Home Blog Page 114

देखो-देखो ‘चमईया’ हमार सुतुही

सोनी पांडेय

कवयित्री सोनी पांडेय साहित्यिक पत्रिका गाथांतर की संपादक हैं. संपर्क :pandeysoni.azh@gmail.com

बाबा ब्रह्मदेव तिवारी के दुवार पर भिनहिये से कल्लुवा की माई ‘मोटकी चमईनिया’ डुगडुगी डिबीर-डिबीर बजा रही थी। डीब-डीब-डीब के बेढब आवाज से तंग आकर ज्योत्सना ने ननद से पूछा- ‘‘बीबीजी ये आपके यहाँ कौन सा रिवाज है कि ब्याह के तीसरे दिन भी डीब-डीब लगा हुआ है।’’ मंजू नयी नवेली दुल्हन का मुँह आवाक हो ताकने लगी, चेहरे का रंग एकदम उतर गया, जैसे किसी ने चोरी पकड़ ली हो। मंजू ने पूरी सजगता के साथ उत्तर दिया- ‘‘जब तक कक्कन नहीं छूटता।’’ ज्योत्सना ने दूसरा सवाल दागा- ‘‘और कक्कन कब छूटता है? हमारे यहाँ तो विदायी वाले दिन ही छुड़ा देते हैं? मंजू को गुस्सा आ गया। भाभी ये आपका घर नहीं है, यहाँ के रस्मो-रिवाज अलग हैं, समझी। अम्मा को भेजती हूँ, जो-जो जानना है पूछ लिजियेगा।’’ ज्योत्सना को ध्यान आया कि वह अभी नव वधू है, ननद को नाराज करना ठीक नहीं। तेजी से दरवाजे की तरफ बढ़ती हुयी छोटी ननद का हाथ थाम लिया- अरे! रे ऽऽऽ मेरी प्यारी बीबीजी नाराज हो गयी। गालों को हथेलियों से थपथपाते हुए कहा- चलिए अभी तो आपको प्यारी-प्यारी चुड़ियाँ और नगों वाली बाली देनी है, जिसे आपने मेरे मेकअप बाक्स में पसन्द किया था। मंजू पिघल गयी। ननद-भौजाई चूड़ीकेश और मेकअप बाक्स में उलझी छेड़-छाड़ में मगन थीं कि नाऊन बुकवा लिए कमरे में दाखिल हुई- ‘‘चला हो दुलहिन तनी मीज देईं।’’ चटाई बिछाकर बैठ गई। ज्योत्सना को सरसों के उबटन से उबकाई आती थी। मई का महीना और तीन दिन पहले उसके घर की नाऊन के हाथों का पिसा हुआ बुकवा फुलहा कटोरे में लेकर नाऊन बैठी मुस्कुरा रही थी। मंजू भाभी के मनोभाव ताड़ गयी- ‘‘मुस्कुराते हुए भाभी से कहा- बुकवा तो यहीं लगेगा भाभी, रिवाज है, पाँच दिन तक नईहर का फिर सवा महीना ससुरे का बुकवा लगता है हमारे यहाँ बहुओं को, कोहनी से ढकेलते हुए भाभी से कहा- सोचती क्या है कूद जा मैदान में।’’ ज्योत्सना ने खीझते हुए कहा- मुझे सरसो के तेल से एलर्जी है। उसी क्षण चाची सास अपने साल भर के बेटे को गोंद में लिए आ धमकी- ‘‘क्या हुआ ओ नाऊन, कनियवा बुकवा लगवाने में निहोरा करवा रही है क्या?’’ नाऊन मुँह चमकाकर रह गयी। ज्योत्सना मुँह गिराकर चटाई पर बैठ गयी, नयी नवेली दुल्हन का यह व्यवहार शाम तक पूरे गाँव-जवार में फैल जायेगा जानती थी। माँ की बात याद आयी- ‘‘परजा-पसारी चार घर की घुमनी जीव होती हैं रंजू ससुराल में इनसे सम्भल कर व्यवहार करना, वरना अफवाह उड़ाते देर नहीं लगेगी।’’

ज्योत्सना ने पाँव की पाँच उंगलियां रूमाल से पैर ढककर आगे बढ़ाया, चाची सास ने तपाक से लिहेड़ी लिया- ‘‘हे इनसे का लजाना, साले भर में नंगटे मिसाओगी। मंजु हा-हा-हा हँसने लगी। नाऊन ने पैर खींचा- ‘‘दा दुलहिन निम्मन से मीज देइं।’’ ज्योत्सना रूमाल दाबे सिर झुकाये बैठी रही। सास दूसरे बेला का मांग बहोरने आयी- ‘‘ऐ नाऊन चला जा- आपन माया जाल हटावा, मांग बहोरे के है। नाऊन हाथ में का बुकुवा छुड़ाकर उठ खड़ी हुई। पंडी बाबा के कब के कहे क है? बता देयीं त काल्ह कहत आईब। आज चार दिन हो गईल, पुजइया काल्हे होई न? ज्योत्सना की सास सिर का पल्ला ठीक करते हुए बोली- कुल पोवत करत चार त बजीए जाई- पाँच के हहु दिहा। और ज्योत्सना के आँचल में पाँच बड़े-बड़े लड्डू डाल कर सिन्होरा से सिन्दूर निकाल कर पूरा मांग पीला सिन्दूर भर गयी। गर्मी में इतना सिन्दूर देख ज्योत्सना रूआंसी हो जाती किन्तु ससुराल में नवेली दुल्हन का विरोध सम्भव नहीं था, इसलिए अन्दर ही अन्दर कुढ़ती रहती।

(2)
अगली सुबह नीम अंधेरे सास आकर जगा गयी, पूरे परिवार की औरतों की चहल-पहल सुनकर ज्योत्सना चौकन्नी हुई। याद आया आज ब्याह के पाँचवे दिन की पुजइया है जो सुबह पाँच बजे से शाम पाँच बजे तक चलेगी, सास शाम को ही समझा गयी थी। झट-पट नहा-धोकर तैयार हो गयी। मन रोमांचित था। आज कक्कन भी छूट जायेगा। चार दिन बाद हृदयेश को देखेगी, जिसने विदाई वाले दिन पूरे रास्ते यही समझाया कि जो भी माँ कहे करते जाना। महीने भर की बात है बाद में तो साल में एक बार छुट्टियों में गाँव आना होगा। कितना सहज और साल पुरुष है हृदयेश, उसकी हथेलियों को अपने हाथों में लेकर कितनी बार चूमा था उसने सफर में, सोच कर सिहर उठी।



ज्योत्सना एक बात सोच कर दंग थी कि घर-भर के मर्द पूरे दिन आँगन-दुवार एक किए रहते, लेकिन हृदयेश की एक झलक भर उसे पिछले चार दिन में नहीं दिखी थी। गजब का शासन चलता था उसके सास का घर में, मजाल की कोई घर में उनका विरोध कर दे।सास कमरे में दाखिल हुई, पीछे-पीछे छोटी सास हाथ में आटे का फुलहा थाल लिए। सास ने आदेश दिया- ‘‘पाँच बार जय चमईया जी- जय चमईया जी बोल कर छू दो दुलहिन। ज्योत्सना को सुनने में भ्रम सा लगा- जी कौन मईया? ‘‘चमईया’’ सास ने तेज आवाज में कहा। ज्योत्सना आवाज कड़की समझ गयी। चुपचाप उच्चारण कर आँटा छू लिया। सास चली गयी। थोड़ी देर में बूढ़ी आजी सास बड़ी फुआ सास के साथ हाथ में फूल-बताशा, धार लिए आयी और वही आदेश दिया जो सास कह गयी थी। बारी-बारी घर भर की औरतें ऐसे ही कुछ-न-कुछ लेकर आतीं और जय चमईया, कहवा जाती। ज्योत्सना सोच में पड़ गयी। चमईया कौन है भला? मंजू मिलती तो उगलवा लेती या फिर हृदयेश से पूछती। अजीब, पेशोपेश में वह कमरे में साड़ी को आँचल का कोर तोड़ते मरोड़ते घूम रही थी की नाऊन पधारी।

‘‘आइये नाऊन, बैठिये।’’ नाऊन खुश हो गयीं शहरी पढ़ी-लिखी बहू से आदर पाकर। चटाई बिछाकर बैठ गयी। आज पाँचवे दिन के कटोरे वाले बासी उबटन से मुक्ति का दिन था। नाऊन ने नेम पूरा किया और हँस कर कहा- कमासुध कनिया से का मिली? ज्योत्सना ताक में थी। पाँच सौ की कड़कती नोट पर्स से निकालकर नाऊन की हथेलियों में दबाकर रखते हुए कहा- अम्मा जी से मत बताइयेगा, नाराज होंगी। तीर निशाने पर लगा था, नाऊन फैल गयी। अरे बहिनी, इ तोहार सास त सछाते चण्डी हई, इनसे के कही? ज्योत्सना ने पूछा- चाची इ चमाईया कौन देवी हैं? नाऊन व्यंग्य से मुस्कुरा उठी। ऐ दुलहिन इ राज तोहरे हमरे पुरखन की पेट क राज है। जेके मरत घरी सास पतोह से बतावेले, अईसे ना। ज्योत्सना की जिज्ञासा प्रबल हुई। काहे? बहुत त ना जानी ऐ दुलहिन, बाकी ऐतना है कि कौनो चमाईन के तोहार पुरखा फसवले रहले, पुजइया लेले, नाहीं त वशे ना चले और उठ कर चल दी। ज्योत्सना सुनकर दंग रह गयी। हद है इतने शिक्षित परिवार में ऐसा ढ़ोंग।
(3)
दोपहर में पकवान बनने के बाद ज्योत्सना को बड़ी ननद रसोई में ले गयी। सास निर्देश देती रही, ज्योत्सना ने कोरे चूल्हे पर कढ़ाई चढ़ाकर पाँच पूड़ी बनाया, थोड़ा सा हलवा नेम के लिए, पहली रसोई का भोग भी ‘‘चमईया’’ को पहले चढ़ता था। दो बजे हृदयेश और ज्योत्सना का नाऊन ने गठजोड़ किया, पति-पत्नी ने चार-दिन बाद एक दूसरे को कनखियों से निहार, छोटी चाची सास ने देख लिया- देखिये-देखिये बड़का बबुवा, आज इनके भोग का भी दिन है। ‘‘लड़कियाँ ठहाका मारकर हँस पड़ी, सास ने आँख तरेरा तो चाची सास चुप हो बैठ गयीं। औरतें लड़कियाँ गाती-बजाती भोग के सोलह थाल लेकर पैदल चल रही थीं। आगे-आगे नाऊन कपाट पर दौरी में पूजन का सामान अछत, फूल, सेन्दूर आदि लिए और सास भर लोटा धार लिए चल रही थीं। लड़कियाँ गा रही थीं- गोरा बदन नीली साड़ी ओ साड़ी वाली….।

ज्योत्सना नंगे पाँव कच्चे रास्ते पर चल रही थीं। जमीन तवे की तरह जल रही था। कोस भर चलने के बाद पति से पूछा, अभी कितना चलना है? बस, सामने वाली बारी में। ज्योत्सना ने पारदर्शी चादर में से देखा सामने घना आमों का बाग पोखरा और एक छोटा सा कमरे नुमा मन्दिर दिखाई दे रहा था।
औरतों का समूह पोखरे के पास बने चबूतरे पर सामान रखकर बैठ गयीं। सभी थक चुकी थीं। सास ने हृदयेश से पूछा- कै बजा? साढ़े तीन, अरे राम रे। ऐ छोटकी दुलहिन के बता रे पूजा का विधि हम पोखरे से पानी लेकर आते हैं, चार बजे पंडी जी कक्कन छोड़ाने और सतनरायन बाबा का कथा बाचने का आ जायेंगे। पाँच बजे तक निबट जाना चाहिए।



(4)
ज्योत्सना के ससुर चार भाईयों में सबसे बड़े थे, छोटा भाई हृदयेश से महज पाँच साल बड़ा था। परिवार में उनके त्याग के कारण सभी अदब-लेहाज करते थें। पत्नी परिवार को बाँधने की कला में माहिर थी सो चार भाईयों का संयुक्त परिवार चार गाँवों में मिसाल था। परिवार में बारह पुरुष, बलिष्ठ, गाड़ी-घोड़ा, छकड़ा से दुवार रज-गज। पुरखा जमींदार, सैकड़ों बीघे की खेती, प्रगतिशील किसान होने के कारण अन्न धन से घर भरा था। इस पीढ़ी में सबसे बड़े बेटे हृदयेश ने विश्वविद्यालय में प्राध्यापकी पाकर कुल परम्परा में चार चाँद लगा दिया था। लड़के बाहर बड़े शहरों में पढ़ने निकल चुके थे। लड़कियाँ घर की जीप से पास के शहर पढ़ने जाती थीं। हृदयेश के पिता पढ़े-लिखे प्रगतिशील विचारधारा के व्यक्ति थे इसलिए उच्च शिक्षित बेटे के लिए बहू भी उसी के टक्कर की खोज निकाला था, एक पैसा दहेज नहीं लिया, पक्के बनिया थे, लड़की कॉलेज में लेक्चर थी, अच्छा कमाती थी। दहेज न लेकर मुफ्त में वाह-वाही लूटकर प्रगतिशीलता पर मुहर पक्की कर गए।

मन में ‘‘चमईया’’ की पूजा को लेकर सशंकित थे, पत्नी को सख्त हिदायत दिया था जब तक बहू पुरानी नहीं हो जाती भेद नहीं खुलना चाहिए। चमईया की पुजइया में विशेष सतर्कता घर भर की औरतें बरत रही थीं। छोटी सास ज्योत्सना को मन्दिर के पिछवाड़े लेकर गयीं, हृदयेश ने गठजोड़ का गमछा उसके कन्धे पर रख दिया। चाची सास ने एक टीले पर बैठाकर धीरे से हाथ जोड़ कर ज्योत्सना से विनय के स्वर में कहा- ‘‘दुलहिन ये बड़ी कठिन पुजइया है, न करने पर चमईया डागर बजाते हुए गर्भ के समय आयेंगी और सोए में कोख काछ कर चली जायेंगी। ज्यादा कुपित हुई तो माँग भी धो सकती हैं। ये जो घर में तीन निपुती राड़ देख रही हो न बहू चमईया की पुजइया ठीक से न करने का परिणाम है। ज्योत्सना ने चाची सास का हाथ थाम लिए- ‘‘चाची जी आप ऐसे क्यों कह रही हैं? जो कुल परम्परा है उसे मानना मेरा धर्म है। आप पूजा की विधि बताइये। ऐसी कौन कठिन पूजा है जो मैं नहीं कर सकती। हँसते हुए गर्व से कहा- ‘‘बताइये-बताइये… मैं गोल्ड मेडलिस्ट हूँ। चाची सास ने लम्बी साँस छोड़कर मुस्कुराते हुए हाथ थामकर खड़ा किया। मन्दिर के पीछे का चोर दरवाजा खोलकर ज्योत्सना को आदेश दिया, दुलहिन ‘‘चमईया’’ की पूजा निर्वस्त्र होकर पति-पत्नी प्रथम मिलन के पहले करते हैं, बारी-बारी सोलहों भोग थाल का परसाद चढ़ाकर पिंडी को पीले सेन्दूर से पाँच बार टीककर लोटे में पोखरे का पानी वाला होगा धार घोलकर गिरा देना अगरबत्ती बार कर दिया जलाकर अढ़हूल का पाँच फूल चढ़ाकर कहना- ‘‘हे चमईया’’ हमने अपना सबकुछ उतारकर आपको दे दिया आप भोग लगाए तो हम पहने। और थोड़ी देर आँख मूंदकर हाथ जोड़कर खड़ी रहना फिर एक-एक थाल में तुम दोनों के लिए कोरे कपड़े रखे हैं, उठाकर पहन लेना और दरवाजा खोलकर बाहर आ जाना। ज्योत्सना को काठ मार गया। वह चीख पड़ी ‘‘आप पागल तो नहीं हो गयी हैं? नंगे ऽ ऽ ऽ, नंगे इनके सामने मैं सीधे जाकर खड़ी हो जाऊँ। हद है मूर्खता की, मुझसे ये नहीं होगा। छोटी सास भागते हुए ज्योत्सना के सास के पास पहुँची। जीजी नहीं मान रही। सास चिंतित हो उठी, डर पहले से था। बहू के पास आयी, ज्योत्सना सुबक-सुबक कर रो रही थी। सास ने पेट पकड़ लिए, बेटी नहीं किया तो इ कुल नाश देगी। हमार बहिनी इ विनती ह तोहसे, आँचल फैलाकर रोते हुए बहू से अनुनय करने लगी। ज्योत्सना पिघल गयी- नहीं अम्मा जी ये क्या कर रही हैं। हम आपके बच्चे हैं, आप पाँव छूकर पाप मत चढ़ाइये। सास का यत्न मारक था। रोते-धोते ज्योत्सना तैयार हो गयी। एक-एक कर सारे कपड़े उतार कमरे में दाखिल हुई, कमरा चूने की नई-नई पुताई से चमक रहा था। बीच में बड़ी सी मिट्टी की पिंडी बनी थी। कच्चे फर्श को गोबर से लीप-पोत कर चिकना किया गया था। चारों तरफ सोलह थाल करीने से रखे हुए था। जब तिवारियों के घर में बेटे का ब्याह होता था कमरा ऐसे ही चमकता था। बाकी दिनों में गाँव के मनचले आशिकों के आशिकी का अड्डा रहता। अब तो बाकायदा आस-पास के गाँव के मजनु-लैला, इतवार को चढ़ावा चढ़ाने लगे थे।


सास ने खट से दरवाजे की कुण्डी चढ़ाई। ज्योत्सना सहम गई, धम्म से घुटनों में मुँह छिपाकर बैठ गयी। चाची सास ने जूड़ा खोल दिया था, कोई बन्धन लेकर जाना वर्जित था। आगे के दरवाजे से हृदयेश अन्दर दाखिल हुआ। ज्योत्सना घुटनों में मुँह छिपाये दीवार के सहारे बैठी थी। लम्बे घने बाल शरीर पर आवरण का काम कर रहे थे। हृदयेश ने हाथ पकड़कर उठाने का प्रयास किया, जल्दी करो ज्योत्सना लेट हो रहा है। जितनी जल्दी करोगी इस यातना से उतनी जल्दी मुक्ति मिलेगी। ज्योत्सना पैरों से लिपट गयी। ये किस पाप की सजा है हृदयेश? वह रोये जा रही थी। इतने प्यारे रिश्ते की शुरूआत इस मानसिक यातना से क्यो? हृदयेश बैठ गया, उसकी आँखों से भी आँसू बह निकले थे। कोई फायदा इस तर्क-वितर्क का नहीं। मैं तुम्हे रात में सब बताता हूँ। प्लीज अभी इसे खतम करो। मैं आँखें बन्द करता हूँ। हृदयेश आँख बन्द कर वहीं दीवार की तरफ खड़ा हो गया, ज्योत्सना ने हिम्मत करके सभी निर्देश चाची सास के पूरा किया। अन्त में पेटीकोट गले तक बाँध कर पति से कहा अब आप माथा टेके मैं आँख बन्द करती हूँ। हृदयेश में गमछा उतार कर माथा टेका और फिर दोनों ने नए कपड़े पहनकर दरवाजा खोला। इस पूरी घटना से ज्योत्सना इतनी विचलित हो चुकी थी चलना दूभर था। छोटी चाची सास ने हाथ में कसकर पकड़ लिया। कच्चे रास्ते की जलती तपिश ने अब उसके अन्तस तक को झुलसाना शुरू कर दिया था। परम्पराओं के नाम पर दिये जाने वाले मानसिक यातना का यह सबसे बड़ा उदाहरण था ज्योत्सना के सामने, जिसने नव जीवन में प्रवेश से पूर्व ही एक अजीब घुटन भर दी थी। घर पहुँचते पहुँचते साढ़े चार बज चुके थे। दुवार पर मर्दों की चौपाल लगी थी। लकड़ी की हत्थ वाली कुर्सी पर पैर रखकर पंडी जी बैठे भागवत कथा का सार सुना रहे थे। बीच-बीच में घड़ी देख लेते और बेवा औरतों की ओर देखकर बड़बड़ाते- ‘‘इ मेहरारून का झमेला, कुच्छौ नहीं समझता, विलम्ब हो गया तो मुँह पिटाएंगी अपना।’’ नाऊन दौरी कपार पर लिए हाली-हाली भागी आ रही थी। पीछे-पीछे बड़की तिवराईन (ज्योत्सना की सास) हाफी-दाफी आती दिखीं तो पंडी जी कुर्सी पर से कूद कर खड़े हो गये- ‘‘का रे ऽ ऽ ऽ नऊनियाँ तोहूं के सिखवे पड़ी, टेम निकरे जात है और तोर चकल्लस अबही ले चलत बा।

नाऊन- अरे बाबा ऽऽऽ अरे बाबा ऽऽऽ बोलती हुई बरामदे की सीढ़ियां चढ़ती आंगन की ओर भागी। पंडित जी पीछे पीछे आंगन में चौक चन्दन पहले से पूरकर, कलशा और गणेश स्थापित देख पंडित जी मुस्कुराते, खैनी पीटते हुए- बोले वाह शेर मैदान मार लिए। चलो अब जल्दी निपट जायेगा। पंडि जी अपने आसन पर जम गये। उनके मुँह से केवल ऊँऽऽऽ का उच्चारण स्पष्ट सुनाई देता। बाकी मंत्र गले में घनघना कर रह जाता। तिवराइन को आवाज लगाया- वर-कन्या को बुलाइये। तभी आंगन में हृदयेश और पीछे लड़खड़ाते हुए ज्योत्सना चाची सास के साथ दाखिल हुयी औरतों ने ज्योत्सना को पकड़ कर चौक पर बिठाया। पंडी जी ने दोनों के कक्कन खोलकर सास को दिया और बँसवार में फेंकवाने का सख्त निर्देश दिया और कथा बाचने लगे। हर अध्याय के आरम्भ में केवल कलावती कन्या सुनाई देता बाकी अऽऽऽ हूँऽऽऽ हंऽऽऽ की ध्वनि के साथ लुप्त हो जाता नाऊन को उनके संस्कृत ज्ञान पर पूरा संदेह था छेड़ते हुए बोली- ए बाबा! तनी अरथ सहित बांचा कुछ बुझाते नइखे। पडी जी पिनक गये, बगल में पड़ी अपनी लाठी जमीन पर पीटते हुए चिल्लाये- ससुरी बिघन डालती है, जानती है, कुबेला हो रहा है, साली नीच जात, नीच बुद्धि नाऊन भी कम नहीं थी तमतमा उठी- ए बाबा जात पर त जइबे न करी नाही त अब्बे कुलआई माई उबेर देइला। मामला बिगड़ते देख हृदयेश ने हस्तक्षेप किया। पंडी जी खतम करिये पाँच मिनट बचा है। पंडी जी का अऽऽऽ हूँऽऽऽ हंऽऽऽ तेज हुआ। गौरी की सिन्दूर पूजा के बाद कथा सम्पन्न हुई। बड़की तिवराइन ने चैन की सास लेकर पूरब में सुरुज नरायन को आरती दिखा पूजा सम्पन्न होने की घोषणा की।
(6)
रात ग्यारह बजे हृदयेश कमरे में आया। ज्योत्सना के मन में प्रथम मिलन का रोमांच समाप्त हो चुका था। ननदों और चाची सास ने कमरे को सुगन्धित इत्र से इतना गमका दिया था कि उसे उबन हो रही थी। भारी बनारसी साड़ी और गहने उसे चुभ रहे थे। एक तरफ छोटे से मेज पर दो गिलास दूध, सूखे मेवे और मिठाईयां करीने से सजाकर रखे थे। हृदयेश ने दरवाजे की कुंडी बन्द कर दी। ज्योत्सना खिड़की के पास आकाश में उगे पूर्णिमा के चाँद को एकटक निहारते हुए सोच रही थी, पूर्णता भी कितना बड़ा भ्रम है। चाँद का एक दाग के साथ उगना और घटते बढ़ते लुप्त हो जाना। सही है ‘‘सब दिन रहत न एक समाना’’ का उदाहरण इस चाँद से बड़ा और क्या होगा। वह नाहक मुस्कुरा उठी हृदयेश ने उसे मुस्कुराता देख बाहों में भीच लिया। ज्योत्सना की तन्द्रा टूटी। एकदम से उसका मन कसैला हो गया। खुद को उसके मजबूत गिरफ्त से छुड़ाने की कोशिश की। हृदयेश ने उसके गालों पर चुम्बन देते हुए कहा- ‘‘अब इतनी क्या शर्म? सब तो ओपेन हो चुका है।’’ ज्योत्सना चीख पड़ी- बस करिये हृदयेश मुझे आपके साथ नार्मल होने में थोड़ा समय लगेगा। हृदयेश नर्वस हो गया। ‘‘अब क्या हुआ?’’ सब नार्मल तो है न? ज्योत्सना छिटकर दूर खड़ी हो गयी- ‘‘नहीं! सब एबनार्मल है, मुझे घुटन हो रही है, शायद मैं बेहोश हो जाऊंगी। हृदयेश ने दरवाजा खोल दिया, हाथ पकड़कर कहा- ‘‘चलो ऊपर छत पर, शायद खुले में कुछ राहत मिले, गरमी बहुत है, हाँ ये सब उतार कर कुछ हल्का पहन लो। इससे भी घुटन हो रही होगी।’’ ज्योत्सना ने पति से कहा- ‘‘आप चलिए! मैं आती हूँ।’’
(7)
ब्रह्मदेव तिवारी के बीघे भर फैले हुए पुस्तैनी मकान में चार भाईयों का परिवार रहता था। दो बीच के भाई क्रमशः एयरफोर्स में कार्यरत थे। छोटा यहीं प्राथमिक में मास्टर था। भाईयों की शादी भी बड़के तिवारी जी ने खूब ठोक-बजाकर कर दिया था। वहां भी दहेज के फेरे में न पड़कर घराना देखकर भाईयों को ब्याहा था। तीन भाईयों की शादी आस-पास के दबंग ब्राह्मणों के घर में किया। इसका परिणाम यह निकला कि बड़े से बड़ा अधिकारी, नेता दरवाजे पर सलामी लगाकर ही आगे बढ़ता। दूसरे नम्बर के भाई के ससुर विधायक, पिता के तर्ज पर दोनों साले भी राजनीति में कूदे और पार्टी बदल-बदल कर सत्ता में काबिज रहते। बस एक फोन मिलाया बड़के तिवारी ने कि थाना पुलिस हाजिर। तीसरे के ससुर इण्टर कॉलेज में प्रिंसपल, नकल कर सेंटर बना अकूत धन कमाया। रिटायर होने पर खुद ही स्कूल, कॉलेज खोल लिया। आज के दिन वे इलाके के मदन मोहन मालवीय थे। चौथा पढ़ने में होनहार था, इलाहाबाद तैयारी को भेजा लेकिन वहां जाकर वामपंथ और साहित्य में रम गया। बड़के तिवारी को पांच साल बाद भाई के रंग-ढंग का पता तब चला, जब अखबार के साहित्यक पृष्ठ पर उनकी क्रांतिकारी कविता छपी मिली। पढ़ते हुए कान खड़े हो गये- लिखते हैं-
मुझे तोड़नी है,
बनी बनाई पुरातन की वज्र वह दीवार
जो तुम्हारे और मेरे बीच
खड़ी की गयी थी
उस दिन जब तुम गाँव के दक्खिन में
और मैं पूरब में जन्म ले रहा था
जब तुम्हारे मुँह में
सभ्यता की काली स्याही से
अक्षर अक्षर कालिमा के नियम
दूध में घोलकर
पिलाया जा रहा था
और मुझे आंगन में
चौक, चन्दन, पूर
सोने के कलश पर
सूरज की अरुणिमा का
चन्दन लगाकर
चाँदी की कटोरी में
चाँदी के सिक्के से
अन्न प्राशन के नाम पर
चटाया जा रहा था
प्रिये!
मुझे गिरानी है
पुरातन की वज्र दीवार,
तुम्हारे लिए,
जोड़कर अधूरे सम्बन्धों की डोर
तुम्हारे दक्खिन से
अपने पूरब तक।

सरपट पत्नी से सतुआ-पिसान लिए पहली ट्रेन से इलाहाबाद भागे। हाथपैर जोड़कर माँ की अस्वस्थता का हवाला देकर घर लाए। अनुभवी ब्राह्मण मानसिकता ताड़कर बाण छोड़ता है। माँ को समझा-बुझाकर तैयार किया। व्याह का दबाव बनाने लगे। दो बार घर छोड़कर भागे। अन्तिम ब्रह्मास्त्र छोड़ा बड़के तिवारी ने। जोरदार हार्ट अटैक का सन्देश भाई के यहाँ भेज अस्पताल में भर्ती हो गये। पिता तुल्य भाई के हार्ट अटैक की खबर सुन छोटके तिवारी गिरते-पड़ते घर भागे। डाक्टर रिश्तेदार थे, एकांत में ले जाकर समझाया तनाव इनके लिए जानलेवा हो सकता है। बेचारे छोटके तिवारी फंस गये और रोते-रोते ब्याह के बंधन में बंध गये।पहले क्रांतिकारी प्रेम का भूत पूरी तरह माथे पर चढ़ा हुआ जानकर बड़के तिवारी ने इस बार न घर देखा, न घराना। इलाके की सबसे खूबसूरत ब्राह्मण कन्या घर लायी गयी। अल्हड़ गाँव की लड़की, किसी तरह नकल से बी.ए. पास किया था। पिता को रिश्ता घर बैठे मिला तो इलाके भर मूसरन डोल बजा-बजा कर ऐलान किया, हमारी बेटी तिवारीपुर के तिवारियों में जा रही है। स्त्री के देह का सौन्दर्य पुरुष की सबसे बड़ी कमजोरी है, पत्नी का सौन्दर्य सारे क्रांति पर भारी पड़ा और छोटके तिवारी का वामपंथ छू मंतर हो गया।

(8)
आधी रात को गुलाबी शिफॉन की खूबसुरत नाइटी में ज्योत्सना छत पर पहुँची, हृदयेश ने आकाश के चांद को आंख मारते हुए कहा- ‘‘तुम्हारी ज्योत्सना मेरे पास है।’’ दोनों कुछ छड़ एक दूसरे को एकटक निहारते रहे। गोरा रंग, गोल चेहरे पर काली बड़ी-बड़ी आँखें। उसे याद आया जब आजी उसे पहली बार देख कर आयी थी, कहते नहीं अघाती थीं- ‘‘बाबू चनरमा अइसन गोल मुँह पर आम के फाक नियर बड़-बड़ आँख अउर तोता के ठोर नियर नाक, टह-टह लाल ओठ और पीठ पर धौल जमाते हुए कहती अउरी गावे ले ए बाबू एकदम कोइलिया नियर।’’ ज्योत्सना ने ननद के आग्रह पर मीरा का भजन सुनाया- ‘‘पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।’’
हृदयेश ने उसके होठों को चूमने का प्रयास किया तो ज्योत्सना छिटककर भागने लगी। बड़े से सुनसान छत पर मियाँ-बीबी एक दूसरे के साथ भागा-भागी खेलने लगे। थककर हँसते-हँसते लोटपोट हुए जा रहे थे- ‘‘बाप रे धाविका पत्नी पहली रात में इतना दौड़ायेगी पता नहीं था।’’ ज्योत्सना ने कहा- ‘‘हृदयेश! एक बात पूंछू?’’ हाँ क्यों नहीं।….
आप भौतिकी के ही प्राध्यापक हैं न?
आफकोर्स, व्हाई नाट।
तुम्हें आशंका क्यों?
‘‘कमाल करते हैं, इतनी मूर्खतापूर्ण परम्परा का निर्वहन पूरे मनोयोग से करते देख।’’ ज्योत्सना ने व्यंग्य से मुस्कुराते हुए कहा- बात ठस्स से दिमाग में धस गयी। बना बनाया रोमैंटिक मूड उखड़ गया।

‘‘विवशता है।’’ हृदयेश का चेहरा क्रोध से खींच गया। जिसे छिपाने की उसकी कोशिश नाकाम रही।
दूसरा सवाल उससे भी घातक था। ‘‘सुना है आप डी.यू. में आइसा के पदाधिकारी थे और अभी प्रलेस के पदाधिकारी हैं। मैंने आपके कई वैचारिक लेख हंस जैसी बड़ी पत्रिकाओं में पढ़े हैं। आश्चर्य होता है समाज की रुढ़ परम्पराओं, जातिय व्यस्था का खण्डन करने वाला युवक ऐसी यातनापूर्ण कुल परम्परा का न केवल पालन करता है बल्कि पत्नी को भी मानने के लिए विवश करता है।’’ज्योत्सना पूरे आवेग में थी। ‘‘जिन बुराईयों का आपको पुरजोर खण्डन करना चाहिए उसके प्रति यह अन्ध आस्था क्यों?’’ हृदयेश बगलें झांकने लगा, कोई मजबूत उत्तर न दे सका तो कुतर्क करने लगा।देखों! ज्योत्सना। कुछ बातें मानसिक तौर पर इस कदर हमसे जुड़ी रहती हैं कि हम उसे मानने के लिए विवश हो जाते हैं। इस पूजा से मेरी माँ मनोवैज्ञानिक तौर पर जुड़ी है और एक अजीब संयोग भी है कि जिन लोगों ने इसे मानने से इनकार किया उन सब का सफाया हो गया। अब न मानने का कोई विकल्प नहीं बचता मेरे पास।ज्योत्सना को हंसी आ गयी- ‘‘यह भौतिकी का प्राध्यापक कह रहा है, आई डोंट बिलिव, ह्वाट अ-नॉनसेंस जोक।’’

हृदयेश चिढ़ गया- ‘‘तुम्हें इतनी उलझन क्यों हो रही है, कर्मकाण्डी आचार्य चन्द्रसेन शास्त्री की बेटी कुल परम्पराओं के निर्वहन पर सवाल खड़े कर रही है।’’ कंधे उचका कर कहा- ‘‘घोर आश्चर्य तो मुझे हो रहा है।’’
हृदयेश हाथ से पकड़ी हुई रेलिंग की ओर पीठकर ज्योत्सना की तरफ खड़ा अंधेरे शून्य में निहार रहा था।
पति की कोई प्रतिक्रिया न पाकर ज्योत्सना ने पास जाकर कहा- ‘‘वैदिक संस्कृति में पितृसत्ता की साजिशें विषय पर शोध किया है मैंने।’’ हृदयेश झट से बोला- ‘‘पितृसत्ता की साजिशें? तुम्हें शीर्षक किसने दिया?’’
जब तर्क मजबूत होते हैं आपके तो रास्ते रोकने का साहस किसी में नहीं होता। ज्योत्सना के होठों पर दृढ़ता की मधुर मुस्कान थी। हृदयेश मुस्कुरा उठा- ‘‘तो तुम्हें वैदिक नियम स्त्रियों के पक्ष में घोर षड़यंत्र लगते हैं?’’
‘‘बिल्कुल’’- ज्योत्सना ने दृढ़ता से कहा। फिर तो तुम नास्तिक हो। हृदयेश में व्यंग्यपूर्ण मुस्कान में लपेटकर तीर छोड़ा। मना क्यों नहीं कर दिया माँ को पूजा से। कहां थी तुम्हारी वैचारिकी डाक्टर ज्योत्सना उस वक्त?
ज्योत्सना आहत हुई, पुरुष स्त्री के आधुनिकता बोध या वैचारिक होने को किस रूप में ग्रहण करता है वह अच्छी तरह से जानती थी। हृदयेश अपनी गलती छिपाने के लिए उसे घेर रहा था। उसे समझते देर न लगी कि अब उसका जूता उसी के सर है।

‘‘डाक्टर साहब स्त्री का आस्तिक या नास्तिक होना यहाँ प्रासंगिक नहीं है, प्रसंग एक विकृत परम्परा को जबरन ढोने का है।’’ ज्योत्सना ने पूरी ताकत झोककर कहा। पति के आँखों में आक्रोश चांदनी रात के धवल प्रकाश में स्पष्ट दिखाई दे रहा था। एक पराजित पुरुष कितना आक्रामक हो सकता है उसके आँखों की लालिमा में साफ-साफ देखा जा सकता था।‘‘ज्योत्सना तुम्हें नहीं लगता कि तुम हमारे मधुर रिश्ते की नींव कटुता की कटीली पृष्ठभूमि पर रख रही हो। ज्योत्सना ने खुद को संयत करते हुए कहा- ‘‘आप नहीं समझेंगे हृदयेश!’’ हमारी संस्कृति में पुरुष का पौरुष कठोरता के प्रदर्शन में निहित है लेकिन स्त्री जिसे प्राकृतिक तौर पर आपने कोमलांगी घोषित कर रखा है । सब कुछ सुकोमल चाहती है वह चाहती है पुरुष उसे फूल की नाजुक पंखुड़ियों से स्पर्श करे और आप जैसे पुरुषों ने स्त्री को सभ्यता के पिंजरे में कैद खूबसूरत परिन्दा ही माना। पुरुष शिकारी की दृष्टि से देखता है नारी देह को और उसके लिए केवल देह है। व्यक्ति मानने का साहस अभी तक हमारे समाज में मर्दो में नहीं है।’’ उसके चेहरे पर घृणा के भाव स्पष्ट उभर आये थे ‘‘बाप रे बाप!’’ तो आप स्त्रीवादी हैं? हृदयेश ने भयभीत होने का अभिनय किया।‘‘नहीं केवल मनुष्य। जिसे प्रकृति ने वाचिक तौर पर प्रतिरोध करने की क्षमता से नवाजा है।’’ ज्योसना ने घृणा से दाँत पीसते हुए कहा।

पूरब में शुक्र ग्रह उग आया था। सप्त ऋषि और शुकउवा कासे देखकर हृदयेश ने झल्लाते हुए कहा- ‘‘भोर हो गयी, जीवन की सबसे मधुर रात इतनी कड़वी होगी मुझे पता नहीं था।’’
‘‘पवित्र रिश्ते की पृष्ठभूमि भयंकर मानसिक यातना के साथ आरम्भ हो तो उसका हश्र यही होता है हृदयेश!’’ ज्योत्सना रुआसी हो गयी ‘‘मुझे थोड़ा वक्त दें आपके साथ सहज होने में मुझे थोड़ा वक्त लगेगा।’’ कहते-कहते वह रो पड़ी।हृदयेश से ज्योत्सना का रोना नहीं देखा गया। स्त्री के आंसू में बड़ी ताकत होती है। बड़े से बड़े चट्टान पुरुष को पिघलाने की क्षमता से लैस। हृदयेश ज्योत्सना को सीने से लगाकर पुचकारने लगा।
‘‘अरे यार! मैं तो गुस्से में यह सब कह गया। रही बात वक्त की तो जानेमन, अब पूरा जीवन तुम्हारा है जब तक चाहो इंतजार करा लो।’’ दोनों की आंखें मिली। सजल स्नेहिल कंपकपाते होठों से हृदयेश ने ज्योत्सना के होठों को चूम लिया। ज्योत्सना ने शर्माकर पति के सीने में चेहरा छिपा लिया।
हृदयेश ने कहा- ‘‘क्या हुआ? आखिर मैं तुम्हारा पति हूं वैसे भी हमारे बीच कोई पर्दा नहीं फिर उस क्षण को लेकर इतना विचलन ठीक नहीं ज्योत्सना। ज्योत्सना ने उसी मधुरता से उत्तर दिया- ‘‘जानती हूं लेकिन जो पर्दा अपनी स्वीकृति के साथ पूरी सजगता से उठना चाहिए था वह मेरे जीवन में भयंकर दुर्घटना बनकर आया हृदयेश! मैं घोर मानसिक पीड़ा से गुजर रही हूं। थोड़ा वक्त दें प्लीज।

दोनों का वाक्युद्ध पूरी रात चलता रहा, भोर की लालिमा पूरब में छिटकने लगी। सास बहू को जगाने कमरे में पहुंची। कमरे में दोनों को न पाकर शंका हुई कि कहीं गर्मी के कारण दोनों छत पर न सो रहे हों। जल्दी जल्दी सीढ़ियां चढ़ती हुई छत पर पहुँची। माँ को देख हृदयेश ने पत्नी को झट से बाहों से अलग किया। ज्योत्सना तुरन्त नीचे भागी। माँ ने बहू को नाइटी में देख बेटे को आँखों ही आँखों में बहुत कुछ सुनाया। हृदयेश ने सर झुकाकर आगे ऐसा न करने का आश्वासन दिया।
(9)
ब्याह के पन्द्रह दिन बीत गये। बड़ी मान मनउल्ल के बाद मुश्किल से दो बार पति पत्नी एक हुए थे। ज्योत्सना पति की सहजता सरलता और संयम पर मुग्ध हुई जा रही थी। गाड़ी पटरी पर लौट रही थी। दोनों बड़े चाचा ससुर अपने परिवार को लेकर नौकरी पर लौट चुके थे। घर में तीन बेवा वृद्ध औरतें छोटे चाचा सुसर-सास, सास ससुर के अतिरिक्त छोटी ननद मंजू और साल भर का चचेरा देवर बिट्टू रह गये थे। बड़ी ननद को हफ्ते भर बाद ही ससुराल वाले विदा कराकर ले गये थे। हृदयेश दो बहन एक भाई में सबसे बड़ा था। चाचा का हमजोली होने के कारण उनसे वह मित्रवत व्यवहार रखता था। वह उनसे इतना प्रभावित था कि उनके कहने पर कुएं में कूद सकता था। अल्हड़ गाँव की लड़की चाची भी उसके साथ देवरों सा हास-परिहास करती थीं। बड़की तिवराइन आँखों की आँखों में देवरानी को समय-समय पर सीमाओं का ज्ञान कराती रहती। आवश्यकता पड़ने पर जबान भी चलाती।



भरे पूरे परिवार में कमकरिन बर्तन चौका के लिए, महराज रसोई बनाने के लिए, तथा दरवाजे पर तीन नौकर झाड़ू बटोरू के लिए, गोरु चउवा की देखभाल के लिए और इसके अतिरिक्त चुनमुन यादव बड़के तिवारी के व्यक्तिगत ड्राइवर कम बॉडीगार्ड अधिक थे। पिस्टल टांगकर लकदक सफेद शर्ट, पैंट और स्पोर्ट शूज में पूरे माफिया लगते। आगे-आगे मूछों पर ताव दिये सभा पंचायतों में बड़के तिवारी चलते पीछे-पीछे पिस्टल पर हाथ फेरते चुनमुन यादव। दोनों की जोड़ी इलाके में सरनाम थी। ज्योत्सना ने घर में अच्छी पैठ बना ली। तीनों आजी सासों का पैरा दबा देती बाल झाड़ती, सिन्दूर बिन्दी लगाकर पैर छूती। बड़की तिवराइन संस्कारी बहू पाकर धन्य हुई।

ज्योत्सना छोटी सास से घुल मिल गयी, दोनों घंटों बातें करती, साथ खाती-पीती, बिल्कुल सहेलियों की तरह। धीरे-धीरे आपसी दुःख-सुख भी बांटने लगीं। ज्योत्सना विज्ञान पढ़ना चाहती थी, पिता ने कुल परम्परा के अनुसार जबरन संस्कृत पढ़ने को विवश किया। जिसका गहरा क्षोभ उसके मन में था। वह अपने विद्रोह से पितृ सत्ता को जड़ से उखाड़ फेकना चाहती थी। चाची सास की खूबसूरती ने उन्हें घर में इस कदर कैद कर लिया था कि वह बाहर की दुनिया का विकास स्कूल, अस्पताल, डाकखाने से ज्यादा नहीं जानती थी। दबाकर रखने का परिणाम यह हुआ कि वह बात-बेबात अनायास हंसती और किसी को बिना सोचे समझे कुछ कहतीं।
ज्योत्सना पिता को कोसती, वह समाज को। एक दिन ज्योत्सना ने पूछा- ‘‘चाची जी आप चमईया माई की पूजा करते असहज नहीं हुई थीं?’’

काहे की असहजता बहिनी, देहियें न देखेगी छिनरी, कोठरी में घूसकर उसके कपार पर टांग पसारकर खड़ी हो गयी। साया उठा दिया और गाने लगी देखो-देखो चमईया हमार सुतुही देखो और ठठाकर हँसते हँसते लोट-पोट हो गयी। और चाचा जी? ज्योत्सना पूछते वक्त फटी आँखों से चाची सास को एकटक देख रही थी, ऊ तो कोने में खड़े होकर मूत रहे थे। हमने तो कह दिया। देखो जी हम साया नहीं उतारेंगे, खाली साया में आपकी भाभी ने अन्दर आने दिया आप आंख मूने नहीं तो हम समनवे पहिन लेंगे, फिर यह न कहियेगा की बड़ी निर्लज है।’’ फिर? ज्योत्सना अवाक थी। फिर क्या इन्होंने आंख मूंद लिया, मैंने कपड़ा पहिना सामान चढ़ाया और निकल गयी। इ देखो, साल भितरे की देन है, पलंग पर गोल मटोल बच्चा निश्चिंत सोया था। ज्योत्सना का दिमाग घूम गया। उफ्फ ये गाँव की औरत भी इतनी समझदार निकली और मैं संसार की सबसे बड़ी मूर्ख जिसे ये सब नहीं सूझा। उसे अपने ऊपर गहरा क्षोभ हुआ जी में आया सिर दीवार पर दे मारे।
(10)

मई में शादी हुई और जुलाई में दो माह गाँव रह कर हृदयेश और ज्योत्सना दिल्ली लौट आये। महानगर की जीवन शैली और व्यस्त दिनचर्या में पिछले दिनों का गम जाता रहा। हृदयेश और ज्योत्सना दोनों अभी बच्चा नहीं चाहते थे। सास हर महीने फोन कर कोई नई बात का सवाल दागती और ज्योत्सना टाल जाती। सास को चिन्ता हुई पढ़ी-लिखी आधुनिक खयालों वाली शहरी लड़की ने लगता है पूजा में कोई कमी कर दी है। पति से चिन्ता जाहिर कर रोने लगी। एक अज्ञात भय ने दंपति को घेर लिया। क्वार का महीना, जाड़े ने अपना असर दिखाना शुरु कर दिया था। शाम होते ही बुर्जुग ओढ़ना-बिछावन डाल बिस्तर में दुबक कर बैठ जाते। एक शाम बड़के तिवारी शहर से लौटकर संध्या वंदन कर दुवार पर आराम कुर्सी पर आँख बन्द कर कुछ मंथन करने में लीन थे। बड़की तिवराईन एक चुरुआ ठण्डा तेल पति के कपार पर डाल, सिर दबाने लगीं। दस मिनट तक पत्नी की आवाज न सुनकर बड़के तिवारी को आश्चर्य हुआ। ऐसे समय पर वह अक्सर पूरे घर की रिपोर्ट देती। ज्यादातर छोटे भाई की छोटके तिवारी पूरे विद्रोही, आज कल खुलेआम मांस मछली खाने लगे थे। तिवारी कुर्सी छोड़कर खड़े हो गये, क्या बात है हृदय की अम्मा, तुम्हारा इतना मौन मुझे अखर जाता है। कोई तो चिन्ता का विषय अवश्य है तुम्हारे मन में बड़की तिवराईन ने पति को सजल आँखों से देखा, ‘‘सुनिये जी छः महीने बीत गया और बहू ने अभी तक खुशखबरी नहीं दी, मेरा जी घबराता है। ना जाने क्या होने वाला है। पति के हथेलियों को पकड़कर आँखों में आंखें डालकर कहा- ‘‘हमको दिल्ली जाना है। बड़के तिवारी ने तुरन्त स्वीकृति दी। ठीक है चलो तुम्हे देश की राजधानी दिखाते हैं, तुम भी क्या याद रखोगी।

हफ्तेभर बाद का टिकट मिला, हृदयेश को फोन से खबर कर दिया गया। ज्योत्सना ने जिंस-कुर्ते, टाउजर, टाप सब आलमारी में छिपा दिया। रात में सोते वक्त हृदयेश से कहा- ‘‘अम्मा-पिताजी कब तक रहेंगे? हृदयेश कोई किताब पढ़ रहा था- सुनकर हँस पड़ा। जानेमन घबड़ा गयी? अभी वो आये नहीं और आपने जाने का हाल पूछ लिया।’’ ज्योत्सना झेप गयी। मेरा मतलब ये नहीं था, अब गाँव की तरह यहाँ तो दस नौकर-चाकर है नहीं, और अम्माजी ठहरी पूरी कर्मकांडी, सब कैसे मैनेज होगा? सोच रही हूँ और एक बात ध्यान रखना, चेतावनी देते हुए कहा- ‘‘अण्डे-आमलेट का फरमान मत देना उनके सामने गलती से भी वरना मेरा छुवा जीते-जी नहीं खायेंगे। ज्योत्सना के चेहरे से चिन्ता साफ झलक रही थी।सास आई, हफ्ते भर रहकर हिदायते देतें, डाक्टर को दिखाते-सुनाते दिल्ली घूमकर चली गयीं। स्टेशन पर रोते हुए बेटे से वचन लिया छुट्टी होते घर चले आना। छुट्टियों में ज्योत्सना मायके जाना चाहती थी लेकिन हृदयेश तैयार नहीं हुआ। कई दिनों तक पति-पत्नी में शीत युद्ध चलता रहा। अन्त में हृदयेश ने समझौता करते हुए कहा- ‘‘अपने पिता से कहो घर आकर ले जायें विदा कराकर।’’ ज्योत्सना मान गयी, कोई चारा नहीं था। दिल्ली से बनारस के लिए ट्रेन रवाना हुई, स्टेशन पर बड़के तिवारी बुलैरो लिए पहले से खड़े थे। बेटे-बहू को देखकर हर्षित हुए, मिलने-मिलाने, हाल-चाल के बाद गाड़ी तिवारीपुर की ओर चल पड़ी। रास्ते भर पिता-पुत्र पूरे गाँव का हाल-चाल, देश-प्रदेश की राजनीति का गाँव पर प्रभाव आदि विषयों पर चर्चा करते रहें। अबकी गर्मी में किन-किन के घर में लगन है और कितना दान-दहेज मिल रहा है पर बड़के तिवारी विशेष रस लेकर बतियाते। ज्योत्सना सर झुकाये दोनों की बातें सुनती और मन ही मन पति को बनारस की सड़कों से गुजरते हुए कोसती, नैहर के रास्ते से गुजर रही थी, हृदयेश ने खबर तक करने को सख्त मना किया था। ‘‘तुम्हारे माँ-बाप का ड्रामा स्टेशन पर ही चालू हो जायेगा, आकर घर से ले जायें समझी। हमारे घर की बहुयें बिना दिन रखे विदा नहीं होती।
(11)
गाँव का नैसर्गिक वातावरण ज्योत्सना को बचपन से लुभाता रहा है। दुवार पर पूरा खानदान जमा था, गाड़ी रुकते ही छोटी ननद मंजू भागकर जल्दी से गाड़ी खोलकर भाभी के पाँव छूकर सामान निकालने में भाई की मदद करने लगी। बड़की तिवराईन ने भर लोटा धार से बेटे-बहू को ओईछ कर नजर उतारा। बहू को पकड़कर अन्दर ले गयीं। टोले भर की औरतें और लड़कियों का हुजूम आंगन में उमड़ा देख ज्योत्सना सहम गयी। सफर की थकान से शरीर टूटा जा रहा था। चाची सास गले मिलीं और बारी-बारी सभी बड़ी-बुर्जुग महिलाओं के पैर छुलाया। लड़कियों ने भाभी को छेड़ा, ‘‘अकेले आयी भाभी, हम तो सोच रहे थे भतीजे का नेग लेंगे।’’ बड़की तिवराईन का दिल बैठ गया। चाची सास ज्योत्सना को भीड़ से निकालकर कमरे में ले गयीं।
‘‘जाओ नहा-धोकर आराम करो, शाम को बतियाते हैंऔर आंख दबाकर खिलखिला उठीं। ज्योत्सना को छोटी चाची की खिलखिलाहट बड़ी प्यारी लगती थी। औरतों का खिलखिलाकर हँसना कितना दुभर है, जानती थी। याद आया मायके में माँ कभी खुलकर हँसने नहीं देती थी। बड़े भाई तो कई बार हाथ तक बचपन में चला देते थे। वह हँसना चाहती थी कई बार छोटी चाची की तरह खिलखिलाकर, स्वच्छन्द हँसी।

महीना भर बीत गया, मई-जून में विदाई की कोई तिथि नहीं मिली, सास दुखी मन से हृदयेश से कह गयीं- ‘‘स्टेशन पर माँ-बाप से मिला देते तो बहू को दुख न होता।’’ हृदयेश को भी दुख हुआ, पिता-भाई तो कई-बार दिल्ली आकर मिल गये थे, लेकिन माँ से मिले ज्योत्सना को पूरा एक साल हो गया था। वह घंटों रोती रही। एक दिन ज्योत्सना बड़की आजी का पैर दबा रही थी, आजी खुश हो गयीं, खूब दूध-पूत का आशीष दे अपनी कोठरी में ले गयीं। काठ के पुराने सन्दूक को खोलकर एक छोटा सा नक्कासीदार बक्सा निकाला, बक्सा गहनों से भरा था। दो मोटे-मोटे पछुऐ उसके हाथ में रख पहना दिया, तुम्हारी कलाईयां वैसी ही गोल-मटोल है बहू, जैसे जवानी में मेरी थी। आँखों से झर-झर आंखू बहने लगा। ज्योत्सना उनके कष्ट को समझ सकती थी। भरे यौवन में वैध्वय कितना बड़ा अभिशाप है उसने बनारस के विधवा आश्रमों, घाटों आदि पर भटकती, भीख मांगती विधवाओं के जीवन में बहुत नजदीक से देखा था शोध कार्य के दौरान।

आजी मौन थी ये ‘चमईया’ और इसकी अन्धभक्ति घर में क्यों होती है? ज्योत्सना ने बड़ी मासूमियत से पूछा। आजी ने संयत होकर कहा बताती हूँ तुम्हें, और काठ के सन्दूक से सास की जनानी वंशावली निकालकर बैठ गयीं- ‘‘हमारे पुरखों में एक थे जटाशंकर बाबा, बड़े विद्वान, बलिष्ठ और सुन्दर। गाँव की जमींदारी राजा साहब से शास्त्रार्थ में जीतने के कारण इनाम में मिला था। घोड़े से गाँव-गाँव घूमते आसासियों का दुख-दर्द पूछते, सूखा पड़ने पर किसानों का लगान राजा को अपने खजाने से देते। न्यायप्रिय और दयालु थे। बाबा के जीवन में सब कुछ ठीक चल रहा था कि एक दिन भोरे राजा का बुलावा आया, घोड़े से चल दिये, सूनसान रास्ते में एक जगह घोड़ा अड़ गया, बड़ी कोशिश करते रहे, लेकिन घोड़ा टस से मस न होता। बेचारे सिर पर हाथ रख पास के बगीचे में जा बैठे दिन चढ़ आया था, भूख-प्यास से बेहाल, बाग में कुँआ तो था, लेकिन लोटा डोर नहीं। बाबा ने सोचा अब जीवन समाप्त। बेचारे ईश्वर को याद कर रोने लगे, तभी एक बूढ़ी औरत अपनी जवान बेटी के साथ लोटा-डोर लिए आई,
बाबा गिरते-पड़ते पहुँचे। बूढ़ी औरत ने कहा- आप बड़ मनई बुझाते हैं, हमारे हाथ का छुआ पियेंगे। बाबा ने हाथ जोड़ विनय किया, जीवन मिले तो सोचेंगे। बुढ़िया ने बेटी को इशारा किया। लड़की भर लोटा पानी लिए आई और मुस्कुराते हुए बाबा को पिलाने लगी। लड़की दिव्य सुन्दरी थी, बाबा मुग्ध हो गये। अक्सर बाग से गुजरने लगे। लड़की और उनका मेल-जोल बढ़ा तो बुढ़िया की झोपड़ी तक पहुँचे। बुढ़िया को कुजात छांट जात वालों ने गाँव निकाला दे रखा था, विधवा औरत जवान बेटी के साथ विराने में झोपड़ी डाल रहती थी। कहते हैं- ‘‘इतनी बड़ी डाईन थी कि उड़ती चिड़िया का पंख बांध देती थी।’’ धीरे-धीरे मड़ई अटारी में बदल गयी। गर्भ रहता तो बुढ़िया मार कर गिरा देती। लड़की महीने शोक मनाती फिर पुराने ढर्रे पर लौट आती। आखिरी गर्भ माँ से छिपा ले गई। जब-तक पेट उभरा पाँच माह हो चुके थे। माँ ने जहर खा लिया। लड़की बाबा के दरवाजे पर आकर बैठ गयी। बाबा का तीनों त्रिलोक घूम गया। समझा-बुझा कर वापस किया, अगले पूरे दिन साथ रहे, सोचते रहे कैसे मुक्ति मिले? आखिरकार अपने विश्वासपात्र नौकर को आदेश दिया, हाथ-पैर बाँध के पोखरे में बोर दो और ब्रह्महत्या से मुक्ति के लिए चार धाम को निकल गये।

इधर बाबा के चार भाईयों में तीन की पत्नियों को गर्भ था। आधी रात को डग्गर बजाते सपने में आयी और पेट काछ के चली गयी। सबेरे तक घर-आँगन खूने-खून। क्या बतायें बिटिया पुरनिया (आजी सास) कहती थी, लगा खूँट नसा गया। साल भर बाद बाबा लौटे तो दरवाजे पर सियापा छा गया था। देवी प्रकोप से बारी-बारी तीन जवान बेवा औरते घर में दहाड़ रही थी। पत्नी बेटी को छाती से साटे पास आने से डरती। बाबा ने देस-देस के पण्डितों को दिखाया। कोई फायदा नहीं। पण्डा, मौलवी, पीर, मजार सब एक किया लेकिन जस का तस सब बना रहा। इसी बीच किसी ने एक ओझा का पता दिया ओझा बुलाया गया। गजब हो गया बहिनी- ‘‘ओझा बकने लगा, गर्भ के साथ चमईनिया डोला रही है।’’ बाबा ने उपाय पूछा- ‘‘ओझा बोला- वंश-दर-वंश पुजइया लेगी महराज। चौरी मांग रही हैं। हिस्सा मांग रही है।’’ कोई चारा नहीं था- बाबा मान गये- उसकी कोठी ओझा को दे बारी वाले पोखरे के पास चौरी बन्हा दिया। पत्नी गर्भ से हुई, नौ माह पर जुड़वा बेटे हुए। ओझा आ धमका, पूजन दें महराज! नहीं तो छोड़ेगी नहीं, जनम-विवाह सब पर। पत्नी हाथ जोड़ विनती करने लगी, देंगे क्या मांगती है? ओझा ने उसकी मांग सबको सुनाई, पैदाइस पर उसका मन्दिर, विवाह पर वर-बहू नंगे जेवनार, गहना, कपड़ा चढ़ा कर पाँचवें दिन साथ रहें, तभी वंश चलेगा।

मन्दिर के नाम पर बाबा ने एक कोठरी बनवा दी। पत्नी ने चार बेटों को जनमा लेकिन आगे बेटों ने चमईया को पूजा देने से मना कर दिया। देखते ही देखते तीन बेटे मर गये। छोटा बेटा बारह का था जल्दी-जल्दी ब्याह कर पुजइया दिलाया। वंश इसी से आगे बढ़ा। इनके भी चार बेटे हुए, ये हमारे पति थे। बड़के भाई माँ की बात मानकर सब करते गये। हमारे पति पढ़े-लिखे होने के कारण नहीं माने। नतीजा देख रही हो। ‘चमईया’ बड़ी जगता हैं। कह कर फफक-फफक कर रोने लगीं। ज्योत्सना पूरी कहानी ध्यान से सुन रही थी। अजीब संयोग जुड़ा था वंशावली की कहानी से। एक तरफ छोटी चाची सास तो दूसरी तरफ आजी सास का वृतांत। माथा घूम गया, अब समझ आया उसे कि बच्चा पैदा करना बेहद जरुरी है वरना सास पागल हो जायेगी। साल भर बाद ज्योत्सना ने बेटे को जन्म दिया। सास ने अंग्रेजी बाबा बजवा कर ‘चमईया’ को कांची-पाकी मसाला चढ़ाया, बड़के तिवारी ने बारह गाँव के ब्राह्मणों को महाभोज दिया।

कुल परम्परा चलती रही। शादी के पन्द्रह साल बीत गये। ज्योत्सना अब दो सुन्दर बेटों की माँ थी। सास खुशी से मुसरन ढोल बजातीं। चाची सास भी अब तक दो बेटों की माँ बन चुकी थी। जिस कुल में तीन पीढ़ियों से एक खूँट पर वंश बेल आगे बढ़ती थी वहाँ अब चारों भाईयों की वंश वृद्धि हो रही थी। ज्योत्सना हर साल छुट्टियों में घर आती, रास्ते में ‘चमईया का मन्दिर’ देख सभी गाड़ी में बैठे-बैठे हाथ जोड़ते। देखते ही देखते इन पन्द्रह सालों में ‘चमईया’ की महिमा पूरे इलाके में फैल गयी, तिवारीपुर के तिवारियों की कुल देवी ‘चमईया’ की कृपा से दरवाजे पर हंस लोटता है। सावन में आस-पास की औरतें कढ़ाई चढ़ाने लगीं। प्रेमी मन्नत का धागा बाँधने लगे। कोठरी भव्य मन्दिर में बदल गया। चुनमुन यादव के संरक्षण में हाट-बाजार सजने लगा। ‘चमईया’ के गीतों के कैसेट से बाजार पट गया।


ज्योत्सना के बाद सबसे पहले बड़े चाचा ससुर के बेटे का ब्याह हुआ। पति-पत्नी दोनों डाक्टर बहू को कुल परम्परा के अनुसार चमईया की पूजन विधि बताने की बारी आई। मन्दिर के पिछवाड़े वाले चोर दरवाजे पर नवेली दुल्हन को ले जाकर ज्योत्सना ने वही निर्देश दिया जो छोटी चाची ने किया। लड़की आवाक मुँह ताकने लगी। पुजइया हो गयी। साल भर बाद बहू ने बेटे को जन्म दिया। घर में एक बार फिर शहनाई बजी। कुल की परम्परा वंशावली में दर्ज हुई, बहुओं के शादी के पहले साल में बच्चा जनमना अनिवार्य है नहीं तो चमईया कुपित हो जायेंगी और बहुओं की कुल परम्परा में चमईया की पूजा का मंत्र वाक्य बना- ‘‘देखो देखो चमईया हमार सुतुही।’’

नोट : जातिसूचक शब्दों का प्रयोग यथार्थ के सन्दर्भ से है, लेखिका की उनसे कोई सहमति नहीं है 

औरतें – क़िस्त तीन ( स्पैनिश कहानियां )



एदुआर्दो गालेआनो / अनुवादक : पी. कुमार  मंगलम 


अनुवादक का नोट 


“Mujeres” (Women-औरतें) 2015 में आई थी। यहाँ गालेआनो की अलग-अलग किताबों और उनकी लेखनी के वो हिस्से शामिल किए गए जो औरतों की कहानी सुनाते हैं। उन औरतों की, जो इतिहास में जानी गईं और ज्यादातर उनकी भी जिनका प्रचलित इतिहास में जिक्र नहीं आता।  इन्हें  जो चीज जोड़ती है वह यह है कि  इन सब ने अपने समय और स्थिति में अपने लिए निर्धारित भूमिकाओं को कई तरह से नामंजूर किया।

भविष्य की जुबानियाँ

एक बार हुआ यह कि पेरू में जादू-करतब दिखाने वाली एक औरत ने मुझे लाल गुलाबों से ढँक दिया और इसके बाद मेरा भाग्य पढ़ते हुए कहा:
“एक महीने के भीतर-भीतर तुम्हें एक बड़ा ईनाम मिलेगा” मुझे हँसी आ गई. मुझे हँसी उस अनजान औरत के अगाध स्नेह पर आई जो मुझे फूल और सफलता की दुआएँ भेंट कर रही थी. मुझे हँसी ईनाम या सम्मान शब्द से आई जिसमें पता नहीं क्या तो मजाकिया-सा है.  हंसी उसी वक़्त मोहल्ले के एक पुराने दोस्त की याद होकर भी आई.  वह निहायत ही रूखा लेकिन खरी-खरी बोलने वाला इंसान था. अपनी छोटी सी उंगली हवा में उठा, सजा सुनाने के अंदाज़ में कहा करता था :”आज नहीं तो कल, लेखकों को रूखा-सूखा खाकर ही ज़िंदा रहना है”. उसकी यही बात याद कर मुझे हंसी आई. और वह जादूगरनी मेरी हँसी पर हँस दी थी.एक महीने बाद, ठीक एक महीने बाद मोंतेवीदियो में मुझे एक टेलीग्राम मिला. टेलीग्राम यह बता रहा था कि चिले में मुझे एक बड़ा ईनाम दिया गया था. उस ईनाम का नाम खोसे कार्रास्को पुरस्कार था.



औरतें सीरीज की इन कहानियों की पहली क़िस्त पढ़ने के लिए क्लिक करें:
औरतें
औरतें सीरीज की इन कहानियों की दूसरी क़िस्त पढ़ने के लिए क्लिक करें:
औरतें :क़िस्त दो 

टेलीविजन


मुझे यह स्पेनी टेलीविजन दुनिया की नामचीन हस्तियों में शुमार रोसा मारिया मातेओ ने बताया था. किसी एकदम से नामालूम से गाँव की एक औरत ने उन्हें एक ख़त लिखकर एक सवाल का सच-सच जवाब बताने की गुजारिश की थी. “जब मैं आपको देख रही होती हूँ, तब क्या आप भी मुझे देखती हैं?”
रोसा मारिया ने मुझे यह बताया. और यह भी कि उन्हें नहीं सूझा कि इस सवाल का जवाब क्या होना चाहिए.

उन दो आवाजों के नाम 

वे साथ बड़ी हुई थी. गिटार और विओलेता पार्रा.
जब एक बुलाती, दूसरी चली आती थी. गिटार और वह एक साथ हँसतीं, रोतीं. सवाल पूछतीं, हैरान होतीं और विश्वास करतीं थी. गिटार के सीने में एक छेद था. उसके भी.  आज ही के एक दिन की तरह 1967 में गिटार ने बुलाया, लेकिन वियोलेता नहीं आई. उसके बाद वह कभी नहीं आई.

वह नहीं भूलती

वह कौन है जो अफ्रीका के जंगलों के सारे छोटे रास्ते जानती पहचानती है? कौन है वह जो हाथीदांत के शिकारियों तथा दुश्मन जंगली जानवरों की खतरनाक जद से बचना जानती है? कौन अपने तथा दूसरों के छोड़े गए निशानों को पहचानती है? कौन अपनी सभी संगिनियों तथा साथियों की यादें बचा कर रखती है?
कौन है जो वे सारे सन्देश-संकेत छोड़ती है जिसे हम इंसान न तो सुन और न ही बूझ सकते हैं? वही संकेत जो बीस किलोमीटर से भी अधिक की दूरी से सचेत करना, मदद देना, घुड़की देना या दुआ-सलाम करना जानते हैं?
वो वह है. सबसे बुजुर्ग हथिनी. सबसे बूढी, सबसे अक्लमंद. वह जो झुण्ड के सबसे आगे चला करती है.


लेखक के बारे में


एदुआर्दो गालेआनो (3 सितंबर, 1940-13 अप्रैल, 2015, उरुग्वे) अभी के सबसे पढ़े जाने वाले लातीनी अमरीकी लेखकों में शुमार किये जाते हैं। साप्ताहिक समाजवादी अखबार  एल सोल  (सूर्य) के लिये कार्टून बनाने से शुरु हुआ उनका लेखन अपने देश के समाजवादी युवा संगठन  से गहरे जुड़ाव के साथ-साथ चला। राजनीतिक संगठन से इतर भी कायम संवाद से विविध जनसरोकारों को उजागर करना उनके लेखन की खास विशेषता रही है। यह 1971 में आई उनकी किताब लास बेनास आबिएर्तास दे अमेरिका लातिना (लातीनी अमरीका की खुली धमनियां) से सबसे पहली बार  जाहिर हुआ। यह किताब कोलंबस के वंशजों की  ‘नई दुनिया’  में चले दमन, लूट और विनाश का बेबाक खुलासा है। साथ ही,18 वीं सदी की शुरुआत में  यहां बने ‘आज़ाद’ देशों में भी जारी रहे इस सिलसिले का दस्तावेज़ भी। खुशहाली के सपने का पीछा करते-करते क्रुरतम तानाशाहीयों के चपेट में आया तब का लातीनी अमरीका ‘लास बेनास..’ में खुद को देख रहा था। यह अकारण नहीं है कि 1973 में उरुग्वे और 1976 में अर्जेंटीना में काबिज हुई सैन्य तानाशाहीयों ने इसे प्रतिबंधित करने के साथ-साथ गालेआनो को ‘खतरनाक’ लोगों की फेहरिस्त में रखा था। लेखन और व्यापक जनसरोकारों के संवाद के अपने अनुभव को साझा करते गालेआनो इस बात पर जोर देते हैं कि “लिखना यूं ही नहीं होता बल्कि इसने कईयों को बहुत गहरे प्रभावित किया है”।




अनुवादक का परिचय : पी. कुमार. मंगलम  जवाहर लाल नेहरु विश्विद्यालय से लातिनी अमरीकी साहित्य में रिसर्च कर रहे हैं .  आजकल फ्रांस में हैं. 


क्रमशः



नदिया के तीरे-तीरे

डॉ. आरती  

संपादक , समय के साखी ( साहित्यिक पत्रिका ) संपर्क :samaysakhi@gmail.com

प्रिय नन्ना

इन दिनों आपकी बहुत याद आ रही है. पिछले कई दिनों से मन बेचैन है, लगता है आपसे खूब बात करूँ, आपको छू सकूं  , पास बैठकर कांपते झुर्रीदार हाथों को  पकड़ कर, चीनी मिट्टी के  सफेद प्लेट में थोड़ी-थोड़ी चाय डाल कर पिला सकू, आपके नहाने से पहले और बाद भी पीठ में तेल लगा सकूँ  और…. ढेरों इच्छाएँ… अनगिनत चाहतें?यह सब अभी संभव होता नहीं लग रहा. हमारे बीच रेलसफर के  दस-ग्यारह घंटों की बिसात बिछी है जिसे पार किए बिना इच्छाओं का कोई भी को ना छू पाना कैसे मुमकिन होगा? बस इसलिए यह भूला-बिसरा तरीका  खोज बैठी चिट्ठी लिख रही हूँ.

चिट्ठी लिखते हुए याद आता कि आठवीं कक्षा पास कर नवमीं पढऩे जब मैं माँ-पापा के  पास जा रही थी. लगभग बारह साल बाद आपसे दूर जाना बेहद  कठिन था. बहुत कठोर सी मानी जाने वाली लड़की रो रही थी, खूब रो रही थी. आपने बस में बैठ जाने के  बाद कहा था- चिट्ठी लिखना, अभी तुम ग्रेजुएट नहीं हुई हो.सुनकर पापा मुस्कुराए थे. उन्हें पता था यह तंज किया गया है और उन्हीं के लिए किया गया है. और मैं हर पंद्रह-बीस दिनों में चिट्ठी लिखने लगी. कोशिश करती कि अंतर्देशीय-पत्र के तीनों पन्ने भर लिखूँ… लेकिन तब मेरी चिट्ठियाँ  आगे बढ़ती ही न थीं! बस पैट्रन राइटिंग पर…. हम सब यहाँ बहुत खुश हैं. आपकी  कुशलता की  कामना…. मेरी पढ़ाई अच्छी चल रही है….. फिर छोटी बहनों, भाई की  पढ़ाई….. फिर हम सब नानी को , आपको  याद करते हैं…. कभी-कभी मौसम की  बातें भी होती हैं…. चिट्ठी का  जवाब देने का  अनुरोध और बस विराम.


उन दिनों मेरे पास लिखने लायक  बातें ही नहीं थी या निश्चित न था कि कौन सी बात किससे कही जाय. ठीक  आज इसके  उलट है. मेरे दिल के  हरेक  कोने में ठूँस-ठूँसकर शब्द भरे हैं. चरखा, चक्की , कैंची, सिलाई मशीन और कलम सब कुछ बारी-बारी चल रहा है भीतर. स्मृतियों का  पूरा का  पूरा थान लपेट रखा है मैंने.
जिक्र चिट्ठियों का आया तो आपकी  ही एक  बात याद आई. ससुराल जाती बेटियों को  नसीहत की  तरह एक  पंक्ति पकड़ा दी थी- मुझे कभी भी चिट्ठी मत लिखना. उन्होंने अच्छी बेटियों की  तरह पालन किया. आखिर बेटियाँ किसकी  थीं? आपकी  तरह ही थीं. आपने भी तो अपने पिता को  तीन वचन दिये थे… एक – ताउम्र पेड़ पर नहीं चढऩे का , दूसरा- साइकिल नहीं चलाने का  और तीसरा कि नदी-तालाब में तैरेंगे भी नहीं. आज मैं आपको  यह चिट्ठी लिखते हुए सोच रही हूँ कि यदि मेरी माँ और दोनों मौसियाँ चिट्ठी लिखती तो क्या-क्या लिखतीं…. कितने पन्ने भर लिखतीं…. क्या कभी खत्म होती उनकी चिट्ठियाँ …?

मेरी माँ ने कभी चिट्ठी नहीं लिखी. पिता को  नहीं, पति को  भी नहीं और किसी प्रेमी को  भी नहीं. मुझे भी नहीं.
माँ और उनकी  बहनों का  चिट्ठियाँ  न लिखने का  वचन पिता के  साथ-साथ पूरी कायनात के लिए था. कभी-कभी मुझे लगता है वह ‘वचन’ न था क्योंकि वचनों में प्रतिपक्ष की सहमति भी होती है. यहाँ प्रतिपक्ष की  प्रतिध्वनि कहाँ सुनी गई थी. यदि सुनी जाती तो वे शायद कहतीं- बाबूजी हम आपको  चिट्ठी लिखे बिना कैसे रह सक ती हैं, आखिर हम अपने सुख-दुख और किससे कहेंगी, दुख विपत्ति के  बखत आखिर किसे पुकारेंगी?…. लेकिन  नहीं…. यह बारीक  प्रतिध्वनि गूँजी होगी जरूर, पर सुनता कौन? यहाँ वचनों जैसा विश्वास न था… अपनी जबरदस्ती की  हुंकार थी. धमकी-सी थी… जिसने ताउम्र उन बेचारियों को  स्वप्न में भी डराये रखा.

अब बातों को  थोड़ा दूसरी ओर मोड़ देते हैं. 1993 का  साल, आप रिटायर हुए. मैंने उसी साल दसवीं की  परीक्षा दी थी. 30 मार्च को  आपके  रिटायर होने के  दिन आपके  पास ही थी. यहाँ से आपके  स्वभाव का , विचारों का  दूसरा अध्याय भी शुरू हुआ. अब हम नातिनें, खासकर मैं (सबसे बड़ी होने की  वजह से शायद) धीरे-धीरे खुद को  व्यक्त क रने का  अवसर पाने लगी. अब शारीरिक  और मानसिक  दूरियाँ सिकुडऩे लगी थीं. अब आप साइकिल पर, पापा की  स्कूटर-मोटर साइकिल पर बैठने लगे थे. एक  वचन का  टूटना बहुत चीजों को  नरम क र रहा था. धीरे-धीरे स्वभाव की  हुंकार भी टूट रही थी. वे रिश्तों की , बहुएँ, कभी जिनकी  आवाज़ सुनना तक  असामाजिक  मानदंड थे आपके  लिए, आज 70 पहुँचते-पहुँचते उन्हें पास बुलाकर हालचाल पूछते, उनके  सुख-दुख सुनते और सलाहें भी देते. बहुत सी अकड़ी हुई चीजें टूट रही थीं, बेआवाज़. जैसे तनी हुई रस्सी धीरे-धीरे मुलायम होती जाए और एक  दिन रेशम की  मानिंद स्निग्ध हो जाए, वैसे ही तो मुलामियत आ गई थी आप में. दिनों-दिन नरम और सहज होते जा रहे थे और कीमती भी. इसीलिए शायद सबसे छुपाया, बचाया आपसे कह सक ने की  हिम्मत हो रही है. आज दिल पर हाथ रखकर सौ फीसदी सच कह सकती हूँ कि आप वह पुरुष हो जिसकी  वजह से कैसी भी परिस्थिति हो, मैं नहीं कह पाऊँगी कि ‘दुनिया के  सारे मर्द एक  से होते हैं’ मैं सारे मर्दों से घृणा करने की  बात भी नहीं कह सक ती. मुझे हरेक  में कुछ खूबियाँ दिखती हैं, बेहद उजड्ड और लंपट किस्म का  सहकर्मी भी सहानुभूतिपूर्ण दिखता है मुझे. मैं अपनी उस दोस्त को -जो पुरुषों से घृणा करती है, उसकी  सोच को  बदलने की  कोशिश करती रहती हूँ. उसे स्त्री-पुरुष के  स्वाभाविक  मनोवैज्ञानिक  भिन्नताओं की , सामाजिक  मानसिकता में दुरूह से पगी परवरिश के  अंतरों का  हवाला दे-देकर समझाने की  कोशिश करती हूँ. वह सचमुच बदल भी रही है….. ये सारी बातें आपके  साथ साझा करने की  इच्छा आज चरम पर है. चिट्ठी के  पन्ने भरते ही जा रहे हैं.

यह सब कहते-सुनते घड़ी एक  बजानेवाली है. समय कहाँ रुकता है कभी. मैं स्मृतियों का  लपेट रखा थान धीरे से खोलना शुरू करती हूँ तो समय पीछे की  ओर तेज गति से गोल-गोल घूमने लगता है. वह थोड़ा सा रुक ता है तो कुछ न कुछ पकड़ ही लेती हूँ. अभी एक  चिट्ठी पकड़ में आ गई है. वह छोटी बहन की  चिट्ठी है. एक  दिन सोते समय तकिया के  नीचे एक  चिट्ठी निकलती है. यह जानकर कि चिट्ठी बहन की  है, एक  अनजानी आशंका  जाग उठी. क्यों, किसलिए चिट्ठी लिखी….? और एक दम से उगीं आशंकाएँ सच होती हैं. उस चिट्ठी के  एक -एक  हरफ तो अब मुझे याद नहीं. तब भी सबकुछ कहाँ पढ़ पाई थी? बस कुछ ही पंक्तियाँ ही… कुहरे की  तरह दिमाग में छा गई थीं. हरफ याद रखने की  जरूरत भी नहीं थी. और क्या किया?… कुछ नहीं. उस कोहरे को  फूँक कर हटाने की  जरा सी भी कोशिश न की . बस चारों ओर बिखरे रिश्तों के  ताने-बाने को  सहेजे रखने की  खातिर किसी से कुछ भी नहीं कहा अब तक … तो आज आपसे भी क्यूँ कहूँगी? याद है तो बस उस चिट्ठी के  आशय, नतीजे. हमारे आसपास के  झूठे, दोगले रिश्ते. वह घर, वह परिवार जिसे हम सुरक्षा घेरा मानते हैं, उसके  दिखाये तर्कों- कुतर्को को  बेप्रश्न कबूल करते हैं, यह सोचकर कि वे हमारे अपने हैं, जो कुछ भी कहते-सुनते हैं हमारे अच्छे आज और कल के  लिए? उन्हीं के  बीच कोई मुखौटा लगाए हम पर घात लगाने बैठा होता है. आज समझ में आ रहा है कि लड़कियों को  तर्क  क्यों नहीं करने दिया जाता? ऐसे अनुभव विरले नहीं हैं, हर औरतजात के  पास होते हैं. चाचा, ताऊ, मामा, मौसा, चचेरे-ममेरे भाई, किसी न किसी की  लोलुपता की  शिकार वे होती हैं पर अपनी छोटी बहनों-बेटियों को  वे आगाह नहीं करतीं. हालांकि यह भी उतना ही खरा सच है कि स्त्री का  रणक्षेत्र उसका अपना अकेले का  होता है. यहाँ कोई भी उसके  साथ नहीं होता. बाहर की  एक  उंगली उठते ही आसपास की  वो लकीरें जिन्हें पिता, भाई, पति यहाँ बेटा सब… जो अब तक  उसकी  रक्षा का  दम भरते रहे… उन उठनेवाली उंगलियों में शामिल हो जाते हैं. आज भी यह प्रश्न कतई महत्वपूर्ण नहीं होता कि अपराधी कौन है? केवल लड़कियों के  मामले में. यहाँ अपराध कोई भी करे, अपराधी केवल और केवल वे ही होती है और सजा भी उन्हें ही मिलती है.

मुझे इस सत्य का  आभास था तभी तो मैंने उस युवा होती लड़की  के  प्रश्नों, जिज्ञासाओं, आकुलताओं का  जवाब चिट्ठी में ही दिया. यहाँ मैं यथार्थवादी बन गई थी, आपकी  तरह और बहुत कुछ माँ की  तरह. उसे समझाया, चुप करवा दिया था और उस समय तो उस रिश्ते को  बचा ले गई. आज भी प्रयासरत हूँ. उस अल्हड़ लड़की  ने भी, जो कुछ भी बकती-बोलती रहती थी, आज भी मेरा साथ दे रही है. हमारे आसपास के  सभी रिश्ते ऐसे ही खोखले हैं, ऐसे ही बचते हैं वे. एक  प्रश्न जब तब बेचैन करता रहता है कि हम आखिर क्यूँ बचाकर रखते हैं इन्हें?



नन्ना पर उस एक  रिश्ते के  कटघरे में खड़े होने से आप भी खुश नहीं रह पाते? इसीलिए अन्याय का  साथ देने का  अपराध मैं ताउम्र  करूँगी? मैं नहीं चाहती कि इस घटना के  अक्स आपकी  समझ में आएं. इसे मैंने माँ से भी छुपाया हुआ है… अभी तक . जब कभी संवेदना या आक्रोश  की  अति होने लगती है और हिम्मत बेकाबू होती है कि कह दूँ… किसी से तो? तभी चुनौती देती हुई वह पंक्ति कानों में शीशे की  तरह तीव्रगति से प्रवेश करती है- ‘औरत के  पेट में कोई बात नहीं पचती’ और मैं दोनों हाथ से पेट को  दबोच, पैरों को  तानकर खड़ी हो जाती हूँ… देखो- मैंने आपसे भी कुछ नहीं कहा, कुछ भी नहीं बताया.

हाँ एक  ख्याल जरूर आता है कि ऐसे अनुभव तो मेरे पास भी थे यदि मैंने माँ को  चिट्ठी लिखकर साझा किया होता तो वे क्या करतीं? कैसा जवाब देतीं…? यदि वे आपके वचनों में बंधी न होतीं तो जरूर उनके  पास भी मुझे बताने को  कोई न कोई अनुभव तो जरूर ही होता. हर औरत की  एक मात्र पूँजी है शायद ऐसे अनुभव, जो उसे सपनों में भी पुरुष नामक  प्राणी से डराते हैं और हद तो यह कि इन्हीं में से कोई एक  को  वह आजीवन सहन क रती है. हाँ इतना तो जरूर तय है कि अगर मैंने माँ को  चिट्ठी लिखी होती तो उनका  तीखा-कडुवा अनुभव संसार भी आज मेरे पास होता. ऐसा ही कोई मासूम सा दिखनेवाला सगा-पराया रिश्तेदार, जिस पर आपको  भी भरोसा रहा हो. लेकिन आपकी  बेटियों ने तो चिट्ठी न लिखने की  कसम खाई थी. इसी वज़ह से मैंने अपना भोगा उनसे साझा किया ही नहीं. मैंने खुद को  खुद ही समझा लिया था. अपना रास्ता चुन लिया था. और उस छोटी उमर में एक  बड़े कडुवे सच को  लगभग सहन करने की  क्षमता ओढ़ ली थी कि इस परिवार रूपी भग्नावेषों की  संरचनाएँ खोखली जरूर लेकिन सर्पीली भुजाओंवाली हैं. अपने आडंबरों में वे किसी को  भी लपेट लेंगी. औरतें यहाँ शापग्रस्त आत्माओं की  तरह भटकती काया मात्र हैं. यहाँ उनके  मन की  रत्तीमात्र परवाह नहीं होती. आपने भी नहीं की  थी वरना अपनी बेटियों से उनकी  रचनात्मकता और सच कह सकने का  अधिकार नहीं छीनते.

मैंने न तो अपने पिता को  कोई ऐसा वचन दिया न ही उन्होंने कभी मुझे ऐसे मुखर-अमुखर वचनों में बांधने की  चेष्टा की . मेरे लिखे पर तो आपको  भी प्रसन्नता होती है. अभी कुछ दिनों पहले ही मेरी कविताएँ सुनते हुए आपने कहा भी था- ‘मुझे तुम पर गर्व है’ ओह पहली या शायद दूसरी बार सुने शब्द थे ये. पर औचक  नहीं, पूरे सोच-विचार के  बाद ही निकले होंगे कुछ शब्द… मेरे जीवन भर की  पूँजी. पापा भी मेरा लिखा, छपा देखकर मन ही मन खुश होते हैं. चाहते हैं कि मैं कविताएँ लिखूँ, किताबें लिखूँ. यह तो परदे के  बाहर का  चित्र है और परदे के  भीतर वही नानी, दादी हैं जिन्हें पितृसत्ता ने पढऩे का  ही मौका  न दिया. अपराध कि वे लड़कियाँ थी, उन्हें चौका -चूल्हा ही तो संभालना था… सो किसलिए पढ़ाना? नानी तो बेहद सरल स्वभाव की  महिला हैं, उन्होंने कभी असंतोष, कोई माँग जताई ही नहीं, लेकिन दादी एक  आत्मस्वाभिमानी व्यक्तित्व की , तेज-तर्राट महिला… उनकी  बातों में ऐसे असंतोष झलक ते हैं. केवल पढ़े-लिखे न हो पाने की  वज़ह से जब कभी किसी को  साथ ले जाने की  बाध्यता सामने आती तो उनका  असंतोष मुखर हो जाता है. माँ की  पीढ़ी पढ़ी-लिखी होकर भी पिता के  विचारों की  शिकार. दोनों मौसियों का  अखबारों और किताबों की  दुनिया से भी नाता लगभग शून्य है. माँ किताब, अखबार, पत्रिका एँ जो मिलता है सब पढ़ लेती हैं. को ई चुनाव नहीं. खूब उपन्यास भी पढ़े उन्होंने. एक  समय उन्होंने, मनोज पॉकेट बुक्स वाले और भी जाने क्या-क्या प्रकाशनों वाले. मैंने भी पढ़े हैं उनमें से कुछ… अब याद नहीं आ रहे. न जाने क्यों यहाँ आप बार-बार कटघरे में खड़े दिखाई देते हैं. किताबों के  अच्छे जानकार, कलाकार स्वयं, साहित्य-संस्कृति से गहरे वाकिफ होते हुए भी आपने उन्हें पढऩे का  सलीका  नहीं दिया. अपने सारे हुनर अपने पास रखकर खत्म कर दिये. बेटा न होने से वसीयत तो बेटियों को  मिली और कुछ वंशानुगत मनोवृत्तियाँ भी, लेकिन वह संचित किया हुआ जिसे ‘ज्ञान’ या ‘कला’ कहते हैं, उसे देने लायक  आपने अपनी बेटियों को  नहीं समझा. हालाँकि इसके  पीछे भी आपका  एक  तर्कशास्त्र था कि- व्यक्ति अपनी-अपनी रुचि, मनोवृत्ति का  खुद अर्जित करता है. मुझे भी आपने कहाँ- कुछ सिखाया? जबकि ढाई साल की उम्र से आपके  पास रहती थी.

लेकिन मुझे लगता है और जैसा कि आप कहते रहे कि रुचियों के  अनुसार, मनोवृत्तियों के  अनुसार… तो मैंने आपकी  परछाई का  थोड़ा सा हिस्सा खुद पर ओढ़ लिया. रुचियाँ तो ओढ़ी-ढांकी  ही, मनोवृत्तियों की  चादर भी तान ली, कितना? अभी निश्चित नहीं कह सकती, समय के  द्वार-दालान थोड़े और पार करने के  बाद ही कुछ कहा जा सकता है.

आज, अब जब आपको  चिट्ठी लिखने बैठी हूँ तो सोचा तो यही था कि सबकुछ लिखूँगी, जो सामने नहीं कह पाती पर अब आगे समझ में ही नहीं आ रहा कि और क्या लिखूँ? एक  प्रश्न बार-बार कौंधता है कि माँ-मौसियों ने जिस तरह आपको  कभी चिट्ठी नहीं लिखी, इसी तरह वचनों के  बिना भी मैंने पापा को  कभी चिट्ठी नहीं लिखी! क्यों नहीं लिखी मैंने चिट्ठियाँ? हम भारतीय और खासकर ग्रामीण, कस्बाई लड़कियाँ, पिता से इतनी दूर कैसे हो जाती हैं? जैसे-जैसे हम बड़ी होती हैं, हमारी दूरियाँ बढ़ती जाती हैं… हमारे कपड़ों की  तरह, बालों की  तरह. लगभग बारह-तेरह साल के  बाद, बड़ी होने के  बाद मैं पापा के  गले नहीं लगी? क भी-क भार ही उनके  बगल में, सटकर बैठती हूँ. अभी पिछले महीने जब माँ-पापा मेरे पास आए थे, तब का  किस्सा आपको  सुनाती हूँ- एक  दिन मैं बेहद थकी  हुई थी, बुखार- सा भी लग रहा था. मैं पापा के  बगल के  सोफे पर बैठी थी, थका न और संवेदनाओं के  किसी बबंडर से आहत हो उनके  बगल से, सोफे के  हत्थों पर सिर औंधाकर बैठी-बैठी ही लगभग लेट गई. उस समय बेहद जरूरत लग रही थी कि पापा मेरे सिर पर हाथ रख दें. पीठ पर भी हाथ फेर दें. उन्होंने ऐसा नहीं किया. अलबत्ता मुझे बार-बार कहा जरूर कि भीतर जाकर बिस्तर पर सो जाऊँ, दवा ले लूँ, डॉक्टर को  दिखा आऊँ. उन्हें चिंता थी मेरी, लेकिन उनका  हाथ मेरे सिर तक  क्यों नहीं पहुँचा? आप जरूर ही इसे संस्कार कहोगे… भारतीय संस्कृति जैसा महान- मायावी कुछ! मैं इसे नैतिकता के  डर कहूँगी, जबरन सिखाये गए सामाजिक  भय-संकोच! आपने खुद इनका  खूब पालन किया है मगर सुखद है कि अब आप बदल गए. आप तो परिवर्तित हो गए, जैसे बर्फ की  शिला पानी बनकर बहने लगे, लेकिन हर कोई नहीं बदल पाता.
आप बदल सके  इसीलिए अब आपसे दुराव-छिपाव नहीं रहा.

चिट्ठी जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है वैसे-वैसे नजरें पीछे घूमती हैं. वह लोक गीत आपको  याद होगा जिसमें विदा होती बेटी, कहार से नीम के  नीचे डोली रोकने का  आग्रह करती है-
निमिया के  नीचे डोला रोक   देक हरवा
देखि लेऊँ गाँव की  ओर…..
बाबुल दिहै मोर नौ मन सोनवा
मैया लहंगा-पटोर…
नौ मन सोनवा, नौ दिन चलिहै
फटि जइहै लहंगा-पटोर…..

जाते हुए सब कुछ आँख भर देख लेने की  इच्छा, कि घर-दुआर, पुर-परिजन सभी आँखों में बस जायें. चिट्ठी लिखते हुए मेरा मन भी जहाँ-तहाँ रुक -रुक  जाता है, कुछ जीवंत सा तलाशने लगता है. मेरी अपनी जड़ें, अपनी पहचान टटोलने लगती हूँ. और जब किसी नीम के  नीचे सुस्ताने ठहरती हूँ तो आप मेरे बगल में बैठे कोई गीत छेड़ देते हो-
नदिया के  तीरे तीरे चर बोक्की  (बकरी)
नदिया सुखा जाय त मर बोक्की …..



बचपन से इस गीत को  सुनती आ रही हूँ… कुछ भी समझ में नहीं आता था… बस नदिया के  किनारे हरी-हरी, को मल घास चरती बक री और वही पतली सी धारवाली अपनी गाँव की  बलुई नदी का  चित्र उभरता था. कभी-कभी तो डर भी लगता कि रात में जंगल से निकलकर कोई बाघ उस अकेली भोली-भाली बकरी को  मारकर खान खा जाय. आज भी इस लोक गीत का  अर्थ पूरा का  पूरा नहीं खुल पाया. आज भी बकरी का  अकेलापन याद आते ही डर लगने लगता है. ऐसा महसूस होने लगता है कि जंगल में दूर कहीं से बाघ-भेडिय़ों के  गरजने-गुर्राने की  आवाज़ें आ रही हैं. सभी उसकी  ओर लपक ती जीभें लिए खड़े हैं. ओफ्हो… हद! इस गीत की  मात्र दो पंक्तियाँ मुझ पर इस हद तक  हावी हो जाती हैं कि मैं बकरी के  अक्स में खुद को  देखने लगती हूँ… आईने में देखती हूँ कि मेरे गले में एक  तख्ती लटकी  है और उस पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा है- ‘नदिया के  तीरे तीरे चर बोक्की … नदिया सुखा जायत मर बोक्की …’

“चकरघिन्नी” : तीन तलाक़ का दु:स्वप्न

नूर जहीर

‘डिनायड बाय अल्लाह’ और ‘अपना खुदा एक औरत’ जैसी चर्चित कृतियों की रचनाकार
संपर्क : noorzaheer4@gmail.com.

कॉमन सिविल कोड और तीन तलाक की बहस के बीच नूर ज़हीर की यह कहानी : 


वो दुबकी हुई एक कोने में बैठी थी, लेकिन ज़किया को बराबर यह एहसास हो रहा था कि वह कुछ कहना चाह रही है. वैसे महिलाओं का जमघट हो और सभी एक साथ बात न कर रही हों, ऐसा कहाँ संभव है. सभी लगातार कैएं कैएं कर रही थीं और दो तीन बार ज़किया को उन्हें डांट कर, स्कूल के क्लास के बच्चों की तरह एक- एक करके बुलवाना पड़ा था. लेकिन जब भी उसपर नज़र जाती वो हलके से मुस्कुरा कर नीचे देखने लगती. उसके दोनों तरफ बैठी औरतें कोहनी मार कर “बोलो न! बोलती क्यों नहीं हो? तो फिर आई क्यों हो?” कहकर उसे उकसा चुकी थीं. लेकिन वह चुप रही थी.तीन घंटे से ज़्यादा हो चुके थे. ज़किया ने यह दिखाते हुए कि मीटिंग खत्म हो गई है , अपने काग़ज़ात, डायरी, कलम समेटना शुरू किया. मजमा भी उठा और अपने चारों तरफ, चौकीदार बने, कील, खूँटी , दरवाज़ों पर टंगे बुर्क़े उतर उतर कर, शरीर और चेहरों को ढंकने लगे. ज़किया बरामदे में लगी चाय की मेज़ की तरफ बढ़ चली थी कि पीछे से आवाज़ आई “बाजी!” ज़किया ने अपनी उकताहट को पीछे धकेल, होठ पर मुस्कुराहट चिपकाई और पलटी. ये हर मीटिंग में होता था ; जमघट में से एक या दो पूरी सभा भर तो चुप रहती और जब सब उठ जाते तो अकेले में एक निजी बातचीत की उम्मीद करती. ऐसा होना लाज़मी भी था क्यूंकि महिलाओं की सभा में भी औरतें खुलकर बोलने से हिचकिचाती, आखिर औरतों ने कुछ पहले ही तो ज़बान खोली है .

“बाजी आपसे कुछ पूछना था. आपने तीन घंटे से ज़्यादा शरीयत और भारतीय संविधान पर बात की लेकिन आपने एक लव्ज़ भी हलाला पर नहीं कहा. ” इतना सब वो एक झोंक में बोल गई जैसे उसने कुछ बेहूदा कह दिया हो जिसकी चर्चा इज़्ज़तदार लोगों के बीच नहीं करनी चाहिए. ज़किया रुक कर पूरे एक मिनट तक उसका चेहरा निहारती रही. कितनी बार उसने चाह था कि कुरान के ‘सूरा-इ-निस्सा ‘ के इस हिस्से पर बातचीत हो ; लेकिन उसके काम का दायरा शरिया कानून और भारतीय संविधान में समानता और अलगाव तक सीमित था. बहुत कोशिश के बावजूद वह इससे मिलती जुलती कोई धारा संविधान में ढूंढ नहीं पाई थी.
“क्या नाम है तुम्हारा ?”
“सकीना ”
“बताओ, तुम्हे हलाला के बारे में क्या जानना है ?”
वो चुप रही. ज़किया ने कुरेदा “क्या शौहर ने तलाक़ दिया है ?”
“जी”
“और अब पछता रहे हैं और अब तुमसे दुबारा निकाह करना चाहते हैं ?”
“जी. पांचवी बार !” वो बुदबुदाई

इस बीच कोई ज़किया के हाथ में चाय का कप पकड़ा गया था. वो हाथ से छूटते बचा. खुद पर काबू पाते हुए ज़किया ने उसका हाथ पकडा और उसे एक कोने में ले गई. लेकिन बात शुरू करवाने के लिए अब उसे कुछ कहने की ज़रूरत नहीं पड़ी. सकीना जैसे इसी तन्हाई का इंतज़ार कर रही थी. हकलटम हिचकिचाते उसकी जिंदिगी की दास्तां उसके लबों से फूट पड़ी जैसे कोई फैलता हुआ नासूर फटकर सड़ते बदबूदार पस और मवाद से मुक्ति पाना चाहे .”बाजी मैं चौदह वर्ष की थी जब मेरा निकाह अब्दुल रशीद के साथ हुआ. मेरे शौहर मुझसे ग्यारह साल बढ़े थे , शराब के शौक़ीन थे और अफीम की लत भी थी. सभी को, मेरे अम्मी अब्बा को भी उनकी इन आदतों का पता था, मगर पांच बेटियों के माँ बाप भला क्या मीन मेख निकलते और क्या देखते भलते? वैसे मैं शादी से खुश थी. ससुराल खाते पीते लोगों का था; सास ससुर के अलावा बस एक देवर था जो मुझसे चार साल छोटा था. हर कोई यही कहता शादी हो जाएगी तो ये अपनी बुरी आदतें छोड़ देंगे ; बीवी सब सम्भाल लेगी. ”

सकीना अजीब तरह हंसी, कुछ खुद पर कुछ इस समाज पर जो औरत से मर्द सँभालने, सुधरने की उम्मीद तो इतनी करता है मगर उसे हक़ कुछ भी नहीं देता. औरत को अकेले यह जंग लड़नी भी है और जितनी भी है और जीतनी भी है किसी शस्त्र या हथियार बगैर. वो अपनी तन्हा हंसी के बाद खामोश हो गई. ज़किया ने उसे मुद्दे पर लौटने के लिए पूछा “तो तलाक कब हुआ ?”

“पहली बार शादी के छह साल बाद. मेरे तब तक दो बच्चे हो चुके थे. वो रात देर से लौटे, नशे में धुत और खाना मांगने लगे. जहाँ वो आकर बैठे थे वही मैंने एक छोटी सी मेज़ रख दी और खाने की थाली रख दी. वो कुर्सी पर गिरे पडे थे, खाना देखकर उठने लगे, पैर टकराया और मेज़ उलट गई. मैं भी पूरे दिन के काम से थकी थी और घर में वो आखरी बना हुआ खाना था. चिढकर मैंने भी कह दिया “इतना क्यों पीते हो कि हाथ पाँव पर काबू नहीं रहता?”बस इतना कहना था कि हमपर चीखना, गलियाना शुरू कर दिया और फिर तीन बार तलाक कहकर हमें तलाक दे दिया.”
“लेकिन नशे में दिया तलाक़ तो माना  नहीं जाना चाहिए. ”

“ये तो हमें मालूम नहीं था, न मौलवी साहब ने ही हमें बताया. क्या जाने शायद उन्हें भी मालूम नहीं होगा. खैर हम अपने मैके आ गए. शुक्र है की बच्चे छोटे थे और सास अक्सर बीमार रहती थी , इसलिए बच्चे हमारे साथ ही आये. जब नशा उतरा तो बहुत रोये, माफ़ी मांगी और मौलवी साहब के पास गए कि निकाह दुबारा पढ़वा दीजिये , हम सकीना से बहुत प्यार करते हैं, उसके बिना हम ज़िंदा नहीं रह सकते. मौलवी साहब ने बताया कि ये नामुमकिन है—पहले सौ दिन इद्दत के गुजरेंगे फिर हमारा किसी और से निकाह होगा, वो हमें तलाक देगा फिर सौ दिन इद्दत के बाद हमारी अब्दुल रशीद से शादी हो सकेगी. हमारे शौहर भला ये कैसे बर्दाश्त करते कि हम किसी और के साथ हमबिस्तर हों ? वो हमारे मायके आये और बोले ‘कुछ दिन इंतज़ार करो सकीना, हम कोई रास्ता निकालते हैं. ‘ डेढ़ साल रास्ता निकालने में लग गया. एक दिन आये बढ़े खुश खुश और बोले ‘तैयार हो जाओ सकीना, मैंने रास्ता निकाल लिया है. तुम्हारी शादी अपने छोटे भाई तारिक़ रशीद से कर देंगे. उसने वादा किया है पहली रात के बाद वह तुम्हे तलाक दे देगा और फिर तलाक के बाद हम तुमसे शादी कर लेंगे.’

“हम घबराये. चार साल छोटे देवर को, एक रात के लिए शौहर कैसे माने? लेकिन हमारे शौहर ने समझाया , खुशामद की और मेरे हर ऐतराज़ को ये कहकर खारिज कर दिया की मैं कौन होती हूँ इस सुझाव को न मानने वाली जब मौलवी साहब इसे ठीक बता रहे हैं ; आखिर वह हमारे दींन के रखवाले हैं. मैंने भी सोचा की जब मौलवी साहब को मंज़ूर है तो फिर ये रास्ता अल्लाह और दींन की नज़र में ठीक होगा. मेरे देवर से मेरा निकाह हो गया. देर रात वह मेरे कमरे में आया. मैं दीवार की तरफ मुंह किये बैठी थी; किसी ग़ैर मर्द को अपना शरीर दिखाने से भी शर्मसार. कुंडी लगाने की आवाज़ तो आई लेकिन उसके करीब आने की आहट मेरे कानो में नहीं पढ़ी. जब बहुत देर वह पास नहीं आया तो मैं पलटी; देखा वह हाथ जोड़े सर झुकाए गुनहगार सा खड़ा है जैसे दुनिया से आँखे मिलाने का साहस न कर पा रहा हो.

‘क्या बात है?’ मैंने पूछा उसने नज़रे उठाई और बोल “भाभी पलंग पर सो जाओ. मैं ज़मीन पर दरी पर लेट जाऊंगा. मैं इस पूरे मामले में राज़ी इसीलिए हुआ की तुमको घर वापस लौटा सकूं. तुम्हे हाथ लगाने के बारे में तो मैं सोच भी नहीं सकता. बस एक रात की बात है. ” आपको सच बताऊँ बाजी वो आखरी रात थी जब मैं चैन की नींद सोई. अगली सुबह मेरा फिर तलाक हो गया और के सौ दिन पूरे हुए तो अब्दुल रशीद से मेरा निकाह हो गया.

“लेकिन क्या इंसान की फितरत बदलती है? कहते हैं कोयला धोकर सफ़ेद हो सकता है मगर इंसान का स्वभाव नहीं बदल सकता. उनके दोस्त वही थे, शराब और अफीम की लत वही थी. घर देर से लौटना, बेवजह झगड़ा करना और फिर मुझे मारना पीटना. वही पुरानी जिंदिगी जिसमे बस एक बात नई थी. बीच बीच में कहते जाते ‘तू तो एक रात मेरे भाई के साथ रही है, वह मुझसे सत्रह साल छोटा है. मैं बुढ़ा रहा हूँ और वह गबरु जवान है, तुझे तो उसके साथ ज़्यादा मज़ा आया होगा न? मेरे साथ जब होती है तब उसकी याद सताती है तुझे? क्या दोपहर में उसके पास जाती है, मौके से, जब अम्मी और बच्चे सोते हैं?’

“बाजी मैंने जब तक हो सका राज़ छुपाया; आखिरकार मेरी बर्दाश्त की हद टूट गई और सच मुंह से फूट पड़ा “तू क्यों मुझ बेचारी पर और अपने फरिश्ता जैसे भाई को गुनहगार समझता है. उसने तो उस रात मुझे हाथ तक नहीं लगाया . वो तो रात में देर से इसलिए लौटता है ताकि मुझ से सामना न हो. ‘ उस वक़्त तो मेरे शौहर ने मुझे बाहों में भर लिया और मुझे अपनी जिंदिगी अपनी जान कहकर बुलाया. मैं अहसानमंद थी की उन्होंने मेरी बात का यकीन किया और घर में कुछ महीने शान्ति के गुज़रे. फिर एक शाम दोस्तों के साथ पीने पिलाने में, किसी दोस्त ने छेड़ दिया की अब्दुल रशीद को, अपनी बीवी और उसके एक रात के शौहर के साथ एक ही घर में रहने से डर नहीं लगता? कौन जाने पीठ पीछे दोनों हम बिस्तर होते हों? अब्दुल रशीद यह कैसे बर्दाश्त कर लेते. ग़ुस्से में कह दिया “मेरी बीवी सिर्फ मेरी है समझे; वो निकाह तो एक धोखा था, मेरी बीवी को तो मेरी भाई ने छुआ तक नहीं. ” बस डींग मार आये. ऐसा दावा, वो भी शराब के ठेके पर किया जाए भला चरों तरफ कैसे न फैलता? और कसबे भर में फ़ैल कर मौलवी साहब के कान तक कैसे न पहुँचता? और पूरी बात जानकर भला यह कैसे हो सकता था कि वो सच्चे दींन के मुहाफ़िज़ होकर ऐसे कदम न उठाते जिनसे साबित होता की वह पैरों तले घाँस उगने नहीं देते?


अब्दुल रशीद से मेरा निकाह नाजायज़ करार दे दिया गया. मेरे लिए शुरू हुए फिर वही इद्दत के तीन माह दस दिन और साथ ही खोज मची एक ऐसे आदमी की जो मुझसे निकाह करके तलाक दे दे ताकि मैं अपने पहले शौहर से शादी कर सकूं. ज़ाहिर है इस बार तो मेरा देवर नहीं हो सकता था क्यूंकि उसपर ऐतबार करना नामुमकिन था; ब्याहता बीवी को जो अछूता छोड़ दे वह भला मर्द कहलाने के काबिल है ?

एक और आदमी तलाश किया गया और उससे मेरा निकाह कर दिया गया. अगले दिन उस आदमी ने मुझे तलाक देने से साफ़ इंकार कर दिया. चौदह महीने मैं उसकी बीवी रही. मैं तो सदा के लिए उसी की हो रहती लेकिन अब्दुल रशीद ने इन बदले हुए हालात से समझौता करने से साफ़ इंकार कर दिया. वह मुझे बाजार में देख लेते, सब्ज़ी खरीदते, बच्चों को स्कूल छोड़ते, बुर्का पहचान लेते और फूट फूट कर रोने लगते जैसे कोई बच्चा मचलकर बेकाबू हो जाये; सड़क पर लोट जाते , ज़मीन पर सर मारने लगते “हाय सकीना, कैसे तेरे बिना ज़िंदा रहूँ? ओ मेरी जिंदिगी मेरे पास वापस आ जा ‘



आखिर मैंने ही अपने शौहर को समझा बूझकर राज़ी किया की वो मुझे तलाक दे दे. छोटे से कस्बाई शहर का मैं एक तमाशा बन गई थी. लोग एक दुसरे को खबर कर देते की मनोरंजन शुरू हो गया है और भीड़ जमा हो जाती. लोग हँसते,फब्तियां कस्ते और अब्दुल रशीद को ‘मजनू ‘ कहकर पुकारते. मेरे वजूद को हर तरफ से नोचा खसोटा जा रहा था और मैं टुकड़े टुकड़े होकर बिखर रही थी. खैर समझाबुझाकर जब तलाक हो गया तो एक सौ दस दिन की गिनती शुरू हुई , जब उस आदमी से शादी होगी जो मुझ से प्यार का दावा तो करता था लेकिन जो किसी भी तरह खुद को ‘तलाक तलाक’ कहने से रोक नहीं पाता था. निकाह होता, कुछ दिन ख़ुशी के बीतते और फिर वही पुराने ढर्रे की जिंदिगी शुरू हो जाती. ऐसा लगता जैसे उन्हें तलाक देने की लत पड़ गई है. पलक झपकते, बगैर किसी कारण के , कभी नशे में, कभी पूरी तरह होश में तलाक दे डालते. फिर एक और आदमी खोझते, शादी की सारी तैयारी खुद करते, उस आदमी को भी नकद रुपये देते; एक बार तो खुद मौलवी साहब ने मुझसे निकाह करके, छह रात मुझे रौंदा. मैं अक्सर इद्दत के दिनों की गिनती भूल जाती , मगर अब्दुल रशीद ठीक एक सौ ग्यारवें दिन मुझसे निकाह करने मौजूद रहते.

“तुमने कभी ‘खुला’ की कोशिश नहीं की , कभी खुद नहीं चाहा की तुम तलाक यानि ‘खुला’ ले लो और नए सिरे से जिंदिगी शुरु करो?’ “की न बाजी. पिछले तीन साल से कोशिश कर रही हूँ. मौलवी साहब कहते हैं कि इतने प्यार करने वाले शौहर से मेरा तलाक चाहना बहुत बढ़ा गुनाह है. और बाजी क्या आप नहीं जानती कि खुला चाहना और मंज़ूर हो जाने के बाद भीम, तलाक कहना तो मर्द को ही पड़ता है. औरत जितना भी तलाक क्यों न चाहे, अंत में शौहर ही इन लव्जों को कहता है और उसे छटकारा देता है. अब्दुल रशीद भी साफ़ इंकार करते हैं. मेरी मर्ज़ी से मुझे तलाक नहीं देंगे, अपनी मर्ज़ी से जितनी बार घर से बेघर कर दे. इस तरह से बाजी मेरी जिंदिगी के सोलह साल निकाह, तलाक , इद्दत और हलाला के बीच चक्कर घिन्नी बने हुए बीत गए. अरे बाजी ! क्या आपकी आँखों में आंसू हैं? ठीक ही है कि मेरे हाल पर अब ग़ैर रोएं. मेरे अपने आंसू तो कब के सूख गए.
ज़किया क्या कहती , कैसे बताती कि ये आंसू सिर्फ एक सकीना के लिए नहीं थे; ये उन अनगिनत औरतों के लिए थे जिनके सिरों पर तीन बार कहे तलाक की तलवार हमेशा लटकी रहती है, जो परेशान होकर अगर खुद इस जीवन से छुटकारा पाना चाहे तो उनको हज़ारों कारण बताने होंगे. अगर वह कारण उलेमा मान भी ले तो भी तलाक उसे पति ही देगा और इसके लिए अक्सर औरत को अपने बच्च्चों से मिलने के हक़ को गवाना होता है, पति को पैसे, मिलकियत देकर ‘तलाक’ कहने के लिए मनाना होता है, मैहर तो खैर कभी मिलती ही नहीं और निर्वाह राशि का तो सवाल ही नहीं पैदा होता.

ज़किया ने सर को एक झटका दिया ; रोने से भला क्या हासिल होगा ; यह वक़्त संघर्ष का है और सभी मुद्दों पर खुल के बात करने का है. उसने फाइल खोल कागज़ निकाला और सकीना की तरफ बढ़ाते हुए बोली ‘ इसे पढ़ना , समझ में आये तो दस्तखत करना. ये अपील है कि हमें बराबरी के सब हक़ चाहिए जो संविधान हमें देने का वादा करता है. लड़ाई लम्बी भी है और मुश्किल भी लेकिन इस मोर्चे पर उतरना तो पड़ेगा.’ज़किया बाहर की तरफ चल दी थी जब उसने फिर सकीना की आवाज़ में ‘बाजी ‘ सुनाई दिया. सकीना पास आ गई थी, पर्चे को हिलाते हुए बोली, ‘इसकी हम फोटोकापी करवा ले, दूसरी औरतों से भी बात करेंगे ; और दस्तखत जमा करेंगे. अरे सुनो सब — “सकीना तेज़ी से चलती हुई , कुछ औरतों के साथ बाजार की तरफ बढ़ रही थी. ज़किया को बहुत धुंधली सी एक राह दिखाई दे रही थी, मंज़िल का कहीं पता न था. कोई बात नहीं रास्ता अगर खुद बनाना है तो मंज़िल भी खुद ढूंढ ही लेंगे.
साभार इन्द्रप्रस्थ भारती 

वर्जिनिटी का नहीं है सवाल … सवाल ना का है . !

प्रो परिमळा अंबेकर


‘‘व्हेन यू लास्ट युवर वर्जिनिटी … जोर -जोर से वकील साब अपने क्लाइंट से पूछे जा रहे थे । और इस सवाल पर क्लांइट तो क्या उस कोर्टरूम का हर बंदा, यहॉ तक कि जज साब भी हक्का-बक्का थे… वकील के इस प्रश्न पर … लडकी विविश होकर पिता की ओर देखती है . पिता …हताश, बेटी के दिये जानेवाले उत्तर को सुनने की पीडा से मुक्ति चाहते हुए … कोर्टरूम से उठकर चल पडता है । सिनेमा का मुख्य किरदार, वह लडकी, जिसने अपने को बचाने के लिये गिलास का बोतल हवश से पीड़ित  लडके के सरपर दे मारा था, अपनी वर्जिनिटी के खोने का पहला रपट वकील और जज साहब के सामने बयान करती है … ”

 पिंक का क्लाइमैक्स और एंड, एक दूसरे में अंतर्भूत होकर प्रस्तुत होते हैं । और इस क्लाईमैक्स का पहला पडाव तब शुरू होता ,है जब अद्भुत नाटकीय और निर्विकार शैली में वकील दीपक सहगल, कटघरे में खडे मीनल अरोरा से पूछता है ‘‘ बताइए मीनल अरोरा, क्या आप वर्जिन है , हॉं या ना में जवाब दीजिये, डोंट शेक योर हेड ‘‘ मीनल के ना कहते ही बंदूक की नली से निकली गोली सा दूसरा प्रश्न करता है सहेगल .. ‘‘ देन व्हेन यू लॉस्ट योर व्हर्जिनिटी …वॉट वाज योर येज .. ” लडकी उत्तर में अपने बालिग होने की उम्र को बताती है । अनिरूद्ध रॉय चौधरी द्वारा दिग्दर्शित सिनेमा ‘पिंक’ के कोर्टरूम ड्रामा में गुंथे गये संवादों का गुंथन, धीरे धीरे स्त्री की व्यवहार स्वछंदता को, अपने जीवन के निर्णय को खुद लेने की उसकी सामाजिक स्वतंत्रता को  स्क्रीन पर  दर्शकों के सामने कलात्मकता से स्पष्ट रूप देता है।

कोर्टरूम के संवाद भारतीय समाज में स्त्री के प्रति  लगभग नकारात्मक वातावरण की भीषणता का पर्दाफाश करते हुए, स्त्री स्वछंदता और उसकी मानवीय जीवन की मुक्त खुले वातावरण की मांग की सकारात्मक सोच को प्रस्तुत करते हैं । और इसके लिये आवश्यक पुरूष मानसिकता के बदलाव की नीति को भी सम्मुख रखता है । जैसे कि … वकील का पूछना, 1 क्या आपने शराब पी रक्खी थी, 2 सभ्य घरकी लडकियॉं शराब नहीं पीती, 3 आप रोज कितन बजे घर लौटती हैं, 4 देर रात लौटना, अच्छे लक्षण नहीं,  5 आप साथी लडको से हॅंस-हॅंस कर बात करती है , उन्हें छू छू कर बोलती हैं, 6 नहीं हॅंसना लडकों को छूना …बस वे औरतें हीं करती हैं जिन्हें अपना जिस्म बेचना होता है …7 जो अपने हॅंसी के बदले पैसे मॉंगती वसूलती हैं 8 और सबसे अहम सवाल है लडकी के यौनिकता का,  पवित्रता का … वकील प्रश्न को व्यंग्यात्मक अंदाज में पूछता है, जैसे वह कह रहा हों ‘‘ समाज पूछना चाहता है मिस् अरोरा कि आपके वर्जिनिटी का अधिकार तो उनके हाथों है, आपको किसने दिया अधिकार उसे खोने का… समाज और धर्म की बपौती को आप कैसे बिना अनुमति के लाइसेंस के उसे खो सकती हो मिस मीनल .. ? आदि…आदि …

कारण पिंक सिनेमा,  कबीराना अंदाज की सृजनात्मक सिनेमिक प्रक्रिया है, जहॉं    कबीर अपने दर्शन की बारीकी को कहने के लिये उलटबासी रचता है, कहता है,  ‘‘बरसे कंबल भीजे आकासा …  ”

फिल्म का उद्देश्य है 
1 स्त्री की यौन-स्वतंत्रता के प्रति समाज की सहज मानसिकता का बनना , 2 देहउपभोग को लेकर उसकी अपनी खुद की इच्छा अनिच्छा को भी समाज का उसी अंदाज में स्वीकार करना, जैसे कि पुरूष की इच्छा अनिच्छा को सदियों से करते आया है , 3 उसकी ना में पुरूष को अपनी अहं की क्षति या चुनौती न देखकर, सहजीवन के दूसरे हिस्से की मान्यता के रूप में देखना  … 4 यौन उपभोग के दूसरे हिस्से का स्त्रीदेह , चाहे प्रेमिका का क्यूॅं न हो, सहजीवन को स्वीकार कर जी रही मेट्रो कल्चर की औरत ही क्यूॅं न हो , मुक्त स्वछंद पसंदीदा शैली में अपने को गढने वाली इक्कीसवी सदी की लडकी ही क्यूॅं न हो, पैसा देकर खरीदा गया वैश्या स्त्री देह ही क्यूॅं न हो या ..या ..उपभोग के लिये मिली हुयी वैवाहिक शास्त्र प्रदत्त धर्मपत्नी ही क्यूॅं न हो… !! उसकी ना को सुने ,गुनना और मानना ।

वकील का पुरूष होना या स्त्री का होना जैसे आयाम यहॉं मायने नहीं रखते , मुद्दा सोचने का यह है कि, सिनेमा पिंक अपने तहत स्त्री से बिंधे गये वर्जिनिटी के सवालों से भी ऊपर उठकर ,देहशुद्धता के सवालों को लांघकर, देहस्वछंदता की उसकी अपनी स्वतंत्रता के प्रश्नों को पुराना बताती है । देहभोग की उसकी अपनी इच्छा और अनिच्छा के अत्यंत ही वर्जिन प्रश्न को बडे ही सलीके से प्रेषित करती  है। देहसंबंधों को बनाने की उसकी अपनी मानसिकता , उसकी अपनी संवेदना को,  पुरूष समाज द्वारा स्वीकार किये जाने की अत्यंत ही मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक सवाल को ‘पिंक‘ , सिनेमा के परदे पर उकेरती  है ।

पिंक के माध्यम से मैं उन फेमिनिस्ट राय पर आपत्ति  करना चाहती हूॅं जो, जेंडर विमर्श के निर्णयों को स्त्री और पुरूष के किरदारों में बॉंटकर देखते हुये,पारंपरिक पुरूषवादी वर्चस्व संस्कृति के विरोध की अपनी बनी बनायी खांचे से बाहर आ नहीं पा रही हैं।

रितेश शाह के उठाये इस कदम में हम विमेन क्राइम के विरूद्ध में , समाज में नयी और सहज सोच को बनाने के पीछे की लेखकीय सरोकार को देख सकते हैं । कुछ और मुद्दे जो कोर्टरूम संवादों में उभरे थे,  1 नार्थइस्ट बेल्ट की जातीय व्यक्तित्व के प्रति देश का प्रिजुडाइ्ज्ड मानसिकता का बना बनाया नमूना… इनके साथ क्या यार सबकुछ चलता है … 2 भारतीय मर्द की मानसिकता, जो घर की औरत को अपनी मर्यादा और खानदानी मान का हिस्सा माने और बाहर की औरतें … होती ही हैं उपभोग की वस्तु, पुंसवादी वर्चस्व के सामने झुकनेवाली अदली …बंदी… और क्या कुछ नहीं … ! इसीलिये , स्त्री की ओर से ना का सुनने के लिये केवल पुरूष वर्ग को नहीं संपूर्ण भारतीय समाज की मानसिकता को बदलना पडेगा । स्त्री से कहा गया ना, एक व्यक्ति की सहज प्रतिक्रिया बननी है न कि कोयी प्रतिष्ठा या चैलेंज का प्रश्न बने । स्त्री और पुरूष के व्यक्तित्व की स्वीकृति जबतक  समान भावबोध के और मानसिकता के धरातल पर नहीं होगी  तब तक अपना समाज स्त्री के नकार को या ना को प्रेस्टीज  इश्शु मानेगा , अपना अपमान मानेगा ।

किसी ने सही कहा, ‘‘ पिंक सिनेमा नहीं, एक मूवमेंट है .., स्त्रीअपराध के विरूद्ध लडना है तो बस माइंडसेट को बदलना है । ‘‘ इस माइंडसेट का बदलाव रखता है भारतीय  स्त्री भी पुरूष भी । जैसे पिंक सिनेमा का किरदार फलक के  पति के कहनेपर कि ‘‘… मीनल की तो बात और है तुम भी फलक ऐसी भी क्या एंजाइमेंट है … ‘‘ फलक बिना कुछ कहे सीधे बाहर निकल पडती है । फलक और एंड्रिया का स्टैंड निर्णायक है, बदलाव की दिशा में ।

और भी बहुत कुछ अंश है पिंक के जिनपर भी चर्चा जरूरी है … । 


लेखिका गुलबर्गा विश्वविद्यालय गुलबर्गा में हिन्दी की प्राध्यापिका हैं. संपर्क: parimalaambekar@yahoo.in

जाघों से परे ‘पार्च्ड’ की कहानी: योनि नहीं है रे नारी, वह भी मानवी प्रतिष्ठित

संजीव चन्दन 


रिहाई के 3 दशक बाद


8 वें दशक में अरूणा राजे की फिल्म थी रिहाई. यह फिल्म प्रवासी मजदूरों के गांव में पीछे छूट गयी पत्नियों की कहानी है. प्रवासी मजदूर घर की आर्थिक रीढ़ हैं, उनके भेजे पैसों से घर चलता है. घर और पत्नी से दूर रहते हुए वे अपनी यौन जरूरतों की पूर्ती के लिए कोठों पर जाते हैं. इस बीच लगभग महिलाओं और पीछे छूट गये बच्चों और बूढ़ों के गांव में नासिरूद्दीन शाह के रूप में एक युवक आता है, जो एक- एक कर सभी महिलाओं, छूट गई पत्नियों को शिड्यूस करता है, सहमति से या थोड़ी जबरदस्ती कर, वह सब के साथ संबंध बना पाने  में सफल होता है. फिल्म का अंत प्रदेश से वापस आये पति (विनोद खन्ना) और विवाहेत्तर यौन संबंध बना चुकी पत्नी ( हेमामालिनी) के बीच ‘स्त्रीअधिकार’ संबंधी बहस के साथ होता है और साथ ही पति के मान जाने के साथ भी. पूरी फिल्म एक बाहरी, शहरी और कुलीन दृष्टि से बनी फिल्म है. कथानक और दृश्य संयोजन की दृष्टि से भी- ग्रामीण महिलाओं के यौन संबंधों पर कुलीन कल्पना की चरम उपस्थिति है एक महिला के साथ मिट्टी के गड्ढे में सेक्स, जहां वह मिट्टी काटने जाती है. रिहाई के पात्रों का सामाजिक परिवेश भी स्पष्ट है. प्रवासी पति लकड़ी का काम करते हैं- कारीगरी और मजदूरी, पत्नियां गांव में श्रमकार्य करती हैं- इस परिवेश के साथ जाति लोकेशन भी प्राय: स्पष्ट है.

उसके लगभग तीन दशक बाद फिल्म बनी है लीना यादव के निर्देशन में ‘ पार्च्ड’. कहानी का परिवेश ग्रामीण और पात्रों का सामाजिक लोकेशन प्रायः वही, जो रिहाई का है. इस फिल्म की नायिकायें, उनका पति, परिवार और कुनबा गांव में ही रहता है- गुजरात के एक गांव में. घर की आर्थिक गतिविधियां संचालित करती हैं स्त्रियां- एक गैरसरकारी संगठन के लिए सिलाइ, बुनाई,एम्ब्रायडरी का काम करके. मर्द, पति- पुत्र आदि, आर्थिक रूप से महिलाओं पर निर्भर हैं. यह फिल्म उनकी यौनिकता को सहज ढंग से अपने कथानक के केंन्द्र में रखती है-  थोड़ी- बहुत काल्पनिक विसंगतियों के बावजूद इस फिल्म को रिहाई से अलग ‘बाहरी दृष्टि’ से मुक्त कहा जा सकता है, यही फिल्म की खासियत है और सार्थकता भी. अभी विस्तार से इसे समझने के पहले, जरा इसपर भी गौर करते हैं कि यह फिल्म अभी लगभग साथ में बनी फिल्म ‘पिंक’ से अलग और स्त्री की दृष्टि से बेहतर क्यों है?

पिंक से बेहतर क्यों 

पार्च्ड की महिलायें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं, अपने निर्णय खुद लेती हैं और बेटे के इस ललकार को कि ‘देखते हैं बिना मर्द के यह घर कैसे चलता है’  उपेक्षा और आत्मविश्वास से उड़ा देती हैं. जबकि पिंक की नायिकाओं को अपनी एजेंसी नायक के महानायकत्व की पुष्टि के लिए गंवा देनी पड़ती है. पिंक में स्त्री की पक्षधरता के लिए पुरूष का ‘संरक्षक’ अवतार उन्हें अपने पितृसत्ताक डैने में समेट लेता है -उत्पीड़क भी हम, संरक्षक भी हम- पिता रक्षति कौमार्ये, भर्ता रक्षति यौवने.रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा:, न स्त्री स्वातंत्र्यमहर्ति.

योनि नहीं है रे नारी, वह भी मानवी प्रतिष्ठित

पार्च्ड की कहानी सेक्स को धूरी में रखकर घूमती है- स्त्री की यौनिकता के इर्द-गिर्द. शुरू के दृश्यों से ही स्त्रियों के आपसी अंतरंग बातचीत, हंसी- मजाक के परिवेश उपस्थित होते हैं, जिसमें उम्र की सीमायें टूटकर परस्पर साख्य बनता दिखता है. चारो स्त्रियों के जीवन की कहानी उनकी यौनिकता की धूरी से संचालित होती है. सबसे छोटी लड़की ‘जानकी’ जब अपने प्रेम और पढ़ाई को छोड़कर विवाह करके ससुराल में बसने के लिए विवश की जाती है, तो उसका सामना एक ऐसे पति से होता है, जो अपनी ‘मर्दानगी’ की जांच के लिए एक बार ‘यौनकर्मी’ के पास जाता है, तो जाता ही रहता है- विवाह के बाद भी. उसके लिए जानकी का मतलब है- उसकी ‘मर्दानगी’ की परीक्षा का एक और टारगेट- जिसे वह पहली रात में क्षत- विक्षत करता है- भावना और शरीर, दोनो ही स्तरों पर.


दूसरी स्त्री है, जानकी की सास ‘रानी’.अपनी उम्र के चौथे दशक में पहुंची रानी के पास मोबाइल है, जिसपर कोई पुरूष आवाज उसे निरंतर फोन करता है, प्रेम निवेदन करता है. विधवा जानकी पहले तो इस आवाज के प्रति उत्सुक होती है, फिर खिझती है- कोई किशोर समझकर डपटती है और फिर हमउम्र आशिक जानकर उसका निवेदन स्वीकार कर लेती है. रानी अपने विधवा होने के अहसास के साथ अपनी यौन- इच्छाओं के प्रति दोहरे भाव में है. पति, जो अब नहीं है, शराब- हिंसा और सेक्स को एक साथ उसपर इस्तेमाल करते हुए उसकी यौनिकता को कुचल चुका है- जो नियमित तौर पर बाजार की स्त्रियों के पास भी जाता है- रानी अपने बेटे को भी अपने बाप के रास्ते पर जाते देखती है. रानी की यौनिकता का एक और पहलू है, अपनी सहेली ‘लाजो’ के प्रति ‘ साख्य’. पति से प्रताड़ित होकर आई अपनी सखी लाजो के अर्धनग्न शरीर पर मलहम लगाते हुए संकोच के साथ ही सही वह लाजो को अपना ब्लाउज भी उतारने देती है.

तीसरी स्त्री है ‘ लाजो’. लाजो रानी की सहेली है. उसकी कोई संतान नहीं है और जैसा कि इस देश की अधिकांश समझ है , बच्चा नहीं होने के लिए स्त्री ही दोषी होती है- लाजो भी ऐसा ही समझती है. उसका पति भी हिंसक, शराबी है और उसे ‘बांझ’ होने का अहसास देता रहता है. रानी से उसकी दोस्ती प्रागाढ़ है- पति से पीट कर और शरीर पर जख्म लिये जब वह रानी के पास आती है तभी रानी उसके अर्धनग्न शरीर पर कोई लेप करती है, उसके ब्लाउज उतारकर तो वह रानी के ब्लाउज भी उतार देती है- यह उनकी दोस्ती का ऐंद्रिक स्वरूप है. जब उसे यह पता चलता है कि बच्चा न होने के लिए सिर्फ स्त्री ही कारण नहीं होती है,बल्कि पुरूष भी कारण हो सकता है, तो वह पहले तो आश्चर्य से भर जाती है, लेकिन यही जानकारी उसे किसी और पुरूष के पास जाने के लिए प्रेरित करती है, ताकि वह उसके सहवास से एक संतान पा सके.संतान पाने की उसकी कामना इसलिए नहीं है कि वह अपने पति या समाज को बता सके कि वह बांझ नहीं है, या इसलिए भी नहीं कि वह अपने पति का वंश चलाने के लिए प्रतिबद्ध है. बल्कि संतान की कामना उसकी अपनी है- अपने मातृत्व के लिए.

रिहाई का एक दृश्य

वह उस समय और भी अचंभित रह जाती है, जब संतान के लिए किसी तांत्रिकनुमा रहस्यमय पुरूष/प्रेमी के पास एक गुफा में पहुचती है और सहवास के लिए आदतन लेट कर अपने कपड़े पांवों से ऊपर उठाती है, तो पुरूष उसके पैरों पर अपना सिर रख देता है, इस अचंभे के साथ उसकी आंखों में आंसू आ जाते हैं- सम्मान के प्रत्युत्तर में और अपने अस्तित्व के अहसास के साथ. पुरूष आद्यांत चूमता है, प्यार करता है, और कुछ मिनटों के इंटेस ऐंद्रिक दृश्य में वह भी सक्रिय होती है- यौन संबंध में अपनी रूटीन पैसिव भूमिका से बाहर निकलकर. उसे आश्चर्य,दुःख और क्षोभ तब भी होता है, जब वह अपने पति से अपने गर्भवती होने की सूचना देती है- पति उस संतान को अपना नहीं मानता, वह सवाल करती है कि ,’यह गर्भ तुम्हारा क्यों नहीं हो सकता!’ दरअसल उसके पति को यह पता है कि संतान न होने का कारण वह स्वयं है, लेकिन अबतक वह लाजो को इसके ग्लानिर्भाव से भरता रहा था. और अंतत: लाजो का पति अपनी ही क्रूरता की मौत मरता है.

बिजली  गांव में ही नृत्य-नौटंकी कंपनी में काम करती है. वह पहले रानी और फिर लाजो की भी मित्र बन जाती है- धीरे- धीरे इन सबकी नेता भी, सबको अपनी कुंठाओं से बाहर निकालने का मार्ग दिखाती हुई, खुद के लिए भी तय करती हुई. कंपनी में काम करते हुए उसका एक और पेशा वेश्यावृत्ति ( यौनकर्म नहीं) भी है. प्रतिदिन- रात अलग-अलग पुरूषों के साथ उसे जाता हुआ देखने वाला उसका प्रेमी उसे हमेशा महत्वपूर्ण महसूस कराता है. वह अपने अस्तित्व के प्रति विश्वास के भाव से भरे जाती है, जब उसका वही प्रेमी उसकी आंखों की प्रशंसा करता है- पहली बार उसकी देह पर टिकी निगाहों से अलग यह निगाह उसे आह्लादित कर देती है, लेकिन जल्द ही वह ख्वाब से यथार्थ में वापस धकेल दी जाती है, जब उसका प्रेमी उसकी देह के आर्थिक दोहन की भावी योजना उसके सामने रखता है. इस बीच कंपनी में नई लड़की के आने और ग्राहकों के उसपर लट्टू  होने से वह व्यथित है- व्यथा, कुंठा और आक्रोश में ही एक गलत ग्राहक के चुनाव के बाद वह अप्राकृतिक यौन संबंध और सामूहिक बलात्कार का शिकार होती है- इस पीड़ा और अपमान के क्षण में ही उसे अपने प्रेमी का ताना सुनाई पड़ता है- दृश्य में उसका चेहरा नहीं दिखता, वह चेहरा विहीन एक पुरूष मात्र हो जाता है.



बहनचो…. नहीं, भाई चो…..गालियों का उलटा संसार बनाम स्त्री का प्रतिकार….

इन चार स्त्रियों की कहानी, पीड़ा की कहानी, संघर्ष और प्रतिकार की कहानी इनकी यौनिकता के इर्द- गिर्द ही आकार लेती है- क्योंकि आर्थिक रूप से बहुत हद तक स्वतंत्र इन स्त्रियों की पीड़ा और उनके दोयम होने के अहसास देते मर्दवादी वर्चस्व के मूल में इनकी यौनिकता है- लेकिन इनकी दुनिया इससे आगे भी है- इनके यौन- अंगो, इनकी यौन- आकांक्षाओं से आगे, जिसे वे हासिल कर लेना चाहती हैं. लेकिन यह समाज, उसका दैनंदिन, उसकी भाषा उन्हें खीच- खीचकर उन्हें उनके ही यौन अंगों में सिमटा देना चाहता है, उनके अपने ही अंगों से उन्हें डरा देना चाहता है. फिल्म के एक दृश्य में बिजली के नेतृत्व में पार्च्ड की चार नायिकायें न सिर्फ गाड़ी की ड्राइविंग सीट पर बैठकर आजादी के सारे पर निकलती हैं, बल्कि आजादी की आवो- हवा में सांस लेते हुए इस समाज के द्वारा अपने लिए तय दायरे और अपने के खिलाफ उसके भाषाई आतंक का प्रतिकार करती है- स्त्रियों को केंद्र में रखकर बनी गालियों को उलट कर गालियां रचती हैं, मर्दों को केंद्रित गालियां.

साख्य का साहस: सास- बहु का याराना 

हवाखोरी के इस सैर का सबसे बड़ा हासिल है, दो पीढ़ियों का आपसी साख्य- सास- बहु का याराना. रानी अपनी बहु जानकी को अपने बेटे के लिए चुन कर लाई है. उससे प्यार करती है, और परंपरा निभाती हुई उसपर शासन भी. वह चाहती है जानकी उसके बेटे को संभाल ले इसलिए उसपर खीझती भी है, लेकिन बेटे और अपने मृत पति का साम्य देखते हुए उसके प्रति सहज संबंध भी महसूस करती है. हवाखोरी के लिए निकलते हुए जब जानकी भी उसके साथ ले आयी जाती है, तो सहजता और भी स्पष्ट होती है- जिसका अंतिम प्राकट्य है अपनी बहु के साथ उसका खड़ा होना, बेटे के घर छोड़ने और उसकी धमकी के दौरान जानकी का ढाल बन जाना और अंतत: अपनी बहु का उसके प्रेमी से विवाह करा देना, इस हिदायत के साथ कि इसे पढ़ाना जरूर .



‘ हां, कहने के साहस से ही ना कहने की ताकत आती है:

फिल्म की तीनो नायिकायें अपनी उम्र के ऐसे पड़ाव पर हैं, जहां उन्हें उनके रिटायर होने, एक उम्र जी लेने का अहसास घेर लेता है उन्हें- उम्र के चौथे दशक के आस- पास. इस उम्र की शहरी मध्यवर्गीय महिलायें अपनी जिंदगी दी लेना चाहती हैं, हाल ही में इस वर्ग से रचना कर्मियों ने चालिस की औरतों पर कवितायें लिखकर इस उम्र का उत्सव मनाया, लेकिन यह सुविधा इन नायिकाओं को नहीं है. बिजली को उसके स्टेज और उसके व्यवसास से उसका रिटायरमेंट उसे साल रहा है, तो रानी अपने अकेलेपन और अपनी उम्र से आक्रांत है. उसकी आक्रांतता फोन पर उससे आशिकी का इजहार कर रहे गुमनाम आशिक पर प्रकट होता है, जब बिना उसे देखे- जाने उसे लगता है कि वह कहीं चालीस पार और छेड़ने वाला कहां 16- 17 का लड़का- वह उस पर खीझती है, इसके बावजूद कि वह चाहती है कि कोई उसे प्यार करे. आगे चलकर अपने आशिक को वह हां कहने का साहस कर पाती है. और यही हां कहने  का साहस पैदा कर लाजो जान पाती है कि वह भी मां बन सकती है. हां कहने के साहस के बाद ही फिल्म की नायिकायें पूरे मर्दवादी समाज को समवेत ना कहने का साहस कर पाती हैं- यह ना कहने का सबसे बड़ा साहस है, जो पिंक के नारेनुमा ना से बड़ा है- संरक्षकत्व में ना कहने से ज्यादा बड़ा – फिल्म का सबसे बड़ा कथन है -‘ मर्द नहीं इंसान बनना सीख.’ मर्द के आदमी न बनने तक यह समवेत ना ज्यादा पावरफुल है- पार्च्ड का वह ‘ ना’ भी ज्यादा असरकारी है पिंक की कचहरी में ना के ड्रामे से ज्यादा, जब बिजली अपनी आंखों के रास्ते दिल में उतरने वाले प्रेमी का असली मकसद जानती है और ना कहती है.

पार्च्ड एक फिल्म के रूप में, एक टेक्सट के रूप में अपने चरित्रों के बेहद करीब है. आर्थिक रूप से आंशिक तौर पर स्वतंत्र ग्रामीण महिलाओं के यथार्थ पर अपना बाहरी नजरिया नहीं हावी होने देती, जैसा कि रिहाई के मामले में अपनी सदिच्छाओं के बावजूद यह संभव नहीं हो पाया था- यह फिल्मकारों की दृष्टि और विषय से ट्रीटमेंट का भी अंतर है. फिल्म में स्पष्टत: तो सामाजिक लोकेशन का जिक्र नहीं है- लेकिन परिवेश नायिकाओं के लोकेशन का संकेत जरूर दे रहा है. इस सामाजिक लोकेशन की स्त्रियों पर बात होना अभी शेष है- इस लोकेशन की महिलाओं की आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक स्थितियों पर शोध अभी शेष है.

पार्च्ड की कहानी उसी समाज के एक बड़े हिस्से का यथार्थ है, जहां ब्राह्मण,क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र होना रंगों से भी तय होता है- जहां इसी फिल्म में रानी की सशक्त भूमिका निभा चुकी तनिष्ठा चटर्जी से उसके काले रंग पर तंज किया जाता है और उसकी जाति और उसके कलर का कांबिनेशन का विमर्श किया जाता है!

किस हाल में हैं बोधगया भूमि मुक्ति आन्दोलन की जमीन मालकिनें !

संजीव चंदन 


वह इस माहाद्वीप का पहला भूमि आन्दोलन माना जाता है , जिससे मुक्त हुई जमीनों के  आधिकार महिलाओं ने अपने लिए भी प्राप्त किये . ७वें ८ वें दशक का यह आन्दोलन एक नजीर बना महिला आन्दोलनों के लिए कि कैसे विपरीत परिस्थितियों में भी महिलाओं के आर्थिक अधिकार हासिल किये जा सकते हैं . बोधगया का यह भूमि मुक्ति आन्दोलन यद्यपि महिला आन्दोलन की अगुआई में नहीं जयप्रकाश नारायण के आन्दोलन से पैदा हुआ ‘युवा संगठन ‘ संघर्ष वाहिनी’ ने की थी . जमीन का मालिकाना हक़ प्राप्त महिलाओं की क्या है वर्तमान स्थिति !  स्त्रीकाल  के लिए एक रपट 
किस हाल में हैं जमीन की मालकिनें 


जब मैं उस इलाके में गया तो एक पूर्व धारणा लेकर गया था कि जमीनें मूल मालिकों के हाथ से निकल गई हैं . संघर्ष वाहिणी के नेता कारू हालांकि सूचित कर देते हैं कि यह आंशिक सच है , २५% तक जमीनें जरूर निकल गई होंगी , लेकिन वे सब किसी न किसी मजबूरी में , बीमारी या शादी –विवाह में . महिलाओं ने अधिकाँश जमीनें बचा रखी हैं, पुरुषों के हाथ की जमीनें शराब आदि की आदतों के कारण भी निकली हैं . कोसा बीजा पंचायत की पार्वती देवी को दो बीघा जमीन मिली थी . खेत के पास ही उन्होंने अपना छोटा सा घर बना रखा है . उनके खेत धान के पौधों से लहलहा रहे हैं. चार बेटों में से एक मकान बनाने का कारीगर है और बाकी खेतों में काम करते हैं . इस इलाके में जमीन की कीमत प्रति बीघा १ करोड़ से भी अधिक हो चुकी है . पार्वती देवी कहती हैं , ‘ जमीन इज्जत होती है , उसे मैं किसी सूरत में नहीं बिकने दूंगी . पार्वती देवी ने इस आन्दोलन में बढ़ –चढ़कर हिस्सा लिया था .

पार्वती देवी



शंकर मठ के खिलाफ था आन्दोलन


बोध गया का शंकर मठ उस इलाके में हजारो एकड़ जमीन का जमींदार हुआ करता था. इस मठ को १५० से एकड़ जमीन दी थी शेरशाह सूरी के वंशज ने , जिसके बाद इसका मालिकाना फैलाव ३० हजार एकड़ से अधिक खेती और गैर खेती की जमीनों तक होता गया था. इलाके के दलित , खासकर भुइयां ( मुसहर ) जाति के दलित मठ की जमीनों में बंधुआ मजदूर की तरह काम करते थे. शेरघाटी , बाराचट्टी , बोधगया और मोहनपुर प्रखंड में मठ ने अपनी ‘ कचहरियाँ’ बना रखी थी , जो इन मजदूरों पर नियंत्रण का काम करती थी . इसी भूमिहीन मजदूर जाति के स्त्री पुरुष इस आन्दोलन में हरावल की तरह शामिल हुए. ७वें दशक के प्रारम्भ में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ( सी पी आई ) ने मठ की जमीनों की हदबंदी और भूमिहीनों में उसके वितरण के सवाल पर आन्दोलन शुरू किए. इस आन्दोलन में सी पी आई के एक नेता ‘ चुरामन माली’ की ह्त्या हो गई . बाद में भूमि मुक्ति के इस  आन्दोलन को दो  चरणों में जयप्रकाश नारायण के अनुयाइयों ने नेतृत्व दिया . पहले चरण में जे. जगन्नाथन और उनकी पत्नी कृष्णम्मा ने लोगों को संगठित किया , लेकिन अंतिम निर्णायक लड़ाई लड़ी गई १९७८ के बाद संघर्ष वाहिनी के नेतृत्व में. सालों चली इस लड़ाई में मठ की कचहरियाँ तोड़ दी गई . ८ अगस्त १९७९ को आन्दोलनकारियों पर पुलिस ने गोली चलाई , जिसमें पाचू मांझी और राम देव  मांझी की हत्या हो गई . १९८१ में लगभग १,५०० एकड़ जमीन बांटी गई ,  बाद में और भी किस्तों में बंटी, और अंततः १९८७ में तत्कालीन मुख्यमंत्री बिन्देश्वरी दुबे के समय में ३५,००० बीघा  जमीन भूमिहीनों में बाँट दी गई.

मांजर देवी , आन्दोलन की एक स्थानीय नेता

आसान नहीं थी डगर महिलाओं के लिए


इस आन्दोलन में बड़ी संख्या में महिलाओं की भागीदारी थी . आन्दोलन के एक नेता उपेन्द्र सिंह कहते हैं , ‘ हमलोग महिलाओं को आगे रखते थे . यह रणनीति थी . सरकार और मठ ताकि आन्दोलनकारियों पर हमले का आरोप लगा कर उनका दमन न कर सकें, लेकिन इससे ज्यादा महत्वपूर्ण था कि महिलाओं ने इस आंदोलन को नेतृत्व दिया था .’ जब जमीन के पट्टे लिखे जाने लगे तब महिलाओं ने सवाल खड़े किये कि यह जमीन सिर्फ पुरुष भूमिहीनों को क्यों दिए जाये ? इस सवाल के बाद उन्हें समाज के पुरुष वर्चस्व से दो –चार होना पडा . उन्हें जवाब मिला कि जमीन परिवार के मुखिया को ही दिए जायेंगे , जो कि पुरुष होता है . दवाब डाले जाने पर अधिकारियों ने धमकी दी कि जमीन किसी को नहीं दी जायेगी. १९८२ में शेरघाटी के प्राशास्कों का महिलाओं ने घेराव किया और अपनी बात रखी.

पार्वती देवी का घर



यद्यपि संघर्षवाहिनी के पुरुष आन्दोलनकारियों ने महिलाओं के हक़ में राय दी लेकिन स्थानीय विरोध प्रबल  था. तर्क दिया गया कि महिलायें खेत नहीं जोत सकती हैं. महिलाओं ने जवाब दिया कि रोपने –काटने –ओसाने का काम महिलायें करती हैं . एक विचित्र प्रसंग १९८५ में आया जब बैंक  एक स्कीम के तहत बैल खरीदने के लिए ऋण दे रहे थे . समाज के पुरुषों ने कहा कि महिलाओं के नाम से जमीन के पट्टे होने से दिक्कत आती है कि वे बाहर नहीं जा सकती हैं. महिलाओं ने व्यंग्य किया कि फिर हम खेतों में काम करने कैसे जाती थीं .

सर्वोदयी गाँव के बच्चे




मांजर देवी आन्दोलन पर एक सवाल !


इस आन्दोलन की जुझारू नेता थीं पीपरघट्टी की मांजर देवी . भुइंया जाति की यह जुझारू महिला उनदिनों सुर्ख़ियों में रहती थीं –देश –विदेश के मीडिया माध्यमों में . इन्होने महिलाओं को जमीन का हक़ दिलवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी . आज चलने से लाचार मांजर देवी की हालत बदहाल है . उन्हें आन्दोलन से मुक्त हुई जमीन नहीं मिली थी क्योंकि वे इस आन्दोलन में प्रमुख भूमिका में थी इसलिए जमीन पर दूसरों का दावा पहले होने दिया . उन्हें दो बीघा जमीन मिली भूदान में . नेता होने के कारण आस पास के दबंगों ने इन्हें निशाना बनाया . इनके पूरे परिवार पर डकैती का केस दर्ज करवा दिया गया . वे कहती हैं , ‘ ऐसा आन्दोलन के कमजोर होने पर हुआ . मेरी अधिकाँश जमीनें केस मुकदमे में निकल गई. धनवाद से अंजलि जी मिलती हैं और कोइ  नहीं . तब भी मुझे उस आन्दोलन में होने का गर्व है.’ संघर्ष वाहिणी की तत्कालीन नेता और धनवाद महिला मंच की अंजलि कहती हैं , ‘ मैं ८ अगस्त को गई थी . मांजर जी से भी मिली . हम चाहते हैं कि वहाँ एक केंद्र खोला जाय ‘ जयप्रभा’ ( जयप्रकाश और प्रभावती के नाम पर )  नाम से ताकि लोग जनोन्मुखी कामों से जुड़ें .

भुइंया जाति की नई पीढी

जहां २ बीघा  से ५ बीघा  हो गयी जमीन 


बोधगया इलाके में एक गाँव ऐसा भी है , जहां के पूर्व भूमिहीनों ने प्राप्त दो बीघा जमीन को ५ बीघा बना लिया . मूलतः खेत मजदूर रहे इस जाति की मेहनत का फल है सर्वोदयपूरी कोशला नाम का यह गाँव . यद्यपि इन्हें जमीने भूदान में मिली थी , आन्दोलन में नहीं, लेकिन मेहनत से आज अधिकाँश लोगों ने अपनी जमीनें बढ़ा ली . देश भर  में सभी भूमिहीनों को ५ एकड़ जमीन के लिए  मुहीम छेड़ने की घोषणा करने वाले आर पी आई के नेता रामदास आठवले कहते हैं , जमीन एक बड़ी ताकत होती है . आज भी यह उत्पादन का सबसे बड़ा क्षेत्र है. महाराष्ट्र में और बाद में बोधगया में भूमिहीनों को मिली जमीनों ने असर दिखाना शुरू कर दिया है .’ हालांकि एक फर्क है बोधगया और महाराष्ट्र में . बोधगया के इलाके में इन दलितों ने शिक्षा पर जोर नहीं दिया , इलाके से अफसर तो दूर कोइ ढंग की सरकारी नौकरी में नहीं है , जबकि महाराष्ट्र के दलितों ने शिक्षा को सबसे पहले प्राथमिकता दी .

पिंक के बहाने ‘अच्छी औरतें’ और ‘बुरी औरतें’

डिसेन्ट कुमार साहू


पी.एच.डी समाजकार्य
ई-मेल – dksahu171@gmail.com
महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा

शिक्षा और रोजगार ऐसे कारक हैं जिनके कारण सोशल स्पेस में महिलाओं की उपस्थिति बढ़ी है. हालांकि शिक्षा की अंतर्वस्तु और रोजगार की प्रकृति का विश्लेषण करें तो पता चलता है कि इन दोनों ही कारकों ने बहुत हद तक यथास्थितिवाद की स्थिति बनाकर रखी है. घोषित-अघोषित कई ऐसे नियम हमारे समाज में हैं जो महिलाओं को आत्मनिर्भर, सशक्त, विचारशील होने से रोकते आ रहे हैं,जेंडर और यौनिकता से जुड़े कायदे उन घोषित-अघोषित नियमों में प्रमुख हैं. इन कायदों को मानने पर हमें ‘अच्छा’ और तोड़ने पर ‘बुरा’ घोषित किया जाता है। फिल्म पिंक के बहाने ‘अच्छी औरत’ तथा ‘बुरी औरत’ के मापदण्डों पर चर्चा कर लेनी चाहिए, इन मापदण्डों को बनाए रखने से किसे फायदा है? तथा अच्छी औरत का अच्छी बनी रहना इस समाज के लिए कितना जरूरी है? फिल्म देखने वाले लगभग सभी लोगों ने इसे अच्छी और यथार्थ फिल्म का दर्जा दिया. लेकिन क्या वे समाज के यथार्थ की बात करते हुए खुद को खंगाल पाते हैं? क्या वे फिल्म की नायिकाओं के साथ ईमानदारी से खड़े  होते हैं या भावुकतावश ही खुद को उनके साथ पा रहे हैं. क्योंकि मीनल का हमला किसी राजबीर के सर पर नहीं बल्कि उस मानसिकता पर है जो औरत को सिर्फ एक जिस्म, एक वस्तु समझता है. जो किसी लड़की के हँसने, बात करने, शराब पीने और उसके कपड़ों के माप से उसका चरित्र निर्धारण कर लेता है.

फिल्म समाज के ढांचे को उघाड़ती है, हमें मौका देती है एक इंसान के मन में बैठे मर्दवादी मन को टटोलने की. हम इस समाज में वही पुरुष हैं जिन्हें लड़कियों के ना को हाँ समझना सिखाया जाता है। क्यों? क्योंकि लड़कियों को सिखाया जाता है- शर्माना, यौनिक इच्छाओं से संबन्धित पहल ना करना. वहीं दूसरी ओर हमारा समाज पुरुष यौनिक छवि को आक्रामक और निडर के रूप में गढ़ता है.  ऐसे में उनके द्वारा किये जाने वाले हिंसक तथा आक्रामक व्यवहारों के लिए लड़कियों को ही दोष दिया जाता है तथा इस घटना को ‘सबक सिखाने’, औकात दिखाने’ के रूप में परिभाषित किया जाता है ताकि भविष्य में उन कायदों को कोई और न तोड़े. हम सबका समाजीकरण जेंडर और यौनिकता के कायदों के अनुसार होता रहता है. हम उन कायदों के अनुसार ही चलते हैं. ये कायदे अपने मानने वालों को भी प्रभावित करती है और न मानने वालों को भी। इसका सबसे बड़ा उदाहरण LGBTQ समूह है जो इन कायदों को तोड़ने के कारण ही समाज में बहिष्कृत जिंदगी जी रहे हैं. इन कायदों के अनुसार लिंग के दोहरे मापदंड हैं इसलिए पुरुषों की तुलना में महिलाएं ज्यादा नियंत्रित और शोषित की जाती हैं.

समाज में जो आदर्श ‘अच्छी महिलाओं’ के लिए गढ़े गये हैं तथा जिसके आधार पर उनसे वैसा ही बनने का आग्रह किया जाता है, उन आदर्श अच्छी महिलाओं की तुलना में ‘पिंक’ की पात्र ‘बुरी महिलाओं’ के वर्ग में आती हैं. ये बुरी महिलाएं जेंडर तथा यौनिकता के उन कायदों को तोड़ती हैं जिसे समाज में स्त्रियों के शोषण व नियंत्रण के लिए बनाया गया है. फिल्म की तीनों पात्र कामकाजी महिला हैं जो अपनी घरों से बाहर रहती हैं, अपनी जिंदगी से जुड़ी फैसले खुद लेती हैं, छोटे कपड़े पहनती हैं, शराब पीती हैं, उनके विवाह पूर्व यौन सबंध हैं, वे अपने यौन साथी का चुनाव करने के लिए स्वतंत्र हैं, इसके साथ ही उनमें असहमति की हिम्मत है. ये वो कायदे हैं जिसे ना तोड़ने के लिए परिवार, पड़ोस, समाज, मीडिया, फिल्म व टी.वी. सीरियलों के द्वारा हमारे सामने ‘आदर्श’ पेश किया जाता है. याद कीजिए उन फिल्मों व सीरियलों को जिसमें ‘बुरी औरतों’ का चित्रण इन्हीं कायदों को तोड़ने वाली के रूप में किया जाता रहा है. अच्छी वही हैं जो इन कायदों को तोड़ती नहीं हैं। क्योंकि इन्हीं कायदों पर तो जाति, धर्म, वर्ग की विशाल दीवार खड़ी है.

भारतीय समाज में अच्छी और बुरी औरत के गढ़न में यौनिकता की मुख्य भूमिका होती है. यही कारण है कि फिल्म में लड़कियों को घर से निकलवाने की कोशिश करने से लेकर न्यायालय में दोषी ठहराने तक की प्रक्रिया में उन्हें ‘चरित्रहीन’ घोषित करने की कोशिश की जाती है. किसी महिला के चरित्र पर उंगली उठाना सबसे आसान और प्रभावकारी तरीका होता है, यह आरोप सिर्फ लड़की के जीवन को प्रभावित ही नहीं करता बल्कि उसका परिवार भी समाज में कलंकित महसूस करता है. अपनी पुस्तक ‘हम हिंदुस्तानी’ में सुधीर कक्कड़ व कैथरीना कक्कड़ भारतीय समाज में स्त्री यौनिकता पर लिखते हुए कहते हैं ‘लड़कों के विपरीत, जो लड़कियां यौन-अभिलाषा को जरा भी सार्वजनिक कर देती हैं, वे न केवल अपनी प्रतिष्ठा को जोखिम में डाल देती हैं, बल्कि उनके यौन शोषण का शिकार होने की संभावना बन जाती है.’ अर्थात जब औरतें अपनी स्वतन्त्रता, अपनी आनंद के लिए जीने लगती हैं तो समाज में ऐसी महिलाओं को आसानी से उपलब्ध यौन वस्तु के रूप में देखा जाने लगता है तथा उसके ना को भी अपने पुरुषवादी मानसिकता के कारण हाँ समझा जाता है. आखिर सवाल उठता है वो कौन से कारण हैं जो हमें ‘अच्छी औरत’ के कायदे की ओर खीचते हैं?

जेंडर और यौनिकता के कायदे सीखते हुए हम लगातार शक्तिशाली (powerful) या शक्तिहीन  (powerless) के अनुभवों से गुजरते हैं. यह हमारे खुद के अनुभव भी होते हैं और यह स्थिति हम दूसरों में भी देखते हैं. जैसे- कोई लड़की किसी भी रूप में जेंडर और यौनिकता के कायदों को तोड़ती है तो उसे हमारे समाज में अच्छा नहीं माना जाता, ऐसी लड़कियों को परिवार में सम्मान नहीं दिया जाता, पारिवारिक निर्णयों में उनकी सहभागिता नहीं ली जाती या ज़्यादातर ऐसे मामलों में लड़कियों को परिवार से बहिष्कृत कर दिया जाता है अर्थात सामाजिक संरचना में इनकी स्थिति शक्तिहीन की होती है. लड़कों के साथ भी यही स्थिति हो सकती है या होती भी है लेकिन लड़कियों की तुलना में उनकी स्थिति ज्यादा बेहतर होती है. इस तरह हमारे परिवार तथा समाज के सत्ता केंद्र में वही होते हैं जो कायदे नहीं तोड़ते. दंड के रूप में शक्तिहीन की स्थिति व पुरस्कार के रूप में शक्तिशाली की स्थिति हमें उन कायदों को मानने के लिए आकर्षित करती है.

जेंडर व यौनिकता के कायदों पर ही पितृसत्तात्मक समाज खड़ा है और इसका सीधा संबंध स्त्री की प्रजनन शुद्धता से जुड़ा है. रक्त शुद्धता को बनाए रखने के लिए ही स्त्री की यौनिकता को नियंत्रित किया जाता है. इस ढांचे को बनाएँ रखने के लिए जरूरी है कि इन कायदों को सहज और प्राकृतिक रूप में फैलाया जाए. अगर किसी तरह की चुनौती मिलती भी है तो उन क्रियाओं को ‘असामाजिक’ व ‘अनैतिक’ घोषित कर दिया जाता है. अच्छी औरतों के अच्छी बनी रहने से ही ये सामाजिक संरचना चल रही है, जिस दिन इन मानकों की परवाह ना करते हुए स्त्रियाँ अपनी स्वतंत्रता, अपनी आनंद के लिए जीने लगेंगी जाति, धर्म तथा वर्ग के ढांचे टूट जाएगें.

अशोक विजय दशमी : दशहरा

0
दशहरा पूरे देश में बड़े धूमधाम से मनाया जाता रहा है. मुख्यतःइस पर्व को बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में रावन के वध और अयोध्यापति राम की जीत  के रूप में मनाया जाता है, ये बात और है कि कौन बुरा था और कौन अच्छा इस पर सभ्य समाज में  एक लम्बी बहस की जरुरत है.जब पूरा देश रावण को जलाए जाने पर ढोल ताशे बजा-बजा कर खुशी मनाता है, तब एक शहर इस उत्सव से दूर दीक्षाभूमि में लाखों  लोग बौद्ध धम्म प्रवर्तन हेतु अपनी दस्तक देते है.



महाराष्ट्र के विशाल नगर नागपुर में हर वर्ष दशहरा के उपलक्ष्य  में अपने ऐतिहासिक दिन को याद करने और बौद्ध धर्म अपनाने हेतु लाखों  की संख्या लोग में एकत्र होते है. माना जाता है कि इस दिन मौर्यवंशीय सम्राट अशोक ने कलिंग  युद्ध की विजय के बाद हुए रक्तपात से खिन्न हो कर शान्ति और विकास के लिए बौद्ध धम्म स्वीकार किया और दस दिन तक राज्य की ओर से भोजन दान  एवं दीपोत्सव किया.


14 अक्तूबर 1956 को डा भीमराव आंबेडकर ने पांच लाख अनुयायियों के साथ  हिन्दू धर्म को त्याग कर, बौद्ध धम्म में विश्वास करने वाले पूर्वज नागों  की जमीन नागपुर में बौद्ध धम्म स्वीकार कियाआधुनिक भारत के इतिहास में दुबारा से बौद्ध धम्म की पताका फहराई गयी. बौद्ध धम्म को मानने वाले देश चीन, जापान, थाईलैंड से प्रति वर्ष हजारों  की संख्या में अक्तूबर के महीने में सैलानी नागपुर की दीक्षाभूमि में दर्शन के लिए आते है.
डा. आंबेडकर ने दीक्षा लेते समय २२ प्रतिज्ञाएं ली, जिसका सार था ईश्वरवाद-अवतारवाद, आत्मा स्वर्ग- नरक, अंधविश्वास और धार्मिक पाखंड से मुक्ति और जीवन में सादगीपूर्ण सद्व्यव्यवहार का संचार. हिन्दू धर्म की मान्यताओं  से दूर जाति-उपजातियों  से उपजे भेदभाव को समाप्त करके उन्होंने एक प्रबुद्ध भारत की ओर एक कदम उठाया था.

नागपुर स्थित दीक्षाभूमि में तीन दिन बड़ा उत्सव होता है . महाराष्ट्र के दूर- दराज जिलों, गावो कस्बों से नंगे पांव लाखो लोग  दीक्षा भूमि के दर्शन करने आते है और 48 घंटे दीक्षाभूमि  में तिल रखने की जगह नहीं मिलती. न केवल महाराष्ट्र से बल्कि  पूरे  भारत के कोने कोने मसलन उत्तेर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, पंजाब-हरियाणा, राजस्थान, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु से हजारो लोग दीक्षाभूमि में धम्म की वंदना करने आते है. इस उत्सव में सबसे खूबसूरत चीज जो देखने को मिलती है, भीड़भाड़ में कोई छेड़छाड़ नहीं होती न ही कोई फसाद .

 दलित आन्दोलन की झलक पल -पल पर देखने  को मिलती है. महिलाओ के मंडप, छात्रो के मंडप,  पुस्तकों के मंडप, अन्धविश्वास निवारण मंडप, बुद्धिस्ट विचारो के कैम्प, कर्मचारियों के कैम्प, पत्रिकाओ के स्टाल, समता सैनिक दल का मार्च, आरपीआई  का मार्च, महिलाओ का मार्च , युवाओं के मार्च नारे लगाते लोग दीखते हैं तो नागपुर की सडको पर जहां -जहां से लोग गुजरते हैं,उनके लिए भोजन की व्यवस्था वही के लोग करते हैं , महिलाएं  भोजन दान करती हैं. जितना विशाल उत्सव  होता है, उतना ही विशाल पुस्तकों , पोस्टर, बिल्लो का बाजार होता है, जो अपनी विशिष्ट छाप  छोड़ता है.

यह उत्सव अब पूरे देश में मनाया जाता है. आंबेडकरवादी  विचारधारा को मानने वाले संगठन, संस्थाए, पार्टी, समूह दल अपने अपने राज्यों में दशहरा के दिन अशोक विजयदशमी मानते है. बनारस, आगरा, दिल्ली , हरियाणा, आन्ध्र, तमिलनाडु. कानपुर, लखनऊ में धूमधाम से मनाया जाता है. अफसोसजनक बात है कि लाखो कि संख्या में दस्तक लेनेवाले उत्सव के बारे में मिडिया , टीवी चैनल में कोई उत्साह नहीं है, न ही उसके बारे में कोई रिपोर्टिंग ही होती है. मुख्यधारा के अखबार दुर्गा पूजा, रावणदहन से भरे हुए मिलेंगे, लेकिन हमारी मूल सभ्यता और विचारधारा पर कोई लेख टिप्पणी भी देखने को नहीं मिलेंगी. अशोक विजयदशमी की याद में आज हम बौद्ध , दलित आदिवासी, घुमंतू जातीय लोगो और उनकी महिलाओं  की अस्मिताओं के प्रति सजग हो कर पितृसत्तात्मक  पर्व और मिथकों पर बहस चलानी होगी, बहस हमें इस बात पर भी चलानी चाहिए कि एक लोकतान्त्रिक देश में त्योहारों के नाम पर हम हिंसात्मक अभिव्यक्तियों को क्यों अभ्यास  करे?

समग्र क्रांति का स्वप्न: अखिल भारतीय दलित महिला सम्मेलन

निशा शेंडे

स्त्री अध्धयन विभाग अमरावती ‘विश्वविद्यालय’ में प्राध्यापिका
shende_nisha7@yahoo.com

20 जुलाई 1942 को पहला अखिल भारतीय दलित  महिला फेडरेशन की परिषद संपन्न हुई. यह वर्ष हम इसी परिषद की 75वीं वर्षगांठ मना रहे हैं. दलित महिलाओं की उन्नति, प्रगति सक्षमता की लड़ाई की शुरुआत इसी परिषद के माध्यम से हुई है. इस परिषद का वर्णन स्वर्ण अक्षरों  में किया जाना चाहिये. जिस जोशपूर्ण वातावरण में यह परिषद संपन्न हुई वहां से लेकर आज तक का दलित महिला आन्दोलन की उपलब्धियों के बारे में ऑडिट होना जरूरी है.


20 जुलाई 1942 को नागपुर में सुलोचनाबाई डोंगरे की अध्यक्षता में यह परिषद संपन्न हुई. इस परिषद की विशेषता यह थी कि परिषद में डॉ. बाबासाहब आंबेडकर स्वयं उपस्थित थे. दलित महिलाओं का अलग संगठन हो, यह इच्छा स्वयं डॉ. बाबासाहब आंबेडकर  की थी. ‘महिलाओं की प्रगति से ही समाज की प्रगति आंकी जा सकती है’ यह विचार डॉ. बाबासाहब आंबेडकर रखते थे. इसलिए व्यवस्था परिवर्तन की सोच, अस्पृश्य महिलाओं की उन्नति, उनका सम्मान प्राप्त करने हेतु उनका सार्वजनिक जीवन में आना महत्वपूर्ण था. सार्वजनिक आन्दोलन में महिलाओं की भागीदारी अपनी अहम् भूमिका निभाती है. और वह भागीदारी शेडयूल कास्ट की महिलाओं को करनी चाहिये. इस पर डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने भूमिका रखी कि  ‘अस्पृश्यता की वजह से जिन अस्पृश्य महिलाओं  का वजूद की खत्म हुआ था. उच्च ब्राह्मणवादी संस्कृति ने उनकी इतनी प्रताड़ना की थी कि वह स्वयं इंसान होना ही भूल गई थी. जानवर से भी बदतर जीवन शेडयूल कास्ट की महिलायें जी रही थी.’

मानवीय दृष्टिकोण या मानवीयता का अंश इस चातुर्य वर्ण  व्यवस्था में कहीं दूर दूर तक नजर नहीं आ रहा था. अस्पृश्य वर्ग की स्थिति बेहाल थी. ऐसी स्थिति में महिलाओं की स्थिति के बारे में हम सोच सकते हैं कि वह किन हालातों की और जातिवादी व्यवस्था की शिकार थी. आज उपलब्ध सभी भाषाओँ की दलित साहित्य में इस जीवन की वेदना प्रतिबिंबित हुई है. इस अवांछनीय सामाजिक परिस्थिति का अंग दलित समाज कैसे जीवनयापन कर रहा था? उसकी सोच-समझ, विचार करने की शक्ति ही हिंदू धर्म ने छीन ली थी. इस कठोर, घोर उपेक्षा तथा ब्राह्मनी हिंदू धर्म के वातावरण में दलित समाज की आंकाक्षा जागृत करने का श्रेय हम डॉ. बाबासाहब आंबेडकर को देते हैं.


इस क्रांतिकारी आंदोलन की शुरुआत महिलाओं ने की. लगभग पच्चीस हजार महिलायें इस परिषद में  रूप से सहभागी हुई थी. उनका उत्साह एक नई क्रांति का बिगुल बजा रहा था. यह एक क्रांतिकारी सम्मेलन था. दलित, शोषित, वंचित, पिछड़े समाज की महिलाओं की आवाज संपूर्णक्रांति की मांग करती नजर आ रही थी. यह परिषद अपने आप में दुनिया की ऐतिहासिक परिषद थी. इस परिषद में हुई घोषणा एवं मांगें महत्वपूर्ण थी. आज दलित महिलायें सामाजिक आंदोलन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी हैं. इस क्रियाशीलता की नींव 1942 की अखिल भारतीय दलित महिला सम्मेलन में डाली गई थी.

इस परिषद में उपस्थित महिलाओं का हौसला देखते बन रहा था. ये महिलायें अस्पृश्य समाज की, दलित, शोषित थी. यह जातिव्यवस्था तथा पितृसत्ता  से पीड़ित थीं. इन महिलाओं की परिस्थिति के बारे में पता चलता है, जो  काफी संघर्षपूर्ण था. आर्थिक, सामाजिक अस्पृश्यता के कारण विकट परिस्थितियों से जूझती ये महिलायें जातिभेद और पितृसत्ता का विरोध कर रही थी. इन महिलाओं की विशेषता यह थी कि ये केवल महिलाओं की परिस्थिति के बारे में ही सिर्फ नहीं सोच रही थी अपितु ये समाज में क्रांतिकारी बदलाव चाह रही थीं तथा डॉ. बाबासाहब आंबेडकर के आंदोलन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी थी.

भारत में 1975 का दशक स्त्रीमुक्ति का दशक जाहिर हुआ था. भारतीय स्त्रीमुक्ति का इतिहास 1975 से लिखना शुरू हुआ. पर 1942 में दलित महिलाओं ने स्त्रीमुक्ति आवाज बुलंद की थी. स्त्रीमुक्ति का आंदोलन सवर्ण जाति की महिलाओं के हाथ में था जहां केवल पारिवारिक हिंसा, बलात्कार तथा दहेज़ प्रथा के बारे में सोचा जा रहा था. जबकि दलित महिलायें पितृसत्ता, हिंदू धर्मव्यवस्था तथा जाति व्यवस्था को ललकार रही थी. महिलाओं का शोषण धार्मिक आधार पर हो रहा है, इस बात पर जोर डाल रही थी. मनुस्मृति की निंदा कर रही थी. इस परिषद में जाति, लिंगभाव तथा आरक्षण के प्रस्ताव संपन्न हुए.

संसदीय आरक्षण का यह अहम् मुद्दा इस परिषद का  अंग था. महिलाओं में सक्षमता निर्माण करना, जाति तथा हिंसा के प्रश्न तथा हिंदूधर्मव्यवस्था त्याग करके डॉ. बाबासाहब आंबेडकर की राह पर चलना यह उनका महत्वपूर्ण कार्य बन चुका था. इसी परिषद के माध्यम से डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने दलित महिलाओं को सामाजिक तथा राजकीय आंदोलन से परिचित करवाया.

20 अप्रैल 1942 के परिषद के फलस्वरूप महिलाओं की विभिन्न जगहों पर सभा आयोजित होने लगी. जिनमें स्वतःस्फूर्त महिलायें भागीदारी करने लगी तथा वैचारिकता में महत्वपूर्ण सोच आने लगी. आज हम 33% महिला आरक्षण की मांग करते हुए आरक्षण के भीतर दलित महिलाओं के आरक्षण की अलग मांग कर रहे हैं.