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दीप्ति शर्मा कविताएँ

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 दीप्ति शर्मा


युवा कवियत्री,विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित संपर्क: deepti09sharma@gmail.com 


1.
काले तिल वाली लड़की

कल तुम जिससे मिलीं
फोन आया था वहाँ से
तुम तिल भूल आयी हो
सुनो लडकियों ये तिल बहुत आवारा होते हैं
चन्द्र ग्रहण की तरह
काला तिल आनाज नही होता
ये पूरी दुनिया होता है
जिससे मिलो सँभल कर मिलो
ये मिलना भी ज्वार भाटा है जिसमें तुम डूब जाती हो
और भूल आती हो तिल
ये तिल अभिशाप नहीं
देखो!
मेरे हाथ में भी एक तिल है
अम्मा ने कहा खूब पैसा होगा
मुट्ठी तो बाँधों जरा
पर मुट्ठी कहाँ बँधी रही है
जो अब रहेगी
खुल ही जाती है
और दिख जाता है तिल
ये छुप नहीं सकता
और दुनिया ढूँढ लेती है
ऐसे ही
धूप नहीं पड़ती
देखो पर्दा लगा है
पर्दे के भीतर भी
लड़की बदचलन हो जाती है
और तिल आवारा
और तुम हो कि नदी में
छलांग लगाती हो

2.


पर्वत पिघल रहे हैं
घास,फूल, पत्तीयाँ
बहकर जमा हो गयीं हैं
एक जगह
हाँ रेगिस्तान जम गया है
मेरे पीछे ऊँट काँप रहा है
बहुत से पक्षी आकर दुबक गये हैं
हुआ क्या ये अचानक
सब बदल रहा
प्रसवकाल में स्त्री

दर्द से कराह रही है,
शिशु भी प्रतिक्षारत !
माँ की गोद में आने को
तभी एक बहस शुरू हुई
गतिविधियों को संभालने की,
वार्तालाप के मध्य ही शुरू हुआ
शिशु का पिघलना
पर्वत की भाँति
फिर जम गया वहाँ मंजर
रूक गयी साँसें
माँ विक्षिप्त
मृत शिशु गोद में लिए
विलाप करती
आखिर ठंड में पसीना आना
आखिर कौन समझे
फिर फोन भी नहीं लगते
टावर काम नहीं करते
सीडियों से चढ़ नहीं पा रहे
उतरना सीख लिया है
कहा ना सब बदल रहा है
सच इस अदला बदली में
हम छूट रहे हैं
और ये खुदा है कि
नोट गिनने में व्यस्त है।

3.
आहट 

घने कोहरे में बादलों की आहट
तैरती यादों को बरसा रही है
देखो महसूस करो
किसी अपने के होने को
तो आहटें संवाद करेंगी
फिर ये मौन टूटेगा ही
जब धरती भीग जायेगी
तब ये बारिश नहीं कहलायेगी
तब मुझे ये तुम्हारी आहटों की संरचना सी प्रतीत होगी
और मेरा मौन आहटों में
मुखरित हो जायेगा।

4. 
मुट्ठिया… 

बंद मुट्ठी के बीचों – बीच
एकत्र किये स्मृतियों के चिन्ह
कितने सुन्दर जान पड़ रहे हैं
रात के चादर की स्याह
रंग में डूबा हर एक अक्षर
उन स्मृतियों का
निकल रहा है मुट्ठी की ढीली पकड़ से
मैं मुट्ठीयों को बंद करती
खुले बालों के साथ
उन स्मृतियों को समेट रही हूँ
वहीं दूर से आती फीकी चाँदनी
धीरे – धीरे तेज होकर
स्मृतियों को देदीप्यमान कर
आज्ञा दे रही हैं
खुले वातावरण में विचरो ,
मुट्ठीयों की कैद से बाहर
और ऐलान कर दो
तुम दीप्ति हो, प्रकाशमय हो
बस यूँ ही धीरे – धीरे
मेरी मुट्ठीयाँ खुल गयीं
और आजाद हो गयीं स्मृतियाँ
सदा के लिये

5
उस बारिश का रंग दिखा नहीं
पर धरती भींग गयी
बहुत रोई !
डूब गयी फसलें
नयी कली ,
टहनी टूट लटक गयीं
आकाश में बादल नहीं
फिर भी बरसात हुई
रंग दिखा नहीं कोई

पर धरती
कुछ सफेद ,कुछ लाल हुई
लाल ज्यादा दिखायी दी
खून सी लाल
मेरा खून धरती से मिल गया है
और सफेद रंग
गर्भ में ठहर गया है,
शोषण के गर्भ में
उभार आते
मैं धँसती जा रही हूँ
भींगी जमीन में,
और याद आ रही है
माँ की बातें
हर रिश्ता विश्वास का नहीं
जड़ काट देता है
अब सूख गयी है जड़
लाल हुयी धरती के साथ
लाल हुयी हूँ मैं भी।

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गौरी लंकेश का आख़िरी संपादकीय



कल देर शाम हिंदुत्व विरोधी पत्रकार  गौरी लंकेश की गोली मार कर हत्या कर दी गई. गौरी लंकेश एक साप्ताहिक पत्रिका ‘गौरी लंकेश पत्रिके’ का संपादन करती थी.उनका आखिरी संपादकीय


“इस हफ्ते के इश्यू में मेरे दोस्त डॉ वासु ने गोएबल्स की तरह इंडिया में फेक न्यूज़ बनाने की फैक्ट्री के बारे में लिखा है। झूठ की ऐसी फैक्ट्रियां ज़्यादातर मोदी भक्त ही चलाते हैं। झूठ की फैक्ट्री से जो नुकसान हो रहा है मैं उसके बारे में अपने संपादकीय में बताने का प्रयास करूंगी। अभी परसों ही गणेश चतुर्थी थी। उस दिन सोशल मीडिया में एक झूठ फैलाया गया। फैलाने वाले संघ के लोग थे। ये झूठ क्या है? झूठ ये है कि कर्नाटक सरकार जहां बोलेगी वहीं गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करनी है, उसके पहले दस लाख का डिपाज़िट करना होगा, मूर्ति की ऊंचाई कितनी होगी, इसके लिए सरकार से अनुमति लेनी होगी, दूसरे धर्म के लोग जहां रहते हैं उन रास्तों से विसर्जन के लिए नहीं ले जा सकते हैं। पटाखे वगैरह नहीं छोड़ सकते हैं। संघ के लोगों ने इस झूठ को खूब फैलाया। ये झूठ इतना ज़ोर से फैल गया कि अंत में कर्नाटक के पुलिस प्रमुख आर के दत्ता को प्रेस बुलानी पड़ी और सफाई देनी पड़ी कि सरकार ने ऐसा कोई नियम नहीं बनाया है। ये सब झूठ है।

इस झूठ का सोर्स जब हमने पता करने की कोशिश की तो वो जाकर पहुंचा POSTCARD.IN नाम की वेबसाइट पर। यह वेबसाइट पक्के हिन्दुत्ववादियों की है। इसका काम हर दिन फ़ेक न्यूज़ बनाकर बनाकर सोशल मीडिया में फैलाना है। 11 अगस्त को POSTCARD.IN में एक हेडिंग लगाई गई। कर्नाटक में तालिबान सरकार। इस हेडिंग के सहारे राज्य भर में झूठ फैलाने की कोशिश हुई। संघ के लोग इसमें कामयाब भी हुए। जो लोग किसी न किसी वजह से सिद्धारमैया सरकार से नाराज़ रहते हैं उन लोगों ने इस फ़ेक न्यूज़ को अपना हथियार बना लिया। सबसे आश्चर्य और खेद की बात है कि लोगों ने भी बग़ैर सोचे समझे इसे सही मान लिया। अपने कान, नाक और भेजे का इस्तमाल नहीं किया।

हिंदुत्व की आलोचक वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश की गोली मारकर हत्या

पिछले सप्ताह जब कोर्ट ने राम रहीम नाम के एक ढोंगी बाबा को बलात्कार के मामले में सज़ा सुनाई तब उसके साथ बीजेपी के नेताओं की कई तस्वीरें सोशल मीडिया में वायरल होने लगी। इस ढोंगी बाबा के साथ मोदी के साथ साथ हरियाणा के बीजेपी विधायकों की फोटो और वीडियो वायरल होने लगा। इससे बीजेपी और संघ परिवार परेशान हो गए। इसे काउंटर करने के लिए गुरमीत बाबा के बाज़ू में केरल के सीपीएम के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के बैठे होने की तस्वीर वायरल करा दी गई। यह तस्वीर फोटोशाप थी। असली तस्वीर में कांग्रेस के नेता ओमन चांडी बैठे हैं लेकिन उनके धड़ पर विजयन का सर लगा दिया गया और संघ के लोगों ने इसे सोशल मीडिया में फैला दिया। शुक्र है संघ का यह तरीका कामयाब नहीं हुआ क्योंकि कुछ लोग तुरंत ही इसका ओरिजनल फोटो निकाल लाए और सोशल मीडिया में सच्चाई सामने रख दी।

एक्चुअली, पिछले साल तक राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के फ़ेक न्यूज़ प्रोपेगैंडा को रोकने या सामने लाने वाला कोई नहीं था। अब बहुत से लोग इस तरह के काम में जुट गए हैं, जो कि अच्छी बात है। पहले इस तरह के फ़ेक न्यूज़ ही चलती रहती थी लेकिन अब फ़ेक न्यूज़ के साथ साथ असली न्यूज़ भी आनी शुरू हो गए हैं और लोग पढ़ भी रहे हैं।


उदाहरण के लिए 15 अगस्त के दिन जब लाल क़िले से प्रधानमंत्री मोदी ने भाषण दिया तो उसका एक विश्लेषण 17 अगस्त को ख़ूब वायरल हुआ। ध्रुव राठी ने उसका विश्लेषण किया था। ध्रुव राठी देखने में तो कालेज के लड़के जैसा है लेकिन वो पिछले कई महीनों से मोदी के झूठ की पोल सोशल मीडिया में खोल देता है। पहले ये वीडियो हम जैसे लोगों को ही दिख रहा था,आम आदमी तक नहीं पहुंच रहा था लेकिन 17 अगस्ता के वीडियो एक दिन में एक लाख से ज़्यादा लोगों तक पहुंच गया। ( गौरी लंकेश अक्सर मोदी को बूसी बसिया लिखा करती थीं जिसका मतलब है जब भी मुंह खोलेंगे झूठ ही बोलेंगे)। ध्रुव राठी ने बताया कि राज्य सभा में ‘बूसी बसिया’ की सरकार ने राज्य सभा में महीना भर पहले कहा कि 33 लाख नए करदाता आए हैं। उससे भी पहले वित्त मंत्री जेटली ने 91 लाख नए करदाताओं के जुड़ने की बात कही थी। अंत में आर्थिक सर्वे में कहा गया कि सिर्फ 5 लाख 40 हज़ार नए करदाता जुड़े हैं। तो इसमें कौन सा सच है, यही सवाल ध्रुव राठी ने अपने वीडियो में उठाया है।


आज की मेनस्ट्रीम मीडिया केंद्र सरकार और बीजेपी के दिए आंकड़ों को जस का तस वेद वाक्य की तरह फैलाती रहती है। मेन स्ट्रीम मीडिया के लिए सरकार का बोला हुआ वेद वाक्य हो गया है। उसमें भी जो टीवी न्यूज चैनल हैं, वो इस काम में दस कदम आगे हैं। उदाहरण के लिए, जब रामनाथ कोविंद ने राष्ट्रपति पद की शपथ ली तो उस दिन बहुत सारे अंग्रज़ी टीवी चैनलों ने ख़बर चलाई कि सिर्फ एक घंटे में ट्वीटर पर राष्ट्रपति कोविंद के फोलोअर की संख्या 30 लाख हो गई है। वो चिल्लाते रहे कि 30 लाख बढ़ गया, 30 लाख बढ़ गया। उनका मकसद यह बताना था कि कितने लोग कोविंद को सपोर्ट कर रहे हैं। बहुत से टीवी चैनल आज राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की टीम की तरह हो गए हैं। संघ का ही काम करते हैं। जबकि सच ये था कि उस दिन पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का सरकारी अकाउंट नए राष्ट्रपति के नाम हो गया। जब ये बदलाव हुआ तब राष्ट्रपति भवन के फोलोअर अब कोविंद के फोलोअर हो गए। इसमें एक बात और भी गौर करने वाली ये है कि प्रणब मुखर्जी को भी तीस लाख से भी ज्यादा लोग ट्वीटर पर फोलो करते थे।

आज राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के इस तरह के फैलाए गए फ़ेक न्यूज़ की सच्चाई लाने के लिए बहुत से लोग सामने आ चुके हैं। ध्रुव राठी वीडियो के माध्यम से ये काम कर रहे हैं। प्रतीक सिन्हा altnews.in नाम की वेबसाइट से ये काम कर रहे हैं। होक्स स्लेयर, बूम और फैक्ट चेक नाम की वेबसाइट भी यही काम कर रही है। साथ ही साथ THEWIERE.IN, SCROLL.IN, NEWSLAUNDRY.COM, THEQUINT.COM जैसी वेबसाइट भी सक्रिय हैं। मैंने जिन लोगों ने नाम बताए हैं, उन सभी ने हाल ही में कई फ़ेक न्यूज़ की सच्चाई को उजागर किया है। इनके काम से संघ के लोग काफी परेशान हो गए हैं। इसमें और भी महत्व की बात यह है कि ये लोग पैसे के लिए काम नहीं कर रहे हैं। इनका एक ही मकसद है कि फासिस्ट लोगों के झूठ की फैक्ट्री को लोगों के सामने लाना।

कुछ हफ्ते पहले बंगलुरू में ज़ोरदार बारिश हुई। उस टाइम पर संघ के लोगों ने एक फोटो वायरल कराया। कैप्शन में लिखा था कि नासा ने मंगल ग्रह पर लोगों के चलने का फोटो जारी किया है। बंगलुरू नगरपालिका बीबीएमसी ने बयान दिया कि ये मंगल ग्रह का फोटो नहीं है। संघ का मकसद था, मंगल ग्रह का बताकर बंगलुरू का मज़ाक उड़ाना। जिससे लोग यह समझें कि बंगलुरू में सिद्धारमैया की सरकार ने कोई काम नही किया, यहां के रास्ते खराब हो गए हैं, इस तरह के प्रोपेगैंडा करके झूठी खबर फैलाना संघ का मकसद था। लेकिन ये उनको भारी पड़ गया था क्योंकि ये फोटो बंगलुरू का नहीं, महाराष्ट्र का था, जहां बीजेपी की सरकार है।

हाल ही में पश्चिम बंगाल में जब दंगे हुए तो आर एस एस के लोगों ने दो पोस्टर जारी किए। एक पोस्टर का कैप्शन था, बंगाल जल रहा है, उसमें प्रोपर्टी के जलने की तस्वीर थी। दूसरे फोटो में एक महीला की साड़ी खींची जा रही है और कैप्शन है बंगाल में हिन्दु महिलाओं के साथ अत्याचार हो रहा है। बहुत जल्दी ही इस फोटो का सच सामने आ गया। पहली तस्वीर 2002 के गुजरात दंगों की थी जब मुख्यमंत्री मोदी ही सरकार में थे। दूसरी तस्वीर में भोजपुरी सिनेमा के एक सीन की थी। सिर्फ आर एस एस ही नहीं बीजेपी के केंद्रीय मंत्री भी ऐसे फ़ेक न्यूज़ फैलाने में माहिर हैं। उदाहरण के लिए, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने फोटो शेयर किया कि जिसमें कुछ लोग तिरंगे में आग लगा रहे थे। फोटो के कैप्शन पर लिखा था गणतंत्र के दिवस हैदराबाद में तिरंगे को आग लगाया जा रहा है। अभी गूगल इमेज सर्च एक नया अप्लिकेशन आया है, उसमें आप किसी भी तस्वीर को डालकर जान सकते हैं कि ये कहां और कब की है। प्रतीक सिन्हा ने यही काम किया और उस अप्लिकेशन के ज़रिये गडकरी के शेयर किए गए फोटो की सच्चाई उजागर कर दी। पता चला कि ये फोटो हैदराबाद का नहीं है। पाकिस्तान का है जहां एक प्रतिबंधित कट्टरपंथी संगठन भारत के विरोध में तिरंगे को जला रहा है।

इसी तरह एक टीवी पैनल के डिस्कशन में बीजेपी के प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि सरहद पर सैनिकों को तिरंगा लहराने में कितनी मुश्किलें आती हैं, फिर जे एन यू जैसे विश्वविद्यालयों में तिरंगा लहराने में क्या समस्या है। यह सवाप पूछकर संबित ने एक तस्वीर दिखाई। बाद में पता चला कि यह एक मशहूर तस्वीर है मगर इसमें भारतीय नहीं, अमरीकी सैनिक हैं। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अमरीकी सैनिकों ने जब जापान के एक द्वीप पर क़ब्ज़ा किया तब उन्होंने अपना झंडा लहराया था। मगर फोटोशाप के ज़रिये संबित पात्रा लोगों को चकमा दे रहे थे। लेकिन ये उन्हें काफी भारी पड़ गया। ट्वीटर पर संबित पात्रा का लोगों ने काफी मज़ाक उड़ाया।
केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने हाल ही में एक तस्वीर साझा की। लिखा कि भारत 50,000 किलोमीटर रास्तों पर सरकार ने तीस लाख एल ई डी बल्ब लगा दिए हैं। मगर जो तस्वीर उन्होंने लगाई वो फेक निकली। भारत की नहीं, 2009 में जापान की तस्वीर की थी। इसी गोयल ने पहले भी एक ट्वीट किया था कि कोयले की आपूर्ति में सरकार ने 25,900 करोड़ की बचत की है। उस ट्वीट की तस्वीर भी झूठी निकली।


छत्तीसगढ़ के पी डब्ल्यू डी मंत्री राजेश मूणत ने एक ब्रिज का फोटो शेयर किया। अपनी सरकार की कामयाबी बताई। उस ट्वीट को 2000 लाइक मिले। बाद में पता चला कि वो तस्वीर छत्तीसगढ़ की नहीं, वियतनाम की है।

ऐसे फ़ेक न्यूज़ फैलाने में हमारे कर्नाटक के आर एस एस और बीजेपी लीडर भी कुछ कम नहीं हैं। कर्नाटक के सांसद प्रताप सिम्हा ने एक रिपोर्ट शेयर किया, कहा कि ये टाइम्स आफ इंडिय मे आया है। उसकी हेडलाइन ये थी कि हिन्दू लड़की को मुसलमान ने चाकू मारकर हत्या कर दी। दुनिया भर को नैतिकता का ज्ञान देने वाले प्रताप सिम्हा ने सच्चाई जानने की ज़रा भी कोशिश नहीं की। किसी भी अखबार ने इस न्यूज को नहीं छापा था बल्कि फोटोशाप के ज़रिए किसी दूसरे न्यूज़ में हेडलाइन लगा दिया गया था और हिन्दू मुस्लिम रंग दिया गया। इसके लिए टाइम्स आफ इंडिया का नाम इस्तमाल किया गया। जब हंगामा हुआ कि ये तो फ़ेक न्यूज़ है तो सांसद ने डिलिट कर दिया मगर माफी नहीं मांगी। सांप्रादायिक झूठ फैलाने पर कोई पछतावा ज़ाहिर नहीं किया।

जैसा कि मेरे दोस्त वासु ने इस बार के कॉलम में लिखा है, मैंने भी एक बिना समझे एक फ़ेक न्यूज़ शेयर कर दिया। पिछले रविवार पटना की अपनी रैली की तस्वीर लालू यादव ने फोटोशाप करके साझा कर दी। थोड़ी देर में दोस्त शशिधर ने बताया कि ये फोटो फर्ज़ी है। नकली है। मैंने तुरंत हटाया और ग़लती भी मानी। यही नहीं फेक और असली तस्वीर दोनों को एक साथ ट्वीट किया। इस गलती के पीछे सांप्रदियाक रूप से भड़काने या प्रोपेगैंडा करने की मंशा नहीं थी। फासिस्टों के ख़िलाफ़ लोग जमा हो रहे थे, इसका संदेश देना ही मेरा मकसद था। फाइनली, जो भी फ़ेक न्यूज़ को एक्सपोज़ करते हैं, उनको सलाम । मेरी ख़्वाहिश है कि उनकी संख्या और भी ज़्यादा हो।”

साभार: एन डी टीवी इंडिया


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गौरी लंकेश की अन्त्येष्टि पूरे राजकीय सम्मान के साथ

 वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश की  अन्त्येष्टि बुधवार को पूरे राजकीय सम्मान के साथ शहर के चामराज पेट कब्रिस्तान में किया गया. पुलिस ने गौरी लंकेश को बंदूकों से सलामी दी तो वहीं इस दौरान हजारों लोगों ने अश्रुपूरित अंतिम विदाई दी. गौरी लंकेश लिंगायत समुदाय से आती हैं, जिसमें मृतक का दाह संस्कार नहीं किया जाता है उसे दफनाया जाता है.

उनके भाई  इंद्रजीत ने कहा, “उनका पार्थिव शरीर लोगों के दर्शन के लिए समसा बायालु रंगमंदिरा (ओपन एयर थिएटर) में रखा जाएगा.” उन्होंने बताया कि गौरी की इच्छानुसार उनकी आंखें दान कर दी गई हैं.

इस दौरान कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया, गृहमंत्री रामलिंगा रेड्डी व अन्य नेता लंकेश को अंतिम श्रद्धांजलि देने के लिए चामराज पेट पहुंचे. इससे पहले सीएम सिद्धारमैया ने जांच के लिए एसआईटी से कराने का आदेश दे चुके हैं. वहीं इस घटना के बाद पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, लेखकों, विचारकों, महिला संगठनों व दूसरे लोगों ने देश भर में जमा होकर निंदा की.



बता दें कि गौरी लंकेश की मंगलवार रात को बेंगलुरु में उनके आवास पर गोली मारकर हत्या कर दी गई. गौरी लंकेश को निशाना बनाकर 7 गोलियां मारी गई थीं. उनके शरीर पर 3 गोलियों के चोट के निशान मिले हैं. गौरी लंकेश को बदमाशों ने तब निशाना बनाया जब वह अपनी कार से उतरकर अपने घर का दरवाजा खोल रही थीं. इस घटना के बाद धरना प्रदर्शन और सियासत शुरू हो गई.



जहां एक तरफ बीजेपी ने इसे लेकर कांग्रेस सरकार और सीएम सिद्दारमैया को निशाने पर लिया है और कानून व्यवस्था को जिम्मेदार ठहराया है. बीजेपी नेता सदानंद गौड़ा ने सीबीआई जांच की मांग की है. तो वहीं दूसरी तरफ राहुल गांधी ने कहा जो कोई भी बीजेपी-आरएसएस की विचारधारा के खिलाफ बोलता है उसे दबाया जाता है यहां तक कि मार डाला जाता है.

साभार: india.com

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तीन तलाक के विषदंत उखाड़ती स्त्रियां

गुलज़ार हुसैन


गुलज़ार हुसैन जितने संवेदनशील और बेहतरीन कवि हैं उतने ही अच्छे रेखा -चित्रकार. मुम्बई में पत्रकारिता करते हैं . संपर्क: मोबाईल न. 9321031379

समस्या औरत ने नहीं खड़ी की। यह पुरुष की समस्या है कि वह स्त्री को सामानाधिकार से वंचित रखना चाहता है।- ‘द सेकेंड सेक्स’ में सिमोन द बोउवार

तीन तलाक का विषदंत भारतीय मुस्लिम महिलाओं के लिए एक समस्या भर ही पैदा नहीं करता है, बल्कि यह महिलाओं को एक ऐसे अथाह असीम दलदल में धकेल देता है, जहां से उसके भविष्य की सारी राहें बंद हो जाती हैं। यह सब कुछ किसी का कत्ल किए बिना सांस छीन लेने की तरह खतरनाक है। इस खतरनाक स्थिति में पड़ी महिलाओं को इससे उबारने और नई पीढ़ी की लड़कियों को इस ‘मर्द दंश’ से बचाने की लड़ाई बहुत संघर्षपूर्ण रही है। अभी हाल ही में (अगस्त, 2016) सुप्रीम कोर्ट ने एक साथ (इंस्टैंट) तीन तलाक कह कर विवाह संबंध खत्म करने की प्रथा को असंवैधानिक करार दिया है। यह फैसला भारतीय मुस्लिम स्त्रियों की राह के कांटे हटाने वाला कहा जा सकता है, क्योंकि भारतीय मुस्लिम स्त्रियों ने इसका खुले दिल से स्वागत किया है।

‘तीन तलाक’ के खिलाफ लड़ाई लड़ने में डॉ. नूरजहां सफिया नियाज और जकिया सोमन का नाम उल्लेखनीय है। इन दोनों ने मिलकर भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन (बीएमएममए) को तब खड़ा किया जब पर्दे के अंदर दबी-छिपी महिलाएं अपने चेहरे पर मुस्कान ओढ़े भीतर ही भीतर खोखली बनी हुर्इं थीं। डॉ. नूरजहां कहती हैं कि उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती मुस्लिम समाज में अपने काम को लेकर स्वीकृति पाने की थी। यह भी साफ नहीं था कि मुस्लिम महिलाएं हमारे साथ आएंगी, लेकिन हमें उम्मीद थी कि वे हमारे साथ आएंगी। वे हमारे साथ आर्इं और बड़ी संख्या में आर्इं। सुप्रीम कोर्ट के तीन तलाक पर आए सकारात्मक फैसले को नूरजहां ऐतिहासिक मानती हैं। वे कहती हैं कि पांच पीड़ित महिलाएं सुप्रीम कोर्ट में पहुंची और उनकी आवाज सुनी गई, यह उल्लेखनीय। यह अप्रत्याशित है।

गौरतलब है कि शायरा बानो, आफरीन रहमान, इशरत जहां, आतिया साबरी और गुलशन परवीन नामक महिलाएं तीन तलाक के दंश से पीड़ित थीं। सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय इन्हीं पांच मुस्लिम महिलाओं की याचिकाओं पर सुनाया है। इन महिलाओं की जिंदगी में तीन तलाक के कारण दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था। किसी को तीन तलाक कहकर घर और संपत्ति से बेदखल कर दिया गया था, तो किसी को स्पीड पोस्ट और फोन के माध्यम से तीन तलाक देकर मरने के लिए छोड़ दिया गया था।

नूरजहां मानती हैं कि भारतीय मुस्लिम महिलाओं की राह में सबसे बड़ा रोड़ा धार्मिक संगठन हैं। वे कहती हैं कि मुस्लिम धार्मिक संगठन हमेशा हमारे आंदोलन का विरोध करते रहे हैं और आज भी करते हैं, लेकिन उनसे समर्थन और मान्यता हमें उम्मीद भी नहीं है। हम जब कुरआन के आधार पर इस्लाम में स्त्री के हक की व्याख्या करते हैं, तो मुस्लिम धर्मगुरु तिलमिला जाते हैं। कुरआन के आधार पर स्त्रियों के हक की बात सुनते ही मुस्लिम धर्म गुरु पर्सनल अटैक पर उतर आते हैं। नूरजहां कहती हैं कि मुस्लिम महिलाओं के साथ बड़ी संख्या में मर्दों का सपोर्ट भी हमें मिला है। बीएमएममए की ओर से तैयार ड्राफ्ट ‘द मुस्लिम फैमिली एक्ट’ को पार्लियामेंट में पहुंचाना हमारा लक्ष्य है। वे कहती हैं कि हमलोग आंदोलन के तहत स्त्रियों की शिक्षा, सेहत और कैरियर से जुड़े कई कार्य करते हैं।



मुस्लिम महिलाओं की दयनीय स्थिति से अपनी कष्टप्रद जिंदगी के तार जोड़कर अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने वाली जकिया सोमन के संघर्ष की कहानी  किसी से छुपी नहीं है। वह गुजरात में प्रोफेसर के पद पर कार्य करते हुए भी 16 सालों तक पुरुषवादी जुल्म को झेलती रहीं। उनका मानना है कि हर औरत के अंदर ताकत होती है, इसलिए उसका उभारा जाना जरूरी है। इसी ताकत के बल पर जेंडर जस्टिस और इक्वलिटी की बात हम उठा पा रहे हैं। जकिया गुजरात से हैं, इसलिए 2002 में हुए सांप्रदायिक नरसंहार और उससे उपजी भीषण त्रासदी का उनके जीवन में बहुत प्रभाव पड़ा वे गुजरात नरसंहार से पीड़ित महिलाओं -बच्चों को दुख से बिलखता देखती तो तड़प उठतीं थी। राहत कैंप में दंगा पीड़ित मुस्लिम स्त्रियों के लिए सेवा कार्य करते हुए उन्हें अपनी जिंदगी जीने की राह भी मिल गई।

जकिया ने जब दंगा पीड़ित गरीब और बेघर मुस्लिम महिलाओं को न्याय पाने के लिए व्याकुल देखा तो उनके अंदर आशा की किरण फूट पड़ी। उन्होंने देखा कि पति, बेटे और अपने परिवार को गुजरात दंगों में खो चुकी मुस्लिम स्त्रियां चुप नहीं बैठी हैं। किसी का पति मारा गया है, तो किसी का घर जल गया है, लेकिन वे न्याय के लिए आवाज उठा रही हैं। वे पुलिस से लेकर कोर्ट तक अपनी आवाज बुलंद कर रहीं हैं। दंगा पीड़ित महिलाओं के इस साहस ने टूटी हुई जकिया को संबल दिया। उन्हें लगा कि बेघर और अपना परिवार खो चुकी स्त्रियां जब इतनी हिम्मत से आगे बढ़ सकती हैं, तो वे क्यों नहीं महिलाओ के हक के लिए लड़ाई लड़ सकती हैं। यही आत्मबल उनके जीवन का टर्निंग प्वाइंट बना था।

जकिया बताती हैं कि शादी के बाद उन्हें अपने मन से हंसने या रोने तक का भी अधिकार नहीं था। मन की बात कहने पर उन्हें पीटा जाता था। वे कहती हैं कि इस पुरुषवादी दुष्चक्र में उन्होंने अपनी जिंदगी के 16 साल गुजार दिए थे, लेकिन गुजरात दंगे से पीड़ित महिलाओं से मिलकर उन्हें लगा कि इतनी दबी-कुचली महिलाएं जब इंसाफ के लिए लड़ सकती हैं, तो वे पढ़ी-लिखीं होकर क्यों नही लड़ सकती हैं। इसके बाद भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन के तहत वे आगे ही बढ़ती गईं। कई स्त्रियां उनसे इस संघर्ष के साथ जुड़ती गईं। जकिया कहती हैं कि न केवल मुस्लिम औरतें, बल्कि अधिकांश मर्द हमारे साथ आए हैं।


इंस्टैंट तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से पहले मुंबई के हाजी अली दरगाह में औरतों के प्रवेश को लेकर भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की ओर से उल्लेखनीय लड़ाई लड़ी गई और जीती भी गई। इस दौरान जितनी भी महिलाएं उनके साथ थी, वे दरगाह के अंदर प्रवेश को लेकर अपने निर्णय से टस से मस नहीं हुईं और अंततः उन्हें सफलता मिली। एक टीवी साक्षात्कार में जकिया ने इस मुद्दे पर कहा था यदि हम लड़ेंगे तो अल्लाह हमारे साथ है और कानून हमारे साथ है।

इंस्टेंट तीन तलाक पर आए सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले से इस्लामिक फेमिनिज्म को एक नया आधार मिला है। इस्लामिक फेमिनिज्म का यह स्वरूप भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन (बीएमएमए) के तहत 2007 में गढ़ा गया था। बीएमएमए की तरफ से डॉ.नूरजहां और जकिया सोमन लिखित (2015 में प्रकाशित) पुस्तक ‘सीकिंग जस्टिस विदिन फैमिली’ (Seeking Justice Within Family: A National Study on Muslim Women’s views on reforms in muslim personal law) में मुस्लिम महिलाओं की आर्थिक-शैक्षिक स्थिति के अलावा शादी, तलाक, और संपत्ति सहित कई मुद्दों पर विस्तार से अध्ययन (study) प्रस्तुत किया गया है। इस स्टडी से कई चौंकाने वाली बात सामने आई हैं। इसके तहत हुए सर्वे के अनुसार भारत में 55. 3℅ लड़कियों की शादी 18 साल की उम्र से पहले हो जाती है। 53.2 ℅ मुस्लिम महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार होती हैं। इसके अलावा सर्वे के अंतर्गत 95.5℅ महिलाएं मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के बारे में नहीं जानतीं। इसके अलावा भी स्टडी में कई चौंकाने वाली जानकारी सामने आईं हैं।



बहरहाल, जकिया और डॉ. नूरजहां की यह गैर राजनीतिक लड़ाई अभी लंबी है और रास्ते में कई कांटें बिखरे हैं। निस्संदेह यह आंदोलन मुस्लिम समाज के अंदर से उभरा है, लेकिन इसी समाज के अंदर इसका जोरदार विरोध भी हो रहा है। कई बुद्धिजीवियों का मानना है कि ट्रिपल तलाक (इंस्टैंट) के मामले भारतीय मुस्लिम समाज में बहुत कम हैं। तो अब सवाल यह है कि जब ट्रिपल तलाक के मामले न के बराबर हैं भी, तो इस अमानवीय प्रथा के अस्तिव में रहने की क्या जरूरत है। इसे हटा क्यों न दिया जाए। ट्रिपल तलाक यदि अस्तित्व में रहेगा, तो मर्द भले इसका इस्तेमाल नहीं करे, लेकिन इसको लेकर वह घमंड से भरा हुआ तो हो ही सकता है। मौखिक ट्रिपल तलाक घर में अवैध रूप से रखी उस बंदूक की तरह है, जिसका इस्तेमाल करके ही नहीं, बल्कि उसका भय दिखा कर भी स्त्रियों का जीना मुश्किल किया जा सकता है, इसलिए जकिया सोमन, डॉ. नूरजहां और उन जैसी हर मुस्लिम महिलाओं की यह लड़ाई जारी रहनी चाहिए।

(कुछ जरूरी जानकारी डॉ. नूरजहां सफिया नियाज से फोन पर बातचीत और जाकिया सोमन के कई साक्षात्कारों पर आधारित)

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पतनशील पूर्वप्रेमिका कंगना हाज़िर हो !

नीलिमा चौहान


पेशे से प्राध्यापक नीलिमा ‘आँख की किरकिरी ब्लॉग का संचालन करती हैं. प्रकाशित पुस्तकें: पतनशील पत्नियों के नोट्स, ‘बेदाद ए इश्क’ (संपादित) संपर्क : neelimasayshi@gmail.com.

कंगना का हालिया अदालती बयान मुल्क के क्यूट सिली एक्स लवरों  के हाइस्पीड मर्दाना गुरूर पर ज़बरदस्त ब्रेक हैं । दानिशमंद जमात के लिए प्रेम , परम्परा और विद्रोह जैसे उलझाऊ विषय पर बौद्धिक व्यायाम करने का एक और बहाना है । प्रेमरत प्रेमिकाओं के लिए अपने  प्रेम और प्रेम में अपनी वलनरेबिलिटी को पहचानने का मौका है । इश्क के दाग़ , पीड़ा और अपराध बोध के रेडीमिक्स सायनाइड को चखने के लिए प्रोग्राम्ड हिंदुस्तानी पूर्वप्रेमिकाओं के लिए फिल्म जगत का एक गैरफिल्मी उदाहरण है । रामादि के प्रेम आदर्श से पतित  होकर सीधे तेजाबादि से प्रेमिकाओं का अभिषेक करने रीत की पर हश हश करने वाले मुल्क का 440 वोल्ट के करंट से गुज़रना है ।


ओहो कंगना डियर ! तुमको मालूम होना चाहिए कि जिसे तुम प्रेमी का जुर्म कहने पर आमादा हो वह तो हमारे मुल्क के ‘ मर्दाना लव कंडक्ट मैनूअल’  में उल्लिखित टोटके वाली टिप्स भर है । एक मान्य और मामूली से सबक का प्रेमिका प्रताड़ित अनाड़ी प्रेमी द्वारा बरतना भर है । इस मुक्ल की प्रेम करने वालियाँ ये बात बखूबी जानती होती हैं कि इस विरासती ज्ञान को अमल में लाकर आदर्श भारतीय  प्रेमी अपने घाव ,हार , हताशा  से फौरी निजात पाता होता है । अपने जलते हुए अहम की आतश को बुझाना उसका इंतिखाब नहीं उसकी मजबूरी हुआ करती है । सारा मुल्क जानता है कि चोटिल मर्दाना अहम अगरचे तुरंत एसे इलाज न पाए तो नासूर बनकर बनकर जमात तक के लिए खतरा बन सकता है । तुम्हारे पास एक अच्छा मौका था सो तुम सज़ायाफ्ता पूर्वप्रेमिका की तरह हाथ बाँधे खड़ी रहतीं और  ट्रेजिडी क्वीन कहलातीं । सहानुभूति के सिक्के बटोरतीं और निजी को निजी रहने देकर इस ज़लज़ले की आमद को रोक लेतीं । तुमने जमात को खेमों में बँटने का असबाब दिया और घरबारी रसूखदार  लोगों को अपनी बेवजह की ज़िद के चलते लामबद्ध होने को मजबूर किया ।   मुल्क के  ध्यान और ताकत को एक ज़नाना मसले की ओर लगाने का फसाद किया ।

तुमने कोई आम प्रेमी चुना होता तो जानतीं  कि इश्क में हुई ज़नाना खता की जमात द्वारा मुकर्रर सज़ाएं कितनी खूंख्वार भी हुआ करती हैं । इश्क के फेर में पड़कर एक आम माशूका की तरह तुमने भी अपने प्रेमी के नाम खतो किताबत , शेरो शायरी की। अपने निजी लम्हों को  कैमरे में कैद कर लिए जाने की बेपरवाही दिखाई। औरतों के सबसे बड़े  जासूस वर्चुअल जगत पर अपने यार से इश्क के सबूत छूट जाने दिए । इस सबसे यही साबित होता है कि तुम पेशतर ही अगले बंदे के नाज़ुक ईमान पर अपनी उम्मीदों का भारी  बोझ लादने की बेशर्मी से भरी हुईं थीं । कँगना डियर आज तुम्हारे द्वारा खेले जा रहे पूर्वप्रेमिका वाले पैंतरे यही साबित करते हैं कि तुम बतौर  प्रेमिका भी कैसी हिसाबफहम रही होंगी । खालिस प्यार न करके तुम बुनियादी रिश्ते बनाने  की फिराक में रहने वाली दूरंदेशी दिखाकर अपने प्रेमी को  उलझन में डालती रही होंगी । जिस मुल्के में हर गली के नुक्कड पर बेज़ुबान प्रेमिका बनने को  बेकरार लड़कियाँ  पाई जाती हैं उस मुल्क के सबसे एलिजिबल प्रेमी के सामने ज़ुबान ही नहीं दिमाग मौजूद होने के सबूत देने से भी तुम बाज़ न आई होंगी । प्रेमी से अपने रिश्ते को अपनी नज़रों से देखने तौलने ,परखने , सँवारने का लालच दबाकर रखना भी तुमको आया न होगा । प्यार को वफा- जफा , कानून- वानून , नैतिकता- वैतिकता  के तराज़ू  पर तोलने वोलने की फिराक  में कूद – कूदकर , अपनी औरताना राय जता- जताकर प्रेम के रस में रेत घोलने का करम किया होगा । क्या हमें कैसे मालूम ? अरे भई हर मूर्ख प्रेमिका यही खता तो किया करती है । यह नहीं कि प्रेम के वक्त  पर बस प्रेम करे और दिल की बातों में दिमाग को आने से रोके रहे । तुमने भी हर हिंदुस्तानी  प्रेमिका  की तरह प्रेम से ज़्यादा प्रेम के भविष्य के बारे में सोचा होगा । मिलते हुए तात्कालिक प्रेम की बजाय संभावित सार्वकालिक प्रेम की आस बाँधी होगी । एक पत्नी और एक प्रेमिका की उम्मीदों के उँचे पहाड़ से बँधी रस्सी पर चलते आशिक को अपने बजाय अपने मज़बूत प्रेम से सम्बल देने के तुमने  उंगलबाज़ी की होगी ।



हे कंगना रनौत ! तुम्हारे हौसले के पीछे छिपी तुम्हारी जुगाड़बाज़ी की कारस्तानी पर तुम खुद भी कुछ बोलोगी या पहले से अतिव्यस्त जनता के ज़ेहन पर एक्स्ट्रा लोड डालकर तमाशाबीनी करोगी ? जनता जानना चाहती कि एक शादीशुदा , रसूखदार , अमीरज़ादे से तुम्हारा इश्क भावनाओं का लोचा भर है या किसी और बेहतर ऊँचाई पर पहुँचने के लिए सीढ़ी  का इंतज़ाम करना था। बतौर एक हारी हुई प्रेमिका के लगाए हुए इल्ज़ाम तुम्हारे उसी सिरफिरेपन का नतीज़ा तो नहीं जिसका पता तुम्हारे  प्रेमी ने मुल्क को पेशतर ही दे दिया था । ए लडकी ! तुम नहीं जानती क्या कि हमारे यहाँ की तमाम  प्रेमिकाएँ प्रेम में  हारते ही जज़्बाती हो जाती हैं और जो इंतकामी हो जाती हैं वो आखिरकार पागल करार दे दी जाती हैं । इंतकाम की आग में जलने वाली तुम्हारी जैसी होशोगुल प्रेमिकाएँ प्रेमी समेत उसके पूरे खानदान को सूली पर लटकवाने की हर नामुमकिन कोशिश करती हैं । इस जुनून के  लिए ये पूर्वप्रेमिकाएँ खुद का  अमन- चैन- इज़्ज़्त सब कुछ दाव पर लगाकर मोटा  हर्ज़ाना पाने की बड़ी  जंग लड़ने में जुट जाती हैं । कितना समझा लो , डरा लो धमका लो । बुढ़ा भले जाएँ पर हार नहीं मानती होतीं । बिचारा चोट खाया प्रेमी सीधे रास्ते पर चलकर नयी गृहस्थी बसाना चाहे |  बूढ़े  पिता के जवान रसूख के दम पर अपना डूबता हुआ नाम बचाना चाहे | पुरानी पत्नी के नये बयानात से खुद को पाक दिल का कहलवाना चाहे | पर्दे के पीछे बुलवाकर कुछ हर्ज़ाना देकर मामला रफा दफा करना चाहे |  आस पास के नेकदिल परोपकारी  सामाजिकों से कहलवाकर  गुस्ताख़ प्रेमिका  को  ‘ कर भला हो भला’  का पाठ पढ़वाना चाहे । पर न जी । तुमारे जैसी अड़ियल प्रेमिका अपने नेक इरादा पूर्व प्रेमी को डुबोने की ज़िद पर टिकी ही रहती है । प्रेमी को स्वरक्षा में खुलासे दर खुलासे करने पर मजबूर किया करती हैं । बात से बात निकलवाकर अपना आगा- पीछा सबका बेड़ा  गर्क किए डालती है । एक बेचारा प्रेमी बस सुधरना ही चाहता है बस पर उसकी इतनी सी आस को  दुत्कारकर माफी , न्याय ,बदला जैसे जाने क्या- क्या हिंसक सपने पाले चलती है ।


ऐ लड़की ! तुम सिरफिरी- बददिमाग प्रेमिका न होतीं तो एक आदर्श भारतीय पूर्वप्रेमिका दिखने की कोशिशों को अंजाम देना जानती होती । तुम थकी और हारी दिखतीं धोखे और सदमे की शिकार दिखतीं । चार लोगों के बीच आठ आसूँ बहाकर अपनी बेगुनाही , बदनसीबी, बदहाली के हवाले पेश करतीं । इश्क करने में लगी न रहकर तुमने भी अपने तम- मन- धन आशिक को सुपुर्द कर देने की लाचारी के सुबूत जुटाकर रखे होते । इस तरह से  तुम लोक की क्षणिक सहानुभूति सहेजकर एक कुर्बान प्रेमिका के शाश्वत खोल में जा रहतीं । ताउम्र इस वहम के सहारे सब्र कर रहतीं कि चंद पलों को ही सही एक हीरो को दुनिया के दिल ने ज़ीरो की तरह कोसा होगा । हाँ जनाब आपने ठीक फरमाया कि दौलत शोहरत का ठीकठाक मकाम हासिल कर चुकी लड़की से एक आम हिंदुस्तानी ज़नानी जैसे व्यवहार की आपको कतई उम्मीद न थी । ‘ प्यार जज़्बात वादे शादी’  के फॉर्मूले पर जीकर सफल हो गई लड़कियों पर यह इल्ज़ाम नहीं बनता । पर जनाब इस फार्मूले पर चलकर मुँह की खाने वाली लड़की को जवाब देना बनता है कि समर्थ पुरुष को प्रेमी बनाने का जाल फैलाने का दुष्कर्म करने की जुर्रत की तो की कैसे तुमने ? बोलो कंगना ?

ओह ! तुम तो अपनी फिल्मों के किरदारों की सीखी सिखाई बदलगाम हंगामाखानम निकलीं । बदहाल बदहवास छोड़ी  हुई प्रेमिकाओं के स्यापे का स्वाद लेने के ख्वाहिश्मंदों को कैसा निराश किया तुमने पगली !  अपने नाकाम रिश्ते को छिपाने के बजाय उसके होने की अकुंठ हामी भरने वाली |  अपने पर आती हुई तोहमतों के तूफान में भी भरे पर्दे पर विचलित हुए बिना टिक जाने वाली । बेधड़क । बेबाक । उन्मुक्त और सहज । अतीत से नाशर्मिंदा । आगत के लिए बेखौफ । दूसरे पाले में तमाम ताकत को पाकर भी अपने पाले में भीड़ की परवाह से आज़ाद । सही कहा किसी भी औरत का ऎसा सिरफिरापन लोहे की दीवार पर अपना सर खुद मारने दौड़ना नहीं  तो और क्या है ? अपनी शोहरत और सुखमय जिंदगी को खुद दीवार में चिनवाने के माफिक है । जनाब आपको वहशत इसलिए बढ़ी  हुई है क्योंकि आप जानते होते हैं कि अपना सब कुछ दाव पर लगा देने वाली औरत से खतरनाक और कुछ नहीं होता । इश्क गँवाकर और इज़्ज़्त के फलसफे को पैरों तले कुचलकर चलने वाली औरत के बेपरवाह कदमों तले और क्या- क्या कुचला जा सकता है इसका अंदाज़ा आपको बखूबी है । आप जानते हैं कि ज़बान की तमाम लगामों को खारिज कर चुकने वाली औरत जब बोलती है तो बहुत मुमकिन है कि ऊंचे शिखरों की जड़ में पलीता लगाने की गुस्ताख़ी करने में भी मज़ा लेने लग सकती है । प्रेम, ईनाम,  जुगाड़,  छवि, भविष्य , सपनों वगैरह को अपनी देह से गर्द की माफिक झाड़कर उठती प्रेमिका । उफ गश खा रहे हैं आप तो ? अजी आप उसकी तमाम तकरीरों का तोड़ पेश कर सकते हैं । आप इस प्रेमिका की हर दलील में  कोई झूठ , कोई पैंतरा तलाश सकते हैं । पर आप डर से पार जा चुकी पूर्व प्रेमिका के औरा से सपने में भी निजात पा नहीं सकते ।


पसोपेश में आप इसलिए हैं क्योंकि आपने पूर्व प्रेमिकाओं के लिए एक घरों के तहखानों में एक अंधेरा कोना एलॉट किया हुआ था । जहाँ प्रेम में छोड़ी हुई लड़कियाँ जीभर रो तड़प सकती थीं या अपनी कलाई काटकर मरण का वरण कर सकती थीं । ऊपर  के माले पर दीवान ए खास में अपनी आराम कुर्सी में जमकर बैठी , ठठाकर हँसती और सपने बुनती हुई पूर्वप्रेमिका देखकर मायूस ही नहीं जड़वत हैं आप । सिरफिरे साहस के मर्ज़ बनने ,  महामारी की तरह फैल जाने और फिर प्रेम में हारी हुई  औरतों  के इम्यून हो जाने से अपनी आधी मर्दाना ताकत खो देने वाले हैं आप ।


ऎसी खरपतवार की मानिंद यहाँ- वहाँ मत पूछो कहाँ- कहाँ उगती हुई पूर्वप्रेमिकाओं को आप नया नाम न देना चाहेंगे ?
हा हा ! हुज़ूर !  बजा फरमाया आपने ये हैं पतनशील पूर्वप्रेमिकाएँ ।

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हिंदुत्व की आलोचक वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश की गोली मारकर हत्या

वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश की उनके घर के बाहर गोली मारकर हत्या, हिंदुत्व की थीं घोर आलोचक.
वे साप्ताहिक पत्रिका ‘गौरी लंकेश पत्रिके’ की सम्पादक थीं। उनके शरीर पर गोलियों के कई निशान हैं, जिससे जाहिर होता है कि उनकी हत्या के लिए उन पर कई बार फायरिंग की गई।

वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश की आज बेंगलुरु स्थित उनके घर के बाहर गोली मार कर हत्या कर दी गई। न्यूज एजेंसी एएनआई ने यह जानकारी दी। उनका घर राजाराजेश्वरी नगर में था। उनके शरीर पर गोलियों के कई निशान हैं, जिससे जाहिर होता है कि उनकी हत्या के लिए उन पर कई बार फायरिंग की गई। गौरी लंकेश को हिंदुत्ववादी राजनीति का घोर आलोचक माना जाता था। डीसीपी वेस्ट एनएन अनुचेथ ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि आज शाम गौरी के घर पर शूट आउट हुआ, जिसमें उनकी मौत हो गई। उनका शव घर के वरांडा में पाया गया।  इस बारे में ज्यादा जानकारी का इंतजार है।

 वैचारिक मतभेदों को लेकर वह कुछ लोगों के निशाने पर थीं. वह कन्नड़ भाषा में एक साप्ताहिक पत्रिका निकालती थीं.


पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या पर कर्नाटक के सीएम सिद्धारमैया ने कहा है कि इस जघन्य अपराध की निंदा करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं. यह लोकतंत्र की हत्या है.



केरल के मुख्यमंत्री पी. विजयन ने इस घटना पर क्षोभ व्यक्त करते हुए कहा है कि बहादुर पत्रकार और कार्यकर्ता गौरी लंकेश की हत्या से स्तब्ध हूं. दोषियों को जल्द से जल्द पकड़ा जाए.

खबर इनपुट: जनसत्ता,एन डी टीवी इंडिया,न्यूज़ 18

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दूसरी महिला रक्षामंत्री और पहली पूर्णकालिक महिला रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण:प्रतिनिधित्व का अपना महत्व

वाणिज्य मंत्रालय  में स्वतंत्र प्रभार मंत्री निर्मला सीतारमण को देश का नया रक्षामंत्री बनाया गया है. इंदिरा गांधी के बाद सीतारमण देश की महिला रक्षामंत्री बनी हैं। इंदिरा जी ने प्रधानमंत्री रहते हुए रक्षा मंत्रालय को भी सम्भाला था। इस तरह  वे पहली पूर्णकालिक महिला रक्षा मंत्री हैं।



जेएनयू की छात्रा रहीं निर्मला सीतारमण ने वाणिज्य मंत्रालय में रहते हुुए कई अच्छे  काम किए, कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री ने उन्हें इसका पुरस्कार दिया है। हालांकि वे अपनी नियुक्ति को दैवीय कृपा भी बता रही हैं।
रक्षा विशेषज्ञ मेजर जनरल पीके सहगल ने तो कहा कि महिलाओं को आप कम करके मत आंकिए.


रक्षा मंत्रालय देश के चार शीर्ष मंत्रालयों में से एक है और यहां चुनौतियां उतनी ही कठिन भी हैं. ख़ुद को साबित करने के लिए निर्मला सीतारमण के पास ज़्यादा समय नहीं है.

निर्मला सीतारमन 2003 से 2005 तक राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्या रह चुकी हैं। 2006 में उन्होंने भाजपा ज्वाइन किया।

निर्मला सीतारमण ने 1980 में सीतालक्ष्मी रामास्वामि कॉलेज, तिरुचिरापल्ली, तमिलनाडु से ग्रेजुएशन किया है. उसके बाद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से एमफ़िल किया है.

भले ही वे अपनी नियुक्ति का श्रेय ईश्वर को दे रही हैं। लेकिन जनता की अपेक्षाएं खुद उनसे होंगीं। रक्षा विशेषज्ञ मेजर जनरल पीके सहगल ने तो कहा कि महिलाओं को आप कम करके मत आंकिए. मुझे तो लगता है कि जो काम पिछले कई रक्षा मंत्री नही कर पाए वो ये कर पाएंगी .एक महिला रक्षा मंत्री की नियुक्ति सेना में महिलाओं की भूमिका को बढ़ाने का भी रास्ता खोलती है. फिलहाल क़रीब साढ़े चौदह लाख सैनिकों वाली भारतीय सेना के तीनों अंगों में कुल क़रीब चार हजार ही महिलाएं हैं. उसमें भी कॉम्बैट रोल अभी सिर्फ़ एयरफोर्स में ही महिलाओं को दिया गया है. निर्मला सीतारमण के आने के बाद इसमें विस्तार की उम्मीद है. तभी तो निर्मला ने कहा कि मंत्रालय में आने के बाद वो इस मामले को खुले तौर पर देखेगी फिर फैसला लेगीं .

निर्मला सीतारमण ने  जेएनयू में एमफिल की पढा़ई के दौरान  सहपाठी पराकला प्रभाकर से प्रेम विवाह किया है। विवाह के बाद वे लन्दन चली गई थीं।1991 में बेटी के जन्म के बाद वह हैदराबाद में बस गईं निर्मला सीतारमण मुदरई की रहने वाली है और ज्यादातर अंग्रेजी का ही इस्तेमाल करती हैं।

सीतारमण की छवि विवाद रहित और साफ सुथरी रही है

अभी तक देश में रक्षा मंत्रालय हमेशा पुरुषों को ही दिया जाता रहा है. हालांकि दुनिया के कई देश हैं जहां पर महिलाएं रक्षा मंत्रालय को संभाल रही हैं

किन देशों में हैं अभी महिला रक्षामंत्री

बांग्लादेश : शेख हसीना इस समय रक्षामंत्री हैं. वह देश की प्रधानमंत्री भी हैं इस समय.

दक्षिण अफ्रीका : एनएम नकुला इस समय यहां की रक्षामंत्री हैं.

नीदरलैंड : जेएस प्लैसचार्ट इस देश की रक्षामंत्रीं हैं. 2012 में उनको यह जिम्मेदारी दी गई थी.

केन्या : आर. ओमामो केन्या की रक्षामंत्री हैं.

अल्बानिया : एम कोढेली अल्बानिया देश की रक्षामंत्री हैं. वह तीन सालों से इस देश की रक्षामंत्री हैं.

नार्वे : नार्वे की रक्षामंत्री एनएमई सोर्रडिया हैं. सोर्रडिया तीन सालो से यहां की रक्षामंत्री हैं.

जर्मनी : यूवी लेयन जर्मनी की रक्षामंत्री हैं. वह यहां पर 3 सालों से रक्षा मंत्रालय संभाल रही हैं.

इटली : रॉबर्टा पिंटो इटली की रक्षामंत्री हैं जो कि 3 सालों से इस मंत्रालय को संभाल रही हैं.

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जेएनयू में दलित-ओबीसी छात्राएं चुनाव मैदान में: ऐतिहासिक चुनाव



ज्योति प्रसाद 

महिला आरक्षण बिल का एक फेसबुक पेज़ है जिसे गिनती के लाइक्स मिलते हैं। कई लोगों को यह भी नहीं मालूम कि डबल्यूआरबी (WRB) किस चिड़िया का नाम है। मगर इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं कि राजनीति के क्षेत्र में महिलाओं की दस्तक नहीं हो रही है। पिछले दिनों दिल्ली में हुए नगर निगम चुनावों में लगभग सभी छोटी बड़ी पार्टियों की पहली पसंद महिला उम्मीदवारों के युवा एवं ताज़ा चेहरे थे। भारतीय राजनीति में यदि महिलाओं के चेहरे खोजें जाएँ तो उँगलियों में गिनने लायक उदाहरण ही मिलते हैं। ममता बनर्जी, महबूबा मुफ़्ती और वसुंधरा राजे सिंधिया वर्तमान में तीन राज्यों में मुख्यमंत्री के चेहरे हैं। इसके अलावा भारतीय राजनीति के इतिहास में कुछ ऐसे चेहरे हैं जो काफी वक़्त तक टिके रहे और आज भी उदाहरण के रूप में आते हैं।

अपराजिता राजा

सुर्खियों में रहने वाले जवाहरलाल विश्वविद्यालय में आगामी 8 सितंबर को छात्र संघ चुनाव होने वाला है। चुनाव में हिस्सा ले रहे छात्र संगठनो ने महिला उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है, जिनमें अधिकांश दलित-ओबीसी  लडकियां हैं। यह वास्तव में एक सकारात्मक सक्रिय कदम भी है जिसमें महिलाओं को एक पूरी पिक्चर वाला फ्रेम मिल रहा है। महिला उम्मीदवारों के चुनाव में भाग लेने से विश्लेषण, परिस्थिति और शब्दावली बदलती है या नहीं इसका पता धीरे धीरे चल जाएगा। फिर भी यह चुनाव दिलचस्प साबित होने जा रहा है।

जेएनयू छात्रसंघ चुनाव इसलिए भी खास होगा क्योंकि ‘9 फरवरी’ की घटना होने के बाद यहाँ पढ़ने वाली छात्राओं को लेकर अभद्र टिप्पणियाँ तो की ही गईं साथ ही साथ कुछ फुरसतिए नेताओं द्वारा कूड़ा करकट में झांक कर कंडोम भी गिने गए। छात्र-छात्राओं को निशाना भी बनाया गया और उन पर देशद्रोह का लेबल भी चिपकाया गया। छात्राओं के लिए उन तमाम शब्दों का इस्तेमाल हुआ जो किसी भी सभ्य समाज में निंदनीय हैं। इसलिए हर मुश्किल का सामना करते हुए भी मुद्दों के साथ अपनी पार्टी की सोच को ये महिला उम्मीदवार रख रही हैं साथ ही साथ एक औरत की नज़र में तमाम विषय किस रूप में ढल जाते हैं, यह भी सामने निकल कर आ रहा है। आइये छात्रसंघ चुनाव में खड़ी होने वाली सभी महिला उम्मीदवारों से एक परिचय किया जाये। सबसे महत्वपूर्ण है कि छात्रसंघ के अध्यक्ष पद के लिए तीन छात्र संगठनों की उम्मीदवार दलित-पसमांदा छात्राये हैं.




1. अपराजिता राजा- प्रेसिडेंट पद के लिए ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन (एआईएसएफ)
की  उम्मीदवार अपराजिता राजा हैं। वह राजनीति विभाग में ही पीएचडी की द्वितीय वर्ष की छात्रा हैं। उनके मुताबिक़ जेएनयू प्रबंधन के खराब प्रबंधन, इस साल एम. फ़िल. एवं पीएचडी सीट कट को बड़ा मुद्दा मानती हैं। बहुत बड़ी संख्या में सीटों की कटौती को वह बड़ा मसला मानती हैं। वे यह भी मानती हैं कि यह चुनाव बेहद कठिन दौर में हो रहा है जबकि विश्वविद्यालयों पर लगातार हमले हो रहे हैं। अपनी बातचीत में वह विभिन्न विषयों पर आलोचना और आत्म आलोचना जैसे शब्दों की बात करती हैं। उनके मुताबिक उनके पास राजनीति में रहने का और करीब से देखने का लंबा अनुभव भी है। वे पिछले दिनों जेएनयू में चले सारे छात्र आन्दोलन के अगले दस्ते में थीं और दिल्ली तथा दिल्ली के बाहर भी छात्र आंदोलनों में काफी सक्रिय रहीं, कई बार पुलिस की बेरहम लाठियों की मार उन्हें झेलनी पड़ी थी. अपराजिता कम्युनिष्ट माँ (एनऍफ़आईडवल्यू की महासचिव एनी राजा) और पिता (सीपीआई के राष्ट्रीय सचिव नेता और राज्यसभा सांसद डी राजा) की इकलौती संतान हैं. अपराजिता अपने चुनावी संबोधनों और सवालों में कश्मीर से लेकर जेंडर जस्टिस के सारे सवाल कैम्पस, के भीतर और बाहर दो से जुड़े सवाल उठा रही हैं. जेएनयू से गायब हो गया छात्र नजीब एबीवीपी को छोड़कर सभी छात्र संगठनों का मुद्दा है. अपराजिता अपने छात्र संगठन एआईएसएफ के भीतर भी विभिन्न मुद्दों पर बहसें तेज करने की बात कह रही हैं, यदि वे जीत कर आती हैं.


अपराजिता अपने कामरेड के साथ

 


2. शबाना अली-बिरसा अंबेडकर फुले स्टूडेंट असोशिएशन (बापसा) ने
अपना उम्मीदवार शबाना अली को बनाया है जो पश्चिम बंगाल से हैं। उनकी पढ़ाई लिखाई बनारस से पूरी हुई है। यह संगठन दूसरी बार चुनाव मैदान में है। पिछले साल बहुत कम मतों के अंतर से यह विजेता संगठन बनने से रह गया था। शबाना अली, लेफ्ट द्वारा जय भीम और लाल सलाम नारे को लगाने के ये बिलकुल पक्ष में नहीं दिखती। इनका मानना है कि हाशिये के लोगों को अब खुद से ही अपनी आवाज़ दर्ज़ करवानी होगी। इनके मुद्दे संघ और बीजेपी द्वारा किए जा रहे हमले, फिर चाहे वे गौ के नाम की जा रही हत्या हो या फिर दलितों पर किए जारे हमले निशाने पर है। जेएनयू के अंदर इनका मुख्य ध्यान यूजीसी गज़ेट, एम. फ़िल. एवं पीएचडी सीट कट,फ़ंड में की जा रही कटौती की खिलाफत में हैं। इसके अलावाजेएनयू छात्र नजीब अहमद की गुमशुदगी को भी यह एक बड़े मुद्दे के रूप में देखते हैं। टीचर और छात्रों के लिए आरक्षण को फिर से लागू करने की भी इनका लक्ष्य लक्ष्य है। बापासा ने जेएनयू में पिछले चुनाव के दौरान से ही अपनी जबरदस्त उपस्थिति दर्ज कराई है।


शबाना अली

3. गीता कुमारी- ऑल इंडिया स्टूडेंट असोशिएशन(आइसा),
स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) और डमोक्रेटिक स्टूडेंट फेडरेशन (डीएसएफ) जैसे छात्र संगठनों ने एक साथ मिलकर छात्रसंघ चुनाव लड़ने का निर्णय लिया है। इस गठबंधन की उम्मीदवार गीता कुमारी हैं। वह हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं और उनके पिता आर्मी में है। उनकी पढ़ाई इलाहाबाद से हुई है और उनके मुताबिक जेएनयू की अफोर्डेबल फीस और हॉस्टल की व्यवस्था ने उन्हें इस विश्वविद्यालय में आने के लिय प्रेरित किया। वह जेएनयू की तीन पार्टियों के गठबंधन की अध्यक्ष पद की उम्मीदवार हैं। उनके लिए इस चुनाव में अहम मुद्दे नीति के स्तर पर किए जा रहे बदलाव जैसे यूजीसी गज़ेट, हॉस्टल सुविधा, जीएस कैश, डेपरिवेशन पॉइंट्स आदि जैसे मुद्दे हैं। वह खुले तौर पर एबीवीपी को अपना प्रतिद्वंदी मान रही हैं और विश्वविद्यालय के वर्तमान वीसी द्वारा उठाए कदमों के सख्त खिलाफ हैं।
 
गीता कुमार

 



4. निधि त्रिपाठी- एबीवीपी ने अपना उम्मीदवार निधि त्रिपाठी को बनाया है। वह जेएनयू के संस्कृत विभाग की छात्रा हैं। उनका मानना है कि वह स्टूडेंट्स मुद्दों को चुनाव में उठाएंगी। इसके अलावा बीते समय में उनके संगठन द्वारा कैम्पस में की गई भूख हड़ताल और वीसी से अपनी मांगों को मनवाने जैसी बातों को अहम उपलब्धि मान रही हैं। राष्ट्रवाद निधि का प्रमुख एजेंडा है, लेकिन उनके सामने चुनौतियां कम नहीं हैं. यह छात्र संगठन कैम्पस में अति उग्र दक्षिणपंथ और बाहरी लोगों के दखल को बढाने का आरोप झेल रहा है.

 
निधि त्रिपाठी अपने साथियों के साथ

5.
वृष्णिका सिंह-कॉंग्रेस पार्टी की छात्र इकाई एनएसयूआई ने अध्यक्ष पद की उम्मीदवार वृष्णिका सिंह को बनाया है। ये भी सीट कट को एक बड़ा मुद्दा मान रही हैं और इसके अलावा जेएनयू के स्टूडेंट्स को दिये गए लेबल्स जैसे देशद्रोही या नक्सली आदि नामों के खिलाफ हैं। उनका मानना है कि विश्वविद्यालय की एक इमेज बनाई गई है जो खतरनाक है और इससे यहाँ के विद्यार्थियों को पास आउट होने के बाद नौकरी व अन्य जगहों पर दिक्कत का सामना करना पड़ा है। अपना प्रतिद्वंदी लेफ्ट और एबीवीपी दोनों को मान रही हैं।
 
वृष्णिका सिंह अपने साथियों के साथ 
जोड़, तोड़ और मरोड़ कर देखें तो सभी संगठनों के मुद्दों में बहुत बड़ा फेरबदल नहीं है। सीट कट और यूजीसी गज़ेट जैसे बड़े मुद्दों पर सभी के अपने अपने तर्क हैं। राइट विंग को लगभग सभी छात्र नेत्रियाँ अपना बड़ा प्रतिद्वंदी मान कर चल रही हैं। वहीं बापसा जैसा नया संगठन अपनी धमक कैम्पस में मजबूती से दर्ज़ करवा रहा है। इसलिए पहले से ही चुनाव के परिणाम का अंदाज़ा लगाना कठिन है। हालांकि अपराजिता का चुनाव मैदान में होना बापसा और जेएनयू के वाम गठबंधन दोनो के लिए चुनौती होगी. अपराजिता का वामपंथी होना और दलित मुद्दों को एक इंसाइडर की तरह देखना और उसपर लगातार सक्रिय  रहना दोनो संगठनों के पारम्परिक वोट के बीच एक  चुनौती होगा, वहीं एआईएसफ के कन्हैया कुमार की उपस्थिति भी मायने रखती है.म  कि चुनाव के बाद परिणामों का इंतज़ार किया जाये और उन दो पुरुष उम्मीदवारों को भी न अनदेखा किया जाये जो कैम्पस में निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं।


ज्योति प्रसाद नेहरू विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा पीठ  में शोधरत है.

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दलित छात्रा को मध्य प्रदेश नाट्य विद्यालय ने चयन के बाद भी नहीं दिया दाखिला

स्त्रीकाल डेस्क 

मध्य प्रदेश नाट्य विद्यालय, भोपाल अपने एक विवादास्पद फैसलों के कारण सुर्ख़ियों में है. इसने अपने यहाँ एक पाठ्यक्रम के लिए चयनित दलित छात्रा, पूनम दहिया को नामांकन न देकर उसकी सीट पर किसी लड़के को नामांकन दे दिया है. यह नाट्य विद्यालय मध्यप्रदेश सरकार के संस्कृति  मंत्रालय के अधीन आता है. दो दिन से छुट्टी के कारण उसके अधिकारियों से बात नहीं हो पायी है. स्त्रीकाल ने मध्य प्रदेश नाट्य विद्यालय के निदेशक संजय उपाध्याय से सम्पर्क किया तो उन्होंने  बताया कि चूकि वह ग्रैजुएशन का अपना सर्टिफिकेट समय जमा नहीं करा पायी इसलिए नामांकन एक लड़के को दे दिया गया. हालांकि उनके पास इस बात का समुचित जवाब नहीं था कि जब विश्वविद्यालय का रिजल्ट ही नहीं आया था तो वह सर्टिफिकेट कहाँ से जमा करायेगी. उसे एक्स्टेंशन दिया जा सकता था. संजय उपाध्याय  के तमाम दावों के बावजूद प्रथम दृष्टया न्याय दाखिला से वंचित की लडकी के पक्ष में है.

पूनम दहिया

पूनम दहिया ने अपने फेसबुक पोस्ट पर लिखा है: 

मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय भोपाल में इस साल मैं भी चयनित हुई थी, लेकिन शिक्षा से वंचित कर दी गई। मुझे कारण बताया गया कि “आप का रिजल्ट नही आया है इस लिए आप को एडमिशन नही मिलेगा ।”
बाद में मेरी ही जैसी स्थिति में एक दूसरे लड़के को एडमिशन दे दिया गया।
मुझे लगातार फोन में कहा गया की ‘इस साल तुम चुप रहो,तुम्हे अगले साल ले लिया जायेगा।
लेकिन मेरा जो ये साल खराब हुआ, उसका क्या? मेरी जगह कोई वेटिंग का पढ़ रहा है,और मैं चयनित हो कर भी अगले साल का इंतेजार करूँ?
एक ही आधार पर एक का चयन कर लिया गया और मेरा नही, ये कैसी रंगशाला है?
और जब मैंने पूछा कि ऐसा क्यों किया गया ये गलत है तो मुझे कहा गया कि ‘हमे सही गलत मत बताओ’
मेरी इस लड़ाई में कोई मेरा साथ नही है मैं अकेली हूँ। क्या आप मेरा साथ देंगे

चयन सूची

पीड़ित छात्रा के पक्ष में नाट्य आलोचक और ‘समकालीन रंगमंच’ के सम्पादक राजेश चन्द्र  ने अपने फेसबुक पेज पर लिखा: 

सीधी, मध्य प्रदेश की अत्यंत प्रतिभाशाली अभिनेत्री और रंगकर्मी Poonam Dahiya को अंतिम परीक्षा पास करने और दाख़िले का औपचारिक पत्र प्राप्त करने के बावज़ूद मध्य प्रदेश नाट्य विद्यालय ने दाख़िला नहीं लेने दिया, जबकि वह रिज़र्व कोटे से थीं। उसी स्थान पर एक सामान्य कोटे के रंगकर्मी का दाख़िला ले लिया गया। कहा जाता है कि यह दाख़िला भोपाल के एक अन्तर्राष्ट्रीय प्रसिद्धि के रंग-निर्देशक की इच्छा से लिया गया, जिनका विद्यालय के प्रशासन पर अप्रत्यक्ष रूप से लगभग वर्चस्व और एकाधिकार रहता आया है।
पूनम ने इस अन्याय के ख़िलाफ़ लड़ने का फ़ैसला लिया और न केवल फेसबुक पर अपनी आपबीती लिखी, बल्कि एमपी के संस्कृति सचिव को एक औपचारिक शिकायत पत्र दिया है, और उसकी प्रतियां सभी सम्बंधित अधिकारियों को भेजी हैं। उसने मामले की जांच करने के साथ-साथ यह भी मांग रखी है कि उसे इसी सत्र में दाख़िला दिया जाये, ताकि उसके जीवन का क़ीमती एक साल बर्बाद होने से बचे।
पूनम की इस सार्वजनिक अपील को समर्थन देते हुए कुछ दिनों पहले मैंने भी एक पोस्ट लिखी थी और उसमें नाट्य विद्यालय के निदेशक तथा वरिष्ठ प्रोफेसर को टैग भी किया। दुखद स्थिति यह है कि इतने दिनों बाद भी विद्यालय प्रशासन का कोई पक्ष सामने नहीं आया। इससे दो बातें सिद्ध होती हैं। पहली, विद्यालय प्रशासन ने यह स्वीकार कर लिया है कि उसने ठगी की है, और दूसरी, वह सत्ता और शक्ति के मद में इतना चूर है कि अपनी कोई जवाबदेही नहीं समझता। उसे लगता है कि रंगमंच की बिरादरी कायर, रीढ़विहीन, लालची, लिजलिजे चाटुकारों तथा सत्ता का गुणगान करने वालों से ही भरी हुई है और इस या ऐसे किसी मामले में पीड़ित या पीड़िता का साथ देने के लिये कोई भी रंगकर्मी आगे नहीं आयेगा। उसका सोचना काफी हद तक सही और तथ्यपरक है।

नामांकन के लिए आमन्त्रण पत्र

सीधी रंगमंच की दृष्टि से कुछ वर्षों में चर्चा में रहा है। वहां के कई रंगकर्मी अपनी पहचान बनाने में कामयाब हुए हैं। सीधी में रंगमंच की गतिविधियां भी नियमित रूप से होती हैं और भोपाल, जहां नाट्य विद्यालय स्थित है, देश के कुछ प्रमुख रंग केन्द्रों में से एक है, वहां अनगिनत ख्याति-प्राप्त रंगकर्मी रहते और रंगकर्म करते हैं।
इतनी लंबी भूमिका के बाद मैं मूल बात पर लौटता हूं कि क्या कारण है कि दो-एक लोगों को छोड़ कर सीधी, भोपाल और मध्य प्रदेश के रंगकर्मी पूनम के साथ हुए अन्याय पर ख़ामोश हैं? क्या सिर्फ़ इसलिये नहीं कि वे पूनम का साथ देकर ताक़तवर संस्थान और लोगों से अपने संबंध ख़राब नहीं करना चाहते हैंं? साथ देना तो दूर की बात, वे तो खुल कर पीड़िता का विरोध करने की भी हिम्मत नहीं जुटा पाते।
एक रंगकर्मी अन्याय को होता हुआ देख कर ख़ामोश रहता है तो वह रंगकर्मी कहलाने की न्यूनतम पात्रता भी पूरी नहीं करता। यही पर आकर लगने लगता है कि आज रंगकर्मी होने के मूल्य में भयावह गिरावट आ गयी है। रंगकर्मी सत्ता और व्यवस्था से मिल-मिला कर रहना चाहता है क्योंकि वह अपने पेट और टुच्ची सुविधाओं से आगे देखता ही नहीं। यह सब देख कर बहुत पीड़ा होती है। हमने रंगकर्म को क्या बना डाला है!

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परमानन्द रमन की कविताएँ

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परमानन्द रमन

कला शिक्षक,केंद्रीय विद्यालय टाटानगर ,जमशेदपुर. संपर्क : potter.raman@gmail.com मो.8404804440

गर्भ 
पुरुष
तुम स्त्री नहीं हो सकते
तुम हो सकते हो
एक महान ग्लेशियर
पिघलना तुम्हारी प्रवृति है
तुमने बहना नहीं सिखा
तुम नदी नहीं हो सकते

तुम हो सकते हो
एक विशाल मरुस्थल
फैलना तुम्हारी फितरत है
तुम उगना नहीं जानते
तुम खेत नहीं हो सकते

तुम हो सकते हो
एक जागृत जवालामुखी
उन्माद तुम्हारी संस्कृति है
तुम शीतल होना नही जानते
तुम शैवाल नहीं हो सकते

तुम हो सकते हो ब्रह्माण्ड का
सबसे चमकीला तारा
वैभव तुम्हारा विविरण है
तुम धारण करना नहीं जानते
तुम पृथ्वी नहीं हो सकते

पुरुष
तुम एक साथ
कई रूपाकार होकर
हो सकते हो स्वयं में
उदात्त

तुम हो सकते हो सभ्यता के
प्राचीनतम मंदिर के
गर्भगृह में स्थापित
देव प्रतिमा
अनश्वरता तुम्हारी सत्ता है
किन्तु तुम जन्म देना
नहीं जानते
तुम गर्भ नहीं हो सकते

पुरुष
तुम स्त्री हो ही नहीं सकते


मोसूल की लड़की


एक अस्त-व्यस्त सी लड़की
प्यार करना सीख गई है
और उससे एक अर्से पहले
सीख चुकी है
नाराज़ होना
मोबाईल को फेंककर
डिस्कस की तरह
खिड़कियों के ज़र्द चेहरो पर
परदा पहनाकर
धप्प से धंस जाती है बिस्तर मे
फिर तमतमाते हुए
फेसबुक की स्टेटस लाईन पर
लिखती है
वह प्रतिज्ञा जिसमें द्रौपदी
धोना चाहती है अपने केश
मानव-रक्त से
कुछ नाम और तस्वीरों के चेहरों को
हेयर क्लीप से गोद कर
जला देती है
अपने स्लैम-बुक के कुछ पन्नें
तस्वीरें, चाँकलेट रैपर्स
आई-लाईनर के टुकड़े
धागे और अधजले कार्डस

जैसे धमाकों के बाद
ईराक का कोई सुलगता शहर
वो झुंझलाहट में पोंछ देती है
कायनात के सारे रंग
नेलपेन्ट रिमूवर से
और सो जाती है
तकिए पर सिसकियाँ लिखते-लिखते
फिर उठती है
जब नारंगी फूलों का मौसम आता है
और फिर से सीख लेती है
प्यार करना
तुम अभी तक नाराज़ हो मुझसे
और वो शहर भी ईराक का
अभी तक सुलग रहा है

औरतें उम्र छुपाती है

औरतें उम्र छुपाती है
और फिर उसे ढ़ून्ढतीं रहती हैं
उम्र भर
अचार के मर्तबान
बताशे के डिब्बे
और सिन्दूर-दानी में
बस हड़बड़ाहट में
ढूढँती ही रहती है
दर-असल औरतों को उम्र छुपाना
आता ही नहीं
अगर आता तो बजाए उसे छुपाने के
ले जाकर फेंक आती उम्र
अंतरिक्ष में
मगर औरतें फेंकना भी नहीं जानतीं
उन्हे तो सिखाया जाता है सहेजना
वे उम्र को भी बस सहेजती रहतीं हैं
जबतक वो आ नहीं जाता
किसी उम्रदराज़ की नज़र में
और फिर शुरू हो जाते हैं
उम्र के ताने
तब औरतें उम्र की आड़ मे
छुपाने लग जातीं हैं देह
और फिर से नाकामयाब रहती है
नहीं छुपा पाती है

खुद को देह होने से
ना आँखों के डार्क-सर्कल्स
झाईयाँ,एड़ीयों की दरार
ना प्रेम, सर्मपण और प्रतिकार
चूल्हे के सामने जितनी सहज होती है
इन्सानों में उतनी ही सजग
अपने हैण्डबैग में
दुनियाभर की बेहतरी का
साजो-सामान छुपाए
औरतें
उम्र तो कभी छुपाती ही नहीं
बस जल्दीबाज़ी में
कहीं रख देतीं है
और भूल जातीं हैं

तीसरी स्त्री 

पहली स्त्री
नतमस्तक कर
निज को
पुरूष चरणों में
कहती है
मै दासी हूं

दूसरी स्त्री
पांव रखकर
पुरुष की छाती पर
अठ्ठाहस करती
कहती है
मै शक्ति हूं

तीसरी स्त्री
पग उठाये
लाँघ रही है देहरी
घर-आँगन की
स्वयं से
कह रही है
मैं हूं स्वामिनी
स्वयं की

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