‘कामायनी’ और ‘उर्वशी’ : आधुनिक मनुष्य की त्रासदी और मुक्ति-चेतना का आख्यान 

आधुनिक युग को सामान्यतः प्रगति और विकास का युग कहा जाता है। आधुनिक मनुष्य की त्रासदी को समझने के लिए पहले यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि त्रासदी क्या है? त्रासदी उस स्थिति को कहते हैं जिसमें मनुष्य का जीवन गहरे दुख, आंतरिक संघर्ष और असफलता की पीड़ा से भर जाता है, और वह स्थिति उसे भीतर से तोड़ देती है। त्रासदी केवल किसी बाहरी दुर्घटना या दु:खद घटना का नाम नहीं है,बल्कि वह मानसिक और भावनात्मक अवस्था भी है, जिसमें मनुष्य अपने जीवन से असंतुष्ट, बेचैन और निराश हो जाता है। जहाँ मनुष्य बाहरी रूप से सक्षम होते हुए भी भीतर से टूट जाता है। आधुनिक युग में यह स्थिति और भी जटिल हो गई है। कारण यह है कि आधुनिक जीवन में भौतिक प्रगति तो हुई है, पर मानसिक और आत्मिक संतुलन कमजोर पड़ा है। आधुनिक मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या असंतुलन है। वह बुद्धि से अत्यंत विकसित है, पर संवेदना से रिक्त होता जा रहा है। विज्ञान, तकनीक और औद्योगिक उन्नति ने मानव-जीवन को पहले की तुलना में अत्यधिक सुविधाजनक बना दिया है। विज्ञान ने उसे सोचने की शक्ति दी है, पर जीवन का उद्देश्य नहीं दिया। इसी कारण वह निरंतर तनाव, अकेलेपन और आत्मसंघर्ष से घिरा रहता है। यह स्थिति उसे भीतर से त्रस्त कर देती है। नामवर सिंह मनुष्य की इस मानसिक स्थिति को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं- “आधुनिक मनुष्य साधनों के बीच जीते हुए भी अपने ही अस्तित्व से कट गया है।”¹ आधुनिक युग में मनुष्य की इच्छाएँ अनंत हो गई हैं। वह अधिक चाहता है, पर जो है उसमें संतोष नहीं कर पाता। यह असंतोष उसे निरंतर अशांत बनाए रखता है। इच्छाओं और सीमाओं के बीच का यही द्वंद्व आधुनिक त्रासदी का मूल है। मनुष्य बाहर से सफल दिखाई देता है, पर भीतर से खाली होता है। नामवर सिंह के अनुसार-“आधुनिक मनुष्य की त्रासदी उसके भीतर चल रहे उस संघर्ष की देन है, जिसमें बुद्धि भावना पर हावी हो गई है।”² आधुनिक त्रासदी का एक प्रमुख कारण अहंभाव भी है। आधुनिक मनुष्य स्वयं को प्रकृति और समाज से अलग मानने लगा है। वह स्वयं सर्वशक्तिमान समझता है। यही बोध उसे अकेला कर देता है। जब वह संकट में पड़ता है, तो उसे कोई सहारा नहीं मिलता। यह अकेलापन आधुनिक मनुष्य की सबसे गहरी पीड़ा है। इसके साथ ही आधुनिक युग में मनुष्य की आध्यात्मिक चेतना भी कमजोर हुई है। जीवन को केवल भौतिक सफलता से मापा जाने लगा है। आत्मिक शांति, करुणा और मानवीय मूल्यों को गौण समझा गया है। परिणामस्वरुप मनुष्य भीतर से टूटता चला जाता है। यहीं स्थिति साहित्य में आधुनिक त्रासदी के रूप में व्यक्त होती है। डॉ नगेंद्र का मत है- “आधुनिक साहित्य  में त्रासदी का रूप बाह्य घटनाओं में नहीं, बल्कि मनुष्य के आंतरिक जीवन में दिखाई देता है।”³ इसी संदर्भ में यह स्पष्ट हो जाता है कि आधुनिक त्रासदी किसी एक कारण से उत्पन्न नहीं होती। यह बुद्धि, इच्छा, अहंकार और आध्यात्मिक रिक्तता के सम्मिलित प्रभाव का परिणाम है। हिन्दी के आधुनिक महाकाव्य इसी आंतरिक संघर्ष  को केंद्र में रखकर मनुष्य की स्थिति का विश्लेषण करते हैं। वहीं मुक्ति-चेतना की बात करें, तो मुक्ति-चेतना का अर्थ केवल मृत्यु के बाद मिलने वाले मोक्ष से नहीं है। इसका सीधा संबंध मनुष्य के इसी जीवन से है। जब मनुष्य दुख, तनाव, उलझन और असंतोष से घिरा होता है, तब उसके भीतर मुक्त होने की इच्छा पैदा होती है। यही इच्छा मुक्ति-चेतना कहलाती है। यह चेतना मनुष्य को जीवन से भागने की नहीं, बल्कि जीवन को सही तरह से समझने और जीने की सीख देती है। मनुष्य तब मुक्त होता है, जब वह अपने मन की बेचैनी और भ्रम को पहचानकर उनसे ऊपर उठने का प्रयास करता है। आधुनिक समय में मनुष्य के पास सुख-सुविधाएँ तो बहुत हैं, फिर भी वह भीतर से परेशान और असंतुष्ट है। इसका कारण यह है कि उसने भौतिक प्रगति को ही जीवन का लक्ष्य मान लिया है और आत्मिक मूल्यों को पीछे छोड़ दिया है। मुक्ति-चेतना मनुष्य को यह समझाती है कि केवल धन, शक्ति या ज्ञान से जीवन पूर्ण नहीं होता। जब इच्छाएँ बहुत बढ़ जाती हैं, बुद्धि में घमंड आ जाता है और मनुष्य अपने कतव्यों से दूर होने लगता है, तब जीवन में दुख और अशांति बढ़ती है। ऐसे समय में मुक्ति-चेतना आत्मसंयम और संतुलन का रास्ता दिखाती है। ‘कामायनी’ में मुक्ति-चेतना का अर्थ और भी स्पष्ट हो जाता है। जयशंकर प्रसाद ‘कामायनी’ के रहस्य सर्ग में लिखते हैं-

“ज्ञान दूर कुछ, क्रिया भिन्न  है इच्छा क्यों पूरी हो मन की;

 एक दूसरे से न मिल सके यह विडंबना है जीवन की।”⁴

अर्थात् जब ज्ञान जीवन से दूर रहता है और कर्म विवेक के अनुरूप नहीं होते, तब मनुष्य की इच्छाओं की पूर्ति संभव नहीं हो पाती। प्राणी के जीवन की सबसे बड़ी विफलता का मूल कारण यहीं है कि इच्छा, क्रिया और ज्ञान- इन तीनों के बीच कोई समन्वय नहीं रह जाता। इच्छा कुछ और चाहती है, कर्म किसी अन्य दिशा में बढ़ते हैं और ज्ञान केवल सैद्धांतिक बनकर रह जाता है। ऐसी स्थिति में जीवन लक्ष्यहीन हो जाता है। वास्तव में इच्छा, क्रिया और ज्ञान एक-दूसरे से पृथक नहीं किए जा सकते। इनका संबंध ऐसा ही है जैसे शरीर, मन और आत्मा का। यदि मनुष्य के भीतर कोई इच्छा उत्पन्न होती है, तो उसकी सिद्धि के लिए सचेत प्रयास अर्थात् कर्म आवश्यक है। किन्तु केवल कर्म करना ही पर्याप्त नहीं है; कर्म करते समय विवेक और ज्ञान का मार्गदर्शन भी उतना ही आवश्यक है। बिना ज्ञान के किया गया कर्म अंधा होता है और बिना कर्म की इच्छा निष्फल रह जाती है। जब इच्छा सच्ची हो, कर्म सही दिशा में हो और ज्ञान उनका मार्गदर्शन करे, तभी जीवन में सफलता, संतुलन और संतोष प्राप्त होता है। यही समन्वय मनुष्य को भटकाव से बचाकर जीवन को सार्थक बनाता है। साथ ही, कर्म करते समय यह भी आवश्यक है कि वह विवेक से काम ले, आवेश में आकर उलटे-सीधे कार्य न करे और जो मन में आए, वहीं कर डालने की प्रवृति से बचे। जब इच्छा की तीव्रता, कर्म की सक्रियता और ज्ञान का संतुलन एक साथ जीवन में उपिस्थत होते हैं, तभी वह सच्चे अर्थों में शांति और संतोष प्राप्त करता है। यहीं मुक्ति-चेतना आधुनिक मनुष्य को एक सार्थक और शांत जीवन की दिशा दिखाती है। इस प्रकार मुक्ति-चेतना का आशय जीवन के कष्टों से भागना नहीं, बल्कि उन्हें समझकर उनसे ऊपर उठना है। यह चेतना मनुष्य को यह सिखाती है कि संघर्ष जीवन का सत्य है, किन्तु उसी संघर्ष के बीच संतुलन, संयम और मानवता के सहारे जीवन को अर्थपूर्ण बनाया जा सकता है। अंततः मुक्ति-चेतना मनुष्य को बाहरी बंधनों से अधिक उसके आंतरिक बंधनों अहंकार, असंतोष से मुक्त करने का मार्ग प्रशस्त करती है।

‘कामायनी’ और ‘उर्वशी’ महाकाव्य इसी आधुनिक त्रासदी को दो अलग-अलग रूपों में प्रस्तुत करती हैं। ‘कामायनी’ में मनुष्य की परेशानी इसलिए पैदा होती है क्योंकि वह केवल बुद्धि पर ज़ोर देता है और भावनाओं को नज़रअंदाज़ कर देता है। इससे उसका जीवन सूना और नीरस हो जाता है। वहीं ‘उर्वशी’ में यह पीड़ा अधूरे प्रेम, तीव्र इच्छाओं और मन के भीतर चलने वाले संघर्ष के रूप में दिखाई देती है। इन दोनों रचनाओं के माध्यम से कवि आधुनिक मनुष्य की उलझी हुई मानसिक अवस्था को गहराई से सामने रखता है। दोनों कृतियाँ आधुनिक मनुष्य की इस जटिल मानसिक स्थिति  को गहराई से उभारती हैं। इस प्रकार आधुनिक मनुष्य की त्रासदी को समझे बिना ‘कामायनी’ और ‘उर्वशी’ का सही मूल्यांकन संभव नहीं है। ये काव्य इसी त्रासदी की पृष्ठभूमि पर मुक्ति-चेतना का मार्ग प्रस्तुत करते हैं।

जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी’ केवल एक पौराणिक आख्यान नहीं है। यह आधुनिक मनुष्य के मानसिक, बौद्धिक और आत्मिक संकट की गहरी अभिव्यक्ति है। ‘कामायनी’ का केंद्रीय पात्र मनु आधुनिक मनुष्य का प्रतीक है। प्रलय के बाद उसका अकेलापन, भय, जिज्ञासा और आत्मसंघर्ष आधुनिक चेतना की त्रासद स्थिति को उजागर करता है। प्रलय के उपरांत जब समस्त सभ्यता नष्ट हो जाती है, तब मनु अकेला खड़ा रह जाता है। यह अकेलापन केवल भौतिक नहीं है, बल्कि मानसिक और आत्मिक भी है। मनु का यह अकेलापन आधुनिक मनुष्य के उस एकाकीपन का प्रतीक है, जहाँ वह भीड़ में रहते हुए भी स्वयं को अकेला अनुभव करता है। मनु की स्थिति उस आधुनिक व्यक्ति जैसी है, जो जीवन के अर्थ को लेकर निरंतर प्रश्न करता रहता है। वह भयग्रस्त है। वह अनिश्चित भविष्य से चिंतित है। यह भय और असुरक्षा आधुनिक मनुष्य की सबसे बड़ी त्रासदी है।

“हिमगिरी के उत्तुंग शिखर पर, बैठ शिला की शीतल छाँह ,

एक पुरुष, भीगे नयनों से, देख रहा था प्रलय प्रवाह!

नीचे जल था, ऊपर हिम था, एक तरल था, एक सघन;

एक तत्व की ही प्रधानता, कहो उसे जड़ या चेतन

दूर-दूर तक विस्तृत था हिम, स्तब्ध उसी के हृदय समान;

नीरवता सी शिला चरण से, टकराता फिरता पवमान।”⁵

उपर्युक्त पंक्तियों में कवि ने बाहरी प्रकृति और मनुष्य के भीतर की स्थिति दोनों को एक साथ चित्रित किया है। कवि कहता है कि हिमालय के ऊँचे शिखर पर, ठंडी चट्टान की छाया में एक पुरुष बैठा है। उसकी आँखें भीगी हुई हैं, यानी वह भीतर से दुखी, अकेला और व्यथित है। वह सामने फैले हुए प्रलय के दृश्य को देख रहा है। यह प्रलय केवल प्रकृति का नहीं, बल्कि उसके मन का भी है। नीचे बहता हुआ जल है- जो तरल, चंचल और भावनाओं का प्रतीक है। ऊपर जमी हुई बर्फ है- जो कठोरता, जड़ता और संवेदनहीनता का संकेत देती है। कवि पूछता है कि इनमें किस तत्व की प्रधानता है- जड़ की या चेतनकी? यानी मनुष्य के भीतर भावना अधिक है या जड़ता? चारों ओर फैला हिम उस पुरुष के हृदय की तरह स्तब्ध और शून्य है। जैसे उसका मन भी ठहर गया हो। चारों तरफ गहरी नीरवता है, और हवा चट्टानों से टकराकर भी कोई हलचल पैदा नहीं कर पा रही। यह स्थिति उस व्यक्ति के भीतर के सन्नाटे को और गहरा कर देती है।

कहने का तात्पर्य यह है कि यह दृश्य आधुनिक मनुष्य की मानसिक अवस्था को दर्शाता है। बाहर सब कुछ स्थिर और ठंडा है, और भीतर भी संवेदनाएँ जमी हुई हैं। प्रलय केवल प्रकृति में नहीं, मनुष्य के मन में भी घटित हो रहा है- जहाँ अकेलापन, निराशा और भावनात्मक शून्यता छाई हुई है। प्रलय के बाद मनु अकेले हिमालय की ऊँची चोटी पर बैठे हैं। उनकी आँखें भीगी हैं, यानी वे भीतर से दुखी और चिंतित हैं। नीचे चारों ओर जल ही जल है और ऊपर बर्फ जमी है। चारों तरफ़ सन्नाटा है। यह बाहरी दृश्य मनु के मन की स्थिति को दिखाता है। जैसे बाहर सब कुछ ठहर गया है, वैसे ही मनु का मन भी शून्य, डर और अकेलेपन से भरा है। कवि यह कहना चाहता है कि प्रलय केवल बाहर नहीं, मनुष्य के भीतर भी घटित हुई है। मनु उस आधुनिक मनुष्य का प्रतीक हैं, जो विनाश, अकेलेपन और मानसिक उलझन से जूझ रहा है। यह अंश प्रकृति के दृश्य के माध्यम से मनुष्य के मन की टूटन और संकट को स्पष्ट करता है। नामवर सिंह ने मनु के इस स्वरूप पर टिप्पणी करते हुए लिखा है-“मनु आधुनिक मानव का प्रतिनिधि है, जो प्रलय के बाद जीवन के नए अर्थ की खोज में भटकता है।”⁶

“ओ चिंता की पहली रेखा, अरी विश्व वन की व्याली;

ज्वालामुखी स्फोट के भीषण, प्रथम कंप सी मतवाली।

हे अभाव की चपल बालिके, री ललाट की खल रेखा!

हरी-भरी सी दौड़ धूप, ओ जल-माया की चल रेखा!

बुद्धि, मनीषा,मति, आशा, चिंता तेरे हैं कितने नाम!

अरे पाप है तू, जा, चल, जा यहाँ नहीं कुछ तेरा काम।”⁷

‘कामायनी’ में मनु द्वारा व्यक्त की गई चिंता केवल व्यक्तिगत मानसिक अवस्था नहीं है, बल्कि वह सम्पूर्ण मानव-चेतना की प्रतिनिधि चिंता बन जाती है। मनु कहते हैं कि चिंता उनके जीवन में पहली बार इतनी स्पष्ट और रेखांकित होकर प्रकट हुई है कि उसने उनके अंतःकरण पर स्थायी छाप छोड़ दी है। यह चिंता संसार रूपी उपवन में छिपी सर्पिणी के समान है, जो दिखाई नहीं देती, पर भीतर ही भीतर मनुष्य के मन में भय,अस्थिरता और अशांति का विष भरती रहती है। मनु की यह चिंता ज्वालामुखी पर्वत के उस प्रारंभिक कंपन के समान है,जो आरंभ में साधारण प्रतीत होता है,किन्तु आगे चलकर भयंकर विस्फोट का कारण बन जाता है। यह संकेत करता है कि चिंता  का आरंभ छोटा होता है, पर यदि उसे नियंत्रित न किया जाए तो वह पूरे जीवन को विक्षुब्ध कर देती है। मनु के अनुसार चिंता किसी न किसी प्रकार के अभाव से जन्म लेती है कभी सुरक्षा के अभाव से, कभी संतोष के अभाव से और कभी भविष्य की अनिश्चितता से। यहीं अभाव मनुष्य की मानसिक स्थिरता को नष्ट कर देता है और उसे भीतर से कमजोर बना देता है। इसी कारण मनु चिंता के उत्पन्न होने को मनुष्य के दुर्भाग्य  का सूचक मानते हैं। यह विचार आधुनिक मनुष्य पर भी पूरी तरह लागू होता है। आज का मनुष्य साधनों, सुविधाओं और ज्ञान के प्रचुरता के बावजूद मानसिक रूप से अत्यधिक सुरक्षित और चिंताग्रस्त दिखाई देता है। नौकरी, प्रतिष्ठा, संबंध और भविष्य सब कुछ होते हुए भी वह संतोष और शांति से वंचित है। किन्तु मनु चिंता को पूरी तरह नकारते नहीं हैं। वे यह भी स्वीकार करते हैं कि चिंता का एक सकारात्मक और रचनात्मक पक्ष भी है। जब मनुष्य चिंता  से आक्रांत होता है, तब वह आलस्य को त्याग देता है और उस चिंता से मुक्त होने के लिए कर्मशील बनता है। यही चिंता उसे दौड़-धूप, परिश्रम और संघर्ष के लिए प्रेरित करती है, जिसके फलस्वरूप उसका जीवन सक्रिय और हरा-भरा हो जाता है। मनु आत्मिक जगत को यदि जल मानते हैं, तो चिंता उसमें उठने वाली तरंग के समान है। जैसे पवन के आघात से शांत जल में लहरें उठने लगती हैं, वैसे ही चिंता की प्रेरणा से मनुष्य जड़ता से बाहर  निकलकर क्रियाशील बनता है। इसी संदर्भ में मनु कहते हैं कि चिंता को ही बुद्धि कहा जाता है, वहीं मनीषा है, वहीं मति का रूप है और वहीं आशा के रूप में भी प्रकट होती है। अर्थात् चिंता मनुष्य की चेतना के विभिन्न स्तरों पर कार्य करती है और उसे सोचने, समझने तथा आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। पर समस्या तब उत्पन्न होती है, जब यही चिंता संतुलन खो देती है। जब वह बुद्धि के स्थान पर भय, आशा के स्थान पर निराशा और कर्म के स्थान पर जड़ता को जन्म देने लगती है, तब वह अत्यंत अशुभ बन जाती है। इसी कारण मनु उस चिंता को, जो उनके हृदय में भय और अस्थिरता उत्पन्न कर रही है, अपने जीवन से दूर चले जाने का आदेश देते हैं। इस प्रकार मनु की चिंता आधुनिक मनुष्य की चिंता का सशक्त प्रतीक बन जाती है। आज का मनुष्य भी उसी प्रकार भविष्य भय, असुरक्षा और आंतरिक असंतोष से घिरा हुआ है। जयशंकर प्रसाद का स्पष्ट संकेत है कि चिंता तभी तक उपयोगी है, जब तक वह मनुष्य को कर्मशील, जागरूक और सजग बनाए; किन्तु जब वहीं चिंता मनुष्य को भयग्रस्त, अशांत और असंतुलित कर दे, तब उससे मुक्ति ही जीवन की अनिवार्य आवश्यकता बन जाती है। वहीं कबीरदास अपनी दोहा में लिखते हैं-

“चिंता ऐसी डाकिनी, काट कलेजा खाय।

वैद बिचारा क्या करे, कहाँ तक दवा लगाय॥“⁸

‘कामायनी’ में मनु-श्रद्धा प्रसंग केवल एक पौराणिक कथा नहीं है, बल्कि आधुनिक मनुष्य के मनोविज्ञान का गहरा चित्र है। मनु यहाँ उस व्व्यक्ति का प्रतीक है जो बुद्धि से तो प्रखर है, विचारों से आधुनिक है, लेकिन भीतर से अस्थिर और असंतुलित है। उसके पास ज्ञान है, पर संतुलन नहीं है। उसके पास शक्ति है, पर संयम नहीं है। मनु श्रद्धा से प्रेम करता है। श्रद्धा उसके जीवन में शांति, संतुलन और विश्वास लाती है। श्रद्धा केवल स्त्री नहीं है; वह आस्था, संवेदना और मानवीय मूल्यों का प्रतीक है। जब तक श्रद्धा का प्रेम केवल व्यक्तिगत और दांपत्य स्तर पर है, तब तक मनु प्रसन्न रहता है। उसे लगता है कि यह प्रेम उसी का है, उसी के सुख के लिए है। लेकिन जब श्रद्धा का प्रेम व्यापक होता है। जब वह मातृत्व की भावना से जुड़ता है, जब वह भविष्य की सृष्टि और मानवता की चिंता से जुड़ता है। तब मनु असुरक्षित महसूस करता है। उसे लगता है कि श्रद्धा का प्रेम अब केवल उसका नहीं रहा। यहीं से उसके भीतर अधिकार-बोध और स्वार्थ जागते हैं। आधुनिक मनुष्य की भी यहीं त्रासदी है। वह प्रेम चाहता है, पर वह प्रेम को साझेदारी नहीं, प्रेम को स्वामित्व समझता है। वह चाहता है कि दूसरा व्यक्ति केवल उसके लिए जिए। जैसे ही प्रेम में कर्तव्य, जिम्मेदारी या व्यापक मानवीय दृष्टि जुड़ती है, उसे बंधन का अनुभव होने लगता है। मनु का क्रोध वास्तव में उसकी आंतरिक कमजोरी है। वह श्रद्धा को समझ नहीं पाता। वह यह नहीं समझ पाता कि प्रेम का स्वभाव विस्तार है, संकुचन नहीं। ईर्ष्या वश वह संबंध तोड़ देता है। यहीं आधुनिक मूल्य-संघर्ष है- व्यक्तिगत सुख बनाम सामाजिक उत्तरदायित्व, भोग बनाम सृजन, अधिकार बनाम त्याग। इस प्रकार मनु-श्रद्धा प्रसंग हमें यह बताता है कि  जब बुद्धि भावना से कट जाती है, जब प्रेम से विश्वास हट जाता है, तब संबंध टूटते हैं और व्यक्ति अकेला रह जाता है। यहीं आधुनिक मनुष्य की आंतरिक त्रासदी हैं।

“तुम अपने सुख से सुखी रहो मुझको दुख पाने

दो स्वतंत्र; ‘मन की परवशता यहां दुःख’

मैं यही जपूँगा महामंत्र!

लो चला आज मैं छोड़ संचित संवेदन भार पुँज;

मुझको काँटे ही मिले धन्य !

हो सफल तुम्हें ही कुसुम कंज।”⁹

मनु का श्रद्धा को छोड़कर चले जाना आधुनिक मनुष्य की उस प्रवृत्ति को दर्शाता है, जिसमें वह संबंधों से भागता है। जैसे ही प्रेम में त्याग, धैर्य या साझेदारी आती है, वह उसे बोझ मानने लगता है। आज भी कई संबंध इसी कारण टूटते है, क्योंकि प्रेम को केवल सुख माना जाता है, कर्तव्य नहीं। इस प्रकार यह प्रसंग आधुनिक समय की एक बड़ी सच्चाई को उजागर करता है। आधुनिक मनुष्य प्रेम तो चाहता है, पर उसे बाँटना नहीं चाहता। वह स्वतंत्रता चाहता है, पर उत्तरदायित्व से डरता है। वह वर्तमान में जीना चाहता है, पर भविष्य का भार नहीं उठाना चाहता। यहीं कारण है कि मनु और श्रद्धा का यह संघर्ष आज के मनुष्य के जीवन, उसके रिश्तों और उसकी मानसिक उलझनों का सशक्त प्रतीक बन जाता है। श्रद्धा के निष्कासन के बाद मनु का जीवन असंतुलित हो जाता है। वह न तो पूरी तरह बुद्धि में स्थिर रह पाता है, न ही शांति प्राप्त कर पाता है। यह अस्थिरता आधुनिक मनुष्य की गहरी त्रासदी को दर्शाता है। नंददुलारे वाजपेयी का यह कथन ध्यातव्य है कि– “श्रद्धा का त्याग ही कामायनी में मानव जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी है।”¹⁰ मनु का संघर्ष बाहरी नहीं है। यह संघर्ष उसके भीतर चलता है। वह बुद्धि और भावना, अहं और करुणा, शांति और संवेदना के बीच फँसा रहता है। यहीं आंतरिक द्वंद्व आधुनिक मनुष्य की वास्तविक त्रासदी है। मनु का यह कहना कि वह जड़ हिमालय नहीं, बल्कि पवन और सूर्य बनना चाहता है, यह आधुनिक मनुष्य की सक्रिय और और कर्मशील बनने की इच्छा को दर्शाता है। वह कुछ करना चाहता है और आगे बढ़ना चाहता है। लेकिन जब कर्म के साथ श्रद्धा और मानवीय भाव नहीं होते, तो वहीं कर्म घमंड और भोग की ओर ले जाता है। मनु ने अपने जीवन को भोग तक सीमित कर लिया है उसने भोग से बाहर सुख के बारे में नहीं सोचा। यह आज की उपभोक्तावादी सोच को दर्शाता है, जहाँ सुख को केवल धन और भोग से जोड़ा जाता है। मनु श्रद्धा को केवल शरीर के रूप में समझ पाता है। वह आत्मिक प्रेम को नहीं समझ पाता। इससे आज के प्रेम-संबंधों की सतही स्थिति सामने आती है। इड़ा बुद्धि और तर्क का प्रतीक है। उसके प्रभाव में मनु भावनाओं से दूर होता चला जाता है। यह आधुनिक मनुष्य की वही दशा है, जहाँ वह बहुत सोचता है, पर कम महसूस करता है। नलिन विलोचन शर्मा के अनुसार-“कामायनी में इड़ा उस आधुनिक बुद्धिवाद का प्रतीक है, जो मनुष्य को संवेदनहीन बना देता है।”¹¹ इस प्रकार बुद्धि-प्रधान जीवन मनुष्य को समाधान नहीं, बल्कि और अधिक द्वंद्व देता है। यहीं द्वंद्व आधुनिक त्रासदी का केंद्रीय कारण बनता है। यह स्थिति आधुनिक मनुष्य की उस मानसिक दशा से मेल खाती है, जहाँ वह मानवीय मूल्यों से कट जाता है। आधुनिक मनुष्य भी इसी प्रकार बाहरी रूप से सफल दिखाई देता है, पर भीतर से टूटता रहता है। ‘कामायनी’ इसी आंतरिक टूटन को महाकाव्यात्मक रूप देती है। आज का मनुष्य भी मनु की तरह अकेला है, असंतुलित है,बुद्धि -प्रधान है लेकिन संवेदनात्मक रूप से रिक्त है। इस दृष्टि से ‘कामायनी’ केवल अपने समय की रचना नहीं है। यह आधुनिक युग की स्थायी समस्या को अभिव्यक्त करती हैं। ‘कामायनी’ में जयशंकर प्रसाद आधुनिक मनुष्य की त्रासदी का चित्रण करने के बाद उसे निराशा में नहीं छोड़ते। वे जीवन के लिए एक मुक्ति-पथ भी प्रस्तुत करते हैं। यह मुक्ति किसी बाह्य साधन से नहीं आती, बल्कि मनुष्य के आंतरिक संतुलन से उत्पन्न होती है। यहीं ‘कामायनी’ की केंद्रीय दार्शनिक अवधारणा है। ‘कामायनी’ के आरंभ से ही मनु एक संघर्षशील चेतना के रूप में सामने आता है। वह प्रलय के बाद अकेला खड़ा है- भयभीत, जिज्ञासु और बेचैन। आगे चलकर वह बुद्धि, कर्म और भावना के विभिन्न मार्ग से गुजरता है। कभी इड़ा के प्रभाव में वह केवल तर्क और बुद्धि पर निर्भर हो जाता है, तो कभी श्रद्धा के साथ भावनात्मक जुड़ाव में बँध जाता है। लेकिन इन दोनों अवस्थाओं में वह पूर्ण शांति नहीं पा पाता। यही स्थिति आधुनिक मनुष्य की भी है, जो या तो अत्यधिक बौद्धिक हो गया है या फिर केवल भावनाओं में बहता है। इड़ा सर्ग का यह पंक्ति भी ध्यान देने योग्य है-

“मनु! तुम श्रद्धा को गए भूल

उसे पूर्ण आत्म-विश्वासमयी में को उड़ा दिया था समझ तूल

तुमने तो समझा असत् विश्व जीवन धागे में रहा तूल

जो क्षण बीतें सुख-साधन में उनको ही वास्तव लिया मान

वासना-तृप्ति ही स्वर्ग बनी, यह उल्टी मति का व्यर्थ-ज्ञान

तुम भूल गये पुरुषत्व-मोह में कुछ सकता है नारी की

समरसता है  संबंध बनी अधिकार और अधिकारी की।”¹²

‘आनंद सर्ग’ में मनु इस द्वंद्व से ऊपर उठता है। वह यह समझने लगता है  कि न तो केवल बुद्धि जीवन को पूर्ण बना सकती है और न ही केवल भावना। जब बुद्धि संवेदना से जुड़ती है और कर्म श्रद्धा से, तब जीवन में संतुलन आता है। इसी संतुलन की अवस्था को कवि ‘आनंद’ कहता है। यह आनंद इंद्रियों से मिलने वाला सुख नहीं है, जो क्षणिक होता है और शीघ्र समाप्त हो जाता है, बल्कि यह वह शांति है जो भीतर से उत्पन्न होती है और स्थायी होती है।  यह आनंद अहंकार के त्याग से जुड़ा हुआ है। जब मनुष्य अपने ‘मैं’ को जीवन का केंद्र मानना छोड़ देता है और स्वयं को व्यापक मानवता से जोड़ता है, तभी उसे सच्चे आनंद की अनुभूति होती है। मनु का आनंद भी इसी प्रक्रिया का परिणाम है। वह अब अपने सुख को ही सर्वोपरि नहीं मानता, बल्कि जीवन को समग्र दृष्टि से देखने लगता है। यह अवस्था ही मुक्ति की अवस्था है। यहाँ मुक्ति का अर्थ संसार से पलायन नहीं है। ‘कामायनी’ की मुक्ति जीवन से भागने की नहीं, बल्कि जीवन को सही ढंग से जीने की शिक्षा देती है। मनुष्य कर्म करता है, सोचता है, अनुभव करता है, लेकिन संतुलन के साथ। यही मुक्ति है। यही कारण है कि आनंद सर्ग आधुनिक मनुष्य के लिए अत्यंत प्रासंगिक बन जाता हैं। आज का मनुष्य, विज्ञान तकनीक और ज्ञान मे आगे बढ़ चुका है। उसके पास शक्ति भी है और साधन भी। फिर भी वह तनाव, अकेलेपन और असंतोष से घिरा हुआ है। इसका कारण यह है कि उसने आनंद को सुख समझ लिया है और सुख को केवल भोग से जोड़ दिया है। ‘कामायनी’ यह स्पष्ट करती हैं कि भोग से मिलने वाला सुख कभी भी स्थायी नहीं हो सकता। स्थायी आनंद केवल तभी संभव है। जब जीवन में विचार, भावना और कर्म का संतुलन हो। इस प्रकार ‘आनंद सर्ग’ यह संदेश देता है कि मानव जीवन की सार्थकता न तो केवल ज्ञान मे है, न केवल शक्ति में और न ही केवल कर्म में, बल्कि इन तीनों के समन्वय से उत्पन्न आनंद में हैं। यहीं आनंद मनुष्य को भीतर से मुक्त करता है। यहीं मुक्ति-चेतना का चरम बिंदु है और यहीं ‘कामायनी’ का अंतिम और सबसे गहरा जीवन-संदेश है।

“समरस थे जड़ या चेतन,

सुंदर साकार बना था।

चेतना एक विलसती,

आनंद अखंड घना था।”¹³

‘उर्वशी’ की बात कर तो यह रामधारी सिंह दिनकर की आधुनिक हिंदी साहित्य की एक विशिष्ट काव्य कृति है। यह कृति केवल पौराणिक प्रेम कथा नहीं है, बल्कि आधुनिक मनुष्य के आंतरिक द्वंद, अतिरिक्त इच्छाओं और मानसिक संघर्ष की सशक्त अभिव्यक्ति हैं। ‘उर्वशी’ में प्रस्तुत त्रासदी बाह्य घटनाओं में नहीं बल्कि मनुष्य के मन के भीतर घटित होती है। इसका नायक पुरुरवा केवल एक पौराणिक राजा नहीं है, बल्कि वह आधुनिक मनुष्य के मानसिक संरचना और उसके आंतरिक त्रासदी का सशक्त प्रतीक है। दिनकर जी ने पुरुरवा को किसी आदर्श नायक के रूप में नहीं बल्कि एक संघर्षरत मानव के रूप में प्रस्तुत किया है यहीं कारण है पुरुरवा की पीड़ा, उसकी अस्थिरता और उसका द्वंद पाठक को आज के जीवन से जुड़ा हुआ प्रतीत होता है। पुरुरवा के भीतर प्रेम और वासना का द्वंद अत्यंत स्पष्ट है। उर्वशी के प्रति उसका आकर्षण केवल आत्मिक प्रेम नहीं है, बल्कि उसमें शारीरिक आकांक्षा और इंद्रिय सुख की तीव्र इच्छा भी समाहित है। वह उर्वशी को पाना चाहता है। उसे अपने पास रखना चाहता है। यह चाह धीरे-धीरे उसके विवेक और संयम को कमजोर कर देती हैं। प्रेम जो सामान्यतः मनुष्य को ऊंँचाई की ओर ले जाता है। यहाँ असंतुलन का कारण बन जाता है। यहीं स्थिति आधुनिक मनुष्य के जीवन में भी दिखाई देता है जहाँ प्रेम और भोग के बीच की सीमा धुंधली होती जा रही है। लेकिन पुरुरवा आत्मसंयम को महत्व देता है। वह जानता है कि असीमित इच्छा विनाश की ओर ले जाती है फिर भी वह स्वयं को इंद्रिय आकर्षण से मुक्त नहीं कर पाता। यह विरोधाभास उसकी त्रासदी को और गहरा कर देता है। ठीक इसी प्रकार आधुनिक मनुष्य भी यह जानता है कि आधुनिक भोग, लालसा और महत्वाकांक्षा उसे भीतर से खोखला कर रही है फिर भी वह उनसे दूर नहीं हो पता। चेतना और आचरण के बीच यही दूरी आधुनिक जीवन का सबसे बड़ा संकट है। पुरुरवा कहता हैं-

  “कई बार चाहा, सुरपति से जाकर स्वयं

कहूं मैं, अब उर्वशी बिना यह जीवन

भार हुआ जाता है, बड़ी कृपा हो आप

यदि भूतल पर जाने दें।

पर मन ने टोका, “क्षत्रिय भी भीख मांगते हैं क्या? 

और प्रेम क्या कभी प्राप्त होता है भिक्षाटन से?”¹⁴

पुरुरवा का कर्तव्य बोध उलेखनीय है। वह राजा है। उस पर राज्य, समाज और प्रजा की जिम्मेदारियाँ हैं, किंतु जब उर्वशी के प्रति उसका प्रेम तीव्र होता है। तब कर्तव्य पीछे छूटने लगता है। वह व्यक्तिगत सुख को सामूहिक उत्तरदायित्व से ऊपर रखने लगता है। वह निजी जीवन और सामाजिक उत्तरदायित्व में संतुलन स्थापित नहीं कर पाता है। यह संघर्ष केवल पुरुरवा का नहीं है आज का मनुष्य भी निजी जीवन और सामाजिक दायित्व के बीच संतुलन बनाने में असमर्थ दिखाई देता है जिसके परिणामस्वरुप वह अपराध-बोध तनावग्रस्त और मानसिक द्वंद्व  से घिर जाता है। दिनकर जी ने पुरुरवा  की त्रासदी को किसी दैवीय शाप या बाहरी घटना से नहीं जोड़ा है। उसकी त्रासदी का कारण उसका स्वयं का मन है। उसके भीतर उठने वाले इच्छाएँ, उसके प्रश्न, उसकी अतृप्ति यही सब मिलकर उसे तोड़ते हैं। इस दृष्टि से ‘उर्वशी’ की त्रासदी आधुनिक त्रासदी हैं। जहांँ संघर्ष बाहरी नहीं बल्कि आंतरिक है। यही कारण है कि पुरुरवा का पतन भी आत्मिक है और उसकी पीड़ा भी मानसिक है। अनेक आलोचकों ने माना है कि पुरुरवा आधुनिक व्यक्ति की उस अवस्था का प्रतीक है जहाँ न तो पूर्णतः भोग को स्वीकार कर पता है और न ही पूर्णतः त्याग को। वह दोनों परिस्थितियों के बीच लगातार उलझा रहता है। यहीं उलझन उसकी सबसे बड़ी कमजोरी और उसकी त्रासदी का मूल कारण है। पुरुरवा का यह संघर्ष हमें सोचने पर विवश करता है कि यदि मनुष्य अपनी इच्छाओं का संतुलन नहीं रख पाए तो चेतना और विवेक होते हुए भी वह दुखी ही रहेगा वह कहता हैं-

“और कभी यह भी सोचा है

जिस सुगंध से छलकर बिकल

वायु बह रही मत होकर त्रिकाल

त्रिभुवन की 

उसे दिगंत व्यापिनी गंध की

अव्यय अमर शिखा को

मत्य प्राण की किस निकुंज वीथी में बांध धरेगा?”¹⁵

 उपर्युक्त पंक्तियों का तात्पर्य यह है कि क्या तुमने कभी यह विचार किया है कि जिस दिव्य सुगंध से पूरी वायु मतवाली होकर बह रही है जो तीनों कालों(भूत, वर्तमान और भविष्य) तथा तीनों लोकों में फैली हुई है, उस अनंत और अमर सुगंध को कोई सीमित मनुष्य अपने छोटे से जीवन में कैसे बाँध सकता है? यहाँ मनुष्य की सीमितता और प्रेम या सौंदर्य की असीमता के बीच का अंतर दिख रहा है। मनुष्य नश्वर है, उसका जीवन छोटा है, लेकिन प्रेम और सौंदर्य अनंत है, इसका विस्तार बड़ा है। इसलिए उन्हें किसी एक व्यक्ति स्थान या संबंध में पूरी तरह बांधकर नहीं रखा जा सकता। इन पंक्तियों का मूल भाव हैं कि सच्चा प्रेम और सौंदर्य किसी सीमा में बाँधने वाली वस्तु नहीं है, वह अनंत, अमर और सर्वव्यापी हैं। यदि मनुष्य अपने पास इसे रखना भी चाहे फिर भी वे अपनी व्यापकता के कारण किसी एक “निकुंज वीथी” अर्थात छोटे से जीवन या संसार में कैद नहीं हो सकते। इस प्रकार ‘उर्वशी’ का पुरूरवा केवल अतीत का पात्र नहीं है। वह आज के मनुष्य का आईना है। उसका प्रेम, उसका मोह, उसका द्वंद्व और उसकी असफलता सब कुछ आधुनिक जीवन की सच्चाई को उजागर करता है। यहीं ‘उर्वशी’ की सबसे बड़ी उपलब्धि है कि वह पौराणिक कथा के माध्यम से आधुनिक मनुष्य की त्रासदी को गहराई से अभिव्यक्त करती है। ‘उर्वशी’ में प्रेम का स्वरूप जटिल है। यह शुद्ध आध्यात्मिक प्रेम नहीं है और न ही केवल शारीरिक आकर्षण। यहीं द्वंद्व पुरुरवा को भीतर से तोड़ देता है। जब प्रेम वासना से नियंत्रित होता है, तब वह मनुष्य को मुक्ति नहीं बल्कि पीड़ा देता है। दिनकर इस द्वंद्व को अत्यंत स्पष्ट रूप में प्रस्तुत करते हैं। वह यह दिखाते हैं कि आधुनिक मनुष्य भी प्रेम को उपभोग की वस्तु समझने लगता है परिणामस्वरुप उसे संतोष नहीं मिलता। पुरुरवा कहता हैं-

“रूप की आराधना का 

मार्ग आलिंगन नहीं तो 

और क्या है? स्नेह को

 सौन्दर्य को उपहार 

रस चुम्बन नहीं तो और क्या है?”¹⁶

डॉ. नगेंद्र ने ‘उर्वशी’ के संदर्भ में कहा है-“उर्वशी में दिनकर ने आधुनिक मनुष्य की अतृप्त कामनाओं को पौराणिक रूपक में ढाला है।”¹⁷ उर्वशी सौंदर्य की प्रतीक है। परंतु यह सौंदर्य पुरुरवा को शांति नहीं देता। वह सौंदर्य को पाने के बाद भी संतुष्ट नहीं हो पता। यह असंतोष आधुनिक उपभोक्तावादी चेतना का प्रतीक है। आधुनिक मनुष्य भी सौंदर्य, सुविधा और सुख के पीछे भागता है। परंतु इन्हें पाने के बाद भी उसका मन खाली रहता है। यहीं स्थिति पुरुरवा की त्रासदी बन जाती हैं। पुरुरवा अपने प्रेम को अधिकार की दृष्टि से देखने लगता है।  इतना ही नहीं वह उर्वशी को भी अपने अधिकार की वस्तु मानने लगता है। यहीं अहं उसकी त्रासदी को गहरा करता है। आधुनिक मनुष्य भी संबंधों में अधिकार और स्वामित्व की भावना से ग्रस्त रहता है। इससे सम्बन्ध टूटते हैं और पीड़ा बढ़ाती हैं। डॉ. रामविलास शर्मा के अनुसार-“उर्वशी में पुरुरवा का संकट प्रेम का नहीं, उसके अहं का हैं। पुरुरवा की पीड़ा किसी बाहरी शक्ति से नहीं आती। यह पीड़ा उसके भीतर से उत्पन्न होती हैं। वह स्वयं अपनी त्रासदी का कारण बनता हैं।”¹⁸ यहीं आधुनिक त्रासदी की सबसे बड़ी विशेषता है, इस प्रकार ‘उर्वशी’ में प्रस्तुत त्रासदी आधुनिक मनुष्य की उस मानसिक स्थिति को व्यक्त करती हैं, जहाँ वह अपनी इक्षाओं और अहं के कारण स्वयं को दुखी करता है। रामधारी सिंह दिनकर की उर्वशी केवल प्रेम और सौंदर्य की काव्य-रचना ही नहीं है। बल्कि यह आधुनिक मनुष्य को उसकी त्रासद मानसिक स्थिति से बाहर निकालने का प्रयास भी करता है। दिनकर इस काव्य-कृति में यह स्पष्ट करते हैं कि भोग प्रधान प्रेम मनुष्य को अशांत कर देता है जबकि उदात्त और संयमित प्रेम मुक्ति की ओर ले जाता है। ‘उर्वशी’ में मुक्ति चेतना का केंद्रीय सूत्र हैं- भोग से योग की यात्रा। प्रारंभ में पुरुरवा प्रेम को केवल भोग की दृष्टि से देखा है। वह सौंदर्य और आकर्षक में उलझा रहता है। परिणामस्वरुप वह मानसिक असंतुलन और पीड़ा का शिकार हो जाता है। धीरे-धीरे उसे यह बोध होता है कि प्रेम केवल दैहिक सुख नहीं है, बल्कि वह आत्मिक सुख है। जब उसे यह बोध होता है, तो उसके भीतर परिवर्तन आता है। यहीं परिवर्तन उसके मुक्ति की दशा हैं वह कहता हैं-

“यह लो, अपने घूर्णिमान सिर पर से

 हटा कर ऐल वंश का आयु के मस्तक पर धरता हूँ। 

लो पूरा हो गया राज्य-अभिषेक! 

कृपा पूषण की। 

ऐल-वंश-अवतंस नए सम्राट् आयु की जय हो। 

महाराज! मैं मुक्त अब कानन को जाता हूँ।”¹⁹

दिनकर प्रेम को नकारते नहीं हैं। वे उसे शुद्ध करते हैं। ‘उर्वशी’ में प्रेम वासना से ऊपर उठकर करुणा, त्याग और आत्मिक चेतना का रूप ग्रहण करता है। यह प्रेम मनुष्य को ऊँचा उठाता है। डॉ नगेन्द्र के शब्दों में- “उर्वशी  में प्रेम का रूपांतरण ही पुरूरवा की मुक्ति का आधार है।”²⁰ मुक्ति-चेतना का एक महत्वपूर्ण पक्ष अहं का क्षय है। पुरूरवा उर्वशी पर अधिकार जताने की भावना छोड़ता है, तब वह प्रेम के वास्तविक स्वरूप को समझ पाता है। यह आत्मबोध आधुनिक मनुष्य के लिए भी उतना ही आवश्यक है। आधुनिक जीवन में अहं और स्वामित्व की भावना संबंधों को विकृत कर देती है। दिनकर इस अहं से मुक्ति को ही वास्तविक मुक्ति मानते हैं। ‘उर्वशी’ में अंततः प्रेम व्यक्तिगत स्तर से उठकर मानवीय स्तर पर पहुँचता है। यह केवल एक स्त्री-पुरुष का संबंध नहीं रह जाता। यह व्यापक मानवीय चेतना का प्रतीक बन जाता है। यहीं मुक्ति की अवस्था है। नलिन विलोचन शर्मा लिखते हैं- “उर्वशी में मुक्ति किसी तपस्या से नहीं, प्रेम के मानवीकरण से प्राप्त होती है।”²¹ आज का मनुष्य प्रेम को उपभोग की वस्तु बना रहा है। इससे उसे संतोष नहीं मिलता। ‘उर्वशी’ यह संदेश देती है कि प्रेम तभी सार्थक है, जब उसमें संयम, सम्मान और करुणा हो। इस प्रकार ‘उर्वशी’ आधुनिक मनुष्य को उसकी त्रासदी से बाहर निकालकर आत्मिक संतुलन की ओर ले जाती है। यहीं इसकी सबसे बड़ी उपलिब्ध है।

‘कामायनी’ और ‘उर्वशी’ का तुलनात्मक विश्लेषण 

‘कामायनी’ और ‘उर्वशी’ दोनों ही आधुनिक हिंदी साहित्य की महत्वपूर्ण काव्य-कृतियाँ है। यदि दोनों की कथा भूमि पौराणिक हैं फिर भी उनकी चेतना आधुनिक है। दोनों काव्य आधुनिक मनुष्य की त्रासदी और उसकी मुक्ति-चेतना को भिन्न-भिन्न मार्ग से प्रस्तुत करते हैं। ‘कामायनी’ में आधुनिक मनुष्य की त्रासदी बुद्धि-प्रधान जीवन से उत्पन्न होती हैं। मनु का चरित्र उस मानव का प्रतीक है जो केवल तर्क और विवेक के सहारे जीवन को समझना चाहता है। परिणामस्वरुप वह संवेदना से दूर होता जाता है। वहीं ‘उर्वशी’ में आधुनिक त्रासदी अतृप्त प्रेम और कामना के रूप में सामने आती हैं। पुरुरवा का संघर्ष भावात्मक है। वह प्रेम और अधिकार बोध के कारण मानसिक पीड़ा झेलता है। मुक्ति-चेतना की दृष्टि से भी दोनों काव्यों का मार्ग अलग है। ‘कामायनी’ में मुक्ति बुद्धि और श्रद्धा के समन्वय से प्राप्त होती हैं। प्रसाद का विश्वास है कि जीवन का संतुलन ही आनंद और शांति का मूल है। इसके विपरीत ‘उर्वशी’ में मुक्ति प्रेम के परिष्कार से प्राप्त होती हैं। दिनकर यह स्पष्ट करते हैं कि जब प्रेम वासना और अहं से मुक्त होकर मानवीय बनता है तभी वह मुक्ति का साधन बनता है। डॉ. नगेन्द्र का यह कथन ध्यातव्य है कि-“‘कामायनी ’और ‘उर्वशी’ दोनों आधुनिक मनुष्य की अलग-अलग पीड़ाओं को सामने लाकर उन्हें एक व्यापक मानवीय समाधान की ओर ले जाती है।”²² इस प्रकार ‘कामायनी’ दार्शनिक और मानसिक स्तर पर मुक्ति का मार्ग सुझाती है जबकि ‘उर्वशी’ भावात्मक और नैतिक स्तर पर समाधान प्रस्तुत करती है दोनों मिलकर आधुनिक मानव जीवन का समग्र चित्र प्रस्तुत करते हैं।

निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि ‘कामायनी’ और ‘उर्वशी’ दोनों काव्य आधुनिक मनुष्य की त्रासदी को गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। ये त्रासदियाँ बाह्य परिस्थितियों से अधिक मनुष्य के आंतरिक जीवन से जुड़ी हैं। बुद्धि और भावना का संतुलन अतृप्त इच्छाएँ, अहंभाव और आध्यात्मिक रिक्तता यहीं आधुनिक मनुष्य की मूल समस्याएँ हैं। इन समस्याओं का समाधान भी दोनों काव्य प्रस्तुत करते हैं। ‘कामायनी’ आत्मबोध संतुलन और समन्वय के माध्यम से मुक्ति का मार्ग दिखाती हैं वहीं ‘उर्वशी’ प्रेम को वासना से ऊपर उठाकर मानवीय और नैतिक ऊँचाई प्रदान करती हैं। दोनों कृतियाँ यह संदेश देती है की मुक्ति किसी बाहरी साधन से नहीं बल्कि मनुष्य के भीतर से प्राप्त होती हैं। आज के समय में जब मनुष्य मानसिक तनाव और अकेलेपन से जूझ रहा है। जिसके कारण ‘कामायनी’ और ‘उर्वशी’ के प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती हैं। ये काव्य आधुनिक मनुष्य को उसकी त्रासदी का बोध कराते हैं और साथ ही उसे जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टि भी प्रदान करते हैं, इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि ये दोनों काव्य केवल साहित्यिक कृतियांँ नहीं है बल्कि आधुनिक मानव चेतना के गहन दस्तावेज है जो आज भी मनुष्य को मुक्ति का मार्ग दिखाने में सक्षम है।

संदर्भ ग्रंथ सूची 

1.सिंह,नामवर-आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या-115

2.सिंह,नामवर-दूसरी परंपरा की खोज, राजकमल प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली,1982, पृष्ठ संख्या- 142 

3.डॉ नगेंद्र-आधुनिक हिंदी कविता की प्रमुख प्रवृत्तियाँ,1951,पृष्ठ संख्या- 76 

4. वहीं, पृष्ठ संख्या- 156

5.  वहीं, पृष्ठ संख्या- 162 

6. वहीं, पृष्ठ संख्या- 170

7. प्रसाद, जयशंकर-कामायनी, अनुपम प्रकाशन(पटना कॉलेज के सामने),पटना,1936, रहस्य सर्ग, पृष्ठ   संख्या- 134 

8. वहीं, चिंता सर्ग, पृष्ठ संख्या- 13

9. वहीं, चिंता सर्ग, पृष्ठ संख्या-13-14

10. वहीं, ईर्ष्या सर्ग, पृष्ठ संख्या-68

11. वहीं, आनंद सर्ग, पृष्ठ संख्या-142

12. वहीं,इड़ा सर्ग, पृष्ठ संख्या-72

13. सिंह, नामवर-कविता के नए प्रतिमान, राजकमल प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली,1968,पृष्ठ संख्या- 92 

14. वाजपेयी, नन्दुलारे-जयशंकर प्रसाद,1940, पृष्ठ संख्या- 58

15. दिनकर, रामधारी सिंह, उर्वशी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली,1961,तृतीय अंक, पृष्ठ संख्या-52 

16. वहीं, तृतीय अंक, पृष्ठ संख्या- 53

17. वहीं, तृतीय अंक, पृष्ठ संख्या- 57

18. वहीं, पंचम अंक, पृष्ठ संख्या- 142

19. शर्मा, नलिन विलोचन, दिनकर और उनकी काव्य कृतियाँ, पृष्ठ संख्या- 98 

20. वहीं, पृष्ठ संख्या- 105 

21. कबीर,कबीर ग्रंथावली, संपादक, बाबू श्यामसुंदर दास, नई दिल्ली, राधाकृष्ण प्रकाशन।

22. शर्मा, नलिन विलोचन, छायावाद और प्रगतिवाद, पृष्ठ संख्या- 134

मैं ‘सनम कुमारीप्रमाणित करती हूं कि यह लेख अप्रकाशित/ अप्रसारित है तथा इसमें उद्धरणों के अलावा plagiarism नहीं है।

सनम कुमारी 

शोधार्थी, हिन्दी विभाग,

पटना विश्वविद्यालय,पटना,बिहार

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ISSN 2394-093X
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