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वे तीन दलित बेटियां :कर्मशील भारती की कविता

कर्मशील भारती

अध्यक्ष दलित लेखक संघ.दो कविता संग्रह प्रकाशित. 1.कलम को दर्द कहने दो 2.दलित मंजरी संपर्क :9968297866
bhartikaramsheel355@gmail.com

एक दलित मोहल्ले से
मात्र तीन दलित बेटियां ही पाठशाला जाती थी
मोहल्ले के और बच्चे/बच्चियों में से
कुछ बच्चे कूड़ा बीनने
कुछ मौहला कमाने
कुछ बच्चे, छोटे बच्चों की देखभाल
घर पर रहकर ही करते थे.
इन बेटियों को
प्रतिदिन पाठशाला जाते देख
इनके मां-बाप को
इतना तो संतोष हो ही गया था कि
उनके बच्चे पढ़ लिख रहे हैं
हमारी तरह से
झाड़ू तो नहीं लगायेंगे
किसी के घर/सडकों पर
मैला तो नहीं उठायेंगे
गांव में/शहरों में
उन्हे इतना विशवास तो
हो चला था कि
एक दिन उनके बच्चे
अवश्य ही बड़े आदमी बनेंगे
तब जा कर ही शायद हमें
इस नरक से मुक्ति मिल पायेगी?

मयूनिस्पल्टी के उस पाठशाला में
सफाई कर्मचारी
जो टी.वी. का मरीज था
पाठशाला कभी आता था
कभी नहीं…

श्रीमती निर्मला जैन
उस पाठशाला की प्रधान अध्यापिका हैं
अपने कार्यालय में
आकर बैठी ही थी कि
‘मैडम पाठशाला के शौचालय
आज भी गन्दे पड़े हैं
कब तक चलेगा ऐसे?
आखिर कुछ तो करो?
मैडम, कुछ तो ख्याल करो
हम ब्राहमणों की पवित्रता का’
सुश्री शान्ति शर्मा ने
अपना ब्राह्मणत्व दिखाते हुए
श्रीमती निर्मला जैन के सामने
कुर्सी पर बैठते हुए
ये शब्द कहे!
बात को आगे बढ़ाते हुए
एक सुझाव भी दे डाला
वे जो तीन दलित लड़कियां हैं
हमारे पाठशाला में
जिनका पैतृक काम ही है

मैला उठाना और शौचालय
साफ करना?
बस उन्हें बुलाकर
डराओ-धमकाओ और
किसी तरह से
इस काम को करवाओ?!!
सुनते ही श्रीमती निर्मला जैन के
लालपीले चेहरे का रंग
एकदम साफ़ हो गया था
उसके चेहरे पर खुशी फिर से लौट आई
उसे इस पहाड़ जैसी समस्या का
एक निश्चित उपचार मिल गया था
उसने तुरंत कॉल बेल दबाई
चपरासी भागा-भागा कमरे में आया
उसने आदेश दिया कि
सुश्री शान्ति मैडम की क्लास से
कमला, विमला और पायल को
तुरंत मेरे पास बुलाओ
फिर दोनों बातो में लग गई….

थोड़ी देर बाद
वो तीनों दलित बच्चियां
श्रीमती निर्मला जैन के कार्यालय में पहुंची
तीनों सहमी-सहमी थी,
देखते ही श्रीमती जैन
एकदम बरस पड़ी उनपर
तुम पढ़ लिख कर क्या करोगी??
निकम्मी कहीं की!
मेरी पाठशाला पर कलंक हो तुम!
इस बदनामी से अच्छा है
तुम्हारा नाम ही काट दूं!
न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी!
उन तीनों दलित बच्चियों को
जैसे बिजली का करंट लगा हो
वो सदमें में पड़ गई!
एकदम से डर गई
वे  समझ ही नहीं पाई
इस षडयंत्र को
निर्दोष होकर भी वे
जातिवादी साजिश में
एक अपराधी की तरह कांप रही थी
तीनों  रोने और गिड़गिड़ाने लगी
श्रीमती निर्मला जैन के पैरों पर
गिरकर, कहने लगी

मैम…. हमारा नाम मत काटो
हमें मत निकालों अपनी पाठशाला से
श्रीमती जैन और सुश्री शर्मा का
शौचालय का समाधान मिल गया था
दोनों की खुशी का ठिकाना नहीं था
आंखो में खुशी की चमक थी
इनके द्वारा बिछाये जाल में
फंस गई थीं  तीनों दलित बच्चियां.
श्रीमती जैन ने तुरंत आदेश दे डाला
तुम तीनों बारी-बारी से
हमारे पाठशाला के शौचालय
साफ़ करोगी.
इस धमकी भरे आदेश के साथ ही
एक हिदायत भी दे डाली
“कान खोल कर सुन लो”
ये बात तुमने किसी को भी बताई
चाहे वो तुम्हारे मां-बाप
रिश्तेदार ही क्यों न हो
तो उसी दिन ‘तुम्हारा नाम’
‘मैं’ अपनी पाठशाला से काट दूंगी!!!
फिर तुम कहीं भी नहीं
पढ़ पाओगी
यह बात ध्यान रहे!
चलो अब दफा हो जाओ
यहां से….
मेरा मुंह क्या देख रही हो?

वे  तीनों दलित बेटियां
दिन-दहाड़े राह में लुटे हुए
राहगीर की तरह
लुटी-पिटी-आंखों में आंसू लिए हुए
चल पड़ी..
उस गंदगी से गिजबिजाते
शौचालयों की ओर….
हिचकियां लेती….

‘पिंक’एक आज़ाद-ख्याल औरत की नज़र से

ललिता धारा 


सोलह सितम्बर, 2016 को ‘पिंक’ देश भर में रिलीज़ हुई. लगभग सभी फिल्म समीक्षकों ने उसे 4 स्टार की रेटिंग दी. यह टाइमपास फिल्म नहीं है, इसकी नायिकाएं स्टार नहीं हैं और ना ही यह ‘मनोरंजक’ फिल्म है. इसके बावजूद ‘पिंक’ बॉक्स ऑफिस पर खासी सफल रही है. इसकी सराहना लैंगिक रूढ़िबद्धता को चुनौती देने वाली एक ऐसी फिल्म के रूप में की जा रही जो हिम्मत से एक नए विचार का प्रतिपादन करती है. इसे नए ज़माने के, नयी सोच वाले शहरी भारतीयों की और उनके लिए फिल्म बताया जा रहा है.

फिल्म  की कहानी तीन युवा कामकाजी महिलाओं – मीनल, फलक और एंड्रिया – के आसपास घूमती है, जो दिल्ली में एक ही फ्लैट में रहती हैं और आपस में गहरी मित्र हैं. फिल्म की शुरुआत से लेकर उसके अधिकांश हिस्से में उन्हें परेशानहाल और भयभीत दिखाया गया है. वे हाल में उनके द्वारा की गयी किसी नादानी के कारण परेशान हैं – एक ऐसी नादानी जो उनके लिए बड़ा सिरदर्द बन गयी है. बाद में पता चलता है कि वे कुछ युवा पुरुषों, जिनसे उनकी पहले से कोई जानपहचान नहीं थी, के साथ पार्टी करने गयीं. वे पुरुष उनके साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाना चाहते हैं, जिसके लिए वे राजी नहीं हैं. वे उनकी बेजा हरकतों का विरोध करती हैं और गुस्से में मीनल उनमें से एक पर बोतल से वार कर देती है, जिससे उसे आँखों के आसपास गहरी चोट लग जाती है.

इस घटना की इन महिलाओं को भारी कीमत अदा करनी पड़ती है. उनका घर, उनकी नौकरी, उनकी प्रतिष्ठा, उनके बॉयफ्रेंड और उनका सुख-चैन, सब कुछ उनसे छिन जाता है. और यह सब सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्होंने कुछ मजा-मौज करने के लिए गलत साथियों का चुनाव किया.

इस सबके बीच प्रवेश होता है सर्वज्ञानी बच्चन साहब का, जो इन महिलाओं के जीवन पर छा जाते हैं. वे उन्हें यह बताते हैं कि उन्हें क्या करना चहिये और क्या नहीं. उनका अंदाज़ यह साफ़ कर देता है कि अगर पुरुष महिलाओं के पीड़क हैं, तो उनके तारक भी वही हैं! दूसरे शब्दों में, महिलाओं को स्वतंत्रता जैसे जुमलों को भूल जाना चाहिए.  ज्यादा से ज्यादा वे केवल यह कर सकतीं है कि ‘भौंडे’ और ‘भद्र’ पुरुषों में से किसी एक को चुनें. तथ्य यह कि भौंडे और भद्र पुरुष एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. दोनों यह मान कर चलते हैं कि महिलाएं अपने निर्णय स्वयं नहीं ले सकतीं; बल्कि उनके पास दिमाग है ही नहीं.

फिल्म निर्माता का उद्देश्य शायद ‘अच्छी’ (अच्छे घर की) और ‘बुरी’ (वैसे टाइप की) महिलाओं के सम्बन्ध में पुरुषवादी रूढ़िबद्ध धारणाओं को चुनौती देना था परन्तु अंततः वे उतनी ही प्रतिगामी “रक्षक” बनाम “भक्षक” पुरुष की टकसाली सोच को पुष्ट करते हैं. सबसे क्रूर विडम्बना यह है कि एक महिला के रक्षक को दूसरी महिला का भक्षक बनने में तनिक भी परेशानी नहीं होती. क्या हम सब उन भाईयों से परिचित नहीं हैं जो अपनी बहनों की “इज्ज़त” की रक्षा की खातिर कुछ भी करने को तैयार रहते हैं – यहाँ तक कि हिंसा भी – परन्तु जहाँ तक दूसरी महिलाओं का सवाल है, वे उनके लिए शबाब ही होती हैं.


अतः ‘भक्षकों’ से बचने के लिए महिला अपनी इच्छा से अपनी आज़ादी को अपने ‘रक्षक’ के चरणों में समर्पित कर देती है और फिर रक्षक उसका मालिक हो जाता है – उसकी ज़िन्दगी का खेवनहार. ठीक अमिताभ बच्चन की तरह. बच्चन (सहगल) यह भी ज़रूरी नहीं समझते कि अपने मुव्वकिलों की “नैतिकता” और “कौमार्य” पर भरी अदालत में प्रश्नचिन्ह लगाने से पहले वे उनसे मशविरा करें. अगर यह उनका एक वकालती दांव था, तो भी क्या यह ज़रूरी नहीं था कि वे अपने मुव्वकिलों को विश्वास में लेते? परन्तु उनकी सोच शायद यही थी कि बड़े-बूढ़े जानते हैं कि बच्चों के लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा. और बच्चों, विशेषकर लड़कियों, को उनसे मुंह लड़ाने के बारे में सोचना भी नहीं चाहिए. क्या यह उन महिलाओं के अधिकारों का उतना ही गंभीर उल्लंघन नहीं है, जितना कि उन पुरुषों ने किया, जो ना सुनने के लिए तैयार ही नहीं थे. उन पुरुषों के मामले में वे कम से कम उनके सिर पर व्हिस्की की बोतल फोड़ कर अपना गुस्सा तो निकाल सकती थीं!

अदालत में और उसके बाहर, लड़कियों को अपनी  उँगलियों पर नचाने के बाद, बच्चन अंत में अपनी इज्ज़त बचाने के लिए कहते हैं कि जब कोई महिला ना कहती है तो उसका मतलब ना ही होता है. तालियाँ परन्तु अच्छा होता कि यह बात लड़कियां अपने मुंह से कहतीं. तब यह ज्यादा विश्वसनीय लगती.
नहीं मिस्टर सहगल, यह हमें मंज़ूर नहीं है.जिस दिन महिलाएं अपने रक्षकों और भक्षकों दोनों को ना कहना सीख जायेगी, उस दिन वे सचमुच आज़ाद होंगीं.

ललिता धारा मुंबई के डॉ आंबेडकर कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स एंड इकोनॉमिक्स के सांख्यिकी विभाग की अध्यक्ष रही हैं. उन्होंने कई शोधपूर्ण पुस्तकों का लेखन किया है, जिनमें ‘फुलेज एंड विमेंस क्वेश्चन’, ‘भारत रत्न डॉ बाबासाहेब आंबेडकर एंड विमेंस क्वेश्चन’, ‘छत्रपति शाहू एंड विमेंस क्वेश्चन’, ‘पेरियार एंड विमेंस क्वेश्चन’ व ‘लोहिया एंड वीमेनस क्वेश्चन’ शामिल हैं. इसके अतिरिक्‍त सावित्रीबाई फुले के पहले काव्य संग्रह का उनका अनुवाद भी “काव्य फुले” शीर्षक से प्रकाशित है.


साभार फारवर्ड प्रेस  से……

द्रौपदी ! भारतीय सेना बलात्कारी नहीं,राष्ट्रवादी है (?!)

21  सितंबर को हरियाणा केन्द्रीय विश्वविद्यालय के अंग्रेज़ी विभाग ने महाश्वेता देवी को श्रद्धांजलि देने के लिए एक कार्यक्रम आयोजित किया. इए मौके पर ‘उनके उपन्यास ‘हजार चौरासीवें की मां’ पर एक फिल्म दिखाई गई, और  उनकी मशहूर कहानी ‘द्रौपदी’ पर आधारित एक नाटक का मंचन किया गया. दर्शकों में छात्रों और शिक्षकों के साथ अधिकारी भी थे. लोगों ने  नाटक को काफी सराहा.
महाश्वेता देवी की कहानी द्रौपदी पर आधारित स्केच

लेकिन यह सराहना ज्यादा देर तक बनी नहीं रह सकी. वजह थी नाटक की पटकथा पर राष्ट्रवादी सरकार (!)की राष्ट्रवादी पार्टी भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रवादी विद्यार्थी शाखा (!) ‘ विद्यार्थी परिषद’ की आपत्तियां. परिषद को आपात्ति है  कि नाटक में भारतीय सेना का अपमान किया गया है , इसलिए आयोजकों पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा दर्ज हो.

सेना बलात्कारी नहीं है


कहानी की नायिका द्रौपदी पर सेना के लोग बलात्कार करते हैं. कहानी बलात्कार पीडिता के संघर्ष की है. वह सामूहिक बलात्कार का शिकार होकर अपने शरीर पर हिंसा के जख्म लिए हुए सेनानायक को ललकारती है. सेना नायक अपने निहत्थे ‘टार्गेट’ के आगे पराजित सा खडा है. राष्ट्रवादी विरोधियों का आरोप है कि राष्ट्र के रणबांकुरों की इतनी गंदी छवि क्यों दिखाई भारत की उस लेखिका ने, जिसकी कलम की ताकत  इस देश ही नहीं दुनिया के लोग मानते हैं. राष्टवादी आत्माओं को भारत के पूर्वोत्तर इलाके से लेकर देश भर में सेना के लोगों पर लगे बलात्कार के आरोप षड़यंत्र दिखते हैं , मणिपुर में बलात्कार के खिलाफ महिलाओं का नग्न प्रदर्शन झूठ
और बेवजह.

नाटक के सवाल 

‘द्रौपदी’ एक आदिवासी औरत की कहानी है जो सुरक्षा बल के हमले की शिकार होती है. होश में आने पर  उसे यह अहसास होता है कि उसके साथ बलात्कार हुआ है. वह अपने नागे शरीर को ढंकने से इनकार कर देती है और उस ज़ख़्मी नंगेपन के साथ सुरक्षा बल के अधिकारी को चुनौती देती है. नाट्य रूपांतरण के प्रसंग में  एक उपसंहार जोड़ा गया, जिसमें आज के भारत में आदिवासियों और अन्य समुदायों पर  आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट (आफ्सपा) जैसे क़ानून की आड़ में हो रहे ज़ुल्म की बात की गई. न्यायमूर्ति वर्मा समिति और उच्चतम न्यायालय के हवाले से बताया गया कि किस प्रकार भारतीय सुरक्षा बल के सदस्य यौन हिंसा के अपराध में शामिल रहे हैं. दर्शकों से इस परिस्थिति में अपनी भूमिका तय करने को कहा गया.नाटक में वंदना ने द्रौपदी, कारलोस लियोन फर्नेंडिस ने सूरजा साहू, दीपक ने अरिजीत, अश्विन ने सेनानायक, अजय कुमार ने डुलना एवं चारू ने टूडू की पत्नी के चरित्रों को जीवंत किया। नाटक का निर्देशन डॉ.मनोज कुमार एवं डॉ. स्नेहसता ने किया।
इस नाटक का एक हिस्सा रिकार्ड कर सोशल मीडिया में वायरल कर दिया गया, जिसके बाद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ( एबीवीपी) के लोग विश्वविद्यालय से बाहर प्रदर्शन कर रहे हैं, आयोजकों पर ऍफ़ आई आर करने और उनकी गिरफ्तारी की मांग कर रहे हैं.

खेले गये नाटक का वीडियो लिंक 



द्रौपदी को कपड़े पहनाना चाहते हैं राष्ट्रवादी 

नाटक की नायिका द्रौपदी का कथन है, ‘तुम मेरे कपड़े उतार सकते हो, लेकिन पहनने को विवश  नहीं कर सकते.’ यह कथन पूर्वोत्तर भारत सहित पूरे देश में स्त्रियों पर बलात्कार का प्रतिरोध है. मणिपुर में सेना के लोगों द्वारा बलात्कार के बाद मणिपुर की महिलाओं के  नग्न प्रदर्शन से भी इस देश के राष्ट्रवादियों और राष्ट्रवादी सेना की संवेदना नहीं जागी और आये दिन इस देश की आदिवासी-दलित महिलाओं पर बलात्कार की खबरें आती रहती हैं. छतीसगढ़ में सोनी सोरी के गुप्तांगों में पत्थर डालने से लेकर क्रूरता और हिंसा की वीभत्स घटनाएं इस देश के दैनंदिन में शामिल अभ्यस्तता सरीखे हो गई हैं.

लेकिन इस क्रूरता, नग्नता पर शर्मिन्दा होने की जगह राष्ट्रवादियों की सेनायें, जो अलग -अलग संगठनों के रूप में सक्रिय हैं, ऐसी घटनाओं, सेना सहित मर्दों के वहशीपन और ‘द्रौपदियों’ के शरीर पर अत्याचार के चिह्न को कपड़ों से ढंकना चाहती हैं- क्योंकि ये घटनाएं उनके राष्ट्रवाद पर धब्बा हैं. महाश्वेता देवी की कहानी और उस पर आधारित नाटक की नायिका इसी कपड़े को पहनने से इंकार करती है – यही सशक्त कथन है. इस कहानी को दलित स्त्रीवाद की कहानी भी बताया जाता रहा है.

खैरलांजी के एक दशक के बाद भी बदस्तूर जारी है शोषण….



रजनी तिलक 

(महाराष्ट्र  में 10 वर्ष पूर्व घटित हुए  सबसे  वीभत्स दलित उत्पीडन कांड को  याद करते हुए रजनीतिलक इन 10 सालों में सामाजिक और कानूनी न्याय की तस्वीर रख रही हैं. )


अभी हाल में महाराष्ट्र में मराठाओं  द्वारा भारी धरने-प्रदर्शन हो रहे हैं,और उनकी मांग है  कि अनुसूचित जातियों की तरह उनका आरक्षण बहाल हो एवं अनुसूचित जाति अत्याचार निवारण अधिनियम निरस्त हो.
खैरलांजी-कांड के ठीक 10 वर्ष बाद महाराष्ट्र  में मराठाओं  का एकत्र होकर अपनी बुलंद आवाज में सर उठाना अपनी ताकत का इजहार करना मात्र नहीं  है बल्कि देश के संविधान के प्रति यह एक तरह की अवमानना भी है, वह संविधान जिसने  अपने देश के अत्यंत पिछड़े समुदायों, विशेषकर  जो सामाजिक आर्थिक शैक्षणिक और सांस्कृतिक रूप से पिछड़ेपन के कारण हाशिये  पर हैं,  के नागरिकों को  मुख्यधारा में लाने के लिए विशेष प्रावधान आरक्षण द्वारा किया. आगे चलकर संविधान के दायरे में ही  उनके विरुद्ध जातीय भेदभावकी रोकथाम हेतु अनुसूचित जाति-जनजाति निवारण अधिनियम लाया गया, जिसका सामाजिक आर्थिक रूप से संपन्न समुदायों द्वारा समय-समय पर विरोध किया जाता रहा है, इस बार मराठाओं ने मुहीम की डोर थामी है.

खैरलांजी-कांड की दसवीं  बरसी  खैरलांजी में  घटित बर्बरता की दास्तान की याद दिलाती है. 29 सितम्बर 2006 में घटित यह  घटना, उत्तर नागपुर से 70 किलोमीटर दूर खैरलांजी गाँव, जिला भंडारा, में उसी  गाँव के लोगों द्वारा अंजाम दी गई. उन दरिंदो ने इंसानियत की सारी सीमायें तोड़ कर अपने जातीय अभिमान के खूंटे गाड दिये- सुरेखा भोतमांगे, एवं उसकी किशोरी बेटी प्रियंका भोतमंगे को गाँव में नंगा करके न केवल घुमाया, बल्कि उनके साथ बलात्कार किया और उनकी योनी में बैलगाड़ी का सरिया घुसेड दिया था. सुरेखा भोतमांगे के दो पुत्रों  को भी  पीट-पीट कर मार डाला और उनके लिंगो को भी कुचल डाला. सामूहिक बलात्कार और सार्वजनिक अपमान तथा हत्या करके इस केस पर लीपा-पोती की गई और पूरा गाँव मूकदर्शक की तरह सबकुछ देखता रहा. गांव के पिछड़ी जाति के 41 पुरुषों ने इस वारदात की  कमान सम्भाली. इस वारदात की जड़ भैयालाल भोतमांगे की 5 एकड़ जमीन थी. खैरलांजी  गाँव में 780 लोग रहते थे, जिसमें  10 घर गोंड आदिवासियों के  एवं 3 परिवार दलितों के थे. भैयालाल के पास उनके पूर्वजो से मिली पांच एकड़ जमीन थी, जिसमें से गाँव की सड़क बनाने के लिए दो एकड़ उनसे ले ली गई थी, बाकी बची जमीन भी दबंगो की आंखो में खटक रही थी. वहीं भैयालाल  की पत्नी सुरेखा भोतमंगे अपनी जमीन के लिए सचेत थी. उसके तीन बच्चो की पढाई-लिखाई भी अच्छी चल रही थी. गाँव के लोगो को  एक दलित परिवार की तरक्की व स्वाभिमान बर्दाश्त  से बाहर था. इस गाँव में पिछड़ी जाति के लोगो में कुनबी, तेली, कलार, लोधी,डिबर व बढ़ई थे. उनमें से 41 लोगों ने घर में घुस कर सुरेखा और उसकी 17 साल की किशोर बेटी से सामूहिक बलात्कार किया व दो बेटों  की सामूहिक हत्या और जातिगत अपमान किया. जाति-वैमनस्य एवं जलन के कारण  यह बर्बर कृत्य किया गया. महीने भर की चुप्पी के बाद एक खोजी पत्रकार ने इस घटना पर अपनी स्टोरी की, तब जाकर यह घटना पूरे  देश के समक्ष उजागर हुई, और अंतरराष्ट्रीय दवाब के चलते सरकार हरकत में आई.

26 सितम्बर 2008 को 41 लोगों में  ३६ लोगो चिन्हित किया गया, उनमें  से भंडारा जिला न्यायलय ने 6 लोगों को मौत की सजा व दो को उम्रकैद की सजा सुनाई. 16 सितम्बर 2008 को इस केस से एसी -एसटी एक्ट हटा दिया गया था.तत्पश्चात  14 जुलाई 2010 को अपील करने के बाद न्यायालय ने 6 लोगों को मौत की सजा को 25 वर्ष की सश्रम कारावास में बदल कर अपराधियों को जीवनभर जीने का तोहफा ईनाम में दे दिया. अब सवाल कई हैं,  मसलन , जब अपराधी दलित होते और पीड़ित समान्य तब भी क्या न्यायविद ऐसा ही फैसला देते! शायद नही. जाति व्यवस्था ने  वर्चस्व  की मानसिकता से न्यायव्यवस्था, कार्यपालिका और विधायिका  किसी को भी अछूता नही रखा है. यहीं कारण है स्वस्थ एवं निष्पक्ष न्याय मिलना दलितों के लिए आज भी चुनौतियों से भरा है.
खैरलांजी के बाद दूसरा चर्चित केस दिल्ली निर्भया का था,जो काफी हद तक समानता लिए हुए था.निर्भया एक पैरा मेडिकल छात्रा थी,जिसके साथ बस ड्राइवर,कंडक्टर और क्लीनर ने सामूहिक बलात्कार किया और  उसकी योनी में सरिये डाल दिए.इस घटना से पूरा देश कांप उठा. मध्यम वर्ग सड़क  पर उतर आया और सरकार पर दबाब बनाया,इस दबाब में बच्चों  पर बने कानून में बदलाव लाने की बहस हुई,आयोग बैठा और नया कानून आया. पूरा मिडिया सक्रिय हो गया. जंतर-मंतर से राष्ट्रपति भवन, इण्डिया गेट, राजपथ तक उनके कैमरे घुमने लगे. अनुभव हुआ कि मीडिया भी जातिवादी मानसिकता से मुक्त नही है.

निर्भया कांड के समानांतर  ही हरियाणा में बलात्कार की घटनाएँ लगातार  घट रही थीं,  एक महीने में दलित बालिकाओं  के साथ 21 बलात्कार के विरुद्ध हरियाणा के विभिन्न जिलों में उठ रही आवाज को किसी मीडिया ने स्थान नहीं दिया, न ही सभ्य समाज ने गम्भीरता दिखाई. बाद में भी दलित -उत्पीडन के  मामले आये , वह मामला चाहे फरीदाबाद में सुनपेड़  में एक परिवार को रातों- रात जला कर मारने के षडयंत्र का था  या रोहतक में एक दलित लड़की  के साथ जाट बिरादरी के कुछ गुंडों द्वारा  दुबारा बलात्कार करने का. अभी हाल में ही कैथल जिले की एक ग्यारहवीं  कक्षा में पढने वाली स्कूली छात्रा को सड़क  चलते अगवा करके सामूहिक बलात्कार का मामला प्रकाश मे आया. बालिका द्वारा शोर मचाने के बाद सम्बन्धित पुलिस स्टेशन में इस  केस को दर्ज कराने जाने पर   केस दर्ज करने की बजाय पीड़ित बच्ची पर दबाब बनाया कि वे  यह  कहें  कि उसके साथ बलात्कार करने वाले केवल दो लोग थे, पीड़ित ने  इंकार करते हुए बताया कि अपराधी चार थे, तो  इस  पर महिला पुलिस ने पीड़ित बच्ची के बाल पकड़ कर पीटा. खैरलांजी की घटना के बाद  भी राज्य की जो भूमिका रही,  वह  पीड़ित को न्याय दिलवाने की कम और अपनी बदनामी छुपाकर अपराधियों से वोट पाने की ललक से ज्यादा प्रेरित थी,  मिलीभगत शायद यही रही कि  हम तुम्हे बचायेंगे तुम हमे बचाओ.

उत्तर प्रदेश, मधयप्रदेश, छतीसगढ़ और राजस्थान के सामंतशाही के प्रभाव में महिलाओं और दलितों का जीवन बदतर होता जा  रहा है. उत्तरप्रदेश में बेशक राजनीतिक प्रतिद्वंदी के रूप में दलित राजनीति खड़ी हो रही है, चार  बार सरकार भी बनाई गई, परन्तु दलित महिलाओं  के बलात्कार और दमन के दाग बदस्तूर जारी हैं. उत्तरप्रदेश के कन्नौज  में सीमा जाटव नाम की लडकी के साथ बलात्कार के बाद उसकी हत्या, दादरी-दनकौर  में एक परिवार को महिलाओं  समेत नंगा करके सड़क  पर घसीटना, बरेली की दो बहनों के साथ बलात्कार के बाद हत्या करके पेड पर लटकाना, आदि घटनाएँ  उत्तरप्रदेश में हुई हैं, जहाँ दावा किया जाता है कि पुलिस प्रशासन में सुधार हुआ है.दक्षिणी भारत के केरल के पेरुम्बुर में कानून की पढाई करने वाली दलित युवती जीशा का पहले बलात्कार किया गया फिर उसे धारदार हथियार से क्रूरतम तरीके से 30 टुकडो में काट कर उसकी अंतड़ियो  तक को बाहर खिंच लिया गया .रोहित वेमुला और डेल्टा मेघवाल की संस्थानिक हत्या मानमर्दन जैसे सैकड़ों  कृत्य प्रशासन के जातिवादी पूर्वाग्रह के जाल में फंसा कर किये गये.   अत्याचारों की इस श्रृंखला  में झझर, गोहाना, मिर्चपुर, भगाना सहित  बिहार के  लक्ष्मणपुर बाथे के इतने वर्षो बाद भी याद करने पर रोंगटे खड़े कर देते  हैं.सुरेखा भोतमांगे, उसकी बेटी प्रियंका भोतमांगे  के साथ उसके दो जवान बेटों  की हत्या करना उनके परिवार को न केवल नष्ट करके जमीन हडपने का षड्यंत्र था बल्कि दलितों के उभरते स्वाभिमान को कुचल कर सबक सिखाना भी इस षड्यंत्र का हिस्सा था,  ताकि  आसपास के गावों  में  लोग देख ले कि सर उठाने पर  उनका हश्र  भी ऐसा हो सकता है.



खैरलांजी की घटना के 10 वर्ष बाद

दलित आंदोलन व मध्यमवर्गीय दलितों की भूमिका को इन सब उत्पीड़नो की नजर से समझा जाये तो  दिखेगा कि खैरलांजी काण्ड के बाद में महाराष्ट्र एवं दिल्ली में कुछ एक  एक्टिविस्ट एवं लेखिकाएं  पहल करके आंदोलन के लिए आगे आये. दलित आंदोलन जिसके नेता पुरुष थे, वे सोचते ही रह गये की क्या एक्शन लें . मुख्यधारा की स्त्रीवादी संगठन की ओर से चुप्पी ही  रही. उत्तर  भारत के लेखक-लेखिका समुदाय, एकाध को छोड़कर, प्राय: चुप ही रहे,  क्योंकि न उनके पास समय था ना उनका दलित जनमानस के साथ जुडाव दिखता है. वे मंचीय स्टेटमेंट देने के लिए आतुर हो सकते हैं,  बशर्ते कोई उन्हें बुला कर मंच प्रदान करे. स्वयं की पहल पर मोर्चे पर उनकी हमेशा चुप्पी ही रहती है.जबकि दलित मध्यम वर्ग को देख कर ही  जनता को आरक्षण के विरुद्ध भड़काया जाता है और शिकार होते है देहातों में गरीब दलित और दलित महिलाएं  एवं बच्चे .दलित आंदोलन के मुखियों  को भी आत्मालोचना करनी चाहिए कि वे  आखिर  क्या चाहते हैं ,किसके साथ खड़ा होना चाहते
है,किसके लिए लड़ रहे है! दलित साहित्यकारों को भी सोचना चाहिए उनके लेखन का प्रयोजन क्या है? क्या मात्र लिखना,छपना और क्या सभ्य समाज में पैठ बनाना ही उनका प्रयोजन है? या आर्थिक,सामाजिक व सांस्कृतिक रूप से पिछड़े समाज के साथ स्वयं को खड़ा करके उनके जीवन में बदलाव लाने का सेतु बनना भी उनका ध्येय है.

गुजरात में पाटीदारों का उभरता आंदोलन, हरियाणा में जाट आंदोलन और अब महाराष्ट्र में मराठा आंदोलन अनुसूचित जातियों की तर्ज पर आरक्षण की मांग कर रहा है. जबकि पाटीदार बिजनेस समुदाय है. जाट व मराठा जमीनों के मालिक है. शासन-प्रशासन में ये अपना रसूख  रखते है.  अर्थव्यवस्था में इनका वर्चस्व है और राजनीति में हस्तक्षेप है. ऐसे में अनुसूचित जातियों के साथ ईर्ष्या करना, उन्हें दबाने-सताने से लेकर उनकी महिलाओं  व युवतियों के साथ छेड़छाड़ बलात्कार  व हत्याओं को हथियार की तरह इस्तेमाल करते है. मराठा लोग अनुसूचित जाति अत्याचार निवारण अधिनियम को चुनौती  की तरह देख रहे है, क्योंकि यह अधिनियम निरकुश जातीय दम्भ पर अंकुश लगाने का कानून है, जो भारतीय संविधान की मूलभावना को अभिव्यक्त करता है,लोकशाही को बरकरार रखने में एक कदम है.अभी  सरकारों की निष्पक्षता  की परीक्षा है कि वे किस और खड़े होते है. यह समय राजनीतिक नैतिकता  की परीक्षा की घड़ी है कि वे किन समुदायों को संरक्षण देंगे.

लेखिका कवयित्री-लेखिका,एक्टिविस्ट-स्त्रीवादी चिंतक है.  

करुणा और प्रेम की रचनाकार उषा किरण खान

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निवेदिता

पेशे से पत्रकार. सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों में भी सक्रिय .एक कविता संग्रह ‘ जख्म जितने थे’. भी दर्ज कराई है. सम्पर्क : niveditashakeel@gamail.com

जो लोग आपके प्रिय हों उनके बारे में लिखना आसान नहीं होता। उषा किरण खान के बारे में लिखना मेरे लिये समुद्र के गहरे जल में उतरने जैसा है। जानती तो उन्हें वर्षो से थी पर वह जानना एक पत्रकार का एक लेखक को जानने जैसा था। जैसे-जैसे उनके नजदीक गयी मैंने पाया जिन्दगी ढ़ेर सारे रंगों के साथ मौजूद है। हैरान थी एक स्त्री के भीतर इतने सारे रंगों को देखकर। जिन्दगी के इस पड़ाव पर बहुत कम लोग इतने सक्रिय रहते हैं। उन्हें देखकर मुझे हमेशा महान अभिनेत्री जोहरा सहगल की याद आती है, जो जिन्दगी के 92 साल तक अभिनय करतीं रहीं, थिरकती रहीं। जीवन से भरी हुई जोहरा सहगल ने इस मुकाम को पाने के लिए लंबा संघर्ष किया। एक स्त्री के लिए रचना  एक संघर्ष है। जब स्त्री रचती है तो परंपराएं टूटतीं हैं। स्त्री के लिए लिखना खून से सनी राहों पर चलने जैसा है। ये राह उषा किरण खान ने चुना और अपनी धुन में आगे बढ़ती गयीं। इस धुमावदार  और रोमांचक सफर में आम लोगों की जिन्दगी, हमारी परंपरा, हमारे इतिहास को उन्होंने समेटा और अदब की दुनिया में नया मुकाम बनाया।

उषा दी के लेखन में ज्ञान और संवेदना का अद्भुत सामंजस्य है। अपने लेखन में उन्होंने  मानवीय सच को प्रमाण के तौर पेश किया। वह एक कठिन डगर पर चल पड़ीं, जहां पहले से कोई निशान नहीं था। अपने पैरों पर चलकर उन्होंने जो राह बनायी वह हर स्त्री की राह बन गयी। एक बार मैंने उनसे पूछा था कि आप लिखती कब हैं? उन्होंने हंसते हुए कहा कि एक औरत को अपनी गृहस्थी के साथ लेखन के लिए समय निकालना आसान नहीं है। मैंने अपने लिए चार बजे भोर का समय चुना । सारे दिन काम-काज के बाद इतनी थकान होती थी कि लिखने के लिए वक्त नहीं निकाल पाती थी। फिर हमने तय किया कि चार बजे सुबह मेरे लिखने का समय होगा। वह आदत आज तक बनी हुई है। हिन्दी और मैथिली में उन्होंने लगातार लिखा और अभी भी लिख रहीं हैं। फागुन के बाद,सीमांत कथा,रतनारे नयन,पानी पर लकीर,त्रिज्या और भामती जैसे उपन्यास ने  पाठको के मन के भीतरी परत को कुरेदा है। उषा दी इतिहास की छात्र रही हैं,इसलिए इतिहास को स्त्री की नजर से देखना, इतिहास में गुमनाम हुए उन पात्रों को जीवंत करने की कला उनके पास  है। उन्होंने मिथिला के बडे दर्शानिक वाचस्पिति मिश्र की पत्नी भामती पर उपन्यास लिखा। उपन्यास में स्त्री स्वर को बहुत ही सहज ठंग से उठाया गया है। उनकी खासियत है कि  स्त्री मुद्दे पर अपनी बात कहने के लिए ना नारा लगाती हैं, ना परचम लहराती हैं। पर जो कहती हैं उसमें सच्ची आग और तड़प होती है।

बाबा नागार्जुन के साथ उषा किरण खान

उनके उपन्यास भामती से -’वाचस्पति काम में ऐसे लीन हुए कि उन्हें दीन-दुनिया की सुध ही नहीं रही । नवविवाहिता भामती इस दौरान उनकी सेवा करती रही। जब उनका लेखन संपन्न हुआ तो वाचस्पति ने देखा एक अधेड़ स्त्री दीप जला रही है । पूछा आप कौन? भामती ने उत्तर दिया मैं आपकी पत्नी हूं।’ उषा दी के लेखन की खासियत यही है। उनके पात्र अपनी पीड़ा का जश्न नहीं मनाते, न ज्ञान बघारते हैं। सच को बिना किसी मिलावट के कहने की कला ने ही उन्हें अदब की दुनिया में बेहतरीन अफसानानिगार बनाया । बड़ी कथाकार से ज्यादा वे एक बेहतर इंसान हैं। यह बात मैं इसलिए कह पा रही हूं कि उन्हें नजदीक से जाना है,वर्षो से उन्हें साधना करते हुए देखा है। उषा दी कला के विभिन्न आयाम से जुड़ी रही हैं। लेखन के साथ-साथ उनकी दिलचस्ची रंगमंच में है। निमार्ण कला मंच की स्थापना और रंगमंच में लगातार सक्रिय रहना कला के प्रति उनके गहरे लगाव को दर्शाता है। हीरा डोम, सात भाई चंपा,उगना रे मोर कतेए गेला समेत कई नाटक का लेखन किया। बतौर साहित्यकार,नाटककार और समाजिक कार्यकर्ता के रुप में लगातार सक्रिय उषा दी के भीतर कई दुनिया है। वो दुनिया बेहद अपनी है जानी-पहचानी।

 उषा दी को मैंने उनके हर रुप में देखा है। उनका कमरा हमसबों की पसंदीदा जगह है। जहां हम दुनिया भर के साहित्य से लेकर प्रेम प्रसंग और साहित्यकारों के छिछोरेपन तक की चर्चा करते हैं। कमरा काफी खुला और हवादार है। घर का दूसरा हिस्सा जितना बेतरतीब रहता है उनका कमरा उतना ही सलीके से सजा हुआ। लकड़ी के मेज पर नीले बिल्लौरी गुलदान में कागज के फूल या कभी ताजा फूल। कोने के मेज पर किताबें ही किताबें।  कई बार प्यार से रामचन्द्र खान को उलाहना देती हैं कि सारे कमरे में किताबे फैला कर रखते हैं इसलिए इस कमरे में मैं उन्हें आने नहीं देती। पहली बार जब मैं उनसे अखबार के लिए साझात्कार लेने गयी तो उस समय मकान पर कुछ काम चल रहा था। वीरान बाग में ईटों से लदे ट्रक खड़े थे। सीमेंन्ट की बोरियों की गर्द उड़ रही थी।  जर्द पत्ते गर्द के उस नांचते भंवर में चक्कर काटते जा रहे थे। हम बातें करते रहे। उनकी बातों में इतना रस था वक्त का पता ही नहीं चला। बाहर चांद निकल आया , कमरा चांद की रौशनी से भर गया तो हमने विदा लिया। ऐसी ही हैं उषा दी। मैं हमेशा उनके घर की चाय पीना पसंद करती हूं। ताजे पत्ती की खूशबू जो उनके घर की चाय में है वह कहीं नहीं।

आयाम की साथी लेखिकाओं के साथ उषा किरण खान

आयाम, लेखिकाओं का संगठन,  केे गठन के बाद हमारी बैठकें जमने लगी हैं। लिखने -पढ़ने वाली महिलाओं की टोली में साहित्य के रंग के अलावा जीवन के तमाम रंग शामिल रहते हैं। मुझे लगता है कुछ चीजें उन्हें विरासत में मिलीं। वह है यथास्थिति से विद्रोह। हम अंदाज लगा सकते हैं कि आजादी के पहले जब स्त्रियों की दशा इतनी खराब थी उससमय उनकी मां का विधवा विवाह हुआ। आज भी हमारे समाज में विधवा विवाह मुश्किल से होता है। हम कल्पना कर सकते हैं कि उस दौर में उनकी मां, पिता और पूरे परिवार को क्या कुछ झेलना पड़ा होगा। उषा दी को उदार परंपरा अपने घर से ही मिली। पिता गांधीवादी थे। बचपन में ही राजनीति से जुड़े लोगों का घर आना-जाना था। बड़ा सा आश्रम। सावन में झांकियां निकलती। कीर्तनों की बड़ी घूम रहती। किसी दिन भगवान का फूलों का सिंगार होता, किसी दिन भगवती की पूजा होती। गांव में बड़ी दूर दूर  से कीर्तनियां आते। गुलाब, चमेली और बेले भगवती घर महंक उठता। कुंवारी लड़कियों का भोजन होता। मुहर्रम के दिनों ताजिया निकलता। पूरे गांव की औरतें ताजिया को सजाती,सवांरती। संस्कृति के विभिन्न रंगों के बीच उषा दी बड़ी हुई। इसलिए उनके विचारों में भी और उनके लेखन में भी हमारे देश की संस्कृति और सभ्यता के विभन्न रंगों का समावेश है। हमारी जिन्दगी में किस्से रंग भरते हैं। उषा दी के पास किस्सों की कमी नहीं है। उसे सुनाने की कला भी उनके पास है।

कई बार उनकी कहानियां पढ़ते हुए लगता है कि किस्से की दुनिया की वो जादूगरनी हैं। किस्सों का पिटारा लेकर बैठ गयी तो उसमें से हजार रंग झिलमिलाते रहते है। अनुभव व ज्ञान का ऐसा मेल कम दिखायी देता है,जो जिन्दगी की सोच और संवेदनाओं से लबरेज हो। घर संभालती स्त्री, नाटक लिखती स्त्री, सामाजिक असमानता के खिलाफ स्त्री। कितने मोर्चे पर उन्हें देखा। कभी खमोशी से साथ देते हुए कभी मुखर। शायद यही वजह रही होगी कि बाबा नागार्जुन की वो उतनी ही प्रिय थीं । नागार्जुन उनके पिता के मित्र थे। आजादी के आंदोलन के दौरान जेल में दोनों की मुलाकात हुई औ वे गहरे मित्र हुए। यह मित्रता पिता के गुजर जाने के बाद भी कायम रही। उषा दी को वो अपनी सगी बेटी ही मानते थे। उनकी मुन्नी के भीतर कला की इतनी बड़ी दुनिया देखकर वे खुद  हैरान रहते थे। नामवर सिंह कहते हैं नागार्जुन की काव्य भूमि विपुल है और विषम भी। विषम इतनी कि इस उंची-नीची भूमि में समतल की अभ्यत आंखें अक्सर घोखा खा जाती है। जो बस्तु औरों की संवेदना को अछूती छोड़ जाती है वही नागार्जुन के कवित्व की रचना भूमि थी। अक्खड़ और यायावर कवि अपनी मुन्नी के लिए प्यार से लबालब भरे पिता थे। जो हमेशा आर्थिक परेशानियों से घिरे रहते थे। उषा दी की मां बिना कुछ बताये उनकी मदद करती थीं। जिन्दगी इन सबसे मिलकर बनती है। उषा दी कहती है पता नहीं कितने लोगों ने मिलकर सवारा है मुझे। किन किन घाराओं से बहते-बहते यहां तक पहुंची। स्त्री का जीवन ऐसा ही है। बहते बहते ठौर लगती है।

उषा किरण खान

आम तौर पर स्त्रियों के जीवन में धर्म की गहरी भूमिका रहती है। ऐसी स्त्री कम मिलती है जिसे धार्मिक कर्मकांड. पर भरोसा नहीं हो। धर्म की गहरी समझ है उनके भीतर। इसलिए वे उस पर हंस भी पाती हैं। एकदिन हमसब उनके पास बैठे थे। धर्म पर बहस चल रही थी। उन्होंने कहा पता है कभी-कभी भगवान विष्णु की  तस्वीर देखकर ‘जिसमें वे नागशेष पर लेटे हुए हैं और लक्ष्मीजी उनका पांव दबा रही हैं’ मुझे ये ख्याल आता है कि अगर समुद्र में तैरती मछलियां देखकर नागशेष को भूख लग जाय और वे मछली खाने के लिए लपक पड़े तो विष्णुऔर लक्ष्मी जी का क्या होगा। हंसते -हंसते हमारे पेट में बल पड़ गए। मैं सोच रही थी कि कितना साहस है इस स्त्री में जो धर्म पर हंस सकती है और धर्म से गहरा अनुराग भी रखती है। जो स्त्री के जीवन में धर्म की भूमिका को जानती है और धर्म से परे मनुष्यता के पक्ष में खड़ी रहतीं हैं। शायद यही वजह है कि उनकी कहानियों  में हमेशा वैसे पात्र होते हैं जो मनुष्यता के पक्ष में खड़े रहते हैं। उनकी कहानियों में आंचलिकता की खुशबू   है। सुख,दुख, जय,पराजय का बयान ऐसा जैसे आप उस कथा के भीतर हों। उनकी कहानियों में एक सहज प्रभाव मिलता है, वे बोझिल नहीं होतीं। इस सहजता की खास वजह है उषा दी का अपने कथा-अंचल से जुड़ा होना। वे अपने इर्द-गिर्द की घटनाओं की दर्शक नहीं हैं उसकी भागीदार हैं। लोक जीवन की धारा में गहरे तक डूबी हैं।

उनकी कहानियों और उपन्यास में करुणा और प्रेम गुंथे हुए हैं। प्रेमकथा की परिणति करुणा में होती है।  भामती उपन्यास में आधी उम्र पति की सेवा में बीत जाती है तब पति को ज्ञान होता है कि भामती उनकी पत्नी है। मानवीय संवेदनाओं की इतनी सूक्ष्म और सहज अभिव्यक्ति उनकी  कहानियों में है कि आप पढ़ेगें तो डूब जायेंगे और जो डूबे सो पार। उषा दी को मैंने टुकडे-टुकड़े में जाना है। वे बेहद जिंदादिल और दिलेर औरत हैं। जीवन से लबालब भरी हुई। उनके संपूर्ण कला-अनुभव के हमसब हिस्सेदार हैं। उनको पढ़ते हुए उन पात्रों की आप हरारत महसूस कर सकते हैं। विविध रंगों और छवियों के साथ उनकी कहानियां हमारे दिलों में उतरती है और गालिब की नज्म की तरह वह दिल के आर -पार नही जाती दिल में धंस जाती है।

‘सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान’ (तृतीय) के लिए आवेदन / संस्तुतियां आमंत्रित

स्त्रीकाल के द्वारा तृतीय  ‘सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान’ (तृतीय) के लिए आवेदन / संस्तुतियां  15 दिसंबर  2016 तक आमंत्रित हैं.

सावित्रीबाई फुले वैचारिकी सम्मान (द्वितीय ) से सम्मानित होती  लेखिका अनिता भारती

वर्ष 2014 से प्रारंभ यह सम्मान हिन्दी की मूल या भारतीय भाषाओं से हिन्दी  में  अनुदित स्त्रीवादी वैचारिकी की किसी एक किताब के लिए उसके लेखक ( स्त्री या पुरुष ) को दिया जाने वाला है.

प्रथम  ‘सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान‘ शर्मिला रेगे को  उनकी किताब  “अगेंस्ट द मैडनेस ऑफ़ मनु : बी आर आम्बेडकर्स राइटिंग ऑन ब्रैहम्निकल पैट्रीयार्की’ के लिए दिया गया था.


दूसरे साल यह सम्मान अनिता भारती को उनकी किताब ‘समकालीन नारीवाद: और दलित स्त्री का प्रतिरोध’ को दिया गया. सम्मानित लेखिका /  लेखक को 12 हजार रुपये की राशि प्रदान की जायेगी. तृतीय  ‘सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान’ के लिए  2010 से 2015 तक  छपी किताबें शामिल की  जायेंगी .

आवेदन या संस्तुतियां  भेजने की अंतिम तिथि : 15 दिसंबर 2016 

निम्नांकित पते पर आवेदन और संस्तुतियां भेजें  :
अनिता सिंह , द्वारा नरेश शर्मा Wz43c , पोसंगीपुर , जनकपुरी , नई दिल्ली -110058

किताबों की  दो प्रतियां अपेक्षित हैं. 5 सदस्यों की सदस्यता वाला एक  निर्णायक मन्डल  सम्मान की जाने वाली एक किताब को संस्तुतित / चयनित करेगा .

इस संदर्भ में किसी भी विशेष जानकारी या स्पष्टता के लिए मेल करें या संपर्क करें: themarginalised@gmail.com 
08130284314, 09650164016,  08800671615

सत्ता के उच्च पदों पर जातिवादी और सांप्रदायिक मनोवृति के लोगआसीन हैं: तीस्ता सीतलवाड़

गुजरात में सत्ता के दमन चक्र के खिलाफ सबसे मुखर आवाज रही सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ से उत्पल कान्त अनीस और संजीव चन्दन की बातचीत

आज के विविध संदर्भों में हमारे सामने कैसी चुनौतियां हैं और इनसे कैसे निबटा जा सकता है?
देश की आजादी, बोलने की आजादी, राजनीतिक आजादी, पत्रकारिता की आजादी सब पर हमले हो रहे हैं. मै मानती हूं कि आज लगभग ढाई साल से जो समय है वह एक अघोषित इमरजेंसी का स्वरूप ले चुका है. गैर लोकशाही और गैर जम्हूरियत का बोलबाला है, लोगों के खिलाफ तंत्र का इस्तेमाल किया जा रहा है. आज जो खतरनाक ढ़ंग से हमारे विश्वविद्यालयों में छात्रों को प्रताड़ित किया जा रहा है, वह इतिहास में नरेंद मोदी का एक गैरजिम्मेदार और काला समय माना जायेगा. विश्वविद्यालयों और केन्द्रीय शिक्षण संस्थाओं में आजाद ख्याल वाले, दलित-बहुजन सोच वाले नौजवानों पर हमला किया जा रहा है. वो नहीं चाहते कि इस देश में आजाद सोच वाले नौजवान पैदा हों. जिस तरह से रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या हुई और हैदराबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, जेएनयू, एफटीआईआई में जो-जो हो रहा है, वह  एक प्रभुत्वकारी  ब्राह्मणवादी रणनीति है. जो हिन्दू राष्ट्रवाद (जिसे मैं हिन्दू प्रभुतावाद मानती हूं – यहां हमें राष्ट्रवाद का नाम ही नहीं देना चाहिए) मेजोटेरियन (बहुसंख्यकवाद) का एक प्रतीक है.

आपको नहीं लगता कि जैसे गुजरात में आप सब लगभग 15 सालों से संघर्ष कर रही हैं, फिर भी उनकी  सरकार लगातार बनी हुई है,  अर्थात मेजोरिटी  इनके साथ लगातार खड़े होती दिख रही है. ठीक ऐसा ही अभी केंद्र में भी दिख रहा है कि तमाम लड़ाईयां लोग लड़ रहे हैं,  लेकिन वे लड़ाईयां हार जाई जा रही है. जैसे हैदराबाद में अप्पाराव बने हुए हैं, एफटीआईआई में गजेन्द्र चौहान बने हुए हैं, यह है क्या आखिर?
अभी वे लोग केंद्र में भी शासन कर रहे हैं. उनके पास बहुमत की एक सरकार है. लेकिन अगर जीत-हार की बात करें, तो आपको दिल्ली और बिहार के चुनाव भी देखने होंगे. इस सरकार को आये हुए ढाई साल हुए हैं मगर इस ढाई साल में कितना नुकसान हुआ है, ये आपको तौलना (आकलन करना) पड़ेगा. जहां पर उनका शासन है, उनकी सत्ता है, वे गलत इस्तेमाल कर रहे हैं. इतने तीखे विरोध के बावजूद वे विरोध को प्रतिक्रिया नहीं दे रहे हैं तो ये हमारी हार नहीं है,  बल्कि उनकी तरफ से लोकशाही को ठुकराने का प्रयास है, इसको ऐसे सोचना चाहिए. अगर अप्पाराव बर्ख़ास्त हो चुके थे तो उनको वापस जाकर लाया गया. पता नहीं वहां एक अजीब तरह की राजनीति चल रही है-आज भी राधिका और रोहित  राजू वेमुला (रोहित वेमुला के मां, भाई_ से सवाल किया जा रहा है कि वे  दलित हैं  कि नहीं . जिलाधिकारी, राष्ट्रीय अनूसूचित जाति आयोग को हलफ़नामा देता है कि वे लोग दलित हैं. फिर 10 दिन भी नहीं होता कि जिलाधिकारी दोबारा जांच करता है कि ये दलित हैं  कि नहीं. यह  केंद्र  सरकार का हावी होना और अनैतिक दवाब है.

जब व्यवस्था जिद्दी हो जाय तो लोकतंत्र में ऐसी कौन सा कारवाई होगी कि जनता की आवाज सुनी जा सकेगी, जनता के अनुरूप व्यवस्था से काम करवाया जा सकेगा. अंततः आप 15 सालों से लड़ाई लड़ रही हैं और परिणाम नकारात्मक आता जा रहा है?
आप नकारात्मक परिणाम नही कह सकते हैं. 137 लोगों को हमलोगों ने उम्रकैद की सजा दिलवाई है. आप ये कैसे मान सकते हैं कि यह असफलता है. हमारे देश में संसदीय लोकतंत्र एक अलग रास्ते पर जाती है और संवैधानिक लोकतंत्र की अलग. हमारे संसदीय लोकतंत्र में ऐसे प्रावधान होते कि जो लोग इस तरह के कामों को अंजाम देते हैं, वे 10 सालों तक चुनाव नही लड़ सकते हैं तो ये लोग आज संसदीय लोकतंत्र में नही होते. हमारी जम्हूरियत और लोकशाही में एक व्यापक बदलाव की जरूरत है, पहली बार दंगो को लेकर 137 लोगों को उम्रकैद की सजा हुई है तो आप यह कैसे कह सकते हैं कि ये असफल लड़ाई है. हमे यह याद दिलाना पड़ेगा कि नरोदा पाटिया का फैसला अगर 2012 में आया है तो उसे साजिश मानी गयी थी, माया कोडनानी और बाबू बजरंगी को सजा भी हुई थी और आज भी जाकिया जाफ़री का मुक़दमा हाईकोर्ट में पेंडिंग है. जजमेंट अच्छे भी आते हैं और बुरे भी आते हैं. अगर दलित, पिछड़ों के मामले देखें तो बहुत सारे जजमेंट इनके ख़िलाफ गया है तो क्या इसका मतलब ये है कि बाबा साहेब आंबेडकर द्वारा बनाया गया संविधान गलत है. क्या आप ऐसा कहेंगे? सवाल है कि हमारे समाज में वे लोग आज भी सत्ता के उच्च पदों पर आसीन हैं,  जो जातिवादी और सांप्रदायिक मनोवृति के लोग है. सबसे पहले हमें यहां बदलने की जरूरत है.

यह तो स्वाभाविक है कि संविधान के द्वारा ही हम अपने अधिकारों को हासिल कर सकते हैं और यह एक बड़ा हथियार है. बाबा साहेब डा. आंबेडकर ने जनता को सशक्त करने की जो रणनीति बनाई थी म स्टेट को मजबूत करने की, वो हमारे पक्ष में जाता है.  तब भी सवाल यह बनता है कि जो संसदीय राजनीति है, वह जनपक्षी नहीं होगी, तो उसका नुकसान होगा. जैसे हम गुलबर्गा सोसायटी वाले जजमेंट के साथ हम देख रहे हैं कि गुजरात में पिछले 15 सालों से न्यायपालिका का चेहरा बदला है, तो न्यायपालिका में जो लोग बैठे हैं वो तय करेंगे न्याय को तो न्याय का स्वरूप बदल जायेगा. मनुस्मृति की वैचारिकता वाले अगर न्यायपालिका में बैठे हैं,  तो ये वैसे ही न्याय के साथ आयेंगे. मूलतः ये खतरा है सिर्फ संवैधानिक लड़ाई लड़ने का ….

यह सवाल जो संसदीय राजनीति में है, आप उनसे जरूर पूछियेगा कि संवैधानिक मूल्यों का सवाल आप कब चुनाव में लायेंगे. जब ये सवाल लाये जायेंगे, जब ये सवाल पत्रकार सही ढ़ंग से करेंगे तब जाकर ये हमारे लोकतंत्र को और मजबूती प्रदान करेंगे.
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क्या आप डरती नहीं हैं?
डर किसको नहीं है. हम भी इंसान ही है. हम जरूर डरते हैं मगर हम डर का शिकार नहीं बन जाते. हम डर को सामूहिक कार्रवाई में बदल देते हैं और जोर से संघर्ष करना समझते हैं. डर तो सबको है. हमारे लिए, हमारे परिवार के लिए, सबके लिए. और वो चाहते भी हैं कि हमारे ऊपर इस तरह का हमला हो. मगर मैं मानती हूं कि हमारी सुरक्षा जनता में है, आवाम में है.

लेकिन पूरे दक्षिण एशिया में,  दुनियाभर में यह खतरा देखा जा रहा है. आप जैसे जो लोग काम कर रहे हैं, उनपर लगातार हमले हो रहे हैं तो….
देखिये यह दौर बहुत चुनौती भरा है. मैंने कई बार कहा है कि ये चुनौती देनेवाला दौर है, खतरे भी बहुत हैं, आज हमें यह मानना पड़ेगा कि आर एस एस जैसी फासीवादी ताकतें संवैधानिक पदों पर बैठकर हमारे ऊपर हावी हैं. तो यह जाहिर है कि इसका मूल्य किसी न किसी को तो चुकाना ही है. प्रतिरोध होगा, होना ही है आज न तो कल तो हमले भी बढ़ेंगे

कुछ ऐसी घटनाएं शेयर करना चाहेंगी जब आपको लगा हो कि कोई सुनियोजित हमला किया गया है जब आप किसी सभा को संबोधित कर रही थी या जनसंपर्क में थीं
हैदराबाद विश्विद्यालय में, उस्मानिया विश्विद्यालय में, गुजरात उच्चन्यायलय में कोर्ट के अन्दर आदि कई जगह. जब मैं हरेन पांड्या के पिता विठ्ठलभाई पांड्या से मिलने जा रही थी,  जिन्होंने  सीधे  नरेन्द्र मोदी के खिलाफ लड़ाई छेड़ रखी थी. उनका मानना था कि उनके बेटे का क़त्ल उन्हीं (मोदी जी ) के हाथों से हुई है और जब मैं उनके घर छायाबेन और विठ्ठलभाई पांड्या को मिलने उनके घर जाती थी, तो बराबर मुझे ये सब झेलना पड़ता था, मेरे ऊपर हमले होते थे. जस्टिस वर्मा ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में इसको रिकॉर्ड भी किया है. ये खतरे शुरू से हैं  और आज ये बढ़ भी गये हैं , क्योंकि वे ताकतें अभी केंद्र के ऊपर हावी है.

आगे क्या रणनीति है या आगे आप क्या करने वाली हैं?
मुझे लगता है कि सबसे जरूरी और ठोस रणनीति है राजनीतिक विपक्षी दल और राजनीतिक प्रतिरोधी शक्तियों को जागृत करना. हम अपना काम कर रहे हैं और ये काम बहुत अहम है. लेकिन जब तक राजनीतिक रूप से ये काम नहीं होगा तब तक हम उनको चुनावी शिकस्त नहीं दे सकते हैं, उनको सत्ता से विस्थापित नहीं कर सकते है. सबसे पहले हमें यह लगता है कि हमारी जो सबसे बड़ी चुनौती है वह है राजनीतिक विपक्षी दलों को एकत्रित करते हुए लामबंद करना. हमारे लिए एकरेखीय बायनरी  (linear binary) एक ही होनी चाहिए: जो संविधान मानने वाली ताकतें हैं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसी ताकतें, जो संविधान को नहीं मानतीं हैं. मैं कुछ दिनों पहले गोविन्दाचार्य के बयान के तरफ धयान दिलाना चाहूंगी, उन्होंने साफ-साफ कहा है कि हां, हम संविधान को बदलेंगे, अगर भारतीय संसद को इसकी जरूरत पडी. मैं मानती हूं कि बाबा साहेब को मानने वाली देश की जो जनता है, वह यह आसानी से नहीं होने देगी.

एक बात पूछना चाहूंगा तीस्ता कि जब आपकी आर्थिक नाकेबंदी हो जायेगी- आप जैसे लोगों की भी और आपकी भी, तो एक संघर्ष का प्रारूप क्या होगा? जैसे देखा जा रहा है कि वाम दलों में भी पूर्णकालिक कार्यकर्ता मिलने मुश्किल हो रहे हैं. धीरे-धीरे कार्यकर्त्ता मिलने बंद हो जाते हैं. तो इसका क्या प्रारूप होगा?

मैं आपके माध्यम से बताना चाहूंगी कि अभी जो हमारा FCRA को रद्द किया गया, बैंक खाते हमारे फ्रीज हुए जनवरी 2014 से, तो ये कोई नई बात नहीं है. 2014 से गुजरात पुलिस ने हमारे FCRA खाते को फ्रीज़ करके रखा है और हमरा जो संगठन है,  चाहे वह  सिटीजन फॉर जस्टिस एंड पीस हो या सबरंग, कभी सिर्फ विदेशी चंदों पर निर्भर नहीं था. हमें चंदे, अंशदान देने वाले भारतीय नागरिक भी हैं. वो आज भी है. ये कैम्पेन,  जो हमारे खिलाफ चलाया जा रहा है वो इसलिए चलाया जा रहा है कि उनको डराया जाय कि आप इनके साथ जुडो मत और इनको चंदे मत दो. फिलहाल हमारा काम जारी है और हम फिलहाल उम्मीद करते हैं कि घरेलू चंदे से हमारा काम चलता रहेगा.

दलित-मुस्लिम एकता की बात कर रही हैं आप, पर सवाल है कि यह एकता किसके बरक्स होगी, क्योंकि शेष बच जाता है ओ बी सी समाज और ब्राह्मण समाज
एकजूट होना, संवैधानिक उसूलों पर तो सब के लिए जरूरी है, बहुजन, महिला, ब्राह्मण, ठाकुर, दलित और मुसलमान. दलित और मुसलमान के बारे में मैंने एक खास जिक्र उत्तरप्रदेश चुनाव को लेकर इसलिए किया है कि अक्सर कौमी/सांप्रदायिक हिंसा के पीछे यह बात आती है. दलित का इस्तेमाल मुसलमानों के खिलाफ.  अगर मुज़फ्फरनगर देखें तो वहां मुसलमान लड़के द्वारा  दलित नौजवान महिला की  छेड़खानी का मामला बनाया गया था. अगर सामाजिक स्तर पर एकजूट होकर हम यह कह सकते कि हम सामाजिक मुद्दों पर साथ में खड़े रहेंगे, नाइंसाफी के खिलाफ- छूत-अछूत की राजनीति के खिलाफ़; संविधानिक उसूलोंको सामने रखते हुए,  तो हो सकता है, संभव है कि हिंसा भड़काने का काम जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बार-बार करता है, वह असफल रहे. हाल में हमने खबर पढी कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारक राकेश सिन्हा उत्तरप्रदेश के बारे में इस प्रचार में जोर लगाने वाले हैं कि दलित-मुसलमान कभी दोस्त नहीं बन सकते क्यों?

पूरी बातचीत सुनें: 

आपको क्या ऐसा नहीं महसूस होता कि संघ के प्रभाव को चुनौती देने के लिए सबसे कारगर मुद्दे जाति के सवालों से बनते हैं और ब्राह्मणवादी संस्कृति पर स्थाई प्रहार ही संघ के वर्णाश्रमवादी हिन्दू राष्ट्रवाद का समाधान है?
अगर हम यह सांस्कृतिक और ऐतिहासिक जंग/संघर्ष नहीं छेड़ेंगे तो संघ को हराना मुश्किल है. कहानी शुरू होती है एकलव्य से और आज तक सिलसिला जारी है. मैं जब इतिहास पढ़ती हूं या शिक्षकों के साथ बैठती हूं तो सावित्रीबाई फुले के योगदान– लड़कियों के लिए खोली गई पहली पाठशाला-भीड़ेवाडा पुणे में, इस ख्याल के साथ किहर जाति और धर्म की लड़कियां एक साथ एक कक्षा में पढ़ेंगी, महत्वपूर्ण दिखती हैं. क्या तीस्ता सीतलवाड़ को यह एहसास नहीं होने चाहिए कि स्त्री के शिक्षण को लेकर ब्राह्मणवाद क्या सोचता है? जब सावित्रीबाई फूले– जो हमारे महाराष्ट्र में क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फूले मानी जाती है,  और जिनका जन्मदिन 3 जनवरी को हम शिक्षक दिवस मानते हैं,  तथा जोतिबा फूले का बहिष्कार हुआ तो साथ देने वाले पुणे शहर के उस्मान शेख थे,  जिनकी बहन फातिमा शेख सावित्रीबाई फूले के स्कूल में उनके साथ पहली शिक्षिका बनी. यह है हमारा इतिहास.

यह साक्षात्कार संक्षिप्त तौर पर हिन्दी अंग्रेजी में फॉरवर्ड प्रेस में पढ़ा जा सकता है.

मैं भारतीय मुसलमान स्त्री हूं : तलाक से आगे भी जहां है मेरी

नासिरुद्दीन

मैं भारतीय हूं. मैं मुसलमान हूं. मैं भारतीय मुसलमान स्त्री हूं.
पिछले कुछ महीनों से मेरी जिंदगी के बारे में खूब बात हो रही है. मेरे जेहन में भी कई सवाल उठते रहे हैं. बात, जिंदगी के बारे में होती और बहस की सुई तलाक-तलाक-तलाक और निजी कानून पर जाकर अटक जाती है. क्या मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा मसला यही है? मेरी जिंदगी, शादी के पहले भी है, शादी के बाद भी और शादी के बिना भी. तलाक के बाद भी रहेगी. तो फिर मेरी इन जिंदगियों के मसलों के बारे में भी खुल कर क्यों बात नहीं की जाती है?

मैं इस मुल्क की शहरी हूं. यानी इस मुल्क का संविधान मेरे लिए भी है. वह जिन हकों की बात करता है, वह मेरे लिए भी होंगे. हां, मैं मुसलमान हूं, संविधान इस नाते भी मेरा कुछ ख्याल रखता होगा. मगर मैं स्त्री भी हूं- संविधान इस बिना पर मेरे साथ गैर-बराबरी की भी तो बात नहीं ही करता है. है न!

भारत में मुसलमानों की कुल आबादी करीब सवा 17 करोड़ है. यानी देश में 14.2 फीसदी मुसलमान हैं. आम समझ तो यही कहती है कि कुदरत के मुताबिक इसमें आधे पुरुष होंगे और आधी स्त्रियां होंगी. तभी तो हमें आधी आबादी कहते हैं. लेकिन, हम पुरुषों से ढाई फीसदी कम हैं! ढाई फीसदी का मतलब है कि 43 लाख 2 हजार 732 मुसलमान स्त्रियां, मुसलमान पुरुषों के मुकाबले कम हैं.

एक और नंबर देखिए. छह साल तक के मुसलमान बच्चे-बच्चियों की कुल आबादी में से लगभग तीन फीसदी लड़कियां यानी आठ लाख 30 हजार लड़कियां एक दशक में कम हो गयी हैं. पूरे मुल्क में छह साल तक की उम्र के प्रति हजार मुसलमान लड़कों के मुकाबले 943 लड़कियां हैं. 2001 में यह तादाद 950 थी. यानी हम लड़कियां घट रही हैं. यह तादाद अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग है. मसलन, जम्मू-कश्मीर में 871, तो उत्तर प्रदेश में 933 है.

अगर कुदरत की वजह से लड़कियां कम नहीं हैं, तो हम बेटियां कहां गायब हो गयीं? मतलब साफ है, हम मुसलमान बेटियां अपने घरों में अनचाही हैं. संविधान कहता है, मेरे साथ सिर्फ इसलिए फर्क नहीं किया जायेगा, क्योंकि मैं स्त्री हूं. तो फिर इस फर्क पर शोर क्यों नहीं मचता? आखिर हम बेटियों का वजूद खतरे में पड़ने से हमारा मजहब खतरे में क्यों नहीं पड़ता?

अगर हम जी गयीं, न चाहते हुए भी बड़ी हो गयीं, तो हमारा भी मन करता है कि हम पढ़े-लिखें. लेकिन, हमें तो पढ़ने भी नहीं दिया जाता. वैसे ही मुसलमानों में साक्षर लोगों की तादाद सबसे कम (68.5 फीसदी) है. साक्षर यानी जो नाम लिख लेते हैं. लेकिन, यहां भी पुरुष हमसे आगे हैं.

देशभर में मुसलमान पुरुषों  की 75 फीसदी आबादी साक्षर है, तो हमारी तादाद सिर्फ 62 फीसदी है. 13 फीसदी का फर्क क्यों है? हम लड़कियां बिहार में 48.4 फीसदी, झारखंड में 56.4 फीसदी, उत्तर प्रदेश में 50.5 फीसदी और पश्चिम बंगाल में 64.8 फीसदी ही साक्षर हैं. यानी पूरे देश में जो मुसलमान लड़कियां पढ़-लिख नहीं सकतीं, उनकी तादाद लगभग चार करोड़ चालीस लाख है. पूरे मुल्क में हम सिर्फ साढ़े दस फीसदी मुसलमान लड़कियां ही मैट्रिक कर पायी हैं. सिर्फ साढ़े सात फीसदी ही इंटर हैं और ग्रेजुएट महज चार फीसदी. जरा सोचिए कि 21वीं सदी में हम कैसा समाजी निजाम कायम करना चाहते हैं?

हम काम करना चाहते हैं, लेकिन हमारे लिए काम कहां है. आंकड़े बता रहे हैं कि लगभग 15 फीसदी हम मुसलमान महिलाएं ही किसी न किसी तरह के काम में लगी हुई हैं. और हमारी बड़ी तादाद दिहाड़ी काम में लगी हुई है, यह बताने की जरूरत नहीं है. हम बताना चाहती हैं कि 64 लाख मुसलमान महिलाएं काम करने की ख्वाहिश रखती हैं, पर उनके पास कोई काम नहीं है. क्या यह हमारी जिंदगी का मुद्दा नहीं है?

हमारी जिंदगी पर हमारा दखल नहीं है. हम अपने फैसले खुद नहीं ले सकती हैं. इसीलिए हममें से साढ़े तीन करोड़ महिलाओं की शादी 21 साल से कम में ही कर दी गयी. आज भी ऐसी शादियां हो रही हैं. 2011 में हम में से लगभग पौने तीन लाख ऐसी मुसलमान लड़कियां शादीशुदा हैं, जिनकी उम्र 10 से 14 साल के बीच है. कानूनी रूप से ऐसा करना जुर्म है. फिर भी यह जुर्म हमारे साथ हो रहा है. 2011 में 21 लाख से ज्यादा हम मुसलमान स्त्रियां तलाकशुदा की जिंदगी गुजार रही हैं. इनमें 14 साल की तलाकशुदा लड़कियां भी हैं.

वैसे तो हर लड़की के लिए सुरक्षा एक अहम मुद्दा है. मगर, हम मुसलमान लड़कियों के बारे में जरा अलग से गौर करना जरूरी है. दंगे-फसाद हमारी जिंदगी के साथ चस्पां हो गये हैं.

दंगों में हमारे साथ यौन हिंसा आम है. हमारे आने-जाने पर पाबंदी लगा दी जाती है. हमारी पढ़ाई छुड़वा दी जाती है. कम उम्र में शादी कर दी जाती है. हमें हमेशा शक की निगाह से देखा जाता है. जब न तब, पुलिस हमारे घर के मर्दों को पकड़ कर ले जाती है. बाप-भाई-पति-बेटा अगर मारा गया या पकड़ा गया, तो उसके असर को भी हम महिलाओं को ही सबसे ज्यादा झेलना पड़ता है. कहीं कुछ होता है, तो हम खौफ में जीते हैं. मगर संविधान ने तो हर नागरिक को बेखौफ जिंदगी जीने की गारंटी दी है, फिर यह खौफ क्यों है?

हमने सुना है कि सच्चर आयोग ने मुसलमानों के हालात को बेहतर बनाने के लिए कई सिफारिशें की हैं. सुना है, वे लागू भी हो रही हैं. मगर, ज्यादातर मुसलमानों और खासतौर पर मुसलिम महिलाओं की जिंदगी में तो बहुत बदलाव दिख नहीं रहा है.

हमारा मसला सिर्फ निजी कानून नहीं है. हम बराबरी और इंसाफ पर आधारित नागरिक होने का हक चाहते हैं.

शादी और तलाक के पीछे-आगे भी जहां है. हम उस जहां का लुत्फ लेना चाहते हैं. हम भी इंसान हैं. हमारे पास अक्ल और हुनर है. हमें बराबरी से जीने का मौका, बराबरी से पढ़ने का मौका, बराबरी से बेखौफ अपनी जिंदगी के बारे में फैसला लेने का मौका चाहिए. शायद संविधान और इसलाम दोनों की रूह यही है. इस रूह को बरकरार रखने के लिए भी हंगामा बरपा क्यों नहीं होता?

(सभी आंकड़े 2011 की जनगणना से हैं.)
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं / प्रभात खबर से साभार

मी लार्ड, स्त्रीवाद का रंग ‘पिंक’ है ! कुछ-कुछ (?) लाल और नीला भी

पिंक फिल्म के लिए बजती तालियों के बीच एक बहस फेसबुक पर अलग ढंग से हुई. एक ही उद्देश्य, स्त्रीवाद के पक्ष में, के लिए दो अलग -अलग कोणों से इस फिल्म के पाठ और बहस जरा ठहरकर पढ़े जाने की मांग करते हैं. वरिष्ठ लेखिका और आलोचक अर्चना वर्मा पिंक में  स्त्री की स्वतंत्रता, उसके अधिकार और आधुनिक स्त्री की पितृसत्ता से संघर्ष देख रही हैं और स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन फिल्म को अंततः पितृसत्ता के पक्ष में देख रहे हैं. आइये समझते हैं, इस बहस को:

अर्चना वर्मा का पहला पोस्ट

पिंक ( PINK ) देख कर लौटने के बाद

बहुत दिन पहले, हमारे बचपन में
आवश्यक चेतावनी की
तरह हड्डियों के क्रॉस मे बीच खोपड़ी का निशान बना होता
था। शायद अब भी होता हो। मैने बहुत दिनों से देखा नहीं है। उसके नीचे
अंग्रेजी में जो लिखा होता था उसको मैँ तब के अपने ध्वन्यात्मक संज्ञान के
सहारे पढ़ती थी, ‘डांगारूस’। थोड़ा बड़े होने के बाद पता चला यह डेंजरस है।
मतलब ख़तरनाक।

पिंक का एक दृश्य

स्त्री पुनःपरिभाषित कर रही है अपने स्वत्व को। नये सिरे से रच रही है अपने वजूद को।
और
उसके आस-पास की दुनिया पीछे, बहुत पीछे, छूटी जा रही है। इस नयी स्त्री
नामके अजूबे को वह देखती है कौतूहल से, आशंका से। आक्रामकता के साथ,। सिर्फ़
देख कर छोड़ नहीं देती, हमला भी करती है। बचने न पाये। अपनी अपनी
बाल्कनी मेँ खड़े अड़ोसी पड़ोसी ताकते-झाँकते खड़े रहते हैँ उस बाल्कनी की तरफ़
जहाँ तीन कामकाजी लड़कियाँ रहती हैं, अपनी unconventional ज़िन्दग़ियों के
साथ।

और फ़िल्म के बिल्कुल शुरू के एक दृश्य मेँ दीपक सहगल यानी अमिताभ
बच्चन भी अपनी बाल्कनी से इस बाल्कनी की तरफ़ शायद कौतूहल, शायद आशंका से
ताकते खड़े हैं, बुज़ुर्गवार, जहाँ दरवाज़ा बन्द करके परदा खींच दिया जाता है।
अचानक संरक्षक की भूमिका में विकसित हो उठता है यह सम्बन्ध जब ऐन उनकी
आँखों के सामने उन तीनों मेँ से एक लड़की सुबह की सैर के समय एक कार के भीतर
घसीट ली जाती है। यह प्रतिशोध है। इस घटना की एक पृष्ठभूमि है, हिंसक।

एक
ही age-group के तीन लड़के और तीन लड़कियाँ।
लेकिन सदियों का फ़ासला है दोनो
की मानसिकताओं के बीच। एक चौथा भी है, लड़का, बीच के फ़ासले में किसी जगह। इस फ़िल्म में कोर्टरूम ड्रामा का इस्तेमाल पितृसत्ता के साथ स्त्री-पक्ष के सम्बन्ध के निरूपण के लिये किया गया है।

फिल्म पार्च्ड का एक दृश्य

पितृसत्ता
कोई नीरन्ध्र एकाश्मिक व्यवस्था नहीं है,
स्त्री-पक्ष भी भी सामाजिक
बहुलताओं और अनेक स्तरों का जटिल पुलिन्दा है। यहाँ जिस नयी स्त्री की बात
की जा रही है उसे किसी वर्ग विशेष की या privileged satus की या अपवाद कहकर
रफ़ा-दफ़ा नहीं किया जा सकता। उसकी संख्या बढ रही है। अब अपने आप में पूरा
तबका बन चुकी है। वह किसी भी भौगोलिक लोकेशन की, किसी भी पारिवारिक
पृष्ठभूमि की हो सकती है। समान बात यह है कि वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर
है, अपनी जिम्मेदारी, प्रायः पारिवारिक जिम्मेदारियाँ भी, खुद सँभालती है।
और उसके पास एक स्त्री-देह है। और वह चाहे अपने चुनाव से, या चाहे किसी
आर्थिक-पारिवारिक विवशता से परिवार से दूर रहती है। ऐसी स्थितियों का सामना
करते हुए रहती है जिसकी कोई ट्रेनिंग बल्कि, शायद जानकारी भी, उसके पास
नहीं है या जो परम्परागत ट्रेनिंग उसे मिली होगी शायद उसकी जकड़न से वह बाहर
आना चाहती है। ऐसे कोई inhibitions भी उसके पास नहीं है जो वैसे तो अपने
निषेधी, वर्जनात्मक स्वभाव के कारण अवज्ञा का पात्र होते हैँ लेकिन शायद
स्वयं अपने निर्णय और चुनाव से माने जायें तो बहुत बार बचाव की कार्रवाई बन
सकते हैं। लेकिन दिक्कत यह है कि इस स्वच्छंदचेता स्त्री के लिये निषेध और
वर्जना को स्वैच्छिक निर्णय बनाने की ज़रूरत की कोई समझ अभी तक नहीं है।
संभावित ख़तरा क्या क्या और कहाँ कहाँ हो सकता है इसका कोई अनुभव या अन्दाज़ा
उसके पास नहीं है। उसके लिये अनुभव से आविष्कृत हो रही है दुनिया। अभी वह ‘
डांगारूस’ पढ़ती है और नहीं जानती यह ‘ डेंजरस ’ है, ख़तरनाक। निश्शंक भाव
से किसी भी कोने में प्रवेश कर जाती है, उसे निरापद और सुरक्षित समझती हुई
लेकिन अचानक आविष्कार की तरह खुद को जंगल में और जानवर के सामने पाती है।

पितृसत्ता
के दो हिस्से हैं। एक पितृ, दूसरा सत्ता।
एक चेहरा पिता का भी है, उसमें
सन्तति के लिये, पुत्री के लिये भी, स्नेह, संरक्षण और अनुकम्पा का भी एक
अर्थ संभावित रूप से निहित है। दूसरा चेहरा पति का है। इस शब्द का प्रयोग
यहाँ में दाम्पत्त्य सम्बन्ध वाले पति के अर्थ में नहीं, सत्ताशाली वाले
अर्थ में कर रही हूँ, जैसे नरपति, भूपति वगैरह। बातचीत की सुविधा के लिये
एक को पितृसत्ता कह लेते हैं, दूसरी को पुरुषसत्ता। पुरुषसत्ता के प्रवक्ता
की भूमिका में पीयूष मिश्र को जो body language दी गयी उसका यही अभिप्राय
है – दबंग, आक्रामक, उत्पीड़क। उसके मुकाबले पितृसत्ता के प्रवक्ता की
भूमिका मेँ अमिताभ हैं, धीमी आवाज़, कौतूहल और आशंका से शुरुआत, थोड़ा
अनिश्चय मानो अभी टटोल रहे हों कि यह चीज़ क्या है, यह नयी औरत जिसे वे
defend कर रहे हैं। किन्ही पूर्वनिर्धारित मान्यताओं के हिसाब से उस जज
करते हुए नहीं, उसे समझने की कोशिश करते हुए। फ़िल्म की संरचना एक
कोर्टरूम ड्रामा की है लेकिन कथ्य केवल मौजूदा केस को सुलझाने, दूध का दूध
और पानी का पानी करने और फँसाई जाती लड़कियों को साफ़ बचा लाने का नहीं है।

पिंक
का कोर्टरूम ड्रामा इन दोनो सत्ताओं के बीच बहस का है।
एक पक्ष पुरुषसत्ता
का है। आक्रमणकारी लड़के और उन के बचाव में खड़ा, उनसे भी अधिक आक्रामक
वकील। उनका वकील। गरजता, दबाता, मामले को उलटता, तस्वीर को बदलता। उनके पास
सबसे बड़ा हथियार चरित्र-हनन का है। निमन्त्रण देने वाली, ब्लैकमेल करने
वाली, पैसा लेकर सम्बन्ध बनाने वाली। यह उसका पहला फन्दा है। यही आखिरी भी
क्योंकि उसके आगे स्त्री हमेशा घुटने टेक देती है, हथियार डाल देती है।
जबकि उसकी स्वच्छन्दता दुश्चरित्रता नहीं है, वह स्वच्छन्दता है,
आत्म-निर्णय, अपना चुनाव है। सिर्फ़। और कठघरे में खड़ी फ़लक अली (गज़ब का
अभिनय। अभिनेत्री का नाम मैने miss कर दिया, hats off to her ) का विस्फोट
और break down इस script का विजय क्षण है, जिसमें वह यह आखिरी फन्दा भी काट
कर निकल जाती है। लिये भी हों पैसे, होऊँ भी मै दुश्चरित्र, तो? आगे बोलो।
अब करो मेरे अधिकार की, मेरे साथ न्याय की बात !

स्त्री-पक्ष का
मुकद्मा भी पितृसत्ता के प्रतिनिधि से लड़वाया गया है
। क्यों? महिला वकीलों
की कोई कमी नहीं हिन्दुस्तान में। और बहुत सी, बल्कि शायद ज्यादातर,
फ़ेमिनिस्ट भी होंगी और स्त्री के साथ अन्याय के विरुद्ध रियायती दरों पर या
नि:शुल्क भी मुकद्मा लड़ती होंगी लेकिन फ़िल्म की स्क्रिप्ट मेँ यह समझ
दिखाई देती है कि समस्या का हल स्त्री पक्ष बनाम पुरुष पक्ष के अनादि अनन्त
मुकाबले मे नहीं है। पुरुष-सत्ता का आखिरी फन्दा काट कर निकल गयी स्त्री
के लिये पितृसत्ता को स्पेस बनानी होगी। एक और बिन्दु पर मैने इस फ़िल्म
के साथ खास तौर से idenificaion का अनुभव किया। निर्भया काण्ड से लेकर और
खूर्शीद अनवर की आत्महत्या के बाद के कई महीनों तक की मानसिक परेशानी के
दौरान मैने एक मरदाना कमजोरी नामका सीरियल पोस्ट लिखना शुरू किया था जो
अन्ततः अन्य व्यस्तताओं के कारण बीच मेँ ही छूट गया। जो कुछ मैने उसमें
कहना शुरू किया था और कुछ जो कहने से बाकी रह गया था वह यहाँ, इस फ़िल्म मेँ
अमिताभ बच्चन कोड ऑफ़ कण्डक्ट मैनुअल के रूल्स की तरह दर्ज किया है। वह
लड़कों के लिये स्त्री-पक्ष से संवाद और लड़कियों के लिये पुरुष पक्ष से
सतर्कता और सावधानी का संकेत, डांगारूस के सही पाठ ‘डेंजरस’ की समझ है।
मेरे लिये वह कोई नैतिक निर्णय नहीं, न कोई condemnation, लेकिन बेशक,
आत्मरक्षा के लिये आवश्यक सावधानी और सतर्कता का निशान ज़रूर ! उसे जानने के
बाद कोई अपनी स्वच्छन्दता को जैसे चाहे वैसे परिभाषित करे, यह उसका अपना
निर्णय होगा।

ऑफ स्क्रीन फिल्म के कलाकार

फ़िल्म मेँ और भी दो चेहरे हैं यहाँ पितृसत्ता के। एक तो
तीनों लड़कियों का मकानमालिक। और दूसरा मुकद्मे का जज। पहले से पता चलता है
कि अगर आप पास से जान पायें इस अजूबा शय को उन्हें प्यारी और अच्छी लड़कियाँ
पायेंगे और दूसरे से पता चलता है कि अगर आप पूर्वग्रह मुक्त और निष्पक्ष
होकर देख पायें, पुनः इसी अजूबा शय को, तो आप उनके पक्ष को समझ भी पायेंगे।

अर्चना जी का दूसरा पोस्ट

समझ के कानूनी पेंचों में पिँक के पुर्जे

संजीव चंदन की वॉल पर मैने कहा था कि सहमत होने (या करने ) की कोई ज़रूरत नहीं। न मुझे, न उसे। लेकिन अपनी असहमति के कारण मैँ बताना चाहती हूँ।

संजीव का तर्क है कि चूँकि महिलाओं को कानूनन ये अधिकार हासिल हैँ कि यौन हिंसा के मामले में ओनस ऑफ़ प्रूफ अभियुक्त का होगा, कि बलात्कार के मामले में पीडिता के चरित्र पर ट्रायल के दौरान सवाल नहीं किये जायेंगे, सेक्स वर्कर को भी अनचाहे सेक्स पर ना कहने का अधिकार होगा इसलिये पिंक सन उन्नीस सौ सत्तर के भी पीछे ले जाती है।कायदे से वे लड़कियां उस लड़के की जान भी ले सकती थीं अपने बचाव में और क़ानून ऐसा करने की इजाजत भी देता है. संजीव को इस बात से भी आपत्ति है कि उन लड़कियों के बचाव में कोई काबिल महिला वकील नहीं आती, कि एक सेकेण्ड भी कोर्ट रूम में वैसा ट्रायल नहीं चल सकता, जो फिल्म में दिखाया गया है.जज उसे रोकने के लिए कानूनी रूप से बाध्य है, लेकिन उसे पिछले दशकों में महिलाओं को हासिल अधिकार का एबीसी नहीं पता है. वह अपने कोर्ट में अनावश्यक रूप से गैर कानूनी तरीके से आरोपी महिलाओं के चरित्र से जुड़े नाटकीय सवाल करने की इजाजत लड़कों के वकील को देता है. और तो और लड़कियों को बचाने वाले वकील साहब (अमिताभ बच्चन) भी अपने मुवक्किलों, यानी लड़कियों को यह नहीं सिखा पाते कि कोर्ट रूम में जज के सामने किसी व्यक्तिगत सवाल को जवाब देने से मना करने यानी ‘नो’ कहने का अधिकार, सबसे बड़ा अधिकार है. इन आपत्तियों की वजह से संजीव को समझ नहीं आता कि कौन सा स्त्रीवादी सन्देश फ़िल्म स्त्रियों को देना चाहती है।

बाकी असहमतियाँ भी इन्हीं आपत्तियों में से ‘ऐसा न हो कर वैसा क्यों नहीं है’ जैसी अपेक्षाओं की लड़ी के रूप में सामने रखी गयी हैँ।इस सिलसिले में पहली बात तो यह है कि यहाँ किसी स्त्रीवादी संदेश के हिसाब से जीवन की प्रस्तुति करने की बजाय जीवन के अनुसार स्त्रीवादी सन्देश की रचना की गयी है। और दूसरी बात यह कि स्त्री का जीवन क्या वाकई कानूनी प्रावधान हो जाने मात्र से सुरक्षित हो जाता है?

कथानक यहाँ दरअसल  क्या बताने के लिये है? मुझको तो उसने फ़िलहाल यह बताया कि ये कानून कैसे और कितनी आसानी से subvert कर दिये जाते हैँ। मुझको जो समझ आया उसके हिसाब से ट्रायल तो बलात्कार का है ही नहीं, सॉलिसिटिंग और ब्लैकमेल का है। अभियुक्त भी लड़के नहीं हैँ, लड़कियाँ हैँ। जानलेवा हमले का अभियोग मीनल पर है। ट्रायल सेक्स के लिये ना कहने के अधिकार का है ही नहीं क्योंकि मामला तो यही बनाया गया है कि मीनल ने उकसाया, लड़के ने ‘ना’ कहा, मीनल ने पैसा माँगा, लड़के ने ना कहा, फिर मीनल ने बोतल से उसकी आंख फोड़ दी। अब मीनल साबित करे कि उसके ख़िलाफ़ जुटाये गये सारे सबूत झूठे हैँ।
कोर्टरूम है, जज है, दोनो पक्षों के वकील हैँ, अभियोगी हैं, अभियुक्त हैं, सब के सब कोर्ट रूम में ही हैं लेकिन फिर भी, माध्यम की प्रकृति के कारण यह ट्रायल कोर्टरूम के भीतर नहीं है, वह, जाहिर है कि, पूरे समाज के पक्षों प्रतिपक्षों के बीच है। इसलिये ऐसा नहीं कि ” वह अपने कोर्ट में अनावश्यक रूप से गैर कानूनी तरीके से आरोपी महिलाओं के चरित्र से जुड़े नाटकीय सवाल करने की इजाजत लड़कों के वकील को देता है।” वह रोकता है “ऑब्जेक्‍शन सस्टेन्ड” कहता है, बन्द कीजिये कहता है, फिर ‘ यह हो क्या रहा है, उस कालांश में निरन्तर निष्प्रभाव, असहाय और लगभग दयनीय होता हुआ। उसी अनुपात मेँ लड़कों का वकील और उसकी बॉडी लैग्युएज और उसकी आवाज़ प्रबल से प्रबलतर, गर्जना बल्कि चिंघाड़ में बदलती और देह क्लोज़-अप के जरिये मानो literally अपने आकार से बड़ी होती जाती है, लगभग प्रतीकात्मक आयाम धारण करती हुई समूचे दिगन्त मेँ गूँजती है। मसला कोर्टरूम के भीतर जज के इजाज़त न देने से सँभलने और हल होने वाला नहीं है। ”
इसी तरह लड़कियों के वकील का भी “असंगत” आचरण है – ” और तो और लड़कियों को बचाने वाले वकील साहब (अमिताभ बच्चन) भी अपने मुवक्किलों, यानी लड़कियों को यह नहीं सीखा पाते कि कोर्ट रूम में जज के सामने किसी व्यक्तिगत सवाल को जवाब देने से मना करने यानी ‘नो’ कहने का अधिकार, सबसे बड़ा अधिकार है.”

लेकिन यह ”option” लड़कियोँ के सामने बाकायदा रखा जाता है। ”आर यू ए वर्जिन” जैसा सवाल क्यों पूछा जा रहा है का सवाल उठाने से लेकर ”इन कैमरा” सुनवाई का भी विकल्प दिया जाता है लेकिन मीनल खुद कहती है, ”मैने कुछ ग़लत नहीं किया है सर, मैं इसका जवाब यहाँ पब्लिक में देना चाहूँगी।”
इस फ़िल्म के बारे में असल मेँ आपत्तियाँ जो भी होंगी, इस जगह पर, इस मोड़ पर होँगी लेकिन यही इसका कथ्य है, यही ईमानदारी, यही साफ़गोई, यही अपनी देह, अपनी यौनिकता, अपनी ‘हाँ’ पर अधिकार का दावा।
कोर्टरूम ड्रामा यहाँ एक रचनात्मक युक्ति है। बाँझ, विधवा, वेश्या और अन्य सताई हुई औरतों के पक्ष में खड़े होना सहज स्वाभाविक है, उनके दावे पर किसी को कोई सन्देह नहीं, उनसे हमारी अपनी भी करुणा का सम्बलन, महिमा-मण्डन होता है, उनके पक्ष में स्त्री-विमर्श के सन्देश सहज मान्य हो सकते हैँ लेकिन ये चिड़ियों जैसी सहज स्वच्छन्द लड़कियाँ इस अधिकार के दावे के साथ खड़ी हों?

निदेशक लीना यादव  और अभिनेत्री काजोल के साथ पार्च्ड फिल्म के कलाकार

इतनी हिमाकत ! बात समाज के नैतिक पाखण्ड की है, उस प्रतिपक्षी पुरुष समुदाय की है जिसकी
पवित्रता की नौटंकी को मीनल ने अपने सच से ख़तरे में डाल दिया है। फ़िल्म जो सवाल और बहस उठाती है उसका असली मुद्दा यह है। जिस समाज में लड़कों से “ग़लती हो जाती है” रोज़मर्रा की बात हो उस समाज में ” बहू बेटियों ” से यह माँग क्कियों कि वे अपनी यौनिक शु्चिता की पहरेदारी करेंगी, वह भी अपने बूते पर अकेले कर लेंगी और ” ग़लती करने वालों ” के बेशर्म हमलों के बावजूद कर लेंगी और सच भी नहीं बोलेंगी कि बिचारों की पवित्रता कहीं ख़तरे में न पढ़ जाय

लेकिन स्वच्छन्दता को सुरक्षित रखना हो तो सतर्कता ज़रूरी है, ज़रूरी है ख़तरे के निशान को पहचानना, डांगारूस को डेंजरस पढ़ना और उसका अर्थ जानना। वही इस फ़िल्म का स्त्रीवादी संदेश है, और इस बात का अहसास दिलाना भी कि सन 1970 से जो अधिकार हम कानूनन लिये बैठे हैँ वे कार्यान्विति के इन दशकों में बता चुके हैँ कि वे कितनी आसानी से सबवर्ट किये जा सकते हैँ। और जनता तो कानून के बारे में निरक्षर है ही।

संजीव चंदन का लेख : क्यों स्त्रीविरोधी है अतिनाटकीय  फिल्म  पिंक

और संजीव चंदन का यह पोस्ट भी

पार्च्ड देखने के पहले ‘पिंक’ की बात…

गुड मॉर्निंग सर
बहुत ही बढ़िया रिव्यू किया है आपने पिंक का. जब से देख कर लौटी, तब से निकल ही नहीं रही ये मूवी. विषय अच्छा होते हुए भी कुछ तो था, जो खटक रहा था. शुक्रिया एक अच्छा रिव्यू लिखने के लिए
(टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल सायंसेज की एक शोध छात्रा का इनबॉक्स मेसेज)

पिंक देखने के बाद इस फिल्म के स्त्रीविरोधी होने के प्रमाणों के साथ मैंने अपनी बात फेसबुक पर और स्त्रीकाल में एक पोस्ट के जरिये कही. स्वाभाविक है कि एक पावरफुल मेसेज लड़कियों के ‘नो’ कहने के अधिकार पर खूब भारी -भरकम डायलोग के साथ और सुपर-डुपर स्टार को फोकस कर बनाई गई फिल्म में इतनी ताकत तो है ही कि इसके प्रशंसक मेरे द्वारा उसकी आलोचना को बर्दाश्त न करें. लेकिन बर्दाश्त न करना एक अलग बात है और अपना पक्ष सुचिंतित और भावना के अतिरेक से मुक्त होकर रखना अलग. प्रशसकों की ओर से यह काम वरिष्ठ लेखिका और आलोचक अर्चना वर्मा ने किया, एक बार फिर स्वाभाविक है बहस का वजन स्वतः बढ़ गया- बहस सार्थक हो गई.

दरअसल हम दोनो फिल्म को जिस वेंटेज से देख रहे हैं, फर्क उससे भी पैदा हुआ है. अर्चना जी ने कल एक और पोस्ट लिखा: समझ के कानूनी पेंचों में पिंक के पुर्जे.’ यह शीर्षक ही दरअसल हमारे वेंटेज को स्पष्ट कर दे रहा है. मेरा कहना है कि महिलाओं को जो कानूनी अधिकार लम्बे संघर्ष के बाद मिले हैं, जो स्टेट की जिम्मेवारी और मजबूरियों के सम्मिलित योग से संभव हुआ है, उसे ‘कथन’ और ‘कथानक’ को नाटकीय बनाने के लिए दरकिनार कर दिया गया है या भूला दिया गया है. उसका असर है कि अपने अंतिम प्रभाव में यह फिल्म महिलाविरोधी हो गई है.

पिंक का पोस्टर

अर्चना जी यह लिखती हैं कि
“इस सिलसिले में पहली बात तो यह है कि यहाँ किसी स्त्रीवादी संदेश के हिसाब से जीवन की प्रस्तुति करने की बजाय जीवन के अनुसार स्त्रीवादी सन्देश की रचना की गयी है। और दूसरी बात यह कि स्त्री का जीवन क्या वाकई कानूनी प्रावधान हो जाने मात्र से सुरक्षित हो जाता है?”
और यह भी
“माध्यम की प्रकृति के कारण यह ट्रायल कोर्टरूम के भीतर नहीं है, वह, जाहिर है कि, पूरे समाज के पक्षों- प्रतिपक्षों के बीच है।”

चूकी इस पर मैंने विस्तार से लिखा है, इसलिए उसके डिटेल में नहीं जाउंगा लेकिन सवाल यह है कि माध्यम की मजबूरियों के कारण यदि खाप के विचार, स्ट्रकचर कोर्ट में फिल्माये जायेंगे तो उसका दीर्घगामी असर ठीक नहीं होगा, बल्कि उल्टा ही होगा. संविधान और स्टेट की भूमिका अभी तक तो समाज से दो कदम आगे ही रहा है, अन्यथा जिन सुधारों के खिलाफ समाज अभी अड़ा हुआ है, अड़ा रहा है उसे संभव कर पाने की भूमिका में स्टेट नहीं होता. हिन्दू कोड बिल से लेकर, सती, दहेज़, घरेलू हिंसा, दलित -उत्पीडन आदि. सवाल है ‘सती प्रथा’, ‘दहेज़ अपराध’ ‘ घरेलू हिंसा’ ‘ दलित उत्पीडन’ जैसी थीम पर यदि कोई फिल्म बनती है, कोई कथानक खडा होता है, तो स्टेट से मिले अधिकारों को दरकिनार कर कोई इनके पीड़ितों के हित का दावा करता हुआ फिल्म या साहित्य कैसे रच सकता है? ‘पिंक’ की समस्या यही है . अर्चना वर्मा मेरे द्वारा वकील के ‘महिला’ होने के आग्रह पर भी सवाल खडा करती हैं. मेरा महिला होने का आग्रह नहीं है. क्योंकि महिला वकील भी फिल्म के वकील साहब की तरह स्त्री को मिले अधिकारों की सुइयां पीछे खीचकर और संरक्षक की भूमिका में काम करेगी तो हस्र यही होगा. हाँ, इतना जरूर होगा कि फिल्म के पुरुष वकील की तरह घूरे जाने से लडकियां बच जरूर जातीं.

अर्चना जी यह भी कहती हैं की मेरी आपत्तियां यह होने और वह न होने -यानी अपेक्षाओं पर आधारित है. सवाल है कि अपेक्षा तो होगी न, यदि फिल्म का दावा और क्राफ्ट है ‘न’ कहने के अधिकार को लेकर.

फिल्म में लडकियां जो खुले में कहती हैं, कहना चाहती हैं, ‘वर्जिनिटी’ के सवाल पर, वह जरूरी कथन है, फिल्म के कथानक का प्लेटफॉर्म भी तो वही है -शुरू से ही, लेकिन यह बोल्डनेस नाटकीयता के हिस्से से ऊपर हो जाता जब प्रतिपक्ष के वकील साहब को ‘उदारमना’ दिखते जज साहब, बीच में ही रोक देते-रोकने के कई तरीके हो सकते हैं, ‘ओब्जेक्शन सस्टेंड’ कहने के अलावा. दरअसल जज साहब और वकील साहब के रूप में ‘एंग्री यंग मैन’ से ‘एंग्री ओल्ड मैन’ में तब्दील अमिताभ बच्चन – ‘संरक्षक स्त्रीवाद’ के नये अवतार हैं!

और आख़िरी बात, कल शाम जेएनयू के सोशल सायंस विभागों में शोध कर रहे लड़के -लडकियों की एक छोटी जमात में इस फिल्म और मेरी समीक्षा को लेकर एक बात-चीत हुई- सारी बातचीत के निष्कर्ष के विभिन्न बिन्दुओं में से एक बिंदु यह भी था कि फिल्म में लड़कियों को ‘आधुनिक’ तो जरूर बनाया गया है, लेकिन ‘आधुनिक चेतना’ से रहित. क़ानून की पेचद्गियों, कोर्ट के व्यवहार के अंतर्विरोध पर बनी फिल्म यह नहीं होती , जो अभी पिंक के रूप में है- कुछ समर्थक इस तर्क से भी इस फिल्म के पक्ष में अपनी बात कह रहे हैं.

और असर के लिए लल्लन टॉप पर यह लिंक भी पढ़ें, आखिर क्या और कैसा असर छोड़ती है यह फिल्म, यदि एक पढी-लिखी आधुनिक मां पर यह असर है , तो बाकी माँ-पिताओं के असर का अनुमान स्वतः लग जाएगा:

कौशल मिश्र का एक आलेख (क्लिक करें ) (लल्लटॉप पर हिंदी  (क्लिक करें)

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‘पार्च्ड’ के जवाब , ‘पिंक’ से कुछ सवाल : स्त्रीवाद के आईने में (!)

‘पार्च्ड’ के जवाब , ‘पिंक’ से कुछ सवाल : स्त्रीवाद के आईने में (!)

सरोज कुमार

सीनियर सब एडिटर, इंडिया टुडे. संपर्क :krsaroj989@gmail.com

इस वक्त जब हम ‘पिंक ‘ और ‘पार्च्ड’पर बात कर रहे हैं, तो हमारे पास रियल लाइफ के हालिया दो अदालती फैसले आए हैं. दोनों ही बहुचर्चित मामले हैं : एक रुचिका गिरहोत्रा का मामला जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने भी हरियाणा के पूर्व डीजीपी एस.पी.एस राठौड़ को दोषी मान लिया है. दूसरा मामला ब्रिटीश किशोरी स्कारलेट की गोवा में हत्या का है, जिसमें स्थानीय अदालत ने दोनों आरोपियों को बरी कर दिया है. दोनों ही मामलों में पुलिस शुरुआत में पीड़िताओं के खिलाफ ही काम करती नजर आई थी. लेकिन अफसोस कि स्कारलेट मामले में सीबीआइ जांच का हासिल भी कुछ न रहा. हम महिलाओं के खिलाफ हुए लाखों मामलों के हश्र को फिर किस तरह समझें?

जमीनी हकीकत से कोसों दूर पिंक!

अदालती कार्यवाही की पृष्ठभूमि के जरिए महिला आजादी की बात करती फिल्म पिंक पर बात से पहले कुछ जमीनी आंकड़े देख लेते हैं. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के हालिया आंकड़ों के मुताबिक 2015 में देश की अदालतों में महिलाओं के खिलाफ अपराध के कुल 12,27,187 केस ट्रायल के लिए आए. इनमें से महज 1,28,240 (करीब 10 फीसदी) मामलों का ही ट्रायल पूरा हो सका. इससे भी चिंताजनक बात कि इनमें सिर्फ 27,844 मामलों में ही अपराध साबित हो सका और 1,00,396 (यानी करीब 78 फीसदी) मामले खारिज हो गए और आरोपी छूट गए. इस तरह अपराध सिद्ध होने की दर महज 22 फीसदी. जाहिर है, असल जिंदगी में देश की अधिकतर महिलाओं को न तो पिंक की तरह एक ‘महानायक’ वकील नसीब हो पाता है और न ही एक दृश्य में ‘फलक’ की बातें सुन तकरीबन रो पड़े ‘न्यायाधीश’ तथा पुलिस तो पुलिस है ही! इतना ही नहीं महिला आजादी को लेकर कुछ कानूनी हासिलों जिसका, जिक्र संजीव चंदन अपने लेख ( लेख पढ़ें स्त्रीकाल में : क्यों स्त्रीविरोधी है अतिनाटकीय  फिल्म पिंक में करते हैं- सिद्ध करने की जिम्मेदारी, सेक्स वर्कर के ना कहने का अधिकार या पीड़िता के चरित्र पर सवाल नहीं करना, का पिंक में नाटकीय ढंग से उल्लंघन है. यह संकेत करता है कि फिल्म समकालीन हासिलों से कदमताल नहीं करती और ना ही उससे आगे बढ़ती है. अदालती कार्यवाही को उसी वक्त खत्म होनी चाहिए थी , जब लड़कियों के खिलाफ एफआइआर बैक डेट में दर्ज किया जाना सिद्ध हो जाता है. जाहिर है, ये सब चीजें अदालती कार्यवाही नाटकीय बनाते हैं और कथानक को लेकर शोध के अभाव को दिखाते हैं. इस लिहाज से पिंक ‘पाथ ब्रेकर’ फिल्म कतई नहीं कही जा सकती.

पिंक में बंदिशों के साथ ‘नो’
हां, पिंक अच्छी फिल्म कही जा सकती है या कम-से-कम बॉलीवुड में बनने वाली अधिकतर फिल्मों की परिपाटी में तो इसे बेहतर कहा ही जा सकता है,  लेकिन बारीकी से देखें तो यह भी बुनियादी तौर पर महिला आजादी के ‘हासिलों’ या विमर्श को कुंद करने का काम करती है. यह ‘नो’ के जिस मैसेज पर जोर देती है वह बेहद महत्वपूर्ण है लेकिन क्या फिल्म में नो का यह संदेश ‘बंदिश रहित’ है? फिल्म के ‘महानायक’ वकील (अभिताभ बच्चन की निजी जिंदगी को इस आलेख में रहने ही देते हैं) को ध्यान से देखिए जरा. वह तीनों युवतियों को जिस तरह घूरता है (नजर रखता है),  इसका संदेश क्या है?  ‘सुरक्षा’ ही न! मतलब युवतियां अपनी सुरक्षा के लिए कुछ ‘कायदों’ या एक ‘घेरे’ को तोड़ रही हैं, जो उनके लिए कथित तौर पर खतरनाक है. महानायक वकील ‘दीपक सहगल’ जो कथित तौर पर सटायर की तरह लड़कियों के लिए जिन ‘रूलबुक’ का जिक्र करता है, क्या वह वास्तव में फिल्म में सटायर के तौर पर है? फिल्म देखने के बाद कुछ उच्च पढ़ी-लिखी महिलाओं की टिप्पणियों को हमें देखना चाहिए. मशहूर dailyO वेबसाइट पर प्रेरणा कौशल मिश्र का एक आलेख (क्लिक करें ) (लल्लटॉप पर हिंदी  (क्लिक करें) में  छपा है कि पिंक ने मेरी बेटी को वह समझा दिया, जो वह खुद नहीं समझा पा रही थीं. उनके शब्दों में, “देखने वाले जिसको दीपक सहगल की सटायर की रूलबुक मान रहे हैं, मैं उस रूलबुक को ‘औरत की सेफ्टी के लिए ज़रूरी’ मैन्युअल मानती हूं.” उनके मुताबिक अभिभावकों के लिए जरूरी होता है कि वे स्ट्रिक्ट रहें, बेटी को अजनबियों से डरने, फ्रेंडली हो रहे लोगों पर शक करे और उनके मुताबिक उनकी बच्ची समझ गई कि वह अपनी एक दोस्त के यहां एक दिन के लिए ठहरने न जाए क्योंकि उसके दोस्त से लेखिका नहीं मिली थी या उसके अभिभावकों को नहीं जानती थी. जाहिर है, दीपक सहगल का नजर रखना या रूलबुक का जिक्र का संदेश क्या है, इसे हमें समझना चाहिए.

परिवार कहां गया?
ऊपर यह जो ‘बाहरी असुरक्षा’ के नाम पर ‘नजर रखने’ का जो विचार है वह कहां से आता है? इन दिनों जब इस नजर रखने के खिलाफ ‘पिंजड़ा तोड़’ जैसे आंदोलन हो रहे हैं, यह फिल्म कहां ले जाती है? खैर, जाहिर तौर पर ‘नजर रखने’ का विचार परिवार नामक ढांचे में बुनियादी तौर पर शामिल है. लेकिन इन दिनों पर पति के द्वारा बलात्कार के मसले या तीन तलाक या लगातार जारी ऑनर किलिंग जैसे मसलों पर जोरदार बात हो रही है, फिल्म में परिवार कहां है? जमीनी हकीकत का अंदाजा इन आंकड़ों से भी लगाया जा सकता है. एनसीआरबी के मुताबिक 2015 में महिलाओं के खिलाफ कुल 3,27,394 अपराध दर्ज हुए. इनमें सबसे ज्यादा मामले यानी करीब 38 फीसदी ( कुल 1,23,403) मामले पति या परिजनों की ओर से किए गए अत्याचार के मामले थे. यही नहीं, बलात्कार के कुल 34,651 मामले दर्ज हुए, जिनमें 33,098 (95.5 फीसदी) में आरोपी परिचित थे. जाहिर है, महिलाओं की आजादी को लेकर या उनके खिलाफ अपराध के मामले में परिवार और सगे-संबंधी और पास-पड़ोस सबसे अहम कड़ी है. लेकिन पिंक में इस परिवार नामक ढांचे की पड़ताल नहीं है. बल्कि नायिका परिवार या अपने रिश्ते को लेकर वहीं पुराने  ढर्रे पर नजर आती हैं. अब मीनल के पिता को देखिए जरा. वह अपनी बेटी के साथ डटकर खड़ा रहने की बजाए एक वक्त ‘शर्म के मारे’ अदालत से बाहर निकल जाता है और उसकी सहेलियों से कहता है कि मीनल को अब घर भेज देना. वहीं आखिर में फैसले के बाद नायिका उसी पिता के साथ खुशी मनाती नजर आती है. जाहिरा तौर पर पिंक महिलाओं की आजादी की सबसे अहम और शुरुआती कड़ी ‘परिवार’ की पड़ताल नहीं करता.

और पिंक के साथ पार्च्ड के कुछ जवाब
परिवार की पड़तालः इस लिहाज से पार्च्ड बेहद अहम फिल्म है, जो पारिवारिक ढांचे पर भी बात करती है. पार्च्ड सिर्फ महिलाओं के शोषण के जड़ पर वार करती है, पिंक की तरह केवल सतह पर या बाहर सिमटी नहीं रहती है. पिंक में जो बातें सिर्फ बयानों (नारे सरीखे) में सामने आते हैं, वह पार्च्ड में चारों नायिकाओं (एक विधवा, एक कथित बांझ, एक कथित वेश्या, एक बालवधू) की जिंदगी में इम्प्लीमेंट हो रहे होते हैं. पार्च्ड भारतीय संस्कृति के ‘महान’ परिवारिक ढांचे को आईना दिखाती है, उसे रेशा-रेशा कर देती है. रानी का बेटा गुलाब जब घर छोड़कर जाता है तो वह कहता है कि ‘देखता हूं तुम लोग पुरुष के बगैर कैसे सर्वाइव कर पाती हो’. रानी और लाजो पुरुषवाद के इस बुनियादी दंभ को सशक्त चुनौती देती हैं.

अपने फैसले खुद: पिंक के मुकाबले पार्च्ड की खासियत है कि इसमें नायिकाएं (शुरुआत में शोषण का शिकार होने के बावजूद) आखिरकार अपने फैसले खुद लेती हैं, अपनी नियति खुद तय करती हैं. फिल्म का आखिरी दृश्य भी इसी से खत्म होता है. सबसे अहम तो यही बात है कि महिलाएं अपनी आजादी अपने जीने का हक या तरीका खुद तय करें. वे किसी महानायक या मददगार या किसी अदालत के फैसले की बाट जोहने को मजबूर नहीं रहतीं. मुझे लगता है कि महिला आजादी का मसला बुनियादी तौर पर सामाजिक स्वीकार्यता से जुड़ा है, यह महज अदालत का मसला नहीं है. अगर पिंक ने अदालती फैसला लड़कियों के खिलाफ जाता तो? (जाहिर तौर पर देश के जमीनी आंकड़े तो ऐसा ही कहते हैं.)

गालियों का समाजशास्त्रः पिंक में जब खलनायक  लड़कियों को गाली देता है, तो पूरे कोर्ट रुम में (सिनेमाहॉल में भी) अपमान की भावना या गुस्से की लहर दौड़ जाती है. वहीं पार्च्ड में नायिकाएं गालियों के समाजशास्त्र को उलटकर रख देती हैं. वे सवाल करती हैं कि गालियां हमेशा महिलाओं पर क्यों बनाए गए और धड़ल्ले से पुरुषों पर गालियां बनाने लगती हैं. (हालांकि गालियां खत्म होनी चाहिए, लेकिन इस मामले में पहली जिम्मेदारी पुरुषों की है). वहीं आखिर में रानी के पति को मरने छोड़ (दुर्घटनावश ही सही) देने पर मुझे आपत्ति है (क्योंकि पुरुष या किसी का खत्म होना उपाय नहीं) बल्कि उसे जिंदा रहते भी उससे अलग हुआ जा सकता है.

सेक्स वर्कर का ‘नो’ ‘नो’ नहीं?: पिंक में यह महज कुछेक बयानों में है. और जब फलक दीपक सहगल से कहती है कि ‘क्या करती कोई मान ही नहीं रहा था कि हमने पैसे नहीं लिए.’ तो क्या सेक्स वर्कर ना कहे तो उसकी अहमियत नहीं? वहीं पार्च्ड में तो बिजली मजबूती से ना कहती है, हालांकि उसे किसी अन्य को लाकर सबक सिखाने की भी कोशिश होती है.

महानायक के बगैर पार्च्ड: पार्च्ड में भी किशन के तौर पर ‘अच्छे’ पुरुष का किरदार है. लेकिन वही कहीं भी नायिकाओं का उद्धार करने वाले महानायक या मददगार के तौर पर नहीं दिखाया गया है. वह बस एक कुटीर उद्योग का नुमाइंदा है, जिसके लिए महिलाएं काम करती हैं (आजीविका के लिए). पिंक में जबकि समापन दृश्य में एक कमजोर प्रतीत हो रही (दिखाई गई) महिला सिपाही दीपक सहगल को इस तरह शुक्रिया कहती है मानो वही हैं जिन्होंने महिलाओं की रक्षा की और महिलाओं को ऐसे पुरुष का एहसानमंद होना चाहिए.

नॉर्थ इस्ट की युवती यहां भी: नॉर्थ इस्ट की युवती पार्च्ड में भी है और असल जिंदगी की तरह ही वह प्रगतिशील और संघर्षशील है. रानी की बहू को वह शादी के गिफ्ट के बतौर किताबें देती है. वह कुंठित पुरुषों से दबने की बजाए चुनौती देती प्रतीत होती है.

जानकी का पढ़ने का ललकः यह एक अहम संदेश है. जानकी को किताबें पसंद है. रानी जब अपनी बहू को उसके प्रेमी के साथ रवाना करती है तो उससे कहती है कि जानकी का नाम स्कूल में जरूर लिखवा देना, इसे खूब पढ़ाना और अच्छे से रखना.

गांव से निकलना ही बेहतरः यह भी महत्वपूर्ण है वे गांव छोड़ मुंबई या किसी शहर जाने की बात करती हैं. गांव को लेकर रोमांटिक होने वाले मुख्यतौर पर उच्च या वर्चस्वशाली तबका ही है, वरना वंचितों-महिलाओं के लिए तो गांव शोषण के अड्डे हैं. गांव से निकल जाना ही बेहतर. अर्थ (पूंजी) को छोड़कर अन्य अधिकतर बंदिशों से आजादी तो दिलाते ही हैं शहर.

और अभिनय तो लाजवाब: अभिनय के लिहाज से भी जिन्हें अमिताभ बच्चन पिंक में बड़े अच्छे लग रहे हैं, जरा उन्हें पार्च्ड में सुरवीन चावला को ही देख लेना चाहिए. तनिष्ठा चटर्जी तो बेहद सधी हुईं, लहर खान बेहतरीन और फिर राधिका आप्टे अच्छी हैं ही इस फिल्म में.

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