स्त्री कविता: स्त्री पक्ष और उसके पार (क़िस्त तीन)

रेखा सेठी
  हिंदी विभाग, इंद्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय, दिल्ली वि वि, में एसोसिएट प्रोफेसर. विज्ञापन डॉट कॉम सहित आधा दर्जन से अधिक आलोचनात्मक और वैचारिक पुस्तकें प्रकाशित  
संपर्क:reksethi@gmail.com

स्त्री-कविता: स्त्री पक्ष और उसके पार  
स्त्री कविता: स्त्री पक्ष और उसके पार (क़िस्त दो)

माँ, कविता और स्त्री....
समाज के जेंडर ढाँचे का पहला अहसास मुझे माँ के बचपन के किस्से-कहानियों में हुआ था। समकालीन स्त्री-कविता की तह में उतरते हुए मैं अपनी माँ के परिवेश और उनके पारिवारिक वातावरण में लौट गयी। माँ ने ज़िंदगी की कटु सच्चाईयों से रूबरू होते हुए भी ज़्यादा सवाल नहीं किये। उन्हें अपनी छोटी-सी गृहस्थी में ही खुश रहना था लेकिन उनकी कहानियाँ जब मुझ तक पहुँचती तो मेरे भीतर बड़ा बवंडर मचातीं । मैं अपनी माँ की बातों को उधेड़कर, उनमें छिपे अर्थ-आशयों को कपास की तरह धुनतीऔर उनकी मार्फ़त अपने होने के सिरे सिरजती। माँ एक रईस परिवार के जन्मी थीं । संयुक्त परिवार में, भाई-बहनों की हँसी-ठिठोलियों से चहकते हुए जिस बंद गली के आखिरी मकान में वे रहती थीं,वहीं से मुझे जीवन के कई पाठ और अंतर-पाठ सीखने को मिले। माँ अपनी ज़िंदगी के जो किस्से सुनाया करतीं, वे उस समय किसी रहस्यमयी कहानी से कम नहीं थे। बचपन में तो माँ के किस्से सुनाने के लहज़े से उत्सुकता ही जागती थी लेकिन बहुत बाद  में जब सोचने-समझने की उम्र हुई तब जाकर ही माँ के उन किस्सों की रहस्यमयता की कलई धीरे-धीरे खुलने लगी। समाज में स्त्री का परंपरागत स्थान और स्त्री जीवन की कई उधड़ी हुई सच्चाईयों को मैं समय के साथ ही समझ पाई।

खानदान में बेटियों की जगह निश्चित थी। उनकी पढ़ाई को लेकर कोई चिंता न थी। हाँ, भाइयों को पढ़ाने के लिये ज़रूर एक मास्टर जी घर पर आया करते थे। वे जब भाइयों को पढ़ाते, माँ खेलने के इंतज़ार में, खम्भे के पीछे से झाँकती-उचकती बहुत कुछ सीखने लगी। 1935-40 के आस-पास स्त्री-शिक्षा को लेकर कुछ जागृति बढ़ी, माँ में भी, सीखने-समझने का  हौंसला बढ़ता गया। वह धीरे-धीरे अपने घर-परिवार से बिलकुल अलग, एक नयी राह पर चलने लगी। यह ज़रूर था कि उनके आस-पास से पितृसत्ता का कड़ा पहरा तो नहीं हटा, मगर फिर भी कुछ संयोग और कुछ सहयोग से माँ ने मैट्रिक, प्रभाकर, फिर बी.ए. और बी.टी. की पढ़ाई पूरी कर ली। माँ के पक्ष में यह एक बड़ी जीत रही।

माँ का जीवन, स्त्री की शक्ति और सीमा का गज़ब पाठ था। मेरे आस-पास जितनी भी स्त्रियाँ थी उनमें से मेरी माँ सबसे अधिक शिक्षित थीं । यह बिलकुल सच है कि उनकी शिक्षा ने ही उनके प्रति, घर और सामाजिक इज्ज़त में इजाफ़ा किया। अध्यापिका का पद, उन्हें प्रतिष्ठा देता लेकिन साथ ही उनका नौकरी करना आश्चर्यजनक ढंग से आस-पड़ोस, नाते-रिश्तेदारों में चर्चा का विषय होता । नौकरी के साथ-साथ घर की पूरी ज़िम्मेदारी उन्होंने बिना किसी शिकायत के संभाल रखी थी। पति की अनुगामिनी बन, उन्होंने अपनी स्वतंत्र इच्छा-अनिच्छा को कभी प्राथमिकता नहीं दी। माँ ने अपनी गृहस्थी, बच्चों की पढ़ाई-लिखाई, सब मिला-जुला कर एक आदर्श परिवार का ढाँचा तैयार किया। उनके इस आदर्श परिवार में किसी प्रकार की कोई टकराहट न थी क्योंकि माँ के भीतर की स्त्री ने स्वयं को नेपथ्य में रखना, सहज ही स्वीकार किया था और अपने सामने वाले पुरुष की सत्ता को किसी प्रकार की कोई चुनौती नहीं दी थी। पलटकर उनके जीवन को देखने पर मेरे भीतर एकबारगी यह विचार भी आया कि क्या शिक्षा, प्रतिगामी बेड़ियों को पिघलाने में अक्षम रही है और फिर इसके साथ ही स्त्री-जीवन से जुड़े कई दूसरे प्रश्न भी चले आते हैं।माँ के आँचल की गाँठ में बंधी इन कहानियों की तासीर स्त्री रचनाकारों की कविताओं से मेल खाती थी। इसके अलावा जैसे-जैसे मैं इन कविताओं के करीब आती गई वैसे-वैसे मेरे अपने जीवन की यात्रा भी इन कविताओं के नज़दीक जाती हुई दिखाई देने लगी। अब मुझे इन कविताओं के शब्दों और पंक्तियों के पार की सच्चाइयाँ  बार-बार असहज करने लगीं। कविता और ज़िन्दगी का यह रिश्ता स्त्री-कविता की पड़ताल करने को बाध्य कर रहा था।

जागरूक होने की उम्र में आने पर अपनी पारिवारिक परवरिश ने जेंडर के सवालों को समझने की अलग दृष्टि दी। अपने परिवार में हम दो बहनें ही हैं तो बहन-भाई के अंतर की बात रही नहीं। आस-पास के परिवेश पर नज़र डालते हुए भी अक्सर यह अहसास होता, कि हम कुछ ख़ास हैं। लिंग आधारित अपमान या हिंसा का हमने सीधा सामना कभी नहीं किया। इसके अतिरिक्त शिक्षा, स्वास्थ्य, नौकरी, समान-वेतन, सामाजिक-राजनीतिक क्षेत्रों में अपनी भागीदारी को लेकर हमें कभी दूसरे दर्जे पर होने का अनुभव नहीं हुआ। इस पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण रोज़मर्रा के कई छोटे-बड़े संघर्ष, हमारी जीवन-परिधि से बाहर रहे। यही कारण था कि हमारी जद्दोजहद, स्त्री-अस्मिता पर केन्द्रित न होकर व्यक्ति-अस्मिता के सवालों से जूझ रही थी।


स्त्री का जीवन, विविधवर्णी है, जिसमें चाहे कितने ही धूसर रंग क्यों न हों, स्त्री का उन सभी रंगों से लगाव है, वह सभी को अपनी संवेदना से सींचती है और अपनी अभिव्यक्ति में इस्तेमाल करती है। यही कारण है कि जो संवेदनाएँ मुझे अपने जीवन में बेचैन करती रहीं वही स्त्री रचनाकारों की कविताओं में भी प्रतिध्वनित होती थीं | स्त्री-कविता, अपने सुख-दुःख के जो प्रतिमान रचती हुई जिस काव्यानुभव को प्रतिबिंबित कर रही थी उसमें स्त्री-अनुभव की विशिष्टता एवं स्त्री-दृष्टिकी प्रमुख भूमिका है। स्त्री जीवन को, स्त्री-दृष्टि से देखने की कोशिश उनकी कविताओं को अतिरिक्त आयाम देती है। ऐसा करना महत्वपूर्ण इसलिये भी है क्योंकि स्त्री ने खुद को स्त्री-दृष्टि से कभी नहीं देखा। वह खुद को पुरुषों द्वारा गढ़ी गयी परिपाटी के भीतर ही देखती रही।

स्त्री-कविता पर अपने अध्ययन के लिये मैंने जिन सात कवयित्रियों का चयन किया, वे समकालीन होते हुये भी स्त्री-अस्मिता के अलग-अलग मायनों के साथ कविता रच रही हैं। इन कवयित्रियों में एक ओर गगन गिल हैं, जिन्होंने अपनी साहित्यिक पहचान, कभी भी अपने स्त्रीत्व के साथ नहीं जोड़ी। जिस तरह रवीन्द्रनाथ ठाकुर की प्रशंसा में वे उन्हें ‘ए ग्रेट ह्युमूनाइज्ड माइंड’ कहती हैं, उनके अपने साहित्य की धुरी भी उसी मानवीय विवेक पर टिकी हुई है, जिसे स्त्री-पुरुष के लिंगाधारित चौखटों में बाँधना मुश्किल है। गगन के ही दूसरे छोर पर कात्यायनी हैं, जिनकी चिंता के केंद्र में व्यक्ति और व्यवस्था का द्वन्द्वपूर्ण संबंध देखने को मिलता है। उनकी कविताएँ स्त्री जीवन से आगे बढ़कर गहरे अर्थों में राजनीतिक कविताएँ हैं जो भारतीय लोकतंत्र में नागरिक अधिकारों की चेतना को प्राथमिक मानती हैं। स्वार्थ लिप्सा से चरमराती व्यवस्था में छले गए जन साधारण की पक्षधरता में आवाज़ उठाती हैं। इनके बाद का दौर, अवश्य ही अनामिका और सविता सिंह के नाम रहा जिनकी कविताओं ने, कविता की दुनिया में स्त्री-स्वर को विशिष्ट पहचान दी लेकिन यह भी सच है कि इन दोनों कवयित्रियों द्वारा रचित कविताओं को भी आलोचना के सीमित साँचे का शिकार होना पड़ा, जबकि इनकी कविताओं में पितृसत्ता के विरोध के साथ-साथ मानव मुक्ति का बड़ा कैनवास उभरता है। अनामिका के यहाँ लोक-संस्कृति का ठाट है जिसमें परंपरा, श्रुति-स्मृति जीवंत होकर वर्तमान और अतीत को एक धागे में बाँधते हैं। सविता सिंह की स्त्री अपनी सीमाओं को लाँघती हुई प्रकृति से एकमेक हो जाती है जिसकी साझेदारी दुनिया के समस्त दमित-वंचित समाजों से है। कविता-भाषा के स्तर भी इन कवित्रियों की रचनाएँ नए इलाके की ओर गतिशील होती हैं।

इनके अलावा नीलेश रघुवंशी, सुशीला टाकभौरे और निर्मला पुतुल इस परियोजना में शामिल हैं जो अलग-अलग पृष्ठभूमि से आती हैं। उनकी कविताओं में स्त्री-अस्मिता, एकांगी न होकर, सामाजिक भेद-भाव की अनेक परतों से जुड़ी हुई है, जिससे उनकी कविताओं में स्त्रीवाद के मायने बदल जाते हैं। स्त्री जीवन के विडंबनात्मकचित्र उनकी कविताओं में भी भरपूर मात्रा में देखने को मिलते हैं किन्तु उनकी प्रवृति, वर्ग और जाति के पदानुक्रम से निर्मित, सामाजिक वर्ग-विभेद को केंद्र में रखने की रही है। नीलेश की निम्न-मध्यमवर्गीय चेतना ने उन्हें समाज को देखने-परखने का अलग नज़रिया दिया। उनकी कविता उस शिक्षित युवा मन की सकारात्मक अंतर्ध्वनि है जो अपने साहस से एक नये समाज की संकल्पना करता है। सुशीला टाकभौरे, अपनी पहचान मात्र स्त्री के रूप में न कर, दलित अस्मिता से जोड़कर करती हैं। उनके अनुसार, ‘एक दलित स्त्री अपने जीवन में सबसे अधिक पीड़ा झेलती है’। आदिवासी अस्मिता की मुखर अभिव्यक्ति, निर्मला पुतुल की कविताओं में देखने को मिलती है। उनकी कविताएँ, आदिवासी स्त्री के संघर्षों की दर्दनाक कथाएँ रचती हैं लेकिन उनसे यह पूछने पर कि स्त्री और आदिवासी होने की पीड़ा में किसकी पीड़ा बड़ी है, उन्होंने इन दोनों वर्गों के बीच जिस साम्य-सूत्र की बात रखी उसे सुनकर मैं एकबारगी चौंकी। उन्होंने कहा कि अंतर केवल इतना है कि ‘उच्च वर्ग की स्त्री, रसोई या बेडरूम में प्रताड़ित होती है जबकि आदिवासी स्त्री, फुटपाथ पर मार खाती है।’ उनका यह कथन, स्त्री-जीवन की विडंबना की पुष्टि करता है कि अपमान की पीड़ा का अंत:सूत्र, संभवतः सभी स्त्रियों को एकसाथ जोड़ता है।


इस तरह, इन सभी कवयित्रियों के अपने विशिष्ट अनुभव, उनके कविता-संसार में स्पष्टता से झाँक रहे थे।उनकी कविता की परछाईयाँ, एक दूसरे को छू भी रही थीं और स्त्री-अस्मिता के मुद्दे पर अलग-अलग हैं। संभवत: मेरी ही तरह, इन रचनाकारों की पारिवारिक पृष्ठभूमि और शिक्षा की विभिन्नताओं ने भी उनकी सोच को अलग-अलग साँचे में ढाला जिससे अपने अस्तित्व पर जिरह करने की ताकत को अलग-अलग धार मिली और अपनी सामाजिक स्थितियों की पड़ताल करने का उनका नज़रिया भी एक-दूसरे से अलग रहा। अपने इसी ओब्ज़रवेशन को अधिक विस्तार देने के लिये, मैंने इन सातों कवयित्रियों से बातचीत करके यह समझने का प्रयास किया कि, उनके लिये स्त्री-कविता का क्या अर्थ-आशय है।सबकी काव्य-प्रेरणा से लेकर, उनके काव्य-जगत और उनके सामाजिक-राजनैतिक सरोकारों को लेकर महत्वपूर्ण सवाल समाहित हैं, जिससे यह पहचान बने कि उनकी रची इस समानान्तर दुनिया का क्षितिज कितना विस्तृत या सीमित है।

गहरी आत्मीयता के साथ, मैंने इन रचनाकारों के मन की भीतरी तह में उतरने की और उनके रचना जगत के लिये कच्चे माल की उपलब्धि जैसे अनेकों पहलुओं तक पहुँचने की हर संभव कोशिश की है। अधिकांश प्रश्नों का दायरा, स्त्री-पक्ष के साथ-साथ, कविता की रचना-प्रक्रिया को सलीके से समझने तक फैला हुआ है। इसके अलावा सभी कवयित्रियों के रचना-विधान के सृजनात्मक उपकरणों पर भी विस्तार से चर्चा की गयी है। स्त्री-कविता के पृथक अभिधान से लेकर उसकी सामाजिक भूमिका, स्त्री-विमर्श की सीमा-सम्भावना व साहित्यिक आलोचना का स्त्री-कविता के प्रति रवैय्या आदि अनेक प्रश्नों पर सातों कवयित्रियों के उत्तर एक-दूसरे से भिन्न धरातल पर अवस्थित थे जिनसे इस कविता की गतिशीलता व विविध-धर्मिता का परिचय मिलता है।यह एक अनजाने क्षितिज की तलाश थी जिसे पहचानने में इन रचनाकारों की सूक्ष्म संवेदनशील दृष्टि ने मेरी सहायता की।अगली किश्तों में इस विषय पर कुछ महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ प्रस्तुत होंगी ।

स्त्री-कविता और सामाजिक परिवर्तन

आज भी हम ऐसे समाज में जी
रहे हैं जिसकी आधी आबादी बहुत दारुण स्थिति में जीवन-यापन कर रही है, जिन्हें अपने स्त्रीत्व की पहचान नहीं है। वह नहीं जानती कि एक स्त्री के रूप में उसकी शक्ति क्या है और उसे किस तरह अधिक धारदार बनाया जा सकता है, उसका जीवन रोज़ी-रोटी की जिस भाग-दौड़ में उलझा है, बौद्धिक विमर्श में उसके लिए कोई जगह नहीं है। स्त्रियों पर होने वाले अत्याचारों के विरोध की अपेक्षा झेलने की विवशता अधिक दिखाई पड़ती है। जब तक स्त्री-मुक्ति का अभियान मानव मुक्ति के अभियान में रूपांतरित नहीं होता, समाज में वह संतुलन नहीं बनता जिसमें स्त्री और पुरुष दोनों को एक स्वतंत्र राष्ट्र के नागरिक के रूप में बराबर का दर्ज़ा मिले, तब तक समतापूर्ण समाज की संकल्पना अधूरी रहेगी। कविता और साहित्य, इस संभावना को कैसे जगा सकेंगे, यह एक महत्वपूर्ण विषय है।


स्त्री-कविता, मुक्ति की जिस चेतना को अपनाती है, वह मानव-मुक्ति की परिकल्पना है जिसमें संभवतः स्त्रियों के बीच वर्ग-भेद भी मिट जायेंगे और स्त्री-पुरुष के बीच सत्ता और ताकत के संबंधों की भी पुनर्व्याख्या होगी। सविता सिंह, ऐसे समाज की कल्पना करते हुये कहती हैं कि “ऐसी समानान्तर सभ्यता का विकास संभव होगा, जिसमें सामूहिक सहवास संभव होगा। एक विनम्र, विश्व-समुदाय बनाने में हमारी कविताओं का भी योगदान होगा।” स्त्री-कविता की यह आधारभूमि, अपने सुख-दुःख में आत्मलिप्त न होकर, एक नई सभ्यता का विकास करने की आकांक्षा रखती है, जो अधिक विनम्र, मानवीय व समतापूर्ण होगी।

“आधी आबादी की सक्रिय भागीदारी व समर्थन के बिना कोई भी सामाजिक बदलाव संभव नहीं...जिस कविता में यथार्थ की इंदराज़ी मुक्तिकामी स्त्री के नज़रिए से की जाती है, उस प्रगतिशील स्त्री-कविता की सामाजिक परिवर्तन में अहं भूमिका है।”कात्यायनी के इन शब्दों में कविता और सामाजिक परिवर्तन का संबंध, सूत्र बनकर झलकता है। यह निश्चित है कि साहित्य अपनी गति से धीरे-धीरे-धीरे ही सही, हमारी चेतना के निर्माण या उसके परिवर्तन में विशेष भूमिका निभाता है। उसकी गति इतनी धीमी, इतनी महीन हो सकती है कि ऊपर से देखने पर भले ही कोई हलचल दिखाई न दे लेकिन वह सदा सक्रिय रहती है। स्त्री-कविता, स्त्री के हक में, हमारी चेतना को निरंतर आंदोलित करती रहती है। उसकी सर्वोदयी करुणामयी दृष्टि सबके लिये न्याय की माँग करती है। उसमें मानवता का सन्देश निहित है।

अपनी कविता के लिये स्त्री-रचनाकार जो भी शब्द चुनती हैं, वे शब्द या पक्तियाँ, बीच के अंतरालों को पाटने की कोशिश करते हैं, क्योंकि उन शब्दों और पंक्तियों में, स्त्री की परिवर्तनकामी चेतना व भूमिका की खास जगह होती है।समकालीन कविता की दुनिया में, स्त्री हों या पुरुष, सभी कवियों के सरोकार समान रहे हैं। अपनी विशेष अभिरुचियों के बावजूद वे साझे यथार्थ के साक्षी हैं। अनामिका कहती हैं, “स्त्री कवि हों या अन्य कवि, सब अपने-अपने वर्ण, नस्ल, लिंग के लेंस से, साझा यथार्थ देखते-परखते हैं। यह अवश्य है कि आज जितनी महिलाएँ, एक-साथ साहित्यिक परिदृश्य पर सक्रिय हैं, वह पहले कभी नहीं हुआ और उनके होने से कविता या साहित्य के बृहत् संसार में कुछ खलबली तो ज़रूर मची है, उनकी अपनी एक आवाज़ बनी है, जो पहले नहीं थी”स्त्री-कविता, सामाजिक परिवर्तन में जो भूमिका निभा रही है और उससे आगे बढ़कर निभाने की आकांक्षा रखती है।

आज के पुरुष आलोचकों ने स्त्री रचनाकारों को नई संवेदनशीलता से पढ़ा है और उनके साहित्य में आने वाली नवीन अभिव्यक्तियों को रेखांकित किया हैं। प्रबुद्ध समाज की प्रवक्ता के रूप में इन कवयित्रियों के सामाजिक-राजनीतिक विचारों व उनकी पक्षधरता का भी विशेष महत्व है।इन कवयित्रियों ने राजनीति, समाज, साम्प्रदायिकता, भूमंडलीकरण की चुनौतियों आदि पर गंभीर, महत्वपूर्ण कवितायें लिखीं है। इसके साथ-साथ कविता की रचना-प्रक्रिया पर भी उन्होंने गहराई से विचार किया है। इसी तरह जीवन के कोमल बिम्ब, प्रकृति से उनकी अभिन्नता, भाव-भाषा के विविध प्रयोग, स्त्री-कविता की इन उपलब्धियों की ओर किसी का ध्यान नहीं गया। स्त्री व स्त्रीत्व की आवाज़ पकड़ते हुए, यह सब छूट रहा था जिससे उनके मूल्यांकन की पहल, स्वागत-योग्य होते हुये भी, अधूरी रही है।काव्य रचना के ये सभी पक्ष समकालीन कविता धारा में स्त्रियों तथा स्त्री-कविता की सम्पूर्ण उपस्थिति को दर्ज करते हैं।

क्रमशः जारी 

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