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जंग खोज निकालता है कोई और खूबसूरत सी चीज

हर्ष भारद्वाज

सरस्वती विद्या मंदिर, फ़ारबिसगंज के छात्र है.

यकीन नहीं होगा आपको कि ये दसवीं में पढ़ रहे एक किशोर की कविताएँ हैं. 


एक दूसरे से प्रेम करते हुए 


मैं चाहता हूँ
कि हम पकड़े जाएं
एक दूसरे से प्रेम करते हुए
और मार दिए जाएं
किसी बन्दूक की आवाज़ पर
या किसी छूरी की चमचमाहट से
या किसी रॉड के भार से।

मैं चाहता हूँ
हम मरने से पहले लिपट जाएं एक दूसरे से
और छू लें एक दूसरे की सांसों को,
पहली बार!
और हमारे बदन में बची थरथराहट
कोई कसर न छोडे
एक दूसरे के
अधमरे,
खूनसनी मरी देह को
पूरा मारने में!

मैं चाहता हूँ
की हम दफना दिए जाएं ,
मेरी देह के ऊपर देह,
उसी आम के बगीचे में
जहां हम छुप -छुप के मिलते थे
और साथ बैठकर बीड़ी पीते थे।

मैं चाहता हूँ
की हम मार दिए जाएं
बहुत चुपके से
बिना किसी शोर के
और फिर हमें कभी कोई खोजे ना।

मैं नहीं चाहता
कि हमारे दफ्न हड्डियों पर
आज से डेढ़ सौ साल बाद शोध हो।
मैं चाहता हूँ कि आज से डेढ़ सौ साल बाद
अगर कोई खोज निकाले हमारी कब्र
और खोदे उसे
तो मेरे छाती के एक हड्डी से लटक रहा हो तुम्हारे कानों का एक झुमका।

जंग खोज निकालता है कोई और खूबसूरत सी चीज 

तुम जानते हो,
मैं कश्मीर हूँ!
मेरे जिस्म पर बहुत उतार चढ़ाव हैं
मेरे जिस्म से फूटते हैं अनगिनत प्यासे झरने।
मैं बहुत खूबसूरत हूँ।

पर क्या देखा है कभी तुमने
मुझे रोते हुए?
और क्या देखा है तुमने कभी
मेरे कटे हुए स्तनों को?
(इन्हें किसने काटा?)
क्या तुम जानते हो
मेरी इस गोरी देह पर क्या जमा है?
यह लाल काला जमा हुआ पहाड़ नहीं
या कोई सूखा झरना नहीं,
या मेरी देह का मैल नहीं!
यह मेरे भीतर से बह रहा खून है
जो अभी भी लाल है
और जमकर काला सा है!
(मैं सोचती हूँ,
की कैसे बचा हुआ है
अभी भी मेरे अंदर खून
वह भी लाल!)

तुम जानते हो
मेरे दोनों हाथों में बारूद है
जो मैंने अपने ही खून से बनाया है,
जिसे मैं अपनी  ही देह पर
जलाती हूँ।
पर क्या करती मैं
खुद पर बम फोड़ने के सिवाय?
वर्षों से होता आया है मेरा बलात्कार
मेरे अपने हीं कहे जाने वाले घर में,
मेरे अपने घर के ही कहे जाने वाले सदस्यों के द्वारा,
मेरी सुरक्षा कर रहे जवानों के द्वारा!

तुमने कभी महसूस किया है,
कि कैसा लगता है जब
कोई बहुत बड़ा इंसानों का झुण्ड
कांधे पर बन्दूक लिये,
तुम्हारी जाँघों को कुचलता है,
अपने जूतों से,
और कुचलता हुआ,
देह के ऊपर चढ़ता है?
और कैसा लगता है
जब तुम्हारी छाती के किनारों पर छिड़ी हो जंग,
और तुम्हारी जिस्म के लिये हो वह जंग?

मैं तो पूरी नग्न हूं,
तुम देख सकते हो
मेरी देह के उतार चढ़ाव पर
खुनें खड्डे!
यह बम की आवाज से बने खड्डें,
मैंने खुद भी किये हैं,
और औरों को भी करने दिए हैं।

क्या तुम सोच सकते हो
की क्यूँ काट दिए मैंने अपने स्तन?
मैनें सोचा की मेरी खूबसूरती ही है
जंग की शुरुआत,
और जंग का अंत ही है मेरी आज़ादी!
पर वे नहीं रुके,
और नहीं रुके उनके हिलते जांघ,
मेरी जाँघों के बीच!

इसीलिए मैं मार रही हूँ खुद को,
अपने ही बनाए बम से
अपने ही धारदार नाखूनों से।
और मैं जानती हूँ
मेरा मरना घोषित किया जाएगा
आत्महत्या!
और बड़े ही आसानी से किया जाएगा ऐसा।

पर क्या कोई जंग कभी खत्म हो सकता है?
नहीं!
वह बस खोज निकालता है
कुछ और
बहुत हीं खूबसूरत चीज़!

आजादी 

हम बुन लेंगे आज़ादी,
सारी बेहूदगी के परे ,
नंगेपन के रेशों से
हम बुन लेंगे अपनी आज़ादी।

जिस तरह मर्द खोदते हैं खेत
हाथों में नसें उगाकर,
उसी तरह हम भी उगाएंगे नस,
अपने हाथों में
और नसों से बुनेंगे आज़ादी।

अब सूखे ख्वाबों और लिपस्टिक से हमारा पेट नहीं भरता है
अब हमें चबाना है आज़ादी।
पर किस तरह की आज़ादी पहनेंगे हम?

नंगेपन को अपना लिबास बना लें
पहनेंगे ऐसी आज़ादी!
मुंह में गाली भर जाए
घोटेंगे ऐसी आज़ादी!

अगर काट दिए जाए हमारे स्तन,
अगर फ़ाड़ दिए गए हमारे कपड़े,
तो हम बहुत से बहुत हाथ पैर मार सकते है,
और कुछ बेसी नहीं कर सकते।
(क्योंकि उनकी अपनी ऐसी भूख  है,
जिसे सिर्फ वे खुद मिटा सकते हैं और कोई नहीं)
लेकिन उन खून सने  स्तनों को लेकर हम,
घुस पाएं अपने ही घरों में
तो होंगे आज़ाद हम (और तुम भी)!
हमारा प्यार हमसे मुँह न फेर ले
हमारे फटे हुए स्लीव देखकर
तो होंगे आज़ाद हम (और तुम भी)!

हमें प्यार करने की आज़ादी हो ,
शादी करने की हो और उससे भी बेसी
तलाक लेने की हो आज़ादी हमें!
होगी ऐसी आज़ादी कि
छातियों पे मर्द उगाएंगे हम,
अनगिनत मर्द!

जिस तरह कुचलता आया है ,
हमारे समाज का ‘सुशील’ मर्द
अनगिनत औरतों के
गिने चुने अंग,
वैसी आज़ादी के साथ अब हम भी जिएंगे!
बहुत घिनौनी होगी , तुम्हारे लिए ऐसी आज़ादी
पर क्या कभी खुद को सूंघा है तुमने,
कि कितनी औरतों की बू आती है तुमसे?

हमें आज़ादी होगी अभद्रता की!
हमें फिक्र न होगी साइकिल चलाने में तब।
हमें शर्म ना आएगी, पेड़ों पर चढ़ने में तब।
कोई आगे से देखता है तो देखे
उसकी आँखें है ,
उसकी मर्ज़ी है।
हम आज़ादी छीनेंगे,
इज़्ज़त जैसे शब्द से!
और आज़ादी होगी हमें कविताएँ छानने की,
मनमर्ज़ी करने की,
आधी रात ट्रेन पकड़ने की!
हमारे काले या गोरे तन ,
किसी को चुभते हैं तो चुभे
इसमे हमारी क्या गलती है?

हम बरस जाएंगे,
बिजली की तरह
इस समाज पर
नंगे या ढके!
चाहे लोग हँसे या रोए,
पर अब हम घरो मे सहेज़ कर
नही रखने देंगे अपने यौवन को।

हमे नही चाहिए आज़ादी,
किसी की इच्छाओं को दबाने की
हमे नही चाहिए आज़ादी, रेप करने की
और नही चाहिए आज़ादी सड़क पर मूतने की!
किसी से डरकर नही चाहते हम रोड पर ना मूतना,
बल्कि इसलिए नही चाहते हम ऐसा करना कि हमें पता है,
कि दुर्गंध क्या होता है
और क्यों होता है!
(जो हमारे सुशील मर्दों को नही पता)

पर हमारी आज़ादी का दुश्मन  है कौन?
बस एक शब्द ही न
‘इज़्ज़त’!
हम जीत लेंगे उस पर,
ऐसी आज़ादी
कि वो शब्द फिर कभी नही दोहराया जाएगा!
उसके अक्षर
ब्लैक होल में दुबक जाएंगे!

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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अपने बच्चों को दूर रखे मर्दानगी की पाठशाला से

इमारतों में बनी पाठशालाएं, जहां हमने अक्षर ज्ञान की शुरुआत की और दुनिया भर का ज्ञान ग्रहण किया। जहां अध्यापकों ने परीक्षाओं का डर दिखाते हुए अलग-अलग तरीकों से हमें पढ़ाया। पाठशाला में किस समय आना है और किस समय जाना है ये सब तय होता है। इस पाठशाला के अलावा कुछ पाठशालाएं ऐसी भी हैं, जहां ना कोई अक्षर ज्ञान सिखाया जाता है और ना कोई किताबी ज्ञान। यहां कोई आने-जाने का समय तय नहीं होता और ना ही इसकी कोई इमारत नज़र आती है। लेकिन इस पाठशाला का वैचारिक ढांचा बहुत मजबूत है, जिसको हिलाने मात्र का प्रयास भी कठिन है। इस पाठशाला में जन्म से ही दाख़िला हो जाता है और यहां सारी उम्र पढ़ाई चलती रहती है। पुरुषों से मर्द बनाने की इस पाठशाला का नाम है :- ‘मर्दानगी की पाठशाला’ जहां पर अलग-अलग तरीकों से मर्दानगी के पाठ पढ़ाए जाते हैं और इसमें किताबी ज्ञान से ज्यादा प्रैक्टिकल सीखने पर ध्यान दिया जाता है।

इस पाठशाला में पुरुषों को मर्द बनाने के लिए, मर्दानगी की दौड़ में दौड़ने के लिए तैयार किया जाता है। सोचने की बात तो ये है कि इस  दौड़ के अंतिम चरण का कोई एक पैमाना नहीं है, जिसको हासिल करके पुरुष अपनी मर्दानगी को साबित कर पाए। ये पैमाने स्थान, समय, सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के हिसाब से बदलते रहते हैं। शारीरिक तो कहीं यौनिक, जाति तो कहीं वर्ग के हिसाब से इसके पैमाने बन जाते हैं। मर्दानगी के पैमानों को बनाने में अहम भूमिका सामाजिक, सांस्कृतिक मान्यताएं और मीडिया बख़ूबी निभा रहे हैं।अगर हम अपने बचपन की बात करें तो जब एक लड़का रोता है तो उसे ये कहकर चुप कर दिया जाता है कि तुम तो शेर बेटे हो, तुम मर्द हो और मर्द कभी रोते नहीं। बार-बार इस पाठ को दोहराया जाता है ताकि उसे ये पाठ याद हो जाए। फिर सिखाया जाता है कि अपनी बहनों की सुरक्षा करो, चाहे बहन उम्र में या कद काठी में बड़ी ही क्यूं ना हो।

हमें हमेशा निडर ओर कठोर बनना सिखाया जाता है। हम ये कभी नहीं कह पाते कि मुझे भी डर लगता है और मुझे भी सुरक्षा की ज़रूरत है। यौनिकता (सेक्शुएलिटी) को लेकर ऐसे पाठ सिखाया जाता है कि यौनिकता को भी हिंसात्मक रूप से देखने और समझने लगते है। इस सब के चलते यौनिकता एक कठिन लड़ाई जैसी लगने लगती है। इतना ही नहीं ज़िंदगी भर असली मर्द बनाने के लिए कुछ पुरुषों को मर्दानगी का मानक बनाकर एक उदाहरण के रूप में पेश किया जाता है। अगर कोई उस पैमाने तक पहुंच जाए तो ठीक, नहीं तो ‘नामर्द’ का टैग लगा दिया जाता है।

‘नामर्द’ के इस टैग से बचाने का दावा करने वाले अनेक विज्ञापन हम हर जगह देखते हैं। चाहे सड़क के निकट ‘मर्दाना ताकत’ के नाम से बने दवाखाने हो या लिंग के साइज को बढ़ाने संबंधी सार्वजनिक स्थलों पर लगे पोस्टर। मीडिया में रोज़ाना हम देखते हैं कि मर्दानगी को जोखिम और हिंसा रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। विज्ञापनों में हम देख रहे है कि मार्केटिंग के लिए जोखिम भरे तरीकों से असली मर्द की परिभाषा तय की जा रही है और चिंता की बात तो ये है कि ये तरीके दिन-प्रतिदिन और कठिन बनते जा रहे हैं। एक तरफ तो हमारी फिल्में पुरुषों के लिए मर्दानगी के उदाहरण बनाती हैं वहीं दूसरी ओर उत्पादन को बढ़ाने के लिए कंपनियां ऐसे विज्ञापन देती हैं जैसे उनके प्रॉडक्ट को इस्तेमाल किए बिना पुरुषों की मर्दानगी अधूरी है। फिर चाहे तेज़ रफ्तार से बाइक चलाना हो या परफ्यूम लगाते ही कुछ भी कर जाने का जोखिम उठाना हो। भला एक परफ्यूम कैसे मर्दानगी का मानक बन सकता है? सत्ता के इस खेल में ये समझना बहुत ज़रूरी है कि मर्दानगी की इस पाठशाला से फायदा और नुकसान किसे हो रहा है।

सही बात तो यही है कि पितृसत्ता के अलावा किसी को इसमें कोई फायदा नहीं है। मर्दानगी पितृसत्ता की जड़ों को मजबूत करने में सहायक है। मर्दानगी की वजह से लड़कियों और महिलाओं को एक चीज़ की तरह दिखाया जा रहा है और साथ ही हिंसा भी लगातार बढ़ती जा रही है। लेकिन ताज्जुब की बात तो ये है कि जिस मर्दानगी की दौड़ में पुरूष दौड़ रहे है, वो मर्दानगी पुरुषों को भी प्रभावित कर रही है। इस दौड़ में आगे रहने का दवाब पुरुषों को हीन भावना का शिकार बना रहा है। पुरुषों में भावनात्मक पहलू खत्म हो रहा है, सिर्फ हिंसा और नफ़रत को बढ़ावा मिल रहा है। मर्दानगी की ये पाठशाला पूरे विश्व के लिए बहुत बड़ा खतरा बनती जा रही है। प्यार, शांति और इंसानियत के लिए ये ज़रूरी है कि हम ऐसी पाठशालाओं को बंद कर दें।

 यूथ की आवाज और थंबनेल से साभार

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राजकमल प्रकाशन ‘वह सफ़र था कि मुकाम था’ को निरस्त करे (!)

स्त्रीकाल डेस्क 


हिन्दी अकादमी की अध्यक्ष और साहित्यकार मैत्रेयी पुष्पा ने अपनी किताब ‘ वो सफ़र था कि मुकाम था’ में झूठ की बुनियाद पर वरिष्ठ लेखिका मन्नू भंडारी के बारे में अपमानजनक स्थापनायें दी है. उनके झूठ को तथ्यपरक ढंग से स्त्रीकाल ने स्पष्ट किया है. इस विषय पर हमने राजेंद्र यादव और मन्नू-भंडारी को जानने वाली लेखिकाओं से भी लिखने का आग्रह किया है. सोशल मीडिया में भी मैत्रेयी के झूठ के खिलाफ लोग आवाज उठा रहे हैं. सोशल मीडिया में आई टिप्पणियाँ कुछ इस प्रकार हैं: 


स्त्रीकाल व्हाट्स ऐप ग्रुप  में दिलचस्प बहस हुई: 


धर्मवीर: काश ! मैत्रेयी जी आत्मकथा न लिखकर उपन्यास लिख रही होती तो साहित्यिक गल्प का कुछ अवकाश रहता। हो सकता था कि वे हज़ारीप्रसाद द्विवेदी उर्फ़ व्योमकेश शास्त्री वाली परम्परा में कुछ नया जोड़ पाती।और राजेंद्र जी का तो व्यक्तित्व भी इतना सर्वाजनिक है कि वे ना तो “बाणभट्ट की आत्मकथा”के बाण हो सकते हैं ना मन्नू जी निउनिया या मिस कैथराइन ।
पूजा पाठक: पर जरूरी थोड़ी है कि हम हर लेखक को हर अच्छे लेखक के साथ जोड़ कर विशेषता तलाशते रहें मैत्रेयी की अपनी स्वतंत्र लेखन की शैली है मेरे ख्याल से उन्होंने अपनी आत्मकथा और राजेन्द्र यादव पर लिखे संस्मरण को बहुत ही अच्छे ढंग से लिखा है. और बाण ऒर निउनिया कैथराईन हजारी प्रसाद द्विवेदी के काल्पनिक आदर्श पात्र है उन्होंने अपने तरीके से उसे प्रस्तुत किया जो कि उनके संस्कार और  मानसिक स्थिति थी।

केजरीवाल सर,  हिन्दी अकादमी में आपकी उपाध्यक्ष साहित्यिक झूठ खड़ा कर रही हैं? 

संजीव चंदन: कहाँ ठीक लिखा पूजा जी, इसमें तो बहुत सारी फैक्चुअल गलतियां हैं
पूजा: रचनाकार  इतिहास नहीं लिख रहा होता कि सही तथ्य प्रस्तुत करना उसकी बाध्यता होगी
अरुण कुमार: फिर तो आत्मकथाओं के नाम पर कोई भी झूठ फैलाया जा सकता है
पूजा: आत्मकथा में क्या झूठ लिखा है? हां हम उसी से तो उन्हें जान पाते हैं.  हो सकता है आप उन्हें और नजदीक से जानते हो पर प्रत्येक पाठक के लिए तो रचना(आत्मकथा ही) जानने का जरिया है मैंने उन्हें जितना जाना या पढ़ पा रही उसमें मुझे झूठ नहीं दिखा उनका साक्षात्कार भी पढ़ा है.अगर कुछ झूठ है तो अनुरोध है आपसे उसे तथ्य के साथ सामने लाए ताकि हम पाठक जान सके
अरुण: अभी संजीव जी ने स्त्रीकाल पर शेयर किया है, आप उसे एक बार पढे
पूजा: जी जरूर पढ़ूंगी ऒर मुझे सही लगा तो अपने शोध में उसे स्थान भी दूंगी किसी लेखक की आलोचना करना प्रत्येक पाठक का व्यक्तिगत मामला है कि वह उसे किस प्रकार लेता है। मैंने मैत्रेयी के साक्षात्कार देखे भी है अक्सर दूरदर्शन पर प्रसारित होते हैं.
फारूक शाह: संस्मरण में ललित गद्य की छूट होती है, जो कि लेखक के मनोवैज्ञानिक पक्ष से निर्मित होता है . ललित गद्य से मतलब रचनात्मक काव्यात्मक गद्य से है. संस्मरण साहित्य अंतरंगता से एकदम जुड़ा हुआ है. तो प्रस्तुति में फैक्ट की जगह लेखकीय प्रक्षेपण होंगे तो तुरत पाठक के ध्यान में आ jaayegaa
धर्मवीर:  जयशंकर प्रसाद की कविताओं के सन्दर्भ में द्विवेदी जी ने एक अद्भुत बात कही है:”सौंदर्य -पार्थिव सौंदर्य-के प्रति प्रसाद का आकर्षण बहुत अधिक है परंतु शुरू में वे उसे व्यक्त नहीं कर पाते थे।उनके मन में इस बात से कुछ चिंता भी हुई। परंतु बाद में वे इस प्रकार सोचते जान पड़ते हैं कि आवरण और अवगुंठन बुरा क्या है। …..इसी रास्ते सोचता हुआ कवि अवगुंठन के तत्ववाद तक पहुंचता है।….प्रसाद जी के काव्यों में और उनके नाटकों में यही चिंतन प्रणाली स्पष्ट हुई है।”….द्विवेदी जी भी “अवगुंठन के तत्ववाद के कायल”थे।बाणभट्ट की आत्मकथा में व्योमकेश शास्त्री ने स्वीकार किया है कि उसमे प्रेम की व्यंजना “गूढ़ और अदृप्त”भाव से प्रकट हुई है। आत्मकथा की लेखिका मिस कैथराइन की आत्म-स्वीकृति अनुसार -“जब की यह कथा है,वे दिन लज्जा और संकोच में ही निकल गए।कथा लिखने का साहस उन्हें तब हुआ जब वे 68 वर्ष की हो गई।”….भट्टिनी की दृष्टि से देखे हुए अपने प्रिय बाणभट्ट की छवि।…वैष्णव भक्ति के तत्ववाद के अवगुंठन में लिपटी निज प्रेम कहानी।…लकिन द्विवेदी जी से यह सब संभव इसलिए हो पाया कि वे स्वयं को कर्ता मानने के बोझ से मुक्त हैं। उनका प्रिय श्लोक है-“यत्रैवं सति कर्तार मात्मान मन्यते तु यः। पश्यत्यकृतबुद्धित्वन्न स पश्यति दुर्मति:।।”द्विवेदी जी स्वयं की मति को बचा ले जाते हैं;अपना कृतित्व व्योमकेश शास्त्री को सौप कर क्योँकि उनमें कर्ता होने का भाव प्रबल नहीं है।…..जबकि मैत्रयी जी के यहाँ कर्ता होने का दर्प है। इसलिए उन्हें आत्मकथा के भीतर गल्प की जरूरत पड़ी।(जैसा कि इस रपट में राजेन्द्र जी से जुड़े लोगों ने कहा है) (नामवर जी की किताब -दूसरी परम्परा की खोज में पृ 111से 121 तक से द्विवेदी जी के बारे में समझा गया है)
संजीव: पूजा जी आप उनकी राजेंद्र जी और मन्नू वाली आत्मकथा का अंश पढ़े वे मन्नू भंडारी के बारे में क्या लिख रही हैं पढ़े और इस रपट में पकड़े गये झूठ पढ़ें. धर्मवीर सही कह रहे हैं कि आत्मकथा की जगह गल्प लिख लेतीं. मैंने केवल शैली के सन्दर्भ में बात नहीं कही थी।
पूजा: आत्मकथा तो नहीं संस्मरण लिखा है, जो अभी उनकी नयी किताब प्रकाशित हुई है “वह सफर था कि मुकाम था ” और जहां तक मुझे पता है उनकी आत्मकथा में मन्नू जी पर इतने विस्तार से चर्चा नहीं है.
संजीव:  हां जी, संस्मरण में  झूठ की छूट होती है क्या, संस्मरण में आप खुद उपस्थित होते हैं.
दोनों को न मिलाए यहाँ प्रश्न रोचकता का है आत्मकथा के साथ इमानदारी की बाध्यता है पर मेरे ख्याल से ऒर कोई विधा के साथ नहीं
धर्मवीर:  जिसे टी एस इलियट ने निर्वैयक्तिक होना कहा है (जो कि हर सृजक के लिए जरूरी है)उसी सन्दर्भ में यहाँ कर्ता भाव से मुक्ति की बात मैंने कही है।
पूजा : बतों को पेचीदा क्यों किया जा रहा सीधी ऒर सरल बात है
अरुण: संस्मरण में तथ्यों के साथ छेड़छाड़ ?

मैत्रेयी इतनी इर्ष्यालू थी कि वह नजर रखती थी कि राजेंद्र जी के पास कौन आ रहा है (?)

फेसबुक पर आई टिप्पणियाँ:


गिरिराज किशोर: मैं बहुत आहत हूँ…मरने के बाद जो लिखा जा रहा है वह ठीक नहीं।
गीताश्री: वो लेखिका इसी ताक में थी कि कब मौक़ा मिले और भडांस निकाले. हमने सारा कृत्य देखा हुआ है. किस मुँह से झूठ पर झूठ स्थापित करती जा रही और कई उस दौर के गवाह लोग चुप्पी साधे बैठे. हिंदी अकादमी के आयोजन और उससे मिलने वाले दस हज़ार रुपये का इतना लोभ ! घृणित चुप्पी !
गोपाल कमल : इन्हें अकथ्य अभक्ष्य कुछ से परहेज़ नहीं। दुःख।
अक्षय शर्मा: तो क्या हुआ। आत्मकथा भी एक साहित्यिक विधा है कोई सुप्रीम कोर्ट में दिया गया इकबालिया बयान नहीं जिसे सिर्फ वकील ड्राफ्ट करते हैं और कोई पढ़ता नहीं है।जज भी नहीं। आत्मकथा भी पठनीय होनी चाहिए।
रचना त्यागी : सच हमेशा शब्दों के पीछे होता है …
रचना यादव: वेद दान सुधीर एम्स में राजेन्द्र जी के साथ दिन-रात रहे. वे भी आपको बहुत कुछ बता सकते हैं.
रुपा सिंह:  केजरीवाल जी की नींद और कपिल मिश्रा जी के सपने से हमें क्या लेना देना ! लेकिन इस झूठे पापी लेखन से हम सबका गहरा वास्ता है !शर्मनाक है यह ! सस्ती सनसनी के लिए यह लेखन होता तो फिर भी क्षम्य होता ! लेकिन मन्नू जी का ऐसा अपमान , जिसे करते राजेंद्र यादव जी को संकोच हुआ ( तद्भव के प्रस्तुत अंश )-उनके लिए ऐसी झूठी , चालबाज़ बातें ? असहनीय है ! वह सच सामने आना चाहिए, जिसका अनुमान सबको है !
लहक हिन्दी: राजकमल प्रकाशन जल्द से जल्द वह सफ़र था कि मुकाम को निरस्त करे. कभी -कभी मुनाफा से अधिक जरूरी व्यक्ति के महत्व को भी देखना चाहिये. इसमें देरीठीक नहीं है.
पुष्पा तिवारी: अगर लेखक जो बड़े भी हैं महान भी हैं इतिहास तो छोड़िए भूगोल में भी दर्ज हो जाएंगें । वे सब एक सच सामने लाने में एकजुट नहीं होंगे तो
रश्मि भारद्वाज: राजेंद्र जी को मन्नू जी की आंतरिक यातना का अंदाज़ा था जिसे मैत्रेयी जी ने प्लेटोनिक प्रेम का कवर चढ़ा पूरी तरह ही खारिज़ कर दिया । मन्नू जी का प्रेम खलनायिका का प्रेम हो गया और मीता का महान ! जबकि जिससे खुले में मिलने का साहस भी न, जो साथ भी न निभाए वह प्रेम कैसा ! मैत्रेयी जी मेरी प्रिय लेखिका रहीं हैं लेकिन उन्होंने जिस तरह मन्नू जी पर लिखा, हैरान हूँ पढ़कर …
कविता: राजेन्द्र जी ने कई बार खुले शब्दों में यह कहा कि वे मन्नू जी के अपराधी हैं, पर उस वक्त उनके लिये यह समझ पाना मुश्किल था …. एक बार तो किसी पत्रकारिता विश्वविधालय में भी जहां अभय कुमार दूबे उन्हें लेकर गये थे …और वे अपने साथ मुझे और राकेश को लेते गये थे
रश्मि भारद्वाज: और इतनी छोटी सी बात और समझने जाओ तो कितनी गहरी, मैत्रेयी जी को ना दिखी ! वह तो वैवाहिक प्रेम को प्रेम मानती ही नहीं, इतने रूमानी और यथार्थ से दूर हैं उनकी सोच कि क्या दिशा मिलेगी इससे समाज को ! प्रेम उत्श्रृंखलता नहीं, प्रेम त्याग भी, अपने स्व का त्याग और वह मन्नू जी ने अंत तक निभाया।
संजीव चंदन: प्रेम तो प्रेम ही रहेगा न विवाह में या विवाह के बाहर. मैत्रेयी जी का वश चले तो विवाह के बाहर को उत्तम का अंतिम दर्जा दिला दें, लेकिन उसका क्या जिसने प्रेम किया , विवाह किया और फिर प्रेम करती रही, उसका भी क्या जो पितृसत्तात्मक वयवस्था में विवाहपूर्व प्रेम न कर पाई, लेकिन विवाह के बाद ही प्रेम कर लिया. संकट यह है कि मन्नू और राजेंद्र जी के विलगाव के बीच वे अपना और डाक्टर साहब का कंट्रास्ट पैदा कर रही हैं और वहीं राजेंद्र जी से प्रेम के मामले में भी मन्नू और मीता का !
उर्मिला उर्मिल: कल्पना की कौड़ी लाकर उसे साहित्यिक कलेवर में लपेट देना एक बात है ,और खुद एक अच्छे , आदर्श व्यक्तित्व के रूप में जीवन जीना बिलकुल दूसरी बात है ।इसे कहते हैं कथनी और करनी का अंतर ।

वे पत्नी और प्रेमिका दोनो रहीं 

वीरू सोनकर: मैत्रेयी पुष्पा जी के लिए मैंने बड़े ही आदर पूर्वक आज से डेढ़ दो वर्ष पूर्व ही यह बात कह दी थी कि वह एक राजनैतिक प्रतिभा से भरपूर महिला हैं जो गलत जगह पर आ गयी हैं वह साहित्य को राजनीति की तरह बरतती और समझती रही हैं जहाँ साहित्य, नैतिकता और आत्मलोचना से संचालित और प्रेरित होता है वही राजनीति में घात-प्रतिघात गिरोहबंदीक में माहिर होना अनिवार्य है. सामने का शीशा साफ करने से, दुसरो के चेहरे पर सप्रयास कालिख पोतने से खुद का चेहरा नही साफ होता. मैं नही समझता कि वह अब इस उम्र में इस बात को नही समझती होगी. राजेन्द्र यादव की विरासत की इकलौती दावेदार बनने के अतिरिक्त प्रयासों से मैत्रेयी जी का खुद का इतिहास अपनी आभा खो चुका है यह बात जान कर भी वह अपना कीचड़-फेकू अभियान खत्म नही करने वाली हैं
आज मैत्रेयी जी इस बात का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हो चुकी हैं कि ‘महत्वकांक्षा’ किस प्रकार से एक लेखक की नैतिकता/लेखकीय निष्पक्षता/लेखकीय उत्तदायित्व को कैसे खा जाती है .फिलहाल वह हिंदी अकादमी के हाथी पर सवार हैं और वह सिर्फ उन्ही लोगो की जय-जयकार सुनना चाहती हैं जो अकादमी के द्वारा पोषित/लाभान्वित हैं जो उनसे फायदा प्राप्त कर रहे हैं वह मैत्रेयी जी के पक्ष में मन्नू भंडारी के विरुद्ध तर्क/साक्ष्य प्रस्तुत करते रहेंगे, यह उनका काम/व्यापार है पर इतिहास काम/व्यापार और जिंदाबाद के नारों से नही बनता. यथार्थ का अपना ही एक मानक होता है अपनी ही एक खास न्याय प्रणाली होती है. अपना ही एक दस्तावेज होता है जहाँ मैत्रेयी जी अपने सभी प्रयासों के बाद भी ठीक उसी तरह दर्ज होगी, जिस तरह यथार्थ उन्हें पहचान पा रहा है
अंत मे, व्यक्ति माफ करते हैं पर इतिहास माफ नही करता, वह दर्ज करता है खुद को स्थापित करने और मनवाने के सभी प्रयासों को बड़ी ही निष्ठुरता से कुचलते हुए, वह हमारा असली चेहरा सामने लाता है जिसे पीढ़ी ठीक उसी तरह पहचानती है
 वंदना राग: बहुत साफ़ साफ़ लिखा वीरू. और यही साफगोई और स्पष्टता सभी लेखकों में होनी चाहिए. यूँही किसी भी लेखक का महिमामंडन जब उसके लिखे से इतर कारणों से होता है तो उसकी महिमा का स्खलन भी यूँ ही होता है.. स्वतः
वीरू सोनकर: जब तक लेखकों में ‘पाने का लोभ’ और ‘खोने का भय’ समाप्त नही होगा, चुप्पियां यूं ही हमारे समय के माथे पर उगती रहें
उषा यादव उषा: मैं कई लेखिकाओं की आत्मकथा पढ़ी हूँ प्रसिद्धी के लिए लोग कितना नीचे गिर जाते हैं आश्चर्य नहीं लेकिन बुरा बहुत लगता है..
मैत्रेयी पुष्पा: ” चाक ” उपन्यास पर जब हंगामे हुये तो राजेन्द्र यादव ने लेखकीय अनुशासन के तहत यह सिखाया था – अब मान लो कि तुम्हारा लिखा असरदार है । इतने लोग विचलित होरहे हैं । उन लोगों के जबाव में तुम कभी कुछ नहीं कहोगी जैसे अपने विरोधियों से मैं कुछ नहीं कहता ।
जितेन्द्र विसारिया: मैत्रैयी जी यह सब उपन्यास मैं चल जाता है, पर आत्मकथ्य या आत्मकथा में तथ्यों की अनदेखी नुकसानदेह साबित होती है। और लेखक की निष्ठा पर प्रश्नचिन्ह छोड़ जाती है। हो सके तो इनसे बचिए, आप वरिष्ठ और समझदार हैं
संजीव चंदन: चाक मुझे भी पसंद था, आपकी सारी रचनायें पढ़ी हैं, लगभग- उनपर लिखा है , लेकिन आत्मकथा और संस्मरण में तथ्यों के हेर-फेर!

रवीन्द्र दास:  शायद प्रेम और राजनिती में सब जायज होता है.
ज्ञानेंद्र मिश्रा: राजनीति में जो काम केजरीवाल जी कर रहे हैं साहित्य के क्षेत्र में वहीं काम मैत्रेयी जी कर रही हैं । उनको प्रेम की उदात्तता का एहसास कम प्रपंचों और लांछन लगाने का अनुभव ज्यादा है ।
डॉ. शशि सुभाष मिश्रा : चरित्रहीन तथाकथित शब्द के जादुगरों का जब तक बहिष्कार नहीं होगा,आम पाठक ठगे जाते रहेंगे ! सुधी जानकारों की जिम्मेदारी बनती है,शब्दों के खिलाड़ियों को उनकी सामाजिक जिम्मेदारी का एहसास करवाएं l मन्नू जी, राजेंद्र यादव और उनकी मीताओं का सच अब पाठकों से छुपा नहीं है l मन्नू जी के पासंग भर नहीं “वे” जो गुजर चुके और जो आज अपनी छबि “बचाये” रखने के चोंचलों में लिप्त हैं l
आशुतोष:  झूठ गढ़ने के लिए समय नहीं , ‘हौसला’ चाहिए ।
उमाशंकर सिंह परमार : आप इस अभियान को आगे बढाईये बढिया लग रहा है
सरोज अरोड़ा: कुछ ज्यादा ही एक्सपोजर हो रहा है मैडम मैत्रेयी का. दुनिया में कुछ औरतें ऐसी होती हैं, जो शोर्टकट से आगे बढना चाहती हैं. इसका यह मतलब नहीं है कि पुरुष पवित्र आत्माएं होते हैं.

राजेंद्र यादव से मन्नू का प्रेम ठोस था: वे पत्नी और प्रेमिका दोनो रहीं

वरिष्ठ लेखिका सुधा अरोड़ा से पाखी के राजेंद्र यादव विशेषांक  के लिए प्रेम भारद्वाज ने 2011 में बातचीत की थी. तब राजेंद्र जी जीवित थे. एक लम्बी बातचीत का यह हिस्सा राजेंद्र जी से मन्नू भंडारी के रिश्ते के संश्लिष्ट स्तरों को  सपष्ट करता है. मन्नू, मीता और मैत्रेयी- तीन एम के साथ उनके रिश्ते को केंद्र में रखकर की गई बातचीत आज फिर प्रासंगिक है. 


राजेंद्र यादव के साथ तीन ‘‘एम’’ जुड़े हुए हैं – मन्नू , मीता और मैत्रेयी ! मुझे लगता है , आप तीनों को ही बेहद करीब से जानती हैं। इन तीनों के बारे में कुछ बताएं ?
‘‘ डायल ‘एम’ फॉर  मर्डर ’’ की तर्ज का प्रश्न  है यह । मैं इन तीनों में से सिर्फ मन्नू जी के निकट हूं । मैत्रेयी से मित्रता औपचारिक है । मीता से मेरा कोई परिचय नहीं । मन्नू जी और मैत्रेयी की तरह मीता किसी एक का नाम नहीं है । मीता एक कल्ट है , एक प्रवृत्ति  है – मटुकनाथ (लीजिए , यहां भी एम) की तरह । हिन्दी साहित्य में राजेंद्र जी की मीता की तर्ज पर मीताओं की भरमार हैं । यह ज़रूर है कि एक मीता को तो स्वीकार कर के ही चलीं मन्नू जी – अपने जीवन के लंबे पैंतीस साल ।
राजेंद्र जी की ही डायरी के पन्ने का अंश देखें –
‘‘शायद मेरी इस मानसिक छटपटाहट को मन्नू समझ रही है । वह बैठ कर बातें करना चाहती है, और मैं टाल देता हूं । एक बार तो उसने कहा था कि अगर आपको लगता है कि इस जड़ता और अवरोध से आप यहां से बाहर जाकर निकल सकते हैं तो नगीना के साथ कुछ दिन रह लीजिए … दया और करुणा ही हुई सुन कर … यह बात उसने किस यातना बिन्दु पर पहुँचकर कही होगी … । लगता मुझे भी है कि शायद इस अंधे कुंए से वही साथ निकाल सकता है मगर हिम्मत नहीं पड़ी । मैं नगीना के साथ रहने दस दिनों को जाऊंगा यह कह कर मैं निकल सकता हूं ? चुपचाप चोरी छिपे जाऊं और भला मानुस बन कर लौट आऊं , यह तो हो सकता है । यही शायद होता भी रहा है । मगर कह कर खुलेआम जाना कैसा लगता है जाने … चला भी गया तो शायद लौटने का मुंह नहीं रहेगा । यहां भी सब चीजें , रहना – व्यवहार नार्मल नहीं रह पायेंगे … । ’’                                                   – तद्भव: 11 , पृष्ठ – 181

दुर्लभ रागात्मकता: राजेंद्र यादव, मन्नू भंडारी

मैत्रेयी ने अब कहा है कि राजेंद्र जी ने हमारे भरोसे को तोड़ा है ! छिनाल प्रकरण पर राजेंद्र जी का स्टैंड क्या सही था जिसके कारण मैत्रेयी ने उनसे नाता तोड़ लिया ?
मैत्रेयी के इस वक्तव्य से उनकी बिलख सामने आ रही है । कैसा भरोसा तोड़ा है ? पारिभाषित  किस्म का नाता टूटने का मसला है यह ! राजेंद्र जी तो रिश्तों -नातों की पारिभाषाओं से बाहर ही खड़े होते रहे हैं । मैत्रेयी की समझ का द्वैध है कि वे राजेंद्र यादव के बौद्धिक पुंसत्व को समझ ही नहीं पाईं । अब वे आरोप लगा रही हैं क्योंकि उनकी कच्ची कसौटियां दरक गईं । लंबा अरसा लगा उसे समझने में कि स्त्रियों के मुद्दों पर राजेंद्र जी भरोसे के लायक नहीं हैं । स्त्री विमर्श  की जो स्यूडो परिभाषायें वे रचते रहे हैं , उस पर भरोसा किया तो ग़लती मैत्रेयी की थी । सबसे बड़ी बात तो यह कि मैत्रेयी को न उनके स्त्री विमर्श  का हिमायती बनना चाहिये था और न उनसे कोई अपेक्षा  पालनी चाहिये थी , पर उसका तो तब राजेंद्र जी के संरक्षण में ट्रेनिंग पीरियड चल रहा था । जो व्यक्ति लगातार इस तरह की बातें लिखता रहा है ‘‘ न जाने कितनी लड़कियाँ, अभिनेत्रियाँ और सामाजिक कार्यकर्ता अपने को गुंडी, लफंगी, रंडी और फाहिशा कहकर या सुनकर इस कान से उस कान निकाल देती हैं या उसका मजा लेती हैं। ’’ (हंस, अक्टूबर 2010) पहले कभी यह भी लिखा था कि वे बलात्कार का भी मज़ा लेती हैं । ऐसे विचारों पर भरोसा ? जो दाम्पत्य की गहरी निष्ठाओं को ठुकरा सकता है , उससे कैसी अपेक्षाएं पाल रखी थीं मैत्रेयी ने ? सच पूछें तो राजेन्द्रजी हर रिश्ते  में खोटे साबित हुए हैं । वे मन्नूजी के लिए ग़ैर ज़िम्मेदार और अराजक पति , मीता के लिए अवसरवादी प्रेमी और मैत्रेयी के लिए झूठे मित्र हैं। हर स्तर पर उन्होने रिश्तों  की मर्यादा भंग की है और अपने संबधों को चौराहे की चीज़ बनाकर रख दिया है । सारी दुनिया को सीख देनेवाला इतना बड़ा साहित्यकार इस उम्र तक मर्यादा में रहना सीख ही नहीं पाया। मैत्रेयी मित्र न भी होतीं तो भी एक वरिष्ठ साहित्यकार होने के नाते राजेंद्र जी से उम्मीद की जा सकती थी कि वे साहित्य में अभद्र भाषा का खुलकर विरोध करेंगे । गली मोहल्लों के चालू अखाड़ों जैसा घटिया माहौल साहित्य में बन गया है , जहां भाषा की कोई मर्यादा नहीं । कोई भी किसी के लिए कुछ भी लिख कर ऐंठ दिखा कर निकल जाए – यह पढ़े लिखों की दुनिया है ?

यह ठीक है कि हर व्यक्ति को वैचारिक स्वतंत्रता दी जानी चाहिये । ज़रूरी नहीं कि हमख़याल मित्रों में भी सबकी प्रतिक्रिया किसी मुद्दे पर एक सी हो ! पर राजेंद्र जी का स्टैंड बिल्कुल सही नहीं था । स्त्री विमर्श  के पैरोकार ने पहले लेखिकाओं को खूब हुड़काया – खुलकर लिखो – यह भी (ही) तो जिन्दगी का हिस्सा है । जब लेखिकाएं खुलकर लिखने लगीं और छिनाल प्रकरण की विभूतियों को नौकरी से बर्खास्त करने की मांग आई तो राजेंद्र जी ने कहा – यह तो महिलाओं का तालिबानी रवैया है । यानी खुलकर लिखो , छिनाल कहलाओ और छिनाल कहलाये जाने का भी उत्सव मनाओ । तालिबानी रवैया मत अपनाओ । राजेंद्र जी की यह प्रतिक्रिया अप्रत्याशित तो नहीं थी । दूसरे सच की गुहार लगाएं तो तालिबान और अपने सौ गुनाह माफ । पर असहमति के कारण नाता तोड़ लेने की बात मेरी समझ से बाहर है ।

राजेंद्र जी अक्सर कहा करते हैं कि मैंने तीन औरतों के साथ न्याय नहीं किया ! दो तो मन्नू और मीता हैं , तीसरी मैत्रेयी नहीं तो फिर कौन हैं ?
यह सवाल निजी है। जहां तक मेरी जानकारी है , राजेंद्र जी ने यह कभी नहीं कहा ! सिर्फ दो के प्रति न्याय न करने की बात कही है।  मुजरिम करार देने के लिये तो इतना ही काफी है कि अपनी समर्पिता और एकनिष्ठ पत्नी के साथ आपने न्याय नहीं किया । ‘‘ 23 लेखिकाएं …..’’ वाली पुस्तक में जयंती रंगनाथन के सेक्स संबंधी लंबे साक्षा त्कार में उन्होंने अपना सेक्स के स्तर पर तीन के साथ रिश्ता  स्वीकार किया है । तीसरी , चौथी  , पांचवीं – कई हो सकती हैं ,उसके बारे में सिर क्यों खपाया जाये । हां , यह एक बहुत बड़ा भ्रम रहा हिन्दी जगत में कि मैत्रेयी के कारण मन्नू जी से राजेंद्र जी को अलग होना पड़ा । दोनों के बीच अलगाव का कारण मैत्रेयी बिल्कुल नहीं रही । अलग होने के बाद भावात्मक संबल और व्यावहारिक सुख सुविधाओं के लिये उन्होंने मैत्रेयी को थाम लिया हो , वह बात दीगर है । आखिर भावात्मक संबल और घर की सुरक्षा  की दरकार एक व्यक्ति को होती ही है। जो अपने घर को सिर्फ शरणस्थली , सुख सुविधाओं का ठिया समझे , घर के ठौर को ठोकर मारे , उसकी कद्र न करे , आखिर देर सबेर समय उसे समझा ही देता है कि उसने क्या खोया और बदले में उसे कहां ठौर तलाशना पड़ रहा है ।

राजेंद्र यादव, मन्नू भंडारी और नन्ही रचना यादव

मन्नू जी राजेंद्र जी से अक्सर कहा करती हैं कि ‘‘ जब करने का साहस रखते हैं , तो बताने का क्यों नहीं ’’ वो कौन सी बात बताने के लिये कहती हैं जिसका साहस राजेंद्र जी नहीं कर पा रहे हैं !
राजेंद्र जी और मन्नू जी के नज़दीक रह चुके कई मित्रों की सबसे ज्यादा और सबसे बड़ी शिकायत यही है कि राजेंद्र जी की कथनी और करनी में बहुत बड़ी फांक हैं । अपने पचासों साक्षात्कारों , प्रवचनों में जिस सैद्धांतिकी   का वे किसी मसीहा के अंदाज़ में प्रतिपादन करते हैं , अपने निजी संबंधों में ही नहीं , संपादन और लेखन में भी – वे सतह पर ईमानदार दिखाई देते अपने ही वक्तव्य को निभा नहीं पाते । उदाहरण पचासों हैं पर यहां एक वाकया बताना चाहती हूं । अपने एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा -‘‘ जिस तरह साहित्य में एक तरह की हिप्पोक्रेसी थी , कुछ चीज़ों को सामने आने नहीं दिया जाता था , उसी तरह व्यक्तिगत जीवन में भी कुछ चीजें ऐसी हैं जिन्हें दबा ढंका कर रखा जाता था कि भई ये साहित्य की चीजें नहीं हैं । लोगों की ज़िंदगी का जो महत्वपूर्ण भाग है ( यानी सेक्स ), जो समाज का बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा (!) है , उसको लोग बोल नहीं रहे हैं । मैंने बोलना शुरु किया । प्रेम प्रसंग किसकी ज़िंदगी में नहीं होते । कौन सा लेखक ऐसा है जो यह कह सके कि मेरे साथ कोई अफेयर नहीं हुआ , मैंने किसी लड़की की तरफ झांका नहीं । हरेक के साथ प्रेम प्रसंग हैं , उनमें से कोई लिखने की हिम्मत नहीं करता । नैतिकता के प्रश्न  हों या व्यक्तिगत प्रश्न  , मैंने उनको खुलकर कहा है ( ‘‘मुड़ मुड़ के देखता हूं ’’ में )। उन पर बात की है और मैं समझता हूं कि इससे ही लोगों की हिप्पोक्रेसी टूटे क्योंकि आपको दूसरों को नंगा करने के बजाय पहले खुद नंगा होना होगा तभी आपको हक है कि आप दूसरों के बारे में कुछ कह सकें । हमारे यहां पता नहीं कितने लोग हैं जो क्लेम करते हैं कि मुझसे ज्यादा सच्चा कोई नहीं है । उन बेवकूफों और दंभियों से यह कहा जाए कि कुछ सच अपने बारे में भी बोलो ! ’’( 23 लेखिकाएं और राजेंद्र यादव – साधना अग्रवाल द्वारा साक्षा त्कार में )
इतना बड़ा प्रवचन सुनने के बाद कोई भी मुस्कुराकर यही पूछेगा – ‘‘ राजेंद्र जी , आपका अपने बारे में क्या ख्याल है ?’’ यह सैद्धांतिकी पहले अपने पर लागू करते ! अपने बारे में कितना सच बोला है उन्होंने । मन्नू जी से अलग होने के ‘‘कारण’’ के बारे में उनके प्रचारित झूठों का तो अंबार लगा है । 1995 में मन्नू जी से अलग होने के बाद     ‘‘ एशियन एज ’’ को एक साक्षात्कार दिया तो कारण यह बताया कि मैं तो बहुत सोशल हूँ  और मुझसे मिलने वालों का आना जाना , उन्हें खिलाना पिलाना मन्नू को पसंद नहीं था तो हमने सोचा चलो , अलग रहने का प्रयोग कर देखा जाए । जाहिर है , मन्नू जी इस बयान से बहुत आहत हुईं क्योंकि उनके यहां हमेशा  ही साहित्यिक मित्रों की बैठकें जमती रही हैं। कथादेश  के लिये जब मैंने मन्नू जी के बारे में नामवर जी का साक्षात्कार लिया था तो उन्होंने मेरे सामने कहा था – ‘‘ दिल्ली में मैं जितने साल रहा हूं । पचास प्रतिशत खाना तो मैंने इस हौज खास वाले घर में खाया है । ’’ मन्नू जी के सिर पर सारी जिम्मेदारियां । कॉलेज में पढ़ाना । ट्यूशन करना । घर आकर मित्र मंडली की बखुशी  आवभगत करना । राजेंद्र जी पर न कोई जिम्मेदारी , न उसका अहसास । न आर्थिक सहयोग , न काम काज में कोई सहयोग । फिर भी हर बार जहां दांव लगा , वहां मन्नू जी को कठघरे में खड़ा करने में कोई कोताही नहीं बरती उन्होंने । यह सिलसिला अब तक चलता ही जा रहा है । 2008 में जब कथादेष के लिये मन्नू जी वाले अंक की योजना आकार ले रही थी , मैंने राजेंद्र जी से कहा – अच्छा लगता है यह देखकर कि आप दोनों का आपस में एक स्वस्थ संवाद भी है , मन्नू जी पर सिर्फ दो पेज लिखकर दें , मुझे इस अंक में कोई विवाद खड़ा नहीं करना ! पर नहीं , अपनी फितरत से कहां बाज आने वाले थे वह ! दो पन्नों की जगह छह पन्नों का साक्षा त्कार दिया उन्होंने अर्चना वर्मा को और उसमें फिर बेसिर पैर की बातें -‘‘ ठाकुर साहब ने घेर -घार हमारी शादी करवा दी !’’ मन्नू जी ने पढ़ा तो फिर आहत हुईं -‘‘ शादी के समय तीस साल की उम्र थी राजेंद्र की ! बाल विवाह हो रहा था हमारा कि कोई घेर घार कर शादी करवा दे ?’’ और शारीरिक विकलांगता और भावात्मक आघात को एक ही तराजू पर तोलना और सबसे बढ़कर अपनी आज़ादी के राग अलापना –  ‘‘ परिवार तो ऐसी चीज़ है जो कल्पना के पंखों को क्लिप करती है ! वैयक्तिकता समाज के दबावों को , परिवार को नकार कर पाई जाती है । परिवार में रहते हुए कोई क्रांतिकारी काम नहीं कर पाता !’’ एक बार मन्नू जी पर बनी साहित्य अकादमी की फिल्म में उनके मुंह से एक बुदबुदाहट -‘‘ आय हैव नॉट  बीन फेअर टू हर ! ’’ सुनकर बहुत अच्छा लगा था पर अपने साक्षात्कारों में हमेशा  उस कन्फेशन पर घड़ों पानी उड़ेलते रहे और अब तक अनफेअर ही बने चल रहे हैं।
राजेंद्र जी को साक्षात्कार देने का आब्सेशन है । एक ही बात को घुमाफिराकर अपनी लच्छेदार भाषा में कहते चले जाते हैं । अगर कोई उनके साक्षात्कारों और जीवन को लेकर तौले तो विरोधाभाषों  का एक पोथा तैयार हो जाएगा । वे कहते हैं – ‘ शादी  एक पिंजरा है , उसमें आपको मूवमेंट की उतनी ही सुविधा है जितनी पिंजरा देता है ! ’’ पर इस पिंजरे में वे बने रहना चाहते थे । मन्नू जी पिंजरे का दरवाज़ा खोल कर बाहर का रास्ता न दिखा देतीं तो वे आज भी इसी पिंजरे में बने रहते । दरवाज़ा खोल दिया गया तो ‘‘पिंजरे का पंछी’’ अराजक होकर अपनी आज़ादी का परचम फहराकर, आज़ादी के गीत गाने लगा ।
इसी साल 2011 में एक रेडियो चैनल से आई एक लड़की ने अलगाव का कारण पूछ लिया तो यहां एक अलग उत्तर  हाजिर था -‘‘ मैं पढ़ने लिखने वाला आदमी हूं , मन्नू को हमेशा  यही लगता था कि मैं उसे समय ही नहीं देता। उसकी यह शिकायत हमेशा  रही । उसके परिवार में बड़े आदर्श  पति रहे हैं । तो एक आदर्श  पति का रोल तो मैं निभा नहीं सकता था । ’’ संयोग कि लड़की वहां से साक्षात्कार लेकर सीधे मन्नू जी के यहां चली आई । मन्नू जी ने कहा – ‘‘ मैं समय मांगती थी , इस लिये वे अलग हुए ? समय तो खुद मेरे पास नहीं था । कॉलेज की नौकरी , घर का खर्च किसी तरह चला पाने के लिये कॉलेज  के बाद ट्यूशन , साल के 361 दिन काम । फिर अपना लिखना । हमारे कॉमन  मित्र । उनका आना । हमारा उनके यहां जाना । मेरे पास ही समय कहां था जो मैं इनसे समय की मांग करती ? उनके जाने के बाद मन्नू जी ने राजेंद्र जी से पूछा – ‘‘ अलग होने का सही कारण क्यों नहीं बताते । आपमें अगर करने की हिम्मत है तो कहने की हिम्मत क्यों नहीं है । हर साक्षात्कार में एक अलग कारण गढ़ लेते हो और उसका ठीकरा मेरे सिर पर फोड़ते हो ! ’’ अगला जवाब हाजिर था – ‘‘ अरे , तो मैं क्या माथे पर चिपका कर घूमूं कि मैंने यह यह किया । अब यह सब हर किसी को बताने की बातें थोड़े ही हैं । ’’ ……अब आप उनके सच बोलने और दूसरों को नंगा करने के बजाय खुद नंगे होने के गर्वीले वक्तव्य पर सिर टकराते रहें कि वह सीख आखिर किनके लिये दी गई है ? किन्हें बेवकूफ और दंभी कहा गया था ?
राजेन्द्र यादव को बहुतों से जवाबदेह होना है – अपनी पत्नी , प्रेमिका और मित्रों से , साथी लेखकों और पाठको से । अपने भीतर झांक कर देखें तो शायद अपने आप से भी ।

पर वह बात कौन सी थी ? क्या आप राजेंद्र – मन्नू जी के अलगाव की मूल वजह के बारे में कुछ बता सकती हैं क्योंकि मन्नू जी के अलावा जिन तीन चार लोगों को उसके बारे में पता है , उनमें से एक आप भी हैं जो मन्नू जी के बेहद करीब हैं ?
सच तो यह है कि अलग रहना दोनों का आपसी सहमति से लिया हुआ निर्णय नहीं था जैसा कि राजेंद्र जी कहते रहे हैं – ‘‘ मैं कई बार छह महीने बाहर रहा ताकि रोज रोज का क्लेश मिटे , मुझे विवाह और आजादी में से एक को चुनना था , विवाह के आचरण की आचार संहिता में मेरा दम घुटता था । हमने अलग रहने के प्रयोग किए । ’’ जैसे राजेंद्र जी अपनी आजादी के लिए खुद अलग हुए हों । दरअसल यह मन्नू जी का एकल निर्णय था जिसे राजेंद्र जी को स्वीकृति देने पर मजबूर होना पड़ा ।
एक औरत की ज़िन्दगी में – चाहे वह कितनी भी पढ़ी लिखी , आत्मनिर्भर और नामचीन क्यों न हो – हादसों और आघातों को पीछे ठेलकर जब तक वह अपने वैवाहिक संबंध को चला सकती है , चलाती है । 1994 में उज्जैन से जब मन्नू जी दिल्ली लौटीं तो स्टेशन पर चहकते हुए राजेंद्र जी और आत्मीयता और अपनत्व से भरा घर । मन्नू जी को लगा कि अब उम्र का भी तकाज़ा है और आखिर घर से जुड़ाव भी होता ही है । उन्हें भीतर एक आशा  बंध रही थी कि अब सब ठीक हो जाएगा , हंस की आर्थिक स्थिरता के कारण भी राजेंद्र जी में बदलाव आएगा । लेकिन कुछ ही दिनों में राजेंद्र जी के छलात्कार का शिकार बनी एक और ‘‘मीता’’ मन्नू जी की ही गोद में सिर रखकर अपना दुखड़ा रो रही थी । उनसे तीस साल छोटी वह मीता अपने परिवार और दोनों बच्चों को छोड़कर राजेंद्र जी के साथ आने का निर्णय ले चुकी थी और उनके ढुलमुल रवैये को देखकर परेशान थी । मन्नू जी बुरी तरह टूटीं और निर्णय लिया  -‘‘ बस , बहुत हुआ , सो फार एंड नो फर्दर !’’ ये उन्हीं के शब्द हैं ।  यह कांड न हुआ होता तो मन्नू जी तो सबकुछ भूल कर नये सिरे से ज़िंदगी शुरु करने के लिये साथ रहने को तैयार थीं ही । कोई भी औरत अपना घर-परिवार तोड़ना नहीं चाहती जब तक सिर के ऊपर से पानी न गुज़र जाये । अब चूंकि हंस की आर्थिक स्थिति भी मजबूत हो चुकी थी । मन्नू जी ने अपना फैसला सुना दिया और उस पर डटी रहीं । वे यह जानती हैं कि आज वे अगर ज़िन्दा हैं तो अपने इस निर्णय पर टिके रहने की वजह से ही , वर्ना रोज़ रोज़ का यह तनाव और राजेंद्र जी के बेरोकटोक कारनामे , उनके लिये अंततः जानलेवा और घातक ही साबित होते ।

मन्नू जी के लिये कुछ लोग कहते हैं कि मन्नू जी को राजेंद्र जी से जो फायदा उठाना था , उठा लिया और बाद में उन्हें घर से बेदखल कर दिया ?
पति पत्नी के रिश्तों  में भी जोड़-घटाव , फायदा-नुकसान , हानि-लाभ  —  पुरुषवादी सोच इससे आगे जा ही नहीं सकती । भावनात्मक तकलीफ को समझ पाना उनके बूते का है ही नहीं । जो ऐसा कहते हैं , उन्होंने मन्नू जी की किताब ‘‘ एक कहानी यह भी ’’ में बिट्वीन द लाइंस पढ़ने-समझने की कोशिश ही नहीं की । समावर्तन के अक्टूबर 2008 के अंक में मैंने मन्नू जी पर नौ पन्नों का संस्मरण लिखा है , उसमें विस्तार से इस पर चर्चा की है ।
मन्नू जी अपनी शादी से पहले ही एक प्रतिष्ठित लेखिका थीं । अपने लेखन के लिये राजेंद्र जी के नाम का सहारा नहीं लिया उन्होंने । हां , राजेंद्र जी से प्रोत्साहन ज़रूर मिलता रहा, जिसके कारण ज़िंदगी के तनावों को अनदेखा करती रहीं और ज़िंदगी चलती रही । प्रेम विवाह था , घर से विद्रोह किया था इसलिये विवाह को निभाना एक बड़ी जिम्मेदारी भी थी । विवाह को न चला पाना एक बहुत बड़ी हार होती । अपनी तथाकथित आत्मकथा में न चाहते हुए भी वे काफी कुछ संकेतों में कह ही गई हैं । जब उनकी इस किताब का फाइनल प्रूफ आया था , मैंने उनसे बहुत बार कहा कि आप अलग होने की इस वजह को थोड़ा सा खोलकर लिखिये । उनको तरह तरह से समझाया । मिन्नते कीं । पर वे भी कम ज़िद्दी नहीं । कहने लगीं – चौदह  साल से इस किताब को मर-मर कर तो लिखा है , अब मैं एक शब्द नहीं जोड़ूंगी । दरअसल वे इसे निजी त्रासदी ही समझती रहीं , इसका एक बड़ा समाजशास्त्रीय कोण समझ ही नहीं पाईं कि यह सिर्फ उनकी  निजी समस्या नहीं हैं । हजारों महिलायें ऐसे अनुभवों से गुज़रती हैं और इसे खोलकर लिखना , उसका एक तार्किक विश्लेषण  करना , पाठिकाओं को एक सकारात्मक सीख देगा । अब वे कहती हैं कि मैंने लिख दिया होता तो इस तरह हर रोज़ राजेंद्र एक नया ठीकरा मेरे सिर पर न फोड़ते ।
जब साथ थे , तब भी हमेशा  यह आरोप लगाते थे कि लेखिका होकर भी तुम लेखक की जरूरत नहीं समझती । तुम घरेलू औरतों की तरह बिहेव करती हो । मन्नू जी कहती हैं -‘‘ पिता से झगड़ कर , घर से विद्रोह कर मैंने शा दी की । बिछिए पहनना , मांग भरना , करवाचैथ का व्रत करना – किसी तरह का घरेलू औरत का स्वांग नहीं किया , सिर्फ एकनिष्ठता की मांग की और वह भी एक ‘मीता’ को स्वीकार करते हुए। ’’ पर मीताओं का बहुवचन कोई पत्नी स्वीकार नहीं कर पाती ।
उनके भीतर के लेखक ने हमेशा  उनके भीतर की स्त्री को ढांपे रखा , सिर उठाने नहीं  दिया वर्ना इतनी छूट कहां कोई स्त्री दे पाती । कोई आधुनिक , स्वतंत्रचेता , देह मुक्त स्त्री ( जैसी स्त्री गढ़ना राजेंद्र जी के स्त्री विमर्श  का स्वप्न है ) इतनी ‘स्पेस’ अपने साथी पुरुष को दे पाती ? उसकी रासलीलाएं , उसके झूठ , उसकी संवादहीनता , उसकी असंवेदनशीलता – पैंतीस साल के लंबे अरसे तक बर्दाश्त कर पाती ? यह उस परंपरावादी खांटी घरेलू लेखिका के ही बूते का था कि अपने पति के लेखन को सबसे ऊंचा  दर्जा देती रही और सारी छूट भी लेखिका ने ही दी – यह मानते और स्वीकार करते हुए कि लेखिका को लिखने के लिए चाहे पहाड़ों के रिसार्टों पर जाने और प्रेमी पुरुष की जरूरत महसूस न हो पर उंगलियों में अदा से सिगार पकड़ने वाले लेखक की दैहिक और भावनात्मक जरूरतें एक आम सामान्य पुरुष  से अलग और ज्यादा है और विशिष्ट  पुरुष  को जीवनसाथी बनाने का चुनाव भी तो उनका अपना ही था , फिर शिकायत कैसी और किससे ? फिर तो यह चुनौती सी जान पड़ी कि इस विशिष्ट  प्राणी को सहेज कर , संभालकर रखना है । जैसा भी है , जितना भी अपने हिस्से यह विशिष्ट  पुरुष आ पड़ा है , उसे पोशक खूराक हर तरह से उपलब्ध करवाकर खुश  रखना है । पर उनकी सारी मजदूरी , मशक्कत बेकार गई । जिनके लिये घर परिवार प्राथमिकता में नहीं आता , उन्हें ताउम्र इसकी अहमियत समझ नहीं आ सकती ।

अलगाव के बाद भी राजेंद्र जी और मन्नू जी कई जगह एक साथ दिखते हैं ! दोनों में अब कैसी केमिस्ट्री है ?


जब जब किसी साक्षात्कार में राजेंद्र जी कुछ आपत्ति जनक बोल जाते हैं , मन्नू जी चुप हो जाती हैं , उनसे बात करना बंद कर देती हैं। एक सप्ताह से ज़्यादा यह अबोला चल नहीं पाता । आखिर राजेंद्र जी फोन करेंगे -‘‘ क्या अभी तक मुंह फुलाकर नाराज़ बैठी हो ! ’’ और संवाद का सिलसिला फिर शुरु हो जाता है। लंबे समय तक साथ रहते हुए मन्नू जी ने संवादहीनता का इतना लंबा दौर झेला है कि उन्हें फोन पर इतना भी बात कर लेना सुकून देता है । और माफ कर देना तो मन्नू जी के जैनी संस्कारों में है । नहीं जानती , लेकिन राजेंद्र जी के भीतर मन्नू जी को लेकर कहीं एक गहरा अपराधबोध तो है ( होना भी चाहिये ) जिसकी वजह से साक्षा त्कारों में तमाम उल्टे सीधे बयान देने के बाद भी राजेंद्र जी रिश्ता  टूटने नहीं देते क्योंकि अपनी फितरत से वे भी वाकिफ हैं। उनका अपना सामंती रवैया चाहते हुए भी छूटे नहीं छूटता । राजेंद्र जी का आगे बढ़कर मन्नू जी से संपर्क बनाये रखना , फोन करना मुझे अच्छा लगता है क्योंकि मन्नू जी जिस तरह बिना भूले उसका ज़िक्र करती हैं , उन्हें भी अच्छा लगता होगा ।

मैला ढोने वाली महिलाओं के लिए प्रधानमंत्री को ख़त

माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी,
मैं आपका नारा..‘सबका साथ सबका विकास’ की तरफ आपका ध्यान ले जाना चाहूंगी कि इस नारे में क्या वे  महिलाएं भी शामिल हैं जो अपने माथे पर ‘मानव-मल’ उठाने के लिए विवश हैं ? जबकि भारत में केवल रिकार्ड के लिए और कानूनन नियमानुसार मानव-मल उठाना निषेध है । दलित महिलाएं इस घृणित कार्य को करने के लिए इसलिए भी मजबूर हैं क्योंकि उनके पास रोजी-रोटी का और कोई चारा नहीं है..जी हां यहां मैं बताना चाहूंगी कि वे दलित महिलाएं जो कई  सदी से इस काम में लगी हुई हैं जब वे इसे छोड़कर दूसरे काम के लिए जाती हैं तो उन्हें अस्पृश्य कहकर काम नहीं दिया जाता है ।

उत्तराखण्ड जिसे देवभूमि कहा जाता है वहां के एक छोटे शहर हरिद्वार के जबरदस्तपुर गांव में 45 साल की राज दुलारी हैं, जो प्रति दिन 20 घरों से मानव-मल को साफ करने का काम करती हैं। कैसा देश है यह यहां एक व्यक्ति अपना मल भी साफ नहीं कर सकता ? उसके अपने मल को उठाने के लिए किसी दूसरे व्यक्ति की जरूरत पड़ती है ? भारत को कैसे विकसित और महान कहा जा सकता है जिसके  ‘हरि के द्वार’ में इस तरह का घृणित काम करने के लिए महिलाएं धकेल दी जाती हों ?

भारत जैसे खूबसूरत देश में, जिसे आप एक विकसित देश और डिजिटल इंडिया बनाने के लिए दिन-रात सबके साथ की बात कर रहे हैं , उनमें ये मैला ढोने वाली महिलाएं कहां आती हैं ? मुझे पता है भारत के विकास में आपको इन महिलाओं की शायद कोई आवश्यकता न हो किन्तु मैं पूरे दावे के साथ कह सकती हूं कि इन्हें छोड़कर आप वास्तविक और विकसित भारत कभी बना नहीं पायेंगे । आज हमें विकसित और अतुलनीय भारत से कहीं ज्यादा वास्तविक भारत बनाने की जरूरत है ।

भारत में बेसलाइन सर्वे के अनुसार 11 करोड़ 10 लाख 24 हजार 917 घरों में शौचालय नहीं हैं इसलिए ‘खुले में शौच नहीं करना चाहिए’ ये पहल भी आपने ही शुरू की । तुरन्त घरों में शौचालय बनाने के लिए लोगों को जागरूक किया । महोदय आपने ‘स्वच्छता अभियान’ चलाया, जिसके लिए केन्द्र सरकार द्वारा 19,314 करोड़ रूपये खर्च किए गये, आपकी इस पहल के लिए लोग कायल भी हुए, तो  फिर आपकी आंखों से ये दलित महिलाएं और उनके माथे पर मानव-मल की टोकरी कैसे अनदेखी रह गयी ? इस घृणित पेशे में लगी इन महिलाओं की महज दिन-भर की कमाई केवल 10रूपये है । आप सोच सकते हैं कि एक व्यक्ति इस महगांई के समय में मात्र 10 रूपये में घर कैसे चला सकता है? जहां इतने करोड़ रूपये स्वच्छ भारत मिशन के लिए लगाए जा रहे हैं उसमें कुछ पैसे क्या इन महिलाओं को रोजगार के लिए दिए जा सकते हैं ?

एक स्त्री जिसे भारत में आदर्श देवी लक्ष्मी, दुर्गा, सरस्वती कहकर सम्मान दिया जाता है, नवमी में जिनके पांव धोकर पिया जाता है,,,“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’ जैसे सूक्तियों से भारत को नवाजा जाता है. फिर ये कौन सा भारत है और वे कौन सी महिलाएं है जिनके माथे पर मानव-मल की टोकरी है?  विकसित राष्ट्र बनाने के लिए आपको ऐसे घृणित कामों को नज़रअन्दाज नहीं करना चाहिए । हजार पहल हमारी तरफ से और एक पहल आपकी तरफ से जरूर होनी चाहिए कि हमारे देश की दलित महिलाएं जिन्होंने विवश होकर अपने माथे पर सदियों से ये मानव-मल की टोकरी उठा रखी है उसे कहीं दफन  करें ताकि भारत जैसे देश में कहीं यह सुनने को न मिले कि जो देश संयुक्त राष्ट्र संघ में विकास का एक मापदण्ड तैयार कर रहा है उसमें वे महिलाएं भी हैं जिनके माथे पर मानव-मल की टोकरी है ।

इस पत्र के माध्यम से मैं मैला-प्रथा उन्मूलन के लिए आपकी तरफ से विशेष पहल चाहती हूं ।
कृपया  शीघ्र से शीघ्र इसे भारत के कोने-कोने से समाप्त करें ।
धन्यवाद !

प्रार्थी
प्रियंका सोनकर

प्रियंका दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में तदर्थ शिक्षिका हैं. संपर्क: priyankasonkar@yahoo.co.in

कहानी में तीसरा कक्ष

अनुपम सिंह

अनुपम सिंह दिल्ली वि वि में शोधरत हैं. संपर्क :anupamdu131@gmail.com



जया जादवानी की कहानियों का पहला संग्रह “मुझे ही होना है बार –बार” मेरे सामने है. संग्रह का नाम  इन पंक्तियों  में से चुना गया है –‘सिर्फ मैं ही हो सकती हूँ ,सिर्फ मुझे ही होना है . मुझे ही बिखरना है टूटकर ,मुझे ही बनना है . सृष्टि के अंत के बाद भी मुझे ही होना है …लगातार…..बार-बार”. इस  कहानी संग्रह को पढ़ते हुए पहली  कहानी ‘शाम की धूप” में ही नाम धारी पात्र मिलते हैं –रामखेलावन और राजू . बाकि सभी कहानियां बिना नाम वाले पात्रों की कहानियां हैं, जिसके लिए कहानीकार ने प्रतीकों का सहारा लिया है . इनकी सभी कहानियों को प्रतीकों का वितान कहा जा सकता है . जहाँ प्रतीकों के संबंधों को समझने में जरा सी भी चूक हुई वहां कहानी पूरी तरह से उलझ कर रह जायेगी . इस संग्रह की पहली कहानी ‘शाम की धूप ‘संग्रह की अन्य कहानियों से लम्बी है या औपन्यासिक विन्यास (जिसे कहानी के फ्लैप पर लिखा गया है )लिए हुए है . लेकिन अन्य कहानीकारों की कहानियां देखें तो इसे औपन्यासिक विन्यास की कहानी नहीं कह सकते . यद्यपि इनकी कहानियां स्त्री चेतना की कहानियां हैं लेकिन शाम की धूप उससे थोडा भिन्न है .इस  कहानी  में स्त्री चेतना  दिखाई देती है लेकिन पाठक पर उस स्त्री चेतना का प्रभाव उस रुप में नहीं पड़ता है जैसा कि अन्य कहानियों में उभर कर आई स्त्री चेतना का . यह कहानी स्त्री विडम्बना से अधिक एक ‘छीजते पुरुष’ की कहानी है. लेकिन यदि उस छीजते (वृद्ध होते )पुरुष को उसके पुन्सत्तव को नष्ट होता मान लें तो निःसंदेह यह कहानी स्त्री चेतना की कहानी होगी . यदि ऐसा माना जायेगा तो कहानी में अनावश्यक विस्तार देखाई देगा .

मैंने इस समीक्षा को कहानी में तीसरा कक्ष शीर्षक दिया है . और इस संग्रह में “तीसरा कक्ष” नाम की एक कहानी भी है .इनकी कहानियों को पढ़ते हुए मुझे लगातार महसूस हो रहा था कि इनकी सभी कहानियों को “तीसरा कक्ष” नाम से संगृहित किया जा सकता था . बहरहाल यह रही मेरी दृष्टि . कहानीकार ने स्त्री की समाज में  जो दोयम दर्जे की स्थिति है उसी को सभी कहानियों में प्रस्तुत करके यथास्थितिवाद का विरोध किया है. इनकी सभी कहानियों में ,जिसको मैंने तीसरा कक्ष कहा है, ऐसे बिंदु हैं जहाँ कोई नहीं जाता है ,क्योंकि वहां कहीं गहराई है, तो कही अंधकार ,कहीं मरे हुए सपनों की लाश है तो कहीं स्त्री का टूटा हुआ स्वतंत्र व्यक्तित्व .सभी उस पहले और दूसरे कक्ष तक ही रह जाते हैं . ‘वहां मैं हूँ’ कहानी का तीसरा कक्ष यह है कि  –“उसने मेरी देह की कमर में हाथ डाल दिया है ,वह मुझे चूम रहा है ,मेरी देह को –माथा ,होठ ,गला ,कंधे “ यह ‘ मैं ’ जो अपने जिस्म को देख रही है वही रहती है उस तीसरे कक्ष में, जहाँ से सभी को पहचानने की कोशिश करती है –“वह मेरे जिस्म के नजदीक आता है . मैं खुद को दूर कर लेती हूँ –अब तुम्ही भुगतो . मैं अपने शरीर से दूर खड़ी उसे देखती हूँ” कहानी का तीसरा कक्ष ‘आत्म’ का कक्ष है ,’चेतन’ का कक्ष है. पहले में तो ख़त्म हो गए संबंधो का ठंठापन है, जिसको लाश की तरह सब ढो रहे हैं . कोई स्त्री जब अपने इसी तीसरे कक्ष में रहती है तो सपने बुनती है , उसे पूरा करने के लिए संघर्ष करती है ,जैसे ही वह पहले वाले कक्ष में प्रवेश करती है भयातुर हो जाती है , क्योंकि यहाँ कोई उसके सपने को झाड़ू  से साफ करता है . लेकिन बचे हुए टुकड़े उसके पैरों में चुभते हैं तब उसको समझ में आता है –‘’कि न तो सपने को रख सकते हैं न  फेक सकते हैं. इन्हें बाहर फेकने की बजाय अपने अन्दर फेकना चाहिए था ’’जहाँ वे सुरक्षित रहते हैं . सपने जीवन के आधार हैं ,”इन्हें जीवित रहना चाहिए ये दुनिया की किसी भी चीज से ज्यादा कीमती हैं‘’ सपने विहीन जीवन मछली के सामान है जो पानी के बिना जिन्दा  है और तड़प रही है . “इनको जिलाए रखने का एक ही तरीका है पानी……. पानी” पहला कक्ष जहाँ वह खिलौने से खेलती है . दूसरा कक्ष जहाँ वह खेलने के लिए बनायीं जाती है . मेरे ख्याल से तीसरा  कक्ष वह  है, जहाँ वह इन सब का निषेध करती है .

स्त्री  इस तीसरे कक्ष में जाकर ही निषेध की ताकत बटोर पाती है  ,जहाँ पुरुष  जाना ही नहीं चाहता है .पहले और दूसरे कक्ष का ही दरवाजा वह खोलता है ,जहाँ वह रहता है . यहाँ यह याद दिलाना अवश्यक है कि  उसका भी एक तीसरा कक्ष है, जिसके दरवाजे वह कभी नहीं खोलता है . “ वह खोलता एक ही है जहाँ वह होता है . बाकी  सब तो बंद पड़े रहते हैं”.  गर्द, सीलन, स्मृतियों की गंध उस तीसरे कमरे में कैद रखता है . वह ही नहीं उसके तीन-तीन बच्चे भी कैद हैं ,उसके पेट से निकालकर . लेकिन एक दिन उसे अँधेरे और ख़ामोशी से ऊब कर ,“ उसने हडबडाकर दरवाजा खोल दिया …..एक चीख उसके गले से फूटी, हवा में उठी और उठती चली गयी…..हवा ने सुना ,बरगद ने सुना ,फूल, पत्तियों ,नदियों ,समुद्रों ,आसमान और बादल ने सुना. सबने चौककर उसे देखा …..उसने एक पल खुद को तोला और बाहर अँधेरे में छलांग लगा दी ” . कैद से मुक्ति ही स्त्री आन्दोलनों का लक्ष्य है . लेखिका हर तरह के कैद से ,गुलामियों से मुक्त करने के लिए संकल्प बद्ध है .’जब वह होता है’ कहानी में ‘वह’ कौन है? वह पति, प्रेमी, दोस्त कोई भी हो सकता है ,लेकिन यहाँ ‘वह’ एक स्त्री का स्वप्न है.  जो आसमान के समान ही असीम है संभावनाओं से भरा हुआ है .आसमान पुरुष का भी प्रतीक होता है तो क्या सिर्फ पुरुष को ही सपने देखने का अधिकार है .एक स्त्री को जिसको धरती के सामान घोषित किया गया है . जहाँ  नैतिकता ,मर्यादा ,वर्जना ,त्याग आदि के जंगल ,नदी पहाड़ उग आयें हैं जिसके नीचे उसका दम घुट रहा है . “अरे …रे …रे मेरी छोटी –सी बच्ची …..देखो ये सरे खिलौने तुम्हारे हैं …ये घोड़ा..ये हाथी…ये गुडिया …गुड्डा …इन सबसे खेलो तुम …देखो बहार मत जाना …बहार बारिश है ,धूप है …काली आंधी चल रही है “. लेकिन लेखिका कहानी के अंत में  तीसरे  कक्ष का वह दरवाजा खोल ही देती है ,जहाँ से सपने आ रहे हैं ,ताजा हवा आ रही है.कहानीकार का उद्देश्य एक तीसरे रस्ते की तलाश  है जो उन दोनों रास्तों से भिन्न है ,जो पहले और दूसरे कक्ष तक ही ले जाते हैं .-“प्रकृति का चक्र अब रोकना बेमानी है . मैंने अपनी छाती के सरे द्वार खोल दिए और अपना चेहरा उन बरसाती बूदों के नीचे कर लिया ….”. इसी प्राकृतिक और आप्राकृतिक के भेद से सब कुछ ठहरा हुआ था ,स्त्रियों की प्रकृति सिर्फ देह तक ही सीमित थी ,देह से बाहर  उसकी कोई पहचान नहीं थी . लेकिन अब  वह इस निषेधाज्ञा को तोडती ,धूप में तपती ,बारिश में भीगती है . स्त्री अपने वजूद को तलाश रही है .-“मैं वहां नहीं जाती ,जहाँ जाने के लिए मुझे मना किया जाता है ,वे जो कहते हैं ,ठीक कहते होंगे . बस कभी कभी मैं खिलौने तोड़  के देख लेती हूँ. माँ की की आँख बचाकर तेज बारिश  में खिड़की में अपना हाथ निकाल लेती हूँ , खूब दोपहर में ,घर के सारे के सारे लोग सो जाते हैं ,छत पर धुप में पसीना पसीना होकर देखती हूँ . नंगे पैर चलती हूँ तलवे जलते हैं तो मुझे असीम शांति मिलती है ….” .

यदि मैं इनकी कहानियों के लिए एक वाक्य में कुछ कहूँ तो यह कि  इनकी कहानियां निषेधाज्ञा का उल्लंघन हैं . वह स्त्री-पुरुष किसी के लिए भी खीचे गए किसी भी लाइन को पार करना चाहती हैं . स्त्री संघर्ष का इतिहास सौ साल से अधिक के संघर्ष का इतिहास है . जिस तरह स्त्री संघर्ष का इतिहास एक देश के भूगोल को लांघ गया, स्त्री भी वैसे ही भूगोल की सीमा को तोड़ना चाहती है . मैंने कहीं पढ़ा था कि  “स्त्री मुक्ति दिवस न पूर्वी है न पश्चमी वह अंतरराष्ट्रीय  है “. लेखिका की दृष्टि  भी स्त्री के लिए भूगोल की जो सीमा है उसको तोड़ने पर  है –“हमें पूरा का पूरा तय कर दिया जाता है जैसे भारत या किसी भी देश के मानचित्र को यहाँ से वहां तक . सरहदों के पास जाने से खतरा है अब मैं किसे बताऊँ मुझे सरहदों के पास जाना ही इसलिए है . नहीं तो क्या जरुरत है फिर “.  स्त्री इन सीमाओं को तोड़कर ही अपने सपने की तलाश पूरा कर सकती है . कोई सवाल कर सकता है कि  स्त्रियों ने  ऐसा  कौन सा  सपना  देखा है,  जिसके लिए वे सभी सीमाओं को तोड़ देना चाहती हैं . तो जवाब यदि इस कहानी से देना हो तो वह होगा ‘समानता’ का . जहाँ स्त्री को  सिर्फ देह न समझा जाय .

किताब: मुझे ही होना है बार-बार 
लेखिका: जया जादवानी 
प्रकाशक: वाणी प्रकाशन 

गर्भवती महिलायें कर सकती हैं मांसाहार और सेक्स: विशेषज्ञों की राय

स्त्रीकाल डेस्क 


एक ओर जहाँ भारत में मातृ मृत्यू दर बहुत ज्यादा है वहै, वहीं भारत सरकार के आयुष मंत्रालय (जो आयुर्वेद, योग व प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्धी तथा होमियोपेथी के विकास के लिये कार्य करता है) ने अपनी एक स्वास्थ्य सलाह पुस्तिका में स्वस्थ प्रसव और सेहतमंद बच्चे के लिए सलाह दी है कि गर्भवती महिलायें मांसाहार न करें. वासना से बचें.  सेक्स न करें  लगता है, इक्कीसवीं सदी में भी देश की वैकल्पिक चिकित्सा प्रणालियाँ विज्ञान और शोध पर अपना आधार विकसित करने के बजाय, महाभारत के अभिमन्यू-मिथक से ही संचालित हो रही हैं. रें .  महाभारत के अभिमन्यू के मिथक से संचालित यह सुझाव कई मामले में अवैज्ञानिक है, खासकर तब, जब भारत की बहुसंख्य आबादी मांसाहारी है और बहुत बड़ी संख्या के लिए जरूरी पोषण आहार मांसाहार पर निर्भर है. सेक्स करने के लेकर भी डाक्टरों की राय आयुष मंत्रालय से ज्यादा वैज्ञानिक है. दुखद सत्य यह है कि 5 वर्ष से छोटे बच्चे तथा माँयें भारत में कुपोषण के सबसे ज्यादा शिकार हैं, और आसानी से कहा जा सकता है कि आयुष का स्वास्थ्य-बोध इस प्रकार की सलाह देते समय पोषण में वंचित इस आबादी के स्वास्थ्य से ज्यादा तथाकथित ‘संस्कृति’ पर अधिक ध्यान दे रहा है.से दूर रहने की आयुष की सलाह का सीधा व प्रचलित अर्थ जो होता है यानि कि सेक्स से दूर रहना, तो यह पूर्णत: अवैज्ञानिक है और फिर से भारतीय संस्कृति की ‘नयी व्याख्याओं’ से प्रेरित दिखाई देती है.

मातृ मृत्यु  का नियन्त्रण महिला स्वास्थय का जरूरी पहलू 

आयुष मंत्रालय ने मदर एंड चाइल्ड केयर नामक बुकलेट जारी करते हुए अपने सुझाव में कहा कि गर्भवती महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान इच्छा, क्रोध, लगाव, नफरत और वासना से खुद को अलग रखना चाहिए. साथ ही बुरी सोहबत से भी दूर रहना चाहिए. हमेशा अच्छे लोगों के साथ और शांतिप्रिय माहौल में रहें.  आयुष मंत्रालय दो कदम आगे बढ़कर कहता है कि यदि आप सुंदर और सेहतमंद बच्चा चाहती हैं तो महिलाओं को “इच्छा और नफरत” से दूर रहना चाहिए, आध्यात्मिक विचारों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए. अपने आसपास धार्मिक तथा सुंदर चित्रों को सजाना चाहिए.  केंद्रीय आयुष मंत्री श्रीपद नाइक ने पिछले सप्ताह इस बुकलेट को नई दिल्ली में हुई राष्ट्रीय स्वास्थ्य संपादकों के एक सम्मेलन में जारी किया था.

सामूहिक नसबंदी के कारण भारतीय स्त्रियों की मौत

स्त्रीकाल के  संस्थापक संपादकों में से एक महात्मा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान में प्रोफेसर डाॅ. अनुपमा गुप्ता कहती हैं कि गर्भावस्था के दौरान भारत में 50 % से अधिक महिलायें खून की कमी तथा कुपोषण के अन्य प्रकारों से जूझती हैं , जिनके लिए मांसाहारी भोजन में  प्रोटीन, आयरन और कार्बोहाइड्रेट की पूर्ती होती है.  खुद शाकाहारी गुप्ता बहुसंख्य मांसाहारी जनता की हकीकत को नजरअंदाज करने से बचने का सुझाव देती हैं. उन्होंने कहा कि सेक्स करना या न करना स्वास्थ्य की स्थिति का मामला है. मसलन पहले तीन महीने में सेक्स करना कई तरह की समस्यायें पैदा कर सकता है, लेकिन यदि गर्भावस्था सामान्य है तो उसके बाद के तीन महीनों में सावधानी के साथ सेक्स किया जा सकता है. बल्कि कई बार महिला के मानसिक स्वास्थ्य के लिए यह लाभकारी भी सिद्ध होता है. क्योंकि शरीर व मन पर अतिरिक्त बोझ डालने वाली इस स्थिति के दौरान कई महिलाओं में तनाव की स्थिति निर्मित होती है और सेक्स तथा पति से शारीरिक निकटता इस तनाव को दूर करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं. उन्होंने स्पष्ट किया कि  गर्भावस्था के दौरान सेक्स के फायदे गिनाने वाले चिकित्सीय शोध इंटरनेट पर न भी मिलें तो, ‘गर्भावस्था में मनोविज्ञान’ पर उपलब्ध पुस्तकें इस तथ्य पर प्रकाश डाल सकती हैं.

गर्भवती महिला का डायट

चाइल्ड केयर लीव बनाम मातृत्व की ठेकेदारी पर ठप्पा 
डाॅ. अनुपमा कहती हैं कि  क्रोध, नफरत आदि मनोभावों से बचना गर्भवती स्त्री के लिए जरूर फायदेमंद है, जिसका अनुपालन किया जा सकता है, और उसका कारण वैज्ञानिक है. लेकिन बड़ी बात यह है कि यह तभी कारगर हो सकता है, जब महिला का परिवार और समाज भी इस प्रकार का वातावरण निर्मित करने में सामूहिक रूप से योगदान दे. यदि माँ बन रही स्त्री के चारों ओर प्रताड़णा, धोखे, लालच और नफरत का वातावरण पहले से ही है, तो वह अकेली स्वयं को तथा आने वाले बच्चे को इन सब से कैसे बचा पायेगी? क्या गर्भावस्था के दौरान उसे वनवास में रहने की सलाह दी जा रही है?
सच तो यही है कि आयुष गर्भवती स्त्रियों को जो सलाहें दे रहा है, वे तब तक कारगर नहीं हो सकतीं जब तक समूचा समाज इसमें मदद नहीं करता. वे कहती हैं साथ ही यदि ये सलाहें चिकित्सा से जुड़े एक जिम्मेदार मंत्रालय द्वारा दी जा रहीं हैं, तब इन सलाहों को सबसे पहले वैज्ञानिक होना चाहिये और तब ही उनके सवालिया सांस्कृतिक व आध्यात्मिक पहलुओं की तरफ नज़र डालने के बारे में सोचा जा सकता है, उसके पहले बिल्कुल नहीं. स्त्रियों को उनके मौलिक अधिकारों तक को देने में कछुये की चाल से चल रहे एक देश-समाज में, स्वस्थ व नीतिवान शिशुओं को जन्म देने की जितनी जिम्मेदारी माँ की हो सकती है, उससे कहीं अधिक परिवार और समाज की होनी चाहिये, इस सत्य का सामना सरकारी महकमों को करना ही चाहिये, यदि वे सचमुच ही देश की तरक्की चाहते हैं

मैत्रेयी इतनी इर्ष्यालू थी कि वह नजर रखती थी कि राजेंद्र जी के पास कौन आ रहा है (?)

स्त्रीकाल डेस्क 

मैत्रेयी पुष्पा की किताब ‘वह सफ़र था कि मुकाम था’  हंस के संपादक राजेंद्र यादव  से उनकी जगजाहिर घनिष्ठता को स्पष्ट करती हुई एक रेफरिंग दस्तावेज है. लेकिन  ऐसे  दस्तावेज  होने की संभावनाओं के साथ लिखी गई किताबों में गल्प और किस्सागोई नहीं होने चाहिए, जिससे मैत्रेयी जी ने इस किताब को भर दिया है- ऐसा लगता है. किताब का एक अंश समालोचन  में प्रकाशित हुआ है, जो राजेंद्र जी की पत्नी और लेखिका मन्नू भंडारी के प्रति विद्वेष से भरा है. यह अंश राजेंद्र यादव  के बीमार होने और हॉस्पिटल में दाखिल होने से शुरू होता है और आगे मन्नू  जी के खिलाफ प्रलाप करते हुए राजेंद्र जी से लेखिका की अंतरंगता, सखी-भाव को बताते हुए बढ़ता है. सखी-भाव का आश्रय है राजेंद्र यादव की ”मीता.’ जिनके संदर्भ में मैत्रेयी जी का दावा है कि उन्होंने उन्हें देखा है. स्त्रीकाल ने राजेंद्र जी की बीमारी के चश्मदीदों, उनकी सेवा में लगे लोगों से बात कर मैत्रेयी की दावे की सत्यता की पडताल की. तथ्यों के आधार पर अपनी पहली रपट में स्त्रीकाल  ने स्पष्ट कर दिया कि हिन्दी अकादमी की उपाध्यक्ष और साहित्यकार मैत्रेयी  जी झूठ रच रही हैं. इस क़िस्त में हम उन दिनों राजेंद्र जी के आस-पास रहे उनके आत्मीय लोगों के हवाले से समझते हैं कि मैत्रेयी अपने संस्मरण में कितना प्रतिशत कल्पना डाल रही हैं-पता नहीं किस उद्देश्य से. पिछली क़िस्त में हमने देखा कि राजेंद्र जी को अस्पताल ले जाने का मैत्रेयी का दावा किस तरह झूठा और काल्पनिक है, वैसे ही मन्नू जी पर किया गया उनका प्रहार भी विद्वेषपूर्ण है:

वेददान सुधीर 

मैत्रेयी पुष्पा खुद को खुदा समझने लगी हैं, वे भूल गईं कि राजेंद्र जी ने उन्हें स्थापित किया है. जब राजेंद्र यादव अपस्ताल में भर्ती हुए तब मैं भी अस्पताल पहुँच गया था. यह सच है कि मैत्रेयी पुष्पा की बेटियाँ एम्स में थीं. मैत्रेयी के पति की अस्पताल में भूमिका जरूर थी मदद करने की, लेकिन मन्नू भंडारी के बारे में उसके दावे सर्वथा झूठे हैं. मन्नू जी अक्सर राजेंद्र जी के खाने-पीने से लेकर हर बात का ख्याल रखती थी. उनका रूटीन था किशन से जानना कि राजेंद्र जी  को क्या खिलाया ? मैत्रेयी इर्ष्यालू भी हैं.  वे मन्नू जी पर कीचड़ उछाल रही हैं. वे कुत्सित विश्लेषण की विशेषज्ञ हैं. अपने को सही ही सिद्ध करना  था मन्नू जी को तो उन्होंने राजेंद्र जी को खुद से अलग क्यों किया होता !  नगीना को मैंने बहुत कम ही देखा है. नगीना खुद भी मन्नू जी का सम्मान करती थीं. राजेंद्र यादव अस्पताल से निकलकर अपनी बेटी रचना के यहाँ गये . राजेंद्र जी उन्मुक्त पक्षी थे, वे किसी की परवाह नहीं करते थे. उन्होंने अपने घर जाने को तय किया तो उन्हें कौन रोक सकता था. उन्हें मैत्रेयी की भी परवाह नहीं थी. मैत्रेयी इतनी इर्ष्यालू थी कि वह नजर रखती थी कि राजेंद्र जी के पास कौन आ रहा है. एक स्त्री थीं, पत्रकार, उनके राजेंद्र जी से मिलने आने पर वह चौकन्नी हो जाती थी. मन्नू जी को किसी के लायसेंस की जरूरत नहीं थी. राजेंद्र जी और मन्नू जी के रिश्तों की तरह मैंने कोई रिश्ता नहीं देखा. मैत्रेयी चाहती थी कि वह राजेन्द्र जी की ख़ास मित्र बने,सबसे प्रिय. राजेंद्र जी ने उसकी साहित्यिक मदद भी खूब की.

किशन
राजेंद्र जी की बीमारी की खबर सुनकर सुधीश पचौरी उनके घर आ गये थे. और नवभारत टाइम्स में रहने वाले पुनीत टंडन और आभा टंडन भी आ गये थे, जिनकी हैदराबाद ब्लास्ट में बाद में मौत हो गई. राजेंद्र जी के अस्पताल में भर्ती होने के बाद उनकी देखभाल मन्नू जी और रचना दी ने की. मैं तब बहुत छोटा था. इतना समझ नहीं पाता था लेकिन यह तो है कि मैत्रेयी जी के पति और उनके बच्चों के एम्स में होने से कुछ मदद मिली थी. बाबूजी को पहले जेनरल वार्ड में एडमिट किया गया था फिर उन्हें कमरा मिला , क्योंकि उन्हें देखने कुछ बड़े लोग आने वाले थे, चन्द्रशेखर, लेकिन वे आ नहीं पाये. सुषमा स्वराज  आई थीं, दो मिनट के लिए- ( हालांकि अरविंद जैन की याद से सुषमा ने बुके और एक कार्ड भिजवाया था, वे खुद नहीं आ पायीं थीं) .मन्नू जी लगभग दिन भर रहती थीं.

जब बीमार हुए थे बाबूजी तो मैंने सबको खबर कर दी थी. उस समय मोबाइल तो नहीं था न, लेकिन मैंने फोन कर दिया था. मैं बच्चा सा था उस समय, बहुत घबड़ा गया था. सुधीश पचौरी तुरत आ गये थे. सुधीश जी ने उनको फोन किया था. मैत्रेयी जी के बच्चो के होने से डाक्टरों से आसानी से अपॉइंटमेंट मिल जाता था.

केजरीवाल सर, हिन्दी अकादमी में आपकी उपाध्यक्ष साहित्यिक झूठ खड़ा कर रही हैं? (मन्नू-मीता-मैत्रेयी के सच की खोज)

शिव कुमार शिव : 
एक दिन बाद जब मै दिल्ली पहुंचा उस समय वह जेनरल वार्ड  से कमरे मे आ गए थे। उस समय जब मै वहाँ पहुँचा तब वहां  मैने देखा कि मन्नू जी हैं, महेश दर्पण हैं, और अरविंद जैन हैं। 2 रातो तक उनकी देखभाल महेश दर्पण ने की थी और फिर मै वहाँ स्थाई रूप से रहने लगा । मैत्रेयी  जी का कहीं नामो निशान नही था । लगभग 5 दिन बाद शाम को 4 बजे मैत्रेयी  जी गुप्त रूप से राजेंद्र जी से मिलने पहुंची । जब वह कमरे में थी, तब मै चौकीदारी कर रहा था। उन्हे याद हो तो आधे घंटे के बाद मैंने उन्हे गाड़ी मे बिठा दिया था । यह कहना लाज़िमी होगा कि उनकी देखभाल और संभाल का पूरा जिम्मा मन्नू जी का था । मैत्रेयी को तो उनकी बीमारी का पता बहुत दिन बाद चला । हालांकि इस बीमारी के दौरान के कई प्रसंग है जो अद्भुत भी हैं और रोचक भी.  लेकिन वे कहीं  नही हैं,  जो इतना झूठा शोर मचा रही है । उनके जिंदा रहते तो आपने उनका लेखकीय शोषण किया अब मुर्दे को तो बख्श दो यार !

इन बयानों को पाठक आत्मकथा अंश के पहले हिस्से से जोड़कर पढ़ सकते हैं, जिसमें मैत्रेयी जी राजेंद्र जी का शुगर टेस्ट कराने के बाद अपने पति द्वारा उन्हें एम्स में भर्ती कराने का उल्लेख करती हैं, जो किसी भी तथ्य से पुष्ट नहीं होता. यानी मैत्रेयी जी झूठ रच रही हैं.

स्त्रीकाल में क्रमशः जारी

मन्नू भंडारी के नाम

आज हरदिल अज़ीज साहित्यकार मन्नू भंडारी का जन्मदिन है. उनके प्रति असीम रागात्मकता और सम्मान के साथ वरिष्ठ साहित्यकार सुधा अरोड़ा की यह कविता स्त्रीकाल के पाठकों के लिए.  


जिन्हें वे संजोकर रखना चाहती थीं 
सुधा अरोड़ा

वे रह रह कर भूल जाती हैं
अभी अभी किसका फोन आया था
किसकी पढ़ी थी वह खूबसूरत सी कविता
कुछ अच्छी सी पंक्तियाँ थी
याद नहीं आ रहीं . . . .

दस साल हो गये
अजीब सी बीमारी लगी है जान को
रोग की तरह…. भूलने की
बस, कुछ भी तो याद नहीं रहता
सब भूल – भूल जाता है

वह फोन मिलाती हैं
एक क़रीबी मित्र से बात करने के लिए
और उधर से ‘हलो` की आवाज़ आने तक में
भूल जाती हैं किसको फोन मिलाया था
वह  शर्मिन्दा होकर पूछती हैं,
‘बताएंगे , यह नंबर किसका हैं?`
‘पर फोन तो आपने किया है !`
सुनते ही वह घबराकर रिसीवर रख देती हैं

क्या हो गया है याददाश्त को
बार-बार बेमौके शर्मिन्दा करती है !

किसी पुरानी फिल्म के गीत का मुखड़ा
इतराकर खिलते हुए फूल का नाम
नौ बजे वाले सीरियल की कहानी का

सुधा अरोड़ा और मन्नू भंडारी

छूटा हुआ सिरा,
कुछ भी तो याद नहीं आता
और याद दिलाने की कोशिश करो
तो दिमाग की नसें टीसने लगती हैं
जैसे कहती हों, चैन से रहने दो,
मत छेड़ो, कुरेदो मत हमें !
बस, यूं ही छोड़ दो जस का तस !
वर्ना नसों में दर्द उठ जाएगा
और फिर जीना हलकान कर देगा,
सुन्न कर देगा हर चलता फिरता अंग
साँस लेना कर देगा दूभर
याददाश्त का क्या है
वह तो अब दगाबाज़ दोस्त हो गयी है ।
कूरियर में आया पत्रिका का ताजा अंक
दूधवाले से लिए खुदरा पैसे
कहाँ रख दिए, मिल नहीं रहे
चाभियाँ रखकर भूल जाती हैं
पगलायी सी ढूँढती फिरती है घर भर में
एक पुरानी मित्र के प्यारे से खत़ का
जवाब देना था
जाने कहाँ कागजों में इधर उधर हो गया
सभी कुछ ध्वस्त है दिमाग में
जैसे रेशे रेशे तितर बितर हो गये हों …

नहीं भूलता तो सिर्फ यह कि
बीस साल पहले उस दिन
जब वह अपनी

शादी की बारहवीं साल गिरह पर
रजनीगंधा का गुलदस्ता लिए
उछाह भरी लौटी थीं
पति रात को कोरा चेहरा लिए
देर से घर आये थे
औरतें ही भला अपनी शादी की
सालगिरह क्यों नहीं भूल पातीं ?

बेलौस ठहाके, छेड़छाड़, शरारत भरी चुहल,
सब बेशुमार दोस्तों के नाम,
उनके लिए तो बस बंद दराज़ों का साथ
और अंतहीन चुप्पी
और वे झूठ की कशीदाकारी वाली चादरें ओढ़े
करवटें बदलती रहतीं रात भर !

पति की जेब से निकले
प्रेमपत्रों की तो पूरी इबारतें
शब्द दर शब्द रटी पड़ी हैं उन्हें –
चश्मे के केस में रखी चाभी से
खुलती खुफिया संदूकची के ताले से निकली –
सूखी पतियों वाले खुरदरे रूमानी कागज़ों पर
मोतियों सी लिखावट में प्रेम से सराबोर
लिखी गयी रसपगी शृंखला शब्दों की
जिन्हें उनके कान सुनना चाहते थे अपने लिए
और आँखें दूसरों के नाम पढ़ती रहीं ज़िन्दगी भर !
सैंकड़ों पंक्तियाँ रस भीनी
उस ‘मीता` के नाम
जिन्हें वह भूलना चाहती हैं
रोज़ सुबह झाड़ बुहार कर इत्मीनान से
कूड़ेदान में फेंक आती हैं –
पर वे हैं
कि कूड़ेदान से उचक उचक कर
फिर से उनके ईद – गिर्द सज जाती हैं
जैसे उन्हें मुँह बिरा – बिरा कर चिढ़ा रही हों।

……और इस झाड़ बुहार में फिंक जाता है
बहुत सारा वह सब कुछ भी
याददाश्त से बाहर
जिन्हें वह संजोकर रखना चाहती थीं,
और रख नहीं पायीं ……..

2007

( “कम से कम एक दरवाज़ा” में संकलित एक कविता ) 

21वीं सदी: स्त्री-सम्वेदी पुरुष की परिकल्पना और ‘कठपुतलियाँ’

 तरुणा यादव 

उत्तर आधुनिक युग में स्त्री के जीवन में व्यापक परिवर्तन हुए हैं। बदलते परिवेश में युवा स्त्री परिवार के बीच पुरुष के प्रभुत्व को चुनौती देती हुई परिधि से केन्द्र में आने की निरंतर कोशिश कर रही है। कुछ हद तक उसे सफलता भी मिली है। इसके बावजूद हम यह नहीं कह सकते है कि स्त्री विमर्श अपने उद्देश्यों को पूर्णतया पा चुका है, स्त्री विमर्श अभी आने वाले दो-तीन दशकों तक ज्वलंत मुद्दा रहेगा। लेकिन 21वीं सदी की लेखिकाएँ जैसे इस विमर्श को लेकर चल रही हैं और युवा पीढ़ी की स्त्रियाँ भी धीरे-धीरे पुरुष वर्चस्व का प्रतिकार कर रही हैं तो वह दिन अब दूर नहीं, जब यह विमर्श कबीर की साखियों की चिर-प्रासंगिकता को पीछे छोड़कर अपना मुकाम हासिल करने में कामयाब होगा और होना भी चाहिए क्योंकि आखिर कब तक यह षड्यंत्रकारी पितृसत्ता अपनी भयावह विद्रूपताओं के साथ स्त्रियों को मुहँफाड निगलती रहेगी। आखिर एक दिन तो इसे थमना ही पड़ेगा अपने जोरदार प्रतिरोध के साथ। लेकिन अभी वह समय बिल्कुल नहीं आया; है! हाँ कुछ अध कचराए विकृत मानसिकता वाले, अपने को बुद्धिजीवी कहलाने वाले लोग जरूर गली नुक्कड़ के मुहानों, सभाओं और सरकारी कुर्सियों को तोड़ते हुए फैशन की तरह यह फिकरा कसते मिलेंगे- ‘अब काहे की स्त्रियों का शोषण हो रहा है अब तो पुरुष विमर्श की जरूरत है। या फिर स्त्री विमर्श सिर्फ देह मुक्ति का विमर्श है। खैर! ये हवाई बातें ठीक वैसे ही उस कहावत की तरह है जिसके पैर न फटे बिवाई वो क्या जाने पीर पराई। किन्तु स्त्रियों को इसकी परवाह न करते हुए अभी अपनी मंजिल तक अपना संघर्ष जारी रखना है और जो अधकचराये लोग स्त्री-विमर्श को देह मुक्ति का विमर्श मानते हैं, उन्हें भी उन्हीं की भाषा में जवाब देना है जैसे ‘प्रतियोगी’ कहानी में नीलाक्षी सिंह बाजार को बाजार की भाषा में जवाब देती है। मनीषा कुलश्रेष्ठ अपनी ‘कठपुतलियाँ’ कहानी में स्त्री विमर्श को देह-मुक्ति का विमर्श मानने वालों को उन्हीं की भाषा में जवाब देती है।

‘कठपुतलियाँ’ कहानी मनीषा कुलश्रेष्ठ के इसी शीर्षक के संग्रह में प्रकाशित है। मनीषा अपनी कहानियों में ऐसे चरित्रों की तलाश करती है जिनका जीवन और आवाज समाज में त्याग की महिमामयी प्रति मूर्ति के रूप में अभिव्यक्ति पाता है। लेखिका पात्रों की रचना के समय उनके व्यक्तित्वों के अनेक स्तरों का उद्घाटन करती हैं, ‘कठपुतलियाँ’ कहानी मुख्य रूप से जैसलमेर के ग्रामीण परिवेश की है। कहानी की मुख्यधारा में तीन पात्र हैं – सुगना, रामकिसन और जोगेन्द्र। हाशिए पर है मायका, ससुराल और परम्परागत पंचायत। जो मुख्यधारा की पृष्ठभूमि को तैयार करके भारत में वास्तव में निःशुल्क (फ्री) मिलने वाली अत्यधिक और अनावश्यक सलाह की तरह जीवन में जबरन घुस कर उसे तीव्रता से प्रभावित करते हैं।

कहानी की शुरूआत में ही रचनाकार दरवाजे के पीछे लटकी कठपुतलियों की ओर इशारा करती है और लिखती है कि – ‘‘कभी सुगना उदास होती तो …. इन कठपुतलियों को एक साथ ढेर बनाकर ताक पर रख देती और साँकल लगाकर गुदड़ी पर ढह जाती। कभी गुस्सा होती तो जोर से झिंझोड़ देती सबके धागें। कुछ मटक जातीं एक-दूसरे में अटक जाती। किसी नर्तकी की गर्दन उसी के हाथों में उलझ जाती। कोई राजा डोर से टूट मुंह  के बल गिरा होता। ढीठ मालिन टोकरी समेत उसके ऊपर।’’1 यहाँ कठपुतलियाँ प्रतीक है सदियों पुरानी पितृसत्तात्मक व्यवस्था के हाथों की कठपुतलियाँ बनी औरतों की। यहाँ कठपुतलियों को गुस्से में झिझोड़ना दबी, कुचली औरतों को उनके अधिकारों के प्रति जाग्रत करना है जिसमें कुछ मटक कर यानि थोड़ा-सा अधिकार या प्यार पाकर इतरा कर उसी में उलझी रह जाती है। कुछ अपनी ही समस्यायों में उलझ कर फँसी उलझी रह जाती है तो कुछ पितृसत्तात्मक व्यवस्था की  नृत्यांगनायें यानि पुरुषवादी महिलाएँ बन उन्हीं के हाथों में अपनी गर्दन सौंप देती हैं। दूसरी ओर पितृसत्ता रूपी कोई राजा किसी शिक्षित या जागृत स्त्री से मुँह की खाकर भी ढीठ हुआ फीके पड़ चुके अपने दम्भी  पुरुषत्व के साथ स्त्री समाज के आस-पास मुँह खिसयाता रहता है।

जाहिर है सुगना को कठपुतली रूपी औरतों का चित्र  मात्र भी पसंद नहीं, तभी तो  वह कठपुतलियों को खीज कर आँखों के आगे से हटा कर ताक पर रखकर साँकल के अंदर रख देती है। सुगना का विवाह पिता ने जोगेन्द्र से तय किया था पर पिता की मृत्यु के बाद माँ ने लेन-देन के कारण तोड़कर कठपुतलियाँ दिखाने वाले लँगड़े तीस वर्ष की उमर के दो बच्चों वाले नसबंदी करवा चुके विधुर से करा दिया। सुगना की माँ को किसी और के साथ जिन्दगी बसानी थी इसलिए जल्दी-जल्दी उसने लड़की का ब्याह 13 वर्ष की उम्र में ही निपटा दिया। शादी का सौदा उसने रामकिसन से दो हजार रूपये लेकर किया था। रामकिसन शादी के बाद अपनी शारीरिक जरूरतें तो सुगना से पूरी करता रहा लेकिन सौन्दर्य की मरूस्थल सुगना से उठती रेतीली देह रूपी लहरों की पूर्ति करने में वह नाकामयाब रहता है। लेखिका के शब्दों में – ‘‘वह धम्म से गुदड़ी पर सुन्न होकर पड़ जाती। अपने वजूद को, अपनी देह को हाथ से टटोलती। सोचती-उलझती लेकिन समझ नहीं आता-रात किस मुहाने पर जाकर उफन पड़ी थी। वह कि रामकिसन कुंठित हो गया और छिटक गया उससे दूर। पहले देह जब शान्त नदी-सी पड़ी रहती थी तो वह मीलों तैर जाता था। अब जब वह नैसर्गिक आकांक्षाओं से भरपूर नदी में बदल जाती है और इन्हीं आकांक्षाओं की पूर्ति हेतु प्रसन्न-प्रगल्भ तो रामकिसन के लिए मुश्किल हो जाता है इस उफनती नदी को बाँहों में भरकर तैरना। बहुत डरपोक थी सुगना, अब रामकिसन चाहे जैसे नचाए। वह तृप्ति की डकार लेता….. तो वह जूठन के इधर-उधर गिरे टुकड़े समेट …. भूखी ही उठ जाती।’’2

दूसरी ओर रचनाकार कहती है कि सुगना की मोहक हँसी को भी शतरंज के घोड़े की तरह टेढ़ी चाल चलने वाले सर्प ने यानि लगड़े रामकिसन ने ही डस लिया था। रसोई और कोठरी रूपी पितृसत्ता की चारदीवारियों से सुगना को घुटन होती है। उसे तो खुले में खड़ा खेजड़े का पेड़ भाता है जिस पर वह प्यासे पक्षियों के लिए दाना-पानी लगाती है पेड़ सुगना को उस घर में अपने अस्तित्व का प्रतीक लगता है तो दाना-पानी उस के जीवन की छोटी-छोटी खुशियों के प्रतीक हैं। खेजड़े के पेड़ के चारों ओर सुगना का चबूतरा बनाना अपने अस्तित्व को उस घर में भी सीमित कर लेना है। रामकिसन के घर में पहले की औरत के दोनों बच्चों को संभालना, पूरे दिन पति की अनुपस्थिति में घर का कामकाज और प्रतीक्षा करना, रेगिस्तानी क्षेत्र के कारण पानी की किल्लत से दूसरे गांव कुलधरा के कुंए से पानी लाना ही सुगना की दिनचर्या थी। रामकिसन के अलावा नयी ब्याहता जवान औरत के सपनों को समझने वाला और कौन होता ? पर उसके लिए तो वह बच्चों को संभालने वाली और जरूरत के मुताबिक यौन सुख देने वाली औरत मात्र थी। इस दिनचर्या में कुलधरा कुएँ से पानी लेने आते-जाते एक दिन तूफान के समय उसकी भेंट जोगिन्द्र से हुई, जिसके साथ उसकी शादी टूट गयी थी। खेजड़े के पेड़ की जड़े काँपने लगी थी। दोनों की देखा-देखी मे भावनात्मक आत्मीयता स्थापित हो गई। जोगिन्द्र की आँखों के जंगल में सुगना को प्रेम रूपी फसल लहराती दिखाई देने लगी।

मरूस्थल में पीली आंधी का तूफान आता है और सुगना का लूगड़ा सर से उखड़कर फरफराने लगता है। रचनाकार के शब्दों में – ‘‘कुर्ती-काँचली में अटका छोर छूट गया …. बस घाघरे में अटका छोर छुड़ा पाता तो यह लूगड़ा तेज हवाओं के साथ कहीं परदेश ही जा उड़ता।’’3 यहाँ घाघरे के छोर में लूगड़े का अटका रह जाना दिखाता है कि युवा पीढ़ी की स्त्री के पाँव अपनी मर्यादा रूपी जमीन पर दृढता से टिके हुए है; नहीं तो उसी दिन जोगी के साथ सुगना भाग भी सकती थी, परन्तु वह तो रामकिसन के बच्चों से जुड़ी हुई थी।

खैर! मरूस्थल में प्रेम की फसल लहराई भी और फसल रूपी बीज सुगना के गर्भ में भी छोड़ दिया। यहाँ भी रचनाकार अपने व्यंग्य के पैनेपन और धार से पितृसत्ता पर करारी चोट करती है। पंडित का फिकरा गूंजा – ‘‘विधवा, गाभण…. रितुमती औरताँ, छोड़ी हुई लुगायाँ हवन सूँ आप ही उठ के चली जावो … बुरो मत मानजो सा …. भगवान री बनायी रीत है … आरती में कोई भेदभाव नी…. आरती के टेम वापस आ … सको …. अपनी-अपनी श्रद्धा आसूँ भेंट चढ़ा सको।’’4 जाहिर है कहानी में पंडित के इस वक्तव्य को पढ़कर स्त्री-विमर्श का प्रतिकार करने वालों की आँखें बरबस ही नीची हो जाएँ, कि आज भी प्रकृति जन्य स्थितियों में औरतों के धार्मिक आयोजनों में शरीक होने पर प्रतिबन्ध लगाने वाली यह पुरुषवादी मानसिकता आखिर कब बदलेगी। प्रकृति ने माँ बनने का गौरवपूर्ण अधिकार सिर्फ स्त्रियों को ही दिया है। इसलिए नहीं कि वह कमजोर है अपितु इसलिए की उसमें दूसरे प्राणी को समझने और स्नेह-सिक्त करने के लिए पुरुष के अतिरिक्त शक्ति व संवेदनशीलता होती है। फिर भी गर्भ भार से क्लान्त एक स्त्री पर लगभग सभी आयोजनों (यज्ञ, मृत्यु, शोक, विवाह आदि) में जाने पर प्रतिबंध लगाये जाते हैं। मैं प्रश्न करना चाहती हूँ कि पितृसत्ता के ये सारे प्रतिबंध सिर्फ स्त्री पर ही क्यों लगाएँ जाते हैं? पिता बनने वाले पुरुष व स्त्री माँ बननेवाली दोनों का ही समान आचरण होता है। तो क्या सिर्फ इसलिए कि स्त्रियों को प्रकृति ने जिस अतिरिक्त स्नेह से आपूरित किया है उसे दबाना ही पितृसत्ता का उद्देश्य है ताकि सृष्टि में उससे ऊपर किसी का वर्चस्व ही न उठ पाए। तो क्या ये दमन मात्र अधिकार लिप्सा का एक मोहकारी षड्यन्त्र है ? अगर हाँ तो फिर 21वीं सदी की स्त्रीयाँ अधिकार मोह में लिप्त मर्दवादी मानसिकता को ये भी बताना चाहती है कि वह भी उसी लोकतंत्र देश की नागरिक है जिस देश का नागरिक दम्भयुक्त वह पुरुष है जो उसे बिना चुनाव के ही दबाना चाहता है।

मनीषा कुलश्रेष्ठ

कहानी में सुगना ढीठ होकर यज्ञ में आहूतियाँ देती है और सन्देश देती है कि तुम्हारी बनाई हुइ मान्यताओं की अब धज्जियाँ उड़ने का समय आ चुका है। ये 21वीं सदी की स्त्रियाँ हैं। इन्हें  तुम और ज्यादा नहीं बरगला सकते हो। सुगना गर्भवती हुई तो नसबन्दी करवाए पति को संदेह हुआ। रामकिसन की माँ जो कि पितृसत्ता की चौकीदारिन है ने जाति दण्ड दिलवाने की ठान ली। जाति पंचायत हुई पंचायत में पंच कहता है कि – ‘‘अग्नि परीक्षा औरत की मर्जी से ही ली जाती है।’’5 मेरे सामने सबसे बडा सवाल यह है कि जब रामकिसन से सुगना की शादी सुगना की मर्जी से नहीं हुई, जो औरत अपनी मर्जी से शादी नहीं कर सकती वह भला अपनी मर्जी से अग्नि परीक्षा क्यों देगी? या फिर मर्जी पूछने वाली यह पंचायत सिर्फ अग्नि परीक्षाओं में ही मर्जी क्यों पूछती है? शादी के समय पंचायत के न्यायधीश  क्या छुट्टियों पर होते हैं? दूसरी ओर जोगिन्द्र पंचायत में मौजूद रहता है वह कहता है कि – ‘‘सुगना सुन, मैं हरजाने के चार हजार लाया हूँ …. दो हजार में छीना था न तुझे मुझसे मैं दुगुना हरजाना भरूँगा। उसे बोल, छाती ठोक के कह दे कि बच्चा तेरा-मेरा है। कोई जरूरत नहीं गरम तेल में हाथ डालने की….. या गरम ईंट पकड़ने की। ये पंच अपना फायदा देखते हैं ऐसी चीजों में। औरत का चरित्र खराब निकले तो भी पंचों की चांदी, न निकले तो भी उनकी चांदी। दोनों तरफ का पैसा उनको तो मिलता ही है।’’6 यहाँ जोगिन्द्र के माध्यम से पंचायत रूपी पितृसत्ता के किलों पर करारा व्यंग्य करती है नरेटर। हालांकि जोगिन्द्र भी कोई दूध का धुला नहीं है, स्वयं शादी-शुदा होते हुए भी उसने अबोध सुगना को बरगला कर उससे शारीरिक संबंध स्थापित किये थे।

यहाँ तक आपको लगता होगा कि मैं और रचनाकार दोनों ही स्त्री-विमर्श में स्त्री-देह-मुक्ति  का तिल्लिस्म रच आपको बरगला रहे हैं। नहीं यहाँ से कहानी अपनी तमाम दकियानूसी सोच को पीछे धकेलकर एक नए आयाम की ओर अग्रसर होती है। सुगना ने पंचायत में दृढ़ता से कहा – ‘‘यह बच्चा बंसी का ही भाई या बहन है। मुझे बंसी के बापू के साथ ही रहना है …. और आप ही कहो क्या कहूँ?’’7 सुगना अग्नि परीक्षा में सफल हुई। पंचायत होते समय जोगिन्द्र वहाँ मंडराता रहा व अनुरोध करता रहा कि सुगना उसके साथ भाग चले। गर्भ के बच्चे को जोगिन्द्र से जोड़ दे। हरजाने की राशि वह दे देगा। परंतु सुगना ने अपने प्रेम और शारीरिक जरूरतों को किनारे कर दिया। दो छोटे-छोटे बच्चों नंद-बंसी के लिए रामकिसन के साथ रहना पसंद किया। वह ऐसी समूची औरत बन गयी जो केवल देह मुक्ति के लिए आजाद नहीं होना चाहती थी।

स्त्री-विमर्श के अंतर्गत सिर्फ स्त्रियों की छवि को ही नहीं गढ़ा जाता और न ही ये पुरुष के विरोध में उपजा कोई प्रतिरोधी आंदोलन है। अपितु यह पुरुष के भी सह अस्तित्व को गढ़ कर समाज को एक नए सिरे से देखता है और उसी की मांग भी करता है। कहानी सिर्फ सुगना की ही नहीं, अपितु यह रामकिसन रूपी पुरुष के चरित्र को भी एक नया आयाम प्रदान करती है। कहानी में रामकिसन का सीमा पार  चार किलोमीटर जाकर ग्वारपाठे और छीपकली का तेल लेकर आना, जोगेन्द्र के बच्चे के साथ सुगना को अपनाना बताता है कि 21वीं सदी का पुरूष भी धीरे-धीरे गहरी संवेदना, विवेक और स्त्री के प्रति उदात्त संभावनाओं से ओत-प्रोत होता जा रहा है। गर्भवती होने पर भी सुगना पर हाथ न उठा कर अपितु स्वयं को ही नुकसान पहुँचाना रामकिसन के उदात्त चरित्र को सिर्फ ऊपर ही नहीं उठाता अपितु उसे समाज के उस सर्वोच्च शिखर पर स्थापित करता है जहाँ से उसे पितृसत्ता की गगनचुम्बी इमारतें भी छू नहीं सकती। प्रभा खेतान अपने उपन्यास ‘छिन्नमस्ता’ में लिखती है कि – ‘‘हर व्यक्ति अपने आप में एक इकाई अवश्य होता है, पर उसमें सच्चे स्त्री और पुरुष वही हो पाते हैं जो पुरुष प्रधान समाज की सीमाओं को पार करके अपने स्वभाव में स्त्री की करुणा को संचित कर पाते हैं, वे ही जीवन का सच्चा सृजन कर पाते हैं।’’7

रही बात कहानी की तो अगर कहानी के पार जाकर सोचा जाये तो कि सुगना और रामकिसन का आगे का जीवन कैसा रहा होगा तो इसमें कोई संदेह नहीं की सुगना के लिए रामकिसन विश्व विजेता सिकन्दर से भी बढ़़कर कोई अन्य ही महान पुरुष सिद्ध हुआ होगा और सुगना स्वयं अपने आप में उसकी रानी। अतः कहानी यहाँ चीख-चीख कर सीमोन के विचारों का समर्थन करते हुए यह बताना चाहती है कि भले ही औरतों की लड़ाई आपने आप में विशिष्ट है, पर वह पुरुषों के साथ मिलकर ही लड़ी जानी चाहिए।वस्तुतः पुरुषों का विरोध करके स्त्री-मुक्ति संभव हो ही नहीं सकती है क्योंकि सिर्फ स्त्रियों को ही पितृसत्तात्मक व्यवस्था या मर्दवादी मानसिकता से मुक्ति नहीं चाहिए अपितु वैयक्तिक स्तर पर भी प्रत्येक स्त्री-पुरुष को इससे छुटकारा पाना है। ताकि परस्पर सामंजस्य, समन्वय एवं सद्भाव से युक्त सह-अस्तित्वपरक समाज की संरचना का मानवीय स्वप्न पूरा हो सके।

अतः कहानी में स्पष्ट किया गया है कि स्त्री को देह से मुक्ति नहीं चाहिए और न ही वह पुरुष के बरक्स किसी प्रतिसंसार की मांग करती है बल्कि वह तो पुरुष के साथ मिलकर सह अस्तित्वपरक समाज की स्थापना करना चाहती है। वस्तुत इस कहानी में स्त्री के पक्ष-विपक्ष पर विचार करते हुए स्त्री को मनुष्य रूप में स्वीकारने की मांग की गई है। पितृसत्तात्मक व्यवस्था को चुनौती दी गई है और इस व्यवस्था के विरूद्ध संवाद करते हुए उन मूल्यों को खंडित किया गया है जो स्त्री के शोषण का कारण बनते हैं। इसलिए आज स्त्री की समाज में बदलती हुई स्थिति और भूमिका के प्रश्न नए परिप्रेक्ष्य में उभर कर सामने आए हैं। कहा जा सकता है कि स्त्री-विमर्श किसी प्रतिस्पर्धा या आवेश का आंदोलन नहीं है और न ही यह केवल स्त्री समस्याओं पर केन्द्रित बहस। डाॅ. रोहिणी अग्रवाल के अनुसार – ‘‘स्त्री-विमर्श अपनी मूल चेतना में  स्त्री को पराधीन बनाने वाली पितृसत्तात्मक समाज व्यवस्था का विश्लेषण करता है। यह स्त्री को एक जीवंत मानवीय इकाई समझने का संस्कार देता है।’’8 इसका एकमात्र उद्देश्य तो लिंगगत भेदभाव से ऊपर उठ कर ऐसे समाज की स्थापना करना है जहाँ सभी का समान अधिकार है।

संदर्भ –
1. मनीषा कुलश्रेष्ठ, कठपुतलियाँ, पृ0 7
2. वही, पृ0 11
3. वही, पृ0
4. वही, पृ0
5 वही, पृ0
6. वही, पृ0
7. प्रभा खेतान, छिन्नमस्ता, पृ0 211
8. डाॅ. रोहिणी अग्रवाल, स्त्री लेखन: स्वप्न और संकल्प, पृ0 12

लेखिका महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक से शोध करने के बाद हरियाण शिक्षा विभाग में हिन्दी की प्रवक्ता है. संपर्क: tarunayadav87@gmail.com