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मेरे अल्लाह मेरी दुआ सुनना : अरावली हिल्स पर पथराई आँखों की पुकार

रायसीना हिल्स से लेकर अरावली हिल्स के उस टुकड़े तक पिछले एक महीने से एक मां और एक बहन का आर्तनाद गूँज रहा है- या खुदा मेरे नजीब को वापस ला दो, खुदा के लिए मेरे नजीब को वापस ला दो, और हृदयहीन सत्तासीन राजनीतिक बयानवाजियों और ट्वीटर पर ट्वीट करने में लगे हैं. पिछले एक महीने से  पुलिस पचास  हजार की रकम से दो लाख रुपये तक की रकम की घोषणा कर चुकी है, नजीब का पता बताने के लिए ,लेकिन अंतिम बार नजीब की पिटाई करने वाले छात्रों से एक सवाल पूछना भी मुनासिब नहीं समझती. जेएनयू से गायब नजीब की मां दिल्ली की सड़कों पर बेटे को पथराई आँखों से ढूंढ रही हैं… पढ़ें जेएनयू के ही शोधार्थी अभय की उनसे यह ख़ास बातचीत और रपट. 

नजीब की मां



शुक्रवार की शाम जाकिर नगर की ऊबर-खाबड़ और बीहड़ सड़क, जैसा की आमतौर पर होता है, लोगो की भीड़ से ठसा-ठस भरी हुई थी . सड़क के किनारे-किनारे लगे हुए कबाब के बहुत सारे दुकानों से उठने वाला धुँआ इस जगह को जरा  घना बना रहा था. गाड़ी के हार्न से निकलने वाले शोर तकलीफों में और इजाफा कर रहे थे. जाम मे फँसा एक बैटरी-रिक्शा एक अधेड़ उम्र की महिला और उसकी बेटी को ले जा रहा था.  उनके बगल में बैठ कर मैं महिला में बढ़ती हुई बैचेनी को देख रहा था. कुछ वक्त बाद ट्रैफिक की भीड़- भाड़ खत्म हुई और बैटरी-रिक्शा चालक ने अपनी चाल दुरुस्त की , कोशिश करने लगा की दूसरी गाड़ियों से आगे निकल सके. महिला ने ड्राईवर को हिदायत देते हुए कहा कि “ दायीं ओर मुड़ो” , वो उस गली की ओर इशारा कर रही थी, जो ऐतिहासिक जामिया-मिलिया इसलामिया से लगी हुई है. महबूब नगर गली से सौ गज के भीतर रिक्शा एक घर के सामने रुका. रिक्शा से उतरने के बाद जरा सा वक्त बीता होगा की वह आँसुओ से शराबोर थीं : “ अल्लाह मैं आज फिर बगैर नजीब के वापस आई”.

उनकी बेटी ने जल्दी ही नीचे उत्तर कर उन्हे अपने आगोश मे ले लिया. माँ की मायूसी कायम रही. परिवार के कुछ और सदस्य घर से निकले और उन्हे दिलासा देने की कोशिश की. उन्होने कहा –“ नजीब जल्द ही वापस आएगा”. आगे , कुछ और रिश्तेदारों ने घर से बाहर निकल उन्हे गले से लगाया और वे इस बात की जिद्द करने लगे कि उन्हे मेहमानखाने चले जाना चाहिए. उन्होने एक बार उन्हे फिर से दिलासा दिया : “ नजीब जल्द ही वापस आएगा”. आखिरकार, वह मेहमानखाने में तशरीफ लाई और सोफ़े पे बैठ गई. उनकी दो जवान बेटियां  और मैं उनके बगल में बैठ गए.

कमरे में मैने दिवारो पर टंगी हुई कई तस्वीरे देखी, जिसमें  कुरान की पाक आयतें छपी हुई थी.  उनमें  से कुछ लोग :“ अल्लाह” (भगवान)  और  “बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहिम” (अल्लाह के नामो मे सबसे अधिक परोपकारी, सबसे अधिक दयावान)- का नाम पढ़ रहे थें. कुछ मिनट के बाद, एक दस वर्ष की लड़की ने उन्हे पानी दिया और उन्हे रोने से मना किया. मगर उन्होने पानी पीने से इंकार कर दिया.

रोने वाली यह औरत फातिमा नफीस थी- नजीब की माँ.  उनकी बेटी थी सदाफ मुशर्रफ—नजीब की बड़ी और एक मात्र बहन. करीब-करीब हर रोज नजीब की माँ और बहन एक उम्मीद के साथ घर से बाहर निकलती है और शाम मायूसी के साथ खत्म होती है.

शुक्रवार की दोपहर को आईटीओ स्थित दिल्ली पुलिस मुख्यालय  मे मैं नजीब की माँ और बहन से मिला. वे वहाँ एक धरना-प्रदर्शन में शरीक होने पहुँचे थे. मैं वहाँ जामिया, जेएनयू  और एमयू से आए छात्रों के साथ इक्टठा हुआ था.  धरने की जगह पर  प्रदर्शनकारीयों की आँखों मे गुस्से की चिन्गारी जल रही थी.  दिल्ली पुलिस मुर्दाबाद के नारे फिजा में दो घण्टे तक गुंजते रहे.

बायोटेक्नोलोजी (एम. एससी) के प्रथम वर्ष के छात्र नजीब के गायब होने के बाद से विश्वविद्यालय प्रशासन, दिल्ली पुलिस और हिन्दुत्त्व सरकार की बेरहमी और निकम्मेपन के खिलाफ लगभग रोज प्रदर्शन के कई तरीके – कब्जा कर बैठ जाना,  वाइस-चांसलर का घेराव, गृह मत्रांलय की और  मार्च – इस्तेमाल मे लाऐ जा रहे हैं. दिल्ली पुलिस मुख्यालय में किया गया प्रदर्शन भी चल रहे संघर्ष का हिस्सा था. प्रतिरोध के प्रतीक के बतौर नजीब की माँ और बहन ऐसे हर मौके पर मौजूद होती हैं.

ध्यान रहे कि नजीब के गायब होने की पहली रिपोर्ट अक्टूबर  15 को दर्ज कराई गयी थी, जो आरएसएस के छात्र संगठन एबीवीपी के सद्स्यों के द्वारा किये गये बेरहम हिंसा का नतीजा था.  चश्मदीद गावाहों के अनुसार, पिछली रात को एबीवीपी से जुडे़ दर्जनो कार्यकर्ताओं ने जेएनयू के माही-माण्डवी होस्टल मे नजीब को इतनी बुरी तरह से पीटा था कि उसके मुँह और नाक से खून बह रहा था.

जैसे ही अँधेरा होता गया भीड़ का जमावाड़ा कम पड़ता गया. नजीब की माँ और बहन लौटने की तैयारी करने लगे. उनको अकेला देखकर मैं उनके करीब पहुँचा और अपना सलाम पेश किया. मैं उन से जेएनयूं के अन्दर और बाहर कई मौको पर पहले ही मिल चुका था, इसलिये उन्होने मुझे बड़ी आसानी से पहचान लिया.
शाम का अन्धेरा और ठंडक अब बढने लगा था. यह महसूस करते हुए कि अब काफी देर हो चुकी है, मैने नजीब की माँ और बहन से साहस बटोर कर कहा : ‘ मैं आप लोगो के साथ कुछ वक्त बीताना चाहता हूँ….’. मैं जिस दुविधा मे था मेरी झिझक उस से निकल कर आ रही थी. मै पूरे  यकीन मे नहीं  था कि वे इस वक्त मुझ से बात करने को राजी हो जाएंगे. हालाकि वे अपनी इच्छा से इस पर राजी हो गए और मुझे अपनी  कार में बैठने को कहा.

कुछ मिनटो बाद कार जाकिर नगर के लिये रवाना हो चुकी थी. नजीब की बहन ने मुझे आगे ड्राइवर की सीट के बगल में बैठने को कहा जबकि नजीब की माँ बीच की पक्तिं मे बैठ गई. नजीब की बहन अपने शौहर के साथ पीछे की सीट पर बैंठी. जैसे ही कार कनाट प्लेस के घेरे तक पहुँची, मैने महसूस किया कि मेरी झिझक बहुत हद तक खत्म हो चुकी थी.

नजीब की बहन जो दिल्ली के हमदर्द मे उर्दू पढाती हैं, ने कहा ,” जेएनयू के छात्रों ने नजीब के लिये जो मोहब्बत दिखलाई है वह हमारे करीबी रिश्तेदारो से भी कही ज्यादा है”. नजीब के परिवार के अन्य सद्स्यों ने भी इस सराहे जाने को दोहराया.हालाकि नजीब का परिवार  जेएनयू प्रशासन  का खास तौर से वाइस-चांसलर जगदीश का असंवेदनशील रवैया देखकर मायूस था. नजीब की बहन, जिनका चेहरा, गला और बाल नीले हिजाब से ढँका हुआ था, ने विश्वविद्धालय प्रशासन और छात्रों  के रवैये के बीच जो फर्क है, उसे बड़ी खूबसूरती से बयाँ किया: ‘ जेएनयू के छात्र कोई खास खाना खा रहे हैं, जिस की वजह से उनको नजीब से इतनी मुहब्बत है . आगर वीसी को पता चले तो वह इनका खाना बंद करा दे’.

नजीब की मां और बहन

वाइस-चाँसलर की आलोचना मे नजीब के माँ ने भी जोड़ते हुए कहा: ‘वाइस-चाँसलर एक ऐसी शखसियत है, जिसके जज्बात मर चुके हैं. वह एक बुत की तरह बैठा था.’ ध्यान रहे एक एकेश्वरवादी धर्म के बतौर इस्लाम बुत के पूजे जाने का सश्क्त विरोध करता है, और बुत एक नकारात्मक संकेतार्थ है. और इसलिये बुत से वीसी की तुलना उसके लिए उनमे मौजूद गहरे असंतोष को बयाँ करता है.वाइस-चांसलर की आलोचना को जारी रखते हुए नजीब की बहन ने उस घटना को याद किया, जब वह उनसे  18अक्टुबर को मिलने गई थीं. जैसा कि उन्होने बताया वाइस-चांसलर ने काफी लम्बे इंतजार के बाद ही उनसे मुलाकात की. आधे घण्टे तक चलने वाली इस बैठक मे उन्होने किसी भी बात का अश्वासन नही दिया. “वाइस- चांसलर ने हमारे किसी भी सवाल का जवाब नही दिया. जब उनसे कुछ कहने को कहा जाता तो वे हमारे सवालो को वहाँ बैठे अन्य विश्वविद्धयालय अधिकारियों की ओर बढा देते थें” , नजीब की बहन ने मायूस होते हुए कहा, ‘वाइस- चांसलर के असवेंदनशील रवैये ने उन्हे काफी परेशान किया’  वह इतनी जज्बाती हो गई कि अगले दिन उन्होने वाइस- चांसलर के अफिस पर सैकड़ो छात्रों को सम्बोधित किया . उनका भाषण कई लोगो को रुला गया.

तब तक कार कनाट प्लेस के औटर रिंग के पास  पहुँच गई थी. हमारी बातचीत का रुख अब मिडिया की ओर मुड़ चुका था. उनकी बहन मिडिया, खास तौर से इलेक्ट्रोनिक मिडिया की “चुप्पी” देखकर दुखी थीं. ‘कुछ अखबारो ने नजीब के केस को कवर किया है मगर इलेक्ट्रोनिक मिडिया अधिकतर चुप ही रहा है”, उन्होने शोक व्यक्त करते हुए कहा.हालांकि  नजीब की माँ की मीडिया मे कोई दिलचस्पी  नहीं थी. उनके जेहन मे सिर्फ एक ही बात तैर रही थीं- अपने बेटे की तालाश: ‘ अगर नजीब मिल गया, मैं तुम सब को पार्टी मे बुलाबा दूंगी’. इस बात को महसूस करते हुए कि नजीब के मिलने की खुशी इतनी ज्यादा होगी कि वह केवल तभी पूरी हो सकती है जब कि समारोह मे जेएनयू के सभी छात्र मौजूद हो, उन्होने खुद को सुधारते हुए कहा: ‘अगर नजीब मिल गया, तो मैं जेएनयू के सारे छात्रो  को पार्टी मे बुलाबा दूंगी’.

जबकि नजीब का गायब होने से जेएनयू को लेकर परिवार के सदस्यों में  गहरे जख्म के निशान बन गये हैं, नजीब के लिये छात्रो की दी गई मदद भी विश्वविद्यालय  को उनके लिये खास बनाता है. अपने परिवार के तरफ से जेएनयू के छात्रो की मदद को याद करते हुए , नजीब की बहन बोली कि धरने की जगह पर वे हमे घेरते हुए बैठ गए और हमे पूरी सुरक्षा दे रहे थे, जैसे कि “ हम उनके परिवार के सदस्य हों”. कुछ ही हफ्ते के भीतर जेएनयू  के लिये नजीब की बहन मे एक गहरी मुहब्बत पनप चुकी है. “ पहले हममे जामिया के लिये मोहब्बत थी और जामिया के इलाके में पहुँच कर हमेशा घर जैसा महसूस होता था मगर अब हममे जामिया के लिए भी ऐसी मुहब्बत पनप चुकी  है”, नजीब की बहन ने कहा.

जब मैंने नजीब और उसके तालीम के बारे मे पूछा, तब नजीब की माँ ने कहा कि वह एक मेहनती छात्र था और चार नामी-गिरामी विश्वविद्यालय  की प्रवेश परिक्षा उसने पास की थी—एएमयू, हमदर्द, जामीया और  जेएनयू. हालांकि  उसने उनकी इच्छा के विरुद्ध  जेएनयू को प्राथमिकता दी . वह नजीब  को जेएनयू क्यों नही भेजना चाहती थी? वह जवाव देती हैं: “ मैं जेएनयू में  हुए पिछले विवाद को लेकर सतर्क थीं……… मैं नही चाहती थीं की नजीब वहाँ जाए लेकिन उसने मेरी नही सुनी. वह वहाँ मोहरा बन गया’, वह रोए जा रही थीं और उनके आँसू  उनके नीले और सफेद कुर्ते को गीला कर रहे थे.

एक घण्टे तक चलने के बाद कार जामिया नगर इलाके में पहुँची. नजीब के साथ हुई हालिया बातचीत को साझा करते हुए उन्होंने  कहा कि नजीब कमरे में खटमल के डर की शिकायत कर रहा था.  यह सुनकर नजीब की माँ ने आश्वासन देते हए कहा था कि वहाँ उसके अब्बा जाएंगे और कमरे मे कीटनाशक का छिड़काव करवा देंगे.  लेकिन यह नजीब की उदासी दूर  नही कर सका: “ खटमल सभी होस्टलो मे मौजूद है. इसमे पापा क्या कर सकते हैं ?”

तब तक कार जाकिर नगर पहुँच चुकी  थी और हम ने जाकिर नगर इलाके मे स्थित नजीब के फुफी ( नजीब के पिता की बहन) के  घर जाने के लिए बैटरी-रिक्शा लिया. नजीब के फुफेरे भाई ने हम सब के लिये चाय लाई, हम सब साथ चाय पीने लगे. नजीब की अम्मी थक चुकी थीं और मैने सोचा मुझे निकलना चाहिए. नजीब की माँ के होठो पर बस ये ही शब्द हैं: “ मेरे अल्लाह मेरी दुआ सुनना और नजीब को जल्द से जल्द वापस ले आना”.

अभय कुमार जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के इतिहास अध्ययन केंद्र में ‘आधुनिक राज्य धर्मनिरपेक्ष कानून और अल्पसंख्यक’ विषय पर शोधरत हैं। संपर्क: 9868660402

नीतीश जी, आपकी पुलिस गालियाँ देती है और टार्चर करती है

राष्ट्रीय महिला आयोग सेपीडिता की शिकायत 


बिहार के भागलपुर में अपने पैतृक संपत्ति के हक़ के लिए संघर्षरत महिला जब शिकायत करने पुलिस के पास गई तो पुलिस ने उल्टा उसे ही प्रताड़ित करना शुरू कर दिया. उसकी प्रताड़ना के गवाह बने भागलपुर विधि संग के अधिवक्ता. सवाल है कि राज्य सरकार क्या पीडिता के पक्ष में अपने न्याय सिस्टम को दुरुस्त करेगी या दबंगों का ही साथ देगी?  सवाल यह है कि पढी –लिखी महिला के साथ जब पुलिस का यह वर्ताव है तो गरीब अनपढ़ महिलाओं के साथ राज्य की पुलिस का क्या व्यवहार होता होगा.  पीडिता ने राष्ट्रीय महिला आयोग को पत्र लिखा है: 

सेवा में,
अध्यक्षा महोदया
राष्ट्रीय महिला आयोग, नई दिल्ली

महाशया,

 मैं, सपना सुमन (उम्र 32 वर्ष), पिता– स्व. कनक लाल राम, माता- स्व. मीरा मधुर बिहार प्रांत के भागलपुर शहर के नया बाजार की स्थायी निवासी हूँ. मेरे माँ-बाप दोनों की मौत एक दशक पूर्व हो चुकी है. मैं 17 अक्तूबर, 2016 (दिन रविवार) को भागलपुर शहर स्थित ततारपुर थाना के थाना अध्यक्ष अजय कुमार के पास अपने घर में हुई चोरी की प्राथमिकी दर्ज कराने गई. कई बार थाना जाकर मैंने प्राथमिकी दर्ज करने की थानाध्यक्ष से गुहार लगाई किन्तु उन्होंने प्राथमिकी दर्ज नहीं की.

इससे परेशान होकर मैं इसकी शिकायत लेकर 20 अक्तूबर को लगभग 3:30 बजे अपराहन एस एस पी कार्यालय पहुंची. लेकिन मुझे एसएसपी कार्यालय भागलपुर के बाहर तैनात आदेशपाल गणेश कुमार ने उनसे मिलने नहीं दिया और कहा कि ‘अभी रुकिये आरक्षी अधीक्षक जब आपको बुलायेगा तब आपको मिलवा दिया जाएगा.’ मैंने उन्हें अपने नाम का पुर्जा लिखकर भी दे दिया किन्तु तीन घंटे बीत जाने के बाद भी एसएसपी मुझसे नहीं मिले.

मैं कार्यालय के बाहर उनके चेम्बर के पास बैठी रही. अचानक साढ़े छह बजे के लगभग महिला थाना अध्यक्षा ज्ञान भारती एवं एक अन्य महिला पुलिसकर्मी सादे लिबास में एवं चार-पाँच की संख्या में पुरुष पुलिसकर्मी, वे भी सादे लिबास में थे, आये और मुझे चारो तरफ से घेर लिया. ज्ञान भारती और उनके साथ आई एक महिला पुलिसकर्मी मुझे जबरन घसीटते हुए वहाँ से बाहर सड़क पर ले जाने लगीं. मैंने उनसे पूछा कि आप मुझे ऐसे कैसे और कहाँ ले जा रही हैं? इससे घबराकर मैं ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी और कहा कि – एसएसपी सर बचाओ! देखो ये लोग मुझे घसीटकर कहाँ ले जा रहे हैं! इस पर एसएसपी साहब बाहर निकले और अनदेखा कर वापस अंदर चले गए. तब महिलाथाना अध्यक्ष ज्ञान भारती ने कहा कि- ‘रंडी! बहुत हल्ला कर रही हो! चलो तुम्हारा अच्छे से इलाज करती हूँ!’ और उनके साथ सादे लिबास में आये पुलिस कर्मी  मुझे और मेरे चार वर्षीय बेटी, जो मेरे साथ ही थी, को घसीटते हुए एस एस पी आफिस से बाहर सड़क पर ले जाने लगे.

महिला थाना अध्यक्षा ज्ञान भारती ने मेरा मोबाईल और पर्स छिन लिया. इस बीच हम माँ-बेटी के रोने-चिल्लाने की आवाज सुनकर जिला विधिज्ञ संघ भागलपुर के महासचिव श्री संजय कुमार मोदी एवं कई अधिवक्ता वहाँ आ गए. श्री मोदी ने अपना परिचय देते हुए महिला थानेदार ज्ञान भारती से जब पूछा कि ‘आपलोग इस महिला के साथ इस प्रकार का  दुर्व्यवहार एवं  मारपीट क्यों कर रहे हैं और इसे कहाँ ले जा रहे हैं?’ मैंने उन्हें बताया कि मैं एसएसपी साहब के पास फरियाद लेकर आई थी किन्तु देखिये ये लोग मेरे साथ ही मारपीट व दुर्व्यवहार कर रहे हैं और कहाँ ले जा रहे हैं! महासचिव सहित अन्य अधिवक्ताओं द्वारा पुलिसकर्मियों से कहा कि आप इस तरह से इस महिला के साथ मारपीट एवं दुर्व्यवहार इस तरह से नहीं कर सकते हैं, लेकिन उपरोक्त सभी पुलिस वालों ने इन अधिवक्ताओं की एक नहीं सुनी. उलटे ज्ञान भारती ने मेरी तरफ देखते हुए कहा कि ‘ज्यादा से ज्यादा क्या होगा, कम्पलेन केस करोगी!’ और यह कहते हुए मुझे और मेरी बेटी को उनलोगों ने सफ़ेद रंग की जीप में फेंक दिया. इस क्रम में हम दोनों माँ-बेटी को काफी चोटें आईं.



 इसके उपरांत ज्ञान भारती खुद और एक महिला पुलिसकर्मी व अन्य पुरुष पुलिसकर्मी भी जीप पर सवार हो गये. उन लोगों ने जिप्सी के अंदर की बत्ती भी बुझा दी थी. मैं और मेरी बेटी बुरी तरह डरे हुए थे. मेरे रोने-चिल्लाने पर दो पुरुष पुलिसकर्मियों ने पहले तो मुझे भद्दी-भद्दी गालियां दी फिर थप्पड़ मारने लगे. उसके बाद मुझे उन लोगों के द्वारा चुपचाप रहने की नसीहत दी गई. रास्ते में जिप्सी पर मौजूद एक पुरुष पुलिसकर्मी ने अंधेरे में मेरी छाती पर गलत मंशा से हाथ भी रखा. इस पर मैं जब चिल्लाने लगी तो ज्ञान भारती एवं दूसरी महिला पुलिस मेरा सिर झुकाकर मेरे पीठ पर कोहनी से मारने लगी. इसको देख जब मेरी बेटी रोने लगी तो इन निर्दयी पुलिस वालों ने उसकी भी चोटी पकड़ कर दो-तीन चाटा जड़ दिया. मुझे शहर के कोतवाली थाना लाया गया. कोतवाली थाना पहुंचते ही ज्ञान भारती ने मेरा बाल पकड़ कर खींचते हुए जीप से उतारा. उसके बाद मुझे वहाँ लगभग आधे घंटे तक 7:30 बजे संध्या तक थाना पर बैठाये रखा गया. मैं बार-बार उनसे घर जाने देने की गुहार लगाती रही,किन्तु उन्होंने मुझे घर जाने नहीं दिया.


 फिर कोतवाली स्थित महिला थाना से ज्ञान भारती समेत अन्य पुलिसकर्मी मुझे जबरन उठाकर शहर के ही ततारपुर थाना ले गए. वहाँ मुझे 8:30 बजे तक बैठाकर रखा. मेरी चार साल की बेटी को भूख और प्यास लग रही थी और वो लगातार पानी मांग रही थी. लेकिन किसी पुलिसवाले को हमारे ऊपर रहम नहीं आई और उन्होंने हम दोनों को पानी तक नहीं दिया.

ततारपुर थाना अध्यक्ष अजय कुमार कहने लगे कि, ‘अरे मैडम को ले आये! जरा इसके चेहरे का बढ़िया से फोटो खींचो! बहुत एसएसपी और आईजी के पास हमलोगों की शिकायत करती है!’ उनके कहने पर थाना में मौजूद कुछ पुलिसकर्मियों ने अपनी मोबाईल से मेरी फोटो भी खींची. इसके बाद अजय कुमार ने मुझसे कहा कि, ‘केस-मुकदमे के चक्कर में मत पड़ो, चुपचाप घर पर बैठ जाओ नहीं तो किसी झूठे मामले में फंसाकर जेल भेज देंगे. जीना मुश्किल कर देंगे. समाज में मुंह दिखाने लायक नहीं रहोगी.’ इस दौरान थाना में मौजूद सभी पुलिसकर्मी ठहाके लगाकर हंसते हुए मेरे बारे में गंदी-गंदी बातें बोल रहे थे. पुनः अजय कुमार ने मुझे गाली देते हुए कहा कि- ‘चलो इस रंडी को इसीके घर पर ले जाकर इसकी इंक्वायरी करते हैं.’

ज्ञान भारती और अजय कुमार सहित कई पुलिसकर्मी दो जीप में मुझे और मेरी बेटी को साथ लेकर मेरे घर ले आये और मेरे चाचा और मेरी तथाकथित सौतेली माँ से कहने लगे कि- ‘इसका ईलाज कर दिये हैं.’ और दोबारा गाड़ी में बैठाकर मुझे और मेरी बेटी को पुनः जीप पर जबरन बैठाकर ततारपुर थाना ले जाने लगे. रास्ते में जब हम बहुत रोने-चीखने लगे तो हमें रात्रि के 9:15 के आसपास रास्ते में उतार दिया गया और मेरा मोबाईल व पर्स फेंककर मुझे वापस कर दिया गया. उतारते वक्त दोनों थाना अध्यक्षों ने मुझे धमकी देते हुए कहा कि-‘भविष्य में दोबारा अगर सौतेली माँ व चाचा पर कोई कांप्लेन करने की कोशिश की तो इससे भी बुरा हाल करेंगे.’

पुलिस वालों द्वारा मुझे और मेरी बेटी के साथ मारपीट करने से हम दोनों को गंभीर चोटें आईं जिसका ईलाज भागलपुर शहर स्थित सदर अस्पताल में चल रहा है. उक्त घटना से मैं और मेरी बेटी काफी भयभीत हैं. मुझे डर है कि पुलिस वाले मेरी कभी भी हत्या कर अथवा करा सकते हैं. मेरे ऊपर झूठे मुकदमे कर अथवा करवाये जा सकते हैं. मैंने इस पूरी घटना से आरक्षी महानिरीक्षक और एसएसपी को लिखित आवेदन व दूरभाष द्वारा देकर कार्यवाही की मांग भी की है. बावजूद इसके अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है. आज भी आते-जाते हमारे ऊपर नजर रखी जा रही है और हमारा पीछा भी किया जा रहा है. हम दहशत के साये में जी रहे हैं.

इतना ही नहीं दिनांक 03/11/2016 की सुबह करीब 06:30 बजे तातारपुर थानाध्यक्ष, अजय कुमार एवं छः सात की संख्या में अन्य पुलिसकर्मी मेरे घर पर आए और मेरे घर का दरवाजा पीटते हुए घर के अंदर प्रवेश कर गए और मैं जिस कमरे में सोती हूँ उस कमरे का दरवाजा भी जोर – जोर से पीटते हुए भद्दी – भद्दी गाली देने लगे और कहा कि तुम थाना चलो, तुम मेरे और एस एस पी पर केस की हो. आज तुम्हारा उस दिन से भी बूरा हाल करेगें और मेरे कमरे के दरवाजा के सामने थानाध्यक्ष कुर्सी मंगाकर बैठ गए तथा उनके साथ आए अन्य पुलिसकर्मी भी उनके इर्द गिर्द खड़े थे जिस कारण न मैं अपनी नित्य क्रिया भी नहीं कर पा रही थी, ये लोग लगातार 09:00 बजे सुबह तक वहाँ बैठे रहे और मुझे प्रताड़ित करते रहे. इस घटना की जानकारी मैने अपने मोबाईल द्वारा श्रीमान् आई जी, भागलपुर और श्रीमान डी आई जी, भागलपुर को दी.उपरोक्त तथ्यों के आलोक में निवेदन है कि मनोज कुमार वरीय आरक्षी अधीक्षक, भागलपुर, ज्ञान भारती महिलाथाना अध्यक्ष, कोतवाली, भागलपुर, अजय कुमार, थाना अध्यक्ष, ततारपुर, भागलपुर, सहित चार-पांच की संख्या में सादे लिवास में पुलिसकर्मी जिसे देखने पर मैं पहचान सकती हूँ, के ऊपर ठोस कार्रवाई करते हुए अविलंब मुअत्तल करने की कृपा की जाय तथा साथ ही मेरे एवं मेरी बेटी के जान-माल की सुरक्षा व न्याय प्रदान की जाय.

                                                                                                                                                                    विश्वासभाजन 
                                                                                                                                              (सपनासुमन)
                  

हमें खत्म करने के पहले वे लोकतंत्र को खत्म करेंगे

स्त्रीकाल संपादकीय टीम 

चाहे कोई भी संघर्ष हो-जाति के खिलाफ, ब्राह्मणवाद के खिलाफ, पितृसत्ता के खिलाफ, तानाशाही के खिलाफ- वह  तभी तक जारी रह सकता है, जबतक लोकतंत्र पर कोई खतरा नहीं है या आपके सवाल करने और अपनी बात कहने या अपने लिए हक़ हासिल करने के लिए शांतिपूर्ण संघर्ष करने की आजादी बची हो. पिछले कई महीनों से इसी आजादी पर सत्ता के प्रत्यक्ष और परोक्ष घटक हमले कर रहे हैं. पिछले कई महीनों से निरंतर तनाव की स्थिति राज्यसत्ता और उसके सहयोगी अंगों, संगठनों और समूहों के द्वारा बनाई जा रही है. जिम्मेवार पदों पर बैठे लोग ‘सवाल’ न करने की चेतावनी दे रहे हैं. हुक्मरानों और ब्राह्मणवादी पितृसत्ता का हित ही राष्ट्र हित बताया जा रहा है. यह एक खतरनाक माहौल का संकेत है. यह लोकतंत्र के खात्मे का संकेत है, जिसके पहले चरण से हम गुजर रहे हैं- अघोषित आपातकाल और उच्चवर्गीय, उच्चवर्णीय पितृसत्ताकों के स्वर्ग का निर्माण काल है यह- इनके अलावा जिस किसी भी गैर ब्राह्मण , गैर-उच्च वर्गीय -वर्णीय पुरुष -समूह को या किसी भी स्त्री-समूह को अपने ‘अच्छे दिन’ आने का भ्रम हो रहा है, तो वह छलावे में है, वे दिवास्वप्न’ देख रहे हैं, वे किसी निश्चित उद्देश्य के लिए किये जा रहे है यज्ञ की आहुति भर हैं, बलि के पात्र भर हैं.

हमने जो कुछ भी हासिल किया है पिछली  शताब्दियों में वह निरंतर आधुनिकता की ओर अपनी उन्मुखता और लोकतंत्र के अपने चुनाव के कारण ही. स्त्रियों, दलितों,पिछड़ों,आदिवासियों, सभी वंचितों के हक़ के लिए संघर्ष और हासिल की पृष्ठभूमि है लोकतंत्र. अभी उसी पर प्रत्यक्ष-परोक्ष प्रहार हो रहे हैं और जनता के एक बड़े वर्ग की सहमति भी इस प्रहार में शामिल कर ली गई है. इसका ताजा उदाहरण है एनडीटीवी इंडिया पर एक दिन का प्रतिबंध. जब मौजूदा दौर के कई सता पोषित चैनल उन्माद, अंधविश्वास, घृणा और छद्मराष्ट्रवाद के नाम पर हिंसक चेतना का निर्माण कर रहे हैं, एक ख़ास चैनल पर यह हमला सवाल करने वालों को सत्ता के द्वारा दिया जाने वाला संकेत भी है, हम सब का गला घोटा जाने वाला है, सबको  चुप कराया जायेगा- यह जबरन चुप्पी हमारी अंतिम पराजय की ओर ले जायेगी- जहां स्त्रियों, दलितों, वंचितों के सारे अधिकार उर्ध्वमुखी सत्ता के लिए छीन लिए जाते हैं –यही उनकी कल्पना का स्वर्ग है.



हमें उनकी कल्पना के इस स्वर्ग की जगह लोकतंत्र को बचाये रखने के लिए जी –जान लगा देना चाहिए, जरूरी है वंचितों की लड़ाई के लिए. एनडीटीवी पर एक दिन के प्रतिबंध की हम भर्त्सना करते हैं. स्त्रीकाल के पाठकों को छोड़ जाते हैं एनडीटीवी के पक्ष के साथ, जो उनके द्वारा अपने हिन्दी चैनल पर एकदिन के प्रतिबंध के बाद जारी किया गया है और चीफ एडिटर, इंडियन एक्सप्रेस, राजकमल झा, के एक महत्वपूर्ण भाषण के साथ, जो रामनाथ गोयनका अवार्ड के मौके (3 अक्टूबर) पर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने, उन्होंने दिया. कहते हैं कि उस समय प्रधानमंत्री के चेहरे पर बेचैनी साफ़ देखी जा सकी, लेकिन दूसरे ही दिन उनकी सरकार ने मीडिया के एक दूसरे हाउस को प्रतिबंध का एक नोटिस थमा दिया.  सुनें  वीडियो लिंक में राजकमल झा और देखें हुक्मरानों के चेहरों की प्रतिक्रया…

एनडीटीवी का पक्ष: 

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का आदेश प्राप्त हुआ है. बेहद आश्चर्य की बात है कि NDTV को इस तरीके से चुना गया. सभी समाचार चैनलों और अखबारों की कवरेज एक जैसी ही थी. वास्तविकता  में NDTV की कवरेज विशेष रूप से संतुलित थी. आपातकाल के काले दिनों के बाद जब प्रेस को बेड़ियों से जकड़ दिया गया था, उसके बाद से NDTV पर इस तरह की कार्रवाई अपने आप में असाधारण घटना है. इसके मद्देनजर NDTV इस मामले में सभी विकल्पों  पर विचार कर रहा है.



राजकमल चौधरी का पक्ष 

आपके शब्दों के लिए बहुत आभार. आपका यहाँ होना एक मज़बूत सन्देश है. हम उम्मीद करते हैं कि अच्छी पत्रकारिता उस काम से तय की जाएगी जिसे आज की शाम सम्मानित किया जा रहा है, जिसे रिपोर्टर्स ने किया है, जिसे एडिटर्स ने किया है. अच्छी पत्रकारिता सेल्फी पत्रकार नहीं परिभाषित करेंगे जो आजकल कुछ ज़्यादा ही नज़र आ रहे हैं, जो हमेशा आपने आप से अभिभूत रहते हैं, अपने चेहरे से, अपने विचारों से जो कैमरा को उनकी तरफ रखते हैं, उनके लिए सिर्फ एक ही चीज़ मायने रखती है, उनकी आवाज़ और उनका चेहरा. आज के सेल्फी पत्रकारिता में अगर आपके पास तथ्य नहीं हैं तो कोई बात नहीं, फ्रेम में बस झंडा रखिये और उसके पीछे छुप जाइये. आपके भाषण के लिए बहुत बहुत शुक्रिया सर, आपने साख/भरोसे की ज़रूरत को अंडरलाइन किया. ये बहुत ज़रूरी बात है जो हम पत्रकार आपके भाषण से सीख सकते हैं. आपने पत्रकारों के बारे में बहुत अच्छी बातें कही जिससे हम थोड़ा नर्वस भी हैं. आपको ये विकिपीडिया पर नहीं मिलेगा, लेकिन मैं इंडियन एक्सप्रेस के एडिटर की हैसियत से कह सकता हूँ कि रामनाथ गोयनका ने एक रिपोर्टर को नौकरी से निकाल दिया जब उन्हें एक राज्य के मुख्यमंत्री ने बताया कि आपका रिपोर्टर बड़ा अच्छा काम कर रहा है. इस साल मैं 50 का हो रहा हूँ और मैं कह सकता हूँ कि इस वक़्त जब हमारे पास ऐसे पत्रकार हैं जो रिट्वीट और लाइक के ज़माने में जवान हो रहे हैं, जिन्हें पता नहीं है कि सरकार की तरफ से की गयी आलोचना हमारे लिए इज़्ज़त की बात है.

वीडियो में 1 घंटे 34वें मिनट  पर देखें राजकमल झा का भाषण और देखें नेताओं के चेहरे की प्रतिक्रया



इस साल हमारे पास इस अवार्ड के लिए 562 एप्लीकेशन आयीं. ये अब तक की सबसे ज़्यादा एप्लीकेशन हैं. ये उन लोगों को जवाब है जिन्हें लगता है कि अच्छी पत्रकारिता मर रही है और पत्रकारों को सरकार ने खरीद लिया है.अच्छी पत्रकारिता मर नहीं रही, ये बेहतर और बड़ी हो रही है. हाँ, बस इतना है कि बुरी पत्रकारिता ज़्यादा शोर मचा रही है जो 5 साल पहले नहीं मचाती थी.

स्वयं सिद्धा !

रंजना गुप्ता

दो कविता संग्रह(रजनी गन्धा,परिंदे),एक कहानी संग्रह(स्वयं सिद्धा) प्रकाशित! निजी व्यवसायी, स्वतंत्र लेखन! संपर्क : ranjanaguptadr@gmail.com

सुष्मिता आज ऑफिस जाने के मूड में नही थी ! उसने लिहाफ को उठा कर फिर से मुहँ ढक लिया ,जैसे उसे नींद आ ही जाएगी ! लेकिन थोड़ी ही देर में लिहाफ के श्वेत श्याम धब्बे उसे बैचैन करने लगे !उसे ऐसा प्रतीत हुआ, जैसे ये धब्बे उसकी पूरी जिंदगी पर छा जाना चाहते है ,घबरा कर उसने बिस्तर छोड़ दिया ,और कारीडोर में टहलने लगी !उसने पूरब की ओर देखा ,सूरज की लालिमा चारो दिशाओं में सुनहरी आभा के रूप में फैलने लगी थी !सुष्मिता का निश्चय बड़ा अटल होता है ,आज वह एक बार भी फैक्ट्री नही जाएगी ,वर्कर्स को जो करना है करे !वैसे भी वे उसकी सुनते नही ,उन्हें जो करना होता है वे वही करते है !उसने कई बार देखा है ,जब वह अचानक पहुँचती है ,तो मंडली लगा कर बैठे उसके कारीगर बीडी फूँक रहे होते है ,उनके मुहँ दबा -दबा कर हँसने और फुसफुसा कर बात करने का ढंग बताता है ,कि वे उसकी अनुपस्थिति से बहुत मौज में है ,जैसे ही ऑफिस में सुष्मिता के आने की आहट होती है ,वे तुरंत सभा समाप्त कर ,अपनी-अपनी मशीनों पर बैठ जाते है !और ऐसे मनोयोग से मशीनें चलाने लगते है ,नीचे के कारीगर इतनी तल्लीनता से माल की कटाई -छटाई में जुट जाते है ,जैसे उनके जैसी कार्य कुशलता ,कर्मठता और व्यस्तता कही और के कारीगरों में या फैक्ट्री में ,पाई ही नहीं जाती है !सुष्मिता का व्यवहार अपने वर्कर्स के साथ बेहद मानवीय और सौहार्द्य पूर्ण है ,वह बड़ी सह्रदयता से उनके सुख दुःख में साझीदार बनती है ,पर वे उसकी इस संवेदन शीलता को उसकी कमजोरी समझते है , जबकि उसके सारे कारीगर प्राय: एडवांस पर ही रहते है ,तब भी उनकी यह कामचोरी की आदत …


उफ़ वह उब चुकी है ..उसके वर्कर्स अपनी कार्य क्षमता को बहुत संभाल-संभाल कर खर्च करते है,चाहे जितना अनिवार्य कार्य चल रहा हो ,उन लोगो का इससे ज्यादा मतलब नही रहता !चाहे मार्केट में सुष्मिता की प्रतिष्ठा और उसकी कम्पनी की धज्जियाँ उड़ जाये ,चाहे उसका पैसा लेट लतीफी की वजह से डूब जाये ,उन्हें तो बस अपनी प्रतिमाह की सैलरी ,वह भी नियत समय पर ,और अधिक से अधिक ओवर टाइम बनाने से मतलब !एडवांस तो हर समय चाहिए ,वरना काम छोड़ने की धमकी !और धीमी कार्य प्रणाली तो उनकी यूनियन बाजी का जैसे पहला सबक ही है !

पन्द्रह -बीस वर्कर्स की इस छोटी सी यूनिट से काम निकलवाने में सुष्मिता को पसीने आ जाते है !सुष्मिता अत्यंत शिष्ट -सुसंस्कृत ,और सुशिक्षित ,मृदु भाषी महिला उद्यमी है ! वह नारी स्वतंत्रता की सही अर्थो में जीवित पर्याय है ! उसने महिला पॉलिटेक्निक से डिग्री लेकर एक प्रोजेक्ट तैयार किया था ,जिसके फाइनेंस हेतु जब उसने बैक के अधिकारियो से संपर्क किया तो ,बैंक अधिकारियो की प्रतिक्रिया अत्यंत सकारात्मक रही ,उन्होंने उसके प्रोजेक्ट की जम कर सराहना की ,और इस तरह उसे बड़ी आसानी से फैक्ट्री शुरू करने के लिए लोन उपलब्ध हो गया !पिता के खाली पड़े प्लाट पर उसने फैक्ट्री की आधार शिला रखी ! बड़े जोश और उमंग के साथ उसने अपना उद्योग शुरू किया था ,यह फैक्ट्री उसके पिता का सपना थी ,वह अपने दिवंगत पिता की इकलौती वारिस थी ,उनके बाद उसका अपना कोई नही बचा था ,माँ का देहांत बहुत पहले ही हो चुका था ,पिता के लाख जिद करने के बावजूद उसने विवाह नही किया था ! उसे डर था,कि विवाह के पश्चात् ,वह पिता के प्रति अपने दायित्वों को शायद पूरी तरह निभा नही सकेगी !वह कर्तव्य जो भारतीय समाज में एक पुत्र का पिता के लिए माना जाता है ,वह पुत्री होकर भी पिता के लिए अत्यंत सहजता से उन्ही कर्तव्यो का निर्वाह तभी शायद कर सकी थी !उसके पिता सदैव करते थे ,कि नौकरी करके तुम अपनी आजीविका तो आसानी से कमा सकती हो ,लेकिन एक उद्योग मनुष्यों के एक पूरे समूह को रोजगार देता है ,उद्योग धंधे में तुम अपने साथ-साथ ही दूसरे पचासों व्यक्तियों की जीविका भी आसानी से चला सकती हो !उद्योग किसी सामाजिक संगठन की तरह बेहद कल्याणकारी वह व्यावसायिक संगठन है ,जो कितने ही घरो में चूल्हे जलाने का माध्यम बनता है ,पिता की इस राष्ट्रीय सोच को सुष्मिता ने अपना कैरियर बना लिया !उसके पिता आदर्शो की प्रति मूर्ति थे ,कुछ-कुछ अति मानव जैसी उनमे कई विशेषताएँ एक साथ मौजूद थी ! सच्चाई ईमानदारी की तो वे जीती जागती मिसाल थे ! वे उससे प्राय: कहा करते थे , कि तुम कभी अन्याय का साथ नही देना ,किसी पर अन्याय नही करना !हर बुराई के लिए जम कर लड़ना सीखो ,लेकिन कभी किसी बुराई के लिए अपनी अच्छाई को दांव पर नही लगाना !

 माँ के सरल निश्छल वात्सल्य ने उसके ह्दय को आकार दिया ,तो पिता के दृढ़ विचारो ने सुष्मिता के सम्पूर्ण व्यक्तित्व को एक कवच रूपी सांचे में ढाल दिया था ,सुष्मिता में इसी कारण एक अदभुत जीवनी शक्ति थी ,जो उसे जल्दी टूटने नही देती थी ,आत्म विश्वास तो उसमे कूट-कूट कर भरा था ,डरना वह जानती नही थी ,अध्यवसायी पिता की उस अध्यवसायी पुत्री ने ,विवेकानंद से लेकर टॉलस्टॉय ,भारतीय दर्शन से लेकर पाश्चात्य विचारकों तक ,वैचारिक अध्ययन का कोई क्षेत्र नही छोड़ा था !लेकिन अंत में एक मात्र गीता ही उसकी सर्व प्रिय पुस्तक रही !पर हित और पर कल्याण की भावना को ,उसने अपने व्यवसाय तक में गूँथरखा था !पैसे के लिए बात-बात पर बिक जाने वाली व्यापारिक बुद्धि से वह कोसो दूर थी !विरासत में मिले संस्कार उसे व्यावसायिक असफलता दिलाने में ,अत्यंत अहम् भूमिका रखते थे !वह सुष्मिता जिसे बाजार वाद ,और धन की कुरूप लालसा का ,चश्मा पहन कर देखना ,बिलकुल असंभव था !उसे उसके ही अनपढ ,गंवार लेकिन पेशेवर चालक बुद्धि के कारीगर प्राय: चकमा देते रहते थे !लेकिन पैसा कमाने की होड़ में आदमियत को रौंद कर ,आगे बढना सुष्मिता को मंजूर नही था !धन के साथ-साथ धर्म कमाने की ,नैतिक सॊंच ही उसकी इस कार्य क्षेत्र में ,सबसे बड़ी बाधा बन गयी थी !कभी -कभी बाजार वाद के कठोर शिकंजे में फंस कर ,बेबस होकर वह फैक्टी बंद करने की सोचती ,लेकिन अपने पिता के सपने को एक लक्ष्य की भांति देखने वाली सुष्मिता ,फैक्ट्री में ताला तब तक नही डाल सकती थी,जब तक उसके एक भी कारीगरको ,उससे रोजी रोटी मिलती रहे !आजकल वह प्राय:अनमनस्क सी रहने लगी थी !वह अपने उदार ह्रदय के किसी कोने में ,ईर्ष्या के एक नन्हे पौधे को लगातार पनपता हुआ देख रही थी !वह उस पौधे को जड़ से उखाड़ फेंकना चाहती थी ,लेकिन वह बेशर्म पौधा उसके सिद्धान्तों की हरी -भरी सृष्टि का ही जीवन रस पीकर ,बढता ही जा रहा था ! इसका कारण वह धीरे -धीरे समझने लगी थी !


उसकी फैक्ट्री के सामने ही ,स्थित चाय समोसे की छोटी सी दुकान ,कुछ ही सालो में किस तरह शहर की प्रतिष्ठित मिठाई की दुकान में बदल गयी ,और देखते ही देखते ,नगर निगम की जमींन पर अवैध कब्जा करके बैठा ,वह करतार नाम का व्यक्ति कैसे रातों रात कालोनी के धनाढयो में शुमार हो गया ,वह यह सारा खेल चमत्कृत होकर देखती ही रह गयी ,उसे याद है ,थोड़े दिनों पहले अपने गंदे अंगौछे से नाक साफ करता ,हुआ और उसी हाथ से बना-बना कर समोसे ढेर करता हुआ ,यह आदमी सदैव उसके मन में जुगुप्सा जगाता रहता था ,उसके समोसे छोले खाकर बीमार पड़ते लोगो के कारण उसकी करतार से आये दिन झड़प होती रहती !और वह छोटा सा पहाड़ी नौकर तो क़डाही को जैसे साफ करके रखता ,सड़क का आवारा कुत्ता उसे चाट कर फ़िर से साफ़ कर देता ,उसे और भी बहुत कुछ याद है ,नगर निगम की गाड़ी ,थाने का दरोगा ,जब तब करतार को तंग करते थे !रोज उसकी झोपड़ी नुमा दुकान उजडती और अगले दिन ही फिर बन जाती !

धीरे -धीरे समय बीतने लगा ,अब करतार की उन्ही नगर निगम के अधिकारियों से हँस-हँस कर बाते होने लगी थी !वह थाने का दरोगा भी ,उसके यहाँ से मिठाईयों के बड़े-बड़े टोकरे ,अक्सर घर ले जाने लगा !करतार का कद धीरे-धीरे बढ़ रहा था ! यहाँ तक कि सुष्मिता स्वयं को उसके सामने बौना पाने लगी थी ,वह लगातार सुरसा के मुहँ की भांति फैलता हुआ सौ योजन तक फ़ैल चुका था !और सुष्मिता ,वह तो उसके सामने बिंदु भर रह गयी थी !आज उसके दुकान की शानदार चार मंजिला भव्य इमारत शहर की मुख्य सडक पर बन कर तैयारहो गयी थी ,उसका उद्घाटन करने ,शहर के मेयर आ रहे थे !अपने पान से रंगे गंदे दांतो को निकले हुये ,वह दो दिन पहले सुष्मिता को भी आमंत्रित करने आया था ! एक हिकारत भरी नज़र उसकी फैक्ट्री पर डाल ,अत्यन्त धूर्तता पूर्वक हाथ जोड़ कर उसी भांति मुस्करा रहा था ,जैसे नेता वोट माँगने के लिए जनता के सामने ढोंगी मुद्रा में खडा रहता है ,सुष्मिता उसकी विषैली हँसी को अभी तक भूल नही पाई थी !अपने ही बनाये आदर्शो का तिलिस्म आज उसे ,बिखरता नजर आरहा था !वह स्वयं को पहली बार कटघरे में खड़ा पा रही थी ! इस अंतरतम के विद्रोह का चेहरा उसे बिल्कुल अजनबी लग रहा था !मन एक अनजानी सी ग्लानि से विचलित हुआ जा रहा था !आज वह अपनी ही निष्ठा ,ईमान दारी ,और सत्य परकता को जितना कोस सकती थी ,कोस रही थी !लेकिन थोड़ी ही देर बाद थक हार कर बैठ गई ,और वह कर भी क्या सकती थी ?अपने जीवन मूल्यों को बदलना या उनसे समझौता करना ,उसके बस की बात तो थी नही !यह वह अच्छी तरह समझती थी !तभी फोन की घंटी बज उठी !
‘बिटिया आपका फोन है ! अचानक विचारों के सतत प्रवाह को ईश्वर काका की आवाज ने टोक दिया
!यह ईश्वर काका भी …..

पापा के समय से ही वह उसके साथ है !और आज भी उसी समर्पित भाव से उसकी देख भाल करते है !उससे भी बढ़ कर पितृ तुल्य स्नेह देते है !उन्ही के कारण वह घर से निश्चिन्त होकर फैक्ट्री का कार्य भार संभालती है !ढेरसारे पेड़पौधों से भरा ,विस्तृत पृष्ठ भूमि में संजोया ,यह छोटा सा घर उसे सही मायने में सन्तुष्टि और चैन देता है !दुनिया की चालबाजियों ,मायावी द्वन्द फंदों से अब वह उकता चुकी है ! लेकिन बंदी के कगार पर खड़ी उसकी फैक्ट्री …..ओह …तनाव के कारण उसका सर दुखने लगा था !

उसने आखिर इतना गलत फैसला लिया ही क्यों ? उसे तो किसी यूनिवर्सिटी ,में प्रोफ़ेसर आदि होना चाहिए था !या फिर किसी पत्रिका का संपादक जैसा ही कुछ …जहाँवह स्वयं को वास्तविक रूप में अभिव्यक्त कर सकती थी !उमड़ते विचारों को स्थायित्व दे सकती थी !आज उसे रह -रह कर पिता की शिक्षा पर भी क्रोध आ रहा था …. भला सच्चाई और ईमानदारी से कहीं आज के जमाने में सफलता मिल सकती है ? वातावरण में चारों और बिखरी घुटन और हताशा उस पर पूरी तरह हावी होने लगी थी ! ‘बिटिया आपका फोन है ,आपने बात नही की ….’
थोड़ी ही देर बाद उसके लिए नाश्ता लेकर लौटे ,ईश्वर काका ने फोन का रिसीवर अलग रखा देखा तो आश्चर्य से पूछ बैठे ,पहले तो कभी इतना सोंच में डूबा सुष्मिता को उन्होंने नही देखा था !
..’जरुर कोई बड़ी बात है ….’


ईश्वर काका के माथे पर उभर आई बुढापे की लकीरों में ,चिंता की लकीरे भी सम्मलित हो गयी ! ..उन्होंने चुप चाप फोन का रिसीवर ठीक से रखा ,और बिना कुछ कहे वापस किचन में चले गए !सुष्मिता का अनकहा दुःख वे भली भांति समझते थे ..लेकिन उसके अड़ियल और जिद्दी स्वभाव को भी बचपन से जानते थे ! थोड़ी ही देर में फोन की घंटी फिर से बजी ,इस बार सुष्मिता ने स्वयं ही फोन उठाया ,’हेलो ..,मालकिन ..मालकिन ..’ ‘हाँ ..हाँ..बोलो किशन …’ ‘आज आप आई नही …करतार की नई बिल्डिग पर इनकम टैक्स वालों की रेड पड़ गयी है …..हेलो…हेलो…’ लेकिन तब तक बिना कुछ कहे ,बिना कुछ सुने ,सुष्मिता ने फोन रख दिया था ! वह इस ख़बर से जैसे जड़ हो गयी !और पुन:उसी मुद्रा में कुर्सी पर बैठ गयी !

खिड़की से आती मन्द बासंतिक हवा ,और खिली -खिली धूप ने जैसे उसके चेहरे से ,चिन्ता परेशानियाँ, और कशमकश के बादलों को किनारे हटाना शुरु कर दिया ,थोड़ी ही देर में उसने स्वयं को ,फिर उसी उर्जा से परिपूर्ण कर लिया ,और अपने सोये हुए सबेरे को जगा कर उठ खड़ी हुई ! ‘ईश्वर काका ,मेरा बैग कहाँ है? मुझे ऑफिस पहुँचना है ,जल्दी करो …’अचानक उल्लास से भीगा स्वर सुन कर ,ईश्वर काका निहाल हो गये !अपनी प्यारी बिटिया की निर्णयात्मक दृढता ,और उन्मुक्त जिजीविषा को उन्होंने तुरंत पहचान लिया !उनके माथे की लकीरों में अब प्रभु से प्रार्थना की कपँकपाहट उभरने लगी थी !अगले ही पल सुष्मिता की गाड़ी सड़क पर दौड़ रही थी !दूर समुन्द्र की उछलती चमकती लहरों में बार -बार उसको अपने पिता का चेहरा,दिखाई दे रहा था !जो उससे कह रहे थे ,कि’ झूठ और बेइमानी की आयु जितनी विद्युत रेखा के समान चकाचौंध भरी होती है ,उतनी ही क्षणिक और विनाश कारी भी होती है ,जो स्वयं तो जलती ही है , साथ में दूसरों का घर भी जला देती है !

अस्ति कश्चित् वाग्विशेषः रामटेक पर दलित युवक

डा .कौशल पंवार

  युवा रचनाकार, सामाजिक कार्यकर्ता ,  मोती लाल नेहरू कॉलेज , दिल्ली विश्वविद्यालय, में संस्कृत  की  असिस्टेंट प्रोफ़ेसर संपर्क : 9999439709



अगर तुम जातियां खत्म न कर सको, तो अपनी जातियों पर इतना गर्व करना कि दूसरे जातियों के लिए लोग खुद जातियों को खत्म करने की आवाज उठाने लगे—डा. बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर.


अभी पिछले दिनों नागपुर जाने का अवसर मिला तो नागपुर से रामटेक जाने की इच्छा भी पूरी हुई, एक संस्कृत की शोधार्थी होने के नाते कालिदास का वह स्थान देखने की इच्छा हुई, जहां पर उन्होंने अपनी सुप्रसिद्ध महाकाव्य मेघदूत लिखा, जिसमें  प्रेमी बादलों के माध्यम से अपनी प्रेयसी के लिए संदेश भेजता है. ऐसे कवि के बारे में जानने का समझने का अवसर खोना नहीं चाहा, जिसे भारत का शेक्सपीयर कहा जाता है. इस यात्रा के दौरान ऐसे एक अनजान शख्स  से मुलाकात हुई, जिसे आपको भी मिलवाने का मन है.

मैं, अर्चना गौतम और भदंत चन्द्रकीर्ति  सुबह ही राम टेक के लिए निकल गये थे, महाकालिदास संस्कृत विश्विद्यालय देखने और रामगिरी पर्वत पर जाने का मन था. हम सुबह जल्द ही महाकालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय पंहुच गये थे, तब तक विश्वविद्यालय खुलने का समय नहीं हुआ था और गेट-कीपर ने द्वार खोलने से मना कर दिया. हमने बहुत विनती की कि हम बाहर से ही एक बार देखना चाहते हैं, और दिल्ली से आये हैं, संस्कृत पढाते हैं, पर वे नहीं माने. हम बड़बड़ाते हुए वापस चौराहे की ओर बढ़ गये. वहां पर आकर पोहा और चाय पीने का इच्छा हुई. सुबह नाश्ता करके नहीं निकले थे तो अब भूख भी लगने लगी थी, देखा पास में ही गर्म- गर्म ब्रेड पकौड़ा, पोहा और चाय बन रही थी, उसकी तरफ बढ गये थे. यह देखकर भी अच्छा लगा कि वहां महिला काम कर रही थी.  हमने हल्के से मुस्कराकर उससे संपर्क बनाया, उससे चाय और पोहा मांगा, उसने भी उसी मुस्कराहट से स्वागत किया. खोके के पिछवाड़े ही एक मेज और दो चार प्लास्टिक  की चेयर रखी हुई थी, हम तीनों वहीं जम गये थे, महिला पोहा परोसने लगी तो मैने केवल पोहा मांगा, क्योंकि उसमे डाले जाने वाली ग्रेवी में मिर्ची थी. मैने दो प्लेट चाय के साथ पोहा लिया. स्वादिष्ट था, खाते- खाते उनके साथ हल्की- फ़ुलकी बातें भी होने लगी थी, दो चार आदमी भी वहीं आ गये थे, उनमे एक नौजवान लड़का और एक दस एक साल का लड़का और  था, एक और  आदमी शायद वह उस छोटे लड़के का बाप होगा, बैठ गये थे. हमने उनसे कालिदास के बारे में कुछ जानकारी लेने चाही, लेकिन उनको इस बारे में कुछ ज्यादा नहीं पता था. वह नौजवान राम नाम का गमछा कंधे पर डाले था, बातूनी भी था, आधी- अधूरी जानकारी उसे थी. भन्ते जी ने उससे पूछा की यहां पर क्या है देखने के लिए, उसने तपाक से कहा कि एक विद्वान आदमी की मूर्ति  लगी है.जो बहुत ही ज्यादा पढा – लिखा है, मैने पूछा कितना पढा है , उसने जवाब में कहा कि बहुत ही ज्यादा जो आंबेडकर  और गांधी से ज्यादा पढा हुआ है. हम उनके मुंह से ये शब्द सुनकर दंग रह गये.  अर्चना ने उसे थोड़ा सा टोका कि तुम ये गमछा  और इतनी अंगूठी क्यों पहने हो? ताबीज भी पहने हुए था तो उसने उससे इसका कारण जानना चाहा. नौजवान ने तपाक से कहा कि अपनी -अपनी श्रद्धा है, कोई सिख को मानता है, कोई ईसाई, कोई मुसलमान, और  भन्ते जी को देखते हुए-कोई बुद्ध को मानता है. मैने आगे बहस न हो और कुछ ओर जानकारियां उससे ली जाये , सोचकर बात को टालते हुए अर्चना की ओर चुप रहने का इशारा किया, मैने पूछा- “तुम कितना पढे हो”  तो बताया- हम तो कुछ नहीं पढे, पर पढे लिखों से कम भी नहीं (हंसकर कहा) हम अब उससे ओर भी बहुत कुछ जानना चाहते थे, उससे पूछा की आप बाबासाहेब आंबेडकर को कैसे जानते हो, तो उसने कहा सुना है कि वे पढे लिखे थे. कालिदास के बारे में उसने बताया कि एक राम का मन्दिर है पहाड़ी पर . वहीं पर कुछ है. तो हमने फ़िर से उसे उसी विद्वान व्यक्ति के बारे में जानना चाहा तो उसने बताया की आप लोग जाकर देख लीजिए. हमने बहुत सारी बातें करते हुए अपना नाश्ता कर लिया था, पर मैं उस नौजवान में एक अलग तरह का स्वाभिमानी व्यक्तित्व देख रही थी. उसका अल्हड़पन से बात करना, बेहिचक बाते करना, मन को अच्छा लग रहा था, मैने उससे यूं ही पूछ लिया कि तुम करते क्या हो, और उसने बड़े अन्दाज से कहा-“साफ़ सफ़ाई का धन्धा करता हूं”, बस इतना सुनना था कि मैं आवाक रह गयी. इतना स्वाभिमान, अपने काम पर गर्व मैं पहली बार सुन और देख रही थी, ऐसा नहीं था कि वह यह काम करता है तो कोई महान काम कर रहा है, परन्तु उसके काम से उसे कितना सुकून  है वह यह दिखा रहा था. उसने कितने आसान शब्दों में कह दिया था. बस…… आगे कुछ और पूछने की हिम्मत नहीं हुई, मैं इधर-उधर देखने  लगी थी. पर उसके चेहरे को देखकर लगा ही नहीं कि वह बाते नहीं करना चाहता. उसने बताया कि वह इलाहबाद का रहने वाला है, वहां उनके साथ बहुत छुआछूत किया जाता है, इसलिए हम लात मारकर यहां नागपुर में आ बसे थे, उसके पिता जी आये थे, और उसका जन्म भी यहीं पर हुआ, इसलिए वह मराठी बहुत अच्छे से बोल रहा था, अर्चना और भन्ते जी ने कहा कि ‘अरे! ये तो अपना ही है, आप तो हमारे अपने हैं.’ यह सुनकर उसका वहां से उठकर जाने का मन नहीं हुआ. हमने भी उसे अपने साथ पहाड़ी पर जाने के लिए कहा तो पहले तो उसने नानुकर की पर उसका भी मन साथ में जाने का ही था, शायद हर रोज के काम से वह भी अपना समय इसमे निकालना चाह रहा था, और भी बहुत सी बातें हुई उसके साथ, पर उसके जातीय गर्व से एक सहानुभूति भी बनी कि जैसे किसी को भी अपनी जाति में पैदा होने का गर्व होता है, उसे भी वही था. उसने अपने आपको किसी से कम नहीं माना.



पढाई के बारे में बात की तो उसने कहा-‘नहीं पढ पाया फ़िर जब समझ बनी तो तब तक टाईम निकल चुका था, अब पढकर क्या करना, मतलब अब तो मस्ती के दिन हैं , शादी करके घर बसाने के दिन है, अब कैसे पढाई होगी !’ भन्ते जी ने अर्चना की ओर इशारा करके कहा कि ‘देखो ये तो अभी भी पढ रही है, तुम भी पढ सकते हो.’  पर उसने जैसे हैरानी से हम तीनों की ओर देखा और मानो एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल दिया था.  मैने उससे उसका नाम पूछा तो उसने ‘अमरूत’ बताया, मेरी हंसी छूट गयी उसका नाम सुनकर, मैने कहा खाने वाला अमरुद! वह मेरे चेहरे की ओर देखने  लगा था. भन्ते जी ने कहा, ‘ मराठी में बोला है , अमृत है.’ मुझे भला सा लगा था वह, कैसे एक नौजवान, जो दूसरा काम भी तो कर सकता है, पर यहीं धन्धा क्य़ूं, क्या इसलिए ही हरियाणा और लगभग उत्तरी भारत में सफ़ाई पेशे से जुडी जातियों की यही उनकी जजमानी होती है और विरासत जो वह पीढी दर पीढी ढोता चला जा रहा है. वह हमारे साथ जाना चाहता था. हमने भी उसे साथ ले लिया, उसने भी चौड़ा होकर कहा कि मैं आप सब को सब कुछ दिखाऊंगा. हम अब रामटेक के उस चौराहे को पार करके रामगिरी, जिसे आज रामगढ कहा जाता है चल पड़े. वहां वह सब रास्तों के बारे में बताता हुआ जा रहा था. एक स्थान पर जो उंचाई से नीचे की तरफ झांकने से दिखायी दिखाई दे रहा था, बताया की यहां पर अस्थियां प्रवाहित की जाती है यहां पिन्ड़ दान करने से स्वर्ग मिलता है, पुण्य मिलता है, इसलिए लोग अपने मृतक का यहां पर पिण्ड दान करते हैं.

तस्वीरों को लेते हुए हम ऊपर कालिदास संग्राहलय में पंहुच गये थे, पर वह गाड़ी के साथ ही रुक गया था, मानो संकेत दे रहा हो , ‘  बड़े बडे लोग अन्दर जाये मैं क्या करुंगा? ‘ हमने वहां कालिदास की आदमकद तस्वीर देखी. चारों तरफ़ हरियाली ही हरियाली. बीच में गुम्बद के अन्दर लगी कालिदास की आदमकद तस्वीर..उसी गुम्बंद में एक व्यक्ति योग कर रहा था, जैसे ही हम अन्दर जाने को हुए तो उसे देखते ही वापिस मुड़ गये. थोड़ी देर इन्तजार किया, लेकिन वह बाहर नहीं निकला. समय के अभाव में हम इन्तजार नहीं कर सकते थे इसलिए अंदर चले गये, बिना उसकी तरफ़ देखे ही मैने उससे कुछ जानकारी लेना चाही. तस्वीर की ओर इशारा करके जब उससे पूछा कि “ये कौन है”, उसने ना में सिर हिलाया, नहीं पता. उसके बारे में उन्हें कुछ नहीं पता था पर अपनी शेखी बघारते हुए अपने योग के गुर दिखाने के लिए तैयार हुआ तो मुझे थोडी झेंप सी हुई, क्योंकि उसने छोटा सा कच्छा पहना था,  मैने चलो कहा तो भन्ते जी मुझे देखकर समझ गये कि मैं यहां ओर उसे देखते हुए नहीं खड़ी रह सकती हांलाकि अर्चना योग दिखाने के लिए कह चुकी थी पर मुझे अच्छा नहीं लग रहा था तो हम लोग वहां से निकलकर उस ओर गये जहां पर कालिदास द्वारा रचित मेघदूत, अभिज्ञानशांकुतलम, विकर्मोवर्शीयम, रघुवंशम् आदि खुदे हुए थे- चारो तरफ़ गोलाकर दिवार पर. वहां पर हम सब ने कुछ फोटो ली. अर्चना ने बताया कि पूरी किताब ही अंकित है उस दिवार के पीछे. मैने सभी की तस्वीरें ली, ताकि अपने विद्यार्थोयों को सब दिखाई जा सके.

संग्राहलय देखने के पश्चात हम राममन्दिर की ओर बढ गये थे, देखने की उत्सुकता थी कि  जो रामायण में लिखा है, उन जगहों में कितनी सच्चाई है, बस इसी कारण हम सब- मैं, अर्चना और भदंत जी उस ओर आ गये थे. ऐसा माना जाता है कि यहां पर राम अयोध्या से निर्वासित होने के बाद वनवास काटने के लिए घूमते हुए अगस्त मुनि के आश्रम में रुके थे. वहां पर वराह अवतार की एक प्रतिमा भी देखी , पर वहां पर इसका औचित्य हम नहीं समझ पाये थे. और भी बहुत कुछ देखा. काफ़ी देर तक हमने चर्चा की कि बहुत सारे प्राचीन बौद्ध विहारों को बिगाड़कर मन्दिर की शक्ल दे दी गयी है. कुछ तस्वीर भी ली. जब मैने अमृत से फ़ोटो लेने के लिए अपना आईपैड़ पकड़ने के लिए कहा तो उसने झिझकते हुए अपना हाथ आगे बढाने की बजाय हमारे ड्राइवर भाई को बोल दिया, मैं उसकी मनोदशा समझ रही थी. इस सफ़र के दौरान दिमाग में चल रहा था मेरी अपनी बिताई जिन्दगी के वो पल जिनसे मैं गुजर चुकी थी, जिससे यह नौजवान गुजर रहा था. मैने अगली जगह पर फोटो लेने के लिए अपना आइपैड़ उसी को जानबूझकर दिया. उसने इसे लेने से पहले हाथों को अपनी मैली कुचैली पैंट से ऐसे रगड़े कि कहीं ये उसके हाथों से गन्दा न हो जाये. मेरे भीतर उसे देखकर कुछ टूट  सा रहा था, और इससे पहले मेरी आंखों की नमी को कोई भांपता, मैने चशमा लगा लिया था और पूरी यात्रा के दौरान वही मेरा सुरक्षा कवच बना रहा. बचपन की भोगी पीड़ा, अपमना, हर चीज का अभाव- कुछ पाने की लालसा सब आंखों के आगे छाता जा रहा था. कैसे मेरे समुदाय के लोग अपनी जिन्दगी को मल और गन्दगी को ढोते हुए बीता देते है, सदियां बीत गयी, आजादी के बाद भी कितना परिवर्तन आया अभी तक…………

 मैं बार-बार इन सब से बाहर निकलने की कोशिश कर रही थी. अपना ध्यान मैने मन्दिर को देखने में लगा लिया था. मुख्यधारा के साहित्य में कितनी सच्चाई है और क्या प्राचीनकाल में बने इन मन्दिर में बौद्ध विहारों के निशान  भी मिलते है, इन सब का विश्लेषण करने के लिए हमने देखने का मन बना लिया था, हालांकि मन्दिर बहुत उंचाई पर था, अर्चना और  अमृत और हमारा ड्राइवर नीचे ही रुक गये. मैं और भन्ते जी गये. राम मन्दिर कहे जाने वाले इसमें सीता की रसोई नाम से बने मन्दिर को हमने देखा, ऐसा माना गया है कि  जब सीता, राम और लक्षमण के साथ थी तो यहां पर भोजन तैयार करती थी. कौशल्या के मन्दिर को भी देखा, जब कौशल्या, सीता राम और लक्षमण को अयोध्या वापिस लौटने के लिए कहने आयी थी, लक्षमण के मन्दिर को देखा. राममन्दिर कहलाने वाले इस मन्दिर की स्थाप्य कला, मूर्ति कला को देखकर मन गदगद हो रहा था, भव्य था – इसमे कोई शक नहीं. चारों तरफ़ बन्दर ही बंदर थे, हरी-भरी हरियाली के बीचों बीच पहाड़ी पर बने इस मन्दिर को देखने के बाद बहुत से प्रश्नों ने जन्म ले लिया था. दुख हुआ यह देखकर की मन्दिर में विधवा और बूढी औरतें राम के नाम पर जाप करती हुई अपना वैधव्य और जीवन के अन्तिम क्षण काट रही थीं. मन्दिर में जगह -जगह पर अलग- अलग एंगल बनाकर बैठे आर्ट के विद्यार्थियों के द्वारा मन्दिर को अपनी ड्राइंग सीट पर उतारा जा रहा था, ये छात्र नागपुर विश्वविद्यालय के आर्ट विभाग के छात्र अपने शिक्षकों सहित वहां पर थे. यहां पर बड़ी मात्रा में बन्दर भी थे.

अब हम लोग वापिस लौट रहे थे तो हमने भूने हुए सिंघाड़े और बेर लिये, जो स्वादिष्ट थे. अपनी गाड़ी में बैठकर हम लोग वापिस रामटेक की ओर आ गये थे. हरिभरी हरियाली, शुद्ध हवा एक सुखद अहसास भर रही थी, अमृत ने जोर से चिल्ला कर कहा-“मैड़म यहां से फोटो लीजिए न एक बार”, गाड़ी रोक कर, मैने उसे हल्के से डांटा भी , ‘  भन्ते जी नाराज हो जायेंगे’.  पर वह नहीं माना और रुकने के लिए कहता रहा. लापरवाह था, अपना मन-मौजी भी तो था. थोड़ी सी खुशी अगर इसे मिल रही है तो क्यूं  न दी जाये, मैने उसकी बात मानकर गाड़ी रुकवाकर कुछ तस्वीरे वहीं पहाड़ी से ली. वह पूरे रास्ते वहां के बारे में बाते करता रहा, बातुनी बहुत था. हम लोग अब नीचे की ओर आ गये थे. रामटेक के उसी चौराहे पर, जहां से दायीं ओर मुड़कर चले तो कुछ फ़्लांग पर महाकवि कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय और दूसरी ओर बस्ती थी. मैने फ़िर से विश्वविद्यालय देखने की इच्छा जताई तो सब ने कहा- “चलो, एक बार ओर चल पड़ते है”, अब तो विश्वविद्यालय का द्वार खोल ही देंगे, हम लोग इस पर बात कर ही रहे थे कि वह नौजवान तपाक से बोला- “क्या मतलब, उन्होंने गेट नहीं खोला था? वह जानने को उत्सुक हुआ, तो हमने उसे सुबह के बारे मे सब बता दिया, कि कैसे उन्होने विश्वविद्यालय का गेट खोलने से मना कर दिया था. तैस मे आकर उसने कहा- ‘अरे……….!  ऐसे वह ….कैसे कर सकता है, मै अभी देखता हूं उसको. ‘ मैं मन ही मन हंस रही थी अपने लोगों की दबंगी पर, निडरता पर, बुलंद हौसलों पर कि कैसे हर वक्त लड़ने-भीड़ने के लिए तैयार रहते है हर समय, गलत चीज का विरोध करने के लिए तुरंत तैयार, भले ही सामने वाला चलाकी से उन्हें फ़सा ही रहा हो. मैं भी ऐसा ही करती थी. परन्तु जैसे- जैसे समझ आने लगा कि कैसे लोग धूर्तता  से हम लोगों को आगे करके मरवा देते है. ज्यादातर यहीं तो हो रहा है. हर जगह पर इनका इस्तेमाल किया जाता है और ये भी अपने छोटे छोटे स्वार्थों से अपना इस्तेमाल होने देते है. सब का सामना करने को तैयार. ये कभी नहीं होता कि दो अक्षर पढकर थोड़ा सी बुद्धि भी रखे. खैर हम लोग विश्वविद्यालय की ओर चले पड़े. वही हुआ जो नौजवान ने कहा था. वह नीचे उतरा और उनकी तरफ़ गया, पता नहीं उसने क्या कहा कि गेट कीपर ने झट से गेट खोल दिया विश्वविद्यालय का . भन्ते जी ने भी ,’ कहा आपकी तो बड़ी चलती है.’ मुझे पता नहीं खुशी हुई या दुख. हम लोग अन्दर चले गये. कालिदास का स्टैच्यू प्रांगण  में ही लगा था. बहुत उंच्चा, उस पर परिचय के साथ उनके ग्रंथों की चर्चा भी अंकित थी. अन्दर से कोई आया और उन्होने बिना  इजाजत के तस्वीरें  लेने से मना कर दिया, थोड़ा बुरा लगा और हम लोग बाहर आ गये.रामटेक के उसी चौराहे पर जहां पर हमने अमृत को लिया था, वहीं पर छोड़ दिया. उसे बाय- बाय कहा और हम लोग नागपुर की ओर बढ गये.



रास्ते भर बाबा साहेब के कहे शब्द याद आते रहे कि ‘अगर जातियां खत्म न हो तो अपनी जाति पर गर्व करो.’ क्या अमृत वही तो नहीं कर रहा था! जहां एक तरफ़ हमारी इसी कौम से निकले बड़े बड़े अधिकारी भी ये कहने का साहस नहीं जुटा पाते कि वह सफ़ाई कर्मी का बेटा या बेटी है, और ये हमारी जाति है. अपना नाम तक बदल कर रख देते हैं  और सरनेम भी बदलकर गुप्ता, शुक्ला, यादव और भी नाम अपने टाइटल बना कर रख लेते है ऐसे में इस नौजवान ने कितनी आसानी से अपना पेशा बता दिया था. उसे भी अपना काम और अपनी जात पर उतना ही गर्व था जितना किसी और  को होता है.

तुम्हें बदलना ही होगा: उपन्यास में विमर्श

विवेक कुमार यादव

शोधार्थी,हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविघालय,मो० 9599871810, ईमेलः—vivekk1906@gmail.com

सुशीला टाकभौरे का उपन्यास ‘तुम्हें बदलना ही होगा’ दलितों, स्त्रियों और दलित-स्त्रियों के संघर्ष की कहानी कहता है. शिक्षण संस्थाओं में दलितों के साथ होने वाले भेदभाव को उजागर करता यह उपन्यास दलित जीवन के महत्वपूर्ण पहलुओं पर प्रकाश डालता है. सुशीला टाकभौरे के बारे में अनिता भारती कहती हैं कि “सुशीला टाकभौरे दलित महिलाओं को संघर्ष की आदर्श स्थिति में दिखाती हैं. वे पुरुषों से किसी मायने में कम नहीं है. वे स्वाभिमानी हैं. लड़ाकू हैं. किसी भी अत्याचार को खामोशी से न सहकर तर्क-वितर्क करती हुई, मुँह तोड़ जवाब देती हुई, डंडा उठाकर अपराधियों से भिड़ जाती हैं.”

उत्तर-आधुनिकता के शुरू होने के साथ ही नयी तकनीकों तथा मुक्ति आन्दोलनों-दलित, स्त्री एवं आदिवासी ने सत्ता, समाज और संस्कृति की मूलभूत संरचनाओं, प्रक्रियाओं और विचारधाराओं को जो चुनौती दी उससे सब कुछ विभेदित, विघटित एवं विकेन्द्रित हो गया. ब्राह्मणवादी सत्ता, पितृसत्ता और पूँजीवादी सत्ता के वर्चस्व को चुनौती मिलने लगी. एक के बाद एक मृत्यु की सूचना मिलने लगी. ईश्वर, इतिहास, पाठक, मनुष्य, आधुनिकता, कला, विचारधारा, लेखक और साहित्य सभी के मृत्यु की घोषणाएँ होने लगीं. कुछ भी निश्चित, परिपूर्ण, अंतिम, शाश्वत और सार्वभौमिक नहीं रह गया. जो हाशिये पर थे, बहस के केन्द्र में आ गये.

हाशिये के लोगों ने पहले से स्थापित सत्ताओं के खिलाफ संघर्ष किया. परिणाम स्वरूप नई प्रकार की सत्ताओं का उदय हुआ जो पहले से कम क्रूर है. उपन्यास में भी एक जगह सुशीला टाकभौरे ने यह बात कही है “पहले का प्रगतिवादी, प्रयोगवादी और जनवादी चर्चा पर केन्द्रित आधुनिक काल, अब अपने उत्तर-आधुनिक काल के रूप में महिला विमर्श और दलित विमर्श पर बोलने और बोलते रहने पर मजबूर हो गया है क्योंकि अब इनकी चर्चाएँ, अपने देश की सीमाओं को पार करके, विश्व स्तर पर हो रही हैं.”

तुम्हें  बदलना ही होगा’ उपन्यास में धीरज कुमार और महिमा भारती नाम के दो चरित्रों के माध्यम से दलितों और स्त्रियों के शोषण और उनके प्रतिरोध को दर्शाया गया है. पूरे कथानक में मनुवादी सवर्ण मानसिकता के लोगों का बोलबाला है. आर्थिक रूप से सम्पन्न लोग गरीबों और मजदूरों का शोषण करते दिखते हैं. दिल्ली जैसे बड़े शहर में भी जातिगत भेदभाव की उपस्थिति को दर्शाया गया है. “वे आमने-सामने तो इन लोगों के साथ सम्मान से बातें करते, मगर उनका यह व्यवहार दिखावटी है. वे उनसे छुआछूत मानते हैं.”  दलित जाति के लोगाें को किराए पर घर न मिलने की समस्या पर काफी जोर दिया गया है. दिल्ली में महिमा के चाचा हों या महाराष्ट्र में धीरज कुमार, दोनों ही जगहों पर इस भेदभाव को महसूस किया गया है.


देश में कानून और आरक्षण व्यवस्था होने के बावजूद दलितों, पिछड़ों को रोजगार से महरूम रहना पड़ता है. “उनका (ब्राह्मणवादी) यथाशक्ति प्रयत्न यही रहता है कि संस्था के टीचिंग और नॉनटीचिंग सभी लोग ब्राह्मण ही हों मगर सरकारी कानून के रहते वे ऐसा नहीं कर सकते. किसी तरह छोटी-बड़ी चालाकी के साथ वे अपना प्रयोजन सिद्ध करते रहते हैं…..हर वर्ष यह बहाना दिखा दिया जाता है कि उचित कैन्डीडेट नहीं मिला.”  संविदा पर अपने उम्मीदवार रख लिए जाते हैं. ओबीसी के पद कुछ समय तक खाली रहने पर सामान्य में तब्दील कर दिए जाते हैं. इस प्रकार पिछड़ों और दलितों को नौकरियों से दूर रखा जाता है.

तुम्हें बदलना ही होगा’ उपन्यास में ज्ञान की शक्ति को महत्वपूर्ण बताया गया है. पढ़े-लिखे होने की वजह से ही महिमा अपने अधिकारों के प्रति जागरूक है. तभी तो वह शांति निकेतन महाविघालय प्रबन्धन की कोशिशों के बावजूद भी प्रोफेसर की नौकरी लेती है. धीरज कुमार अपने परिवार का पालन-पोषण करते हैं साथ ही दलित बच्चों को शिक्षित और जागरूक करते हैं.



चमनलाल जैसे पैसे और रूतबे वाले पुरुष वातानुकूलित कमरों में बैठकर महिलाओं की समस्या पर चर्चा करते हैं. आश्चर्य और विडम्बना यह है कि इस चर्चा में कोई स्त्री भाग नहीं लेती या उसे भाग नहीं लेने दिया जाता. पुरुष स्त्रियों की समस्याओं पर बात करते दिखते हैं किन्तु वे समस्याओं को अपने कार्यक्षेत्र के आधार पर परिभाषित करते हैं. कोई इतिहास पढ़ने पर नारी सबलीकरण की सम्भावना जताता है, कोई स्त्रियों को जलने से बचने के उपाय बताकर, कोई उनकी स्थिति सुधारकर, कोई वृक्षारोपण करके, कोई पुरुषों द्वारा अपनी बहन बेटियों की रक्षा करके उनको सबल बनाने की बात करता है.  तमाम गैर सरकारी संगठन महिला सशक्तिकरण के नाम पर सरकारी पैसा लेकर ऐशो आराम में खर्च करते हैं. खानापूर्ति के लिए मीटिंग करते हैं. इन मीटिंगों में महिलाएँ केवल खाने और पीने का इन्तजाम करती हैं. “घर की महिलाएँ, रसोईं और दावत की व्यवस्था संभालने में लगी हैं.”


लैंगिक सत्ता का बोलबाला पूरे उपन्यास में दिखता है. “जिनका पुत्र होता है, वे माता-पिता स्वर्ग ही जाते हैं.”  “लड़की का क्या है, उसे अपनी ससुराल ही जाना है. बाद में लड़के ही साथ रहेंगे.”  “लड़कियाँ ही हों, पुत्र न हों, तब उनका पति अपनी बेटियों और पत्नी की जिम्मेदारी भूलकर, पुत्र पाने के लिए दूसरा विवाह कर लेता है.”  लड़कों को लड़कियों से बेहतर मानने की प्रवृत्ति आज भी समाज में देखने को मिलती है. उपन्यास जहाँ उत्तर-आधुनिकता की बात करता है तो आज के समय में स्थिति पहले से बेहतर हुई है. सुशीला टाकभौरे ने केवल धीरज कुमार को महिलाओं के मुद्दे पर संवेदनशील दिखाया है और उसकी वजह उनका दलित होना दिखाया है. उन्होंने दलितों में मानवेतर गुण दिखाया है. ऐसा वास्तव में नहीं होता कि दलित पुरुष स्त्रियों का शोषण नहीं करता या उसके भीतर कोई बुराई नहीं होती. कौशल्या बैसन्त्री ने अपनी आत्मकथा दोहरा अभिशाप’ में यह दिखाया है कि कैसे दलित-स्त्री समाज में दलित होने की वजह से और घर के अन्दर स्त्री होने की वजह से शोषित है.


उपन्यास में यह दिखाने का प्रयत्न किया गया है कि सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था में जो बदलाव आये हैं वे जागरूकता से कम डर की वजह से ज्यादा है.आंबेडकर लोगों की नजरें, उनके (ब्राह्मणवादी) आस-पास मौजूद है. वे अब अपनी पहले की गलती दोहराने में डरने लगे हैं.”  गैर दलितों द्वारा दलितों के अधिकारों की वकालत करने पर सुशीला टाकभौरे इसे षड्यन्त्र की तरह देखती हैं. “शोषित वंचितों के बढ़ते आन्दोलनों को शांतिपूर्ण ढंग से रोकने के लिए, हम स्वयं उनके आंदोलनों का नेतृत्व करें. उन्हें अपने ढंग से समझाने-बहलाने के लिए उनके हित सम्बन्धी कार्यों को अपने हाथों सम्पन्न करें. इससे समाज की पुरानी व्यवस्था भी बनी रहेगी और हमारी समाज सेवा से हमारा सम्मान भी बढ़ेगा.”  हजारों वर्षों तक इसी तरह की चालाकियों से ठगे जाने के बाद इतनी जल्दी विश्वास नहीं पनप सकता. दलितों का यह अविश्वास फिर से ठगे जाने के भय से उत्पन्न हुआ है.
स्त्रियों के आन्दोलन के विषय में भी उनका विश्लेषण यही रहता है. पुरुषों के बहकावे में आकर “वे (स्त्रियाँ) अपने शुभचिन्तक पुरुष वर्ग के प्रति अति कृतज्ञता के साथ अति विनम्र बनती जा रही हैं.”  जिस तरह औरत के औरतपन को पुरुष जैविक रूप में और इसी तरह मानसिक रूप में नहीं लांघ सकता उसी तरह गैरदलित दलित के अनुभव संसार में जैविक ढंग से प्रवेश नहीं पा सकता.  स्त्री और दलित विमर्श का एक वर्ग हमदर्दी को संदेह की नजर से देखता है. धीरज कुमार को जातिगत भेदभाव झेलना पड़ता है. महिमा भारती स्त्री होने की वजह से लैंगिक भेदभाव का सामना तो करती ही हैं साथ ही दलित होने की वजह से सवर्ण स्त्रियों द्वारा भी शोषित होती हैं. महिमा के कॉलेज की महिला सहकर्मी उसे कहती है. “यह मायावती बहनजी की बहन, हमारे बीच रहकर, हमारी ही नाक काट रही है.”  वर्ण व्यवस्था को ईश्वर द्वारा बनाई बताकर उसे न बदलने की सिफारिश ब्राह्मणवादी लोग करते हैं. “ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र को अलग बताने वाली वर्ण व्यवस्था हमारे हिन्दू धर्म की पहचान है. इसे बदलने की बात क्यों की जा रही है.”  धर्मपालन की आड़ में ही ब्राह्मणवादी सामंती ताकतों ने दलितों के साथ अमानवीय व्यवहार किया, स्त्रियों को सती होने के लिए विवश किया.

तुम्हें बदलना ही होगा’ उपन्यास के शुरू में ही लेखिका ने दलितों की बदलती स्थिति का जिक्र किया है. उनके अनुसार “वर्णवादी पुराणपन्थी देश अब शिक्षा और वैज्ञानिक प्रगति से जुड़कर आधुनिक बनता जा रहा है. लोग पुराने रीति रिवाजों को बदलने और पुरानी रूढ़ियों, परम्पराओं को तोड़ने की बातें करने लगे हैं. वर्ण भेद और जाति भेद का विरोध करने के लिए दलित लोग सड़कों पर उतरने लगे हैं.”  प्रतिरोध के स्वर पूरे उपन्यास में जगह-जगह दिखाई देते हैं. कॉलेज के पद पर अन्य किसी का अप्वाइंटमेंट होने पर महिमा अपने दो साथियों के साथ मिलकर इस भेदभाव और अन्याय का विरोध करती है और कॉलेज प्रशासन को अपना फैसला बदलने पर मजबूर करती है. जाति के आधार पर पहचान कराये जाने पर महिमा कहती है, “मैडम, मेरा परिचय सिर्फ जाति से नहीं, मेरे व्यक्तित्व और कृतित्व से है.”  छात्र नेता बसन्त तिवारी ने धीरज को आन्दोलन न चलाने की धमकी दी तो धीरज ने विरोध किया और कहा. “तुम्हारी आर्थिक समानता का आन्दोलन तुम्हारे लिए है, हमारे लिए नहीं है. हमारी लड़ाई हमें स्वयं लड़नी है.”

सेनेटरी इंस्पेक्टर द्वारा अपने माता-पिता को शोषित होता देख धीरज ने उनसे नौकरी छुड़वा दी और उन्हें लेकर आपने साथ चला गया. चमनलाल के बहुत कहने पर भी महिमा अपनी नौकरी नहीं छोड़ती और अपनी आर्थिक स्वतन्त्रता पर कोई आँच नहीं आने देती. चमनलाल की लाख कोशिशों के बावजूद महिमा कमेटी की मीटिंग में आती है और अब तक चले आ रहे घूँघट करने के संस्कार को ठुकराते हुए पुरुषों की बेतुकी दलीलों का विरोध करती है.

सुशीला टाकभौरे ने उपन्यास में चरित्रों का निर्माण किया है. महिमा गरीब दलित घर की लड़की है जो अपने चाचा—चाची के साथ रहकर, कष्ट झेलते हुए अपनी शिक्षा पूरी करती है. बाहर उसे जातीय भेदभाव भुगतना पड़ता है जबकि घर के भीतर उसके चाचा—चाची उसका शोषण करते हैं, उससे घर के सारे काम करवाते हैं.  धीरज कुमार के बारे में बहुत विस्तार से न बताकर उनके पढ़ाई के दौरान और नौकरी के लिए भटकते वक्त हुए कष्टों को दिखाया है. दोनों ही चरित्रों के माध्यम से लेखिका ने यह दिखाने का प्रयत्न किया है कि अभावों में जीकर सफल होने वाले व्यक्ति के मन में अपने आस पास के अपने जैसे लोगों के प्रति सहानुभूति और कर्तव्य का भाव होता है. वे जिस जलालत से गुजरते हैं वे नहीं चाहते कि उनके जैसे और लोग भी वैसे ही कष्ट झेलें.


दोनों ही चरित्रों का कार्यक्षेत्र शिक्षा जगत रहा है. हालाँकि दोनों ने वापस अपने मूल निवास जाकर लोगों को अधिकारों और शिक्षा के प्रति जाग्रत किया. बड़े-बड़े शहरों में पढ़े लिखे लोगों द्वारा निचली जाति के गरीबों और स्त्रियों का शोषण होता दिखाया गया है. इन तमाम शोषण दमन एवं भेदभाव का दोनों ने प्रतिरोध किया और अपने अधिकारों को हासिल किया. उपन्यास के अन्त में लेखिका ने दोनों ही दलित पात्रों का विवाह सवर्ण से कराकर बाबा साहब अम्बेडकर के रोटी-बेटी के सम्बन्ध को साकार होता दिखाया है. अन्तर्जातीय विवाह को सामाजिक विषमता मिटाने के एक महत्वपूर्ण हथियार की तरह दिखाया गया है.

उपरोक्त सभी उत्तर-आधुनिक विशेषताओं के रहते हुए भी उपन्यास में समय का सहज प्रवाह नहीं दिखता. इसमें जीवन नहीं बल्कि विमर्श चलता है. बात—बात पर भाषणबाजी और नारेबाजी की गई है. घटनाओं को बेमतलब ही अतिनाटकीय बनाया गया है. जैसे “महिमा ने क्रोध से जलते हुए वाक्य-बाणों का निशाना साधते हुए हुंकार भरी. साथ ही अपने सिर को हल्का सा झटका दिया. एक ही झटके में उनका जूड़ा खुल गया और लम्बी बनी केश राशि उनके कन्धों और पीठ पर फैल गयी. महिमा के इस रौद्र रूप को देखकर उपस्थित लोग हर्षित हो गये. धीरज कुमार ने प्रसन्नता के साथ नारा लगाया नारी शक्ति जिन्दाबाद….नारी शक्ति आगे बढ़ो हम तुम्हारे साथ है….नारी सबलता जिन्दाबाद…..”  धीरज कुमार के विषय में सारी जानकारी होने के बाद भी चमनलाल धीरज की जाति कैसे नहीं पता लगा पाये, जबकि वे महाविघालय में ट्रस्टी भी है? शादी से पहले ही महिमा एक सक्रिय महिला थी. वह अपने अधिकारों के प्रति सजग थी. तो चमनलाल के साथ विवाह होने के पश्चात, चमनलाल के घर में अधिकार और सम्मान के लिए प्रतिरोध करने में इतना अधिक समय क्यों लग गया? हनुमान नगर और रघुजी नगर जैसे नाम पॉप कल्चर वाले मेट्रोपोलिटन शहरों में फिट न बैठने वाले लगते हैं.

लेखिका ने पूरे उपन्यास में सभी विपरीत विचारधारा वालों के बड़ी सहजता से हृदय परिवर्तन कराये हैं. दलितों को, स्त्रियों को उनके अधिकारों के लिए समझाने में महिमा या धीरज को ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी. एक या दो बार के समझाने पर ही लोगों ने उनकी बात मान ली. धर्म को लेकर या संस्कृति को लेकर जो आस्था लोगों के मन में होती है उसे बदलने में दशकों लग जाते हैं. जितनी आसानी से दलित पात्रों ने पाण्डे जी, शर्मा जी आदि को मारा-पीटा है और उनकी बेइज्जती की है वह वास्तविक जीवन में निहायत ही अस्वाभाविक और बनावटी लगता है.
चमनलाल और उनके पूरे परिवार का हृदय परिवर्तन होने के लिए महिमा और धीरज का भाषण ही काफी हो गया. जो सत्ता हजारों सालों से शोषण करती रही है. जिसको बदलने के लिए फुले, आंबेडकर आदि व्यक्तियों ने लम्बी लड़ाई लड़ी और वो लड़ाई आज भी जारी है. उसको बदलने में लेखिका ने बहुत जल्दबाजी दिखा दी. यह सहज, स्वाभाविक और वास्तविक नहीं लगता. उपन्यास की भाषा सरल एवं प्रवाहमयी है. जगह-जगह अंग्रेेजी के शब्दों का प्रयोग है जैसे पोस्ट, फ्लैट, अपार्टमेंट, टीचिंग, नॉनटीचिंग, कैन्डीडेट, मैनेजमेंट, ऑफिस, कॉलेज, टेन्डर, कैन्टीन, सर्वेन्ट, क्वार्टर, परमानेन्ट आदि.

बेटी संज्ञा : बहू सर्वनाम

सुधा अरोड़ा

सुधा अरोड़ा सुप्रसिद्ध कथाकार और विचारक हैं. सम्पर्क : 1702 , सॉलिटेअर , डेल्फी के सामने , हीरानंदानी गार्डेन्स , पवई , मुंबई – 400 076
फोन – 022 4005 7872 / 097574 94505 / 090043 87272.

” हमारी बिट्टो तो बहुत बढि़या खाना बनाती है , आप उंगलियां चाटते रह जाओ.बिट्टो के ऑफिस में सब उसकी बड़ी तारीफ करते हैं , मज़ाल है कि काम आधा छोड़कर उठ जाये ! कभी कभी तो दस बज जाते हैं ….. अभी सो रही है , एक इतवार ही तो मिलता है ज़रा देर तक सो लेती है.बड़े लाड़-प्यार में पली है हमारी बिट्टो ……”

” इसे तो चाय तक ढंग की बनानी नहीं आती.कभी फीकी तो कभी मीठी चाशनी ! … पता नहीं , इसकी मां ने क्या सिखाया है इसे ! आजकल तो सभी काम करती हैं पर काम करने का ये मतलब थोड़ी है कि रसोई दूसरा संभाले …इसे घर गिरस्ती चलानी नहीं आती … महारानी सो रही है अब तक …..”

यह पहचानना कतई मुश्किल नहीं है कि कौन सा संवाद किसके लिये कहा जा रहा है ! किसी दकि़यानूसी मध्यवर्गीय भारतीय परिवार में कभी आप जायें जहां एक ही उम्र की दो लड़कियां हैं – एक घर की बेटी है , जिसका एक नाम है और वह अपने नाम से बुलायी जाती है.दूसरी बहू है – नाम उसका भी है पर नाम होते हुए भी वह ‘यह-वह’ , ‘इस-उस’ के सर्वनाम से जानी जाती है.

एक औसत सास की त्रासदी ही यह है कि वह स्वयं जि़ंदगी भर स्त्री बनी रहती है पर सास बनते ही अपना  स्त्री होना भूल जाती है| जिस बात के लिये वह अपनी बेटी की तारीफ करती है , उसी के लिये उसकी बहू उपहास और निंदा का पात्र् बनती है.एक ही स्त्री अपनी बेटी को आधुनिकता और नयेपन को स्वीकारने की छूट देती है और बहू के रवैये के लिए उसकी लानत मलामत करती है ! जिन्हें अपना समय याद रहता है और जो अपने समय में हुई भूलों को दोहराना नहीं चाहतीं , वे अपनी बहू के प्रति न कभी अतार्किक होती हैं , न दुराग्रह पालती हैं क्योंकि अन्तत: एक स्त्री ही स्त्री की तकलीफ़ को ज़्यादा गहराई से महसूस कर सकती है.


ऐसी ही एक समझदार महिला को मैं कभी भूल नहीं सकती जो अपनी बहू प्रीति को लेकर हमारे सलाहकार केंद्र में आई थी.देखने में बेहद खूबसूरत प्रीति गरीब परिवार से थी.बेटे ने अपनी पसंद से उससे शादी की , लेकिन कुछ सालों बाद अपने ऑफिस की एक विधवा सहकर्मी से उसके संबंध बन गये.ऑफिस से लौटते ही वह एक रिंगमास्टर की तरह घर में घुसता और किसी न किसी बात पर चिल्लाने लगता.बेटे का आतंक पूरे घर को नरक बना रहा था.बच्चे दहशत से कांपने लगते.

आम तौर पर होता यह है कि एक स्त्री अपने पति के विवाहेतर संबंध से जीवन भर जितनी भी त्रस्त  रही हो , अपने बेटे के ऐसे संबंधों को उचित ठहराती है या फिर उस संबंध का दोष भी अपनी बहू के मत्थे मढ़ देती है” इसे ही अपने पति को बांधकर रखना नहीं आया वर्ना वह इधर उधर क्यों भागता , पहले तो मेरा बेटा ऐसा नहीं था.”

…… और यहां हमारे सामने एक ऐसी सास बैठी थी जो पूरी तरह अपनी बहू का साथ दे रही थी.उन दोनों की दुनिया एक कमाऊ पुरुष के ईद गिर्द घूम रही थी.आखिर हमारी सलाह पर उस बुज़ुर्ग महिला ने घर और दोनों बच्चों को संभाला और प्रीति को छोटे बच्चों की ट्रयूशन का काम करने दिया.अब कुछ पैसे भी घर में आने लगे और अपने पांव पर खड़े होते ही प्रीति का आत्मविश्वास बढ़ा और उसने हिंसा में पति के उठते हाथ को रोकना सीखा.आज भी प्रीति अपनी सास की बहुत एहसानमंद है जिसने उसकी जि़ंदगी में आये तूफान को झेलने का हौसला दिया.

अगर एक मां होने के साथ साथ आप सास के ओहदे पर भी हैं तो अपने संबोधनों और अपने व्यवहार पर ग़ौर करें ! जैसा रवैया आपका अपनी बेटी के प्रति है, वही बहू के प्रति रखें तो बहू भी बेटी सा ही सुलूक करेगी.ग़ौरतलब है कि आपकी बहू का भी एक नाम है ! वह भी किसी घर की संज्ञा रही है ! उसे सर्वनाम न बनायें.

नरसंहारों का स्त्रीपक्ष

संजीव चंदन

बिहार के जहानाबाद कोर्ट ने सेनारी नरसंहार (जहां सवर्ण जाति के लोग मारे गये थे) के मामले में अपना निर्णय सुनाया है. कई लोग आरोपी सिद्ध हुए हैं, उन्हें सजा भी सुना दी जाएगी. इधर बारा हत्याकांड (जहां 1992 में सवर्ण जाति के लोग मारे गये थे) के दोषियों को फांसी दिए जाने की तैयारी हो रही है. 2012 में बथानी टोला (जहां दलित जाति के लोग मारे गये थे ) के दोषियों को हाई कोर्ट ने आरोपमुक्त कर दिया था और हाईकोर्ट के निर्णय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील आज भी लंबित है. न्याय के इसी समाज शास्त्र के बीच नरसंहारों के स्त्रीपक्ष को समझने की कोशिश की है. यह आलेख नरसंहार प्रभावित गांवों में लोगों से मिलकर लिखा गया .

उसने आत्म हत्या कर ली. पति रणवीर सेना का एरिया कमांडर था, मारा गया. पत्नी दो बार अपने गाँव की मुखिया रही. निस्संदेह जीत में उसके पति के प्रति जातीय सहानुभूति का अहम रोल था, गाँव की अधिकतम आबादी रणवीर सेना के समर्थकों की थी, इसलिए जीती. तीसरी बार वह जीत नहीं पाई -उसने मौत को गले लगा लिया. हवा में उसके चरित्र को लेकर फुसफुसाहटें तैरने लगीं .


तब बथानी टोला के अभियुक्तों को आरोप मुक्त कर दिये जाने के बाद मैं बथानी टोला सहित नरसंहार प्रभावित गांवों के दौरे पर था- कैसा है जातीय तनाव का ग्राफ, प्रभावित परिवारों की महिलाओं और बच्चों का जीवन और मनोविज्ञान घटनाओं के दो दशक बाद कितना अलिप्त हो पाया है उन खौफनाक मंजरों से?

बारा जाते हुए उसकी आत्महत्या का पता चला,  रणवीर सेना के एरिया कमांडर की पत्नी की आत्महत्या, उसके ही एरिया में मेरा गाँव भी था. किशोर अवस्था में ही उसका पति रणवीर सेना का एरिया कमांडर था, तूती बोलती थी उसकी, लेकिन वास्तव में वह अपनी जाति के भू सामंतों का एक हथियार भर था और अंततः मारा गया. उसकी पत्नी उसकी जातीय अस्मिता और ‘जाति शहीद’ के दर्जे के कारण ही मुखिया बनी थी अपने ग्राम पंचायत की.

बिहार के भू सामंतों ने जिस जातीय अस्मिता के सहारे अपने साम्राज्य की रक्षा के लिए अंतिम प्रयास ‘निजी सेनाओं ‘ के सहारे किया था उसमें आर्थिक रूप से कमजोर जाति- युवा की आहुति दी गई थी,  भू सामंतों का बहुत थोड़ा दाँव पर था, संपत्ति का सबसे न्यूनतम हिस्सा. उसका पति भी एक वैसा ही युवक था, इन्हें न तो राजनीतिक दर्शन से संपन्न किया गया था और न कोई विशेष राजनीतिक लक्ष्य था उनके पास , लक्ष्य था तो सिर्फ जाति-भाइयों की हत्या का बदला.

बारा , जहाँ 1992 में यानी रणवीर सेना के गठन के चार साल पूर्व  ‘भूमिहार जाति ‘ के 33 लोग मारे गये थे, ने इस ‘जातीय अस्मिता’ को निजी सेना में बदलने का आधार बनाया. एम.सी.सी ने , जब इस गाँव में सामूहिक नरसंहार का निर्णय लिया होगा तो मुझे नहीं लगता कि वे सामन्तों के खिलाफ या जातिवाद के खिलाफ किसी कारवाई के तर्क से संचालित थे, अन्यथा एक वैसे गाँव में जहाँ एक भी बड़ी जोत का भू-सामंत नहीं था, हत्या की नृशंस कारवाई नहीं की गई होती या एक ही जाति (भूमिहार) के लोगों की हत्या नहीं की गई होती , गौरतलब है कि कुछ लोगों के प्राण सिर्फ इसलिए बख्श दिये गये थे कि वे ब्राहमण जाति के थे.

बथानी टोला के बाद बारा अगला गाँव था, जहाँ हम चिलचिलाती गर्मी की दोपहर में पहुंचे. 20 सालों बाद गांव उस खौफनाक मंजर को भूल चुका है, कुछ लोग अपने ‘दालानों’ में दोपहर की नींद ले रहे थे, कुछ लोग एक ‘दालान’ में ताश खेल रहे थे. उन लोंगों में एक ऐसा भी शख्स था, जिसके गले पर हथियार से हमले की निशानियाँ थीं, उसे मरा हुआ समझकर छोड़ दिया गया था, लेकिन वह बच निकला. पास में एक बुजुर्ग लेटे थे -‘ बुद्धन’ उनकी जान इस लिए बख्सी गई थी कि वे उन लोगों के साथ खड़े हो गए थे, जिनको मारने वालों ने ब्राहमण माना था, हालांकि वे भूमिहार थे. उनके दो जवान बेटे मार दिए गए थे. इस खेतिहर गाँव के हत्याकांड ने जाति आधारित गोलबंदी और रणवीर सेना के गठन  के लिए सामंत भूमिपतियों को तर्क दे दिए. बारा आज भी इस गोलबंदी का प्रतीक है. इस जाति के नेता इस हकीकत को समझाते हैं, इसीलिए इस गाँव को वे जाति -स्मृतियों में जिन्दा रखना चाहते हैं. कुछ माह पूर्व ही भाजपा नेता सी .पी.ठाकुर ने इस गाँव का दौरा किया था.

मारे गए लोगों के एक-एक आश्रितों को बिहार सरकार ने नौकरी दी थी. हालांकि 11 लोगों के उपर किसी को आश्रित नहीं माना गया. बदले में मिली नौकरी ही मारे गए लोगों की विधवाओं के लिए जीवन का आधार बना अन्यथा आमतौर पर सवर्ण विधवाओं की जिन्दगी आज भी उतना ही जटिल है, जितना 19 वीं शताब्दी में हुआ करती थी, जब ब्राह्मणवाद के प्रखर विरोधी चिन्तक महात्मा फुले ने ‘ब्राहमण विधवाओं’ के लिए पहला विधवा आश्रम खोला. यह अंतर साफ़ दिखता भी है कि बगल के ‘बरसिमहा’ नरसंहार ( बारा के पूर्व) में मारे गए दलित परिवार के व्यक्ति की विधवा ने अपनी ही जाति में दूसरी शादी कर ली, उसका भरा -पूरा घर है और पूर्व पति की हत्या के बाद मिली नौकरी से आर्थिक संबल भी. वही बारा की तीन विधवाओं में से, जिनसे मैं मिला या जिनके विषय में मैं जान सका, एक ने शादी कर ली थी, शेष दो अपने मरहूम पति के परिवार के साथ थीं. उनमें से दो हत्याकांड के दौरान तुरत व्याही गई थीं, कोई बच्चा नहीं था, एक को एक बेटा और एक बेटी थी. एक ने नौकरी के बाद बारा में ही रहना पसंद किया, अपने पति के छोटे भाई से अपनी छोटी बहन की शादी करवा दी और ससुराल के परिवार की देख-भाल करती है, दूसरी दूसरी शादी के बाद बारा से चली गई. बारा जाने के पूर्व टेकारी में जब मैं दो बच्चों की माँ यानी तीसरी महिला से मिला, तो उसके बच्चे, खासकर बेटी कुछ भी बात करने से मना करती रही. बेटी, जिसकी हाल में शादी हुई है, हमें अपनी माँ से बिना मिले चले जाने को कह रही थी. दरवाजे तक माँ के आ जाने से वह निरुत्तर हो गई. माँ की आँखे बात करते हुए भर आ रही थीं. माँ, जो पति की हत्या के बाद स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत हुई,  के लिए 20 साल पुराना मंजर उसके वजूद से जुड़ा है , जबकि बेटी ने तब ठीक से अपने पिता की उंगलियाँ भी नहीं थामी होगी.

बिहार के गांवों में उन नरसंहारों के जेंडर पक्ष यही हैं, पीड़ित महिलाएं अपनी जाति की पीड़ा की प्रतीक हो गईं, उनपर इन नरसंहारों के स्थाई प्रभाव हुए, उनका निजी छिन गया. इस निजता के खंड के ऊपर जो सामूहिक जातीय गोलबंदी हुई, वहां भी अपने पति के साथ उनका निजी कुछ नहीं रहा. एरिया कमांडर की पत्नी, उसकी हत्या के बाद जातीय अस्मिता की सामूहिक प्रतीक रही, और जिस दिन वह सार्वजनिक जीवन से छूटी उस दिन उसने इस दुनिया को छोड़ जाने का निर्णय ले लिया.

बथानी टोला के सन्दर्भ से मैंने पहले लिखा था कि किस प्रकार सवर्णों का वर्चस्व पुनः कायम हुआ है और यह भी कि बिहार में नरसंहारों के कई दशक के बाद शांति तो है, लेकिन जातीय तनाव में कोई कमी नहीं आई है- इस तनाव के रूप बदले हैं. सरकार जहाँ महादलित के नाम पर ‘दलित अस्मिता’ के टुकडे कर रही है वहीँ सवर्ण सामजिक आर्थिक राजनीतिक वर्चस्व की पुनर्वापसी कर रहे हैं. हालांकि ‘राज्य’ की भूमिका, और भागीदारी के सिद्धांत के अनुपालन से सवर्ण मानस ज्यादा आतंकित होता है, हथियारों की तुलना में . संवादों, तर्कों और प्रयासों में आरक्षण के माध्यम से दलित -पिछड़ा भागीदारी के खिलाफ सवर्ण झुंझलाहट स्पष्ट है, जबकि बरसिम्हा जैसे गांवों में रह रहे दलित जीने की जद्दो-जहद कर रहे हैं.

मेरी दिलचस्पी रणवीर सेना के कुछ ज्ञात -अज्ञात कमांडरों का वर्तमान जानने में भी थी . मेरे साथ भूमिहार जाति से ही एक युवा नेता और स्थानीय पत्रकार थे, दोनों ही राजीव रंजन. उनके कुछ रिश्तेदार सेना के दिनों में क्षेत्र में  ख्यात -कुख्यात भी रहे थे. उनमे से कोई स्वास्थ्य विभाग में अपने मारे गये किसी रिश्तेदार की अनुकम्पा पर नौकरी कर रहा है, कोई छोटा-मोटा लूट -मार करता हुआ फटेहाल है. एक की हत्या और उसकी पत्नी की दुखद आत्महत्या का जिक्र मैंने किया ही. इनकी  जाति के भू-सामंत वर्चस्व के नए समीकरणों के साथ वापस हुए हैं. एक बात और कि बारा में हमारी अगुआई करने वाला युवा नरसंहार के दिन 8-10 साल का छोटा लड़का था, उसके अनुसार उन्होंने बच्चों और महिलाओं को टार्गेट नहीं किया था, उसे जरूर दो-नाली (बन्दूक) दिखाकर उसके घर में होने या न होने की तफ्तीश की गई थी, जबकि बथानी टोला में तीन माह की बच्ची समेत कई बच्चे मारे गये थे.

जयभीम वाला दूल्हा चाहिए

शर्मिला रेगे की किताब  ‘अगेंस्ट द मैडनेस ऑफ़ मनु : बी आर आम्बेडकर्स राइटिंग ऑन ब्रैहम्निकल  पैट्रीआर्की’की भूमिका का अनुवाद हम धारावाहिक प्रकाशित कर रहे हैं. मूल अंग्रेजी से अनुवाद डा. अनुपमा गुप्ता  ने  किया है.  इस किताब को स्त्रीकाल द्वारा  सावित्रीबाई  फुले  वैचारिकी  सम्मान, 2015 से  सम्मानित किया  गया  था. 





1990 के वर्षां में आंबेडकर तथा स्त्री मुक्ति पर विभिन्न विचारों को रखने वाली कई पुस्तिकायें, स्मारिकायें और पत्रिकायें प्रचलन में थी. उदाहरण के लिये, प्रतिमा परदेशी द्वारा लिखित ‘डा. आंबेडकर और स्त्रीमुक्ति’ (मराठी ) की बात करें, जो इस विषय पर विस्तार में लिखी छपी पहली पुस्तिकाओं में से थी. इसकी शुरूआत में आंबेडकर के इस विषय पर भाषणों व लेखों को  स्त्रीवादियों, संगठित वामपंथियों तथा दलित राजनीतिक दलों द्वारा नजरअंदाज किये जाने के कारणों के बारे में चर्चा की गयी.


जन्मशती (1990) वर्ष  में डा. आंबेडकर के कुछ अल्पज्ञात या अनदेखी किये गये कार्यो-विचारों पर कुछ चर्चा हुई अर्थव्यवस्था व मुस्लिम समुदाय पर उनका मत सामने लाया गया, लेकिन स्त्री मुक्ति पर उनके विचार फिर भी अंधेरे में ही रहे. आज जब हम नई शताब्दी के मुहाने पर खड़े हुए हैं और जब सामाजिक न्याय के लिये संघर्ष का स्वरूप अहम हो गया है तो इस वक्त उस व्यक्ति के विचार नजरअंदाज नहीं किये जा सकते, जो स्त्रियों के मुददों पर सबसे मुख्य रहा, यहां तक कि जिसने हिन्दू कोड बिल के मामले पर कानून मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. सच  यह है  कि इस  विषय में मौन एक षडयंत्र जैसा लगता है और इसके कारणों की तह में जाना ही चाहिये.

(पढ़ें : डा. भीमराव आंबेडकर के स्त्रीवादी सरोकारों की ओर)

अरूण शौरी की पुस्तक ‘झूठे ईश्वर की उपासना ( Worshiping a false God) में प्रस्तुत तर्कों के विपक्ष में जाने माने इतिहासकार वाय.डी. फड़के ने अपने विचार रखे और गौतम शिन्दे की पुस्तिका ‘भारत में स्त्री क्रांति व मुक्ति’ में फड़के का समर्थन किया गया . फड़के ने यह भी कहा कि बुद्व के स्त्रियों के बारे में विचारों को भी अक्सर गलत समझा जाता है और बताया कि विद्वानों को आंबेडकर के लेख ‘हिन्दू स्त्रियों का उत्थान व पतन’ क्यों और किस तरह पढ़ना चाहिए. शिन्दे की पुस्तिका में इसका भी उल्लेख मिलता है. कुछ लेखकों ने उल्लेख किया है कि वाइसराय की कार्यकारिणी समिति (1942-46) के सदस्य के रूप में आंबेडकर ने खदान प्रभूति लाभ कानून जैसे विधेयक बनाने में काफी श्रम किया. समान मेहनताना, कोयला खदान कर्मचारी कल्याण कोष में स्त्रियों का प्रतिनिधित्व , समान नागरिकता, स्त्री का आर्थिक विकास पर हक जैसे मुद्दों पर अम्बेडकर का जोर देना भारत में स्त्री आंदोलन के लिये काफी अहम माना जाना चाहिए. इस  नजरिये से देखें तो हिन्दू कोड बिल को स्त्री मुक्ति का घोषणापत्र माना जाना चाहिए और इस बिल को संशोधित करने के षडयंत्रकारी  प्रयासों के कारण उनका कानून मंत्री के पद से इस्तीफा इतिहास में अभूतपूर्व माना जाना चाहिए.



कुछ पुस्तिकाओं में आंबेडकर द्वारा बुद्व की विरासत को स्त्री मुक्ति के लिये पुनर्जीवित करने के कार्य को खास तौर पर प्रशंसनीय माना गया है. इसी तरह सती, बाल विवाह तथा देवदासी प्रथा के जरिये वेश्यावृत्ति को संस्थागत बनाने जैसी ब्राह्मण  प्रथाओें के खिलाफ उनकी आलोचना को भारत में स्त्रियों के खिलाफ हिंसा पर पहले वक्तव्यों  में से एक माना गया है. इनमें से ज्यादातर लेखकों ने इस बात पर जोर दिया है कि स्त्रीमुक्ति पर आंबेडकरका सैद्धान्तिक दृष्टिकोण किस तरह स्त्री आंदोलन के कई अभियानों की नीव बना. वे महाड़ सत्याग्रह (मार्च 1927) में स्त्रियों के लिये दिये गये आंबेडकर के सम्बोधन का हवाला देते हैं. इन्डिपेन्डेन्ट लेबर पार्टी की महिला सभाओं द्वारा दलित स्त्रियों के राजनीतिक जागरण का जिक्र करते हैं और 1942 में दलित महिला फेडरेशन की स्थापना का उल्लेख करते हैं. परदेशी की पुस्तिका में आंबेडकर के 1916 में लिखे ‘भारत में जातियां’ लेख का विस्तृत विवेचन किया गया है, जिसमें आंबेडकर तर्क देते हैं कि स्त्रियों की दोयम अवस्था  का प्रवेश द्वार थी जाति व्यवस्था,  जिसने स्त्रियों के शोषण का ढांचा तैयार किया. पुस्तिका यह भी स्पष्ट करती है कि हिन्दू केड बिल जाति-आधारित पितृसत्तात्मक  ढांचे के लिये चुनौती क्यों था? आंबेडकरी  समुदायों की यह पुस्तिका संस्कृति  आंबेडकर के मुख्यधारा से अलग लेखन और उद्बोधनों को प्रकाश में लाकर उनके स्त्रीवाद पर दावे को  पुन: स्थापित करती है.

(पढ़ें :पीड़ाजन्य अनुभव और डा. आंबेडकर का स्त्रीवाद)


ये पुस्तिकायें, जहां आंबेडकर के स्त्रीमुक्ति में योगदान के उपयुक्त आलोचानात्मक पहलुओं को लेकर जोश में आती हैं. वही गायन पार्टियां उनके सामाजिक स्वप्न का पक्ष सामने रखती हे. आंबेडकरी पचांग के उत्सवों में उनके बिक्री स्टाॅल संख्या में दूसरे स्थान पर होते हैं. इन पार्टियों का संगीत क्षेत्र या पीढ़ियों के भेदभाव से परे होता है, जब तक कि गीत में ही नाम उल्लेखित न हो या गीतकार की शैली बहुत पहचानी हुई न हो. 1920 में स्थानीय स्तर पर बने सस्ते कैसेट्स ने इन गीतों की पहुंच का दायरा काफी बढ़ा दिया और ज्यादा लोग ऐसी गायन पार्टियां बनाने के लिये प्रेरित हुए,  जिससे गीतों की संख्या व संगीत की विविधता में बहुत इजाफा हुआ. कई स्त्री गायिकायें और उनके संगीत दल, मंचीय प्रस्तुतियों की लोकप्रियता को कोई नुकसान पहुंचाये बिना अपना स्थान बना पाये. आधुनिक भारतीय इतिहास (खासकर 1932 का पूना समझौता) की घटनाओं को अपनी दृष्टि से देखना आंबेडकर के नित्यप्रति के जीवन का संघर्ष,  सामाजिक राजनीतिक आंदोलन इन रचनाओं के मुख्य विषय हुआ करते हैं.

वर्ष 2000 से नयी रचनायें जैसे ‘मनुस्मृति की होली’ भी अस्तित्व में आई. गीतकारों व गायकों में स्त्रियों का प्रतिनिधित्व और बढ़ गया तथा 25 दिसंबर को महाराष्ट्र के विभिन्न भागों में स्त्री-मुक्ति दिवस के रूप में मनाने का प्रचलन भी बढ़ा. कुछ अन्य रचनाये हैं जैसे ‘जयभीम वाला दूल्हा चाहिए’ जिसमें स्त्रियां आंबेडकर से पूछती हैं कि पति को एक सच्चे आंबेडकरी पति के रूप में कैसे बदला जाये, बुद्ध महिला गीत, जिसमें सच्ची आंबेडकरी, यानि जयभीम वाली नारी का वर्णन किया गया है तथा ‘भीमवाड़ी’ का उल्लेख है जो आंबेडकरी स्त्रियों का स्वर्ग है यानि समता पर आधारित एक बस्ती.

कभी-कभी इन गीतों के अर्थ अलग-अलग और दुविधा भरे भी होते  हैं. उदाहरण के लिये कुछ में हिन्दू प्रतीकों जैसे कुमकुम का तिलक, जेण्डरीकृत संहितायें और आदर्श आंबेडकरी स्त्री की परिभाषा में नियंत्रण की भरमार. आंबेडकरी संगीत को ये पीढ़ियां एक जटिल अध्ययन का विषय हैं,  और इन्हें सिर्फ राजनीतिक या बाजारी हथकंडा मान कर खारिज नहीं किया जा सकता. इन कुछ सरलीकरण किये हुए द्वैतों जैसे भावुक/तर्कसंगत, हथकंडे/अभिव्यक्ति को दलित अभियानों पर शोध में बार-बार लाया गया है और मराठी मध्यम वर्ग में फैली उस सामान्य समझ में भी इन्हें देखा जा सकता है , जो इन पुस्तिकाओं व संगीत को रूढ़िवादी और अंध भक्ति का नाम देती है. ये समझ के साथ बदलते हुए स्रोत अकादमिया द्वारा अपेक्षाकृत अनदेखे ही किये जाते रहे हैं,  जैसा कि पहले कहा गया, ये स्रोत जाति-विरोधी  स्त्रीवाद को आंबेडकरी प्रति समुदायों में स्थापित करते हैं. दलित सामूहिक आंदोलनोें पर सच्चे शोध के लिये उन आसान निष्कर्षों से परे जाना होगा जो आंबेडकरी को मात्र भावात्क प्रतीक मान लेने पर ही खत्म हो जाते हैं. असल में इन भावनाओं को खंगालना होगा, व्यैक्तिक और सामूहिक भावनाओं को  अधिक गंभीरता से जांचना होगा. सामूहिक कल्पना चित्रों जैसे जय भीम वाली नारी (आंबेडकरी स्त्री) और भीमवाड़ी (आंबेडकरी यूरोपिया) के भावार्थों का अनुवाद और अधिक गहराई में जाकर करना होगा. फिलहाल यह याद रखना जरूरी है कि आंबेडकर का स्त्रीवाद पर दावा किन्हीं अकादमिक क्षेत्रों से नहीं बल्कि इन्हीं अपारम्परिक स्रोतों से शुरू हुआ था. अब इस प्रकाशित सामग्री व संगीत संस्कृति से दिशाज्ञान लेकर हम आंबेडकर के कुछ खास स्त्रीवादी लेखों से परिचित होंगे.

(पढ़ें : आंबेडकरी गीतों में रमाबाई और भीमराव आंबेडकर )

स्त्रीवादियों के लिये महत्वपूर्ण लेखन

स्त्रीवादी विद्वान उमा चक्रवर्ती के अनुसार मंडल आंदोलन के बाद दो भिन्न दिशाओं में छिटक गये सिद्वांतों से पहचान का मौका था-जात के मुद्दे पर समाजवादी अवधारणा तथा जेण्डर के मुद्दे पर स्त्रीवादी अवधारणा. उनके अनुसार शहरी भागों में जाति पर चर्चा ने बौद्विक रास्ता पकड़ा और जाति व्यवस्था को समझाने की बजाये उसे परदे मेें छुपा दिया. इस संदर्भ में चक्रवर्ती का साफ इरादा जाति के स्त्रीवादी विश्लेषण को आगे बढ़ाने का है और वे आंबेडकर के उस फाॅर्मूले को स्थापित करना चाहती है , जिसमें वे जाति को श्रेणीबद्व असमताओं का एक तंत्र मानते हैं. यह फार्मूला ब्राम्हणी पितृसत्ता की ऐतिहासिक संरचना की व्याख्या करने के लिये उनका आधार बनता है. साथ ही जाति व जेण्डर के बीच देशव्यापी गठजोड़ को भी वे साफ देख पाते हैं.

अब मैं जातिमुखी पितृसत्ता की संरचना और स्त्रीवादी अवधारणा के बारे में आंबेडकर के लेखन महत्व को और विस्तार देना चाहती हूं.आंबेडकर के  लेखन का विशाल भंडार और गहराई उसके भीतर दिखती निरन्तरता लेखों के चयन को मुश्किल बना देेते हैं. मेरा चयन कुछ पक्षपात वाला है क्योंकि इतने महती साहित्य के साथ जुड़ने में मेरी क्षमता सीमित है. साथ ही यह संचयन आय रूप से उन लेखों को प्रकाश में लाने के लिये है जो जाति जेण्डर गठजोड़ पर है और इसलिये ब्राम्हणी पितृसत्ता पर स्त्रीवादी आदर्श लेखों के रूप में लिये जा सकते हैं. इस दौरान मैने आंबेडकर के मराठी व अंगे्रजी में दिये गये भाषणों और लेखों का भी उल्लेख किया है,  जो ‘डा. बाबा साहेब अम्बेडकर लेख व भाषण, खण्ड 17 भाग तीन’ से लिये गये हैं.

ये लेख तीन भागों में व्यवस्थित किये गये हैं हर एक हिस्से में प्रासंगिक परिचय संक्षिप्त वितरण व विवेचन है, जो आंबेडकर  की पितृसत्ता के बारे में समझ के विभिन्न आयाम दिखते हैं. पहले भाग जाति यानि राजतीय विवाह, जाति और स्त्रियों पर हिंसा में अटूट संबंध’’ में दो लेख है-‘भारत में जातियां, उनका जन्म, विकास तथा कार्य तंत्र’ (BAWS
VOl 17, Part 2) तथा हिंदू स्त्री का उत्थान व पतन (BAWS VOl 17, Part 2) . पहले लेख में जाति को सजातीय विवाहों के संदर्भ में व्यास्थापित किया गया है, जिसमें जाति और स्त्रीदमन में गठजोड़ को समझा जा सके. दूसरे लेख में भारत के इतिहास के उपनिवेशी व राष्ट्रवादी पाठ्यान्तरों की पड़ताल की गई है और वैदिक युग को स्त्रियों के लिये स्वर्णिम काल माने जाने वाले मिथक को नकारा गया है.
दूसरे भाग ‘मनु का मतिभ्रंश स्त्रियों के खिलाफ श्रेणीबद्ध हिंसा की पहेली का खुलासा’ में दो ऐसे खुलासे पर चर्चा और कुछ संक्षिप्तीकरण है. ये है पहले नं. 18 मनु का मतिभ्रंश या संकर जातियों के माध्यम की ब्राह्मणवादी व्याख्या (BAWS
VOl 4, 215-25) तथा पहले नं. 19 पितृत्व से मातृत्व की ओर सक्रमण ब्राह्मण  इससे क्या पान चाहते थे? (BAWS
VOl 4, 226-32)  और और विवादित राम व ‘कंश व कृष्णा की पहेली’ के कुछ अंश (BAWS.VOL.4.appendisI,323-43) . इस भाग के लेख ‘स्त्री और प्रतिशील ’ (BAWS.VOL.3.429-37) मेें भी संदर्भित है तथा हिन्दू स्त्री का उत्थान व पतन लेख के आखिरी हिस्से के रूप् मेंभी छपे हैं.  आंबेडकर की पहेलियों को पढ़ना मैं समझती हूं, ब्राम्हणी पितृसत्ता की जेण्डरीकृत हिंसा के उस श्रेणीवद्व चरित्र को बेनकाब करताहै,  जिसके द्वारा जाति- व्यवस्था की संरचना की बरकरार रखा जा सका.

आखिरी भाग ‘हिन्दू कोड बिल पर संसदीय बहसों और आंबेडकर  के इस्तीफे के बारे में है. हिन्दू कोड बिल पर सभी चर्चाओं को एक साथ रखता है. ’ (BAWS.VOL.4.Part
16, 4-12, 267-81) तथा मंत्रिमण्डल से इस्तीफा देते हुए डा. अम्बेडकर के भाषण के अंश प्रस्तुत करता है. (BAWS.VOL.14 भाग दो , 137-27) . यह भाग विधेयक की तीन प्रकार से जांच पड़ताल करता है. पहले यह विधेयक को आंबेडकर  के निजी जीवन के लोकतंत्रीकरण के प्रस्ताव के रूप में देखता है. दूसरे यह विधेयक के पक्ष में आंबेडकर की सार्थक दलीलों को पेश करता है, जिसे बाद में ‘अबधित स्वतंत्रता’ के उनके लक्ष्य का नाम दिया गया. अंत में यह विधेयक के विरोध को रेखांकित करता है और इस  रूढ़िवादी विपक्ष को लोकतांत्रिक करार को रद्द करने वाले की तरह देखता है.

अंत में 1927 में दलित स्त्रियों के ऐतिहासिक सम्मेलन में अपने उद्बोधन में आंबेडकर ने पूछा था,
‘‘यहां सभा में बैठी’’ कायस्थ व अन्य सवर्ण महिलाओं के बच्चों और हममें क्या कोई फर्क है? आपको सोचना होगा और इस वास्तविकता को जानना होगा कि आप भी एक ब्राह्मण  स्त्री की पाकीजगी और चरित्र रखती हैं. बल्कि जो साहस और कुछ कर दिखाने की इच्छा आप में है, वह उनमें भी नहीं है. फिर आपके बच्चों का अपमान क्यों होना चाहिए? आपने इस बारे में कभी सोचाा ही नहीं वरना आप एक सत्याग्रह खड़ा कर चुकी होती….

(पढ़ें: आंबेडकर की राजनीतिक छवि का स्त्रीवादी नकार )

आंबेडकर के उस उद्बोधन के बाद काफी कुछ घटित हो चुका है. आंबेडकर के शब्दों पर  बहस खड़ी करने से आगे बढ़कर राजनीति-दीक्षित दलित स्त्रियों ने बहुत कुछ कर दिखाया है. बाबा साहेब की वफादार बेटियों के रूप में दलित स्त्री वादियों ने ब्रम्हण स्त्रीवाद के खिलाफ विद्रोह का लंबा सफर तय किया है और जाति-विरोधी राजनीति की दिशा का संकेत दिया है. ऐसा करते हुए, उन्होंने स्त्रीवाद तथा जाति विरोधी रानजीति के कई संभावित भविष्यों की राह खोली है. आंबेडकर की स्त्रीवादी विरासत का दलित पुरूषों व गैर दलित स्त्रीवादियों द्वारा संपूर्ण दोहन किया जाना अभी बाकी है. यह पुस्तक इसी  दिशा में एक गैर दलित स्त्रीवादी का विनम्र प्रयास है.

ताकि बलात्कार पीड़िताओं को बार –बार बलात्कार से न गुजरना पड़े

संजीव चंदन

बलात्कार पीडिताओं को लेकर भारतीय समाज अजीब मर्दवादी मानसिकता में जीता है. अभी कल ही खबर आई कि बलात्कार पीडिता को उसके बलात्कारी के साथ शादी करवा दी गई और वह शादी के 7 महीने के भीतर आत्महत्या को विवश हो गई- मर गई. यह उसके खिलाफ यौन हिंसा को गैरजिम्मेवार तरीके से डील करने से हुआ- उसकी ह्त्या का दोषी समाज और उसकी मानसिकता है, वह शादी के बाद रोज -रोज बलात्कृत होती होगी. इस समाज कि यह कैजुअल सोच बलात्कार की घटनाओं के बाद पीडिता को न्याय दिलाने वाली एजेंसियों के रवैये में भी दिखता है . चिकित्सा, जांच और न्याय एजेंसी के  इस रवैये के खिलाफ महाराष्ट्र के एक डाक्टर ने मुहीम छेड़ रखी थी और इस पर उन्हें बहुत हद तक सफलता भी मिली है . 

 महिलाओं के प्रति असंवेदनशील व्यवस्था को बदलने की मुहीम में महाराष्ट्र के वर्धा में महात्मा गांधी इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल सायन्सेज ( एम जी आई एम एस ) के फोरेंसिक विभाग में कार्यरत डाक्टर इन्द्रजीत खांडेकर  ने कई बड़े बदलावों को अंजाम दिये, उनमें बलात्कार पीडिताओं के फिंगर टेस्ट को बंद करवाने से लेकर गैरकानूनी सवालों के दायरे में उसकी जांच को बंद करवाने जैसे बदलाव शामिल हैं. जेंडर जस्ट न्याय और चिकित्सा के लिए संघर्षरत इस डाक्टर की पहलों से आये बदलाव पर एक विशेष रिपोर्ट . 


अमानवीय फिंगर टेस्ट का खात्मा 


डाक्टर खांडेकर ने कई पन्नों में फैले अपने अध्ययन के आधार पर यह स्थापित किया कि यौन हमलों की शिकार महिलाओं को जांच के नाम पर काफी अमानवीय प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है. बिना किसी फोरेंसिक फॉरमेट के उनकी जांच होती है . उन्होंने इसके लिए केंद्र और महाराष्ट्र सरकार से पत्राचार किये , जो शुरू में बिना जवाब के पड़े रहे . 2010  में डा. खांडेकर के अध्ययन के आधार पर फ़ॉर्मेट बनाने के लिए एक जनहित याचिका बॉम्बे उच्च न्यायालय के नागपुर खंडपीठ  में डा. रंजना पारधी और एडवोकेट विजय पटाइत ने किये .

(पढ़ें : बलात्कार बलात्कार में फर्क होता है साहेब )

डा खांडेकर  की सबसे बड़ी आपत्ति यौन हमलों की शिकार महिलाओं के फिंगर टेस्ट पर थी , जो उनके अनुसार दोहरी यातना से गुजरने जैसा था. फिंगर टेस्ट पीडिता की योनी में दो ऊँगल डालकर की जाती है. इस पी आई एल में केंद्र सरकार का रवैया काफी टाल-मटोल वाला रहा . उसने कोर्ट में अपने एफीडेविट में कहा कि महाराष्ट्र सरकार जो भी फॉरमेट बनायेगी, वह केंद्र सरकार मान लेगी. इस एफीडेविट के पूर्व राज्य और केंद्र सरकार जो फॉरमेट लेकर कोर्ट में आई उसमें ‘ फिंगर टेस्ट’ शामिल था. डा खांडेकर और याचिकाकर्ताओं की आपत्ति के बाद महाराष्ट्र सरकार मई , 2013 में डा खांडेकर की सहमति से जांच का फॉरमेट लेकर आई, जिसमें फिंगर टेस्ट न सिर्फ ख़त्म किया गया था बल्कि कई स्त्री के पक्ष में कालम बनाये गये थे  , जिससे पीडिता को न्याय मिले. केन्द्रीय स्तर पर डिपार्टमेंट ऑफ़ हेल्थ रीसर्च  (DHR) ,  इन्डियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रीसर्च ने एक समिति बनाई , जिसमे डाक्टर खांडेकर को भी शामिल किया गया . निर्भया काण्ड (दिल्ली गैंग रेप) की पहली बरसी (2013) पर इस समिति का फ़ॉरमेट लागू किया गया, लेकिन जल्द ही केंद्र सरकार का स्वास्थ्य मंत्रालय मार्च, 2014 में अपने फोर्मेट लेकर आई . डा खांडेकर कहते हैं कि ‘दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस नये फॉरमेट में सैम्पलिंग की प्रक्रिया गायब है.’ दरअसल पीडिता के कपड़ों, खून आदि के साथ 15-20 चीजें सैम्पल के तौर पर ली जाती हैं , जिसकी अभियुक्तों को सजा दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका होती है .

आज भी पूछे जाते हैं अपमानजनक सवाल 
बलात्कार के बाद सबसे कठिन लड़ाई होती है, दोषियों को सजा दिलवाने की . पुलिस डाक्टरों से पीडिता की जांच के लिए तीन अपमानजनक और स्त्रीविरोधी सवाल पूछती है. 1.. क्या पीडिता यौन सम्बन्ध की आदि है ? 2. बलात्कार हुआ या नहीं?  3. पीडिता यौन संबंध में सक्षम है या नहीं? डा खांडेकर ने 2011 में पुलिस की यह पद्धति हटाने के लिए महाराष्ट्र और केंद्र, दोनो सरकारों को लिखा. सितम्बर 2013 में महाराष्ट्र सरकार ने एक आदेश के माध्यम से जांच के लिए नये सवाल डा खांडेकर की  सलाह पर बनाये. नये नियम के अनुसार पुलिस अब चार सवाल सम्बंधित डाक्टर से पूछती है : 1. क्या पीडिता के साथ हाल में कोई  बलपूर्वक यौन संबंध बनाया गया है ? 2. पीडिता के ऊपर कितने , कैसे और कहाँ जख्म हुए हैं ? 3. क्या कोई बाहरी वस्तु, जैसे, बाल, खून या वीर्य पीडिता के शरीर पर पाये गये हैं ? 4 . पीडिता से जरूरी सैम्पल जैसे, कपडे, खून आदि .

( पढ़ें: यौन हिंसा और न्याय की मर्दवादी भाषा )

हालांकि केंद्र सरकार ने इसपर आज भी चुप्पी बनाये रखी है और देश के दूसरे राज्यों में तथा केन्द्रीय जांच एजेंसियों के बीच सवालों का पुराना पैटर्न बदस्तूर जारी है. सुप्रीम कोर्ट के वकील अरविंद जैन कहते हैं, ‘ यह रवैया न सिर्फ केंद्र सरकार की पुरुषवादी प्रवृत्ति के कारण उस तक ही सीमित है बल्कि उच्चतम न्यायालय में भी यह कई मामलों में सामने आता रहता है . एविडेंस एक्ट 1944 से पीडिता की  यौन संबंध की आदत  वाले सवाल 1994 में ही ख़त्म कर दिये गये थे , लेकिन आज भी कई निर्णयों में सर्वोच्च न्यायालय पीडिता के यौन संबंधों के इतिहास को प्राथमिकता देते हुए पाया जाता है.’ खांडेकर कहते हैं ‘ जरूरत है कानूनों को प्रैक्टिकल सिलेबस में शामिल करने की.

गैर जरूरी वीर्य सैम्पल की परंपरा
डा. खांडेकर की ही पहल पर यौन हिंसा के अभियुक्तों का वीर्य सैम्पल लिए जाने की परम्परा को महाराष्ट्र सरकार ने ख़त्म कर दिया. खांडेकर कहते हैं, ‘ यह न सिर्फ गैरजरूरी समय खाता है बल्कि दोहरा स्त्रीविरोधी माहौल भी बनाता है.’ राज्य और केंद्र सरकार को लिखे अपने पत्र में उन्होंने तफसील के साथ बताया है कि कैसे इस सैम्पल के लिए बलात्कार के अभियुक्तों को पोर्न दिखाया जाता ह. यह सैम्पल सिर्फ ब्लड ग्रूप जानने के लिए लिया जाता है, जिसे अभियुक्त के ब्लड और पीडिता के कपड़ों पर प्राप्त सीमेन के जरिये जाना जा सकता है .
आश्चर्यजनक तौर पर केंद्र सरकार ने इसपर चुप्पी बना रखी है .

देश का पहला क्लिनिकल फोरेंसिक मेडिसिन यूनिट : 
डा खांडेकर ने 2011 में एक जनहित याचिका बॉम्बे उच्च न्यायालय के नागपुर बेंच में दायर की और मांग की कि देश भर में यौन हिंसा सहित दूसरी हिंसा की जांच के लिए एक क्लिनिकल फोरेंसिक मेडिसिन बनाया जाय और सिलेबस तथा करिकुलम में इसे शामिल किया जाय .  दरअसल अभी तक यौन हिंसा की पीड़िताओं की जांच स्त्री रोग विशेषज्ञ, बाल यौन हिंसा के पीड़ितों की जांच बाल रोग विशेषज्ञ आदि के द्वारा करवाने की परम्परा रही है , जिन्हें फोरेंसिक जानकारियाँ नहीं होती हैं. इस प्रकार उनकी रिपोर्ट न्यायिक प्रक्रिया में ज्यादा प्रभावी नहीं होती . खांडेकर कहते हैं , ‘ इसका मूल जड़ है मेडिकल का सिलेबस . जो पढाता है ( यानी फोरेंसिक शिक्षक ) वह प्रैक्टिकल नहीं करता और जो प्रैक्टिकल करता है वह पढाता नहीं. खांडेकर ने अपने मेडिकल कालेज ( एम जी आई एम एस ) में देश का पहला क्लिनिकल फोरेंसिक मेडिसिन यूनिट बनाया , जो अस्पताल के  आपात विभाग ( इमरजेंसी) का हिस्सा है. इस यूनिट में सर्जरी , ओर्थोपेडिक, स्त्रीरोग , बालरोग और फोरेंसिक के डाक्टरों की टीम २४ घंटे काम करती है . नागपुर हाईकोर्ट के आदेश पर मेडिकल कौंसिल ऑफ़ इण्डिया ने डा खांडेकर से ९ जून  २०१४ को बातचीत की ताकि इस मॉडल को पूरे देश में लागू किया जा सके .

अपराध की जांच की ट्रेनिंग देते डा. खांडेकर 

(पढ़ें : बलात्कार पर नजरिया और सलमान खान )

गैरजरूरी पोस्टमार्टम, अपठनीय हैण्डराइटिंग के खिलाफ मुहीम और अन्य बड़ी पहल 
डा . खांडेकर जेंडर जस्टिस आधारित  न्याय और चिकित्सा की अपनी पहलों के साथ लगातार सक्रिय हैं . उनकी पहल पर महाराष्ट्र सरकार गैरजरूरी पोस्टमार्टम ख़त्म करने पर विचार कर रही है. खांडेकर के अनुसार इससे ६०% पोस्टमार्टम कम हो जायेंगे और इनपर जाया होने वाले समय , ऊर्जा और धन की बचत होगी. एक जरूरी पहल के तौर पर डाक्टरों की हैण्डराइटिंग तथा हस्ताक्षर के कारण पीड़ितों को न्याय मिलने में होने वाली देरी को कम करने की मुहीम भी उल्लेखनीय है. अपने मेडिकल कालेज में इन्होने देश का पहला सॉफ्टवेयर विकसित करवाया है , जो मैन्युअल फोरेंसिक रिपोर्ट की प्रथा को ख़त्म करदेने वाला है . महाराष्ट्र सरकार इसे भी पूरे राज्य में लागू करने की तैयारी कर रही है.

(पढ़ें : दाम्पत्य में बलात्कार का लायसेंस)

डाक्टर की अगली मुहीम है देश के पाठ्य पुस्तकों में जरूरी जानकारियाँ शामिल करवाना , जिससे बच्चे यौन विचलन और हिंसा के शिकार न हों .