औरतें

एदुआर्दो गालेआनो / अनुवादक : पी. कुमार  मंगलम 

अनुवादक का नोट 

एदुआर्दो गालेआनो (3 सितंबर, 1940-13 अप्रैल, 2015, उरुग्वे) अभी के सबसे पढ़े जाने वाले लातीनी अमरीकी लेखकों में शुमार किये जाते हैं। साप्ताहिक समाजवादी अखबार  एल सोल  (सूर्य) के लिये कार्टून बनाने से शुरु हुआ उनका लेखन अपने देश के समाजवादी युवा संगठन  से गहरे जुड़ाव के साथ-साथ चला। राजनीतिक संगठन से इतर भी कायम संवाद से विविध जनसरोकारों को उजागर करना उनके लेखन की खास विशेषता रही है। यह 1971 में आई उनकी किताब लास बेनास आबिएर्तास दे अमेरिका लातिना (लातीनी अमरीका की खुली धमनियां) से सबसे पहली बार  जाहिर हुआ। यह किताब कोलंबस के वंशजों की  ‘नई दुनिया’  में चले दमन, लूट और विनाश का बेबाक खुलासा है। साथ ही,18 वीं सदी की शुरुआत में  यहां बने ‘आज़ाद’ देशों में भी जारी रहे इस सिलसिले का दस्तावेज़ भी। खुशहाली के सपने का पीछा करते-करते क्रुरतम तानाशाहीयों के चपेट में आया तब का लातीनी अमरीका ‘लास बेनास..’ में खुद को देख रहा था। यह अकारण नहीं है कि 1973 में उरुग्वे और 1976 में अर्जेंटीना में काबिज हुई सैन्य तानाशाहीयों ने इसे प्रतिबंधित करने के साथ-साथ गालेआनो को ‘खतरनाक’ लोगों की फेहरिस्त में रखा था। 
लेखन और व्यापक जनसरोकारों के संवाद के अपने अनुभव को साझा करते गालेआनो इस बात पर जोर देते हैं कि "लिखना यूं ही नहीं होता बल्कि इसने कईयों को बहुत गहरे प्रभावित किया है"।

 “Mujeres” (Women-औरतें) 2015 में आई थी। यहाँ गालेआनो की अलग-अलग किताबों और उनकी लेखनी के वो हिस्से शामिल किए गए जो औरतों की कहानी सुनाते हैं। उन औरतों की, जो इतिहास में जानी गईं और ज्यादातर उनकी भी जिनका प्रचलित इतिहास में जिक्र नहीं आता।  इन्हें  जो चीज जोड़ती है वह यह है कि  इन सब ने अपने समय और स्थिति में अपने लिए निर्धारित भूमिकाओं को कई तरह से नामंजूर किया।

शहरजाद

एक की बेवफाई का बदला लेने के लिए राजा सारी दुल्हनों  के गले उतार लिया करता था.रात होने से पहले वह ब्याह रचाता और सुबह होते-होते अपना ब्याह खुद खतम भी कर डालता था. इस तरह, एक के बाद एक लड़कियाँ आती गईं और अपना कौमार्य तथा जीवन गंवाती गईं. शहरजाद वह अकेली लड़की थी, जो पहली रात के बाद जिंदा बची रही और इसके बाद वह हर रात एक और नया दिन पाने की खातिर कहानियाँ बदलती रही. ये कहानियाँ जो शहरजाद ने कहीं से सुनी , पढी  या फिर यूँ ही बनाई थी, उसे सरकलमी से बचाती थी. वह इन्हें धीमी आवाज में, आधे अंधेरे कमरे में सिर्फ़  चांदनी की रोशनी में कहा करती थी।इन्हें कहते वक्त उसे एक रूहानी खुशी मिला करती थी, जिसे वह राजा तक पहुंचाया करती. वह, हाँलाकि , एहतियात भी बहुत रखती थी.कभी-कभी अच्छी-भली चल रही कहानी  के बीच उसे यह अहसास हुआ करता कि राजा उसकी  गर्दन देख रहा है.वहां राजा का मन ऊबा और यहाँ वह गई.और फिर मरने के डर से कहने की कला शुरू हुई.



आधुनिक नॉविल की पहली ईंट

आज से हज़ार साल पहले, दो जापानी औरतें ऐसा लिख रहीं थी  मानों वह आज की बात हो.खोर्खे लुईस बोरखेस (Jorge Luis Borges) और मार्गेरिते योरसेनार (Marguerite Yourcenar) कहते हैं कि आज तक मुरासाकी शिकिबु (Murasaki Shikibu) जैसा बेहतरीन उपन्यास किसी ने नहीं लिखा. शिकिबु की गेंजी की कहानी पुरुषों के रोमांचक कारनामों तथा औरतों के पीछे हटने या हार जाने की एक शानदार किस्सागोई है.
मुरासाकी के साथ एक और औरत अपने जाने के हजार साल बाद तारीफ के इतने शब्दों के साथ याद किए जाने का दुर्लभ सम्मान हासिल कर रही थी. सेई शोनागोन (Sei Shonagon) की Libro de la Almohada (लिब्रो दे ला आलमोआदा - शाब्दिक अर्थ "तकिए की किताब" यानी  बिस्तर पर या सोने से पहले आराम से, आनंद के साथ पढ़ी जाने वाली किताब) ने  zuihitsu (जुईहित्सु) नाम की एक पूरी विधा को ही जन्म दिया था. जुईहित्सु का शाब्दिक अर्थ "पेंट-ब्रुश या कूची की रौ के संग बहना" होता है. यह छोटी-छोटी कहानियों, नोट्स, विचारों, खबरों और कविताओं से गूंथे हुए एक बहुरंगी मोजैक या रंगीन पत्थरों और काँचों से बनी कलाकृतियों की तरह लिखा जाता था. देखने में इधर-उधर बिखरे मालूम पड़ने वाले इसके टुकड़े दरअसल कथ्य के विविध आयाम बुनते हैं और हमें अपने लोक तथा समय में दाखिल होने का न्यौता देते हैं.


कहने की धुन (1)

मार्सेला उत्तर के बर्फीले इलाकों में गई थी. वहाँ नार्वे  की राजधानी ओस्लो में एक रात उसकी मुलाकात एक औरत से हुई, जो गाती और कहती है. एक गाना खत्म और दूसरा शुरू होने के बीच वह मजेदार कहानियाँ सुनाया करती है. वह इन्हें कागज के छोटे-छोटे पर्चो पर नजर फिराते हुए कहती है, ऐसे जैसे कोई बड़ी बेफिक्री से किसी का भविष्य बाँच रहा हो.ओस्लो की वह औरत एक बहुत बड़े घेरे वाला स्कर्ट पहनती है, जिसमें कई-कई तो जेबें हैं. इन्हीं जेबों से वह एक-एक कर ये पर्चे निकालती है. हर पर्चे में कहने को एक मजेदार कहानी रहती है। वह कहानी जो एक शुरुआत और इस शुरुआत के बीज रोपे जाने के बारे में है. हर कहानी उन लोगों की है, जो कुछ जादुई रचने-गढ़ने की कला की खातिर दुबारा जीना चाहते हैं. और इस तरह वह भुला दिए और मर गए लोगों को फिर से जिलाया करती है; उसके स्कर्ट की तहों से इंसानों के सफर और उनके  इश्क की कई दास्तानें बाहर निकल सामने आ खड़ी होती हैं. वही इंसान जो जीते हुए, कुछ कहते हुए चलते जाते हैं.

अनुवादक का परिचय : पी. कुमार. मंगलम  जवाहर लाल नेहरु विश्विद्यालय से लातिनी अमरीकी साहित्य में रिसर्च कर रहे हैं .  आजकल फ्रांस में हैं. 

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