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कर्मानंद आर्य की कविताएँ

कर्मानन्द आर्य

कर्मानन्द आर्य मह्त्वपूर्ण युवा कवि हैं. बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय में हिन्दी पढाते हैं. संपर्क : 8092330929



बलात्कारी कहाँ से आये थे द्रोपदी !

फँसी हुई
जैसे फड़फड़ाती है बंसी की मछली
वैसे फड़फड़ा रही है देह

मिट्टी होने का अर्थ
पानी होने का अर्थ
हवा होने का अर्थ
बदल रहा है धीरे धीरे

एक पति, दो पति, तीन पति
चार पति, पांच पति
क्या फर्क पड़ता है
कंचन काया के लिए

द्रोपदी चीखती है
मिट्टी होने के लिए
पानी होने के लिए
हवा होने के लिए

और देह छटपटाती है लगातार


लड़की

मैं खुद में ही जवान होती
एक भारतीय लड़की
जिसे सन्दर्भ की
शब्दार्थ की आशा नहीं

दोस्तों के संग-संग घूमना
बतियाना या छत पर जाना
सब पर ही हावी है
मेरा शारीरिक दोष

उपेक्षा अनदेखी के बीच खिली
मेरी अपनी ही जिन्दगी में
कितना अघुलनशील है
मेरा अपना ही अस्तित्व

बचपन को लेकर
नही है,
अतिरिक्त उच्छवास मेरे पास
न ही कोई स्पर्धा है
अपने ही छोटे भाई से
पर हाँ, मैं समझने लगी हूँ
मां की चिंतायें
इन दिनों माँ मुझे चुन्नी ओढ़ने को क्यों कहती है


देह

जिन्दगी का एहसास
अधूरेपन में खो गया
द्रष्टा और दृश्य
एकाकी हो गया

तुम्हारा शब्द
जिसको न मिल पायी पूर्णता
भावना की कोख
न उर्वर हो पायी
न बो पायी, शब्द बीज

प्यार पलता रहा
चलता रहा
अहर्निशं सेवामहे

तुमने जो पूछा था
यक्ष प्रश्न
देह का अर्पण क्या
प्रेम नही
मै सब जानता था,पर
तवायफ की देह!

शब्द वृत्त का आज भी
अपराधी हूँ

सीता स्वयंवर की तरह
मैंने शब्द चुना था
जिसे मेरे सिले होंठो ने
अचानक बुना था

शब्द दृश्य थे
हम द्रष्टा
था सत्य पर कड़वा

सच बोलो,
प्रिय बोलो
पर न बोलो
अप्रिय सच
जिसे
तब हमने जाना था
अब जी रहे हैं गीले अहसासों के साथ

चरित्रहीन

क्या तुम जानती हो/
चरित्रहीन होने का मतलब
शायद!
पर तुम्हारे सिवा/सब जानते हैं
अधूरे प्रेम की प्रस्तावना लिखना

तुम्हारे लिए 

धरती जो महकती है
लोबान की खुशबू से
घर जो कस्तूरी की गंध से भर आता है
वह कमरा जो महकता है
दुनिया के सबसे बेहतरीन इत्र से
चाहता हूँ तुम्हें देना
कई स्थाई सुख
जिसकी चाह में चिड़िया नाप आती है आसमान
पंडुको की टोली
एक दूसरे को लगा आती है गुलाल
एक दूसरे के पास जाकर पूछ आती है हाल चाल
देना चाहता हूँ तुम्हें वही चाँद

दुनिया की सबसे बेहतरीन किताबें
दर्शन और सौन्दर्यशास्त्र
जिन्होंने सिर्फ प्यार बांटा है
मैं तुम्हें ट्रेन देना चाहता हूँ
बहुत सारी खदाने, बहुत सारे उपनिवेश
तुम्हारी पसंदीदा मणिपुरी साड़ी
यानी की सारे भौतिक संसाधन
अपने सारे खेत जिसमें तुम्हारे नाम का पट्टा लिखा हो
महानगर विस्तार के इस चार बाई छः के कमरे में बैठा
सोचता हूँ
इतना सब पाकर तुम कितनी खुश होंगी !!!!!
जिन्दगी की संचित निधियां तुम्हें भी मिलनी चाहिए

मधुबनी पेन्टिंग्स

विदा होते वक्त/
उसने पूछा-
मुझे याद रखोगे हमेंशा ?
मैंने/ उसे विदा कर दिया/
और/भूल गया/ बचपन/
अपना भी / उसका भी

पहली बार वह ससुराल से लौटी/
तो साथ ले आयी/अपना घर/
घर के साथ आयी मधुबनी पेन्टिग्स्
फिर भाव को विस्तार मिला/
वह दीवार पर टांग दी गई/

दुनिया इन दिनों स्याह है

देह की गिरहें उठाऊं तो
फफोलों पर गवाही देता है मन
अकाल का सारस दुर्दिन में बढ़ा लेता है दुःख
दर्द रिसता है, लोहित होता है लहू
यहाँ मन की बात कौन सुने
कोई है भी तो नहीं
जिसे लगा सकूं आवाज
जिससे दिल के तार जोड़ सकूं
जिसपर चीख सकूं जी भर, फिर मांग लूँ मुआफ़ी
अकाल के दिन हैं

भूख भूत हुई जाती है
अकेलापन डसने लगता है
निराशा में भर आता है मन
कुंठा का ताल लबालब उतिराता है
पसीजती हैं मुट्ठियाँ
दूर दूर तक एक चिड़िया पर नहीं मारती
पंडुको की तरह जबान सिल
तरणताल में गोते लगाता है एक अजनबी मन
राततीन बजे तक किसी चाँद का इन्तजार
जो पिछले कई दिनों से
किसी पथिक की तरह भटक गया है जंगल में
करता हूँ इन्तजार
एक बड़ा पत्थर रख लिया है सीने पर
मन है कि गिरहें तोड़ता है
फफोलों से भरती जाती है रात
स्याह रात !!!!!!

तुम भी हो!
इन दिनों तुम्हें भी फुरसत कहाँ है


लिखो

कवि प्यार से मत छुओ
उस औरत को

मत निहारो उसकी जंघाओं में
उपजा हुआवनपाखी

उसे मत बताओ
अजन्ता कला का एक नमूना मात्र

स्त्री जो तुम्हारे पड़ोस में
जल उठी उस रोज
उसके बारे में भी लिखो

कविता ने स्त्री को पतनशील बनाया है
स्त्री देह से आगे की चीज है
लिखो………मैथ….साइंस……

तुम्हारी दो तस्वीरें 

मेरे पास तुम्हारी दो तस्वीरें हैं
हमेशा की तरह
एक थोड़ी खंडित है
थोड़ी नाराज सी
थोड़ी ढुलमुल
पलाश के फूल सी जो है दूसरी
ढीठ बहुत कोमल
ले लेती है जान
खुद को उन्हीं फोटुओं में चिपकाये हुए
मैं विचरता हूँ
एक देशांतर से दूसरे देशांतर
बिना यह परवाह किये हुए
तुमने आज रोटी खाई कि नहीं
तुम आज स्कूल गईं की नहीं
बाबू सच कह रहा हूँ
ये दो ही तस्वीरें हैं
इस धरती पर सबसे अकेली
सब से अलहदा
जोगनिया सी
जो बार बार आँखों में खुलती हैं
और घुल जाती हैं आँखों में
बार बार

तुम्हारे शहर से वापस आकर 

इस काली अँधेरी रात में
तुमसे नाभिनाल का जुड़ना
चरम तक पहुँचना
और वापस चले आना, जहाँ से शुरू किया था फिर वहीँ
फिर तुमसे जुड़ना, फिर वापस आना
ऊष्मा से भरी किसी बर्फीली गुफा में एक दो रोज
किसी थके हुए पथिक सा सुस्ताना
सोचता हूँ क्या यही है प्यार

देह के भीतर देह को महसूस करना
जीवन की एक लम्बी श्रृंखला का राही होना
मैंने ऐसे जी ली
भटकाव और अनंत में किसी योगी सा ध्यानस्थ
ढूंढ़ता हुआ तुम्हें
सोचता हूँ क्या यही है प्यार

रात का गहराना
जब और गहरा रही है रात
जब नाभिनाल विखंडित हो रहा है

मैं पुनः एक लम्बी यात्रा पर निकल पड़ा हूँ

सोचता हूँ तब
क्या यही है प्यार

उधार की कोख

आओ देवी! स्वागत !!
स्वागत !!
ममत्व भरी इस रात में
पहरेदारों के बीच
खेल रहे इस बच्चे कि तरफ से
तुम्हारा स्वागत!
स्वागत !!

तुमने उधार दी गर्भ की चाहत
ममत्व का सुख दिया बंध्या रात को
अपने हाथ से छुआ तुमने
कोमल, मांसल भ्रूण
रात ने महसूस किया
कोई टहलता है उसके भीतर
उससे बतियाता है
दिलाता है अहसास

गंधक सुलगती थी
तूतिया नीली हो जाती थी सांझ
गुबार भर आता था भीतर
कहते हैं जम आई थी
तुमने नोच फ़ेंक दिया
व्यंग्य की तीखी चर्बी

तुमने माँ बनाया है !
कोमल भाव भरे हैं
तुमने माँ होने का अहसास दिया है
स्तनों में उडेला है दूध
स्वागत ! स्वागत! स्वागत
स्वागत जननी !!

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प्रथम आधुनिक कविता ‘स्वप्न‘ में स्त्री चेतना

मीनाक्षी

‘‘19वीं सदी के भारतीय साहित्य और विशेष रूप से हिन्दी साहित्य में  स्वप्न के रचनात्मक उपयोग का उद्देश्य है नये युग की सम्भावनाओं की खोज करना और उसके साथ ही आत्म-सजग होकर सामाजिक रूप से जाग्रत होना। ऐसी रचनाओं में यथार्थ और स्वप्न का जो सम्बन्ध दिखाई देता है, उसमें पराधीनता के यथार्थ और स्वप्न की द्वन्द्वात्मकता व्यक्त हुई है। यथार्थ और स्वप्न की यही द्वन्द्वात्मकता महेश नारायण की कविता ‘स्वप्न‘ में मिलती है और गहरे तथा व्यापक अर्थ में पहली आधुनिक कविता बनाती है।”

प्रस्तुत पंक्तियाँ एक ऐसे रचनाकार और रचना के लिए है जो हिंदी साहित्य जगत में प्रमुख नाम नहीं है किंतु एक लंबे समय के संघर्ष के बाद इन्होंने हिन्दी साहित्य के इतिहास में स्थान न सही, पर हिन्दी साहित्य के विचारकों को सोचने पर विवश अवश्य कर दिया है। आज करीब-करीब हिन्दी साहित्य के सभी विचारकों ने इसके महत्व को स्वीकारना आरम्भ कर दिया है। इन विचारकों में कृष्णदेव प्रसाद गौड, उमाशंकर, महाकालेश्वर, अयोध्याप्रसाद खत्री, डाॅ. मैनेजर पाण्डेय, डाॅ. देवेन्द्र कुमार चैबे, डाॅ. रश्मि चौधरी, डाॅ. सुदीप्ति आदि प्रमुख हैं। ज़ाहिर है अब वह समय दूर नहीं जब हिन्दी साहित्य के इतिहास में महेशनारायण और उनकी कविता ‘स्वप्न‘ की गिनती की जा सकेगी।

हिन्दी साहित्य के इतिहास में आधुनिक काल का सूत्रपात उन्नीसवीं शती के मध्य से माना जाता है। आरंभिक अवस्था के इस दौर के नेतृत्व का श्रेय भारतेंदु हरिश्चंद्र को जाता है। सम्पूर्ण भारतेंदु युगीन परम्परा को दृष्टिपात करने पर यह स्वतः ही ज्ञात हो जाता है कि महेशनारायण ही वह अकेले व्यक्ति हैं जिन्होंने आधुनिक हिन्दी कविता की वास्तविक शक्ति और स्वरूप को पहचानने का प्रयास किया। साधारणतः किसी भी रचना के लिए यथार्थ का गहन बोध आवश्यक होता है। इसी के द्वारा कविता अपने तत्कालीन विमर्शों से जुड़ती हुई तत्कालीन विषमताओं, रूढ़ियों, मान्यताओं का विरोध करती है। यह कविता तत्कालीन विमर्शों से तो जुड़ी ही रहती है, साथ ही आधुनिक विमर्शों को भी आत्मसात कर चलती है। पिछले कई दशकों से नक्सलवाद, दलित चेतना, स्त्री मुक्ति, मजदूर आन्दोलन, किसान आन्दोलन आदि स्वाधीनता संबंधी आकांक्षा को लेकर जो जन-आन्दोलन हो रहे हैं। ‘स्वप्न‘ में उसी प्रकार की आकांक्षा से उत्प्रेरित आन्दोलन दिखलाई पड़ता है और जो मुक्ति पाने की जद्दोजहद में आधुनिक जन-आन्दोलन से जुड़ती है। इस संदर्भ में माओत्से-तुंग की पंक्तियाँ याद आ जाती है जिसमें उन्होंने कहा है-‘‘हर वह कला श्रेष्ठ है जो जन संघर्षों में तथा क्रान्ति में जनता का साथ देती है।‘‘


‘कला‘ कला होती है फिर वह किसी भी रूप में क्यों न हो? बशर्ते वह जन-आन्दोलित करे। ‘स्वप्न‘ कविता में जन संघर्ष, जन क्रांति या जन-आन्दोलित करने की वह क्षमता मौजूद है। यह कविता जितनी तत्कालीन संदर्भों से जुड़ती है उतनी ही समकालीन संदर्भों से जुड़ने का प्रयास करती है। आज जिस प्रगति से साहित्य में स्त्री विमर्श की खोज की जा रही है उस दृष्टि से यह कविता और महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि यह कविता वैयक्तिक चेतना को सचेत करती है, मानवीय अधिकारों के प्रति जाग्रत करती है विशेषकर स्त्री को। सुदीप्ति के शब्दों में-‘‘अगर इस बात की पड़ताल की जाए कि हिंदी कविता में आधुनिक स्त्री की उपस्थिति कब से हुई तो ‘स्वप्न‘ ही इसका उत्तर साबित होगा।‘‘

आधुनिक हिन्दी साहित्य के आरंभिक काल से महेशनारायण संबंद्ध है। इस बहुआयामी व्यक्तित्व वाले व्यक्ति की वाणी का प्रमुख स्वर सामाजिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक जागरण है। इन्हीं विशेषताओं के कारण महेशनारायण भारतेंदु युगीन परम्परा में अग्रणीय दिखलाई पड़़ते हैं क्योंकि इन्होंने भारतेंदु की परम्परा का न केवल संरक्षण किया बल्कि अपनी निजी प्रतिभा के योग से खड़ी बोली में काव्य सृजन किया। खड़ी बोली आन्दोलन और मुक्त छंद परम्परा को सम्वर्द्धित किया तथा उसे नये आयाम प्रदान किये। उनकी यह कविता भारतेंदु-युग के कवियों के समक्ष कुछ न कुछ समानता के साथ-साथ कुछ विविधता भी लिए हुए है जो महेशनारायण को भारतेंदु युगीन कवियों से अलगाती है। महेशनारायण इस समस्या प्रधान कविता को सामाजिक और राष्ट्रीय कविता के रूप में नई दिशा देते हैं। महेशनारायण की ‘स्वप्न‘ कविता से कविता में एक नया मोड़ आया। आधुनिक कविता जिस लीक को लेकर चल रही थी उस लीक से विपरीत महेशनारायण एक नये मार्ग को, एक नए उद्देश्य के साथ प्रकट करते हैं। वे स्वयं नायिका से कहलवाते हैं-

‘चन्द्रलोक’ है देश मेरा
वो एक अमीर की कन्या हूँ कुमारी;
कुमारी नहीं, कुमारी, हाँ, कुमारी ही हूँ मैं।
सांस एक लेके-’ओह क्या कहूँ मैं,
समझो तुम्हें जो बूझे पड़े,
पर मैं एक विधवा हूँ कुमारी।

एक स्त्री द्वारा इस तरह का प्रतिरोध सामाजिक रूढ़ियों और परम्पराओं के खिलाफ केवल एक प्रगतिशील विचारक ही करा सकता है। यह बड़े दुर्भाग्य की बात है कि हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में ऐसे व्यक्ति को प्रायः उपेक्षित दृष्टि से देखा गया। यह साहित्येत्हिासकारों की कमी कहे या समय एवं परिस्थितियों का प्रभाव कि महेशनारायण की कविता ‘स्वप्न’ हिन्दी साहित्य के किसी भी इतिहास में स्थान नहीं बना पाई। महेशनारायण की कविता ‘स्वप्न’ का अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि ‘स्वप्न’ सामाजिक, ऐतिहासिक, राजनैतिक, आर्थिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक आदि सभी संदर्भों से एक महत्वपूर्ण कविता है। यह कविता समकालीन समय में प्रासंगिक तब हो जाती है जब इसमें स्त्री चेतना के बीज तत्व दिखलाई पड़ते है।



इस प्रथम आधुनिक कविता में स्त्री चेतना के बीजत्व का होना आधुनिक हिन्दी साहित्य के लिए साधारण बात नहीं है। यह कविता आधुनिकता की परिभाषिक शब्दावली पर खरी उतरती है। इस बात की पुष्टि डाॅ. मैनेजर पाण्डेय के इन शब्दों से होती है-‘‘सामान्य रूप से हिन्दी साहित्य में और विशेष रूप से हिन्दी कविता के सन्दर्भ में आधुनिकता की बात करते समय भाषा का प्रश्न सामने आता है। कविता के प्रसंग में खड़ी बोली में लिखी गयी कविता ही आधुनिक कविता मानी जाती है। भारतेन्दु युग से खड़ी बोली में हिन्दी कविता की शुरूआत होती है। लेकिन उस समय काव्य-भाषा के रूप में ब्रजभाषा ही अधिक प्रचलित थी। लम्बे समय तक इस बात पर विवाद होता रहा कि क्या ब्रजभाषा को छोड़कर खड़ी बोली में हिन्दी कविता लिखी जा सकती है। धीरे-धीरे यह विवाद समाप्त हुआ और खड़ी बोली हिन्दी गद्य के साथ कविता की भाषा के रूप में भी स्वीकृत हुई।…………हिन्दी में आधुनिक होने के लिए आचार्य शुक्ल के अनुसार अपने समय और समाज के प्रति सजगता आवश्यक है। भारतेन्दु युग की सबसे बड़ी सच्चाई यह थी कि देश उपनिवेशवाद का शिकार था, इसलिए उपनिवेशवाद की स्थिति, भारत की गुलामी और उससे स्वाधीन होने की चेतना आधुनिकता की अनिवार्य शर्त थी। उस समय जो कवि अपने समाज की सबसे बड़ी वास्तविकता अर्थात देश की पराधीनता और उसके विरोध में क्रियाशील स्वाधीनता की भावना के बारे में सजग नहीं होगा वह आधुनिक भी नहीं होगा।…………हिन्दी की पहली आधुनिक कविता वही होगी जो एक तो खड़ी बोली में लिखी हुई हो दूसरे भारत की पराधीनता की पहचान के साथ ही स्वाधीनता की चेतना की अभिव्यक्ति उसमें भी हो।‘‘

डाॅ. मैनेजर पाण्डेय आधुनिक कविता के लिए जिस आधुनिकता की खोज-बीन करते हैं उसमें भारत की पराधीनता का बोध और स्वाधीन चेतना की अभिव्यक्ति अनिवार्य पक्ष है। आधुनिक हिन्दी साहित्य और आधुनिक कविता के लिए आधुनिकता का अर्थ-पराधीनता का बोध और स्वाधीन चेतना के परिप्रेक्ष्य में होना चाहिए। वह चाहे राष्ट्र के प्रति हो या एक स्त्री के प्रति। ‘स्वप्न‘ कविता में इन दोनों के प्रति विशेष आग्रह है। इस अर्थ में यह कविता अधिक आधुनिक और प्रासंगिक हो जाती है।

भारतीय सामाजिक इतिहास में स्त्रियों का इतिहास जितना पुराना है उतना ही स्त्रियों का शोषण भी बहुत पुराना है। सृष्टि की रचना से लेकर आज तक उसका शोषण होता आया है। समस्त धर्मशास्त्र ऋग्वेद, गीता, रामचरितमानस, मनुस्मृति आदि सभी स्त्री को कमतर ही आँकते हैं। इन ग्रंथों के अनुसार स्त्री केवल भोग्या है चाहे वह किसी भी रूप में प्राप्त हो। इन ग्रंथों ने ही स्त्री को संयमित जीवन जीने के मजबूर किया गया है। स्त्रियों पर सदियों से हो रहे अत्याचारों के कारण आज स्थिति यह हो गयी है कि उसे एक अलग जाति के रूप में देखा जाने लगा है। यद्यपि आज समाज में स्त्री जागृति को लेकर नई चेतना का विकास हुआ है, लेकिन यह जाग्रति अनायास नहीं आई। इसकी पृष्ठभूमि सदियों से बन रही थी और समय समय पर इसने समाज को अपनी दस्तक से परिचित कराया है, वह भी एक तीखे स्वर में । गार्गी, मैत्रेयी, मीरा, महादेवी आदि उसका विस्फोटक रूप का ही तो परिणाम था। करोडों में विरल होकर उन्होंने अपनी जागरणवादी चेतना से इतिहास में अपना नाम दर्ज़ कराया और समाज से अपना परिचय कराया। महेशनारायण की कविता ‘स्वप्न‘ में भी स्त्री जाग्रति को लेकर नई चेतना का संचार हुआ है। महेशनारायण की सम्पूर्ण कविता ‘स्वप्न‘ स्त्री केन्द्रित कविता है। एक स्त्री का अपने समाज के विपरीत प्रतिगामी शक्तियों को चुनौती देना यह बतलाता है ‘स्वप्न‘ कालीन समाज में स्त्रियों की स्थिति अच्छी नहीं थी। वह प्रतिगामी शक्तियों के विरूद्ध खड़ी ही नहीं होती बल्कि उनका भरसक सामना भी करती है।

‘स्वप्न‘ कविता में स्त्रियों की स्थिति बड़ी विचारणीय थी। माता, पत्नी और पुत्री तीनों रूपों में उसका महत्व नाममात्र का था। माता और पत्नी की अपेक्षा पुत्री की स्थिति अधिक निम्न दर्जे की थी। उसे विमाता के स्नेह से तो वंचित रहना ही पड़ा साथ ही पिता के अपशब्दों और दण्ड को भी सहन करना पड़ा। बाल्यावस्था से लेकर वृद्धावस्था तक जिस परिधि में उसे ढाला गया उसी परिधि में सहर्ष ढल गयी। वह प्रत्येक अधिकारों एवं आकांक्षों से दूर आरम्भ से लेकर अंत तक किसी न किसी के अधीन रही है। पुत्री के रूप में न पिता की सम्पत्ति में कोई अधिकार था, न पति की सम्पत्ति में। केवल पति की मृत्यु के बाद ही पति की सम्पत्ति में अधिकार मिलता था। यह अधिकार किसलिए? क्योंकि उसके लिए परिवार में आश्रय पाना संभावनाओं से अति परे की बात थी। डाॅ. वीरभारत तलवार विधवाओं की स्थिति व्यक्त करते हुए कहते हैं कि-‘‘हिंदी नवजागरण का गढ़ विधवाओं का भी गढ़ था। सारे हिंदुस्तान से विधवाएँ काशी में आती थीं जो दशाश्वमेध घाट की सीढ़ियों से लेकर मुमुक्ष भवन जैसी बड़ी इमारतों तक में बसी हुई थीं। पर इनके लेखे बनारस में कोई विद्यासागर नहीं हुआ।”  जिस समाज के साहित्यकारों , समाजसुधारकों  और राष्ट्रीय नेताओं  के मूल में स्त्रियों के उद्धार का प्रश्न हो, न कि उसके अधिकारों का। उस समाज में विधवाओं के लिए कोई विद्यासागर हो भी कैसे सकता है?


उच्चवर्गीय परिवार हो या निम्नवर्गीय परिवार, स्त्री का प्रेम विवाह और विधवा विवाह वर्जित ही नहीं निंदनीय भी था। उसके लिए शिक्षण एक दुर्लभ वस्तु के समान थी। परिवार में उसकी स्थिति ऐसी थी कि पिता अपनी पुत्री को मारपीट भी सकता था। त्याग, सहनशीलता, समर्पण, कर्तव्य परायणता यही स्त्री जीवन की मयादाएँ थीं। इन्हीं के माध्यम उसे आँका जाता था और मर्यादाएँ तोड़ने पर दण्डित भी किया जाता था। विवाह के विषय में उसके अपने किसी प्रकार के अभिमत का प्रश्न ही नहीं उठता था। पिता की इच्छानुसार उसे विवाह करना पड़ता। ये वे परिस्थितियां थी जिनसे विवश होकर ‘स्वप्न’ की नायिका एक अलग इकाई के रूप में प्रकट होती है। ‘स्वप्न’ की निम्नलिखित पंक्तियाँ तत्कालीन समय और समाज में व्याप्त विद्रूपताओं की सूचक है साथ ही नायिका को एक अलग इकाई के रूप में व्यक्त करती है-

‘चन्द्रलोक’ है देश मेरा
वो एक अमीर की कन्या हूँ कुमारी;
कुमारी नहीं, कुमारी, हाँ, कुमारी ही हूँ मैं।‘
सांस एक लेके-’ओह क्या कहूँ मैं,
समझो तुम्हें जो बूझे पड़े,
पर मैं एक विधवा हूँ कुमारी। माता नहीं हमें हैं। जीते मेरे पिता है। जो आँखें खुली मेरी उस भूमि में, एक दूसरी माता शीघ्र आई पर मेरे लिए प्रीत न लाई। सच है मैं प्रीत के योग नहीं, आशा इसकी है यह भूल हमारी। यां तो लड़की कभी ऐसी नहीं होती होगी। प्रीत के योग वेमाता के यह होती होंगी।


महेशनारायण ने अपने युग से पूर्णतः परिचय पाया और समझा कि स्त्रियों की बड़ी दयनीय स्थिति है। इसीलिए महेशनारायण स्त्री स्वाधीनता के लिए चेतनावादी मार्ग को चुनते हैं। महेशनारायण स्त्री को समाज में स्थान दिलाने के उद्देश्य से सामाजिक प्राचीन रूढ़ियों से प्रतिरोध नहीं करते अपितु एक जुझारू व्यक्तित्व होने के कारण एक स्त्री द्वारा प्रतिरोध करवाते हैं। वे स्त्री सम्बन्धी सभी समस्याओं को आत्मसात कर उनसे स्वयं जूझते हैं तथा उसके निवारण हेतु उपाय भी खोजते हैं। स्त्री सामाजिक व्यवस्थाओं के नाम पर शोषित होती रहती है। वे सामाजिक व्यवस्थाएँ कौन सी हैं जो व्यवस्थाएँ स्त्री समाज की जड़ें ही नहीं हिला रही थी बल्कि स्त्री को जड़हीन भी बना रही थीं। महेशनारायण की यह कविता ‘स्वप्न‘ उसी जड़हीनता के कारकों को ज्ञात करने का प्रयास है। स्त्री का पूर्णत‘ हाशिए पर रखने वाले प्रमुख कारक भारतीय सामाजिक व्यवस्था में निहित है जिसका महेशनारायण ने ‘स्वप्न’ कविता में खुलकर विरोध किया है.

भारतीय सामाजिक व्यवस्था में सबसे प्राचीन पितृसत्तात्मक व्यवस्था और वर्णव्यवस्था है। यह दोनों व्यवस्थाएँ धर्म पर आधारित पालित-पोषित है। पुरुष द्वारा पत्नी, पुत्री और बहन की रक्षा करना उसे सुरक्षित रखना उसका परम् धर्म है। स्त्री पर अपना वर्चस्व रखना मानों पुरुष समाज का जन्मसिद्ध अधिकार हो। स्त्री पर यह नियंत्रण बहुत कड़ा होता है क्योंकि परिवार की मानर्यादा उसी पर टिकी होती है। यह कविता उसके सारे तथ्यों को उजागर करती है। यह व्यवस्थाएँ प्रत्येक धर्म में विद्यमान है। आरम्भ से ही यह स्त्री के विरोध में रही है जिसके फलस्वरूप यह स्त्रियों के लिए एक बड़ा खतरा बन गयी है। इसी खतरे से अवगत होकर महेशनारायण ‘स्वप्न’ कविता को हथियार बनाकर इस व्यवस्था पर प्रहार करते हैं। आज समाज में स्त्री का शोषण जो खुलेआम हो रहा है महेशनारायण ने उसे ‘स्वप्न’ कविता में जगह-जगह चिहिन्त किया है-

‘एक रोज पिता ने हमको देखा
उस प्यार के साथ वन में तनहा।
भूलूंगी नहीं उस दृष्टि को हर्गिज
छाई जिससे जीवन भर अन्धियारी।
प्यारा मेरा जिस घड़ी हुआ मुझसे जुदा
समझा कि कुमारी ही हुई मैं विधवा
कहते हुए बाप ने मुझे पकड़ा
‘तू बेहया है घर को जा।‘
और दाँतों प‘ दाँत मसमसा के बोले,
‘कुछ तू भी जहेज में अबे ले.

‘स्वप्न‘ कविता भारतीय स्त्री की प्रतीकात्मक कविता है। एक ही स्त्री में भारतीय स्त्री की सभी पीड़ा ;अर्थात् नायिका को ही भारतीय स्त्रियों का प्रतीक बनाकरद्ध व्यक्त की गई है। वह अपने अधिकारों को लेकर समाज व्यवस्था से प्रतिरोध करती है। जिस पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने स्त्री को अधिकारहीन बना उसे प्रत्येक अधिकारों से वंचित कर दिया, ‘स्वप्न‘ कविता की नायिका उन अधिकारों के लिए लड़ती है। आज आवश्यकता स्त्री के भीतर चेतना जाग्रत करने की है ताकि वह मानवीय अधिकारों के प्रति सचेत हो सके। स्त्री को उसकी आन्तरिक शक्ति से परिचित कराने में ‘स्वप्न‘ कविता अहम् भूमिका निभाती है। ‘स्वप्न’ की नायिका का बार-बार शोषण और प्रताड़ना का शिकार होने के बावजूद विपरीत प्रतिगामी शक्तियों के विरूद्ध जाना उसके अटूट संघर्ष की कहानी व्यक्त करता है। एक उदाहारण दृष्टव्य है-
एक दिन बैठे यह ख्याल आया /ख्याल क्या आया एक जवाल आया /कि योगिन बन के विभूत रमा
और कहके मैं ‘हा‘ पितृगृहि से सिधारी /वां से निकली तो फिर गई वन /वही वन जो कि फिरता था मन-मन/      घूमने मैं लगी इधर वो उधर /कि एकाएक पड़ी नजर किस पर ? /ज्यों हि बिछुड़ी-सी थी, मिल जाके /नोच डाला पिता ने फिर आके /जोर से और घुमाके दे चक्कर / शून्य में फेंका यां गिरी आकर /‘हाय ! वह देश चन्द्रलोक मेरा  हाय ! प्यारा मेरा कहाँ है पड़ा। हाय ! जब वां से मैं निकाली गई। हाय ! तब बिजली मुझ प‘ क्यों न गिरी ?        ज्यों ही यह कलाम निकला था कि सन से /बिजली त्यों ही गिरी प‘ हम चौंक उठे, /कहानी मेरी, प्यारे पढ़नेवाले सब स्पप्न ही था, जो देखते थे।

 हालांकि पितृसत्तात्मक सामंती व्यवस्था में अधिकार पूर्ण स्वच्छंद रहना एक स्वप्न से अधिक कुछ नहीं है। ‘स्वप्न‘ की नायिका का ऐसे स्वप्न को साकार करने का प्रयास तत्कालीन समाज के लिए चुनौती है। चुनौती है स्त्री को नियंत्रित करने साधन ‘परिवार‘ और ‘विवाह‘ के लिए क्योंकि ये व्यवस्थाएँ व्यक्ति के बाह्य रूप पर प्रतिबंध लगा सकती है किंतु आंतरिक रूप से प्रतिबंध लगाना इनकी क्षमता के विरूद्ध है। कविता में नायिका अंतर्मन से अपने प्रेमी को अपना पति मान चुकी है। सामाजिक वर्जनाओं के चलते भी वह अंतर्मन से कभी अपने प्रेमी का त्याग नहीं कर पाती बल्कि वह वहीं से स्वयं को विधवा समझने लगती है-

‘एक रोज पिता ने हमको देखा/उस प्यार के साथ वन में तनहा। भूलूंगी नहीं उस दृष्टि को हर्गिज/छाई जिससे जीवन भर अन्धियारी।प्यारा मेरा जिस घड़ी हुआ मुझसे जुदा / समझा कि कुमारी ही हुई मैं विधवा

जब यह संस्था या व्यवस्था नायिका को आंतरिक रूप से कमजोर करने में असमर्थ होती है तब उसे बाह्य रूप से कमजोर करने का षड्यंत्र किया जाता है। और विवाह द्वारा उसकी स्वच्छंद प्रवृत्ति पर प्रतिबंध लगाया जाता है परन्तु नायिका पर आंतरिक प्रतिबंध लगाना किसी भी संस्था या व्यवस्था के लिए संभवता से परे की बात है। हो सकता है वह सामाजिक दबाव के कारण कत्र्तव्यबद्ध हो जिसकारण अपने पति की मृत्यु के बाद स्वयं को विधवा मान लेती है किन्तु वह अपने पति को मन से स्वीकार कर नहीं कर पाती है तभी वह स्वयं को विधवा तो कहती परन्तु कुमारी विधवा। इसका परिचय वह अपनी कहानी व्यक्त करते हुए कविता के अंतिम पृष्ठों पर देती हुई कहती हैं कि-
‘हाय! शादी हुई थी/ बेहोश जब मैं थी /मैं सोलह बरस की /वह अस्सी बरस के / देख इनको मैं रोती, /देख हमको वह हँसते। क्या करो मुझे प्यार करो, माता ने बनाया है तुमको हमारी /मैं ही अमीर मर जाऊँगा जब, तब दौलत होगी हमारी तुम्हारी / मर ही गये वह विचारे, उसी दिन हो गई मैं विधवा; पर कुमारी /माता मेरी संतुष्ट हुई और घर लाई वह दौलत सारी,

एक स्त्री का अविवाहित होकर स्वयं को विधवा कहना और फिर उसी का विवाह उपरांत स्वयं को कुमारी विधवा कहना प्रतिरोधात्मक प्रवृत्ति का सूचक है। महेशनारायण स्त्री पीड़ा को भली-भाँति समझते हुए किस स्तर तक प्रत्येक स्त्री के लिए प्रतिरोधात्मक प्रवृत्ति को आवश्यक मानते हैं यह इस कविता के माध्यम से समझा जा सकता है। वे धर्म की आड़ में हो रहे स्त्री शोषण को चुपचाप नहीं देखते बल्कि ‘स्वप्न’ कविता की नायिका के माध्यम से प्रतिरोध करवाते हैं। वह यह सोचने पर विवश करते हैं. कि स्त्री जड़ता का कारण क्या है? एक तरह से यह कविता स्त्रियों में आत्म-चेतना उत्पन्न करती है। इस कविता में सामाजिक मान-मर्यादाओं, रूढ़ियों, मान्यताओं के प्रति तीव्र आक्रोश का भाव है। क्योंकि ये मान्यताएं स्त्री स्वाधीनता के लिए सबसे बड़ा खतरा है। अनादि काल से स्त्री उपेक्षिता को चरितार्थ करने वाली उक्तियाँ प्रयुक्त की जाती रही है ये उक्तियाँ स्त्री शोषण और पराधीनता की गाथा गाती रहती हैं और उसकी स्वाधीनता की दुहाई देती रहती हैं। यह हमारे समाज की संकीर्ण मानसिकता का फल है कि आज तक स्त्री को स्वतंत्र प्राणी का अधिकार नहीं मिल पाया। राजेन्द्र यादव लिखते हैं ‘‘हमने स्त्री को हमेशा पुरूष के संदर्भ में ही देखा है, न कि स्वतंत्र प्राणी के रूप में। उसका सारा जीवन उसका अपना नहीं होता, किसी न किसी पुरूष के साथ जुड़कर ही उसका अस्तित्व बनता है। यहाँ तक कि उसका नाम भी नहीं होता। वह किसी की बहन है, तो किसी की बेटी, किसी पत्नी है, तो किसी की प्रेयसी। अब ऐसे में यदि स्वतंत्र स्त्री की अवधारणा पर बात की जाए तो वह एक बिल्कुल नई चीज है।’

स्वतंत्र स्त्री की अवधारणा नई हो सकती है लेकिन स्त्री स्वाधीनता संघर्ष का इतिहास बहुत पुराना है। भारतीय समाज में स्त्री गुलामी का इतिहास जितना पुराना है, उस गुलामी से मुक्ति के लिए स्त्री के संघर्ष का इतिहास भी उतना ही पुराना है, इस इतिहास की एक झलक ‘‘विमेन राइटिंग इण्डिया’ (1991)नामक पुस्तक में मिलती है जिसमें ईसा पूर्व 600 से वर्तमान काल तक के स्त्री-लेखन के नमूनों का संकलन है और साथ में लगभग ढाई हजार वर्षों के इतिहास में फैले लेखन के विभिन्न रूपों में व्यक्त पराधीनता का बोध और स्वाधीनता की कामना का विवेचन भी है।’’  स्त्री स्वाधीनता क्या है? यह प्रश्न प्रत्येक साहित्यकार के लिए विचारणीय बना हुआ है। सभी ने इसे अपने-अपने अर्थो में ग्रहण किया है। किसी ने इसे आर्थिक स्वावलम्बन से जोड़ा, किसी ने शरीर मुक्ति से, कोई स्त्री स्वाधीनता को शोषण विहीन समाज से जोड़ता है, कोई मानवीय अधिकार और कोई परम्पराओं से मुक्ति। किन्तु ये धरणाएँ तब तक निरर्थक हैं जब तक कोई स्त्री स्वयं अपने निर्णय लेने में सक्षम नहीं हो जाती। राजेन्द्र यादव ‘स्त्रीकाल’ में लिखते हैं ‘‘स्वतंत्र स्त्री वही है जो अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करें, अपनी शक्ति का अर्जन करें।’’
भक्तिकाल में मीरा अपने निर्णय लेने में पूर्णतः सक्षम थी। वह अपने निर्णयों द्वारा सम्पूर्ण सामंतवादी व्यवस्था को अपना विरोधी बना लेती है और छायावाद में महादेवी का सम्पूर्ण जीवन स्त्री स्वाधीनता के लिए संघर्षरत था। चन्द्रा सहाय के शब्दों में-‘‘भारतीय समाज में स्त्री की स्वाधीनता के लिए जो चिंता और बैचेनी आज है वह महादेवी वर्मा के लेखों में 30 के दशक में व्यक्त हुई थी।’’  लेकिन हिंदी साहित्यकार भक्तिकाल और छायावाद की कड़ी को क्यों भूल जाते हैं जिसमें स्वाधीनता आन्दोलन और नवजागरण के मूल में स्त्री स्वाधीनता की चिंता भी बखूबी दिखाई पड़ती है। हिंदी साहित्य में मीरा की स्वाधीनता अथवा मुक्ति का प्रयास प्रथम चरण और भारतेन्दु युग में ‘स्वप्न’ कविता में नायिका द्वारा मुक्ति की आंकाक्षा को द्वितीय चरण माना जा सकता है क्योंकि महादेवी ने एक स्त्री की जिन समस्याओं का विवेचन किया है लगभग वैसी ही समस्याएँ ‘स्वप्न’ कविता में स्त्री जीवन को विचलित करती है। यह कविता काल की दृष्टि से 1881 की कविता है। इस काल में स्त्रियों को लेकर बहुत कुरीतियाँ व्याप्त थीं जिन्हें लेकर भारतीय समाज सुधारकों ने स्त्री सुधारों के लिए विभिन्न आन्दोलन चलाए हुए थे.


‘स्वप्न’ की नायिका भी ‘स्त्री स्वाधीनता की लड़ाई के लिए सामाजिक प्राचीन रूढ़ियों, कुरीतियों से अपना संघर्ष आरंभ करती है जैसे-अनमेल विवाह, सती प्रथा, प्रेम विवाह, विधवा समस्या, आर्थिक स्वावलम्बन आदि। यद्यपि सभी प्रथाएँ स्त्री जाति के लिए एक अभिशाप थी लेकिन सती प्रथा समाज की बड़ी ही क्रूर और निर्मम प्रथा थी, जिसमें किसी स्त्री के पति की मृत्यु पर उसे ;स्त्री कोद्ध जिन्दा अग्नि में भस्म कर दिया जाता था। ऐसे समय में राजा राममोहन राय आगे आए और सती प्रथा का पुरजोर विरोध किया जिसके फलस्वरूप 1829 में सती प्रथा को समाप्त करने का कानून पास किया गया। किन्तु कानून पास होना और कानून लागू होना दोनों अलग-अलग बातें है। देश में कानून पास होने के बावजूद भी सती प्रथा जैसी क्रूर  कुरीति छिट-पुट घटनाओं के रूप में मिलती रही है।  कहना न होगा कि उस स्थिति में ‘स्वप्न’ की नायिका अपने अधिकारों को पहचानते हुए सती नहीं होती। वह स्त्री अधिकारों और स्वाधीनता की भली-भाँति समझ रखती है। स्त्रियों को विधवा होने पर जो संयमित जीवन व्यतीत करना पड़ता है उससे उसका कोई सरोकार नहीं है। वह समस्त नियमों को तोड़ते हुए प्राचीन रूढ़ियों, परम्पराओं अथवा कुरीतियों का बहिष्कार कर; स्त्रियों में नवीन चेतना का संचार अथवा स्त्री मुक्ति की ओर अग्रसर हेतु प्रेरक शक्ति बनती है।

प्रेम व्यक्ति की निजी अनुभूति है। सामाजिक प्रतिबंधनों के कारण यह अनुभूति भारतेन्दु युग में विकसित नहीं हो पाई। साहित्य में इस अनुभूति का आरम्भ छायावाद से माना गया। भारतेन्दु युग और द्विवेदी युग में यह अनुभूति नगण्य है। नामवर सिंह इसका कारण देते हुए कहते हैं ‘‘द्विवेदी-युग में सुधारवादी नैतिकता का इतना आतंक था कि प्रेम की कविता लिखते हुए कवि-जन संकोच करते थे, क्योंकि उन्हें रीतिकालीन कहे जाने का डर था।’’  लेकिन महेशनारायण ने समस्त खतरों पर ध्यान न देते हुए उन सभी तथ्यों को उजागर किया जिनसे अक्सर भारतेन्दु और द्विवेदी युगीन कवियों ने बचना श्रेयस्कर समझा। यद्यपि श्रीधर पाठक और प्रसाद ने इस प्रेम अनुभूति का आभास अपनी रचनाओं के माध्यम से कराया लेकिन श्रीधर पाठक को स्वच्छंदतावाद का प्रवर्तक या छायावाद को स्त्री और पुरूष के वैयक्तिक प्रेम का उदय मानना तर्कसंगत प्रतीत नहीं होता क्योंकि श्रीधर पाठक की ‘एकांतवासी योगी’ और प्रसाद की ‘प्रेम पथिक’ जैसी रचनाओं से भी पहले महेशनारायण ने नवीन काव्य स्वरूप का पुनर्विधान सामंजस्य के रूप में और प्राकृतिक आधार पर किया और वैयक्तिक प्रेम को भी स्थान दिया। एक ऐसे समय एवं समाज में जहाँ प्रेम के नाम को हीन दृष्टि से देखा जाता था, स्त्री और पुरूष के आपसी प्रेम की बात तो दूर की बात थी।

‘स्वप्न’ कविता की प्रेमपद्धति के विषय में महाकालेश्वर कहते हैं ‘‘स्वप्न’ रोमाण्टिक या स्वच्छन्दतावादी पद्धति की प्रेम कथा है। केवल कथानक के विचार से भी यह हिन्दी में अपने ढंग की रचना है। इस पद्धति का विकास आगे चलकर श्रीधर पाठक की ‘एकांतवासी योगी’ और प्रसाद की ‘प्रेम पथिक’- जैसी रचनाओं में हुआ है। आचार्य शुक्ल जिसे छायावाद के पूर्व का स्वाभाविक स्वच्छन्दतावाद कहते हैं।’’  महेशनारायण की कविता ‘स्वप्न’ की नायिका समाज की प्राचीन रूढ़ियों, मान्यताओं, परम्पराओं को न मानते हुए प्रेम मार्ग को अख्तियार करती है। पे्रम मार्ग का चुनाव नायिका की आकांक्षाओं को नये सोपान प्रदान करने का सा्रेत है। वह उन्मुक्त रूप से प्रेमी के साथ वनों में विहार करती हुई वह कहती भी है-
उस दिन से हुई गले का उसका मैं हार,
और खूब ही मैं उसको करती थी प्यार।
मिलती थी मैं रोज उससे जा एक वन में
फिरती थी मैं साथ उसके उस कानन में।
थे बीतते दिन इसी तरह से
वह प्यार के दिन अहा। इसी तरह से।
दुनिया से हमें नहीं था कुछ सरोकार,
हम उसके, हमारा था वह संसार।
बेलों के वह झूड़ों में देखाके छिपना
मुख-चुम्बन बाद फिर वन से निकलना
नयनों की चमक को देखकर उसकी जीती मैं थी।
आगोश में उसके जाके फिर भी जीती मैं थी।
वह था हमसे खुश
हम थे उससे प्रसन्न
दिल थे मेरे खुश
मन थे मेरे प्रसन्न।’‘

छायावाद में प्रकृति को विशेष महत्व दिया है। वास्तविक अर्थों में प्रकृति ही वह तत्व है जो मनुष्य को उन्मुक्त स्वच्छंदता का आभास कराती है। नामवर सिंह कवि की प्रकृति विशेष रूचि का कारण मानते हुए लिखते हैं ‘‘पुरानी समाज-व्यवस्था के घुटते हुए वातावरण की अपेक्षा आधुनिक युवक को प्रकृति के बीच खुला वातावरण मिला; प्रकृति के राज्य में उसे पशु, पक्षियों, नदी, नालों, हवा-बादल सब में उन्मुक्त और निरंकुश स्वच्छंदता के दर्शन हुए। इसी स्वाधीनता की टोह में आधुनिक कवि प्रकृति के क्षेत्र में आया। पुरानी समाज-व्यवस्था में उसकी वैयक्तिकता खो गई थी।’’

 ‘स्वप्न‘ कविता में स्त्री का बार-बार वन में भटकना अपनी सामाजिक व्यवस्था के प्रति उदासीनता को दर्शाता है। वह उन्हें तोड़कर ऐसे वातावरण में जाने के लिए उत्सुक रहती है, जहाँ उस पर किसी प्रकार का बंधन न हो। वह पूर्ण रूप से स्वाधीन हो। यह अनुभव सिर्फ नायिका को वन में जाकर ही होता है। नामवर सिंह भी कहते हैं ‘‘आधुनिक व्यक्ति का प्रकृति की ओर दौड़ना व्यक्तिगत स्वच्छंदता की आकांक्षा के लिए तो था ही, व्यक्तिगत स्वाधीनता का परिणाम भी था। यदि यह नूतन प्रकृति-परिचय इस स्वाधीनता का परिणाम था, तो छायावाद युग से पूर्व द्विवेदी युग और द्विवेदी युग से पूर्व भारतेन्दु युग तथा उससे भी पूर्व के पाँच-छः सौ वर्षों के सम्पूर्ण मध्ययुग में ऐसा-प्रकृति प्रेम संभव क्यों नहीं हो सका? प्रकृति तो पहले से ही मौजूद थी और वह लगभग इसी रूप में, बल्कि आधुनिक रूप से अधिक वन्य रूप में।’’  महेशनारायण ने इस वैयक्तिक स्वतंत्रता को बखूबी पहचाना, वह भी एक स्त्री स्वाधीनता के परिप्रेक्ष्य में। इसलिए ‘स्वप्न’ की नायिका व्यक्तिगत स्वछंदता के लिए अवसर तलाशती है और उन अवसरों का समय-समय पर लाभ भी उठाती है। नायिका जब युवक से प्रेम करती है तो वन में ही विहार करती हैं लेकिन पिता को यह ज्ञात होने पर जबरन उसका विवाह एक वृद्ध पुरूष से कर दिया जाता है और वह शादी के कुछेक दिनों बाद विधवा हो जाती है। वह एक बार फिर समाज की वर्जनाओं से उद्वेलित हो वनों में ही आसरा पाती है क्योंकि वन समाज की समस्त वर्जनाओं से मुक्त हैं।
छायावाद में वैयक्तिकता की पहचान प्रकृति के बीच होती है लेकिन भारतेन्दु युगीन कविता में यह अनुभूति भले न हो पाती हो पर भारतेन्दु युग में रहकर महेशनारायण ने इस अनुभूति को पहचाना। ‘स्वप्न‘ कविता में स्त्री द्वारा वैयक्तिकता की पहचान उनका प्रयोग उनकी नवीन दृष्टि और प्रयोगधर्मिता की परिचायक है। एक स्त्री का बार-बार वन में जाना, स्त्री की अव्यक्त भावनाओं को व्यक्त करना नहीं तो क्या है? स्त्री स्वाधीनता की प्रबल आकांक्षा नहीं तो क्या है? नामवर सिंह ने जिस छायावाद में प्रकृति प्रेम को द्विवेदी-युगीन आर्यसमाजी नैतिकता की प्रतिक्रिया का पहला सोपान और नारी-प्रेम की पृष्ठभूमि बताया है, वही भारतेंदु युगीन कविता ‘स्वप्न‘ में प्रकृति प्रेम समस्त नैतिकता की प्रतिक्रिया का प्रतिफलन है। इस कविता में स्त्री-प्रेम की अलग अवधारणा है। यह प्रेम भोग-विलास से कहीं ऊपर उठकर स्त्री-पुरुष के पारस्परिक संबंधों को नवीन अर्थों में परिभाषित करने का प्रयास करता है। यह प्रेम किसी प्रकार से स्त्री आधिपत्य पर आश्रित न होकर आधिपत्य लैस स्त्री अधिकारों का पक्षपाती है। अंततः महेशनारायण की प्रथम आधुनिक कविता ‘स्वप्न‘ एक महत्वपूर्ण कविता है। इसे नकारा जाना इसकी महत्ता पर प्रश्न चिन्ह लगाना है।

    संदर्भ सूची
1.डाॅ. मैनेजर पांडेय, आलोचना की सामाजिकता, वाणी प्रकाशन, प्र. संस्करण 2006, पृ. सं. 230
    2.माओत्से-तुंग, कला, साहित्य और संस्कृति, वाणी प्रकाशन, संस्करण 1994, पृ.द्ध
    3.सम्पादकः नामवर सिंह ,समकालीन भारतीय साहित्य, नवम्बर-दिसंबर 2007, पृ. 24
    4.महेशनारायण, स्वप्नः संपादक प्रो. महाकालेश्वर, अरण्यानी रांची, वर्ष 1984, पृ. 21
   5. डाॅ. मैनेजर पांडेय, आलोचना की सामाजिकता, वाणी प्रकाशन, प्र. संस्करण 2006, पृ. सं. 227-230
   6.वीरभारत तलवार, रस्साकशीः 19वीं सदी का नवजागरण और पश्चिमोत्तर प्रांत, सारांश प्रकाशन, दिल्ली,        संस्करण 2012, पृ. 187
   7.  वीरभारत तलवार, रस्साकशीः 19वीं सदी का नवजागरण और पश्चिमोत्तर प्रांत, सारांश प्रकाशन, दिल्ली,          संस्करण 2012, पृ. 197
   8.‘‘हिन्दी नवजागरण के लेखकों के सामने स्त्रियों की समस्याएँ नहीं थीं। उनके लिए खुद स्त्री ही एक                    समस्या थी जिस पर हर हाल  में काबू पाना था।‘‘
  9. वीर भारत, राष्ट्रीय नवजागरण और साहित्य; कुछ प्रसंगः कुछ प्रवृत्तियाँ, हिमाचल पुस्तक भण्डार,                दिल्ली, प्र सं. 1993, पृ. 125
  10.‘‘19वीं सदी के पुरुष सुधारकों का स्त्री-आन्दोलन कभी भी कस्बों या छोटे शहरों तक नहीं फैला, वह सिर्फ          कुछ बड़े शहरों तक सीमित रहा।‘‘
  11.वीर भारत, राष्ट्रीय नवजागरण और साहित्य; कुछ प्रसंगः कुछ प्रवृत्तियाँ, हिमाचल पुस्तक भण्डार,                 दिल्ली, प्र सं. 1993, पृ. 135
  12.‘‘गांधी तथा अन्य राष्ट्रीय नेता बाल विवाह के दुबारा पक्ष में तो थे, पर युवती विधवा विवाह के विरोधी             थे।‘‘
    13.महेशनारायण, स्वप्नः संपादक प्रो. महाकालेश्वर, अरण्यानी रांची, वर्ष 1984, पृ. 21-22
   14. महेशनारायण, स्वप्नः संपादक प्रो. महाकालेश्वर, अरण्यानी रांची, वर्ष 1984, पृ. 25
   15. महेशनारायण, स्वप्नः संपादक प्रो. महाकालेश्वर, अरण्यानी रांची, वर्ष 1984, पृ. 27-28
   16.महेशनारायण, स्वप्नः संपादक प्रो. महाकालेश्वर, अरण्यानी रांची, वर्ष 1984, पृ. 25
   17. महेशनारायण, स्वप्नः संपादक प्रो. महाकालेश्वर, अरण्यानी रांची, वर्ष 1984, पृ. 26-27
  18.राजेन्द्र यादव, ‘बाजार स्त्री की छवि गढ़ता है‘, स्त्रीकाल, संपादक संजीव-चंदन, अंक-7,अप्रैल, 2010, पृ.                117
  19. राजेन्द्र यादवः संपादक, हंस, अक्ट. 1994, पृ. 36
  20. राजेन्द्र यादव, बाजार स्त्री की छवि गढ़ता है, स्त्रीकाल संपादक संजीव-चंदन, अंक-7,अप्रैल, 2010, पृ.                117
  21. संपादकः राजेन्द्र यादव, हंस, अक्ट‐ 1994, पृ. 36
  22.  राधा कुमार, स्त्री संघर्ष का इतिहास 1800-1900, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 2011, पृ. 338
         सितम्बर, 1987 में राजस्थान के एक गाँव में हुई सती की एक घटना से इस आंदोलन की शुरूआत हुई।             इस आंदोलन के दौरान बड़ी गर्मागर्म बहस हुई। इस बहस में न केवल हिंदू स्त्रियों के प्रति होनेवाले अच्छे-         बुरे बर्ताव के मुद्दे उठाए गए बल्कि धार्मिक पहचान, सामुदायिक स्वायत्तता तथा भारत के बहुआयामी,             विविध समाज में कानून एवं राज्य की भूमिका के प्रश्न भी उठे।
   23.नामवर सिंह, छायावाद, राजकमल प्रकाशन, संस्करण 2007, पृ. 52  
  24.महेशनारायण, स्वप्नः संपादक प्रो. महाकालेश्वर, अरण्यानी रांची, वर्ष 1984, पृ.द्ध
  25. महेशनारायण, स्वप्नः संपादक प्रो. महाकालेश्वर, अरण्यानी रांची, वर्ष 1984, पृ. 23
  26.नामवर सिंह, छायावाद, राजकमल प्रकाशन, संस्करण 2007, पृ. 36  
  27.नामवर सिंह, छायावाद, राजकमल प्रकाशन, संस्करण 2007, पृ. 37 

शोधार्थी,भारतीय भाषा केंद्र,जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय


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हिन्दी कविता का स्त्रीवादी स्वर: अनामिका

पिछले दिनों स्त्री रचनाकारों पर हमले और स्त्रीवादी संघर्ष दोनो की प्रतीक बनी अनामिका का आज जन्मदिन (17 अगस्त) है. वे हिन्दी साहित्य की उन चुनिन्दा रचनाकारों में हैं जो न सिर्फ स्त्रीवादी लेखन करती हैं, बल्कि खुद को स्त्रीवादी घोषित भी करती हैं. उनकी सात कविताएं उनके स्वर में.

किसने फैलाई गरीबों को विदेशी औरत मुहैया कराने की खबर और कौन काट रहा महिलाओं की चोटी

विकाश सिंह मौर्य

शोधार्थी,
इतिहास विभाग, डी.ए.वी.पी.जी. कॉलेज,
बी.एच.यू. वाराणसी. संपर्क : vikashasaeem@gmail.com

11 अगस्त 2017 को मैं अपने रिसर्च पेपर के लिए फील्ड वर्क पर चित्रकूट जिले के बरगढ़, मानिकपुर के आस-पास भ्रमण पर था, तभी ये दो घटनायें मेरे सामने हुई. पहली घटना इस प्रकार है.  

यह 11 अगस्त को चित्रकूट जिले के बरगढ़ में क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक के पास फिरोज के सब्जी की दुकान के पास की घटना है. 11 अगस्त शुक्रवार को एक खबर पूरे क्षेत्र में बड़ी तेजी से उड़ी कि रात में फिरोज की पत्नी के बाल किसी ने काट लिए हैं, यह खबर सोशल मीडिया में भी काफी तीव्र गति से फैली. इसकी फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट इस तरह से मिली.

श्री बुद्धराज मौर्य जिन्हें आसपास के लोग बुधराम कहते हैं. यहाँ के जागरूक नागरिक एवं बुंदेलखंड के इस मऊ-मानिकपुर पठारी क्षेत्र के एक प्रगतिशील किसान हैं. अपनी सब्जी (नेनुआ) लेकर सुबह लगभग 11 बजे फिरोज की दुकान के पास पहुंचे और चूँकि उस समय तक यह खबर आग की तरह फ़ैल चुकी थी, तब ऐसे में स्वाभाविक था कि इस पर कुछ चर्चा हो और घर-परिवार के हालात पर कुछ बातचीत हो. प्रस्तुत है उस बातचीत का ज्यों का त्यों विवरण-
बुधराम- और भाई सलाम !
फिरोज- नमो बुद्धाय ! बुधराम भाई. अउर बतावा.
बुधराम- आपन हाल-चाल बतावा. सब ठीक है न.
फिरोज- जसरा अस्पताल से बस अबहिंये चले आवत लाग हन.
बुधराम- फ़िलहाल तबियत तो ठीक है न.
फिरोज- हाँ, अबे (अभी) तो सही है. जल्दी ठीक होइ जयी.
बुधराम-(मजाक में) यार तू त… मुसलमान अह… तोहरे बीबी के साथै ई कइसे होइगा?
फिरोज- हम त अपने बिटिया का अस्पताल मा भरती कराये रहेन. ओकर तबियत कुछ ख़राब रही है. बीबी त ठीक है. ओका कहाँ कुछौ भा है.
बुधराम- सुने हन अउर चारों तरफ हल्लौ मचा है कि तुहरे बीबी के चोटी कट गइ है रात मा.
फिरोज- का बुधराम भाई. अच्छा मजाक है इया. अइसा है, हम आहेन मुसलमान. चोटी काटै वाले के सारे के घुटकी (गर्दन) न काट लेब?

इस घटना के बाद से ही लगभग पांच महिलाएं मारे डर और भय के बेहोस हो गयीं हैं. दो तो अपने छतों से नीचे भी गिर गयीं. इस मामले पर अभिलाष का कहना है कि ‘यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है कि अभी तक किसी भी पढ़े-लिखे, जागरूक और बुद्धिमान घर में चोटी कटने-काटने की कोई घटना नहीं हुई है. और न ही ऐसी कोई घटना समाज व धर्म के ठेकेदारों यथा ब्राम्हण और ठाकुर परिवार में घटित हुई है.’ अभिलाष एक जागरूक परिवार से आते हैं. एवं इन्होने सरदार वल्लभ भाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ से एग्रीकल्चर की मास्टर डिग्री हासिल किया है.

दूसरी घटना और दिलचस्प है. इस समय इस क्षेत्र के डभौरा, मानिकपुर, रानीपुर, सकरौंहा, अइलहा, चुरेह कशेरुआ आदि गाँवों में यह अफवाह फैली हुई है कि ‘कुछ विदेशी औरतों को अन्त्योदय कार्ड धारकों के यहाँ भेजा जायेगा. वे लोग इनकी देखभाल और जैसे भी चाहें रखें.’ राशन और मिट्टी का तेल लेने तक भी लोग राशन की सरकारी दूकानों में नहीं जा रहे हैं. क्योंकि यह खबर पूरे क्षेत्र में फैली है कि कोटेदार गल्ला देने के साथ ही इन कार्डधारकों का फार्म भी औरतों के लिए भरवा रहा है. इसके पीछे का सच जानने की कोशिश में अफवाह फ़ैलाने वालों में से ही एक शख्स मानिकपुर तहसील के पास इत्तफाक से मिल गए.

ये क्षेत्र के बहुत सम्मानित व्यक्तियों में से एक हैं. इनके बड़े भाई ब्लाक प्रमुख भी रह चुके हैं. फिलहाल इनका दावा है कि इस प्रकार के काम जिन्होंने किये हैं, उनके इरादे ये अच्छी तरह से जानते हैं. इस अफवाह के पीछे की हकीकत इन्हें मालूम है. इन साहब से किसी ने कहा कि ‘का भैया इया सच आय कि गाँव मा औरत बंट रही हैं?’ इन्होने कहा कि पता नहीं बंट रही हैं कि नहीं पर बढ़ जरुर रही हैं.

इन दिनों उनके घर में चार सालियाँ (दो इनकी और दो भाइयों की) आई हुई हैं. इस खबर से कई लोग जो बाहर थे. अपने गाँव आ गए. इधर आस-पास के गाँव के लोग भी जिनकी रिश्तेदारी इने गाँव में है, अपनी रिश्तेदारियों में जा-जाकर इस बात की तस्दीक कर आये. और किसानी के इस सर्वाधिक माकूल मौसम में अपना अमूल्य समय और पैसे भी बरबाद कर के आये. अगर एक व्यक्ति कम से कम 200/- रूपये भी खर्च किया होगा तो कम से कम पचास लोग तो आये ही होंगे. ऐसे में कम से कम 10,000/- रुपये बरबाद हुए.

आपको बता दें कि यह इलाका बुंदेलखंड का सर्वाधिक सूखा ग्रस्त क्षेत्र है. पठारी जमीन होने के कारण प्राकृतिक रूप से भी पानी की बहुत कमी है. बीते मार्च महीने से ही पानी के टैंकरों द्वारा पीने के लिए पानी की सप्लाई हो रही थी. ऐसे में इतना समय और पैसा बरबाद करने का मतलब क्या होगा? आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है. इस क्षेत्र में शिक्षा की कमी अत्यधिक कमी है. आज भी कोलों (कोल, आदिवासी समुदाय) और अन्य जातियों यथा यादव, मौर्य आदि जातियों के लोगों में बिरले ही इंटर पास लड़के मिलेंगे. लड़कियों की स्थिति तो और भी ख़राब है. ठाकुरों और ब्राम्हणों की लड़कियां भी बमुश्किल ही इंटर पास मिलती हैं. साथ ही यह इलाका जंगल, पहाड़ और दस्यु बहुल भी है. अब इस तरह की अफवाहों के पीछे क्या मकसद हो सकता है? इसकी पहचान आसानी से की जा सकती है.

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
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प्रतिमा की कविताएँ ( कहाँ हो विधाता ! और अन्य)

प्रतिमा

विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कवितायेँ प्रकाशित. संपर्क :
rjpratima@gmail.com

सेनाएँ
कभी नहीं जाती
सेनाएँ हड़ताल पर
बेमौत मरने के खिलाफ
नहीं उठाती आवाज़ कभी
न जाने क्यों ?
बुद्ध की असंख्य मूर्तियाँ
नहीं बिछा देती रणभूमि में
नहीं लिखती कविताएँ
मृत्यु के खिलाफ
न जाने क्यों ?
हर देश में कश्मीर होना जरुरी है
जहाँ चलता रहे मौत का प्रशिक्षण अनवरत
जहाँ की उर्वर मिट्टी में
मिला दिए जाते खाद की जगह बारूद
और खिलंदड़ करते युवाओं को
बना दिया जाता सेनाओं का जत्था
प्रेमिकाओं के ख्वाब में डूबे रहनेवाले
कोमल कच्चे मन को
तोपों और बमों के बीच
सिखाया जाता खूनी खेल
बनाया जाता खूंखार
और बाँटा जाता है मौत का तगमा
न जाने क्यों ?

सेनाएँ खामोश खड़ी है
हाथों में लिए बन्दूक
क्यों नहीं सवाल करती
क्यों नहीं हड़ताल करती
क्यों नहीं बन्दूक की नलियों में भर देती स्याही
क्यों नहीं उठाती कूची
और बना देती नवजात शिशु का चित्र
सरहदों के काँटेदार तारों पर
नहीं सुखाती खून से सनी हुई अपनी कमीजें
न जाने क्यों  ?


 जाने क्यों  नहीं टूटती आस !

जाने क्यों ?
लगी रहती है आँखें सड़क के मोड़ पर
टकटकी लगाए करती है इन्तजार
कि अनायास कभी
काका, मौसी, बुआ, मामा…
आ जाएँगे लेने बिटिया का हाल
कि ले आएँगे पोटली में बाँधकर
तिलौड़ी, फुलौड़ी के साथ अथाह दुलार
माया में सिमटकर करेंगे ढ़ेरों इधर-उधर की बातें
ढ़ूँढ़ेंगे घर के कोने में पड़ी मेरी हँसी
उदासी का सबब ढ़ूढ़ेंगे
और मुझसे नजरें बचाकर
नाप लेंगे घर का सन्नाटा
टटोलेंगे किसी रैख पर पड़ी सुख-दु:ख की थैली
टूटी हुई चप्पल को देखकर
लगा लेगें तंगी का हिसाब
तलाशेंगे मेरे रतजगे का कारण
और हिलसकर फेरेंगे मेरे सिर पर
अपना स्नेहमय हाथ
कि माँ-पिता के बाद भी
माँ के घर नहीं सूखा है अभी
तुम्हारे हिस्से का पोखर
आ जाओ जब जी करे
डूब लो उसमें, और भिगा लो अपना मन !

कहाँ हो विधाता !

घनघोर अन्हरिया है विधाता
हाथो-हाथ नहीं सूझ रहा
कौन जलाएगा डिबिया
चित्त उचट गया है, उसके जाने के बाद से
क्यों नहीं सोचा वो जहर खाने से पहले
कि कैसे होगी कटनी, बैल का पैसा कौन भरेगा
कौन चुकाएगा बैंक का कर्ज, और बनिया कैसे मानेगा
मतारी छाती कूट रही है दिन-रात

सबके खेत में हँसिया लहरा रही है
बोझा बन रहा है कतार से
सीस चुन रह हैं बच्चे दौड़ दौड़कर
मेरा खेत उदाम पड़ा है
किसको फुरसत है हाथ बटाने की
कौन सुनेगा मुझ अभागन को
बचे हुए धान का कैसे होगा हिसाब
कितना बटैया मिलेगा
और क्या भेजूँगी बबनी के ससुराल
भोरे भोर महाजन आएगा
नहीं काटने देगा फसल
बैल भी खोलकर ले जाएगा
करेगा मुझे तार-तार
बच्चे देखेंगे टुकुर टुकुर
अधीर हो जाएँगे बिना बाप के
कहाँ से बाँधू धीरज
जाने कहाँ हो विधाता !

 मुंबई मेरी जान 

मुंबई में हाई अलर्ट था
लोग काम में मशगूल थे
माँ बिस्तर पर लेटी हुई थी
बाहर खेल रहा बच्चा
भागा हुआ माँ के पास आया
और सटकर खड़ा हो गया
बताने लगा अपने दोस्तों के बारे में
माँ की नीची झुकी हुई नज़रें उसे देख रही थी
उसकी ठोढ़ी पर हाथ फेरी

वो माँ से और सट गया

मुँह में मुँह सटाकर
अपने दोस्तों की शिकायत करने लगा
झगड़ा के बारे में बताने लगा
माँ के गर्दन में पड़े माला से खेलने लगा
माँ ने कहा ‘बहार जाकर खेलो’
पर उसे अपना दूध याद आया
वो माँ की छाती का कपड़ा खीचकर अन्दर झाँका
और पेट पर चढ़कर बैठ गया
माँ ने कहा ‘बहार जाकर खेलो’
वो छाती से चिपककर लेट गया
माँ थपकियाँ देने लगी और वो सो गया
उसकी बाहें माँ की गर्दन से लटक रही थी
वो सपने में दूध पी रहा था
माँ बाल सहला रही थी
और विस्फोटकों का जखीरा
सही सलामत मुंबई पहुँचा दिया गया

 मुक्त करो इस मानव को

कौन है वो क्रूर मेरे भीतर
जो करता है ममता को शर्मसार
और देता है चुनौती
कि एक संतान को चुनो
या चुनो दूसरे को
ऐसा मुमकिन नहीं कि
एक ही गोद में दोनों का सिर रखकर
साथ में दो थपकियाँ,
एक ही आँचल से पोछो
दोनों के माथे पर छलका पसीना,
और न ही ये संभव है कि
एक ही थाली में सानकर भात
भर दो हम दोनों का पेट

अब तुम्हें चुनना होगा
दोनों में से किसी एक को
किसका भरना चाहोगी पेट
किसे पुचकारोगी प्रेम से
किसकी तकलीफ में
छटपटाओगी रात भर
और अधीर होकर
किसे समेटोगी बार बार सीने में

भले हम एक ही कोख में पले
एक ही छाती से तुमने दूध पिलाई हो भले
पर अब तुम्हे चुनना होगा
किसी एक का सुख-दु:ख
एक का हँसना-गाना
कोख में उलटने-पलटने की यादें
और बचपन की मासूम हरकतें

भले तुम उसी के साथ चली जाओ
जो करती नहीं परवाह उस समाज की
जो देता है मेरे हाथों में
परिवार का बागडोर
जिम्मेदारियों को निभाने की शक्ति
संस्कृति को समझने का नजरिया
दिखाता है सत्ता का रंग
लुभाता है
बताता है पुरुष होने का महत्व
करवाता है खतरनाक काम
और
बदले में ले लेता है
माँ, पिता, भाई, बहन
मेरा सारा बचपन
सारी दुआएँ
सारी लोरियाँ
सारी थपकियाँ

बचपन से ही मेरे पाँव में
बान्धता है कई जँजीरें
तुम्हारी आँचल की छाँव से दूर
फेकता है जलती अलाव पर
बना देता है मुझे क्रूर
जो तय कर सके ममता की आयु
रख सके प्रेम का हिसाब
और देते रहे ब्यौरा
कि किसका करना है बहिष्कार
और किसे स्वीकृति देनी है

मैं करता रहा, मैं करता रहा
मैं मरता रहा, मैं मरता रहा
मैं लड़ता रहा ,मैं लड़ता रहा
सारे मानवी मूल्यों को
‘मनु’ के साँचे में ढ़ालता रहा
सवालों का सिर मरोड़ता रहा
गिरता रहा, सम्भलता रहा
तड़पता रहा, धधकता रहा
तलाशता रहा तेरी आँचल का छोर
जिसे फाड़कर
पाँव की बेड़ियों में तब लपेट लिया था
जब रिवाजों को ढ़ोते हुए
कमजोर पड़ा था मैं

अकेले चलते चलते
अब थक गया हूँ माँ !
लोग आगे निकल गए हैं
मैं छूट गया हूँ बहुत दूर
पीछे जलती धूप है और
आगे है अलाव
आकर सम्भालो मुझे
मुझसे बचा लो मुझे
लोरी सुना दो मुझे
नींद अब आती नहीं
छटपटाती रातों में
बिस्तर के सिलवटों पर
ढूँढ़ता हूँ तुम्हारा स्पर्श
सिरहाने आकर खड़ी होती हो तुम
मुझे पहचानती नहीं
मुझे पुचकारती नहीं
गुनगुनाती नहीं कोई लोरी
नहीं देती हल्की-सी थपकियाँ
मैं सदियों से जाग रहा हूँ
पर अब मुझको सोना है
करो तुम दोनों हाथ उठाकर
एक बार फिर से मेरे लिए प्रार्थना
हाय समाज ! ओ रे समाज !
अब मुक्त करो इस मानव को !



 सभ्यता 

स्कूल जाते हुए बच्चे
ढ़ो रहे हैं पीठ पर

सभ्यताओं का बोझ
झाड़ रहे हैं
बस्ते पर जमी धूल
पोखर के घाट पर जा
धो आते एड़ियाँ बार बार
फिर भी घर लौटते हुए
लथपथ हो जाते उनके तलवे

  स्त्री आन्दोलन

पूरी दुनियाँ की स्त्री अगर
कर दे आन्दोलन अपने शोषक के खिलाफ
अगर खोया हुआ हक माँगे
माँगे अपना पूरा अधिकार
तो ये समाज ढ़ह जाएगा धड़धड़ाकर
लेखकों की कलमें डूब जाएगी नीमरस में
शायर तड़पेंगे रातों को
चाँद नाले में उतर आएगा
प्रेमिकाओं का चेहरा विभत्स हो जाएगा,
डरावना हो जाएगा

देह नहीं रह जाएगा भूल भुलैया
नख से लेकर शिख तक का सफर
सौन्दर्य का गुफा नहीं रह पाएगा
नहीं बन पाएगी विभत्स ब्लू फिल्में
और हाथों में अपना देह लिए स्त्री
नहीं लुभा पाएगी पुरुषों को
नहीं दिखा पाएगी योनि में कोई तिलिस्म

अगर पूरी दुनियाँ की स्त्री
आन्दोलन कर दे अपने शोषक के खिलाफ
तो ढ़ह जाएगा ये समाज
विद्रूप हो जाएगा इतिहासकारों का चेहरा
रंग उतर जाएगा दुनिया के महान चित्रों से
स्त्री सौन्दर्य की देवी नहीं रह जाएगी
बाप और बेटों द्वारा छली नहीं जाएगी
पतियों द्वारा रौंदी नहीं जाएगी
न ही छुपाई जाएगी
न ही दिखाई जाएगी कपड़ों के अलग-अलग हिस्सों से
टांग दी जाएगी दीवारों पर नंगी
या काट दिए जाएँगे स्तन बेहिसाब
भर दिए जाएँगे योनि में शीशा या पत्थर
पर नहीं लिख पाएगा खोखला इतिहास
नहीं गढ़ पाएगा कोई झूठा साहित्य
नहीं लिखेगा कोई “लंगड़ा स्मृति”
नहीं भरेगा कोई पुरुष होने का स्वांग

पूरी दुनिया की स्त्री
अगर वारिस को पालने से इनकार कर दे
गिरा दे गर्भ बिना किसी से पूछे
या नाले में बहा दे छाती का सारा दूध
सोने की कड़ियाँ उछाल दे आसमान में
तो ये समाज ढ़ह जाएगा धड़धड़ाकर
ढ़ह जाएगा ये ढ़ाँचा
बह जाएगी वो सारी उतकृष्ट रचनाएँ
जो रची गई है स्त्रीदेह के आसपास

अगर पूरी दुनिया की स्त्री माँग ले अपना पूरा अधिकार
तो सबसे पहले कठघरे में होंगे पिता और पुत्र
फिर आएँगे बारी-बारी से हर एक पुरष
राजाओं की गद्दियाँ गिर जाएगी
गिर जाएगा पूरा समाज

अगर पूरी दुनिया की स्त्री
अपनी लाश बिछाने से कर दे इनकार
माँगे इन्सान होने का पूरा हक़
तो सबसे पहले मरेंगे देवता
फिर मरेगी सत्ता
मर जाएगी पुरुष की बनाई ये दुनिया
फिर मरेगा सारा झूठ
और सबसे अन्त में मर जाएगा पुरूष
और खत्म हो जाएगा स्त्री आन्दोलन

 भरोसा नहीं 

भरोसा नहीं रहा
कि आनेवाले बच्चों को
दे पाएँगे कोई ढब की ज़िंदगी, लेकिन
शिक्षा पर भरोसा है
भरोसा नहीं कि हो पाएगा अब
किसी के भी साथ न्याय, लेकिन
न्यायपालिका पर भरोसा है
भरोसा नहीं कि अब न आए
कोई जन-विरोधी नीति, लेकिन
व्यवस्था पर भरोसा है
भरोसा नहीं कि ये सभ्यता
बर्बरता को कम कर पाए, लेकिन
सभ्यता पर भरोसा है
भरोसा नहीं कि कोई भी संसद
मनुष्य को संसाधन न समझे, लेकिन
संविधान पर भरोसा है
भरोसा नहीं कि धूप दे हमेशा गर्माहट
और आसमान से केवल पानी ही बरसे, लेकिन
सरकार पर भरोसा है
भरोसा नहीं कि राजनितिक खेल का परिणाम

हो हमारे हित में, लकिन
नेताओं पर भरोसा है
भरोसा नहीं कि हमारा जीना-मरना
अकेले ईश्वर ही तय कर रहे, लेकिन
ईश्वर पर भरोसा है
भरोसा नहीं कि कोई भी स्तम्भ अब
उठाने लायक रहा नई पीढ़ी का भार, लेकिन
लोकतंत्र पर भरोसा है .

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चंद्रकांत देवताले की याद में उनकी कविताएं : बाई दरद ले ले और अन्य

साठोत्तरी हिन्दी हिन्दी कविता के प्रमुख हस्ताक्षर चंद्रकांत देवताले नहीं रहे. उन्हें आदरांजलि देते हुए उनकी कुछ स्त्रीवादी कविताएं: 

माँ पर नहीं लिख सकता कविता 

माँ के लिए सम्भव नहीं होगी मुझसे कविता
अमर चिऊँटियों का एक दस्ता मेरे मस्तिष्क में रेंगता रहता है
माँ वहाँ हर रोज़ चुटकी-दो-चुटकी आटा डाल देती है
मैं जब भी सोचना शुरू करता हूँ
यह किस तरह होता होगा

घट्टी पीसने की आवाज़ मुझे घेरने लगती है
और मैं बैठे-बैठे दूसरी दुनिया में ऊँघने लगता हूँ
जब कोई भी माँ छिलके उतार कर
चने, मूँगफली या मटर के दाने नन्हीं हथेलियों पर रख देती है
तब मेरे हाथ अपनी जगह पर थरथराने लगते हैं
माँ ने हर चीज़ के छिलके उतारे मेरे लिए
देह, आत्मा, आग और पानी तक के छिलके उतारे
और मुझे कभी भूखा नहीं सोने दिया
मैंने धरती पर कविता लिखी है
चन्द्रमा को गिटार में बदला है
समुद्र को शेर की तरह आकाश के पिंजरे में खड़ा कर दिया
सूरज पर कभी भी कविता लिख दूँगा
माँ पर नहीं लिख सकता कविता!

मैं अभी-अभी माँ से मिलकर आया हूँ 

वहाँ जैसे सभी कुछ आइने के भीतर बसा था
मै वहीं से अभी-अभी माँ के पास से आया हूँ
उसकी आँखों में आँसू नहीं थे
और वह वैसी परेशान-खटकरम में जुटी हुई नहीं थी
जैसी हम लोगों को बड़ा करते
इस दुनिया के उस चार कमरों वाले घर में ताज़िन्दगी रही

उसने मुझसे कुछ भी जानने की कोशिश नहीं की
जैसे उसे पता था सब कुछ
उसने मुझे उन निगाहों से भी देखा
जो सारे अपराधों को मुआफ़ी देती है

एक बार मर चुकने के बाद वह अमर हो गई थी
मैं उसके लिए सिर्फ़ एक भुक्ति हुई गूँज था
जो कभी उसके अतीत की धड़कन थी
उस थोड़े से बेआवाज़ वक़्त में
पत्थर का एक घोड़ा और दो कुत्ते ज़रूर दिखे
कुत्तों के प्रति अपने प्रेम के कारण
हाथ फेरा एक के माथे पर
तो उसका उतना हिस्सा रेत की तरह बिखर गया

चाहते हुए भी माँ को नहीं छुआ मैंने
पता नहीं किन-किन दुखों-स्मृतियों से भरी थी उसकी देह
मैंने चाहा किसी भी तरह मै देख पाऊँ
उन स्तनों को चूसते हुए अपने होंठ
कैसे युद्ध, मंदी और फाका-मस्ती के उन दिनों में
चिपटे हुए उसके पेड़ का पक्षी बन जाता था मैं

मैं उसे नहीं बता पाया
की कसाईख़ाने में काम करते शाकाहारी की तरह
मै ज़िन्दा हूँ इस दुनिया में
और शामिल हूँ उन्ही में जो
अपनी करुणा की तबाही और
अपने साहस की हत्या के लिए
दूसरों को अपराधी समझ रहे हैं

मै अभी-अभी माँ से मिलकर आया हूँ
और पुरखों की प्यास को चाट रहा हूँ
माँ से अपने ढंग की इस अकेली-अधूरी मुलाक़ात के बारे में

कोई सबूत देना संभव नहीं
यह न तो सपने में हुई
और न इसके लिए मुझे मृतकों में शामिल होना पड़ा ।

बाई दरद ले ले 

तेरे पास और नसीब में जो नहीं था
और थे जो पत्थर तोड़ने वाले दिन उस सबके बाद
इस वक़्त तेरे बदन में धरती की हलचल है
घास की ज़मीन पर लेटी
तू एक भरी पूरी औरत आंखों को मींच कर
काया को चट्टान क्यों बना रही है

बाई तुझे दरद लेना हैं
जिन्दगी भर पहाड़ ढोए तूने
मुश्किल नहीं है तेरे लिए दरद लेना

जल्दी कर होश में आ वरना उसके सिर पर जोर पड़ेगा
पता नहीं कितनी देर बाद रोए या ना भी रोए
फटी आंख से मत देख
भूल जा जोर जबरदस्ती की रात
अँधेरे के हमले को भूल जा बाई

याद कर खेत और पानी का रिश्ता
सब कुछ सहते रहने के बाद भी
कितना दरद लेती है धरती
किस किस हिस्से में कहॉ कहॉ
तभी तो जनम लेती हैं फसलें
नहीं लेती तो सूख जाती सारी हरियाली
कोयला हो जाते जंगल
पत्थर हो जाता कोख तक का पानी

याद मत कर अपने दुखों को
आने को बेचैन है धरती पर जीव
आकाश पाताल में भी अट नहीं सकता
इतना है औरत जात का दुःख
धरती का सारा पानी भी
धो नहीं सकता
इतने हैं आंसुओं के सूखे धब्बे

सीता ने कहा था – फट जा धरती
ना जाने कब से चल रही है ये कहानी
फिर भी रुकी नहीं है दुनिया
बाई दरद ले!
सुन बहते पानी की आवाज़
हाँ ! ऐसे ही देख ऊपर हरी पत्तियां
सुन ले उसके रोने की आवाज़
जो अभी होने को है
जिंदा हो जायेगी तेरी देह
झरने लगेगा दूध दो नन्हें होंठों के लिए

बाई! दरद ले

बेटी के घर लौटना।

बहुत जरूरी है पहुँचना
सामान बाँधते बमुश्किल कहते पिता
बेटी जिद करती
एक दिन और रुक जाओ न पापा
एक दिन

पिता के वजूद को
जैसे आसमान में चाटती
कोई सूखी खुरदरी जुबान
बाहर हँसते हुए कहते कितने दिन तो हुए
सोचते कब तक चलेगा यह सब कुछ
सदियों से बेटियाँ रोकती होंगी पिता को
एक दिन और
और एक दिन डूब जाता होगा पिता का जहाज

वापस लौटते में
बादल बेटी के कहे के घुमड़ते
होती बारीश आँखो से टकराती नमी
भीतर कंठ रूँध जाता थके कबूतर का

सोचता पिता सर्दी और नम हवा से बचते
दुनिया में सबसे कठिन है शायद
बेटी के घर लौटना।

दो लड़कियों का पिता होने से 

पपीते के पेड़ की तरह मेरी पत्नी

मैं पिता हूँ

दो चिड़ियाओं का जो चोंच में धान के कनके दबाए

पपीते की गोद में बैठी हैं

सिर्फ़ बेटियों का पिता होने से भर से ही

कितनी हया भर जाती है

शब्दों में

मेरे देश में होता तो है ऐसा

कि फिर धरती को बाँचती हैं

पिता की कवि-आंखें…….

बेटियों को गुड़ियों की तरह गोद में खिलाते हैं हाथ

बेटियों का भविष्य सोच बादलों से भर जाता है

कवि का हृदय

एक सुबह पहाड़-सी दिखती हैं बेटियाँ

कलेजा कवि का चट्टान-सा होकर भी थर्राता है

पत्तियों की तरह

और अचानक डर जाता है कवि चिड़ियाओं से

चाहते हुए उन्हें इतना

करते हुए बेहद प्यार।

वह औरत 

वह औरत
आकाश और पृथ्वी के बीच
कब से कपड़े पछीट रही है,

पछीट रही है शताब्दिशें से
धूप के तार पर सुखा रही है,
वह औरत आकाश और धूप और हवा से
वंचित घुप्प गुफा में
कितना आटा गूंध रही है?
गूंध रही है मानों सेर आटा
असंख्य रोटियाँ
सूरज की पीठ पर पका रही है,

एक औरत
दिशाओं के सूप में खेतों को
फटक रही है
एक औरत
वक़्त की नदी में
दोपहर के पत्थर से
शताब्दियाँ हो गईं
एड़ी घिस रही है,

एक औरत अनंत पृथ्वी को
अपने स्तनों में समेटे
दूध के झरने बहा रही है,
एक औरत अपने सिर पर
घास का गट्ठर रखे
कब से धरती को
नापती ही जा रही है,

एक औरत अँधेरे में
खर्राटे भरते हुए आदमी के पास
निर्वसर जागती
शताब्दियों से सोयी है,

एक औरत का धड़
भीड़ में भटक रहा है
उसके हाथ अपना चेहरा ढूँढ रहे हैं
उसके पाँव
जाने कब से
सबसे
अपना पता पूछ रहे हैं

घर में अकेली औरत के लिए 

तुम्हें भूल जाना होगा समुद्र की मित्रता
और जाड़े के दिनों को
जिन्हें छल्ले की तरह अंगुली में पहनकर
तुमने हवा और आकाश में उछाला था
पंखों में बसन्त को बांधकर
उड़ने वाली चिडिया को पहचानने से
मुकर जाना ही अच्छा होगा……

तुम्हारा पति अभी बाहर है तुम नहाओ जी भर कर
आइने के सामने कपड़े उतारो
आइने के सामने पहनो
फिर आइने को देखो इतना कि वह तड़कने को हो जाए
पर तड़कने के पहले अपनी परछाई हटा लो
घर की शान्ति के लिए यह ज़रूरी है
क्योंकि वह हमेशा के लिए नहीं
सिर्फ़ शाम तक के लिए बाहर है
फिर याद करते हुए सो जाओ या चाहो तो अपनी पेटी को
उलट दो बीचोंबीच फ़र्श पर
फिर एक-एक चीज़ को देखते हुए सोचो
और उन्हें जमाओ अपनी-अपनी जगह पर

अब वह आएगा
तुम्हें कुछ बना लेना चाहिए
खाने के लिए और ठीक से
हो जाना होगा सुथरे घर की तरह
तुम्हारा पति
एक पालतू आदमी है या नहीं
यह बात बेमानी है
पर वह शक्की हो सकता है
इसलिए उसकी प्रतीक्षा करो
पर छज्जे पर खड़े होकर नहीं
कमरे के भीतर वक्त का ठीक हिसाब रखते हुए
उसके आने के पहले
प्याज मत काटो
प्याज काटने से शक की सुरसुराहट हो सकती है
बिस्तर पर अच्छी किताबें पटक दो
जिन्हें पढ़ना कतई आवश्यक नहीं होगा
पर यह विचार पैदा करना अच्छा है
कि अकेले में तुम इन्हें पढ़ती हो…….

बालम  ककड़ी बेचने वाली लडकियां

कोई लय नहीं थिरकती उनके होंठों पर

नहीं चमकती आंखों में

ज़रा-सी भी कोई चीज़

गठरी-सी बनी बैठी हैं सटकर

लड़कियाँ सात सयानी और कच्ची उमर की

फैलाकर चीथड़े पर

अपने-अपने आगे सैलाना वाली मशहूर

बालम ककड़ियों की ढीग

सैलाना की बालम ककड़ियाँ केसरिया और खट्टी-मीठी नरम

– जैसा कुछ नहीं कहती

फ़क़त भयभीत चिड़ियों-सी देखती रहती हैं

वे लड़कियाँ सात

बड़ी फ़जर से आकर बैठ गई हैं पत्थर के घोड़े के पास

बैठी होंगी डाट की पुलिया के पीछे

चौमुखी पुल के पास

होंगी अभी भी सड़क नापती बाजना वाली

चाँदी के कड़े ज़रूर कीचड़ में सने

पाँवों में पुश्तैनी चमक वाले

होंगी और भी दूर-दूर

समुद्र के किनारे पहाड़ों पर

बस्तर के शाल-वनों की छाया में

माँडू-धार की सड़क पर

झाबुआ की झोपड़ियों से निकलती हुई

पीले फूल के ख़यालों के साथ

होंगी अंधेरे के कई-कई मोड़ पर इस वक्त

मेरे देश की

कितनी ही आदिवासी बेटियाँ

शहर-क़स्बों के घरों में

पसरी है अभी तक

अन्तिम पहर के बाद की नींद

बस शुरू होने को है थोड़ी ही देर में

कप-बसी की आवाज़ों के साथ दिन

लोटा भर चाय पीकर आवेंगे धोती खोंसते

अंगोछा फटकारते

खरीदने ककड़ी

उम्रदराज़ सेठ-साहूकार

बनिया-बक्काल

आंखों से तोलते-भाँपते ककड़ियाँ

बंडी की जेबों से खनकाते रेजगी

ककड़ियों को नहीं पर लड़कियों को मुग्ध कर देगी

रेजगी की खनक आवाज़

कवि लोग अख़बार ही पढ़ते लेटे होंगे

अभी भी कुढ़ते ख़बरों पर

दुनिया पर हँसते चिलम भर रहे होंगे सन्त

शुरू हो गया होगा मस्तिष्क में हाकिमों के

दिन भर की बैठकों-मुलाक़ातों

और शाम के क्लब-डिनर का हिसाब

सनसनीख़ेज ख़बरों की दाढ़ी बनाने का कमाल

सोच विहँस रहे होंगे मुग्ध पत्रकार

धोती पकड़ फहराती कार पर चढ़ने से पहले

किधर देखते होंगे मंत्री

सर्किट हाउस के बाद दो बत्ती फिर घोड़ा

पर नहीं मुसकाकर पढ़ने लगता है मंत्री काग़ज़

काग़ज़ के बीचोंबीच गढ़ने लगता है अपना कोई फ़ोटू चिंन्तातुर

नहीं दिखती उसे कभी नहीं दिखतीं

बिजली के तार पर बैठी हुई चिड़ियाएँ सात

मैं सवारी के इन्तज़ार में खड़ा हूं

और

ये ग्राहक के इन्तज़ार में बैठी हैं

सोचता हूँ

बैठी रह सकेंगी क्या ये अंतिम ककड़ी बिकने तक भी

ये भेड़ो-सी खदेड़ी जाएंगी

थोड़ा-सा दिन चलने के बाद फोकट में ले जाएगा ककड़ी

संतरी

एक से एक नहीं सातों से एक-एक कुल सात

फिर पहुँचा देगा कहीं-कहीं कुल पाँच

बीवी खाएगी थानेदार की

हँसते हुए

छोटे थानेदार ख़ुद काटेंगे

फोकट की ककड़ी

कितना रौब गाँठेंगी

घर-भर में

आस-पड़ोस तक महकेगा सैलाना की ककड़ी का स्वाद

याद नहीं आएंगी किसी को

लड़कियाँ सात

कित्ते अंधेरे उठी होंगी

चली होंगे कित्ते कोस

ये ही ककड़ियाँ पहुँचती होंगी संभाग से भी आगे

रजधानी तक भूपाल

पीठवाले हिस्से के चमकते काँच से

कभी-कभी देख सकते हैं

इन ककड़ियों का भाग्य

जो कारों की मुसाफ़िर बन पहुँच जाती हैं कहाँ-कहाँ

राजभवन में भी पहुँची होंगी कभी न कभी

जगा होगा इनका भाग

सातों लड़कियाँ ये

सात सिर्फ़ यहाँ अभी इत्ती सुबह

दोपहर तक भिंडी, तोरू के ढीग के साथ हो जाएगी इनकी

लम्बी क़तार

कहीं गोल झुंड

ये सपने की तरह देखती रहेंगी

सब कुछ बीच-बीच में

ओढ़नी को कसती हँसती आपस में

गिनती रहेंगी खुदरा

सोचतीं मिट्टी का तेल गुड़

इनकी ज़ुबान पर नहीं आएगा कभी

शक्कर का नाम

बीस पैसे में पूरी ढीग भिंडी की

दस पैसे में तोरू की

हज़ारपती-लखपती करेंगे इनसे मोल-तोल

ककड़ी तीस से पचास पैसे के बीच ऐंठकर

ख़ुश-ख़ुश जाएंगे घर

जैसे जीता जहान

साँझ के झुटपुटे के पहले लौट चलेंगे इनके पाँव

उसी रास्ते

इतनी स्वतंत्रता में यहाँ शेष नहीं रहेगा

दुख की परछाई का झीना निशान

गंध डोचरा-ककड़ी की

देह के साथ

लय किसी गीत की के टुकड़े की होंठों पर

पहुँच मकई के आटे को गूँधेंगे इनके हाथ

आग के हिस्से जलेंगे

यहाँ-वहाँ कुछ-कुछ दूरी पर

अंधेरा फटेगा उतनी आग भर

फिर सन्नाटा गूँजेगा थोड़ी देर बाद

फिर जंगलों के झोपड़ी-भर अंधेरे में

धरती का इतना जीवन सो जाएगा गठरी बनकर

बाहर रोते रहेंगे सियार

मैं भी लौट आऊँगा देर रात तक

सोते वक्त भी

क्या काँटों की तरह मुझमें चुभती रहेंगी

अभी इत्ती सुबह की

ये लड़कियाँ सात

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कविता में स्त्री और स्त्रियों की कविता

प्रकाश चंद्र

महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग में शोधार्थी हैं. संपर्क :9657062744
Prakashupretti@gmail.com

कविता में स्त्री की उपस्थिति के बारे में चर्चा करना कोई नई बात नहीं है । आदिकाल से लेकर आज तक की कविता में स्त्री की उपस्थिति तो दर्ज़ है लेकिन उसका स्वरूप भिन्न-भिन्न है । इसलिए महत्वपूर्ण प्रश्न भी यही है कि पहले की कविताओं में स्त्री की उपस्थिति किस रूप में है और आज जब स्वयं स्त्रियाँ लिख रही हैं तो उनकी उपस्थिति किस रूप में है ? आदिकालीन कविता में स्त्री का चित्रण युद्ध की प्रेरक तथा जीतने और भोग की वस्तु के रूप में है तो वहीं भक्तिकालीन कविता में वह प्रेमिका व दैवीय रूप में नज़र आती है । कविता में स्त्री की उपस्थिति के लिहाज़ से रीतिकाल की बड़ी निर्मम आलोचना हुई है । रीतिकाल में स्त्री को भोग विलास और सौंदर्य की प्रतिमा के रूप चित्रित किया गया । बिहारी की नायिका से लेकर घनानंद की सुजान तक में स्त्री का अपना अस्तित्व कहीं नज़र नहीं आता है । लेकिन स्त्री का ऐसा चित्रण करने वाले सभी पुरुष रचनाकार थे ।

आदिकाल में किसी स्त्री रचनाकार का पता नहीं चलता है लेकिन मध्यकाल में मीरा और अंडाल के अतिरिक्त कुछ लेखिकाओं की सूची भक्तमाल (नाभादास) में मिलती है पर साहित्य में उनका अस्तित्व नदारद है । वहीं रीतिकाल में भी स्त्री लेखन सिरे से गायब है जबकि सावित्री सिन्हा ने अपने शोध ‘मध्यकालीन हिंदी कवयित्रियाँ’ में इस काल की कवयित्रियों की लंबी सूची दी है । लेकिन साहित्य के इतिहास ग्रन्थों में इनका उल्लेख कहीं-कहीं ‘फिलर’ के तौर पर दिखाई देता है । इसलिए साहित्य में स्त्री की उपस्थिति और उसमें भी कविता में स्त्री की उपस्थिति पर विचार करते हुए साहित्य के इतिहास ग्रन्थों की पड़ताल करना और उनके मर्दवादी नज़रिए को भी देखना समीचीन होगा ।अनुराधा अपने एक लेख ‘हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन पर एक स्त्री के नोट्स’ में लिखती हैं कि- “रामचन्द्र शुक्ल से पहले के इतिहास ग्रंथ भले ही तथ्यों के संकलन भर हों, पर ‘स्त्री’ के नजरिए से सोचते समय ये ग्रंथ भी महत्व रखते हैं, क्योंकि स्त्री भी एक तथ्य है। आचार्य द्विवेदी तक के अधिकतर इतिहास ग्रंथ स्त्री को पहचानने के सम्बन्ध में एक साफ-सुथरा-सा गणित रखते हैं।


वे जब किसी पुरुष कवि या लेखक को पहचानते हैं तो उसकी जाति और उपजातियों में बात करते दिखते हैं, वहीं एक स्त्री लेखक को पहचानते समय पुरुषों के साथ उसके सम्बन्धों में बात करते हैं : अमुक लेखिका अमुक की पत्नी थी, अमुक की उपपत्नी थी, अमुक की बेटी या बहन या शिष्या थी (और अपने आप में कुछ नहीं थी)। जाति व्यवस्था और पितृसत्ता के जटिल समीकरण का यह खेल बहुत गहरे पैठ कर खेला गया जिसने आधी आबादी की प्रतिभा, ज्ञान, अनुभव और क्षमता को या तो हड़प कर लिया या नष्ट होने के लिए अँधेरे में छोड़ दिया। गार्सां द तासी अकेले इतिहासकार हैं जो इन मामलों में सजग हैं। अपने ‘इस्त्वार’ की भूमिका में ही वे रजिया सुल्तान को भारत के देशवासियों की प्रिय सुल्ताना कहकर स्त्री की भूमिका और इतिहास लेखन में उसके स्थान की जरूरत को रेखांकित कर जाते हैं। इन्होंने ‘इस्त्वार’ में अच्छी संख्या में स्त्रियों को जगह दी है, जबकि अधिकतर इतिहासकारों ने स्त्रियों को अधिक से अधिक किसी काल की अन्य प्रवृत्तियों में स्थान दिया है” । हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन की इन जटिलताओं और चतुराइयों से भी स्त्री की उपस्थिति को समझा जा सकता है । वैसे हिंदी में मृदुवाणी (1905) शीर्षक से मुंशी देवी प्रसाद ने आरंभिक 35 कवयित्रियों की कविताओं का संकलन निकाला था । इन कवयित्रियों की कविताओं को देखें तो उसमें सामाजिक रूढ़ियों पर गहरी चोट और पितृसत्तात्मक व्यवस्था से मुक्ति की आकांक्षा दिखाई देती है ।

आधुनिक काल की कविता में स्त्री का एक स्वरूप बनता हुआ दिखाई देता है । स्त्री को उसके अंग-प्रत्यंग से हटकर संपूर्णता में देखने की कोशिश की जाती है । इसलिए आधुनिक कविता ने स्त्री की मध्यकालीन छवि को भी तोड़ा । स्त्री ‘कविता का by product’ नहीं है बल्कि उसकी अपनी स्वतंत्र छवि है । मैथिलीशरण गुप्त की ‘यशोधरा’ , दिनकर की ‘उर्वशी’  निराला की ‘वह तोड़ती पत्थर’ आदि कविताओं  में स्त्री का अस्तित्व दिखाई देता है । स्त्री इन कविताओं  में ‘मैं’  के साथ है । यही ‘मैं’ या ‘सेल्फ’ आधुनिक हिंदी कविता में स्त्री की पहचान है । आधुनिक काल की कविता में स्त्री ‘केवल श्रद्धा’, ‘अबला’ और ‘नीर भरी दुख की बदली’ नहीं है, अब वह पितृसत्ता के ‘दुर्ग द्वार पर दस्तक’ देती हुई अपनी मंजिल की ओर बढ़ रही है। अब उसे पुरुषों की कविताओं में से झाँकने की जरूरत नहीं है बल्कि वह अब स्वयं रच  रही हैं । अनामिका ने  ‘कहती हैं औरतें’ किताब की भूमिका में लिखा है कि “एक जमाना था जब पुरुष कविताएँ लिखते थे और औरतें उन कविताओं के अनंत छिद्रों से अच्छी बच्ची की तरह झाँकती मंद-मंद मुस्काया करती थीं । उन औरतों के खास लक्षण होते थे – 1.वे सर्वदा सुंदर होती थीं, सर्वांग सुंदर, पर उन्हें डर बना रहता था कि उनसे उनका यौवन और सौंदर्य छिन न जाए, 2. अक्सर वे असमय ही भगवान को प्यारी हो जाती थीं और 3. आजीवन, जीवन के बाद भी उनका इकलौता काम होता था अपने प्रिय में प्रेरणा पम्प करना किंतु अपनी सुध-बुध बिसराए रखना” । स्त्री स्वयं को रच रही हैं और साहित्य में बराबरी का दख़ल दे रही हैं साथ ही सवाल भी कर रही हैं – मैं किसकी औरत हूँ / कौन है मेरा परमेश्वर/ किसके पाँव दबाती हूँ / किसका दिया खाती हूँ / किसकी मार सहती हूँ  । ये पंक्तियाँ हमसे इतनी सरल भाषा में वे प्रश्न पूछती हैं जो पहले कभी नहीं पूछे गए । क्या पितृसत्तात्मक समाज के पास इन ‘अबोध’ सवालों का कोई जवाब है? यदि बात समकालीन हिंदी कविता की कि जाए तो उसमें स्त्री न बिहारी की नायिका है न छायावादियों की एकान्त प्रणयिनी है बल्कि अपनी पूरी साधारणता, कमजोरियों और विशिष्टताओं के साथ विद्यमान है। वह न अब ‘अबला’ और न ही ‘प्रेयसी’  है वह अपने अस्तित्व के साथ नज़र आती है । समकालीन कविता के फलक को देखें तो कई कवयित्रियाँ कविता लेखन में सक्रिय रूप से दिखलाई पड़ती हैं । स्त्रियाँ अपनी कविताओं में स्वयं को रच रही हैं और पुंसवादी समाज के द्वारा स्त्रियों का जो मिथ गढ़ा गया था उसे भी तोड़ रही हैं । गगन गिल का कविता संग्रह ‘एक दिन लौटेगी लड़की’ में पुराने मिथ को तोड़कर उस नई लड़की की तस्वीर है जो न तो मात्र देह है और न देवी बल्कि अपनी पूरी इयत्ता और चेतना के साथ मौजूद है।

स्त्री कविता में स्त्री 

समकालीन स्त्री कविता में स्त्री की
उपस्थिति देखें तो उसके कई आयाम दिखाई देते हैं । सदियों के दासत्व से मुक्ति की झटपटाहट, मैं भी हूँ का भाव और सामाजिक रूढ़ियों से टकराती हुई स्त्री दिखाई देती है । स्त्री ने जब स्वयं को रचा तो उस मध्यकालीन स्त्री की छवि को तोड़ा जो उसे भोग की वस्तु और शृंगार की प्रतिमा के रूप में चित्रित कर रहा था । रीतिकालीन कवियों ने जो नायिकाओं के कई भेद बतलाए और श्रेष्ठ स्त्री के गुणों को निर्धारित किया स्त्री कवयित्रियों ने उस पर भी चोट की । हमारे रीतिकालीन कवियों ने स्त्री यानि नायिका के कई भेद और उभेद बताए । नायिका भेद पर लगभग दो सौ ग्रंथ हमारे आचार्यों ने लिख डाले । मतिराम का ‘रसराज’ या फिर पद्माकर के ग्रन्थों में नायिका की आयु, गंध , सौंदर्य आदि के हिसाब से कई भेद हैं । एक सम्पूर्ण स्त्री जो अपने अस्तित्व और चेतना के साथ हो वह कहीं नज़र नहीं आती है । अनामिका स्त्री की इस छवि के खिलाफ लिखती हैं कि -आचार्य, हम इनमें कोई नहीं-/कोई नहीं, कोई नहीं, कोई नहीं-/मुग्धा, प्रगल्भा, विदग्धा या सुरतिगर्विता/परकीया भी नहीं, न स्वकीया ही!/मुग्धाएं जब थीं हम/देनी थी हमको परीक्षाएं/बोर्ड के सिवा भी कई,/संस्थानों में प्रवेश की परीक्षाएं देते हुए/हमें फुर्सत ही नहीं मिली / मध्यकाल में स्त्री एक ‘ऑब्जेक्ट’ के रूप में चित्रित है जो कविता का ‘बाय प्रॉडक्ट’ भी है जिसका काम अपनी यौनिकता, सुंदरता से पुरुष यानि नायक को रिझाना है । अनामिका और अन्य कवयित्रियों ने स्त्री की इसी छवि को तोड़ा है । यही नई स्त्री गगन गिल के वहाँ भी है । स्त्री की जो विरहव्याप्त छवि गढ़ी गई है दरअसल वह स्त्री है ही नहीं । स्त्री को कविता में विरहिणी के रूप में ज्यादा चित्रित किया वह राधा से लेकर बिहारी की नायिकाओं तक में देखा जा सकता है । बिहारी की नायिका विरह में इतनी दुबली हो गई है कि साँस छोड़ने में छ: सात हाथ पीछे चली जाती है और सांस लेने में आगे आ जाती है – इत आवति चलि जात उत चली छः सातक हाथ/ चढ़ी हिंडोरे सी रहै लगी उसासन हाथ । दरअसल स्त्री की जो ये आरोपित छवि है इसे कवयित्रियों ने चुनौती दी । साथ ही संस्कृति के गौरव के नाम पर जो स्त्री शोषण सदियों से चला आ रहा है उसकी भी पहचान की । शुभा अपनी कविता ‘गौरवमय संस्कृति’ में स्त्री की इसी छवि पर चोट करती हैं – हमने ही लिखे हैं / स्त्रियों के विरह गीत / खंडिताओं और पतिकाओं के चित्र / कितने मनमोहक !/ …युद्धों के बीच / पिता और पुत्र के लिए विलाप करती स्त्रियाँ / कैसी नदी बहाती हैं करुण रस की / हमें आदत है इनमें स्नान करने की / हमारी भुजाएँ जब फड़कती हैं / वीर रस के ज्वालामुखी फूटते हैं / और स्त्रियाँ करुण रस की / आलंबन बनती हैं।

हमारे समाज और साहित्य ने स्त्री के लिए कुछ खांचे बनाए जिसके तहत ‘आदर्श’ स्त्री और ‘बिगड़ी’ स्त्री जैसे मिथ भी तैयार किए गए । एक स्त्री को कैसा होना चाहिए?  कैसे हँसना, बोलना, बैठना, खाना और क्या पहनना चाहिए वह सब कुछ पितृसत्तात्मक समाज ने निर्धारित कर लिए और कोई स्त्री उन नियमों से बाहर आचरण करती है तो उसके लिए बिगड़ी, बदचलन जैसे कई विशेषण भी गढ़ डाले गए । स्त्री हो / कम बोलना /कम काटना बात औरों की / मत उलझना / मत हँसना पेट पकड़ / चुप चुप गुजर जाना / उन शान –मेले से / स्त्री हो / उसी होने को होना । स्त्री की इस आचरण मूलक भूमिका को बनाने में हमारे महान साहित्य ने बड़ा योगदान दिया । समाज के इन सांचों पर साहित्य ने प्रश्न लगाने के बजाए अपनी मुहर लगाई ।  एक स्त्री के लिए इन बेड़ियों को तोड़ना और खुद को रचना कभी भी आसान नहीं रहा । स्त्री को कभी ‘मर्यादा’  (यानि जो मर्द की मर्जी हो) के नाम पर तो कभी इज्जत के नाम पर उसके सपने, उसकी ज़िंदगी, उसकी उड़ान, को कैद करने की कोशिश हमेशा से रही है  । रंजना जयसवाल इस ‘मर्यादा’ रूपी जंज़ीर में जकड़ी स्त्री के बहाने कहती हैं- मैं स्त्री हूँ और जब मैं स्त्री हूँ/तो मुझे दिखना भी चाहिए स्त्री की तरह/मसलन मेरे केश लम्बे,/स्तन पुष्ट और कटि क्षीण हो/देह हो तुली इतनी कि इंच कम न छटाँक ज्यादा/बिल्कुल खूबसूरत डस्टबिन की तरह/जिसमें/डाल सकें वे/देह, मन, दिमाग का सारा कचरा और वह/मुस्कुराता रहे-‘प्लीज यूज मी’।/मैं स्त्री हूँ और जब मैं स्त्री हूँ/तो मेरे वस्त्र भी ड्रेस कोड के/ हिसाब से होने चाहिए जरा भी कम न महीन/भले ही हो कार्यक्षेत्र कोई / आखिर मर्यादा से जरूरी क्या है / स्त्री के लिए और मर्यादा वस्त्रों में होती है ।  जिस मर्यादित और कैद स्त्री की छवि हमारे समाज और साहित्य ने गढ़ी उसे स्त्री कवयित्रियों ने तोड़ा । लेकिन समाज को इस नई स्त्री की छवि आज भी पूर्ण रूप से स्वीकार्य नहीं है- गणित पढ़ती है ये लड़की / हिंदी में विवाद करती / अँग्रेजी में लिखती है / मुस्कराती है / जब भी मिलती है /गलत बातों पर / तन कर अड़ती / खुला दिमाग लिए / जिंदगी से निकलती है ये लड़की । यह ‘खुले दिमाग वाली लड़की’ है जो स्त्री कविता में उन पुरानी रूढ़ियों को धत्ता बताते हुए आ धमकती है साथ ही कविता में स्त्री की बनी बनाई छवि को तोड़ती है । कात्यायनी की ‘हॉकी खेलती लड़कियाँ’ कविता भी इस नए बनते समाज में स्त्री संघर्ष की प्रतीक हैं । ये लड़कियाँ ‘स्त्री’ की कमजोर छवि, अबला की छवि विलाप करती हुई छवि, पुरुष संरक्षण की आकांक्षी छवि को तोड़ रही हैं । समकालीन स्त्री कविता की यह एक बड़ी खूबी है।

समकालीन स्त्री कविता में परंपरागत स्त्री छवि को तोड़ने वाली स्त्री है तो वहीं नई राह खोजने, आत्मनिर्भर और स्वतंत्र स्त्री भी है। लेकिन इसी ‘बाइनरी’ के बीच जहाँ ‘हॉकी खेलती लड़कियाँ’ हैं तो वहीं आदिवासी ‘मुर्मू’ और ‘सुगिया’ भी हैं । सुगिया के बहाने जब निर्मला पुतुल इस ‘सभ्य’ और ‘आधुनिक समाज’ से प्रश्न करती हैं कि यहाँ हर पाँचवाँ आदमी उससे/ उसकी देह कि भाषा में क्यों बतियाता है? ।  तो यह समाज मौन हो जाता है । इसलिए कई बार स्त्री की उस स्वतंत्रता पर सोचने के लिए मजबूर हो जाता हूँ जो महानगर की कवयित्रियाँ की कविताओं में दिखाई देती है । सविता सिंह जब यह कहती हैं कि -मैं किसी की औरत नही हूँ,/ मै अपनी औरत हूँ,/ अपना खाती हूँ,/ जब जी चाहता है तब खाती हूँ,/ मैं किसी की मार नहीं सहती / और मेरा परमेश्वर कोई नहीं  । तो एक पल के लिए सुकून मिलता है कि स्त्री अब पुरुष सत्ता को चुनौती दे रही है और वह उसके अधीनस्थ नहीं है । लेकिन दूसरे पल सोचता हूँ की क्या सुगिया कभी ऐसा कह पाएगी ? अच्छा लगता है पढ़कर जब सुधा अरोड़ा अपनी कविता ‘अकेली औरत’ में लिखती हैं कि इक्कीसवी सदी की यह औरत/हांड मास की नहीं रह जाती/ इस्पात में ढल जाती है/ और समाज का सदियों पुराना/शोषण का इतिहास बदल डालती है । लेकिन अगले ही पल ‘मुर्मू’ और ‘सुगिया’ की इक्कीसवी सदी के बारे में सोचने लगता हूँ, वह कब  इस्पात में ढलकर अपने शोषणकारी इतिहास को बदलेगी?



कुल मिलाकर देखें तो स्त्री को गढ़ने का काम हमारा समाज आरंभ से ही करता है । सिमोन की यह उक्ति कि ‘स्त्री पैदा नहीं होती बनाई जाती है’ से टकराए बिना सामाजिक जटिलताओं के बीच जूझती स्त्री को समझना थोड़ा मुश्किल है । सिमोन कि यह उक्ति बार-बार सोचने को मजबूर करती है । स्त्री का अपना क्या है? स्त्री ही क्या है ? स्त्री की देह के अतिरिक्त भी, स्त्री का कोई अस्तित्व है ? क्यों आज भी स्त्री एक अदद घर की तलाश में भटक रही है- राम, देख यह तेरा कमरा है !/‘और मेरा ?’/‘ओ पगली,’/लड़कियां हवा, धूप, मिट्टी होती हैं/उनका कोई घर नहीं होता है  । क्यों स्त्री को एक मुकम्मल रूप में समझने की कोशिश नहीं होती है?  क्यों स्त्री पिता और पति रूपी दो छोरों के बीच झूलती रहती है? उसकी अपनी जमीन और ठिकाना कहाँ है ? उसे जाना है आज शाम चार बजे रेलगाड़ी से /  जाना है पति के घर से इस बार पिता के घर / एक घर से दूसरे घर जाते हैं वही / नहीं होता जिनका अपना कोई घर  । क्या विमला की यह यात्रा खत्म होगी?


इस तरह देखें तो कविता में स्त्री की छवि आरंभ से ही दोयम दर्ज़े की रही है । हिंदी साहित्य के इतिहास ग्रन्थों की पड़ताल करने पर यह बात सामने आती है कि कविता में स्त्री की स्थिति आधुनिक काल से पहले चेतना विहीन मात्र एक शरीर के रूप में थी । उन कविताओं से गुजरते हुए लगता है कि सुंदरता को बचाए रखना और पुरुषों को रिझाना ही स्त्री का काम था । स्त्री के लिए युद्ध होते थे ‘जेहि घर देखी सुंदर नार तिह घर धरी जाए तलवार’ और उन्हें जीतना पौरुष का प्रमाण था । क्योंकि उनके लिए स्त्री मात्र ‘सेक्स ऑब्जेक्ट’ थी । स्त्री की इस छवि को आधुनिक काल की कविता ने कुछ हद तक तोड़ा ।आधुनिक कविता ने स्त्री को ‘सेक्स ऑब्जेक्ट’ के रूप में देखने की प्रवृति पर चोट की लेकिन यहाँ भी स्त्री एक ‘कमोडिटी’ और पितृसत्ता के कैद में नज़र आती है । यानि स्त्री की  स्वतंत्र छवि यहाँ भी नहीं है, वह पत्नी है, माता है, दासी है, बहन है यानि की देह है लेकिन एक स्वतंत्र चेतनाशील स्त्री नहीं है । स्वतंत्र, चेतनासम्पन, संघर्षरत और मैं यानि ‘सेल्फ’ के साथ मौजूद स्त्री हमें समकालीन स्त्री कविता में दिखाई देती है । स्त्री ने जब स्वयं को रचा तो उन श्र्ंगार की प्रतिमाओं को भी खंडित किया जो मध्यकाल में खड़ी की गई थी । समकालीन स्त्री कविता ने मध्यकालीन जड़ताओं  को तोड़ा, नायिका भेद से लेकर स्त्री के दोयम होने के भाव तक को खंडित किया । अनामिका की एक कविता है ‘मरने की फुर्सत’ जरा सोचिए इसके बारे में और समझिए कविता में स्त्री और ‘स्त्री की कविता’ की ताकत को –
ईसा मसीह
औरत नहीं थे
वरना मासिक
धर्म ग्यारह बरस की उम्र से
उनको ठिठकाए ही रखता
देवालय के बाहर….. !

संदर्भ सूची
1.http://www.hindisamay.com/contentDetail.aspx?id=720&pageno=1
  2. अनामिका, (2007), कहती हैं औरतें, इतिहासबोध प्रकाशन, इलाहाबाद, पृ.11 
  3.अनामिका, (2007), कहती हैं औरतें, इतिहासबोध प्रकाशन, इलाहाबाद, पृ.137 
  4.अनामिका, (2012), पचास कविताएं, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, पृ.109 
  5.अनामिका, (2007), कहती हैं औरतें, इतिहासबोध प्रकाशन, इलाहाबाद, पृ.80 
  6.अनामिका, (2007), कहती हैं औरतें, इतिहासबोध प्रकाशन, इलाहाबाद, पृ.43 
  7.रंजना जयसवाल, (2009), जब मैं स्त्री हूँ, नई किताब प्रकाशन, दिल्ली, पृ. 5    
  8.अनामिका, (2007), कहती हैं औरतें, इतिहासबोध प्रकाशन, इलाहाबाद, पृ.55 
  9.निर्मला पुतुल, (2012), नगाड़े की तरह बजते शब्द, ज्ञानपीठ प्रकाशन, दिल्ली, पृ. 81     
 10.अनामिका, (2007), कहती हैं औरतें, इतिहासबोध प्रकाशन, इलाहाबाद, पृ.137 
 11. सुधा अरोड़ा, अकेली औरत, वागर्थ पत्रिका  
 12.अनामिका, (2012), पचास कविताएं, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, पृ. 40  
 13. अनामिका, (2007), कहती हैं औरतें, इतिहासबोध प्रकाशन, इलाहाबाद, पृ. 139     
 14.अनामिका, (2012), पचास कविताएं, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, पृ. 93     

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हृदयहीन शासकों, सुनो बच्चों की चीख और माओं की आहें !

गोरखपुर ज़िले के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन की सप्लाई बंद हो जाने से लगभग 60 बच्चों के मरने की ख़बर है. हालांकि योगी सरकार सरकार इन मौतों को अलग-अलग कारणों से बाताती है तो कथन की क्रूरता की हदें पार करते हुए इसे अगस्त की नियमित और सालाना  मौत भी बता रही है. गोरखपुर से आई तस्वीरें हृदय विदारक हैं. फटी-पथराई आँखों के साथ मृत-अर्ध मृत बच्चों की लाश लिये माँ की तस्वीरें. ऑक्सीजन की कमी के बावजूद डा कफील अहमद ने तत्परता से कुछ बच्चों की जानें बचाई अन्यथा मारे गए बच्चों की संख्या और भी अधिक होती. इन तस्वीरों का यह कोलाज ताकि सनद रहे. 
डा. कफील अहमद एक माँ के बच्चे को बचाने की कोशिश करते हुए
गाय के बच्चों को दुलारते सीएम योगी और उनके राज्य और उनके संसदीय क्षेत्र में बच्चे की जान बचाते डा. कफील

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रात को सड़कों पर उतरी लडकियां : मेरी रात मेरी सड़क

वे पब्लिक स्पेस को क्लेम करने उतरीं थीं, वे उतरी थीं पुरुष प्रायोजित उन अंधेरों से लड़ने जो सड़क पर देर रात औरतों को डराने के लिए आहूत की जाती हैं. वे वर्णिका के पक्ष में उतरीं, निर्भया के लिए उतरीं. वे उनसब के लिए रात को सडकों पर उतरीं, जिन्हें मर्दवादी सत्ता लील ले गई इस अपराध के लिए कि वे शाम के बाद घर से निकलती ही क्यों हैं? तस्वीरों में #मेरीरातमेरीसडक 

12 अगस्त, 2017 की रात  देश भर में लडकियां अपने-अपने शहरों की सड़कों पर उतरीं…. 


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स्त्री कविता: स्त्री पक्ष और उसके पार (क़िस्त तीन)

रेखा सेठी

  हिंदी विभाग, इंद्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय, दिल्ली वि वि, में एसोसिएट प्रोफेसर. विज्ञापन डॉट कॉम सहित आधा दर्जन से अधिक आलोचनात्मक और वैचारिक पुस्तकें प्रकाशित
संपर्क:reksethi@gmail.com



स्त्री-कविता: स्त्री पक्ष और उसके पार
स्त्री कविता: स्त्री पक्ष और उसके पार (क़िस्त दो)


माँ, कविता और स्त्री….
समाज के जेंडर ढाँचे का पहला अहसास मुझे माँ के बचपन के किस्से-कहानियों में हुआ था। समकालीन स्त्री-कविता की तह में उतरते हुए मैं अपनी माँ के परिवेश और उनके पारिवारिक वातावरण में लौट गयी। माँ ने ज़िंदगी की कटु सच्चाईयों से रूबरू होते हुए भी ज़्यादा सवाल नहीं किये। उन्हें अपनी छोटी-सी गृहस्थी में ही खुश रहना था लेकिन उनकी कहानियाँ जब मुझ तक पहुँचती तो मेरे भीतर बड़ा बवंडर मचातीं । मैं अपनी माँ की बातों को उधेड़कर, उनमें छिपे अर्थ-आशयों को कपास की तरह धुनतीऔर उनकी मार्फ़त अपने होने के सिरे सिरजती। माँ एक रईस परिवार के जन्मी थीं । संयुक्त परिवार में, भाई-बहनों की हँसी-ठिठोलियों से चहकते हुए जिस बंद गली के आखिरी मकान में वे रहती थीं,वहीं से मुझे जीवन के कई पाठ और अंतर-पाठ सीखने को मिले। माँ अपनी ज़िंदगी के जो किस्से सुनाया करतीं, वे उस समय किसी रहस्यमयी कहानी से कम नहीं थे। बचपन में तो माँ के किस्से सुनाने के लहज़े से उत्सुकता ही जागती थी लेकिन बहुत बाद  में जब सोचने-समझने की उम्र हुई तब जाकर ही माँ के उन किस्सों की रहस्यमयता की कलई धीरे-धीरे खुलने लगी। समाज में स्त्री का परंपरागत स्थान और स्त्री जीवन की कई उधड़ी हुई सच्चाईयों को मैं समय के साथ ही समझ पाई।


खानदान में बेटियों की जगह निश्चित थी। उनकी पढ़ाई को लेकर कोई चिंता न थी। हाँ, भाइयों को पढ़ाने के लिये ज़रूर एक मास्टर जी घर पर आया करते थे। वे जब भाइयों को पढ़ाते, माँ खेलने के इंतज़ार में, खम्भे के पीछे से झाँकती-उचकती बहुत कुछ सीखने लगी। 1935-40 के आस-पास स्त्री-शिक्षा को लेकर कुछ जागृति बढ़ी, माँ में भी, सीखने-समझने का  हौंसला बढ़ता गया। वह धीरे-धीरे अपने घर-परिवार से बिलकुल अलग, एक नयी राह पर चलने लगी। यह ज़रूर था कि उनके आस-पास से पितृसत्ता का कड़ा पहरा तो नहीं हटा, मगर फिर भी कुछ संयोग और कुछ सहयोग से माँ ने मैट्रिक, प्रभाकर, फिर बी.ए. और बी.टी. की पढ़ाई पूरी कर ली। माँ के पक्ष में यह एक बड़ी जीत रही।


माँ का जीवन, स्त्री की शक्ति और सीमा का गज़ब पाठ था। मेरे आस-पास जितनी भी स्त्रियाँ थी उनमें से मेरी माँ सबसे अधिक शिक्षित थीं । यह बिलकुल सच है कि उनकी शिक्षा ने ही उनके प्रति, घर और सामाजिक इज्ज़त में इजाफ़ा किया। अध्यापिका का पद, उन्हें प्रतिष्ठा देता लेकिन साथ ही उनका नौकरी करना आश्चर्यजनक ढंग से आस-पड़ोस, नाते-रिश्तेदारों में चर्चा का विषय होता । नौकरी के साथ-साथ घर की पूरी ज़िम्मेदारी उन्होंने बिना किसी शिकायत के संभाल रखी थी। पति की अनुगामिनी बन, उन्होंने अपनी स्वतंत्र इच्छा-अनिच्छा को कभी प्राथमिकता नहीं दी। माँ ने अपनी गृहस्थी, बच्चों की पढ़ाई-लिखाई, सब मिला-जुला कर एक आदर्श परिवार का ढाँचा तैयार किया। उनके इस आदर्श परिवार में किसी प्रकार की कोई टकराहट न थी क्योंकि माँ के भीतर की स्त्री ने स्वयं को नेपथ्य में रखना, सहज ही स्वीकार किया था और अपने सामने वाले पुरुष की सत्ता को किसी प्रकार की कोई चुनौती नहीं दी थी। पलटकर उनके जीवन को देखने पर मेरे भीतर एकबारगी यह विचार भी आया कि क्या शिक्षा, प्रतिगामी बेड़ियों को पिघलाने में अक्षम रही है और फिर इसके साथ ही स्त्री-जीवन से जुड़े कई दूसरे प्रश्न भी चले आते हैं।माँ के आँचल की गाँठ में बंधी इन कहानियों की तासीर स्त्री रचनाकारों की कविताओं से मेल खाती थी। इसके अलावा जैसे-जैसे मैं इन कविताओं के करीब आती गई वैसे-वैसे मेरे अपने जीवन की यात्रा भी इन कविताओं के नज़दीक जाती हुई दिखाई देने लगी। अब मुझे इन कविताओं के शब्दों और पंक्तियों के पार की सच्चाइयाँ  बार-बार असहज करने लगीं। कविता और ज़िन्दगी का यह रिश्ता स्त्री-कविता की पड़ताल करने को बाध्य कर रहा था।

जागरूक होने की उम्र में आने पर अपनी पारिवारिक परवरिश ने जेंडर के सवालों को समझने की अलग दृष्टि दी। अपने परिवार में हम दो बहनें ही हैं तो बहन-भाई के अंतर की बात रही नहीं। आस-पास के परिवेश पर नज़र डालते हुए भी अक्सर यह अहसास होता, कि हम कुछ ख़ास हैं। लिंग आधारित अपमान या हिंसा का हमने सीधा सामना कभी नहीं किया। इसके अतिरिक्त शिक्षा, स्वास्थ्य, नौकरी, समान-वेतन, सामाजिक-राजनीतिक क्षेत्रों में अपनी भागीदारी को लेकर हमें कभी दूसरे दर्जे पर होने का अनुभव नहीं हुआ। इस पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण रोज़मर्रा के कई छोटे-बड़े संघर्ष, हमारी जीवन-परिधि से बाहर रहे। यही कारण था कि हमारी जद्दोजहद, स्त्री-अस्मिता पर केन्द्रित न होकर व्यक्ति-अस्मिता के सवालों से जूझ रही थी।

स्त्री का जीवन, विविधवर्णी है, जिसमें चाहे कितने ही धूसर रंग क्यों न हों, स्त्री का उन सभी रंगों से लगाव है, वह सभी को अपनी संवेदना से सींचती है और अपनी अभिव्यक्ति में इस्तेमाल करती है। यही कारण है कि जो संवेदनाएँ मुझे अपने जीवन में बेचैन करती रहीं वही स्त्री रचनाकारों की कविताओं में भी प्रतिध्वनित होती थीं | स्त्री-कविता, अपने सुख-दुःख के जो प्रतिमान रचती हुई जिस काव्यानुभव को प्रतिबिंबित कर रही थी उसमें स्त्री-अनुभव की विशिष्टता एवं स्त्री-दृष्टिकी प्रमुख भूमिका है। स्त्री जीवन को, स्त्री-दृष्टि से देखने की कोशिश उनकी कविताओं को अतिरिक्त आयाम देती है। ऐसा करना महत्वपूर्ण इसलिये भी है क्योंकि स्त्री ने खुद को स्त्री-दृष्टि से कभी नहीं देखा। वह खुद को पुरुषों द्वारा गढ़ी गयी परिपाटी के भीतर ही देखती रही।

स्त्री-कविता पर अपने अध्ययन के लिये मैंने जिन सात कवयित्रियों का चयन किया, वे समकालीन होते हुये भी स्त्री-अस्मिता के अलग-अलग मायनों के साथ कविता रच रही हैं। इन कवयित्रियों में एक ओर गगन गिल हैं, जिन्होंने अपनी साहित्यिक पहचान, कभी भी अपने स्त्रीत्व के साथ नहीं जोड़ी। जिस तरह रवीन्द्रनाथ ठाकुर की प्रशंसा में वे उन्हें ‘ए ग्रेट ह्युमूनाइज्ड माइंड’ कहती हैं, उनके अपने साहित्य की धुरी भी उसी मानवीय विवेक पर टिकी हुई है, जिसे स्त्री-पुरुष के लिंगाधारित चौखटों में बाँधना मुश्किल है। गगन के ही दूसरे छोर पर कात्यायनी हैं, जिनकी चिंता के केंद्र में व्यक्ति और व्यवस्था का द्वन्द्वपूर्ण संबंध देखने को मिलता है। उनकी कविताएँ स्त्री जीवन से आगे बढ़कर गहरे अर्थों में राजनीतिक कविताएँ हैं जो भारतीय लोकतंत्र में नागरिक अधिकारों की चेतना को प्राथमिक मानती हैं। स्वार्थ लिप्सा से चरमराती व्यवस्था में छले गए जन साधारण की पक्षधरता में आवाज़ उठाती हैं। इनके बाद का दौर, अवश्य ही अनामिका और सविता सिंह के नाम रहा जिनकी कविताओं ने, कविता की दुनिया में स्त्री-स्वर को विशिष्ट पहचान दी लेकिन यह भी सच है कि इन दोनों कवयित्रियों द्वारा रचित कविताओं को भी आलोचना के सीमित साँचे का शिकार होना पड़ा, जबकि इनकी कविताओं में पितृसत्ता के विरोध के साथ-साथ मानव मुक्ति का बड़ा कैनवास उभरता है। अनामिका के यहाँ लोक-संस्कृति का ठाट है जिसमें परंपरा, श्रुति-स्मृति जीवंत होकर वर्तमान और अतीत को एक धागे में बाँधते हैं। सविता सिंह की स्त्री अपनी सीमाओं को लाँघती हुई प्रकृति से एकमेक हो जाती है जिसकी साझेदारी दुनिया के समस्त दमित-वंचित समाजों से है। कविता-भाषा के स्तर भी इन कवित्रियों की रचनाएँ नए इलाके की ओर गतिशील होती हैं।

इनके अलावा नीलेश रघुवंशी, सुशीला टाकभौरे और निर्मला पुतुल इस परियोजना में शामिल हैं जो अलग-अलग पृष्ठभूमि से आती हैं। उनकी कविताओं में स्त्री-अस्मिता, एकांगी न होकर, सामाजिक भेद-भाव की अनेक परतों से जुड़ी हुई है, जिससे उनकी कविताओं में स्त्रीवाद के मायने बदल जाते हैं। स्त्री जीवन के विडंबनात्मकचित्र उनकी कविताओं में भी भरपूर मात्रा में देखने को मिलते हैं किन्तु उनकी प्रवृति, वर्ग और जाति के पदानुक्रम से निर्मित, सामाजिक वर्ग-विभेद को केंद्र में रखने की रही है। नीलेश की निम्न-मध्यमवर्गीय चेतना ने उन्हें समाज को देखने-परखने का अलग नज़रिया दिया। उनकी कविता उस शिक्षित युवा मन की सकारात्मक अंतर्ध्वनि है जो अपने साहस से एक नये समाज की संकल्पना करता है। सुशीला टाकभौरे, अपनी पहचान मात्र स्त्री के रूप में न कर, दलित अस्मिता से जोड़कर करती हैं। उनके अनुसार, ‘एक दलित स्त्री अपने जीवन में सबसे अधिक पीड़ा झेलती है’। आदिवासी अस्मिता की मुखर अभिव्यक्ति, निर्मला पुतुल की कविताओं में देखने को मिलती है। उनकी कविताएँ, आदिवासी स्त्री के संघर्षों की दर्दनाक कथाएँ रचती हैं लेकिन उनसे यह पूछने पर कि स्त्री और आदिवासी होने की पीड़ा में किसकी पीड़ा बड़ी है, उन्होंने इन दोनों वर्गों के बीच जिस साम्य-सूत्र की बात रखी उसे सुनकर मैं एकबारगी चौंकी। उन्होंने कहा कि अंतर केवल इतना है कि ‘उच्च वर्ग की स्त्री, रसोई या बेडरूम में प्रताड़ित होती है जबकि आदिवासी स्त्री, फुटपाथ पर मार खाती है।’ उनका यह कथन, स्त्री-जीवन की विडंबना की पुष्टि करता है कि अपमान की पीड़ा का अंत:सूत्र, संभवतः सभी स्त्रियों को एकसाथ जोड़ता है।

इस तरह, इन सभी कवयित्रियों के अपने विशिष्ट अनुभव, उनके कविता-संसार में स्पष्टता से झाँक रहे थे।उनकी कविता की परछाईयाँ, एक दूसरे को छू भी रही थीं और स्त्री-अस्मिता के मुद्दे पर अलग-अलग हैं। संभवत: मेरी ही तरह, इन रचनाकारों की पारिवारिक पृष्ठभूमि और शिक्षा की विभिन्नताओं ने भी उनकी सोच को अलग-अलग साँचे में ढाला जिससे अपने अस्तित्व पर जिरह करने की ताकत को अलग-अलग धार मिली और अपनी सामाजिक स्थितियों की पड़ताल करने का उनका नज़रिया भी एक-दूसरे से अलग रहा। अपने इसी ओब्ज़रवेशन को अधिक विस्तार देने के लिये, मैंने इन सातों कवयित्रियों से बातचीत करके यह समझने का प्रयास किया कि, उनके लिये स्त्री-कविता का क्या अर्थ-आशय है।सबकी काव्य-प्रेरणा से लेकर, उनके काव्य-जगत और उनके सामाजिक-राजनैतिक सरोकारों को लेकर महत्वपूर्ण सवाल समाहित हैं, जिससे यह पहचान बने कि उनकी रची इस समानान्तर दुनिया का क्षितिज कितना विस्तृत या सीमित है।

गहरी आत्मीयता के साथ, मैंने इन रचनाकारों के मन की भीतरी तह में उतरने की और उनके रचना जगत के लिये कच्चे माल की उपलब्धि जैसे अनेकों पहलुओं तक पहुँचने की हर संभव कोशिश की है। अधिकांश प्रश्नों का दायरा, स्त्री-पक्ष के साथ-साथ, कविता की रचना-प्रक्रिया को सलीके से समझने तक फैला हुआ है। इसके अलावा सभी कवयित्रियों के रचना-विधान के सृजनात्मक उपकरणों पर भी विस्तार से चर्चा की गयी है। स्त्री-कविता के पृथक अभिधान से लेकर उसकी सामाजिक भूमिका, स्त्री-विमर्श की सीमा-सम्भावना व साहित्यिक आलोचना का स्त्री-कविता के प्रति रवैय्या आदि अनेक प्रश्नों पर सातों कवयित्रियों के उत्तर एक-दूसरे से भिन्न धरातल पर अवस्थित थे जिनसे इस कविता की गतिशीलता व विविध-धर्मिता का परिचय मिलता है।यह एक अनजाने क्षितिज की तलाश थी जिसे पहचानने में इन रचनाकारों की सूक्ष्म संवेदनशील दृष्टि ने मेरी सहायता की।अगली किश्तों में इस विषय पर कुछ महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ प्रस्तुत होंगी ।

स्त्री-कविता और सामाजिक परिवर्तन

आज भी हम ऐसे समाज में जी
रहे हैं जिसकी आधी आबादी बहुत दारुण स्थिति में जीवन-यापन कर रही है, जिन्हें अपने स्त्रीत्व की पहचान नहीं है। वह नहीं जानती कि एक स्त्री के रूप में उसकी शक्ति क्या है और उसे किस तरह अधिक धारदार बनाया जा सकता है, उसका जीवन रोज़ी-रोटी की जिस भाग-दौड़ में उलझा है, बौद्धिक विमर्श में उसके लिए कोई जगह नहीं है। स्त्रियों पर होने वाले अत्याचारों के विरोध की अपेक्षा झेलने की विवशता अधिक दिखाई पड़ती है। जब तक स्त्री-मुक्ति का अभियान मानव मुक्ति के अभियान में रूपांतरित नहीं होता, समाज में वह संतुलन नहीं बनता जिसमें स्त्री और पुरुष दोनों को एक स्वतंत्र राष्ट्र के नागरिक के रूप में बराबर का दर्ज़ा मिले, तब तक समतापूर्ण समाज की संकल्पना अधूरी रहेगी। कविता और साहित्य, इस संभावना को कैसे जगा सकेंगे, यह एक महत्वपूर्ण विषय है।

स्त्री-कविता, मुक्ति की जिस चेतना को अपनाती है, वह मानव-मुक्ति की परिकल्पना है जिसमें संभवतः स्त्रियों के बीच वर्ग-भेद भी मिट जायेंगे और स्त्री-पुरुष के बीच सत्ता और ताकत के संबंधों की भी पुनर्व्याख्या होगी। सविता सिंह, ऐसे समाज की कल्पना करते हुये कहती हैं कि “ऐसी समानान्तर सभ्यता का विकास संभव होगा, जिसमें सामूहिक सहवास संभव होगा। एक विनम्र, विश्व-समुदाय बनाने में हमारी कविताओं का भी योगदान होगा।” स्त्री-कविता की यह आधारभूमि, अपने सुख-दुःख में आत्मलिप्त न होकर, एक नई सभ्यता का विकास करने की आकांक्षा रखती है, जो अधिक विनम्र, मानवीय व समतापूर्ण होगी।

“आधी आबादी की सक्रिय भागीदारी व समर्थन के बिना कोई भी सामाजिक बदलाव संभव नहीं…जिस कविता में यथार्थ की इंदराज़ी मुक्तिकामी स्त्री के नज़रिए से की जाती है, उस प्रगतिशील स्त्री-कविता की सामाजिक परिवर्तन में अहं भूमिका है।”कात्यायनी के इन शब्दों में कविता और सामाजिक परिवर्तन का संबंध, सूत्र बनकर झलकता है। यह निश्चित है कि साहित्य अपनी गति से धीरे-धीरे-धीरे ही सही, हमारी चेतना के निर्माण या उसके परिवर्तन में विशेष भूमिका निभाता है। उसकी गति इतनी धीमी, इतनी महीन हो सकती है कि ऊपर से देखने पर भले ही कोई हलचल दिखाई न दे लेकिन वह सदा सक्रिय रहती है। स्त्री-कविता, स्त्री के हक में, हमारी चेतना को निरंतर आंदोलित करती रहती है। उसकी सर्वोदयी करुणामयी दृष्टि सबके लिये न्याय की माँग करती है। उसमें मानवता का सन्देश निहित है।


अपनी कविता के लिये स्त्री-रचनाकार जो भी शब्द चुनती हैं, वे शब्द या पक्तियाँ, बीच के अंतरालों को पाटने की कोशिश करते हैं, क्योंकि उन शब्दों और पंक्तियों में, स्त्री की परिवर्तनकामी चेतना व भूमिका की खास जगह होती है।समकालीन कविता की दुनिया में, स्त्री हों या पुरुष, सभी कवियों के सरोकार समान रहे हैं। अपनी विशेष अभिरुचियों के बावजूद वे साझे यथार्थ के साक्षी हैं। अनामिका कहती हैं, “स्त्री कवि हों या अन्य कवि, सब अपने-अपने वर्ण, नस्ल, लिंग के लेंस से, साझा यथार्थ देखते-परखते हैं। यह अवश्य है कि आज जितनी महिलाएँ, एक-साथ साहित्यिक परिदृश्य पर सक्रिय हैं, वह पहले कभी नहीं हुआ और उनके होने से कविता या साहित्य के बृहत् संसार में कुछ खलबली तो ज़रूर मची है, उनकी अपनी एक आवाज़ बनी है, जो पहले नहीं थी”स्त्री-कविता, सामाजिक परिवर्तन में जो भूमिका निभा रही है और उससे आगे बढ़कर निभाने की आकांक्षा रखती है।

आज के पुरुष आलोचकों ने स्त्री रचनाकारों को नई संवेदनशीलता से पढ़ा है और उनके साहित्य में आने वाली नवीन अभिव्यक्तियों को रेखांकित किया हैं। प्रबुद्ध समाज की प्रवक्ता के रूप में इन कवयित्रियों के सामाजिक-राजनीतिक विचारों व उनकी पक्षधरता का भी विशेष महत्व है।इन कवयित्रियों ने राजनीति, समाज, साम्प्रदायिकता, भूमंडलीकरण की चुनौतियों आदि पर गंभीर, महत्वपूर्ण कवितायें लिखीं है। इसके साथ-साथ कविता की रचना-प्रक्रिया पर भी उन्होंने गहराई से विचार किया है। इसी तरह जीवन के कोमल बिम्ब, प्रकृति से उनकी अभिन्नता, भाव-भाषा के विविध प्रयोग, स्त्री-कविता की इन उपलब्धियों की ओर किसी का ध्यान नहीं गया। स्त्री व स्त्रीत्व की आवाज़ पकड़ते हुए, यह सब छूट रहा था जिससे उनके मूल्यांकन की पहल, स्वागत-योग्य होते हुये भी, अधूरी रही है।काव्य रचना के ये सभी पक्ष समकालीन कविता धारा में स्त्रियों तथा स्त्री-कविता की सम्पूर्ण उपस्थिति को दर्ज करते हैं।

क्रमशः जारी 

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