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सुन्नत महिलाओं के पैदा होते ही कुचलने की मानसिकता है

 लेखिका: डा. नवल अल सादवी

प्रस्तुति एवं अनुवाद: सुधा अरोड़ा 

सामाजिक कार्यकर्ता और रचनाकार डॉक्टर नवल अल सादवी (हव्वा का पर्दानशीन चेहरा ) ने अपनी पुस्तक ‘द हिडेन फेस ऑफ ईव: वीमेन इन द अरब वर्ल्ड’ में सुन्नत की क्रिया का दिल दहला देने वाला वर्णन प्रस्तुत किया है।


सुन्नत की अमानवीय प्रथा को समाप्त करने के लिए अन्तरराष्ट्रीय  स्तर पर कोशिशें की गई हैं। 1994 में काइरो में संपन्न अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन में यह स्वीकार किया गया कि महिला सुन्नत मानवाधिकार का उल्लंघन है और इससे महिलाओं के स्वास्थ्य और  जीवन  को खतरा है। कई देशों में इस प्रथा पर रोक लगाने के लिए कानून बनाए गए हैं !


गांव कप्र तहला में जन्मी लेखिका डा. नवल अल सादवी ने नी डाक्टरी की शुरुआत गांव की अनपढ़ औरतों के बीच ही की, उसके बाद वह काइरो अस्पताल और फिर पलिक हेल्थ की निदेशक रहीं। 1972 में अपनी पहली विवादास्पद पुस्तक ‘वीमेन एंड सेक्स’ के प्रकाशन के तहत उन्हें अपनी निदेशक के ओहदे से हटना  पड़ा और ‘हेल्थ पत्रिका के संपादन से भी  उन्हें हटा दिया गया। इसके बावजूद नवल अल सादवी का लेखन जारी रहा और उन्होंने औरतों की सामाजिक स्थिति, मनोविज्ञान और यौन संबंधी प्रश्नों पर लिखना जारी रखा। उनकी लिखी सभी पुस्तकों पर मिस्र, सऊदी अरब, सूडान और लीबिया में प्रतिबंध लगाया जा चुका है। लेबनान, बेरुत से उनकी पुस्तकों का प्रकाशन हुआ है।

 नवल अल सादवी

‘द हिडेन फेस ऑफ ईव’ सादवी की अंग्रेजी में अनूदित पहली पुस्तक है। आयरीन. एल. गेंजियर ने इस किताब की भूमिका में लिखा है, ‘कुछ किताबों की यह नियति होती है कि वे पढ़ते हुए आपको आनंद नहीं देती, उन्हें पढ़कर आप खुश नहीं हो सकते। इन किताबों की सार्थकता इसी में है कि उन्हें पढ़ते वक्त आपके भीतर पैदा हुआ घृणा, शर्म या गुस्से का भाव आपको बहुत बेचैन कर देता है।’

जानें अरब देश की औरतों का सच !

सुन्नत की प्रथा: अरब देश की औरतें…


उस रात मैं छह साल की थी और अपने नर्म बिस्तर पर शांत और सुकून भरी नींद की उस खुमारी में थी जब जागने और सोने के बीच बचपन के गुलाबी सपने और खूबसूरत परियां पलकों पर तारी रहती हैं। उस नींद की खुमारी में मुझे लगा जैसे मेरे कंबल के नीचे अचानक कोई बड़ा-सा हाथ – ठंडा और रूखा – मेरे जिस्म पर कुछ टटोलता सा घूम गया है जैसे वह कुछ ढूंढ़ रहा हो। उसके साथ ही उतने ही बड़े और खुश्क हाथ ने मेरे मुंह को ढक लिया, होंठों से निकलती चीख को रोकने के लिए।

‘दर्दजा‘: हव्वा को पता होता तो वह बेऔलाद रह जाती

वे मुझे उठाकर बाथरूम में ले गए। मुझे पता नहीं, वे सब गिनती में कितने थे, आदमी थे या औरतें, मुझे उनके चेहरे भी याद नहीं। मेरे सामने की पूरी दुनिया एक स्याह अंधेरे में कैद थी, जो मुझे देखने से रोक रही थी। मुझे बस इतना याद है कि मैं बेतरह डर गई थी और वे एक नहीं कई थे और मेरी हथेलियों, बांहों और मेरी जांघों पर उनकी पकड़ लोहे सी सख्त थी, जिसकी वजह से मैं हिल भी नहीं पा रही थी। मुझे अपने जिस्म के नीचे बाथरूम की ठंडी टाइलों का स्पर्श याद है, जिसके इर्द-गिर्द कई सारी फुसफुसाती आवाजें थीं, जिसे बीच-बीच में सान पर चढ़ाई जाती छुरी का स्वर तोड़ रहा था। मेरी बंद आंखों के सामने ईद का दिन कौंध गया, जब बकरे को जिबह करने से पहले कसाई अपने छुरे की धार तेज करता था।

मेरा खून मेरी पसलियों में जम गया था। मुझे लगा, मेरे घर में कुछ चोर घुस आए थे, जो मुझे मेरे बिस्तर से उठा लाए थे और अब मेरा गला काटने के लिए तैयार हो रहे थे। किस्सों-कहानियों में सुनी हुई बिल्कुल अपने जैसी उस बागी लड़की की तरह, जिनके किस्से मेरी गांव की दादी मां बड़े प्यार से मुझे सुनाया करती थी।
उस लोहे के औजार की घिसघिसाहट सुनने के लिए मैंने अपने कानों पर जोर डाला। जैसे ही वह आवाज रुकी, मेरे दिल ने उसके साथ ही धड़कना बंद कर दिया था। मैं देख नहीं पा रही थी और मेरी सांस भी उसके साथ ही थम गई थी, लेकिन मैं महसूस कर रही थी कि लोहे का वह औजार धीरे-धीरे मेरे बहुत नजदीक आ रहा था। उन सख्त हाथों का दबाव जरा भी ढीला नहीं पड़ रहा था और मुझे लगा अब वह तेज किया हुआ छुरा सीधे मेरे गले की ओर बढ़ रहा है, लेकिन वह मेरी गर्दन की ओर नहीं, पेट पर नीचे की ओर मेरी जांघों के बीच जैसे कुछ ढूंढ़ता सा बढ़ रहा था। उसी पल मैंने महसूस किया कि मेरे दोनों पैरों को, जांघों को और निचले हिस्से को जितना चौड़ा खींचा जा सकता था, खींच दिया गया था, फिर अचानक छुरे की तेज धार मेरी जांघों के बीच गिरी और मेरे शरीर से मांस का एक टुकड़ा अलग होकर जा पड़ा।

अपने मुंह पर पड़ी हथेली के सख्त दबाव के बावजूद मैं दर्द से बेइंतहा चीखी, क्योंकि वह दर्द सिर्फ दर्द नहीं था, जैसे आग की एक तीखी लपट मेरे पूरे शरीर को चीरती हुई मेरे भीतर से गुजर रही थी। कुछ पलों के बाद मैंने देखा, मेरे कूल्हों के आसपास खून का तालाब बन रहा था।

मुझे नहीं मालूम था, मेरे शरीर में से उन्होंने क्या काट डाला था। मैंने इसे जानने की कोशिश भी नहीं की। मैं सिर्फ रो रही थी और अपनी मां को मदद के लिए चीख-चीख कर पुकार रही थी और मुझे सबसे गहरा सदमा पहुंचा, जब मैंने अपने आसपास देखा और पाया कि मां मेरी बगल में खड़ी थी। हां, यह मेरा वहम नहीं था, वह मेरी मां ही थी, अपने हाड़-मांस के साथ, उन अजनबी औरतों के ठीक बीचोबीच, उनसे बतियाती और मुस्कुराती जैसे अभी कुछ मिनटों पहले उनकी बेटी को जिबह करने में उनकी कोई हिस्सेदारी न रही हो।

हव्वा की बेटी : उपन्यास अंश, भाग 2

वे मुझे उठाकर बिस्तर तक ले गए। मैंने देखा, अब वे मेरी बहन को, जो मुझसे दो साल छोटी थी, बिल्कुल उसी तरह उठाकर ले जा रहे थे, जैसे वे मुझे ले गए थे। मैं अपनी पूरी ताकत के साथ चिल्लाई – नहीं, नहीं। मैं उन बड़े-बड़े सख्त हाथों के बीच अपनी बहन का मासूम चेहरा देख रही थी। एक क्षण के लिए मेरी आंखों उसकी बड़ी-बड़ी काली आंखों में जमी दहशत से टकराई। उसकी आंखों का वह भयावह खौफ में कभी भूल नहीं सकती। दूसरे ही पल बाथरूम के उसी दरवाजे के पीछे वह बंद हो गई थी, जहां से मैं अभी-अभी होकर आई थी।

मेरा परिवार एक अशिक्षित परिवार नहीं था। उस समय के स्तर से मेरे माता-पिता पढ़े-लिखे थे। पिता अपने प्रांत के ग्रेजुएट थे और शिक्षा नियंत्रक के औहदे पर थे। मेरी मां की शिक्षा फ्रेंच स्कूल में हुई थी और उनके पिता सेना में थे, लेकिन गांव हो या शहर, उच्च वर्ग हो, मध्य या निम्न मध्यवर्ग, सुन्नत की प्रथा का प्रचलन हर क्षेत्र में कायम था। कोई भी लड़की अपनी योनि के ऊपरी हिस्से (clitoris) को कटवाए जाने से बच नहीं सकती थी। जब मैंने स्कूल में अपनी साथिनों से अपने अनुभव को बांटा तो मुझे पता चला कि बिना किसी अपवाद के हर एक लड़की इस मर्मांतक अनुभव का शिकार हो चुकी थी।

इस हादसे की याद बहुत बाद में भी एक दुःस्वप्न की तरह मुझे पीछे धकेलती रही। मुझमें एक असुरक्षा की भावना ने घर कर लिया था कि मेरे साथ कुछ भी घट सकता है। जिस दिन मैंने जिंदगी में आंखें खोलीं, समाज ने मुझे बता दिया था कि मैं लड़की हूं और कि ‘बिंत’ (लड़की) शब्द का जब भी उच्चारण किया जाएगा, माथे पर सलवटों के साथ ही किया जाएगा।

1955 में जब मैं डाक्टर बनी, मैं कभी वह दर्दनाक घटना भूल नहीं पाई, जिसने एकबारगी मेरा बचपन छीन लिया था और शादी के बाद भी जिसने मुझे जिंदगी की पूर्णता और यौन के आनंद से मरहूम रखा, जो अंततः एक मनोवैज्ञानिक संतुलन से ही हासिल किया जा सकता है। जब मैं गांव में प्रैक्टिस कर रही थी, मुझे अपने दुःस्वप्न से कई-कई बार फिर से गुजरना पड़ा। अक्सर मुझे उन लड़कियों का इलाज करना पड़ता था, जो सुन्नत के बाद खून से तरबतर वहां आती थीं। सुन्नत करने वाली दाइयां अप्रशिक्षित होती हैं, जो आमतौर पर कांच के टुकड़े या विशेष किस्म के चाकू का इस्तेमाल करती हैं। सुन्नत करने के दौरान न तो एनस्थीसिया दिया जाता है, न किसी तरह का एंटीसेप्टिक लगाया जाता है। रक्तस्राव रोकने के लिए तरह-तरह की चीजें रगड़ दी जाती हैं, जिनसे संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। इस किस्म के अमानवीय और आदिम तरीके की वजह से बहुत सी लड़कियां सुन्नत के दौरान अपनी जान से भी हाथ धो बैठती थीं। कइयों को गंभीर किस्म का इंफेक्शन और सेप्टिक हो जाता था। और उनमें से अधिकांश इस बर्बर अनुभव की यातना के कारण मानसिक और यौन विक्षिप्ति का शिकार हो जाती थीं।

मुझे अपने डाक्टरी पेशे के कारण एक बार अरब देश के अलग-अलग हिस्सों से आई औरतों का परीक्षण करने का मौका मिला। इनमें सूडान की औरतें भी थीं। मैं उन्हें देखते हुए दहशत से भर गई कि सूडानी लड़की को सुन्नत की जिस प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, वह मिस्र की सुन्नत प्रथा से दस गुना ज्यादा क्रूर और बर्बर है। इस आपरेशन में जननेन्द्रिय के सभी बाहरी हिस्सों को निकाल दिया जाता है। योनि का ऊपरी हिस्सा तो वे काट ही देते हैं, साथ ही बाहरी पटल (labia majora) और भीतरी पटल (labia minora) को भी काट दिया जाता है। फिर उस घाव को सिला जाता है। इस दौरान सिर्फ योनि का छिद्र ही छोड़ दिया जाता है, जो घाव की मरम्मत के दौरान कुछ अतिरिक्त टांकों से छोटा कर दिया जाता है। इसका नतीजा यह होता है कि आमतौर पर शादी की रात उस संकुचित जगह को दोनों ओर से काट कर कुछ चौड़ा करना पड़ता है ताकि पुरुष का लिंग उसमें प्रवेश कर सके। जब किसी सूडानी औरत का तलाक होता है तो इस बाहरी खोल को फिर से कुछ टांकों द्वारा छोटा किया जाता है ताकि वह किसी से शारीरिक संबंध स्थापित न कर सके और अगर वह फिर से शादी करती है तो फिर से टांकों को खोला जाता है।

जब मैंने 1969 में सूडान की यात्रा की तो वहां की औरतों से बात कर और यह देखकर कि वहां गांव, कस्बे और बड़े शहरों की शत-प्रतिशत लड़कियां इस प्रथा की शिकार थीं और इस प्रथा की जड़ें गहरे धंसी हुई थीं, मुझमें गुस्से और विद्रोह का भाव कई गुना बढ़ गया। अपनी सारी डाक्टरी पढ़ाई और अपने अपेक्षाकृत खुले माहौल में बड़े होने के बावजूद मैं यह समझ पाने में असमर्थ थी कि लड़कियों को इस बर्बर प्रक्रिया से क्यों गुजरना पड़ता है। मैं हमेशा अपने आप से सवाल करती, क्यों? आखिर क्यों? मुझे इसका कोई जवाब नहीं मिलता। और यह सवाल मेरे दिमाग में उसी दिन पैदा हो गया था, जब मुझे और मेरी छोटी बहन का सुन्नत किया गया था।
बाद में अपने शोध के दौरान मैंने पाया कि मिस्र के अशिक्षित परिवारों में 97.5 प्रतिशत लड़कियां इस प्रथा का शिकार होती हैं, लेकिन शिक्षित परिवारों में यह प्रतिशत घटकर 66.2 प्रतिशत रह गया है।

जब-जब मैंने इस बारे में उन लड़कियों से बात की तो पाया कि उन्हें इसका कतई इलम ही नहीं था कि सुन्नत से उनके शरीर को कितना नुकसान पहुंचता है, बल्कि कुछ तो यह समझती थीं कि यह उनकी सेहत के लिए मुफीद है और उनके शरीर को पाक साफ रखने के लिए निहायत जरूरी है। सुन्नत की प्रक्रिया से गुजरी पढ़ी-लिखी औरतें भी इस तथ्य से अनजान थीं कि योनि के ऊपरी हिस्से को काट फेंकने का उनके मनोवैज्ञानिक और यौन संबंधों पर नकारात्मक असर पड़ता है। इन औरतों के बीच और मेरे बीच आमतौर पर इस तरह का एक औसत संवाद चलता था –
‘सुन्नत के समय तुम्हारी उम्र क्या थी?’
‘मैं बच्ची थी तब। यही कोई सात-आठ साल।’
‘तुम्हें आपरेशन की सारी बातें याद हैं?’
‘बिल्कुल! भला उन्हें कैसे भूला जा सकता है!’
‘क्या तुम्हें डर लगा था?’
‘बेहद! मैं जाकर अल्मारी के ऊपर छिप गई थी ( कोई कहती पलंग के नीचे, कोई पड़ोसियों के घर) लेकिन उन्होंने मुझे पकड़ ही लिया और उनके हाथों में मेरा पूरा शरीर कांप रहा था।’
‘दर्द महसूस हुआ?’
‘बेहद! मैं चीखी थी। मेरी मां ने मेरा सिर पकड़ रखा था ताकि मैं हिल भी न सकूं। मेरी चाची ने मेरा बायां हाथ पकड़ा था और दादी ने दायां। दो अजनबी औरतें, जिन्हें मैंने पहले कभी देखा नहीं था, मेरी दोनों जांघों को एक दूसरे से जितनी दूर तक अलग खींच सकती थीं, खींच रही थीं ताकि मेरे जरा भी हिलने की गुंजाइश न रहे। इन दोनों चेहरों के बीच हाथ में तेज धार वाला चाकू लिए दाई बैठी थी। जैसे ही उसने मेरे एक हिस्से को काटा, मेरे पूरे शरीर में आग की लपटें दौड़ रही थीं और मैं तेज दर्द से बेहोश हो गई थी।
‘आपरेशन के बाद क्या हुआ?’
‘मेरे पूरे शरीर में भयंकर दर्द था और मैं हिल भी नहीं सकती थी। कई दिन मैं बिस्तर पर ही रही। हर बार जब मैं पेशाब करने जाती तो कटी हुई जगह पर असहनीय जलन होती थी। घाव में से खून बहता रहता था और मेरी मां दिन में दो बार उस जगह की ड्रेसिंग बदलती थी। कितने ही दिन तक मैं पानी पीने से डरती थी ताकि पेशाब करने न जाना पड़े।’

सुधा अरोड़ा

‘जब तुम्हें पता चला कि तुम्हारे शरीर का एक छोटा-सा हिस्सा काट दिया गया है तो तुम्हें कैसा महसूस हुआ?’
‘मुझे सिर्फ यह बताया गया था कि यह एक मामूली सा आपरेशन है जो हर लड़की को पाक-साफ रखने के लिए किया जाता है और इससे उसकी इज्जत बची रहती है। जिस लड़की का आपरेशन नहीं किया जाता, उसका बर्ताब खराब होता है, वह लड़कों के पीछे भागने लगती है और उसके बारे में लोग-बाग बातें बनाने लगते हैं, जिसकी वजह से शादी की उम्र आने पर उससे कोई शादी करने को राजी नहीं होता। मेरी दादी ने बताया कि जांघों के बीच उस छोटे से हिस्से का बना रहना मुझे नापाक बना देगा और शादी के बाद मेरा शौहर मुझसे नफरत करने लगेगा।’
‘क्या तुम्हें इन दलीलों पर भरोसा हुआ?’
‘हां, हुआ। आपरेशन के बाद जब मैं बिल्कुल ठीक हो गई तो मुझे खुशी हुई कि मैंने उस चीज से छुटकारा पा लिया जो मुझे गंदा और नापाक बना सकती थी।’

मुझे कमोबेश सबसे यही जवाब मिलते थे। वहां ऐन शम्स स्कूल आफ मेडिसन के आखिरी साल की एक छात्रा थी। जब उससे मैंने यह सवाल किया कि क्या वह इसे मानती है कि औरत की योनि का ऊपरी हिस्सा काट दिया जाना एक सेहतमंद क्रिया है या कम से कम हानिकारक नहीं है?

‘मुझे तो सबने यही बताया है’, उसने कहा, ‘हमारे परिवार में सभी लड़कियां इस क्रिया से गुजरी हैं। मैंने डाक्टरी पढ़ी है पर मुझे आज तक किसी प्रोफेसर ने नहीं बताया कि एक औरत के शरीर में उसकी योनि के ऊपरी हिस्से (clitoris) की कोई अहमियत है, न ही हमारी मेडिकल किताबों में इसका कोई जिक्र है।’
‘यह सच है! आज तक चिकित्सा विज्ञान में औरत के जिन अंगों पर अलग से चर्चा की जाती है, वे उसकी जननेन्द्रियों से सीधे ताल्लुक रखते हैं जैसे योनि (vagina), गर्भाशय (uterus) और अंडकोश (ovaries)। चिकित्सा शास्त्र में योनि के ऊपरी हिस्से को उपेक्षित रखा गया है, उसी तरह जैसे वह समाज द्वारा उपेक्षित और तिरस्कृत है।’


‘दरअसल, एक बार एक छात्रा ने प्रोफेसर से क्लिटोरिस के बारे में पूछ लिया तो प्रोफेसर का मुंह तमतमा गया और उन्होंने रूखा-सा जवाब दिया कि आगे से कोई इस बारे में सवाल न पूछे क्योंकि औरत के जिस्म में इसकी कोई अहमियत नहीं है।’

यहीं से मेरी शोध शुरू हुई। मुझे यह जानना था कि सुन्नत की प्रथा का लड़की पर मानसिक रूप से और उसके सेक्स जीवन पर क्या असर होता है। पर मैंने जिनसे भी पूछा – सबने आंखें झुकाकर मेरी ओर देखे बिना यही उत्तर दिया कि उन पर कोई असर नहीं पड़ा। दरअसल, मिस्र की औरतें जिस तरह के सख्त और घुटे हुए माहौल में बड़ी होती हैं, वहां उनके लिए शादी के बाद शौहर के हाथ का पहला स्पर्श पाने से पहले किसी भी तरह के यौन सुख या अनुभव की बात करना भी गुनाह समझा जाता है। बहुत कोंचने पर शादीशुदा औरतों ने स्वीकार किया कि अपने पति के साथ सहवास के दौरान भी उन्होंने कभी रत्ती भर भी आनंद महसूस नहीं किया।
अपने शोध में 651 औरतों से सुन्नत के बारे में लंबी बातचीत करने के बाद जो नतीजे हाथ लगे, ये हैं –

1. सुन्नत एक ऐसा आपरेशन है, जो औरत के शरीर पर हानिकारक असर छोड़ता है। इससे उसकी कामवासना मंद पड़ जाती है और इससे औरत की यौन संबंध के चरम सुख तक पहुंचने की क्षमता कम हो         जाती है। अरब समाज में औरतों का सेक्स संबंधी ठंड़ापन (frigidity) मुख्यतः इसी कारण से है।

2. अशिक्षित परिवार आज भी परंपरा के तरह इसी धारणा को मानते हैं       कि लड़की की कामेच्छा के दमन का  एकमात्र तरीका सुन्नत ही है और     सुन्नत द्वारा ही उसके कौमार्य और इज्जत को शादी से पहले बरकरार      रखा जा सकता है।

3. यह धारणा भ्रामक है कि सुन्नत द्वारा औरत के प्रजनन अंगों में           कैंसर की संभावना कम हो जाती है। सच्चाई यह है कि सुन्नत – वह         किसी भी रूप में और पहली, दूसरी   किसी  भी डिग्री का हो (खासतौर    पर  सूडानी, जो चौथी डिग्री का माना जाता है और सुन्नत का सबसे बर्बर स्वरूप है) अपने साथ इंफेशन, सेप्टिक या हेमरेज और मूत्रनली में गांठ  (cyst) या सूजन लेकर ही आता है, साथ ही इससे योनि का द्वार  संकुचित होता है और पेशाब के बहाव में  काफी समय तक रुकावट महसूस होती है।

4. सुन्नत की गई लड़कियों में हस्तमैथुन की क्रिया बहुत कम पाई जाती है बजाय उन लड़कियों के, जिनका          आपरेशन नहीं किया गया है।

5. इसमें कोई शक नहीं कि सुन्नत लड़की के यौन जीवन के लिए एक सदमा साबित होता है और                          मनोवैज्ञानिक विकास में बाधा पहुंचाता है। अंततः यह लड़की को उसके माहौल के अनुरूप यौन संबंधी              ठंडेपन (sexual frigidity) की ओर ही धकेलता है। शिक्षा ही एकमात्र रास्ता है जिसमें पढ़े-लिखे मां-बाप            अपनी बेटियों को इस अमानवीय प्रथा से गुजरने से इनकार कर सकते हैं। आज के शिक्षित मां-बाप यह               समझ गए हैं कि यह आपरेशन किसी भी रूप में लाभदायक नहीं है और इसलिए इसका बहिष्कार किया             जाना  चाहिए।

आइन शम्स यूनिवर्सिटी में ‘वीमेन एंड न्यूरोसिस’ पर अपना शोध शुरू करने से पहले काइरो यूनिवर्सिटी के कस्त्र अल आइनी मेडिकल कालेज से इसे करने की मैंने बहुत कोशिश की पर हर बार मुझे कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा। हमारी सबसे बड़ी रुकावट सत्तारूढ़ दकियानूसी मानसिकता वाले प्रोफेसरों से ही थी जिन्होंने ‘सेक्स’ को हमेशा ‘शर्म’ के साथ जोड़कर ही देखा है। उनके अनुसार ‘प्रतिष्ठित’ शोध सेक्स जैसे विषय पर नहीं हो सकती थी। मैंने अपने शोध के आलेख का शीर्षक दिया था ‘मिस्र की आधुनिक औरत के यौन जीवन में आने वाली समस्याएं।’ (¼problems that confront the sexual life of modern eypytian women) लेकिन लंबी चर्चा और बातचीत के बाद आखिर मुझे शीर्षक से ‘यौन’ शब्द हटाकर ‘मनोवैज्ञानिक’ (psychological) शब्द डालना पड़ा।

(‘द हिडन फेस आफ ईव’ के पहले भाग ‘द म्यूटिलेटेड हाफ’ के पहले और छठे अध्याय के कुछ चुने हुए अंश ) 


( अन्तरंग संगिनी 1999 / हंस मार्च 2000 में प्रकाशित )

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योनि के ऊपरी हिस्से को काटने की प्रथा (सुन्नत) के खिलाफ बोहरा महिला ने पीएम को लिखा खत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी,


स्वतंत्रता दिवस पर आपने मुस्लिम महिलाओं के दुखों और कष्टों पर बात की थी. ट्रिपल तलाक को आपने महिला विरोधी कहा था, सुनकर बहुत अच्छा लगा था.

हम औरतों को तब तक पूरी आज़ादी नहीं मिल सकती जब तक हमारा बलात्कार होता रहेगा, हमें संस्कृति, परंपरा और धर्म के नाम पर प्रताड़ित किया जाता रहेगा. हमारा संविधान सभी को समान अधिकार देने की बात करता है, पर असल में जब भी किसी बच्ची को गर्भ में मारा जाता है, जब भी किसी बहु को दहेज के नाम पर जलाया जाता है, जब भी किसी बच्ची की जबरन शादी करवा दी जाती है, जब भी किसी लड़की के साथ छेड़खानी होती है या उसके साथ बलात्कार किया जाता है, हर बार इस समानता के अधिकार का हनन किया जाता है.

ट्रिपल तलाक अन्याय है, पर इस देश की औरतों की सिर्फ़ यही एक समस्या नहीं है. मैं आपको औरतों का सुन्नत/ खतना (Female Genital Mutilation ) के बारे में बताना चाहती हूं, जो छोटी बच्चियों के साथ किया जाता है. जो बच्चियां अपने शरीर से जुड़े निर्णय नहीं ले सकती, उन्हें इस अमानवीय प्रथा का शिकार बनना पड़ता है. इन बच्चियों के शरीर को जो नुकसान पहुंचता है, उसे किसी भी तरह से ठीक नहीं किया जा सकता. इस प्रथा के खिलाफ़ पूरी दुनिया में आवाज़ उठाई जा रही है.

मैं इस ख़त के द्वारा आपका ध्यान इस भयानक प्रथा की तरफ़ खींचना चाहती हूं. बोहरा समुदाय में सालों से ‘ख़तना’ या’ख़फ्ज़’ प्रथा का पालन किया जा रहा है. बोहरा, शिया मुस्लिम हैं, जिनकी संख्या लगभग 2 मिलियन है और ये महाराष्ट्र,गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान में बसे हैं.


मैं बताती हूं कि मेरे समुदाय में आज भी छोटी बच्चियों के साथ क्या होता है. जैसे ही कोई बच्ची 7 साल की हो जाती है,उसकी मां या दादी मां उसे एक दाई या लोकल डॉक्टर के पास ले जाती हैं. बच्ची को ये नहीं बताया जाता कि उसे कहां ले जाया जा रहा है या उसके साथ क्या होने वाला है. दाई या आया या वो डॉक्टर उसके योनि (Clitoris) को काट देते हैं. इस प्रथा का दर्द ताउम्र उस बच्ची के साथ रह जाता है.

इस प्रथा का एकमात्र उद्देश्य है, बच्ची या महिला की यौन इच्छा को दबाना.


वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन  के अनुसार, ‘सुन्नत  महिलाओं और लड़कियों के मानवाधिकार का हनन है. महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव का ये सबसे बड़ा उदाहरण है. बच्चों के साथ ये अकसर होता है और ये उनके अधिकारों का भी हनन है. इस प्रथा से व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर पड़ता है.’
सैंकड़ों सालों से इस प्रथा का शांति से पालन किया जा रहा है और बोहरा समुदाय के बाहर बहुत कम लोग ही इस प्रथा के बारे में जानते होंगे. 2015 में बोहरा समुदाय की कुछ महिलाओं ने एकजुट होकर #WeSpeakOut On FGM नाम से एक कैंपेन शुरू किया और यहां हमने आपस में अपनी दुख और कहानियां एक-दूसरे से कही. हमने ख़तना के खिलाफ़ एक जंग का ऐलान करने की ठानी.

हमने अपने पादरी, सैदना मुफ़्फदल को इस प्रथा को रोकने के लिए कई ख़त लिखे, पर हमारी बात किसी ने नहीं सुनी. ये प्रथा न सिर्फ़ आज भी चल रही है, बल्कि पादरी साहब ने एक पब्लिक प्रेस स्टेटमेंट में ये घोषणा भी कर दी कि 1400 साल से जो प्रथा चल रही है उसे किसी भी हालत में नहीं बदला जाएगा. बच्चों के मानवाधिकार हनन की तरफ़ किसी ने भी ध्यान नहीं दिया.

18 दिसंबर. 2014 में यूनाईटेड नेशन ने एक प्रस्ताव पारित किया जिसके तहत पूरी दुनिया में सुन्नत को बैन करने की बात कही गई. इसे ख़त्म करना एक सस्टेनेबल डेवेलपमेंट लक्ष्य भी है.

प्रधानमंत्री जी, एक बार पहले भी आपने कहा था कि संविधान के अनुसार, मुस्लिम औरतों और उनके अधिकारों की रक्षा करना अनिवार्य है. मुझे आपकी बातें सुनकर सुकून मिला कि मुस्लिम महिलाओं की हक़ की रक्षा करना भी सरकार का कर्तव्य है.

आपने ये भा कहा था कि, ‘लोकतंत्र में बातचीत ज़रूरी है.’ इसलिये मेरी आपसे दरख्वास्त है कि मेरी और मेरी बहनों की, जो सुन्नत की शिकार हुईं हैं कि बात सुनी जाए.


दिसंबर 2015 में हमने ‘WeSpeakOut On FGM’ नाम से Change.org पर एक कैम्पेन की शुरुआत की थी. इस प्रथा को बंद करने के पक्ष में हमें 90000 से ज़्यादा दस्तख़त मिल गए हैं. लेकिन अब तक सरकार की तरफ़ से हमें कोई जवाब नहीं मिला है.

प्रधानमंत्री जी, हम बोहरा समुदाय की महिलायें अपने हक़ के लिए लड़ रही हैं. कुरान में भी सुन्नत की बात नहीं कही गई है. हमारे देश में सिर्फ़ बोहरा समुदाय में और केरल के कुछ समुदायों में ही इस प्रथा का पालन किया जाता है. हम 21वीं सदी में जी रहे हैं और कुछ चीज़ें बदलनी ही चाहिए. मैं सरकार से ये दरख़्वास्त करती हूं कि जल्द से जल्द इस कुप्रथा को ख़त्म करने पर काम शुरू किया जाए.
इस प्रथा को बैन करके बोहरा बेटियों को बचाना बहुत ज़रूरी है.

मासूमा रानाल्वी
(अनुवाद संचिता, गजब पोस्ट से साभार)


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निजता के अधिकार के खिलाफ सरकार की सारी दलीलों को सुप्रीम कोर्ट ने ख़ारिज किया ….उषा रामनाथन



पिछले तीन वर्षों में सुप्रीम कोर्ट में मामले की मैराथन सुनवाई के दौरान, भाजपा की अगुवाई वाली एनडीए सरकार ने तर्क दिया था कि निजता का अधिकार एक मूल अधिकार नहीं है. यह भारतीय संविधान में दिये गये मौलिक अधिकार का अपरिहार्य हिस्सा नहीं है. सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की खंडपीठ ने अपने एकमत ऐतिहासिक फैसले में सरकार की किसी दलील को नहीं माना, न विकास की दलील, न मौलिक अधिकार की सरकारी व्याख्या की दलील. अपने स्पष्ट निर्णय में सेक्सुअल निर्णय, जीवनसाथी चुनने या गर्भ धारण के निर्णय, खाने पीने के चुनाव आदि के अधिकार को निजता का अधिकार बताया है.


स्त्रीवादी न्याविद और सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता उषा रामनाथन इसे भाषा सिंह से बातचीत में एक महत्वपूर्ण फैसला मानती हैं और इसका असर वे सुप्रीम कोर्ट में चल रहे ‘आधार’ के खिलाफ मुकदमे या ‘एलजीबीटी’ के राइट्स के मुकदमे पर साफ़ देखती हैं.

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय कितना महत्वपूर्ण है?


यह फैसले तीन महत्वपूर्ण चीजों का प्रतीक है, पहला, 1954 और 1963 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा ही किए गए फैसले हमारे मौलिक अधिकारों के रास्ते में नहीं आयेंगे। दूसरा, पिछले 40 वर्षों के लंबे समय से संघर्ष के बाद निजता के अधिकार को सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से समर्थन दिया है। हालांकि, सरकार ने बहुत ही व्यवस्थित तरीके से इस अधिकार को नष्ट करने की कोशिश की। तीसरा, कोर्ट ने मान्यता दी है कि निजता के अधिकार को संविधान का अनुच्छेद 21 और मूलभूत अधिकार संरक्षित करते है।

क्यों आधार के मामले में, सरकार ने मौलिक अधिकारों की दलील ली है?


यह एक दिलचस्प पहलू है, जिस पर ध्यान देना है. ऐसा नहीं है कि सरकार ने हर परिस्थिति में निजता के अधिकार की मौजूदगी से इनकार कर दिया है। उदाहरण के लिए, जब लोग अदालत में कहने लगे कि मानहानि को आपराधिक कानून का हिस्सा नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह कमजोर वर्ग को दबाने के लिए उपयोग किया जाता है, तब तत्कालीन सरकार ने बचाव में व्यक्तिगत गोपनीयता की दलील का ही सहारा लिया. लेकिन यूआईडी / आधार पर सरकार अलग खड़ी थी.

आपकी राय में, क्यों सरकार ने आधार मामले में निजता का विरोध किया?

उन्होंने भ्रम पैदा करने, गुमराह करने और ज्यादा से ज्यादा समय कोर्ट के फैसले को टाला जाये, के मकसद से ऐसा किया. आप देखते हैं, जब उन्होंने कहा कि निजता को मौलिक अधिकार के रूप में नहीं माना जा सकता है, आधार मामला अंतिम सुनवाई के चरण में था. उन्होंने यह बचाव की दलील 16 मार्च, 2015 दी, जब बेंच अंतिम सुनवाई के दौर में था. उन्होंने इसे शुरू में क्यों नहीं रखा? क्यों इस महत्वपूर्ण चरण में? इस बीच, वे आधार की गुंजाइश और पहुंच को बढ़ाना चाह रहे थे. यह सब बहुत सोच समझकर किया गया था.



फैसले में कहा गया है कि गोपनीयता का आधिकार धारा 377 के संदर्भ में भी वैध है। आप इसे कैसे देखती हैं?

यदि आप निर्णय पढ़ते हैं, तो यह बहुत खुला और स्पष्ट है. निर्णय कहता है कि मौलिक अधिकार बहुसंख्यकवाद से जुड़ा नहीं है. यदि एलजीबीटी अल्पमत में है, तो कोई भी उनके मौलिक अधिकारों को छीन नहीं सकता है. उनहें ‘जीवन का अधिकार , गोपनीयता का अधिकार आदि सारे अधिकार हैं।  9 जजों की पीठ ने सुरेश कौशल के फैसले के मूल को लगभग उलट दिया है। इसका एक दीर्घकालिक प्रभाव होगा। यह निर्णय विवादास्पद एडीएम जबलपुर के फैसले पर भी बरसता है. हाँ, यह खुले तौर पर कहता है कि यह निर्णय “पूरी तरह दोषपूर्ण है।” यह स्पष्ट कर दिया गया है कि मौलिक अधिकार निलंबित नहीं किए जा सकते या वापस नहीं लिये जा सकते.

क्या आपको लगता है कि यह निर्णय आधार के खिलाफ कानूनी लड़ाई को मजबूती देगा? 

यह अच्छा है कि सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि निजता मौलिक अधिकार है. इस फैसले के साथ, यह स्पष्ट हो जाता है कि यूआईडी परियोजना को मौलिक अधिकार के रूप में ‘निजता के अधिकार की चुनौती’ का सामना करना होगा। इस परियोजना में निजता के अधिकार का जबरदस्त उल्लंघन किया गया है.  इस संबंध में पर्याप्त सबूत अदालत में प्रस्तुत किए गए हैं. आधार परियोजना ने सरकार को निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार न बताने के लिए प्रेरित किया है. वे (सरकार) विदेशी कंपनियों को नागरिकों का निजी डेटा दे रहे हैं, ऐसा अब नहीं हो सकता, हम आशान्वित हैं.

यह साक्षात्कार मूलतः नेशनल हेराल्ड में अंग्रेजी में प्रकाशित हुआ है. 


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किरायेदार

अनुपमा तिवाड़ी


कविता संग्रह “आइना भीगता है“ 2011 में बोधि प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित. संपर्क : anupamatiwari91@gmail.com

मकान नंबर ए – 41 मीता और उमेश ने देखते ही पसंद कर लिया था.छोटी – सी गृहस्थी के लिए दो कमरे, किचिन और लेटबाथ पर्याप्त थे. दोनों ही कामकाजी थे इसलिए बच्चों और अपनी सहूलियतों को देखते हुए वे शहर में घर बदलते रहते थे. किराए का घर टोकरे में होता है जब चाहे बदल लो. हाँ, किराएदार को मकान मालिक का मिजाज़ मापते रहना होता है जिस दिन मकान मालिक का पारा ऊपर चढ़ता है उस दिन किराएदार सोचने लगता है कि अब तो उसे दूसरा घर ही देखना पड़ेगा. ये एक किरायेदार की त्रासदी होती है जिसे वे दोनों खूबसमझते थे.

उस दिन मकान मालकिन आंटी के पोते का जन्मदिन था तो आंटी थाल में दो बड़ी – बड़ी घी में डूबी बाटी, चूरमा और कटोरे में दाल ले कर आईं. इसी बहाने थोड़ी बातचीत हुई. कहने लगीं बेटा, तुम्हारे अंकल जी तो सीधे – साधे आदमी हैं. चार बेटियाँ हैं बड़ी दो जबलपुर ब्याही हैं एक यहीं अपनी ही कॉलोनी में पीछे की गली में रहती है. छोटी वाली यहीं डिजाइनिंग की कम्पनी में नौकरी करती है. छोटी वाली ब्याही तो मुम्बई है लेकिन क्या करें जवाईं से तोये बहू लगी हुई है न !अब दामाद तलाक की बात कर रहा है.

बहू प्रीति भी समय निकाल कर मीता के पास आ कर मन की बात कहने की कोशिश करती.एक दिन बोली दीदी, आप तो देखते ही हो न, मैं सारे दिन घर के काम में लगी रहती हूँ. ये पीछे वाली दीदी और छोटी दीदी आपके भैया को हमेशा भड़काती रहती हैं और फिर ये मुझ पर हाथ उठाते हैं. मैंने एक दिन आपके भैया से कह दिया कि तुम्हारी बहन के साथ ऐसा हो तब तुम्हें कैसा लगे ? इस बात पर आपके भैया ने मुझे बाल पकड़ कर मारा और बोले मेरी बहन तेरी जैसी थोड़े ही है. बहुत बार करते हैं ये ऐसे. एक बार तो मैंने छोटे नंदोई को चिठ्ठी में लिखा कि “आप ही मेरे दुःख को समझ सकते हो, ये दोनों बहनें घर में बहुत झगड़ा करवाती हैं और फिर इनके भैया का स्वभाव, गुस्सा तो जैसे नाक पर ही रखा रहता है”यह बात नंदोई जी ने घर में सबको बता दी तब से तो ये और भी ज्यादा ऐसे करने लग गए हैं. मम्मीजी कहती हैं नंदोई है तेरा सगा है, अब जा उसी के पास. मीता समझ रही थी कि प्रीति भाभी को एक भावनात्मक सहारे की ज़रुरत थी इसलिए उन्होंने नंदोई को पत्र लिखा और तब से प्रीति भाभी को ससुराल में ये कलंक मिल गया कि वह नंदोई से लगी हुई हैं. उस चिट्ठी ने उनके दुःख कम नहीं किए बल्कि और बढ़ा दिए.

मीता ऑफिस जाते- आते अपने पड़ौस की महिलाओं और बच्चों से थोड़ा – बहुत बतियाती. महिलाएं कभी – कभी तो मीता से खूब बातें करतीं.कभी – कभी आंटी की बुराई भी लगे हाथ करके, घर की टोह लेने की फ़िराक में रहतीं कि छोटी बेटी ससुराल क्यों नहीं जाती ?तीसरे नंबर की बेटी रोज़ – रोज़ क्यों आती है ? इनके घर में रोज़ – रोज़ झगड़ा क्यों होता है ? मीता इन बातों से कन्नी काटने की कोशिश करती.उसे तो उस घर में रहना था न,किरायेदार जो ठहरी ! ये पड़ोसिनें, आंटी से तो खूबप्यार से बात करतीं. उन्हें अपने घर होने वाले आयोजनों में बुलाती. हाँ, वो मीता से खूब बतियाने के बावज़ूद अपने घर में होने वाले आयोजनों में उसे नहीं बुलातीं.



एक दिन मीता की बेटी ने कहा मम्मा,आज राघव जन्मदिन है अपन शाम को राघव के घर चलेंगे न !मैं उसके बर्थडे में ये गुलाबी फ्रॉक पहन कर जाऊंगी और तुम कौन सी साड़ी पहन कर चलोगी ? बताओ न, बताओ न ! उस दिन मीता ने बेटी के सवालों से मुश्किल से पीछा छुड़ाया था. क्या समझाए वह बेटी को, यह वह खुद ही नहीं समझ पा रही थी. जब बेटी पीछे ही पड़ गई तब वह बोली“मैं भीगुलाबी साड़ी पहनूंगी, अब चुप हो जा”.
राघव पिछले चार दिन से अपने जन्मदिन को ले कर हमउम्र बच्चों के झुण्ड में इठला रहा था. मीता बेटी को क्या और कैसे समझाती कि राघव की मम्मी ने राघव के बर्थडे में अपने को नहीं बुलाया है सो उसने उमेश के साथ पार्क में बिटिया को आइसक्रीम खाने चलने के लिए राजी कर लिया. पार्क में बिटिया लगातार जिद कर रही थी कि पापा अब घर चलो, चलो, कब चलोगे ? कितनी देर बाद चलेंगे ?राघव की बर्थडे पार्टी ख़त्म हो जाएगी.
मीता और उमेश जानबूझ कर समय को पार्क में खींचे जा रहे थे. जब तक वे घर लौटे. बर्थडे पार्टी खत्म हो चुकी थी.बिटिया भी पार्क में झूले, झूल – झूल कर थक गई तो घर पर पहुँचने से पहले ही रास्ते में स्कूटर पर ही सो गई. चलो अच्छा हुआ, सो गई. मीता ने धीमे से कहा और गोद से उतार कर उसे बेड पर सुला दिया. पड़ोसियों के बीच मन में चाहे अलगाव हो लेकिन फिर भी औपचारिकता के नाते आना – जाना रहता है, रहना होता है न लम्बे समय उनके साथ.. “ कुछ अच्छे बुरे में रिश्तेदार तो बाद में आयेंगे पहले तो पड़ोसी ही काम आयेंगे” ऐसी उक्तियाँ पड़ोसी के महत्व को और बढ़ा देती हैं. किरायेदार की क्या हैसियत होती है ? चला जाता है एक दिन, घर खाली करके, उसे कॉलोनी में होने वाले आयोजनों में क्या बुलाना ? ये बात किराएदार को समय – समय पर यह अहसास करवाती रहती है कि वह किराएदार है और उसकी समाज में क्या औकात है.

सुनो! ये प्रीति भाभी को मार रहे हैं ……मीताकी आँख एक रात,सटाक – सटाक किसी डंडे की फटकार सुनते हुए खुली. उमेश भी जाग गया. उस रात मीता फिर रात भर नहीं सोई.वो धीरे-धीरे सुनने की कोशिश करते हुए कुछ-कुछ उमेश को होठों में कहती रही लेकिन सुबह उसने आंटी को ये जाहिर नहीं होने दिया कि रात को जो कुछ आपके यहाँ हुआ उसके बारे में हमें पता है.

सुबह प्रीति भाभी के पीहर से भाई और माँ गेट पर आ कर खड़े हो गए,भाभी बिना कुछ भी सामान लिए उनके साथ पीहर चली गईं और रास्ते में जिस स्कूल में दोनों बेटे और छोटी बेटी पढ़ने जाते थे उस स्कूल से अपनी बेटी को भी साथ में ले गईं.शाम को मीता ऑफिस से लौटी तो आंटी बहू की कमियाँ गिनाने लगीं और बोलीं“हमको नहीं रखनी ऐसी बहू. रात को ही उसके पीहरवालों को फोन कर दिया, भई ले जाओ अपनी बेटी को.सुबह उसका भाई और माँ आ कर ले गए,बहू अपने साथ बेटी को तो ले गई और दोनों बेटों को छोड़ गई”

मीता के अन्दर पता नहीं कितने सारे सवाल और कितना सारा क्षोभ बाहर आने को उमड़ रहा था लेकिन वो जान रही थी कि उसकी हैसियत किरायेदार की है.क्या हो जाता है कभी-कभी कि आदमी के होठ खुलने को तैयार होते हैं और फिर सिल जाते हैं. एकदम चुप्प से !

लगभग डेढ़ महीने के बाद मीता ने दूसरा घर बदल लिया. घर दूसरा लेने के बाद भी दिमाग में यह बात चलती रही कि वो प्रीति भाभी अब भी अपने पीहर में रह रही होंगीं या ससुराल आ गई होंगी ? यह जानने के लिए सात साल बाद एक दिवाली पर मीता, सपरिवार आंटी से मिलने गई. ड्राइंग रूम में प्रीति भाभी की बच्चों के साथ बात करने की धीमी – धीमीआवाज़ अन्दर से आ रही थी. प्रीति भाभी यहाँ अपने आप आई होंगी या इन्होंने बुलाया होगा या वहां से भी धकेल दी गईं पता नहीं !मीता की आँख, कानऔर दिमाग जैसे तेजी से काम करने लगे.आंटीके घर उस समय बड़ी बेटी,जबलपुर से अपने परिवार के साथ आई हुई थी जिसे आंटी ने बताया कि ये मीता है पहले अपने किराए पर रहती थी.

कुछ हालचाल जानने के बाद आंटी ने सोफे पर बैठे – बैठे ही आवाज़ लगाई प्रीति, मीता आई है चाय – पानी तो ले कर आ. प्रीति भाभी के चेहरे पर क्या लिखा था वह मीता एक नज़र में पढ़ नहीं पाई और पढ़ती भी क्या – क्या और क्या वो सही- सही पढ़ पाती ? मीता तो बस अकेले में प्रीति भाभी का हाथ,अपने हाथ ले कर बस कहना चाहती थी कि भाभी, अब आप कैसी हो ? मुझे माफ़ कर देना, उस रात मैं आपको बचा नहीं सकी !

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मोदी जिनके प्रशंसक वे दे रहे महिला पत्रकार को रेप की धमकी



महिला पत्रकार को रेप की धमकी देने वाले अपने बहुत से प्रशंसकों को खुद पीएम मोदी और अमित शाह फॉलो करते हैं।

बॉलीवुड सुपरस्टार अक्षय कुमार और भूमि पेडनेकर की फिल्म ‘टॉयलेट-एक प्रेम कथा’ को लेकर महिला पत्रकार और फिल्म समीक्षक एना वेटिकड  ने जब इस फिल्म की प्रशंसा करते हुए नरेंद्र मोदी के प्रसंग में एक टिपण्णी की तो उन्हें मोदी के प्रशंसकों ने बलात्कार की धमकी देनी शुरू कर दी. दरअसल इस महिला पत्रकार ने ट्वीट करते हुए लिखा था कि अगर इस फिल्म को सरकार की तारीफ करने के एजेंडे से ना बनाया जाता, तो फिल्म काफी बेहतर बनती। आपको बता दें कि फिल्म में एक जगह पीएम नरेंद्र मोदी की तारीफ करते हुए कहा बी जा रहा है कि हमारे प्रधानमंत्री ने शौचालय बनवाने के लिए काफी अच्छे काम किये हैं और कर रहे हैं।

पीएम मोदी का नाम जुड़ता देख प्रधानमंत्री मोदी के प्रशंसक एना को गंदी-गंदी गालियां देने लगे। कुछ यूजर्स ने तो उन्हें रेप करने तक की धमकी देनी शुरू कर दी। एना ने ट्रोलर्स के इस व्यवहार पर ट्वीट करते हुए एक सवाल किया है कि इस फिल्म की आलोचना को हिंदू हेट के रूप में क्यों देखा जा रहा है? इस पर भी उन्हें ट्रोल करते हुए एक यूजर ने यहां तक लिख दिया है कि उन्हें अपना नाम बदलकर एना वैटिकन कर देना चाहिए। इसके अलावा सोशल मीडिया पर उन्हें लेकर गाली-गलौच तक हो रही है। पत्रकार को गालियां देने वाले बहुत से ऐसे यूजर्स भी हैं जिन्हें खुद पीएम मोदी और अमित शाह फॉलो करते हैं।

प्रधानमंत्री जिन्हें फॉलो करते हैं उनके महिला विरोधी रवैयों के कारण पहले भी प्रधानमंत्री की आलोचना होती रही है, लेकिन वे ऐसे सेक्सिस्ट प्रशासकों को लगातार फॉलो किये जा रहे हैं. आल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन के नेशनल काउन्सिल की सदस्य अपराजिता कहती हैं कि ‘ऐसे लोगों को प्रधानमंत्री द्वारा फॉलो करना इस पद की गरिमा को अपूरणीय क्षति पहुँचाता है.’


फिल्म बॉक्स ऑपिस पर हिट है। हर तरफ इस फिल्म की चर्चा हो रही है। फिल्म ने अब तक 100 करोड़ से अधिक की कमाई कर ली है।

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जाने उन पांच महिलाओं को और उनकी कहानी जो तीन तलाक को रद्द कराने में सफल हुईं

शायरा बानो उत्तराखंड के काशीपुर की रहने वाली हैं. 2002 में उन्होंने इलाहाबाद के रिजवान अहमद से शादी की. उनके दो बच्चे भी हैं. शायरा के मुताबिक उनके ससुराल में उन्हें बहुत प्रताड़ित किया जाता था. उनसे दहेज की मांग की जाती, मारा-पीटा जाता. इन सबके चलते वो बीमार भी रहने लगीं. इसके बाद रिजवान ने शायरा को जबरदस्ती काशीपुर वापस अपने पिता के घर भेज दिया. साल 2015 में उनके पति ने उन्हें डाक के जरिए तलाक भेज कर रिश्ता खत्म कर लिया. तलाक को चुनौती देते हुए वे सुप्रीम कोर्ट पहुंची.

10 अक्टूबर 2015 को पति ने शायरा के पास रजिस्ट्री से तीन तलाक का फरमान भेज दिया. शायरा बानो ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके तीन तलाक, हलाला निकाह और बहु-विवाह की व्यवस्था को असंवैधानिक घोषित किए जाने की मांग की. बानो ने मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन कानून 1937 की धारा 2 की संवैधानिकता को चुनौती दी.

कोर्ट में दाखिल याचिका में शायरा ने कहा है कि मुस्लिम महिलाओं के हाथ बंधे होते हैं और उन पर तलाक की तलवार लटकती रहती है. वहीं पति के पास निर्विवाद रूप से अधिकार होते हैं. यह भेदभाव और असमानता एकतरफा तीन बार तलाक के तौर पर सामने आती है. शायरा कहती हैं, शादी के तुरंत बाद ही ससुराल वालों ने एक चार पहिया तथा ज्याैदा पैसों की मांग शुरू कर दी, लेकिन सिर्फ वही एक समस्याप नहीं थी. शुरुआत से ही, मेरे शौहर मेरी हर गलती पर मुझे तलाक की धमकी देते.



शादी के पहले दो साल तक जब मुझे बच्चा नहीं हुआ तो मेरी सास ने उनपर मुझे तलाक देने का दबाव बनाना शुरू कर दिया. शायरा अब एक 14 साल के लड़के और 12 साल की लड़की की मां हैं, दोनों की कस्टाडी उनके शौहर के पास है. शायरा कहती हैं कि रिजवान से शादी के एक साल बाद, उन्हेंल इलाहाबाद में अपनी बहन की शादी में जाने नहीं दिया गया. पिछले 14 सालों में, उन्हें् अपनी बहन के घर जाने की इजाजत नहीं मिली जोकि उनके इलाहाबाद वाले घर से सिर्फ आधे घंटे की दूरी पर रहती हैं.

शायरा कहती हैं मैं रिजवान (पति) से 6 या 7 बार अपनी नसंबदी कराने के लिए गिड़गिड़ाती मगर उन्होंने मुझे कभी ऐसा नहीं करने दिया. उनकी मां फिरोजा बेगम कहती हैं कि भावनात्मनक और शारीरिक पीड़ा ने शायरा को जड़ बना दिया है. पिछले साल से पहले, उनकी बेटी ने कभी अपना दर्द बयां नहीं किया था, तब भी नहीं जब रिजवान ने उनका गला दबाने की कोशिश की थी. फिरोजा कहती हैं कि दिमाग खराब हो गया था शायरा का टेंशन ले ले कर. यहां आकर हमने इलाज कराया.

पिछले साल अप्रैल में जब शायरा की तबियत बिगड़ी तो उनके मुताबिक रिजवान ने उनसे एक छोटा बैग पैक करने को कहा. रिजवान ने शायरा के पिता को उन दोनों से मुरादाबाद के रास्ते  में कहीं मिलने को बुलाया, जहां से वे शायरा को घर ले जा सकते. शायरा से कहा गया था कि वह पूरी तरह ठीक होने के बाद ही घर लौट सकती है. शायरा कहती हैं, ‘जब मेरी हालत में सुधार हुआ, तो मैं उन्हेंे फोन करती और कहती कि मुझे वापस ले जाओ. लेकिन वह मुझे वापस नहीं आने देना चाहते थे और मेरे बच्चों  से बात करने भी नहीं देते थे.  शायरा ने बेचैनी से छह महीने तक इंतजार किया और फिर तलाक-नामा आ गया..

याचिका में सऊदी, पाकिस्तान और अन्य मुस्लिम देशों में तीन तलाक पर प्रतिबंध का भी जिक्र किया  और कहा गया  कि भारत जैसे प्रगतिशील देश में इन चीजों की कोई जरूरत नहीं है.

आफरीन रहमान
जयपुर की 25 वर्षीय आफरीन रहमान ने भी तलाक के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उन्हें  इंदौर में रहने वाले उनके पति ने स्पीड पोस्ट के जरिए तलाक दिया था। आफरीन ने कोर्ट से न्याय की मांग की थी। आफरीन का आरोप था कि उनके पति समेत ससुराल पक्ष के दूसरे लोगों ने मिलकर दहेज की मांग को लेकर उनके साथ काफी मारपीट की और फिर उन्हें घर से निकाल दिया।

अतिया साबरी
यूपी के सहारनपुर की आतिया साबरी के पति ने कागज पर तीन तलाक लिखकर आतिया से अपना रिश्ता तोड़ लिया था। उनकी शादी 2012 में हुई थी। उनकी दो बेटियां भी हैं। अतिया ने आरोप लगाया था कि लगातार दो बेटियां होने से नाराज उनके शौहर और ससुर उन्हें घर से निकालना चाहते थे। उन्हें दहेज के लिए भी परेशान किया जाता था।

गुलशन परवीन 
यूपी के ही रामपुर में रहने वाली गुलशन परवीन को उनके पति ने 10 रुपये के स्टांप पेपर पर तलाकनामा भेज दिया था। गुलशन की 2013 में शादी हुई थी और उनका दो साल का बेटा भी है।

इशरत जहां
तीन  तलाक को संवैधानिकता को चुनौती देने वालों में पश्चिम बंगाल के हावड़ा की इशरत जहां भी शामिल थीं। इशरत ने अपनी याचिका में कहा था कि उसके पति ने दुबई से ही उन्हें फोन पर तलाक दे दिया। इशरत ने कोर्ट को बताया था कि उसका निकाह 2001 में हुआ था और उसके बच्चे भी हैं जिन्हें पति ने जबरन अपने पास रख लिया है। याचिका में बच्चों को वापस दिलाने और उसे पुलिस सुरक्षा दिलाने की मांग की गई थी। याचिका में कहा गया था कि ट्रिपल तलाक गैरकानूनी है और मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों का हनन है

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मध्यकालीन ब्रजभाषा काव्य और स्त्री रचनाकार

आरती रानी प्रजापति

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हिन्दी की शोधार्थी. संपर्क : ई मेल-aar.prajapati@gmail.com

सभ्यता के प्रारम्भ से ही दलित और स्त्री दोनों को समाज के दोयम दर्जे पर रखा गया है. ऐसे में इन दोनों वर्गों का पढ़ा-लिखा होना कैसे संभव हो सकता है? ब्राह्मणवादी, पुरुषसत्तात्मक सोच यही कहती है कि यह दोनों वर्ग कभी कुछ नहीं कर सकते. समाज में स्त्री-दलित दोनों को कम आंका जाता है. स्त्री की अस्मिता पर लगातार प्रहार किया जाता है, जिससे वह अपने को घर में बंद कर ले. स्त्री के विरुद्ध होने वाले शारीरिक, मानसिक अपराध इसी मानसिकता की देन हैं. साहित्य में भी यही धारणा रही है कि स्त्रियाँ कुछ नहीं कर सकतीं. किसी के लिए उपलब्धि के सारे अवसर बंद कर के यह धारणा बना लेना बहुत सरल काम है. किन्तु समाज की इस मानसिकता को भी स्त्रियों ने चुनौती दी है.


आज तक का लिखा गया साहित्य सवर्ण पुरुषों की देन है. यह गाथा हमारे इतिहास ग्रन्थ ही हमें बताते हैं. किन्तु क्या ऐसा संभव है कि स्त्रियों ने कभी कुछ रचा ही न हो? लोक साहित्य को जन्म देने और उसे आगे बढ़ाने का काम स्त्रियों ने ही किया है.घर-बाहर के कामों में व्यस्त स्त्रियाँ कार्यों के साथ ही कुछ न कुछ सृजन करती थीं. कामों में लगी स्त्रियों ने काम के साथ-साथ कई गीतों की रचना की जिनमें स्त्री समाज देखने को मिलता है. उनकी पीड़ा, अभिलाषाओं की अभिव्यक्ति मिलती है. ऐसे कई गीतों को अलग-अलग लोगों ने लिपिबद्ध करने की कोशिश की. हम जानते हैं कि लोक साहित्य की परम्परा को विकसित करने वाली स्त्रियाँ ही है. क्या लिखित साहित्य में भी ऐसा कुछ है जो स्त्रियों द्वारा लिखा गया?सावित्री सिन्हा कहती हैं कि:

‘सम्वत् 1000 से लेकर आज तक के विशाल साहित्य पर स्त्रियों की देन का प्रभुत्व है ऐसा तो नहीं कहा जा सकता; किन्तु वह अनुमान के अनुसार हीन भी नहीं है.’1

समाज में स्त्रियों को बोलने की आजादी नहीं है और यदि किसी तरह वह बोलती हैं तो उसे महत्वपूर्ण नहीं माना जाता. साहित्य इतिहास में स्त्रियों का न होना इस बात की ओर इंगित करता है. कुछ इतिहासकारों ने ऐसी विदुषियों के नामों का उल्लेख किया है जिनका स्त्री-साहित्य के आरम्भ के लिए महत्वपूर्ण योगदान माना जा सकता है. स्त्री द्वारा रचा गया साहित्य अधिकतर श्रुति परंपरा में ही मिलता है, वजह स्त्री को शिक्षा से दूर रखा जाना. वैदिक समय में कुछ विदुषियों के नाम स्मृत इतिहास में दर्ज हैं, जिनमें “रोमशा, लोपामुद्रा, श्रद्धा, कामायनी, यमीवैवस्वती, पौलोमी शची, विश्ववारा, अपाला, घोषा, सूर्या, शाश्वती, ममता एवं उशिज आदि ऋषिकाओं के नाम मन्त्र-द्रष्टा के रूप में प्राप्त होते हैं.”2

बौद्धकाल में वह स्त्री-पुरुष जो बुद्ध की शरण में गए उनके लेखन को थेर गाथा (पुरुष रचना), थेरी गाथा (स्त्री रचना) कहा गया. बौद्धकालीन समय से ही स्त्री रचनाकार अपनी उपस्थिति साहित्य में कराने लगी थीं.


विमलकीर्ति लिखते हैं- “थेरीगाथा में भगवान बुद्ध की समकालीन भिक्खुणियों के जीवनानुभव उन्हीं की वाणी में व्यक्त अभिव्यक्ति का अनुपम संग्रह हैं. थेरीगाथा काल के पहले भारतीय इतिहास में नारी को अपनी व्यथा को इतनी स्वतंत्रता के साथ प्रकट करते नहीं देखा जा सकता| वास्तव में थेरीगाथा नारी स्वतंत्रता को प्रकट करने वाला प्रथम ग्रन्थ है.” 3


उनकी आवाज को पुरुषवादी, ब्राह्मणवादी साहित्यकारों ने दबा दिया| कुछ-एक रचनाकार ऐसे हुए हैं जिन्होंने इन स्त्रियों के महत्व को समझा और इन रचनाओं का संग्रह किया. इसे भी दुर्भाग्य ही कहेंगे कि यह रचनाएं आज भी अपने प्रकाशन के इन्तजार में किन्ही-किन्ही पुस्तकालयों में रखी हुई अपनी अंतिम अवस्था में पहुँच चुकी हैं.

साहित्य के मध्यकाल में लिख रहीं स्त्रियाँ अपने आप में एक आश्चर्य पैदा करती हैं. उस समाज में स्त्रियाँ घर में बंद थीं| ऐसा कुछ नहीं था जिसके माध्यम से वे अपने मन की अभिव्यक्ति कर पातीं. वह ऐसा समय था जब राजमहल में रहने वाली मीरा को भक्ति करने तक का अधिकार समाज नहीं देता. मीरा अपने अधिकार के लिए लड़ाई इसलिए भी कर सकी क्योंकि वह राजघराने से थीं. मीरा के समान ऐसी बहुत सी स्त्रियाँ उस समय में रहीं होंगी जो भक्त होना या अपने अधिकारों को पाना चाहती थीं पर समाज ने उनको ऐसा नहीं करने दिया.मध्यकालीन साहित्य में लिख ब्रजभाषा में लिख रही स्त्री रचनाकारों के नाम हैं- मीरा, ताज, प्रवीनराय, रारिक बिहारी, दयाबाई, सुन्दर कुंवरी बाई, प्रताप कुंवरी बाई, सहजोबाई आदि.

इन कवयित्रियों ने सहज भाषा का प्रयोग किया| जो जैसा है उसे बिना लाग-लपेट के इन कवयित्रियों ने प्रस्तुत किया. अधिकतर ये कवयित्रियाँ कृष्ण प्रेम में डूब कर काव्य रचना कर रही थी| मीरा कहती हैं

पिय इतनी विनती सुण मोरी, कोई कहियो रे जाय
औरन सूं रस-बतिया करत हौ, हमसे रहे चितचोरी
तुम बिन मेरे और न कोई मैं सरनागत तोरी

अधिकतर स्त्री रचनाकार कृष्ण की उपासक हैं- मीरांबाई, वीरां गंगाबाई, सोन कुंवारी आदि. कुछ कवयित्रियाँ शृंगार काव्य की भी रचना करती हैं जैसे-प्रवीनराय पातुर, रूममती बेगम, शेख, तीन तरंग आदि. इन  रचनाकारों ने कृष्ण काव्य और शृंगार काव्य को प्रमुख रूप से क्यों अपनाया जबकि वहां रामभक्ति और सूफी काव्य भी उपलब्ध था. क्या इसकी एक वजह सामाजिक तौर पर स्त्रियों का शोषण है? क्या उन्हें समाज स्वतंत्रता नहीं देता कि वह अपने अधिकारों, घर से बाहर निकलने की सोचें भी, इसलिए सोलहवीं सदी की स्त्री रचनाकार कृष्ण काव्य को अपनाती हैं? यथा-

“कृष्ण काव्य में कृष्ण का परम सुन्दर और सरस रूप ही लिया गया है, वे परम मनोहर और परम प्रेमी तथा शीलवान नायक के ही रूप में विशेषतया चित्रित किये गए हैं. उनका प्रेम यद्यपि लौकिक होता हुआ अलौकिक रहा है साथ ही अन्य भावों के साथ कृष्ण भक्ति में दाम्पत्य अथवा माधुर्य भाव की ही विशेषता रही है यही सब ऐसे प्रमुख कारण हैं जिन्होंने हमारी बहुत सी देवियों को कृष्ण काव्य की ओर समाकृष्ट कर उन्हें उसकी ही सुधा धार में निमम कर रक्खा था.”4

कृष्ण के प्रेम में पड़कर ताज कवयित्री अपने धर्म तक को छोड़ देने से नहीं चुकती| प्रेम जीवन का ऐसा तत्व है जो स्त्री को स्वतंत्रता देता है. और प्रेम यदि ईश्वर से ही हो जाए तो मनुष्य सब छोड़ ही देता है. ताज कहती हैं-

नन्द के कुमार, कुर्बान ताणी सूरत पर,
हौं तो तुरकानी हिन्दुआनी ह्वौ रहूँगी मैं

मीरां की तरह प्रताप बाला ने भी कृष्ण भक्ति को अपनाया और उसके प्रेम में रंग करा अपने को धन्य माना साधारणत: इनकी रचनायें अच्छी हैं, और उनमें इनकी भक्ति-संलग्नता दिखाई देती है. वे लिखती हैं

 सखी री चतुर श्याम सुन्दर सों मोरी लगन लगी री
लाख कहो अब एक ण मानूं उनके प्रीति पगी री 5



ऐसी मान्यता है कि पुरुषों ने ही चारण कार्य किया है किन्तु मध्यकालीन साहित्य में उपस्थित झीमा इस धारणा को खारिज करती हैं. सावित्री सिन्हा अपनी पुस्तक मध्यकालीन हिन्दी कवयित्रियाँ में लिखती हैं-

“झीमा की कहानी उस अंधकारमय नारी के इतिहास में जुगनू की चमक की भाँति दिखाई देती है. कई युद्धों के अवसर पर उसने चारिणी का कार्य किया. कला और सौन्दर्य की कोमलता में राजनीति और युद्ध की कटुता मिलाकर उसने एक नई भावना को जन्म दिया.”6

सोलहवीं सदी के साहित्य को ध्यान से देखा जाए तो उसमें स्त्रियों द्वारा ऐसे अनेक काम मिलेंगे जिसके लिए पुरुष ही स्वीकार किए जाते हैं. कई रचनाएं ऐसी भी हैं जिस पर रचनाकार ने अपनानाम नहीं दिया. पुरुष रचनाकार के साथ ऐसी समस्या नहीं ही होती. वे या तो अपनी रचना पर अपना नाम स्वयं लिख देते हैं या उनके पदों में उनके नाम का उल्लेख होता है. स्त्री रचनाकार ऐसा नहीं कर पाती| पद ही उनके स्त्री अस्तित्व का बोध करवाते हैं. इन रचनाकारों ने कृष्ण-राम-शृंगार को अपना काव्य विषय बनाया.

साहित्य में आलम के साथ शेख का नाम भी लिया जाता है. शेख ने बहुत नहीं लिखा उनका कोई अलग गांठ प्राप्त नहीं होता पर आलम की रचनाओं के साथ उनकी रचना संययुक्त रूप से देखी जा सकती है. कई विचारक मानते हैं की शेख नाम की कोई रचनाकार हुई ही नहीं है. ऐसा कहना स्त्री के अस्तित्व को पूरी तरह नकार देना है. स्त्री है इसलिए उसे सिरे से खारिज कर दो क्या ऐसा किसी पुरुष के साथ भी किया जाता है? शेख की रचना उनकी प्रतिभा का प्रमाण हैं. इसलिए आलम जैसे कवि भी शेख के कायल हुए बिना नहीं रह सके.


शेख के लिए करुना शंकर शुक्ल कहते हैं-शेख कविता में किसी से आगे नहीं, तो बहुत पीछे भी नहीं दिखाई देती. इनके स्त्री ह्रदय ने कही-कहीं नायिकाओं के वर्णन में बहे अनूठे चमत्कार का प्रदर्शन किया है. नायक नायिकाओं के प्रेम को जागृत करने के लिए शेख ने जिन उक्तियों का आश्रय लिया है, वे सजीव होने के साथ ही साथ चमत्कार-पूर्ण भी हैं. भेल ही शेख की कविता में शीमित कल्पना हो, किन्तु शेख में अपने ह्रदयगत भावों को कविता में प्रस्फुटित करने की सफल शक्ति अवश्य थी.

पुरुष कवियों ने भरपूर मात्रा में नख शिख अंगों का वर्णन किया है.  पर खोज बताती है किमध्यकाल की स्त्री रचनाकार भी इस कार्य में पीछे नहीं थी. सीता के नेत्रों का वर्णन रघुराज कुंवरी कुछ इस तरह करती हैं.
मृग-मनहारे, मीन खंजन निहारि वारे, प्यारे रतनारे कजरारे अनियारे हैं.

ब्रजभाषा काव्य की प्रमुख कवयित्रियों में दयाबाई और सहजो बाई का नाम भी आता है इन्होंने भक्ति के पद लिखे| दयाबाई के लिए करुणाशंकर शुक्ल लिखते हैं- वे ईश्वर प्रेम और उसकी पीड़ा में इतनी डूबी हुई दिखाई देती हैं, की उन्हें उसके आगे संसार की क्या, अपना भी ध्यान नहीं है. यथा :


दया प्रेम प्रगट्यो तिन्है, तन की तनि न संभार 7  

संत कवयित्रियों ने कबीर आदि संत कवियों की भांति गुरु की महिमा का वर्णन अपने काव्य में किया. सहजो कहती हैं-


‘सहजो’ गुरु दीपक दियौ, रोम रोम उजियार
तीन लोक द्रष्टा भयो, मिट्यो भरम अंधियार||8  

इस सभी कवयित्रियों से अलग प्रवीण राय हैं. अधिकतर कवयित्रियों की भाषा जहाँ सहजता  लिए हुए है वहीं प्रवीण की भाषा में काव्य शास्त्र के सारे तत्व मौजूद हैं. प्रवीण राय की भाषा दरबारी कवियों जैसी है. कारण वह दरबार में रहने वाली स्त्री थी. ‘उनकी कविता की शब्द योजना और भावों को परिस्फुटित करने वाली उनकी उपमाओं को देखकर यह कहना पड़ता है, कि प्रवीन राय काव्य के अंगों से भली भाँति परिचित थीं, और उनमें भावों को प्रगट करने की पर्याप्त क्षमता थी. ’ 9

विनती राय प्रवीन की, सुनिए साह सुजान||
जूठी पतरी भखत हैं, बारी-वायस, स्वान|| 10

एक ओर कवयित्रियों ने ईश्वर की उपासना की है तो, दूसरी ओर पति को परमात्मा मानने वाली स्त्रियाँ भी मध्यकाल में हुई. आज नारीवादी विमर्श के कारण हम इस बात को भले ही न समझे पर एक स्त्री के लिए खासकर मध्यकालीन स्त्री केलिए जहाँ परकियाओं की पूरी कतार है अपना पति चाहे जैसा हो अच्छा ही होगा.आज समाज हमें विकल्प प्रस्तुत कर रहा है लेकिन तब अधिकतर स्त्रियों के पास पति का कोई विकल्प नहीं था| रानी रघुवंश कुमारी लिखती हैं

पग दाबे ते जीवन-मुक्ति लाही|
विष्णु पद  सैम पति पद-पंकज छुवत परम पद होवे सही 11



हिन्दी साहित्य के इतिहास में सिर्फ  मीरां, महादेवी का नाम लिया जाता है. जबकि सिर्फ मध्यकाल में ऐसी बहुत सी कवयित्रियाँ हैं जो लिख रही थी. उन्होंने क्या लिखा, कैसा लिखा यह अलग विषय है लेकिन प्रत्येक साहित्य को समान सौन्दर्य के प्रतिमानों पर नहीं उतार सकते. सबकी अपनी विशेषता और जरुरत होती है और जब लिखने वाले भी पुरुष आलोचक भी वही तो सोचने की जरुरत है की किसे साहित्य में वो स्थान दे रहे हैं किसे नहीं. मध्यकालीन साहित्य में यदि सिर्फ ब्रजभाषा की बात की जाए तो बहुत सी स्त्रियाँ लेखन करती मिल जायेंगी. जरूरत है की उन स्त्रियों पर काम किया जाए उनके यदि एक पद भी उपलब्ध होते हैं तो उसका भी मूल्य समझा जाए.


संदर्भ सूची
 1.मध्यकालीन हिन्दी कवयित्रियाँ- सावित्री सिन्हा, पृष्ठ-2  
 2.हिन्दी साहित्य का आधा इतिहास, पृष्ठ-18 
 3.थेरी गाथा, सम्पादक और अनुवादक-डॉ विमलकीर्ति, पृष्ठ-3    
 4.हिन्दी काव्य की कलामयी तारिकाएँ, पृष्ठ-3 
 5.वही-पृष्ठ-85
 6.मध्यकालीन हिन्दी कवयित्रियाँ-पृष्ठ 28
 7.हिन्दी काव्य की कलामायी तारिकाएँ-52 
 8.वही- 49 
 9.मध्यकालीन हिन्दी कवयित्रियाँ पृष्ठ-24  
 10.वही, पृष्ठ-27 
 11.हिन्दी काव्य की कलामयी तारिकाएँ- पृष्ठ-88 


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फिल्म कक्कुज (पखाना) की निर्माता दिव्या भारती किसके निशाने पर ?

कुमुदिनी पति 


विवाद , समाज और सियासत,
दिव्या भारती अपने गृह-राज्य तमिलनाडु से बाहर रहने के लिए मजबूर कर दी गईं हैं।उनके कुछ करीबी मित्रों के अलावा किसी को नहीं पता कि वह कहां हैं और किस हालत में जी रही हैं। हालांकि पिछले दिनों वे इरोम शर्मिला की शादी में वधु सखी के तौर पर देखी गईं। उनके ऊपर जातीय हिंसा व वैमनस्य पैदा करने का आरोप लगाकर 3 अगस्त कोमदुरई में केस भी दर्ज कर दिया गया है।

मैला ढोने वाली महिलाओं के लिए प्रधानमंत्री को ख़त

क्या गुनाह है इस 28 वर्षीया महिला फिल्मकार का, जिसको लगातार ‘स्टाक’ किया जा रहा है, बलात्कार और हत्या की धमकियां मिल रही हैं और सुरक्षित रहने के लिए अपनों से दूर अज्ञातवास में रहना पड़ रहा है?
सवाल उठाना, सच बोलना और ज़मीनी हक़ीकत को उजागर करना आज सबसे बड़ा जुर्म है। दिव्या माले से जुड़ी हैं। वह कहती हैं कि अलग-अलग नाम से संगठन बन रहे हैं, जो दक्षिणपंथी विचारधारा का प्रतिपादन कर रहे हैं। दिव्या का मानना है कि ‘‘पुट्टिया तमिलघम पार्टी भाजपा का एक ‘फ्रन्ट’ हैऔर उसका नेता कृष्णास्वामी  दलितों को पिछड़ी जाति की श्रेणी में शामिल करना चाहता है, इसलिए उसे लगता है कि जाति का नाम बदनाम हो रहा है।’’दिव्या पर आरोप है कि वे पाल्लर जाति को बदनाम कर रही हैं।

फिल्म निर्माता दिव्या भारती

समाज का सच सामने लाती है ‘कक्कूज़’


पर दिव्या की डॉक्युमेंट्री फिल्म ‘कक्कूज़’ आज जिस बात को सामने ला रही है, उसे स्वीकारने से बचा नहीं जा सकता। यह फिल्म भारत के सबसे उन्नत राज्य तमिलनाडु के करीब 25 जिलों में हाथों से मैला ढोने व सीवर साफ करने वाले सफाई कर्मियों के जीवन की दुर्दशा को उजागर करती है और‘स्वच्छ भारत’ के भीतर छिपी घिनौनी सच्चाई का पर्दाफाश भी करती है। फिल्म में बताया गया है कि अरुनदतियार, चकिलियार, इरुलार, कुरवार व अन्य दलित उप-जातियां भी इस काम को करने के लिए मजबूर हैं। ‘कक्कूज़’ का मतलब है ‘पाख़ाना’। दिव्या ने अपनी फिल्म में अनेकों महिला और पुरुषसफाई कर्मियों से बात ही नहीं की, बल्कि उनके कार्यस्थल पर जाकर सीवर की सफाई, पाखानों की सफाई, कूड़ों के ढेरों की सफाई, नालों से पॉलिथीन और महीनों का सड़ा कचरा निकालना और उनकी झुग्गियों की स्थिति को ‘शूट’ किया है, जिसमें उन्हें एक साल लगा। वह कहती हैं  कि वह कानून की स्नातक होने के नाते जान पाती हैं कि 2013 में ‘मैनुअल स्कैवेंजिंग’ पर प्रतिबन्ध के बावजूद यह काम धड़ल्ले से चल रहा है। फिल्म देखने के बाद शायद खाना तक खाना मुश्किल लगे, तो आप कल्पना कर सकते हैं कि ये सफाई कर्मी काम के बाद खाना कैसे खा पाते होंगे; कई बार तो उन्हें दिन भर उल्टियां होती हैं।

सीवर में मौत: सर्वोच्च न्यायलय की अवहेलना


दिव्या ने मदुरई, चेन्नई, कोइम्बाटूर, थिरुप्पूर, रामनाथपुरम, थिरुनलवेली जैसे तमाम जिलों में जाकर 20 परिवारों से बातचीत की, जिनके पति, भाई या पुत्र सेप्टिक टैंक साफ करने के लिए अन्दर घुसे और फिर वापस बाहर नहीं आ सके। वे फिसलकर अन्दर ही समा गए, पर अधिकारी ठेकेदारों और सुपरवाईज़रों पर आरोप लगाकर मुक्त हो गए; किसी को सज़ा नहीं मिली। घर की औरतें 10 लाख के मुआवज़े के लिए दलालों और सरकारी अफसरों के पास भटकती रहीं और अक्सर पैसे सबूत के अभाव में नहीं मिले। कभी पैसे मिले तो दलालों ने बड़ा हिस्सा हड़प लिया। सरकारी अफसर अक्सर यह साबित करने में लग जाते कि मौत किसी अन्य कारण से हुई थी। कई बार तो दौड़-भाग करने के बादकेवल 1.5-2 लाख रुपये से अधिक नहीं मिले। घर की औरतें कहती हैं कि जब कमाने वाला ही चला गया तो पैसे लेकर क्या होगा? वे पूछती हैं, ‘‘क्या इस खतरे वाले काम को करने के लिए हम ही बचे हैं; क्या हमारे जान की कोई कीमत नहीं, जो कीड़े-मकोड़ों की भांति मरते रहें? कई कर्मचारी आंध्रप्रदेश से पलायन करके प्रदेश में इस काम को कर रहे हैं, तो उन्हें लोकल समर्थन नहीं मिलता।
भारत में नई सरकार का नया जुमला है ‘स्वच्छ भारत’। तो प्रधानमंत्री सहित कुछ मंत्री, नेता व अधिकारी साफ सड़कों पर झाड़ू फेरते हुए फोटो खिंचवाते हुए मिल जाएंगे। पर कोई इन मृत सफाईकर्मियों के घरों के अंदर पांच मिनट भी बैठ न सकेंगे, उनके दुख-दर्द को बांटना तो बहुत दूर की बात है।

लेखिका कुमुदिनीपति

आत्म-सम्मान का प्रश्न


दिव्या ने फिल्म में इन दलितों के आत्म-सम्मान का प्रश्न भी बहुत संजीदगी से उठाया है-कैसे हर जगह उनका सफाई का काम ही प्रधान बन जाता है। कुछ कर्मियों ने बताया कि उनके बच्चों को स्कूलमें भी सफाई कर्मी समझा जाता है, तो जब पाखाना जाम हो जाता है तो तुरंत प्रशासन उन्हें बुलाकर सफाई करवाने लगता है। उन्हें अछूत समझकर अध्यापक सहित दूसरे बच्चे हेय दृष्टि से देखते हैं।कोई उनके पास बैठना नहीं चाहता, इसलिए वे स्कूल में भी अलग बैठते हैं। इसके कारण बच्चों को स्कूल जाने का ही मन नहीं करता।

कई माताओं ने रोते हुए कहा, ‘क्या हमारी पीढ़ियां कभी इस नारकीय ज़िन्दगी से नहीं निकल पाएंगी?’ उन्हें लगता है कि पढ़कर उनके बच्चे इस कुचक्र से आखिर निकलें भी तो कैसे-वे आरक्षण के बारे में कहते हैं कि उससे भी क्या लाभ हुआ जब उनका सामाजिक दर्ज़ा कभी ऊपर नहीं उठ सकता? कई कर्मचारी महिलाओं ने बताया कि महिलाओं और लड़कियों के मासिक के कपड़ों को, अस्पतालों की गन्दगी और होटलों के सड़े खाने व मरे चूहों को उठाने से संक्रामक रोगों का खतरा रहता है। यह सारा काम हाथ से करना पड़ता है।

देखा जाए तो यह बड़ी विडम्बना है कि आधुनिक भारत के आधुनिकतम राज्य में सूखे शोचालयों की कमी है, खुले में हर प्रकार का कूड़ा फेका जाता है, सीवर साफ करने के लिए मशीनों का प्रयोग नहीं होता है और समाज के एक बड़े हिस्से को इसलिए गंदा माना जाता है कि वे अन्य लोगों के घरों की गंदगी साफ करते हैं। महिलाओं ने बताया कि काम से घर आने पर कई बार बच्चे भी घिना जाते हैं और उनके हाथ से खाना नहीं लेते। अक्सर उनकी बस्तियां शहर से बाहर होती हैं क्योंकि तथाकथित सभ्यलोग उनके आस-पास भी नहीं रहना चाहते।

कक्कूज़ फिल्म में कई सामाजिक कार्यकर्ताओं, ट्रेड यूनियन नेताओं और कर्मचारी नेताओं से बातचीत की गई है। दलित नेता कहते हैं कि डॉ. भीमराव अम्बेडकर की तस्वीरें तो बहुत जगह लगीं हैं पर जाति-विहीन समाज की उनकी परिकल्पना को साकार नहीं किया गया। ट्रेड यूनियन नेता भी कहते हैं कि इतने सारे यूनियन बन चुके हैं, लड़ाई लड़कर कई बार मुआवजा दिलाया जाता है और पगार बढ़वा लिया जाता है, पर सामाजिक सम्मान की लड़ाई जीतने में अभी बहुत समय लगेगा। कर्मचारी बताते हैं कि ट्रेड यूनियन और दलित संगठनों के नेता भी दलाली करते हैं और पैसा कमाते हैं। ‘कक्कूज़’ केअन्तिम सीन में एक तरफ स्वच्छ भारत अभियान के तहत प्रधानमंत्री तक लम्बी झाड़ू उठाए हुए हैंऔर दूसरे फ्रेम में मैला ढोने वाले हाथों से मल साफ कर रहे हैं।



दिव्या के खिलाफ साजिश?
एक साजिश के तहत पहले जुलाई 25 को दिव्या को पुलिस उसके अलंगाकुलम के घर से उठा ले गई।और यह गिरफ्तारी 2009 के एक पुराने केस में दो बार हाज़िर न होने के चलते की गई। दिव्या को जमानत तो मिल गई पर नया केस दर्ज हो गया। हालांकि 3 अगस्त वाले नये केस में मद्रास हाईकोर्ट ने स्टे लगा दिया है लेकिन धमकियां मिलनी बंद नहीं हुईं। उधर, सरकार अलग नाराज है कि जो बातें समाज में ढकी-छुपी हैं उन्हें उठाकर समाज में उथल-पुथल मचाने का हक दिव्या को कैसे प्राप्त हो गया? पर कौन इसका जवाब देगा कि आज भी भारत में 1 लाख 80 हज़ार 6 सौ सत्तावन मैनुअल मेहतर परिवार हैं?

(लेखिका सामाजिक और राजनीतिक विषयों के अलावा महिला अधिकारों के लिए सजग तौर पर लिखती और लड़ती रही हैं। )


साभार:janchowk.com


स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
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9 बिन्दुओं में समझें सुप्रीम कोर्ट का तीन तलाक पर फैसला



स्त्रीकाल डेस्क 


आज, 22 अगस्त, 2017 को देश के सर्वोच्च न्यायालय में मुस्लिम समुदाय ने  प्रचलित तीन तलाक के मुद्दे पर अपना फैसला सुनाया आइये 9 बिन्दुओं में समझते हैं फैसला और कोर्ट रूम गतिविधियों को 


1. 5 संवैधानिक बेंच के तीन जज कुरियन जोसफ, यूयू ललित और आरएफ नरीमन ने  तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया. चीफ जस्टिस जेएस खेहर और अब्दुल नजीर ने अ संसद को इस बारे में कानून बनाने के लिए निर्देश दिया. स्पष्ट है कि बहुमत इसे असंवैधानिक मान रहा था.

तीन तलाक, समान नागरिक संहिता और मोदी सरकार:

2. तीन तलाक का मामला मुस्लिम धर्म की महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन माना जाता है. संवैधानिक बेंच में हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और पारसी धर्म के पांच जज शामिल थे. लेकिन कोई महिला नहीं थी.

मेरा शबाब भी लौटा दो मेरे मेहर के साथ

3. आल इंडिया  मुस्लिम  पर्सनल बोर्ड ने कोर्ट को इस मामले में हस्तक्षेप के योग्य नहीं बताया था. यही उसका पक्ष था, फैसला प्रायः इसके अनुरूप आया. मामला संसद के पाले में. बोर्ड के वकील कपिल सिब्बल ने दलील दी थी  अनुच्छेद-25 यानी धार्मिक स्वतंत्रता के तहत परंपरा की बात है और संविधान पर्सनल लॉ को संरक्षित करता है. 1400 साल से आस्था चली आ रही है. सरकार चाहे तो पर्सनल लॉ को रेग्युलेट करने के लिए कानून बना सकती है. हिंदुओं में आस्था है कि राम अयोध्या में पैदा हुए हैं. ये आस्था का विषय है. अनुच्छेद 14 स्टेट कार्रवाई की बात करता है पर्सनल लॉ की नहीं। सिब्बल ने कहा, ‘तीन तलाक पाप है और अवांछित है। हम भी बदलाव चाहते हैं, लेकिन पर्सनल लॉ में कोर्ट का दखल नहीं होना चाहिए. निकाहनामा में तीन तलाक न रखने की शर्त के बारे में लड़की कह सकती है कि पति तीन तलाक नहीं कहेगा. मुस्लिम का निकाहनामा एक कॉन्ट्रैक्ट है. सहमति से निकाह होता है और तलाक का प्रावधान उसी के दायरे में है.

“चकरघिन्नी” : तीन तलाक़ का दु:स्वप्न

4. सुप्रीम कोर्ट ने यह चिहिनित किया कि पाकिस्तान सहित कई इस्लामिक देश तीन तलाक की अनुमति नहीं देते तो भारत में क्यों नहीं?

5. पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने पहली बार इस पर विचार किया कि तीन तलाक गैर इस्लामिक है.

6. तीन तलाक के खिलाफ अपना पक्ष रखने वाले वकीलों ने इसे महिला के मूलभूत अधिकारों का हनन बताया.

7. मोदी सरकार ने तीन तलाक के खिलाफ कोर्ट आये पेटिशनर के पक्ष में अपनी दलील दी और इसे असंवैधानिक बताया.

मर्दाना हकों की हिफ़ाजत करता मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड

8. सुनवाई के दौरान  कुरान, शरीयत और इस्लामिक कानून के इतिहास पर जोरदार बहस हुई। साथ ही संविधान के अनुच्छेदों पर विस्तार से दलीलें पेश की गईं। संविधान के अनुच्छेद-13 (संविधान के दायरे में कानून) , 14 (समानता का अधिकार), 15 (जेंडर, धर्म, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव के खिलाफ अधिकार), 21 (मान सम्मान के साथ जीने का अधिकार) और 25 (पब्लिक ऑर्डर, हेल्थ और नैतिकता के दायरे में धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार) पर बहस हुई.

प्रधानमंत्री को मुस्लिम महिला आंदोलन का पत्र/ तीन तलाक से निजात की मांग

9. याचिकाकर्ता शायरा बानो के वकील अमित चड्ढा ने कहा कि अनुच्छेद 25 में धार्मिक प्रैक्टिस की बात है। तीन तलाक अनुच्छेद 25 में संरक्षित नहीं हो सकता. धार्मिक दर्शनशास्त्र में तीन तलाक को बुरा और पाप कहा गया है. ऐसे में इसे धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के तहत संरक्षित कैसे किया जा सकता है. राम जेठमलानी ने तीन तलाक के खिलाफ दलील पेश करते हुए कहा कि अनुच्छेद-13 के तहत कानून की बात है.  जो भी कानून है वह संविधान के दायरे में होगा. मूल अधिकार का जो कानून, रेग्युलेशन या परंपरा उल्लंघन करेगा वह मान्य नहीं हो सकता.

जानें न्यायालय के निर्णय से कैसे महिलायें लटकीं अधर में, बढ़ेगी उनकी परेशानी

स्त्रीवादी कानूनविद  अरविंद जैन से स्त्रीकाल की बातचीत पर आधारित


सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों, जस्टिस जेएस खेहर, जस्टिस कुरियन जोसफ, जस्टिस यूयू ललित, जस्टिस आरएफ नरीमन और जस्टिस अब्दुल नजीर की बेंच ने शायरा बानो, मुस्लिम वीमेनस क्वेस्ट फॉर इक्वालिटी, आफरीन रहमान, गुलशन परवीन, इशरत जहां, अतिया सबरी आदि  द्वारा दायर स्पेशल लीव पेटीशन, जिसमें भारत सरकार, जमायते-उलमा-ए-हिन्द आदि पार्टी बनाये गये थे की सुनवाई करते हुए 22 अगस्त, 2017 को तुरत दिया जाने वाले तीन तलाक को समाप्त करने का निर्णय दिया.

इंडिया टाइम्स से साभार

9 बिन्दुओं में समझें तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला 

395 पेज के ऑर्डर में तीन तलाक को निरस्त करने का फैसला तीन-दो के बहुमत से लिखा गया है. 1937 के शरियत लॉ में यह प्रोविजन (तीन तलाक का) सेक्शन 2 में था, जिसे 5 जजों के बेंच ने आज निरस्त कर दिया. जस्टिस जेएस खेहर और जस्टिस अब्दुल नजीर ने इस प्रोविजन को असंवैधानिक नहीं माना लेकिन यह भी कहा कि यह चूकि महिलाओं के हितों के खिलाफ है इसलिए इस पर सरकार और संसद को क़ानून बनाना चाहिए. इस बीच उन्होंने छः महीने के लिए इस पर रोक लगा दी तथा कहा कि इसे आगे भी बढ़ाया जा सकता है. जस्टिस जोसफ ने लिखा कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही शमीम आरा मामले में कहा है कि शरीयत क़ानून ठीक नहीं है और गैरइस्लामिक है तो फिर बाकी मुद्दों पर बात करने की जरूरत ही नहीं है, इसी आधार पर यह असंवैधानिक भी है. जस्टिस नरीमन और जस्टिस ललित ने कहा कि 1937 का क़ानून 1950 में संविधान बनने के बाद पूरी तरह संविधान के दायरे में आ गया. यह मर्दों को अवैध रूप से तलाक देने का अधिकार देता है इसलिए संविधान की धारा 14 में उल्लिखित मौलिक अधिकारों का हनन करता है, इसलिए यह असंवैधानिक है.

तीन तलाक, समान नागरिक संहिता और मोदी सरकार:

मेरा कहना है कि सरकार द्वारा क़ानून बनाने का जो आदेश दो जजों का है, वह इस पूरे जजमेंट के अल्पमत का निर्णय है, अब सरकार पर निर्भर करता है वह क़ानून बनाये या न बनाये. बहुमत ने कानून बनाने का कोई निर्देश तो दिया नहीं सिर्फ तीन तलाक को निरस्त कर दिया. अब चूकि तीन तलाक का प्रोविजन ही आपने खत्म कर दिया तो कोई और क़ानून तो है नहीं, न तलाक देने का, न लेने का कोई प्रावधान. कोई यदि तीन तलाक दे दे तो फिर सजा का कोई प्रावधान कहाँ है? सारी चीजें हवा में हैं. पति तलाक देगा और औरत बोलेगी कि यह असंवैधानिक है तो पति बोलेगा जाओ कोर्ट. कोर्ट क्या करेगी, क़ानून ही नहीं है. पहले जो मौलवी करते थे, पंच  करते थे, घर-परिवार के लोग करते थे, वे कहेंगे हम भी कुछ नहीं करेंगे जी. पहले मौलवी वैलिड या इनवैलिड कह तो देते थे, अब वे भी नहीं कहेंगे. अब सरकार का क़ानून बनाने की प्रक्रिया जटिल है. क़ानून ड्राफ्ट होगा, समितियां देखेंगी, राज्यों की राय ली जायेंगी. कुछ राज्य स्वीकार करेंगी, कुछ नहीं करेंगी, मामला लटकेगा. तो फिर आप उस कानून को बनायेंगे भी तो 2 साल में बनेगा 3 साल में बनेगा. और अगर सरकार बहुत सीरियस है तो वह ऑर्डिनेंस ला सकती है. भजापा की जो फितरत है उसके अनुसार ये कानून बनाने का एक नाटक करेंगे लेकिन अंततः कोई कानून नहीं बनायेंगे यह सच्चाई है.

मेरा शबाब भी लौटा दो मेरे मेहर के साथ

महिलायें पहले से बदतर स्थिति में हैं. पहले कम से कम पता होता था कि तलाक मिल गया, तो दूसरी शादी कर सकती थीं, मुक्त हो सकती थीं,  नौकरी कर सकती थीं,  जो भी करना था कर सकती थीं. अब तलाक मिलेंगे नहीं लेकिन घर में ही नमक की सप्लाई बंद कर देंगे, हम उन्हें रोटी कपड़ा मकान नहीं देंगे, जो दूसरी सुविधाएँ हैं वह नहीं देंगे, भूखी मारेगी घर में. तलाक देंगे नहीं और सुविधाएं सारी छीन लेंगे.  तलाक तलाक दिए बिना दूसरी शादी कर लेंगे. बहुविवाह तो वहां पहले से ही है अब कोई डर भी नहीं रहेगा. अब तलाक ही नहीं होगा तो मेंटेनेंस भी नहीं है या मुकदमे चलते रहेंगे सालों साल लड़ते रहेंगे, 20 साल तक लड़ेंगे.  तो मुझे लगता है कि ये सदियों पुराना तीन तलाक (तालाब) का क़ानून था, उसे बंद कर दिया. नई प्रक्रिया में गड्ढा तो खोद दिया लेकिन उसमें पेड़ (नया क़ानून) कब लगेगा कोई नहीं जनाता. इस बीच बारिश के मिट्टी और पानी से कीचड़ होने का भय है और किसी के भी गिरने का ख़तरा बना रहेगा- टोटल मेस.

“चकरघिन्नी” : तीन तलाक़ का दु:स्वप्न

मैं यह पूछता हूं कि जैसा सरला मुद्गल केस में सुप्रीम कोर्ट ने समान नागरिक संहिता बनाने के लिए कहा था उसे बनाने की बात भाजपा सरकार क्यों नहीं करती है? समान नागरिक संहिता बनती है तो धर्म और जाति से परे सारे पर्सनल क़ानून खत्म हो जायेंगे. जो भी क़ानून बने, तलाक, विवाह, मेंटेनेंस आदि के वह सभी महिलाओं के लिए- हिन्दू महिलाओं के लि , मुस्लिम महिलाओं के लिए, ईसाई महिलाओं के लिए भी, जैन महिलाओं के लिए भी समान हो. तब जाकर कहीं समानता बनेगी.

प्रधानमंत्री को मुस्लिम महिला आंदोलन का पत्र/ तीन तलाक से निजात की मांग

कॉमन सिविल कोड बनाने की बात तो बहुत करती रहती है सरकार या भाजपा ,पर कितनी सीरियस है अभी तक तो नहीं दिखाई देता. वरना तो 3 सालों में वह सिविल कोड बनने में कितनी देर लगाती. वे अपनी राजनीति कर रहे हैं बुर्के की आड़ में वोट बैंक की राजनीति. बहुमत सत्ता में है इसलिए अल्पसंख्यकों की रिवाजों को, धर्मों को कटघरे में खडा किया जा रहा है, इनका इरादा इतना भर है.