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जाने उन पांच महिलाओं को और उनकी कहानी जो तीन तलाक को रद्द कराने में सफल हुईं

शायरा बानो उत्तराखंड के काशीपुर की रहने वाली हैं. 2002 में उन्होंने इलाहाबाद के रिजवान अहमद से शादी की. उनके दो बच्चे भी हैं. शायरा के मुताबिक उनके ससुराल में उन्हें बहुत प्रताड़ित किया जाता था. उनसे दहेज की मांग की जाती, मारा-पीटा जाता. इन सबके चलते वो बीमार भी रहने लगीं. इसके बाद रिजवान ने शायरा को जबरदस्ती काशीपुर वापस अपने पिता के घर भेज दिया. साल 2015 में उनके पति ने उन्हें डाक के जरिए तलाक भेज कर रिश्ता खत्म कर लिया. तलाक को चुनौती देते हुए वे सुप्रीम कोर्ट पहुंची.

10 अक्टूबर 2015 को पति ने शायरा के पास रजिस्ट्री से तीन तलाक का फरमान भेज दिया. शायरा बानो ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके तीन तलाक, हलाला निकाह और बहु-विवाह की व्यवस्था को असंवैधानिक घोषित किए जाने की मांग की. बानो ने मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन कानून 1937 की धारा 2 की संवैधानिकता को चुनौती दी.

कोर्ट में दाखिल याचिका में शायरा ने कहा है कि मुस्लिम महिलाओं के हाथ बंधे होते हैं और उन पर तलाक की तलवार लटकती रहती है. वहीं पति के पास निर्विवाद रूप से अधिकार होते हैं. यह भेदभाव और असमानता एकतरफा तीन बार तलाक के तौर पर सामने आती है. शायरा कहती हैं, शादी के तुरंत बाद ही ससुराल वालों ने एक चार पहिया तथा ज्याैदा पैसों की मांग शुरू कर दी, लेकिन सिर्फ वही एक समस्याप नहीं थी. शुरुआत से ही, मेरे शौहर मेरी हर गलती पर मुझे तलाक की धमकी देते.



शादी के पहले दो साल तक जब मुझे बच्चा नहीं हुआ तो मेरी सास ने उनपर मुझे तलाक देने का दबाव बनाना शुरू कर दिया. शायरा अब एक 14 साल के लड़के और 12 साल की लड़की की मां हैं, दोनों की कस्टाडी उनके शौहर के पास है. शायरा कहती हैं कि रिजवान से शादी के एक साल बाद, उन्हेंल इलाहाबाद में अपनी बहन की शादी में जाने नहीं दिया गया. पिछले 14 सालों में, उन्हें् अपनी बहन के घर जाने की इजाजत नहीं मिली जोकि उनके इलाहाबाद वाले घर से सिर्फ आधे घंटे की दूरी पर रहती हैं.

शायरा कहती हैं मैं रिजवान (पति) से 6 या 7 बार अपनी नसंबदी कराने के लिए गिड़गिड़ाती मगर उन्होंने मुझे कभी ऐसा नहीं करने दिया. उनकी मां फिरोजा बेगम कहती हैं कि भावनात्मनक और शारीरिक पीड़ा ने शायरा को जड़ बना दिया है. पिछले साल से पहले, उनकी बेटी ने कभी अपना दर्द बयां नहीं किया था, तब भी नहीं जब रिजवान ने उनका गला दबाने की कोशिश की थी. फिरोजा कहती हैं कि दिमाग खराब हो गया था शायरा का टेंशन ले ले कर. यहां आकर हमने इलाज कराया.

पिछले साल अप्रैल में जब शायरा की तबियत बिगड़ी तो उनके मुताबिक रिजवान ने उनसे एक छोटा बैग पैक करने को कहा. रिजवान ने शायरा के पिता को उन दोनों से मुरादाबाद के रास्ते  में कहीं मिलने को बुलाया, जहां से वे शायरा को घर ले जा सकते. शायरा से कहा गया था कि वह पूरी तरह ठीक होने के बाद ही घर लौट सकती है. शायरा कहती हैं, ‘जब मेरी हालत में सुधार हुआ, तो मैं उन्हेंे फोन करती और कहती कि मुझे वापस ले जाओ. लेकिन वह मुझे वापस नहीं आने देना चाहते थे और मेरे बच्चों  से बात करने भी नहीं देते थे.  शायरा ने बेचैनी से छह महीने तक इंतजार किया और फिर तलाक-नामा आ गया..

याचिका में सऊदी, पाकिस्तान और अन्य मुस्लिम देशों में तीन तलाक पर प्रतिबंध का भी जिक्र किया  और कहा गया  कि भारत जैसे प्रगतिशील देश में इन चीजों की कोई जरूरत नहीं है.

आफरीन रहमान
जयपुर की 25 वर्षीय आफरीन रहमान ने भी तलाक के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उन्हें  इंदौर में रहने वाले उनके पति ने स्पीड पोस्ट के जरिए तलाक दिया था। आफरीन ने कोर्ट से न्याय की मांग की थी। आफरीन का आरोप था कि उनके पति समेत ससुराल पक्ष के दूसरे लोगों ने मिलकर दहेज की मांग को लेकर उनके साथ काफी मारपीट की और फिर उन्हें घर से निकाल दिया।

अतिया साबरी
यूपी के सहारनपुर की आतिया साबरी के पति ने कागज पर तीन तलाक लिखकर आतिया से अपना रिश्ता तोड़ लिया था। उनकी शादी 2012 में हुई थी। उनकी दो बेटियां भी हैं। अतिया ने आरोप लगाया था कि लगातार दो बेटियां होने से नाराज उनके शौहर और ससुर उन्हें घर से निकालना चाहते थे। उन्हें दहेज के लिए भी परेशान किया जाता था।

गुलशन परवीन 
यूपी के ही रामपुर में रहने वाली गुलशन परवीन को उनके पति ने 10 रुपये के स्टांप पेपर पर तलाकनामा भेज दिया था। गुलशन की 2013 में शादी हुई थी और उनका दो साल का बेटा भी है।

इशरत जहां
तीन  तलाक को संवैधानिकता को चुनौती देने वालों में पश्चिम बंगाल के हावड़ा की इशरत जहां भी शामिल थीं। इशरत ने अपनी याचिका में कहा था कि उसके पति ने दुबई से ही उन्हें फोन पर तलाक दे दिया। इशरत ने कोर्ट को बताया था कि उसका निकाह 2001 में हुआ था और उसके बच्चे भी हैं जिन्हें पति ने जबरन अपने पास रख लिया है। याचिका में बच्चों को वापस दिलाने और उसे पुलिस सुरक्षा दिलाने की मांग की गई थी। याचिका में कहा गया था कि ट्रिपल तलाक गैरकानूनी है और मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों का हनन है

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मध्यकालीन ब्रजभाषा काव्य और स्त्री रचनाकार

आरती रानी प्रजापति

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हिन्दी की शोधार्थी. संपर्क : ई मेल-aar.prajapati@gmail.com

सभ्यता के प्रारम्भ से ही दलित और स्त्री दोनों को समाज के दोयम दर्जे पर रखा गया है. ऐसे में इन दोनों वर्गों का पढ़ा-लिखा होना कैसे संभव हो सकता है? ब्राह्मणवादी, पुरुषसत्तात्मक सोच यही कहती है कि यह दोनों वर्ग कभी कुछ नहीं कर सकते. समाज में स्त्री-दलित दोनों को कम आंका जाता है. स्त्री की अस्मिता पर लगातार प्रहार किया जाता है, जिससे वह अपने को घर में बंद कर ले. स्त्री के विरुद्ध होने वाले शारीरिक, मानसिक अपराध इसी मानसिकता की देन हैं. साहित्य में भी यही धारणा रही है कि स्त्रियाँ कुछ नहीं कर सकतीं. किसी के लिए उपलब्धि के सारे अवसर बंद कर के यह धारणा बना लेना बहुत सरल काम है. किन्तु समाज की इस मानसिकता को भी स्त्रियों ने चुनौती दी है.


आज तक का लिखा गया साहित्य सवर्ण पुरुषों की देन है. यह गाथा हमारे इतिहास ग्रन्थ ही हमें बताते हैं. किन्तु क्या ऐसा संभव है कि स्त्रियों ने कभी कुछ रचा ही न हो? लोक साहित्य को जन्म देने और उसे आगे बढ़ाने का काम स्त्रियों ने ही किया है.घर-बाहर के कामों में व्यस्त स्त्रियाँ कार्यों के साथ ही कुछ न कुछ सृजन करती थीं. कामों में लगी स्त्रियों ने काम के साथ-साथ कई गीतों की रचना की जिनमें स्त्री समाज देखने को मिलता है. उनकी पीड़ा, अभिलाषाओं की अभिव्यक्ति मिलती है. ऐसे कई गीतों को अलग-अलग लोगों ने लिपिबद्ध करने की कोशिश की. हम जानते हैं कि लोक साहित्य की परम्परा को विकसित करने वाली स्त्रियाँ ही है. क्या लिखित साहित्य में भी ऐसा कुछ है जो स्त्रियों द्वारा लिखा गया?सावित्री सिन्हा कहती हैं कि:

‘सम्वत् 1000 से लेकर आज तक के विशाल साहित्य पर स्त्रियों की देन का प्रभुत्व है ऐसा तो नहीं कहा जा सकता; किन्तु वह अनुमान के अनुसार हीन भी नहीं है.’1

समाज में स्त्रियों को बोलने की आजादी नहीं है और यदि किसी तरह वह बोलती हैं तो उसे महत्वपूर्ण नहीं माना जाता. साहित्य इतिहास में स्त्रियों का न होना इस बात की ओर इंगित करता है. कुछ इतिहासकारों ने ऐसी विदुषियों के नामों का उल्लेख किया है जिनका स्त्री-साहित्य के आरम्भ के लिए महत्वपूर्ण योगदान माना जा सकता है. स्त्री द्वारा रचा गया साहित्य अधिकतर श्रुति परंपरा में ही मिलता है, वजह स्त्री को शिक्षा से दूर रखा जाना. वैदिक समय में कुछ विदुषियों के नाम स्मृत इतिहास में दर्ज हैं, जिनमें “रोमशा, लोपामुद्रा, श्रद्धा, कामायनी, यमीवैवस्वती, पौलोमी शची, विश्ववारा, अपाला, घोषा, सूर्या, शाश्वती, ममता एवं उशिज आदि ऋषिकाओं के नाम मन्त्र-द्रष्टा के रूप में प्राप्त होते हैं.”2

बौद्धकाल में वह स्त्री-पुरुष जो बुद्ध की शरण में गए उनके लेखन को थेर गाथा (पुरुष रचना), थेरी गाथा (स्त्री रचना) कहा गया. बौद्धकालीन समय से ही स्त्री रचनाकार अपनी उपस्थिति साहित्य में कराने लगी थीं.


विमलकीर्ति लिखते हैं- “थेरीगाथा में भगवान बुद्ध की समकालीन भिक्खुणियों के जीवनानुभव उन्हीं की वाणी में व्यक्त अभिव्यक्ति का अनुपम संग्रह हैं. थेरीगाथा काल के पहले भारतीय इतिहास में नारी को अपनी व्यथा को इतनी स्वतंत्रता के साथ प्रकट करते नहीं देखा जा सकता| वास्तव में थेरीगाथा नारी स्वतंत्रता को प्रकट करने वाला प्रथम ग्रन्थ है.” 3


उनकी आवाज को पुरुषवादी, ब्राह्मणवादी साहित्यकारों ने दबा दिया| कुछ-एक रचनाकार ऐसे हुए हैं जिन्होंने इन स्त्रियों के महत्व को समझा और इन रचनाओं का संग्रह किया. इसे भी दुर्भाग्य ही कहेंगे कि यह रचनाएं आज भी अपने प्रकाशन के इन्तजार में किन्ही-किन्ही पुस्तकालयों में रखी हुई अपनी अंतिम अवस्था में पहुँच चुकी हैं.

साहित्य के मध्यकाल में लिख रहीं स्त्रियाँ अपने आप में एक आश्चर्य पैदा करती हैं. उस समाज में स्त्रियाँ घर में बंद थीं| ऐसा कुछ नहीं था जिसके माध्यम से वे अपने मन की अभिव्यक्ति कर पातीं. वह ऐसा समय था जब राजमहल में रहने वाली मीरा को भक्ति करने तक का अधिकार समाज नहीं देता. मीरा अपने अधिकार के लिए लड़ाई इसलिए भी कर सकी क्योंकि वह राजघराने से थीं. मीरा के समान ऐसी बहुत सी स्त्रियाँ उस समय में रहीं होंगी जो भक्त होना या अपने अधिकारों को पाना चाहती थीं पर समाज ने उनको ऐसा नहीं करने दिया.मध्यकालीन साहित्य में लिख ब्रजभाषा में लिख रही स्त्री रचनाकारों के नाम हैं- मीरा, ताज, प्रवीनराय, रारिक बिहारी, दयाबाई, सुन्दर कुंवरी बाई, प्रताप कुंवरी बाई, सहजोबाई आदि.

इन कवयित्रियों ने सहज भाषा का प्रयोग किया| जो जैसा है उसे बिना लाग-लपेट के इन कवयित्रियों ने प्रस्तुत किया. अधिकतर ये कवयित्रियाँ कृष्ण प्रेम में डूब कर काव्य रचना कर रही थी| मीरा कहती हैं

पिय इतनी विनती सुण मोरी, कोई कहियो रे जाय
औरन सूं रस-बतिया करत हौ, हमसे रहे चितचोरी
तुम बिन मेरे और न कोई मैं सरनागत तोरी

अधिकतर स्त्री रचनाकार कृष्ण की उपासक हैं- मीरांबाई, वीरां गंगाबाई, सोन कुंवारी आदि. कुछ कवयित्रियाँ शृंगार काव्य की भी रचना करती हैं जैसे-प्रवीनराय पातुर, रूममती बेगम, शेख, तीन तरंग आदि. इन  रचनाकारों ने कृष्ण काव्य और शृंगार काव्य को प्रमुख रूप से क्यों अपनाया जबकि वहां रामभक्ति और सूफी काव्य भी उपलब्ध था. क्या इसकी एक वजह सामाजिक तौर पर स्त्रियों का शोषण है? क्या उन्हें समाज स्वतंत्रता नहीं देता कि वह अपने अधिकारों, घर से बाहर निकलने की सोचें भी, इसलिए सोलहवीं सदी की स्त्री रचनाकार कृष्ण काव्य को अपनाती हैं? यथा-

“कृष्ण काव्य में कृष्ण का परम सुन्दर और सरस रूप ही लिया गया है, वे परम मनोहर और परम प्रेमी तथा शीलवान नायक के ही रूप में विशेषतया चित्रित किये गए हैं. उनका प्रेम यद्यपि लौकिक होता हुआ अलौकिक रहा है साथ ही अन्य भावों के साथ कृष्ण भक्ति में दाम्पत्य अथवा माधुर्य भाव की ही विशेषता रही है यही सब ऐसे प्रमुख कारण हैं जिन्होंने हमारी बहुत सी देवियों को कृष्ण काव्य की ओर समाकृष्ट कर उन्हें उसकी ही सुधा धार में निमम कर रक्खा था.”4

कृष्ण के प्रेम में पड़कर ताज कवयित्री अपने धर्म तक को छोड़ देने से नहीं चुकती| प्रेम जीवन का ऐसा तत्व है जो स्त्री को स्वतंत्रता देता है. और प्रेम यदि ईश्वर से ही हो जाए तो मनुष्य सब छोड़ ही देता है. ताज कहती हैं-

नन्द के कुमार, कुर्बान ताणी सूरत पर,
हौं तो तुरकानी हिन्दुआनी ह्वौ रहूँगी मैं

मीरां की तरह प्रताप बाला ने भी कृष्ण भक्ति को अपनाया और उसके प्रेम में रंग करा अपने को धन्य माना साधारणत: इनकी रचनायें अच्छी हैं, और उनमें इनकी भक्ति-संलग्नता दिखाई देती है. वे लिखती हैं

 सखी री चतुर श्याम सुन्दर सों मोरी लगन लगी री
लाख कहो अब एक ण मानूं उनके प्रीति पगी री 5



ऐसी मान्यता है कि पुरुषों ने ही चारण कार्य किया है किन्तु मध्यकालीन साहित्य में उपस्थित झीमा इस धारणा को खारिज करती हैं. सावित्री सिन्हा अपनी पुस्तक मध्यकालीन हिन्दी कवयित्रियाँ में लिखती हैं-

“झीमा की कहानी उस अंधकारमय नारी के इतिहास में जुगनू की चमक की भाँति दिखाई देती है. कई युद्धों के अवसर पर उसने चारिणी का कार्य किया. कला और सौन्दर्य की कोमलता में राजनीति और युद्ध की कटुता मिलाकर उसने एक नई भावना को जन्म दिया.”6

सोलहवीं सदी के साहित्य को ध्यान से देखा जाए तो उसमें स्त्रियों द्वारा ऐसे अनेक काम मिलेंगे जिसके लिए पुरुष ही स्वीकार किए जाते हैं. कई रचनाएं ऐसी भी हैं जिस पर रचनाकार ने अपनानाम नहीं दिया. पुरुष रचनाकार के साथ ऐसी समस्या नहीं ही होती. वे या तो अपनी रचना पर अपना नाम स्वयं लिख देते हैं या उनके पदों में उनके नाम का उल्लेख होता है. स्त्री रचनाकार ऐसा नहीं कर पाती| पद ही उनके स्त्री अस्तित्व का बोध करवाते हैं. इन रचनाकारों ने कृष्ण-राम-शृंगार को अपना काव्य विषय बनाया.

साहित्य में आलम के साथ शेख का नाम भी लिया जाता है. शेख ने बहुत नहीं लिखा उनका कोई अलग गांठ प्राप्त नहीं होता पर आलम की रचनाओं के साथ उनकी रचना संययुक्त रूप से देखी जा सकती है. कई विचारक मानते हैं की शेख नाम की कोई रचनाकार हुई ही नहीं है. ऐसा कहना स्त्री के अस्तित्व को पूरी तरह नकार देना है. स्त्री है इसलिए उसे सिरे से खारिज कर दो क्या ऐसा किसी पुरुष के साथ भी किया जाता है? शेख की रचना उनकी प्रतिभा का प्रमाण हैं. इसलिए आलम जैसे कवि भी शेख के कायल हुए बिना नहीं रह सके.


शेख के लिए करुना शंकर शुक्ल कहते हैं-शेख कविता में किसी से आगे नहीं, तो बहुत पीछे भी नहीं दिखाई देती. इनके स्त्री ह्रदय ने कही-कहीं नायिकाओं के वर्णन में बहे अनूठे चमत्कार का प्रदर्शन किया है. नायक नायिकाओं के प्रेम को जागृत करने के लिए शेख ने जिन उक्तियों का आश्रय लिया है, वे सजीव होने के साथ ही साथ चमत्कार-पूर्ण भी हैं. भेल ही शेख की कविता में शीमित कल्पना हो, किन्तु शेख में अपने ह्रदयगत भावों को कविता में प्रस्फुटित करने की सफल शक्ति अवश्य थी.

पुरुष कवियों ने भरपूर मात्रा में नख शिख अंगों का वर्णन किया है.  पर खोज बताती है किमध्यकाल की स्त्री रचनाकार भी इस कार्य में पीछे नहीं थी. सीता के नेत्रों का वर्णन रघुराज कुंवरी कुछ इस तरह करती हैं.
मृग-मनहारे, मीन खंजन निहारि वारे, प्यारे रतनारे कजरारे अनियारे हैं.

ब्रजभाषा काव्य की प्रमुख कवयित्रियों में दयाबाई और सहजो बाई का नाम भी आता है इन्होंने भक्ति के पद लिखे| दयाबाई के लिए करुणाशंकर शुक्ल लिखते हैं- वे ईश्वर प्रेम और उसकी पीड़ा में इतनी डूबी हुई दिखाई देती हैं, की उन्हें उसके आगे संसार की क्या, अपना भी ध्यान नहीं है. यथा :


दया प्रेम प्रगट्यो तिन्है, तन की तनि न संभार 7  

संत कवयित्रियों ने कबीर आदि संत कवियों की भांति गुरु की महिमा का वर्णन अपने काव्य में किया. सहजो कहती हैं-


‘सहजो’ गुरु दीपक दियौ, रोम रोम उजियार
तीन लोक द्रष्टा भयो, मिट्यो भरम अंधियार||8  

इस सभी कवयित्रियों से अलग प्रवीण राय हैं. अधिकतर कवयित्रियों की भाषा जहाँ सहजता  लिए हुए है वहीं प्रवीण की भाषा में काव्य शास्त्र के सारे तत्व मौजूद हैं. प्रवीण राय की भाषा दरबारी कवियों जैसी है. कारण वह दरबार में रहने वाली स्त्री थी. ‘उनकी कविता की शब्द योजना और भावों को परिस्फुटित करने वाली उनकी उपमाओं को देखकर यह कहना पड़ता है, कि प्रवीन राय काव्य के अंगों से भली भाँति परिचित थीं, और उनमें भावों को प्रगट करने की पर्याप्त क्षमता थी. ’ 9

विनती राय प्रवीन की, सुनिए साह सुजान||
जूठी पतरी भखत हैं, बारी-वायस, स्वान|| 10

एक ओर कवयित्रियों ने ईश्वर की उपासना की है तो, दूसरी ओर पति को परमात्मा मानने वाली स्त्रियाँ भी मध्यकाल में हुई. आज नारीवादी विमर्श के कारण हम इस बात को भले ही न समझे पर एक स्त्री के लिए खासकर मध्यकालीन स्त्री केलिए जहाँ परकियाओं की पूरी कतार है अपना पति चाहे जैसा हो अच्छा ही होगा.आज समाज हमें विकल्प प्रस्तुत कर रहा है लेकिन तब अधिकतर स्त्रियों के पास पति का कोई विकल्प नहीं था| रानी रघुवंश कुमारी लिखती हैं

पग दाबे ते जीवन-मुक्ति लाही|
विष्णु पद  सैम पति पद-पंकज छुवत परम पद होवे सही 11



हिन्दी साहित्य के इतिहास में सिर्फ  मीरां, महादेवी का नाम लिया जाता है. जबकि सिर्फ मध्यकाल में ऐसी बहुत सी कवयित्रियाँ हैं जो लिख रही थी. उन्होंने क्या लिखा, कैसा लिखा यह अलग विषय है लेकिन प्रत्येक साहित्य को समान सौन्दर्य के प्रतिमानों पर नहीं उतार सकते. सबकी अपनी विशेषता और जरुरत होती है और जब लिखने वाले भी पुरुष आलोचक भी वही तो सोचने की जरुरत है की किसे साहित्य में वो स्थान दे रहे हैं किसे नहीं. मध्यकालीन साहित्य में यदि सिर्फ ब्रजभाषा की बात की जाए तो बहुत सी स्त्रियाँ लेखन करती मिल जायेंगी. जरूरत है की उन स्त्रियों पर काम किया जाए उनके यदि एक पद भी उपलब्ध होते हैं तो उसका भी मूल्य समझा जाए.


संदर्भ सूची
 1.मध्यकालीन हिन्दी कवयित्रियाँ- सावित्री सिन्हा, पृष्ठ-2  
 2.हिन्दी साहित्य का आधा इतिहास, पृष्ठ-18 
 3.थेरी गाथा, सम्पादक और अनुवादक-डॉ विमलकीर्ति, पृष्ठ-3    
 4.हिन्दी काव्य की कलामयी तारिकाएँ, पृष्ठ-3 
 5.वही-पृष्ठ-85
 6.मध्यकालीन हिन्दी कवयित्रियाँ-पृष्ठ 28
 7.हिन्दी काव्य की कलामायी तारिकाएँ-52 
 8.वही- 49 
 9.मध्यकालीन हिन्दी कवयित्रियाँ पृष्ठ-24  
 10.वही, पृष्ठ-27 
 11.हिन्दी काव्य की कलामयी तारिकाएँ- पृष्ठ-88 


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फिल्म कक्कुज (पखाना) की निर्माता दिव्या भारती किसके निशाने पर ?

कुमुदिनी पति 


विवाद , समाज और सियासत,
दिव्या भारती अपने गृह-राज्य तमिलनाडु से बाहर रहने के लिए मजबूर कर दी गईं हैं।उनके कुछ करीबी मित्रों के अलावा किसी को नहीं पता कि वह कहां हैं और किस हालत में जी रही हैं। हालांकि पिछले दिनों वे इरोम शर्मिला की शादी में वधु सखी के तौर पर देखी गईं। उनके ऊपर जातीय हिंसा व वैमनस्य पैदा करने का आरोप लगाकर 3 अगस्त कोमदुरई में केस भी दर्ज कर दिया गया है।

मैला ढोने वाली महिलाओं के लिए प्रधानमंत्री को ख़त

क्या गुनाह है इस 28 वर्षीया महिला फिल्मकार का, जिसको लगातार ‘स्टाक’ किया जा रहा है, बलात्कार और हत्या की धमकियां मिल रही हैं और सुरक्षित रहने के लिए अपनों से दूर अज्ञातवास में रहना पड़ रहा है?
सवाल उठाना, सच बोलना और ज़मीनी हक़ीकत को उजागर करना आज सबसे बड़ा जुर्म है। दिव्या माले से जुड़ी हैं। वह कहती हैं कि अलग-अलग नाम से संगठन बन रहे हैं, जो दक्षिणपंथी विचारधारा का प्रतिपादन कर रहे हैं। दिव्या का मानना है कि ‘‘पुट्टिया तमिलघम पार्टी भाजपा का एक ‘फ्रन्ट’ हैऔर उसका नेता कृष्णास्वामी  दलितों को पिछड़ी जाति की श्रेणी में शामिल करना चाहता है, इसलिए उसे लगता है कि जाति का नाम बदनाम हो रहा है।’’दिव्या पर आरोप है कि वे पाल्लर जाति को बदनाम कर रही हैं।

फिल्म निर्माता दिव्या भारती

समाज का सच सामने लाती है ‘कक्कूज़’


पर दिव्या की डॉक्युमेंट्री फिल्म ‘कक्कूज़’ आज जिस बात को सामने ला रही है, उसे स्वीकारने से बचा नहीं जा सकता। यह फिल्म भारत के सबसे उन्नत राज्य तमिलनाडु के करीब 25 जिलों में हाथों से मैला ढोने व सीवर साफ करने वाले सफाई कर्मियों के जीवन की दुर्दशा को उजागर करती है और‘स्वच्छ भारत’ के भीतर छिपी घिनौनी सच्चाई का पर्दाफाश भी करती है। फिल्म में बताया गया है कि अरुनदतियार, चकिलियार, इरुलार, कुरवार व अन्य दलित उप-जातियां भी इस काम को करने के लिए मजबूर हैं। ‘कक्कूज़’ का मतलब है ‘पाख़ाना’। दिव्या ने अपनी फिल्म में अनेकों महिला और पुरुषसफाई कर्मियों से बात ही नहीं की, बल्कि उनके कार्यस्थल पर जाकर सीवर की सफाई, पाखानों की सफाई, कूड़ों के ढेरों की सफाई, नालों से पॉलिथीन और महीनों का सड़ा कचरा निकालना और उनकी झुग्गियों की स्थिति को ‘शूट’ किया है, जिसमें उन्हें एक साल लगा। वह कहती हैं  कि वह कानून की स्नातक होने के नाते जान पाती हैं कि 2013 में ‘मैनुअल स्कैवेंजिंग’ पर प्रतिबन्ध के बावजूद यह काम धड़ल्ले से चल रहा है। फिल्म देखने के बाद शायद खाना तक खाना मुश्किल लगे, तो आप कल्पना कर सकते हैं कि ये सफाई कर्मी काम के बाद खाना कैसे खा पाते होंगे; कई बार तो उन्हें दिन भर उल्टियां होती हैं।

सीवर में मौत: सर्वोच्च न्यायलय की अवहेलना


दिव्या ने मदुरई, चेन्नई, कोइम्बाटूर, थिरुप्पूर, रामनाथपुरम, थिरुनलवेली जैसे तमाम जिलों में जाकर 20 परिवारों से बातचीत की, जिनके पति, भाई या पुत्र सेप्टिक टैंक साफ करने के लिए अन्दर घुसे और फिर वापस बाहर नहीं आ सके। वे फिसलकर अन्दर ही समा गए, पर अधिकारी ठेकेदारों और सुपरवाईज़रों पर आरोप लगाकर मुक्त हो गए; किसी को सज़ा नहीं मिली। घर की औरतें 10 लाख के मुआवज़े के लिए दलालों और सरकारी अफसरों के पास भटकती रहीं और अक्सर पैसे सबूत के अभाव में नहीं मिले। कभी पैसे मिले तो दलालों ने बड़ा हिस्सा हड़प लिया। सरकारी अफसर अक्सर यह साबित करने में लग जाते कि मौत किसी अन्य कारण से हुई थी। कई बार तो दौड़-भाग करने के बादकेवल 1.5-2 लाख रुपये से अधिक नहीं मिले। घर की औरतें कहती हैं कि जब कमाने वाला ही चला गया तो पैसे लेकर क्या होगा? वे पूछती हैं, ‘‘क्या इस खतरे वाले काम को करने के लिए हम ही बचे हैं; क्या हमारे जान की कोई कीमत नहीं, जो कीड़े-मकोड़ों की भांति मरते रहें? कई कर्मचारी आंध्रप्रदेश से पलायन करके प्रदेश में इस काम को कर रहे हैं, तो उन्हें लोकल समर्थन नहीं मिलता।
भारत में नई सरकार का नया जुमला है ‘स्वच्छ भारत’। तो प्रधानमंत्री सहित कुछ मंत्री, नेता व अधिकारी साफ सड़कों पर झाड़ू फेरते हुए फोटो खिंचवाते हुए मिल जाएंगे। पर कोई इन मृत सफाईकर्मियों के घरों के अंदर पांच मिनट भी बैठ न सकेंगे, उनके दुख-दर्द को बांटना तो बहुत दूर की बात है।

लेखिका कुमुदिनीपति

आत्म-सम्मान का प्रश्न


दिव्या ने फिल्म में इन दलितों के आत्म-सम्मान का प्रश्न भी बहुत संजीदगी से उठाया है-कैसे हर जगह उनका सफाई का काम ही प्रधान बन जाता है। कुछ कर्मियों ने बताया कि उनके बच्चों को स्कूलमें भी सफाई कर्मी समझा जाता है, तो जब पाखाना जाम हो जाता है तो तुरंत प्रशासन उन्हें बुलाकर सफाई करवाने लगता है। उन्हें अछूत समझकर अध्यापक सहित दूसरे बच्चे हेय दृष्टि से देखते हैं।कोई उनके पास बैठना नहीं चाहता, इसलिए वे स्कूल में भी अलग बैठते हैं। इसके कारण बच्चों को स्कूल जाने का ही मन नहीं करता।

कई माताओं ने रोते हुए कहा, ‘क्या हमारी पीढ़ियां कभी इस नारकीय ज़िन्दगी से नहीं निकल पाएंगी?’ उन्हें लगता है कि पढ़कर उनके बच्चे इस कुचक्र से आखिर निकलें भी तो कैसे-वे आरक्षण के बारे में कहते हैं कि उससे भी क्या लाभ हुआ जब उनका सामाजिक दर्ज़ा कभी ऊपर नहीं उठ सकता? कई कर्मचारी महिलाओं ने बताया कि महिलाओं और लड़कियों के मासिक के कपड़ों को, अस्पतालों की गन्दगी और होटलों के सड़े खाने व मरे चूहों को उठाने से संक्रामक रोगों का खतरा रहता है। यह सारा काम हाथ से करना पड़ता है।

देखा जाए तो यह बड़ी विडम्बना है कि आधुनिक भारत के आधुनिकतम राज्य में सूखे शोचालयों की कमी है, खुले में हर प्रकार का कूड़ा फेका जाता है, सीवर साफ करने के लिए मशीनों का प्रयोग नहीं होता है और समाज के एक बड़े हिस्से को इसलिए गंदा माना जाता है कि वे अन्य लोगों के घरों की गंदगी साफ करते हैं। महिलाओं ने बताया कि काम से घर आने पर कई बार बच्चे भी घिना जाते हैं और उनके हाथ से खाना नहीं लेते। अक्सर उनकी बस्तियां शहर से बाहर होती हैं क्योंकि तथाकथित सभ्यलोग उनके आस-पास भी नहीं रहना चाहते।

कक्कूज़ फिल्म में कई सामाजिक कार्यकर्ताओं, ट्रेड यूनियन नेताओं और कर्मचारी नेताओं से बातचीत की गई है। दलित नेता कहते हैं कि डॉ. भीमराव अम्बेडकर की तस्वीरें तो बहुत जगह लगीं हैं पर जाति-विहीन समाज की उनकी परिकल्पना को साकार नहीं किया गया। ट्रेड यूनियन नेता भी कहते हैं कि इतने सारे यूनियन बन चुके हैं, लड़ाई लड़कर कई बार मुआवजा दिलाया जाता है और पगार बढ़वा लिया जाता है, पर सामाजिक सम्मान की लड़ाई जीतने में अभी बहुत समय लगेगा। कर्मचारी बताते हैं कि ट्रेड यूनियन और दलित संगठनों के नेता भी दलाली करते हैं और पैसा कमाते हैं। ‘कक्कूज़’ केअन्तिम सीन में एक तरफ स्वच्छ भारत अभियान के तहत प्रधानमंत्री तक लम्बी झाड़ू उठाए हुए हैंऔर दूसरे फ्रेम में मैला ढोने वाले हाथों से मल साफ कर रहे हैं।



दिव्या के खिलाफ साजिश?
एक साजिश के तहत पहले जुलाई 25 को दिव्या को पुलिस उसके अलंगाकुलम के घर से उठा ले गई।और यह गिरफ्तारी 2009 के एक पुराने केस में दो बार हाज़िर न होने के चलते की गई। दिव्या को जमानत तो मिल गई पर नया केस दर्ज हो गया। हालांकि 3 अगस्त वाले नये केस में मद्रास हाईकोर्ट ने स्टे लगा दिया है लेकिन धमकियां मिलनी बंद नहीं हुईं। उधर, सरकार अलग नाराज है कि जो बातें समाज में ढकी-छुपी हैं उन्हें उठाकर समाज में उथल-पुथल मचाने का हक दिव्या को कैसे प्राप्त हो गया? पर कौन इसका जवाब देगा कि आज भी भारत में 1 लाख 80 हज़ार 6 सौ सत्तावन मैनुअल मेहतर परिवार हैं?

(लेखिका सामाजिक और राजनीतिक विषयों के अलावा महिला अधिकारों के लिए सजग तौर पर लिखती और लड़ती रही हैं। )


साभार:janchowk.com


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9 बिन्दुओं में समझें सुप्रीम कोर्ट का तीन तलाक पर फैसला



स्त्रीकाल डेस्क 


आज, 22 अगस्त, 2017 को देश के सर्वोच्च न्यायालय में मुस्लिम समुदाय ने  प्रचलित तीन तलाक के मुद्दे पर अपना फैसला सुनाया आइये 9 बिन्दुओं में समझते हैं फैसला और कोर्ट रूम गतिविधियों को 


1. 5 संवैधानिक बेंच के तीन जज कुरियन जोसफ, यूयू ललित और आरएफ नरीमन ने  तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया. चीफ जस्टिस जेएस खेहर और अब्दुल नजीर ने अ संसद को इस बारे में कानून बनाने के लिए निर्देश दिया. स्पष्ट है कि बहुमत इसे असंवैधानिक मान रहा था.

तीन तलाक, समान नागरिक संहिता और मोदी सरकार:

2. तीन तलाक का मामला मुस्लिम धर्म की महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन माना जाता है. संवैधानिक बेंच में हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और पारसी धर्म के पांच जज शामिल थे. लेकिन कोई महिला नहीं थी.

मेरा शबाब भी लौटा दो मेरे मेहर के साथ

3. आल इंडिया  मुस्लिम  पर्सनल बोर्ड ने कोर्ट को इस मामले में हस्तक्षेप के योग्य नहीं बताया था. यही उसका पक्ष था, फैसला प्रायः इसके अनुरूप आया. मामला संसद के पाले में. बोर्ड के वकील कपिल सिब्बल ने दलील दी थी  अनुच्छेद-25 यानी धार्मिक स्वतंत्रता के तहत परंपरा की बात है और संविधान पर्सनल लॉ को संरक्षित करता है. 1400 साल से आस्था चली आ रही है. सरकार चाहे तो पर्सनल लॉ को रेग्युलेट करने के लिए कानून बना सकती है. हिंदुओं में आस्था है कि राम अयोध्या में पैदा हुए हैं. ये आस्था का विषय है. अनुच्छेद 14 स्टेट कार्रवाई की बात करता है पर्सनल लॉ की नहीं। सिब्बल ने कहा, ‘तीन तलाक पाप है और अवांछित है। हम भी बदलाव चाहते हैं, लेकिन पर्सनल लॉ में कोर्ट का दखल नहीं होना चाहिए. निकाहनामा में तीन तलाक न रखने की शर्त के बारे में लड़की कह सकती है कि पति तीन तलाक नहीं कहेगा. मुस्लिम का निकाहनामा एक कॉन्ट्रैक्ट है. सहमति से निकाह होता है और तलाक का प्रावधान उसी के दायरे में है.

“चकरघिन्नी” : तीन तलाक़ का दु:स्वप्न

4. सुप्रीम कोर्ट ने यह चिहिनित किया कि पाकिस्तान सहित कई इस्लामिक देश तीन तलाक की अनुमति नहीं देते तो भारत में क्यों नहीं?

5. पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने पहली बार इस पर विचार किया कि तीन तलाक गैर इस्लामिक है.

6. तीन तलाक के खिलाफ अपना पक्ष रखने वाले वकीलों ने इसे महिला के मूलभूत अधिकारों का हनन बताया.

7. मोदी सरकार ने तीन तलाक के खिलाफ कोर्ट आये पेटिशनर के पक्ष में अपनी दलील दी और इसे असंवैधानिक बताया.

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8. सुनवाई के दौरान  कुरान, शरीयत और इस्लामिक कानून के इतिहास पर जोरदार बहस हुई। साथ ही संविधान के अनुच्छेदों पर विस्तार से दलीलें पेश की गईं। संविधान के अनुच्छेद-13 (संविधान के दायरे में कानून) , 14 (समानता का अधिकार), 15 (जेंडर, धर्म, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव के खिलाफ अधिकार), 21 (मान सम्मान के साथ जीने का अधिकार) और 25 (पब्लिक ऑर्डर, हेल्थ और नैतिकता के दायरे में धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार) पर बहस हुई.

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9. याचिकाकर्ता शायरा बानो के वकील अमित चड्ढा ने कहा कि अनुच्छेद 25 में धार्मिक प्रैक्टिस की बात है। तीन तलाक अनुच्छेद 25 में संरक्षित नहीं हो सकता. धार्मिक दर्शनशास्त्र में तीन तलाक को बुरा और पाप कहा गया है. ऐसे में इसे धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के तहत संरक्षित कैसे किया जा सकता है. राम जेठमलानी ने तीन तलाक के खिलाफ दलील पेश करते हुए कहा कि अनुच्छेद-13 के तहत कानून की बात है.  जो भी कानून है वह संविधान के दायरे में होगा. मूल अधिकार का जो कानून, रेग्युलेशन या परंपरा उल्लंघन करेगा वह मान्य नहीं हो सकता.

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स्त्रीवादी कानूनविद  अरविंद जैन से स्त्रीकाल की बातचीत पर आधारित


सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों, जस्टिस जेएस खेहर, जस्टिस कुरियन जोसफ, जस्टिस यूयू ललित, जस्टिस आरएफ नरीमन और जस्टिस अब्दुल नजीर की बेंच ने शायरा बानो, मुस्लिम वीमेनस क्वेस्ट फॉर इक्वालिटी, आफरीन रहमान, गुलशन परवीन, इशरत जहां, अतिया सबरी आदि  द्वारा दायर स्पेशल लीव पेटीशन, जिसमें भारत सरकार, जमायते-उलमा-ए-हिन्द आदि पार्टी बनाये गये थे की सुनवाई करते हुए 22 अगस्त, 2017 को तुरत दिया जाने वाले तीन तलाक को समाप्त करने का निर्णय दिया.

इंडिया टाइम्स से साभार

9 बिन्दुओं में समझें तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला 

395 पेज के ऑर्डर में तीन तलाक को निरस्त करने का फैसला तीन-दो के बहुमत से लिखा गया है. 1937 के शरियत लॉ में यह प्रोविजन (तीन तलाक का) सेक्शन 2 में था, जिसे 5 जजों के बेंच ने आज निरस्त कर दिया. जस्टिस जेएस खेहर और जस्टिस अब्दुल नजीर ने इस प्रोविजन को असंवैधानिक नहीं माना लेकिन यह भी कहा कि यह चूकि महिलाओं के हितों के खिलाफ है इसलिए इस पर सरकार और संसद को क़ानून बनाना चाहिए. इस बीच उन्होंने छः महीने के लिए इस पर रोक लगा दी तथा कहा कि इसे आगे भी बढ़ाया जा सकता है. जस्टिस जोसफ ने लिखा कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही शमीम आरा मामले में कहा है कि शरीयत क़ानून ठीक नहीं है और गैरइस्लामिक है तो फिर बाकी मुद्दों पर बात करने की जरूरत ही नहीं है, इसी आधार पर यह असंवैधानिक भी है. जस्टिस नरीमन और जस्टिस ललित ने कहा कि 1937 का क़ानून 1950 में संविधान बनने के बाद पूरी तरह संविधान के दायरे में आ गया. यह मर्दों को अवैध रूप से तलाक देने का अधिकार देता है इसलिए संविधान की धारा 14 में उल्लिखित मौलिक अधिकारों का हनन करता है, इसलिए यह असंवैधानिक है.

तीन तलाक, समान नागरिक संहिता और मोदी सरकार:

मेरा कहना है कि सरकार द्वारा क़ानून बनाने का जो आदेश दो जजों का है, वह इस पूरे जजमेंट के अल्पमत का निर्णय है, अब सरकार पर निर्भर करता है वह क़ानून बनाये या न बनाये. बहुमत ने कानून बनाने का कोई निर्देश तो दिया नहीं सिर्फ तीन तलाक को निरस्त कर दिया. अब चूकि तीन तलाक का प्रोविजन ही आपने खत्म कर दिया तो कोई और क़ानून तो है नहीं, न तलाक देने का, न लेने का कोई प्रावधान. कोई यदि तीन तलाक दे दे तो फिर सजा का कोई प्रावधान कहाँ है? सारी चीजें हवा में हैं. पति तलाक देगा और औरत बोलेगी कि यह असंवैधानिक है तो पति बोलेगा जाओ कोर्ट. कोर्ट क्या करेगी, क़ानून ही नहीं है. पहले जो मौलवी करते थे, पंच  करते थे, घर-परिवार के लोग करते थे, वे कहेंगे हम भी कुछ नहीं करेंगे जी. पहले मौलवी वैलिड या इनवैलिड कह तो देते थे, अब वे भी नहीं कहेंगे. अब सरकार का क़ानून बनाने की प्रक्रिया जटिल है. क़ानून ड्राफ्ट होगा, समितियां देखेंगी, राज्यों की राय ली जायेंगी. कुछ राज्य स्वीकार करेंगी, कुछ नहीं करेंगी, मामला लटकेगा. तो फिर आप उस कानून को बनायेंगे भी तो 2 साल में बनेगा 3 साल में बनेगा. और अगर सरकार बहुत सीरियस है तो वह ऑर्डिनेंस ला सकती है. भजापा की जो फितरत है उसके अनुसार ये कानून बनाने का एक नाटक करेंगे लेकिन अंततः कोई कानून नहीं बनायेंगे यह सच्चाई है.

मेरा शबाब भी लौटा दो मेरे मेहर के साथ

महिलायें पहले से बदतर स्थिति में हैं. पहले कम से कम पता होता था कि तलाक मिल गया, तो दूसरी शादी कर सकती थीं, मुक्त हो सकती थीं,  नौकरी कर सकती थीं,  जो भी करना था कर सकती थीं. अब तलाक मिलेंगे नहीं लेकिन घर में ही नमक की सप्लाई बंद कर देंगे, हम उन्हें रोटी कपड़ा मकान नहीं देंगे, जो दूसरी सुविधाएँ हैं वह नहीं देंगे, भूखी मारेगी घर में. तलाक देंगे नहीं और सुविधाएं सारी छीन लेंगे.  तलाक तलाक दिए बिना दूसरी शादी कर लेंगे. बहुविवाह तो वहां पहले से ही है अब कोई डर भी नहीं रहेगा. अब तलाक ही नहीं होगा तो मेंटेनेंस भी नहीं है या मुकदमे चलते रहेंगे सालों साल लड़ते रहेंगे, 20 साल तक लड़ेंगे.  तो मुझे लगता है कि ये सदियों पुराना तीन तलाक (तालाब) का क़ानून था, उसे बंद कर दिया. नई प्रक्रिया में गड्ढा तो खोद दिया लेकिन उसमें पेड़ (नया क़ानून) कब लगेगा कोई नहीं जनाता. इस बीच बारिश के मिट्टी और पानी से कीचड़ होने का भय है और किसी के भी गिरने का ख़तरा बना रहेगा- टोटल मेस.

“चकरघिन्नी” : तीन तलाक़ का दु:स्वप्न

मैं यह पूछता हूं कि जैसा सरला मुद्गल केस में सुप्रीम कोर्ट ने समान नागरिक संहिता बनाने के लिए कहा था उसे बनाने की बात भाजपा सरकार क्यों नहीं करती है? समान नागरिक संहिता बनती है तो धर्म और जाति से परे सारे पर्सनल क़ानून खत्म हो जायेंगे. जो भी क़ानून बने, तलाक, विवाह, मेंटेनेंस आदि के वह सभी महिलाओं के लिए- हिन्दू महिलाओं के लि , मुस्लिम महिलाओं के लिए, ईसाई महिलाओं के लिए भी, जैन महिलाओं के लिए भी समान हो. तब जाकर कहीं समानता बनेगी.

प्रधानमंत्री को मुस्लिम महिला आंदोलन का पत्र/ तीन तलाक से निजात की मांग

कॉमन सिविल कोड बनाने की बात तो बहुत करती रहती है सरकार या भाजपा ,पर कितनी सीरियस है अभी तक तो नहीं दिखाई देता. वरना तो 3 सालों में वह सिविल कोड बनने में कितनी देर लगाती. वे अपनी राजनीति कर रहे हैं बुर्के की आड़ में वोट बैंक की राजनीति. बहुमत सत्ता में है इसलिए अल्पसंख्यकों की रिवाजों को, धर्मों को कटघरे में खडा किया जा रहा है, इनका इरादा इतना भर है.

#टॉक.. सेक्स स्त्री यौनिकता का उत्सव अभियान

इन दिनों हैश टैग टाक सेक्स सोशल मीडिया पर वाइरल हो रहा है. यह लन्दन के 23, पॉल स्ट्रीट के “स्कारलेट लेडिज” के भव्य बुटिक से उठ रही महिलाओं की आवाजें हैं जो 23 अगस्त को औपचारिक रूप से हैश टैग टॉक सेक्स अभियान शुरू करने वाली हैं. “आवाज़ अनेक सन्देश एक” के नारे के साथ इस अभियान से जुड़ने का आह्वान किया गया है. इसमें हर जगह की “सामान्य” महिलाओं के जीवन और शरीर की फोटो प्रदर्शनी के साथ-ही-साथ वैसी मज़बूत और सक्षम महिलाओं से बातचीत और जुड़ने का मौक़ा है जो इस दुनिया को बदलने के लिए कृत संकल्प हैं. इसमे लिखा हुआ है ए टूर ऑफ़ 23, पॉल स्ट्रीट, स्कारलेट लेडिज होम एंड लन्दन मोस्ट इथिकल हॉउस ऑफ़ स्ट्रिप टीज. ( 23,पॉल स्ट्रीट की यात्रा  लंदन के  सबसे नैतिक स्ट्रिप टीज घर की सैर). अपनी आपबीती साझा कीजिए #TalkSex वाल  (क्लिक करें)  पर.

इस वैभवशाली बुटिक घर से आ रही आवाजें उनकी हैं, जहाँ पर स्कारलेट लेडिज की सदस्य स्त्रियाँ प्रत्येक बुद्धवार को अपनी यौनिकता पर खुल कर बहस करती हैं, सेक्स के उपर बातचीत करती हैं, आराम फरमाती हैं, अपनी निजी और गुप्त बातें साझा करती हैं. अपनी यौनिकता से उभरे दाग-धब्बों और समस्याओं पर खुलकर चर्चा ही नहीं करती बल्कि अपनी खूबसूरती और अपने यौनिकता के आनंद और अपने शरीर से प्रेम के सन्देश को दुनिया तक पहुंचाना चाहती हैं जिससे दुनिया के हर हिस्से की महिलाएं स्वयं को सार्वभौम बहनापे से खुद को जोड़ते हुए अपने आप को सशक्त कर सकें. ताकि इस पितृसत्तात्मक समाज द्वारा स्त्रियों को उनकी ही यौनिकता से कैद कर दिए जाने की साजिश से मुक्त हो सकें.

यौनिकता की विश्वसनीय दृश्यता

स्कारलेट लेडिज के इस वैभवशाली घर के पीछे का इतिहास भी बड़ा रोचक है. 18 वीं सदी में एक कुख्यात फ़्रांसिसी दार्शनिक-साहित्यकार हुए, जिनका नाम था मर्क़ुएश दि सादे ( Marquis De Sade ). ये सुखवाद के पक्के समर्थक और यौनिक नैतिकता के सबसे बड़े आलोचक थे. ये अपने कामुक और रत्यात्मक लेखन के लिए जाने जाते हैं. जिसमें पोर्नोग्राफी का दार्शनिक विमर्श, यौन फंतासियों– जिसमें  हिंसा, अपराध, ईश निंदा के साथ -साथ क्रिश्चानिटी का विरोधी साहित्य भी शामिल था. “सैडिज्म” और “सैडिस्ट” शब्द भी इन्हीं के नाम पर बने हैं.

 इनकी एक बहुत प्रसिद्द पुस्तक का नाम है “फिलोसोफी इन द बेडरूम”. इसमें इन्होंने एक ऐसे छोटे कमरे या जगह के बारे में लिखा है जो महिलाओं की गुप्त और रहस्यमयी बातों की जगह है. और इस जगह ने समय के साथ एक ऐसी ख्याति प्राप्त कर ली है जहाँ स्त्रिया गंदे काम करती हैं, गन्दी बातें करती, केलि करती हैं जो समाज में लज्जाजनक हैं. आधुनिक समय में इस तरह से स्त्रियों का सुसज्जित निजी बैठका या सलून जहाँ सिर्फ स्त्रियों का वर्चस्व है, जहाँ अपनी मर्ज़ी की हर चीज़ करने को वह स्वतंत्र हैं. आधुनिक अर्थों में बुटीक या सलून जहाँ उच्च घराने की स्त्रियाँ स्नान करती हैं, सजती-संवरती हैं और अपने आनंद का समय बिताती हैं. फ़्रांसिसी शब्द बौदियार (boudoir)  अंग्रेजी के बोवर (bower) का समतुल्य है जिसका अर्थ भी यही है.



रीतिकाल में स्त्रीं-यौनिकता का सवाल उर्फ देह अपनी बाकी उनका
तो इस घर ने मूलत: एक ऐसी ख्याति प्राप्त की हुई है जो तथाकथित नैतिकता और सामाजिक मान्यताओं को तार-तार करता रहा है. जहाँ पुरुषों का प्रवेश पूर्णत: वर्जित है बिना किसी अपवाद के. दुनिया की वह हर एक स्त्री जो पुरुषों द्वारा और इस पितृसत्ता द्वारा बनाई धारणाओं और उनके द्वारा थोपी गई वर्जनाओं की वजह से त्रस्त है वह स्त्री अपनी यौनिकता पर आरोपित बदनुमा दाग से, मानसिक गुलामी, झिझक, अनावश्यक रूप से सचेत रखने और एक अलग अनुशासन के बोझ तले दबी हुई है, जिसकी वजह से स्त्रियाँ स्वयं अपनी खूबसूरत देह का ध्यान नहीं कर पातीं, उसका उल्लास और आनंद नहीं मना पातीं, वे इसी तरह के स्थान से मुक्ति की शुरुआत कर सकती हैं. स्कारलेट औरतें मानती हैं कि स्त्री यौनिकतता प्रकृति की एक अनुपम देन है जो विशिष्ट रूप में स्त्रियों को ही मिला है. लेकिन इस समाज ने हमारे इस प्राकृतिक अधिकार पर बेड़ियाँ बाँध रखी हैं. मनुष्य होने के नाते यह सहज और प्राकृतिक है. हम ये नहीं कहती कि जीवन में सब कुछ सेक्स ही है. लेकिन जहाँ तक हमारी निजी पहचान और अस्मिता का सवाल है महिलाओं का कोई सशक्तिकरण अबतक नहीं हो पाया है और ना ही समाज में जेंडर समानता आई है. क्यूंकि इसे अबतक छुपाकर और दबाकर रखा गया है.



हैश टैग टॉक सेक्स से सोशल मीडिया पर वायरल इस अभियान का केंद्रीय विषय है कि स्त्री यौनिकता कोई गंदा रहस्य नहीं है जिसे गुप्त रखा जाए बल्कि यह हमारा भाग है जिससे हमारा वजूद जुड़ा है. इस अभियान का उद्देश्य है कि केवल बातचीत की ताक़त के माध्यम से औरतों की एकता बने और वे खुलकर अपनी उन भावनाओं को, चाहतों को उजागर कर सके जो वास्तव में उनके भीतर है और वैसा ही वो चाहती भी हैं पर समाज के बनाए नीति-नियमो और लोक-लाज के भय से अपनी यौनिकता का उत्सव मनाने और उसके आनंद से वंचित रह जाती हैं. स्कारलेट लेडिज यह समझती और मानती हैं कि दुनिया के हर हिस्से की महिलाएं अपनी  सेक्स जरूरतों, अपनी पसंद-नापसंद और अपने अनुभवों को साझा करें. सिर्फ बातचीत के माध्यम से उनके अन्दर एक आत्मविश्वास और मजबूती का भाव जगे और वे खुद को, अपने शरीर को, अपनी यौनिकता से प्रेम करना सीख सकें जिसका वे वास्तव में अंग हैं.

बलात्कार पीड़ित स्त्री से लेकर दाम्पत्य जीवन में सिर्फ सेक्स गुलामी भर करनेवाली औरतों और वे जो अपने को तथा अपनी बेटियों को मजबूत बनाना चाहती हैं और ऐसी लड़कियां जो अपने शरीर के खुबसूरत लोच को बरकरार रखना चाहती हैं उन सबके लिए यह अभियान है. इसकी सह संस्थापिका  जेनेट डेविस मानती हैं कि सेक्स पर बात करो “क्यूंकि यह मुझे पसंद है”… “क्यूंकि बलात्कार मेरा हुआ”…”क्यूंकि कुचली मैं गई”…..”क्यूंकि लैंगिक भेदभाव और शोषण की शिकार मै होती हूँ रोज़”—ये सब अनेक कारणों में कुछ हैं जिनकेलिए हमारा अभियान या विश्वास करता है कि सेक्स के बारे में बात करना ही महत्वपूर्ण है.
इस हैश टैग सेक्स टाक अभियान के साथ दो प्रसिद्द बौदियार फोटोग्राफर फैबी और कार्लो भी जुडी हैं जिनका मानना है कि स्त्री सशक्तिकरण में उनकी महती भूमिका हो सकती है क्यूंकि वह अपनी संवेदनशील फोटोग्राफी के जरिये वह उन महिलाओं की निजी, सुन्दर और सौम्य फोटो दिखाकर उनके भीतर आत्मविश्वास भर सकती हैं ताकि वे स्वयं से प्यार कर सकें और अपनी यौनिकता का सम्मान कर सकें और उनका आनंद ले सकें.


राजीव सुमन स्त्रीकाल के संपादन मंडल में है.
संपर्क:9650164016

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
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सीवर में मौत: सर्वोच्च न्यायालय की अवहेलना

रजनीतिलक

रविवार (20 अगस्त) को जब सारी दुनिया अपने घर में बैठ कर अपने बच्चों के साथ छुट्टी मनाती है तब लोक नायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल के सीवर सफाई हेतु चार कर्मचारियों को सीवर में सफाई के लिए उतारा गया जिनको कोई सुरक्षा उपकरण उपलब्ध नहीं कराये गए. बहुत ही गैर जिम्मेदाराना कृत्य बार-बार दुहराया जा रहा है.पिछली बार 6 अगस्त को भी रविवार था जब लाजपतनगर में तीन लोगो को सीवर में उतारा गया था.


12 अगस्त को आनंद विहार में दो कबाड़ा चुनने वाले दो भाइयो को गटर में उतारा गया,जबकि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के अनुसार किसी भी कर्मचारी को बिना सुरक्षा उपकरण के सीवर में नहीं उतारा जा सकता.दूसरा, विशेषतः रविवार जो किसी भी तरह से वर्किंग डे नहीं होता, प्राइवेट ठेकेदारों द्वारा इस तरह का अभ्यास सफाई कर्मचारियों के जीवन से न केवल खिलवाड़ है,बल्कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना भी है.

जिन चार लोगों को अस्पताल के गेट न. दो, वार्ड न. 14 के सामने उतारा गया था, वे थे  ऋषिपाल उम्र 40 व, विशन पाल 30 वर्ष, किरण पाल- 25 वर्ष और सुमित 30 वर्ष के थे,अंदर जाते ही सफाईकर्मियों के साथ हमेशा के हादसे की तरह वे लोग जहरीली गैस की चपेट में आकर बेहोश हो गये.दिल्ली पुलिस एवं अग्नि शमन की मदद से उन्हें बाहर निकाल कर अस्पताल में दाखिल कराया गया. उनमें से इक ऋषिपाल को मृत घोषित कर दिया बाकी तीन का इलाज चल रहा है.  मौत के गटर में उतारने की या कोई पहली घटना नहीं है राजधानी  दिल्ली में इन घटनाओं की पुनरावृत्ति सरकारी असक्षमता और इन कर्मचारियों के प्रति गहरी असंवेदना प्रकट होती है.

12 अगस्त 2017 को आनंदविहार इलाके में शापिंग माल के सीवर की सफाई कर रहे तीन कर्मी जहरीली गैस के कारण बेहोश हो गये. तीनो को निकालने गये दमकल विभाग से सीवर में उतरे हवलदार महिपाल भी बेहोश हो गये.  सीवर में मौत कोई नयी घटना नहीं है. प्रभात खबर के अनुसार (9 अगस्त 2017 )एक सरकारी रिपोर्ट बताती है कि अब तक  22,327  सफाई कर्मी लोगो की मौत सीवर में दम घुटने से हुई  है. 14  जुलाई 2017  को दक्षिण दिल्ली के घिटरोली गावं में चार सफाईकर्मी जिनका नाम, स्वर्णसिंह, अनिल कुमार, दीपू, बलविंदर था की मृत्यु सैप्टिक टैंक सफाई में दम घुटने की वजह से हुई थी. अभी एक माह भी नहीं हुआ कि दूसरी घटना लाजपत नगर में 6 अगस्त 2017 की सुबह फिर से दुहरा दी गयी. सीवर, सैप्टिक टैंक सफाई का चार्ज दिल्ली जलबोर्ड के आधीन होता है, जिसकी जिम्मेदारी सम्बन्धित इन्जिनियर और जलबोर्ड अधिकारियों की होती है.



निजीकरण के दौर में आजकल अनुभवहीन सवर्ण ठेकेदारों के जिम्मे इस काम को सौप कर अधिकारी व इंजीनियर निश्चिन्त हो गये है. ज्ञातव्य है सन 2013  में सर्वोच्च न्यायालय ने मैनुअल स्क्वैन्जर एंड रिहैब्लटेशन एक्ट 2013  के  तहत किसी भी कर्मचारी को बिना किसी सुरक्षा कवच के सीवर में उतारना गैर क़ानूनी कर दिया था.  सीवर में मरने वालो के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 10 लाख की राशि परिवार के लिए निश्चित भी की थी. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश की खुले आम अवहेलना और अवमानना जा रही है, यंहा तक कि सफाईकर्मी को धडल्ले से सीवर में उतार दिया जाता है जिसका परिणाम उनकी भयंकर मौत के रूप में आये दिन देखने को मिल रही है. हर घटना में सफाई कर्मी की मृत्यु के बाद दो दिन की सुर्खियों  पर बहस होती है उस बहस और उनकी मौत को नजरअंदाज करके फिर से सफाईकर्मी को कहीं पर भी बेधड़क सीवर में उतार दिया जाता है. ठेकेदारों और जलबोर्ड के अधिकारियो की संवेदनहीनता दृष्टिगत हो उठती है, उनका जातिवादी चेहरा भी उभर कर आता है.

लाजपतनगर में सीवर में उतरे तीनो युवक डेली वेजेज पर थे. उन्हें इस काम के बदले 300-350/ रूपये दीये जाते थे. एक कर्मचारी  मंथली सैलरी पर था, जिसकी तनख्वाह 8000/ थी लेकिन उसे 2000-5000/  रूपये तक ही मिलते थे. सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम वेतन भी इस अस्वच्छ कार्य हेतु नहीं दिया जाता. तीनो कर्मचारियों  की उम्र 20 -32 वर्ष थी. चौथा कर्मचारी राजेश, जो तीनो की खोज खबर लेने सीवर में उतरा था,  वह भी  उतर कर  कर बेहोश हो गया जिसे आम जनता एवं पुलिस ने अपनी मशक्कत से बाहर निकालाकर अस्पताल में दाखिल किया गया तत्पश्चात इलाज के बाद थोडा स्वस्थ हुआ.

चार सदस्यीय दल सफाई कर्मचारी आयोग के नेतृत्व में तीनो कर्मचारियों के घर पर उनके परिवारों से मुलाक़ात करने और मौके पर घटी घटना की जानकारी लेने पहुंचा. सबसे पहले हम लोग पूछ-पूछ कर कल्याणपुरी मन्नू के घर गये. छोटी-छोटी तंग गलियों से गुजरते हुए हमें एसा लगा की हम स्वयं किसी गटर से गुजर रहे है. इन गलियों से एक साथ तीन व्यक्ति एक साथ नहीं चल सकते. ऊपर की छतों से गलिया पटी हुई थी. गलियां पार करके हम एक पार्क में पहुंचे. पार्क तो नाम का था दरअसल वह एक खुली जगह थी, जिसके एक तरफ वाल्मीकि समाज रहता है. एक हजार परिवार का वाल्मीकि समाज इस दमघोटू माहौल  में रहने का अभ्यस्त दीखा.



ज्यादातर लोग सफाई के काम में लिप्त है यंहा करीब 200 महिलायें भी बाहर जा कर सफाई का काम करती है.  मोनू के घर के सामने भरी धुप में एक सस्ता सा सामियाना टंगा हुआ था. एक तरफ महिलाए बैठ कर रो रही थी, तो थोड़ी दूरी पर परिवार व समाज के कुछ पुरुष बैठ कर बीडी पी रहे थे. मोनू, पुत्र श्री फूल सिंह उम्र 22 वर्ष के दो बच्चे हैं-गोद में एक बेटी जो अभी केवल ढाई महीने की है और एक बेटा  जो डेढ़  साल का है. उसकी पत्नी प्रीति 20 वर्ष की हैं,  जिसने अभी जीवन के कोई सुख नहीं देखे हैं,  गोद में दो बच्चो को ले कर विधवा हो गयी. अन्नू बेरोजगार था अतः डेली वजेज पर इसी तरह के काम करने चले जाता था. बीबी बच्चो के साथ साथ बुजुर्ग माँ-बाप की जिम्मेवारी भी उसके सर पर थी. सरकार और ठेकेदारों की मिली भगत से इस परिवार का एक जिम्मेदार कमाने वाला नौजवान जवानी आने से पहले ही दुनिया से सिधार चुका है.


मोनू के घर की हालत जान कर दुखी मन से हम सीवर सफाई के दूसरे शिकार जोगिन्दर के घर खिचड़ीपुर की झुग्गियो में गये, जहां पहले से ही केंद्र सरकार के एक संसद सदस्य, अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष वंहा पहुंचे हुए थे. उनके वंहा जाने के बाद जोगिन्दर के बारे में पता चला कि उसकी उम्र 32 वर्ष थी और बेरोजगारी के आलम की वजह से उसने शादी ही नहीं की थी. खिचड़ीपुर में वाल्मीकि समाज की करीब 600 घर थे. यंहा भी ज्यादातर लोग सफाई के काम में लिप्त है. यंहा की 60 प्रतिशत महीलायें भी बाहर काम करने जाती रही हैं.
जोगिन्दर के घर से निकल कर हम लोग तीसरे केस दल्लू पूरा के दुर्गा पार्क में अन्नू के घर गये. यह एक मिक्स आबादी का घर था. कोन पर एक दूकान है. हमने उनके घर के बारे में पूछा तो गली में खड़े एक नौजवान ने इशारा करके हमें घर बताया, यह युवक दैनिक जागरण का फोटो ग्राफर था, सरकार की टीम का इन्जार कर रहा था. हमने घर पर दस्तक दी तो एक युवक बहर आया तो हमने बाते की किहम अन्नू के बारे में जाननेआये है. हम जैसे ही घर में प्रवेश कर रहे थे तो बीच में ही हमे खुला शिट देखा, हम उसे पार करके घर में बैठे तो पता चला कि अन्नू की उम्र 28 वर्ष थी उसकी पत्नी की उम्र 27 साल है. उनका  छ साल का बेटा भी है. अन्नू मासिक तनख्वाह पर था लेकिन उसे कभी पूरी तनख्वाह नहीं मिली- कभी  2000/, कभी 4000/, कभी 5000/ से ज्यादा उसे तनख्वाह नहीं मिली. उसकी पत्नी ने बताया कि घर खर्च चलने के लिए वो अपने मायके से वितीय मदद लगातार लेती रही है, यहाँ तक कि बिजली का बिल और बच्चे की ५००/ फीस अपनी माँ और भाई से लेती है.

रक्षाबंधन पर मिली भाई की लाश, बहने बाँध न सकी राखी

6 अगस्त की सुबह तीनो कर्मचारी घर से यह कह कर निकले कि कल रक्षाबंधन है बहनें घर आएंगी तो काम करके थोडा पैसा हाथ में आ जाएगा तो त्यौहार मना लेंगे. अनुसूचित जातियों में ज्यादातर उप-जातियां हिन्दू परम्परा और त्यौहार मनाने के अभ्यस्त हैं, क्योंकि वे खुद को हिन्दू ही मानते रहे है. तीनो कर्मचारी जब शाम तक घर नहीं लौटे तो यही समझा गया कि अपने दोस्तों के साथ मौज मस्ती कर रहे होंगे. रात के दस बजे पुलिस का फोन अन्नू की पत्नी रेखा को आया कि आपके पति बीमार हैं,  लाजपत नगर अस्पताल में, सुबह आ जाना. पता पूछने पर कोई जबाब नहीं दिया गया. सुबह 10 बजे दुबारा से किसी का फोन आया कि अस्पताल से बॉडी ले जाओ. दिनभर और रात भर पुलिस और जलबोर्ड ने यह सूचना  घरवालों से छुपा  कर रखी कि उनकी जीवन लीला 6 अग्स्त की दोपहर समाप्त हो चुकी थी. ये कैसी विडंबना है? 7 अगस्त जब बहनें राखी बाँधने भाइयों के घर आई तो उन्हें भाई की कलाई पर राखी नहीं कफन देखने को मिला. यह खबर क्यों छुपायी गयी? क्यों परिवार को अँधेरे में रक्खा गया? ऐसा सदमा परिवार को क्यों दिया?

सीवर में मौत शाहदत क्यों नहीं मानी जाती?


देश में तीन लोग महत्वपूर्ण है. सफाई कर्मचारी- किसान और बार्डर पर सैनिक. किसान अन्न उगा कर देश का पेट भरता है और सफाई कर्मचारी देश के भीतर खुद अस्वच्छ प्रक्रिया से गुजर कर देश को साफ सुथरा रखता है, नाली, सीवर, सैप्टिक टैंक, गटर मैनहोल साफ रखता है. बॉर्डर पर सैनिक को सम्मान जनक तनख्वाह, पेंशन, शहीद होने पर विधवा को कोटे से पैट्रोलपम्प आदि दिया जाता है ताकि उसका परिवार एक सम्मानजनक जिन्दगी जी सके और और उसके बच्चों का भविष्य उज्जवल हो सके. पिछले वर्ष बॉर्डर पर 60 जवान शहीद हुए जबकि उनकी तुलना में देश के भीतर 1471 सफाईकर्मी मौत के घाट उतर गये. यह दोगला व्यवहार क्यों? सफाई कर्मी को न यूनिफार्म है, न ईएसआई सुविधा, न नयूनतम वेतन, न सम्मानजनक व्यवहार, न ही मरने के बाद उनके बच्चो के भविष्य की सुरक्षा ? ऐसा क्यों? क्या हम आज के लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुश्तैनी धंधो को क्या जातिगत पेशे में  सुरक्षित रखना चाहते है? क्या सफाई कर्मचारी इस देश का नागरिक नहीं? सफाई कर्मचारियों के लिए  सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गये आर्डर की अवहेलना क्यों की जा रही है ? आनदविहार, लाजपत नगर और घिटोरनी में हुई लोगो की मौत के बाद उनकी पत्नियां जो विधवा हो गयी हैं, गोद में छोटे-छोटे बच्चे जिन्हें अभी अपने पिता के होने न होने का अहसास भी नहीं है तमाम उम्र बिना पिता के रहना पड़ेगा, इन सबका जिम्मेवार कौन है? वर्तमान सरकार का दायित्व है कि इस पर अपनी पैनी नजर रख कर पीडितो को न्याय दिलाये और अपराधियों को सख्त से सख्त सजा दिलाये.

कुछ सवालों पर विचार किये जाने की सखत जरुरत है

 -गटर, सीवर, मैनहोल, सैप्टिक टैंक की सफाई अनिवार्य रूप से मशीनों से करवाई जाए.

– ठेकेदारी व्यवस्था समाप्त की जाए, सफाई कर्मियों की भर्ती स्थायी की जाए. सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागु किया जाए. महिला कर्मचारियों  के लिए शौचालय, खाना खाने व बैठने की जगह की व्यवस्था की जाए. उनके बच्चो के लिए क्रेच व बच्चो  के लिए खेलने व पढने की व्यवस्था की जाए. महिलाओ को प्रसूति अवकाश वेतन सहित दिया जाए, एवं एबोरशन लीव भी मुहैय्या हो. रोजी जिदारो एवं अस्थायी कर्मचारियो  को न्यूनतम वेतन दिया जाए  चिकित्सा सुविधा, युनिफोर्म, जूते ,एवं कार्यस्थल पर उपयोगी वस्तुए उपलब्ध हों. जीपीएफ,लोन, एच.आर.ए एवं अन्य वितीय सुविधा अन्य सेवाओ की तरह सुगम की जाए  रिटायर्मेंट पर उनका पूरा पैसा दिया जाए और पेंशन भी नियमित रूप से दी जाए.

 रिपोर्ट : रजनी तिलक (लेखिका एक्टिविस्ट दलित स्त्रीवादी ) 
(जांच दल के सदस्य :- सफाई कर्मचारी आयोग के अध्यक्ष श्री संतलाल चावारियाजी
श्री राजपाल , अ.भा. मजदुर संघ . पवन परचा 
सन्दर्भ : प्रभात खबर , जनसत्ता, और भुक्तभोगी परिवारों से सीधी मुलाकात 



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सुधा अरोड़ा की कहानियाँ :स्त्री नारी अस्मिता की संघर्ष-गाथा



पूर्णिमा रानी
प्रस्तावना
“हे स्त्री ! तू स्वयं को पहचान, तू सिंहस्वरूपा है। तू शत्रु रूपी मृगों का मर्दन करने वाली है। स्वयं में सामर्थ्य उत्पन्न कर। हे नारी ! तू अविद्या आदि दोषों पर सिंहनी की तरह टूटने वाली है। दिव्य गुणों के प्रचारार्थ स्वयं को शुद्ध कर। हे नारी ! तू दुष्कर्म एवं दुर्व्यसनों का सिंहनी के समान विध्वंस करने वाली है। धार्मिक जनों के हितार्थ स्वयं को दिव्य गुणों से अलंकृत कर।”1

यजुर्वेद के पाँचवें सूक्त के दसवें मंत्र का उक्त उद्बोधन इस तथ्य की ओर संकेत करता है कि भारतीय संस्कृति में वैदिक युग से ही नारी महत्त्वपूर्ण भूमिका में थी। धार्मिक कर्मकाण्ड हो या शिक्षा का क्षेत्र, सामाजिक संस्कार हो या परम्परागत आयोजन, नारी को प्रत्येक क्षेत्र में विशिष्ट स्थान प्राप्त था। स्त्री के कर्तव्य एवं अधिकार पुरुषों के समकक्ष थे। सिन्धुघाटी सभ्यता से प्राप्त मातृदेवी की मूर्तियाँ, वैदिक मंत्र एवं पौराणिक आख्यान नारी के शक्तिशाली तथा दैवीय स्वरूप को व्याख्यायित करते हैं। पौराणिक पुरुष राम शत्रु पर विजय प्राप्त करने हेतु शक्ति का आह्वान करते हैं और शक्ति के सहयोग से ही शत्रु पर विजय प्राप्त कर पाते हैं.

स्त्री की इस प्रतिष्ठित सामाजिक स्थिति में परिवर्तन का संकेत पहले-पहल महाभारत काल में देखने में आता है जहाँ परम्पराओं व रूढ़ियों में उलझी द्रौपदी सहधर्मिणी नहीं वरन् व्यक्तिगत संपत्ति है जिसे निस्संकोच दाँव पर लगा दिया जाता है। मध्ययुगीन समाज में नारी की दशा अपेक्षाकृत अधिक शोचनीय हो गई। अब उसके हिस्से में अधिकार के नाम पर मात्र दासता थी और कर्तव्य के नाम पर पुरुष व परिवार की सेवा। उन्नीसवीं शताब्दी तक आते-आते नारी मानवी से उपभोग की वस्तु बन गई। अपनी शारीरिक दुर्बलता और पितृसत्तात्मक समाज की अहंवादी सोच के कारण नारी की जीवन-यात्रा सामाजिक बन्धनों, कठिनाइयों तथा शोषण के दौर से गुजरी।

स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् विभिन्न नारी-सुधारवादी आन्दोलनों के प्रयासों तथा शिक्षा के प्रचार-प्रसार के कारण समाज और विशेष रूप से नारी वर्ग की सोच में क्रान्तिकारी परिवर्तन आया। विरोधों के मकड़जाल से संघर्ष करती नारी अब ताल ठोककर नारी-अस्मिता के रक्षार्थ प्रयास करने लगी। यह प्रयास समस्त नारी-वर्ग के लिए एक जागरण गीत बन गया। चूँकि, साहित्य समाज सापेक्ष होता है, इसलिए बदलते परिवेश में वह नारी विषयक दशा में परिवर्तन की उपेक्षा नहीं कर सका तथा इस चुनौती का सामना करने के लिए तत्पर हो गया। नारी के उत्पीड़न तथा संघर्ष ने साहित्यकारों को उद्वेलित कर दिया। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से नारी की स्वाधीनता व पराधीनता से जुड़े रहस्यों पर से पर्दा हटाते हुए पुरुष-प्रधान समाज में नारी की वास्तविक स्थिति और उसमें नारी की भूमिका पर साफगोई के साथ अपने विचार प्रकट किए।

सातवें दशक की कथा लेखिका सुधा अरोड़ा ने स्त्री-जीवन के विविध पक्षों को बड़ी संवेदनशील दृष्टि से देखा, परखा और अत्यन्त सादगी के साथ अभिव्यक्त किया। “सुधा अरोड़ा की कहानियाँ स्त्री जीवन के किसी अनछुए कोमल पक्ष को अभिव्यक्त करती कर्णप्रिय लोकगीत-सी लगती है। …….. इन कहानियों में लेखिका ‘दर्दमंद’ स्त्रियों की दरदियाँ बनकर अगर एक हाथ से उनके घाव खोलती हैं तो दूसरे हाथ से उन्हें आत्मसाक्षात्कार के अस्त्र भी थमाती हैं जिससे ये स्त्रियाँ भावात्मक आघात और संत्रास से टूटती नहीं बल्कि मजबूत बनती हैं।”2

सुधा अरोड़ा ने समाज के वर्चस्ववादी केन्द्रों पर निशाना साधा। उन्होंने स्वयं के देखे व भोगे हुए यथार्थ को अपनी कहानियों में अभिव्यक्त किया मानो वह रचना नहीं वरन् आईना हो। अपने लेखन में सुधा अरोड़ा ने पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, पारम्परिक व पितृसत्तात्मक व्यवस्था के मुद्दों एवं चुनौतियों को आधार बनाकर नारी-जीवन के प्रति चिन्ता प्रकट की और नारी-जीवन की विसंगतियों, आर्थिक स्वायत्तता, स्त्री-पुरुष अन्तःसम्बन्ध, परम्पराओं एवं आधुनिकता के द्वन्द्व को अपनी कहानियों के माध्यम से प्रस्तुत किया।

सुधा अरोड़ा के नारी-पात्र शिक्षित हैं, वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर भी हैं किन्तु कहीं-न-कहीं अपने ही निर्णयों के प्रति असमंजस की स्थिति में है। उनकी कहानी ‘महानगर की मैथिली’ की नायिका चित्रा एक ऐसी नारी है जो अर्थसंघर्ष व ममता के बीच जूझती रहती है। मैथिली की देख-रेख के लिए अच्छी आया न मिलने के कारण चित्रा बार-बार नौकरी छोड़ने का विचार करती है किन्तु “हर बार महानगर का अर्थशास्त्र उसे मात दे जाता था।”3 यद्यपि चित्रा को यह दोहरा व्यक्तित्व व्यथित कर रहा था फिर भी उसका आत्मबल उसे टूटने नहीं देता।


परम्परागत पुरुष-प्रधान समाज में नारी एक मूक पशु की तरह जीवन जी रही है। ‘नमक’ कहानी की नायिका सिया अपनी इच्छा को कह नहीं पाती। सिया शिक्षित है और स्कूल में नौकरी करना चाहती है किन्तु उच्च पदस्थ साहब अपनी पत्नी को घर की चौखट लाँघने नहीं देना चाहते। वे कहते हैं – “स्कूल में नौकरी ? ….. तुम्हारे नाम से कंपनी खोल दी मैंने। मेरा दोस्त उस कंपनी का सब कुछ देखेगा। तुम्हें सिर्फ मालिक की तरह चेक दस्तखत करने होंगे।”4

एक ओर पितृसत्तात्मक समाज अपनी अहंवादी सोच से नारी जीवन को प्रभावित कर रहा है तो दूसरी ओर नारी-शोषण की सक्रिय एजेंट के रूप में नारी ही नारी की शत्रु बन बैठी है। वंश चलाने की धारणा ने एक ऐसा चक्रव्यूह रच दिया है जिससे नारी की मानसिकता उबर ही नहीं पा रही है। सुधा अरोड़ा की कहानी ‘बड़ी हत्या, छोटी हत्या’ में सास को जब दाई ने लड़की होने की सूचना दी तो “सास ने चिलम सरकाई और बँधी मुठ्ठी से अँगूठे को नीचे झटके से फेंककर मुठ्ठी खोलकर हथेली से बुहारने का इशारा कर दिया – ‘दाब दे’। ………. जैसा बोला वैसा कर। बीस बरस पाल-पोस के आधा घर बाँध के देवेंगे, फिर भी सासरे वाले दाण-दहेज में सौ नुक्स निकालेंगे और आधा टिन मिट्टी का तेल डाल के फूँक आएँगे। उस मोठे जंजाल से तो यो छोटो गुनाह भलो।”5


 ऐसी मानसिकता से स्वयं नारी प्रभावित है। सुधा अरोड़ा की कहानी ‘तीसरी बेटी के नाम – ये ठण्डे, सूखे, बेजान शब्द’ में सुनयना के जन्म पर बूढ़ी बुआ ने जैसे ही चद्दर हटाई तो अपनी कुत्सित मानसिकता का परिचय देती हुई बोली – “हाय मेरे रब्बा ! इक होर कुड़ी? बनाण वाले दे घर मिट्टी थुड़ गई सी ?”6 किन्तु सुनयना की माँ इन दकियानूसी बातों को ख़ारिज करती हुई कहती है – “बुआ, ऐसे मत बोल ! यह मेरी बेटी भी है और बेटा भी ! बेटा होता तो भी इतनी ही तकलीफ देकर, इतना ही खून बहाकर पैदा होता।”7

सुधा अरोड़ा ने अपने चारों ओर के परिवेश को समझा और प्रत्येक वर्ग की नारी को अपनी कहानियों में स्थान दिया। चाहे उच्च वर्ग हो, मध्यम वर्ग या सामान्य से निचले स्तर का वर्ग, सुधा अरोड़ा ने प्रत्येक तबके की नारियों के प्रति होने वाली हिंसा तथा प्रतिक्रियास्वरूप होने वाले संघर्ष को पाठकों के सम्मुख रखा। उनके अनुसार हिंसा सभी वर्गों की औरतों के साथ होती है। उच्च वर्ग में मौन रहकर मानसिक प्रताड़ना दी जाती है तो मध्यम और निम्न वर्ग में शारीरिक रूप से औरत को प्रताड़ित किया जाता है। सामान्य तौर पर संभ्रांत पति मामूली-सी बात पर पत्नी के प्रति व्यंग्य बाणों की वर्षा करता है और उसके बाद चुप्पी साध लेता है। उसका यह मौन-व्रत पत्नी के दिल व दिमाग को विचलित करने के लिए काफी होता है। सुधा अरोड़ा की कहानी ‘काला शुक्रवार’ एक धनाढ्य वर्ग के पति-पत्नी की कहानी है जहाँ दोनों में कोई आपसी सामंजस्य नहीं है। पत्नी ड्राइवर मिराज के साथ बाजार जाती है और वहाँ नगर में हो रहे दंगों में फँस जाती है। ड्राइवर के बुद्धि-कौशल से वह सकुशल घर लौट आती है किन्तु जब दिन-भर की बैचेनी और तनाव को पति के समक्ष व्यक्त करना चाहती है तो पति कहता है कि “तुम्हें वहाँ जाने की जरूरत क्या थी …….. आगे से ये सब एडवेंचर्स मत करना।”8 धनाढ्य वर्ग के पुरुष का यह अहंकार औरत के अन्तर्मन को आहत कर देता है।

जहाँ शिक्षित वर्ग में पुरुष द्वारा मानसिक हिंसा के उदाहरण देखने को मिलते है वहीं निम्न स्तर पर जीवनयापन करने वाली नारी शारीरिक हिंसा की भयावह स्थिति से जूझ रही है। हिंसक पुरुष अपनी तमाम कुंठाओं का विरेचन अपनी पत्नी पर करता है। सुधा अरोड़ा की कहानी ‘ताराबाई चाल : कमरा नंबर एक सौ पैंतीस’ के पति-पत्नी के बीच सम्बन्धों में एक ओर क्रूरता है तो दूसरी ओर घृणा। “हमेशा की तरह उसके मरद ने सहवास के बाद आदतन बीड़ी सुलगाई थी और आखिरी कश खींच कर उसके बाएँ वक्ष पर जलती सलाई-सा चुभो दिया था।”9

सुधा अरोड़ा का यह उद्देश्य कदापि नहीं है कि वे अपनी कहानियों के नारी पात्रों को पीड़ित, अबला या बेचारी बनाकर प्रस्तुत करें। उनके नारी-पात्र पारम्परिक हैं और दोहरी भूमिका का निर्वहन करना जानते हैं किन्तु जहाँ पीड़ाओं का अतिरेक होता है वहाँ वे विद्रोही स्वरूप में सामने आते हैं। ‘भागमती पंडाइन का उपवास यानी करवाचौथ पर भरवां करेले’ कहानी में परम्परा का निर्वाह करती भागमती जीवनपर्यन्त अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त नहीं हो पाती और अपने पति को परमेश्वर मानती है किन्तु जैसे ही पति-पत्नी के सम्बन्धों के मध्य सुमेधा का आगमन होता है और पांडेजी भागो से छल करते हैं तो भागमती उनकी हत्या कर देती है किन्तु उसे इसका कोई पछतावा नहीं है। वह जज साहब को कहती है – “बाकी ये बात बताओ ! सब कुछ बरदास करे का मेवा क्या मिला ? ये तो हमारे लिए ही सोच लिए – ना रही बाँस, न बजी बंसरी। आज नहीं तो कल, दूनों मिलकर हमरा काम तमाम कर देते। वो ही काम हमरे हाथ से हो गया तो कौन गुनाह हो गया ? बताओ साहेब …….. बताओ …….. बताओ ?”10

समाज का चाहे कोई भी वर्ग क्यों न हो ! छल हमेशा औरत के साथ होता ही है और इसका मुख्य कारण है प्रतिवाद की अनुपस्थिति। सुधा अरोड़ा अपने आलेख ‘सहनशील धारित्री का आत्मपीड़क आनन्द’ में कहती हैं – “एक औरत के संस्कार उसे सात फेरों की मर्यादा और गरिमा में इस कदर जकड़ लेते हैं कि वह बहुत-सा अनचाहा स्वीकार करती चलती है।प्रतिरोध वह तभी करती है, जब चीजें उसकी बर्दाश्त के बाहर चली जाती हैं।”11

सुधा अरोड़ा की कहानियों की नायिकाएँ जब अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए संघर्ष करती हैं, परिवार और विवाह का विरोध करती हैं तो वे केवल पुरुष-वर्चस्व से ही विद्रोह नहीं करती बल्कि परम्परा से चली आ रही तमाम बासी रूढ़ियों से भी संघर्ष करती हैं। ‘स्वप्नजीवी’ कहानी की नायिका ‘मित्रा दी’ आधुनिक नारी का प्रतिनिधित्व करती है। वैवाहिक जीवन के संस्कारों के प्रति उसके मन में आक्रोश है। वह कहती है – “हिन्दुस्तानी लड़कियों के दिमाग ही मजबूत नहीं होते। हुंह एकनिष्ठ बनती हैं। पूछो भला! वह उधर विदेशी लड़की के साथ गुलछर्रे उड़ा रहा है और यह उसके नाम को रो रही है। जिसके साथ इतने महीने ‘टेंशन’ में काट दिए उसके प्रति भावुकता ?”12 नारी धैर्य व साहस की प्रतिमूर्ति है किन्तु उसकी यह सहिष्णुता धीरे-धीरे विद्रोह में बदल रही है। ‘सत्ता संवाद’ कहानी की नायिका घर की तमाम जिम्मेदारियाँ निभाती है किन्तु नाकारा पति की जेब से जब प्रेम-पत्र मिलता है तो वह स्पष्ट कह देती है – “इसे कह दो, आने को तैयार है तो मेरी ओर से कोई रुकावट नहीं। आए संभाले तुम दोनों को। मेरी जान छूटे।”13 आधुनिक नारी पति के प्रेम-प्रसंग का पता लगने पर मजबूर होकर अपमानित होने की बजाय छल-छद्म से युक्त रिश्तों से मुक्ति चाहती है। वह अब उस पारम्परिक पत्नी-बोध से मुक्त हो गई है जिसमें केवल पतिव्रता धर्म ही उसके जीवन का सार था।

सुधा अरोड़ा की कहानी ‘अविवाहित पृष्ठ’ की नायिका सुधा वैवाहिक जीवन के बजाय अकेलेपन का जीवन जीने की प्रबल इच्छा रखती है। वह कहती है – “मेरा मन कई बार होता है कि इसी तरह अकेले-अकेले, चौरंगी भीड़ भरी शाम में अकेले घूम लें।”14  नारी स्वातंत्र्य की प्रबल समर्थक ‘अविवाहित पृष्ठ’ कहानी की नायिका सुधा न केवल पारिवारिक बन्धन से मुक्त होना चाहती है अपितु वह तो अपनी भावनाओं को डायरी में लिखते समय शब्दों की भी स्वतन्त्रता चाहती है। उसका मानना है – “हमारी भाषा ऐसी हो जिसमें अभिव्यक्ति के लिए शब्दों का सहारा न ढूँढना पड़े, भाव स्वतः अंकित होते चले जाएँ।”15 परिवर्तित युग प्रवाह में नारी का स्वरूप भी बदला है। कल तक स्वयं को सीता बनाने में प्रयासरत नारी आज आदर्शवादी बनकर कष्ट सहन करने को कमजोरी मानती है। ‘स्त्री-शक्ति की भूमिका से उठते कई सवाल’ आलेख में स्वयं सुधा अरोड़ा कहती हैं – “जाहिर है स्त्री की भूमिका भी बदली है और स्वरूप भी। अब सीता बेवजह अग्नि-परीक्षा देने के लिए तैयार नहीं है, धोबी के लांछन से वह घर छोड़ने से इन्कार करती है। स्त्री मुखर हुई है, उसकी शक्ति ज्यादा धारदार हुई है।”16


निष्कर्ष
आधी दुनिया कही जाने वाली आबादी आज भी संघर्ष के रास्ते पर है । स्त्री के अधिकारों का अधिकांश हिस्सा अभी भी पुरुषों के अतिक्रमण की त्रासदी झेल रहा है । इन स्थितियों में सुधा अरोड़ा की कहानियाँ संजीवनी का काम करती हैं । त्रिभुवन राय के शब्दों में, “सुधा अरोड़ा की चर्चित कहानियाँ सवाल ही नहीं उठातीं, मौजूदा विद्रूप के खिलाफ कारगर मुठभेड़ भी करती दीखती हैं । प्राप्त स्थितियों के दंश के चलते इनकी स्त्रियाँ रोती-कलपती नहीं, इसके विपरीत उनका इस तरह से मुकाबला करती हैं कि पाठकीय चेतना आन्दोलित एवं क्षुब्ध हुए बिना नहीं रहती । इस तरह सुधा अरोड़ा का स्त्री विमर्श यथार्थ का विस्फोटक चित्र ही उपस्थित नहीं करता, भविष्य के पथ को संकेतित करने के कारण आश्वस्त भी करता है।”17
सन्दर्भ सूची 
01. यजुर्वेद, सूक्त क्रमांक : 5, मंत्र क्रमांक : 10.
02. अरोड़ा, सुधा, बुत जब बोलते हैं (कहानी संग्रह), आवरण पृष्ठ, लोकभारती प्रकाशन, नई दिल्ली.
03. अरोड़ा, सुधा, रहोगी तुम वही (कहानी संग्रह), पृ.क्र. 22, रेमाधव पब्लिकेशंस प्रा.लि., नोएडा.
04. अरोड़ा, सुधा, एक औरत : तीन बट्टा चार (कहानी संग्रह), पृ.क्र. 49, बोधि प्रकाशन, जयपुर.
05. अरोड़ा, सुधा, 21 श्रेष्ठ कहानियाँ (कहानी संग्रह), पृ.क्र. 184, डायमंड पॉकेट बुक्स, नई दिल्ली.
06. अरोड़ा, सुधा, एक औरत : तीन बट्टा चार (कहानी संग्रह), पृ.क्र. 51, बोधि प्रकाशन, जयपुर.
07. वही, पृ.क्र. 51.
08. अरोड़ा, सुधा, काला शुक्रवार (कहानी संग्रह), पृ.क्र. 27, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली.
09. अरोड़ा, सुधा, एक औरत की नोटबुक (कथा विमर्श), पृ.क्र. 43, मानव प्रकाशन, कोलकाता.
10. अरोड़ा, सुधा, भागमती पंडाइन का उपवास यानी करवाचौथ पर भरवां करेले, बुत जब बोलते हैं, पृ.क्र. 114,          लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद.
11. अरोड़ा, सुधा, एक औरत की नोटबुक (कथा विमर्श), पृ.क्र. 46, मानव प्रकाशन, कोलकाता.
12. अरोड़ा, सुधा, काँसे का गिलास (कहानी संग्रह), पृ.क्र. 120, आधार प्रकाशन, हरियाणा.
13. अरोड़ा, सुधा, एक औरत : तीन बट्टा चार (कहानी संग्रह), पृ.क्र. 35, सुधा अरोड़ा, बोधि प्रकाशन, जयपुर.
14. अरोड़ा, सुधा, बगैर तराशे हुए (कहानी संग्रह), पृ.क्र. 69, इकाई प्रकाशन, इलाहाबाद.
15. वही, पृ.क्र. 71
16. अरोड़ा, सुधा, स्त्रीर शक्ति की भूमिका से उठते कई सवाल (विमर्श), स्त्रीकाल पत्रिका.
17. राय, त्रिभुवन, पीड़ित के पक्ष की कहानी, अंक : मार्च-अप्रैल 2009, पृ.क्र. 11, पुस्तक-वार्ता,                                म.गां.अं.हिं.वि., वर्धा.

पी-एच॰ डी॰ शोधार्थी, हिन्दी विभाग, जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर, राजस्थान
संपर्क: Email address: poornima.rani19@yahoo.in


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क्यों नाराज हैं किसान महिलायें लोकसभा अध्यक्ष से?

पिछले दिनों लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने कहा कि किसान महिलायें आत्महत्या नहीं करती हैं. उनके इस बयान को भ्रम फैलाने और किसान महिलाओं की दुःस्थिति पर पर्दा डालने की कवायद मानते हुए महाराष्ट्र के अमरावती जिले में तेजस्विनी  बारब्दे के नेतृत्व में किया गया प्रदर्शन.

ये लडकियां दे रही राष्ट्रवादी आतंकवादियों को चुनौती

देश हमारे आपका, ये नहीं किसी के बाप का /सरकार हमारी आपकी ये नहीं किसी के बाप की 
14 अगस्त,2017  को (NFIW) के एक कार्यक्रम में लडकियों ने कहा  ये दिल मांगे मोर पीएम जी, ये दिल मांगे मोर) लोग इस गाने पर झूम उठे.