से आने वाले  प्रेमकुमार मणि उदारीकरण के विरोध को एक पक्षीय मानते हैं. अपने एक लेख में वे उस दौरान के परिदृश्य को चित्रित करते हुए बताते हैं कि उदारीकरण के साथ ही ‘‘राज्य संपोषित अथवा केन्द्रित अर्थव्यवस्था, अब बाजार केन्द्रित, मार्केट सेन्ट्रिक हो गयी थी. अचानक हुई इस उलट-पुलट ने दलित-पिछड़ों को भौंचक कर दिया. उन्हें यह लगा कि उनके सामूहिक हितों, कलेक्टिव इंटरेस्ट की धज्जियां उड़ा दी गयी है . सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम एक-एक कर उखड़ने लगे और एनडीए राज में जब व्यापक विनिवेश नीति अपनाई गयी तब ऐसा लगा कि बहुजनों का मटिया-मेट हो जायेगा.

यह वह समय था जब बहुजनों की पहली या दूसरी पीढ़ी स्कूल जा रही थी. अंग्रेजी पर इस तबके की पकड़ मजबूत नहीं थी और ज्यादा से ज्यादा एक छोटा वर्नाकुलर लिटरेट तबका बन सका था, जिसके ज्यादातर लोग सरकारी नौकरियों में थे. उदारीकरण के बाद इनके बीच निराशा की स्थिति थी क्योंकि सरकारी नौकरियां घटने लगी थीं. दलित-पिछड़ों के बीच यह बात चर्चा में थी कि सत्ता में बैठे ब्राह्मणों ने षडयंत्र किया है. आरक्षण ने सरकारी नौकरियों में उनकी भागीदारी को संकुचित किया तो उन्होंने विश्वामित्र की तरह एक अभिनव स्वतंत्र बाजार की संरचना कर डाली. यह बाजार उच्चे तबके अर्थात सवर्णों का अभयारण्य है, ऐसा प्रचारित हुआ.
ल्ेकिन क्या यह दृष्टि का केवल एक कोण ही नहीं है?’’ (32) वे मानते हैं कि ‘‘अभी संक्रमण काल है और इसकी मुश्किलें हैं. बहुजन बाजार के बीच उपभोक्ता के रूप में खड़ा है, लेकिन उपभोक्तावाद की हाय-तौबा वह नहीं मचा रहा है. वह बाजार का अध्ययन कर रहा है. उसमें घुसने की तैयारी कर रहा है. ग्लोबल इकॉनॉमी ने इंडियन इकोनॉमी के ब्राह्मणवादी चरित्र को खारिज कर एक अनुकूल स्थिति का सृजन किया है.‘‘(33)

उदारीकरण का मुखर समर्थक दलित लेखक चंद्रभान प्रसाद भी इसी प्रकर के तर्क उदारीकरण के समर्थन में रखते हुए कहते हैं कि ‘‘उदारीकरण और वैश्वीकरण या नव पूंजीवाद ही सदियों से शोषण, दमन और भेदभाव का शिकार बने दलितों की मुक्ति की राह है. भारत में 1990 से लागू हुई नवउदारवादी नीतियां जातीय विषमता को खत्म करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं.‘‘ (34) प्रसाद अपने दावे की पुष्टि के लिए इस संबंध में हुए सर्वेक्षणों का भी हवाला देते हैं. वे बताते हैं कि ‘‘अमेरिका के पेनीसिल्वानिया विश्वविद्यालय सेंटर फार एडवांस्ड स्टडीज आॅफ इंडिया के वित्तीय सहयोग से हुए सर्वेक्षण में उत्तर प्रदेश के 20000 परिवारों का सर्वे किया गया और पाया कि दलितों की स्थिति में बदलाव हुआ है. आजमगढ़ के ग्रामीण इलाकों में अब पहले की तुलना में ज्यादा दलित दूल्हे बारात में कार में बैठकर जाते हैं.

प्रसाद के मुताबिक इस परिवर्तन की वजह यह है कि अब दलितों की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है और वे बेहद गरीबी के दलदल से बाहर निकल आए हैं. अब उन्हें रोजाना जमींदारों के हाथों अपमानित भी नहीं होना पड़ता. अब उन्हें जमींदार के लिए बेगार भी नहीं करनी पड़ती. … धीर-धीरे ही सही दलितों की परंपरागत पेशों से ही जुड़े रहने की मजबूरी खत्म हो रही है.‘‘(35)

चंद्रभान जिस सर्वेक्षण का हवाला देते हैं वह आजमगढ़ के गांवों में किया गया था. जिन गांवों में यह किया गया था. उन गांवों के बारे में उनका दावा है कि ‘‘वहां एक महत्वपूर्ण परिवर्तन यह देखने को मिला कि खेती करने में सदियों से चली आ रही बैलगाड़ी का इस्तेमाल बंद हो गया है. दलितों ने खेतिहर मजदूर के तौर पर काम करना बंद कर दिया है. इसलिए किसान ट्रेक्टर खरीदकर या किराए पर लेकर अपना काम चलाते हैं. कुछ खेती करनेवाले दलित परिवारों के पास अपने ट्रैक्टर हैं. अब दलित मरे हुए जानवरों को उठाने का काम भी कम ही करते हैं. अब ऊंची जाति के लोग उनसे यह काम जबरदस्ती नहीं करवा सकते. इतना ही नहीं दलितों के खानपान में आर्थिक स्थिति सुधरने के कारण बदलाव आने लगा है. अब वे अच्छा अनाज और दाल आदि खाने में सक्षम हैं… इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि समाज में बढ़ती समृद्धि ने दलितों को भी आर्थिक रूप से सशक्त बनाया है और यह प्रक्रिया जारी है. इसमें नवउदारवाद ने अहम् भूमिका निभाई है. ..अगले पचास सालों में जाति खत्म भले ही न हो लेकिन आर्थिक गतिविधियों का प्रसार उसे बेअसर जरूर बना देगा.‘(36)

बहुजन वैचारिकी के उपरोक्त्त लेखकों के साथ-साथ दक्षिणपंथ से जुड़े रहे दलित लेखक रामशंकर कठेरिया भी यही बात मानते हैं. हालांकि उनका संगठन एक समय ‘स्वदेशी’ के प्रचार में जोर शोर से लगा था लेकिन अपनी किताब में वे कहते हैं कि ‘‘भूंडलीकरण के इस दौर में वैज्ञानिक और तकनीकी दृष्टि से जो विकास हुआ है, आधुनिकीकरण जिस प्रकार चारों ओर साफ तौर पर दिखता है, दलित उससे काफी हद तक वंचित हैं. किंतु यह भी एक वास्तविकता है कि जिस प्रकार शिक्षा-संस्थानों में विभिन्न प्रावधानों द्वारा दलितों के लिए शिक्षा का पथ प्रशस्त किया है, उससे वैश्वीकरण और आधुनिकीकरण की मुख्यधारा में दलितों की सहभागिता क्रमशः बढ़ी है. बहुत से अच्छे अध्यापक, वकील, इंजीनियर, डाॅक्टर, वैज्ञानिक दलित समुदाय से आए और उन्होंने अपने-अपने क्षेत्रों में अपना वर्चस्व स्थापित किया.‘‘ (37) हलांकि मार्क्सवाद से प्रभावित दलित-ओबीसी लेखक भी उदारीकरण की मुखालफत करते हैं. मसलन, मार्क्सवादी दलित लेखक आनंद तेलतुंबड़े अपना विरोध दर्ज करते कहते हैं कि ‘‘कुछ बुद्धिजीवियों का कहना है कि इससे दलितों की अक्षमता दूर करने में मदद मिल सकती है. हालांकि यह तर्क पूरी तरह गलत नहीं है, लेकिन यह देश में पूंजीवाद के पिछले एक सदी के अनुभवों पर आधारित नहीं है. जिस प्रकार से पूंजीवाद ने कुशलता के साथ जाति का इस्तेमाल किया है, वैश्वीकरण जो वर्तमान सूचना संचार के युग में पूंजीवाद का ही स्वरूप है, इस पर कोई सकारात्मक असर नहीं डालने वाला है.‘‘(38)

अद्विज लेखकों के बीच सभी प्रकार के मत-मतांतरों से गुजरते हुए हम पाते हैं विभिन्न विचारधाराओं से आने वाले दलित और पिछड़े समुदायों से आने वाले लेखक ‘‘दलित-बहुजन मुक्त अर्थव्यवस्था का न ज्यादा अभिनंदन कर रहे हैं और ना ही उससे ज्यादा भयभीत हैं. उन्हें महसूस हो रहा है कि ग्लोबल अर्थव्यवस्था ने देशी बनिया ब्राह्मणवादी अर्थव्यवस्था को चुनौती दी है और वे उम्मीद कर रहे हैं कि अंततः वह उसे ध्वंस्त कर देगी. वह बाजार के बीच उपभोक्ता के रूप में खड़ा है, लेकिन उपभोक्तावाद की हाय-तौबा वह नहीं मचा रहा है. वह बाजार का अध्ययन कर रहा है. उसमें घुसने की तैयारी कर रहा है.‘‘ (39) लेकिन आदिवासी लेखकों के विचार इस मामले में अलग हैं. वे यह समझते हैं कि उदारीकरण उपजे कथित विकास से उनकी संस्कृति और परंपरा ही नहीं, अपने भौतिक हितों पर कुठाराघात होगा. अद्विज तबकों द्वारा लिखे गये रचानात्मक साहित्य में भी स्वाभिक तौर पर उनके उपरोक्त विचार प्रमुखता पाते हैं.


संदर्भ

1. देवेंद्र चैबे, फारवर्ड प्रेस, अप्रैल, 2013
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8. भीष्म साहनी, हंस के विमर्श भाग-1, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2012, पृ. 205
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10. नामवर सिंह, वही, पृ. 22
11. शैलेश मटियानी, हंस के विमर्श भाग-1, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2012, पृ. 205
12. प्रेमकुमार मणि, ‘बहुजन साहित्य की प्रस्तावना‘, सं. प्रमोद रंजन, द मार्जिनलाइज्ड प्रकाशन, वर्धा, 2016, पृ. 46
13. कंवल भारती, ‘बहुजन साहित्य की प्रस्तावना‘ पृ.,99
14. चैथीराम यादव, ‘बहुजन साहित्य की प्रस्तावना’, पृ. 62
15. योगेंद्र यादव,‘लोकतंत्र के सात अध्याय‘,सं.,अभय कुमार दुबे, वाणी प्रकाशन,दिल्ली, पृ,52
16. वही, पृष्ठ, 53
17. वही, पृष्ठ, 58
18. राजेंद्र यादव, आदमी की निगाह में औरत, राजकमल प्रकाशन, 2001, पृ़, 40
19. राजेंद्र यादव, ‘सामाजिक न्याय की अवधारणा‘, पृ., 31
20. कंवल भारती, लोकतंत्र में भागीदारी के सवाल, बोधिसत्व प्रकाशन, 1997, पृ.7
21. वही, पृ.8
22. शरणकुमार लिंबाले, ‘दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र’, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2000, पृ., 175
23. हरिनारायण ठाकुर, ‘दलित साहित्य का समाजशास्त्र’, भारतीय ज्ञानपीठ, 2004, पृ., 375
24. गंगा सहाय मीणा, ‘आदिवासी साहित्य विमर्श’, अनामिका पब्लिशर्स, दिल्ली, 2014, पृ., 9
25. वंदना टेटे, ‘आदिवासी साहित्य परंपरा और प्रयोजन’, प्यारा केरकेट्टा फाउण्डेशन, रांची, 2013, पृ., 88
26. ग्लैडसन डुंगडुंग, इंडियाएबोरिजनल डाॅट ब्लागस्पाॅट डाॅट इन, 9 जून, 2013
27. निर्मला पुतुल, कविताकोश डाॅट ओआरजी
28. रोज केरकेट्टा, ‘स्त्री महागाथा की महज एक पंक्ति’, प्यारा केरकेट्टा फाउंडेशन, रांची, 2014, पृ., 29
29. वही, पृ.,31
30. हेराॅल्ड एस. तोपनो, ‘उपनिवेशवाद और आदिवासी संघर्ष’, सं. अश्विनी कुमार पंकज, विकल्प प्रकाशन, दिल्ली, 2015, पृ.,35
31. संजय कुमार, ‘भारत का भूमंडलीकरण‘, सं., अभय कुमार दुबे, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2008, पृ., 311
32. प्रेमकुमार मणि, ‘चिंतन के जनसरोकार, द मार्जिनलाइज्ड, दिल्ली, पृ., 22
33. वही, पृ. 23
34. सतीश पेडणेकर, आजादीडाॅटमी/दलित एंड इकोनाॅमिक रिफार्म
35. वही
36. वही
37. रामशंकर कठेरिया, दलित साहित्य: नई चुनौतियां, प्रभात प्रकाशन, दिल्ली, पृ., 36
38. आनंद तेलतुंबड़े, ‘जनवादी समाज और जाति का उन्मूलन‘, आधार प्रकाशन, पंचकुला, 2016, पृ., 36
39. प्रेमकुमार मणि, ‘चिंतन के जनसरोकार, द मार्जिनलाइज्ड, दिल्ली, पृ., 22

देखो-देखो ‘चमईया’ हमार सुतुही

सोनी पांडेय

कवयित्री सोनी पांडेय साहित्यिक पत्रिका गाथांतर की संपादक हैं. संपर्क :pandeysoni.azh@gmail.com

बाबा ब्रह्मदेव तिवारी के दुवार पर भिनहिये से कल्लुवा की माई ‘मोटकी चमईनिया’ डुगडुगी डिबीर-डिबीर बजा रही थी। डीब-डीब-डीब के बेढब आवाज से तंग आकर ज्योत्सना ने ननद से पूछा- ‘‘बीबीजी ये आपके यहाँ कौन सा रिवाज है कि ब्याह के तीसरे दिन भी डीब-डीब लगा हुआ है।’’ मंजू नयी नवेली दुल्हन का मुँह आवाक हो ताकने लगी, चेहरे का रंग एकदम उतर गया, जैसे किसी ने चोरी पकड़ ली हो। मंजू ने पूरी सजगता के साथ उत्तर दिया- ‘‘जब तक कक्कन नहीं छूटता।’’ ज्योत्सना ने दूसरा सवाल दागा- ‘‘और कक्कन कब छूटता है? हमारे यहाँ तो विदायी वाले दिन ही छुड़ा देते हैं? मंजू को गुस्सा आ गया। भाभी ये आपका घर नहीं है, यहाँ के रस्मो-रिवाज अलग हैं, समझी। अम्मा को भेजती हूँ, जो-जो जानना है पूछ लिजियेगा।’’ ज्योत्सना को ध्यान आया कि वह अभी नव वधू है, ननद को नाराज करना ठीक नहीं। तेजी से दरवाजे की तरफ बढ़ती हुयी छोटी ननद का हाथ थाम लिया- अरे! रे ऽऽऽ मेरी प्यारी बीबीजी नाराज हो गयी। गालों को हथेलियों से थपथपाते हुए कहा- चलिए अभी तो आपको प्यारी-प्यारी चुड़ियाँ और नगों वाली बाली देनी है, जिसे आपने मेरे मेकअप बाक्स में पसन्द किया था। मंजू पिघल गयी। ननद-भौजाई चूड़ीकेश और मेकअप बाक्स में उलझी छेड़-छाड़ में मगन थीं कि नाऊन बुकवा लिए कमरे में दाखिल हुई- ‘‘चला हो दुलहिन तनी मीज देईं।’’ चटाई बिछाकर बैठ गई। ज्योत्सना को सरसों के उबटन से उबकाई आती थी। मई का महीना और तीन दिन पहले उसके घर की नाऊन के हाथों का पिसा हुआ बुकवा फुलहा कटोरे में लेकर नाऊन बैठी मुस्कुरा रही थी। मंजू भाभी के मनोभाव ताड़ गयी- ‘‘मुस्कुराते हुए भाभी से कहा- बुकवा तो यहीं लगेगा भाभी, रिवाज है, पाँच दिन तक नईहर का फिर सवा महीना ससुरे का बुकवा लगता है हमारे यहाँ बहुओं को, कोहनी से ढकेलते हुए भाभी से कहा- सोचती क्या है कूद जा मैदान में।’’ ज्योत्सना ने खीझते हुए कहा- मुझे सरसो के तेल से एलर्जी है। उसी क्षण चाची सास अपने साल भर के बेटे को गोंद में लिए आ धमकी- ‘‘क्या हुआ ओ नाऊन, कनियवा बुकवा लगवाने में निहोरा करवा रही है क्या?’’ नाऊन मुँह चमकाकर रह गयी। ज्योत्सना मुँह गिराकर चटाई पर बैठ गयी, नयी नवेली दुल्हन का यह व्यवहार शाम तक पूरे गाँव-जवार में फैल जायेगा जानती थी। माँ की बात याद आयी- ‘‘परजा-पसारी चार घर की घुमनी जीव होती हैं रंजू ससुराल में इनसे सम्भल कर व्यवहार करना, वरना अफवाह उड़ाते देर नहीं लगेगी।’’

ज्योत्सना ने पाँव की पाँच उंगलियां रूमाल से पैर ढककर आगे बढ़ाया, चाची सास ने तपाक से लिहेड़ी लिया- ‘‘हे इनसे का लजाना, साले भर में नंगटे मिसाओगी। मंजु हा-हा-हा हँसने लगी। नाऊन ने पैर खींचा- ‘‘दा दुलहिन निम्मन से मीज देइं।’’ ज्योत्सना रूमाल दाबे सिर झुकाये बैठी रही। सास दूसरे बेला का मांग बहोरने आयी- ‘‘ऐ नाऊन चला जा- आपन माया जाल हटावा, मांग बहोरे के है। नाऊन हाथ में का बुकुवा छुड़ाकर उठ खड़ी हुई। पंडी बाबा के कब के कहे क है? बता देयीं त काल्ह कहत आईब। आज चार दिन हो गईल, पुजइया काल्हे होई न? ज्योत्सना की सास सिर का पल्ला ठीक करते हुए बोली- कुल पोवत करत चार त बजीए जाई- पाँच के हहु दिहा। और ज्योत्सना के आँचल में पाँच बड़े-बड़े लड्डू डाल कर सिन्होरा से सिन्दूर निकाल कर पूरा मांग पीला सिन्दूर भर गयी। गर्मी में इतना सिन्दूर देख ज्योत्सना रूआंसी हो जाती किन्तु ससुराल में नवेली दुल्हन का विरोध सम्भव नहीं था, इसलिए अन्दर ही अन्दर कुढ़ती रहती।

(2)
अगली सुबह नीम अंधेरे सास आकर जगा गयी, पूरे परिवार की औरतों की चहल-पहल सुनकर ज्योत्सना चौकन्नी हुई। याद आया आज ब्याह के पाँचवे दिन की पुजइया है जो सुबह पाँच बजे से शाम पाँच बजे तक चलेगी, सास शाम को ही समझा गयी थी। झट-पट नहा-धोकर तैयार हो गयी। मन रोमांचित था। आज कक्कन भी छूट जायेगा। चार दिन बाद हृदयेश को देखेगी, जिसने विदाई वाले दिन पूरे रास्ते यही समझाया कि जो भी माँ कहे करते जाना। महीने भर की बात है बाद में तो साल में एक बार छुट्टियों में गाँव आना होगा। कितना सहज और साल पुरुष है हृदयेश, उसकी हथेलियों को अपने हाथों में लेकर कितनी बार चूमा था उसने सफर में, सोच कर सिहर उठी।



ज्योत्सना एक बात सोच कर दंग थी कि घर-भर के मर्द पूरे दिन आँगन-दुवार एक किए रहते, लेकिन हृदयेश की एक झलक भर उसे पिछले चार दिन में नहीं दिखी थी। गजब का शासन चलता था उसके सास का घर में, मजाल की कोई घर में उनका विरोध कर दे।सास कमरे में दाखिल हुई, पीछे-पीछे छोटी सास हाथ में आटे का फुलहा थाल लिए। सास ने आदेश दिया- ‘‘पाँच बार जय चमईया जी- जय चमईया जी बोल कर छू दो दुलहिन। ज्योत्सना को सुनने में भ्रम सा लगा- जी कौन मईया? ‘‘चमईया’’ सास ने तेज आवाज में कहा। ज्योत्सना आवाज कड़की समझ गयी। चुपचाप उच्चारण कर आँटा छू लिया। सास चली गयी। थोड़ी देर में बूढ़ी आजी सास बड़ी फुआ सास के साथ हाथ में फूल-बताशा, धार लिए आयी और वही आदेश दिया जो सास कह गयी थी। बारी-बारी घर भर की औरतें ऐसे ही कुछ-न-कुछ लेकर आतीं और जय चमईया, कहवा जाती। ज्योत्सना सोच में पड़ गयी। चमईया कौन है भला? मंजू मिलती तो उगलवा लेती या फिर हृदयेश से पूछती। अजीब, पेशोपेश में वह कमरे में साड़ी को आँचल का कोर तोड़ते मरोड़ते घूम रही थी की नाऊन पधारी।

‘‘आइये नाऊन, बैठिये।’’ नाऊन खुश हो गयीं शहरी पढ़ी-लिखी बहू से आदर पाकर। चटाई बिछाकर बैठ गयी। आज पाँचवे दिन के कटोरे वाले बासी उबटन से मुक्ति का दिन था। नाऊन ने नेम पूरा किया और हँस कर कहा- कमासुध कनिया से का मिली? ज्योत्सना ताक में थी। पाँच सौ की कड़कती नोट पर्स से निकालकर नाऊन की हथेलियों में दबाकर रखते हुए कहा- अम्मा जी से मत बताइयेगा, नाराज होंगी। तीर निशाने पर लगा था, नाऊन फैल गयी। अरे बहिनी, इ तोहार सास त सछाते चण्डी हई, इनसे के कही? ज्योत्सना ने पूछा- चाची इ चमाईया कौन देवी हैं? नाऊन व्यंग्य से मुस्कुरा उठी। ऐ दुलहिन इ राज तोहरे हमरे पुरखन की पेट क राज है। जेके मरत घरी सास पतोह से बतावेले, अईसे ना। ज्योत्सना की जिज्ञासा प्रबल हुई। काहे? बहुत त ना जानी ऐ दुलहिन, बाकी ऐतना है कि कौनो चमाईन के तोहार पुरखा फसवले रहले, पुजइया लेले, नाहीं त वशे ना चले और उठ कर चल दी। ज्योत्सना सुनकर दंग रह गयी। हद है इतने शिक्षित परिवार में ऐसा ढ़ोंग।
(3)
दोपहर में पकवान बनने के बाद ज्योत्सना को बड़ी ननद रसोई में ले गयी। सास निर्देश देती रही, ज्योत्सना ने कोरे चूल्हे पर कढ़ाई चढ़ाकर पाँच पूड़ी बनाया, थोड़ा सा हलवा नेम के लिए, पहली रसोई का भोग भी ‘‘चमईया’’ को पहले चढ़ता था। दो बजे हृदयेश और ज्योत्सना का नाऊन ने गठजोड़ किया, पति-पत्नी ने चार-दिन बाद एक दूसरे को कनखियों से निहार, छोटी चाची सास ने देख लिया- देखिये-देखिये बड़का बबुवा, आज इनके भोग का भी दिन है। ‘‘लड़कियाँ ठहाका मारकर हँस पड़ी, सास ने आँख तरेरा तो चाची सास चुप हो बैठ गयीं। औरतें लड़कियाँ गाती-बजाती भोग के सोलह थाल लेकर पैदल चल रही थीं। आगे-आगे नाऊन कपाट पर दौरी में पूजन का सामान अछत, फूल, सेन्दूर आदि लिए और सास भर लोटा धार लिए चल रही थीं। लड़कियाँ गा रही थीं- गोरा बदन नीली साड़ी ओ साड़ी वाली….।

ज्योत्सना नंगे पाँव कच्चे रास्ते पर चल रही थीं। जमीन तवे की तरह जल रही था। कोस भर चलने के बाद पति से पूछा, अभी कितना चलना है? बस, सामने वाली बारी में। ज्योत्सना ने पारदर्शी चादर में से देखा सामने घना आमों का बाग पोखरा और एक छोटा सा कमरे नुमा मन्दिर दिखाई दे रहा था।
औरतों का समूह पोखरे के पास बने चबूतरे पर सामान रखकर बैठ गयीं। सभी थक चुकी थीं। सास ने हृदयेश से पूछा- कै बजा? साढ़े तीन, अरे राम रे। ऐ छोटकी दुलहिन के बता रे पूजा का विधि हम पोखरे से पानी लेकर आते हैं, चार बजे पंडी जी कक्कन छोड़ाने और सतनरायन बाबा का कथा बाचने का आ जायेंगे। पाँच बजे तक निबट जाना चाहिए।



(4)
ज्योत्सना के ससुर चार भाईयों में सबसे बड़े थे, छोटा भाई हृदयेश से महज पाँच साल बड़ा था। परिवार में उनके त्याग के कारण सभी अदब-लेहाज करते थें। पत्नी परिवार को बाँधने की कला में माहिर थी सो चार भाईयों का संयुक्त परिवार चार गाँवों में मिसाल था। परिवार में बारह पुरुष, बलिष्ठ, गाड़ी-घोड़ा, छकड़ा से दुवार रज-गज। पुरखा जमींदार, सैकड़ों बीघे की खेती, प्रगतिशील किसान होने के कारण अन्न धन से घर भरा था। इस पीढ़ी में सबसे बड़े बेटे हृदयेश ने विश्वविद्यालय में प्राध्यापकी पाकर कुल परम्परा में चार चाँद लगा दिया था। लड़के बाहर बड़े शहरों में पढ़ने निकल चुके थे। लड़कियाँ घर की जीप से पास के शहर पढ़ने जाती थीं। हृदयेश के पिता पढ़े-लिखे प्रगतिशील विचारधारा के व्यक्ति थे इसलिए उच्च शिक्षित बेटे के लिए बहू भी उसी के टक्कर की खोज निकाला था, एक पैसा दहेज नहीं लिया, पक्के बनिया थे, लड़की कॉलेज में लेक्चर थी, अच्छा कमाती थी। दहेज न लेकर मुफ्त में वाह-वाही लूटकर प्रगतिशीलता पर मुहर पक्की कर गए।

मन में ‘‘चमईया’’ की पूजा को लेकर सशंकित थे, पत्नी को सख्त हिदायत दिया था जब तक बहू पुरानी नहीं हो जाती भेद नहीं खुलना चाहिए। चमईया की पुजइया में विशेष सतर्कता घर भर की औरतें बरत रही थीं। छोटी सास ज्योत्सना को मन्दिर के पिछवाड़े लेकर गयीं, हृदयेश ने गठजोड़ का गमछा उसके कन्धे पर रख दिया। चाची सास ने एक टीले पर बैठाकर धीरे से हाथ जोड़ कर ज्योत्सना से विनय के स्वर में कहा- ‘‘दुलहिन ये बड़ी कठिन पुजइया है, न करने पर चमईया डागर बजाते हुए गर्भ के समय आयेंगी और सोए में कोख काछ कर चली जायेंगी। ज्यादा कुपित हुई तो माँग भी धो सकती हैं। ये जो घर में तीन निपुती राड़ देख रही हो न बहू चमईया की पुजइया ठीक से न करने का परिणाम है। ज्योत्सना ने चाची सास का हाथ थाम लिए- ‘‘चाची जी आप ऐसे क्यों कह रही हैं? जो कुल परम्परा है उसे मानना मेरा धर्म है। आप पूजा की विधि बताइये। ऐसी कौन कठिन पूजा है जो मैं नहीं कर सकती। हँसते हुए गर्व से कहा- ‘‘बताइये-बताइये… मैं गोल्ड मेडलिस्ट हूँ। चाची सास ने लम्बी साँस छोड़कर मुस्कुराते हुए हाथ थामकर खड़ा किया। मन्दिर के पीछे का चोर दरवाजा खोलकर ज्योत्सना को आदेश दिया, दुलहिन ‘‘चमईया’’ की पूजा निर्वस्त्र होकर पति-पत्नी प्रथम मिलन के पहले करते हैं, बारी-बारी सोलहों भोग थाल का परसाद चढ़ाकर पिंडी को पीले सेन्दूर से पाँच बार टीककर लोटे में पोखरे का पानी वाला होगा धार घोलकर गिरा देना अगरबत्ती बार कर दिया जलाकर अढ़हूल का पाँच फूल चढ़ाकर कहना- ‘‘हे चमईया’’ हमने अपना सबकुछ उतारकर आपको दे दिया आप भोग लगाए तो हम पहने। और थोड़ी देर आँख मूंदकर हाथ जोड़कर खड़ी रहना फिर एक-एक थाल में तुम दोनों के लिए कोरे कपड़े रखे हैं, उठाकर पहन लेना और दरवाजा खोलकर बाहर आ जाना। ज्योत्सना को काठ मार गया। वह चीख पड़ी ‘‘आप पागल तो नहीं हो गयी हैं? नंगे ऽ ऽ ऽ, नंगे इनके सामने मैं सीधे जाकर खड़ी हो जाऊँ। हद है मूर्खता की, मुझसे ये नहीं होगा। छोटी सास भागते हुए ज्योत्सना के सास के पास पहुँची। जीजी नहीं मान रही। सास चिंतित हो उठी, डर पहले से था। बहू के पास आयी, ज्योत्सना सुबक-सुबक कर रो रही थी। सास ने पेट पकड़ लिए, बेटी नहीं किया तो इ कुल नाश देगी। हमार बहिनी इ विनती ह तोहसे, आँचल फैलाकर रोते हुए बहू से अनुनय करने लगी। ज्योत्सना पिघल गयी- नहीं अम्मा जी ये क्या कर रही हैं। हम आपके बच्चे हैं, आप पाँव छूकर पाप मत चढ़ाइये। सास का यत्न मारक था। रोते-धोते ज्योत्सना तैयार हो गयी। एक-एक कर सारे कपड़े उतार कमरे में दाखिल हुई, कमरा चूने की नई-नई पुताई से चमक रहा था। बीच में बड़ी सी मिट्टी की पिंडी बनी थी। कच्चे फर्श को गोबर से लीप-पोत कर चिकना किया गया था। चारों तरफ सोलह थाल करीने से रखे हुए था। जब तिवारियों के घर में बेटे का ब्याह होता था कमरा ऐसे ही चमकता था। बाकी दिनों में गाँव के मनचले आशिकों के आशिकी का अड्डा रहता। अब तो बाकायदा आस-पास के गाँव के मजनु-लैला, इतवार को चढ़ावा चढ़ाने लगे थे।


सास ने खट से दरवाजे की कुण्डी चढ़ाई। ज्योत्सना सहम गई, धम्म से घुटनों में मुँह छिपाकर बैठ गयी। चाची सास ने जूड़ा खोल दिया था, कोई बन्धन लेकर जाना वर्जित था। आगे के दरवाजे से हृदयेश अन्दर दाखिल हुआ। ज्योत्सना घुटनों में मुँह छिपाये दीवार के सहारे बैठी थी। लम्बे घने बाल शरीर पर आवरण का काम कर रहे थे। हृदयेश ने हाथ पकड़कर उठाने का प्रयास किया, जल्दी करो ज्योत्सना लेट हो रहा है। जितनी जल्दी करोगी इस यातना से उतनी जल्दी मुक्ति मिलेगी। ज्योत्सना पैरों से लिपट गयी। ये किस पाप की सजा है हृदयेश? वह रोये जा रही थी। इतने प्यारे रिश्ते की शुरूआत इस मानसिक यातना से क्यो? हृदयेश बैठ गया, उसकी आँखों से भी आँसू बह निकले थे। कोई फायदा इस तर्क-वितर्क का नहीं। मैं तुम्हे रात में सब बताता हूँ। प्लीज अभी इसे खतम करो। मैं आँखें बन्द करता हूँ। हृदयेश आँख बन्द कर वहीं दीवार की तरफ खड़ा हो गया, ज्योत्सना ने हिम्मत करके सभी निर्देश चाची सास के पूरा किया। अन्त में पेटीकोट गले तक बाँध कर पति से कहा अब आप माथा टेके मैं आँख बन्द करती हूँ। हृदयेश में गमछा उतार कर माथा टेका और फिर दोनों ने नए कपड़े पहनकर दरवाजा खोला। इस पूरी घटना से ज्योत्सना इतनी विचलित हो चुकी थी चलना दूभर था। छोटी चाची सास ने हाथ में कसकर पकड़ लिया। कच्चे रास्ते की जलती तपिश ने अब उसके अन्तस तक को झुलसाना शुरू कर दिया था। परम्पराओं के नाम पर दिये जाने वाले मानसिक यातना का यह सबसे बड़ा उदाहरण था ज्योत्सना के सामने, जिसने नव जीवन में प्रवेश से पूर्व ही एक अजीब घुटन भर दी थी। घर पहुँचते पहुँचते साढ़े चार बज चुके थे। दुवार पर मर्दों की चौपाल लगी थी। लकड़ी की हत्थ वाली कुर्सी पर पैर रखकर पंडी जी बैठे भागवत कथा का सार सुना रहे थे। बीच-बीच में घड़ी देख लेते और बेवा औरतों की ओर देखकर बड़बड़ाते- ‘‘इ मेहरारून का झमेला, कुच्छौ नहीं समझता, विलम्ब हो गया तो मुँह पिटाएंगी अपना।’’ नाऊन दौरी कपार पर लिए हाली-हाली भागी आ रही थी। पीछे-पीछे बड़की तिवराईन (ज्योत्सना की सास) हाफी-दाफी आती दिखीं तो पंडी जी कुर्सी पर से कूद कर खड़े हो गये- ‘‘का रे ऽ ऽ ऽ नऊनियाँ तोहूं के सिखवे पड़ी, टेम निकरे जात है और तोर चकल्लस अबही ले चलत बा।

नाऊन- अरे बाबा ऽऽऽ अरे बाबा ऽऽऽ बोलती हुई बरामदे की सीढ़ियां चढ़ती आंगन की ओर भागी। पंडित जी पीछे पीछे आंगन में चौक चन्दन पहले से पूरकर, कलशा और गणेश स्थापित देख पंडित जी मुस्कुराते, खैनी पीटते हुए- बोले वाह शेर मैदान मार लिए। चलो अब जल्दी निपट जायेगा। पंडि जी अपने आसन पर जम गये। उनके मुँह से केवल ऊँऽऽऽ का उच्चारण स्पष्ट सुनाई देता। बाकी मंत्र गले में घनघना कर रह जाता। तिवराइन को आवाज लगाया- वर-कन्या को बुलाइये। तभी आंगन में हृदयेश और पीछे लड़खड़ाते हुए ज्योत्सना चाची सास के साथ दाखिल हुयी औरतों ने ज्योत्सना को पकड़ कर चौक पर बिठाया। पंडी जी ने दोनों के कक्कन खोलकर सास को दिया और बँसवार में फेंकवाने का सख्त निर्देश दिया और कथा बाचने लगे। हर अध्याय के आरम्भ में केवल कलावती कन्या सुनाई देता बाकी अऽऽऽ हूँऽऽऽ हंऽऽऽ की ध्वनि के साथ लुप्त हो जाता नाऊन को उनके संस्कृत ज्ञान पर पूरा संदेह था छेड़ते हुए बोली- ए बाबा! तनी अरथ सहित बांचा कुछ बुझाते नइखे। पडी जी पिनक गये, बगल में पड़ी अपनी लाठी जमीन पर पीटते हुए चिल्लाये- ससुरी बिघन डालती है, जानती है, कुबेला हो रहा है, साली नीच जात, नीच बुद्धि नाऊन भी कम नहीं थी तमतमा उठी- ए बाबा जात पर त जइबे न करी नाही त अब्बे कुलआई माई उबेर देइला। मामला बिगड़ते देख हृदयेश ने हस्तक्षेप किया। पंडी जी खतम करिये पाँच मिनट बचा है। पंडी जी का अऽऽऽ हूँऽऽऽ हंऽऽऽ तेज हुआ। गौरी की सिन्दूर पूजा के बाद कथा सम्पन्न हुई। बड़की तिवराइन ने चैन की सास लेकर पूरब में सुरुज नरायन को आरती दिखा पूजा सम्पन्न होने की घोषणा की।
(6)
रात ग्यारह बजे हृदयेश कमरे में आया। ज्योत्सना के मन में प्रथम मिलन का रोमांच समाप्त हो चुका था। ननदों और चाची सास ने कमरे को सुगन्धित इत्र से इतना गमका दिया था कि उसे उबन हो रही थी। भारी बनारसी साड़ी और गहने उसे चुभ रहे थे। एक तरफ छोटे से मेज पर दो गिलास दूध, सूखे मेवे और मिठाईयां करीने से सजाकर रखे थे। हृदयेश ने दरवाजे की कुंडी बन्द कर दी। ज्योत्सना खिड़की के पास आकाश में उगे पूर्णिमा के चाँद को एकटक निहारते हुए सोच रही थी, पूर्णता भी कितना बड़ा भ्रम है। चाँद का एक दाग के साथ उगना और घटते बढ़ते लुप्त हो जाना। सही है ‘‘सब दिन रहत न एक समाना’’ का उदाहरण इस चाँद से बड़ा और क्या होगा। वह नाहक मुस्कुरा उठी हृदयेश ने उसे मुस्कुराता देख बाहों में भीच लिया। ज्योत्सना की तन्द्रा टूटी। एकदम से उसका मन कसैला हो गया। खुद को उसके मजबूत गिरफ्त से छुड़ाने की कोशिश की। हृदयेश ने उसके गालों पर चुम्बन देते हुए कहा- ‘‘अब इतनी क्या शर्म? सब तो ओपेन हो चुका है।’’ ज्योत्सना चीख पड़ी- बस करिये हृदयेश मुझे आपके साथ नार्मल होने में थोड़ा समय लगेगा। हृदयेश नर्वस हो गया। ‘‘अब क्या हुआ?’’ सब नार्मल तो है न? ज्योत्सना छिटकर दूर खड़ी हो गयी- ‘‘नहीं! सब एबनार्मल है, मुझे घुटन हो रही है, शायद मैं बेहोश हो जाऊंगी। हृदयेश ने दरवाजा खोल दिया, हाथ पकड़कर कहा- ‘‘चलो ऊपर छत पर, शायद खुले में कुछ राहत मिले, गरमी बहुत है, हाँ ये सब उतार कर कुछ हल्का पहन लो। इससे भी घुटन हो रही होगी।’’ ज्योत्सना ने पति से कहा- ‘‘आप चलिए! मैं आती हूँ।’’
(7)
ब्रह्मदेव तिवारी के बीघे भर फैले हुए पुस्तैनी मकान में चार भाईयों का परिवार रहता था। दो बीच के भाई क्रमशः एयरफोर्स में कार्यरत थे। छोटा यहीं प्राथमिक में मास्टर था। भाईयों की शादी भी बड़के तिवारी जी ने खूब ठोक-बजाकर कर दिया था। वहां भी दहेज के फेरे में न पड़कर घराना देखकर भाईयों को ब्याहा था। तीन भाईयों की शादी आस-पास के दबंग ब्राह्मणों के घर में किया। इसका परिणाम यह निकला कि बड़े से बड़ा अधिकारी, नेता दरवाजे पर सलामी लगाकर ही आगे बढ़ता। दूसरे नम्बर के भाई के ससुर विधायक, पिता के तर्ज पर दोनों साले भी राजनीति में कूदे और पार्टी बदल-बदल कर सत्ता में काबिज रहते। बस एक फोन मिलाया बड़के तिवारी ने कि थाना पुलिस हाजिर। तीसरे के ससुर इण्टर कॉलेज में प्रिंसपल, नकल कर सेंटर बना अकूत धन कमाया। रिटायर होने पर खुद ही स्कूल, कॉलेज खोल लिया। आज के दिन वे इलाके के मदन मोहन मालवीय थे। चौथा पढ़ने में होनहार था, इलाहाबाद तैयारी को भेजा लेकिन वहां जाकर वामपंथ और साहित्य में रम गया। बड़के तिवारी को पांच साल बाद भाई के रंग-ढंग का पता तब चला, जब अखबार के साहित्यक पृष्ठ पर उनकी क्रांतिकारी कविता छपी मिली। पढ़ते हुए कान खड़े हो गये- लिखते हैं-
मुझे तोड़नी है,
बनी बनाई पुरातन की वज्र वह दीवार
जो तुम्हारे और मेरे बीच
खड़ी की गयी थी
उस दिन जब तुम गाँव के दक्खिन में
और मैं पूरब में जन्म ले रहा था
जब तुम्हारे मुँह में
सभ्यता की काली स्याही से
अक्षर अक्षर कालिमा के नियम
दूध में घोलकर
पिलाया जा रहा था
और मुझे आंगन में
चौक, चन्दन, पूर
सोने के कलश पर
सूरज की अरुणिमा का
चन्दन लगाकर
चाँदी की कटोरी में
चाँदी के सिक्के से
अन्न प्राशन के नाम पर
चटाया जा रहा था
प्रिये!
मुझे गिरानी है
पुरातन की वज्र दीवार,
तुम्हारे लिए,
जोड़कर अधूरे सम्बन्धों की डोर
तुम्हारे दक्खिन से
अपने पूरब तक।

सरपट पत्नी से सतुआ-पिसान लिए पहली ट्रेन से इलाहाबाद भागे। हाथपैर जोड़कर माँ की अस्वस्थता का हवाला देकर घर लाए। अनुभवी ब्राह्मण मानसिकता ताड़कर बाण छोड़ता है। माँ को समझा-बुझाकर तैयार किया। व्याह का दबाव बनाने लगे। दो बार घर छोड़कर भागे। अन्तिम ब्रह्मास्त्र छोड़ा बड़के तिवारी ने। जोरदार हार्ट अटैक का सन्देश भाई के यहाँ भेज अस्पताल में भर्ती हो गये। पिता तुल्य भाई के हार्ट अटैक की खबर सुन छोटके तिवारी गिरते-पड़ते घर भागे। डाक्टर रिश्तेदार थे, एकांत में ले जाकर समझाया तनाव इनके लिए जानलेवा हो सकता है। बेचारे छोटके तिवारी फंस गये और रोते-रोते ब्याह के बंधन में बंध गये।पहले क्रांतिकारी प्रेम का भूत पूरी तरह माथे पर चढ़ा हुआ जानकर बड़के तिवारी ने इस बार न घर देखा, न घराना। इलाके की सबसे खूबसूरत ब्राह्मण कन्या घर लायी गयी। अल्हड़ गाँव की लड़की, किसी तरह नकल से बी.ए. पास किया था। पिता को रिश्ता घर बैठे मिला तो इलाके भर मूसरन डोल बजा-बजा कर ऐलान किया, हमारी बेटी तिवारीपुर के तिवारियों में जा रही है। स्त्री के देह का सौन्दर्य पुरुष की सबसे बड़ी कमजोरी है, पत्नी का सौन्दर्य सारे क्रांति पर भारी पड़ा और छोटके तिवारी का वामपंथ छू मंतर हो गया।

(8)
आधी रात को गुलाबी शिफॉन की खूबसुरत नाइटी में ज्योत्सना छत पर पहुँची, हृदयेश ने आकाश के चांद को आंख मारते हुए कहा- ‘‘तुम्हारी ज्योत्सना मेरे पास है।’’ दोनों कुछ छड़ एक दूसरे को एकटक निहारते रहे। गोरा रंग, गोल चेहरे पर काली बड़ी-बड़ी आँखें। उसे याद आया जब आजी उसे पहली बार देख कर आयी थी, कहते नहीं अघाती थीं- ‘‘बाबू चनरमा अइसन गोल मुँह पर आम के फाक नियर बड़-बड़ आँख अउर तोता के ठोर नियर नाक, टह-टह लाल ओठ और पीठ पर धौल जमाते हुए कहती अउरी गावे ले ए बाबू एकदम कोइलिया नियर।’’ ज्योत्सना ने ननद के आग्रह पर मीरा का भजन सुनाया- ‘‘पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।’’
हृदयेश ने उसके होठों को चूमने का प्रयास किया तो ज्योत्सना छिटककर भागने लगी। बड़े से सुनसान छत पर मियाँ-बीबी एक दूसरे के साथ भागा-भागी खेलने लगे। थककर हँसते-हँसते लोटपोट हुए जा रहे थे- ‘‘बाप रे धाविका पत्नी पहली रात में इतना दौड़ायेगी पता नहीं था।’’ ज्योत्सना ने कहा- ‘‘हृदयेश! एक बात पूंछू?’’ हाँ क्यों नहीं।….
आप भौतिकी के ही प्राध्यापक हैं न?
आफकोर्स, व्हाई नाट।
तुम्हें आशंका क्यों?
‘‘कमाल करते हैं, इतनी मूर्खतापूर्ण परम्परा का निर्वहन पूरे मनोयोग से करते देख।’’ ज्योत्सना ने व्यंग्य से मुस्कुराते हुए कहा- बात ठस्स से दिमाग में धस गयी। बना बनाया रोमैंटिक मूड उखड़ गया।

‘‘विवशता है।’’ हृदयेश का चेहरा क्रोध से खींच गया। जिसे छिपाने की उसकी कोशिश नाकाम रही।
दूसरा सवाल उससे भी घातक था। ‘‘सुना है आप डी.यू. में आइसा के पदाधिकारी थे और अभी प्रलेस के पदाधिकारी हैं। मैंने आपके कई वैचारिक लेख हंस जैसी बड़ी पत्रिकाओं में पढ़े हैं। आश्चर्य होता है समाज की रुढ़ परम्पराओं, जातिय व्यस्था का खण्डन करने वाला युवक ऐसी यातनापूर्ण कुल परम्परा का न केवल पालन करता है बल्कि पत्नी को भी मानने के लिए विवश करता है।’’ज्योत्सना पूरे आवेग में थी। ‘‘जिन बुराईयों का आपको पुरजोर खण्डन करना चाहिए उसके प्रति यह अन्ध आस्था क्यों?’’ हृदयेश बगलें झांकने लगा, कोई मजबूत उत्तर न दे सका तो कुतर्क करने लगा।देखों! ज्योत्सना। कुछ बातें मानसिक तौर पर इस कदर हमसे जुड़ी रहती हैं कि हम उसे मानने के लिए विवश हो जाते हैं। इस पूजा से मेरी माँ मनोवैज्ञानिक तौर पर जुड़ी है और एक अजीब संयोग भी है कि जिन लोगों ने इसे मानने से इनकार किया उन सब का सफाया हो गया। अब न मानने का कोई विकल्प नहीं बचता मेरे पास।ज्योत्सना को हंसी आ गयी- ‘‘यह भौतिकी का प्राध्यापक कह रहा है, आई डोंट बिलिव, ह्वाट अ-नॉनसेंस जोक।’’

हृदयेश चिढ़ गया- ‘‘तुम्हें इतनी उलझन क्यों हो रही है, कर्मकाण्डी आचार्य चन्द्रसेन शास्त्री की बेटी कुल परम्पराओं के निर्वहन पर सवाल खड़े कर रही है।’’ कंधे उचका कर कहा- ‘‘घोर आश्चर्य तो मुझे हो रहा है।’’
हृदयेश हाथ से पकड़ी हुई रेलिंग की ओर पीठकर ज्योत्सना की तरफ खड़ा अंधेरे शून्य में निहार रहा था।
पति की कोई प्रतिक्रिया न पाकर ज्योत्सना ने पास जाकर कहा- ‘‘वैदिक संस्कृति में पितृसत्ता की साजिशें विषय पर शोध किया है मैंने।’’ हृदयेश झट से बोला- ‘‘पितृसत्ता की साजिशें? तुम्हें शीर्षक किसने दिया?’’
जब तर्क मजबूत होते हैं आपके तो रास्ते रोकने का साहस किसी में नहीं होता। ज्योत्सना के होठों पर दृढ़ता की मधुर मुस्कान थी। हृदयेश मुस्कुरा उठा- ‘‘तो तुम्हें वैदिक नियम स्त्रियों के पक्ष में घोर षड़यंत्र लगते हैं?’’
‘‘बिल्कुल’’- ज्योत्सना ने दृढ़ता से कहा। फिर तो तुम नास्तिक हो। हृदयेश में व्यंग्यपूर्ण मुस्कान में लपेटकर तीर छोड़ा। मना क्यों नहीं कर दिया माँ को पूजा से। कहां थी तुम्हारी वैचारिकी डाक्टर ज्योत्सना उस वक्त?
ज्योत्सना आहत हुई, पुरुष स्त्री के आधुनिकता बोध या वैचारिक होने को किस रूप में ग्रहण करता है वह अच्छी तरह से जानती थी। हृदयेश अपनी गलती छिपाने के लिए उसे घेर रहा था। उसे समझते देर न लगी कि अब उसका जूता उसी के सर है।

‘‘डाक्टर साहब स्त्री का आस्तिक या नास्तिक होना यहाँ प्रासंगिक नहीं है, प्रसंग एक विकृत परम्परा को जबरन ढोने का है।’’ ज्योत्सना ने पूरी ताकत झोककर कहा। पति के आँखों में आक्रोश चांदनी रात के धवल प्रकाश में स्पष्ट दिखाई दे रहा था। एक पराजित पुरुष कितना आक्रामक हो सकता है उसके आँखों की लालिमा में साफ-साफ देखा जा सकता था।‘‘ज्योत्सना तुम्हें नहीं लगता कि तुम हमारे मधुर रिश्ते की नींव कटुता की कटीली पृष्ठभूमि पर रख रही हो। ज्योत्सना ने खुद को संयत करते हुए कहा- ‘‘आप नहीं समझेंगे हृदयेश!’’ हमारी संस्कृति में पुरुष का पौरुष कठोरता के प्रदर्शन में निहित है लेकिन स्त्री जिसे प्राकृतिक तौर पर आपने कोमलांगी घोषित कर रखा है । सब कुछ सुकोमल चाहती है वह चाहती है पुरुष उसे फूल की नाजुक पंखुड़ियों से स्पर्श करे और आप जैसे पुरुषों ने स्त्री को सभ्यता के पिंजरे में कैद खूबसूरत परिन्दा ही माना। पुरुष शिकारी की दृष्टि से देखता है नारी देह को और उसके लिए केवल देह है। व्यक्ति मानने का साहस अभी तक हमारे समाज में मर्दो में नहीं है।’’ उसके चेहरे पर घृणा के भाव स्पष्ट उभर आये थे ‘‘बाप रे बाप!’’ तो आप स्त्रीवादी हैं? हृदयेश ने भयभीत होने का अभिनय किया।‘‘नहीं केवल मनुष्य। जिसे प्रकृति ने वाचिक तौर पर प्रतिरोध करने की क्षमता से नवाजा है।’’ ज्योसना ने घृणा से दाँत पीसते हुए कहा।

पूरब में शुक्र ग्रह उग आया था। सप्त ऋषि और शुकउवा कासे देखकर हृदयेश ने झल्लाते हुए कहा- ‘‘भोर हो गयी, जीवन की सबसे मधुर रात इतनी कड़वी होगी मुझे पता नहीं था।’’
‘‘पवित्र रिश्ते की पृष्ठभूमि भयंकर मानसिक यातना के साथ आरम्भ हो तो उसका हश्र यही होता है हृदयेश!’’ ज्योत्सना रुआसी हो गयी ‘‘मुझे थोड़ा वक्त दें आपके साथ सहज होने में मुझे थोड़ा वक्त लगेगा।’’ कहते-कहते वह रो पड़ी।हृदयेश से ज्योत्सना का रोना नहीं देखा गया। स्त्री के आंसू में बड़ी ताकत होती है। बड़े से बड़े चट्टान पुरुष को पिघलाने की क्षमता से लैस। हृदयेश ज्योत्सना को सीने से लगाकर पुचकारने लगा।
‘‘अरे यार! मैं तो गुस्से में यह सब कह गया। रही बात वक्त की तो जानेमन, अब पूरा जीवन तुम्हारा है जब तक चाहो इंतजार करा लो।’’ दोनों की आंखें मिली। सजल स्नेहिल कंपकपाते होठों से हृदयेश ने ज्योत्सना के होठों को चूम लिया। ज्योत्सना ने शर्माकर पति के सीने में चेहरा छिपा लिया।
हृदयेश ने कहा- ‘‘क्या हुआ? आखिर मैं तुम्हारा पति हूं वैसे भी हमारे बीच कोई पर्दा नहीं फिर उस क्षण को लेकर इतना विचलन ठीक नहीं ज्योत्सना। ज्योत्सना ने उसी मधुरता से उत्तर दिया- ‘‘जानती हूं लेकिन जो पर्दा अपनी स्वीकृति के साथ पूरी सजगता से उठना चाहिए था वह मेरे जीवन में भयंकर दुर्घटना बनकर आया हृदयेश! मैं घोर मानसिक पीड़ा से गुजर रही हूं। थोड़ा वक्त दें प्लीज।

दोनों का वाक्युद्ध पूरी रात चलता रहा, भोर की लालिमा पूरब में छिटकने लगी। सास बहू को जगाने कमरे में पहुंची। कमरे में दोनों को न पाकर शंका हुई कि कहीं गर्मी के कारण दोनों छत पर न सो रहे हों। जल्दी जल्दी सीढ़ियां चढ़ती हुई छत पर पहुँची। माँ को देख हृदयेश ने पत्नी को झट से बाहों से अलग किया। ज्योत्सना तुरन्त नीचे भागी। माँ ने बहू को नाइटी में देख बेटे को आँखों ही आँखों में बहुत कुछ सुनाया। हृदयेश ने सर झुकाकर आगे ऐसा न करने का आश्वासन दिया।
(9)
ब्याह के पन्द्रह दिन बीत गये। बड़ी मान मनउल्ल के बाद मुश्किल से दो बार पति पत्नी एक हुए थे। ज्योत्सना पति की सहजता सरलता और संयम पर मुग्ध हुई जा रही थी। गाड़ी पटरी पर लौट रही थी। दोनों बड़े चाचा ससुर अपने परिवार को लेकर नौकरी पर लौट चुके थे। घर में तीन बेवा वृद्ध औरतें छोटे चाचा सुसर-सास, सास ससुर के अतिरिक्त छोटी ननद मंजू और साल भर का चचेरा देवर बिट्टू रह गये थे। बड़ी ननद को हफ्ते भर बाद ही ससुराल वाले विदा कराकर ले गये थे। हृदयेश दो बहन एक भाई में सबसे बड़ा था। चाचा का हमजोली होने के कारण उनसे वह मित्रवत व्यवहार रखता था। वह उनसे इतना प्रभावित था कि उनके कहने पर कुएं में कूद सकता था। अल्हड़ गाँव की लड़की चाची भी उसके साथ देवरों सा हास-परिहास करती थीं। बड़की तिवराइन आँखों की आँखों में देवरानी को समय-समय पर सीमाओं का ज्ञान कराती रहती। आवश्यकता पड़ने पर जबान भी चलाती।



भरे पूरे परिवार में कमकरिन बर्तन चौका के लिए, महराज रसोई बनाने के लिए, तथा दरवाजे पर तीन नौकर झाड़ू बटोरू के लिए, गोरु चउवा की देखभाल के लिए और इसके अतिरिक्त चुनमुन यादव बड़के तिवारी के व्यक्तिगत ड्राइवर कम बॉडीगार्ड अधिक थे। पिस्टल टांगकर लकदक सफेद शर्ट, पैंट और स्पोर्ट शूज में पूरे माफिया लगते। आगे-आगे मूछों पर ताव दिये सभा पंचायतों में बड़के तिवारी चलते पीछे-पीछे पिस्टल पर हाथ फेरते चुनमुन यादव। दोनों की जोड़ी इलाके में सरनाम थी। ज्योत्सना ने घर में अच्छी पैठ बना ली। तीनों आजी सासों का पैरा दबा देती बाल झाड़ती, सिन्दूर बिन्दी लगाकर पैर छूती। बड़की तिवराइन संस्कारी बहू पाकर धन्य हुई।

ज्योत्सना छोटी सास से घुल मिल गयी, दोनों घंटों बातें करती, साथ खाती-पीती, बिल्कुल सहेलियों की तरह। धीरे-धीरे आपसी दुःख-सुख भी बांटने लगीं। ज्योत्सना विज्ञान पढ़ना चाहती थी, पिता ने कुल परम्परा के अनुसार जबरन संस्कृत पढ़ने को विवश किया। जिसका गहरा क्षोभ उसके मन में था। वह अपने विद्रोह से पितृ सत्ता को जड़ से उखाड़ फेकना चाहती थी। चाची सास की खूबसूरती ने उन्हें घर में इस कदर कैद कर लिया था कि वह बाहर की दुनिया का विकास स्कूल, अस्पताल, डाकखाने से ज्यादा नहीं जानती थी। दबाकर रखने का परिणाम यह हुआ कि वह बात-बेबात अनायास हंसती और किसी को बिना सोचे समझे कुछ कहतीं।
ज्योत्सना पिता को कोसती, वह समाज को। एक दिन ज्योत्सना ने पूछा- ‘‘चाची जी आप चमईया माई की पूजा करते असहज नहीं हुई थीं?’’

काहे की असहजता बहिनी, देहियें न देखेगी छिनरी, कोठरी में घूसकर उसके कपार पर टांग पसारकर खड़ी हो गयी। साया उठा दिया और गाने लगी देखो-देखो चमईया हमार सुतुही देखो और ठठाकर हँसते हँसते लोट-पोट हो गयी। और चाचा जी? ज्योत्सना पूछते वक्त फटी आँखों से चाची सास को एकटक देख रही थी, ऊ तो कोने में खड़े होकर मूत रहे थे। हमने तो कह दिया। देखो जी हम साया नहीं उतारेंगे, खाली साया में आपकी भाभी ने अन्दर आने दिया आप आंख मूने नहीं तो हम समनवे पहिन लेंगे, फिर यह न कहियेगा की बड़ी निर्लज है।’’ फिर? ज्योत्सना अवाक थी। फिर क्या इन्होंने आंख मूंद लिया, मैंने कपड़ा पहिना सामान चढ़ाया और निकल गयी। इ देखो, साल भितरे की देन है, पलंग पर गोल मटोल बच्चा निश्चिंत सोया था। ज्योत्सना का दिमाग घूम गया। उफ्फ ये गाँव की औरत भी इतनी समझदार निकली और मैं संसार की सबसे बड़ी मूर्ख जिसे ये सब नहीं सूझा। उसे अपने ऊपर गहरा क्षोभ हुआ जी में आया सिर दीवार पर दे मारे।
(10)

मई में शादी हुई और जुलाई में दो माह गाँव रह कर हृदयेश और ज्योत्सना दिल्ली लौट आये। महानगर की जीवन शैली और व्यस्त दिनचर्या में पिछले दिनों का गम जाता रहा। हृदयेश और ज्योत्सना दोनों अभी बच्चा नहीं चाहते थे। सास हर महीने फोन कर कोई नई बात का सवाल दागती और ज्योत्सना टाल जाती। सास को चिन्ता हुई पढ़ी-लिखी आधुनिक खयालों वाली शहरी लड़की ने लगता है पूजा में कोई कमी कर दी है। पति से चिन्ता जाहिर कर रोने लगी। एक अज्ञात भय ने दंपति को घेर लिया। क्वार का महीना, जाड़े ने अपना असर दिखाना शुरु कर दिया था। शाम होते ही बुर्जुग ओढ़ना-बिछावन डाल बिस्तर में दुबक कर बैठ जाते। एक शाम बड़के तिवारी शहर से लौटकर संध्या वंदन कर दुवार पर आराम कुर्सी पर आँख बन्द कर कुछ मंथन करने में लीन थे। बड़की तिवराईन एक चुरुआ ठण्डा तेल पति के कपार पर डाल, सिर दबाने लगीं। दस मिनट तक पत्नी की आवाज न सुनकर बड़के तिवारी को आश्चर्य हुआ। ऐसे समय पर वह अक्सर पूरे घर की रिपोर्ट देती। ज्यादातर छोटे भाई की छोटके तिवारी पूरे विद्रोही, आज कल खुलेआम मांस मछली खाने लगे थे। तिवारी कुर्सी छोड़कर खड़े हो गये, क्या बात है हृदय की अम्मा, तुम्हारा इतना मौन मुझे अखर जाता है। कोई तो चिन्ता का विषय अवश्य है तुम्हारे मन में बड़की तिवराईन ने पति को सजल आँखों से देखा, ‘‘सुनिये जी छः महीने बीत गया और बहू ने अभी तक खुशखबरी नहीं दी, मेरा जी घबराता है। ना जाने क्या होने वाला है। पति के हथेलियों को पकड़कर आँखों में आंखें डालकर कहा- ‘‘हमको दिल्ली जाना है। बड़के तिवारी ने तुरन्त स्वीकृति दी। ठीक है चलो तुम्हे देश की राजधानी दिखाते हैं, तुम भी क्या याद रखोगी।

हफ्तेभर बाद का टिकट मिला, हृदयेश को फोन से खबर कर दिया गया। ज्योत्सना ने जिंस-कुर्ते, टाउजर, टाप सब आलमारी में छिपा दिया। रात में सोते वक्त हृदयेश से कहा- ‘‘अम्मा-पिताजी कब तक रहेंगे? हृदयेश कोई किताब पढ़ रहा था- सुनकर हँस पड़ा। जानेमन घबड़ा गयी? अभी वो आये नहीं और आपने जाने का हाल पूछ लिया।’’ ज्योत्सना झेप गयी। मेरा मतलब ये नहीं था, अब गाँव की तरह यहाँ तो दस नौकर-चाकर है नहीं, और अम्माजी ठहरी पूरी कर्मकांडी, सब कैसे मैनेज होगा? सोच रही हूँ और एक बात ध्यान रखना, चेतावनी देते हुए कहा- ‘‘अण्डे-आमलेट का फरमान मत देना उनके सामने गलती से भी वरना मेरा छुवा जीते-जी नहीं खायेंगे। ज्योत्सना के चेहरे से चिन्ता साफ झलक रही थी।सास आई, हफ्ते भर रहकर हिदायते देतें, डाक्टर को दिखाते-सुनाते दिल्ली घूमकर चली गयीं। स्टेशन पर रोते हुए बेटे से वचन लिया छुट्टी होते घर चले आना। छुट्टियों में ज्योत्सना मायके जाना चाहती थी लेकिन हृदयेश तैयार नहीं हुआ। कई दिनों तक पति-पत्नी में शीत युद्ध चलता रहा। अन्त में हृदयेश ने समझौता करते हुए कहा- ‘‘अपने पिता से कहो घर आकर ले जायें विदा कराकर।’’ ज्योत्सना मान गयी, कोई चारा नहीं था। दिल्ली से बनारस के लिए ट्रेन रवाना हुई, स्टेशन पर बड़के तिवारी बुलैरो लिए पहले से खड़े थे। बेटे-बहू को देखकर हर्षित हुए, मिलने-मिलाने, हाल-चाल के बाद गाड़ी तिवारीपुर की ओर चल पड़ी। रास्ते भर पिता-पुत्र पूरे गाँव का हाल-चाल, देश-प्रदेश की राजनीति का गाँव पर प्रभाव आदि विषयों पर चर्चा करते रहें। अबकी गर्मी में किन-किन के घर में लगन है और कितना दान-दहेज मिल रहा है पर बड़के तिवारी विशेष रस लेकर बतियाते। ज्योत्सना सर झुकाये दोनों की बातें सुनती और मन ही मन पति को बनारस की सड़कों से गुजरते हुए कोसती, नैहर के रास्ते से गुजर रही थी, हृदयेश ने खबर तक करने को सख्त मना किया था। ‘‘तुम्हारे माँ-बाप का ड्रामा स्टेशन पर ही चालू हो जायेगा, आकर घर से ले जायें समझी। हमारे घर की बहुयें बिना दिन रखे विदा नहीं होती।
(11)
गाँव का नैसर्गिक वातावरण ज्योत्सना को बचपन से लुभाता रहा है। दुवार पर पूरा खानदान जमा था, गाड़ी रुकते ही छोटी ननद मंजू भागकर जल्दी से गाड़ी खोलकर भाभी के पाँव छूकर सामान निकालने में भाई की मदद करने लगी। बड़की तिवराईन ने भर लोटा धार से बेटे-बहू को ओईछ कर नजर उतारा। बहू को पकड़कर अन्दर ले गयीं। टोले भर की औरतें और लड़कियों का हुजूम आंगन में उमड़ा देख ज्योत्सना सहम गयी। सफर की थकान से शरीर टूटा जा रहा था। चाची सास गले मिलीं और बारी-बारी सभी बड़ी-बुर्जुग महिलाओं के पैर छुलाया। लड़कियों ने भाभी को छेड़ा, ‘‘अकेले आयी भाभी, हम तो सोच रहे थे भतीजे का नेग लेंगे।’’ बड़की तिवराईन का दिल बैठ गया। चाची सास ज्योत्सना को भीड़ से निकालकर कमरे में ले गयीं।
‘‘जाओ नहा-धोकर आराम करो, शाम को बतियाते हैंऔर आंख दबाकर खिलखिला उठीं। ज्योत्सना को छोटी चाची की खिलखिलाहट बड़ी प्यारी लगती थी। औरतों का खिलखिलाकर हँसना कितना दुभर है, जानती थी। याद आया मायके में माँ कभी खुलकर हँसने नहीं देती थी। बड़े भाई तो कई बार हाथ तक बचपन में चला देते थे। वह हँसना चाहती थी कई बार छोटी चाची की तरह खिलखिलाकर, स्वच्छन्द हँसी।

महीना भर बीत गया, मई-जून में विदाई की कोई तिथि नहीं मिली, सास दुखी मन से हृदयेश से कह गयीं- ‘‘स्टेशन पर माँ-बाप से मिला देते तो बहू को दुख न होता।’’ हृदयेश को भी दुख हुआ, पिता-भाई तो कई-बार दिल्ली आकर मिल गये थे, लेकिन माँ से मिले ज्योत्सना को पूरा एक साल हो गया था। वह घंटों रोती रही। एक दिन ज्योत्सना बड़की आजी का पैर दबा रही थी, आजी खुश हो गयीं, खूब दूध-पूत का आशीष दे अपनी कोठरी में ले गयीं। काठ के पुराने सन्दूक को खोलकर एक छोटा सा नक्कासीदार बक्सा निकाला, बक्सा गहनों से भरा था। दो मोटे-मोटे पछुऐ उसके हाथ में रख पहना दिया, तुम्हारी कलाईयां वैसी ही गोल-मटोल है बहू, जैसे जवानी में मेरी थी। आँखों से झर-झर आंखू बहने लगा। ज्योत्सना उनके कष्ट को समझ सकती थी। भरे यौवन में वैध्वय कितना बड़ा अभिशाप है उसने बनारस के विधवा आश्रमों, घाटों आदि पर भटकती, भीख मांगती विधवाओं के जीवन में बहुत नजदीक से देखा था शोध कार्य के दौरान।

आजी मौन थी ये ‘चमईया’ और इसकी अन्धभक्ति घर में क्यों होती है? ज्योत्सना ने बड़ी मासूमियत से पूछा। आजी ने संयत होकर कहा बताती हूँ तुम्हें, और काठ के सन्दूक से सास की जनानी वंशावली निकालकर बैठ गयीं- ‘‘हमारे पुरखों में एक थे जटाशंकर बाबा, बड़े विद्वान, बलिष्ठ और सुन्दर। गाँव की जमींदारी राजा साहब से शास्त्रार्थ में जीतने के कारण इनाम में मिला था। घोड़े से गाँव-गाँव घूमते आसासियों का दुख-दर्द पूछते, सूखा पड़ने पर किसानों का लगान राजा को अपने खजाने से देते। न्यायप्रिय और दयालु थे। बाबा के जीवन में सब कुछ ठीक चल रहा था कि एक दिन भोरे राजा का बुलावा आया, घोड़े से चल दिये, सूनसान रास्ते में एक जगह घोड़ा अड़ गया, बड़ी कोशिश करते रहे, लेकिन घोड़ा टस से मस न होता। बेचारे सिर पर हाथ रख पास के बगीचे में जा बैठे दिन चढ़ आया था, भूख-प्यास से बेहाल, बाग में कुँआ तो था, लेकिन लोटा डोर नहीं। बाबा ने सोचा अब जीवन समाप्त। बेचारे ईश्वर को याद कर रोने लगे, तभी एक बूढ़ी औरत अपनी जवान बेटी के साथ लोटा-डोर लिए आई,
बाबा गिरते-पड़ते पहुँचे। बूढ़ी औरत ने कहा- आप बड़ मनई बुझाते हैं, हमारे हाथ का छुआ पियेंगे। बाबा ने हाथ जोड़ विनय किया, जीवन मिले तो सोचेंगे। बुढ़िया ने बेटी को इशारा किया। लड़की भर लोटा पानी लिए आई और मुस्कुराते हुए बाबा को पिलाने लगी। लड़की दिव्य सुन्दरी थी, बाबा मुग्ध हो गये। अक्सर बाग से गुजरने लगे। लड़की और उनका मेल-जोल बढ़ा तो बुढ़िया की झोपड़ी तक पहुँचे। बुढ़िया को कुजात छांट जात वालों ने गाँव निकाला दे रखा था, विधवा औरत जवान बेटी के साथ विराने में झोपड़ी डाल रहती थी। कहते हैं- ‘‘इतनी बड़ी डाईन थी कि उड़ती चिड़िया का पंख बांध देती थी।’’ धीरे-धीरे मड़ई अटारी में बदल गयी। गर्भ रहता तो बुढ़िया मार कर गिरा देती। लड़की महीने शोक मनाती फिर पुराने ढर्रे पर लौट आती। आखिरी गर्भ माँ से छिपा ले गई। जब-तक पेट उभरा पाँच माह हो चुके थे। माँ ने जहर खा लिया। लड़की बाबा के दरवाजे पर आकर बैठ गयी। बाबा का तीनों त्रिलोक घूम गया। समझा-बुझा कर वापस किया, अगले पूरे दिन साथ रहे, सोचते रहे कैसे मुक्ति मिले? आखिरकार अपने विश्वासपात्र नौकर को आदेश दिया, हाथ-पैर बाँध के पोखरे में बोर दो और ब्रह्महत्या से मुक्ति के लिए चार धाम को निकल गये।

इधर बाबा के चार भाईयों में तीन की पत्नियों को गर्भ था। आधी रात को डग्गर बजाते सपने में आयी और पेट काछ के चली गयी। सबेरे तक घर-आँगन खूने-खून। क्या बतायें बिटिया पुरनिया (आजी सास) कहती थी, लगा खूँट नसा गया। साल भर बाद बाबा लौटे तो दरवाजे पर सियापा छा गया था। देवी प्रकोप से बारी-बारी तीन जवान बेवा औरते घर में दहाड़ रही थी। पत्नी बेटी को छाती से साटे पास आने से डरती। बाबा ने देस-देस के पण्डितों को दिखाया। कोई फायदा नहीं। पण्डा, मौलवी, पीर, मजार सब एक किया लेकिन जस का तस सब बना रहा। इसी बीच किसी ने एक ओझा का पता दिया ओझा बुलाया गया। गजब हो गया बहिनी- ‘‘ओझा बकने लगा, गर्भ के साथ चमईनिया डोला रही है।’’ बाबा ने उपाय पूछा- ‘‘ओझा बोला- वंश-दर-वंश पुजइया लेगी महराज। चौरी मांग रही हैं। हिस्सा मांग रही है।’’ कोई चारा नहीं था- बाबा मान गये- उसकी कोठी ओझा को दे बारी वाले पोखरे के पास चौरी बन्हा दिया। पत्नी गर्भ से हुई, नौ माह पर जुड़वा बेटे हुए। ओझा आ धमका, पूजन दें महराज! नहीं तो छोड़ेगी नहीं, जनम-विवाह सब पर। पत्नी हाथ जोड़ विनती करने लगी, देंगे क्या मांगती है? ओझा ने उसकी मांग सबको सुनाई, पैदाइस पर उसका मन्दिर, विवाह पर वर-बहू नंगे जेवनार, गहना, कपड़ा चढ़ा कर पाँचवें दिन साथ रहें, तभी वंश चलेगा।

मन्दिर के नाम पर बाबा ने एक कोठरी बनवा दी। पत्नी ने चार बेटों को जनमा लेकिन आगे बेटों ने चमईया को पूजा देने से मना कर दिया। देखते ही देखते तीन बेटे मर गये। छोटा बेटा बारह का था जल्दी-जल्दी ब्याह कर पुजइया दिलाया। वंश इसी से आगे बढ़ा। इनके भी चार बेटे हुए, ये हमारे पति थे। बड़के भाई माँ की बात मानकर सब करते गये। हमारे पति पढ़े-लिखे होने के कारण नहीं माने। नतीजा देख रही हो। ‘चमईया’ बड़ी जगता हैं। कह कर फफक-फफक कर रोने लगीं। ज्योत्सना पूरी कहानी ध्यान से सुन रही थी। अजीब संयोग जुड़ा था वंशावली की कहानी से। एक तरफ छोटी चाची सास तो दूसरी तरफ आजी सास का वृतांत। माथा घूम गया, अब समझ आया उसे कि बच्चा पैदा करना बेहद जरुरी है वरना सास पागल हो जायेगी। साल भर बाद ज्योत्सना ने बेटे को जन्म दिया। सास ने अंग्रेजी बाबा बजवा कर ‘चमईया’ को कांची-पाकी मसाला चढ़ाया, बड़के तिवारी ने बारह गाँव के ब्राह्मणों को महाभोज दिया।

कुल परम्परा चलती रही। शादी के पन्द्रह साल बीत गये। ज्योत्सना अब दो सुन्दर बेटों की माँ थी। सास खुशी से मुसरन ढोल बजातीं। चाची सास भी अब तक दो बेटों की माँ बन चुकी थी। जिस कुल में तीन पीढ़ियों से एक खूँट पर वंश बेल आगे बढ़ती थी वहाँ अब चारों भाईयों की वंश वृद्धि हो रही थी। ज्योत्सना हर साल छुट्टियों में घर आती, रास्ते में ‘चमईया का मन्दिर’ देख सभी गाड़ी में बैठे-बैठे हाथ जोड़ते। देखते ही देखते इन पन्द्रह सालों में ‘चमईया’ की महिमा पूरे इलाके में फैल गयी, तिवारीपुर के तिवारियों की कुल देवी ‘चमईया’ की कृपा से दरवाजे पर हंस लोटता है। सावन में आस-पास की औरतें कढ़ाई चढ़ाने लगीं। प्रेमी मन्नत का धागा बाँधने लगे। कोठरी भव्य मन्दिर में बदल गया। चुनमुन यादव के संरक्षण में हाट-बाजार सजने लगा। ‘चमईया’ के गीतों के कैसेट से बाजार पट गया।


ज्योत्सना के बाद सबसे पहले बड़े चाचा ससुर के बेटे का ब्याह हुआ। पति-पत्नी दोनों डाक्टर बहू को कुल परम्परा के अनुसार चमईया की पूजन विधि बताने की बारी आई। मन्दिर के पिछवाड़े वाले चोर दरवाजे पर नवेली दुल्हन को ले जाकर ज्योत्सना ने वही निर्देश दिया जो छोटी चाची ने किया। लड़की आवाक मुँह ताकने लगी। पुजइया हो गयी। साल भर बाद बहू ने बेटे को जन्म दिया। घर में एक बार फिर शहनाई बजी। कुल की परम्परा वंशावली में दर्ज हुई, बहुओं के शादी के पहले साल में बच्चा जनमना अनिवार्य है नहीं तो चमईया कुपित हो जायेंगी और बहुओं की कुल परम्परा में चमईया की पूजा का मंत्र वाक्य बना- ‘‘देखो देखो चमईया हमार सुतुही।’’

नोट : जातिसूचक शब्दों का प्रयोग यथार्थ के सन्दर्भ से है, लेखिका की उनसे कोई सहमति नहीं है 

औरतें – क़िस्त तीन ( स्पैनिश कहानियां )



एदुआर्दो गालेआनो / अनुवादक : पी. कुमार  मंगलम 


अनुवादक का नोट 


“Mujeres” (Women-औरतें) 2015 में आई थी। यहाँ गालेआनो की अलग-अलग किताबों और उनकी लेखनी के वो हिस्से शामिल किए गए जो औरतों की कहानी सुनाते हैं। उन औरतों की, जो इतिहास में जानी गईं और ज्यादातर उनकी भी जिनका प्रचलित इतिहास में जिक्र नहीं आता।  इन्हें  जो चीज जोड़ती है वह यह है कि  इन सब ने अपने समय और स्थिति में अपने लिए निर्धारित भूमिकाओं को कई तरह से नामंजूर किया।

भविष्य की जुबानियाँ

एक बार हुआ यह कि पेरू में जादू-करतब दिखाने वाली एक औरत ने मुझे लाल गुलाबों से ढँक दिया और इसके बाद मेरा भाग्य पढ़ते हुए कहा:
“एक महीने के भीतर-भीतर तुम्हें एक बड़ा ईनाम मिलेगा” मुझे हँसी आ गई. मुझे हँसी उस अनजान औरत के अगाध स्नेह पर आई जो मुझे फूल और सफलता की दुआएँ भेंट कर रही थी. मुझे हँसी ईनाम या सम्मान शब्द से आई जिसमें पता नहीं क्या तो मजाकिया-सा है.  हंसी उसी वक़्त मोहल्ले के एक पुराने दोस्त की याद होकर भी आई.  वह निहायत ही रूखा लेकिन खरी-खरी बोलने वाला इंसान था. अपनी छोटी सी उंगली हवा में उठा, सजा सुनाने के अंदाज़ में कहा करता था :”आज नहीं तो कल, लेखकों को रूखा-सूखा खाकर ही ज़िंदा रहना है”. उसकी यही बात याद कर मुझे हंसी आई. और वह जादूगरनी मेरी हँसी पर हँस दी थी.एक महीने बाद, ठीक एक महीने बाद मोंतेवीदियो में मुझे एक टेलीग्राम मिला. टेलीग्राम यह बता रहा था कि चिले में मुझे एक बड़ा ईनाम दिया गया था. उस ईनाम का नाम खोसे कार्रास्को पुरस्कार था.



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औरतें
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टेलीविजन


मुझे यह स्पेनी टेलीविजन दुनिया की नामचीन हस्तियों में शुमार रोसा मारिया मातेओ ने बताया था. किसी एकदम से नामालूम से गाँव की एक औरत ने उन्हें एक ख़त लिखकर एक सवाल का सच-सच जवाब बताने की गुजारिश की थी. “जब मैं आपको देख रही होती हूँ, तब क्या आप भी मुझे देखती हैं?”
रोसा मारिया ने मुझे यह बताया. और यह भी कि उन्हें नहीं सूझा कि इस सवाल का जवाब क्या होना चाहिए.

उन दो आवाजों के नाम 

वे साथ बड़ी हुई थी. गिटार और विओलेता पार्रा.
जब एक बुलाती, दूसरी चली आती थी. गिटार और वह एक साथ हँसतीं, रोतीं. सवाल पूछतीं, हैरान होतीं और विश्वास करतीं थी. गिटार के सीने में एक छेद था. उसके भी.  आज ही के एक दिन की तरह 1967 में गिटार ने बुलाया, लेकिन वियोलेता नहीं आई. उसके बाद वह कभी नहीं आई.

वह नहीं भूलती

वह कौन है जो अफ्रीका के जंगलों के सारे छोटे रास्ते जानती पहचानती है? कौन है वह जो हाथीदांत के शिकारियों तथा दुश्मन जंगली जानवरों की खतरनाक जद से बचना जानती है? कौन अपने तथा दूसरों के छोड़े गए निशानों को पहचानती है? कौन अपनी सभी संगिनियों तथा साथियों की यादें बचा कर रखती है?
कौन है जो वे सारे सन्देश-संकेत छोड़ती है जिसे हम इंसान न तो सुन और न ही बूझ सकते हैं? वही संकेत जो बीस किलोमीटर से भी अधिक की दूरी से सचेत करना, मदद देना, घुड़की देना या दुआ-सलाम करना जानते हैं?
वो वह है. सबसे बुजुर्ग हथिनी. सबसे बूढी, सबसे अक्लमंद. वह जो झुण्ड के सबसे आगे चला करती है.


लेखक के बारे में


एदुआर्दो गालेआनो (3 सितंबर, 1940-13 अप्रैल, 2015, उरुग्वे) अभी के सबसे पढ़े जाने वाले लातीनी अमरीकी लेखकों में शुमार किये जाते हैं। साप्ताहिक समाजवादी अखबार  एल सोल  (सूर्य) के लिये कार्टून बनाने से शुरु हुआ उनका लेखन अपने देश के समाजवादी युवा संगठन  से गहरे जुड़ाव के साथ-साथ चला। राजनीतिक संगठन से इतर भी कायम संवाद से विविध जनसरोकारों को उजागर करना उनके लेखन की खास विशेषता रही है। यह 1971 में आई उनकी किताब लास बेनास आबिएर्तास दे अमेरिका लातिना (लातीनी अमरीका की खुली धमनियां) से सबसे पहली बार  जाहिर हुआ। यह किताब कोलंबस के वंशजों की  ‘नई दुनिया’  में चले दमन, लूट और विनाश का बेबाक खुलासा है। साथ ही,18 वीं सदी की शुरुआत में  यहां बने ‘आज़ाद’ देशों में भी जारी रहे इस सिलसिले का दस्तावेज़ भी। खुशहाली के सपने का पीछा करते-करते क्रुरतम तानाशाहीयों के चपेट में आया तब का लातीनी अमरीका ‘लास बेनास..’ में खुद को देख रहा था। यह अकारण नहीं है कि 1973 में उरुग्वे और 1976 में अर्जेंटीना में काबिज हुई सैन्य तानाशाहीयों ने इसे प्रतिबंधित करने के साथ-साथ गालेआनो को ‘खतरनाक’ लोगों की फेहरिस्त में रखा था। लेखन और व्यापक जनसरोकारों के संवाद के अपने अनुभव को साझा करते गालेआनो इस बात पर जोर देते हैं कि “लिखना यूं ही नहीं होता बल्कि इसने कईयों को बहुत गहरे प्रभावित किया है”।




अनुवादक का परिचय : पी. कुमार. मंगलम  जवाहर लाल नेहरु विश्विद्यालय से लातिनी अमरीकी साहित्य में रिसर्च कर रहे हैं .  आजकल फ्रांस में हैं. 


क्रमशः



नदिया के तीरे-तीरे

डॉ. आरती  

संपादक , समय के साखी ( साहित्यिक पत्रिका ) संपर्क :samaysakhi@gmail.com

प्रिय नन्ना

इन दिनों आपकी बहुत याद आ रही है. पिछले कई दिनों से मन बेचैन है, लगता है आपसे खूब बात करूँ, आपको छू सकूं  , पास बैठकर कांपते झुर्रीदार हाथों को  पकड़ कर, चीनी मिट्टी के  सफेद प्लेट में थोड़ी-थोड़ी चाय डाल कर पिला सकू, आपके नहाने से पहले और बाद भी पीठ में तेल लगा सकूँ  और…. ढेरों इच्छाएँ… अनगिनत चाहतें?यह सब अभी संभव होता नहीं लग रहा. हमारे बीच रेलसफर के  दस-ग्यारह घंटों की बिसात बिछी है जिसे पार किए बिना इच्छाओं का कोई भी को ना छू पाना कैसे मुमकिन होगा? बस इसलिए यह भूला-बिसरा तरीका  खोज बैठी चिट्ठी लिख रही हूँ.

चिट्ठी लिखते हुए याद आता कि आठवीं कक्षा पास कर नवमीं पढऩे जब मैं माँ-पापा के  पास जा रही थी. लगभग बारह साल बाद आपसे दूर जाना बेहद  कठिन था. बहुत कठोर सी मानी जाने वाली लड़की रो रही थी, खूब रो रही थी. आपने बस में बैठ जाने के  बाद कहा था- चिट्ठी लिखना, अभी तुम ग्रेजुएट नहीं हुई हो.सुनकर पापा मुस्कुराए थे. उन्हें पता था यह तंज किया गया है और उन्हीं के लिए किया गया है. और मैं हर पंद्रह-बीस दिनों में चिट्ठी लिखने लगी. कोशिश करती कि अंतर्देशीय-पत्र के तीनों पन्ने भर लिखूँ… लेकिन तब मेरी चिट्ठियाँ  आगे बढ़ती ही न थीं! बस पैट्रन राइटिंग पर…. हम सब यहाँ बहुत खुश हैं. आपकी  कुशलता की  कामना…. मेरी पढ़ाई अच्छी चल रही है….. फिर छोटी बहनों, भाई की  पढ़ाई….. फिर हम सब नानी को , आपको  याद करते हैं…. कभी-कभी मौसम की  बातें भी होती हैं…. चिट्ठी का  जवाब देने का  अनुरोध और बस विराम.


उन दिनों मेरे पास लिखने लायक  बातें ही नहीं थी या निश्चित न था कि कौन सी बात किससे कही जाय. ठीक  आज इसके  उलट है. मेरे दिल के  हरेक  कोने में ठूँस-ठूँसकर शब्द भरे हैं. चरखा, चक्की , कैंची, सिलाई मशीन और कलम सब कुछ बारी-बारी चल रहा है भीतर. स्मृतियों का  पूरा का  पूरा थान लपेट रखा है मैंने.
जिक्र चिट्ठियों का आया तो आपकी  ही एक  बात याद आई. ससुराल जाती बेटियों को  नसीहत की  तरह एक  पंक्ति पकड़ा दी थी- मुझे कभी भी चिट्ठी मत लिखना. उन्होंने अच्छी बेटियों की  तरह पालन किया. आखिर बेटियाँ किसकी  थीं? आपकी  तरह ही थीं. आपने भी तो अपने पिता को  तीन वचन दिये थे… एक – ताउम्र पेड़ पर नहीं चढऩे का , दूसरा- साइकिल नहीं चलाने का  और तीसरा कि नदी-तालाब में तैरेंगे भी नहीं. आज मैं आपको  यह चिट्ठी लिखते हुए सोच रही हूँ कि यदि मेरी माँ और दोनों मौसियाँ चिट्ठी लिखती तो क्या-क्या लिखतीं…. कितने पन्ने भर लिखतीं…. क्या कभी खत्म होती उनकी चिट्ठियाँ …?

मेरी माँ ने कभी चिट्ठी नहीं लिखी. पिता को  नहीं, पति को  भी नहीं और किसी प्रेमी को  भी नहीं. मुझे भी नहीं.
माँ और उनकी  बहनों का  चिट्ठियाँ  न लिखने का  वचन पिता के  साथ-साथ पूरी कायनात के लिए था. कभी-कभी मुझे लगता है वह ‘वचन’ न था क्योंकि वचनों में प्रतिपक्ष की सहमति भी होती है. यहाँ प्रतिपक्ष की  प्रतिध्वनि कहाँ सुनी गई थी. यदि सुनी जाती तो वे शायद कहतीं- बाबूजी हम आपको  चिट्ठी लिखे बिना कैसे रह सक ती हैं, आखिर हम अपने सुख-दुख और किससे कहेंगी, दुख विपत्ति के  बखत आखिर किसे पुकारेंगी?…. लेकिन  नहीं…. यह बारीक  प्रतिध्वनि गूँजी होगी जरूर, पर सुनता कौन? यहाँ वचनों जैसा विश्वास न था… अपनी जबरदस्ती की  हुंकार थी. धमकी-सी थी… जिसने ताउम्र उन बेचारियों को  स्वप्न में भी डराये रखा.

अब बातों को  थोड़ा दूसरी ओर मोड़ देते हैं. 1993 का  साल, आप रिटायर हुए. मैंने उसी साल दसवीं की  परीक्षा दी थी. 30 मार्च को  आपके  रिटायर होने के  दिन आपके  पास ही थी. यहाँ से आपके  स्वभाव का , विचारों का  दूसरा अध्याय भी शुरू हुआ. अब हम नातिनें, खासकर मैं (सबसे बड़ी होने की  वजह से शायद) धीरे-धीरे खुद को  व्यक्त क रने का  अवसर पाने लगी. अब शारीरिक  और मानसिक  दूरियाँ सिकुडऩे लगी थीं. अब आप साइकिल पर, पापा की  स्कूटर-मोटर साइकिल पर बैठने लगे थे. एक  वचन का  टूटना बहुत चीजों को  नरम क र रहा था. धीरे-धीरे स्वभाव की  हुंकार भी टूट रही थी. वे रिश्तों की , बहुएँ, कभी जिनकी  आवाज़ सुनना तक  असामाजिक  मानदंड थे आपके  लिए, आज 70 पहुँचते-पहुँचते उन्हें पास बुलाकर हालचाल पूछते, उनके  सुख-दुख सुनते और सलाहें भी देते. बहुत सी अकड़ी हुई चीजें टूट रही थीं, बेआवाज़. जैसे तनी हुई रस्सी धीरे-धीरे मुलायम होती जाए और एक  दिन रेशम की  मानिंद स्निग्ध हो जाए, वैसे ही तो मुलामियत आ गई थी आप में. दिनों-दिन नरम और सहज होते जा रहे थे और कीमती भी. इसीलिए शायद सबसे छुपाया, बचाया आपसे कह सक ने की  हिम्मत हो रही है. आज दिल पर हाथ रखकर सौ फीसदी सच कह सकती हूँ कि आप वह पुरुष हो जिसकी  वजह से कैसी भी परिस्थिति हो, मैं नहीं कह पाऊँगी कि ‘दुनिया के  सारे मर्द एक  से होते हैं’ मैं सारे मर्दों से घृणा करने की  बात भी नहीं कह सक ती. मुझे हरेक  में कुछ खूबियाँ दिखती हैं, बेहद उजड्ड और लंपट किस्म का  सहकर्मी भी सहानुभूतिपूर्ण दिखता है मुझे. मैं अपनी उस दोस्त को -जो पुरुषों से घृणा करती है, उसकी  सोच को  बदलने की  कोशिश करती रहती हूँ. उसे स्त्री-पुरुष के  स्वाभाविक  मनोवैज्ञानिक  भिन्नताओं की , सामाजिक  मानसिकता में दुरूह से पगी परवरिश के  अंतरों का  हवाला दे-देकर समझाने की  कोशिश करती हूँ. वह सचमुच बदल भी रही है….. ये सारी बातें आपके  साथ साझा करने की  इच्छा आज चरम पर है. चिट्ठी के  पन्ने भरते ही जा रहे हैं.

यह सब कहते-सुनते घड़ी एक  बजानेवाली है. समय कहाँ रुकता है कभी. मैं स्मृतियों का  लपेट रखा थान धीरे से खोलना शुरू करती हूँ तो समय पीछे की  ओर तेज गति से गोल-गोल घूमने लगता है. वह थोड़ा सा रुक ता है तो कुछ न कुछ पकड़ ही लेती हूँ. अभी एक  चिट्ठी पकड़ में आ गई है. वह छोटी बहन की  चिट्ठी है. एक  दिन सोते समय तकिया के  नीचे एक  चिट्ठी निकलती है. यह जानकर कि चिट्ठी बहन की  है, एक  अनजानी आशंका  जाग उठी. क्यों, किसलिए चिट्ठी लिखी….? और एक दम से उगीं आशंकाएँ सच होती हैं. उस चिट्ठी के  एक -एक  हरफ तो अब मुझे याद नहीं. तब भी सबकुछ कहाँ पढ़ पाई थी? बस कुछ ही पंक्तियाँ ही… कुहरे की  तरह दिमाग में छा गई थीं. हरफ याद रखने की  जरूरत भी नहीं थी. और क्या किया?… कुछ नहीं. उस कोहरे को  फूँक कर हटाने की  जरा सी भी कोशिश न की . बस चारों ओर बिखरे रिश्तों के  ताने-बाने को  सहेजे रखने की  खातिर किसी से कुछ भी नहीं कहा अब तक … तो आज आपसे भी क्यूँ कहूँगी? याद है तो बस उस चिट्ठी के  आशय, नतीजे. हमारे आसपास के  झूठे, दोगले रिश्ते. वह घर, वह परिवार जिसे हम सुरक्षा घेरा मानते हैं, उसके  दिखाये तर्कों- कुतर्को को  बेप्रश्न कबूल करते हैं, यह सोचकर कि वे हमारे अपने हैं, जो कुछ भी कहते-सुनते हैं हमारे अच्छे आज और कल के  लिए? उन्हीं के  बीच कोई मुखौटा लगाए हम पर घात लगाने बैठा होता है. आज समझ में आ रहा है कि लड़कियों को  तर्क  क्यों नहीं करने दिया जाता? ऐसे अनुभव विरले नहीं हैं, हर औरतजात के  पास होते हैं. चाचा, ताऊ, मामा, मौसा, चचेरे-ममेरे भाई, किसी न किसी की  लोलुपता की  शिकार वे होती हैं पर अपनी छोटी बहनों-बेटियों को  वे आगाह नहीं करतीं. हालांकि यह भी उतना ही खरा सच है कि स्त्री का  रणक्षेत्र उसका अपना अकेले का  होता है. यहाँ कोई भी उसके  साथ नहीं होता. बाहर की  एक  उंगली उठते ही आसपास की  वो लकीरें जिन्हें पिता, भाई, पति यहाँ बेटा सब… जो अब तक  उसकी  रक्षा का  दम भरते रहे… उन उठनेवाली उंगलियों में शामिल हो जाते हैं. आज भी यह प्रश्न कतई महत्वपूर्ण नहीं होता कि अपराधी कौन है? केवल लड़कियों के  मामले में. यहाँ अपराध कोई भी करे, अपराधी केवल और केवल वे ही होती है और सजा भी उन्हें ही मिलती है.

मुझे इस सत्य का  आभास था तभी तो मैंने उस युवा होती लड़की  के  प्रश्नों, जिज्ञासाओं, आकुलताओं का  जवाब चिट्ठी में ही दिया. यहाँ मैं यथार्थवादी बन गई थी, आपकी  तरह और बहुत कुछ माँ की  तरह. उसे समझाया, चुप करवा दिया था और उस समय तो उस रिश्ते को  बचा ले गई. आज भी प्रयासरत हूँ. उस अल्हड़ लड़की  ने भी, जो कुछ भी बकती-बोलती रहती थी, आज भी मेरा साथ दे रही है. हमारे आसपास के  सभी रिश्ते ऐसे ही खोखले हैं, ऐसे ही बचते हैं वे. एक  प्रश्न जब तब बेचैन करता रहता है कि हम आखिर क्यूँ बचाकर रखते हैं इन्हें?



नन्ना पर उस एक  रिश्ते के  कटघरे में खड़े होने से आप भी खुश नहीं रह पाते? इसीलिए अन्याय का  साथ देने का  अपराध मैं ताउम्र  करूँगी? मैं नहीं चाहती कि इस घटना के  अक्स आपकी  समझ में आएं. इसे मैंने माँ से भी छुपाया हुआ है… अभी तक . जब कभी संवेदना या आक्रोश  की  अति होने लगती है और हिम्मत बेकाबू होती है कि कह दूँ… किसी से तो? तभी चुनौती देती हुई वह पंक्ति कानों में शीशे की  तरह तीव्रगति से प्रवेश करती है- ‘औरत के  पेट में कोई बात नहीं पचती’ और मैं दोनों हाथ से पेट को  दबोच, पैरों को  तानकर खड़ी हो जाती हूँ… देखो- मैंने आपसे भी कुछ नहीं कहा, कुछ भी नहीं बताया.

हाँ एक  ख्याल जरूर आता है कि ऐसे अनुभव तो मेरे पास भी थे यदि मैंने माँ को  चिट्ठी लिखकर साझा किया होता तो वे क्या करतीं? कैसा जवाब देतीं…? यदि वे आपके वचनों में बंधी न होतीं तो जरूर उनके  पास भी मुझे बताने को  कोई न कोई अनुभव तो जरूर ही होता. हर औरत की  एक मात्र पूँजी है शायद ऐसे अनुभव, जो उसे सपनों में भी पुरुष नामक  प्राणी से डराते हैं और हद तो यह कि इन्हीं में से कोई एक  को  वह आजीवन सहन क रती है. हाँ इतना तो जरूर तय है कि अगर मैंने माँ को  चिट्ठी लिखी होती तो उनका  तीखा-कडुवा अनुभव संसार भी आज मेरे पास होता. ऐसा ही कोई मासूम सा दिखनेवाला सगा-पराया रिश्तेदार, जिस पर आपको  भी भरोसा रहा हो. लेकिन आपकी  बेटियों ने तो चिट्ठी न लिखने की  कसम खाई थी. इसी वज़ह से मैंने अपना भोगा उनसे साझा किया ही नहीं. मैंने खुद को  खुद ही समझा लिया था. अपना रास्ता चुन लिया था. और उस छोटी उमर में एक  बड़े कडुवे सच को  लगभग सहन करने की  क्षमता ओढ़ ली थी कि इस परिवार रूपी भग्नावेषों की  संरचनाएँ खोखली जरूर लेकिन सर्पीली भुजाओंवाली हैं. अपने आडंबरों में वे किसी को  भी लपेट लेंगी. औरतें यहाँ शापग्रस्त आत्माओं की  तरह भटकती काया मात्र हैं. यहाँ उनके  मन की  रत्तीमात्र परवाह नहीं होती. आपने भी नहीं की  थी वरना अपनी बेटियों से उनकी  रचनात्मकता और सच कह सकने का  अधिकार नहीं छीनते.

मैंने न तो अपने पिता को  कोई ऐसा वचन दिया न ही उन्होंने कभी मुझे ऐसे मुखर-अमुखर वचनों में बांधने की  चेष्टा की . मेरे लिखे पर तो आपको  भी प्रसन्नता होती है. अभी कुछ दिनों पहले ही मेरी कविताएँ सुनते हुए आपने कहा भी था- ‘मुझे तुम पर गर्व है’ ओह पहली या शायद दूसरी बार सुने शब्द थे ये. पर औचक  नहीं, पूरे सोच-विचार के  बाद ही निकले होंगे कुछ शब्द… मेरे जीवन भर की  पूँजी. पापा भी मेरा लिखा, छपा देखकर मन ही मन खुश होते हैं. चाहते हैं कि मैं कविताएँ लिखूँ, किताबें लिखूँ. यह तो परदे के  बाहर का  चित्र है और परदे के  भीतर वही नानी, दादी हैं जिन्हें पितृसत्ता ने पढऩे का  ही मौका  न दिया. अपराध कि वे लड़कियाँ थी, उन्हें चौका -चूल्हा ही तो संभालना था… सो किसलिए पढ़ाना? नानी तो बेहद सरल स्वभाव की  महिला हैं, उन्होंने कभी असंतोष, कोई माँग जताई ही नहीं, लेकिन दादी एक  आत्मस्वाभिमानी व्यक्तित्व की , तेज-तर्राट महिला… उनकी  बातों में ऐसे असंतोष झलक ते हैं. केवल पढ़े-लिखे न हो पाने की  वज़ह से जब कभी किसी को  साथ ले जाने की  बाध्यता सामने आती तो उनका  असंतोष मुखर हो जाता है. माँ की  पीढ़ी पढ़ी-लिखी होकर भी पिता के  विचारों की  शिकार. दोनों मौसियों का  अखबारों और किताबों की  दुनिया से भी नाता लगभग शून्य है. माँ किताब, अखबार, पत्रिका एँ जो मिलता है सब पढ़ लेती हैं. को ई चुनाव नहीं. खूब उपन्यास भी पढ़े उन्होंने. एक  समय उन्होंने, मनोज पॉकेट बुक्स वाले और भी जाने क्या-क्या प्रकाशनों वाले. मैंने भी पढ़े हैं उनमें से कुछ… अब याद नहीं आ रहे. न जाने क्यों यहाँ आप बार-बार कटघरे में खड़े दिखाई देते हैं. किताबों के  अच्छे जानकार, कलाकार स्वयं, साहित्य-संस्कृति से गहरे वाकिफ होते हुए भी आपने उन्हें पढऩे का  सलीका  नहीं दिया. अपने सारे हुनर अपने पास रखकर खत्म कर दिये. बेटा न होने से वसीयत तो बेटियों को  मिली और कुछ वंशानुगत मनोवृत्तियाँ भी, लेकिन वह संचित किया हुआ जिसे ‘ज्ञान’ या ‘कला’ कहते हैं, उसे देने लायक  आपने अपनी बेटियों को  नहीं समझा. हालाँकि इसके  पीछे भी आपका  एक  तर्कशास्त्र था कि- व्यक्ति अपनी-अपनी रुचि, मनोवृत्ति का  खुद अर्जित करता है. मुझे भी आपने कहाँ- कुछ सिखाया? जबकि ढाई साल की उम्र से आपके  पास रहती थी.

लेकिन मुझे लगता है और जैसा कि आप कहते रहे कि रुचियों के  अनुसार, मनोवृत्तियों के  अनुसार… तो मैंने आपकी  परछाई का  थोड़ा सा हिस्सा खुद पर ओढ़ लिया. रुचियाँ तो ओढ़ी-ढांकी  ही, मनोवृत्तियों की  चादर भी तान ली, कितना? अभी निश्चित नहीं कह सकती, समय के  द्वार-दालान थोड़े और पार करने के  बाद ही कुछ कहा जा सकता है.

आज, अब जब आपको  चिट्ठी लिखने बैठी हूँ तो सोचा तो यही था कि सबकुछ लिखूँगी, जो सामने नहीं कह पाती पर अब आगे समझ में ही नहीं आ रहा कि और क्या लिखूँ? एक  प्रश्न बार-बार कौंधता है कि माँ-मौसियों ने जिस तरह आपको  कभी चिट्ठी नहीं लिखी, इसी तरह वचनों के  बिना भी मैंने पापा को  कभी चिट्ठी नहीं लिखी! क्यों नहीं लिखी मैंने चिट्ठियाँ? हम भारतीय और खासकर ग्रामीण, कस्बाई लड़कियाँ, पिता से इतनी दूर कैसे हो जाती हैं? जैसे-जैसे हम बड़ी होती हैं, हमारी दूरियाँ बढ़ती जाती हैं… हमारे कपड़ों की  तरह, बालों की  तरह. लगभग बारह-तेरह साल के  बाद, बड़ी होने के  बाद मैं पापा के  गले नहीं लगी? क भी-क भार ही उनके  बगल में, सटकर बैठती हूँ. अभी पिछले महीने जब माँ-पापा मेरे पास आए थे, तब का  किस्सा आपको  सुनाती हूँ- एक  दिन मैं बेहद थकी  हुई थी, बुखार- सा भी लग रहा था. मैं पापा के  बगल के  सोफे पर बैठी थी, थका न और संवेदनाओं के  किसी बबंडर से आहत हो उनके  बगल से, सोफे के  हत्थों पर सिर औंधाकर बैठी-बैठी ही लगभग लेट गई. उस समय बेहद जरूरत लग रही थी कि पापा मेरे सिर पर हाथ रख दें. पीठ पर भी हाथ फेर दें. उन्होंने ऐसा नहीं किया. अलबत्ता मुझे बार-बार कहा जरूर कि भीतर जाकर बिस्तर पर सो जाऊँ, दवा ले लूँ, डॉक्टर को  दिखा आऊँ. उन्हें चिंता थी मेरी, लेकिन उनका  हाथ मेरे सिर तक  क्यों नहीं पहुँचा? आप जरूर ही इसे संस्कार कहोगे… भारतीय संस्कृति जैसा महान- मायावी कुछ! मैं इसे नैतिकता के  डर कहूँगी, जबरन सिखाये गए सामाजिक  भय-संकोच! आपने खुद इनका  खूब पालन किया है मगर सुखद है कि अब आप बदल गए. आप तो परिवर्तित हो गए, जैसे बर्फ की  शिला पानी बनकर बहने लगे, लेकिन हर कोई नहीं बदल पाता.
आप बदल सके  इसीलिए अब आपसे दुराव-छिपाव नहीं रहा.

चिट्ठी जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है वैसे-वैसे नजरें पीछे घूमती हैं. वह लोक गीत आपको  याद होगा जिसमें विदा होती बेटी, कहार से नीम के  नीचे डोली रोकने का  आग्रह करती है-
निमिया के  नीचे डोला रोक   देक हरवा
देखि लेऊँ गाँव की  ओर…..
बाबुल दिहै मोर नौ मन सोनवा
मैया लहंगा-पटोर…
नौ मन सोनवा, नौ दिन चलिहै
फटि जइहै लहंगा-पटोर…..

जाते हुए सब कुछ आँख भर देख लेने की  इच्छा, कि घर-दुआर, पुर-परिजन सभी आँखों में बस जायें. चिट्ठी लिखते हुए मेरा मन भी जहाँ-तहाँ रुक -रुक  जाता है, कुछ जीवंत सा तलाशने लगता है. मेरी अपनी जड़ें, अपनी पहचान टटोलने लगती हूँ. और जब किसी नीम के  नीचे सुस्ताने ठहरती हूँ तो आप मेरे बगल में बैठे कोई गीत छेड़ देते हो-
नदिया के  तीरे तीरे चर बोक्की  (बकरी)
नदिया सुखा जाय त मर बोक्की …..



बचपन से इस गीत को  सुनती आ रही हूँ… कुछ भी समझ में नहीं आता था… बस नदिया के  किनारे हरी-हरी, को मल घास चरती बक री और वही पतली सी धारवाली अपनी गाँव की  बलुई नदी का  चित्र उभरता था. कभी-कभी तो डर भी लगता कि रात में जंगल से निकलकर कोई बाघ उस अकेली भोली-भाली बकरी को  मारकर खान खा जाय. आज भी इस लोक गीत का  अर्थ पूरा का  पूरा नहीं खुल पाया. आज भी बकरी का  अकेलापन याद आते ही डर लगने लगता है. ऐसा महसूस होने लगता है कि जंगल में दूर कहीं से बाघ-भेडिय़ों के  गरजने-गुर्राने की  आवाज़ें आ रही हैं. सभी उसकी  ओर लपक ती जीभें लिए खड़े हैं. ओफ्हो… हद! इस गीत की  मात्र दो पंक्तियाँ मुझ पर इस हद तक  हावी हो जाती हैं कि मैं बकरी के  अक्स में खुद को  देखने लगती हूँ… आईने में देखती हूँ कि मेरे गले में एक  तख्ती लटकी  है और उस पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा है- ‘नदिया के  तीरे तीरे चर बोक्की … नदिया सुखा जायत मर बोक्की …’

“चकरघिन्नी” : तीन तलाक़ का दु:स्वप्न

नूर जहीर

‘डिनायड बाय अल्लाह’ और ‘अपना खुदा एक औरत’ जैसी चर्चित कृतियों की रचनाकार
संपर्क : noorzaheer4@gmail.com.

कॉमन सिविल कोड और तीन तलाक की बहस के बीच नूर ज़हीर की यह कहानी : 


वो दुबकी हुई एक कोने में बैठी थी, लेकिन ज़किया को बराबर यह एहसास हो रहा था कि वह कुछ कहना चाह रही है. वैसे महिलाओं का जमघट हो और सभी एक साथ बात न कर रही हों, ऐसा कहाँ संभव है. सभी लगातार कैएं कैएं कर रही थीं और दो तीन बार ज़किया को उन्हें डांट कर, स्कूल के क्लास के बच्चों की तरह एक- एक करके बुलवाना पड़ा था. लेकिन जब भी उसपर नज़र जाती वो हलके से मुस्कुरा कर नीचे देखने लगती. उसके दोनों तरफ बैठी औरतें कोहनी मार कर “बोलो न! बोलती क्यों नहीं हो? तो फिर आई क्यों हो?” कहकर उसे उकसा चुकी थीं. लेकिन वह चुप रही थी.तीन घंटे से ज़्यादा हो चुके थे. ज़किया ने यह दिखाते हुए कि मीटिंग खत्म हो गई है , अपने काग़ज़ात, डायरी, कलम समेटना शुरू किया. मजमा भी उठा और अपने चारों तरफ, चौकीदार बने, कील, खूँटी , दरवाज़ों पर टंगे बुर्क़े उतर उतर कर, शरीर और चेहरों को ढंकने लगे. ज़किया बरामदे में लगी चाय की मेज़ की तरफ बढ़ चली थी कि पीछे से आवाज़ आई “बाजी!” ज़किया ने अपनी उकताहट को पीछे धकेल, होठ पर मुस्कुराहट चिपकाई और पलटी. ये हर मीटिंग में होता था ; जमघट में से एक या दो पूरी सभा भर तो चुप रहती और जब सब उठ जाते तो अकेले में एक निजी बातचीत की उम्मीद करती. ऐसा होना लाज़मी भी था क्यूंकि महिलाओं की सभा में भी औरतें खुलकर बोलने से हिचकिचाती, आखिर औरतों ने कुछ पहले ही तो ज़बान खोली है .

“बाजी आपसे कुछ पूछना था. आपने तीन घंटे से ज़्यादा शरीयत और भारतीय संविधान पर बात की लेकिन आपने एक लव्ज़ भी हलाला पर नहीं कहा. ” इतना सब वो एक झोंक में बोल गई जैसे उसने कुछ बेहूदा कह दिया हो जिसकी चर्चा इज़्ज़तदार लोगों के बीच नहीं करनी चाहिए. ज़किया रुक कर पूरे एक मिनट तक उसका चेहरा निहारती रही. कितनी बार उसने चाह था कि कुरान के ‘सूरा-इ-निस्सा ‘ के इस हिस्से पर बातचीत हो ; लेकिन उसके काम का दायरा शरिया कानून और भारतीय संविधान में समानता और अलगाव तक सीमित था. बहुत कोशिश के बावजूद वह इससे मिलती जुलती कोई धारा संविधान में ढूंढ नहीं पाई थी.
“क्या नाम है तुम्हारा ?”
“सकीना ”
“बताओ, तुम्हे हलाला के बारे में क्या जानना है ?”
वो चुप रही. ज़किया ने कुरेदा “क्या शौहर ने तलाक़ दिया है ?”
“जी”
“और अब पछता रहे हैं और अब तुमसे दुबारा निकाह करना चाहते हैं ?”
“जी. पांचवी बार !” वो बुदबुदाई

इस बीच कोई ज़किया के हाथ में चाय का कप पकड़ा गया था. वो हाथ से छूटते बचा. खुद पर काबू पाते हुए ज़किया ने उसका हाथ पकडा और उसे एक कोने में ले गई. लेकिन बात शुरू करवाने के लिए अब उसे कुछ कहने की ज़रूरत नहीं पड़ी. सकीना जैसे इसी तन्हाई का इंतज़ार कर रही थी. हकलटम हिचकिचाते उसकी जिंदिगी की दास्तां उसके लबों से फूट पड़ी जैसे कोई फैलता हुआ नासूर फटकर सड़ते बदबूदार पस और मवाद से मुक्ति पाना चाहे .”बाजी मैं चौदह वर्ष की थी जब मेरा निकाह अब्दुल रशीद के साथ हुआ. मेरे शौहर मुझसे ग्यारह साल बढ़े थे , शराब के शौक़ीन थे और अफीम की लत भी थी. सभी को, मेरे अम्मी अब्बा को भी उनकी इन आदतों का पता था, मगर पांच बेटियों के माँ बाप भला क्या मीन मेख निकलते और क्या देखते भलते? वैसे मैं शादी से खुश थी. ससुराल खाते पीते लोगों का था; सास ससुर के अलावा बस एक देवर था जो मुझसे चार साल छोटा था. हर कोई यही कहता शादी हो जाएगी तो ये अपनी बुरी आदतें छोड़ देंगे ; बीवी सब सम्भाल लेगी. ”

सकीना अजीब तरह हंसी, कुछ खुद पर कुछ इस समाज पर जो औरत से मर्द सँभालने, सुधरने की उम्मीद तो इतनी करता है मगर उसे हक़ कुछ भी नहीं देता. औरत को अकेले यह जंग लड़नी भी है और जितनी भी है और जीतनी भी है किसी शस्त्र या हथियार बगैर. वो अपनी तन्हा हंसी के बाद खामोश हो गई. ज़किया ने उसे मुद्दे पर लौटने के लिए पूछा “तो तलाक कब हुआ ?”

“पहली बार शादी के छह साल बाद. मेरे तब तक दो बच्चे हो चुके थे. वो रात देर से लौटे, नशे में धुत और खाना मांगने लगे. जहाँ वो आकर बैठे थे वही मैंने एक छोटी सी मेज़ रख दी और खाने की थाली रख दी. वो कुर्सी पर गिरे पडे थे, खाना देखकर उठने लगे, पैर टकराया और मेज़ उलट गई. मैं भी पूरे दिन के काम से थकी थी और घर में वो आखरी बना हुआ खाना था. चिढकर मैंने भी कह दिया “इतना क्यों पीते हो कि हाथ पाँव पर काबू नहीं रहता?”बस इतना कहना था कि हमपर चीखना, गलियाना शुरू कर दिया और फिर तीन बार तलाक कहकर हमें तलाक दे दिया.”
“लेकिन नशे में दिया तलाक़ तो माना  नहीं जाना चाहिए. ”

“ये तो हमें मालूम नहीं था, न मौलवी साहब ने ही हमें बताया. क्या जाने शायद उन्हें भी मालूम नहीं होगा. खैर हम अपने मैके आ गए. शुक्र है की बच्चे छोटे थे और सास अक्सर बीमार रहती थी , इसलिए बच्चे हमारे साथ ही आये. जब नशा उतरा तो बहुत रोये, माफ़ी मांगी और मौलवी साहब के पास गए कि निकाह दुबारा पढ़वा दीजिये , हम सकीना से बहुत प्यार करते हैं, उसके बिना हम ज़िंदा नहीं रह सकते. मौलवी साहब ने बताया कि ये नामुमकिन है—पहले सौ दिन इद्दत के गुजरेंगे फिर हमारा किसी और से निकाह होगा, वो हमें तलाक देगा फिर सौ दिन इद्दत के बाद हमारी अब्दुल रशीद से शादी हो सकेगी. हमारे शौहर भला ये कैसे बर्दाश्त करते कि हम किसी और के साथ हमबिस्तर हों ? वो हमारे मायके आये और बोले ‘कुछ दिन इंतज़ार करो सकीना, हम कोई रास्ता निकालते हैं. ‘ डेढ़ साल रास्ता निकालने में लग गया. एक दिन आये बढ़े खुश खुश और बोले ‘तैयार हो जाओ सकीना, मैंने रास्ता निकाल लिया है. तुम्हारी शादी अपने छोटे भाई तारिक़ रशीद से कर देंगे. उसने वादा किया है पहली रात के बाद वह तुम्हे तलाक दे देगा और फिर तलाक के बाद हम तुमसे शादी कर लेंगे.’

“हम घबराये. चार साल छोटे देवर को, एक रात के लिए शौहर कैसे माने? लेकिन हमारे शौहर ने समझाया , खुशामद की और मेरे हर ऐतराज़ को ये कहकर खारिज कर दिया की मैं कौन होती हूँ इस सुझाव को न मानने वाली जब मौलवी साहब इसे ठीक बता रहे हैं ; आखिर वह हमारे दींन के रखवाले हैं. मैंने भी सोचा की जब मौलवी साहब को मंज़ूर है तो फिर ये रास्ता अल्लाह और दींन की नज़र में ठीक होगा. मेरे देवर से मेरा निकाह हो गया. देर रात वह मेरे कमरे में आया. मैं दीवार की तरफ मुंह किये बैठी थी; किसी ग़ैर मर्द को अपना शरीर दिखाने से भी शर्मसार. कुंडी लगाने की आवाज़ तो आई लेकिन उसके करीब आने की आहट मेरे कानो में नहीं पढ़ी. जब बहुत देर वह पास नहीं आया तो मैं पलटी; देखा वह हाथ जोड़े सर झुकाए गुनहगार सा खड़ा है जैसे दुनिया से आँखे मिलाने का साहस न कर पा रहा हो.

‘क्या बात है?’ मैंने पूछा उसने नज़रे उठाई और बोल “भाभी पलंग पर सो जाओ. मैं ज़मीन पर दरी पर लेट जाऊंगा. मैं इस पूरे मामले में राज़ी इसीलिए हुआ की तुमको घर वापस लौटा सकूं. तुम्हे हाथ लगाने के बारे में तो मैं सोच भी नहीं सकता. बस एक रात की बात है. ” आपको सच बताऊँ बाजी वो आखरी रात थी जब मैं चैन की नींद सोई. अगली सुबह मेरा फिर तलाक हो गया और के सौ दिन पूरे हुए तो अब्दुल रशीद से मेरा निकाह हो गया.

“लेकिन क्या इंसान की फितरत बदलती है? कहते हैं कोयला धोकर सफ़ेद हो सकता है मगर इंसान का स्वभाव नहीं बदल सकता. उनके दोस्त वही थे, शराब और अफीम की लत वही थी. घर देर से लौटना, बेवजह झगड़ा करना और फिर मुझे मारना पीटना. वही पुरानी जिंदिगी जिसमे बस एक बात नई थी. बीच बीच में कहते जाते ‘तू तो एक रात मेरे भाई के साथ रही है, वह मुझसे सत्रह साल छोटा है. मैं बुढ़ा रहा हूँ और वह गबरु जवान है, तुझे तो उसके साथ ज़्यादा मज़ा आया होगा न? मेरे साथ जब होती है तब उसकी याद सताती है तुझे? क्या दोपहर में उसके पास जाती है, मौके से, जब अम्मी और बच्चे सोते हैं?’

“बाजी मैंने जब तक हो सका राज़ छुपाया; आखिरकार मेरी बर्दाश्त की हद टूट गई और सच मुंह से फूट पड़ा “तू क्यों मुझ बेचारी पर और अपने फरिश्ता जैसे भाई को गुनहगार समझता है. उसने तो उस रात मुझे हाथ तक नहीं लगाया . वो तो रात में देर से इसलिए लौटता है ताकि मुझ से सामना न हो. ‘ उस वक़्त तो मेरे शौहर ने मुझे बाहों में भर लिया और मुझे अपनी जिंदिगी अपनी जान कहकर बुलाया. मैं अहसानमंद थी की उन्होंने मेरी बात का यकीन किया और घर में कुछ महीने शान्ति के गुज़रे. फिर एक शाम दोस्तों के साथ पीने पिलाने में, किसी दोस्त ने छेड़ दिया की अब्दुल रशीद को, अपनी बीवी और उसके एक रात के शौहर के साथ एक ही घर में रहने से डर नहीं लगता? कौन जाने पीठ पीछे दोनों हम बिस्तर होते हों? अब्दुल रशीद यह कैसे बर्दाश्त कर लेते. ग़ुस्से में कह दिया “मेरी बीवी सिर्फ मेरी है समझे; वो निकाह तो एक धोखा था, मेरी बीवी को तो मेरी भाई ने छुआ तक नहीं. ” बस डींग मार आये. ऐसा दावा, वो भी शराब के ठेके पर किया जाए भला चरों तरफ कैसे न फैलता? और कसबे भर में फ़ैल कर मौलवी साहब के कान तक कैसे न पहुँचता? और पूरी बात जानकर भला यह कैसे हो सकता था कि वो सच्चे दींन के मुहाफ़िज़ होकर ऐसे कदम न उठाते जिनसे साबित होता की वह पैरों तले घाँस उगने नहीं देते?


अब्दुल रशीद से मेरा निकाह नाजायज़ करार दे दिया गया. मेरे लिए शुरू हुए फिर वही इद्दत के तीन माह दस दिन और साथ ही खोज मची एक ऐसे आदमी की जो मुझसे निकाह करके तलाक दे दे ताकि मैं अपने पहले शौहर से शादी कर सकूं. ज़ाहिर है इस बार तो मेरा देवर नहीं हो सकता था क्यूंकि उसपर ऐतबार करना नामुमकिन था; ब्याहता बीवी को जो अछूता छोड़ दे वह भला मर्द कहलाने के काबिल है ?

एक और आदमी तलाश किया गया और उससे मेरा निकाह कर दिया गया. अगले दिन उस आदमी ने मुझे तलाक देने से साफ़ इंकार कर दिया. चौदह महीने मैं उसकी बीवी रही. मैं तो सदा के लिए उसी की हो रहती लेकिन अब्दुल रशीद ने इन बदले हुए हालात से समझौता करने से साफ़ इंकार कर दिया. वह मुझे बाजार में देख लेते, सब्ज़ी खरीदते, बच्चों को स्कूल छोड़ते, बुर्का पहचान लेते और फूट फूट कर रोने लगते जैसे कोई बच्चा मचलकर बेकाबू हो जाये; सड़क पर लोट जाते , ज़मीन पर सर मारने लगते “हाय सकीना, कैसे तेरे बिना ज़िंदा रहूँ? ओ मेरी जिंदिगी मेरे पास वापस आ जा ‘



आखिर मैंने ही अपने शौहर को समझा बूझकर राज़ी किया की वो मुझे तलाक दे दे. छोटे से कस्बाई शहर का मैं एक तमाशा बन गई थी. लोग एक दुसरे को खबर कर देते की मनोरंजन शुरू हो गया है और भीड़ जमा हो जाती. लोग हँसते,फब्तियां कस्ते और अब्दुल रशीद को ‘मजनू ‘ कहकर पुकारते. मेरे वजूद को हर तरफ से नोचा खसोटा जा रहा था और मैं टुकड़े टुकड़े होकर बिखर रही थी. खैर समझाबुझाकर जब तलाक हो गया तो एक सौ दस दिन की गिनती शुरू हुई , जब उस आदमी से शादी होगी जो मुझ से प्यार का दावा तो करता था लेकिन जो किसी भी तरह खुद को ‘तलाक तलाक’ कहने से रोक नहीं पाता था. निकाह होता, कुछ दिन ख़ुशी के बीतते और फिर वही पुराने ढर्रे की जिंदिगी शुरू हो जाती. ऐसा लगता जैसे उन्हें तलाक देने की लत पड़ गई है. पलक झपकते, बगैर किसी कारण के , कभी नशे में, कभी पूरी तरह होश में तलाक दे डालते. फिर एक और आदमी खोझते, शादी की सारी तैयारी खुद करते, उस आदमी को भी नकद रुपये देते; एक बार तो खुद मौलवी साहब ने मुझसे निकाह करके, छह रात मुझे रौंदा. मैं अक्सर इद्दत के दिनों की गिनती भूल जाती , मगर अब्दुल रशीद ठीक एक सौ ग्यारवें दिन मुझसे निकाह करने मौजूद रहते.

“तुमने कभी ‘खुला’ की कोशिश नहीं की , कभी खुद नहीं चाहा की तुम तलाक यानि ‘खुला’ ले लो और नए सिरे से जिंदिगी शुरु करो?’ “की न बाजी. पिछले तीन साल से कोशिश कर रही हूँ. मौलवी साहब कहते हैं कि इतने प्यार करने वाले शौहर से मेरा तलाक चाहना बहुत बढ़ा गुनाह है. और बाजी क्या आप नहीं जानती कि खुला चाहना और मंज़ूर हो जाने के बाद भीम, तलाक कहना तो मर्द को ही पड़ता है. औरत जितना भी तलाक क्यों न चाहे, अंत में शौहर ही इन लव्जों को कहता है और उसे छटकारा देता है. अब्दुल रशीद भी साफ़ इंकार करते हैं. मेरी मर्ज़ी से मुझे तलाक नहीं देंगे, अपनी मर्ज़ी से जितनी बार घर से बेघर कर दे. इस तरह से बाजी मेरी जिंदिगी के सोलह साल निकाह, तलाक , इद्दत और हलाला के बीच चक्कर घिन्नी बने हुए बीत गए. अरे बाजी ! क्या आपकी आँखों में आंसू हैं? ठीक ही है कि मेरे हाल पर अब ग़ैर रोएं. मेरे अपने आंसू तो कब के सूख गए.
ज़किया क्या कहती , कैसे बताती कि ये आंसू सिर्फ एक सकीना के लिए नहीं थे; ये उन अनगिनत औरतों के लिए थे जिनके सिरों पर तीन बार कहे तलाक की तलवार हमेशा लटकी रहती है, जो परेशान होकर अगर खुद इस जीवन से छुटकारा पाना चाहे तो उनको हज़ारों कारण बताने होंगे. अगर वह कारण उलेमा मान भी ले तो भी तलाक उसे पति ही देगा और इसके लिए अक्सर औरत को अपने बच्च्चों से मिलने के हक़ को गवाना होता है, पति को पैसे, मिलकियत देकर ‘तलाक’ कहने के लिए मनाना होता है, मैहर तो खैर कभी मिलती ही नहीं और निर्वाह राशि का तो सवाल ही नहीं पैदा होता.

ज़किया ने सर को एक झटका दिया ; रोने से भला क्या हासिल होगा ; यह वक़्त संघर्ष का है और सभी मुद्दों पर खुल के बात करने का है. उसने फाइल खोल कागज़ निकाला और सकीना की तरफ बढ़ाते हुए बोली ‘ इसे पढ़ना , समझ में आये तो दस्तखत करना. ये अपील है कि हमें बराबरी के सब हक़ चाहिए जो संविधान हमें देने का वादा करता है. लड़ाई लम्बी भी है और मुश्किल भी लेकिन इस मोर्चे पर उतरना तो पड़ेगा.’ज़किया बाहर की तरफ चल दी थी जब उसने फिर सकीना की आवाज़ में ‘बाजी ‘ सुनाई दिया. सकीना पास आ गई थी, पर्चे को हिलाते हुए बोली, ‘इसकी हम फोटोकापी करवा ले, दूसरी औरतों से भी बात करेंगे ; और दस्तखत जमा करेंगे. अरे सुनो सब — “सकीना तेज़ी से चलती हुई , कुछ औरतों के साथ बाजार की तरफ बढ़ रही थी. ज़किया को बहुत धुंधली सी एक राह दिखाई दे रही थी, मंज़िल का कहीं पता न था. कोई बात नहीं रास्ता अगर खुद बनाना है तो मंज़िल भी खुद ढूंढ ही लेंगे.
साभार इन्द्रप्रस्थ भारती