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महिला सशक्तिकरण के लिए: ‘एक देश, एक कानून’

अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने महत्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com

तीन तलाक़ पर, उच्चतम न्यायालय के पांच न्यायधीशों की संविधान पीठ के ‘ऐतिहासिक फैसले’ को, आने वाली पीढियों  किस रूप में देखेंगी- क्रांतिकारी फैसला या मील का ‘पत्थर’. अभी कहना कठिन है. 1400 साल पुरानी प्रथा की वैधानिकता-संवैधानिकता पर, न्यायविद सालों बहस करते रहे हैं, करते रहेंगे. क्या सचमुच इस निर्णय से औरत की गरिमा बढ़ेगी, महिलाओं का सशक्तिकरण होगा और लैंगिक समानता की दिशा में सार्थक शुरुआत हो पाएगी? सवाल यह भी है कि महिला याचिकाकर्ताओं को क्या ‘हासिल’ हुआ. उसी पति के रहने का आदेश, जो उसे रोज़ तरह-तरह से प्रताड़ित करता रहा है. क्या ज़मीनी स्तर पर आमूल-चूल बदलाव से स्त्रियों की ज़िन्दगी खुशहाल होगी. बहुत से सवाल, संदेह और आशंकाएं हैं और तब तक रहेंगी, जब तक आधी-आबादी को सामान न्याय और सम्मान से जीने-मरने के अधिकार नहीं मिलते. बहुत आशा और विश्वास के साथ, देश की तमाम स्त्रियां न्यायपालिका कि तरफ देखती (रही) हैं.


  22 अगस्त, 2017 को सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों-जस्टिस जे.एस. खेहर, जस्टिस कूरियन जोसेफ, जस्टिस यू.यू. ललित, जस्टिस आर.एफ. नरीमन और जस्टिस अब्दुल नजीर की संविधान-पीठ ने, ‘तीन तलाक’ को निरस्त करने का आदेश दिया है। यह फैसला शायरा बानो, आफरीन रहमान, गुलशन परवीन, इशरत जहां, अतिया सबरी और मुस्लित वीमेन्स क्वेस्ट फॉर इक्वेलिटी द्वारा दायर याचिकाओं के मद्दे-नजर दिया गया। इस फैसले के बाद, पूरे देश में ऐसा लग रहा है कि मुस्लिम महिलाओं की आजादी का नया युग शुरू हो गया है। अब उन पर दमन, अत्याचार या अनाचार का सिलसिला एकदम खत्म जाएगा। केंद्र सरकार इसका श्रेय ले ही रही है और अन्य विपक्षी पार्टियां फैसले का विरोध नहीं कर पा रही हैं। शायद डर है कि विरोध कहीं उनके ‘वोट बैंक’ में सेंध न लगा दे।

395 पेज के फैसले में तीन तलाक को निरस्त करने का फैसला 3-2 के बहुमत से लिखा गया। 1937 के शरियत लॉ में तीन तलाक का प्रावधान सेक्शन 2 में था, जिसे पांच जजों की बेंच ने निरस्त कर दिया। जो दो जज तीन तलाक को निरस्त करने के पक्ष में नहीं थे, उनमें जस्टिस खेहर और जस्टिस अब्दुल नजीर हैं। इन दोनों ने इस प्रावधान को असंवैधानिक नहीं माना। लेकिन साथ ही यह भी कहा कि चूंकि यह महिलाओं के हितों के खिलाफ है, इसलिए इस पर सरकार और संसद को कानून बनाना चाहिए। यानी केवल दो जजों ने कानून बनाये जाने की बात कही है। इसका सीधा सा अर्थ है कि सरकार के लिए कानून बनाए जाने की को बाध्यता नहीं है। इस फैसले के तत्काल बाद केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि फैसले के क्रियान्वयन के लिए अलग से कानून बनाए जाने की कोई आवश्यकता नहीं है। जाहिर है सरकार कानून बनाए जाने के पक्ष में नहीं दीख रही है। वैसे भी सरकार द्वारा कानून बनाने का जो आदेश, अल्पमत निर्णय है। सरकार  कानून बनाये या न बनाए। बहुमत ने नया कानून बनाने का कोई निर्देश नहीं दिया है। केवल तीन तलाक को निरस्त किया है।

तीन तलाक का प्रावधान खत्म हो गया और नया कानून बना नहीं (या बनेगा नहीं), ऐसे में यदि कोई अपनी पत्नी को तीन तलाक दे देता है, तो उसे सजा या ज़ुर्माना किस कानून के तहत दी जा सकती है? पति पत्नी से कहेगा कि वह नहीं मानता सुप्रीम कोर्ट के फैसले को, जाओ अदालत। ऐसे में मुस्लिम महिलाएं (जिनमें से अधिसंख्य अशिक्षित-गरीब और गांव कस्बों में रहने वाली हैं) अदालतों के चक्कर काटती रहेंगी। सरकार कानून बनाना भी चाहे, तो उसकी प्रक्रिया कम जटिल नहीं। कानून ड्रॉफ्ट होगा, समितियां देखेंगी, राज्यों की राय ली जाएगी, कुछ राज्य स्वीकर करेंगे, कुछ नहीं करेंगे, मामला सालों लटका ही रहेगा। सरकारा कानून बनाने का नाटक-नौटंकी कर सकती है लेकिन कोई कल्याणकारी कानून बनने-बनाने कि संभावना नज़र नहीं आती.
तीन तलाक को निरस्त करने के फैसले को, महिलाओं की ‘विजयघोष’ के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। कहा जा रहा है कि दुनिया के लगभग 22देशों ने पहले ही तीन तलाक को निरस्त कर दिया है। भारत ने महिलाओं का ‘यह आजादी’ देने में 70 बरस लगा दिये। पाकिस्तान जैसे देश में 1961 में तीन तलाक को रद्द किया जा चुका है। जिन देशों में तीन तलाक की यह असंवैधानिक परंपरा नहीं है, वहां तो महिलाएं सशक्त होनी ही चाहिए। लेकिन क्या ऐसा है? अन्य देशों को छोड़ दीजिए, सिर्फ पाकिस्तान और बांगला देश में ही महिलाओं के सामजिक-आर्थिक हालात देख लीजिए, स्थिति का अंदाजा हो जाएगा।

मान भी लें कि तीन तलाक अंसवैधानिक है, तो बहुविवाह, करेवा, बाल विवाह, वैवाहिक बलात्कार, लैंगिक असमानता, भ्रूण हत्या को आप क्या कहेंगे-मानेंगे? विवाह संस्था में हिंदू महिलाओं के साथ भी हिंसा-हत्या, दमन-अत्याचार, अनाचार-दुराचार कम नहीं. तलाकशुदाओं में 68 प्रतिशत हिन्दू, 22 प्रतिशत मुस्लमान और दस फीसदी अन्य मजहबों के हैं। मुस्लमानों में तीन तलाक के महज 0.01 प्रतिशत मामले ही पाये जाते हैं। तो क्या हमारे सरोकार सिर्फ इन 0.01फीसदी महिलाओं से जुड़े हैं, बहुमत की महिलाओं के अधिकारों की संवैधानिकता और असंवैधानिकता पर हमें कुछ नहीं कहना है? एक दबा-ढका-छिपा सच यह है कि मर्दवादी समाज óियों को कोई अधिकार नहीं देना चाहता. पंचायत (संसद-अदालत) में मर्द ही, स्त्रियों के भाग्य का फैसला करते रहे हैं। महिलाओं के विषय में इतना बड़ा फैसला करते समय, कोई महिला न्यायाधीश नहीं दिखती-मिलती? ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है।
     



1955 में देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने जब हिंदू कानून के तहत महिलाओं के अधिकारों को लेकर प्रयास किया, तो उन्हें भी भारी विरोध का सामना करना पड़ा था। आज नारी स्वतंत्रा की वकालत करने वाले, उस समय विरोध में खड़े थे। लेकिन राजनीतिक दृढ़ता के कारण ही कुछ कानून पास हो सके । उस समय तमाम हिंदुवादी नेताओं ने घोर विरोध किया था। वे नहीं चाहते थे कि हिंदू कानून के अंतर्गत महिलाओं को मर्दों के सामान अधिकार मिलें। हिंदू कानून के तहत महिलाओं को जो भी अधिकार मिले हैं, वे तब कि राजनीतिक इच्छा और मजबूती के कारण ही मिल पायें हैं। क्या उस तरह की मजबूती वर्तमान सरकार में दिखाई पड़ रही है।

सरला मुद्गल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ही समान नागरिक संहिता बनाने के लिए कहा था। उसे बनाने की कोई नहीं कर रहा। भाजपा ने तो अपने चुनावी घोषणा पत्र में भी, समान नागरिक संहिता बनाने का वादा किया था। एक देश, एक कानून की वकालत करने वाली सरकार, महिला सामान अधिकारों के लिए एक कानून क्यों नहीं बनाती या बना सकती। समान नागरिक संहिता में तलाक, विवाह, मेंटनेंस,संपत्ति आदि के अधिकार, सभी महिलाओं-हिंदू मुस्लिम,सिख, ईसाई, जैन के लिए समान होने चाहिए। तब समान न्याय-क़ानून होंगे भी और दिखाई भी पड़ेंगे। समान नागरिक संहिता के साथ-साथ, यदि महिला आरक्षण बिल भी पास कर-करवा दें, तो सचमुच महिलाओं के सशक्तिकरण की प्रक्रिया शुरू होगी। लेकिन ऐसा कब हो पायेगा, कौम कह सकता है।

 आप-हम सिर्फ मुस्लिम महिलाओं के लिए तीन तलाक को निरस्त किये जाने पर खुश होते रहेंगे लेकिन अगर उनके पति ने सोच लिया कि पत्नी को छोड़ना है या तंग करना है, तो समाज-अदालत के पास क्या विकल्प है। आज भी अदालतों में रोजना ऐसे मामले आते हैं (अधिकांश हिंदू लड़कियों के) जिनमें पति पत्नियों को उत्पीडित-प्रताडि़त करते रहते हैं और आजादी से घूमते रहते हैं। हम कहते हैं ‘दहेज़ मामलों में गिरफ्तारी मत करो’. किसी से छिपा नहीं है कि किसी भी अदालती मामले को निपटाने में सालों का समय-पैसा लगता है। अलग रहने के लिए ही नहीं, साथ रहने के लिए भी।



एक दिलचस्प मामला है देखें कि 1955 में सरोज रानी ने, हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 की धारा 9 के तहत पति के साथ दोबारा रहने के लिए याचिका दाखिल की। इसका फैसला सुप्रीम कोर्ट ने 1983-84 में सुनाया। यानी साथ रहने के लिए भी फैसला देने में अदालत को 28-29 साल का समय लग गया। ऐसे में तलाक से पीडि़त महिलाओं की अदालतों में क्या स्थिति होगी या हो सकती है, इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। तीन तलाक को निरस्त करके मुस्लिम महिलाओं को, कोर्ट-कचहरी के उन्ही  गलियारों में धकेल रहे हैं, जहां जाने के रास्ते तो कठिन हैं ही, वहां से बाहर निकलने के रास्ते कमोबेश बंद या अंतहीन ही हैं।

तीन तलाक को निरस्त करने का फैसला कुछ और सवाल मन में पैदा करता है। आखिर हम किस तरह का समाज बनाना चाहते हैं। एक तरफ हम महिलाओं को सहजीवन, सिंगल वुमन, बिना विवाह पैदा किये बच्चा पैदा करने का अधिकार, सेक्स का अधिकार दे रहे हैं और दूसरी तरफ समाज के एक बहुत ही छोटे तबके को तलाक से रोकने के आदेश पर पर्व मान रहे हैं। आंकड़े बताते हैं कि जब देश आजाद हुआ, तो सिंगल वुमन की संख्या महज चार  फीसदी थी, जो आज बढ़ कर 21 फीसदी हो गई हैं।
    
 विश्व इतिहास और सामजिक अनुभव साक्षी है, गवाह है कि एक समय पूरे यूरोप में तलाक के पक्ष में स्त्री आंदोलन हुए और वहां की संसद-सरकार-अदालतों ने तलाक को कानून बना कर आसान बनाया। यूरोप में महिलाएं इसलिए सशक्त हुईं कि वे पढ़ी लिखीं थीं, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर थीं, विवाह को सात जन्मों का बंधन नहीं मानती-समझती थीं, अपने फैसले खुद लेती थीं। इसलिए धार्मिक आस्थाओं का यह अभियान भी खत्म होना चाहिए . महिलाओं को भी खुले मन से यह सोचना होगा कि क्या सचमुच (तीन) तलाक रुकने से उनका जीवन जन्नत बन जाएगा? क्या उनके जीवन की एकमात्र त्रासदी यही है कि उनके पति उन्हें एक साथ तीन तलाक दे रहे हैं?  तीन तलाक को निरस्त किये जाने के परिणाम, शीघ्र ही समाज में दिखाई देने लगेंगे और यह भी साफ हो जाएगा कि इस फैसले से कितनी महिलाओं का उद्धार, कल्याण या सशक्तिकरण हो सकेगा. स्त्री-पुरुष को विवाह बंधन में बांध कर रखना, पितृसत्ता के हितों को पोषित करती विवाह संस्था को ही बनाए-बचाए रखना है…होता है. यह रास्ता स्त्री मुक्ति या सशक्तिकरण का रास्ता तो नहीं लगता.



(सुधांशु गुप्त की अरविन्द जैन से बातचीत)


महिलाओं की मुक्ति का मार्ग तलाक से ही होकर जाता है-अरविंद जैन

पांच मुस्लिम महिलाएं-शायरा बानो, फराह फेज, आफरीन रहमान, इशरत जहां और गुलशन परवीन तीन तलाक को खत्म करने के लिए याचिका दायर करती हैं। उत्तर प्रदेश चुनावों में पहली मुस्लिम समाज में तीन तलाक को खत्म करने की बात की जाती है। भाजपा लगातार यह वादा करती है कि महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए तीन तलाक को खत्म किया जाएगा।…और 18 माह की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित कर दिया जाता है। तो क्या यह फैसला राजनीति से प्रेरित नहीं लगता? 


यह कहना तो उचित नहीं होगा, लेकिन कहा जा सकता है कि अदालती फैसलों पर समाजिक और राजनीतिक स्थितियों का असर तो होता ही है। संभव है इसी के आलोक में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भी हुआ। जिस तरह से  फैसले के बाद प्रचार प्रसार किया जा रहा है, उससे इसी बात की आशंका दिखाई पड़ती है।लेकिन हमें न्यायपालिका की निष्पक्षता के संदर्भ में ही इस फैसले को देखना चाहिए।

• तीन तलाक को अंसवैधानिक घोषित करने के बाद जिस तरह मुस्लिम महिलाएं एक दूसरे को मिठाई खिलाती दिखीं और जिस तरह राजनेताओं ने कहा कि ये महिला सशक्तिरण का नया युग है। इसे आप किस रूप में देखते हैं।

जो लोग ऐसा कह रहे हैं, वे सुप्रीम कोर्ट के फैसले के परिणामों से परिचित नहीं हैं। इसमें दो तीन बातें हैं। अगर पति अब भी पत्नी को तीन तलाक दे देता है, तो पत्नी क्या करेगी? नया कानून अभी बना नहीं है, बिना किसी कानून के तो सजा या जुर्माना हो नहीं सकता। कानून बनेगा या नहीं बनेगा, इस पर तमाम शंकाएं हैं। क्या पत्नी इस फैसले के आधार पर, पुलिस, कोर्ट-कचहरी के दरवाजे खटखटाती रहेगी। गांवों कस्बों और देहात में रहने वाली, कितनी महिलाएं जानती होंगी कि तीन तलाक के इस फैसले के खिलाफ कौन सी कोर्ट जाना है.

• और तीन तलाक के निरस्तीकरण के बाद महिला सशक्तिकरण? 


अगर तीन तलाक को निरस्त करने से ही “महिला सशक्तिकरण” होता, तो यकीन मानिये मिस्र, ट्यूनिशिया, ईरान, इराक, तुर्की, साइप्रस, अल्जीरिया, मलेशिया, पाकिस्तान, बांग्लादेश में महिलाएं कब की सशक्त हो चुकी होतीं। इन सभी देशों में, तीन तलाक को वर्षों पहले निरस्त किया जा चुका है। लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं। सो महिलाओं के सशक्तिकरण का, तीन तलाक या तलाक़ से कोई लेना देना नहीं है।

आप यह कहना चाहते हैं कि सरकार महिला सशक्तिकरण को लेकर केवल सियासत कर रही है, वह इसके प्रति गंभीर नहीं है?


मुझे नहीं पता…मैं नहीं जानता-समझता कि सरकार गंभीर है या नहीं। हाँ! अगर सरकार सचमुच गंभीर है, तो उसे  महिला सशक्तिकरण की दिशा में ईमानदारी से काम करना चाहिए। सरकार को सिर्फ मुस्लिम महिलाओं के लिए ही नहीं, आधी आबादी के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए। न्यायोचित कानून बनाए, नहीं तो स्थितियां और भी ज्यादा भायवह हो जाएंगी। पति तलाक देते रहेंगे और पत्नियां अदालतों के चक्कर काटती रहेंगी। बिना कानून के ना कोई सजा होगी, ना कोई डर। आशंका है कि कहीं ये फैसला भी “शाहबानो केस” की तरह, महिलाओं के ही खिलाफ ना खड़ा हो जाए और बुर्के की आड़ में सियासत और तेज हो जाए।

तो इसका रास्ता क्या होना चाहिए?


देखिये, हर धर्म-जाति की स्त्रियों को समान न्याय के लिए समान नागरिक संहिता (यूनिफार्म सिविल कोड) बनाना चाहिए। सत्ताधारी दल ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में इसका वादा किया था। जीएसटी की घोषणा करते समय सरकार ने एक देश, एक कानून का नारा दिया….वकालत की थी। महिलाओं को भी सामजिक-आर्थिक-राजनीतिक इंसाफ, सामान न्याय, संवैधानिक बराबरी देने के लिए, एक ही कानून होना चाहिए…क्यों नहीं होना चाहिए। अगर सरकार सचमुच महिला सशक्तिकरण की पक्षधर है, तो महिला आरक्षण बिल पास करे-करवाए, सामान नागरिक संहिता लाए….पता चल जाएगा।

यानी तीन तलाक को निरस्त किया जाना महिलाओं के लिए (मुस्लिम ही सही) मुक्ति का कोई मार्ग नहीं खोलेगा?

जिस तरह आज विवाह संस्था का जर्जर ढांचा अप्रासंगिक होता जा रहा है. आप सहजीवन का कानून बना सकते हैं, लेकिन बाल विवाह को अवैध और वैवाहिक बलात्कार को असंवैधानिक नहीं कहेंगे-मानेगे..क्यों? बहुओं को दहेज के लिए मिट्टी का तेल, पेट्रोल और व्हिस्की डालकर मार दिया जाता है…क्या यह सब क्या है..वैधानिक-संवैधानिक होगी  सामाजिक? सवाल सिर्फ तीन तलाक ही क्यों? हिंदु और अन्य कानूनों में भी समुचित संशोधन हों…अंसवैधानिक बातों को भी निरस्त किया जाए। मेरा स्पष्ट मानना है कि (तीन) तलाक को निरस्त किया जाना ही, महिलाओं मुक्ति का मार्ग नहीं है, बल्कि सच कहूं तो वास्तव में दमित-उत्पीड़ित-शोषित स्त्री के लिए मुक्ति का मार्ग तो तलाक के बाद…आत्मनिर्भर होना है। लाखों मुकदमें अदालतों में तलाक के लिए लंबित पड़े हैं, अगर इन लोगों को तलाक मिल जाए..न्याय मिल जाए..थोड़ा जल्द और आसानी से मिल जाए तो, ये सब अपना जीवन अपनी शर्तों और निर्णयों के साथ या अपने तरीके से जी सकेंगी/सकेंगे। निश्चित रूप से असली मुक्ति यहां से आरम्भ होगी।

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हिन्दी आलोचना में स्त्री के प्रति संवेदना नहीं है: सविता सिंह

रेखा सेठी

  हिंदी विभाग, इंद्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय, दिल्ली वि वि, में एसोसिएट प्रोफेसर. विज्ञापन डॉट कॉम सहित आधा दर्जन से अधिक आलोचनात्मक और वैचारिक पुस्तकें प्रकाशित
संपर्क:reksethi@gmail.com



सविता सिंह ने स्वयं को घोषित तौर पर स्त्रीवादी कवयित्री कहते हुए समाज के स्थापित ढाँचों को कुछ इस तरह चुनौती दी कि साहित्य की लब्ध-प्रतिष्ठ अविरल धारा में एक नया मोड़ उपस्थित हुआ. उनकी कविताएँ लिंगाधारित असमानता के खिलाफ जिरह खड़ी कर एक नयी दुनिया की तस्वीर पेश करती हैं जो अधिक मानवीय, समानधर्मा और स्वतंत्र होगी. सविता ने जिस सजग ढंग से सामाजिक संबंधों की पड़ताल करते हुए पितृसत्तात्मक व्यवस्थाओं को प्रश्नांकित किया, उससे ‘स्त्री होने के संकट’ का बोध कवि और पाठक दोनों को समान रूप से होने लगा. उनकी कविताएँ उसी संकट और उससे उन्मुक्तता के अहसास को एक साथ पैदा करती हैं. असमानता, यातना और संघर्ष के असंख्य बिंब यदि सविता सिंह की कविताओं का प्रस्थान बिंदु हैं तो मुक्ति का अहसास (केवल स्वप्न या आकांक्षा के स्तर पर नहीं) उसकी अनिवार्य परिणति. स्त्री, प्रकृति और दमित समाज के अनेक चेहरे एक-दूसरे में घुल-मिल जाते हैं.


सविता सिंह की कविताओं का संसार हमारे सामने दुनिया के जिस रूप को प्रस्तावित करता है वह वैकल्पिक दुनिया का स्वप्न है.यह इलाका स्वप्न और यथार्थ के बीच अवस्थित है. एक ओर वे कविताओं में स्त्री जीवन के इतिहास को रचती, उसकी मुक्ति के सपने को पा लेना चाहती हैं तो दूसरी ओर पूरी तरह खुद को कविता के हवाले कर सहज भाव से पूछती हैं- ‘कहाँ लिए जा रही हो मुझे मेरी कविता’. उनकी कविताओं की संवेदना गहरी वैचारिक उर्जा से गढ़ी गई है. ये विचार स्त्री को लेकर उनके (वर्ल्ड-व्यू) विश्व-दृष्टि से पैदा होते हैं. वैकल्पिक विश्व-दृष्टि जो संभवतः ‘जेंडर न्यूट्रल’ दुनिया तक ले जा सके. सपनों की तरलता जेंडर के इस पाठ को मानवीय अनुभव में बदल देती है. इन कविताओं में जेंडर के ये सवाल जिस तरह उठे थे उससे यह आशंका भी बनी थी कि यह कविता कहीं स्त्री के इतिहास, संघर्ष या उसके अधिकारों की पक्षधरता का ऊपरी शोर बन कर न रह जाए, लेकिन सविता सिंह ने उस सीमा का अतिक्रमण किया. उन्होंने कल्पना, संवेदना और विचार के समुच्चय को साधकर उसे मानवता का ऐसा सवाल बना दिया है जो दर्शन और रहस्य की  पराकाष्ठा तक पहुँचता है. साहित्य परंपरा में उसका मूल्य इस बात से निश्चित होगा कि  चिंता और चिंतन की यह सलवटें किस तरह का सक्रिय हस्तक्षेप कर पाएँगी जिससे कविता में सविता जिसे पाने की ज़िद्द करती हैं उसे हम सामाजिक स्तर पर भी अर्जित कर सकें. मैंने (रेखा सेठी ने), जेंडर और कविता के अनेक सवालों उनसे लंबी बात-चीत की, प्रस्तुत हैं उसके कुछ अंश ….

स्त्री-कविता:अर्थ-आशय


मैं एक स्त्री हूँ और मेरी कविता में मेरी यह पहचान सम्मिलित है… मैं मानती हूँ और बहुत शिद्दत से महसूस करती हूँ कि मेरे साथ जो कुछ भी इस जीवन में घटित हुआ है और हो रहा है वह इस वजह से है…कविता में अपनी बात अभिव्यक्त करना (स्त्री की) अंदरूनी शक्ति का इज़हार है.यह मेरे लिए अपने निकट होने जैसा है. स्त्री-कविता  में अपने निकट होने का एक मतलब है. कहीं न कहीं यहउसके ‘स्व’ का मामला है और जो‘स्व’ है उसका आविर्भाव उसके साथ जन्म से ही होता है. हाँ, उसके साथ उसका विकास हो तो उसमें और भी बहुत-सी बातें आ जाती हैं I यह एक ख़ास यात्रा है. मेरे अपने ‘स्व’ का विकास. मेरे जीने के लिए यह बहुत है I मुझे अपने बारे में एक ख़ास तरह की समझ चाहिए जो मुझे संपन्न करे. यह संपन्नता कोई बाहर से महसूस न भी करे आप अपने भीतर उसे महसूस कर सकती हैं, वह एक रोशनी की तरह होती है, आपको आगे जो कदम रखने हैं उनकी दिशा दिखाती हुई.यह दिशा बहुत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि कोई आपके भीतर से ही यह सुझा रहा होता है कि किधर जाएँ.यह आपका अपना फ़ैसला होता है.जीवन का गंभीर फ़ैसलाI दरअसल वही मुक्ति है, वही स्वतंत्रता.

….मेरे भीतर का स्त्री-आलोक मुझे दिशा देता है. इसका एक दूसरा पक्ष भी है, कविता और आपका द्वंद्वात्मक संबंध. आप और कविता एक दूसरे को बनाते चलते हैं. इस प्रक्रिया को मैं पहचानती हूँ. कविता के इस सच को मैंने अपनी कविताओं में परखा है और उसे ज़ाहिर भी किया है. ‘कविता का जीवन’, ‘कहाँ लिए जा रही हो मुझे मेरी कविता’, ‘कृतज्ञ हूँ मेरी कविता’ आदि अनेक ऐसी कवितताएँ हैं जिनमें यह प्रक्रिया देखी जा सकती है. यह प्रक्रिया इतनी जीवंत है, मनुष्य के दूसरे ‘स्व’ की तरह ही उससे बहुत मिलती-जुलती  मेरी उसके प्रति कृतज्ञता भी है, सवाल भी हैं और झगड़े भीIकविता के साथ मेरा बहुत ही घनिष्ठ एवं आत्मीय संबंध है. मैं स्त्री कवि हूँ और मैं मानती हूँ कि मेरी कविता स्त्रीत्व से जुड़ी है तो निश्चित तौर पर मैं चाहूँगी कि उन कविताओं को स्त्री-कविता  के रूप में पहचाना जाए. ‘स्त्री सच है’ मेरी ही एक कविता है, ‘नींद थी और रात थी’ में यहाँ सत्य का कविताकरण और राजनीतिकरण दोनों होता है.

स्त्री-कविता: स्त्री पक्ष और उसके पार

स्त्री-कविता और पाश्चात्य संदर्भ

बहुत से लोग स्त्रीवाद पर हमला करते
हुए कहते हैं कि वह पाश्चात्य अवधारणा से आया है. मैं भी मानती हूँ कि इसमें पाश्चात्यप्रभाव से उदय होने के कारण एक दृष्टिकोण है लेकिन हमें यह भी नज़रंदाज़ नहीं करना चाहिए कि अगर दुनिया में कहीं भी मनुष्य का कोई समूह (स्त्री तो छोड़ो) दुनिया को बदलने के लिए संघर्ष कर रहा है और उसका कोई परिणाम निकल रहा है तो हम क्यों उससे मुतासिर न हों, हम क्यों उसे स्वीकार न करें या उससे अपनी पहचान न जोड़ें ? यहाँ पाश्चात्य का सवाल बीच में आ जाने से इसका संबंध औपनिवेशिक संस्कृति से जोड़ दिया जाता है जिससे सांस्कृतिक दासता की ध्वनि आती है.यह सारी बातें हाइपर नेशनलिज्म या उग्र राष्ट्रवाद के संदर्भ से उभर कर आती हैं.बिना किसी धुंधलके के मैं यह कहना चाहती हूँ कि हमारा अपना जो राष्ट्रवाद है उसने हमारे लिए एक नए पितृसत्तात्मक समाज का निर्माण भी किया क्योंकि इस राष्ट्रीय व्यवस्था में स्त्री और पुरुष बराबर नहीं हैं. पितृसतात्मक व्यवस्था उसमें गुंथी हुई है इसलिए यह बहुत ज़रूरी है कि हम दुनिया की उन बहनों के साथ एक बहनापा स्थापित करें जिन्होंने विवेक के स्तर पर या जीवन के स्तर पर अपने यहाँ के पुरुषों से संघर्ष कर कुछ हासिल किया है.

1960 के आस-पास अमरीका में जिस रेडिकल फेमिनिज्म की शुरुआत होती है या उससे भी बहुत पहले जब स्त्रीवादी चेतना उभरने लगी,मेरी वालस्टोनक्राफ्ट (1792) ने जब लिखना शुरू किया, या फिर सोशलिस्ट स्त्रीवादियों ने स्त्री श्रम की पड़ताल शुरू की. इनको भी हम अपने संघर्ष से जोड़कर देखते हैं. कम्युनिस्ट मूवमेंट में जो स्त्रियाँ रहीं उन सबका इतिहास हमारा इतिहास है. हमारे लिए इतिहास का अर्थ केवल राष्ट्र का इतिहास नहीं है, स्त्री संघर्ष का इतिहास है. हालाँकि यहाँ भी राष्ट्रीय आंदोलन में स्त्रियों की बहुत बड़ी भूमिका रही है लेकिन उसका प्रतिफल क्या हुआ ? यह हमारे सामने है कि सरोजिनी नायडू, राजकुमारी अमृत कौर तथा अन्य स्त्रियाँ जो स्वतंत्रता संघर्ष में शामिल थीं वे पुरुषवादी विवेक से प्रभावित रहीं. 1932-33 में जब स्त्री के प्रतिनिधित्व का सवाल उठा तो उनके द्वारा रखे गए विचार असमंजस में डालने वाले लगते हैंIवे राष्ट्रवादी होने के कारण ही अपनी योजना एवं लक्ष्य में पुरुषवादी लगते हैं.स्त्री-प्रतिनिधित्व के विषय में इन्होंनेकहा कि स्त्रियों को कोई आरक्षण नहीं चाहिए बस उनकी मनुष्यता को पहचाना जाए. कितना बड़ा अंतर्विरोध है इस कथन में,क्योंकि एक तरफ यह कहा जा रहा है कि स्त्रियाँ बहुत सशक्त हैं उन्हें विशेष दर्जा नहीं चाहिए, साथ ही उनकी,मनुष्यता को नहीं पहचाना जा रहा इसका भी स्वीकार है. कहीं बहुत बड़ी फाँक है यहाँIआप अपनी मनुष्यता की पहचान कराना चाहती हैं तो उसके लिए संघर्ष करने की ज़रुरत है I 1973-74 में जब ‘टुवर्ड्स इक्वालिटी रिपोर्ट’ आई तो स्थिति साफ़ हो गई. हिन्दुस्तान की औरतों की स्थिति कितनी खराब और दयनीय थी, चाहें उनकी शिक्षा हो या स्वास्थ्य सभी जगह उनकी स्थिति मिट्टी के बराबर थी. उसके बाद ही यह चेतना आई कि इसे बदलने के लिए विशेष यत्न करने होंगे.उनके उत्थान के लिए सरकारी नीतियाँ बनाने की शुरुआत हुई.

बाबा साहेब अंबेडकर इस पर पहले बात कर चुके थे और मैं उनके योगदान को महत्त्वपूर्ण मानती हूँ कि उन्होंने उन लोगों के लिए संविधान में विशेष प्रोविज़न किए जिन्हें दलित या अस्पृश्य माना गया था. स्त्री की स्थिति में सुधार लाने के लिए भी बाबा साहेब ने हिन्दू कोड बिल में परिवर्तन लाने की कोशिश की. कम से कम उन्होंने इस आवश्यकता को राजनीतिक स्तर पर पहचाना तो सही.मेरे कहने का मतलब है कि हम राष्ट्रवाद को आँख मूँद कर स्वीकार नहीं कर सकते. हमें राष्ट्रवाद के अँधेरों को भी देखना चाहिए. औरतों के लिए उसकी अपनी मुसीबतें हैं.हमें यह बहस नहीं करनी चाहिए कि हम इसको पाश्चात्य मानें या भारतीय, और अगर पाश्चात्य है भी तो हम जैसे पश्चिम के उपनिवेशवाद को स्वीकार नहीं करते लेकिन उनके यहाँ जो प्रगतिशील आंदोलन हुए हैं उनको स्वीकार करते हैं. उसी तरह हमारे यहाँ जो राष्ट्रवादी चेतना है उसमें जो प्रगतिशील अवयव हैं, उसको हम स्वीकार करते हैं और जो प्रतिगामी हैं, जो हमें पीछे धकेलते हैं, पितृसत्ता के अधीन करते हैं, जो हमें परंपरा में व्याप्त प्रतिगामी मूल्यों की तरफ वापस धकेलते हैं उनको हम अस्वीकार करते हैं.उन्हें हम राष्ट्रवाद के नाम पर आत्मसात नहीं कर सकते.

स्त्री कविता: स्त्री पक्ष और उसके पार (क़िस्त दो)

स्त्री-कविता: मूल मुद्दे

स्त्री-कविता  के मूल मुद्दे वही हैं जो
दुनिया में आज तक स्त्रियों के मूल मुद्दे रहे हैं और जिन पर स्त्रियों ने लिखा भी है. मेरा यह मानना है कि स्त्री-कविता  तमाम सामाजिक संरचनाओं में जो असमानता व्याप्त है, चाहे वह स्त्री को लेकर हो चाहे दूसरे ऐसे समूहों को लेकर, उन सब के प्रति संघर्ष को जायज़ ठहराती है. वह संसार को हर तरह की कुरूपताओं से मुक्त करना चाहती है.वह पितृसत्ता की भयावहता से मनुष्य को निजात दिलाना चाहता है. इसके लिए वह सुंदर की पहचान करना चाहती है. मैंने भी यह कोशिश की है कि जिन असमानताओं से हमारा समाज प्रभावित है उसके दर्द और अंधेरों को सामने लाऊं. स्त्री-कविता भी लगातार यह कोशिश करती है कि अपनी कविताओं के ज़रिए वह समाज को कैसे बदल सकती है. सामानांतर स्तर पर ऐसी सभ्यता के विकास में सम्मिलित हो जिसमें अंततः जो भी हमारी भिन्नताएँ हैं वह हमारे शोषण के लिए इस्तेमाल न होकर हमारी उन्नति के लिए हों, जिससे हम कह सकें कि एक सामूहिक, विनम्र, विश्व समुदाय बनाने में हमारी कविताओं का योगदान रहा है.हमारी कविताओं को पढ़ते हुए लगे कि वे व्यस्क स्त्री नागरिक की कविताएँ हैं I यह एक उपलब्धि होगी.

स्त्री-कविता और स्त्री-विमर्श

मैं विमर्श को पुनः परिभाषित करना
चाहूँगी क्योंकि स्त्री-विमर्श किसी भी चीज़ को संकुचित करने के लिए नहीं है Iस्त्री-विमर्श  है ही इसीलिए कि वह जीवन की तमाम परतों को खोल सके और स्त्री-विमर्श  के भीतर जो कविताएँ लिखी जा रही हैं, मैं नहीं मानती कि वहसीमित हैक्योंकि विमर्श एक जगह स्थिर होकर नहीं रहता.विमर्श के इतिहास की अपनी यात्रा है. अगर स्त्री-विमर्श  की बात करें तो यह विमर्श वह नहीं है जहाँ 1960 में था. आज हम स्त्री-विमर्श  के तीसरे दौर से भी आगे निकल चुके हैं बल्कि,  विमर्श के इस फेज़ में या इस पड़ाव पर स्त्रियाँ लगातार पुरानी बातों को निरस्त कर रही हैं, उसमें नया जोड़ रही हैं, बिल्कुल नया यथार्थ भी हासिल कर रही हैं. वे खुद अपनी ज़मीन तलाश कर उसे उर्वर बनाकर, उसमें जो भी फसल उगानी थी, उगाकर, काटकर, उस जगह आ गई हैं जहाँ पर वे दार्शनिक स्तर पर मानुष के मनुष्यत्व को पहचान रही हैं. स्त्री-विमर्श  विकास की ओर अग्रसर है और ऐसे मुकाम पर पहुँचा हुआ है जहाँ चाहे कला हो, साहित्य या अलग से स्त्रियों पर कविता, उसे संकुचित करने के बजाए उसके लिए नई ज़मीन तैयार कर रहा है. अब आप पर है कि आप स्त्री-विमर्श  को कैसे समझती हैं.आप किस स्तर पर उससे जुड़ी हैं.आप स्त्री-विमर्श  के पहले चरण में, दूसरे या फिर तीसरे और उससे आगे के विमर्शों में हैं या फिर उससे भी आगे बिल्कुल अलग. मेरा मानना है कि आज-कल ज़्यादा पढ़ी-लिखी महिलाएँ जो एब्सट्रेक्ट विचारों  के क्षेत्रों में काम कर रही हैं सब तीसरे चरण में हैं, क्योंकि वे अपने आत्म-संघर्ष से यहाँ तक पहुँची हैं.किसी ने उनको पहुँचाया नहीं है.उन्होंने स्वयं देखा, जाँचा-परखा, सबको पढ़ा है.बहुत-सी स्त्री सिद्धांतकार हैं जिन्होंने मार्क्स के बाद,फ्रायड के बाद, फूको को महत्त्वपूर्ण माना है और उनसे प्रेरित हुईं.बहुत सारी स्त्रियाँ हैं जिन्होंने लकां के काम को बहुत महत्वपूर्ण माना है.फ्रायड की उन्होंने लकां के ज़रिए कठोर आलोचना कीI वे पुरुष के ज़रिए पुरुष को रिप्लेस कर रही हैं, विस्थापित कर रही हैं.

आजकल मैं फ्रेंच फेमिनिज्म से बहुत मुतासिर हूँ. उनके काम में जूलिया क्रिस्टेवा हों या हेलेन सिक्सू, इन लोगों के काम में आपको वो उन्नति दिखती है जिसको आप संकुचित अर्थ में स्त्री-विमर्श  नहीं कह सकतीं. वह एक सभ्यता-विमर्श है जिसमें स्त्रियाँ अपना विकास कर चुकी हैं और इतने प्रगतिशील ढंग से सोच रही हैं जैसा पुरुषों ने भी नहीं सोचा होगा.इनका जो नया इलाका है उसमें अपने दायरे से बाहर निकलकर सोचने समझने की कोशिश हो रही है. यह संघर्ष बहुत बड़ा है. यह कभी भी कविता या किसी अन्य चीज़ को संकुचित कर ही नहीं सकता.यहाँ एक नया सिंबॉलिक ऑर्डर यानी व्यवस्था बनाने का अथक प्रयास चल रहा है जिसमें अर्थव्यवस्था का भी रूपांतरण हो जाना चाहिए.

समकालीन कविता की परंपरा में स्त्री कविता 

मैं जब अन्य कवियों को पढ़ती हूँ तो मेरे
सामने कई चित्र अपने बिंबों के ज़रिए उभरने लगते हैं – कई आईने आने लगते हैं जिनमें मैं अपना चेहरा और अपनी स्थिति देखती हूँ. मेरे लिए यह बहुत ही अंतरंग अनुभव होता है. जैसे जब आप महादेवी को पढ़ते हैं तो शुरू में उनकी आलोचना इस तरह हुई कि उनके यहाँ संघर्ष से ज़्यादा व्यक्तिगत संताप है लेकिन उस संताप-विलाप का स्वर इतना करूण है कि वह स्त्री को ज़्यादा छूता है या पुरुष को यह भी समझने की बात है.किसी भी कविता का पाठ एक राजनीतिक मसला भी है. आप स्त्री कवि को कहाँ से पढ़ रहे हैं, उससे यह बात साफ़ हो जाती है कि आपका पाठ कैसा होगा. मैं जब स्त्री कवि को पढती हूँ, गगन गिल पर मैंने इधर लिखा भी है, उसमें से मुझे एक ऐसी गूँजती हुई आवाज़ आती है जो अपनी ही छूटी हुई आवाज़ लगती है. मेरा ख्याल है कि स्त्री-कविता  चाहे वो जिस दौर में लिखी गई हो, मीरा की कविता हो या अक्क महादेवी की, उन सबको पढ़ते हुए लगता है कि यह मेरी अपनी ही कविताएँ हैं, मेरी छूटी हुई आवाज़ जिसे सहज ही अपना लेने को जी चाहता है.

…कविता आपके सच की आवाज़ है, जब आप ऐसी किसी विधा में लिख रही हैं तो यह आवश्यक है कि आपके अंदर एक स्वच्छता हो, सच्चाई हो उसकी आभा हो कम से कम.उसे पढ़ते हुए और परिभाषित करते हुए भी हमें चाहिए कि कविता को उसके अपने इतिहास और भूमिका के संदर्भ में पढ़ें, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा.यही चिंता का विषय है.जो लोग इस समय सक्रिय हैं यह उन लोगों की कमी है कि वे उन चीज़ों पर बात नहीं कर रहे. कोई एक अच्छी स्त्री-कविता  किसी भी पुरुष को पसंद आनी चाहिए और कोई अच्छी कविता जो किसी पुरुष द्वारा लिखी गयी है वह स्त्रियों को पसंद आनी चाहिए, इसमें कोई मुश्किल नहीं है लेकिन उसका समझकर बहस और विश्लेषण होना चाहिए.पंकज सिंह की स्त्री पर लिखी कवितायेँ किसे पसंद नहीं आएँगी या फिर विष्णु नागर की माँ पर लिखी कविता बेमिसाल लगती है.कुमार अंबुज की बहनों पर लिखी कविता भी एक ऐसा ही उदाहरण है. मंगलेश जी के यहाँ भी माँ पर एक कविता है जो ज़ेहन में रहती है. असद ज़ैदी की अधिकतर कविताओं की मैं अच्छी पाठिका हूँ. विजय कुमार की एक कविता ‘मार खाई हुई स्त्री’ है जो गला रुद्ध कर देती है या फिर लीलाधर मंडलोई की माँ पर कविताएँ, इतनी करूण हैं कि आप यहाँ पता नहीं कर सकते स्त्री या पुरुष भावना में. हमारे सीनियर पुरुष कवियों की कविताएँ अपनी विलक्षणता में हम सबको भाती हैं कुँवर जी हों, केदार जी अशोक वाजपयी जी या फिर विष्णु खरे या विनोद कुमार शुक्ल और प्रभात त्रिपाठी जी,वैसे ही अनीता वर्मा, निर्मला गर्ग, कात्यायनी, नीलेश, सविता भार्गव, विपिन चौधरी – सबके यहाँ सामान्य सामाजिक चेतना पर लिखी कविताएँ पुरुष कवियों को खूब भाती हैं. यहाँ वे स्त्री-विमर्श की तलाश नहीं करते लेकिन जहाँ स्त्रियों का संसार अपनी स्व-चेतना में कविताओं में खुलता है, उसकी चमक ही विशेष होती है.

स्त्री कविता: स्त्री पक्ष और उसके पार (क़िस्त तीन)

हिंदी आलोचना और स्त्री-कविता 

स्त्री-कविता की कोई आलोचनात्मक
प्रवृति नहीं है जिससे उसे समझा जाए. आलोचना बातचीत के लिए एक आधार देती है जिस पर आप सभी सहमत हो सकते हैं कि यह कविता यह कह रही है. अगर आप अभी समकालीन स्त्रियों को पढ़ें तो लगेगा कि उसमें एक स्वर है जो उनका है, क्योंकि वो उनके अनुभवों से आ रहा है और वे अनुभव सार्वभौमिक भी हैं क्योंकि स्त्री कहीं भी हो किसी भी वर्ग की, किसी भी धर्म की, उसे पितृसत्ता समान रूप से दमित करती है.इसलिए स्त्रियों का अनुभव एक स्तर पर एक ही किस्म का अनुभव होगा लेकिन उसके बाद उसमें बहुत सी भिन्नताएँ भी हैं.अगर यह सत्य कोई मिस कर जाए तो कविता समझने में दिक्कत होगीI यदि किसी स्त्री कवि को यह कहा जाए कि उसकी कविता तो पुरुषों की तरह है या सामान्य साहित्य की तरह तो इस बात को शाबाशी की तरह थोड़े ही लेना चाहिए. इसको इस तरह से लेना चाहिए कि कहीं आलोचना ने अपना काम नहीं किया और इस बड़ाई ने आपको वह भाषा और वह समझ नहीं दी जिससे आप पहला कदम या दूसरा कदम पार कर चुके होते हैं और दूसरे स्तर पर जाकर बहस करें I मेरा अपना मानना है कि स्त्रियों की कविताओं की बहुत ज़्यादा चिंता इस आलोचना में नहीं रही है. हाँ, लेकिन मैं यह भी मानती हूँ की अब जो आलोचना हो रही है उसमें यह चिंता भी है, संवेदना भी और समझने की कोशिश भी.इसलिए निराश होने की कोई ज़रूरत नहीं है.

इधर मैंने एक बहुत छोटी कोशिश की है और उसकी सराहना हुई है जिससे पता चलता है कि हिंदी में ऐसी आलोचना की कमी है Iमैंने कोशिश की कि जो आलोचनात्मक टिप्पणियाँ अब तक स्त्री कवियों पर की गई हैं उनसे अलग कुछ देखूँ, जैसे नीलेश की ज़्यादातर कविताओं को जो प्रशंसा मिली वह उसके वर्ग विश्लेषण के कारणI नीलेश एक ख़ास वर्ग से आती हैं और उस अनुभव को उन्होंने कविता में पिरोया, लेकिन मैंने उनकी कविताओं में उस स्वर को ढूँढा जिसे स्त्री स्वर कह सकते हैं I अगर आप उन्हें पढ़ना चाहते हैं तो उनकी स्त्री को आप अनुपस्थित नहीं कर सकते. इसी तरह गगन गिल के बारे में मैंने लगातार देखा कि लोग उनकी आलोचना करते हैं कि वे अँधेरे में चली गई हैं, बुद्ध की ओर चली गई हैं और यथार्थवादी जीवन से उनका संबंधविच्छेद-सा हो गया हैलेकिन जब मैं उन्हें पढ़ती हूँ या उनका पाठ करती हूँ तो पाती हूँ कि वे कहीं नहीं गई हैं.अपने ही स्पेस में हैं.एक स्त्री के स्पेस में. उनका जीवन जो उनकी वेदना का स्रोत है वो उनके स्त्री होने को लेकर ही है.संतान न होने का भयानक दुःख उनके भीतर है और उनकी कविताओं में भी अभिव्यक्त होता है. कोई भी स्त्री उस स्वर को समझ सकती है और उसके बाद वे देखतीं हैं कि इस दुःख से निजात पाने के लिए उन्हें एक दूसरी कॉस्मोलोजी का ही सृजन करना होगा.उस तलाश में वे बुद्ध के पास जाती हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि दुःख को पहचानने की एक दार्शनिक दृष्टि यहाँ है| इसलिए यह पाठ बहुत अलग है.आप इस विषय को बिना समझे उनकी आलोचना करके उनको ख़ारिज करते रहिए तो आप उनकी कविताओं को नहीं पढ़ सकेंगे.आप उन कविताओं को भी ख़ारिज कर देंगे जो महत्त्वपूर्ण कविताएँ हैं. स्त्री चेतना के लिए यह उसकी अपनी दिशा है. उसे समझने के लिए आपको इस तरह के पाठ से मदद मिलेगी.

मैं यह मानती हूँ कि यह पाठ मैंने यह स्थापित करने के लिए किया है कि स्त्रियों द्वारा लिखी गई कविताओं का पाठ थोड़े अलग ढंग से करना चाहिए क्योंकि यह जिस चेतना की उपज हैं उसमें उसका स्त्री होना केंद्र में है. अगर आप इसको नदारद कर देंगे तो आप उसके आस-पास तो पहुँच सकते हैं लेकिन बहुत करीब नहीं जा सकते और पाठ को खोलना बहुत ज़रूरी है.ख़ासकर आज आलोचना की जो स्थिति है वह स्त्रीवादी नहीं है उसमें स्त्री के प्रति वह संवेदना नहीं है.मेरा ख़याल है कि जब इस तरह के कुछ और पाठ होंगे तो पाठ करने का जो यह ढंग है वह हिंदी आलोचना में ज़रूरी तौर पर शामिल हो जाएगा और इस अर्थ में यह हो सकता है कि यह प्रतिमान बने लेकिन उसकी मुझे ज़्यादा चिंता नहीं है.मुझे केवल इस बात में रूचि है कि जब हम इन कविताओं को पढ़ते हैं तो उनको थोड़ा सही ढंग से, थोड़ा करीब जाकर पढ़ सकें.

स्त्री-कविता और जेंडर निरपेक्षता 

हमारा पहला कदम तो जेंडर संवेदनशीलता
का ही होना चाहिए यानी कि एक संवेदना होनी चाहिए जिससे यह समझा जाए, कि दो लैंगिक समुदायों के बीच संबंध ठीक-ठाक नहीं हैं. इनको ठीक करने के लिए जेंडर सेंसिटाईज़ेशन ज़रूरी है.आज हम जो बहुत सारा लेखन कर रहे हैं वह उस संवेदना को पैदा करता है लेकिन जेंडर न्यूट्रल होना एक बहुत वृहत किस्म की ऐतिहासिक-सामाजिक प्राप्ति होगी.जेंडर न्यूट्रल वही समाज हो सकता है जहाँ जेंडर की असमानताएँ समाप्त हो चुकी हों I स्वीडन वगैरह ख़ास कर नोरडीक देशों में जेंडर निरपेक्ष पॉलिसिज़ बन रही हैं.यह बहुत ही प्रसन्न करने वाली बात है क्योंकि जेंडर के स्तर पर उनके समाज में जो असमानताएँ थीं उन्हें उन्होंने ख़त्म करने की कोशिश की है. कैसे ? औरतों के लिए सबसे बड़ी मुसीबत यह है कि पितृसत्ता ने हमारे समाज को श्रम विभाजन के आधार पर विभाजित किया है.बहुत ही ठोस ढंग से स्त्री और पुरुष को असमान बनाया है.हम कौन से काम करते हैं उससे निश्चित होता है कि समाज में हमारी भूमिका क्या होगी. अगर हमारे देश मेंस्त्री जानवरों से भी ज़्यादा काम करती है (जिसके आँकड़े भी हैं) और वो काम इतने भारी काम हैं कि अगर वे न किए जाएँ तो दूसरे काम भी नहीं हो सकते तो इससे क्या असमानताएँ पैदा हो रही हैं, इसे तो समझना ही पड़ेगा. बात यह है कि इसके बावजूद उसके श्रम का कोई मूल्य नहीं है.स्वीडन जैसे देशों में आप पाएँगे कि जेंडर के आधार पर इस तरह के विभाजन को समाप्त करने की कोशिश की गई है.वहाँ पर वेल-बीइंग की बात होती है यानी हम कैसे स्वस्थ जीवन जिएँ घरेलू काम कौन करेगा? वह किस तरह बँटेगा, सरकार सिर्फ स्त्रियों को ही प्रसूति के लिए छुट्टी देगी या पुरुषों को भी छुट्टी देगी.अगर बच्चे हैं तो पिता को भी छुट्टी मिलनी चाहिए.एक दिन में कितने घंटे काम किया जाना चाहिए जिससे कि आपकी मनुष्यता विकसित हो. जब आप इस तरह से विचार करने लगेंगे सारा समाज ऐसे सोचेगा तब वहाँ अर्थव्यवस्था या पितृसत्ता पर टिकी असमानताएँ सुलझने लगती हैं. यहसब हमारे देखते-देखते हुआ है कि जेंडर निरपेक्ष पॉलिसिज़ बन रही हैं. इसीलिए जेंडर निरपेक्षता को हासिल किया जा सका हैI  अगर हम जुट जाएँ कि हम उन चीज़ों को अपने समाज से दूर करें, निकाल बाहर करें जो हमें असमान बनाती हैं Iतब हम एक साथ गरिमापूर्ण समाज में गरिमा के साथ जीने वाले स्त्री-पुरुष बना ही सकेंगे.

सामाजिक परिवर्तन में स्त्री-कविता की भूमिका 

सामाजिक परिवर्तन में स्त्री-कविता
अपनी भूमिका निभाएगी क्या, वह निभा रही है. वह सबके बीच यह चेतना स्थापित कर रही है कि हर मनुष्य चाहे वह कहीं हो, यह कविता चाहती है कि उसकी गरिमा हो.उसे एक न्याय मिले, उसके निम्नतर होने की चेतना निरस्त हो. बहुत सारी स्थितियाँ जो हमारे लिए तकलीफदेह हैं–हिकारत, असामनता, हिंसा, अन्याय, इन सारी स्थितियों को बदलने का काम हिंदी की स्त्री-कविता कर रही है और सिर्फ राजनितिक ढंग से ही नहीं, दर्शन और सभ्यता विमर्श के तहत भी वह उस काम को कर रही है. मुझे अपनी समकालीन स्त्री कवियों से बहुत उम्मीदे हैं.

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हाशिये पर मुसलमान औरत: कुरान में ही हैं इसकी वजहें

 प्रेमकुमार मणि

 प्रेमकुमार मणि चर्चित साहित्यकार एवं राजनीतिक विचारक हैं. अपने स्पष्ट राजनीतिक स्टैंड के लिए जाने जाते हैं. संपर्क : manipk25@gmail.com

किसी भी समाज में नई चेतना प्रस्फुटित होने पर हलचल स्वाभाविक तौर पर होती ही है . अरब के समाज में मुहम्मद साहब ने जब इस्लाम का प्रस्ताव रखा था ,तब उनका बहुत विरोध हुआ था.बहुत मुसीबतें झेली थीं उन्होंने . उन्हें मक्का से मदीना शिफ्ट यूँ ही नहीं करना पड़ा था. जितने भी समाज सुधारक या पैगम्बर हुए उन्होंने विरोध और तकलीफें झेलीं.

हम दुनिया भर की बात करेंगे ,तो करते ही रह जायेंगे .क्योंकि तब हमें क्राइस्ट के सूली चढ़ने से लेकर लिंकन और गाँधी के गोली खाने तक की घटनाएं सुनानी पड़ेंगी. इसलिए अपनी जमीन भारत पर लौटते हैं.उन्नीसवीं सदी में राजाराममोहन राय ने जब सतीप्रथा को ख़त्म करने का प्रस्ताव लाया तब कितना नहीं विरोध हुआ. सती प्रथा हिन्दुओं की ऊँची जातियों में प्रचलित थी . हज़ारों स्त्रियां मृत पति के साथ जिन्दा जला दी जाती थीं . उदहारण केलिए एक आंकड़े के अनुसार 1815 से 1824 तक की नौ साल की अवधि में केवल सात शहरों (कोलकाता ,कटक ,ढाका ,मुर्शिदाबाद ,पाटण,बरेली और बरैन ) में छह हज़ार से अधिक स्त्रियां सती हुई थीं . यह सब जानकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं . राजा राममोहन राय ने जब इसके विरोध में आवाज उठाई ,तब सबसे पहले उनकी माँ ने उनका विरोध किया . वह घर से बाहर हो गए ,या कर दिए गए . उन्होंने धर्मशास्त्रों में से अपने समर्थन केलिए सूत्र निकाले ,क्योंकि उन्हें जिस रूढ़ तबके को समझाना था ,वे शास्त्र की ही दुहाई देते थे . लेकिन उन्हें लगा कि इतने भर से काम नहीं चलेगा . उन्होंने सरकार पर दबाव बनाया कि वह इस अमानवीय प्रथा के खिलाफ अपने प्रभाव का इस्तेमाल करे अर्थात कानून बनाये और उसे सख्ती से लागू करे . विलियम बेंटिक ,जो तब गवर्नर जनरल थे ,इससे सहमत थे ,क्योंकि वह ब्रिटेन में भी सामाजिक सुधारों के सवाल से जुड़े थे .उनके प्रयास से कानून बना .राजा राममोहन राय की आज भले ही इज़्ज़त हो ,उनके समय में उनकी यही इज़्ज़त थी कि जब वह लंदन में मरे ,तब बहुत दिनों बाद कोलकाता के एक अख़बार में छोटा सा समाचार छपा कि एक दुष्टात्मा की मौत हो गई .बंगाली भद्र समाज उनकी मौत पर इत्मीनान महसूस कर रहा था . ऐसा ही विरोध ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने झेला था ,विधवा विवाह के सवाल पर .महाराष्ट्र में जोतिबा फुले और पंडिता रमा बाई ने जो कष्ट झेले ,विरोध बर्दास्त किये उसे बयां करने केलिए कई ग्रन्थ लिखने होंगे . बीसवीं सदी में ही आंबेडकर साहब जब हिन्दू कोड बिल ला रहे थे ,तब जो विरोध और अपमान झेला था ,उसकी तरफ एक नज़र जरा देखिये . विरोध तो होंगे ,लेकिन क्या इन्साफ की लड़ाई को इस डर से छोड़ दिया जाना चाहिए ? …… ( जारी )

जाने उन पांच महिलाओं को और उनकी कहानी जो तीन तलाक को रद्द कराने में सफल हुईं

अभी मुस्लिम स्त्रियों के तीन तलाक़ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसला दिया है ,उस पर बहस छिड़ गई है . अच्छी बात है . शुरुआत तो हुई . दाढ़ी -टोपी वाले कह रहे हैं कि यह हमारे मुस्लिम समाज में हस्तक्षेप है .ऐसी ही बातें विलियम बेंटिक और राजाराममोहन राय के ज़माने में हिन्दू चुटियाधारी भी कह रहे थे . 1857 के विद्रोह के कारणों में एक यह भी था कि कुलीन हिन्दू -मुस्लिम तबका अंग्रेजी राज से इस बात को लेकर खफा था कि वह हमारे धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप कर रहा है . हिन्दुओं और मुसलमानों का रजवाड़ी और प्रतिगामी तबके का एक हिस्सा इकठ्ठा होकर 1857 बन गया था . कुछ यही कारण रहा होगा कि बड़े समाज सुधारकों ने इस बलवे को ख़ारिज कर दिया था . इसमें जोतिबा फुले भी थे और सैयद अहमद खान भी . इसीलिए हमें रूढ़िवादियों के विरोध से डरने कि ज़रूरत नहीं है . हमें यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि विरोध करने वालों का मक़सद क्या है .

हमें इस बात पर भी भी गौर करना चाहिए कि क्या सुधारों से कोई समाज कमजोर होता है ? क्या हिन्दुओं के समाज सुधार से हिन्दू समाज कमजोर हुआ ? यूरोप में ईसाइयत के बीच चले प्रोटेस्टेंट मूवमेंट से यूरोपीय अथवा क्रिस्तियन समाज कमजोर हो गया ? क्या कोई गुसल -स्नान करने से ,गंदे कपडे साफ़ कर लेने से कमजोर हो जाता है ? क्या इस्लाम में हजरत के ज़माने में या उसके बाद कोई सुधार नहीं हुआ ? क्या मुहम्मद ने अपने अनुयायियों को अपनी बुद्धि ताक पर रख देने की सीख़ दी थी ?

इस्लाम ईसा की सातवीं सदी और अरबी समाज का धर्म दर्शन है . अरब का समाज बेहद पिछड़ा था . कबायली समाज बिना कृषि और सामंतवादी दौर से गुजरे व्यापारिक गतिविधियों से जुड़ने लगा था . इसलिए पूरे अरब में सामाजिक तनाव का माहौल था. लूट -मार मची थी . मुहम्मद साहब को एक कबायली चेतना को आध्यात्मिक बनाना था . यह आसान नहीं था . वहां गुलामों और औरतों की स्थिति नाजुक होती जा रही थी ,क्योंकि हिंसा के माहौल में यही होता है . ऐसे माहौल से मुहम्मद साहब ने गुलामों ,गरीबों और औरतों के लिए कुछ सहूलियतें निकालीं. अपने आखिरी हज के वक़्त उन्होंने जो प्रवचन दिए उसमे कहा – “औरतों के मामले में अल्लाह से डरो, तुम्हारा औरतों पर और औरतों का तुम पर हक़ है .” यानि वह औरत-मर्द के बीच बराबरी की बात कह रहे है . कुरान में यह बराबरी नहीं दिखती . वहां वह एक मर्द को दो औरतों के बराबर धन में हिस्सा देते हैं . (सूरा 4 ). कहने का तात्पर्य कि स्थितियों के अनुसार बदलाव उस ज़माने में भी होते रहे थे . कुरान में सूरा 24 अल -नूर (दिव्य -प्रकाश ) एक तरह से स्त्री विमर्श है . इसमें कुल चौंसठ आयतें हैं . इसके पीछे एक कहानी है . हजरत को अपनी पत्नी आयशा के चरित्र पर शक हुआ और उनसे पवित्रता के सबूत मांगे . सबूत देने से आयशा ने इंकार कर दिया और मायके चली गईं . कुछ समय बाद हजरत आयेशा से मिलने पहुंचे और फिर सबूत मांगे . आयशा ने कहा -आप कहते हैं अल्लाह सब जानता है और आप उनसे संपर्क में हैं .आप उन्ही से पूछ लीजिए. इस के बाद हजरत पर वहि (ईश्वरीय सन्देश ) उतरने लगे और उन्होंने आयशा से कहा -अल्लाह ने आपके बेगुनाह होने को ज़ाहिर कर दिया .

लेकिन इन सबके बावजूद हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कुरान एक पुरुष द्वारा तैयार की गई संहिता है . स्त्री वहां अन्य है. वह याचक है ,दाता नहीं . उसकी स्थिति अन्य धर्मों से थोड़ी अच्छी या बुरी हो सकती है लेकिन वर्तमान समय से उसका तालमेल है या नहीं यह देखना है . आज औरत मर्द दोनों को वोट के बराबर के अधिकार हैं . जेंडर भेद हमने नकार दिया है . यह सब भी किसी कुरान -पुराण से मेल नहीं खाता और यह सामाजिक धार्मिक हस्तक्षेप भी है . यही तो सेकुलर समाज का पहला पाठ है .

मुस्लिम महिलाओं की निर्णय स्वतंत्रता: प्रतिरोध का एक स्वरूप


औरतों के मामले में लगभग सभी धर्म आदर और पूजा भाव तो ज़रूर पालते रहे ,लेकिन मानवीय स्तर पर कमतर बना कर रखा .इसीलिए उन्नीसवीं सदी में सभी समाज सुधारकों ने स्त्रियों के सवाल को अपना केंद्रीय विषय बनाया . अफ़सोस कि मुसलमानों के बीच यह नहीं हुआ या अपेक्षाकृत काफी कम हुआ .

मुस्लिम जमातों के बीच नवजागरण की लहर कमजोर तो रही ही ,एक भिन्न अंदाज़ में भी रही . अंग्रेजों के आने के पूर्व लगभग दो तिहाई हिंदुस्तान मुसलमान शासकों के अधीन था . अंग्रेजों ने मुख्य रूप से उन्हें ही अपदस्थ किया था . अपदस्थ होने वालों में मराठा -पेशवा भी थे . लेकिन मुसलमानो का शासक तबका अंग्रेजों के काफी खिलाफ था . अंग्रेज उन्हें फूटी आँख नहीं सुहाते थे . रोष पेशवाओं में भी था . मुसलमानों और पेशवाओं के अंग्रेज विरोध -जिसे कुछ लोग देशभक्ति भी समझते हैं – का कारण समझना मुश्किल नहीं है .

1860 के बाद मुस्लिम समाज से आये होशियार तबियत के एक इंसान सैयद अहमद खान ने महसूस किया कि अब राज -पाट लौटने का ख्वाब देखना बेकार है . अंग्रेजों से समझौता करो ,उनकी तहजीब सीखो , जुबान सीखो और राज -व्यवस्था का हिस्सा बनो . सैयद अहमद खान का आंदोलन उच्च मुसलमानों का आंदोलन था ,जिन्हे असरफ कहा जाता है . वह खुद नीची ज़ात के मुसलमानों , जैसे जुलाहे कुंजड़ों आदि के लिए हिक़ारत पालते थे . स्त्रियों के सवाल पर भी विचार करने केलिए उनके पास फुर्सत नहीं थी .तब भारत में मुसलमानों की आबादी कुल आबादी के लगभग एक तिहाई थी . लेकिन जाहिर है ,उनकी मानसिकता पर मुश्किल से दस फीसद असरफ हिस्से का कब्ज़ा था .इनकी . आवाज ही मुस्लिम आवाज होती थी .इन असरफों का एक खास हिस्सा कुछ ज्यादा ही ढपोरशंख था . अरब और ईरान में अपनी जड़ें तलाशने का इन्हे खूब शौक था . हिन्दुओं के सवर्ण हिस्से से तो इन्होने थोड़ा तालमेल कर लिया था ,लेकिन अपने ही निचले हिस्सों को ,जिन्हे ये कमजात और कमीना कहते थे ,एक दूरी बना कर रखी थी .औरतों के सवाल पर सवर्ण हिन्दुओं और असरफ मुसलमानों में इतना अंतर जरूर था की मुसलमानों के यहां सतीप्रथा नहीं था और विधवा विवाह की मनाही नहीं थी . वहां दूसरी समस्याएं थीं .जैसे तलाक़ और पर्दा ( बुर्के ) की प्रथा .इन सब की ओर ध्यान नहीं दिया गया .

कुछ खास कारण थे ,जिसके फलस्वरूप मुसलमानों में जोतिबा फुले और रमाबाई जैसे लोग नहीं हुए . पृथक पहचान का सवाल असरफ मुसलमानों केलिए हमेशा बड़े काम का रहा है ,क्योंकि इसी के बूते बाकि मुसलमानों पर उनका वर्चस्व बना रहता है .सैयद अहमद खान के प्रयासों से जो मध्यवर्ग वहां बना उसका मिज़ाज़ जितना आधुनिक होना चाहिए था ,नहीं हुआ .मुसलमानों के बीच कोई ताक़तवर सामाजिक इंक़लाब नहीं दिखा . जब डेमोक्रेसी अथवा जम्हूरियत के विचार राजनीति में उभरने लगे ,तब इन असरफ मुसलमानों ने पहचान की कवायद और तेज कर दी . उनके आर्थिक -सामाजिक मुद्दे गौण हो गए ,राजनीतिक अधिकार के मुद्दे आगे कर दिए गए .अंतत: बीसवीं सदी में पाकिस्तान बन ही गया . पाकिस्तान बन जाने के बाद भी बड़ी सख्या में मुसलमान भारत में रहे .लेकिन अब वे अकलियत थे . भारत ने चुकी बिना किसी भेद भाव के अपने को सेक्युलर स्टेट घोषित किया था ,इसलिए सबको समान नागरिक अधिकार दिए गए .प्रधानमंत्री नेहरू ने सबको समान अवसर का भरोसा दिया . उन्होंने पूरी दुनिया के उतार-चढाव को समझा था . दुनिया भर के इतिहास और राजनीति की उन्हें जानकारी थी . वह हिंदुस्तान को एक आदर्श लोकतंतंत्रिक देश बनाना चाहते थे .लेकिन यह भी जानते थे की एक सेक्युलर समाज द्वारा ही यह संभव है , और ऐसा समाज वैज्ञानिक चेतना से ही बन सकता है .इसलिए उन्होंने साइंटिफिक टेम्पर विकसित करने पर जोर दिया.नेहरू ने आत्मकथा में और भारत के सामाजिक मसलों पर विचार करते हुए कई दफा मुसलमानो के पिछड़ेपन पर अपना रंज व्यक्त किया है.

सुधार नहीं पूर्ण बदलाव चाहेंगी महिलायें

अपनी किताब “ग्लिम्प्सेस ऑफ़ वर्ल्ड हिस्टरी ” में वह तबियत से कमाल पाशा के सुधारों और आधुनिकता के प्रति उसके दीवानेपन की चर्चा करते हैं . दाढ़ी -टोपी ,खास तरह की टोंटीदार लुटिया और उटांग पायजामे का वह मज़ाक उड़ाते हैं और मुसलमानों को मुख्य धारा में शामिल होने का आह्वान भी करते हैं . लेकिन बदकिस्मती से मुसलमानों के बीच यह सब प्रभावी नहीं हुआ . दाढ़ी -टोपी वाला समूह सातवीं सदी और अरब की मानसिकता से निकलने केलिए तैयार नहीं था.आर्किड़िया के अपने सुख होते हैं . हिन्दुओं के बीच भी चुटियाधारी खूब सक्रिय थे . इन्ही लोगों ने हिन्दू कोड बिल का विरोध किया था . (दिलचस्प यह है कि हिन्दू कोड बिल का विरोध करने वाले कॉमन सिविल कोड की वकालत करते हैं . )लेकिन हिन्दुओं के बीच एक सेकुलर और आधुनिक समूह बन चुका था ,जिसने इसे लेकर संघर्ष किया . यह संघर्ष कई रूपों में आज भी चल रहा है और आगे भी चलेगा ,क्योंकि सुधार एक सतत प्रकिया है . इसके थम जाने का अर्थ है गतिहीनता ,और गतिहीनता मतलब मृत्यु .

मुस्लिम समाज इसी गतिहीनता का शिकार हुआ जा रहा है . यह अफसोसजनक है . मुसलमानों की सामाजिक -आर्थिक स्थिति इतनी दयनीय है की रोंगटे खड़े हो जाते हैं . कोई बारह साल पहले एक संस्था ने अपने अध्ययन में पाया था क़ि साठ फीसद बीमार मुसलमान इलाज़ के बजाय दुआ -ताबीज़ से काम चलाते हैं .
मदरसों ने उनमे इल्म कम ज़हालत ज्यादा पैदा की है .रोजगार के अवसर उन्हें कम से कम मिल रहे हैं . गरीबी ऐसी है कि बाज़ दफा मज़दूर -गरीब परिवार की महिलाएं अपना खून बेचकर रोटी खरीदती हैं . दाढ़ी -टोपी वालों को हज और हज भवन की चिंता ज्यादा रहती है . इस्लाम की चिंता उनके लिए सर्वोपरि है ,मुसलमानों की नहीं . वे हरी दुनिया के बाशिंदे हैं . बहुजन मुसलमान भूरी -धूसर-भुतही दुनिया में सांसें गिन रहे हैं .

कौन हैं जिन्हे शरीयत और कुरान की अधिक चिंता है ? औरतें तो खुद ही आधी आबादी हैं . और फिर गरीब -गुरबे मिहनतक़श मुसलमान हैं . दस फीसद दाढ़ी -टोपी वाले और अब जिनमें टाई-शूट वाले भी शामिल हो गए हैं ,सुधारों का विरोध करता है . यही तबका कॉमन स्कूलों की जगह मदरसों की वकालत करता है . लेकिन इनसे पूछिए इनके बच्चे अंग्रेजी स्कूलों में क्यों पढ़ते हैं ,तब ये बगलें झांकने लगेंगे .

मुस्लिम समाज को सुधारों की कुछ ज्यादा ही ज़रूरत है . किसी भी समाज में सुधार औरतों के मसले से शुरू होता है . मुस्लिम औरतों को अपने हक़ -हक़ूक़ केलिए तन कर खड़ा होना है . खुली तबियत के लोग उनकी लड़ाई का समर्थन करें . इससे न केवल मुलिम औरतों को इंसानी ज़िन्दगी का अवसर मिलेगा ,बल्कि पूरे मुस्लिम समाज का भला होगा . मुस्लिम स्त्रियां यदि शिक्षित और आधुनिक बनेंगी तब पूरी मुस्लिम बिरादरी शिक्षित और आधुनिक हो जाएगी . इसलिए मुस्लिम औरतों की आज़ादी का सवाल अहम मसला है.

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एक राजधानी: जहाँ टॉयलेट ढूंढते रह जाओगे. महिलाओं ने बयान किया दर्द

स्वच्छता अभियान, महिला हित के दावे और सच यह कि इस राजधानी में इक्के-दुक्के गंदे सार्वजनिक शौचालयों को छोड़कर कई-कई किलोमीटर तक एक शौचालय, टॉयलेट आप ढूंढते रह जायेंगे.हजारो कामकाजी महिलायें यहाँ आस-पास के इलाकों से आती हैं, लेकिन नैचुरल कॉल या तो घंटो रोकना पड़ता है, या सार्वजनिक जगहों पर उन्हें निपटना पड़ता है.

 

 

मुझे वेश्या बना दिया है : अटल बिहारी वाजपेयी को बलात्कार पीड़िता ने बताया था राम रहीम का सच


आज  हरियाणा  के पंचकुला  में सीबीआई  के  स्पेशल  कोर्ट  ने डेरा  सच्चा  सौदा  के  स्वयंभू  बाबा  को  15  साल  पुराने  बलात्कार  के  मुकदमे  का  दोषी  सिद्ध  कर  दिया . उसके  बाद  पूरे  हरियाणा  में  जबरदस्त तोड़-फोड़  और  हिंसा  हुई , उसकी  आग  दिल्ली  तक पहुँची . ऐसा  लगा  कि  हरियाणा  सरकार  की  शह  पर उपद्रवी  इकट्ठे  हुए  और  उन्होंने  आगजनी  की.  15  साल  तक बलात्कार की  पीडिताओं   ने  संघर्ष  किया. 2002 में  भारतीय  जनता  पार्टी  की  सरकार  थी . तब  प्रधानमंत्री  अटल  बिहारी  वाजपेयी  को  उन्होंने  खत  लिखा . हालांकि  वाजपेयी  ने  उस  ख़त  को  नजरअंदाज  कर  दिया  था . पढ़ें  किन शब्दों  में  अपनी  पीड़ा , खौफ  और संघर्ष  और  अपने  यौन  शोषण  की  दास्तान लिखी थी   तब  गुमनाम  पीडिता  ने . 

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 मैं पंजाब की रहने वाली हूं और अब पांच साल से डेरा सच्चा सौदा सिरसा (हरियाणा, धन धन सतगुरु तेरा ही आसरा) में साधु लड़की के रूप में कार्य कर रही हूं. सैकड़ों लड़कियां भी डेरे में 16 से 18 घंटे सेवा करती हैं. हमारा यहां शारीरिक शोषण किया जा रहा है. मैं बीए पास लड़की हूं. मेरे परिवार के सदस्य महाराज के अंध श्रद्धालु हैं, जिनकी प्रेरणा से मैं डेरे में साधु बनी थी.

पीड़िता का पत्र और बलात्कार का दोषी सिद्ध राम रहीम

साधु बनने के दो साल बाद एक दिन महाराज गुरमीत की प्रमाशया साधु गुरजोत ने रात के 10 बजे मुझे बताया कि महाराज ने गुफा (महाराज के रहने के स्थान) में बुलाया है.मैं क्योंकि पहली बार वहां जा रही थी, मैं बहुत खुश थी. यह जानकर कि आज खुद परमात्मा ने मुझे बुलाया है.गुफा में ऊपर जाकर जब मैंने देखा महाराज बेड पर बैठे हैं. हाथ में रिमोट है, सामने टीवी पर ब्लू फिल्म चल रही है. बेड पर सिरहाने की ओर रिवॉल्वर रखा हुआ है.
मैं ये सब देख कर हैरान रह गई… मेरे पांव के नीचे की ज़मीन खिसक गई. यह क्या हो रहा है. महाराज ऐसे होंगे, मैंने सपने में भी नहीं सोचा था. महाराज ने टीवी बंद किया व मुझे साथ बिठाकर पानी पिलाया और कहा कि मैंने तुम्हें अपनी खास प्यारी समझकर बुलाया है. मैं ये सब देख कर हैरान रह गई… मेरे पांव के नीचे की ज़मीन खिसक गई.

यह क्या हो रहा है. महाराज ऐसे होंगे, मैंने सपने में भी नहीं सोचा था. महाराज ने टीवी बंद किया व मुझे साथ बिठाकर पानी पिलाया और कहा कि मैंने तुम्हें अपनी खास प्यारी समझकर बुलाया है. मेरा ये पहला दिन था. महाराज ने मेरे को बांहों में लेते हुए कहा कि हम तुझे दिल से चाहते हैं. तुम्हारे साथ प्यार करना चाहते हैं क्योंकि तुमने हमारे साथ साधु बनते वक्त तन मन धन सतगुरु को अर्पण करने को कहा था. सो अब ये तन मन हमारा है.

मेरे विरोध करने पर उन्होंने कहा कि कोई शक नहीं, हम ही खुदा हैं. जब मैंने पूछा कि क्या यह खुदा का काम है, तो उन्होंने कहाः श्री कृष्ण भगवान थे, उनके यहां 360 गोपियां थीं. जिनसे वह हर रोज़ प्रेम लीला करते थे. फिर भी लोग उन्हें परमात्मा मानते हैं. यह कोई नई बात नहीं है.यह कि हम चाहें तो इस रिवॉल्वर से तुम्हारे प्राण पखेरू उड़ाकर दाह संस्कार कर सकते हैं. तु्म्हारे घर वाले हर प्रकार से हमारे पर विश्वास करते हैं व हमारे गुलाम हैं. वह हमारे से बाहर जा नहीं सकते, यह बात आपको अच्छी तरह पता है.

यह कि हमारी सरकार में बहुत चलती है. हरियाणा व पंजाब के मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री हमारे चरण छूते हैं. नेता हमसे समर्थन लेते हैं, पैसा लेते हैं और हमारे खिलाफ कभी नहीं जाएंगे. हम तुम्हारे परिवार से नौकरी लगे सदस्यों को बर्खास्त करवा देंगे.

पीडिता का पत्र

सभी सदस्यों को मरवा देंगे और सबूत भी नहीं छोड़ेंगे, ये तुझे अच्छी तरह पता है कि हमने पहले भी डेरे के प्रबंधक को खत्म करवा दिया था, जिनका आज तक अता-पता ना है. ना ही कोई सबूत बकाया है. जो कि पैसे के बल पर हम राजनीतिक व पुलिस और न्याय को खरीद लेंगे. इस तरह मेरे साथ मुंह काला किया और पिछले तीन माह में 20-30 दिन बाद किया जा रहा है.

हमें सफेद कपड़े पहनना, सिर पर चुन्नी रखना, किसी आदमी की तरफ आंख ना उठाकर देखना, आदमी से पांच-दस फुट की दूरी पर रहना महाराज का आदेश है. हम दिखाने में देवी हैं, मगर हमारी हालत वेश्या जैसी है.मैंने एक बार अपने परिवार वालों को बताया कि यहां डेरे में सब कुछ ठीक नहीं है तो मेरे घर वाले गुस्से में कहने लगे कि अगर भगवान के पास रहते हुए ठीक नहीं है, तो ठीक कहां है.

तेरे मन में बुरे विचार आने लग गए हैं. सतगुरु का सिमरन किया कर. मैं मजबूर हूं. यहां सतगुरु का आदेश मानना पड़ता है. यहां कोई भी दो लड़कियां आपस में बात नहीं कर सकती, घर वालों को टेलीफोन मिलाकर बात नहीं कर सकती. पिछले दिनों जब बठिण्डा की लड़की साधु ने जब महाराज की काली करतूतों का सभी लड़कियों के सामने खुलासा किया तो कई साधु लड़कियों ने मिलकर उसे पीटा.

कुरूक्षेत्र जिले की एक साधु लड़की जो घर आ गई है, उसने घर वालों को सब कुछ सच बता दिया है. उसका भाई बड़ा सेवादार था. जो कि सेवा छोड़कर डेरे से नाता तोड़ चुका है. संगरूर जिले की एक लड़की जिसने घर आ कर पड़ोसियों को डेरे की काली करतूतों के बारे में बताया तो डेरे के सेवादार गुंडे बंदूकों से लैस लड़की के घर आ गए. घर के अंदर कुण्डी लगाकर धमकी दी।


अतः आप से अनुरोध है कि इन सब लड़कियों के साथ-साथ मुझे भी मेरे परिवार के साथ मार दिया जाएगा, अगर मैं इसमें अपना नाम लिखूंगी….हमारा डॉक्टरी मुआयना किया जाए ताकि हमारे अभिभावकों को व आपको पता चल जाएगा कि हम कुमारी देवी साधू हैं या नहीं. अगर नहीं तो किसके द्वारा बर्बाद हुई हैं.”

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सुन्नत महिलाओं के पैदा होते ही कुचलने की मानसिकता है

 लेखिका: डा. नवल अल सादवी

प्रस्तुति एवं अनुवाद: सुधा अरोड़ा 

सामाजिक कार्यकर्ता और रचनाकार डॉक्टर नवल अल सादवी (हव्वा का पर्दानशीन चेहरा ) ने अपनी पुस्तक ‘द हिडेन फेस ऑफ ईव: वीमेन इन द अरब वर्ल्ड’ में सुन्नत की क्रिया का दिल दहला देने वाला वर्णन प्रस्तुत किया है।


सुन्नत की अमानवीय प्रथा को समाप्त करने के लिए अन्तरराष्ट्रीय  स्तर पर कोशिशें की गई हैं। 1994 में काइरो में संपन्न अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन में यह स्वीकार किया गया कि महिला सुन्नत मानवाधिकार का उल्लंघन है और इससे महिलाओं के स्वास्थ्य और  जीवन  को खतरा है। कई देशों में इस प्रथा पर रोक लगाने के लिए कानून बनाए गए हैं !


गांव कप्र तहला में जन्मी लेखिका डा. नवल अल सादवी ने नी डाक्टरी की शुरुआत गांव की अनपढ़ औरतों के बीच ही की, उसके बाद वह काइरो अस्पताल और फिर पलिक हेल्थ की निदेशक रहीं। 1972 में अपनी पहली विवादास्पद पुस्तक ‘वीमेन एंड सेक्स’ के प्रकाशन के तहत उन्हें अपनी निदेशक के ओहदे से हटना  पड़ा और ‘हेल्थ पत्रिका के संपादन से भी  उन्हें हटा दिया गया। इसके बावजूद नवल अल सादवी का लेखन जारी रहा और उन्होंने औरतों की सामाजिक स्थिति, मनोविज्ञान और यौन संबंधी प्रश्नों पर लिखना जारी रखा। उनकी लिखी सभी पुस्तकों पर मिस्र, सऊदी अरब, सूडान और लीबिया में प्रतिबंध लगाया जा चुका है। लेबनान, बेरुत से उनकी पुस्तकों का प्रकाशन हुआ है।

 नवल अल सादवी

‘द हिडेन फेस ऑफ ईव’ सादवी की अंग्रेजी में अनूदित पहली पुस्तक है। आयरीन. एल. गेंजियर ने इस किताब की भूमिका में लिखा है, ‘कुछ किताबों की यह नियति होती है कि वे पढ़ते हुए आपको आनंद नहीं देती, उन्हें पढ़कर आप खुश नहीं हो सकते। इन किताबों की सार्थकता इसी में है कि उन्हें पढ़ते वक्त आपके भीतर पैदा हुआ घृणा, शर्म या गुस्से का भाव आपको बहुत बेचैन कर देता है।’

जानें अरब देश की औरतों का सच !

सुन्नत की प्रथा: अरब देश की औरतें…


उस रात मैं छह साल की थी और अपने नर्म बिस्तर पर शांत और सुकून भरी नींद की उस खुमारी में थी जब जागने और सोने के बीच बचपन के गुलाबी सपने और खूबसूरत परियां पलकों पर तारी रहती हैं। उस नींद की खुमारी में मुझे लगा जैसे मेरे कंबल के नीचे अचानक कोई बड़ा-सा हाथ – ठंडा और रूखा – मेरे जिस्म पर कुछ टटोलता सा घूम गया है जैसे वह कुछ ढूंढ़ रहा हो। उसके साथ ही उतने ही बड़े और खुश्क हाथ ने मेरे मुंह को ढक लिया, होंठों से निकलती चीख को रोकने के लिए।

‘दर्दजा‘: हव्वा को पता होता तो वह बेऔलाद रह जाती

वे मुझे उठाकर बाथरूम में ले गए। मुझे पता नहीं, वे सब गिनती में कितने थे, आदमी थे या औरतें, मुझे उनके चेहरे भी याद नहीं। मेरे सामने की पूरी दुनिया एक स्याह अंधेरे में कैद थी, जो मुझे देखने से रोक रही थी। मुझे बस इतना याद है कि मैं बेतरह डर गई थी और वे एक नहीं कई थे और मेरी हथेलियों, बांहों और मेरी जांघों पर उनकी पकड़ लोहे सी सख्त थी, जिसकी वजह से मैं हिल भी नहीं पा रही थी। मुझे अपने जिस्म के नीचे बाथरूम की ठंडी टाइलों का स्पर्श याद है, जिसके इर्द-गिर्द कई सारी फुसफुसाती आवाजें थीं, जिसे बीच-बीच में सान पर चढ़ाई जाती छुरी का स्वर तोड़ रहा था। मेरी बंद आंखों के सामने ईद का दिन कौंध गया, जब बकरे को जिबह करने से पहले कसाई अपने छुरे की धार तेज करता था।

मेरा खून मेरी पसलियों में जम गया था। मुझे लगा, मेरे घर में कुछ चोर घुस आए थे, जो मुझे मेरे बिस्तर से उठा लाए थे और अब मेरा गला काटने के लिए तैयार हो रहे थे। किस्सों-कहानियों में सुनी हुई बिल्कुल अपने जैसी उस बागी लड़की की तरह, जिनके किस्से मेरी गांव की दादी मां बड़े प्यार से मुझे सुनाया करती थी।
उस लोहे के औजार की घिसघिसाहट सुनने के लिए मैंने अपने कानों पर जोर डाला। जैसे ही वह आवाज रुकी, मेरे दिल ने उसके साथ ही धड़कना बंद कर दिया था। मैं देख नहीं पा रही थी और मेरी सांस भी उसके साथ ही थम गई थी, लेकिन मैं महसूस कर रही थी कि लोहे का वह औजार धीरे-धीरे मेरे बहुत नजदीक आ रहा था। उन सख्त हाथों का दबाव जरा भी ढीला नहीं पड़ रहा था और मुझे लगा अब वह तेज किया हुआ छुरा सीधे मेरे गले की ओर बढ़ रहा है, लेकिन वह मेरी गर्दन की ओर नहीं, पेट पर नीचे की ओर मेरी जांघों के बीच जैसे कुछ ढूंढ़ता सा बढ़ रहा था। उसी पल मैंने महसूस किया कि मेरे दोनों पैरों को, जांघों को और निचले हिस्से को जितना चौड़ा खींचा जा सकता था, खींच दिया गया था, फिर अचानक छुरे की तेज धार मेरी जांघों के बीच गिरी और मेरे शरीर से मांस का एक टुकड़ा अलग होकर जा पड़ा।

अपने मुंह पर पड़ी हथेली के सख्त दबाव के बावजूद मैं दर्द से बेइंतहा चीखी, क्योंकि वह दर्द सिर्फ दर्द नहीं था, जैसे आग की एक तीखी लपट मेरे पूरे शरीर को चीरती हुई मेरे भीतर से गुजर रही थी। कुछ पलों के बाद मैंने देखा, मेरे कूल्हों के आसपास खून का तालाब बन रहा था।

मुझे नहीं मालूम था, मेरे शरीर में से उन्होंने क्या काट डाला था। मैंने इसे जानने की कोशिश भी नहीं की। मैं सिर्फ रो रही थी और अपनी मां को मदद के लिए चीख-चीख कर पुकार रही थी और मुझे सबसे गहरा सदमा पहुंचा, जब मैंने अपने आसपास देखा और पाया कि मां मेरी बगल में खड़ी थी। हां, यह मेरा वहम नहीं था, वह मेरी मां ही थी, अपने हाड़-मांस के साथ, उन अजनबी औरतों के ठीक बीचोबीच, उनसे बतियाती और मुस्कुराती जैसे अभी कुछ मिनटों पहले उनकी बेटी को जिबह करने में उनकी कोई हिस्सेदारी न रही हो।

हव्वा की बेटी : उपन्यास अंश, भाग 2

वे मुझे उठाकर बिस्तर तक ले गए। मैंने देखा, अब वे मेरी बहन को, जो मुझसे दो साल छोटी थी, बिल्कुल उसी तरह उठाकर ले जा रहे थे, जैसे वे मुझे ले गए थे। मैं अपनी पूरी ताकत के साथ चिल्लाई – नहीं, नहीं। मैं उन बड़े-बड़े सख्त हाथों के बीच अपनी बहन का मासूम चेहरा देख रही थी। एक क्षण के लिए मेरी आंखों उसकी बड़ी-बड़ी काली आंखों में जमी दहशत से टकराई। उसकी आंखों का वह भयावह खौफ में कभी भूल नहीं सकती। दूसरे ही पल बाथरूम के उसी दरवाजे के पीछे वह बंद हो गई थी, जहां से मैं अभी-अभी होकर आई थी।

मेरा परिवार एक अशिक्षित परिवार नहीं था। उस समय के स्तर से मेरे माता-पिता पढ़े-लिखे थे। पिता अपने प्रांत के ग्रेजुएट थे और शिक्षा नियंत्रक के औहदे पर थे। मेरी मां की शिक्षा फ्रेंच स्कूल में हुई थी और उनके पिता सेना में थे, लेकिन गांव हो या शहर, उच्च वर्ग हो, मध्य या निम्न मध्यवर्ग, सुन्नत की प्रथा का प्रचलन हर क्षेत्र में कायम था। कोई भी लड़की अपनी योनि के ऊपरी हिस्से (clitoris) को कटवाए जाने से बच नहीं सकती थी। जब मैंने स्कूल में अपनी साथिनों से अपने अनुभव को बांटा तो मुझे पता चला कि बिना किसी अपवाद के हर एक लड़की इस मर्मांतक अनुभव का शिकार हो चुकी थी।

इस हादसे की याद बहुत बाद में भी एक दुःस्वप्न की तरह मुझे पीछे धकेलती रही। मुझमें एक असुरक्षा की भावना ने घर कर लिया था कि मेरे साथ कुछ भी घट सकता है। जिस दिन मैंने जिंदगी में आंखें खोलीं, समाज ने मुझे बता दिया था कि मैं लड़की हूं और कि ‘बिंत’ (लड़की) शब्द का जब भी उच्चारण किया जाएगा, माथे पर सलवटों के साथ ही किया जाएगा।

1955 में जब मैं डाक्टर बनी, मैं कभी वह दर्दनाक घटना भूल नहीं पाई, जिसने एकबारगी मेरा बचपन छीन लिया था और शादी के बाद भी जिसने मुझे जिंदगी की पूर्णता और यौन के आनंद से मरहूम रखा, जो अंततः एक मनोवैज्ञानिक संतुलन से ही हासिल किया जा सकता है। जब मैं गांव में प्रैक्टिस कर रही थी, मुझे अपने दुःस्वप्न से कई-कई बार फिर से गुजरना पड़ा। अक्सर मुझे उन लड़कियों का इलाज करना पड़ता था, जो सुन्नत के बाद खून से तरबतर वहां आती थीं। सुन्नत करने वाली दाइयां अप्रशिक्षित होती हैं, जो आमतौर पर कांच के टुकड़े या विशेष किस्म के चाकू का इस्तेमाल करती हैं। सुन्नत करने के दौरान न तो एनस्थीसिया दिया जाता है, न किसी तरह का एंटीसेप्टिक लगाया जाता है। रक्तस्राव रोकने के लिए तरह-तरह की चीजें रगड़ दी जाती हैं, जिनसे संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। इस किस्म के अमानवीय और आदिम तरीके की वजह से बहुत सी लड़कियां सुन्नत के दौरान अपनी जान से भी हाथ धो बैठती थीं। कइयों को गंभीर किस्म का इंफेक्शन और सेप्टिक हो जाता था। और उनमें से अधिकांश इस बर्बर अनुभव की यातना के कारण मानसिक और यौन विक्षिप्ति का शिकार हो जाती थीं।

मुझे अपने डाक्टरी पेशे के कारण एक बार अरब देश के अलग-अलग हिस्सों से आई औरतों का परीक्षण करने का मौका मिला। इनमें सूडान की औरतें भी थीं। मैं उन्हें देखते हुए दहशत से भर गई कि सूडानी लड़की को सुन्नत की जिस प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, वह मिस्र की सुन्नत प्रथा से दस गुना ज्यादा क्रूर और बर्बर है। इस आपरेशन में जननेन्द्रिय के सभी बाहरी हिस्सों को निकाल दिया जाता है। योनि का ऊपरी हिस्सा तो वे काट ही देते हैं, साथ ही बाहरी पटल (labia majora) और भीतरी पटल (labia minora) को भी काट दिया जाता है। फिर उस घाव को सिला जाता है। इस दौरान सिर्फ योनि का छिद्र ही छोड़ दिया जाता है, जो घाव की मरम्मत के दौरान कुछ अतिरिक्त टांकों से छोटा कर दिया जाता है। इसका नतीजा यह होता है कि आमतौर पर शादी की रात उस संकुचित जगह को दोनों ओर से काट कर कुछ चौड़ा करना पड़ता है ताकि पुरुष का लिंग उसमें प्रवेश कर सके। जब किसी सूडानी औरत का तलाक होता है तो इस बाहरी खोल को फिर से कुछ टांकों द्वारा छोटा किया जाता है ताकि वह किसी से शारीरिक संबंध स्थापित न कर सके और अगर वह फिर से शादी करती है तो फिर से टांकों को खोला जाता है।

जब मैंने 1969 में सूडान की यात्रा की तो वहां की औरतों से बात कर और यह देखकर कि वहां गांव, कस्बे और बड़े शहरों की शत-प्रतिशत लड़कियां इस प्रथा की शिकार थीं और इस प्रथा की जड़ें गहरे धंसी हुई थीं, मुझमें गुस्से और विद्रोह का भाव कई गुना बढ़ गया। अपनी सारी डाक्टरी पढ़ाई और अपने अपेक्षाकृत खुले माहौल में बड़े होने के बावजूद मैं यह समझ पाने में असमर्थ थी कि लड़कियों को इस बर्बर प्रक्रिया से क्यों गुजरना पड़ता है। मैं हमेशा अपने आप से सवाल करती, क्यों? आखिर क्यों? मुझे इसका कोई जवाब नहीं मिलता। और यह सवाल मेरे दिमाग में उसी दिन पैदा हो गया था, जब मुझे और मेरी छोटी बहन का सुन्नत किया गया था।
बाद में अपने शोध के दौरान मैंने पाया कि मिस्र के अशिक्षित परिवारों में 97.5 प्रतिशत लड़कियां इस प्रथा का शिकार होती हैं, लेकिन शिक्षित परिवारों में यह प्रतिशत घटकर 66.2 प्रतिशत रह गया है।

जब-जब मैंने इस बारे में उन लड़कियों से बात की तो पाया कि उन्हें इसका कतई इलम ही नहीं था कि सुन्नत से उनके शरीर को कितना नुकसान पहुंचता है, बल्कि कुछ तो यह समझती थीं कि यह उनकी सेहत के लिए मुफीद है और उनके शरीर को पाक साफ रखने के लिए निहायत जरूरी है। सुन्नत की प्रक्रिया से गुजरी पढ़ी-लिखी औरतें भी इस तथ्य से अनजान थीं कि योनि के ऊपरी हिस्से को काट फेंकने का उनके मनोवैज्ञानिक और यौन संबंधों पर नकारात्मक असर पड़ता है। इन औरतों के बीच और मेरे बीच आमतौर पर इस तरह का एक औसत संवाद चलता था –
‘सुन्नत के समय तुम्हारी उम्र क्या थी?’
‘मैं बच्ची थी तब। यही कोई सात-आठ साल।’
‘तुम्हें आपरेशन की सारी बातें याद हैं?’
‘बिल्कुल! भला उन्हें कैसे भूला जा सकता है!’
‘क्या तुम्हें डर लगा था?’
‘बेहद! मैं जाकर अल्मारी के ऊपर छिप गई थी ( कोई कहती पलंग के नीचे, कोई पड़ोसियों के घर) लेकिन उन्होंने मुझे पकड़ ही लिया और उनके हाथों में मेरा पूरा शरीर कांप रहा था।’
‘दर्द महसूस हुआ?’
‘बेहद! मैं चीखी थी। मेरी मां ने मेरा सिर पकड़ रखा था ताकि मैं हिल भी न सकूं। मेरी चाची ने मेरा बायां हाथ पकड़ा था और दादी ने दायां। दो अजनबी औरतें, जिन्हें मैंने पहले कभी देखा नहीं था, मेरी दोनों जांघों को एक दूसरे से जितनी दूर तक अलग खींच सकती थीं, खींच रही थीं ताकि मेरे जरा भी हिलने की गुंजाइश न रहे। इन दोनों चेहरों के बीच हाथ में तेज धार वाला चाकू लिए दाई बैठी थी। जैसे ही उसने मेरे एक हिस्से को काटा, मेरे पूरे शरीर में आग की लपटें दौड़ रही थीं और मैं तेज दर्द से बेहोश हो गई थी।
‘आपरेशन के बाद क्या हुआ?’
‘मेरे पूरे शरीर में भयंकर दर्द था और मैं हिल भी नहीं सकती थी। कई दिन मैं बिस्तर पर ही रही। हर बार जब मैं पेशाब करने जाती तो कटी हुई जगह पर असहनीय जलन होती थी। घाव में से खून बहता रहता था और मेरी मां दिन में दो बार उस जगह की ड्रेसिंग बदलती थी। कितने ही दिन तक मैं पानी पीने से डरती थी ताकि पेशाब करने न जाना पड़े।’

सुधा अरोड़ा

‘जब तुम्हें पता चला कि तुम्हारे शरीर का एक छोटा-सा हिस्सा काट दिया गया है तो तुम्हें कैसा महसूस हुआ?’
‘मुझे सिर्फ यह बताया गया था कि यह एक मामूली सा आपरेशन है जो हर लड़की को पाक-साफ रखने के लिए किया जाता है और इससे उसकी इज्जत बची रहती है। जिस लड़की का आपरेशन नहीं किया जाता, उसका बर्ताब खराब होता है, वह लड़कों के पीछे भागने लगती है और उसके बारे में लोग-बाग बातें बनाने लगते हैं, जिसकी वजह से शादी की उम्र आने पर उससे कोई शादी करने को राजी नहीं होता। मेरी दादी ने बताया कि जांघों के बीच उस छोटे से हिस्से का बना रहना मुझे नापाक बना देगा और शादी के बाद मेरा शौहर मुझसे नफरत करने लगेगा।’
‘क्या तुम्हें इन दलीलों पर भरोसा हुआ?’
‘हां, हुआ। आपरेशन के बाद जब मैं बिल्कुल ठीक हो गई तो मुझे खुशी हुई कि मैंने उस चीज से छुटकारा पा लिया जो मुझे गंदा और नापाक बना सकती थी।’

मुझे कमोबेश सबसे यही जवाब मिलते थे। वहां ऐन शम्स स्कूल आफ मेडिसन के आखिरी साल की एक छात्रा थी। जब उससे मैंने यह सवाल किया कि क्या वह इसे मानती है कि औरत की योनि का ऊपरी हिस्सा काट दिया जाना एक सेहतमंद क्रिया है या कम से कम हानिकारक नहीं है?

‘मुझे तो सबने यही बताया है’, उसने कहा, ‘हमारे परिवार में सभी लड़कियां इस क्रिया से गुजरी हैं। मैंने डाक्टरी पढ़ी है पर मुझे आज तक किसी प्रोफेसर ने नहीं बताया कि एक औरत के शरीर में उसकी योनि के ऊपरी हिस्से (clitoris) की कोई अहमियत है, न ही हमारी मेडिकल किताबों में इसका कोई जिक्र है।’
‘यह सच है! आज तक चिकित्सा विज्ञान में औरत के जिन अंगों पर अलग से चर्चा की जाती है, वे उसकी जननेन्द्रियों से सीधे ताल्लुक रखते हैं जैसे योनि (vagina), गर्भाशय (uterus) और अंडकोश (ovaries)। चिकित्सा शास्त्र में योनि के ऊपरी हिस्से को उपेक्षित रखा गया है, उसी तरह जैसे वह समाज द्वारा उपेक्षित और तिरस्कृत है।’


‘दरअसल, एक बार एक छात्रा ने प्रोफेसर से क्लिटोरिस के बारे में पूछ लिया तो प्रोफेसर का मुंह तमतमा गया और उन्होंने रूखा-सा जवाब दिया कि आगे से कोई इस बारे में सवाल न पूछे क्योंकि औरत के जिस्म में इसकी कोई अहमियत नहीं है।’

यहीं से मेरी शोध शुरू हुई। मुझे यह जानना था कि सुन्नत की प्रथा का लड़की पर मानसिक रूप से और उसके सेक्स जीवन पर क्या असर होता है। पर मैंने जिनसे भी पूछा – सबने आंखें झुकाकर मेरी ओर देखे बिना यही उत्तर दिया कि उन पर कोई असर नहीं पड़ा। दरअसल, मिस्र की औरतें जिस तरह के सख्त और घुटे हुए माहौल में बड़ी होती हैं, वहां उनके लिए शादी के बाद शौहर के हाथ का पहला स्पर्श पाने से पहले किसी भी तरह के यौन सुख या अनुभव की बात करना भी गुनाह समझा जाता है। बहुत कोंचने पर शादीशुदा औरतों ने स्वीकार किया कि अपने पति के साथ सहवास के दौरान भी उन्होंने कभी रत्ती भर भी आनंद महसूस नहीं किया।
अपने शोध में 651 औरतों से सुन्नत के बारे में लंबी बातचीत करने के बाद जो नतीजे हाथ लगे, ये हैं –

1. सुन्नत एक ऐसा आपरेशन है, जो औरत के शरीर पर हानिकारक असर छोड़ता है। इससे उसकी कामवासना मंद पड़ जाती है और इससे औरत की यौन संबंध के चरम सुख तक पहुंचने की क्षमता कम हो         जाती है। अरब समाज में औरतों का सेक्स संबंधी ठंड़ापन (frigidity) मुख्यतः इसी कारण से है।

2. अशिक्षित परिवार आज भी परंपरा के तरह इसी धारणा को मानते हैं       कि लड़की की कामेच्छा के दमन का  एकमात्र तरीका सुन्नत ही है और     सुन्नत द्वारा ही उसके कौमार्य और इज्जत को शादी से पहले बरकरार      रखा जा सकता है।

3. यह धारणा भ्रामक है कि सुन्नत द्वारा औरत के प्रजनन अंगों में           कैंसर की संभावना कम हो जाती है। सच्चाई यह है कि सुन्नत – वह         किसी भी रूप में और पहली, दूसरी   किसी  भी डिग्री का हो (खासतौर    पर  सूडानी, जो चौथी डिग्री का माना जाता है और सुन्नत का सबसे बर्बर स्वरूप है) अपने साथ इंफेशन, सेप्टिक या हेमरेज और मूत्रनली में गांठ  (cyst) या सूजन लेकर ही आता है, साथ ही इससे योनि का द्वार  संकुचित होता है और पेशाब के बहाव में  काफी समय तक रुकावट महसूस होती है।

4. सुन्नत की गई लड़कियों में हस्तमैथुन की क्रिया बहुत कम पाई जाती है बजाय उन लड़कियों के, जिनका          आपरेशन नहीं किया गया है।

5. इसमें कोई शक नहीं कि सुन्नत लड़की के यौन जीवन के लिए एक सदमा साबित होता है और                          मनोवैज्ञानिक विकास में बाधा पहुंचाता है। अंततः यह लड़की को उसके माहौल के अनुरूप यौन संबंधी              ठंडेपन (sexual frigidity) की ओर ही धकेलता है। शिक्षा ही एकमात्र रास्ता है जिसमें पढ़े-लिखे मां-बाप            अपनी बेटियों को इस अमानवीय प्रथा से गुजरने से इनकार कर सकते हैं। आज के शिक्षित मां-बाप यह               समझ गए हैं कि यह आपरेशन किसी भी रूप में लाभदायक नहीं है और इसलिए इसका बहिष्कार किया             जाना  चाहिए।

आइन शम्स यूनिवर्सिटी में ‘वीमेन एंड न्यूरोसिस’ पर अपना शोध शुरू करने से पहले काइरो यूनिवर्सिटी के कस्त्र अल आइनी मेडिकल कालेज से इसे करने की मैंने बहुत कोशिश की पर हर बार मुझे कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा। हमारी सबसे बड़ी रुकावट सत्तारूढ़ दकियानूसी मानसिकता वाले प्रोफेसरों से ही थी जिन्होंने ‘सेक्स’ को हमेशा ‘शर्म’ के साथ जोड़कर ही देखा है। उनके अनुसार ‘प्रतिष्ठित’ शोध सेक्स जैसे विषय पर नहीं हो सकती थी। मैंने अपने शोध के आलेख का शीर्षक दिया था ‘मिस्र की आधुनिक औरत के यौन जीवन में आने वाली समस्याएं।’ (¼problems that confront the sexual life of modern eypytian women) लेकिन लंबी चर्चा और बातचीत के बाद आखिर मुझे शीर्षक से ‘यौन’ शब्द हटाकर ‘मनोवैज्ञानिक’ (psychological) शब्द डालना पड़ा।

(‘द हिडन फेस आफ ईव’ के पहले भाग ‘द म्यूटिलेटेड हाफ’ के पहले और छठे अध्याय के कुछ चुने हुए अंश ) 


( अन्तरंग संगिनी 1999 / हंस मार्च 2000 में प्रकाशित )

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योनि के ऊपरी हिस्से को काटने की प्रथा (सुन्नत) के खिलाफ बोहरा महिला ने पीएम को लिखा खत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी,


स्वतंत्रता दिवस पर आपने मुस्लिम महिलाओं के दुखों और कष्टों पर बात की थी. ट्रिपल तलाक को आपने महिला विरोधी कहा था, सुनकर बहुत अच्छा लगा था.

हम औरतों को तब तक पूरी आज़ादी नहीं मिल सकती जब तक हमारा बलात्कार होता रहेगा, हमें संस्कृति, परंपरा और धर्म के नाम पर प्रताड़ित किया जाता रहेगा. हमारा संविधान सभी को समान अधिकार देने की बात करता है, पर असल में जब भी किसी बच्ची को गर्भ में मारा जाता है, जब भी किसी बहु को दहेज के नाम पर जलाया जाता है, जब भी किसी बच्ची की जबरन शादी करवा दी जाती है, जब भी किसी लड़की के साथ छेड़खानी होती है या उसके साथ बलात्कार किया जाता है, हर बार इस समानता के अधिकार का हनन किया जाता है.

ट्रिपल तलाक अन्याय है, पर इस देश की औरतों की सिर्फ़ यही एक समस्या नहीं है. मैं आपको औरतों का सुन्नत/ खतना (Female Genital Mutilation ) के बारे में बताना चाहती हूं, जो छोटी बच्चियों के साथ किया जाता है. जो बच्चियां अपने शरीर से जुड़े निर्णय नहीं ले सकती, उन्हें इस अमानवीय प्रथा का शिकार बनना पड़ता है. इन बच्चियों के शरीर को जो नुकसान पहुंचता है, उसे किसी भी तरह से ठीक नहीं किया जा सकता. इस प्रथा के खिलाफ़ पूरी दुनिया में आवाज़ उठाई जा रही है.

मैं इस ख़त के द्वारा आपका ध्यान इस भयानक प्रथा की तरफ़ खींचना चाहती हूं. बोहरा समुदाय में सालों से ‘ख़तना’ या’ख़फ्ज़’ प्रथा का पालन किया जा रहा है. बोहरा, शिया मुस्लिम हैं, जिनकी संख्या लगभग 2 मिलियन है और ये महाराष्ट्र,गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान में बसे हैं.


मैं बताती हूं कि मेरे समुदाय में आज भी छोटी बच्चियों के साथ क्या होता है. जैसे ही कोई बच्ची 7 साल की हो जाती है,उसकी मां या दादी मां उसे एक दाई या लोकल डॉक्टर के पास ले जाती हैं. बच्ची को ये नहीं बताया जाता कि उसे कहां ले जाया जा रहा है या उसके साथ क्या होने वाला है. दाई या आया या वो डॉक्टर उसके योनि (Clitoris) को काट देते हैं. इस प्रथा का दर्द ताउम्र उस बच्ची के साथ रह जाता है.

इस प्रथा का एकमात्र उद्देश्य है, बच्ची या महिला की यौन इच्छा को दबाना.


वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन  के अनुसार, ‘सुन्नत  महिलाओं और लड़कियों के मानवाधिकार का हनन है. महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव का ये सबसे बड़ा उदाहरण है. बच्चों के साथ ये अकसर होता है और ये उनके अधिकारों का भी हनन है. इस प्रथा से व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर पड़ता है.’
सैंकड़ों सालों से इस प्रथा का शांति से पालन किया जा रहा है और बोहरा समुदाय के बाहर बहुत कम लोग ही इस प्रथा के बारे में जानते होंगे. 2015 में बोहरा समुदाय की कुछ महिलाओं ने एकजुट होकर #WeSpeakOut On FGM नाम से एक कैंपेन शुरू किया और यहां हमने आपस में अपनी दुख और कहानियां एक-दूसरे से कही. हमने ख़तना के खिलाफ़ एक जंग का ऐलान करने की ठानी.

हमने अपने पादरी, सैदना मुफ़्फदल को इस प्रथा को रोकने के लिए कई ख़त लिखे, पर हमारी बात किसी ने नहीं सुनी. ये प्रथा न सिर्फ़ आज भी चल रही है, बल्कि पादरी साहब ने एक पब्लिक प्रेस स्टेटमेंट में ये घोषणा भी कर दी कि 1400 साल से जो प्रथा चल रही है उसे किसी भी हालत में नहीं बदला जाएगा. बच्चों के मानवाधिकार हनन की तरफ़ किसी ने भी ध्यान नहीं दिया.

18 दिसंबर. 2014 में यूनाईटेड नेशन ने एक प्रस्ताव पारित किया जिसके तहत पूरी दुनिया में सुन्नत को बैन करने की बात कही गई. इसे ख़त्म करना एक सस्टेनेबल डेवेलपमेंट लक्ष्य भी है.

प्रधानमंत्री जी, एक बार पहले भी आपने कहा था कि संविधान के अनुसार, मुस्लिम औरतों और उनके अधिकारों की रक्षा करना अनिवार्य है. मुझे आपकी बातें सुनकर सुकून मिला कि मुस्लिम महिलाओं की हक़ की रक्षा करना भी सरकार का कर्तव्य है.

आपने ये भा कहा था कि, ‘लोकतंत्र में बातचीत ज़रूरी है.’ इसलिये मेरी आपसे दरख्वास्त है कि मेरी और मेरी बहनों की, जो सुन्नत की शिकार हुईं हैं कि बात सुनी जाए.


दिसंबर 2015 में हमने ‘WeSpeakOut On FGM’ नाम से Change.org पर एक कैम्पेन की शुरुआत की थी. इस प्रथा को बंद करने के पक्ष में हमें 90000 से ज़्यादा दस्तख़त मिल गए हैं. लेकिन अब तक सरकार की तरफ़ से हमें कोई जवाब नहीं मिला है.

प्रधानमंत्री जी, हम बोहरा समुदाय की महिलायें अपने हक़ के लिए लड़ रही हैं. कुरान में भी सुन्नत की बात नहीं कही गई है. हमारे देश में सिर्फ़ बोहरा समुदाय में और केरल के कुछ समुदायों में ही इस प्रथा का पालन किया जाता है. हम 21वीं सदी में जी रहे हैं और कुछ चीज़ें बदलनी ही चाहिए. मैं सरकार से ये दरख़्वास्त करती हूं कि जल्द से जल्द इस कुप्रथा को ख़त्म करने पर काम शुरू किया जाए.
इस प्रथा को बैन करके बोहरा बेटियों को बचाना बहुत ज़रूरी है.

मासूमा रानाल्वी
(अनुवाद संचिता, गजब पोस्ट से साभार)


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निजता के अधिकार के खिलाफ सरकार की सारी दलीलों को सुप्रीम कोर्ट ने ख़ारिज किया ….उषा रामनाथन



पिछले तीन वर्षों में सुप्रीम कोर्ट में मामले की मैराथन सुनवाई के दौरान, भाजपा की अगुवाई वाली एनडीए सरकार ने तर्क दिया था कि निजता का अधिकार एक मूल अधिकार नहीं है. यह भारतीय संविधान में दिये गये मौलिक अधिकार का अपरिहार्य हिस्सा नहीं है. सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की खंडपीठ ने अपने एकमत ऐतिहासिक फैसले में सरकार की किसी दलील को नहीं माना, न विकास की दलील, न मौलिक अधिकार की सरकारी व्याख्या की दलील. अपने स्पष्ट निर्णय में सेक्सुअल निर्णय, जीवनसाथी चुनने या गर्भ धारण के निर्णय, खाने पीने के चुनाव आदि के अधिकार को निजता का अधिकार बताया है.


स्त्रीवादी न्याविद और सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता उषा रामनाथन इसे भाषा सिंह से बातचीत में एक महत्वपूर्ण फैसला मानती हैं और इसका असर वे सुप्रीम कोर्ट में चल रहे ‘आधार’ के खिलाफ मुकदमे या ‘एलजीबीटी’ के राइट्स के मुकदमे पर साफ़ देखती हैं.

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय कितना महत्वपूर्ण है?


यह फैसले तीन महत्वपूर्ण चीजों का प्रतीक है, पहला, 1954 और 1963 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा ही किए गए फैसले हमारे मौलिक अधिकारों के रास्ते में नहीं आयेंगे। दूसरा, पिछले 40 वर्षों के लंबे समय से संघर्ष के बाद निजता के अधिकार को सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से समर्थन दिया है। हालांकि, सरकार ने बहुत ही व्यवस्थित तरीके से इस अधिकार को नष्ट करने की कोशिश की। तीसरा, कोर्ट ने मान्यता दी है कि निजता के अधिकार को संविधान का अनुच्छेद 21 और मूलभूत अधिकार संरक्षित करते है।

क्यों आधार के मामले में, सरकार ने मौलिक अधिकारों की दलील ली है?


यह एक दिलचस्प पहलू है, जिस पर ध्यान देना है. ऐसा नहीं है कि सरकार ने हर परिस्थिति में निजता के अधिकार की मौजूदगी से इनकार कर दिया है। उदाहरण के लिए, जब लोग अदालत में कहने लगे कि मानहानि को आपराधिक कानून का हिस्सा नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह कमजोर वर्ग को दबाने के लिए उपयोग किया जाता है, तब तत्कालीन सरकार ने बचाव में व्यक्तिगत गोपनीयता की दलील का ही सहारा लिया. लेकिन यूआईडी / आधार पर सरकार अलग खड़ी थी.

आपकी राय में, क्यों सरकार ने आधार मामले में निजता का विरोध किया?

उन्होंने भ्रम पैदा करने, गुमराह करने और ज्यादा से ज्यादा समय कोर्ट के फैसले को टाला जाये, के मकसद से ऐसा किया. आप देखते हैं, जब उन्होंने कहा कि निजता को मौलिक अधिकार के रूप में नहीं माना जा सकता है, आधार मामला अंतिम सुनवाई के चरण में था. उन्होंने यह बचाव की दलील 16 मार्च, 2015 दी, जब बेंच अंतिम सुनवाई के दौर में था. उन्होंने इसे शुरू में क्यों नहीं रखा? क्यों इस महत्वपूर्ण चरण में? इस बीच, वे आधार की गुंजाइश और पहुंच को बढ़ाना चाह रहे थे. यह सब बहुत सोच समझकर किया गया था.



फैसले में कहा गया है कि गोपनीयता का आधिकार धारा 377 के संदर्भ में भी वैध है। आप इसे कैसे देखती हैं?

यदि आप निर्णय पढ़ते हैं, तो यह बहुत खुला और स्पष्ट है. निर्णय कहता है कि मौलिक अधिकार बहुसंख्यकवाद से जुड़ा नहीं है. यदि एलजीबीटी अल्पमत में है, तो कोई भी उनके मौलिक अधिकारों को छीन नहीं सकता है. उनहें ‘जीवन का अधिकार , गोपनीयता का अधिकार आदि सारे अधिकार हैं।  9 जजों की पीठ ने सुरेश कौशल के फैसले के मूल को लगभग उलट दिया है। इसका एक दीर्घकालिक प्रभाव होगा। यह निर्णय विवादास्पद एडीएम जबलपुर के फैसले पर भी बरसता है. हाँ, यह खुले तौर पर कहता है कि यह निर्णय “पूरी तरह दोषपूर्ण है।” यह स्पष्ट कर दिया गया है कि मौलिक अधिकार निलंबित नहीं किए जा सकते या वापस नहीं लिये जा सकते.

क्या आपको लगता है कि यह निर्णय आधार के खिलाफ कानूनी लड़ाई को मजबूती देगा? 

यह अच्छा है कि सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि निजता मौलिक अधिकार है. इस फैसले के साथ, यह स्पष्ट हो जाता है कि यूआईडी परियोजना को मौलिक अधिकार के रूप में ‘निजता के अधिकार की चुनौती’ का सामना करना होगा। इस परियोजना में निजता के अधिकार का जबरदस्त उल्लंघन किया गया है.  इस संबंध में पर्याप्त सबूत अदालत में प्रस्तुत किए गए हैं. आधार परियोजना ने सरकार को निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार न बताने के लिए प्रेरित किया है. वे (सरकार) विदेशी कंपनियों को नागरिकों का निजी डेटा दे रहे हैं, ऐसा अब नहीं हो सकता, हम आशान्वित हैं.

यह साक्षात्कार मूलतः नेशनल हेराल्ड में अंग्रेजी में प्रकाशित हुआ है. 


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किरायेदार

अनुपमा तिवाड़ी


कविता संग्रह “आइना भीगता है“ 2011 में बोधि प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित. संपर्क : anupamatiwari91@gmail.com

मकान नंबर ए – 41 मीता और उमेश ने देखते ही पसंद कर लिया था.छोटी – सी गृहस्थी के लिए दो कमरे, किचिन और लेटबाथ पर्याप्त थे. दोनों ही कामकाजी थे इसलिए बच्चों और अपनी सहूलियतों को देखते हुए वे शहर में घर बदलते रहते थे. किराए का घर टोकरे में होता है जब चाहे बदल लो. हाँ, किराएदार को मकान मालिक का मिजाज़ मापते रहना होता है जिस दिन मकान मालिक का पारा ऊपर चढ़ता है उस दिन किराएदार सोचने लगता है कि अब तो उसे दूसरा घर ही देखना पड़ेगा. ये एक किरायेदार की त्रासदी होती है जिसे वे दोनों खूबसमझते थे.

उस दिन मकान मालकिन आंटी के पोते का जन्मदिन था तो आंटी थाल में दो बड़ी – बड़ी घी में डूबी बाटी, चूरमा और कटोरे में दाल ले कर आईं. इसी बहाने थोड़ी बातचीत हुई. कहने लगीं बेटा, तुम्हारे अंकल जी तो सीधे – साधे आदमी हैं. चार बेटियाँ हैं बड़ी दो जबलपुर ब्याही हैं एक यहीं अपनी ही कॉलोनी में पीछे की गली में रहती है. छोटी वाली यहीं डिजाइनिंग की कम्पनी में नौकरी करती है. छोटी वाली ब्याही तो मुम्बई है लेकिन क्या करें जवाईं से तोये बहू लगी हुई है न !अब दामाद तलाक की बात कर रहा है.

बहू प्रीति भी समय निकाल कर मीता के पास आ कर मन की बात कहने की कोशिश करती.एक दिन बोली दीदी, आप तो देखते ही हो न, मैं सारे दिन घर के काम में लगी रहती हूँ. ये पीछे वाली दीदी और छोटी दीदी आपके भैया को हमेशा भड़काती रहती हैं और फिर ये मुझ पर हाथ उठाते हैं. मैंने एक दिन आपके भैया से कह दिया कि तुम्हारी बहन के साथ ऐसा हो तब तुम्हें कैसा लगे ? इस बात पर आपके भैया ने मुझे बाल पकड़ कर मारा और बोले मेरी बहन तेरी जैसी थोड़े ही है. बहुत बार करते हैं ये ऐसे. एक बार तो मैंने छोटे नंदोई को चिठ्ठी में लिखा कि “आप ही मेरे दुःख को समझ सकते हो, ये दोनों बहनें घर में बहुत झगड़ा करवाती हैं और फिर इनके भैया का स्वभाव, गुस्सा तो जैसे नाक पर ही रखा रहता है”यह बात नंदोई जी ने घर में सबको बता दी तब से तो ये और भी ज्यादा ऐसे करने लग गए हैं. मम्मीजी कहती हैं नंदोई है तेरा सगा है, अब जा उसी के पास. मीता समझ रही थी कि प्रीति भाभी को एक भावनात्मक सहारे की ज़रुरत थी इसलिए उन्होंने नंदोई को पत्र लिखा और तब से प्रीति भाभी को ससुराल में ये कलंक मिल गया कि वह नंदोई से लगी हुई हैं. उस चिट्ठी ने उनके दुःख कम नहीं किए बल्कि और बढ़ा दिए.

मीता ऑफिस जाते- आते अपने पड़ौस की महिलाओं और बच्चों से थोड़ा – बहुत बतियाती. महिलाएं कभी – कभी तो मीता से खूब बातें करतीं.कभी – कभी आंटी की बुराई भी लगे हाथ करके, घर की टोह लेने की फ़िराक में रहतीं कि छोटी बेटी ससुराल क्यों नहीं जाती ?तीसरे नंबर की बेटी रोज़ – रोज़ क्यों आती है ? इनके घर में रोज़ – रोज़ झगड़ा क्यों होता है ? मीता इन बातों से कन्नी काटने की कोशिश करती.उसे तो उस घर में रहना था न,किरायेदार जो ठहरी ! ये पड़ोसिनें, आंटी से तो खूबप्यार से बात करतीं. उन्हें अपने घर होने वाले आयोजनों में बुलाती. हाँ, वो मीता से खूब बतियाने के बावज़ूद अपने घर में होने वाले आयोजनों में उसे नहीं बुलातीं.



एक दिन मीता की बेटी ने कहा मम्मा,आज राघव जन्मदिन है अपन शाम को राघव के घर चलेंगे न !मैं उसके बर्थडे में ये गुलाबी फ्रॉक पहन कर जाऊंगी और तुम कौन सी साड़ी पहन कर चलोगी ? बताओ न, बताओ न ! उस दिन मीता ने बेटी के सवालों से मुश्किल से पीछा छुड़ाया था. क्या समझाए वह बेटी को, यह वह खुद ही नहीं समझ पा रही थी. जब बेटी पीछे ही पड़ गई तब वह बोली“मैं भीगुलाबी साड़ी पहनूंगी, अब चुप हो जा”.
राघव पिछले चार दिन से अपने जन्मदिन को ले कर हमउम्र बच्चों के झुण्ड में इठला रहा था. मीता बेटी को क्या और कैसे समझाती कि राघव की मम्मी ने राघव के बर्थडे में अपने को नहीं बुलाया है सो उसने उमेश के साथ पार्क में बिटिया को आइसक्रीम खाने चलने के लिए राजी कर लिया. पार्क में बिटिया लगातार जिद कर रही थी कि पापा अब घर चलो, चलो, कब चलोगे ? कितनी देर बाद चलेंगे ?राघव की बर्थडे पार्टी ख़त्म हो जाएगी.
मीता और उमेश जानबूझ कर समय को पार्क में खींचे जा रहे थे. जब तक वे घर लौटे. बर्थडे पार्टी खत्म हो चुकी थी.बिटिया भी पार्क में झूले, झूल – झूल कर थक गई तो घर पर पहुँचने से पहले ही रास्ते में स्कूटर पर ही सो गई. चलो अच्छा हुआ, सो गई. मीता ने धीमे से कहा और गोद से उतार कर उसे बेड पर सुला दिया. पड़ोसियों के बीच मन में चाहे अलगाव हो लेकिन फिर भी औपचारिकता के नाते आना – जाना रहता है, रहना होता है न लम्बे समय उनके साथ.. “ कुछ अच्छे बुरे में रिश्तेदार तो बाद में आयेंगे पहले तो पड़ोसी ही काम आयेंगे” ऐसी उक्तियाँ पड़ोसी के महत्व को और बढ़ा देती हैं. किरायेदार की क्या हैसियत होती है ? चला जाता है एक दिन, घर खाली करके, उसे कॉलोनी में होने वाले आयोजनों में क्या बुलाना ? ये बात किराएदार को समय – समय पर यह अहसास करवाती रहती है कि वह किराएदार है और उसकी समाज में क्या औकात है.

सुनो! ये प्रीति भाभी को मार रहे हैं ……मीताकी आँख एक रात,सटाक – सटाक किसी डंडे की फटकार सुनते हुए खुली. उमेश भी जाग गया. उस रात मीता फिर रात भर नहीं सोई.वो धीरे-धीरे सुनने की कोशिश करते हुए कुछ-कुछ उमेश को होठों में कहती रही लेकिन सुबह उसने आंटी को ये जाहिर नहीं होने दिया कि रात को जो कुछ आपके यहाँ हुआ उसके बारे में हमें पता है.

सुबह प्रीति भाभी के पीहर से भाई और माँ गेट पर आ कर खड़े हो गए,भाभी बिना कुछ भी सामान लिए उनके साथ पीहर चली गईं और रास्ते में जिस स्कूल में दोनों बेटे और छोटी बेटी पढ़ने जाते थे उस स्कूल से अपनी बेटी को भी साथ में ले गईं.शाम को मीता ऑफिस से लौटी तो आंटी बहू की कमियाँ गिनाने लगीं और बोलीं“हमको नहीं रखनी ऐसी बहू. रात को ही उसके पीहरवालों को फोन कर दिया, भई ले जाओ अपनी बेटी को.सुबह उसका भाई और माँ आ कर ले गए,बहू अपने साथ बेटी को तो ले गई और दोनों बेटों को छोड़ गई”

मीता के अन्दर पता नहीं कितने सारे सवाल और कितना सारा क्षोभ बाहर आने को उमड़ रहा था लेकिन वो जान रही थी कि उसकी हैसियत किरायेदार की है.क्या हो जाता है कभी-कभी कि आदमी के होठ खुलने को तैयार होते हैं और फिर सिल जाते हैं. एकदम चुप्प से !

लगभग डेढ़ महीने के बाद मीता ने दूसरा घर बदल लिया. घर दूसरा लेने के बाद भी दिमाग में यह बात चलती रही कि वो प्रीति भाभी अब भी अपने पीहर में रह रही होंगीं या ससुराल आ गई होंगी ? यह जानने के लिए सात साल बाद एक दिवाली पर मीता, सपरिवार आंटी से मिलने गई. ड्राइंग रूम में प्रीति भाभी की बच्चों के साथ बात करने की धीमी – धीमीआवाज़ अन्दर से आ रही थी. प्रीति भाभी यहाँ अपने आप आई होंगी या इन्होंने बुलाया होगा या वहां से भी धकेल दी गईं पता नहीं !मीता की आँख, कानऔर दिमाग जैसे तेजी से काम करने लगे.आंटीके घर उस समय बड़ी बेटी,जबलपुर से अपने परिवार के साथ आई हुई थी जिसे आंटी ने बताया कि ये मीता है पहले अपने किराए पर रहती थी.

कुछ हालचाल जानने के बाद आंटी ने सोफे पर बैठे – बैठे ही आवाज़ लगाई प्रीति, मीता आई है चाय – पानी तो ले कर आ. प्रीति भाभी के चेहरे पर क्या लिखा था वह मीता एक नज़र में पढ़ नहीं पाई और पढ़ती भी क्या – क्या और क्या वो सही- सही पढ़ पाती ? मीता तो बस अकेले में प्रीति भाभी का हाथ,अपने हाथ ले कर बस कहना चाहती थी कि भाभी, अब आप कैसी हो ? मुझे माफ़ कर देना, उस रात मैं आपको बचा नहीं सकी !

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मोदी जिनके प्रशंसक वे दे रहे महिला पत्रकार को रेप की धमकी



महिला पत्रकार को रेप की धमकी देने वाले अपने बहुत से प्रशंसकों को खुद पीएम मोदी और अमित शाह फॉलो करते हैं।

बॉलीवुड सुपरस्टार अक्षय कुमार और भूमि पेडनेकर की फिल्म ‘टॉयलेट-एक प्रेम कथा’ को लेकर महिला पत्रकार और फिल्म समीक्षक एना वेटिकड  ने जब इस फिल्म की प्रशंसा करते हुए नरेंद्र मोदी के प्रसंग में एक टिपण्णी की तो उन्हें मोदी के प्रशंसकों ने बलात्कार की धमकी देनी शुरू कर दी. दरअसल इस महिला पत्रकार ने ट्वीट करते हुए लिखा था कि अगर इस फिल्म को सरकार की तारीफ करने के एजेंडे से ना बनाया जाता, तो फिल्म काफी बेहतर बनती। आपको बता दें कि फिल्म में एक जगह पीएम नरेंद्र मोदी की तारीफ करते हुए कहा बी जा रहा है कि हमारे प्रधानमंत्री ने शौचालय बनवाने के लिए काफी अच्छे काम किये हैं और कर रहे हैं।

पीएम मोदी का नाम जुड़ता देख प्रधानमंत्री मोदी के प्रशंसक एना को गंदी-गंदी गालियां देने लगे। कुछ यूजर्स ने तो उन्हें रेप करने तक की धमकी देनी शुरू कर दी। एना ने ट्रोलर्स के इस व्यवहार पर ट्वीट करते हुए एक सवाल किया है कि इस फिल्म की आलोचना को हिंदू हेट के रूप में क्यों देखा जा रहा है? इस पर भी उन्हें ट्रोल करते हुए एक यूजर ने यहां तक लिख दिया है कि उन्हें अपना नाम बदलकर एना वैटिकन कर देना चाहिए। इसके अलावा सोशल मीडिया पर उन्हें लेकर गाली-गलौच तक हो रही है। पत्रकार को गालियां देने वाले बहुत से ऐसे यूजर्स भी हैं जिन्हें खुद पीएम मोदी और अमित शाह फॉलो करते हैं।

प्रधानमंत्री जिन्हें फॉलो करते हैं उनके महिला विरोधी रवैयों के कारण पहले भी प्रधानमंत्री की आलोचना होती रही है, लेकिन वे ऐसे सेक्सिस्ट प्रशासकों को लगातार फॉलो किये जा रहे हैं. आल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन के नेशनल काउन्सिल की सदस्य अपराजिता कहती हैं कि ‘ऐसे लोगों को प्रधानमंत्री द्वारा फॉलो करना इस पद की गरिमा को अपूरणीय क्षति पहुँचाता है.’


फिल्म बॉक्स ऑपिस पर हिट है। हर तरफ इस फिल्म की चर्चा हो रही है। फिल्म ने अब तक 100 करोड़ से अधिक की कमाई कर ली है।

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