रीतिकालीन कविता और स्त्री यौनिकता विमर्श

            हिंदी साहित्य का उत्तर मध्यकाल ही रीतिकाल के नाम से जाना जाता है‌। मुगल साम्राज्य की जड़ें जमने के बाद एक व्यवस्थित दरबारी संस्कृति का उदय हुआ और मुगल दरबार की देखा-देखी अन्य छोटे-मोटे राजाओं ने भी दरबार सजाने और कवियों को उसमें आमंत्रित करने की प्रथा का निर्वाह किया। श्रृंगार प्रधान काव्य तथा नायक-नायिका भेद ,नख-शिख वर्णन एवं विविध क्रीड़ाओं का रसमयी शैली में विवेचन इस युग में किया गया है। रीतिकालीन साहित्य में भक्ति जैसी प्रमुख प्रवृति का स्थान श्रृंगार ले लेता है और उस श्रृंगारिक वर्णन पर अनेक आरोप आक्षेप लगाकर उसे अश्लील भी कहा जाता है। परंतु ऐसा क्यों ? रीतिकाल का कवि या साहित्यकार घोर श्रृंगारी क्यों हुआ?  उसने ऐसी कविता लिखने की प्रेरणा कहांँ से और कैसे पाई? इस संबंध में श्री सुधीश पचौरी अपनी पुस्तक “रीतिकाल सेक्सुअलिटी का समारोह” में लिखते हैं – हिंदी साहित्य के इतिहास में रीतिकाल के विमर्श के रूपों को पढ़ते हुए एक सवाल का उत्तर कभी नहीं मिलता। यह सवाल रीतिकाल में स्त्री देह और उसकी उत्कट यौनमूलकता की विकट उपस्थिति से संबंधित है। 

… इसे इतिहासकारों ने नायिका भेद या श्रृंगार या नखशिख वर्णन का नाम दिया।…स्त्रीत्ववादी विमर्श के एकमात्र चरण के रूप में नहीं लेकिन एक खास चरण में स्त्री देह के ‘खोने’ या ‘गायब किया जाने’ और ‘पाने’ और फिर उसके अपने स्वत्व को पाने की नई और लम्बी लड़ाई से क्या स्त्री सम्बन्धी रीतिकालीन यौनमूलक निर्मितियों का कोई सम्बन्ध बनता है? बन सकता है?”

            यौनिकता-विमर्श निस्संदेह एक बायोलॉजिकल संदर्भ पर केन्द्रित है लेकिन इस विमर्श की परिधि में भूगोल विशेष के सामाजिक व सांस्कृतिक कंस्ट्रक्ट्स भी शामिल होते हैं। स्पष्ट है कि सामाजिक व वैयक्तिक दो विपरीत ध्रुवों से संबद्ध यौनिकता में स्त्री व पुरुष की अवस्थिती भी उतनी ही विपरीत व वैभिन्यपूर्ण होगी। इसलिए आधुनिक विमर्शों में स्त्री-स्वातंत्र्य के साथ ही स्त्री सेक्सुएलिटी का विमर्श भी अस्तित्व में आया।

             हिंदी साहित्य के रीतिकाल में इन आधुनिक विमर्शों के इतिहास की प्राक्कल्पना के लिए पर्याप्त व विस्तृत अध्ययन सामग्री उपलब्ध है। अपनी श्रृंगारिकता, स्थूलता, दैहिकता और सौन्दर्य – केन्द्रीयता के कारण रीतिकाल की आक्षेपग्रस्त कविता अपने समय का पहला यौनिकता का प्रगल्भ इतिहास सामने रखती है। फूको ने हिस्ट्री ऑफ सेक्सुएलिटी की पृष्ठभूमि में जिस महानतापूर्ण, दंभपूर्ण, प्रपंचकारी सामाजिक परिवेश की बात की है वही परिवेश रीतिकाल की कविता की पृष्ठभूमि का भी रहा। इस लेख के माध्यम से हम रीतिकालीन यौनिकता पर पुनर्विचार का प्रयास कर रहे हैं। रीतिकाल को उन्नीसवीं सदी के आखिरी दिनों और बीसवीं सदी के शुरू के दिनों से लेकर आज तक श्रेष्ठता के क्रम में अगर नीचे रखा गया है तो उसके पीछे विक्टोरियाई ब्राह्मणीकल  पुल्लिंगी नैतिक विमर्श रहे हैं जिससे कि स्त्री पर नियंत्रण रखने के तरीके मजबूत हो सकें। स्त्री की आज़ादी, उसकी अधिक दृश्य मानता, आर्थिक स्वतंत्रता, निर्णय लेने की क्षमता आदि को पश्चिम के बुरे असर और ग्लोबलइजेशन आदि का प्रभाव बताकर अपनी संस्कृति, परंपरा आदि के मूसल से कूटते रहते हैं। हिंदी का पाठक रीतिकाल को पढ़ते हुए स्त्री के होने और उसकी यौन सक्रियता को लेकर सहज नहीं महसूस करता और रीतिकालीन साहित्य को पतित मानकर चलता है।

             आलोचकों इतिहासकारों आदि ने प्रायः रीतिकालीन काव्यों विशेष रूप से लक्षण ग्रंथो को संस्कृत ग्रंथों का अनुकरण, अनुवाद मात्र बताया है। यहीं पर यह प्रश्न उठता  है कि रीतिकालीन लक्षण ग्रंथों में वर्णित नायिका-भेद की नायिका क्या लक्षण ग्रंथ लिखने वाले दरबारी कवियों की कल्पना भर है?  या यूँ कहें कि रीतिकाल की कविताओं की नायिकाओं में रीतिकालीन कवियों के अपने जीवन के अनुभव शुमार ही नहीं हैं। यह बात न केवल विश्वास के योग्य नहीं है अपितु बहुत ही विचित्र भी है कि रीतिकालीन कविता लगातार अश्लील कहे जाने, नकली और बनावटी होने, फरमाइशी होने तथा सामाजिक संवेदना का अभाव होने आदि आरोपों की सजा पाती रही और इसी के साथ वे तमाम नायिकाएँ निर्जीव कर दी गईं जो किसी समय जीती जागती रही होंगी। 

             ‘रीतिकाल’ नामकरण श्रृंगार को जितना समेटता है उतना ही काव्य-शिक्षा को समेटता है। रीतिकाल में साहित्यकारों के यही दो कार्य हैं- श्रृंगार की सफल शिक्षा और काव्य करने की शिक्षा। श्रृंगार की शिक्षा को यौनता की शिक्षा कहा जा सकता है। यह महत्वपूर्ण बात है जिस पर थोड़ा ठहरकर, समय लगाकर सोचना चाहिए और यौनता की शिक्षा के नये सामाजशास्त्र के आलोक में इसे समझने का प्रयास होना चाहिए। यहाँ यह भी ध्यातव्य है कि रीतिकालीन कवि यौनता पर लगातार बात करते हैं किन्तु उनकी सीमा उनकी अपनी पुरूषवादी दृष्टि है। वे स्त्री यौनता की बात पुरूषवादी मानसिकता से ही करते हैं लेकिन इस प्रक्रिया में यौनता का, स्त्री यौनता और स्त्री देह का जबर्दस्त निर्माण होता है। यौनता की शिक्षा का मतलब सिर्फ़ यौन शिक्षा भर नहीं है। इन दिनों यौनता की शिक्षा का मतलब ऐसी सूचना से है जो जीवन के कार्यों यथा निर्णय लेने की क्षमता और संचारात्मक क्षमता को प्रदान करती है। यौनता की शिक्षा जीवन के अन्य कला कौशलों की शिक्षा की तरह ही है।

                रीतिकालीन काव्य में श्रृंगारिकता, नायिका भेद, सौन्दर्य-वर्णन, देह-चित्रण व सामाजिक सांस्कृतिक संबंधों के डिकोडीकरण के माध्यम से उस काल की सेक्सुएलिटी व उसमें स्त्री-सेक्सुएलिटी का अध्ययन किया जा सकता है। मध्यकालीन सामंती परिवेश में राग-रंग संगीत कलाओं की तरह कविता में स्त्री का पण्यकरण करने की प्रवृत्ति दिखाई देती है जहांँ आनंद केवल पुरूष केन्द्रित अवधारणा है व स्त्री के जन्म व वजूद का अंतिम लक्ष्य आनंद का सृजन करने वाली वस्तु मात्र है। भक्तिकाल के विलुप्त आध्यात्मिक संदर्भ तथा दरबारी अभिवृत्ति से जनित विलास-भावना के कारण उपजी कविता में स्त्री एक प्राणहीन , संवेदनाहीन आलम्बन ही बनकर रह गई है। यहाँ मुगलकाल में होने वाले कुछ महत्वपूर्ण समाजिक , आर्थिक परिवर्तनों पर भी गौर करना ज़रूरी है जिनके चलते भक्ति आंदोलन और भक्तिकाव्य के बाद नितान्त ऐहिक कामनाओं से  प्रेरित, नितांत भौतिक(फिज़िकल) कविता से युक्त रीतिकाल पैदा हो गया, जिसमें  भक्ति सिर्फ़ एक विचार भर रह गया। उत्तर मुगलकाल में सत्ता का विकेन्द्रण हुआ और कविता से समाज की अपेक्षाएँ बदलीं। शिल्पकारों, श्रमिकों का काम बढ़ा। कविता धर्म और मंदिर को छोड़कर दरबार में आ गई। कविता का स्पेस और एजेंडा दोनों ही बदल गए। 

               देव ने रीतिकालीन कविता की ‘यौनता’ (सेक्सुअलिटी) का घोषणापत्र इन शब्दों में घोषित किया 

        “काम अन्धकारी जगत, लखै रूप कुरूप!

         हाथ लिए बोलते फिरत, कामिनी छरी अनूप!!

         तातैं कामिनी एक ही, कहना सुनन को भेद

         राचै पागै प्रेम रस, मेटै मन के खेद !!

         रची राम संग भीलनी, जदुपति संग अहीरि!

         प्रबल सदा बनवासिनी, नवल नागरिन पीरि!!

         कौन गनै पुर बन नगर, कामिनी एकै रीति!

         देखते हरै विवेक कों, चित्त हरै करि प्रीति!!”

देव के इन दोहों को पढ़ने से यह सहज ही स्पष्ट है कि उनकी दृष्टि न केवल ‘काम अंधकारी जगत’ पर है अपितु  पुर, वन, नगर(यत्र-तत्र सर्वत्र) में कामिनी, की प्रबल उपस्थिति पर भी है । अभिप्राय स्पष्ट है कि काम और कामिनी की उपस्थिति सर्वत्र देखी जा सकती है। 

             मतिराम, देव, पदमाकर आदि कवियों के लिए श्रृंगारिकता ऐन्द्रिकता के उत्सव से कम नहीं थी। यौनिकता के देह व सौन्दर्य से इस कदर अंर्तर्भाक्ता हो जाने से स्त्री की यौनिकता के लिए पूर्ण नकार का परिवेश था। स्त्री जन्म की सार्थकता मानो अपने रूप-सौन्दर्य तथा काम कला में प्रवीणता द्वारा पुरुष/नायक की यौनिकता को उदबुद्ध  करने में ही थी। प्रेम व श्रृंगार की फाक यहांँ स्पष्ट दिखाई देती है, सौन्दर्य जनित आकर्षण से उपजे प्रेम में प्रायः ऐन्द्रिकता का प्राधान्य और बलिदान समर्पण और रोमानी साहसिकता का प्रायः अभाव होता है। काममय होते हुए भी रीतिकाव्य काम को प्रवृति से अधिक कुछ नहीं मानता और उसके द्वारा उद्बुद्ध जीवन की गहन मनोवैज्ञानिक और सामाजिक समस्याओं से वह अनभिज्ञ है। गांभीर्य के अभाव तथा एकांगिता के कारण ही रीतिकाल पर आक्षेप लगते रहे हैं तथा सेक्सुअलिटी व जेंडर विमर्श व स्त्री स्वातंत्र्य आधुनिक विमर्शों के आलोक में रीतिकाल के साथ हीनता का मूल्य आ जुड़ता है।  “इस काल की श्रृंगारिकता में अप्राकृतिक गोपन अथवा दमन से उत्पन्न ग्रंथियांँ नहीं हैं, उसमें स्वीकृत रूप से शरीर सुख साधना है , जिसमें न अध्यात्मिकता का आरोप है न वासना के उन्नयन अथवा प्रेम को अतीन्द्रीय रूप देने का उचित अनुचित प्रयत्न। … इसका परिणाम यह हुआ कि काम जीवन का अंतरंग साधक तत्व न रहकर बहिरंग साध्य बन गया।”  इस काल के यौनिक वर्णनों में समाज व सांस्कृतिक संरचना स्त्री को वासना के केंद्र में प्रतिष्ठित कर रहे हैं व स्त्री के यौनिक अस्तित्व को हाशिए पर धकेल रहे हैं। तत्कालीन सामाजिक व साहित्यिक परिवेश में स्त्री के अस्तित्व के कोई चिह्न नहीं दिखाई देते। देह व सौन्दर्य के चित्रणों में स्त्री वस्तुकृत कर दी गई है। स्त्री-देह, संवेदना,काम-स्वीकृति, शारीरिक स्वातंत्र्य व शरीर की छवि-निर्माण में स्त्री की भूमिका को भी दरकिनार किया गया है। इस देह विमर्श में स्त्री के गर्भाशय की उपस्थिति कविता की कल्पना से बाहर की बात है, इसलिए इस कविता में मातृत्व के चित्र नहीं मिलते।

                     नायिका-भेद की परिपाटी वस्तुतः रीतिकालीन  समाज की विकृत मानसिक  संरचना को सूचित करती है। स्वकीया, परकीया, वैश्या आदि भेदों से स्त्री के प्रति उपभोगवादी समाजिक नजरिया उजागर होता है। इस विभेदीकरण का निहितार्थ यह है कि पारिवारिक संरचना में अपने स्थान के लिए संघर्ष करती स्त्री को अपना स्थान तभी मिल सकता है जब वह रूपवती व कामप्रवीण होकर नायक के लिए काम्य हो। इस काल में नायिका केवल पत्नी, उपपत्नी, भाभी, बहू, सखी रूप में है – मांँ,  बेटी,  बहन,  या समाजिक रूप से सक्रिय और कर्मशील रूपों के चित्र नगण्य हैं । रीतिमुक्त काव्य में चूंँकि दैहिकता का प्राधान्य नहीं है इसलिए वहांँ प्रेम की सहजानुभूति के वर्णन मिलते हैं।

                         इस काल की कविता में यौन शक्ति बढ़ाने के लिए नायक के वैद्य के पास जाने, वैद्य-वधू का स्वपति के अक्षम होने के कारण पड़ोसी से गर्भ धारण करने, पुरुष की पतत्रि में जारज संतान का योग होने, स्त्री व देवर के बीच गुप्त प्रेम होने, पारिवारिक वातावरण में रति-निमंत्रण के लिए तरह-तरह के उपाय करने, सखियों द्वारा यौन शिक्षा दिए जाने जैसे कई चित्र उपलब्ध हैं। किन्तु उनसे उस काल की सेक्सुएलिटी के स्त्री पक्ष का कोई मज़बूत स्वरूप उभर कर सामने नहीं आता। न ही उस समय के समाज की सेक्सुअल ओरिएंटेशन की उपरोक्त विमर्श से भिन्न कोई अन्य दृष्टि ही दिखाई देती है। जैसे स्त्री समलैंगिकता के संकेत मात्र खोजे जा सकते हैं लेकिन प्रायः यह एक वर्जित विषय था। यहाँ यौनिकता जैविक क्रिया मात्र है, उसके साथ यौनिक आइडेंटिटी का आयाम जोड़ा भी है तो वह भी पुरुष केन्द्रित है । वस्तुतः इसी की प्रतिक्रिया स्वरुप आगामी कालों में रीतिकाव्य प्राय: उपेक्षा का भागी रहा और उसे नीतिभ्रष्ट कहकर  तिरस्कृत किया गया। किन्तु यहांँ यह भी ध्यातव्य है कि रीतिकालीन कविता का चरित्र पुरुष केन्द्रित भले ही रहा हो किन्तु उसके चलते स्त्री-अधिकारों, स्त्री-अस्तित्व, स्त्री- यौनिकता जैसे मुद्दों पर सवाल उठने लगे। नवजागरण काल तथा उसके आगे आने वाले साहित्यिक आंदोलनों/काल खण्डों में स्त्री समानता तथा स्त्री आंदोलनों का जन्म हुआ। सेक्सुएलिटी की अवधारणा लगातार बन-बिगड़ तथा बदल रही है। भौगोलिक,  सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक, कानून आदि की सहायता तथा हस्तक्षेप से इसे पुनर्परिभाषित किया जा सकता है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि रीतिकालीन काव्य के ज़रिए स्त्री-देह-विमर्श, जेंडर विमर्श, यौनिकता विमर्श आदि तमाम महत्वपूर्ण मुद्दों पर सजग तथा साथर्क विश्लेषण किया जा सकता है।

 संदर्भ –

  1. डॉ. नगेन्द्र, रीतिकाव्य की भूमिका, नेशनल पब्लिशिंग हाउस 
  2. आ.विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, हिंदी साहित्य का अतीत, भाग-2
  3. आ.रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास,नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी 
  4. सुधीश पचौरी, रीतिकाल सेक्सुअलिटी का समारोह, वाणी प्रकाशन 
  5. डॉ.रामस्वरूप चतुर्वेदी, हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, लोकभारती प्रकाशन 

 – डॉ. शगुन अग्रवाल

    एसोसिएट प्रोफेसर 

  श्यामा प्रसाद मुखर्जी महिला 

    महाविद्यालय दिल्ली, विश्वविद्यालय    

  ईमेल– shagagar945@gmail.com

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