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70 साल गौरव के, लोकतंत्र और समतामूलक सपनों के

स्त्रीकाल (प्रिंट )के अक्टूबर-दिसंबर अंक का संपादकीय 
संजीव चंदन


आजादी के 70 साल में कुछ नहीं हुआ. यह हालिया समय का सबसे बड़ा और बार-बार दुहराया जाने वाला एक ऐसा असत्य है, जिसका मुख्य लक्ष्य समाज और देश को पुनरुत्थानवादी  विचारों और व्यवस्था की ओर ले जाना है.  मेरे जैसे लोग 15  अगस्त 1947 को केन्द्रीय सत्ता के हस्तान्तरण, और इस सत्ता का देश के शासक वर्ग के हाथ में आने की तारीख के रूप में देखते हैं, जिसका बड़ा महत्व यह था कि तत्कालीन शासक वर्ग का केन्द्रीय नेतृत्व प्रगतिशील विचारों वाले लोगों के हाथ में था और इसीलिए 26 जनवरी 1950 को समता आधारित सपनों के साथ संविधान लागू हो सका, जो इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण तारीख है, जो एक मील के  पत्थर की तरह है और अब उसका भी लगभग 70 साल होने जा रहा है. इस 70 साल को नकार देना 1950 के उस महत्वपूर्ण घटना और उसके हस्तक्षेप तथा असर को नकार देना है.

हालांकि इन 70 सालों में संविधान पर आधारित शासन व्यवस्था के सकारात्मक असर के बीज अभी अंकुरित ही होने शुरू हुए है कि उसपर ‘कुश के ऊपर मट्ठे’ के प्रयोग जैसे हमले होने लगे हैं, वह डराने वाला जरूर है. देश में बढ़ती असहिष्णुता, भीड़तन्त्र की हिंसा, धर्म और राष्ट्रवाद के सम्मिश्रण से पैदा हुआ ‘राष्ट्रवादी आतंकवाद’ राज्य संरक्षित शिक्षण संस्थानों के लोकतंत्र पर हमले और जब पीछे छूट गये समाजों की लगभग पहली पीढ़ी वहाँ आ ही रही है तब उनके लिए दरवाजे बंद करना, या स्पेस को सीमित करना, महिलाओं पर बड़ी संख्या में हो रहे हमले आदि एक भयावह चित्र प्रस्तुत करते हैं. इन स्थितियों में यह जरूरी है कि विचार करें कि 70 सालों का आखिर हासिल क्या है, क्या यही जो दिख रहा है या यह पुनरुत्थानवादियों का प्रतिक्रियावाद है और इससे आने वाले समय में हम निपट सकने वाले प्रगतिशील राष्ट्र की तरह उभरेंगे!

इस समय और इन 70 सालों के हासिल को समझने के लिए बहुत सचेत और सावधान समझ की जरूरत है ताकि समझा जा सके कि उस सपने पर कोई संकट तो नहीं है, जो समतामूलक समाज के लिए 26 जनवरी 1950 को देखा गया था, या उसके पहले भी देखा गया था जब पहली बार महिलाओं, वंचितों के हित में पहली व्यवस्था की कोशिश हुई थी, जब सतीप्रथा के खिलाफ क़ानून बना था, जब एज ऑफ़ कंसेंट पर बहस हुई थी, जब बाल-विवाह के खिलाफ कानूनी हस्तक्षेप हुआ था, जब छुआछूत उन्मूलन की दिशा में पहला कदम लिया गया था, जब सबके लिए सुलभ शिक्षा की पहली पहल ली गई थी, जब देश में व्यक्ति की स्वतंत्रता और उसके अधिकार की संरक्षा के उद्देश्य से पहली बार क़ानून और न्यायालय बना था, या ऐसे ही कई अन्य प्रगतिशील सामाजिक-राजनीतिक निर्णयों के वक्त!

विचित्र विरोधाभास की स्थिति है, जो एक तरह से शातिर शतरंजी चाल भी है, कि जो विचार परंपरा या ताकतें अपने युग की हर प्रगतिशील पहल के खिलाफ थीं और उन पहलों के बरक्स खुद दकियानूस, परंपरावादी और प्रतिक्रियावादी थीं, वह आज प्रगतिशीलों की शब्दावालियों में ही प्रगतिशील मूल्यों के खिलाफ माहौल बना रही हैं, क्रमिक युद्ध की स्थिति में हैं. बहुत पीछे जाने की जरूरत नहीं है, इसी 70 साल की अवधि के भीतर भी उनके व्यवहार, विचार, राजनीतिक एजेंडे और पहलों को देखें तो  समतामूलक मूल्यों के जो अवरोधक थे आज समतावादी समूहों की शब्दावली के साथ ही अपने लक्ष्य के प्रति निरंतर गतिशील हैं. उनका लक्ष्य उनके महान ‘यज्ञ’ का अंतिम फलाफल है, जिसमें वे कभी-कभी शातिर, चालाक और पैतरे बदलकर समिधा डाल रहे हैं. वे समाज में समानता के लिए पीछे छूट गये समाजों के अधिकार के लिए राज्य और समाज द्वारा किये जा रहे प्रयासों के खिलाफ थे, आंदोलनरत थे, लेकिन आज वे उन्हीं समाजों से मुट्ठी भर लोगों के अधिकार सम्पन्नता के खिलाफ उनसे भी पीछे छूट गये और असंतुष्ट समुदायों के साथ खड़े होने का भ्रम रच रहे हैं. हिन्दू महिलाओं के समान अधिकार के सिद्धांत की खिलाफत करने वाले लोग मुस्लिम महिलाओं के समान अधिकार के पक्ष में खड़े होने का छद्म रच रहे हैं. धन-अर्थ-काम-मोक्ष जैसे सारे तत्कालीन अधिकारों से एक बड़े समूह की वंचना की वकालत करने वाले लोग आज कश्मीर में वंचितों-दलितों के छिन गये अधिकार के पक्ष में खड़े होने का छद्म रच रहे हैं. 1984 में शाहबानो केस में, गुजारे भत्ते के सावाल पर वे काफी मुखर हुए और अब तीन तलाक के खिलाफ मुहीम के पक्ष में. विरोधाभास है कि भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम महिलाओं द्वारा दायर याचिका के समर्थन में अपनी दलीलें दीं, वहीं विवाह के भीतर 15-16 साल की लड़कियों का होने वाला जबरन बलात्कार के समर्थन में कोर्ट में हलफनामादाखिल किया. यानी वे मुसलमान महिलाओं के लिए फिक्रमंद हैं और हिन्दू महिलाओं के सांस्थानिक बलात्कार के पक्षधर!



उनके झांसे में आने से बचना होगा. सच यही है कि तीन तलाक के खिलाफ लड़ने वाली मुस्लिम महिलाओं को समर्थन देने वाला भी मुसलमान समाज ही है. मुस्लिम महिलाओं का संगठन, लड़ने वाली महिलाओं के मायके के लोग या उनके समर्थक, शाहबानो प्रकरण पर राजीव गांधी सरकार से इस्तीफा देने वाले आरिफ मोहम्मद खान जैसे लोग, क्योंकि राजीव गांधी शाहबानो के खिलाफ मुसलमान समाज के तबके के विरोध से डर कर झुक गये थे और उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपनी सरकार के फैसले लिए.


आज तीन तलाक के खिलाफ अदालत और स्टेट की दखल का विरोध कर रहे वे वैसे ही लोग हैं जैसे हिन्दू कोड बिल, सती उन्मूलन, विधवा विवाह उन्मूलन आदि का विरोध करने वाले पुनरुत्थानवादी हिन्दू. वे लोग शरियत चाहते हैं तो पुनरुत्थानवादी हिन्दुओं के समविचारी पूर्वज मनुस्मृति के समर्थक थे. आज भी जब हिन्दू व्यवस्था में सुधार का प्रसंग आता है तो वे उसके खिलाफ होते हैं, लेकिन मुसलमान समाज को बुरा समाज सिद्ध करने के लिए उनके दकियानूस मुद्दों को जोर-शोर से उठा रहे हैं. यह खतरनाक है क्योंकि उनके मुद्दे गलत नहीं हैं इरादे गलत हैं, मुद्दे वही हैं जो प्रगतिशील जमातों के थे या उनके होने चाहिए थे.

इन 70 सालों में बहुत कुछ हासिल है वंचित जातियों और लिंग का, जिसे सुनिश्चित किया है संविधान ने. आज महिलायें ज्यादा स्वतंत्र हुई हैं, पितृसत्तात्मक जकड़न की गाठें कुछ हद तक ढीली हुई हैं, स्त्री-शिक्षा दर बढ़ा है, स्वास्थ्य का स्तर सुधरा है, विभिन्न संसाधनों में उनकी हिस्सेदारी बढ़ी है, स्पेस पर उनकी हिस्सेदारी और दावेदारी बढ़ी है, जिसकी प्रतिक्रिया में पितृसत्तात्मक वर्चस्व के एजेंट हमलावर हैं. यदि बलात्कार की घटनाओं की संख्या बढ़ी है तो उसका कारण है कि उसकी रिपोर्टिंग बढ़ी है. अब छेड़छाड़ खबरें बढ़ी हैं तो उसका कारण है कि महिलायें इनके खिलाफ सूचित कर रही हैं, मुंह खोल रही हैं. इसी हासिल के खिलाफ वर्चस्ववादी समूह आक्रामकता के साथ हमलावर भी है, इसलिए घटनाओं के कारण वे आक्रामक हमले भी है. वंचित जातियों के हासिल के संदर्भ में भी यही सच है तो इसी अनुपात का सच यह भी है कि उनपर भी आक्रामक हमला है और यह भी सच है कि वे भी आज संवैधानिक दायरे में अपने हक़ की आवाजें उठा रहे हैं, संघर्ष कर रहे हैं, इसलिए उनपर हमलों की घटनाएँ रिपोर्ट हो रही हैं. हाशिये के समाज का थोड़ा ही सही आगे आ जाना और लोकतंत्र तथा 70 साल पहले लागू हुआ संविधान अपना काम कर रहे हैं तो प्रतिक्रियावादी और पुनुरुत्थानवादी जमातें अपना.


वर्चस्वावादी, ब्राह्मणवादी ताकतों के हालिया हमलों और इरादों को निष्प्रभावी बनाने के लिए वंचित समूहों के नेतृत्व को इन 70 सालों के हासिल की चर्चा और उसका प्रसार करना चाहिए. बात करनी चाहिए इन प्रयास, समता के लिए जारी संघर्ष के सपनों की और उसे देखने तथा लागू कराने में संघर्ष करने वाले महान लोगों की, जनता को इसके लिए तैयार करना चाहिए कि शिक्षा, लोकतंत्र, न्यायालय, संविधान, संसद जैसे संस्थाओं की अक्षुण्णता सुनिश्चित हो अन्यथा वर्चस्वावादी ताकतों का पहला शिकार ये संस्थायें ही होंगी, जिनसे समाज के हाशिये के लोग ताकत पाते रहे हैं.

थोड़ा गौर करते हैं कि इन पुनरुत्थानवादियों के सपनों का समाज क्या है, वह ब्राह्मणवादी हिंदुत्व का राष्ट्रवाद कैसा समाज बनायेगा. इसे एक प्रसंग से समझते हैं. अभी विलियम डेलरिम्पल और अनिता आनंद की एक किताब खत्म की है:  ‘कोहिनूर, दुनिया के सबसे मशहूर हीरे की कहानी'(जगरनॉट). एक ऐतिहासिक उपन्यास सा लिखा गया यह कोहिनूर हीरे का प्रमाणिक इतिहास-लेखन है. किताब भरसक कोशिश करती है कि इसके ऐतिहासिक वजूद की विकास यात्रा को परत-दर-परत डॉक्यूमेंट किया जाये. वहीं इसके कालखंड की और हीरे की कहानी की अवांतर कहानियां, जो तब की मुख्यधारा का इतिहास हैं, इसे एक रचना के रूप में ऐतिहासिक उपन्यास का स्वरूप दे देती हैं. नायक कोहिनूर , रहस्यों, अफवाहों और अतिशक्योक्तियों की लिबास में लिपटा सर्वाधिक चर्चित नायकों में से एक है, जो बाद में हिन्दू राष्ट्रवादी भावना से जा जुड़ा. किताब का फलक विस्तृत है, जानकारियों और विभिन्न संवेदनाओं के लिए महत्वपूर्ण आश्रय और उद्दीपन हैं इसमें. लेकिन राष्ट्रवाद की कड़वी सच्चाइयों के भीतर आहों और अनसूनी कर दी गई कराहों के कब्र डरा देते हैं. राष्ट्रवादी अस्मिता, खासकर हिन्दू राष्ट्रवादी अस्मिता  की डरावनी तस्वीर है महाराणा रणजीत सिंह के साथ उनकी चंदन की चीता में उनकी 11 महारानियों का ज़िंदा जल जाना और साथ में अनेक दासियों का उपलों और कंडों की आग में-वीभत्स सती प्रथा का यह चित्र रूह तक हिला देता है. रणजीत सिंह के बाद भी अनेक राजाओं के साथ यह सिलसिला दुहराया जाता रहा, जलने वाली रानियों में 16 से लेकर 50 तक की उम्र की रानियाँ और इन्हीं उम्रों की दासियाँ लिजलिजाती, बूढ़ी वासना और महानता की उन्मत्त आकांक्षा  की आग में  पीढी-दर-पीढी जलती रही हैं, कितनी जीवित कराहती रही हैं. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का (दुः) स्वप्न इसी लिए डारता भी है, और इन 70 सालों पर, बल्कि पिछले दो सौ-ढाई सालों पर गर्व करने को जी चाहता है, जिसे वे सर्वाधिक बुरा समय मानते हैं- उनके शब्दों में कलियुग का चरम ! वे इसे ‘हंस चुगेगा दाना और कौआ मोती खायेगा वाली शब्दावाली में समझते, समझाते हैं.

स्त्रीकाल का यह अंक महिला आरक्षण को विशेष रूप से केन्द्रित है. आज आजादी के 70 सालों बाद भी संसद, विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिशत नगण्य है. पिछले दो दशक से महिला आरक्षण बिल संसद में पारित नहीं हो पा रहा है, कारण किसी भी राजनीतिक दल का इसके प्रति गंभीर नहीं होना है. स्त्रीकाल न सिर्फ समय-समय पर इस मुद्दे को उठाता रहा है, बल्कि सांस्थानिक रूप से इसके लिए सक्रिय है.

2012 में स्त्रीकाल के दलित स्त्रीवाद अंक के बाद हम इसे त्रैमासिक पत्रिका के रूप में पुनः एक शुरुआत दे रहे हैं. इसके पहले यह पत्रिका अनियतकालीन रही है. 2012 के बाद हालांकि इसका वेब वर्जन (www.streekal.com) 2014 से निरंतर और दैनिक प्रकाशन है. इसे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने भी शोध-पत्रिका के रूप में मान्यता दी है. हम द्विमासिक ऑनलाइन शोध जर्नल भी प्रकाशित कर रहे हैं. आपका सहयोग अपेक्षित है.


स्त्रीकाल के संपादक है .

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स्त्रीकाल  प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.

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अपने यौन शोषण की घटनायें बताने का हैश टैग #MeToo

ट्वीटर पर पाने जीवन में कभी न कभी हुए यौन शोषण की घटना का विवरण देने का सिलसिला #MeToo हैश टैग के साथ ट्रेंड कर रहा है. 30,000 से अधिक महिलाएं, जिनमें अभिनेता एलिसा मिलानो और अन्ना पाकीन और एमपी स्टैला क्रैसी भी शामिल हैं, अभियान में शामिल हुई भारत की चर्चित हस्तियों ने भी अपनी आपबीती बतानी शुरू की है. यह ट्रेंड फेसबुक पर भी आकार ले रहा है.

हार्वे वेन्स्टीन के आरोपों के प्रकाश में, Me Too का इस्तेमाल यह दिखाने के लिए किया जा रहा है कि यौन उत्पीड़न और हमले कैसे व्यापक हैं.

रविवार को अभिनेत्री एलिसा मिलानो ने एक टिप्पणी ट्वीट की थी कि “एक मित्र ने सुझाव दिया है: यदि सभी महिलायें, जो यौन उत्पीड़न या हमले की शिकार  वे ” Me Too ” शीर्षक से लिखें तो  हम लोगों को समस्या की भयावहता से अवगत करा सकते हैं.”

उन्होंने लिखा “अगर आपको यौन उत्पीड़न का शिकार होना पडा है, तो प्रत्युत्तर में ‘ Me Too’ लिखें. इस कैम्पेन में शामिल होते हुए प्रसिद्ध कॉमेडियन मल्लिका दुआ ने बचपन में अपने साथ हुई यौन शोषण की घटना के बारे में लिखा है. भारत से भे एप्रमुख हस्तियाँ लिख रही हैं वहीं फेसबुक पर भी यह ट्रेंड करने लगा है.


टच ही तो किया है न और कुछ तो नहीं किया न 

अब प्रसिद्ध कॉमेडियन मल्लिका दुआ ने बचपन में अपने साथ हुई यौन शोषण की घटना का खुलासा किया है.

कॉमेडियन मल्लिका दुआ ने अपने फेसबुक और सोशल मीडिया पर एक पोस्‍ट के तहत बताया कि वह 7 साल की उम्र में उनके साथ भी यौन शोषण की घटना हुई है. मल्लिका ने अपने पोस्‍ट में लिखा, ‘ मैं भी… अपनी खुद की कार में. मेरी मां कार चला रही थीं जबकि वह हमारे साथ पीछे बैठा था और पूरे समय उसका हाथ मेरी स्‍कर्ट में था. मैं सिर्फ 7 साल की थी और मेरी बहन 11 साल की. उसका हाथ मेरी स्‍कर्ट के अंदर था और मेरी सिस्‍टर की पीठ पर था. मेरे पिता ने, जो उस समय दूसरी कार में थे, उसका मुंह तोड़ दिया क्‍योंकि उसी रात उन्‍होंने उसे रंगे हाथों पकड़ लिया था.’

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बाल विवाह के लिए अभिशप्त लड़कियाँ

उपासना बेहार

लेखिका  सामाजिक कार्यकर्ता हैं और महिला मुद्दों और बाल अधिकारों को लेकर मध्यप्रदेश में लम्बे समय से काम कर रही हैं संपर्क :’
upasana2006@gmail.com

‘‘मैं अभी बहुत पढ़ना चाहती हूँ लेकिन मेरे घर वाले मेरी शादी जबरदस्ती करवा रहे थे। शादी रुक जाने से बहुत खुश हूँ और अब मैं फिर से स्कूल जा पाऊँगी और अपने मां पिता को कुछ बन कर दिखाऊंगी।’’ ये कहना था 13 साल की तनु की जिसका बाल विवाह होने जा रहा था और प्रशासन की मुश्तेदी से यह विवाह रुक गया। मध्यप्रदेश के उज्जैन के जमुनिया खुर्द गाँव की 13 साल की सोनू और तनु के विवाह की तैयारियाँ चल रही थी। जिसे प्रशासन के हस्तक्षेप के बाद रद्द किया गया। यह घटना उसी 24 जनवरी के चंद रोज पहले हुआ है जिस दिन को पूरा देश ‘नेशनल गर्ल चाइल्ड़ डे’ के रूप में मनाता है।

देश और प्रदेश में ऐसी हजारों तनु और सोनू जैसी बच्चियाँ हैं जो पढ़ना चाहती थी कुछ बनना चाहती थी लेकिन उन सब की आकांक्षाएँ और अरमान बाल विवाह की भेंट चढ़ गयी।


संयुक्त राष्ट्र की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार भारत दुनिया का ऐसा छठा देश है, जहां बाल विवाह का प्रचलन सबसे ज्यादा है। भारत में 20 से 49 साल की उम्र की करीब 27 फीसदी महिलाएं ऐसी हैं जिनकी शादी 15 से 18 साल की उम्र के बीच हुई है। जुलाई 2014 में यूनिसेफ द्वारा ‘एंडिग चाइल्ड मैरिजः प्रोग्रेस एंड प्रास्पेक्ट्स’ शीर्षक से बाल-विवाह से संबंधित एक रिपोर्ट जारी की गई। इस रिपोर्ट के अनुसार विश्व में 720 मिलियन महिलाएं ऐसी हैं, जिनकी शादी 18 साल या इससे कम उम्र में हो गई है। विश्व की कुल बालिका वधु की एक तिहाई बालिका वधु भारत में पाई जाती है अर्थात् प्रत्येक 3 में से 1 बालिका वधु भारतीय है।

इसी प्रकार वार्षिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार मध्यप्रदेश में वर्ष 2012-13 में वर्ष 2011-12 की तुलना में अधिक बाल विवाह हुए हैं। प्रदेश में लड़कियों के बाल विवाह की दर पिछले वर्ष की अपेक्षा वर्ष 2012-13 में 20 जिलों में बढ़ी है जिसमें सबसे ज्यादा झाबुआ, दूसरे स्थान पर शाजापुर तथा तीसरे स्थान पर राजगढ़ है। वैसे प्रदेश में बाल विवाह लड़कियों में लड़कों की तुलना में कम रही है, लेकिन पिछले वर्ष 2011-12 की तुलना में बालिका विवाह 0.2 फीसदी की वृद्धि हुई है।

अगर लड़कों के बाल विवाह को देखें तो उनके बाल विवाह के जिलों में भी बहुत ज्यादा बढ़ोत्तरी हुई है। वर्ष 2012-13 में 21.3 फीसदी लड़कों के विवाह 21 वर्ष से कम उम्र में हुए है, जबकि पिछले वर्ष यह दर 18.3 फीसदी रही। वर्ष 2012-13 में 35 जिलों में लड़कों के बाल विवाह बढ़े हैं और इसमें 10 फीसदी वृद्धि की दर से झाबुआ प्रथम स्थान पर है, वहीं शाजापुर 9.6 फीसदी दर के साथ दूसरे और टीकमगढ़ 42.7 के साथ तीसरे पर है। इसी तरह इंदौर, भोपाल और जबलपुर जैसे शहर भी बाल विवाह वृद्धि दर से अछूते नहीं है।

बाल विवाह बाल अधिकारों का उल्लंघन है। लिंगभेद, अशिक्षा, अज्ञानता, असुरक्षा, धार्मिक-सामाजिक मान्यताएँ, रीति-रिवाज, परम्पराएं, लड़कियों को कमतर समझना, उन्हें आर्थिक बोझ मानना, इत्यादि प्रमुख कारण है। समाज की यह सोच भी कि लड़कीयों की कम उम्र में शादी कर देने से वे दूसरे घर में जल्दी सामंजस्य बिठा लेती हैं, यह भी बाल विवाह के अनेक कारणों में से एक है।

जिन बच्चियों का बाल विवाह होता है उनका शारीरिक, मानसिक, सामाजिक व शैक्षणिक विकास सही तरिके से नहीं हो पाता है। कम उम्र में शादी होने से उन्हें गरिमापूर्ण जीवन जीने के, स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा के अधिकार से महरुम होना पड़ता है और वे हिंसा, दुर्व्यवहार, शोषण, यौन शोषण की शिकार हो जाती हैं। बाल विवाह के कारण बच्चियाँ कम उम्र में गर्भवती हो जाती हैं जिससे उनमें स्वास्थ्य समस्याएं होने की सम्भावना बहुत बढ़ जाती है और इसके कारण उनकी मृत्यु, गर्भपात में वृद्धि, कुपोषित बच्चों का जन्म, माता में कुपोषण, खून की कमी होना, शिशु मृत्यु दर, माता में प्रजनन मार्ग संक्रमण यौन संचरित बीमारियाँ बढ़ती हैं। कच्ची उम्र में माँ बनने वाली ये बालिकाएं न तो परिवार नियोजन के प्रति सजग होती हैं और न ही नवजात शिशुओं के उचित पालन पोषण में दक्ष होती हैं इस कारण बच्चों की सही देखभाल नहीं हो पाती और बच्चे ताउम्र कमजोर रहते हैं। अध्ययनों से यह सिद्ध हो चुका है कि 15 वर्ष की उम्र में माँ बनने से मातृ मृत्यु की संभावना 20 वर्ष की उम्र में माँ बनने से पांच गुना अधिक होती है।

कम उम्र में शादी करने से लड़कियाँ शिक्षा से वंचित हो जाती हैं। उनका भविष्य अंधकारमय हो जाता है। अनपढ़ या कम पढ़ी-लिखी होने के कारण वे अपने घर में बहुत ज्यादा आर्थिक सहयोग नहीं कर पाती हैं और गरीबी निरंतर बनी रहती है। इसके अलावा वे अशिक्षित होने के कारण अपने बच्चों को भी शिक्षित नहीं कर पातीं। यदि विवाह के पश्चात् पति कि मौत हो जाए तो उसे छोटी उम्र से ही विधवा का जीवन जीना पड़ता है। इस प्रकार से बाल विवाह लड़की को लिंगभेद, बीमारी, अशिक्षा एवं गरीबी के भंवरजाल में फंसा देता है और एक बार बच्ची इस जाल में फंस जाये तो उससे निकलना मुश्किल हो जाता है। कुल मिलाकर बाल विवाह का दुष्परिणाम जीवन भर सबसे ज्यादा बालिका बधू को भोगना पड़ता है।


बाल विवाह की कुरीति को रोकने के लिए 1928 में शारदा एक्ट बनाया गया था। इस एक्ट के मुताबिक नाबालिग लड़के और लड़कियों का विवाह करने पर जुर्माना और कैद हो सकती थी। आजादी के बाद से लेकर आजतक इस एक्ट में कई संशोधन किए गए है। सन् 1978 में इसमें संशोधन कर लड़की की उम्र शादी के वक्त 15 से बढ़ाकर 18 साल और लड़के की उम्र 18 से बढ़ाकर 21 साल कर दी गई थी। बाल ‘विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006’ की धारा 9 एवं 10 के तहत बाल विवाह के आयोजन पर दो वर्ष तक का कठोर कारावास एवं एक लाख रूपए जुर्माना या दोनों से दंडित करने का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा बाल विवाह कराने वाले अभिभावक, रिश्तेदार, विवाह कराने वाला पंडित, काजी को भी तीन महीने तक की कैद और जुर्माना हो सकता है। बाल विवाह की शिकायत कोई भी व्यक्ति निकटतम थाने में कर सकता है। अगर बाल विवाह हो जाता है तब किसी भी बालक या बालिका की अनिच्छा होने पर उसे न्यायालय द्वारा वयस्क होने के दो साल के अंदर अवैध घोषित करवाया जा सकता है।

देश में बाल विवाह के खिलाफ कानून बने हैं और समय के अनुसार उसमें लगातार संशोधन कर उसे ओर प्रभावशाली बनाया गया है फिर भी बाल विवाह लगातार हो रहे हैं। अगर सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद देश में बाल विवाह जैसी कुप्रथा का अंत नहीं हो पा रहा है, तो इस असफलता के पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि बालविवाह एक सामाजिक समस्या है और इसका निदान सामाजिक जागरुकता से ही सम्भव हो सकेगा। केवल कानून बनाने से यह कुरीति खत्म नहीं होने वाली है।

अगर इस कुप्रथा को जड़ से खत्म करना है तो इसके लिए समाज को ही आगे आना होगा तथा बालिकाओं के पोषण, स्वास्थ्य, सुरक्षा और शिक्षा के अधिकार को सुनिश्चित करना होगा। समाज में शिक्षा को बढ़ावा देना होगा। अभिभावकों को बाल विवाह के दुष्परिणामों के प्रति जागरुक करना होगा साथ ही साथ सरकार को भी बाल विवाह के विरुद्व बने कानून का जोरदार ढंग से प्रचार-प्रसार करना होगा तथा कानून का कड़ाई से पालन करना होगा। बाल विवाह प्रथा के खिलाफ समाज में जोरदार अभियान चलाना होगा। साथ ही साथ सरकार को विभिन्न रोजगार के कार्यक्रम भी चलाना होगा ताकि गरीब परिवार गरीबी की जकड़ से मुक्त हो सकें और इन परिवारों की बच्चियाँ बाल विवाह का निशाना न बन पाएं।

स्त्रीकाल  प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
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लघुकथाएं

संध्या तिवारी

हिन्दी की प्राध्यापिका, कवयित्री और कहानीकार.. संपर्क : 9810201120
sandhyat70@gmail.com

सांकल

पिछले दो सालो से साथ पढ़ती पायल और पूर्वी अब तक फास्ट फ्रैन्ड बन चुकी थी,  लेकिन पायल घर कम ही आती और आती तो बाहर बाले कमरे तक।

मम्मी ईशान कोण में बने पूजा गृह के समक्ष ऊन से बने धवल आसन पर बैठ चुकी थी। कितनी पवित्र लग रही थी खुले गीले बालो में। मानो केशो से पानी के मोती टपक रहे हो।

मम्मी आदित्य हृदय स्तोत्र पाठ के लिये आचमन कर चुकी थी अब तो बह बोलेगी नहीं जब तक “ऊं अस्य श्री बाल्मीके  रामायणे आदित्य हृदय स्तोत्र ऊं तत्सत” नहीं कह लेती।

मन ही मन सोचती पूर्वी ने धीरे से कार्ड  मम्मी के पास रख दिया और खुद काम में लग गयी।

“किसका कार्ड है यह,  और  यहां किसने रखा ?? ”
कार्ड पर नजरे गडाये मम्मी गुस्से से उबल रहीं थी

मम्मी पायल के भाई की शादी है,  और बही कार्ड दे गयी। आप पूजा से उठते ही देख लो,  इसलिये मैने ही रख दिया। क्या कुछ गलत हुआ ?? पूर्वी ने सहमते हुये पूंछा।


हे भगवान!!! धरम भ्रष्ट कर दिया पूर्वी तूने। एक ब्राह्मण के यहां जन्म ले के एक वाल्मीकि से दोस्ती? तुझे कोई और सहेली नहीं मिली। देख कार्ड पर बाकायदा पायल के भाई के नाम के आगे वाल्मीकि लिखा है। ये लड़की न……….. आगे से तुम्हारी पायल से दोस्ती खत्म और हां कार्ड कूड़ेदान में डालकर नहाओ!… और मैने भी तो कार्ड छू लिया है मुझे भी अब दोबारा नहाना पड़ेगा।“
“ऊंहूं…………… लेकिन मम्मी  आप तो रोज ही वाल्मीकि  का लिखा स्तोत्र पढ़ कर पुण्यार्जन करती हो और पवित्र होती हो।” पूर्वी ने डरते डरते कहा

“चोऽऽऽप्प।“ मम्मी की धारदार आवाज रीढ़ की हड्डी चीर गयी।

 चिमटी

आत्मा पर बडा बोझ था,  जो रातों में सपना बन कर डराता था और दिन में सोच।

अब क्या करूं,  मैं तो था ही कायर,  लेकिन वह तो समझदार थी,  उसे अपनी जान देने की क्या जरूरत थी। वह मरकर मुक्त हो सकी भला क्या? और मै जीकर भी मुक्त हो पाया भला क्या उसकी यादों से। क्या करूं? कहां जाऊं ?कैसे इस अपराध बोध से मुक्ति होगी ?

न्हीं बातो की सोच में डूबता उतरता विपुल बान की खरखटी खटिया पर बैठा  कभी एक छेद मे हाथ डालता कभी अदबाइन के सहारे सहारे अंगुलियां किसी और छेद में जा ठहरती। जैसे सोच के कई खाने बने हो और उनमें से किस खाने में ग्लानि की भरपाई का मल्हम मिलेगा  अंगुलिया टोहकर ढूंढ़ना चाह रही हों।
“आऊच…” कहकर उसने हाथ खींच लिया बान की फांस अंगुली के मांस में धंस चुकी थी। वह नाखूनों की चिमटी बनाकर फांस निकालने का भरसक प्रयत्न कर रहा था लेकिन फांस थी कि अन्दर ही अन्दर टूटती जा रही थी। फांस मांस मे धंस चुकी थी  बहुत दर्द और चीसन बढ गयी थी। “अब तो इसके लिये बाजार से चिमटी ही लानी पडेगी तब  कहीं जाकर”… कहकर विपुल तर्पण के लिये जल,  काले तिल,  जौ,  फूल की थाली,  कुश की पैंती और सफेद फूल अंजुली में भर कर बैठा।


“आप पिछले कई सालो से किसका तर्पण कर रहे है? भगवान की कृपा से मां बाऊ जी सभी कुशल मंगल से है,  तो…?”

पत्नी जिज्ञासा और प्रश्न चिन्ह की प्रतिमूर्ति सी बनी खडी थी।

विपुल अपनी फांस लगी अंगुली की चीसन दबाते हुए बोला, “तर्पण कहां है यह,  यह तो मन की फांस की चिमटी है…”  और अंजुली भरे पानी में दो आंसु  टपक गये।

हूटर

मुझे  फैक्ट्री के सारे मुलाजिम हमेशा ही फैक्ट्री में बजने बाले हूटर के गुलाम सरीखे दिखते थे।   हालांकि ये सब नियम से नहाते-धोते, खाते-पीते थे,  लेकिन इनके  जीवन में स्फूर्ति न थी।
एक यन्त्रवत जीवन यापन था। एक अनकही यन्त्रणा थी।

सबेरे पांच बजे के हूटर पर मन हो या न हो बिस्तर छोड़ देना। सात बजे के हूटर पर टिफिन का झोला साइकिल में लगाये,  साढ़े सात के हूटर पर फैक्ट्री गेट के अन्दर आई कर्ड पंच करने से लेकर,  इस कैद खाने से छूटने की शाम सात बजे तक के हूटर की थका देने बाली अविराम प्रतीक्षा,  फैक्ट्री में काम करने बाले हर कर्मचारी के हिस्से की दिनचर्या थी।

नापसंदगी ही कभी-कभी जीवन का अभिन्न अंग बन जाती है।
शादी के बाद मेरा जीवन भी हूटराधीन था।
“हूटर के दास पति की दासी अर्थात् दासनुदासी।”


एक दिन हूटर की आवाज पर वह उठा,  उस दिन उसका चेहरा जल्दी में नहीं लग रहा था,  हां कुछ-कुछ चोर निगाहों से मुझे जरूर देख रहा था।

मैने टिफिन दिया। उसने टिफिन लेते हुये अपनी अंगुली मुझसे न छू जाये इसका भरसक प्रयत्न किया।

मैने नोटिस किया,  लेकिन किसी अशुभ विचार से कहीं “पल्ला न छू जाये इस डर से पल्ला झाड लिया।”

वह किसी स्वामिनी का हाथ पकड़े इस हूटर की परिधि से कहीं बाहर चला गया था।

और मैं,  दासानुदासी हूटर की गुलामी करती,  आज भी सुबह के पांच बजे के हूटर पर बिस्तर छोडकर शाम के सात बजे के हूटर पर दरबाजे की कुंडी खोल हर आहट पर ऐसे कान लगाये रहती हूं जैसे पूरे शरीर में कान ही कान उग आये हो।

लेकिन सुनाई पड़ती है तो, केवल सात,  सवा सात,  साढे सात के हूटर की आवाज। जो रोज मुझे हूट करती है,  और मैं इसका कुछ नहीं कर पाती।

उफ्फ!!!

किराये का ड्राम खाली कर के देना था दुकान मालिक को। उसमें रखे वर्फ के पानी को किसमें लौटा जाय इतना बड़ा कोई बर्तन न मिलने के कारण पानी नाली में बहाया जा रहा था।

वह झुलसा देने बाली गर्मी में खड़ा ये सब देख रहा था। उसे लगा उसका गला भी प्यास से चटक  जायेगा। क्यों न वह भी अपनी बोतल ठंडे पानी से भर ले? लेकिन कल जब वह भाभी से पानी मांगने गया था,  तो भाभी ने उसे कितनी गालियां दीं थीं, और बिना पानी के ही भगा दिया था। अगर मां जिन्दा होती तो क्या कोई उसे पानी के लिये मना कर सकता था।

कमरे में घुसते ही वह प्यास के मारे बेहोश हो गया था। आज अगर भाभी के घर गया तो क्या भाभी भतीजे फ्रिज का पानी लेने देंगें। कल तो डांटा ही था आज हो न हो मारने ही लगें।

लेकिन प्यास थी,  कि अपने को जोर मार रही है। जो होगा देखा जायेगा। सोचकर वह घर की तरफ बढ़ा।

खूब सारे लोग है आज घर में। भाई भाभी कैसे चुपचाप है। कोई मुझे गाली क्यों नहीं नहीं दे रहा। आज अचानक क्या बदल गया? कोई मुझसे कुछ कहता ही नहीं। सब मेरी माला चढ़ी फोटो को घेर कर कितने मेवा मिष्ठान लिये बैठे है।

लेकिन मुझे तो बिल्कुल भूख नहीं है। मुझे तो प्यास लगी है बहुत तेज प्यास।

 क्षेपक

रात्रि भोज के लिये खाने की मेज पर बैठे बैंक मैनेजर मिस्टर एस लाल पचास साल पीछे की सीढ़ियां उतर गये, जब वह सुखिया हुआ करते था। बस जब गाँव की पाठशाला में हाजिरी होती थी तब सुखलाल नाम सुनाई पड़ता था। नहीं तो ये सुख्खी, ये सुखिया ऐसे सम्बोधन ही अन्तरमन पर गुदे हुये थे।

उसे अच्छी तरह याद है गाँव का नाम,  सौंखिया था। लेकिन गांव में जाति के आधार पर टोले बंटे थे जैसे पसिया टोला,  कुम्हारनटोला और उसका वाला था चमारन टोला।

उफ्फ !! झुरझुरी आ गई एस लाल को। पूरी खाल में चामरौधे की सडान्ध भिद गई।

खाना लगा दिया है “पत्नी माया की आवाज से वह वर्तमान में लौटे
“कुसुम कहां है? खाना नहीं खायेगी क्या?” एस लाल ने पूछा
“अपने कमरे में है आती होगी। आज ऑफिस से देर से आयी थी। कह रही थी,  ऑडिट है,  थोडा काम करना है।”
“हूंऽऽऊं। अरे वाह ! आज तो पनीर और खीर दोनो मेरी मनपसन्द चीजें बनायीं हैं क्या बात है,  कुछ कहना है क्या?
“जी” माया कुछ सकुचाते हुये बोली “कुसुम के साथ एक लडका काम करता है.. अच्छी पोस्ट पर है… और दोनों एक दूसरे को पसन्द भी करते है,  आप कहें तो……..?”
“ठीक हैऽ, ठीक हैऽ, भाई। हमें क्या आपत्ति हो सकती है।” खीर गटकते हुये उन्होने
पत्नी को प्यार से देखा।
“लेकिन वह………….” पत्नी हकलायी
“लेकिन क्या ? ” एस लाल विराम चिह्न से प्रश्नवाचक बन गये थे।
“जी वह….. मु……स……ह….र”
अचानक खीर के बर्तन में सुअरों को अपनी थूथन घुसाने का बिम्ब बना सुखिया से  एस लाल बने सुखलाल अगिया बेताल बन गये।

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दो लाख ले लो और मेरा पति लौटा दो: महाराष्ट्र सरकार से किसान विधवायें

महाराष्ट्र के यवतमाल जिले में कीटनाशकों के छिडकाव से मारे गये किसानों की विधवायें भीख मांगकर सरकार को दो लाख रूपये देना चाहती हैं, और अपने मृत पति के वापसी चाहती हैं. ऐसा वे सरकार द्वारा उन्हें बतौर मुआवजा  दिये जा रहे दो लाख रूपये और मुम्बई में स्टेशन हादसे में मारे गये लोगों को 5 लाख रूपये दिये जाने के प्रति रोष व्यक्त करने के उद्देश्य से कर रही हैं. इस बीच आम आदमी पार्टी के नेता जम्मू आनंद ने बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच में याचिका दाखिल कर मृतक के परिवारों को 20 लाख रूपये और प्रभावितों को 10 लाख रूपये के अतिरिक्त प्रतिबंधित दवाएं बेचने वाली कंपनियों और अधिकारियों पर ह्त्या का मुकदमा दर्ज करने की मांग की है. राज्य की भाजपा सरकार शाख बचानाने के लिए आंशिक रूप से हरकत में दिख रही है. यवतमाल से नितिन राउत की रिपोर्ट: 

यवतमाल के अस्पताल में दाखिल प्रभावित किसान

महाराष्ट्र के यवतमाल की किसान विधवायें भीख मांगकर दो लाख रूपये सरकार को देना चाहती हैं और अपना पति वापस चाहती हैं. पिछले दिनों यवतमाल जिले में फसलों पर कीटकनाशक का छिडकाव करते समय कीटकनाशक के प्रभाव में आने से 21 किसानों की मौत हो गयी थी. महाराष्ट्र सरकार मुआवजे के तौर पर मृत किसान के परिवार को 2 लाख रुपये देने की घोषणा कर चुकी है. लेकिन इस मुआवजे पर एक किसान की पत्नी ने ऐतराज जताया. वह सवाल करती है कि ‘मुंबई स्टेशन पर दुर्घटना में मरने वालों को 5 लाख रुपये तो किसानों की मौत की कीमत 2 लाख क्यो? वह इस भेदभाव से दुखी है और सरकार को भीख मांगकर 2 लाख देकर उसका पति वापस चाहती है.’

बंडू सोनोले की मौत जहरीले कीटकनाशक के छीडकाव से हुई थी .लेकीन पति के गुजर जाने के महज चंद दिनो बाद उनकी पत्नी गीता को सरकार बडा जख्म दे रही है. गीता की तरह सारी किसान विधवायें सरकार के फैसले से दुखी हैं. इस बीच आम आदमी पार्टी के नेता जम्मू आनन्द ने बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच में किसानों के लिए 20 लाख रूपये की मांग करते हुए याचिका दाखिल की है.

गांधी के गाँव से छात्राओं ने भेजा प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री को सेनेटरी पैड: जारी किया वीडियो

यवतमाल जिले में रोष व्याप्त है. इस रोष के कारण ही राज्य सरकार के एक मंत्री पर उसी जहरीले कीटनाशक के छिडकाव की कोशिश की गई, जिससे किसान मरे. किसान इस बात से भी नाराज हैं कि राज्य के मुख्यमंत्री अबतक किसानों से मिलने यवतमाल नहीं पहुंचे. जाँच के लिए कई समितियों गठन किया गया. एक समिति की रिपोर्ट के बाद जिला कृषि विकास अधिकारी को निलम्बित कर मामले की लीपापोती की शुरुआत हो गयी है.



महाराष्ट्र का यवतमाल एक ऐसा जिला है जो किसान मौत के चलते सुर्खियो मे रहता है साल दर साल दिल दहला देने वाले आंकड़े यवतमाल से आते हैं. इसी जिले की किसान विधवा कलावती के घर राहुल गांधी के जाने के बाद पूरे देश को किसान विधवाओं का दर्द पता चला था. आज जहरीले छिडकाव के चलते यवतमाल मौत की बंदरगाह बन चुका है .यवतमाल के साथ  बुलडाणा, गोंदिया, भंडारा, अकोला जिले में अबतक 34 किसानों की मौत ऐसे ही कीटनाशकों के छिडकाव के दौरान हुई है. तकरीबन 700 से अधिक किसान विषबाधा से बाधित है . 25 किसानों के अंधा होने की नौबत आ पडी है .

कीटकनाशक से विषबाधा का प्रकरण नया नहीं है. पिछले साल भी 150 किसानों को कीटनाशक छिडकाव करते समय विषबाधा हुई थी, उनमें से 6 किसानों की मौत हो गयी थी. लेकिन सरकार ने ठोस कदम नही उठाये. समय रहते सरकार ठोस कदम उठाती तो इन मासूम किसानों की मौत नहीं होती .

भारत मे कई जहारीले कीटनाशकों पर पाबंदी होने के बावजूद धडल्लेसे कीटकनाशक बेचे जाते हैं. जिसमें  कोब्रोरील , ट्रायझोफोज , डायक्लोरोव्ह जैसे कीटनाशक शामिल हैं . कपास पर आनेवाली कीटकनाशकों के लिये मालेथियोन, एन्डोसल्फान , कार्बारील , कॉपरऑक्सिक्लोराईड , वेटेबर, सल्फर , थायरम आदि जहरीली औषधी का इस्तेमाल होता है.   इस जहरीले व्यापार से सरकार अच्ची तरह से वाकीफ है मगर व्यापारियों के दवाब में सरकारें कारवाई करने से बचती हैं. कृषि मंत्रालयने 18 जानलेवा कीटकनाशकों में से 12 पर 2018 से रोक लगाई है. पर 6 जानलेवा कीटकनाशक बाजार मे धडल्ले से बिकते नजर आ रहे. इन्हें 2020 तक बेचने की अनुमति सरकार द्वारा दी गयी है.

    किसान महिलाओं को विशेष अवसर दिये जायें

फ़ाइल फोटो: स्त्रीकाल

कृषि विभाग द्वारा इन जहरीले कीटकनाशको की जांच होनी थी.  लेकीन कृषि विभाग के अधिकारी किसान के खेतों तक क्यों पहुंचेंगे भला! हालांकि इसके लिये कृषि अधिकारी , कृषि सेवक, गुणवत्ता नियंत्रक आदि की नियुक्ति की जाती है. किसानों को  इसकी जानकारी देना बेहद जरुरी थ, क्योंकि कीटकनशक पर लिखी गई जानकारी अग्रेजी में लिखी होती है , जो किसानों के समझ से परे है.

बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच की सख्ती 
इस दर्दनाक हादसे के बाद जहां राज्य भर में किसानों के बीच आक्रोश है वहीं राज्य के और राष्ट्रीय मीडिया का रुख विचित्र है. कई बड़े मीडिया चैनलों और वेबसाईट पर इस मौत की वजह सिर्फ प्रशिक्षण का अभाव और सुरक्षा मानकों का उल्लंघन बताया जा रहा है. इसी चोर दरवाजे से भाजपा की सरकारों (राज्य और केंद्र) के बच निकलने का रास्ता है, क्योंकि मुख्य कारण जहरीली और हानिकारक दवाइयों की बिक्री पर वास्तविक रोक न होना है.’ आम आदमी पार्टी के नेता जम्मू आनंद ने नागपुर हाई कोर्ट में उन कंपनियों के खिलाफ भी कार्रवाई के लिए जनहित याचिका दायर की है, जो प्रतिबन्धित दवाएं बेच रही हैं. जम्मू कहते हैं , ‘ 3 दर्जन से अधिक किसान इस छिडकाव से मरे और 700 से ज्यादा प्रभावित हैं. इसीलिए न्यायिक जांच की मांग करते हुए मैंने याचिका डाली है. याचिका में न्यायिक जांच अथवा विशेष जांच समिति का गठन कर जाँच  के अलावा दोषी अधिकारी और कंपनियों की जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग की गयी है, साथ ही मृत किसान परिवारों को 20 लाख तथा प्रभावित किसान परिवारों को 10 लाख रूपये की मुआवजे की मांग भी शामिल है.’ याचिकाकर्ता ने मांग के है कि कीटनाशक कंपनियों, दोषी अधिकारियों और फुटकर विक्रेताओं पर भारतीय दंड संहिता की धारा 304(सदोष मानव हत्या) और कीटनाशक कानून की धरा 29 के तहत एफआईआर दर्ज की जाये तथा प्रतिबंधित और जहरीली दवाओं की बाजार में उपलब्धता पर रोक लगाई जाये, साथ ही मौजूद दवाओं को जब्त कर संबंधित दुकानों को सील किया जाये.
 नरेन्द्र मोदी से नहीं मिलना चाहती है कलावती

यवतमाल में किसानों के बीच आप नेता जम्मू आनंद

मुनाफाखोरी में सरकार और कंपनियों की मिलीभगत 
आप नेता जम्मू आनंद ने स्त्रीकाल से बातचीत करते हुए कहा कि ‘कीटनाशक कानून 1968 व कीटनाशक नियम 1971 के प्रावधानों का राज्य में कडाई से पालन नहीं होता है. मुनाफाखोरी के लिए कम्पनियां किसानों की जान से खेल रही हैं और सरकार तथा नेताओं का उन्हें संरक्षण प्राप्त है.

क्या है ‘ कीटनाशक कानून 1968 व कीटनाशक नियम 1971
मई 1958 में केरल व चेन्नई में कीटनाशक का छिडकाव के वक्त प्रभावित सैकड़ों किसानों की मौत हो गयी थी. उसकी जांच के लिए बनी समिति ने कीटनाशकों के उपयोग, बिक्री और इस्तेमाल के लिए नियम बनाने की संस्तुति की थी, जिसके अनुसार 2 सितम्बर 1968 से कीटनाशक क़ानून देश में लागू है. क़ानून की धारा 36 के अनुसार कीटनाशक के उपयोग के लिए नियम 1971 में बने से लागू हुआ. इसके अनुसार किसानों को प्रशिक्षण देना, कीटनाशक से सरंक्षण के लिए उपकरण और कपड़े आदि देना अनिवार्य है.

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प्रभावित किसान परिवार


याचिका का असर

8 अक्टूबर को याचिका की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट का रुख महाराष्ट्र सरकार के खिलाफ काफी कडा था. नोटिस करते हुए कोर्ट ने जिले के अधिकारियों ने व्यक्तिगत स्तर पर यह हलफनामा दाखिल करने को कहा कि उन्होंने जिले में प्रतिबंधित कीटनाशकों की बिक्री पर रोक, जहरीले कीटनाशकों के छिडकाव के लिए प्रशिक्षण देने और किसानों की मौत के बाद दोषियों पर कार्रवाई के लिए क्या-क्या कदम उठाये हैं. हरकत में आई सरकार के मुखिया देवेन्द्र फडनवीस ने विशेष जाँच समिति का गठन कर दिया है और घोषित किया है कि दोषियों के खिलाफ एफआईआर भे दर्ज करवाई जायेगी.

नितिन राउत अमरावती जोन से पत्रकारिता करते हैं, मराठी की सरोकारी पत्रकारिता में स्थापित होता नाम. सम्पर्क: 9767777917

तस्वीरें गूगल के माध्यम से सम्बंधित वेबसाईट से साभार




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जनसत्ता में भावना भड़काती खबर: ‘बेशर्म सेल्फी’!

साम्प्रदायिक तनावों के बीच अखबारों की टिप्पणियाँ और ख़बरें इसमें आग का काम करती हैं. आज जब साम्प्रदायिकता अपने चरम पर है तब अखबारों की भूमिका और संवेदनशील हो जाती है. 14 अक्टूबर को जनसत्ता में छपी इस खबर से इसके प्रशंसकों को चोट पहुँच सकती है, जिन्होंने इसके पूर्व संपादकों, खासकर प्रभाष जोशी की साम्प्रदायिकता विरोधी प्रतिबद्धता को देखी है अथवा 1992 सहित कई अवसरों पर सांप्रदायिक तनावों के दौर में जनसत्ता की पत्रकारिता देखी है.

जनसत्ता इस खबर के साथ सबसे ऊपर जो कैप्शन लिख रहा है, उसकी क्या जरूरत है वह जनसत्ता के संपादक ही बता सकते हैं या रामनाथ गोयनका की विरासत वाले एक्सप्रेस समूह के प्रबन्धक. जनसत्ता ने इंट्रो में लिखा है: “कमाल की बात तो यह है कि हिंदुओं में पारंपरिक पोशाक मानी जाने वाली साड़ी में फातिमा की इस तस्वीर पर तमाम लोगों ने उल्टे-सीधे कमेंट किए हैं.” यह खबर एक्ट्रेस फातिमा सना शेख के बारे में लिखी गयी है. उनकी धार्मिक पहचान के बरक्स एक धार्मिक पहचान को भिडाने वाली यह टिप्पणी निंदनीय है.

हनीप्रीत की खबर नहीं सेक्स फंतासी बेच रही मीडिया

भर्त्सना के साथ पढ़ें पूरी खबर.

इस ‘बेशर्म सेल्फी’ के लिए सोशल मीडिया पर ट्रोल हुईं ‘दंगल’ एक्ट्रेस फातिमा सना शेख


कमाल की बात तो यह है कि हिंदुओं में पारंपरिक पोशाक मानी जाने वाली साड़ी में फातिमा की इस तस्वीर पर तमाम लोगों ने उल्टे-सीधे कमेंट किए हैं।

दिसंबर 2016 में रिलीज हुई आमिर खान स्टारर फिल्म ‘दंगल’ में पहलवान गीता फोगाट का किरदार निभाने वाली एक्ट्रेस फातिमा सना शेख एक बार फिर सोशल मीडिया पर ट्रोल्स का निशाना बन गईं। फातिमा द्वारा इंस्टाग्राम पर शेयर की गई इस तस्वीर में फातिमा ने नीले रंग की खूबसूरत साड़ी पहनी हुई है और लाल व पीले रंग का ब्लाउज पहना हुआ है। इस तस्वीर में उनकी कमर और गर्दन का कुछ हिस्सा खुला दिख रहा है। फातिमा को शायद पहले से ही इस बात का अंदाजा हो गया था कि इस तस्वीर पर कोई ना कोई विवाद हो सकता है, इसीलिए उन्होंने तस्वीर को अपलोड करते वक्त कैप्शन में खुद ही शेमलेस सेल्फी लिख दिया था।

मोदी जिनके प्रशंसक वे दे रहे महिला पत्रकार को रेप की धमकी

कमाल की बात तो यह है कि हिंदुओं में पारंपरिक पोशाक मानी जाने वाली साड़ी में फातिमा की इस तस्वीर पर तमाम लोगों ने उल्टे-सीधे कमेंट किए हैं। तमाम लोगों ने इन तस्वीरों पर अभद्र टिप्पणियां की हैं। एक शख्स ने कमेंट बॉक्स में लिखा कि खुदा तुम्हें देख रहा है और वह तुम्हें सजा देगा। एक यूजर ने लिखा कि फातिमा आपसे यह उम्मीद नहीं थी। किसी ने लिखा कि आप इस परिधान की मर्यादा का अनादर कर रही हैं तो किसी ने कहा कि फातिमा को साड़ी पहनना तक नहीं आता। बता दें कि रमजान के महीने से फातिमा के फोटोशूट की तस्वीरें सामने आई थीं जिसमें वह बिकिनी पहने समंदर के किनारे बैठी थीं। उस वक्त भी फातिमा को ट्रोल किया गया था।

सुधार 
तीन घंटे में जनसत्ता ने वह पंक्ति हटा ली जिसपर इस पोस्ट को आपत्ति थी. 

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इलायची

ज्योति प्रसाद

 शोधरत , जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय. सम्पर्क: jyotijprasad@gmail.com

मुझे अपने स्कूल के दिन याद आ रहे हैं। सर्दियों वाले। सुबह-सुबह जगा दिया जाता था। रज़ाई में से ही पाँच मिनट और…पाँच मिनट और…बस उठ ही रही हूँ, वाली पंक्ति आज सोचकर अपने पर हंसी ही आती है। हम तीन बहनों में सर्दियों का मौसम मुझे ही बेकार लगता था। कई बार तो मैंने भगवान से शिकायत भी की कि इस मौसम को बनाने की क्या जरूरत थी! तुम्हें भी सर्दियों में स्कूल जाना पड़ता तो पता चलता! सभी के जगाने पर भी मेरी पाँच मिनट वाली मांग बनी रहती थी। लेकिन जैसी ही दादी की दहाड़ कानों में पड़ती वैसी ही मैं बिच्छू के डंक लगे जख्मी लड़की की तरह उछल पड़ती थी। मैंने कई बार इस बात की भी शिकायत की थी कि ऐसी दादी मुझे ही क्यों दी गई है। खुद की ऐसी दादी होती तो भगवान को भी अच्छी तरह पता चल जाता।

सर्दियों में रविवार का दिन और इलायची वाली चाय, ये दोनों ही मेरी पसंद के दायरे में आते थे। रविवार को मुझे एक घंटे अधिक सोने की इजाजत प्राप्त थी क्योंकि उस दिन पिताजी घर में रहते थे और किसी भी प्रकार की दहाड़ घर में सुनने को नहीं मिलती थी। इसके अलावा सतुआ, मेरी बड़ी बहन जो घर के काम रविवार को संभाल लिया करती थी, भी रहती थी। शनिवार के दिन क्लास में बैठे बैठे मैं उन लोगों को कोटी कोटी प्रणाम करती थी जिसने रविवार को छुट्टी का दिन बनाया था।

पिता जी का इलायची का छोटा सा धंधा था जो घर में घुसते ही महक से हर किसी को पता चल जाता था। मुझे भी इलायची को देखकर ही बहुत खुशी होती थी। हल्का हरा रंग और उसमें महकते काले दाने मानो एक नई दुनिया सी दिखलाते थे। मैं इन दानों को इलायची के बच्चे कहकर पुकारा करती थी। घर में इलायची का भरपूर इस्तेमाल होता था। पिताजी को मुनाफा कमाने का शौक था या लालच नहीं पता लेकिन उन्हों ने इलायची के साथ साथ कुछ ही दिनों में अन्य मसालों का धंधा भी छोटे धंधे में जोड़ लिया। इसलिए बहुत से साबुत मसालों का उस समय तक नाम और विवरण कुछ हद तक मुझे पता था। खाने में भी भरपूर मसाले झोंकें जाते थे। मसालों के मामले में हमारी आँख भले ही धोखा दे जाये पर घर के पूरे परिवार की नाकें धोखा नहीं देती थीं। या यूं कहूँ कि सूंघने के मामले में घर का प्रत्येक व्यक्ति हुनरमंद था। यही हुनर जन्म के साथ साथ मुझमें भी आ गया। और सूंघने का प्रतिशत मुझमें अधिक था क्योंकि स्कूल के बाद मेरा सारा समय मसालों के हिसाब किताब में गुजरता था। मुझे एक तरह से मुनीम बना दिया गया था। आसपास के घरों में किसी को मेरा असली नाम तक नहीं मालूम था। वे लोग भी मुझे मुनीम जी कहकर ही पुकारते थे।

इसके अलावा दादी को भी अदरक इलायची वाली चाय भाती थी। अगर बिना इनके चाय बन भी जाये तो वे पूरा घर सिर पर उठा लेती थीं। उनका खयाल था कि इन सब चीजों के असर पड़ते हैं। शरीर ठीक रहता है। सो मुझे भी यह बात खूब जम गई। बिना अदरक और इलायची के चाय नहीं पीती थी।

हमारा परिवार छोटा था। हम तीन बहनें घर में दृश्य होते हुए भी अदृश्य ही मानी जाती थीं। घर में रहते हुए भी हमारे हिस्से बहुत कुछ ऐसा नहीं था जिससे पता चल जाए कि इस घर में तीन लड़कियां सांस लेती हैं। बड़ी बहन का नाम सतुआ था। दादी ने ही रखा था। सतुआ को अपना नाम बेहद ‘ओल्ड फेशन्ड’ लगता था। बाक़ी बची हम दोनों बहनों के नाम नए जमाने से मैच करते थे। हम तीनों पर एक जोड़ी बूढ़ी आँखें जब तब पीछा किया करती थीं। यह सब बहुत गुस्सा दिलाने वाला भी होता था। कुर्ता भी सिलवाया जाता तब कॉलर लगवा दी जाती और आगे से बंद गला। ‘तहजीब बंद कपड़ों में होती है’- दादी का यही कहना था। कभी ऐसा लगता था कि हम तीनों की कन्डीशनिंग हो रही हो। ज़ुबान भी उतनी खोलने की इजाजत थी जितने की जरूरत होती। ‘लड़कियां चुप रहते हुए ही अच्छी लगती हैं’- यह पंक्ति हमेशा कान से टकराया करती थी। लेकिन दादी औरत होते हुए भी बहुत बोलती थीं। उनकी आवाज़ का वॉल्यूम भी सामान्य से अधिक रहता था। न मालूम कहाँ से वे सीखकर आई थीं।

सतुआ को इन सब से सबसे ज़्यादा चिढ़ होती थी। क्योंकि उसके कॉलेज का वक़्त भी दादी नोट किया करती थीं। एक मिनट इधर उधर हुआ तो घर में हाहाकार मच जाता था। सतुआ का हर खयाल बहुत ज़्यादा बड़ा होता था। उसका मानना था कि हम आसमानी उल्का पिंड थे। गलती से इस धरती पर ‘टपक’ गए हैं। जिस दिन बड़ी वाली आसमानी चुंबक हमें खींचेगी हम तुरंत उड़ते हुए अपनी अपनी जगह चले जाएंगे। इस कथा में मेरी दूसरी बहन छाया का उत्सुकता में पूछा गया सवाल सतुआ की आँख में किरकिरी जैसा ही होता था। “सतुआ, आसमान में पहुँचने के बाद क्या करेंगे? उल्कापिंड होना भी कोई ज़िंदगी है!” सतुआ इसके बाद नाक बनाती हुई जाती और कहती- “यहाँ सपनों की कोई कद्र ही कहाँ है!” इसके बाद मैं जाती हुई सतुआ को देखती और फिर बाद में छाया पर नज़र ले जाती।

छाया का भी हाल सतुआ जैसा ही था। विद्रोही टाइप का। मेरा कुछ भी नहीं था। मैं बोलती ही नहीं थी। …मुझे बोलना ही नहीं आता था। मुझे स्कूल जाना और घर में रहना आता था। हिसाब किताब करना आता था। सूंघना आता था। मेरी इस तरह की आदत दादी को पसंद थी। मुझे अपने घर में अपने ही लोग अजनबी लगते थे। इस अजनबियत को मैंने अपने अंदर समेट लिया था। जो कहा जाए वैसे करती थी। जो नहीं कहा जाता था वो नहीं करती थी। मैं पूरी तरह से आदर्श के खाके में फिट होने के लिए मुनासिब चरित्र बन ही चुकी थी। पर भला हो एक अजनबी औरत का जिसके चलते यह अनहोनी घटना होते होते रह गई।

इन्हीं दिनों हमारे सामने वाले घर में एक औरत किराए पर रहने आई। उस घर के मकान मालिक दूसरी जगह रहते थे सो उस औरत ने वह पूरा घर ही किराए पर ले लिया। लंबा क़द था। रंग गेहुआँ था। काले बाल। एक दम सीधे। बड़ी बड़ी आँखों में मोटा काजल लगाती थी। नाक में मोती का लॉन्ग हुआ करता था। कट बाजू वाले सूट पहना करती थी। बिंदी लगाती थी लेकिन सिंदूर नहीं। इस बात पर गली में एकाद बहस भी हुई कि वह शादीशुदा है या नहीं। लेकिन किसी की हिम्मत नहीं हुई उससे से सीधे पूछने की। मुझे वह बहुत अच्छी लगती थी। इतना ही नहीं सतुआ भी उससे प्रेरित हुई तो काजल लगाने लगी। इस पर दादी ने कहा कि बड़ी लड़की के लक्षण ठीक नहीं लग रहे। तब पिताजी ने कहा कि काजल लगाने में क्या गड़बड़ है। दादी चुप तो हो गईं पर हम तीनों पर निगरानी और बढ़ गई।

दादी का खयाल था कि हम उस नई ‘बदचलन औरत’ से ज़्यादा ही इंस्पायर्ड हो गए हैं। सब ऐसे ही चला रहा था। एक दिन घर में किसी के न रहने पर मुझे अखबार की जरूरत आन पड़ी। मैंने अपने घर के छज्जे से ही उनसे पूछा- “आपके पास आज का अखबार होगा?”वह मुस्कुरा कर बोलीं- “हाँ है। उसे लेने आपको मेरे घर में आना होगा।”अगले दस मिनट में मैं चुपके से उनके घर में थी।

घर में प्रवेश करते ही पीले रंग से मुलाक़ात हुई। मुझे पेंट की महक आई। बहुत ताज़ा ताज़ा ही पेंट हुआ था। सीढ़ियों की दिवारों पर सुंदर सुंदर पैंटिंग्स टंगी थीं। सीढ़ियां एक बैठक के गुलाबी पेंट वाले कमरे में ले जाती थीं। वहाँ लकड़ी का एक चरमराया हुआ सोफा रखा था। लेकिन उसकी सजावट मिट्टी रंग के कुशन से ऐसे की गई थी जैसे कोई संगीत महफिल लगने की तैयारी चल रही हो। मैंने सीढ़ियों के पास ही खड़े होकर अखबार मांगा। उन्होने मुस्कुराते हुए कहा- “जानती हूँ मुनीम लोग बहुत बिज़ी लोग होते हैं। पर उन्हें चाय पीने का वक़्त निकाल लेना चाहिए।” मैंने थोड़ा शर्माते हुए कहा- “आपको भी पता चल गया।…मैं फिर कभी आ जाऊँगी। अभी तो बस अखबार दे दीजिये।” उन्हों ने जिद्द की। मुझे चाय के लिए बैठाकर कर वह बैठक के दाई ओर बनी रसोई में प्रवेश कर गईं। रसोई की दीवारों का रंग सफ़ेद था।

दो कप चाय लाते हुए वे मेरा नाम पूछने लगीं। मुझे खुद दो मिनट इस बात को सोचते हुए लग गए कि मेरा नाम मसाला है, मुनीम है या फिर रोल नंबर 33। उन्हों ने दुबारा पूछा- “नाम क्या है आपका?” मैंने अपने पैरों पर बल देते हुए और सिर नीचे किए ही तारा कहा। वो तुरंत मज़ाक में बोलीं- “अरे वाह! तुम धरती पर क्या कर रही हो? तुम तो आसमान की रहने वाली हो।” मैंने कुछ कहने की बजाय मुस्कुराना ठीक समझा। मेरे पास कहने को कुछ था ही नहीं। मैंने धीरे से अपने हाथ कप की तरफ बढ़ाए। चाय में से इलायची की महक आ रही थी। मैंने सूंघते हुए कहा- “आप भी इलायची वाली चाय पसंद करते हो?” वो फिर अखबार खोजते हुए बोलीं- “हाँ। मुझे पसंद है। मुझे इसकी महक अच्छी लगती है।”

महक का नाम आते ही मैंने अपने कपड़ों में से मसालों की महक को एक बदबू की तरह पाया और मन ही मन शर्मिंदा हुई। मैंने अपने कपड़ों को सूंघा। मुझे उबकाई आई। मैंने उनसे और ज़्यादा बात नहीं की। वापस लौट आई।

इसके बाद अगली बार उनके यहाँ किस कारण जाना हुआ यह याद नहीं। लेकिन जो बात याद रही वह यह थी कि उनके निजी कमरे का रंग आसमानी था। मैंने कुछ देर के लिए अपनी आँख बंद की तब मुझे उल्का पिंड अपने चारों तरफ घूमते हुए दिखाई दिये। गुब्बारों से भी हल्के। जब उन्हों ने मेरा नाम पुकारा तब मेरा ध्यान टूटा और मैं अपने चारों तरफ हैरानी से देखने लगी। खुद में सवाल किया उल्का पिंड कहाँ गए!

पहली बार आसमान को किसी कमरे में पाया। मैं वह कमरा कभी भूल नहीं सकती। मुझे आज भी उस कमरे की रोशनी का शीतल अहसास है। वहाँ खूबसूरत चित्र थे। मैं हैरान थी। मैंने पूछा- “आप क्या करती हैं?’इस सवाल पर वह मेरा हाथ पकड़ कर एक ऐसे कमरे में ले गईं जहां सभी रंगों को मिक्स करके दीवारों में पुताई हुई थी। वहाँ एक अधूरी पेंटिंग को पूरा करने की तैयारी चल रही थी। और पूरे कमरे में बने हुए तरह तरह के चित्र रखे हुए थे। मुझे कुछ पल को हैरानी हुई।

मैंने चित्रों पर नज़र फिराते हुए पूछा- “आप इतने रंगों में कैसे रहती हैं? आपके सिर दर्द नहीं होता?”

वो अपनी आदत की तरह मुस्कुराते हुए बोलीं- “जब आपका जिसमें मन रम जाता है तो आप वही हो जाते हो। मन रमा तो राम भी बन सकते हो। जो न लगा तो वही बनते हो जो बाकी लोग हैं। मशीन!”

मैंने मुंह में कड़वा सा कुछ महसूस किया और दूसरा छोटा सवाल पूछा- “कैसे?”

रसोई में जाते हुए वह बोलीं- “दुनिया रंगती हूँ।…इलायची वाली चलेगी?”मैंने कहा- “हाँ, बिलकुल।”

वो आगे बोलीं- “मशीनों को देखा है…कैसे एक जगह बैठी रहती हैं। जो बटन दबाया जाता है वैसे ही वे काम करती हैं। उन्हें देखकर मुझे ऊब आती है। बात तो यही है कि आज़ादी की महक को आजमाना चाहिए। हमें यह तय करना चाहिए कि हम मशीन बनेंगे या फिर वो जो हम बनना चाहते हैं। मैंने पेंटर बनने का इसलिए नहीं सोचा कि यह मेरा पेशा है। बल्कि इसलिए क्योंकि यहाँ किसी की रोक टोक नहीं होती। जो मन आए वो करने की आज़ादी मिल जाती है जो बाहर की दुनिया में नहीं मिलती।”

मुझे उनकी बात समझ नहीं आई। मैंने अगली बार उनसे फिर मिलने का वादा किया और लौट आई। मुझे उनसे मिलना और बात करना अच्छा लगने लगा था। मुझे नहीं पता उनके रंगों का सम्मोहन था या फिर कुछ और था। यह तय था कि वह कमाल की औरत थीं जो किचन के लिए नहीं बनी थीं। वो अकेली ही रहती थीं। उनके यहाँ कुछ लोग आते थे जो उनके चित्रों के संबंध में आते थे। कुछ लोग तो मेरे सामने भी आते थे जो एफ. एन. सुज़ा से लेकर विंसेंट वॉन गोग जैसे नाम लेते थे। उस वक़्त ये नाम मुझे अजीब लगते थे। जब इनके बारे में सतुआ से पूछा तो उसने बताया कि ये नामी चित्रकार हैं।

सतुआ और छाया को जब इनके बारे में बताया तो उन दोनों में भी उस औरत से मिलने की ललक जग गई।इसी बीच सतुआ अपने कॉलेज के किताबघर से एक किताब लाई थी। उस किताब का नाम ‘एकांत के सौ वर्ष’ था। उसकी पढ़ने की आदत से हम दोनों बहनों को बहुत फायदा होता था। उसे लगभग हमारे हर सवाल का जवाब मालूम होता था। और वह न मालूम होने पर भी हमारे सवालों के जवाब खोज खोजकर बताया करती थी। उस दिन मैंने ‘एकांत के सौ वर्ष’ जैसा नाम के पीछे के कारण को जानना चाहा तब उसने किताब की कहानी टूटी फूटी तरह से हम दोनों के आगे परोस दी। उसने बहुत सारे किरदारों के नाम लिए और उनमें से एक रेमेदियोस के बारे में बताया जो बहुत सुंदर थी और एक दिन अचानक आसमान में चली जाती है…उड़कर। मैंने इस किरदार को कुछ इस तरह से समझा जैसे सतुआ की हमारे उल्का पिंड होने की कहानी। मुझे अब उसकी बात पर यकीन हुआ कि हम तीनों इस धरती के नहीं हैं। यहाँ ढेर सारे दरवाजे हैं जहां हर वक़्त ताला ही लगा रहता है। तालों के पीछे का कारण चोरी नहीं हैं बल्कि कोई लड़की घर से न बाहर चली जाये,यही इकलौती वजह थी।

कुछ दिनों बाद एक दिन आया। जाने क्यों?सुबह सुबह भयानक शोर घर में दस्तक दे रहा था। कहीं बहुत झगड़ा हो रहा था। छज्जे से झाँका तो वही औरत बीच में बहुत गुस्से में खड़ी थी और आसपास बहुत लोग खड़े थे। इतने में उसके मकान मालिक भी आ गए। …मैंने बहुत कोशिश की कि मुख्य मुद्दे को सुना और समझा जाये। पर पीछे से दादी ने एक तेज़ आवाज़ हम तीनों पर धमाके के साथ फेंक दी। हम डर गए। …पापा ने जो खबर हमें दी वह यह थी कि गली के कुछ लोगों को उसके अकेले रहने से परेशानी थी। इसके अलावा उसके काम के बारे में किसी को मालूम नहीं था। सबका खयाल था कि वह कोई गलत काम में शामिल है। ऐसी औरत का गलत प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए उसे घर खाली करने को कहा गया है।मैंने इस बीच यह कहा कि वह तो एक पेंटर है। चित्रकारी करती है। इतना ही कहना था कि दादी टूट पड़ीं। उस दिन वो न जाने क्या क्या बोलती रहीं। मुझे सिर्फ एक पंक्ति ही याद है। यह लड़की तो भाग जाएगी एक दिन। मैंने इसे सुनकर मन में कहा- “हम्म …रेमेदियोस की तरह। मैं आपके यहाँ नहीं रहूँगी। मुझे घुटन होती है। बहुत!” इसके बाद मैंने इलायची के रखे पैकटों को गिनने काम शुरू किया और कई घंटें लगातार करती रही। इलायची की महक मेरे अंदर घुसती रही। सतुआ के जबरन उठाने पर ही खाने के लिए उठी।

कुछ दिनों बाद एक बड़ा ट्रक आया जिसमें उस औरत का सामान रखा गया। जाते-जाते उन्हों ने हल्की गर्दन ऊंची की और मेरी तरफ देख कर मुस्कुरा दीं। वो चली गईं। अंदर दादी ने हुकुम दिया कि चाय बनाओ,इलायची वाली। रसोई में मैं दो तीन इलायची कूटने लगी। एक बहुत तेज़ महक उठी और साँसों के सहारे मेरे अंदर फिर घुस गई…दिमाग तक पहुँच गई।

दिन ऐसे ही बीत रहे थे। इस बीच एक ऐसी घटना घटी जिससे मैं और सतुआ खुश हुए पर पिताजी और दादी को बड़ा सदमा लगा। छाया किसी के साथ घर छोड़ कर जा चुकी थी। ये बात पूरे मौहल्ले में दादी के लाख छुपाने के बाद भी लीक हो चुकी थी। छाया की बात हम दोनों से होती रहती थी पर इस बात का पता घर के बाकी दो लोगों को नहीं मालूम था। कुछ दिन पिताजी के सीने में दर्द की शिकायत रही और अंत में उनका दर्द यह कहकर गया कि आज से वो हमारे लिए मर चुकी है।

अब हम दोनों ही अपनी बातों का बंटवारा करते। सतुआ का सपना बड़ा अजीब था। उसका कहना था कि वह सपने बेचने का काम करेगी। जो बच्चा या औरत- आदमी जिस तरह के सपने देखना चाहेंगे वह वही उनको बेचा करेगी। मसालों से कितनी गंदी महक आती है। इसलिए वह इन सब से दूर महकदार सपने बेचा करेगी जिसमें भीनी-भीनी महकें आया करेंगी। उसकी इस बात पर मैं बहुत देर तक हंसा करती थी। तब तक जब तक आँखों में पानी न आ जाए। इसके बाद पलट कर वह अपनी बड़ी आँखों में शरारत लाते हुए पूछती- “तारा, तू बता… तू क्या बनेगी?” …मैं बिना सोचे समझे झट कहती- “इलायची!” इस पर वह हंस कर कहती- “तब तो दादी तुझे कूट कूट कर चाय में घोल घोल कर गट कर जाएंगी।” ऐसे ही बात कर के हम आधी रात करते और सुबह फिर उठ जाते मशीन बनने की तैयारी में। ये हमारे अच्छे दिन थे। और हम दोनों ने चाहा कि ये दिन रुके रहें पर ऐसा नहीं होता।

सतुआ की शादी आनन-फानन में तय हुई। कुछ दिनों बाद ही दादी के कहे अनुसार सतुआ को निपटा दिया गया। उसकी पसंद को पूछे बिना या फिर जाने बिना। सतुआ में मौजूद विद्रोही स्वभाव को पिताजी ने अपने दो आंसुओं से लगभग समाप्त कर दिया था जिसका पता मुझे सतुआ के बताने पर चला कि पिताजी ने उसे अपना वास्ता देकर शादी के लिए मनाया है। उनको इस बात का डर था कि कहीं सतुआ भी छाया की तरह घर से न चली जाये। सतुआ की शादी के बाद फोन पर होने वाली बातचीत में वह जरा भी खुश नहीं मालूम होती थी। कई बार वह मेरी बीमारी का बहाना बनाकर हमारे पास कई दिनों तक रहती थी। मुझे उसके लिए बीमार होना पसंद भी था। इस पर भी दादी की नज़र पड़ी और उसने आना लगभग बंद कर दिया।

बहुत दिनों तक उसका हाल नहीं पता चला। उसने मुझसे भी बात करना लगभग बंद कर दिया। एक रोज़ फोन की घंटी बजी और पता चला कि सतुआ के साथ दुर्घटना घटी है। वह लगभग पूरी तरह से जली अवस्था में अस्पताल में मेरी आँखों के सामने पड़ी हुई थी। उसने कुछ बोलने की कोशिश भी की पर हम जान ही नहीं पाये कि आखिर क्या कहना चाह रही है। वह मर गई। मेरे सामने। मैंने रोते हुए आँखें बंद कीं। मुझे दिखा कि वो उल्का पिंड बनी हुई धीरे धीरे धरती से ऊपर उठ रही है। उसे कोई चुंबक खींच रही है। जाते हुए उसने कहा- “देख, मैं न कहती थी कि हम इस धरती के नहीं हैं।”

कई दिन बीत गए। सर्दियाँ आईं। मुझे चाय बनाने का हुक्म हुआ। मैंने इलायची कूटना शुरू किया और न जाने एक जहरीली महक मेरे दिमाग पर चढ़ी और उल्टी होने लगी। बहुत उल्टी हुई। इसके बाद मुझे याद नहीं कि क्या हुआ। मुझे जब होश आया तब सिर दर्द से फट रहा था। दादी को लगा कि मुझ पर किसी हवा का साया है। एक ताबीज़ बनवाकर गले में डाल दिया। लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।रात के समय में मेरे कमरे में रोशनी उतर आती। खूब सारे उल्का पिंड और इनके साथ ही सतुआ, छाया और वह औरत धीरे -धीरे आसमान से उतरतीं। फिर जो बातों का सिलसिला चलता तो सुबह होने पर ही समाप्त होता। वह औरत पेंटिंग बनाती। सतुआ अपने साथ हमारे फर्माइशी सपने लाती। छाया और मैं दर्शक बनते। कुछ दिनों बाद यह खबर फैली कि तारा पागल हो गई है। मैंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया। हालांकि मुझे अस्पताल में भर्ती करवा दिया गया था। फिर भी मैंने अपने पागल होने पर कभी यकीन नहीं किया।

फोटो: साभार गूगल


ज्योति प्रसाद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा पीठ  में शोधरत हैं. कहानियां लिखती हैं और फिल्मों की समीक्षा में विशेष रुचि रखती हैं. 


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समकालीन ग़ज़ल में मुखर होता महिला रचनाकारों का स्वर

के. पी. अनमोल

हिन्दी ग़ज़ल क्षेत्र के उल्लेखनीय गज़लकार और आलोचक. ‘साहित्य रागिणी’ और ‘हस्ताक्षर’ वेब पत्रिका के संपादक.. संपर्क : मो. 8006623499
kpanmol.rke15@gmail.com

दुष्यन्त कुमार के अवतरण के बाद हिन्दुस्तानी साहित्य में ग़ज़ल विधा ने प्रमुखता से स्थान बनाया है। आज यह विधा कविता से भी अधिक लोकप्रिय होने की स्थिति में है। इसका कारण इसका तयशुदा लयात्मक प्रारूप और सरल-सहज शब्दावली में हर ख़ासो-आम के मन की बात प्रभावी तरीक़े से उकेरना है।

दुष्यन्त के बाद हिन्दुस्तानी ग़ज़ल में अनेक उम्दा ग़ज़लकार आये और उसे समृद्ध किया। आज हिन्दुस्तानी ग़ज़ल के पास ऐसे कई नाम हैं जो इस विधा के जाने-माने चेह्रे हैं। लेकिन अगर बात महिला ग़ज़लकारों की की जाए तो गिनती के लिए शायद हमें उँगलियों का ही इस्तेमाल करना पड़े।

ऐसा नहीं है कि ग़ज़ल में महिला रचनाकारों ने अभिव्यक्ति की ही नहीं, की है और बहुत सलीक़े से की है। अगर हिन्दुस्तानी ग़ज़ल में महिला रचनाकारों के नाम याद करना चाहें तो डॉ. रमा सिंह, सरोज व्यास, देवी नागरानी, ममता किरण, सिया सचदेव सहित कई नाम ज़ेहन में उभर कर आएँगे। जो लगातार कई सालों से ग़ज़लें कह रही हैं और उन्हें साधने में रत हैं।

वर्तमान में सोशल मीडिया के आने के बाद इस सूचि में बढ़ोतरी हुई है। आज ऐसी अनेक महिला ग़ज़लकारों के नाम पढ़ने-सुनने को मिलते हैं जो इस विधा में धारदार प्रस्तुति दे रही हैं। चूल्हे-चौके और घर की चार-दीवारी से बाहर निकल आज कई महिला ग़ज़लकार देश-दुनिया और समाज की समस्याओं पर भी समान अधिकार से अभिव्यक्ति कर रही हैं। कसे हुए शिल्प के साथ घर और बाहर के कई मुद्दों पर अपनी ग़ज़लों के माध्यम से खुल कर बोल रही हैं।

कच्चा मकां तो ऊँची इमारत में ढल गया
आँगन में वो जो रहती थी चिड़िया किधर गयी
(‘हस्ताक्षर’ वेब पत्रिका, दिसम्बर 2016)

वरिष्ठ ग़ज़लकार ममता किरण अपने इस शेर के माध्यम से विकास की भेंट चढ़े एक प्यारे-से एहसास को बहुत मार्मिकता से हमारे सामने रख, हमें यह सोचने पर विवश करती हैं कि क्या विकास के साथ-साथ हम अपने एहसासों को नहीं बचाए रख सकते!

याद कीजिए वह दिन जब हर घर के आँगन में एक वृक्ष हुआ करता था और उस वृक्ष में अनेक पक्षी अपना बसेरा बनाके रहा करते थे। सुबह सुबह जब आँख खुलती तो इन पक्षियों की तरह तरह की कर्ण-प्रिय आवाज़ें सुनने को मिलतीं। उस वृक्ष की डालियों पर पक्षी जब अठखेलियाँ करते तो उन्हें देखकर मन को कितना सुकून मिलता था। लेकिन आज शहरीकरण के इस दौर में यह दृश्य किसी सपने-सा प्रतीत होता है।

महज आकाश छूना प्यास का मिटना नहीं होता
ज़मीं पर पाँव का टिकना सफ़लता की निशानी है
(सत्यचक्र, ग़ाज़ियाबाद)

डॉ. तारा गुप्ता का यह शेर कितना सकारात्मक और प्रेरणास्पद है। सफ़लता प्राप्त कर लेने के बाद अगर किसी ने ज़मीन छोड़ दी तो उसकी सफ़लता का कोई औचित्य नहीं। यह शेर लाखों युवाओं के लिए मार्गदर्शक हो सकता है।

सामाजिक सरोकारों के साथ साथ महिला ग़ज़लकार एक महिला की ज़िंदगी के विभिन्न पहलुओं को भी बड़ी बारीकी से उकेर रही हैं। एक महिला के जीवन से जुड़े कई अनुभव ऐसे होते हैं जो केवल और केवल एक महिला ही समझ सकती है। ऐसे कई अनुभवों/ पहलुओं को इनकी ग़ज़लों में कथ्य के रूप में जगह मिल रही है। इस बहाने ‘स्त्री विमर्श’ भी आगे बढ़ता हुआ दिखता है।


नशे में धुत्त अपने आदमी से मार खाकर भी
बहुत ज़िन्दादिली से दर्द को वो भूल जाती है
(समकालीन महिला ग़ज़लकार, सं- हरेराम समीप)


डॉ. मालिनी गौतम के इस शेर के माध्यम से एक बहुत बड़े वर्ग की पीड़ा का बयान हुआ है। कितना वास्तविक और मर्मस्पर्शी शेर हुआ है यह। नशे की लत में डूबे अपने पति से मिली यातना के इस सच का इस तरह यथार्थ बयान किसी पुरुष ग़ज़लकार के शेर में आ पाना बहुत मुश्किल था।

वो समन्दर की तरह शोर मचाने से रही
जबकि सीने में नदी कितने भँवर रखती है


रश्मि सबा के इस शेर में यदि समन्दर और नदी के प्रतीकों का आशय पुरुष और स्त्री से लिया जाए तो शेर कितना खिलकर आता है! यह हक़ीक़त है एक महिला पुरुष की तुलना में कई गुणा दर्द अपने सीने में पालकर रखती है लेकिन उसे उफ्फ्फ़ तक करने की आज़ादी नहीं है। बहुत ही सलीक़े से कहे गए इस शेर की गूंज दूर तक सुनाई देती है।



महिलाओं के लिए असुरक्षित हमारे समाज में एक महिला हमसे क्या उम्मीद करती है, इसे समझना बहुत ज़रूरी है। हमें अपने बच्चों को यह समझ देनी होगी कि एक औरत का क्या मर्तबा है और उसका अदब करना कितना ज़रूरी है। हर पुरुष को यह समझना होगा कि एक बीवी, एक बेटी और एक बहन की क्या ख़्वाहिशें हैं और उन ख़्वाहिशों को पूरा करने के लिए उन्हें किस तरह के माहौल की ज़रूरत है। असमा सुबहानी का यह मार्मिक शेर देखिए जो एक गुहार है हर पुरुष से, हर बीवी, बेटी और बहन की-

उड़ानों के लिए रख लो ये सारा आसमां तुम ही
ज़मीं रहने दो पैरों में हमें इतना ही काफ़ी है

एक लड़की घर-परिवार की हो जाने के बाद अपने परिवारजनों की मिन्नतों, चाहतों और उम्मीदों में इस तरह खट जाती है कि उसे अपने होने का भी एहसास बहुत कम होता है। एक वक़्त के बाद जब उसे ज़िम्मेदारियों से ज़रा-सी फ़ुर्सत मिलती है तब वह अपने आपको टटोलती है और उस वक़्त उसे भान होता है कि इस बीते समय के साथ क्या-क्या पीछे छूट गया, समय कितनी तेज़ी से निकल गया। कुछ यही ख़याल दीपाली जैन ‘ज़िया’ ने कितना खूबसूरती से शेर में बाँधा है, देखिए-

उम्र ने दहलीज़ तन की लाँघ ली है और हम
आइने में झुर्रियों को ढांपते ही रह गए

एक माँ अपनी औलाद के प्रति क्या भाव रखती है, उसके मन में ममता का सैलाब किस तरह हिलोरें मारता है, यह एक महिला के अलावा कोई अभिव्यक्त नहीं कर सकता। कोख में पल रहे बच्चे से बातें, उसकी पहली किलकारी, पहली बार माँ शब्द का उच्चारा जाना, स्कूल का पहला दिन, औलाद की क़ामयाबी, बिटिया की विदाई आदि कई एहसास ऐसे हैं जो केवल एक माँ ही समझ सकती है। देखिए डॉ. भावना का एक ममता भरा शेर-

बड़ी होकर न जाने कितने वो क़िस्से सुनाएगी
मेरी नवजात बच्ची तो अभी से बात करती है
(हंस, दिसम्बर 16)

इश्क़-मोहब्बत जैसी पाक शय को निभाने का हुनर समझने में जहाँ दुनिया भर के विद्वान चूक जाते हैं, वहीं एक नौजवान शाइरा उसे कितनी आसानी से समझा देती है। देखिए पूनम यादव का एक नाज़ुक-सा शेर-

बड़ी तहज़ीब से निभती है साहिब
मुहब्बत रस्म मामूली नहीं है



हमारी संस्कृति में एक रूमानी जोड़ी; जो प्रेम का प्रतीक सा समझी जाती है, राधा-कृष्ण। कई कई प्रेम-काव्य इनके जीवन पर रचे गए हैं और उनमें लगभग सभी तरह के भाव उनमें समाहित हैं। लेकिन शरारत भरा एक जो ख़याल डॉ. तुलिका सेठ के एक शेर में आया है, वो अन्यत्र मिल पाना मुश्किल है-


कैसे ऊँगली पे कान्हा नचाये गए
राधिका से ज़रा ये पता कीजिए
(आईना ज़िंदगी का, ग़ज़ल संग्रह)


इस तरह हिंदुस्तानी ग़ज़ल में महिला रचनाकार बहुत प्रभावी तरीक़े अपनी उपस्थिति दर्ज करवाती हुई नज़र आती हैं। ख़याल, कहन और लहजे में ताजगी के साथ ये रचनाकार ग़ज़ल विधा को नई ऊँचाइयों तक लेकर जाएँगी, ऐसी कामना अब हर ग़ज़ल-प्रेमी कर सकता है।

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हनीप्रीत की खबर नहीं सेक्स फंतासी बेच रही मीडिया

स्वरांगी साने

वरिष्ठ साहित्यकार, पत्रकार और अनुवादक विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित. संपर्क : swaraangisane@gmail.com

मीडिया में हनीप्रीत की खबरें एक महीने से अलग-अलग एंगल और फंतासियों के साथ बेची जा रही है. बलात्कार और सेक्स-अपराध की घटनाओं के बाद मीडिया-कवरेज बलात्कार और सेक्स की संभावनाओं को बेचते हैं. हनीप्रीत व्यक्तिवाचक से जातिवाचक संज्ञा में बदल जाती है ऐसी खबरों के साथ और एक स्त्री सारी स्त्रियों का विशेषण बन जाती है. . हनीप्रीत से लेकर जेएनयू तक के मिसाल के साथ इसका विश्लेषण कर रही हैं, स्वरांगी साने. आजतक, एनडीटीवी से लेकर बीबीसी हिन्दी तक एक ही भूमिका में दिख रहे इस विश्लेषण में: 

हनीप्रीत की रिमांड 10 अक्टूबर को भी तीन दिन के लिए बढ़ा दी गई। यह तो हुई ताजा खबर।   कितने ही दिनों से हनीप्रीत ने क्या खाया, क्या पहना, कहाँ सोई, करवाचौथ का व्रत किसके लिए रखा जैसी कितनी ही खबरें मुख्यधारा में दिखती रहीं, स्क्रोल में चलती रहीं और मीडिया में छपती रहीं। ‘आज तक’ पर इस लेख को लिखने से 12 घंटे पहले खबर थी- (‘6 दिनों की रिमांड के दौरान हनीप्रीत द्वारा उगले और छिपाए गए राज’)
कितनी काल्पनिक कथाएँ और राम रहीम के साथ उसके संबंधों को लेकर ये खबरें दर्शकों की सेक्सुअल फंतासी को उकसाती भी हैं। मसलन – (‘क्या है मुँहबोली बेटी हनीप्रीत के साथ गुरमीत राम रहीम के रिश्ते की सच्चाई?’ / एनडीटीवी इंडिया 31 अगस्त)

कौन है यह हनीप्रीत?
गुरप्रीत राम रहीम की तीसरी मुँहबोली बेटी है, जो हरदम उसके साथ साए के साथ रही, उसे जब सज़ा सुनाई गई थी तब भी हनीप्रीत उनके साथ थी। पंचकूला में डेरा समर्थकों के आतंक फैलाने के मामले में उसे गिरफ़्तार किया गया तो हो सकता है कि उसकी ख़बर उतनी महत्वपूर्ण हो, लेकिन जब वह फरार थी तो हर दिन खबर के नाम पर सनसनी बनाती काल्पनिक कहानियाँ परोसी गयीं। हनीप्रीत फरार थी तो उसके पति को ढूँढ-ढाँढ कर हनीप्रीत पर कीचड़ उछालना जारी रखा गया… बीबीसी हिंदी (22 सितंबर) में खबर थी कि (‘हनीप्रीत और राम रहीम को मैंने सेक्स करते देखा था- हनीप्रीत के पूर्व पति विश्वास गुप्ता’) क्या यह केवल एक शीर्षक है, नहीं बल्कि यह वह हकीकत है कि पत्नी तो पति की बपौती होती है और भले ही पूर्व पति हो तब भी वह कुछ भी कह (बक) सकता है जिसे यदि बीबीसी में तवज्जो मिलती है तो पुरुषों की तो बल्ले-बल्ले ही है।
 महिलाओं को साहस से भर देते हैं बलात्कारियों के खिलाफ ऐसे निर्णय



जेएनयू की खबर भी इसी एंगल से 
आख़िर यह किस तरह की मानसिकता है जो हम महिलाओं के मामले में रखते हैं? एक खबर और बनायी गयी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय परिसर के ब्यायज  होस्टल के 13 कमरों में लड़कियों के मिलने की ख़बर जिसे अमर उजाला में इस तरह से छापा गया जैसे महापाप हो गया हो। विश्वविद्यालय में लड़कों के छात्रावास में लड़कियों का प्रवेश निषिद्ध नहीं है। नियम लड़की या लड़के के लिए नहीं है, किसी भी बाहरी व्यक्ति को होस्टल में नहीं रुकाया जा सकता है चाहे वह स्त्री हो या पुरुष। गुरुवार को वार्डन की जाँच टीम ने होस्टल में जब छापा मारा तो वह नियमित दौरे से अलहदा कुछ नहीं था,जिसे सनसनीखेज बनाकर पेश किया गया। कांग्रेस के गढ़ माने जाते अमेठी में उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री ने तंज कसते हुए जो कहा वह शीर्षक बन गया कि –(‘स्मृति के बहाने ही सही राहुल अमेठी में तीन दिन तो रहे –योगी’/ अमर उजाला, 10 अक्तूबर)…हम इतने कैसे गिर सकते हैं? महिला का सम्मान हमारे लिए कोई मायने नहीं रखता?

 क्या ‘महिलायें’ सिर्फ़ ‘पुरुषों’ की जरुरत की वस्तु हैं ??

आख़िर वे कौन लोग हैं जो इस तरह की ख़बरों में रुचि रखते हैं और जिनके लिए इन ख़बरों में सारा मिर्च मसाला डालकर इन्हें बनाया जाता है? उन सिरों (हैड्स) को देखा नहीं जा सकता उन चेहरों को पहचाना नहीं जा सकता लेकिन उस सोच की पड़ताल ज़रूर होनी चाहिए जो कहती है कि किसी  महिला को ‘टनाटन माल’ कह देना ख़बर बन सकती है- देखें खबर – (‘छत्तीसगढ़ की लड़कियाँ टनाटन होती हैं –बीजेपी सासंद बंसीलाल महतो’/ द डेलीग्राफ में 4 अक्तूबर को इसी शीर्षक से ख़बर थी) सासंद ने जो कहा, वह तो कहा लेकिन खबर बनकर उछालने का क्या औचित्य था..पढ़ने वाले को गुदगुदी हो यही इस तरह के शीर्षक का लक्ष्य होता है और खबर के फैलने से लक्ष्य प्राप्ति भी हो जाती है।

रामरहीम ने हनीप्रीत को अपनी तीसरी बेटी घोषित किया था पर उसने करवाचौथ का व्रत रखा या वह कभी पूरे मेकअप में होती थी, बिना कालीन ज़मीन पर कदम नहीं रखती थी और आज एक कंबल में रात बिताने को मजबूर है, वह फिल्मों में अभिनय भी कर चुकी है..आदि, आदि। क्या इन बातों को ख़बरें कहें? हनीप्रीत के बारे में इतनी ख़बरें क्यों आ रहीहैं? क्या उसके बारे में जानना इतना ज़रूरी है कि हम देश-दुनिया के अन्य सरोकारों से भी अधिक उसे तवज्जो दे रहे हैं? हनीप्रीत के जीवन की सारी कथाओं को इतना नमक-मिर्च लगाकर क्यों परोसा जा रहा है? यदि इसे टीआरपी बढ़ाने का ज़रिया माना जा रहा है तो टीआरपी कैसे बढ़ती है…टीआर पी बढ़ती है जब किसी चैनल पर कोई कार्यक्रम अधिक और अधिक और अधिक लोगों द्वारा लगातार देखा जाता है। समाचार अधिक कब देखे जाएँगे जब वे रुचिकर होंगे। समाचारों को कॉर्पोरेट ने जब हथियाया तब उन्होंने उसे केवल इंफ़ॉर्मेशन न कहते हुए समाचार चैनलों, अखबारों या कि पूरे माध्यमतंत्र को इंफोमेंट (इंफ़ॉर्मेशन प्लस इंटरटेनमेंट) कहना शुरू कर दिया। मतलब समाचार तो हो लेकिन उससे मनोरंजन भी हो और मनोरंजन के लिए स्तर तय होना ज़रूरी नहीं समझा जाता।

यौन हमलावारों से सख्ती से निपटें पीड़िताएं, तभी रुकेंगी बैंगलोर जैसी घटनाएं

बनारस विश्व विद्यालय का किस्सा याद ही होगा उसमें भी किसी ने यह नहीं पूछा कि वे लड़के कौन थे, वे कहाँ गए, उनके पिता ने उन लड़कों से नहीं कहा कि कॉलेज जाना बंद करो, घर बैठो। सारी ख़बरें ये आती रहीं कि लड़कियों के परिवार वाले क्या कह रहे हैं, लड़कियों के साथ क्या हुआ? ‘निर्भया’ नाम जितना हमें याद रहा उतना उन लड़कों का नहीं जो दोषी थे। बलात्कार के बारे में जो खबर आती है उसके साथ अमूमन जो स्कैच दिया जाता है वह भी घुटने में सिर छिपाए बैठी लड़की होती है, मतलब लड़की ही दोषी है यह अनजाने या जान-बूझकर समाज के दिमाग में फ़िट कर दिया जाता है या कि लड़की के बारे में ही हम जानना चाहते हैं।
सबसे बड़ा सवाल है मनोरंजन किसका? सदियों से हमारी मानसिकता है कि सामने जो दर्शक है वह पुरुष ही है और इसलिए कहा भी जाता है कि दर्शक/ श्रोता/ पाठक जो पसंद करता (पुल्लिंग वाचक) है, वही परोसा जाता है। यह मानकर चला जाता है कि देखने, सुनने और पढ़ने वाला पुरुष वर्ग ही है,  फ्रायड के सिद्धांत के अनुसार पुरुष को क्या पसंद आएगा तो स्त्री के बारे में जानना….बस स्त्री को परोस दिया जाता है। जैसे ‘राधे माँ’ क्या करती थी, कब मुंबई आई, किस  मिठाई वाले के बंगले में रहने लगी हमें सब पता है। क्या राधे माँ के बारे में जानना इतना ज़रूरी है?राधे माँ के चमत्कार, उसका गोदी में बैठना, उसका मस्त नाचना…मतलब वही न..उसी तरह  कि‘तू चीज़ बड़ी है मस्त-मस्त’। फिल्मों में आइटम सॉन्ग बनाकर और अब मीडिया में महज़ आइटम बनाकर, पेश किया जा रहा है स्त्री को।

सवाल है कि मीडिया के लिए कौन नियामक तय करेगा। अपनी तमाम संलिप्तताओं के बावजूद, जिसे अदालत से अभी सिद्ध होना है, हनीप्रीत एक स्त्री है। उसका निजत्व हनन क्यों हो रहा है? मीडिया दरअसल हनीप्रीत को व्यक्तिवाचक से अधिक महिलाओं के लिए एक समूहवाचक संज्ञा या विशेषण में तब्दील कर दे रही है और इस तरह स्त्रियाँ मीडिया के टार्गेट में हैं, महत्वाकांक्षी स्त्रियाँ, न कि हनीप्रीत।

जेएनयू के मामले में भी तो यही हो रहा है। अंततः उच्च शिक्षा में दाखिल होती स्त्रियों के लिए उनके घर अपने दरवाजे बंद कर देंगे। यदि ऐसा है तो यह ऐसी खाई है जिसके पार कुछ नहीं है…महिलाओं पर तंज कसता परिवार, फब्तियाँ करता समाज, भद्दे चुटकुलों से भरी सोशल साइट्स…कुछ अधिक लाइक्स मिलने की चाह में तैयार किए जाते शीर्षक…गौर से देखिए हम महिलाओं का मज़ाक बना रहे है या अपने आप का?

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सुप्रीम कोर्ट ने माना नाबालिग पत्नी के साथ सेक्स बलात्कार है: फिर भी अधूरा है न्याय



सरकार की अनिच्छा के बावजूद वैवाहिक बलात्कार को मानते हुए एक ऐतिहासिक फैसले में आज (11 अक्टूबर) की सुबह सुप्रीम कोर्ट ने 15 से 18 के बीच की पत्नी के साथ सेक्स को  बलात्कार की श्रेणी में ठहराया. इसके साथ ही इन्डियन पेनल कोड में बलात्कार की धारा में एक दूरगामी बदलाव भी आ गया. इसके पहले सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक बलात्कार को निजी मामला बताते हुए इसपर कोई निर्णय देने से इनकार कर दिया था और भारत सरकार भी इसी रूख पर थी. जबकि दुनिया के 80 देशों में वैवाहिक बलात्कार को अपराध माना जाता है.

जस्टिस मदन बी लोकुर के नेतृत्व वाली दो जजों की बेंच ने एक एनजीओ द्वारा दायर याचिका पर यह निर्णय सुनाया. इस निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए एससी ने बाल विवाह निषेध अधिनियम पर भरोसा किया। अदालत ने कहा कि एक पति को प्रतिरक्षा नहीं दी जा सकती है जो 15 से 18 की उम्र के बीच की अपनी पत्नी के साथ संभोग कर रहा है।


नाबालिग पत्नी से, बलात्कार का कानूनी अधिकार (हथियार): अरविंद जैन

एनजीओ इंडिपेंडेंट थॉट की एक याचिका ने धारा 375 आईपीसी (जो कि बलात्कार से संबंधित है) के तहत अपवाद खंड (2) को चुनौती दी है, जो कि 15 साल से ज्यादा उम्र की  पत्नी के साथ किसी संभोग या यौन कृत्य को बलात्कार नहीं मानता. इसने एक विरोधाभास बनाया क्योंकि सहमति की उम्र 18 साल थी. याचिका में यही  दलील थी।याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि यह लड़की के बच्चे के हित के खिलाफ भी है बुधवार को अदालत ने कहा कि आईपीसी की धारा 375 (2) को कोई कानूनी सुरक्षा नहीं दी जा सकती है। याचिका कर्ताओं ने इस खंड को संविधान की धारा 14, 15 और 21 का उल्लंघन मानते हुए उसे ख़त्म करने की अपील की थी.

याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने केंद्र से कहा था कि संसद कानून में इस तरह के अपवाद को कैसे बना सकती है। हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वह वैवाहिक बलात्कार के पहलू में नहीं जाना चाहता , लेकिन यह पूछा गया कि जब सहमति की उम्र “सभी उद्देश्यों” के लिए 18 साल थी, तो ऐसा अपवाद क्यों बनाया गया था?

दाम्पत्य में ‘बलात्कार का लाइसेंस’ असंवैधानिक है

केंद्र ने हालांकि वैवाहिक बलात्कार को बनाये रखने के हक में अपनी दलील दी और कहा कि  इस अपवाद को खत्म करने से  वैवाहिक बलात्कार का क्षेत्र खुल जाएगा, जो भारत में मौजूद नहीं है। केंद्र के वकील ने शादी के उद्देश्य के लिए मुसलमानों के बीच यौन की अवधारणा को संदर्भित किया और कहा कि निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले इन पहलुओं पर संसद द्वारा विचार-विमर्श किया गया है।

याचिकाकर्ताओं ने भी तर्क दिया कि अपवाद खंड बाल विवाह अधिनियम के निषेध के उद्देश्यों के खिलाफ गया था और अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों का उल्लंघन भी किया गया था, जिसके लिए भारत एक हस्ताक्षरकर्ता था।

अधूरी है लड़ाई 


वैवाहिक बलात्कार को खत्म करने की आज से 9 साल पहले याचिका दायर करने वाले स्त्रीवादी कानूनविद और सुप्रीम कोर्ट के अधिवकता अरविन्द जैन ने इस फैसले का स्वागत करते हुए इसे अधूरी जीत बताया. उन्होंने कहा कि ‘यह 15 से 18 तक के वैवाहिक बलात्कार पर तो लागू होगा लेकिन 18 से ऊपर की पत्नियां बलात्कार का शिकार होती रहेंगी. उसके खिलाफ लड़ाई अभी जरूरी है. 80 देशों में वैवाहिक बलात्कार अपराध है.’

 यौन सम्बन्ध को प्यार का रूप देना जरुरी

2008 में अरविन्द जैन ने दिल्ली हाई कोर्ट में महादेव बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया एक याचिका दायर की थी. जिसके तहत उन्होंने बलात्कार की धारा 375 के कई अपवादों को चुनौती दी थी. मसलन 15 से बड़ी उम्र की पत्नी से सेक्स बलात्कार नहीं माना जायेगा. पत्नी यदि 12  से 15 के बीच है तो बलात्कार की सजा मात्र दो साल की जेल होगी. इस याचिका में और भी प्रावधानों को चुनौती दी गई थी. मसलन हिन्दू मायनॉरिटी एंड गार्जियन शिप एक्ट (सेक्सन 6 सी )के अनुसार पति नाबालिग पत्नी का नैचुरल लीगल गार्जियन है, जिसकी व्याख्या कोर्ट करते थे कि नाबालिग पति को भी यह हक़ है.  2012 तक बहस चलती रही . 2010 से 12 के बीच तत्कालीन सरकार ने तीन संशोधन बिल लाये और कोर्ट को यह बताया भी. 2013 में नये  बलात्कार क़ानून के बाद वह याचिका निरस्त कर दी गई थी. जैन इस अन्य मामले में आज के फैसले का अधूरी जीत के रूप में स्वागत कर रहे और स्त्रीवादियों को वैवाहिक बलात्कार की लड़ाई को जारी रखने के लिए सचेत कर रहे हैं.

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