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भारतीय नवजागरण के स्त्री सरोकार की वैचारिकी

अभिषेक भारद्वाज  

 शोधार्थी गुजरात विश्वविद्यालय, संपर्क :abhidwaj86@gmail.com,7818067905

नवजागरण समूह विशेष में अपने सामूहिक रूप से अवनति के चिंतन से उपजता है. इस अर्थ में जो हार गए अथवा पीछे छूट गए हैं, और वह वापस पुनर्स्थापित होना चाहते हैं, उनका नवजागरण है. यह उस समूह विशेष की भूमिका, हिस्सेदारी और उनके अधिकार को सुनिश्चित करना है . यहाँ एक सवाल पैदा होता है कि यदि समाज के पीछे छूट गए अंश के हिस्सेदारों को हम पुनः स्थापित नहीं करते हैं तो क्यायह नवजागरण है? अपितु यह केवल वर्चस्वशील वर्ग का ही सतत विकास है. 19वीं सदी के नवजागरण पर बहुधा उसके अभिजात्य स्वरूप को लेकर सवाल उठने लगा है. इस अर्थ में यह एक उचित प्रश्न है. इस अर्थ के साथ हम धर्म के आधार पर (मुस्लिम नवजागरण), वर्ग के आधार पर (बौद्ध काल में पुरोहितवर्ग के विरुद्ध धार्मिक सुधार एवं जागरण), राष्ट्र के आधार पर (भारतीय राष्ट्रीय नवजागरण, इटली और फ़्रांस आदि विभिन्न देशों के नवजागरण) भाषा के आधार पर हिन्दी नवजागरण, बंगाली नवजागरण, आदि(यह विभाजन केवल भाषा का न होकरजातियता का भी है) इसी भांति लिंग, जाति (भारतीय वर्ण व्यवस्था) के बरक्स भी हम अध्ययन कर सकते हैं. बहुतेरे लिंग के आधार पर अध्ययन करते भी हैं.

मानव सभ्यता के प्रारंभ में जब सभी मनुष्य समान थे तो इसका अर्थ हुआ स्त्री भी पुरुष के बराबर रही होंगी. सभ्यता के विकास के साथ वह पीछे छूटते चली गई. कई विद्वानों ने यथा मॉर्गन, एंगेल्स, बोट्मोर आदि ने इस पर पर्याप्त तथ्यों को उद्घाटित किया है. संभवतः इस प्रकार देंखे तो जागृति की सर्वाधिक आवश्यकता उन्हीं में है. क्योंकि उनकी शोषण से मुक्ति तो दूर की बात है पहले इसका सम्पूर्ण बोध तो हो. इस प्रकार नवजागरण के काल में स्त्री के सरोकार के मायने बढ़ जाते हैं, क्योंकि यह स्त्री के अन्दर बोध निर्मित करने का दौर था. इसके साथ ही अगले स्तर के रूप में नवजागरण उनकी सामाजिक भूमिकाओं की पहचान सुनिश्चित करने का युग था . इसके उदाहरण के स्वरूप पंडिता रमाबाई को देखा जा सकता है, वैसे वे हिंदी क्षेत्र से बाहर की परिधि से हैं. लेकिन उनका प्रभाव निश्चित रूप से हिंदी पट्टी में रहा है इसे नाकारा नहीं जा सकता.

19वीं सदी में स्त्री

कोई भी नवजागरण बहुस्तरीय होता है . कई बार यह एक-दूसरे के विरोधी भी प्रतीत होते हैं, किन्तु वे वास्तव में  विरोधी होते नहीं बल्कि विभिन्न समूहों, जिनमें नवजागरण घटित हो रहा है उनके सकारात्मक मूल्यों की वृद्धि में सहायक होते हैं. क्योंकि नवजागरण अपने मूल में सार्वभौमिक मानवतावाद से अनुप्रेरित है. इस तरह स्त्रियाँ  भी , जो जन्म के समय एवं आदिम समाज में जब सभ्यताओं का आरंभ हुआ होगा तब पुरुषों के  समान ही रही होगी. किन्तु, जीवन और समाज के विकास के साथ-साथ प्राकृतिक रूप से मिले अधिकार को खो कर, वह पुरुषों के अधीनस्थ हो जाती हैं. यदि अपने समलिंगी के साथ समान चेतना बोध को ग्रहण कर प्रतिक्रिया करती हैं और अपने उत्थान के लिए सक्रिय होती है तो यह स्त्री नवजागरण है. अभी इस प्रकार के पदबंध का उपयोग नहीं होते हैं, किन्तु यदि हम चाहे तो विभिन्न अन्य समूहवाची पद के समान ही पीछे छूट गए लिंग आधारित वर्ग समूह के रूप में इसकी भूमिका स्वीकार कर सकते हैं. “जब-जब इतिहास में नवजागरण घटित हुए हैं, महिला रचनाकारों का पूरा समूह उभरकर सतह पर आया है.”  नवजागरण में स्त्रियों की भूमिका को स्पष्ट करते हुए सुमन राजे कहती हैं “नवजागरण सांस्कृतिक मंथन ही तो होते हैं, और इस मंथन में वे पैर जमाकर खड़ी हैं, कहीं-कहीं धारा के विपरीत भी, पूरी शक्ति और शब्द संरचना के साथ.”

इस प्रकार हिंदी नवजागरण में स्त्रियों को सशक्त बनाने वाली जो गतिविधियाँ है, वे सभी ‘स्त्री सरोकार’ के अंतर्गत आ सकती हैं. अब यहाँ एक प्रमुख बिंदु उभरता है स्त्रियों के इस उठान में केवल स्त्री ही आ सकती है या पुरुष भी. यदि पुरुष आता है तो उसकी भूमिका क्या होगी और उसकी भूमिका की व्याख्या किस प्रकार करनी होगी? क्योंकि बहुधा स्त्रीवादियों का मानना है कि समाज सुधार के नाम पर स्त्रियों का अनुकूलन (कंडिशनिंग) ही होता रहा है. “एक और ऐसे स्त्रीवादी मिल जायेंगे जो सामाजिक, न्यायिक, व्यवसायगत आर्थिक राजनैतिक और नैतिक समानता की अवधारणा पर खरे उतरते हैं जिनका शत्रु भेदभाव है, प्रतियोगिता और माँग जिनके साधन हैं, दूसरी ओर वे हैं जो बेहतर जीवन के आदर्श संजोएँ हैं, जो तब प्राप्त होगा जब सही राजनैतिक साधनों से सबके लिए एक बेहतर जीवन सुनिश्चित हो जाएगा. उन स्त्रियों को, जो संवैधानिक या सर्वाधिकारवादी या क्रान्तिकारी सभी रुढ़िवादी राजनैतिक उपायों से बददिल हो चुकी हैं, दोनों ही विकल्प नहीं भाते.”  जर्मेन ग्रीअर  जब इस प्रकार स्त्री संबंधी उपादेयता की व्याख्या करती है तो नवजागरण के काल में किए गए स्त्री संबंधी सुधार कार्य कहीं-न-कहीं हमें बेमानी लगने लगते है.

19वीं सदी की मुस्लिम महिलायें

तब क्या इसकी काल सापेक्ष व्याख्या हो सकती है? मतलब जिस युग में ये नवजागरण के पैरोकार हैं उस समय उनके किए गए सुधार कार्य तत्कालीन युग के अपेक्षा प्रगतिशील है या नहीं. वस्तुतः इसी प्रगतिशील तत्व को पहचानने का यह एक उचित तरीका होगा. इस आधार पर हम हिंदी नवजागरण के अध्ययन करने पर स्त्री-सुधार के दृष्टिकोण से किए गए कार्यों का अवलोकन करते है तो ये तत्कालीन सुधारकों की स्थिति हम एक प्रगतिशील विचारक के रूप में पाते है.लेकिन ऐसा भी नहीं है कि इन सुधारकों में सब कुछ सकारात्मक ही है, कुछ इनकी सीमाएं भी है. जो कुछ हद तक तत्कालीन परिस्थितियों की एवं कुछ इनकी व्यक्तित्व कि सीमा थी. स्त्री की धार्मिक बंधनों से मुक्ति भारत में एक कठिन कार्य है. 19वीं सदी की स्त्रियों की स्थिति में सुधार के दृष्टिकोण से सती प्रथा के समापन से लेकर विधवा विवाह की शुरुआत, बालविवाह और बहुविवाह पर रोक, पर्दा प्रथा की समाप्ति के प्रयास, नाच-विरोधी आन्दोलन, स्त्री-शिक्षा और स्त्री-आत्मसम्मान जैसे मामले तत्कालीन धार्मिक संकीर्ण व्यक्ति को भड़काने वाले थे.  यही गतिविधियाँ वर्तमान में स्त्री-विमर्श के बीज रूप में देखी जा सकती हैं. वस्तुतः औपनिवेशिक दौर, “राष्ट्रीय जागरण के उन्मेष में स्त्री-जागृति की धारा भी शामिल थी और स्त्री-प्रश्न भी नये रूप में एजेण्डे पर उपस्थित था, लेकिन राष्ट्रीय आन्दोलन की विभिन्न संघटक धाराओं की वैचारिक निर्बलताओं-विचलनों से स्त्री-मुक्ति विमर्श भी मुक्त या अप्रभावित नहीं था.”

नवजागरण के स्त्री सरोकार की परम्परा एवं जुड़ाव 

कुछ व्याख्याओं के अनुसार  ‘मातृ शिक्षा’ कुशल धाय या कुशल कामगार को निर्मित करने की श्रेणी में आता है . जिसे यह कहकर व्याख्यायित किया  जाता  है कि यह एक प्रकार का अनुकूलन (कंडिशनिंग) है, पितृव्यवस्था के दोषों को दूर करते हुए स्त्री को अपनी  उपयोगिता के अनुसार ढालने की प्रक्रिया . किंतु, दूसरी ओर जब पितृव्यवस्था के स्थान पर ‘मानवता’ को केंद्र के रूप में स्वीकार करते हुए मनुष्यमात्र के लिए उद्धार या करूणा की आवश्यकता की अवधारणा को ग्रहण करते हुए इसका मूल्यांकन करते हैं  तो एक नवीन पक्ष का उदय होता है . यह पक्ष नवजागरण का है . भारतीय एवं यूरोपीय ज्ञान परम्परा के सम्मिलन से जो ‘मानवतावाद’ के बोध की नवीन निर्माण प्रक्रिया शुरू होती है, उसके अनुसार देंखे तो यह कुशल कामगार का निर्माण या कंडिशनिंग नहीं है, बल्कि वंचितों को दिया जानेवाला उनका अधिकार है . भारत में कई नवजागरण आ चुके हैं और उससे निर्मित एक सुदीर्घ ठोस आधार हमारे पास हैं . इसके सन्दर्भ में अमर्त्य सेन कहते हैं, “निस्संदेह, शास्त्रार्थीय महासंग्रामों में तो प्रायः पुरुषों का ही बोलबाला रहा है . फिर भी राजनीतिक नेतृत्व और बौद्धिक अनुष्ठानों में नारी की भागीदारी इतनी नगण्य भी नहीं रही है .”

सुदूर अतीत में महिलाएं मुखर नेतृत्व से अनभिज्ञ भी नहीं थी . यहीं नहीं, ‘अक्सर इन संवादों में अधिकांश तीखे चर्चित प्रश्न भी महिलाओं ने ही उठाए थे .’  गार्गी, मैत्रेयी और भारवि इसके प्रमाण हैं .  “भारत की संवाद-विवाद परम्परा को केवल पुरुष वर्ग का एकाधिकार मान लेना तो कदापि उचित नहीं होगा . ” इसी कड़ी में सुमन राजे के ‘हिंदी साहित्य का आधा इतिहास’ को लिया सकता है . इसमें सुमन राजे भारत में चार नवजागरण की बात करती है- प्रथम नवजागरण: थेरी गाथाएँ, द्वितीय नवजागरण : संस्कृत और प्राकृत की कवयित्रियाँ, तृतीय नवजागरण  : भक्ति आन्दोलन और चौथे नवजागरण के रूप में आधुनिक काल के ‘नवजागरण’ को .  इसमें वह आधुनिक काल के नवजागरण को विश्लेषित करते हुए कहती है- ‘ये सभी मूलतः धार्मिक सांस्कृतिक आन्दोलन थे. राष्ट्रवाद इनकी बुनावट में शामिल था. लगभग एक ही समय में इन महान विचारकों को केंद्र में रखे ये आन्दोलन जन्मे और विभिन्न अंचलों में फ़ैल गए. एक महत्वपूर्ण रेखांकित करने योग्य बात यह है कि इन सभी आन्दोलनों ने ‘स्त्री विमर्श’ को मुख्य मुद्दा बनाया. सती प्रथा निषेध हो, या विधवा विवाह प्रारंभ, सभी ने स्त्री-गरिमा और स्वतंत्रता की बात की. इसका परिणाम यह हुआ कि स्त्री ने स्वयं अपने और अपने परिदृश्य के बारे में सोचना शुरू किया.’  यहाँ पर सुमन राजे स्पष्ट रूप से स्त्री से जुड़े हुए चिंतन पक्ष को नवजागरण के मुख्य सरोकार के रूप में अंकित करती हैं. भारत के सभी हिस्से में यह स्त्री जागृति हमें दिखाई देती है. हिंदी नवजागरण भी इससे कोई अपवाद नहीं है. हाँ, हिंदी नवजागरण के शुरूआती समय में किसी स्त्री विचारक को हम नहीं पाते है, लेकिन 19 वीं सदी के अंत होते-होते इस प्रकार के उदाहरण मिलने शुरू हो जाते है. जो कि भारत के अन्य अंचलों के नवजागरण के समान ही है.

हिंदी नवजागरण की जब स्त्री भूमिकाओं का विश्लेषण करते हैं तो रामविलास शर्मा हिंदी नवजागरण की निर्मित वैचारिकी में 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम का व्यापक प्रभाव मानते हैं. रामविलास शर्मा के साथ सुमन राजे भी इस आन्दोलन में स्त्री की महती भूमिका को स्त्री के सकारात्मक पक्ष के रूप में निबंधित करती हैं. ‘1857 के विद्रोह ने राष्ट्रीय नवजागरण को नया आयाम दिया . इस क्रांति में महिलाओं की प्रमुख हिस्सेदारी थी जैसे- बेगम हजरत महल, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, मध्यप्रदेश में रामगढ़ की रानी, बदुरी की ठकुरानी और रानी दिगंबर कौर आदि.’  भारतीय इतिहास में इन वीरांगनाओं के बारे में विस्तृत जानकारी उपलब्ध है.नवजागरण के अग्रगण्य जिस आधुनिक वैचारिकी और सांस्कृतिक तत्वों के विकास हेतु प्रयत्नशील थे उसकी विभिन्न सीमाओं एवं अवरोधकों से अवगत थे . भारतेंदु युग के सभी लेखक इससे पार जाने का प्रयास करते रहे . कर्मेंदु शिशिर इस संबंध में कहते हैं- “सामंती उत्पीड़न में जातिगत रूढ़ी, संकीर्णता और नारी – शोषण पर वे चोट करते रहे . बालविवाह की भर्त्सना की . विधवा-विवाह का आन्दोलन किया . भारतेंदु- युग के लेखकों की देशभक्ति, दूरदर्शिता और तत्कालीन आधुनिकता का मैं लोहा मानता हूँ . वे विचारों के स्तर पर ही नहीं, कर्म के स्तर पर भी सकर्मक रहे . भारतेंदु युग के तमाम लेखकों ने अपने सांस्कृतिक संगठन बनाए . बिना संगठन का कोई रचनाकार न था .”  इस प्रकार इस युग के लेखक दोहरी भूमिका का निर्वाह करते है. एक स्तर पर वह साहित्यकार है तो दूसरी ओर वो समाज सुधारक की भूमिका को भी अदा कर रहे है.

स युग के विचारकों की अग्रगामी भूमिका को सुनिश्चित करने में शिक्षा कि महती भूमिका थी, उसमें भी पाश्चात्य शिक्षा पद्धति का विशेषतौर पर . ऐसा नहीं है कि यहाँ अंग्रेजों से पूर्व शिक्षा की परंपरा ही नहीं रही है, जो कि अक्सर कहा जाता है . वास्तव में भारतीय शिक्षा पद्धति की स्थिति इतनी बुरी भी नहीं थी .  कर्मेंदु शिशिर इस संबंध में कहते हैं, “शिक्षा को अंग्रेजों की देन मानने वाले इस तथ्य की अनदेखी करते हैं कि अंग्रेजों के पूर्व भारत में शिक्षा का सुव्यवस्थित, विकसित और सुदृढ़ आधार था. उच्च शिक्षा के जो केंद्र थे उनमें स्त्रियों के शिक्षा ग्रहण करने के दस्तावेज तक इतिहासकार धर्मपाल को मिले थे. अनेक दस्तावेज जला दिए गए और काफी कुछ बटोरकर अंग्रेज लन्दन की इम्पीरियल लाइब्रेरी में ले गए.”  इस सम्बन्ध में के.एन. पनिक्कर ने भी टिप्पणी किया है, जिसमें वह औपनिवेशिक शिक्षा प्रणाली के माध्यम से दिए गए सार्वजानिक शिक्षा पद्धति की सिमित भूमिकाओं को चिन्हित करते हैं. इसके साथ अंग्रेजों से इतर भारतीय शिक्षा के सामाजिक प्रसार को अंग्रेजी शिक्षा से कहीं अधिक बताते हैं.

भारतेंदु द्वारा प्रकाशित महिला-पत्रिका का संपादन

वर्तमान स्त्रीवादी विमर्श पर पाश्चात्य स्त्री वैचारिकी का अत्यधिक प्रभाव है. इस प्रभाव के फलस्वरूप भारतीय स्त्री विमर्श यूरोपीय स्त्री विमर्श की भारतीय शाखाएँ मात्र प्रतीत होने लगती है. इस प्रकार वर्तमान स्त्री विमर्श भारतीय जमीन पर विदेशी पौधे के समान लगता है, जो कि भारतीय वस्तुगत परिस्थिति की उपज न होकर एक आयातित विचारधारा के समान प्रतीत होता है. क्या वाकई भारतीय स्त्री विमर्श को देखने का यही एकमात्र नजरिया है? क्या भारत में स्त्री वैचारिकी की अपनी स्वाभाविक धारा को ढूँढा जा सकता है? पश्चिम में वोलस्टनक्राफ्ट, जॉन स्टुअर्ट मिल आदि स्त्रीवादी विचारक के रूप में मान्य हैं . जिस प्रकार ये पश्चिम के स्वाभाविक मानवतावादी चिन्तक हैं उसी प्रकार भारत में भी इस परंपरा की खोज किया जा सकता हैं . नवजागरणकाल के कई विचारकों को हम इस प्रकार चिन्हित कर सकते हैं . इसमें पुरुष और महिला समाज सुधारक दोनों को रख सकते हैं .कम से कम स्त्री समाज सुधारक पर एकमत से इसका उत्तर दिया जा सकता हैं . इसमें रमाबाई, आनंदी बाई जोशी या उनके समकालीन अन्य महिला लेखक हैं जिन्होंने स्त्रियों की स्थिति को लेकर चिंतन किया और सामाजिक रूप से भी सक्रिय रहीं .

रमाबाई के व्यक्तित्व विकास में उनके पिता अनंत शास्त्री एवं माता की मुख्य भूमिका थी . राजघराने की एक शिक्षित स्त्री से प्रभावित होकर उनके पिता ने अपनी पत्नी को शिक्षित किया . बाद में उन्होंने अपनी पत्नी के साथ मिलकर अपनी संतानों एवं अन्य बच्चों को शिक्षित बनाने पर जोर दिया . रमाबाई इनकी छोटी बेटी थी . जिसकी शिक्षा में व्यवधान न हो, अतः उन्होंने इनका विवाह 16 वर्ष की उम्र में किया . अब अनंत शास्त्री के इस स्त्री शिक्षा संबंधी जागृति का कारण क्या माना जाए ? रमाबाई का जन्म 1860 ई. में हुआ . इस समय तक भारत में पाश्चात्य प्रभाववश नवजागरण का प्रभाव देखा जा सकता है . किन्तु रमाबाई के पिता इस पाश्चात्य प्रभाव से दूर थे . उनके अन्दर किसी अन्य परिवार की शिक्षित स्त्री को देखकर सहज ही अपने परिवार में भी इस संस्कार के विकास की आकांक्षा उत्पन्न हो गईं . अब इस प्रेरणा एवं उसके प्रभावस्वरूप रमाबाई की शिक्षा क्रम में पाश्चात्य स्त्रीवादी वैचारिकी की कहीं कोई महती भूमिका तो कम से कम नहीं हैं . यही रमाबाई प्रकारांतर में प्रख्यात विदुषी एवं स्त्रीवादी लेखिका हुईं . हाँ, कालांतर में रमाबाई पाश्चात्य ज्ञान परंपरा की ओर जबरदस्त रूप से उन्मुख होती हैं, वह इनसे यहाँ तक अभिप्रेरित होती हैं कि उन्होंने ईसाई धर्म को कबूल कर लिया था. रमाबाई की यह परंपरा ज्योतिबा फुले एवं उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले से जुड़ती है. इस प्रकार भारतीय नवजागरण के प्रभावस्वरूप उभरने वाली स्त्री वैचारिकी के स्वाभाविक धारा का पता चलता है.

पंडिता रमाबाई

हिंदी नवजागरण भारतीय नवजागरण के इसी विशाल कलेवर का एक प्रमुख हिस्सा है. इस शोध आलेख में हिंदी साहित्य के सन्दर्भ से स्त्री संबंधी तत्कालीन वैचारिकी उसके सरोकारों को समझने का प्रयास किया गया है.

पृष्ठ- नौ,प्रस्थान, हिंदी साहित्य का आधा इतिहास, सुमन राजे, चौथा संस्करण 2011, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली
, सम्पादकीय, स्त्री अधिकारों का औचित्य-साधन( मूल पुस्तक A Vindication of the Rights of Women का हिंदी अनुवाद): मेरी वोल्सटनक्राफ्ट, अनुवाद : मीनाक्षी, पहला संस्करण 2003, पहली आवृति 2009, राजकमल प्रकाशन
पृष्ठ-22, विचार-स्वातंत्र्य और संवाद,भारतीय अर्थतंत्र, इतिहास और संस्कृति (The argumentative indian) : अमर्त्य सेन, अनुवादक : भवानीशंकर बागला, हिंदी संस्करण पृष्ठ- नौ,प्रस्थान,  वही|
पृष्ठ- 16-17, बधिया स्त्री (The Female Eunch): जर्मेन ग्रीअर, अनुवाद – मधु बी. जोशी, पहला संस्करण 2001, दूसरा संस्करण 2005, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली|
पृष्ठ-22, सामाजिक क्रांति के दस्तावेज, शम्भुनाथ,प्रथम संस्करण 2004, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली|
पृष्ठ- vii, सम्पादकीय, स्त्री अधिकारों का औचित्य-साधन( मूल पुस्तक A Vindication of the Rights of Women का हिंदी अनुवाद): मेरी वोल्सटनक्राफ्ट, अनुवाद : मीनाक्षी, पहला संस्करण 2003, पहली आवृति 2009, राजकमल प्रकाशन
पृष्ठ-22, विचार-स्वातंत्र्य और संवाद,भारतीय अर्थतंत्र, इतिहास और संस्कृति (The argumentative indian) : अमर्त्य सेन, अनुवादक : भवानीशंकर बागला, हिंदी संस्करण 2011, राजपाल एंड संज, नई दिल्ली
पृष्ठ-22, वही|
पृष्ठ-22-25, वही|
पृष्ठ-25, वही|
हिंदी साहित्य का आधा इतिहास, सुमन राजे, चौथा संस्करण 2011, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली|
पृष्ठ- 227, हिंदी साहित्य का आधा इतिहास, सुमन राजे, चौथा संस्करण 2011, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली
पृष्ठ- 227, वही |
पृष्ठ-24, नवजागरण और संस्कृति, कर्मेंदु शिशिर, प्रथम संस्करण 2000, आधार प्रकाशन, पंचकूला, हरियाणा|
पृष्ठ-24, वही|
पृष्ठ-67, औपनिवेशिक भारत में सांस्कृतिक और विचारधारात्मक संघर्ष, के.एन. पणिक्कर, अनुवाद: आदित्य नारायण सिंह|
के.एन. पणिक्कर, अनुवाद: आदित्य नारायण सिंह : औपनिवेशिक भारत में सांस्कृतिक और विचारधारात्मक संघर्ष

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एक बम तो मैं भी फोङूँगी ही

चंद्रभान  

 शोधार्थी, जेएनयू.   इतिहास एवं साहित्य में रुचि के साथ-साथ थिएटर भी।संपर्क : saahir2000@gmail.com

एक बम तो, मैं भी फोङूँगी ही

उस दिन क्या हुआ था?

शंकर के लिंग
गोली में तब्दील होकर
फ़िज़ा में उड़ रहे थे…

हर घर में
लिंग ही लिंग

खिड़की, दरवाज़ा
यहाँ तक कि दीवार  तक
छेदकर, घुस आए थे…..

फिर योनि के रास्ते
दिल, दिमाग़
हर नस में

दाग दी गईं
गोलियाँ….

उस दिन से दिमाग़ में भी
एक योनि बन गई…..

जब भी साँस लो
गोली ठाँय सी लग जाती है
हर रोज़
वही मौत
फिर-फिर और फिर….

इन लिंगों को इकट्ठाकर
एक बार ही सही
एक बम तो
मैं भी फोङूँगी ही।

( कुंनन-पोशपोरा में आर्मी द्वारा किए गए समूह बलात्कार  की घटना के सन्दर्भ में)

आओ विदा लें


आओ विदा लें
कि शब्द बने रहें मधु
कि लम्स बचे रहें सुंदर

कि लमहात यादगार रहें
कि क्षणों को दाग़ न लगें

आओ आगे बढ़ें
आओ विदा लें

आओ सौदा करें 


आओ  सौदा करें

तुम मेरा ख़याल रखना
मैं तुम्हारा।

तुम मेरे साथ चलना
मैं तुम्हारे।

तुम मुझ पर चिल्लाना
मैं तुम पर

तुम मुझ पर झल्लाना
मैं तुम पर

तुम मुझको रुलाना
मैं तुमको…….

इस तरह तुम भी जी लोगे
और मैं भी

हमारा आसमाँ
और ये हवा
मुफ़ीद नहीं है

इसलिए आओ
सौदा करें

कि  जी सकें

स्वर्णयुग

स्वर्णयुग में
मेरा अक़ीदा है ही नहीं
मैं जानता हूँ
आग जैसे मानव को
वर्तमान में जलते हुए
आसमाँ और समंदर
बुनते हुए
हर रोज़
हर वक़्त

वायरल वीडियो और हिंसक-अश्लील ऐशट्रे के बहाने

पारुल अग्रवाल 

दो दिन के फेर में वायरल हुए दो पोस्ट अश्लीलता, भद्देपन और निजी-स्वतंत्रता के फर्क को इतनी बेहतरी से समझा पाएं, ये सोशल-मीडिया के बिना शायद संभव नहीं था.

कहानी बहुत छोटी सी है. बीते शुक्रवार की शाम मैं बंगलौर के पीवीआर सिनेमा हॉल में अपने कुछ मित्रों के साथ एक फिल्म देखने गई. इंतज़ार और बातचीत के दौरान हमारी नज़र दो लोगों के बीच हो रही कहासुनी पर पड़ती है. थियेटर के ठीक बाहर एक अधेड़ उम्र व्यक्ति एक नौजवान को फिल्म देखने से रोक देता है. फसाद का कारण है उसकी टी-शर्ट. ‘भारत के नागरिक’ के तौर पर इन अधेड़ उम्र सज्जन को नौजवान की टी-शर्ट पर लिखी पंक्तियां (स्टॉप जर्किंग, स्टार्ट फकिंग) अश्लील लगीं. उनके साथ एक पुलिसवाला भी मौजूद था, जिसके वहां खड़े होने के बावजूद ये सज्जन लगातार उस नौजवान पर चिल्लाते रहे, उसके कपड़े खींचे और उसे फौरन नई टी-शर्ट खरीद, कपड़े बदलने के लिए धमकाया. मॉरल पुलिसिंग के इस वाकये का मैंने एक वीडियो बनाया और उसके बाद मुझ समेत वहां मौजूद कई लोगों ने मिलकर उन सज्जन और पुलिसवाले से सवाल-जवाब किए. आखिरकार वह नौजवान सिनेमा-हॉल में दाखिल हुआ.

फेसबुक पर इस वीडियो को साझा करने के कुछ ही घंटो के भीतर ये वायरल हो गया. इसके साथ शुरु हुआ टिप्पणियों का सिलसिला, जिनमें लोगों ने एक टी-शर्ट को लेकर हुए बवाल पर हैरानी जताई, लेकिन बहुत से लोग ऐसे भी थे जिन्हें इस टी-शर्ट पर आपत्ति  थी और उन्होंने मॉरल पुलिसिंग को जायज़ ठहराया. कुछ ने कहा कि टी-शर्ट पहने व्यक्ति को भारतीय दंड संहिता की धारा- 292/293 के तहत फौरन गिरफ्तार किया जाना चाहिए.

अश्लीलता और फूहड़ता एक सामाजिक बहस है लेकिन ये भी सच है कि क्या अश्लील है और क्या फूहड़, ये एक व्यक्तिगत फैसला और निजी अनुभव भी है. कई लोग स्त्रियों के पहनावों को बलात्कार से जोड़ते हैं और लोग ऐसे भी हैं जिन्हें एम-एफ़ हुसैन की चित्रकला अश्लील और भद्दी लगी, जिसके चलते उन्होंने अपनी ज़िंदगी के आखिरी साल निर्वासन में बिताए.

अश्लीलता का विमर्श, समाज और स्त्री से जुड़ा है. इस पर बहस ज़रूरी है क्योंकि सेक्स और अश्लीलता के ज़रिए औरतों को उपभोग की वस्तु बनाए जाने का गवाह इतिहास है. लोकिन ये बहस कब, कहां और कैसे करनी है इसका फैसला भी भी उतना ही महत्वपूर्ण है.

अब औरत के गुप्तांग में सिगरेट भी 

दो दिन पहले सोशल-मीडिया पर एक और पोस्ट वायरल हुई. मामला था अमेज़न  पर बिक रही एक ऐश-ट्रे का. क्रिएटिव प्रॉडक्ट्स की सूची में शामिल ये ऐश-ट्री एक नग्न महिला की योनि  में सिगरेट बुझाने का मौका देती है. औरतों के प्रति हिंसा और उनके शरीर को सेक्स का माध्यम-भर समझने के मामले आज भी हर दूसरे दिन सामने आते हैं. इस ऐश-ट्रे ने कुत्सित मानसिकता और यौन-हिंसा का एक नया आयाम गढ़ा. लोगों का गुस्सा और सोशल-मीडिया पर उठ रहे सवालों को देखते हुए, आखिरकार अमेज़न ने इस ऐश-ट्रे को वेबसाइट से हटा दिया.

अश्लीलता और बाज़ार एक दूसरे के पूरक रहे हैं और बाज़ार के आगे घुटने टेकने की प्रवृत्ति दुनियाभर की सरकारों में है. सरकार, कानून और खुद नागरिक समाज ने बाज़ार को लेकर दोहरी नीति अपनाई है. आंकड़े बताते हैं कि बाज़ार के बढ़ावे पर हमारी रोज़मर्रा ज़िंदगी में अश्लीलता का दख़ल दिन-रात बढ़ रहा है. टी-शर्ट और ऐश-ट्रे दोनों ही बाज़ार की उपज हैं.

वायरल हुआ वीडियो 

तो सवाल ये है कि अगर ऐश-ट्रे आपत्तिजनक है तो फिर टी-शर्ट कैसे जायज़ है. अगर ऐश-ट्रे भावनाओं को आहत करती है तो टी-शर्ट पर नाक-भौं सिकोड़ने वालों को किस आधार पर नकारा जा सकता है. मामला अगर अश्लीलता का है तो क्या अश्लील है और क्या पहनावे का अधिकार ये कौन तय करेगा?

इस सवाल का एक जवाब अग्रेंज़ी हुकूमत ने सन 1860 में दिया. अश्लीलता पर बने इस कानून के मुताबिक, अश्लीलता को प्रचारित करने के लिए 20 वर्ष या उससे कम आयु के व्यक्ति को अश्लील सामग्री, बेचना, किराए पर देना, वितरित करना या प्रदर्शित करना कानून जुर्म है, जिसके लिए जुर्माने से लेकर सज़ा तक का प्रावधान है. आज़ाद भारत ने इस कानून को ज़्यों का त्यों  अपनाया. अदालत तक पहुंचे अश्लीलता के सवालों को हम आज भी सौ साल पुराने इसी कानून के ज़रिए हल करते हैं. समय के साथ भारतीय कानून ने अश्लीलता और भद्दे के बीच फर्क करना सीखा है और अश्लीलता अगर ‘हिंसक-उत्तेजना’ पैदा करे तो वो दंडनीय है.

लेकिन अश्लीलता के सवाल का जवाब देना केवल अदालतों की ज़िम्मेदारी नहीं. हमारे और आपके ज़हन में उठा हर सवाल अगर अदालत जाकर हल हो, तो देश की चरमराई न्याय-व्यवस्था भरभराकर गिर पड़ेगी. ये उसी तरह है जैसे भारतीय कानून हमें जनहित याचिकाओं का हक़ देता है, लेकिन ये जनहित याचिकाएं जब सरदारों को लेकर सुनाए जाने वाले चुटकुलों और भारत को कोहिनूर हीरा लौटाए जाने का सवाल उठाती हैं तो सुप्रीम कोर्ट तिलमिला उठता है.

आंकड़े गवाह हैं कि अश्लीलता को लेकर आईपीसी– 292/293 के अंतर्गत दायर किए गए ज़्यादातर मामले अदालतों में खारिज हुए हैं. एम-एफ़ हुसैन सहित एआईबी रोस्ट जैसे विवादों में कोर्ट ने अभव्यक्ति की स्वतंत्रता का संज्ञान लिया है.

औरत के मुंह में पेशाब करने में क्या आनंद मिलता है 

यही वजह है कि अश्लीलता के सवाल का जवाब देने की ज़िम्मेदारी जितनी अदालतों की है उतनी ही बाज़ार और हमारी भी. टी-शर्ट पर लिखे- स्टार्ट फ़किंग और ऐश-ट्रे में मौजूद महिला की योनी में सिगरेट का फ़र्क अदालतों से ज़्यादा समाज को सीखना है.  एम-एफ़ हुसैन की चित्रकारी, न्यूड आर्ट की प्रदर्शनी, कंडोम के विज्ञापन और टी-शर्ट के स्लोगन, कला-सेक्स और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के ईर्द-गिर्द घूमते हैं. सेक्स अश्लील भी है और एक अभिव्यक्ति भी और इस अभिव्यक्ति के मायने और तरीके लगातार बदल रहे हैं.

टी-शर्ट पर लिखा हर ‘सेक्सी’ शब्द अश्लील नहीं और ज़रूरी नहीं कि हर बार सेक्स के निशाने पर स्त्री हो. आज के दौर में ‘फ़क’ शब्द  का इस्तेमाल, उसका मतलब, उसके परिप्रेक्ष्य बहुत बदल चुके हैं. ये उसी तरह है जैसे अंग्रेज़ी शब्द Shit का इस्तेमाल एक समय वर्जित था. S***t या S—t के साथ उसका प्रयोग किया जाता था. या फिर हम God Damn या it sucks नहीं कह सकते थे.

ये शब्द भद्दे हैं, फूहड़ हैं ये सच है लेकिन ये भी सच है कि शब्दों का अर्थ और उनकी ‘इमेजरी’ बहते पानी की तरह है. ये सच है कि यही वो शब्द हैं जिनका इस्तेमाल रेप-सॉंग्स और औरत को एक वस्तु की तरह गिनाने में किया जाता है, लेकिन ये भी सच है कि सेक्स का माध्यम अब केवल औरत नहीं है और सेक्स से जुड़ी हर चीज़ में वही निशाने पर हो, ये भी ज़रूरी नहीं है. सेक्स अब सेल्फ़ का लिबरेशन भी है. वो अब एक ऐटिट्यूड भी है, और विरोध का तरीका भी. वो अब केवल एक निजी यौन-क्रिया नहीं बल्कि एक बहस भी है. सेक्स से जुड़े शब्दों और इमेजरी का इस्तेमाल इस नए आयाम में भी हो रहा है.

ज्यादा अश्लील हैं मर्दों के पहनावे 

कुलमिलाकर अश्लीलता एक बहुत गंभीर मसला है लेकिन इन मसलों पर बहस समय और समाज से कटकर नहीं की जा सकती. ये मसले जटिल हैं और इनके हल उससे भी अधिक जटिल. ये लड़ाईयां समय लेती हैं और इन लड़ाईयों के निष्कर्ष   उससे भी अधिक देर से निकलते हैं. लेकिन ऐसे में ये और भी ज़रूरी है कि प्रक्रिया के दौरान हम भटकें नहीं. हमारी भावनाएं सही मुद्दों पर आहत हों और हमारा गुस्सा सही जगह चोट करे. अफ़सोस ये है कि इस सही-गलत की कोई आसान सूची उपलब्ध नहीं. ये सही और गलत अपने विवेक और अपनी समझ से हमें खुद तय करने हैं और वही बदलाव का पहला क़दम है.

(पारुल अग्रवाल पेशे से पत्रकार हैं और नागरिक समाज से जुड़े मुद्दों पर लिखती हैं)

जाज़िम

सोनी पांडेय

कवयित्री सोनी पांडेय साहित्यिक पत्रिका गाथांतर की संपादक हैं. संपर्क :pandeysoni.azh@gmail.com

अन्धेरा घिरने लगा तो कनिया ताड़ का झांडू लिए छत की ओर चलीं….कमर झुक गयी थी ….एक आँख का मोतियाबिन्द पक गया था ,किसी को सुध नहीं. झुकी कमर पर दाहिना हाथ धरे ,एक हाथ में झांडू उठाए कनिया  को जाते देख कलक्ते वाली ने ताली पीटा …इ लो  मुल्ला चला मस्ज़ीद की ओर.हा ..हा…हा…ए  इया !सुनिये तो ,यहाँ बैठिए, हल्दी वाली जगत बो ने हाथ पकड़ कर खटिया की ओर खींचते हुए कहा.हट….हट …हट ,कहते बुढ़िया पिनपिना उठी. जरा और बोलती ,झाडू उठ जाता….बुढ़ापा था कि घर भर की औरतों -बच्चों के मनोरंजन का साधन …दिन भर बेना की तरह ड़ोलती बुढ़िया पूरे कुटुंब को शीतल मन्द बयार बन जेठ की दोपहरी में सुख देना चाहती. चाहती बटोर लाए ज़माने भर  को ,कि देखो हमारी वंश बेली कैसे छितर कर फैली है देश भर में और कैसे लौटती है हर जेठ में अपनी जड़ों की ओर. पिछवाड़े दो पेड़ आम ,एक नीम,बेल,नींबू ,पपिते ,केले की सघन छाया में खटिया डाल घर की नयी बहूँऐं बैठी दम भर अपने -अपने शहरी वैभव का बखान करने में मगन. प्रौढ़ाऐं आँगन में …लड़कियाँ तितली की तरह घर से दुवार तक मंडराती ,मुस्कुराती …कुछ कथ -अकथ गाथाओं के सूत्र सहेजते अपनी दुनिया में रंग भरतीं. बच्चों का झुण्ड चिड़ियों की तरह चहचहाता -गाता जब घर,आँगन,दुवार चारों ओर दौड़ता -भागता गुजरता तो कनिया का कलेजा लहलहाती खेती देख झूम उठता.

कनिया  बिना वक्त गवाऐं छत बुहार देना चाहती थीं ... पुन -पुन सीढ़ियाँ चढ़ती जा रही थीं. नीचे आँगन में एक कोने में बुधिया की माई कढ़ाई में सब्जी छौंकने की तैयारी कर रही थी. ब्याह का घर,….घर भर की औरतों की चाँदी, इन दिनों खाना बनाने के लिए बुधिया की माई पच्छिम टोले से बुला ली जाती थी ….औरतें सब्जी काट भर देतीं ,बाकि का काम वह अपनी दोनों बेटियों संग करती ,बदले में रोज का पचास रुपये…एक बहू की झांपी की साड़ी ….एक- दो घर की औरतों की पुरानी साड़ी और नेग -जोग मिलता. बेवा औरत बेटियों संग पूरे लगन घर -घर घूम कर रसोई बना कर गुजारा करती.

मिर्चे की तेज झौंस से कलकतेवाली तुनक उठीं  ….इतना मिर्चा झोंकती है कि कलेजा झौंस जाए ….खों -खों करती वह भी छत की ओर चलीं. बुढ़िया अब तक आधा छत धीरे-धीरे झाड़ चुकी थी. लेहाज में कलकतेवाली ने झांडू हाथ से लेना चाहा तो जोर से कलाई पकड़ ठेलते हुए चुपचाप आगे बुहारने लगीं. एक कोने में तहा कर रखे जाज़िम के बड़े से बंडल पर कलकतेवाली बैठ गयी ….नीम की सघन छाया और मन्द हवा के झोंके ने राहत दी तो गुनगुनाने लगीं…..हेssरी काली री कोइलिया बताउssss ….कब मिलिहें सवरियाssssssssss
मधुर आवाज की तान का असर हो या मौसम की फितरत, आम पर कोयल कूं -कूं  कूहुकने लगी…अनायास दोनों औरतें मुस्कुरा उठीं. छत का कूड़ा किनारे लगा ,दौरी में उठा कनिया कलकतेवाली  के पास आईं….लम्बी साँस छोड़ते हुए…हाथ हिला कर गट्ठर पर से उठने का इशारा किया….वह अविलम्ब उठ गयीं. दोनों औरतें खोलकर बिस्से भर के छत पर जाज़िम बिछाने लगीं ….लगभग एक तिहाई छत ढ़क गया…कनिया बैठ कर माथे का पसीना पोंछने लगीं….काहें रउवां एतना परेशान होती हैं….अरे बिछाएगीं न कुल. आँगन की ओर हाथ लहराकर…देखिए सब मजलिस लगाए हैं नीचे एक्के खटिया पर अडस कर. अब्बे भागे आएगा ज़माना….जान गयीं कुल की बिछौना बिछ गया.कलकते वाली को सत्तर साल की कनिया का यह श्रमसाध्य कार्य बिल्कुल रास नहीं आता था,वह झनझना रहीं थीं ..जैसे झन से थरिया कोठे से आँगन में गिर झनकता हो. पर कनिया भी बेहया की जड़ …रोज चारों देवरानियों,तीनों ननदों से डांट -ड़पट सुनतीं  और फिर उसी क्रिया को रोज परिवार जुटने पर दुहरातीं. कलकतेवाली उनके बाद उतरी घर की दूसरी बहू थीं. उम्र कोई साठ से पैंसठ, लम्बी -गोरी -चिट्टी कलकतेवाली पर कनिया का विशेष स्नेह था. कलकतेवाली  नियम से जब तक गाँव ठहरतीं,जिठानी के पैर शाम को दबातीं और पूरे गाँव भर की कथा साल भर की सुनतीं. पैर जबरन खींच कर दबाने लगीं …..आज कनिया कुछ उदास थी …..नई बहू उतर चुकी थी, कल से धीरे- धीरे परिवार शहर की ओर लौटने लगेगा, सोच कर ,आँखें बन्द कर वह जो खोंईं अतीत में कि आँसू झर -झर लुढ़क कर कानों में समाने लगे. चित्त लेटी कनिया ने झक उजली साड़ी से मुँह ढ़क लिया. अन्धेरा सघन होने लगा था ….कुछ तारे रह -रह कर आसमान से झांकते और कहते कि धीर धरो अभी चन्द्रमा का लालटेन जलाते हैं. सोलहवें साल में कनिया ब्याह कर जो नगरा से दलछपरा आई कि नैहर का मुँह पलट कर नहीं देखा. ब्याह के कुल चार महीने गुजरे थे जब पति को बरखा में खेत के मेढ़ पर बैठी काली नागिन डस छीन ले गयी …….सास छाती पीट-पीट डेकरती……अरे रमवा हो रमवाsss उतरत मोर पूत खइलस रे रमवाsss. कनिया पर वज्र गिरा ……सामने पहाड़ जैसी जिन्दगी……बस एक रहम किया विधाता ने,गर्भ रह गया. सास ने चैन की साँस ली…..गीता ….पुराण….मानस पढ़वातीं. कठोर जप-तप करती कनिया रात-दिन एक ही प्रार्थना करतीं कि किसी की किरपा हो और बेटा हो जाए…. पर नियती को कुछ और मंजूर था …. सात महीने बीते और सौरी में बेटी का तीव्र रुदन सुन सास लहकने लगीं.जैसे बरसात में भींगी लकड़ी सुलग- सुलग लहकती है..मायके भेजने की जुगत भिड़ाने लगीं….. वह उनसे भी नौ जौ आगे निकले. संदेशा ले जाने वाले नाउ को मार -पीट कर भगा दिया. जानते थे सास दुबारा नहीं बुलाएगी. इधर क्रान्तिकारी देवर बनारस से लौटे और पूरा हाल जाना तो भावज से ब्याह को अड़ गये……सास को काटो तो खून नहीं. कनिया पर अत्याचार बढ़ गया…..सास माथा पीट- पीट आँगन में चिल्लाती…..हम रहतीं त माहूर घोर पी लेतीं…..इ राsढ़ ,घर दहनी,कुल बोरनी,गू खौकी हमार घर नसलस रे रमवाssssss

गोद में फूल सी सुकोमल पति की एक मात्र निशानी बच्ची का मुँह देख कनिया सब सह रही थीं.एक दिन देवर का पैर पकड़  रोने लगीं…..बबुआ जी sssss रंs उवा बेटा नियर बांडी…जिद छोड देईं. जइसन माई त इसन हमके बूझीं.  देवर की सारी जिद धरी रह गयी ….कोई चारा नहीं…..भावज ने बेटा मान लिया. सास ने सारे देवता -पित्तर की पूजा की, कि बला टली. झट-पट बिना दान -दहेज के बड़ी से सुन्दर बहू दूसरे नम्बर के बेटे के लिए उतारा और साले- साल कर दोनों छोटे बेटों को भी ब्याह दिया. कनिया चुकी घर की बडी बहू थीं ,सो जीवन भर सास के लिए कनिया ही रहीं. सफेद काली किनारी की मोटी खादी की धोती पर मोटा चद्दर डाल कर गंगा नहाने ले जातीं …घर से पैर केवल देवता पूजने को निकलता. घर आँगन में भटके पंक्षी की तरह फड़फडा कर सपनों के सारे सुनहरे पंख झड़ गये……जब शरीर की उष्मा भाप बन सिर पर मंडराने लगती ,आधी रात को उठ कर मन भर नहातीं …..सास तरह – तरह के साधना करातीं. कतकी नहाना…पचकोसी जाना,हर मास की निर्जला एकादसी की कठोर साधना सिर झुकाए करते- करते न केवल भरे यौवन में गर्दन झुकी ,कमर भी धनुषाकार मुड़ गयी. कनिया को थोड़ी राहत मिलती तो बड़ी देवरानी से…..बड़े देवर पढ़ -लिख कर कलक्ते में कालेज के मास्टर हुए तो देवरानी कलकतेवाली  हो गयी. देवर शिक्षा पर विशेष बल देते …..पत्नी को भी उच्च शिक्षा दिलाया,देखा देखी पूरा परिवार शिक्षा की ओर भागा. दोनों छोटे देवर भी क्रमश:चण्डीगढ़ और दिल्ली में कालेज के मास्टर बने ….सबसे छोटी देवरानी भी. गाँव समाज कहने लगा ….कनिया के पैर लक्ष्मी और विद्या साथ लाया पर अपना करम नास कर.

महानगरों की आबो हवा में नयी पीढ़ी पलने -बढ़ने लगी .…..जब तक ससुर जीते रहे सभी तीज त्योहार में नियम से गाँव आते रहे. बड़े देवर की पहल पर मिट्टी का घर गिरा कर भाईयों ने चौखण्ड गहरे आँगन वाला बीस कमरों का बड़ा सा मकान बनवाया. ….सबके दो – दो बेटे ,दो -दो बेटियों , कनिया की बेटी को मिलाकर कुल तेरह बच्चे … देवर -देवरानियों ,सास -ससुर को लेकर नौ.तीनों ननदों को जोड़ दें तो कुल पचास का कुटुंब. घर में सालों साल रंगोत्सव सा माहौल रहता. सास बहुओं को नियन्त्रण में रखना जानती थीं. मजाल नहीं कि दिन में बेटे आँगन में पैर रख दें. दुवार पर कुछ सालों बाद एक मर्दानी बखरी और बैठका अलग से बन गया. सब जानते थे ये पहरेदारी अकेले कनिया पर थी. बड़ी ननद पिछले सावन में काशी ले गयी थीं ….वहाँ आश्रम में कनिया ने विधवाओं को केश मुड़वाए देखा तो रेशम जैसे कमर तक घने बाल विश्वनाथ जी को सौंप आईं. बड़े देवर दरवाजे पर बैठे थे जब कार से कनिया उतरीं ….खूब कुहराम मचाया …..सास को छोड़ सबने कनिया के इस कृत्य का बहिष्कार किया, नतीजा दुबारा कनिया के सर पर उस्तरा नहीं चला …..त्योहारों में देवरानियाँ हरी चूड़ियाँ जबरन कलाईयों में ड़ाल देतीं. कलकतेवाली नाउन को डांट कर आलता पैर में लगवातीं. सास ने खासा विरोध किया….बेटे की माँ होती तो आधी सुहागन होती ….करमदलिद्दर..बेटी बिया के बैठ गयी …आदि -आदि चिल्लातीं. छोटे देवर से एक बार भावज का कूहुक कर रोना, माँ के ताने सुनाना देखा नहीं गया.अपना तीन महीने का छोटा बेटा भाभी की गोद में डाल भरे आँगन में घोषणा की ……आज से भाभी एक बेटे की भी माँ हुईं…..माँ को सख्ती से समझाया कि अब निपुती मत कहना कभी. और उस दिन से सिन्दूर -बिन्दी छोड़ कनिया के जीवन से सफेद रंग उतर गया. लोग तरह-तरह की कहानियाँ बनाते …..कनिया घर की चाहरदिवारी में कैद बेखबर बेटी का लालन- पालन और सास -ससुर की सेवा करतीं……बचे हुए समय में धार्मिक किताबें पढ़तीं. पाँचवीं पास कनिया को पढ़ने में गहरी रुचि थी ….पूरे दलछपरा का एक मात्र परिवार था कनिया का जहाँ उस ज़माने में अखबार आता था. दिन बीतते रहे …..बेटी इण्टर पास कर गयी ……आगे की पढ़ाई के लिए बड़े देवर कलकते ले गये. कनिया उदास रहने लगीं तो ससुर चरखा ले आए. चरखा कातने का ऐसा धुन चढ़ा कनिया को कि महीने में चार-पाँच किलो सूत कात ड़ालतीं. पूरा घर खादीमय हो गया…..बदले में गाँधी आश्रम से चद्दर,साल ….साड़ी ….धोती, अगरबत्ती आदि आने लगा. घर में पहला आघात तब गिरा जब ससुर हार्ट-अटैक से चल बसे.लगाम ढ़ीली पड़ गयी. गर्मी का दिन होने के कारण औरतों को आँगन में खटिया ड़ाल सोने में दिक्कत होने लगी. भुनभुनाहट बढ़ी तो कलकतेवाली बलिया से पति संग जाकर छत भर की ज़ाजिम ले आईं. रात को छत पर बिछी और सबकी बैठकी जम गयी ……कनिया की खोई हँसी परिवार को खुश देख लौटी. नियम से जब तक परिवार रहता,रोज छत बुहार कर अन्धेरा घिरते बिछा देंती …..जाने के बाद सहेज कर खाद की बोरी में भर भण्डारे की छत से लटकती हुण्डी में लटका देतीं की मूस -मुसड़ी से बचा रहे.

ससुर के मरते दोनों छोटे देवरों का त्योहारों पर आना बढ़ती मंहगाई के गान के साथ बन्द हो गया. अब केवल गर्मियों में आने लगे या ब्याह आदि पड़ने पर. हाँ बड़े देवर ने घर आना जरुर बढ़ा दिया ताकि माँ को खले  बेटों का न आना. कनिया का मन त्योहारों में बुझा रहता …..सास छिप कर रो लेतीं तो कलकतेवाली ने मोर्चा सम्हाला. ननदों को बुला लेतीं .कथा-वरत रख लेतीं कि रज-गज बना रहे. चालीसा में कनिया दामादवाली बनीं …..घर में इस पीढ़ी की पहली शादी ,तीनों देवरों ने मिलकर खूब धूम -धाम से शादी की. दामाद भी कालेज के मास्टर निकले कनिया के ….गनीमत इतना था कि अपने ही जिले में थे वरना कनिया बेटी की दूरी सोच-सोच मर जाती. बड़े देवर ने घर की औरतों के बदलते मिज़ाज देख आगे भी सारी शादियाँ लड़के -लड़कियों की अपने गाँव के आस-पास खोज- पीट कर की कि बच्चे जड़ों से चाहे-अनचाहे जुड़े रहे. कनिया की सास ने जीवन की लम्बी पारी खेली …..नब्बे की उम्र में छड़ी ले दरवाजे पर डंटी रहतीं. आँगन में मालिकाना कनिया का चलता. एक मार्सल गाड़ी घर के रुतबे के अनुसार परमानेण्ट दरवाजे पर खड़ी रहती,एक चौकीदार और खेती के देख -भाल के लिए अच्छे वेतन पर नौकर रख बड़े देवर कुल मर्यादा को बचाए रखने की पुरजोर कोशिश करते रहे. चण्डीगढ़ वाली कांख में चद्दर जांते ..हाथ में बेना लिए छत पर आ पहुँची….पीछे दिल्लीवाली भी. चारों शान्त पड़ी कनिया का मर्मभेदी मौन रुदन जानती थीं. चण्डीगढ़वाली ने उठा कर बिठा दिया, यह तीसरे नम्बर पर थीं …..बुधिया चार कप में चाय छत पर पहुँचा गयी. देखते -देखते  बहुएं भी हाथ में चाय की कप लिए आ पहुँचीं.

ज़ाजिम ना जाने कब खुद ब खुद चार हिस्सों में बंट गया जैसे चौखण्ड घर के पाँच- पाँच कमरे बंटे …..कलकतेवाली  बायीं तरफ अपने परिवार संग ….दायीं तरफ चण्डीगढ़वाली ….पूरब में दिल्लीवाली और नीचे पश्चिम की ओर कनिया के हिस्से में ननदें, बेटी और बुधिया की माई बेटियों संग घुसड़ -पुसड़ कर सो लेतीं. दुवार पर पुरुषों की सभा बैठी थी ….रह -रह कर ठहाकों की आवाज छत से टकराकर लौट जाती. चण्डीगढ़वाली की दोनों बहुऐं पूरी तरह गव ई,पर शहर जाते गाँव के अनुभवों को ऐसे त्याग चुकी थीं जैसे लोग बुरे अनुभव त्यागते हैं. उनकी बड़ी बहू तो पूरी अंग्रेजन हो चुकी थी ….बात बे बात थैंक्यू -सॉरी कहना नहीं भूलती…आई लाईक दिस तो उसका तकिया कलाम था. देवरानी के चार साल के बेटे की बहती नाक देख बड़ी अदा से कहा…बिट्टू बेटा!वेरी बैड मैनर ….जाओ नोजी वॉश करके आओ. दिल्लीवाली ने अपनी बड़ी बहू से कहा …..विमला !जरा लालटेन जलाकर रख आओ आँगन में , बिजली कभी भी कट सकती है. इनके नखरे और भारी ……मम्मी जी ….मेरे हाथ में कालिख लग जाएगी …..आप तो जानती ही हैं मुझे धूल मिट्टी से कितनी एलर्जी है. दिल्लीवाली जल -भून गयीं….उनके छोटे बेटे के ब्याह में ही सबका बटोर था. इनवर्टर कनेक्श मर्दाने बखरी और बैठका में हर कमरे में था किन्तु जनानी घर में एक आँगन में और न ई बहू के कमरे में भर….आज न ई बहू का कोहबर था.रात के आठ बजते बिजली कटती थी …इस हफ्ते दिन में लाईट का शिफ्ट था ,सो दिल्लीवाली चिन्तीत थीं कि न ई नवेली बहू को कोई असुविधा न हो …..इन्वर्टर बाहर जम कर इस्तेमाल होने से कभी भी बोल सकता था.भनभनाते हुए उठीं……”माई-बाप जिनगी भर सिवाल मठिया में गू -गोबर काछते रहे और इ दिल्ले जाते धूल -माटी से बेराम होने लगीं. ” बहू के लिए यह अपमान असह्य था …..किन्तु सबको देख चुप रही …..पी लिया हलाहल. शादी उसकी शिक्षा और सुन्दरता पर हुई थी.पति उसके गाँव बारात में गये थे….देखते जिद करके बैठ गये…..जब ब्याह करुँगा उसी लड़की से करुँगा जो पसन्द है. सब हार गये ….माँ रो -धो कर यजमानिक बाभन की बेटी न चाहते जमींदरिहा बाभन घर में ले आई पर वक्त -बे वक्त ताने देने से बाज नहीं आती थी. आठ बजते बिजली कटी तो कनिया की सास ने दुवार फर हल्ला मचाना शुरु किया …..खाए क बेरा हो ग इल बबुआ लोग.मर्द खटिया छोड़ ,हाथ पैर धो अन्दर चले. कनिया और कलकतेवाली  नीचे उतर आईं….कुछ लड़कियाँ भी लेहाज में आ गयीं. मर्दों -बच्चों की पंगत आँगन में चारों तरफ टांट पट्टी बिछा कर बैठ गयी …..लड़कियाँ बुधिया के साथ खाना परोसने लगीं. मर्दों के बाद औरतों की बारी आई ,बुधिया से कनिया ने व्यंग्य के लहजे में कहा …….जो रे बुचिया …सबके अइगा दे आव. बुधिया कह आई. औरतों ….लड़कियों का झुण्ड आकर बैठ गया ……हँसी – ठिठोली के बीच औरतें खाती रहीं. कनिया को औरतों का बतिया-बतिया के खाना तनिको पसन्द नहीं था ……..हे ! तनी फटा-फट खाइए लोग…..मुँह चमका कर कलकतेवाली  से…..औरत का खाए ,मर्द का नहाए,कोई देखे कोई देखबे न करे. आज ज़माना का बस चले तो पूरी रात मज़लिस इहें चलें. कनिया के शब्द कान में पड़ते बहुऐं सिर झुका कर खानें लगीं. दस मिनट में पंगत उठ गयी तो बुधिया टांट पट्टी लपेट कनिया से पूछी …..ए ssइया !भितरी ध देईं न? कनिया के कान में उसके शब्द उबलते अदहन की तरह पड़े ….वह दहल गयीं …..मौन कण्ठ में शब्द अटक गये. सिर पर हाथ धर कर एक टक उसे देखने लगीं. सोचने लगीं…..उफ्फ! तो बिहाने से घर खाली होने लगेगा. …..कनिया ने आँचल से मुँह ढ़क लिया …..चण्डीगढ़वाली ने धीरे से कहा …..ध दे रे बुचिया …..भोरे से जनता भागेगी.

अचानक बल्ब बुझ गये…..चारों तरफ घुप्प अन्धेरा छितर गया .….पिछली शादी में कलकतेवाली  ने जनानी घर में अलग इन्वर्टर लगाने की मांग की ,पर देवरानियाँ मुकर गयीं. उनको गाँव में रुपया खपाना गोंईठा में घी सोखाने जैसा लगता था. यहाँ जो था सब साझे का….जानतीं थीं आज नहीं कल बटना ही है,इस लिए वह पतियों पर लगाम कसे थीं …..चण्डीगढ़वाली ने साफ -साफ पति से कह दिया था…..”बड़के भ ईया विश्वविद्यालय में मास्टर …बेटे साहब -सुब्बा,रुपये से कोठरी भरी है. हमारे मास्टरी में घर चलाना मुश्किल ….अभी एक बेटी भी ब्याहनी है….यदि एक रुपया लगाया घर पर ,मैं गाँव में लात नहीं डालूँगी.” पति जानता था पत्नी की वृत्ती ….इस लिए चुप लगा गये….एक चुप हजार चुप. गनीमत था कि लालटेन जल रहा था ……चारों दयादिनें अन्त में खानें बैठीं….कनिया ने थाली में एक रोटी छोड़ सब निकाल दिया ……गले से निवाला निगलना मुश्किल हुआ जा रहा था. इधर न ई बहूँऐं गाँव के नाम से बिदकने लगीं थीं ….परोजन बितते अटैची उठ जाता.जैसे कैद से छूटीं हों ,शहर भागतीं. ऊपर छत पर फिरसे हँसी ठिठोली शुरु हो चुका था ….लड़कियों के बीच नातेदारों के युवा लड़के भी गुड़ की चाहत में माटा की तरह खींचे चले आए थे. बुधिया की माई ऊपर की ठिठोली सुन हँस कर कही …..जहाँ बुढ़ियन क संग उहां खरची क तंग,जहाँ ल ईकन क संग उहाँ बाजे मिरदंग.चारों औरतें बेमन से मुस्कुराईं.कलकतेवाली  की बड़ी बहू हल्दीवाली की आवाज सबसे बुलन्द आ रही थी …….उनके कान में उसके व्यंग्य बोल ज़हर की तरह घुलने लगे…..आते वक्त सास -बहू में जल्दी लौटने पर तगड़ी बहस हुई थी ….तर्क कमजोर पड़ने पर उसने भी दुनिया का सबसे सस्ता और मारक अस्त्र उठाया ….पता नहीं कैसे माँ आप अपनी छाती पर सौत सहतीं हैं …..देखिए सम्हल के कहीं बुढ़ापे में पापा की आसक्ति बढ़ गयी तो कहीं की नहीं रहेंगीं……… छोटी दो कदम और आगे बढ़ी …..इससे अच्छा तो कनिया अम्मा ब्याह ही कर ली होंतीं….गुड़ खाऐं ,गुलगुलों से परहेज….और दोनों बहूँऐं देर तक हँसतीं रहीं थीं. ऊपर किसी बात पर वैसी ही समवेत हँसी गूंजी और कलकतेवाली  चिंहुक कर कनिया की तरफ देखने लगीं. देखा था कनिया का कठोर तप ….कभी देवरों के सामने सिर से आँचल नहीं सरका ….बराबरी में नहीं बैठीं ….नज़र तो गलती से भी नहीं उठी पर लोग ……लोग तो उड़ती चिर ई की गांड़ी हरदी पोतने में माहीर …..बात उड़ी तो उड़ी ….लोग दो में दस जोड़ते रहे.अब तो घर की बहूँऐं भी कहने लगीं थीं.

रात के बारह बजे हल्दीवाली देवर को दरवाजे से बुलाकर कोहबर में ले गयी. अन्दर लालटेन की मद्धिम रोशनी में न ई दुल्हन पियरी में सजी -धजी सिकुड़ कर सास की पलंग पर बैठी थी. कोने में एक छोटे से टेबल पर दो गिलासों में दूध ,कटोरियों में मेवे और मिठाई रखा था. हल्दीवाली ने झांपी में से निकाल तेज गुलाब की खुशबूवाला इत्र भी छिड़क दिया था. कमरे में घूसते लड़के का सिर गर्मी और इत्र की गन्ध से चकराने लगा….हल्दीवाली आकर छत पर लेट गयी.बुधिया की माई भी बेटियों को लेकर एक कोने में दुबक गयी. बार -बार बेटियों को टो लेती ….इधर इस घर के किशोर लड़कों को रात में प्यास ज्यादा लगने लगी थी.अक्सर रात को सीधे छत पर आकर सिराहने खड़े हो जाते थे.विधवा औरत जवान हो रही बेटियों की प्रहरी बनी रात भर जागती.धीरे -धीरे सन्नाटा हो गया …..झिंगुरों की झन-झन की आवाज के बीच रह-रह कर नीम पर टिटीहरी टिटियाती तो रात डरावनी हो उठती.इधर बहूँओं को बड़के बाबूजी रात को सफेद धोती में दिखने लगे थें..आए दिन कहानियाँ बनातीं. कनिया अभी भी देवरानियों संग भण्डारे में परजा -पसारी का लेन देन धर -निकाल रही थीं. भोरे दोनों छोटी देवरानियों का मयपरिवार टिकट था. रात के एक बजे वह चारों भी छत पर काम निबटा कर आगयीं. हल्दीवाली कान लगाए ……… नीचे अचानक खट से दरवाजे की कुण्डी गिरी और लड़का कोहबर छोड़कर दुवार पर चला गया.हल्दीवाली को दाव मिला “लगता है बबुआ जी को लड़की पसन्द नहीं”. अगली सुबह फुसफुसाहट होने लगी. लड़का कोहबर छोड़ कर भाग गया. हो गया अर्थ का अनर्थ. दिल्लीवाली के प्रान सूख गये,क्यों कि लड़की अबकी उनके पसन्द की थी….जब्कि हुआ यह था कि अत्यधिक गर्मी के कारण लड़का पत्नी को समझा-बुझा बाहर निकल गया था. पूरब में शुक्र ग्रह उग गया और कनिया की बेचैनी औरत की प्रसव वेदना सी बढ़ने लगी. बाहर भी हलचल बढ़ने लगी….दोनों छोटे देवर आँगन में आकर पत्नियों को आवाज दे बुला रहे थे……..बाहर गाड़ियों के हार्न सुन छत पर सोई बहूँऐं उठ बैठीं….बुधिया की माई भी झट नीचे भाग चाय चढ़ा सफर के खाने की तैयारी में जुट गयी. कनिया को छोड़ हर चेहरे पर राहत के भाव थे…..वह एक टक आसमान में उगे दूज के पतले चन्द्रमा को निहार रही थी…..उस दिन भी दूज थी ,जब वह छोड़ कर गया …..आज भी दूज. सुनापन उसकी नियति थी या लोगों द्वारा मिला अभिशाप ,वह कभी खुल कर सोच नहीं पाई….पर अब खलने लगा था.एक छुअन भर का साथ भी कितना सन्तोष दे जाता है उसने गंगा नहान से लौटते बड़के बबुआ के बगल में बैठ कर पहली बार महसूसा था और जम कर मन को धिक्कारा था कि सोचना भी महापाप है. पाप -पुण्य की गठरी में कैद विधवा औरत की जिन्दगी की पीढ़ादायक यात्रा उसके आँखों के सामने चलचित्र की तरह चलने लगे.

बहुएं बच्चों को गरम दूध पिला जबरन लैट्रीन में बिठा रही थीं..…कोई नहा रहा था ….कोई कपड़े समेट रहा था. उजाला फैला तो कनिया बेमन से उठ कर बैठ गयी. बाहर चाय का दौर चल रहा था. देवरों के ससुराल से गाड़ियाँ स्टेशन छोड़ने के लिए आ गयी थीं. देखते -देखते ननदों के लड़के-पति भी तैयार होने लगे. वह मौन बैठी थी….बगल में लेटी बेटी भी उठ कर बैठ गयी. माँ से कहते उठी …..आठ बजे तक तैयार हो जाना अम्मा…..ये आऐंगे. वह बेटी को सजल आँखों से देखती रही…..क्या सोच रही हो अम्मा!…..यहाँ किसी को तुमसे मतलब नहीं…..आँख का मोतियाबिन्द फूट गया तो एक आँख से आन्हर हो जाओगी. माँ के सिर पर हाथ रख स्नेह और अपार धैर्य को सहेज कर…..जीवन सबको दिया तुमने,बुढ़ापा मेरे ही हिस्से आएगा लाख जतन कर लो. खाली छत देख कर…..किसको सुध है यहाँ तुम्हारी? कनिया की आँख से ढ़र से दो बूंद लोर ढ़रका…..आँचल से पोंछने लगी. बेटी सीढ़ियाँ उतरते चेताती गयी ….समय से तैयार हो जाना. नीचे लगभग सभी तैयार हो चुके थे….सबकी आगे -पीछे ट्रेन थी. अटैंची निकलने लगी. बुधिया सबका खाना बाँध -बाँध कर कमरे में पहुँचा रही थी. कनिया रोज की तरह उठ कर जाज़िम तहाने लगीं. तहा कर बंडल बना सूत की रस्सी से बाँध सीढ़ियों से लुढ़का दिया…..जानती थीं आज रात से इसकी जरुरत नहीं थी. आगे -आगे बंड़ल लुढ़क रहा था पीछे -पीछे कनिया सीढ़ी पकड़ कर उतर रही थीं. जाज़िम धम से आँगन में जाकर गिरा ,कलकतेवाली  पोते को चौकी पर बैठ तैयार कर रही थीं….हल्दीवाली ने कनिया को देख कर मुस्कुराते हुए देवरानी से कहा…..अगली बार से ब्याह के दिन आना और अगले दिन जाना होगा मेरा तो नैना….वैसे भी शहर छोड़ पापाजी ये सब जिसके लिए करते हैं करते रहें ….अब ढ़ोना हमारे बस का नहीं.वह बोल कम रही थी मुँह चार कोने का दिवरानियों को दिखा ज्यादा चमका रही थी. अक्सर चुप रहने वाली इन मामलों में दिल्लीवाली से बहू का यह परिहास सहा नहीं गया. हद करती हो बहू……औरत हो कर औरत की व्यथा तुम समझ नहीं सकती. बोलने से पहले सौ बार सोचा करो जरा कि कह क्या रही हो. तुम्हारा पढ़ना -लिखना सब व्यर्थ है. बड़ी घटिया सोच है तुम्हारी…..वह क्रोध से हाँफ रही थी…..कनिया आवाक वहीं सीढ़ी पर बैठी कभी बहू को कभी देवरानी को देख रही थी. कनिया की बेटी ब्रश करना छोड़ माँ को पकड़ जोर -जोर से रोने लगी.बहुत दिनों से सुनती आ रही थी,आज फट पड़ी. कलकतेवाली  भी आज धैर्य खो चित्कार उठीं…..दुनिया के ताने अकेले आज तक सहती आई थीं. दरवाजे से बड़े देवर भागे आए.पीछे -पीछे भाई- भतिजे. बहूँऐं सहम गयीं. क्या हुआ?….रुदन के कोलाहल के बीच एक विराट मौन…..कुछ नहीं चाचा….बस ऐसे ही कह कनिया की बेटी चाचा को देख मुस्कुराकर आँसू पोंछने लगी. वह नम आँखें पोछते बाहर लौट गये. औरतें यहाँ शिव की तरह हलाहल कण्ठ में रोकने में सिद्धहस्त होती हैं…..सबने मौन हलाहल पी लिया कि परिवार में शान्ति बनी रहे.

सब एक -एक कर बुधिया की माई और उसकी बेटियों को नेग के रुपये दे निकलने लगीं. लड़के सामान पहले ही गाड़ियों में रख चुके थे. बुधिया दुपट्टे के कोर में रुपया गठियाते कनिया से पूछी….इया जज़िमिया त अब धराई न?. उन्होने सहमति में सिर हिलाया. बुधिया भण्डारे से बोरा लाकर बहन संग मिलकर जाज़िम बोरे में रख मुँह बाँध लेकर चली…..पीछे-पीछे कनिया. बुधिया बड़ी फरहर थी….झट बन्दरिया की तरह पटनी पर चढ़ हुण्ड़ी में रस्सी बाँध बहन से बँधवा कर ऊपर खीचने लगी. कनिया चौखट पर बैठ देख रही थीं…..अचानक बिट्टू पीछे से गला पकड़ झूल गया…..दादी हम नहीं दाऐंगे आपको छोड़कर……कनिया की लुप्त हँसी लौट आई. कलेजे से लगा दुलारने लगीं. बाहर बिट्टू की खोजाई मची थी…..पैर पटकते हल्दीवाली दनदनाते आई और एक थप्पड़ मार खींच कर ले जाने लगी…..साथ -साथ बड़बडाती भी जा रही थी……अभी घर का मुखिया कम था जो अगली पीढ़ी भी फांसने पर उतारु है ….. बुढ़िया…..कनिया एक साथ सैकड़ों ज़हर बुझे तीरों से बीध गयीं. बुधिया ने आवाज दी…..हो ग ईल इया. कनिया ने मुड़ ठर देखा…हुण्ड़ी में बोरे में बँधी जाज़िम ऐसे लटक रही थी जैसे किसी ने फाँसी लगा लिया हो. घबड़ा कर आँख बन्द कर लिया……बाहर गाड़ियों के घरघरा कर जाने की आवाज आ रही थी. आज कुछ ने जाते पैर छुए ,कुछ ने नहीं कनिया के. जिस सच पर कलकतेवाली  परदा डालती आ रही थी ,एक झटके में आज उठ गया था. कनिया आहत थी आत्मा के अन्तिम कोर तक, समझ रही थी कि अब और वह जाज़िम को नहीं सहेज पाएगी. जाज़िम अभी तक रौशनदान से आ रही हवा का झोंका पा झूल रहा था…..समय की करवट यही थी कि आज वह शायद आखिरी बार बँधा था. शायद ही फिर उतरे. चण्डीगढ़वाली जाते सुना गयीं थीं बेटी की शादी उधर ही तय है…शादी भी वहीं से होगी. गाँव आने-जाने में बहुत खर्च हो जाता है. घर खाली हो गया……कनिया चौखट पर आँचल से मुँह ढ़ांप कर बैठी रो रही थीं कि कलकतेवाली  बाहर से आँगन में आईं……स्नेह से हाथ पकड़ कनिया को दुवार पर लेकर चलीं…..अन्दर गहन सन्नाटा पसर चुका था. बरामदे में चौकी पर बूढ़ी सास और बड़े देवर बैठे थे. दोनों औरतें भी कुर्सी खींच बैठ गयीं. सूने घर के दरवाजे को पर मातमी सन्नाटा फैल चुका था.  …..अन्दर अब भी जाज़िम बेतहाशा झूल रहा था. सबके कानों में जाते हुए परिवार का पदचाप धप्प -धप्प सुनाई  पड़ रहा था जैसे छाती पर पैर रख कर युद्ध भूमि में शत्रु जातें हैं लहूलुहान लाशों को रौंद कर…..सब चले गये,जबकि सब अपने थे.

औरत के मुंह में पेशाब करने और उसकी वजाइना में सिगरेट बुझाने में कौन सा आनंद मिलता है?

यह अश्लीलता नहीं हिंसा है, वह भी क्रूरतम प्रकृति की 

पूजा सिंह 


कई भारतीय फेसबुक यूजर सोमवार सुबह उस समय हक्के-बक्के रह गये जब एक के बाद एक कई लोगों ने ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट अमेज़न  पर बेचे जा रहे एक प्रॉडक्ट की तस्वीर शेयर कर उसकी आलोचना करनी शुरू की. यह आलोचना सही भी थी. यह प्रॉडक्ट दरअसल एक एशट्रे थी जिसे एक महिला की शक्ल में ढाला गया था. महिला की उस आकृति की योनि (वजाइना) में सिगरेट बुझाने का इंतजाम किया गया था.

देखते ही देखते फेसबुक पर यह तस्वीर वायरल हो गयी. तमाम लोगों ने इसकी जमकर लानत-मलामत की. यहां यह सवाल उठ सकता है कि प्रोग्रेसिव तबका आर्ट पीस के नाम पर कई तरह की न्यूड और दूसरों की दृष्टि में वल्गर चीजों को स्वीकार करता रहा है तो फिर इस एशट्रे में ऐसा क्या है जो इसका चौतरफा विरोध हो रहा है. यह ऐशट्रे न्यूडिटी और वल्गारिटी से ज्यादा वायलेंट यानी हिंसक है, हालांकि भारी विरोध के बाद अमेज़न ने वह ऐशट्रे अपनी वेबसाईट से हटा दिया है.

कम से कम मुझे तो यही लगा. एक लड़की की वजाइना में सिगरेट बुझाने की कोशिश! कितनी जघन्य और क्रूर सोच होगी इसे डिजाइन करने वाले की. मुझे कह लेने दीजिये कि इसे डिजाइन करने वाले कलाकार (?) के मन में भी एक पोटेंशियल रेपिस्ट छिपा होगा. निर्भया कांड के उन दोषियों की तरह जिन्होंने उसके शरीर में लोहे की रॉड डाल दी थी.

और अब औरत के गुप्तांग में सिगरेट भी 

कॉलिन थांपसन  द्वारा डिजाईन किया गया ऐशट्रे

मैंने इंटरनेट पर इस कलाकार को तलाशने की कोशिश की. मुझे यह कलाकार तो नहीं मिला लेकिन ऐसी ही एक और एशट्रे जरूर मिली जिसे एक महिला कलाकार कॉलिन थांपसन  ने डिजाइन किया था. उस एशट्रे के बारे में सुप्रसिद्घ नारीवादी नॉबोनिसो गासा ने कहा था कि तमाम कलाकृतियों में महिलाओं को ऐसे ही बेबस चित्रित किया जाता है. उन्होंने कहा कि वजाइना को एशट्रे के रूप में दिखाना महिलाओं के साथ क्रूर हिंसा है. दुनिया में पहले ही महिलाओं पर इतने अत्यचार हो रहे हैं, अब उन पर ऐसी क्रूरता मत कीजिये.

सुप्रसिद्घ मनोचिकित्सक डॉ. एस टंडन कहते हैं कि यह विज्ञापन महिलाओं के बारे में नहीं बल्कि इन्हें बनाने और खरीदने वाले पुरुषों के मानस के बारे में ज्यादा बताता है. यह एक बीमार मानसिकता का प्रतीक है. इसे बनाने वाले के बारे मैं कुछ नहीं कह सकता क्योंकि कई बार ऐसे आर्ट तैयार करने वालों के मन में उसकी कोई पॉजिटिव व्याख्या होती है लेकिन प्रथमदृष्टया तो यह एक डेरोगटरी और वायलेंट प्रॉडक्ट लगता है और इसे बनाने और खरीदने वाले लोगों के आसपास जो भी महिलाएं हैं उनके हिंसा की शिकार होने की आशंका ज्यादा है.

अमेज़न ने अब इस  ऐशट्रे को हटा दिया है

ऐसा नहीं है कि आर्ट और आर्टिस्ट न्यूडिटी के लिए कभी आलोचना के शिकार नहीं हुए. एम एफ हुसैन को सरस्वती और सीता- हनुमान की पेंटिंग्स के लिए अपना देश छोडऩा पड़ा तो पाब्लो पिकासो को बार्सिलोना के ब्रॉथेल (वेश्यालय) के चित्रण के लिए तगड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा. लेकिन वहां मामला कला और उसकी समझ का है जबकि यहां मामला स्त्री जाति के अपमान से जुड़ा हुआ है. इस एशट्रे प्रकरण से मुझे जर्मनी के रोलिंग स्टोन म्यूजियम में प्रस्तुत एक यूरिनल की याद आती है जिसे एक औरत के मुंह का आकार दिया गया था. उस यूरिनल के बारे में स्थानीय नारीवादी रोडा आर्मब्रस्टर ने एक खास बात कही थी कि उस मुंहनुमा यूरिनल में होंठ और दांत तो हैं लेकिन जुबान नहीं है. यानी उसके पास प्रतिरोध की ताकत नहीं है उसे केवल पुरुष की गंदगी अपने अंदर समेटनी है.  उसे लेकर छिड़े विवाद पर म्यूजियम के फाउंडर यूनी स्कॉर्डर ने पूरी बेशर्मी से कहा था कि वह बहुत महंगी कृति है और वह जहां है वहीं रहेगी चाहे जितना विरोध हो.

बहुत खूब कंगना राणावत, सलमान खान कुछ सीखो 

यह सच है कि पुरुषों की शेविंग क्रीम से लेकर उनकी बनियान तक महिलाओं को हथियार बनाकर बेचे जा रहे हैं. उनका शरीर और उनकी सेक्सुएलिटी बीती एक सदी से विज्ञापनों के केंद्र में है अब कम से कम कलाकृति के नाम पर बने प्रॉडक्ट्स में उनके साथ यह क्रूरता तो मत कीजिये. भला वह कौन सा आनंद है जो एक पुरुष किसी स्त्री के मुंह में पेशाब करके या उसकी वजाइना में सिगरेट बुझाकर लेना चाहता है. मैं सचमुच जानना चाहती हूं.

पूजा सिंह पत्रकार हैं और अपने स्त्रीवादी तेवर तथा हस्तक्षेप करती रपटों के लिए जानी जाती हैं 

अभी तक रॉड, तेज़ाब, मोमबत्ती और अब औरत के गुप्तांग में सिगरेट भी: सोशल मीडिया में आक्रोश

स्त्रीकाल डेस्क 


इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक सोशल मीडिया में अपने विरोध के बावजूद अमेज़न इंडिया ने  महिलाओं  के यौन अंग को टार्गेट कर बनाई गई ऐश ट्रे को अपनी साईट से हटाया नहीं था. ‘ट्राईपोलर क्रिएटिव टेबलटॉप ऐश-ट्रे’.  नाम से अपने प्रोडक्ट को बेचने वाली कंपनी ने अमेज़न पर इसे सजावट के लिए एक क्रिएटिव प्रोडक्ट बताया है.

ऐशट्रे का इमेज एक टब में लेटी महिला का है, जिसके खिलाफ  सोशल इंडिया पर महिलाओं ने अपना गुस्सा जाहिर किया. कई ने अमेज़न के साईट पर जाकर उसकी भर्त्सना की और ऐशट्रे को अपने सेल प्रोडक्ट से हटाने की मांग की. अभी तक अमेज़न में इसे अपने यहाँ बिक्री के लिए बनाये रखा है, इसके बावजूद कि प्रीति कुसुम की शिकायत के जवाब में अमेज़न ने त्वरित कार्रवाई का आश्वासन भरा मेल भेजा.

अपनी प्रतिक्रया में श्वेता यादव ने अपने फेसबुक पेज पर लिखा: 


तस्वीर आपको वाहियात लग सकती है और इसके लिए आप मुझे सलाह से लेकर गालियों तक से नवाज़ सकते हैं … लेकिन रुकिए ये तस्वीर मेरी खींची हुई नहीं है और ना ही यह सिर्फ तस्वीर है। जी हाँ यह ऐश ट्रे है जिसे आपका प्यारा Amazon.in बेच रहा है पूरे बेशर्मी से… यह तस्वीर मुझे शिल्पी शिल्पी की वाल से मिली। एक बार मन हिचका थोड़ी शर्म भी आई सोचा देखकर अनदेखा कर दूँ लेकिन कर नहीं सकी तो नतीजन लिख रही हूँ। अब सोचिये कितनी घटिया मानसिकता होगी उस आदमी की जिसने स्त्री की योनी में सिगरेट बुझाने की सोची? उसकी कुंठा का अंदाजा लगाइये। क्या वह उस बलात्कारी की सोच से जरा भी अलग है जो रेप करने के बाद रॉड किसी महिला की योनि में घुसेड़ देता है? उसकी सोच कितनी उस आदमी से या सड़क चलते मनचले से अलग है जो सड़क चलती लड़कियों को कपड़े के ऊपर से भी चीर- फाड़ कर रख देते हैं और लड़की को बराबर यह अहसास दिला जाते हैं कि आखिर वह घर से बाहर निकली ही क्यों? अब अमेजन से अगर कोई डेटा मिले तो वह भी निकलवाइए, यकीन मानिए अब तक का सबसे ज्यादा बिकने वाला ऐश ट्रे निकले तो मुझे बहुत आश्चर्य नहीं होगा। अब इतना कह दिया तो लगे हाथ एक बात और भी बता दूँ। ट्रे का दाम देख लीजिये आपको अंदाजा हो जाएगा की इसे खरीदने वाले कौन होंगे? कोफ़्त होती जा रही है इस दुनिया से… यह समाज औरतों के प्रति मानसिक बीमारों का हैं …. आप माने या नहीं पर हकीकत यही है सबसे महत्वपूर्ण बात अमेजन पूरे शान से इसे खुलेआम बेच रहा है। एक अपील है आप सब दोस्तों से हो सके तो इस पोस्ट को शेयर करिये ताकि अमेजन पर दबाव बने और वह इस प्रोडक्ट को बेचना बन्द करे,

ऊप्स मूमेंट: स्त्री को देह बनाते कैमरे 


शिल्पी सिंह ने तल्ख़ प्रतिक्रया देते हुए लिखा: 

“लो भई! अब औरत के गुप्तांग में सिगरेट भी बुझाई जा सकती है. अभी तक रॉड, तेज़ाब, मोमबत्ती और न जाने क्या-क्या डाला गया. लेकिन यह नई सुविधा उपलब्ध करवाई है अमेज़न ने.”

फ़ेसबुक पर रीवा सिंह ने अमेज़न के नाम एक ‘खुला खत’ लिखा है. रीवा लिखती हैं, “डियर अमेज़न, मुझे उम्मीद है कि आपकी टीम इस उत्पाद को एक मॉडल के तौर और आपके वरिष्ठ अफ़सर इसे अपनी साइट पर उतारते वक़्त होश में रहे होंगे. लेकिन आपकी रचनात्मकता ने हमारे पास कोई विकल्प नहीं छोड़ा है.”

विज्ञापन के नाम पर स्त्रियों के खिलाफ यौन हिंसा को उकसाती तथाकथित रचनात्मकता पहले भी देखी गयी है, एक सरिया के विज्ञापन में सलमान खान ने भी इस उकसावे को अभिनीत किया है:

बहुत खूब कंगना राणावत, सलमान खान कुछ सीखो 

नैन्सी तुम मारी नहीं गई तुम तो यूपीएससी टॉप कर रही हो, सीबीएसई टॉप कर रही हो

संपादकीय


नैन्सी,


मैं कई दिनों से तुम्हारे मारे जाने की खबर पढ़ रहा था, सोशल मीडिया में तुम्हारे मृत शरीर पर की गई हैवानियत की तस्वीरों पर नजर पडीं-वीभत्स! नैन्सी तुम उन कई लड़कियों में से एक हो जो पितृसत्ता से मुठभेड़ करती हुई मारी गईं, तुम उस अनवरत लड़ाई की सिपाही हो, जो जाति और जेंडर के क्रूर तालमेल से से बनी पितृसत्ता के खिलाफ लड रही हैं. हाँ, 12 साल की प्यारी बच्ची तुम पढ़-लिखकर डीएम बनना चाहती थी! देखो साल-दर साल कितनी नैन्सियाँ डीएम बनने की राह पर हैं! अभी पिछले ही साल टीना डाबी ने टॉप किया था यूपीएससी. नैन्सी तुम बड़ी होती तो तुम्हें समझ में आता कि टीना जाति और जेंडर दोनो मोर्चों पर छिड़ी लड़ाई से आगे आई थी, पीढियां लग जाती हैं, इस लड़ाई में छोटी जीत दर्ज करने में भी. और हाँ, इस बार भी नंदिनी केआर के जरिये तुम्हारा सपना पूरा हुआ. वह भी इस बार यूपीएससी टॉप कर गई है. यह कहानी, लड़ाई का यह मोर्चा तबसे ही शुरू हो जाता है, जब तुम जैसी नन्हीं नैन्सियाँ भ्रूण के रूप में आती हैं, और उनमें से कई गर्भ में ही मार दी जाती हैं. लेकिन सफलता की अहर्निश गाथायें भी तुम जैसी नैन्सियाँ ही साल-दर-साल लिख रही हैं. इस वर्ष भी लड़कियों ने लड़कों से बेहतर प्रतिशत में सफलता हासिल की है. हर बार रिजल्ट आता है और लड़कियों के लहराते परचम की खबरें आती हैं. सीबीएसई 12 वीं की टॉपर रक्षा गोपाल की मुस्कानों में भी नैन्सी तुम्हारी ही मुस्कुराहटें हैं.



मैंने तुम्हें पितृसत्ता से लड़ाई के मोर्चे पर शहीद कहा है, यह अकारण नहीं है. बड़ी मुश्किल से आज लड़कियों का साक्षरता दर बढ़ा है, उन घरों से लडकियां शिक्षा के लिए आगे आ रही हैं, जहां शिक्षा के अवसर अभी पहुंचे हैं. लड़कियों का साक्षर होना शिक्षित होना एक युगांतकारी घटना है. स्त्रियों की शिक्षा के खिलाफ ब्राह्मणवादी पितृसत्ता का षड्यंत्र इस कदर रहा है कि प्राचीन कालीन स्त्रियों के विदुषी होने के उदाहरण तो खूब दिये जाते रहे, लेकिन उनकी लिखी रचनाओं के इक्के-दुक्के अंश ही शेष रह पाये. या तो उनकी रचनाएं जला दी गईं या कैननाइजेशन की प्रक्रिया में भुला दी गईं. मनुस्मृति तक आते-आते तो और भी कठोर विधान बना दिये गये. मनु के स्त्रीविरोधी संहिताओं में स्त्री के शैक्षणिक, धार्मिक और दार्शनिक अधिकार छीन लिये जाने के स्पष्ट विधान हैं. तुम्हारी पूर्ण स्वतंत्रता और तुम्हारे अधिकारों के लिए प्रतिबद्ध डा. बाबा साहेब अम्बेडकर ने तुम्हारे विरुद्ध मनु के षड्यंत्रों को अपने लेख ‘हिन्दू नारी का उत्थान और पतन’ में स्पष्ट किया है:



अमन्त्रिका तू कार्येयं स्त्रीणां भावृदशेषत:
संस्कारार्थ शरीरस्य यथाकालं यथा क्रमम्


अर्थात :-निर्धारित कालक्रम के अनुसार स्त्रियों के जो संस्कार किये जायें, उनमे वेद-मन्त्रों का पाठ न किया जाये . ब्राह्मण संस्कृति में यज्ञ –कर्म धर्म ही आत्मा माना गया है,परन्तु मनु ने स्त्रियों को इस धर्म-कार्य से भी वंचित रखा है . इस संबन्ध  में उनका आदेश निन्मलिखित है:

न वै कन्या न युवतिर्नाल्प विद्धो बा बालिश:
 होता स्यादग्निहोत्रस्य नर्तोनासंस्कृतस्तथा!
नरके हि पतन्त्येते जुह्वतः  स च यस्य तत
तस्माद्वैता  न कुशलो होता स्याद्वेदपरागः 


अर्थात:– कन्याएँ युवतियां ,थोड़ा पढ़े -लिखे लोग,कुपढ,बीमार अथवा संस्कार-रहित व्यक्ति यज्ञ के होता न बनाये जायें, वरना होता और यजमान दोनों नरकगामी होंगे . धर्म लाभ से स्त्रियों को वंचित रखने के लिए उनको स्वयं तो यज्ञ करने के लिए अयोग्य ठहराया है,मनु ने ब्राह्मणों पर भी बंधन लगा दिया कि वे भी स्त्रियों के लिए यज्ञ न करे. इस प्रकार  न स्वयं  यज्ञ कर सकती है, न ब्राह्मणों के द्वारा करा सकती है.

नैन्सी शिक्षा से वंचन के खिलाफ तुम जैसी हजारो नैन्सियाँ बाधाएं पार कर रही हैं. पीढ़ियों से संघर्ष किया है तुमने. तुम्हारे घर से बाहर निकलने, आत्मनिर्भर होने और आर्थिक-सांस्कृतिक अधिकारों से पीढी-दर-पीढी बड़े-बड़े लोग डरते रहे हैं! स्त्रियों में अपना और अपने परिवार की इज्जत आरोपित करने वाले बड़े-बड़े महानुभाव हंटर कमीशन के सामने स्त्री-शिक्षा के नाम पर सिलाई-बिनाई-कढाई की वकालत करते रहे हैं. लेकिन तब भी तुम जैसी नैन्सियों ने इन षड्यंत्रों से आगे इतिहास में कदम बढ़ाये, तुम्हारे लिए फुले दंपति ने रौशनी के नये मशाल दिखाये. नैन्सी तुम जब बड़ी होती तो सावित्रीबाई फुले, ताराबाई शिंदे, फ़ातिमा शेख या रुकमाबाई के बारे में जानती, तुम्हें अच्छा लगता कि तुम्हारी तरह पितृसत्ता से जंग छेड़ने वाली स्त्रियों को आखिरकार इतिहास ने उन्हें उनका वाजिब स्थान देना शुरू कर दिया है.

सच में तुम जैसी लड़कियों की भ्रूण से लेकर आगे तक की जाने वाली हत्याओं, उनपर हवश के वीभत्स हमलों से हर संवेदनशील नागरिक विचलित होता होगा, होता है. तुम पर या तुम जैसी अन्य लड़कियों पर होने वाले ये हमले तुम्हारे पढ़ने से, तुम्हारे स्कूल-कॉलेज जाने से, तुम्हारे काम करने से, तुम्हारे बड़े पदों पर होने से खौफ खाते वर्चस्ववादियों के आख़िरी और लगातार धारविहीन होते हथियार हैं. हाँ नैन्सी, उम्मीद की किरणें तब-तब दिखाई देती हैं, जब तुम्हारी जैसी ही नैन्सियाँ शिक्षा की हर चुनौती पर खरे उतरती हैं, सीबीएसई, यूपीएससी या ऐसी ही अनेक सफलता की मंजिलों पर अपने परचम लहराती हैं. सच, नैन्सी इन सफलताओं से पितृसत्ता बहुत खौफ खाती है, पुरुष वर्चस्व दरकता है और निरंतर जारी जंग में खूंखार ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के पंजे लहू-लूहान होते हैं. नैन्सी तुम मरी नहीं हो, तुम्हारे सपने तुम जैसी ही इन नैन्सियों में अंगडाई लेते रहेंगे, साकार होते रहेंगे !

संजीव चंदन, 2 जून 2017

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मेरा कमरा/अपने कमरे की बात

सुशीला टाकभौरे  

चर्चित लेखिका. दो उपन्यास. तीन कहानी संग्रह , तीन कविता संग्रह सहित व्यंग्य,नाटक, आलोचना की किताबें प्रकाशित. संपर्क :9422548822

वर्जीनिया वूल्फ की किताब  ‘ A Room of One’s Own’ का प्रकाशन 1929 में हुआ था, उसका केन्द्रीय स्वर है कि एक स्त्री का अपने लेखन के लिए अपना कमरा होना चाहिए, अपने निजी को सुरक्षित रखने के लिए भी अपना कमरा, इसके लिए उसकी आर्थिक स्वतंत्रता जरूरी है.


वर्जीनिया वूल्फ की पुस्तक ‘^A Room of one’s own*में शिद्दत के साथ यह बताया गया है कि एक स्त्री का अपने लेखन के लिए अपना कमरा होना चाहिए। अपने लेखन, अध्ययन जैसे कार्य कलापों के लिए अपना एक कमरा होना ही चाहिए, यह प्रत्येक प्रबुद्ध साहित्यकार स्त्री चाहती है, मगर इसके साथ यह प्रश्न भी है – क्या स्त्री की अपनी इतनी आर्थिक स्थिति सामर्थ्य या स्वतंत्रता है कि वह अपना एक अलग कमरा अपने लिए सुरक्षित रख सके ? अथवा घर में या परिवार में उसकी वह जगह है कि वह घर के एक कोने पर या एक कमरे पर अपना अधिकार या स्वामित्व जता सके ?

वर्जीनिया वूल्फ ने पश्चिमी देशों की सभ्यता और संस्कृति के आधार पर, पश्चिमी घर – परिवार में उन स्त्रियों की जगह को ध्यान में रखकर यह लिखा है। मगर हमारे देश की संस्कृति और सामाजिक रीति परम्पराओं को देखते हुए, क्या लेखिका की यह बात भारतीय स्त्रियों के लिए है ? सामन्ती और धनाढ्य परिवारों की बात अलग है। सम्पन्न प्रगतिशील शिक्षित और पश्चिमी सभ्यता के अनुयायी परिवारों की बात भी अलग है, यहाँ परिवार के छोटे बच्चे के लिए भी उनके अलग कमरे होते हैं। मगर इन परिवारों की संख्या कितने प्रतिशत है ? बहुत कम है। मैं उन 80 प्रतिशत परिवारों की बात जानती हूँ, जहां घर भले ही बड़े हों, मगर स्त्रियों के लिए अलग से उनका कमरा होने की बात आश्चर्यपूर्ण मानी जाती है।

एक पत्नी का कमरा पत्नी का नहीं पति का कमरा होता है। माँ का कमरा बेटा बेटी नाती पोतों के साथ होता है। बेटी का कमरा भी अलग न होकर, बहनों या नानी दादी के साथ होता है। तब वे अपने निजत्व को सुरक्षित कैसे रखें ? यदि घर पुरानी पद्धति के हो। और संयुक्त परिवार हो, तब तो स्त्री को अपना कोई अलग कमरा नहीं मिल सकता। बड़ा किचन, बड़ा बरामदा, बड़े कमरे का बेडरूम – वहाँ स्त्री हर जगह होती है मगर अकेली नहीं होतीं। वह सबके लिए होती है और सबके साथ होती है। ये बातें भी बड़े घरों के सम्पन्न सवर्णों, बड़े लोगों की हैं। मैं अपने लिए क्या कहूं ?

कहने के लिए बहुत कुछ है। अनुभवों अनुभूतियों, ख्वाहिशों और हताश उदास टूटे सपनों का अम्बार हमारे दिलों में भी है। ये कब शुरू हुए और कब मैंने इन पर विचार करना शुरू किया, इसका अपना एक इतिहास है। यह बात सच है, जब तक हम किसी बात पर गंभीरता के साथ विचार नहीं करते, तब तक वह हमारे लिए कोई महत्व नहीं रखती है। हम उन स्थितियों में बरसों से रह रहे थे। वह हमारी आदत में इस तरह शामिल थे कि कभी उससे अलग विचार भी मन में नहीं आया। यह बात शुरू में मेरे साथ भी रही है।

जहां घर होगा, वहीं तो कमरे की बात सोची जाएगी। इसके लिए मैं अपने उन सभी घरों के विषय में जरूर बताना चाहूंगी जहां जहां मैं रही हूँ। गरीबी और अभाव हमारे जीवन के विशेष अंग रहे हैं। बचपन से ही मैंने देखा, हम 7 बहन भाई, माँ पिताजी और नानी के साथ एक घर में रहते थे। घर क्या था एक कमरा और छोटा सा बरामदा। कमरे में ही रसोई के चूल्हा चक्की थे। वहीं बर्तन, वहीं बिस्तर की मचान। पिताजी और बड़े दो भाई बरामदे में सोते थे। माँ नानी हम तीन बहने और छोटे दो भाई कमरे के अन्दर जमीन पर बिस्तर बिछाकर एक लाईन से सोते थे। यह घर भी हमारा नहीं नानी का घर था। एकांत न मिल पाने के कारण कभी पिताजी माँ और नानी से झगड़ते, कभी नानी माँ और पिताजी को आश्रय देने का एहसान जताते हुए झगड़ा करती। तब किसी तरह जोड़ जुगाड़ करके पिताजी और माँ ने नानी के घर की बगल में अपना अलग छोटासा घर बना लिया। तब भी हम बहन भाई नानी के साथ ही रहते थे। वहीं रहना, वहीं खाना। बानापुरा गांव में, गांव से दूर हमारे दो घर थे, जहां न बिजली की सुविधा थी न ही पानी की। बानापुरा में गांव का विस्तार होने और स्कूल के पास अनाज गोदाम के ऑफिस का विस्तार होने पर हमारे घर वहां से हटाए गए। हमें डॉक बंगले के पीछे जंगल के पास की जगह में, नगर पालिका ने मकान बनाकर दिए। यह बात सन 1965 की है। यहां भी नानी और हमारे दो ही घर थे। एक कमरा किचन और बरामदा, बस। मैं कक्षा 6-7 तक नानी के साथ ही सोती थी। रात में कुत्तों के भौंकने पर डर कर  नानी से लिपटकर सोती थी।



तो यह था हमारा घर और घर की सुविधा व्यवस्था। ऐसी स्थिति में अपने लिए अलग कमरे की कल्पना तो क्या, सपना भी नहीं देख सकते थे। ऐसे माहौल में मेरे बड़े भाई कल्लू भैया, शंकर भैया और मेरी पढ़ाई कैसे हो सकी ? बडे़ भाई पढ़ाई करने के लिए अधिकतर अपने दोस्तों के घर चले जाते थे अथवा घर के पास की अमराई में किसी झाड़ के नीचे या निचली डाल पर बैठकर पढ़ाई करते। कभी वे रेल्वे लाईन के उस पार नदी के किनारे जाकर पढ़ते थे। मैं कहां जाती ? या कहां जा सकती थी ? स्कूल से लौटने के बाद पढ़ाई की चिन्ता से बेचैन रहती। इन दिनों मैं छोटी छोटी कविताएं भी लिखने लगी थी। घर के काम भी करती रहती, शाम के खाना बनाने में सहयोग करती, साथ ही अपनी पुस्तक के पन्ने भी पलटती रहती। ऐसे समय मन में कभी कोई कविता ही मचलने लगती, तब दाल बघारते समय, या रोटी बनाते समय मैं उठकर अपनी कॉपी पेन निकालकर वे लाईने लिख लेती थी।
सबका खाना हो जाने के बाद बिस्तर लगाया जाता। सबके सोने के बाद मैं लालटेन की धीमी रोशनी में देर रात तक पढ़ाई करती रहती। तब मैं कविता की तुकबन्दी भी करती थी। दरी पर बैठकर पढ़ाई करते हुए कभी झपकी लग जाती। माँ देखती तब डांटकर कहती – बेटी बहुत रात हो गई, अब बिस्तर पर सो जा। कल पढ़ लेना।’’ पिताजी की नींद खुलने पर वे डांटते थे – ‘‘लड़की, सोई नहीं अब तक ?’’ मां बप्पा के डर से मैं थोड़ी देर के लिए लालटेन धीमी करके बिस्तर पर लेट जाती। उनके सोने पर फिर से पढ़ने लगती। अपनी रचनाएं भी लिखती। परिक्षा के दिनों में अक्सर भय लगता, पिताजी शाम को घर आकर लड़ाई झगड़ा न करें। ऐसे में पढ़ाई करना मुश्किल हो जाता था। मैट्रिक की पढ़ाई, बी. ए. की पढ़ाई मैंने इसी तरह की थी। परिक्षा के दिनों में ऐसे समय रात में माँ मुझे चाय बनाकर देती और अच्छी पढ़ाई करने का हौसला जगाती थी।


घर के पीछे ईंधन जलावन लकड़ी कंडे रखने की छोटी टापरी, घर के पीछे की दीवार से लगी हुई थी। दिन के समय कभी कभी मैं वहां एकान्त में बैठकर भी पढ़ती थी। कभी कोर्स की किताबे पढ़ती थी, कभी कहानी उपन्यास पढ़ती, कभी कविताएं लिखती। मैं अधिकतर अपने विचारों में खोई रहती। कभी कागज के फूल बनाती कभी पेन से कॉपी में ड्राईंग करती रहती। इन दिनों सिर्फ चार हफ्ते तक मैंने पेंटिंग और चित्रकला भी सीखी थी। एक बार बरसात के समय, लकड़ियों के बीच से निकलकर एक सांप मेरे बहुत नजदीक से निकला। अपने विचारों में तल्लीन मैं उसे चुपचाप देखती रही। देखते देखते सांप टापरी से बाहर निकल गया। बाद में मुझे समझ में आया कि वह जहरीला संाप था, काट भी सकता था। यह सोचकर मैं वहां बैठने से डरने लगी थी। माँ ने भी मुझे वहां बैठने से शख्त मना कर दिया था। तब मैं दिन में दोपहर या शाम के समय नानी के घर के बरामदे में एक खाट खड़ी रखकर, उसपर एक चादर डालकर अपने लिए ओट बनाकर कृत्रिम कमरा बना लेती थी। दीवार से लगी खाट से बना वी  आकार का मेरा छोटा सा कमरा मुझे एकान्त का एहसास देता और मैं ध्यान लगाकर पढ़ाई करती रहती। कभी काम करने के लिए पुकार होती – ‘‘शीला मसाले पीस दे, रोटी बना ले, खाना परोस दे।’’ तब मैं अपने ये काम तुरन्त पूरे करके, पुनः अपने कमरे में बैठ जाती। ऐसे समय मैं भाई द्वारा लाई गई ‘फिल्मी दुनिया’ ‘सत्य कथाएं’ पत्रिका या गुलशन नन्दा के उपन्यास और जासूसी उपन्यास भी पढ़ती थी। घर के लोग खाट के ऊपर से अक्सर झांकते कि मैं क्या पढ़ रही हूँ। तब मैं तुरन्त उन किताबों को छिपाकर, अपने स्कूल कॉलेज की किताब खोलकर पढ़ने लगती थी। इस चोरी में भी बड़ा अच्छा लगता था। बड़ी बहन गुस्सा करते हुए माँ, नानी से कहती कि मैं कामचोरी करती हूँ। काम के डर से किताब पकड़कर बैठी रहती हूँ, कोर्स की किताबें नहीं पढ़ती हूँ। बड़ी बहन की पढ़ाई चैथी पांचवीं कक्षा से ही छूट गई थी। घर के काम और छोटे बहन भाईयों को संभालने के कारण वह पढ़ नहीं सकी थी।

1965 में बड़े भाई की शादी होने पर जबलपुर वाली भाभी भी हमारे घर में आ गई। 1969 में शंकर भैया की शादी होने पर जलगांव वाली भाभी भी आ गई थी, उस समय मैं कक्षा नौवीं में पढ़ रही थी। इतने लोग उस छोटे से घर में रहते थे। बड़े भैया भाभी कमरे में सोते, दूसरे भैया भाभी किचन में सोते। बाकी हम सब बरामदे में एक लाईन से नीचे सोते। तब पिताजी ने छोटे बरामदे के सामने छप्पर बढ़ाकर दूसरा लम्बा बरामदा और बना लिया था। इससे बरसात के दिनों में भी हमें सूखी सुरक्षित जगह मिल जाती थी। गरमी के दिनों में उसी नए बरामदे के एक कोने में चूल्हा जलाकर खाना बनाया जाता। वहीं सामने पानी के घड़े गुण्डी रखने की मचान थी। घर आए मेहमान बरामदे में ही बैठते, बरामदे में ही सोते। शंकर भैया होशंगाबाद में नौकरी करने लगे। वे पेपर मिल के क्वार्ट़र में रहने लगे तब भाभी को भी अपने साथ ले गए थे। बाकी हम सब एक साथ रहते रहे। दो बड़ी बहनों की शादी हो गई थी। बड़ी भाभी को संजय अजय बेटे हो गए, तब मां पिताजी ने घर के पास की नजूल की जमीन को खरीद कर, एक अलग घर और बनाया। वहां बड़ी भाभी और भैया रहने लगे थे।



1975 में मेरी शादी हुई। मैं नागपुर अपनी ससुराल आई तब यहां भी एक कमरा और छोटे किचन का छोटा सा घर था। सास, ननद, नन्दोई भी हमारे साथ रहते थे। इस समय की बहुत सी बातें मैंने अपनी आत्मकथा में लिखी हैं। घर के कमरे के सामने खुली जगह थी। छोटे बरामदे जैसी जगह को लकड़ी के पट्टों से घेरकर एक छोटा कमरा बनाया गया, तब जवाई इस बरामदे में सोते थे और अन्दर कमरे में हम पति पत्नी और सास ननद साथ में सोते थे। इस बीच ननद को एक बेटा भी हो गया था, दूसरा बच्चा होने वाला था। हर दिन लडाई झगड़ा होता। ननद घंटों बड़बड़ाती रहती। नन्दोई भी अपने नाज नखरे बताते हुए, शिकायतों के साथ झगड़ा करता। शादी के समय मैंने बी. ए. फायनल की परीक्षा दी थी। नागपुर आने के बाद रिजल्ट आया था। उसी वर्ष बी. एड. में मेरा एडमीशन हो गया था। मैं मेडीकल सर्वेन्ट क्वार्टर से रविनगर वानखेडे़ बी. एड. कॉलेज बस से जाती थी। कॉलेज जाने के पहले और कॉलेज से आने के बाद घर के काम झाडू पोछा, बर्तन कपड़े धोना, खाना बनाना भी करती थी। सुबह से रात हो जाती पढ़ने का समय ही नहीं मिलता था। तब मैं यहां भी सबके सोने के बाद, किचन में चूल्हे के पास अकेली बैठकर बी. एड. की मोटी मोटी पुस्तकों से पढ़ाई करती। कभी अपने जीवन की व्यथा कथा को कविता और कहानी के रूप में लिखती रहती। इन दिनों लिखी ऐसी कई कविता और कहानियों को मैंने बाद में व्यक्तिगत जीवन से ऊपर उठकर, अपने से अलग नाम देकर, समाजगत रूप दिया है।

मैं रात के दो तीन बजे तक लिखती पढ़ती। सुबह 6 बजे के पहले उठकर नहाती, घर आंगन झाड़ती, चाय नास्ता, खाना बनाती फिर कॉलेज जाती। परिक्षा के दिनों में मैं सीताबर्डी की हिन्दी मोरभवन लायब्रेरी के खुले बरामदे में अकेली बैठकर अपनी पढ़ाई करती थी। इस तरह मेरा बी. एड. हुआ। छै माह मातृसेवा संघ में नौकरी की, इसके बाद प्रकाश हायस्कूल में शिक्षिका की नौकरी करने लगी। तब भी मेरी दिनचर्या यही थी। घर में दिन में और रात में रहने सोने की व्यवस्था भी वही थी।


मेडीकल टी. वी. वार्ड का किराये का वह सर्वेन्ट क्वार्टर छोड़कर जब हम अजनी रेल्वे क्वार्टर में किराये से रहने गए, तब वहाँ दो कमरे, अलग किचन और बरामदा था। यहां भी सास और ननद नन्दोई साथ ही रहते थे। तब तक ननद को तीन बेटे हो गए थे। यहां हम पति पत्नी का एक कमरा जरूर था, मगर सिर्फ रात के लिए था। दिन में दरवाजा खुला रहता। सब लोग बैठते, बच्चे खेलते रहते। इन दिनों सितम्बर 1978 में मेरा बेटा भी आ गया था। इसके बाद की घर बदलने की लम्बी यात्रा का चित्रण मैंने आत्मकथा ‘शिकंजे का दर्द’ में किया है। अजनी रेलवे  क्वार्टर से हम शाम टाकीज के पास कामरेड के मकान में किराए से रहे। यहां भी एक कमरा किचन और छोटा बरामदा ही था जो सबके उपयोग के लिए था। यहां आने के बाद ननद नन्दोई अलग किराए का घर लेकर हमसे अलग रहे। यहां सासू माँ बीमार रहने लगी थी। वे कमरे में पलंग पर सोती थीं, हम पति-पत्नी छोटे बच्चे के साथ बरामदे में नीचे फर्श पर बिस्तर बिछाकर सोते थे। फिर हम तुकड़ोजी चौक के पास एलआयजी के एक कमरा एक किचन वाले घरों की तीन मंजिल चाल में रहने आये।


पहली बार इस छोटे से घर को हमने खरीद लिया था। तब हमारे तीन बच्चे भी साथ में थे। 10 बाई 10 का एक कमरा। वही हमारा ड्राईंग हॉल, वही बेडरूम, वही स्टडी, वही मेहमान खाना और वही डाइनिंग रूम था। बडा एक पलंग बिछाने पर आधा कमरा ही रहता था। हम दो और हमारे तीन हम सब एक ही पलंग पर सोते थे। बच्चों की देखभाल के लिए कभी भांजी या भतीजी 12-15 साल की लड़की हमारे साथ रहती। तब वह रात में किचन में सोती। वह रात में कई बार उठती, बाथरूम टायलेट जाने के पहले हमें देखती कि हम कैसे सोये हैं, या क्या कर रहे हैं।

उस समय में दिन में और रात में पेपर जांचने का काम हमारे पास बहुत रहता। कमरे में एक कोने में नीचे बैठकर मैं रात रात भर पेपर जांचती रहती, अपनी कक्षा के बच्चों के भी और पति की कक्षा के बच्चों के पेपर भी। इन्हीं दिनों याने 1985 – 86 में मैंने ‘हिन्दी साहित्य’ विषय लेकर एम. ए. की पढ़ाई भी की थी। लायब्रेरी से किताबे लेकर पढ़ना, पढ़ने के साथ नोट्स बनाना और किताबे वापस करके दूसरी किताबे लाना, पढ़ना। यह सिलसिला लगातार चलता रहा। 1986 में प्रकाश हायस्कूल की नौकरी छोड़कर सेठ केसरीमल पोरवाल कॉलेज में आ गई, तब भी हम उसी एक कमरे के घर में रहते रहे। इन्हीं दिनों मैंने कई कहानियां लिखी थीं, एकांकी नाटक लिखे थे। जब मन में भावनाओं की तरंगे उठतीं, मेरी लेखनी कविताएं लिखती। उस एक कमरे के घर में मैंने अपने लिए एक कोना चुन लिया था। वहां एकांत मुझे रात के 12.00 बजे के बाद ही मिल पाता था। पड़ोसी का दरवाजा हमारे घर के दरवाजे से लगा हुआ था। उनके घर बातचीत हल्ला कोलाहल चलता रहता। रेडियो ऊंची आवाज में बजता रहता। ऐसे समय बार बार मना करने के बाद भी वे वही करते। तब मैं उस समय का इन्तजार करती, जब सब अपनी मर्जी से सो जाते। तब मेरा दिन शुरू होता, मैं अपने स्वयं के पास होती, अपने आप से बतियाती, अपने मन की सुनती और अपने आप को ही मन ही मन अपनी बातें सुनाती। यह प्रक्रिया प्रतिदिन चलती रहती।  कभी इसमें व्यवधान भी आता। लगातार झगड़े लड़ाई से मन इतना तृस्त हो जाता कि फिर कुछ भी लिखने पढ़ने का मन नहीं होता। तब सामने की गैलरी में घंटों अकेली खड़ी रहती। 1976 में मैंने ‘मृगतृष्णा’ जैसी कविताएं लिखी थीं और 1986 में ‘विद्रोहिणी’ जैसी कविताएं लिखीं। तब तब मेरी जानकारी भी बढ़ी थी, साथ ही हिम्मत और विरोध की क्षमता भी बढ़ी थी। कॉलेज  में अध्यापन की नौकरी करने के साथ, मेरा व्यक्तित्व स्वतंत्र सबल रूप में विकसित होने लगा था।

1986 के पहले से ही मैं सामाजिक कार्यक्रमों में जाने लगी थी, साथ ही महिला जाग्रति के कार्यक्रमों से भी जुड़ गई थी।  अपने दलित शोषित समाज की शोषित पीड़ित स्थिति को देखकर मन दुखी हो जाता। कार्यक्रमों में कई महिलाओं की दुख भरी कथा को सुनकर, अपनी जीवन कथा भी असहनीय लगने लगती। ऐसे समय में रात के एकान्त में, कमरे के उसी कोने में कई कविताएं जन्म लेती रहीं, वैचारिक लेख मानसिक विस्फोट के साथ लावे की तरह कागज की सफेदी पर बिखरते रहे। मेरा लेखन दलित विमर्श और नारी विमर्श पर केन्द्रित रहा। वह इसलिए कि  वे मेरे जीवन से जुड़े रहे, मैं उनके लिए संघर्ष करती रही। कभी हम पति पत्नी कवि सम्मेलनों में जाते थे। कभी ‘कथा कथन’ कार्यक्रम, कभी विचार गोष्ठी में, कभी महिला आन्दोलन, कभी दलित आन्दोलन के कार्यक्रमों में। हर बार विचारों का उद्रेक मेरे मन में उठता और वह लेखन सृजन के रूप में स्थायी बन जाता। कभी ऐसा भी होता कि सृजन की उद्दाम तरंगे अपना सिर पटकती रहतीं और मैं समय या सुविधा के अभाव में कुछ नहीं लिख पाती। तब बहुत कुछ खो जाने का एहसास होता, जैसे विचारों  रूपी बादलों के उमड़ने के बाद भी, कुछ न पाने का एहसास, एक खालीपन की अनुभूति कराता। कभी अपने अहं की रक्षा करने के लिए की गई तकरार से, मेरा वह कीमती समय मैं खो देती। कभी बच्चों की चिन्ता, तबियत या घर में एकांत का अभाव, मन में आक्रोश भर देता था।

1989 में जब मोहिनी बेटी का जन्म हुआ, तब से हम दूसरा मकान खरीदने का प्रयत्न करने लगे थे। उन्हीं दिनों शकरदरा चैक के पास वैष्णव अपार्टमेन्ट का फ्लैट हमने खरीद लिया था।  यहां दो बेडरूम किचन और ड्राइंग रूम था। दोनों तरफ आगे पीछे गॅलरी थी। पहली बार हम अपने बड़े घर में रहने आए। मगर यहां सीढ़ियों की बड़ी तकलीफ थी। हमारा फ्लैट तीसरी मंजील पर था। यहां फ्लैट में इंजीनीयर डॉक्टर थे मगर उनके घर की महिलाएं जातिवादी थी। वे अपनी उच्चता और सम्पन्नता दिखाने का कोई अवसर नहीं छोड़तीं। उनके व्यवहार से हमें अपमान का एहसास होता रहता था। यहां भी जातिभेद और अकेलेपन से जूझना पड़ा।

अन्त में 1996 में हमने वह फ्लैट बेच दिया और गोपालनगर के एक पुराने मकान को खरीदकर यहां रहने लगे। यहां मकान में दो कमरे किचन हाल था। ऊपर भी दो कमरे एक हाल था। इतना सब रहने के बाद भी कभी वह दिन नहीं आया कि मैं एक कमरे को अपना बनाकर रखती या ‘यह मेरा कमरा है’ – यह कह पाती। कर्ज भरने की चिन्ता से हमने घर के दूसरी मंजिल के कमरों को ट्यूशन क्लास के लिए किराए पर दे दिया था। हम दो और हमारे चार हम छै लोग नीचे के दो कमरे और हाल में ही रहते थे। यहां के रूम भी 8 ग 9 जैसे छोटे छोटे हैं। बाद में यहीं रहने की आदत हो गई। पति पत्नी का अलग कमरा जैसी बात भी न यहां थी, न ही फ्लैट में। बेटा बेटियां बड़े हो रहे थे। हम सब साथ रहते, बच्चों के साथ ही सोते थे।

गोपालनगर के घर में आने के बाद पति ने ऊपर की मंजिल का एक कमरा अपने पढ़ने लिखने के लिए स्वयं ले लिया था, लेकिन मेरे लिए ऐसा कोई कमरा कभी नहीं रहा। यहां आने के बाद भी मैं अपने लिखने पढ़ने का काम रात में करती हूँ। घर में टी. व्ही आने के बाद, रात के 12 बजे तक टी. व्ही ही चलता रहता, तब टी. वी का समय खत्म होने की राह देखते हुए मैं थोड़ा आराम कर लेती। जैसे ही घर में शांति होती, मैं अपनी किताब कॉपी लेकर बैठ जाती। कॉलेज के पठन पाठन की तैयारी भी करती, स्वतंत्र अध्ययन भी करती और अपना लेखनकार्य  भी करती रहती। फ्लैट में रहते समय भी मैं अपने लिए इसी तरह समय निकाल पाती थी।



लेखन कार्य तो स्कूल में पढ़ने के समय से ही चल रहा था। उन अधकचरी रचनाओं में कभी सुधार करती, कभी एक ही रचना या कविता को बार बार लिखकर सुधारती रहती। इसी तरह लेख और कहानियों को भी बार बार पढ़कर ठीक करती। मैं अपने इन कार्यो में इस तरह मगन रहती कि घंटों बीत जाते और समय बीतने का एहसास ही नहीं होता। रात के 12.00 बजे से सुबह के पांच बजे जाते। चिड़ियां चहचहाने लगतीं, आकाश में उनीदां धुंधला उजाला फैलने लगता। तब लगता कि रात बीत गई है और दिन आ गया है। तब एक या आधा घंटा लेटकर आराम करने के बाद, मैं घर के सुबह के काम में लग जाती। रातभर जागने के बाद भी, कॉलेज जाने के लिए नागपुर से कामठी आने जाने की यात्रा करती। कक्षा में 100-120 छात्रों के शोर के बीच मैं उन्हें पढ़ाती और शाम को घर आकर पुनः घर में भोजन पकाने खिलाने का काम करती। कभी कभी इस तरह 2-3 दिन बीत जाते तब थोड़े चक्कर आने जैसा लगता, मतली जैसा लगता। फिर भी दिनचर्या इसी तरह चलती। तकलीफ होती मगर मन में खुशी रहती कि मैंने अपनी रचनाओं को सही रूप दे दिया है या नई रचनाओं का सृजन किया है। 1986 तक ‘अनुभूति के घेरे’ कहानी संग्रह की कहानियां पूरी तरह छपने के लिए तैयार थी, ‘स्वाति बूंद और खारे मोती’ काव्य संग्रह के लिए मेरे सभी कविताएं बार बार सुधारित होकर परिमार्जित रूप पा चुकी थीं। मैं चाहती थी कि मेरा कविता संग्रह और कहानी संग्रह छपे, प्रकाशित हो। मगर उस समय मैं उन्हें प्रकाशित करने के प्रयास में सफल नहीं हो पाई। कारण यही था – न प्रकाशकों की जानकारी थी, न ही प्रकाशन के लिए खर्च करने के अतिरिक्त रुपए।  पूछने पर सब यही कहते थे कि नागपुर में हिन्दी के कोई प्रकाशक ही नहीं। तब मैं मन मार कर चुप रह जाती थी।


1986 में एम. ए. के डेजरटेशन के लिए नागपुर यूनीवर्सिटी के डॉ. रामेश्वर शर्मा जी से कई मुलाकाते हुईं। इसी तरह नागपुर विश्वविद्यालय के डॉ. हरभजन सिंह हंसपाल जी से भी मिलते रहे। इसके बाद पी.एच. डी. के शोधकार्य के लिए एल. ए. डी कॉलेज की डॉ. योगेश्वरी शास्त्री मैडम से और उनके पति डॉ. अजय मित्र शास्त्री जी से लगातार मिलने रहे। 1990 तक यही चलता रहा। इस बीच इन्हीं लोगों से नागपुर के हिन्दी प्रकाशकों  की जानकारी मिली, तब 1993 में ऋचा प्रकाशन नागपुर से मेरा पहला काव्य संग्रह छपा। इस तरह नागपुर में स्वयं लागत खर्च उठाकर, मैं चार कविता संग्रह, तीन कहानी संग्रह, एक लेख संग्रह, दो नाटक की पुस्तकें और महिला सम्बन्धी दो विवरणात्मक पुस्तकें प्रकाशित कर सकी। इसके लिए मुझे अपने घर में ही और बाहर भी किस तरह संघर्षो का सामना करना पड़ा, यह अलग बात है।

इसके साथ मैं एक बात जरूर कहना चाहूंगी, घर में मुझे लिखने पढ़ने से प्रत्यक्ष रूप में कोई भी मना नहीं करता था, मगर यह सत्य था कि मेरे लगातार लेखन और प्रकाशन से, पति की थोड़ी खुशी के बाद लगातार नाराजी ही दिखाई देती। घर में हम दोनों और बच्चों के अलावा कोई नहीं रहते थे। बच्चों को मेरे लेखन से कोई विरोध नहीं था, फिर कौन मेरे लेखन में अवरोध खड़ा करता था ? मुझे मेरी रखी हुई किताबे पांडुलिपी मिलती नहीं थीं। मैं घंटों और कभी कभी महिनों उन्हें ढूंढ़ती रहती। फिर वे ऐसी जगह रखी मिलतीं, जहां कभी मैंने रखा ही नहीं था। छुट्टी के दिनों में मेरे लिखने के समय ही, घर में कुछ अलग या अच्छीं विशेष चीजे बनाने की फरमाईश होती। मुझे लिखना छोड़कर उठना पड़ता। कभी मुझे लिखने में व्यस्त देखकर ही घर में कचरा गंदगी नजर आने लगता। तब वे सारा सामान उथल पुथल कर, घर में साफ सफाई करने की बात कहते। मैं समझ जाती कि यह मेरे लेखन में जानबूझ कर व्यवधान खड़ा किया जा रहा है। अगर मैं मना करती तब तो दिन भर के लिए लड़ाई का मोर्चा बांध लिया जाता। इस स्थिति से बचने के लिए मैं अपना लेखन कार्य छोड़कर, घर के काम में अपना वह कीमती समय लगा देती। दो दो बातें भी हो जातीं, मगर मैं उस समय अपने विशेष लेखन से वंचित रह जाती। यह दुख मुझे कई दिनों तक सालता रहता। अक्सर यह भी होता रहा, मुझे लेखन में तल्लीन देख उसी समय बेमलब की हुज्जत शुरू की जाती। अकारण ही नाराजी बताकर मेरा ध्यान भंग किया जाता। और फिर यह सिलसिला इस तरह आगे बढ़ता कि कई दिनों तक चलता ही रहता। सुविधा के नाम पर कभी कुछ दिया नहीं, मगर मुझसे मेरा कीमती समय किस तरह छीना जाता रहा, वह भी तानाशाही अधिकारों के साथ ! अब इसके लिए क्या कहू ? यदि उन दिनों मेरे साथ ये जुल्म न किए जाते, तो शायद मेरे लेखन का भंडार कितना बड़ा और महत्वपूर्ण होता। यह मैं अच्छी तरह जानती हूँ, मगर दुखी होने के सिवा कुछ नहीं कर सकी, यह भी मैं जानती हूँ।
अपने लेखन को बचाने के लिए मेरे मन में हमेशा भय रहता था। मैं छिप छिप कर लिखती। मेरे लिखते समय पति आ जाते, या आकर सामने खड़े हो जाते, तब मैं स्वयं अपनी कापी किताब रखकर दूसरे काम में लग जाती। मुझे यह भय रहता कि कहीं मेरी रचनाएं कोई नष्ट न कर दे। तब मैं उन्हें हमेशा संभालकर छिपाकर रखती थी। मेरे लिखे हुए पन्ने सुरक्षित रहें, मेरे लिखे को भी मैं छिपाकर पढ़ती थी। शारीरिक, मानसिक मेरे कष्ट का सिलसिला शुरू न हो जाए, हमेशा सतर्क रहती थी। लायब्रेरी से लाई हुई किताबे भी संभालकर छिपाकर रखती थी कि कहीं वे अचानक नदारद न हो जाएं।

ये बातें कहने में अच्छी नहीं लगती, मगर मेरे साथ अधिकतर यही होता था। जानबूझकर ऐसा किया जाता और अपनी गलती कभी स्वीकार भी नहीं की जाती, जैसे यह खुला आतंकवाद था, जिससे मैं मन ही मन भयभीत रहती थी।  अपनी लिखी रचना इन्हें दिखाकर प्रसंशा पाने के बदले, मैं कई दिनों की आफत को अपने लिए आमंत्रित करती थी। वे मुझे कई तरह से जलील कर करके, यह साबित करते थे कि मुझे कुछ लिखना नहीं आता, वे इससे कई गुना अच्छा लिख सकते हैं। ऐसे समय हमारे बीच लड़ाई झगड़ा होता, मेरे साथ मारपीट भी होती। फिर वह साहित्य सृजन की लगन ऐसे रूठती कि कई दिनों – महीनों तक मेरा साथ ही नहीं देती। तब मैं निष्क्रिय सी अपने जीवन के रेगिस्थान में अकेली भटकती रहती। मेरा लेखन ही मेरे जीवन का उद्यान रहा है। मेरे लेखन के लिए मेरे घर में एक कमरा तो क्या, एक कोना भी सुरक्षित नहीं रहा।

फिर भी मैं लिखती रही, छपती रही। यह मेरी जिद भी, दृढ़ निश्चय था, यह मेरी आशा थी,अरमान था क्योंकि मेरा लेखन सिर्फ मेरे लिए नहीं बल्कि पूरे समाज के लिए है, दलित पीड़ित शोषित जनों की जागृति और उत्थान के लिए हैं। इसके लिए मैंने कभी ‘अपने कमरे’ की कमी को महसूस नहीं किया। जीवन जिया संग्राम की तरह, और मेरा लेखन चलता रहा संघर्ष के साथ।जब लोग किसी के प्यार में डूबकर अपना घर अपनी हथेली पर बसा लेने की बात करते हैं,तब अपने लोगों के लिए क्या अपना कमरा या कोना न मिल पाना कोई बहाना बन सकेगा ?

मैं जानती हूँ गैरदलित स्थापित सवर्ण साहित्यकार अपने लेखन के लिए विदेश जाते हैं। कई लेखक पहाड़ों पर जाते रहे हैं, प्रकृति की गोद में बैठकर लिखते रहे हैं। वे और उनके समर्थक कभी यह भी देखें कि इसके बिना भी लिखा जा सकता हैं, वह भी तेज धारदार असरदार। फिर भी यदि हमें अपना कमरा मिल पाता, तो यह लेखन कितना महत्वपूर्ण और अधिक होता। झील और पहाड़ों के सपने नहीं चाहिए, मगर जीवन जीने की सुविधा चाहिए, अपनी अभिव्यक्ति का अधिकार चाहिए। यह एक कमरे से अधिक महत्वपूर्ण बात है।

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लड़की पर हमले का इंतजार कर रही है मुम्बई पुलिस : सेना के अफसर पर कार्यवाही से बचने की कवायद

शिलांग में  कार्यरत सेना के अफसर की धमकी , गालियों और पीछा किये जाने से डरी मुम्बई की लड़की प्रियंका पांडेय ने मुम्बई के काशी मीरा पुलिस स्टेशन में अपनी शिकायत दर्ज कराई है. इसके पहले प्रियंका ने डिफेन्स सचिव और महिला आयोग को भी पत्र लिखा . काशी मीरा पुलिस स्टेशन ने उनकी शिकायत को अदखल पात्र ( नॉन काग्निजेबल) मानते हुए मामला दर्ज किया है.

पीड़िता का एफबी पोस्ट

गौरतलब है कि शिलांग में  कार्यरत सेना का अफसर संदीप कु. चव्हाण  प्रियंका को पिछले तीन सालों से मेसेज और फोन के जरिये धमकियां और गालियाँ दे रहा है. इसने  प्रियंका के पिता को भी फोन पर गालियाँ और प्रियंका के संदर्भ में अश्लील बातें कहीं, जिसके बाद प्रियंका ने फेसबुक पोस्ट पर अपनी बात लिखी. इसकी धमकियों को दो सालों तक नजरअंदाज करने के बाद पेस्टिसाइड कंपनी में कार्यरत प्रियंका ने डिफेन्स सचिव संजय मित्रा को अपनी शिकायत भेजी है और 30 मई को देर शाम पुलिस में अपनी शिकायत भी दर्ज कराई, जिसे पुलिस ने दखल के लायक न मानते हुए इन्डियन पेनल कोड 507 के तहत अपने यहाँ रजिस्टर कर लिया.

थाने में शिकायत

क़ानून के जानकारों के अनुसार पुलिस ने ऐसा इस मामले को टालने के लिए किया है क्योंकि धारा 507 ऐसे मामलों में लगाया जाता है जब धमकी देने वाला अज्ञात हो. शिकायतकर्ता ने न सिर्फ आरोपी का नाम बताया है बल्कि नंबर भी जारी किया है, इसलिए पुलिस आई एक्ट , 66A के तहत मामला दर्ज कर तहकीकात करती तो महिला की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है.

लड़की पर तेज़ाब फेकने की धमकी दे रहा है सेना का अफसर

लड़की पर तेज़ाब फेकने की धमकी दे रहा है सेना का अफसर, डरी लड़की ने किया फेसबुक पोस्ट, की डिफेन्स सचिव से शिकायत

स्त्रीकाल डेस्क 


ये भारतीय सेना का  अफसर संदीप कु. चव्हाण है. (नीचे तस्वीर में)  जिसकी पोस्टिंग इस समय शिलांग में है. यह शख्स  मुंबई की एक लड़की प्रियंका पांडेय को पिछले 2 साल से फोन करके और मैसेज करके भद्दी-भद्दी गालियाँ दे रहा है. लड़की के पिता  को फोन करेक बहादुर फौजी ने कहा है कि तुम्हारी बेटी वेश्या है. धंधा करती है.  और ये यह भी कहता है कि मैं तुम्हारी बेटी से शादी करूँगा . इसने लड़की के पिता  के फोन पर ही कहा है कि मैं मई के अंत में शिलांग से मुंबई आ रहा हूँ. तुम्हारी  बेटी मेरा फोन नहीं उठाती है. मैं आर्मी अफसर हूँ. मुझसे पंगा लेना बहुत महंगा पड़ेगा. मई आता हूँ फिर देखता हूँ कौन तुम्हारी बेटी को बचाता है. मैं उसकी जिंदगी बर्बाद कर दूंगा. मैं उसके चेहरे पर तेजाब डाल दूंगा.

लडकी को तंग करने वाला आर्मी ऑफिसर

दो सालों से परेशान प्रियंका ने आज अपने फेसबुक पेज पर इस आशय का मेसेज डाला है. प्रियंका ने फेसबुक पर अपनी बात कहने के पहले डिफेन्स सचिव संजय मित्रा, और महिला आयोग  को अपनी शिकायत भी भेजी है और स्त्रीकाल से बात करते हुए उन्होंने कहा कि आज मुम्बई के एक थाने में  उसके खिलाफ शिकायत भी दर्ज करा रही हूँ .  एक  पेस्टीसाइड कंपनी में कार्यरत प्रियंका ने बताया कि ‘  मैं तंग आकर उसके खिलाफ फेसबुक पर सार्वजनिक तौर पर आई हूँ. प्रोफेशनल काम के सिलसिले में संदीप मुझे मिला था, तब वह लखनऊ में पोस्टेड था. वह सेना की ओर से पेस्टिसाइड के ऑर्डर के लिए आता था. शुरू में वह इस सिलसिले में मुझसे बातें करता था, तब उसका व्यवहार नॉर्मल था. उसके बाद वह पजेसिव होने लगा मेरे प्रति. मैंने मई 2016 से उससे प्रोफेशनल रिश्ते तोड़ लिए.’ वह इसके बाद अलग-अलग नंबरों से फोन कर प्रियंका को धमकियां देने लगा.  प्रियंका के अनुसार उसने इन नंबरों से फोन कर उसे धमकी दी है : 8691896111; 9999416159; 9971819732; 9077772481; 9096771066.

प्रियंका का फेसबुक पोस्ट

प्रियंका के फेसबुक पोस्ट के अनुसार संदीप ने न सिर्फ उसे धमकियां दी बल्कि इस आशय की धमकी उसने उसके पिता तक भिजवाई.  लिखित धमकी अपने फोन नम्बर के साथ उसने अपने एक दोस्त के माध्यम से मेरे सेक्युरिटी गार्ड के मार्फ़त दी. बंद लिफ़ाफ़े में  वेरी अर्जेंट लिखा हुआ था , जिसे देते हुए सेक्युरिटी गार्ड को कहा गया कि इसे  मिस्टर पाण्डेय को देना.

प्रियंका ने  फौजी अफसर का पूरा पता और फोन नंबर अपने फेसबुक पेज पर जारी किया है: 
S K Chavan,
Headquarters 101 Area (st branch),
PIN 79001, C/o 99 APO,
Near Railbong,
Shillong, Meghalaya.
Pin Code : 793001
Landmark: Army Pre Primary School
Mobile: 9628052953