करुणा से भीगा प्रेम : फ़िल्म समीक्षा के बहाने
फ़िल्म क्यों देखें उसके पहले “मैं वापस आऊंगा” पर सबसे पहली प्रतिक्रिया, इस फ़िल्म का टाइटल होना चाहिए था – “क्या कमाल है’! विस्मयादिबोधक चिह्न के साथ जी हाँ, वह प्रमुख चिह्न जोकि एक विराम चिह्न है इसका प्रयोग लिखित भाषा में हर्ष, शोक, आश्चर्य, घृणा, भय, और उत्साह जैसी तीव्र भावनाओं को व्यक्त करने वाले शब्दों या वाक्यों के ठीक बाद या अंत में किया जाता है। क्या आपको नहीं लगता कि इस भाग-दौड़ की ज़िन्दगी में विराम की निहायत ज़रूरत है।
कारण भी बताउंगी, पहले फ़िल्म का स्पोइलर दिए देती हूँ। अब वैसे कुछ बचा भी नहीं बताने को जिसने फ़िल्म नहीं भी देखी वे भी जानते हैं, फ़िल्म विभाजन की त्रासदी को “कीनू और जिया” की प्रेम कहानी के माध्यम से दिखाती है। जिया जोकि एक प्रगतिशील प्रोफेसर की बेटी है प्रगतिशील लेखक संघ के बैनर तले मुंशी प्रेमचंद की कहानी “दुनिया का सबसे अनमोल रतन” के नायक नायिका दिलफरेब और दिलफिगार का उदाहरण देते हुए देश-भक्ति के महत्व को दर्शाती है। देश-भक्ति की करुणा से उपजा प्रेम ! जबकि कीनू दो साल से मन में मंसूबे बनाए बैठा है कि अँगरेजों के ईसाई धर्म को स्वीकार करके शादी कर लेंगे। उसके लिए समस्या अँगरेज़ नहीं, दोनों के अलग-अलग धर्म है। और वो ठीक ही था विभाजन की घोषणा के बाद धर्म दंगाइयों का भेस धारण कर लेता है धर्म और दंगाई दोनों ही आदमी ने बनाएं हैं। है ना? और फिर जो शुरू होता है हम सभी जानते हैं लेकिन उसे दिखाने के लिए इम्तियाज़ ने जो दृश्य ठूँसे है उसके लिए उन्हें माफ़ नहीं कर सकते। सिनेमा में कुछ भी “दिखाना” ऐसे ही नहीं हो सकता । फिर वो भले ही एकाध सेकेण्ड का दृश्य क्यों न हो। एक उभरा हुआ गर्भ और एक चाक़ू थामे हाथ ! या एक बूढ़ी दादी का बारी-बारी लड़कियों के गले पर कटार चलाना !
फिर भयभीत आँखों के साथ एक असहाय बीमार 95 वर्ष का बुज़ुर्ग जिसकी स्मृतियाँ उसका पीछा नहीं छोड़ती। उसका पोता विदेश से लौटकर मदद करना चाहता है कि कैसे भी वह उनकी उस अंतिम इच्छा को पूरा कर पाए जो वह बुज़ुर्ग {कीनू} बता भी नहीं पा रहा। लेकिन निर्वैर जो इस नफ़रत भरी दुनिया में प्यार के मायने खोज रहा है, अपने दादा जी के 78 साल के पुराने ‘प्रेम’ में उसे पा लेता है क्योंकि प्यार कोई समस्या नहीं, समस्या तो है इस दुनिया में नफ़रत को प्रश्रय देने वाले जिनकी संख्या ज़्यादा है,जबकि प्रेम की नहीं! तो खैर कीनू की जिया को दुनिया छोड़े 10 साल हो चुके हैं। 1953 के बाद उसने जिया की सुध नहीं ली 53 में जब वह वहाँ गया था तो जिया की शादी की खबर को सहन नहीं कर पाता । अपने छोटे भाई से कहा “यह दुनिया ख़त्म हो चुकी है अब मुड़ कर नहीं देखना” लेकिन कोई अदृश्य शक्ति है जो उसे वापस वहीँ लौटने के लिए पुकार रही है । प्यार को लौटा लाने के लिए निर्वैर का होना ज़रूरी है और निर्वैर सफ़ल भी होता है। दादा सुख चैन से आखिरी साँस लेता है ।

तो अभिनय गीत संगीत निर्देशन की बात करके अपना और आपका समय व्यर्थ नहीं करुँगी । अब मैं वापस लौटती हूँ फ़िल्म के शीर्षक पर कि क्यों इसका नाम होना चाहिए था क्या कमाल है!
अंत में भीगी पलकों के साथ जब सभी उठकर निकलने लगते हैं तो फ़िल्म ख़त्म होने के बाद, क्रेडिट्स के भी बाद शुरू होता है एक गीत जो यूट्यूब पर उपलब्ध है …
“न कोई वहम,
ना बेरहम है यहाँ
ना कोई ज़ुल्म,
ना ही ज़ख्म है यहाँ
क्या कमाल है!
क्या कमाल है!
ना शिकायतें, ना सवाल है”!
बिल्कुल यही तो कमाल की ही बात है {व्यंग्यात्मक भाव-भंगिमा से गाया गया ख़ूबसूरत गीत} कि आज क्यों हमें कोई बेरहम नज़र नहीं आ रहा ? हम क्यों कोई भी जुल्मों-सितम नहीं देख पा रहे ? क्या हम किसी के ज़ख्मों पर मरहम लगाने के काबिल नहीं बचे ?
सच में ! “मैं खुद की फेवरेट हूँ” संवाद देने वाले इम्तियाज़ अली जब आज की दुनिया से सामना करते हैं तो पाते हैं कि इस सेल्फीयुग में अब न कोई किसी से शिकायत करते हैं, न ही किसी ज़ुल्म और ज़ख्म देखकर विचलित होते हैं, यह संवादहीनता की स्थिति नहीं है क्या ? उससे भी बड़ा संकट “हम रोना भूल चुके हैं”। दुःख को हमने सीने में छिपा रखा है । अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम माने जाने वाले सोशल मीडिया पर रोने के लिए कोई जगह नहीं !
सभी अपना बेस्ट और बेहतर ही चस्पां करते हैं, तस्वीरों के साथ । फिर दुःख कहेंगे भी किससे ? सुनने के लिए समय है किसी के पास ?

हम सुनना भूल चुके हैं धैर्य नहीं है !
“सारे सदमे रहते
अपनी हद में “…
वास्तव में सभी सदमें में हैं! इसलिए भी रुलाई नहीं छूट रही। हाँ, हँसी बेतहाशा निकल जाती है तभी तो कॉमेडियनस की भी बाढ़ आ गई है। निर्वैर भी कॉमेडियन बनाने की प्रक्रिया में है लेकिन सफल नहीं हो पा रहा । तो… तो हम रो क्यों नहीं पा रहे, क्या हमारे आँसू सूख गए? नहीं जी नहीं, हमारी संवेदनाएं सूख चुकी है! कैसे? नफरत के ज़हर ने ‘प्रेम-वृक्ष’ को, संवेदनाओं को डस लिया अब यह ‘प्रेम-वृक्ष’ लगातार तेज़ी से मुरझाता चला जा रहा है! आपको नहीं लगता कि प्रेम की लताएँ जो हर गली मोहल्ले में पहले तेज़ी से बढ़ा करती थी, बेख़ौफ़! अब उन्हें वो ज़मीन ही नहीं मिल रही !
हाल में एक समीक्षक ने लिखा कि “फ़िल्म देखकर दुनिया रो रही है जबकि इम्तियाज़ हँस रहा है” उनकी बात व्यंजना में है लेकिन मेरे लिए यह विशुद्ध अभिधा ही है। क्यों? क्योंकि इम्तियाज़ का मकसद ही था लोगों को रुलाना, लोग जो रोना भूल चुके है। उनकी संवेदनाओं के तारों को झंकृत करना ताकि आँसुओं की बरसात से मलबे के ढेर में परिवर्तित इस धरा पर कम-से-कम घास तो उग सके। इम्तियाज़ हँस रहे हैं वे खुश हैं कि रोने का बहाना मिल गया लोगो को! शायद आप भी मन हलका करने के लिए पहले कभी उदास “रोने-धोने” वाले गाने सुना करते रहे होंगे । जब मन खाली हो हल्का हो तो उसमें प्यार-मोहब्बत के बसने की गुंजायश बच जाती है । गीत की एक पंक्ति है –
ना शराफ़तों का ज़वाल है
ना मोहब्बतों का अकाल है
ज़वाल मतलब पतन। ऐसा नहीं कि सभी शरीफ़ मासूम लोग खत्म हो गए, उम्मीद बाकी है अभी और न ही इस दुनिया में मोहब्बतों का अकाल पड़ा है। बस ज़रूरत है मन में प्रेम का अंकुर प्रस्फुटित होने के लिए परिवेश तैयार करना ।
फ़िल्म में निर्वैर नाम {शत्रुता, द्वेष, या घृणा से रहित} रखने के भी तो मायने हैं – यदि कोई व्यक्ति ‘निर्वैर’ है, तो इसका मतलब है कि वह किसी के प्रति मन में बैर, घृणा, या बदला लेने की भावना नहीं रखता यह व्यक्ति नसीर का पोता है जो विभाजन के ज़हर को नफरत और द्वेष को बुझाना चाहता है । कर पाया ?
अगर अंत तक आते-आते यदि खुद-ब-खुद आँखों से आँसू निकल रहे हैं तो मान लीजिये संवेदना के स्रोत अभी बाकी हैं । सम्भावना, उम्मीद का दामन थामे निर्वैर ‘जिया’ को खोज लेता है जिया यानी ह्रदय जिसमें संवेदनाओं का दरिया समाया हुआ है अब दूसरी ही दुनिया की चीज़ हो चुका है । हमारे भीतर का करुण रस उसका स्थायी भाव “शोक” अभी बाकी है । करुण रस या करुणा? साहित्यिक दृष्टि से देखा जाए तो करुणा, करुण रस (शोक) का ही एक बाहरी रूप या प्रकटीकरण है। जब हम किसी दु:खी व्यक्ति को देखकर द्रवित होते हैं, तो उस संवेदना को करुणा कहा जाता है। उत्तररामचरित के रचनाकार संस्कृत साहित्य में महाकवि भवभूति ऐसे कवि थे जिन्होंने करुण रस को ‘रसराज’ माना था। उनका प्रसिद्ध कथन है- “एको रसः करुण एव निमित्तभेदात्” , अर्थात् मूल रूप से केवल एक ही रस (करुण रस) है, जो विभिन्न कारणों (निमित्तों) से अलग-अलग रूप धारण कर लेता है।
साहित्य और सिनेमा दोनों में ही रसराज ‘श्रृंगार रस’ को माना गया जबकि ज़मीनी हक़ीकत हमेशा अलग रही है। वैसे भी श्रृंगार दिखाने भर का ऊपरी आवरण भर है इम्तियाज़ की पहले की प्रेम कहानियों से बिल्कुल जुदा यह फ़िल्म प्रेम को करुण रस के साथ परोसती है यही उनकी सफलता भी है। अगर आप माने तो और यदि सह्रदय होंगे तो रसों के रहस्य को समझ पायेंगे अन्यथा ये तो मानकर चलिए कि हास्य रस भी समझना कोई हँसी खेल नहीं है ।
चलिए तो हास्य रस की बात चली है तो जैसा कि पहले कहा कि कॉमेडियन’स की बाढ़ आ चुकी है इस फ़िल्म में भी नायक निर्वैर सबको हँसाने का प्रयास कर रहा है और लोग नहीं हँसते लेकिन जब विभाजन की त्रासदी पर वह व्यंग्य-बाण छोड़ता है तो लोग ठाहके लगा कर हँसतें हैं। वाह री हँसी वाह ! फूटी भी तो कहाँ, त्रासदियों पर ! विचित्र विडंबना नहीं तो और क्या है ! सोशल मीडिया पर फैली हास्यास्पद रील्स जो हम देखते हैं उनमें अश्लील कंटेट, फूहड़ता से भरे मज़ाक, गालियों की बौछार रहती है जो दर्शकों को सराबोर कर रही हैं। इतनी अश्लीलता कि कईयों को जेल भी हो जाती है लेकिन वे वापस लौट आते हैं। पूरे ताम- झाम के साथ, जानते हैं दर्शक उन्हें मिस कर रहे हैं। वे कीनू थोड़े ही हैं कि वापस लौटने का वादा पूरा ही न कर पाए क्योंकि विभाजन हो गया था। वैसे स्टैंडअप कॉमेडियनस के जेल जाने की वज़हें कई बार सिर्फ अश्लीलता नहीं भी होती! …खैर! वो अलग पक्ष है।
तो क्या रह-सह कर जीवन में जो ‘रस’ बचा रह गया है वो है हास्य रस है, शायद नहीं। मेरी समझ में यह एक सूखा नशा है जो ज़्यादा खतरनाक है। एक पूरी पीढ़ी हास्य के इस डोपामिन में डूब रही है! खुद से सवाल करें कि क्या सचमुच मुट्ठी में कैद, दुनिया भर की सूचनाओं के बीच हास्य अथवा हास्यास्पद कंटेंट राहत दे रहा है? और हम सदमों को भूल जाते हैं, नहीं। कोक्ररोच नहीं है न हम ? शायद इसलिए सड़कों पर उतर आते हैं लेकिन वहाँ भी क्या “हिट” नहीं मिलता ? लाठियां और खून… लेकिन ये दूसरा डोपामिन है बल्कि पहला है जिसके हम अभ्यस्त हो चुके हैं – न्यू नार्मल ! हिंसा! जिसमें हमें आनंद आता है लेकिन अफ़सोस ये उत्तरकाण्ड का वीभत्स रस नहीं है। खून भरी देह, और खूनी लाल रंग न हमें विचलित करता है न उदास हमें ऐसा बना दिया गया, हम उदासीन हो चुके हैं।
तो इसलिए “मैं वापस आऊंगा” देखना जरूरी है कि यह फ़िल्म हमें रोना सिखा रही है हमारे भीतर की करुणा और संवेदना को उद्वेलित कर रही है| {दो दृश्यों को छोड़ दें} फ़िल्म हमारे स्थायी भाव शोक को जाग्रत करती है जिसे नफ़रत के ज़हर ने डस रखा है।
जेन ज़ी की बात नहीं करूँगी मैं मानती हूँ कि वे अल्ट्रा संवेदनशील हैं उनकी अभिव्यक्ति के तरीके जुदा हैं जिन्हें हम डी- कोड नहीं कर पा रहे शायद ! हाँ 70-80 की पीढ़ी जिनमें सहृदयता बाकी है इस फ़िल्म को पसंद करेगी ऐसा मुझे लगता है। आपकी अलग सोच हो सकती है। फिर 90 के दशक के बाद जो पीढ़ी आती है वह धीरे-धीरे प्लास्टिक होती रही है और प्लास्टिक ‘पृथ्वी’ के लिए खतरनाक है। इस ख़तरे को हमने नहीं पहचाना! अब जबकि खतरे दृश्यमान हो रहें है, तमाम युद्ध संसाधनों के लिए ही तो है! ज़मीन के लिए होने वाले युद्ध ! युद्ध में प्रेम? वो हाशिये पर चला गया, वो ‘प्रेम’ जिसके सूत्र करुणा से जुड़े हैं भवभूति वाला करुण रस। दया और करुणा का अंतर हम जानते हैं न? करुणा में बराबरी का भाव है, जिसमें कोई अहंकार नहीं होता इसमें दूसरे के दर्द को अपना दर्द समझना शामिल होता है। लेकिन अफ़सोस प्रेम के पीर में तड़पने वाला कीनू जब जिया के दर्द को समझे बगैर “कभी मुड़ के नहीं देखना” एक पुरुष दंभ के साथ कह तो आया लेकिन वो दर्द उसके भीतर ज़ज़्ब हो गया और वह पुन: तड़पता है।
आज बुद्ध के देश में करुणा लुप्तप्राय है ! इसलिए भी “मैं वापस आऊंगा” देखनी चाहिए… ये जो भारी मन लिए हम घूम रहे हैं न, हमारी करुणा ही हमें हल्का कर सकती है, हम सदमे से बाहर आ सकते हैं। तभी हमारे कदम तेज़ी से आगे बढ़ेंगे, न कि नफ़रत के भँवर में भटकते रहेंगे ।

“यारा, सुन ले ओ यारा
झगड़ों का मारा बेवजह
सारा जलता जहाँ ये
तेरा मेरा है, बचा लें इसे”
भारत दुर्दशा में भारतेंदु जी लिखते हैं “रोअहु सब मिलिकै आवहु भारत भाई। हा हा! भारतदुर्दशा न देखी जाई” विचित्र है न कि वे रोने के लिए लोगों का आह्वान कर रहे हैं ताकि दुःख पकड़कर न बैठे रहे बल्कि एक दूसरे का दुःख बाँटे जबकि सोशल मीडिया की साझा दीवार पर दुःख व्यक्त करना कमजोरी की निशानी है। इसलिए भी “मैं वापस आऊंगा” देखना निहायत ज़रूरी है कि सुप्तावस्था में हमारा शोक जागे और हम फूट-फूट कर रोयें , पृथ्वी को आंसुओं से भिगों दे।

एक समय था जब फ़िल्म समीक्षक कहा करते थे कि रुलाना बहुत आसान है जबकि हँसाना मुश्किल। दुःख भरे चेहरे पर हँसी की लहर लाना आसान नहीं लेकिन इन कॉमेडियनस को कोई भाव नहीं देता ! असल में तब के इंसान भी तो अत्यंत भावुक हुआ करते थे, शीघ्र ही पिघल जाया करते थे, अंत में खलनायक तक को माफ़ भी कर दिया करते थे लेकिन आज…हमारी भावनाओं का ही तो इतना शोषण हुआ कि हम सदमे में ही नहीं लगभग विक्षिप्तावस्था में हैं। दुःख दर्द कम ही समझते हैं। अगर मैं गलत न हूँ तो दो-दो विश्व युद्धों ने हमें बड़े-बड़े दार्शनिक, कलाकार चित्रकार दिए जो जीवन के मायनों को खोजते हैं लेकिन आज एक नहीं कई-कई विभाजनों की त्रासदियाँ सीने में दबाएँ हमारा युग रील्स स्क्रोल से खुश हैं। खुश है? और अंत में…

“कोई सूरत नज़र नहीं आती, आगे आती थी हाले-ए-दिल पर हँसी
अब किसी बात पर नहीं आती” कहने वाले ग़ालिब आज रहते तो क्या कहते…
“फ़साद – फूहड़ता तैर रही है सब ओर,
अब रुलाई नहीं, नहीं ही आती,
क्या सख्त-जान हो चुके हैं हम,
किसी चेहरे पर रुलाई नज़र नहीं आती…
आपका क्या विचार है… कि हँसना है तो क्यों न थोड़ा रो लिया जाए!

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