लोक से विश्व तक गूंजती छत्तीसगढ़ की धड़कन अब खामोश: तीजन बाई
रीतिकालीन कविता और स्त्री यौनिकता विमर्श
हँसना है तो थोड़ा रो लें: मैं वापस आऊंगा’
“भक्तिकालीन हिंदी साहित्य में स्त्री-अस्मिता कीअभिव्यक्ति : एक आलोचनात्मक अध्ययन”
तुम्हारा माँ होना
उन क्षणों के बाद.. !
छन्ने की लौंडिया गुनगुनाती है
हिन्दी नवजागरण और स्त्री
हमारे समय के अंधेरे में
अपना कमरा : सार्थकता का एहसास
कर्मानन्द आर्य की कवितायें: अगली पीढ़ी की लड़की और अन्य
विकल सिंह की कवितायें
सूखा नशा