फूलमती का वसंत ऋतु

कहानी : श्यामत भट्टाचार्य                                अनुवाद : कुमार शाश्वत

कोयल के लिए जैसे वसंत होता है, वैसे ही काश फूलों के लिए शरद ऋतु होता है। बहुत से लोगों के जीवन में सब ऋतुओं में कोयल की कुहुक और वसंत छाई रहती हैं, परन्तु कुछ लोगों के जीवन में पूरे साल शरद ऋतु बनी रहती हैं। पतझड़ के पत्तों की तरह जीवन की सारी खुशियाँ एक-एक कर वृक्ष से अलग हो जाती हैं, दुर-दुर तक, वसंत का कोई नामोनिशान नहीं होता। अकेला वृक्ष चुपचाप ठंडी हवाओं के बीच खड़ा रहता है, अपने भीतर की ऊर्जा को समेटकर वसंत के इंतज़ार में।

            फूलमती पिछले पंद्रह दिनों से सौ रुपये का एक नोट लेकर परेशान है। कुछ दिन पहले आँचल की गाँठ खोलकर ढाई सौ रुपया छीका की पतीली में और एक सौ रुपया अपने बिस्तर के नीचे चटाई के ऊपर रखी थी। रुपया पैसा कभी एक जगह नहीं रखना चाहिए, अलग-अलग रखने से एक खो जाने पर भी दूसरा रह जाता हैं। उसके पिता ऐसा ही कहा करते थे।

            वह राजाओं के जमाने में राजप्रसाद के पुराने फर्नीचर की मरम्मत किया करते थे। नए फर्नीचर पर अपने कुशल हाथों से नाना प्रकार की पौराणिक घटनाओं को उकेर कर नक्काशी किया करते थे।

            अब न तो राजा रहें, न राजाश्रय रहा। देश आजाद हो गया। बड़े लड़के ने दौरे पर आए भूतपूर्व राष्ट्रपति को राज्य के काष्ठ शिल्पियों की तरफ से लकड़ी का बना एक कमल का फूल भेंट किया था। शायद इसी वजह से उनको पद्मश्री मिला हैं। अब वह एक विशाल एंपोरियम खोलकर कलकत्ता वासी हो गए हैं। मंझले लड़के के हाथ में भी हुनर है, विवाह की वेदी से लेकर पलंग-चेयर, ड्रेसिंग टेबल, अलमारी में नक्काशी का काम, सब कुछ कर सकते हैं। छोटे वाले पढ़ते थे, इसके अलावा उन्हें खानदानी पेशा पसंद न था, आजकल वह न जाने किसकी सिफारिश से प्राइमरी स्कूल में मास्टर हैं।

            फूलमती सबसे छोटी है। उसकी शादी में तीनों भाइयों ने खूब खर्च किया है। फूलमती के ऊपर के दो दांत होठों के बाहर निकलें होने की वजह से वर पक्ष को एतराज़ था, परंतु रुपया जो न कराए। नगद के अलावा साइकिल, घड़ी, महंगे लकड़ी के ऊपर नक्काशी किया हुआ पलंग और अलमारी दिया गया। फूलमती को आज भी उन दिनों को याद कर रोना आता हैं।

            तब फूलमती सचमुच फूलमती थी, जैसा नाम वैसा ही कोमल मन। कितनी नासमझ थी वह तब ? गोमती नदी को करीब पाकर समझती थी जैसे स्वर्ग मिल गया। गोमती के उस पार जंगल है। जंगल के बीच है, जले हुए मकान की तरह खंडहर हो चुका राजप्रसाद और एक पुराना मंदिर। किसी समय इसी मंदिर के प्रांगण में नरबलि होता था। खून से लाल नाला नदी की धारा में मिल कर उसको भी लाल कर देती थी। अब और खून नहीं बहता। शायद लोग सोचते हैं कि गोमती का पानी लाल माटी बहा कर लाती हैं इसलिए लाल हैं। परन्तु फूलमति को लगता है कि यह धारणा ग़लत हैं। गोमती के घाट पर बर्तन धोना, कपड़े धोना, उसके प्रवाह में गुब्बारे की तरह कपड़े फूला कर तैरते रहना, बिना हाथ-पाँव चलाकर चुपचाप पानी में बहते रहना और लहरों के उल्टी दिशा में लौटना, न जाने कहां गए वे दिन।

            आजकल फूलमती के साथ अक्सर ऐसा होता हैं। मौक़ा मिलते ही अतीत उसके पेट के घाव की तरह कष्ट देता हैं। तैर कर गुज़ारे बचपन के दिन किसी तेज ज्वलनशील द्रव्य की तरह लगते हैं। दर्द बढ़ने पर फूलमति छटपटाने लगती हैं। बनिए के दुकान से खाने का सोडा लाकर, जब तक खा न लें, उसे आराम नहीं मिलता। वैसे भी काम का बोझ न होने पर स्मृति उसे कष्ट देती हैं। इसीलिए फूलमती जब तक नींद न आए, काम में डूबे रहना चाहती हैं। लेकिन दो दिन पहले उसकी ऊँगली कट गयी हैं। तब से मौका पाकर अतीत उसे जब-तब दबोच लेती हैं।

          बृजेश भी बढ़ई था। शादी के पहले फूलमती की सहेलियाँ उसका होठ दबाकर कहती – बिन माँ-बाप का हैं तेरा दूल्हा, अपने चाँद को संभालकर रखना ! सुनकर फूलमती को डर लगता। उसका भय दांतों के लिए था। यह भय एक दिन, दो दिन, सप्ताह और महीने बाद संक्रामक हो जाता हैं। उसके पति ने एक बार भी उसका चुंबन नहीं लिया, जैसे एकदम साधु पुरुष है। अगर एक बार भी न छूतें तो कुछ और बात होती, परन्तु हर रात एक बैल पील परता फूलमती के ऊपर। कोई प्यार नहीं, केवल यान्त्रिक अत्याचार ! कार्बाईड डालकर कटहल पकाने की तरह। वह आग लगाकर दूसरी तरफ़ निढाल हो जाता। फूलमती की भी एक इच्छा – अनिच्छा हो सकती है, वह इस बात से बेखबर रहता। बस हाथ पांव फैलाकर सो जाता। तब फूलमती चुपचाप दरवाज़ा खोलकर दबे पाँव घाट पर पहुँचकर पानी में उतर जाती। प्रायः गोमती के छाती भर पानी में आधी रात सरक जाती सुबह की तरफ़।

            तब भी फूलमती का कष्ट सहने लायक था। अलग-अलग आकार के चाँद वाले आकाश में तारों की मंद मंद मुस्कुराहट, मेघों का उड़ना या हवा की गति, उसकी सारे कष्ट हर लेती। सुबह होने के पहले वह एक बार फिर बिस्तर पर लौट आती। पड़ोस के लुहार की बहू खूब सबेरे बर्तन धोने घाट पर चली आती, फिर स्नान करती। कितनी मीठी हँसी थी उस औरत की। एक दिन लुहार की बहू बूढ़े कटहल के पेड़ के नीचे खड़ी होकर उसे बुलाती है। उस दिन उसके चेहरे पर मुस्कान न थी। उसके हाव-भाव मे कुटिलता झलक रही थी। – बढ़ई की बहू, मैं कई दिनों से देख रही हूँ, तुम हर रात पानी में उतर कर देर तक बैठी रहती हो ! सुनकर फूलमती को शर्म आती हैं, वह नज़रें झुका लेती है। फिर क़रीब आकर लोहार की बहू उसके कंधे पर हाथ रख कर कहती हैं, – एक बात कहूँ, बुरा मत मानना, बढ़ई तुम्हें संतुष्ट नहीं कर पाता और दूसरी तरफ़ …! उसके शब्दों में मानो आग हो। फूलमति के दोनों कान, सारा शरीर उसी क्षण गर्म हो जाता है। ललाट के दोनों तरफ धड़ाम-धड़ाम हथौड़े की चोट पड़ने लगती हैं।

            बृजेश का संबंध किसी बूढ़े आदमी की जवान औरत से हैं। उस दिन से फूलमती, अब फूलमती न रही, उसकी मति पलट गई। उस दिन बर्तन ठीक से साफ़ नहीं हुए, चूल्हे का आग ठीक से न जला, चूल्हा फुकने में बेचैनी बढ़ गई, पूरा घर धुएं से भर गया। उस दिन बृजेश नमकीन दाल के साथ जला हुआ भात खाकर काम पर गया। सिधलभर्ता में इतनी अधिक मिर्च थी की बृजेश खाते-खाते गाली बकता रहा। उसकी आंखें मिर्च, गुस्से और धुएं से लाल हो गई। आधा खाकर थाली को ठोकर मारकर उठ गया। इन सब के बीच फूलमती का गुस्सा बढ़ता जाता हैं। मन होता है थाली उसके मुँह पर दे मारे। रो-रो कर उसकी आंखें सूज गई हैं। पूरा घर धुएं से भर गया है। अंधों की तरह बड़े कोठरी में आकर देखती हैं कोठरी खाली हैं। बृजेश काम पर चला गया हैं। फूलमती असहाय की तरह लकड़ी की चौकी पर बेबस होकर बैठ जाती हैं। बहुत देर तक ऐसे ही बैठी रहती हैं। फिर अपने चमड़े के सूटकेस से कलम और पिता के घर से लाए रूलदार कागज निकाल कर लिखना शुरू करती हैं। तीन लाईन लिखती तो एक लाइन काटती। इस तरह लिखते-लिखते, काटते-काटते, बीच-बीच में आंखें भर आती। फूलमती साड़ी के आँचल से आँखें पोछकर फिर लिखना शुरू करती है। इसी बीच कब उसके पीछे की खिड़की से धूप चला गया, पता ही न चला।

            आठ-दस पन्ने लिखने के बाद सामने की खिड़की से तीखी धूप उसकी काँपी पर पड़ने लगी। फूलमति को ख्याल आता हैं किसके लिए लिख रही हैं वह ? यह तो भैंस के सामने बांसुरी बजाने जैसा हैं। संभवतः उसकी यह बातें कोई पढ़ ही नहीं पाएगा। फूलमती को पता नहीं बृजेश कितना पढ़ा-लिखा है, पर एक दिन मिला-मिलाकर अखबार पढ़ते देखा था। फूलमती सोचते-सोचते थक जाती हैं। अंतड़ियों को मरोड़ कर भूख अपने तीव्रता का एहसास दिलाती है।

            फूलमती उठकर रसोई में जाकर देखती है सब कुछ बिखरा पड़ा हैं। भात का डेकची खुला पड़ा है, दाल की कड़ाही खुली हैं। एक थाली में चींटियों की कतार लगी है, उसमें तेलचट्टा पड़ें हैं। फूलमती चूल्हे में आँच देकर दो सूखे हुए टहनियाँ डालती हैं। धधकती आग पर दाल की कराही रखकर भात की डेकचि से अच्छा वाला भात अलग करके कड़ाही में डालती हैं। मन ही मन सोचती है ना, दूसरे के कहने पर अपने पति पर संदेह करना ठीक नहीं।  

            जले हुए भात को एक थाली में रखकर जमीन पर बिखरे पड़े भात और सिधलभर्ता को समेटकर उठाती है। नारियल के झाड़ू से रसोई बहार के लालटेन जलाकर पोतना गिला करके मिट्टी का फर्श लिपती हैं। उसके बाद हाथ धोकर अपने लिए एक कटोरी में कड़ाही से दो कलछुल निकालकर आँच कम कर देती हैं। एक कौड़ खाकर देखती है, अभी बासी नहीं हुआ हैं। अब भी चलेगा। कड़ाही उतारकर ढक कर रख देती हैं। उसके बाद कटोरी से सिधलभर्ता लेकर दाल-भात खाती है, फिर साबुन से मुँह हाथ धोकर आईने के सामने खड़ी होती है। दीवार पर लालटेन लटकाने से चेहरे पर रोशनी पड़ती हैं। केश बिखड़ कर चेहरा जैसे डायन की तरह हो गया है। फूलमती केश झाड़कर काफी देर तक उसे संवारती है, उसके बाद चोटी बनाकर पति के लौटने के बारे मे सोचती रहती है।

            तभी घर के सामने शोर सुनाई देता है। फूलमती कान लगाकर सुनती है। बूढ़े का गाली-गलौज सब बृजेश को सुनाकर है। सुनते-सुनते फूलमती का कान गर्म होता रहता है। बाहर भीड़ बढ़ रहा है। तभी एक स्त्री स्वर आकर उसमें शामिल होती है। वह बृजेश की तरफ़दारी करती है। बूढ़े को कमज़ोर नपुसंक इत्यादि कहकर गाली देती जा रही है। इसके बाद और कुछ भी फूलमती के कान में नहीं जाता। उसके पाँव थरथराने लगते हैं, शरीर भारी हो जाता है। अपने आप को संभालने के लिए वह  बिस्तर पर जा बैठती है। भूकंप था या चक्कर आया था ? धीरे-धीरे वह लेट जाती है। उसके बाद कभी लालटेन की रोशनी के साथ नीचे डूबती तो कभी ऊपर उठती है। मानो आधी रात को बाढ़ में बहती जा रही हो।

            उस रात कब बृजेश घर लौटा, खाना खाया या नहीं, फूलमती को कुछ भी नहीं मालूम। सिर्फ़ इतना याद है, उस रात, उसकी चेतना लौटी थी एक पुरुष शरीर के भार से। फूलमती को लगता है जैसे सब कुछ लुट गया हो। उसके शरीर में इतनी ताकत है, उसे पता ही नहीं था। उस रात एक ही धक्के मे उसने बृजेश को जमीन पर फेंक दिया। उसके उठकर खड़ा होने के पहले ही फूलमती बिस्तर से उठकर एक आरी हाथ में उठा लेती है। बृजेश अपने आप को बचाने के लिए चौखट पार करके दरवाजे को धक्का देता है। फूलमती के सर पर चोट लगते ही वह वहीं पर लुढक कर गिर पड़ती है।

            होश आने पर फूलमती अपने आप को पागलखाने में पाती हैं। आधी रात को नदी के पानी में बैठे रहना, आरी हाथ में लेकर पति को मारने दौड़ना, सच-झूठ और कितने ही बनावटी आरोप लगाकर उसे पागल करार दिया गया। इसको उसको कहकर फूलमती ने अपने भाइयों के साथ संपर्क करने की कोशिश की, पर असफल रही। पागलखाने के पागल का कौन सुनता हैं। शुरू-शुरू में उसे खूब अपमान बोध होता, सारी दुनिया पर गुस्सा आता। लगता सूरज, चांद, आकाश, हवा किसी को भी फूलमती की परवाह नहीं है।

            उसका शरीर काफ़ी कमज़ोर था, हमेशा मितली सी आती रहती। उसमें गर्दन सीधा रखने की ताकत भी न थी। एक दिन चेकअप के बाद डॉक्टर साहब बोले, सावधानी से रहना, तेरे पेट में बच्चा है……।

            यही एक बात उसे नया जीवन देती है। पागलखाना का खाना जानवरों के खाने जैसा था। मजबूरन उसे निगलना पड़ता। धीरे-धीरे उसके शरीर में ताकत आती है। वक्त गुजरने के साथ एक समय पेट फूल कर तंबूरा हो जाता है। पेडू में रह-रह कर हो रहा उथल-पुथल, उसे ज़िंदा रहने की प्रेरणा देता है। वार्ड के पिछवाड़े के पेड़ पर पहला फल आया है। पेड़ पर पके हुए कटहल की खुशबू फूलमती के पोर पोर में प्रवेश कर जाती है।

            उसके बाद जिस दिन बच्चा हुआ, वह कितना खुश थी ! कितने सुंदर थे उसके छोटे-छोटे हाथ-पाँव ! रक्त-मांस से बने इस आनंद-पिंण्ड को वह हमेशा सीने से लगाए रहती थी। आज भी फूलमती जीवन के उन कुछ दिनों को भूल नहीं पाती। तीसरे दिन दो नर्म होठ उसके कठोर स्तनों को चूस कर गहरा पीला दूध निकालते हैं। फूलमती धीरे-धीरे हल्का महसूस कर बाँसुरी के से राग में मुग्ध होती गई। पाँच दिन बाद हल्दी सा पीला रंग सफ़ेद होता गया, मानो यह शिशु कोई दक्ष शिल्पी हो। बाउल गायकों के प्रभाती गीतों की तरह छोटे-छोटे हाथों का स्पर्श और चूक-चूक दूध का पीना रोज़ फूलमती को नींद से जगाता। समस्त चेतना में एकतारा के झंकार से वह अपना सारा दुख भूल जाती। इसी तरह आनंद में गुज़रता है प्रायः एक महीना।

            अचानक एक दिन फूलमती बाथरूम से आकर देखती है बिस्तर खाली पड़ा है। वह चिल्लाते हुए नर्सों के कमरे में जाती है। पूछने पर जवाब मिलता है, बच्चे को उसके पिता और बड़ी माँ ले गए ! पागलों के वार्ड में छोटे बच्चे को कैसे रखा जा सकता है ! अगर कोई गला दबा दे तो ?

            बाप और बड़ी माँ ! कौन बड़ी माँ ?

            वह जो औरत जा रही है तुम्हारे पति के साथ। लोहे के ग्रील से फूलमति झाँककर देखती है, उस बूढ़े आदमी की जवान औरत बच्चे को गोद में लेकर जल्दी-जल्दी बड़े रास्ते की तरफ उतरती जा रही है। फूलमती दौड़ कर बाहर निकलना चाहती है, पर टकराकर गिर जाती है। उठकर फिर दौड़ती है, पर अब तक पागलखाने का विशाल दरवाजा बंद हो चुका था। ताला लग गया था। फूलमती वापस लौटकर नर्सों से बहुत विनती करती है पर कोई लाभ नहीं होता। वह बौखला जाती है। बौखलाहट में एक नर्स का केश पकड़ लेती है। उसका कैप खुलकर नीचे गिर जाता है। तब तक पुरुष गार्ड उसे काबू में करके इलेक्ट्रिक शॉक रूम में ले जाते है। वहाँ उसका हाथ-पाँव बाधकर बिजली का झटका दिया जाता हैं। छटपटाते छटपटाते फूलमती बेदम हो जाती है।

            उसके बाद कितने ही दिन, महीने, साल वह मूक बनी रही। कितने आंसू गिरे है उसका कोई हिसाब नहीं है। शुरू-शुरू में छाती में दूध भर आने से नस-नस में उठते दर्द से छटपटाने लगती। बाथरूम में जाकर नर्सों के दिए पंप को छाती से लगाकर दूध निकालकर फ़र्श पर गिरा देती। दर्द से आँसू निकल आते, फिर नल चलाकर धो डालती।

            उसके बाद मानो कई सौ वर्ष बीत गए। हर एक दिन महीने जितना लंबा था। हर बार विशाल सीलिंग फैन के घट-घट आवाज़ के साथ ग्रीष्म ऋतु आती। छत धूप से गर्म हो जाता। खिड़की के रास्ते धूप के पीठ पर सवार होकर गर्मी कमरे में प्रवेश कर उसे पसीने से भिगो देती। कपड़े पहने रहने का दिल नहीं करता, लेकिन कभी-कभार कालबैसाखी का आना अच्छा लगता।

            मूसलाधार वर्षा होती। वर्षा की बूंदें छिटक कर पाँव पर गिरती जबकि शरीर सूखा रहता। ऐसे मे फूलमती पाँव खिड़की की ओर करके सोती। पानी अच्छा लगता। वर्षा का पानी पाँव में लगे लाल मिट्टी को धो डालता। अस्पताल से बस स्टैंड की तरफ़ उतर गया सड़क तब गोमती नदी मे परिणत हो जाता। यादों की नदी में छाती भर डूबकर फूलमती देर तक नहाती रहती।

            शरद ऋतु आते ही ढाक का स्वर सुनाई पड़ता। आकाश में रुई की तरह सफेद बादल दिखाई देते। याद आती बचपन की बातें, पिता की बातें। कुम्हार का बनाया लकड़ी का आसन, उसका पुआल, मिट्टी और रंग से धीरे-धीरे मूर्ति गढ़ना, आँखों को चकमका देने वाले नए-नए कपड़े पहनकर पूजा देखने जाना, अंजलि भर प्रसाद खाना, महादशमी का मूर्ति विर्सजन। उसके बाद हेमंत ऋतु का आगमन, प्राथमिक से माध्यमिक में जाना और क्रमशः माध्यमिक छोड़ने के पहले ही विवाह मंडप में जाने की बातें, सब याद आती हैं। पिताजी जिंदा होते, तो फूलमति को जैसे भी होता ज़रूर ढूंढ निकालते। काश की पिताजी जिंदा होते !  

            सोचते-सोचते व्याकुल लड़की का शरीर बर्फ हो जाता। लाल कंबल के ऊपर काला कंबल लेकर शीत ऋतु आती। भीतर खटमलों का दंश और बाहर हड्डी कंपाने वाली सर्दी। दोपहर होने पर ही चारपाई पर धूप आती। धूप में बैठकर खिड़की से मेघ शून्य आसमान को तकते-तकते सीलिंग पर रहने वाले कबूतरों का गुटर-गू सुनते-सुनते फूलमती भी पंख फड़फड़ाती। सिंगारबिल के आकाश में उड़ते-उड़ते अपना बचपन निहारती। बदरमोकाम भुवनेश्वरी के आकाश में पंख फैलाकर माँ कबूतर सात राजाओं के धन के बराबर अपने छोटे शावक को ढूंढती फिरती।

            एक दिन एक मैडम आकर कहती हैं तेरा भाई आया है, तेरे पति को कई चिट्ठी भेजकर भी बुलाया न जा सका, अब तू ठीक हो गई है, जा ठीक से रहना ! यह सपना है या सच फूलमती समझ नहीं पाती।

            उस दिन अस्पताल के बाहर फूलमती का पहला ग्रीष्म था। मँझले भाई निरंजन को देखकर सीने से लिपट जाती है। इतने दिन कहाँ थे तुम लोग, देख मेरा क्या हाल हुआ है ! उस दिन पूरा दोपहर आकाश में रंग बिरंगे पतंग उड़ते रहे थे।

            अस्पताल वालों ने अखबार में फोटो सहित विज्ञापन दिया था। यदि कोई अपना हो तो…. । निरंजन फूलमती को लेकर नरसिंहगढ़ लौट गए। वह फूलमती को लेकर अगले दिन उदयपुर जाते हैं। लोहार की बहू अब बूढी हो चली है, फिर भी फूलमती उसे याद है। उसे सीने से लगा लेती है। लोहार के घर में ही पता चलता है की बदरमोकाम का घर बेचकर क़रीब बीस साल पहले ही बृजेश बेटे को लेकर उस बूढ़े आदमी की जवान औरत के साथ भाग गया। कहाँ ? किसी को नहीं मालूम।

            अब नदी के घाट पर पेड़-पौधे कम हो चले हैं। पानी में शैवाल बहुत जम गया है। भरे यौवन की एक सांवली ब्याहता कपड़े फूला कर नहा रही थी। उस दिन फिसलते-फिसलते उठ खड़ी हुई थी फूलमति। पीछे मुड़कर एक बार और देखने की इच्छा को दबाकर वह तेज क़दमों से आगे बढ़ गई।

            फूलमती बचपन में कभी-कभार पिता और भाई के साथ लकड़ी का काम करती थी। इधर राज्य सरकार के तरफ़ से कई कुशल काष्ठ शिल्पियों को नियुक्त करके काम सिखाने का पाठ्यक्रम चालू हुआ है। पिता और भाई की ख्याति की वजह से इस पाठ्यक्रम मे फूलमती को दाखिला मिल गया। वह मन लगाकर काम सीखने लगी। उसके बाद हर रोज माथे का पसीना और हाथ का काम बढ़ने लगा।

            नक़्क़ाशी के नशे में फूलमती खाना-पीना भी भूल जाती। शायद इसीलिए पेट में घाव हो गया हैं। फूलमती लकड़ी के ऊपर यत्नपूर्वक बटाली से खुदाई करके मूर्ति गढती। लकड़ी का छोटा टुकड़ा धीरे-धीरे मयूर या कोयल में परिवर्तित हो जाता। एकटक देखते रहने से लगता लकड़ी की चिड़ियाँ अभी बोल पड़ेगी। प्रतिमा बन जाने पर साधारण लकड़ी को ही अधिक दाम पर खरीद कर लोग दीवार पर टांगते हैं। हाथ जोड़कर प्रणाम करते हैं।

            इस समय उसके हाथ का काम चल पड़ा है। उसने अगरतला में किराए पर कमरा ले लिया है। अपने हाथ से खाना बनाकर खाती हैं। पहले पहल रात दिन काम करती थी पर अब नहीं कर पाती। बैंक के पासबुक में कुछ पैसा जमा हुआ है। एक जमीन मिलने की संभावना हैं। जमीन मिलने पर एक निजी शोरूम खोलने का विचार हैं।

            जिस सौ रुपये के नोट को बिस्तर के नीचे चटाई के ऊपर रखी थी, उसको दीमक खा गया है। केवल नंबर ठीक है। बाक़ी रुपया जाल की तरह कट-फट कर बड़ा-बड़ा छेद हो गया है। बनिया के दुकान पर बाज़ार में, यहाँ-वहाँ घूमने के बाद एक दिन पूर्बाशा विपणन केन्द्र में एक मैडम बैंक जाने की सलाह देती हैं। बैंक में जाने पर पता चलता है उस दिन काम नहीं होगा।

            अगली बार निर्दिष्ट दिन को, समय पर पहुच कर, वह सही काउंटर के लाइन में खड़ी होती है। काउंटर पर बैठे बाबू का उम्र कम है उसकी आँखें सुंदर हैं, उसकी नज़रों में आर्कषण है। फूलमति गहरी श्वास लेती है। रुपया बदलते समय बाबू होठ दबाकर हँसता है। उसकी दोनों मायावी आँखें फूलमती को अपने में उलझा लेती हैं।

            दोपहर की धूप में सड़क का अलकतरा नर्म हो गया है। उसमे चप्पल बार-बार चिपक जाता हैं। धूप तेज है, प्यास भी लग रही है। फूलमती को जोरों की भूख लगती है। भूख लगने से उसके पेट का घाव ज़्यादा तकलीफ़ देता है। माथे से पसीना टपकने लगता है। आखिर में हारकर वह रिक्शा करती है। परन्तु रिक्शा में बैठकर भी चैन नहीं मिलता, बेचैनी बनी रहती है। उस बाबू का चेहरा एक आदमी के बीस साल पहले के चेहरे से मिलता जुलता है। फूलमती लगातार सोचती रहती है।

            घर पहुंचकर, हाथ-पाँव धोकर, चेहरा और आँखों पर पानी का छींटा मारकर, सुबह के तरकारी के साथ भात खाकर वह दरवाजा बंद करती है। उसके बाद सीलिंग फैन को पूरे गति मे चलाकर ब्लाउज खोलकर पेटीकोट का गाँठ ढीला करके बिस्तर पर हाथ पाँव फैलाकर लेट जाती है। थकान नींद लाती हैं। काम से बोझिल नींद !

           आँखें कब लग गई, फूलमती को याद नहीं। वह दरवाज़े पर हल्का दस्तक महसूस करती है। क्या फूलमती उठ कर बैठती है ? न की बहने लगती है नदी की धारा में। दरवाज़े को छूते ही चमत्कार होता है। बाहर वृक्षों के हरे पत्तों से सूर्य का पीला प्रकाश परावर्तित होकर पूरे वातावरण में फैल रहा है। इस दोपहर में दरवाज़े पर साँवले रंग का कौन खड़ा है ? वह बाबू मंद मंद मुस्करा रहा हैं। कैसी बैंगनी आभा है उसके चेहरे पर ! उसके होंठ हिलते हैं। क्या उसने माँ कह कर पुकारा ? फूलमती को क्यों सुनाई नहीं दे रहा? उसका गला भर आता है। जीभ भारी हो जाती है। ऊपर के दांत नीचे के दांत को दबाने लगते हैं। होठ भारी होकर लंबा हो जाता है। खोए हुए शावक को दोबारा पाकर मां उसके गाल, शरीर और पीठ को थपथपाती है, उसे दुलार करती है।

            इसी बीच धम-धम की आवाज बढ़ती रहती है। दरवाजा तो खुला ही है फिर यह आवाज़ कैसी ? फूलमती आँखें खोलकर देखती है पूरे घर में अंधकार है। उठकर साड़ी ठीक से लपेटती है। मन भारी लग रहा है। सिटकनी ठीक से ही लगा था। दरवाजा खोलकर देखती है बिसू दलाल। वह बिसू को भारी आवाज में कहती है। बाद में आना, उंगली कट गया है, समय लगेगा ! बिसू सर खुजला कर कहता है। मंगलवार तक चाहिए, याद रखना!

            उसका काम लगभग अस्सी प्रतिशत तक हो गया है। कई भंगिमाएँ उभर आई हैं लकड़ी के खाँचे में, बाक़ी बीस प्रतिशत ही कठिन है। इसके लिए बहुत एकाग्रता चाहिए। जितना मन लगाएँगे काम उतना ही अच्छा होगा। प्रत्येक धारी से सौंदर्य की धारा निकलेगी। फूलमती यह काम ज़रूर पूरा कर देगी। आजकल उसे बहुत तेज सिर दर्द होता है। डॉक्टर चश्मा लेने की सलाह दिए हैं।

            दरवाज़ा बंद करके फूलमति एक बार फिर सोती है। ऐसा सपना तोड़ दिया बिशू ने! डूबते शाम का कटहल के रस की तरह पीला रोशनी घर में फैल जाती है। कोयल के गाने का स्वर हवा में तैर कर आती है, दूर कहीं गाजन का बजना सुनाई देता है। अभी वसंत ऋतु है, देर तक आंखें बंद करके भी नींद नहीं आती। स्वप्न-युवक की बातें सोचते-सोचते फूलमती उठकर बैठ जाती है। दरवाज़ा खोलकर रोशनी के लिए बिजली का बल्ब जलाती है। उसके बाद हाथ में औज़ार लेती है।

            देवी दुर्गा के काष्ठ मुख पर धीरे-धीरे मुस्कान खिलती है। छोटे-छोटे बटाली बिना आवाज किए माँ के चेहरे पर नाना प्रकार की रेखाएं उकेर देतीं हैं।

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लेखक परिचय: श्यामल भट्टाचार्य

मातृभाषा बांग्ला में लेखन के अलावा हिंदी, अंग्रेजी, पंजाबी, डोगरी एवं राजस्थानी से बांग्ला में अनुवाद। पश्चिम बंगाल बांग्ला अकादमी से सुतपा रॉय चौधरी पुरस्कार (वर्ष 2010) एवं साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कार (वर्ष 2010) से सम्मानित। कुल 56 पुस्तकों का लेखन एवं अनुवाद। 

Email: shyamal_bhttchry@yahoo.co.in

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अनुवादक परिचय: कुमार शाश्वत 

अंग्रेजी तथा बांग्ला से हिंदी में अनुवाद एवं हिंदी में लेखन। बांग्ला और अंग्रेजी से हिंदी में लगभग चालीस कहानियों सहित तीन उपन्यास का अनुवाद प्रकाशित। 

Email : kumarsashwat1970@gmail.com

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