“भक्तिकालीन हिंदी साहित्य में स्त्री-अस्मिता कीअभिव्यक्ति : एक आलोचनात्मक अध्ययन”

शोध सारांश

भक्तिकालीन हिंदी साहित्य भारतीय साहित्य परंपरा का एक महत्वपूर्ण और सशक्त चरण है, जिसमें भक्ति, आस्था, सामाजिक चेतना और मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति गहराई से देखने को मिलती है। प्रस्तुत शोध आलेख “भक्तिकालीन हिंदी साहित्य में स्त्री-अस्मिता की अभिव्यक्ति : एक आलोचनात्मक अध्ययन” का उद्देश्य भक्तिकालीन साहित्य में स्त्री की स्थिति, उसकी अस्मिता, भावनात्मक स्वतंत्रता और सामाजिक चेतना के विविध रूपों का आलोचनात्मक विश्लेषण करना है। भक्तिकालीन साहित्य में स्त्री केवल उपेक्षित या परंपरागत भूमिका तक सीमित नहीं रही, बल्कि वह भक्ति, प्रेम, समर्पण और आत्मिक संघर्ष की सशक्त प्रतीक के रूप में उभरती है। ‘मीराबाई’ जैसी संत कवयित्रियों की वाणी में स्त्री-अस्मिता का निर्भीक और आत्मविश्वासी स्वर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। उनकी रचनाओं में स्त्री ईश्वर से सीधा संवाद करती है एवं सामाजिक बंधनों, पितृसत्तात्मक मूल्यों और रूढ़िगत परंपराओं को चुनौती देती है। पुरुष संत कवियों – जैसे कबीर, सूरदास और तुलसीदास – की रचनाओं में भी स्त्री पात्र विभिन्न रूपों में उपस्थित है। कहीं वह भक्त के रूप में आत्मसमर्पित है, तो कहीं सामाजिक नैतिकता और मर्यादा की वाहक। यह शोध आलेख इस तथ्य को भी रेखांकित करता है कि भक्तिकालीन साहित्य में स्त्री की छवि एकांगी नहीं है, बल्कि वह बहुआयामी और परिवर्तनशील है। शोध में यह भी स्पष्ट किया गया है कि भक्ति आंदोलन ने स्त्री को धार्मिक और आध्यात्मिक क्षेत्र में आवाज़ प्रदान की, जिससे उसकी अस्मिता को नया आधार मिला। यद्यपि सामाजिक स्तर पर स्त्री की स्थिति सीमित थी, फिर भी साहित्यिक अभिव्यक्ति में उसकी चेतना, भावनात्मक स्वतंत्रता और आत्मसम्मान को मुखर रूप मिला। इस प्रकार यह अध्ययन निष्कर्षतः यह स्थापित करता है कि भक्तिकालीन हिंदी साहित्य में स्त्री-अस्मिता केवल भक्ति तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना, आत्मबोध और मानवीय गरिमा की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है।

बीज शब्द : भक्तिकाल, हिंदी साहित्य, स्त्री-अस्मिता, संत काव्य, भक्ति आंदोलन

प्रस्तावना

          मानव सभ्यता की सम्पूर्ण संरचना स्त्री के अस्तित्व पर आधारित है| यदि संसार में स्त्री न होती, तो सृष्टि की कल्पना ही अधूरी रह जाती| स्त्री केवल जैविक अर्थों में जीवन की जननी नहीं है, अपितु वह संवेदना, संस्कार और सृजनशीलता की मूल धुरी भी है| उसके अभाव में मानव समाज का अस्तित्व, विकास और सांस्कृतिक निरंतरता संभव नहीं होती| इतिहास साक्षी है कि प्रत्येक युग में स्त्री ने सामाजिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक उन्नयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है| उसके बिना समाज संवेदनहीन तथा संस्कृति निष्प्राण व मानवीय मूल्यों से रिक्त हो जाता| इस प्रकार स्त्री केवल व्यक्ति या परिवार की नहीं, अपितु सम्पूर्ण सभ्यता की आधारशिला है| मार्कंडेय पुराण के अध्याय 81 के श्लोक संख्या 57 में स्त्री को सृष्टि की रचना करने वाली, उसका पालन करने वाली और अंततः उसका विनाश करने वाली के रूप में दर्शाया गया है –

विसृष्टौ सृष्टिरूपा त्वं स्थितिरूपा च पालने|

तथा संहृतिरूपान्ते जगतोऽस्य जगन्मये||1 

हिंदी साहित्य का भक्तिकाल भारतीय सांस्कृतिक इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण युग है। सामान्यतः 14वीं से 17वीं शताब्दी के मध्य का यह काल धार्मिक चेतना, सामाजिक जागरण और लोकभाषा के विकास का काल माना जाता है। इस युग में एक ओर निर्गुण भक्ति की धारा के संत कवि दिखाई देते हैं, तो दूसरी ओर सगुण भक्ति की माधुर्यपूर्ण काव्यधारा भी प्रवाहित होती है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल भक्ति के उद्भव के संबंध में कहते हैं कि – “भक्ति का जो सोता दक्षिण की ओर से धीरे-धीरे उत्तर भारत की ओर पहले से ही आ रहा था, उसे राजनीतिक परिवर्तन के कारण शून्य पड़ते हुए जनता के ह्रदय-क्षेत्र में फैलने के लिए पूरा स्थान मिला|”2  इस प्रकार भक्ति आन्दोलन केवल धार्मिक चेतना का ही परिणाम नहीं था, बल्कि उस समय की सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक परिस्थितियों से भी गहराई से जुड़ा हुआ था| भक्ति की यह धारा लोकजीवन से संबद्ध होकर साहित्य में भी व्यापक रूप से अभिव्यक्त हुई और हिंदी साहित्य में एक महत्वपूर्ण युग का रूप ग्रहण कर गई| भक्तिकाल को प्रायः आध्यात्मिक और धार्मिक दृष्टि से देखा जाता है, किंतु इस साहित्य में सामाजिक संरचना, जाति-व्यवस्था और सत्ता-चेतना के प्रश्न भी अंतर्निहित रूप से उपस्थित हैं। विशेषतः स्त्री-अस्मिता का प्रश्न भक्तिकालीन साहित्य में एक जटिल और बहुआयामी रूप में सामने आता है। भक्तिकालीन समाज सामंती संरचना, जातिगत ऊँच-नीच और पितृसत्तात्मक व्यवस्था से संचालित था। स्त्री की सामाजिक स्थिति प्रायः सीमित थी। उसे परिवार और समाज में अधीनस्थ भूमिका दी गई थी। शिक्षा, स्वतंत्रता और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी के अवसर बहुत कम थे। बाल-विवाह जैसी प्रथाओं के कारण स्त्रियों के लिए उच्च शिक्षा और स्वतंत्र विकास की सम्भावनाएं भी सीमित हो जाती थीं| फिर भी इस काल के कुछ साहित्यिक स्रोतों से यह संकेत मिलता है कि उच्च वर्ग की स्त्रियाँ, राजकुमारियाँ तथा गणिकाएँ संगीत, चित्रकला और काव्य जैसी ललित कलाओं में दक्ष थीं| सामान्यतः स्त्रियों को वेद-अध्ययन से वंचित रखा जाता था तथा उनके जीवन पर पिता, पति या पुत्र का नियंत्रण रहता था| स्मृतिकार भी कन्या के शीघ्र विवाह पर बल देते हुए कहते हैं कि –“माता-पिता को चाहिए कि 6 से 8 वर्ष की आयु के बीच या 8 वर्ष के बाद और रजस्वला होने से पहले कन्या का दान कर दें|”3 ऐसे समय में भक्ति आंदोलन ने व्यक्ति और ईश्वर के सीधे संबंध की बात कही। इसने मध्यस्थता और आडंबर का विरोध किया। यह विचार स्वयं में लोकतांत्रिक था। इसी लोकतांत्रिक चेतना ने स्त्री के लिए भी एक नई संभावनाओं का द्वार खोला। 

मध्यकाल में हिंदू राजाओं के आपसी संघर्ष और संगठन के अभाव के कारण विदेशी यवन शासकों को भारत पर आक्रमण करने का अवसर मिला| हिंदू शासक वीर होने के बावजूद एकजुट न होने के कारण बार-बार पराजित होते रहे| स्त्री चहारदीवारी में सीमित हो गई एवं उसका कामिनी रूप ही प्रमुख माना जाने लगा तथा अनेक युद्धों का कारण भी स्त्री ही बनती थी, जैसे संयोगिता स्वयंवर की घटना| धीरे-धीरे स्त्री का स्थान समाज में हीन तथा निम्न हो गया| आचार के बंधन तथा नियम पुरुषों के लिए नगण्य थे| राजाओं के अन्तःपुर में स्त्रियों का जमावड़ा लगा रहता था| एक पुरुष की कई पत्नियाँ थी जिससे गार्हस्थ जीवन भी प्रभावित होता था तथा पत्नी के रूप में भी स्त्री केवल पुरुष के मनोरंजन का साधन मात्र बनकर रह गई थी| प्राचीन युग की गौरवमयी, शक्ति-स्वरूपा स्त्री को पुरुषों के हाथों का खिलौना मात्र बना दिया गया था| समाज में बाह्याडम्बर बढ़ रहा था और अंधविश्वासों पर जनता की अटूट श्रद्धा थी| ऐसे में कबीर आदि निर्गुण संत कवियों ने इस सामाजिक कुप्रथाओं तथा दोषों को दूर करने का भरसक प्रयत्न किया| कबीर ने बाह्य आडंबरों का विरोध तो किया, किंतु स्त्री के प्रति उनकी दृष्टि कई बार विरोधाभासी दिखाई देती है। एक ओर वे आत्मा को ‘नारी’ और परमात्मा को ‘पति’ के रूप में रूपायित करते हैं, जिससे स्त्री-रूप आध्यात्मिक प्रतीक बनता है। दूसरी ओर कुछ स्थानों पर वे स्त्री को माया और मोह का कारण भी बताते हैं तथा स्त्री को साधक के मार्ग में बाधक भी मानते हैं| उदाहरण के लिए वे कहते हैं कि –

नारि नसावै तीनि सुख, जा नर पासै होई|

भगति मुकति निज ग्यान मैं, पैसि न सकई कोइ||4 

हिंदी साहित्य के आदिकाल से ही नारी-निंदा की प्रवृत्ति दिखाई देती है| नारी को ईश्वर प्राप्ति में बाधक माना जाता था| सिद्धों से प्रारम्भ होकर जैन, नाथ और बाद में हिंदी के संत कवियों तक यह प्रवृत्ति किसी न किसी रूप में उपस्थित रही| गोरखनाथ ने तो नारी के कामिनी रूप की कठोर शब्दों में आलोचना की और उसे सर्पिणी तथा बाघिनी जैसे रूपकों से संबोधित किया| यद्यपि वहाँ नारी-निंदा उतना तीव्र नहीं मिलता, जितना बाद में कबीर में दिखाई पड़ता है| चूँकि कबीर अपने समय के समाज में व्याप्त भोग-विलास और नैतिक पतन को देखकर चिंतित थे| वे देखते थे कि शासक वर्ग विलासिता में डूबा हुआ है और सामान्य जनता भी उसी का अनुकरण कर रही है| इसलिए उन्होंने लोगों को भोग-विलास से दूर रहने तथा काम, क्रोध, लोभ, मोह और तृष्णा जैसे विकारों से बचने की शिक्षा दी| इसी उद्देश्य से उन्होंने स्त्री के कामिनी रूप की निंदा करते हुए साधकों को सावधान किया है| वास्तव में संत कवियों द्वारा की गई यह नारी-निंदा केवल स्त्री की निंदा के लिए नहीं थी, बल्कि मनुष्य को सांसारिक आसक्ति से दूर कर आध्यात्मिक मार्ग की ओर अग्रसर करने के उद्देश्य से की गई थी| भक्ति परंपरा में कई स्थानों पर आत्मा को स्त्री और परमात्मा को पति के रूप में रूपायित किया गया है| इसी भाव को स्पष्ट करते हुए पाश्चात्य कवि न्यूमैन ने कहा है – “If the soul is to go on to higher spiritual blessedness, it must become woman – yes, however manly you may be among men”5 –  अर्थात मनुष्य कितना ही पुरुषार्थवान क्यों न हो, यदि वह उच्चतर आत्मिक आनंद प्राप्त करना चाहता है तो उसकी आत्मा को स्त्री रूप बनना ही पड़ेगा| दूसरी ओर यह भी ध्यान देने योग्य है कि संत कवियों की यह आलोचना सती-साध्वी नारी के लिए नहीं थी| माता, बहन और पतिव्रता पत्नी के रूप में स्त्री की उन्होंने अनेक स्थानों पर प्रशंसा की है और उसकी महिमा का गुणगान किया है| सच तो यह है कि वे स्त्री के इस पातिव्रत गुण से इतने अधिक प्रभावित हुए कि उन्होंने स्वयं को ही भगवान की पतिव्रता स्त्री मान लिया और इसी भाव से अपने ईष्ट की उपासना की| इसी भाव को व्यक्त करते हुए कबीर कहते हैं –

उस संम्रथ का दास हौं, कदे न होई अकाज|

पतिब्रता नाँगी रहै, तो उसही पुरिस कौ लाज||6 

संत कवियों की भांति भक्तिकाल के अन्य महत्वपूर्ण काव्य-प्रवृत्ति सूफी काव्यधारा में भी स्त्री के विविध रूपों की अभिव्यक्ति मिलती है| संत साहित्य में जहाँ स्त्री को कभी माया और भोग की प्रतीक मानकर उसकी आलोचना की गई, वहीं सती-साध्वी और पतिव्रता स्त्री के रूप में उसकी महिमा को भी स्वीकारा गया| इसके विपरीत सूफी कवियों ने स्त्री को मुख्यतः प्रेम, सौंदर्य और आध्यात्मिक साधना के प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठित किया| इस परंपरा में ईश्वर को अनेक बार स्त्रीरूप में कल्पित किया गया है और साधक को प्रेमाकांक्षी पुरुष के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो अपने प्रियतम – अर्थात् परमात्मा – को प्राप्त करने के लिए निरंतर प्रयास करता है| सूफी दर्शन में प्रेम के दो रूप माने गए हैं – इश्क मजाज़ी और इश्क हक़ीक़ी| इश्क मजाज़ी का अर्थ है लौकिक या सांसारिक प्रेम, जिसमें मनुष्य किसी स्त्री या पुरुष के प्रति आकर्षित होता है| किंतु सूफ़ी मत के अनुसार यही लौकिक प्रेम धीरे-धीरे साधक को उच्चतर आध्यात्मिक प्रेम अर्थात् इश्क हक़ीक़ी की ओर ले जाता है, जहाँ प्रेम का लक्ष्य स्वयं परमात्मा होता है| इस प्रकार सांसारिक प्रेम ईश्वर प्रेम का मार्ग बन जाता है| सूफी कवियों ने अपनी काव्य रचनाओं में स्त्री को इसी इश्क मजाज़ी का केंद्र बनाकर प्रस्तुत किया है, जिसके माध्यम से साधक अंततः इश्क़ हक़ीक़ी तक पहुँचता है| जायसी के पद्मावत में – मानुष प्रेम भयेउ बैकुंठी, नाहिं त काह छार एक मुट्ठी – कथन से स्पष्ट है कि मानव प्रेम ही वह साधन है जिसके माध्यम से मनुष्य आध्यात्मिक ऊँचाई प्राप्त कर सकता है| इसी प्रकार मंझन की कृति मधुमालती तथा कुतुबन की मृगावती में भी नायक-नायिका के प्रेम का वर्णन केवल कथा का भाग नहीं, बल्कि वह आत्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक है| आचार्य रामचंद्र शुक्ल का अनुमान है कि सूफ़ी कवियों ने जिन प्रेम-कथाओं का आधार लिया, उनमें से अनेक कथाएँ भारतीय लोकजीवन में पहले से प्रचलित थीं| सूफी कवियों ने उन्हें अपनी आध्यात्मिक दृष्टि के अनुसार रूपांतरित करके प्रस्तुत किया| इन कथाओं की एक विशेषता यह भी है कि उनमें केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षी और प्रकृति भी मानो प्रेम और करुणा की अनुभूति में सहभागी बन जाते हैं| किसी पात्र के दुःख या विरह में समस्त प्रकृति संवेदना से भर उठती है| एक कथा में विरह-वेदना का चित्रण करते हुए कहा गया है –

रोवै व्याधी बहुत पुकारी| छोहन ब्रिछ रोवैं सब झारी||

बाघ सिंह रोवत बन माहीं| रोवत पंछी बहुत ओनाहीं||7

इन पंक्तियों में यह संकेत मिलता है कि प्रेम की पीड़ा केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहती, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि को स्पर्श करती है| यही कारण है कि सूफी प्रेम-कथाएँ केवल मनोरंजन की कथा नहीं रह जातीं, बल्कि वे साधक की उस आध्यात्मिक यात्रा का प्रतीक बन जाती हैं, जिसमें वह अपने प्रियतम – अर्थात् परमात्मा – की प्राप्ति के लिए निरंतर संघर्ष करता है| इसी प्रेम-अनुभूति के आधार पर सूफ़ी संतों ने परमात्मा की कल्पना अनेक बार स्त्री अथवा पत्नी के रूप में की और स्वयं को उस प्रेम के आकांक्षी पति के रूप में देखा| इस प्रकार सूफी कवियों ने स्त्री को केवल भोग-वस्तु के रूप में नहीं, बल्कि प्रेम और आत्मिक उत्कर्ष की प्रेरक शक्ति के रूप में चित्रित किया है| 

          भक्तिकालीन हिंदी साहित्य में स्त्री अस्मिता की अभिव्यक्ति केवल सूफी काव्यधारा तक ही सीमित नहीं है| इसके पश्चात रामभक्ति काव्यधारा में भी स्त्री के विविध रूपों का उल्लेख मिलता है| रामभक्ति काव्य मुख्यतः मर्यादा, आदर्श और धर्म के आधार पर निर्मित काव्यधारा है। इस धारा के प्रमुख कवि तुलसीदास माने जाते हैं, जिनकी प्रसिद्ध कृति रामचरितमानस भारतीय समाज और संस्कृति पर गहरा प्रभाव डालती है। गोस्वामी तुलसीदास के संबंध में आचार्य रामचंद्र शुक्ल कहते हैं कि – “तुलसीदासजी उत्तरी भारत की समग्र जनता के ह्रदय-मंदिर में पूर्ण प्रेम-प्रतिष्ठा के साथ विराज रहे हैं| भारतीय जनता का प्रतिनिधि कवि यदि किसी को कह सकते हैं तो इन्हीं महानुभाव को|”8 रामभक्ति साहित्य में स्त्री का चित्रण प्रायः आदर्श नारी के रूप में किया गया है, जिसमें त्याग, पतिव्रत, धैर्य और समर्पण जैसे गुणों को प्रमुखता दी गई है। सीता, कौशल्या, कैकेयी, उर्मिला और शबरी जैसे पात्रों के माध्यम से स्त्री के विविध रूपों का चित्रण मिलता है| रामभक्ति काव्य में स्त्री का सबसे महत्वपूर्ण रूप सीता के रूप में सामने आता है। सीता भारतीय संस्कृति में आदर्श नारी की प्रतीक मानी जाती हैं। वे धैर्य, त्याग, पतिव्रत और मर्यादा का सर्वोत्तम उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। रामचरितमानस में सीता के स्वभाव का वर्णन करते हुए तुलसीदास लिखते हैं –

“पति अनुकूल सदा रह सीता| सोभा खानि सुसील बिनीता||

जानति कृपासिंधु प्रभुताई| सेवति चरन कमल मन लाई||”9

 इन पंक्तियों में सीता के स्वभाव को विनम्र, सुशील और पति के प्रति समर्पित नारी के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह चित्रण उस समय की सामाजिक धारणा को भी व्यक्त करता है, जिसमें स्त्री के आदर्श रूप में पतिव्रत और समर्पण को सर्वोपरि माना जाता था। रामभक्ति काव्य में स्त्री के मातृत्व और करुणा के रूप को भी अत्यंत महत्त्व दिया गया है। कौशल्या का चरित्र एक आदर्श माँ का प्रतीक है। राम के वनवास के प्रसंग में उनका करुणामय और वात्सल्यपूर्ण रूप दिखाई देता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि उस समय समाज में मातृत्व को अत्यंत पवित्र और सम्मानजनक माना जाता था| इसी प्रकार उर्मिला का चरित्र भी स्त्री के त्याग और धैर्य का प्रतीक है। लक्ष्मण के वनवास के दौरान उर्मिला का मौन त्याग स्त्री के धैर्य और सहनशीलता को दर्शाता है। यद्यपि रामचरितमानस में उर्मिला का वर्णन अपेक्षाकृत कम मिलता है, फिर भी उनका त्याग भारतीय नारी के आदर्श के रूप में देखा जाता है। हालाँकि रामभक्ति साहित्य में स्त्री को आदर्श और सम्मानजनक रूप में प्रस्तुत किया गया है, लेकिन आधुनिक आलोचनात्मक दृष्टि से इसमें कुछ सीमाएँ भी दिखाई देती हैं। उदाहरण के रूप में तुलसीदास की एक प्रसिद्ध पंक्ति अक्सर चर्चा का विषय बनती है – “ढोल गँवार शूद्र पशु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥” आधुनिक समय में इस पंक्ति की काफी आलोचना की जाती है। कई विद्वानों का मानना है कि यह उस समय की सामाजिक मानसिकता को दर्शाती है, जहाँ स्त्री को पुरुष की अपेक्षा निम्न स्थान दिया जाता था। हालांकि कुछ विद्वान इसे प्रसंगानुसार या लोकप्रचलित कथन के रूप में भी देखते हैं। इस प्रकार यदि सामाजिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि को ध्यान में रखकर रामभक्ति काव्य का अध्ययन किया जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि उस समय का समाज पितृसत्तात्मक था और स्त्री की भूमिका मुख्यतः पारिवारिक मर्यादाओं के भीतर निर्धारित थी। रामभक्ति साहित्य ने उसी सामाजिक व्यवस्था के भीतर स्त्री को आदर्श और सम्मानजनक रूप में प्रस्तुत किया। अंततः कहा जा सकता है कि रामभक्ति काव्य में स्त्री-अस्मिता की अभिव्यक्ति मर्यादा और आदर्श के दायरे में दिखाई देती है। यहाँ स्त्री की स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति सीमित है, किंतु उसकी नैतिक गरिमा और सामाजिक महत्ता को अत्यंत उच्च स्थान दिया गया है। इसलिए रामभक्ति साहित्य न केवल धार्मिक दृष्टि से, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक अध्ययन की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

रामभक्ति धारा में स्त्री के आदर्श, मर्यादा और पतिव्रत की अवधारणा को देखने के बाद भक्तिकालीन हिंदी साहित्य की दूसरी महत्त्वपूर्ण धारा—कृष्णभक्ति काव्य—की ओर बढ़ना आवश्यक हो जाता है। जहाँ रामभक्ति काव्य में स्त्री मुख्यतः आदर्श गृहिणी, पतिव्रता और मर्यादित नारी के रूप में चित्रित होती है, वहीं कृष्णभक्ति काव्य में उसका रूप अधिक भावनात्मक, स्वाभाविक और आत्मानुभूति से भरपूर दिखाई देता है। यही कारण है कि कृष्ण काव्य में स्त्री-अस्मिता का स्वर अपेक्षाकृत अधिक मुक्त और सजीव प्रतीत होता है| इस धारा के प्रमुख कवियों में सूरदास, नंददास, कुंभनदास तथा मीराबाई का विशेष स्थान है। इन कवियों ने कृष्ण के बाल-रूप, रास-लीला और प्रेम की अनुभूति को केंद्र में रखकर काव्य की रचना की। कृष्णभक्ति काव्य की विशेषता यह है कि इसमें स्त्री केवल सामाजिक आदर्श की प्रतीक नहीं रहती, बल्कि वह प्रेम की अनुभूति करने वाली एक स्वतंत्र भावनात्मक सत्ता के रूप में सामने आती है। गोपियाँ और राधा कृष्ण के प्रति अपने प्रेम और विरह को खुलकर व्यक्त करती हैं। यह प्रेम केवल लौकिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और आत्मिक अनुभूति का रूप ले लेता है। कृष्णभक्ति काव्य में स्त्री-अस्मिता का सबसे सशक्त रूप मीराबाई के काव्य में दिखाई देता है। उन्होंने सामाजिक मर्यादाओं और राजपरिवार की सीमाओं को तोड़ते हुए कृष्ण-भक्ति को अपने जीवन का केंद्र बना लिया। बच्चन सिंह कहते हैं कि – “गुजरात से लेकर समस्त हिंदी भाषा-भाषी प्रदेशों में मीरा जैसी लोकप्रियता शायद ही किसी को मिली हो| कहना न होगा कि वे समाज की जड़ता को तोड़कर स्वच्छंदता की राह दिखा रही थीं|”10 उनके प्रसिद्ध पद में यह आत्मिक स्वतंत्रता और अधिक स्पष्ट रूप में दिखाई देती है –

“पग घुंघरू बाँध मीरा नाची रे,मैं तो अपने नारायण की आपहि हो गई दासी रे।”11

इस पद में मीरा का नृत्य केवल भक्ति का प्रतीक नहीं है, बल्कि सामाजिक बंधनों से मुक्त स्त्री की स्वतंत्र अभिव्यक्ति भी है। यहाँ स्त्री अपने आध्यात्मिक प्रेम को निर्भीक होकर व्यक्त करती है। अन्य स्त्री भक्त कवियों में सहजोबाई का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है| उन्होंने अपनी वाणी में भक्ति और आत्मानुभूति को अत्यंत सहज और गहन रूप में व्यक्त किया। उनकी वाणी में स्त्री की आध्यात्मिक चेतना और आत्मविश्वास स्पष्ट दिखाई देता है। सहजोबाई के पदों में यह भावना दिखाई देती है कि भक्ति के मार्ग में स्त्री-पुरुष का भेद नहीं रह जाता। इसी प्रकार दक्षिण भारत की प्रसिद्ध भक्त कवयित्री आंडाल का उल्लेख भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। आंडाल ने विष्णु के प्रति अपने प्रेम और भक्ति को अत्यंत भावनात्मक रूप में व्यक्त किया। उनकी रचनाओं में स्त्री के प्रेम, समर्पण और आध्यात्मिक उत्कटता का अद्भुत संगम दिखाई देता है। आंडाल का काव्य यह दर्शाता है कि भक्ति आंदोलन ने स्त्री को अपनी अनुभूतियों को अभिव्यक्त करने का एक नया मंच प्रदान किया। इस प्रकार भक्ति आन्दोलन ने स्त्री को केवल पारिवारिक भूमिकाओं तक सीमित न रखकर उसे अपनी आध्यात्मिक अनुभूतियों और भावनाओं को व्यक्त करने का अवसर प्रदान किया| इन संत कवयित्रियों की वाणी में स्त्री का व्यक्तित्व केवल पत्नी या पारिवारिक भूमिका तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह एक स्वतंत्र आत्मा के रूप में उभरता है| महादेवी वर्मा का यह कथन अत्यंत सार्थक प्रतीत होता है – “वास्तव में स्त्री केवल पत्नी के रूप में ही समाज का अंग नहीं है, अतः उसे उसके भिन्न-भिन्न रूपों में व्यापक तथा सामान्य गुणों द्वारा ही समझना समाज के लिए आवश्यक तथा उचित है|”12

निष्कर्ष

उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि भक्तिकालीन हिंदी साहित्य में स्त्री-अस्मिता की अभिव्यक्ति एक बहुआयामी और जटिल रूप में सामने आती है। यह साहित्य केवल धार्मिक या आध्यात्मिक चेतना का ही प्रतिनिधित्व नहीं करता, बल्कि उस समय के सामाजिक और सांस्कृतिक यथार्थ को भी प्रतिबिंबित करता है। निर्गुण संत काव्य में जहाँ समानता और मानवीय चेतना का स्वर प्रमुख है, वहीं सगुण भक्ति की रामभक्ति धारा में स्त्री का रूप मुख्यतः आदर्श, पतिव्रता और मर्यादित नारी के रूप में सामने आता है। यहाँ स्त्री की गरिमा और नैतिक शक्ति को महत्व दिया गया है, परन्तु उसकी स्वतंत्र पहचान अपेक्षाकृत सीमित दिखाई देती है। इसके विपरीत कृष्णभक्ति काव्य में स्त्री की भावनात्मक अनुभूति, प्रेम और आत्मिक अनुभव को अधिक खुलकर अभिव्यक्ति मिली है। गोपियों और राधा के माध्यम से स्त्री-मन की सूक्ष्म संवेदनाओं का अत्यंत मार्मिक चित्रण हुआ है। विशेष रूप से मीराबाई, सहजोबाई तथा आंडाल जैसी स्त्री भक्त कवयित्रियों ने भक्ति को केवल आध्यात्मिक अनुभव तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे आत्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत पहचान के रूप में भी व्यक्त किया। उनके काव्य में स्त्री की स्वायत्त चेतना और सामाजिक बंधनों के प्रति एक सूक्ष्म प्रतिरोध दिखाई देता है।

सन्दर्भ सूची –

1 वृन्दावनदास, बा०, श्री मार्कंडेय पुराण, श्यामकाशी प्रेस, मथुरा, 1941, पृष्ठ 285

2 शुक्ल, आचार्य रामचंद्र, हिंदी साहित्य का इतिहास, द्वितीय विश्वविद्यालय प्रकाशण, वाराणसी, 2017, पृष्ठ 39

3 चन्द्र, सतीश, मध्यकालीन भारत, ओरियंट ब्लैकस्वान, हैदराबाद, 2016, पृष्ठ 45

4 दास, श्यामसुंदर, कबीर ग्रंथावली, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण 2010, पृष्ठ 79

5 माधव, भुवनेश्वरनाथ मिश्र, संत-साहित्य, ग्रन्थमाला-कार्यालय, बाँकीपुर, संस्करण 1941, पृष्ठ 250

6 दास, श्यामसुंदर, कबीर ग्रंथावली, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण 2010, पृष्ठ 63

7 शुक्ल, आचार्य रामचंद्र, हिंदी साहित्य का इतिहास, द्वितीय विश्वविद्यालय प्रकाशण, वाराणसी, 2017, पृष्ठ 46

8 वही, पृष्ठ 88

9 रामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, गीताप्रेस, गोरखपुर, सं० 2071, पृष्ठ 933

10 सिंह, बच्चन, हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, अट्ठारहवां संस्करण 2025, पृष्ठ 135

11 वही, पृष्ठ 135

12 वर्मा, महादेवी, शृंखला की कड़ियाँ, साधना-सदन, प्रयाग, तृतीय संस्करण 1944, पृष्ठ 153

मनीष कुमार दुबे

शोधार्थी, हिंदी विभाग, झारखंड केन्द्रीय विश्वविद्यालय, राँची

Email: dubeym964@gmail.com

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