नाम जोती था मगर वे ज्वालामुखी थे

महात्मा जोतीबा  फुले की जयंती  (11 अप्रैल ) पर विशेष.... 

मनीषा बांगर और डा. जयंत चंद्रपाल 

इनका जीवनक्रम ज्योति था बिलकुल ज्योति की तरह अन्धकार को विलय करनेवाला ..  पर उनके कवन ज्वाला मुखी थे | इसीलिए उनका जीवनक्रम तो महत्वपूर्ण है ही मगर उससे ज्यादा महत्वपूर्ण है उनके कवन... उनके विचार... |उनका जीवन हमारे लिए श्रद्धा और आस्था का विषय बन सकता है तो उनके कवन हमारे लिए दर्शन और संकल्प का विषय बन सकता है | वैसे भी हमें हमारे मार्गदर्शक डी के खापर्डे साब ऐसा कहा करते थे कि व्यक्ति से ज्यादा महत्वपूर्ण उनके विचार होते है; जब तक सांस चलती रहती है जीवन चलता रहता है; सांस रुक जाती है जीवन समाप्त हो जाता है मगर जब तक उनके विचार जिन्दा रहते है तब तक व्यक्ति जिन्दा रहता है |

क्या है जोतीराव फुले के कवन...?
क्या है उनकी विचारधारा...?  और
क्या है उनका सामाजिक क्रांतीवाद...?
जो ज्योति को ज्वालामुखी में बदल देता है |
जोतीराव के सामाजिक क्रांतीवाद की रूपरेखा अत्यंत स्पष्ट थी...


उनका सामाजिक क्रांतिवाद सबसे पहले दुश्मन की सही सही पहचान करता है और फिर उनसे निपटने के उपाय बताता है | अगर एक लाइन में कहा जाय तो  उनके  सामाजिक क्रांतिवाद का प्रारंभ होता है “शूद्र -अतिशूद्र बनाम शेठजी भटजी” संकल्पना से. यह महात्मा बुद्ध  की “बहुजन हिताय बहुजन सुखाय” की संकल्पना का पुनरुत्थान है |

सावित्रीबाई फुले : शैक्षिक –सामाजिक क्रान्ति की अगुआ

जोतीराव यहाँ पर नहीं रुकते. शुद्र-अतिशूद्र बनाम शेठजी भटजी” संकल्पना से प्रारंभ करते है और आगे कहते है की यह आर्य इरानी भट्ट बाहर से आये है | यहाँ पर वे “शूद्र -अतिशूद्र बनाम शेठजी भटजी” की संकल्पना को विकसित करते है “मूलनिवासी बनाम विदेशी” के नारे से |

यहाँ पर वे स्पष्टरूप से कहते हैं कि  यह जो भटजी (शेठजी भटजी) है वह आपके दुश्मन है और वे इस देश के मूलनिवासी नहीं है वे विदेशी है और बाहर से आये है... वे आर्य है और इरान अर्थात मध्य एशिया से आये हैं | इन्होने आपको न केवल राजनितिक या आर्थिक गुलाम बनाया है बल्कि सांस्कृतिक एवं मानसिकरूप से भी गुलाम बनाया है |

जोतीराव के विचारदर्शन का महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि वे सामाजिक ध्रुवीकरण पर बल देते हैं,  इसीलिए तो वे  शूद्र-अतिशूद्र , जो आजके समय के SC-ST-OBC और कुछ मध्यवर्ती जातियां उनके आपसी भाईचारे के आधार पर मूलनिवासियो के बहुजन समाज की संकल्पना रखते है , और इन्ही से राष्ट्र निर्माण का काम होगा यह संदेश देते है | इसीलिए तो वे कहते है कि “हजारो जातियों में बंटे लोग एक राष्ट्र कैसे हो सकते है” अर्थात अगर आप राष्ट्र निर्माण करना चाहते हो तो फिर तो आपको इन जातियों को तोडना होगा और  जातियो को शेठजी भटजी तोड़ेंगे यह मानना बेवकूफी होगी |


जो लोग जाति विभाजन के आधार पर जिन्दा है और आपके मालिक बने बैठे है वह जातियों को तोड़ेंगे ऐसा मानना एक छलावा है | इसीलिए जातियों को तोड़ने के लिए शूद्र अतिशुद्रो में भाईचारा का निर्माण कर उनका एक समाज निर्माण करना ही उपाय है | उनकी यह विचारधारा उनके द्वारा लिखित/निर्मित साहित्य से सम्पूर्ण स्पष्ट होती है |

महात्मा फुले का क्रांतिकारी स्त्रीवाद

तृतीय रत्न (1855) इस नाटिका में ब्राह्मणों की प्रतीकात्मक सता को चुनौती देते हुए  मनोवैज्ञानिक भय के आधार पर ब्राह्मण किस तरह से शोषण का जाल रचता है उस प्रक्रिया को स्पष्ट स्वरुप देते है |  कुनबी दंपति और धूर्त ब्राह्मण के संवादों के माध्यम से ब्राह्मणों की चालाकी को उजागर करने है  और यह भी स्पष्ट करते हैं  कि

अंग्रेजो के आने से नए ज्ञानतंत्र का विकास जरूर हुआ है पर फिर भी कैसे ब्राह्मण नयी स्थितियों  में भी अपने ज्ञान या सूचनाओं का इस्तेमाल शूद्र  अतिशुद्रो को मुर्ख बनाकर ठगने के लिए करता है |  अंग्रेजो के नए बनाए प्रशासनतंत्र में भी ब्राह्मणों ने अपना जाल बना लिया है और वहां बैठकर वे ब्राह्मणवादी चालबाजियो से एक परंपरागत शोषण और पाखंड का शोषण कर रहे है |

विद्रोह की मशाल है सावित्रीबाई फुले की कविताएं

'ब्राह्मणा चे कसब अर्थात ब्राह्मणों की चतुराई (1869)', बीस पन्ने की इस लघुकिताब में वे कहते हैं कि शूद्र  जातियों में आज भी पुरोहितगिरी प्रकोप चलता है और उनके घरो में आज भी बाजीराव पेशवा के जमाने की पुरोहितगिरी राज कर रही है | किस तरह ब्राह्मण सदियों से शास्त्र, ग्रह, नक्षत्र एवं ज्योतिष के आधार पर पुरोहितगिरी के हथकंडे अपनाते है और  शुद्र अतिशूद्रो का शोषण करते है |  इस लघुपुस्तिका में इस बात का वर्णन करते हैं  कि   किस तरह ब्राह्मण ग्रह और नक्षत्रो का भय दिखाकर शूद्रअतिशूद्रो को दुविधा में डाल कर डराते है; और  जब भय के मारे शुद्र अतिशूद्र की मति मारी जाति है तो कैसे वे शस्त्र एवं ज्योतिष का सहारा लेकर चतुरायपूर्ण उपाय बताते हुए ब्रह्मभोज, जप, तप, यज्ञ और ग्रहशांति के नाम पर लुटने खसोटने का काम करते है | इस तरह वे शूद्र अतिशूद्रों को बर्बाद करने की उनकी जालसाजी का पर्दाफाश करते है

शिवाजी का पोवाडा (जून-1969)  यह वीरगाथा के रूप में एक महाकाव्य है |  इसमें वे शिवाजी के ओजस्वी एवं निर्भीक चरित्र का बहुत ही अनुपम वर्णन करते है | साथ साथ यह भी कहते हैं कि  कुनबी माली महार मातंग यह जातीय आरम्भ में शाषक जातियां थी वे शासन करते थे,  पर ब्राह्मणों की चालाकियो ने उन्हें शूद्र अतिशूद्र बना दिया और अधिकार वंचित करते हुए गुलाम बना दिया | इस पोवाडा में वे अपने आक्रामक एवं तर्कनिष्ठ शैली से
ब्रह्मा द्वारा चार वर्णों की उत्पति की कठोर आलोचना भी करते हैं | इस रचना में शिवाजी के गौरव गान के जरिये उन्ही जातियों को अपने गौरवशाली अतीत की पहचान कराते हुए उन्हें याद करने की प्रेरणा दी गई है |  इसी  जून १९६९ में उन्होंने एक और पोवाडा भी रचा था शिक्षा विभाग के ब्राह्मण अध्यापक का |


1973 में जोतीराव की सबसे महत्वपूर्ण रचना “गुलामगिरी” प्रसिद्ध होती है | अब ज्योति से ज्वालामुखी होने का परिचय तो इस किताब की प्रस्तावना से ही मिल जाता है | प्रस्तावना में वे लिखते हैं कि  “ सैकड़ो  सालो से आज तक  शूद्र अतिशूद्रो समाज, जबसे इस देश में ब्राह्मणों की सत्ता कायम हुई तब से लगातार जुल्म और शोषण के शिकार है | ये लोग हर तरह की यातनाओं और कठिनाइयो में अपने दिन गुजार रहे हैं,  इसलिए इन लोगो को इन बातो की और ध्यान देना चाहिए और गंभीरता से सोचना चाहिए |  ये लोग अपने आपको ब्राह्मण पंडा पुरोहितों की जुल्म ज्यादतियों से कैसे मुक्त कर सकते हैं,  यही आज हमारे लिए महत्वपूर्ण सवाल है | यही इस ग्रन्थ का उद्देश्य भी है |

आक्रमक शैली में लिखे  गये इस ग्रंथ में गुलामी के मनोविज्ञान, यांत्रिकी और षड़यंत्र को उजागर किया गया है | पुरुष प्रधान समाज के पाखंड और जाति एवं लिंग के आधार पर किये जा रहे शोषन का मुद्दा भी उठाया गया है | उनका कहना है कि  धर्मशास्त्रों  की आज्ञाओ से उपजे भयो और प्रलोभनों पर कड़ी गुलामी की यह इमारत अपने आप में विशुद्ध भारतीय घटना है | जोतीबा  इन भयों और लोभ लालच की जाँच पड़ताल करते है और बतलाते है कि  यह सब किसलिए और किन लोगों  ने रचा है |

“गुलामगिरी” ग्रंथ शूद्रों  को उनके वास्तविक इतिहास का ज्ञान भी करता है |  इसमें यह भी बताया गया है कि .षड्यंत्रकारी शास्त्रकारो ने किस तरह गोल मोल पुराण कथाओ में खुद के षड्यंत्रों को देवी देवताओ के किस्सों में लपेटा है और बाद में उन्ही किस्सों को घटनाओ का स्वरुप देते हुए त्योहारों और अनुष्ठानो से जोड़कर लोगो के मन में गहराई तक उतार दिया है ताकी किसी अच्छे से अच्छे पढ़े लिखे व्यक्ति के मन में भी उन मान्यताओ के बारे में कोई प्रश्न ही पैदा ना हो

सावित्रीबाई फुले-स्त्री संघर्षो की मिसाल

यह बिलकुल स्वाभाविक लगता है की.. डॉ अम्बेडकर की किताब “शूद्रो की उत्पति” का आधार “गुलामगिरी” ही रही होगी ।  और  इसी लिए ही तो 25 अक्तूबर 1954 को पुरंदरे स्टेडियम की जहाँ बाबासाहब का हीरक महोत्सव मनाया गया था;  वहां बाबा साहब ने कहा की मेरे तिन गुरु है ... बुद्ध, कबीर और जोतिबा फुले .... इस तरहा जोतीराव का स्थान बाबासाहब के जीवन मे गुरुवर्य का था

1983 में उनकी किताब आती है किसान का कोड़ा; यह किताब  जोतीराव फुले के आर्थिक दर्शन को स्पष्ट करती है |  पेशवाई में किसान वह वर्ग था जो सामाजिक आर्थिक एवं धार्मिक हर तरह से सताया हुआ था |  इनके प्रति जोतिबा की संवेदना स्फुट ना हो ऐसा तो हो ही नहीं सकता |  इस किताब की प्रस्तावना में ही जोतीबा लिखते हैं, “शूद्र किसान के इस दयनीय एवं दीन अवस्था के धार्मिक एवं राज्य सम्बन्धी कई कारण है | उन तमाम कारणों में से कुछ कारणों का विश्लेषण करने के उद्देश से ही मैंने इस ग्रंथ को लिखा है | जोतिबा किसानो के इस शोषण के सन्दर्भ में कहते है के “ दुनिया के तमाम देशो के इतिहास की एक दुसरे से तुलना करने से यह निश्चित रूप से दिखाई देता है कि इस देश के अज्ञानी, अनपढ़, भोलेभाले शुद्र किसानो की स्थिति अन्य देशो के किसानो से भी बदतर है | पशु से भी बुरी स्थिति में पहुंची है |


सरकारी तंत्र में पनप रहे ब्राह्मणवाद को पहचानते हुए और उसको बेनकाब करते हुए लिखते हैं कि “सरकारी विभागों में ब्राह्मण कर्मचारियो का वर्चस्व  होने की वजह से वे अज्ञानी किसानो को इस तरह से फांसते है की उनके पास अपने नन्हे मुन्हें बच्चो को स्कूल में दाखिला देने के लिए तक के साधन नहीं बचता |अगर किसीके पास कुछ साधन बच भी गये  तो पंडो की गलत सलाह की वजह से आपने बच्चो का स्कूल में दाखिला नहीं कराते |” उनके द्वारा साहित्य निर्माण का कार्य निरंतर चलता रहता है ।

1885 में उनकी कई किताबें प्रसिद्ध होती है जिनमे मुख्य है सतसार भाग – 1 और 2, जो कि महिलाओं के अधिकारों को ध्यान में रखकर लिखी गई थी एक तरफ वे ब्राह्मणवादी शास्त्रों पर धावा बोलते है तो दूसरी तरफ पंडिता रमाबाई का समर्थन कर खलबली मचा देते है |  सतसार दो में भी पंडिता रमाबाई प्रकरण को एक सन्दर्भ की तरह उपयोग करते हुए वे समाज के स्त्री विरोधी मानस का आलोचनात्मक मूल्यांकन करते है | इशारा नाम से प्रसिद्ध उनकी किताब में उन्होंने कैसे जातियों का असंतुलन समूचे देश के विकास को प्रभावित करता है इस बात को उजागर किया है |  1985 में ही उनकी किताब 'अछूतों की कैफियत' तैयार हो चुकी थी मगर वे प्रसिद्ध नहीं कर पाए |

उन्होंने अपनी आखिरी रचना  “सार्वजनिक सत्य धर्म” लिखा और उसको 1891 में प्रसिद्ध किया गया | इस पुस्तक में उन्होंने  समता मूलक समाज का निर्माण करने के लिए ३३ नियम बनाए यह नियम नैतिकता, समानता, अधिकार, स्वतंत्रता सहित तर्कशीलता के आयामों को तो स्थान दिया ही जाता है इसके साथ साथ एक अनुसासन के भी बात मुख्यरूप से रखी गई है | बाबासाहब की २२ प्रतिज्ञा और जोतीबा के इस तैतीस नियम बहुत ही क्रांतिकारी नजर आते है |

और इस तरह यही उनके क्रांतिकारी कवन,  यही उनकी क्रांतिकारी विचारधारा,  यही उनका सामाजिक क्रान्तिवाद उन्हें नाम से ज्योति पर कार्य एवं विचार से ज्वाला मुखी बना देते है ।*

संदर्भ:

आधुनिक सामाजिक क्रांति के पितामह महात्मा जोतीराव फुले_
लेखक - डी के खापर्डे

_युगपुरुष महात्मा जोतीराव फुले_
लेखक - मुरलीधर जगताप

_जोतिबा फुले - जीवन और विचार_
लेखक - संजय  जोठे

मनीषा  बहुजन विचारक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं. बामसेफ की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं. डा. जयंत चन्द्रपाल बहुजन विचारक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं. 
स्त्रीकाल का संचालन 'द मार्जिनलाइज्ड' , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

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