सुधार नहीं पूर्ण बदलाव चाहेंगी महिलायें

नूर जहीर
'डिनायड बाय अल्लाह' और 'अपना खुदा एक औरत' जैसी चर्चित कृतियों की रचनाकार
संपर्क : noorzaheer4@gmail.com.

कॉमन सिविल कोड के संघर्ष में तीन पक्ष हैं, एक प्रगतिशील मुसलमान-हिन्दू महिलाओं-पुरुषों का और उनके साथी अन्य प्रगतिशीलों का दूसरा दक्षिणपंथी हिन्दू जमातों का और तीसरा दक्षिणपंथी, परंपरावादी मुसलमानों का. इस त्रिकोण में मुस्लिम स्त्रियों की सामाजिक-कानूनी  स्थिति और उनका संघर्ष शोर –शराबे में दब जाता है – पढ़ें नूर ज़हीर का दृष्टिकोण, एक इनसाडर प्रगतिशील नजरिया. यह आलेख मासिक पत्रिका सबलोग के स्त्रीकाल कालम में नवंबर में प्रकाशित हुआ है. 
संपादक

एक मुसलमान  सज्जन से मैंने पूछा "क्या आप समझते हैं कि कोई भी महिला पति की दूसरी शादी को पसंद करेगी? या एकतरफा दिए गए एक झोक में तीन बार तलाक़ को ख़ुशी से क़ुबूल करेगी?' वे  बोले "अगर वह एक अच्छी मुसलमान है तो ज़रूर करेगी।"  यही आकर इस गंभीर मुद्दे पर  बहस रुक जाती है।  मौलवियों  का कहना है कि उनके अनुसार चलना ही 'अच्छे मुसलमान’ होने की कसौटी है भले ही उनका कहा क़ुरान के खिलाफ हो।  यह तो मौलवी भी मानते हैं कि कुरआन एक बार में तीन तलाक़ को ग़लत बतलाता है। पहली बार तलाक़ कहने के बाद एक माह दस दिन, दूसरी बार के बाद भी, और तीसरी बार के बाद 3 माह दस दिन की इद्दत के बाद ही तलाक़ माना जाना चाहिए।  लेकिन आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड में बैठे मौलाना कहते हैं कि आज अगर इसे लागू किया गया और पुरुषों को दो महीने  बीस  दिन इंतज़ार करना पड़ा तो वे अपनी पत्नियों को ज़हर दे देंगे, खून कर देंगे.

यानी इतनी बेक़रारी है सुन्नी मुस्लिम पुरुषों में कि उनसे  80 दिन इंतज़ार नहीं होगा।  या आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड में बैठे मौलाना आज सड़क पे उतरी हुई न्याय की मांग करती मुसलमान  महिलाओं को धमकी दे रहे हैं, 'इस मांग पर आंदोलन करना बंद करो वरना मार दी जाओगी!'  अगर ऐसा है तो एक सर्वे करवाने की ज़रूरत है मुसलमानों के  शिया फ़िर्क़े में  जिनमे ट्रिपल तलाक़ एक साथ नहीं माना जाता, कितनो ने अपनी पत्नियों का खून कर दिया और  हिन्दू जिन्हें 'तत्काल तलाक़' में भी  3 महीने इंतज़ार करना पड़ता है, क्या पत्नियों का खून कर देते है? या सुन्नी मुस्लिम पुरुष किसी अलग तरह के मर्द हैं ?

"चकरघिन्नी" : तीन तलाक़ का दु:स्वप्न

लेकिन अपने आप में तीन तलाक़ पर रोक लगे यह मांग  अधूरी है। क्योंकि तीन तलाक़ एक वक़्त में मुस्लिम महिला नहीं दे सकती। यदि मुस्लिम महिला रिश्ता तोडना चाहे तो उसे कारण बताना पड़ता है, उस कारण पर मौलवी विचार करते हैं कि कारण जायज़ है या नहीं, महिला को अपना 'महर' यदि वह शादी के वक़्त न दिया हो तो छोड़ना पड़ता है, अगर दे दिया गया हो तो लौटाना पड़ता है और अक्सर कुछ और रकम देकर अपने लिए 'तलाक़' खरीदना पड़ता है।  इतना करने के बाद भी 'तलाक़, तलाक़ ,तलाक़' कहता पुरुष ही है, महिला नहीं। इसमें अक्सर कई साल लग जाते हैं।  पुरुष को क्योंकि इस्लाम 4 शादियों की एक वक़्त में इजाज़त देता है दूसरी शादी करके आराम से रहता है, और तलाक़ चाहने वाली महिला अकेली विधिशास्त्र के महकमों/संस्थानों के चक्कर काटती रह जाती है। यह पता लगाने की ज़रूरत है कि इस लंबी दुर्दशा से जूझते हुए  में कितनी मुस्लिम  महिलाओं ने अपने पतियों की हत्या करने की कोशिश की है।


बच्चों की लिए अनुरक्षण से भी पुरुष अक्सर छूट जाते हैं और पत्नी के लिए तो अनुरक्षण हो ऐसा मानते ही नहीं मुसलमान मौलवी। बस महर देना ही ज़रूरी है और अमूमन  यह भी नहीं पूरी मिलती क्योंकि अक्सर जो मौलवी तलाकनामा बनाते हैं वह कुछ पैसों की लालच में 'महर अदा  की गई' भी जोड़ देते हैं।  ऐसे ही एक केस में महिला ने दार उल उलूम तक की गुहार लगाई जहाँ से उसे कहा गया कि "अल्लाह ऐसे बेईमान मौलवी और पति को ज़रूर सजा देगा, उन्हें इसका बदला दूसरी दुनिया में चुकाना होगा।" लेकिन जीना  तो औरत को इस दुनिया में है और आज मुस्लिम महिला अल्लाह से नहीं उच्चतम न्यायालय से न्याय मांग रही है।

मर्दाना हकों की हिफ़ाजत करता मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड

आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड यह भी कहता है कि  लंबी चलने वाली न्यायिक गतिविधि महिला के पक्ष में नहीं क्योंकि पुरुष उसे बदनाम करके उसके पुनः विवाह के रास्ते बंद कर सकता है। तलाक़शुदा होना ही अपने आप में एक शाप  की तरह माना  जाता है इस देश में; मौलवी तो बुर्का पहने हुए आंदोलनकारी महिलाओं को बदतरीन गालियाँ दे रहे हैं; इससे ज़्यादा क्या और बदनाम होंगी।  दूसरे यह सोचना महिलाओं का काम है कि  वे इस बदनामी से कैसे जूझे , मौलवीगण महिलाओं के चरित्र पर लगे दाग़ की चिंता न करें।

वे कहते हैं कि बहुविवाह और तीन तलाक़ एक बार में, मुसलमानों का  संस्कृतिक और सामाजिक मामला है और उच्चत्तम न्यायालय को इससे दूर रहना चाहिए। किसी भी समाज में होने वाले अन्याय में उच्चतम न्यायालय  नहीं तो और कौन बोलेगा? वे जो अभी तक अन्याय करते रहे हैं?  ज़्यादातर पुरुष दूसरी शादी करके पहली वाली को तलाक़ नहीं देते क्योंकि वे महर नहीं देना चाहते। इस तरह से वे दोनों शादियों का मज़ा ले सकते हैं , पहली वाली घर संभाले और दूसरी पति संभाले। वे यह भी कहते हैं कि बहुविवाह इसलिए महिला के फायदे में है क्योंकि इससे बहुत सारी  महिलाओं की शादी हो पाती है वरना वे कुवारीं रह जाएँगी।  शायद यह इतनी बुरी बात भी न हो क्योंकि बुरे रिश्ते से रिश्ते का न होना बेहतर है। और लड़की पढ़ी लिखी, आत्मनिर्भर हो तो शायद वह अपनी मन मर्ज़ी का साथी मिलने तक अकेली जीवन व्यतीत करना पसंद करे?


इस्लाम में शादी एक कॉन्ट्रैक्ट है यह बात सही है लेकिन मौलवी कहते हैं इस कॉन्ट्रैक्ट में दोनों पार्टियाँ बराबर नहीं हैं।  यह सरासर संविधान के जो हर नागरिक को बराबर मानता है,  विरुद्ध बात है।  यहाँ पर यह सवाल पूछने की भी ज़रूरत है कि  आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड  की वैद्यता क्या है ? क्यों  ज़रूरी है उच्चतम न्यालय के लिए इस बोर्ड की राय लेना।  यह मुद्दा महिलाओं का है, उन्हें ही इसे भोगना पड़ता है, वही इसके खिलाफ आवाज़ उठा रही हैं, पीआईएल दाखिल कर रही हैं और  सड़क पर उतरी हैं। फिर भी यह कैसी पैतृक मानसिकता है जिसके तहत उस संस्था से राय मांगी जा रही है जिस पर उलेमा हावी हैं जो न कोई बदलाव चाहते हैं न कोई बदलाव लाने की सलाहियत रखते हैं। मज़े की बात यह है कि कुछ महिलाये भी जुट जाती हैं पुरुषों के इस एक तरफ़ा तलाक़ देने की तरफदारी करने।  यह वे हैं जो बातें तो बड़ी बड़ी करती हैं लेकिन ज़मीनी हकीकत से नावाकिफ हैं।  या हो सकता है की उनके सिरों पर पतियों  ने 'तीन तलाक़' की तलवार लटका रखी हो। जी हाँ अक्सर महिलाओं से बात करके यह मालूम हुआ कि उनके पतियों ने उन्हें धमकाया "आंदोलन किया, जलूस में गईं  तो तुम्हे तलाक़ दे देंगे। "

मेरा शबाब भी लौटा दो मेरे मेहर के साथ

सिर्फ इतना ही नहीं है कि  तलाक़ एकतरफा है. मुसलमान महिला इसको मानने के लिए बाध्य है, वह न इसे नकार सकती है और न ही इसे किसी कोर्ट में चुनौती दे सकती है। 22 इस्लामी देशों ने तीन तलाक़ को रद्द कर दिया है लेकिन भारत एक जनतांत्रिक देश है , जिसके  संविधान की   प्रस्तावना   में ही हर नागरिक को बराबर माना गया है , ये लागू नहीं। खैर जो  मामला अभी गरमाया है कुछ देर में उसमें उबाल भी आएगा ये प्राकृतिक नियम है। उस उबाल के लिए भी तैयारी रहनी चाहिए मुस्लिम समाज की. रिफॉर्म्स से कुछ हासिल नहीं होता क्योंकि उसे बग़ैर आम बहस के रद्द किया जा सकता है।  कानून के साथ ऐसा नहीं है और इसीलिए मांग कानून में बदलाव की होनी चाहिए।  और इसके लिए ज़रूरी है कि  यूनिफॉर्म सिविल कोड पर चर्चा शुरू हो।  अमूमन यह मान लिया जाता है कि  यूनिफॉर्म सिविल कोड, मुसलमानो से उनके हक़ छीन लेगा और हिंदुओं को कुछ भी गवाना नहीं होगा. . आज जिस तरह से यूनिफार्म सिविल कोड को मुसलमानो को धमकाते हुए डंडे की तरह नचाया जा रहा है,, उससे इस बात पर विशवास भी होता है। लेकिन इसका जवाब इस चुनौती से भाग जाना तो नहीं है।  एक ड्राफ्ट क्यों नहीं लाती उदार वादी संस्थाए और पार्टियां,  जो सभी पर्सनल लॉ पर विचार करके सबमे बदलाव के सुझाव रखे और सबसे प्रगतिशील सूत्रों को चाहे वे  किसी भी धर्म के हों, इस यूनिफॉर्म सिविल कोड की ड्राफ्ट में शामिल करे।  कमसे कम एक लिखित सूचि तो सामने आएगी, जिसकी बुनियाद पर आगे बहस चलाई जा सकेगी।

जो शरीयत मुसलमानो के लिए अटल मानी जा रही है वह तो कुरआन और हदीस को मिलकर बनाया गया एक व्याख्या है ; ऐसी किसी और व्याख्या पर पाबन्दी भला कैसे लगाई जा सकती है ?आख़िरी  बात ये है कि अगर ये संस्कृति और सभ्यता का हिस्सा है भी तो क्या बस इसीलिए इसे बदला नहीं जा सकता? क्या संस्कृति और सभ्यता अटल और जड़ होती है कि  उसे हिलाया नहीं जा सकता? इस्लाम की ही बात ली जाये तो इस धर्म के माध्यम से ही बहुत सरे बदलाव हुए, जिनमे प्रमुख है 'तलाक़' जो कबाइली सभ्यता में मौजूद तो था लेकिन जिसमे कोई विधिवद तरीका नहीं था।  तलाक़ को बाक़ायदा दस्तावेज़ी शक्ल इस्लाम ने दी उस समय की संस्कृति के खिलाफ जाकर।

मैं भारतीय मुसलमान स्त्री हूं : तलाक से आगे भी जहां है मेरी


आज ज़रूरत है कि धर्म और क़ानून को अलग-अलग किया जाये। आखिर डर किस बात का है मुसलमानो को और खास करके महिलाओं को? इस्लाम के पांच स्तंभों को यानि : शहादा [ अल्लाह और उनके आखरी पैग़म्बर पर विशवास] , सलात [नमाज़ ] , ज़कात[दान], सावेम [रोज़ा ] हज [तीर्थ] ये बदलाव कहीं भी चुनौती नहीं देते। जो कुछ छोटे-छोटे बदलाव की मांग मुस्लिम महिलाये कर रही है उनपर अगर उलेमा और सर्कार दोनों ग़ौर नहीं करते हैं तो बहुत संभव है कुछ दिन बाद मुस्लिम महिलाये एक गणतांत्रिक देश में अपने हक़ समझ कर पूरी बराबरी की मांग लेकर सड़क पर उत्तर आएं  और बराबरी पाकर ही छोड़े. उस वक़्त न ये मौलवी उन्हें रोक पाएंगे न ही वो महिलाये जो आज इन न्यायिक मांग करती हुई महिलाओं के खिलाफ ज़हर उगल रही हैं.

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