स्त्री-कविता: स्त्री पक्ष और उसके पार

रेखा सेठी
  हिंदी विभाग, इंद्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय, दिल्ली वि वि, में एसोसिएट प्रोफेसर. विज्ञापन डॉट कॉम सहित आधा दर्जन से अधिक आलोचनात्मक और वैचारिक पुस्तकें प्रकाशित  
संपर्क:reksethi@gmail.com

कविता हमेशा से ही मेरे लिए, अपने भीतरी अंतरद्वंद्वों और उस दुनिया की बीहड़ तल्खियों-टटकी उमंगों की हज़ारों बानगियों को नज़दीक से, समझने-जानने का बेहद खूबसूरत ज़रिया रही है। कविता की दुनिया अपने सच को पा जाने की दुनिया है। एक बड़बोले समय में जीवन के आतंरिक सच का अनुभव। दुनिया-भर के कवियों ने आक्रामक और हिंसक समय में अपनी स्वाधीनता व सृजनशीलता को बचाए रखने के लिए कई खतरे उठाये हैं। स्त्री रचनाकारों की कविताएँ भी इस जोखिम से अछूती नहीं हैं। उनका संघर्ष और भी विकट है क्योंकि वहाँ दुनिया के इस भूगोल के साथ-साथ स्त्री-चेतना का वह आतंरिक भूगोल भी है, जिसका मानचित्र हर पल उसकी कलम से गढ़ा जाता है।

स्त्री-कविता के इस संसार में अनेक प्रश्न हैं जिनका संबंध, स्त्री-अस्मिता तथा कविता और जेंडर के आपसी संबंधों से है। मेरे ज़ेहन में अक्सर यह सवाल उठता रहा है कि समकालीन कवयित्रियों द्वारा रचित कविताओं में उनके भीतर की स्त्री, अपने व्यक्तित्व की कितनी परतें खोल पाती है ? इन रचनाकारों का स्त्रीत्व उनकी कविताओं को कितनी दूर तक प्रभावित करता है ? अपनी अभिव्यक्ति को औज़ार की तरह इस्तेमाल करने वाली स्त्री-कविता का कितना हिस्सा अभी भी नेपथ्य की ओटमें है ? स्त्री रचनाकारों का रचना-धर्म, स्त्री-विमर्श की उठती लहरों, साहित्यिक आलोचना के स्थापित मानदंडों से कैसे टकराता है? ऐसे अनेक सवाल मन को लम्बे समय से घेरे रहे हैं। इन्हीं के समकक्ष रहे स्त्री-जीवन के अंतर्विरोधों से जुड़े वे यक्ष-प्रश्न जिनका सामना हर स्त्री को कभी न कभी करना पड़ता है।

साहित्य की दुनिया में नब्बे के बाद से अस्मितावादी साहित्य के उभार के साथ स्त्री-कविता अपने लिए नयी ज़मीन तैयार करती दिखाई पड़ती है। स्त्री-विमर्श ने इसे अलग ढंग से पोषित करते हुए पैनी धार दी।इसके बावजूद, ऐसा नहीं है कि इस कविता का भाव जगत इतना सीमित रहा हो लेकिन चर्चा के केंद्र में यही सरोकार रहे। ज़ाहिर तौर पर इसके दो प्रभाव हुए। कुछ स्त्री रचनाकारों ने अपने लिए यह दायरा चुन लिया और दूसरा, औरों ने भी इस कविता को सीमित नज़र से देखना शुरू किया। तब मन में यह जिज्ञासा जगी कि यदि इस साहित्य को अस्मिता के लेंस से न देखकर, साहित्य की अविरल परंपरा में देखा जाये तो उसके परिणाम क्या होंगे ?

इसी विचार से प्रेरित हो मैंने वर्ष 2015 में ‘स्त्री-कविता की पहचान’ शीर्षक से एक प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू किया।मेरा यह मानना है कि अब तक सभी स्त्री-रचनाकारों की कविताओं को केवल, स्त्री विमर्श के फ्रेम में देखा गया है। उनकी कविताएँ अक्सर स्त्री विमर्श की प्रपत्तियों में उदाहरण-स्वरुप रखी गई हैं और उन कविताओं के परिदृश्य से बाकी सरोकारों को गायब कर दिया गया। इसलिए स्त्री-कविता में अपनी पुख्ता पहचान बनाने की स्पर्धा रही है। कविता के वजूद और अंतर्विरोधों से सीधे मुठभेड़ करने का यह मौका, मुझे उन गहराइयों तक ले गया जिनके होने का अहसास मुझे पहले नहीं था।


सबसे पहली दुविधा स्त्री-कविता, पदबंध के चुनाव को लेकर रही। मैंने स्त्री रचनाकारों की कविताओं पर अपने अध्ययन को केंद्रित करने के कारण ही इसे स्त्री-कविता कहना उपयुक्तसमझा लेकिन यह शंका बनी रही कि क्या ‘स्त्री’ कविता के विशेषण रूप में इस्तेमाल हो सकता है ? इसमें मतभेद हो सकते हैं क्योंकि स्त्री-कविता का आशय निश्चित नहीं है। यह स्त्रियों की कविता है, स्त्री-मन की कविता या फिर स्त्री के प्रति सहानुभूतिपूर्ण स्वर की कविता, इस पर एकमत नहीं हुआ जा सकता। प्रत्येक पाठक का अपना व्यक्तिगत निर्णय हो सकता है, हालाँकि ये सभी अंतर्ध्वनियाँ इस पदबंध में समाहित हैं।इस सन्दर्भ में मैंने समकालीन सात कवयित्रियों से बातचीत की।गगन गिल, कात्यायनी, अनामिका, सविता सिंह, नीलेश रघुवंशी, सुशीला टाकभौरे और निर्मला पुतुल—हमारे युग की प्रतिनिधि रचनाकार हैं। संवेदना के धरातल पर अपने युग-यथार्थ से जुड़ने की उनकी दृष्टि एक-दूसरे से भिन्न है। इसलिए सबके विचारों के समवेत से एक मुक्कमल तस्वीर बन सकेगी ऐसा मेरा विश्वास है।

अपने अध्ययन में मेरे सामने, ये सात कवयित्रियाँ अपने काव्य-जगत के साथ मौजूद रही हैं। मेरे लिये यह देखना बहुत दिलचस्प रहा कि इन सातों कवयित्रियों की कविताओं की परछाईयाँ, एक दूसरे को छूती हुई भी जान पड़ती हैं और स्त्री-अस्मिता के मुद्दे पर एक दूसरे से बिलकुल अलग भी हैं। जाति और वर्ग के बदलते समीकरणों में अस्मिता का स्वरुप व प्राथमिकताएँ बदल जाती हैं। एक और सवाल जो परेशान करता रहा है वह हमारी सामाजिक संरचनाओं में जेंडर की लगभग अलंघ्य स्थिति को लेकर है, ‘क्या यह समाज, जेंडर सेंसेटिव से बढ़कर जेंडर न्यूट्रल हो सकता है ?’ सब चाहते हैं कि, ‘समाज और कविता, दोनों जेंडर न्यूट्रल हों’ लेकिन कविता और साहित्य, इस संभावना को कैसे जगा सकेंगे, यह महत्वपूर्ण है।

क्रमश:

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