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लोकतंत्र की हत्या हो रही है.. अब एक सिर्फ जुमला नहीं है !

भारती वत्स


निर्भीक पत्रकार गौरी लंकेश की ह्त्या के एक महीने के बाद भी उनके हत्यारों की गिरफ्तारी नहीं हुई है. उनकी ह्त्या पर सामाजिक चुप्पी को भयावह बता रही हैं भारती वत्स 

साथी गौरी लंकेश को एक दुःसाहसी पत्रकार के रूप में जानते है और यही उसका सर्वाधिक ताकतवर पक्ष है भी, पर मेरे लिये गौरी सिर्फ एक पत्रकार, लेखक, कार्यकर्ता नहीं बल्कि एक महिला पत्रकार, महिला लेखक, और महिला कार्यकर्ता है. यहां महिला लगाना इसलिये जरूरी है क्योकि गौरी उन्ही सामाजिक असमानताओं , लैंगिक विभेदों के बीच स्वतंत्र छवि हासिल करती हैं, जिनके चलते औरतों की एक बहुत बड़ी आबादी पराजित-सी, घुटी हुई, छटपटाती हुई या अनुकूलित हो जीवन जी रही है, इसलिये गौरी का संघर्ष दोहरा और दुगना है।

गौरी के जाने के बाद उनका धर्म, जाति, विचार-धारा खोजने और उस पर विशिष्ट ठप्पा लगाने की कवायद तेजी से चल रही है, क्या किसी भी तरह की  जातीय पहचान गोली चलाने की अनुमति दे देती है ??? क्या किसी भी प्रकार का विचार गोली चलाने की अनुमति दे देता है? गौरी को उन लोगों के बीच ढूंढा जा रहा है, उन लोगों द्वारा व्याख्यायित किया जा रहा है जिनसे गौरी का कोई संवाद, विचार का कोई साझापन नहीं था.  जिनके साथ वो काम कर रही थी, जो उसके मन के साथ बहते थे विचार के साथ रहते थे उनसे गौरी को जानने की कोशिश की जानी चाहिये और उससे भी ज्यादा गौरी का लिखा हुआ वो सब कुछ जो इतने वर्ष उसने पूरी संजीदगी और जिम्मेदारी से लिखा। मैं गौरी से मिली नहीं कभी, उनको जाना नही; पर जब से वो गई हैं  मेरे सपनों में, मेरी सांसो में वो बसने लगी है एक पारदर्शी निडर , बेबाक और निश्छल करूणा से भरी स्त्री की तहर। बार-बार सोचती हूॅ, आखिर गौरी क्या कर रही थी ? बस उन बातों को प्रश्नांकित कर रही थी, जो मानव विरोधी है, प्रकृति विरोधी हैं। एक प्यार समानता और भाईचारे की दुनिया को बनाने में लगी थी गौरी, तब क्यों डर गये वे  लोग ? क्या उनके पास घृणा और, क्रोध से भरे शब्द कम पड़ गये ? क्या उनके विचार और मन इतने पंगु हो गये कि उन्हें हत्या के अलावा और कोई तरीका अपनी बात कहने का नहीं मिला ?

इतिहास ऐसे लोगों की हत्यायों से भरा पड़ा है जो मानवता के लिये जीते रहे, परन्तु क्या हुआ ? व्यक्ति गये पर विचार तो नहीं मरे ? हम किस तरह के आजाद देश में रह रहें ? असहमतियों  ओर आलोचना से मुक्त समाज क्या जीवित रह सकता है ? और क्या द्वंदविहीन समाज क्या वाकई में मानव समाज ही कहलायेगा ? दो प्रकार की चुप्पियाँ इन बोलने और लिखने वाले लोगों के साथ सामान्तर चल रही हैं. एक वे सत्ताधीश जो बात-बेबात बोलते हैं पर आज चुप हैं, और दूसरे वो जो जानते हैं सही-गलत पर, चुप्प हैं. ये डरे हुये लोगों की चुप्पी है. कारण कुछ भी हो चुप्पी हमेशा उसी तरफ खड़ी होती है जहां नाइंसाफी होती है इसलिये चुप रहना भी उतना ही बड़ा गुनाह है जितना बड़ा गुनाह गौरी के हत्यारों ने गौरी के साथ किया है। लोगों के पक्ष में खड़े होने वाले और सत्ता के पक्ष में रहे खड़े होने वाले मानस हमेशा से मौजूद थे परन्तु जनपक्ष मे खड़े होने वालों के विरूद्ध दमन की भयावहता आज जिस तरह दिखाई दे रही है वह भयाक्रांत करने वाली राजनीति का कुरूप चेहरा है जो पहले कभी नही दिखा, और देखा जाये तो वो भयभीत करने में सफल हो गये है। दिल्ली प्रेस क्लब मे उपस्थित पत्रकार जनतंत्र के पक्ष में खड़े लोग थे परन्तु वहां वे अपनी निर्भीकिता से ज्यादा भय को व्यक्त कर रहे थे. यही सत्तायें चाहती है इसलिये मैंने कहा कि वे इसमे सफल हो रहे है; सवाव यह है कि साहस निर्भीकता और बेबाकी की दीवार इस कदर कमजोर कैसे और क्यों हो गई ? क्या इस दीवार में सेंध लगा दी गई है ? कौन सी बजहें है इस पर हमें चिन्तन करना पड़ेगा कि हमें क्यों इस कदर डरने लगे है, ब्रेख्त की जिस कविता को तब बोला जाता था, गाया जाता जब शायद वह बहुत मौजूं नहीं थी परन्तु आज हम उसे बोलने में डर रहे हैं।

असहिष्णुता की बात पिछले 2वर्ष से की जा रही थी और जिसके चलते अनेक बुद्धिजीवियों और संस्कृति कर्मियो ने सम्मान वापस किये, फिर भी  सोचिये एक बार भी किसी तरह कि चिन्ता या हलचल सत्ता के गलियारों में महसूस नही हुई, आप हंस  रहे होंगे मेरे भोलेपन मूर्खता पर कि किससे उम्मीद कर रही है ?
दरअसल में उन सत्ताधीशों से उम्मीद नहीं कर रही, मैं  उम्मीद इस आम जनमानस, समाज के उस संवेदन शील वर्ग से कर रही हूॅ, जो इन खबरों को सिर्फ सुनता है। गौरी की हत्या के विरोध में दर-दर छोटे-बड़े शहरों में औसतन 500 से 1000 – दो हजार लोग जुड़े रास्ते पर आते-जाते लोगों ने सुना और चल दिये, तब मैंने सोचा कि मैं किन लोगों से उम्मीद कर रही हूॅ वे लोग जो 10 गुने ज्यादा बिजली के दाम देकर चार गुना दाम पेट्रोल के देकर भी चुप रहते हैं, जो काम न मिलने की लंबी चिन्ता के साथ जीते-जीते भी खौलते नहीं हैं, वे   भला एक कन्नड़ पत्रकार के लिये क्यों एकजुट होंगे ?

सोचिये सोशलमीडिया पर कुछ लोग सीधे-सीधे धमकी, घटिया भाषा में दे रहे है पर उन्हें न कोई कानून रोकता है न कोई संगठन। इन अंधे भक्तों ने आंख खोलकर न कभी नक्सलवाद को जानने की कोशिश की, न आतंकवाद को जानने की कोशिश की, न ही किसी भी माइथोलाॅजी को गहराई से जाना-पढ़ा। आलोचना किसे कहते हैं इन्हें नही मालूम। भाषा इन्हें  आती नहीं परन्तु ये गाली देने और गोली चलाने में महारथी हैं। संवाद कीजिये बाद-विवाद कीजिये भारत की परम्परा शास्त्रार्थ की है, गोली और गाली की नहीं। यह बीमार और विकृत मानस है, जिन्हें इलाज की जरूरत है। अंतर्मन   के इन उलझावों को सुलझाने का कोई रास्ता संभवतः मनोविज्ञान की उन परतों में हो जो बहुत पहले रूक गया है, उन्हीं  को खोलने की अपर्रिहायता आज महसूस हो रही है। लोकतंत्र में कार्यपालिका यानि राज्य हमेशा से दमनकारी भूमिका में रहा है जो लोकतंत्र के पाखंड को बनाये रखता है। ऐसी स्थिति में न्याय पालिका, विधायिका और मीडिया ऐसे स्तंभ हैं जिनसे जनपक्षधरता की, न्याय की, उम्मीद की जाती हैं परन्तु यदि यहीं स्तंभ सत्ता पक्ष में खड़े हो जायें तो स्थिति भयानक हो जाती है, ऐसे हालातों में हमेशा विरोधीपक्ष ’’लोकतंत्र की हत्या हो गयी या की जा रही है जैसे जुमलों का प्रयोग करता रहा है, और सही मायने में ये तब जुमले की तरह ही था, परन्तु आज इसे सिर्फ जुमला कहकर टाला नही जा सकता यह एक सच बन चुका है, जिसका उदाहरण है, लगभग पूरा का पूरा मीडिया जो सत्तापक्ष में खड़ा दिखाई दे रहा है। और फिर चाहे वह मुख्यधारा का मीडिया हो या सोशल मीडिया और सिर्फ खड़ा नहीं है इतने गहरे स्तर पर भ्रमित करने वाली सूचनाओं का संजाल फैलाये हुये है जिसमे एवं सहज-सरल नागरिक असर में आने बाध्य हो जाता है।

अभिव्यक्ति की आजादी व्यक्तिगत नहीं होती, उसका फैलाव सामुदायिक होता है, उसकी जरूरत सामुदायिक होती है, तब उसके लिये लड़ना वैयक्तिक कैसे हो सकता है ? वामपंथ हो या दक्षिण पंथ यदि बोलने, काम करने की आजादी वहाँ नही है और भयाक्रान्त करने की राजनीति हो, वहाँ लोकतंत्र नहीं हो सकता , जनपक्षधरता नहीं हो सकती है। ये गहरे चिन्तन के विषय हैं कि कौन से कारण हैं, कौनसी मानसिकतायें जिनके चलते हम इस कदर भयाक्रान्त हो  गये हैं,  यद्यपि इतिहास इस बात को पुष्ट करता है कि हमेंशा कुछ संवेदनशील, ईमानदार, निर्भीक लोगों के जीवन की शर्त पर ही मानवता के संघर्ष, आजादी के संघर्ष चलते रहे हैं। इसलिये बात सिर्फ गौरी की नहीं है, दुनिया मे हर जगह ये संघर्ष चल रहे हैं।

स्त्री की चेतना और संसार का कहानी संग्रह है शरद सिंह की किताब ’तीली-तीली आग’

डॉ.जीतेंद्र प्रताप 


कथाकार डॉ. शरद सिंह का कथा संग्रह तीली तीली आग मुझे जिन प्रमुख कारणों से आकर्षित और प्रभावित करता है,उन कारणों की संख्या महज एक या दो नहीं, कई है। तीली-तीली आग कथा संग्रह स्त्रियों के जीवन को रेखांकित करता कहानी संग्रह है। इसका प्रकाशन सन् 2003 में सामयिक प्रकाशन, दिल्ली से हुआ । गौरतलब है कि उक्त कथा संग्रह में लेखिका ने जिन सत्रह कहानियों को प्रस्तुत किया है उनमें  आये स्त्री  पात्रों के माध्यम से लेखिका ने समय और समाज के समानान्तर आ रहे स्त्री चेतना के बदलावों  को विस्तॄत एवं व्यापक फलक पर उतारने की कोशिश की है।


कथा संग्रह की प्रथम कहानी मरद की मुख्य स्त्री पात्र सुंदरा है। इस कहानी की शुरुआत ही कुछ इस तरह होती है,“सुंदरा शेरनी की तरह दहाड़ रही थी। अपनी साड़ी का छोर कमर पर कसे हुए वह खांटी बुंदेली गालियों की बौछार कर रही थी।” कहानी का यह प्रथम वाक्य ही यह बताने के लिए काफी है कि सुंदरा शेरनी बनी हुई थी। जरूर इसके पीछे कोई न कोई अनुचित और अमानवीय कारण रहा होगा, खासकर वर्तमान समाज के लिए। तभी तो उसे शेरनी का रूप धारण करना पडा था। जब हम कहानी में आगे बढ़ते हैं तो पाते हैं कि सुन्दरा जिन दो समस्याओं से विकट रूप से जूझ रही थी, वे थीं- उसकी बेटी पर जमींदार की कुदॄष्टि और उसकी तथा बेटी के शौच के लिए बाहर जाने की समस्या। इन दोनों समस्याओं से लड़ने वाली सुंदराबाई का जुझारू रूप यह साबित करता है कि आज की स्त्री  की सोच में व्यापक बदलाव आ रहा है। बस जरूरत है, समाज के प्रत्येक सदस्य उसके साथ कंधे से कंधा मिलाएं और मानवीय समाज की स्थापना में अपना योगदान दें।

तीली तीली आग इस कथा संग्रह की दूसरी कहानी है। इस कहानी की स्त्री पात्रों में मुख्य रूप से दो पात्र हैं- कहानी की वक्ता और प्रीतो। इन दोनों के बीच वैसे तो खून का कोई रिश्ता नहीं है ,फिर भी उनका आपसी रिश्ता खून के किसी भी रिश्ते से कहीं ज्यादा ही मज़बूत है। प्रीतो का प्रेम प्रसंग एक डाक्टर से चल रहा है। कहानी की वक्ता को यह भली भांति पता है कि यह गलत है फिर भी समय़ और समाज की मांग को देखते हुए उसने भी अपनी सोच में प्रगतिशील बदलाव किया। उसने प्रीतो की मुलाकत उस डाक्टर से कराने में अपना अमूल्य योगदान दिया, लेकिन साथ ही प्रीतो को शारीरिक संबंध न बनाने या फिर सुरक्षित तरीके से बनाने की हिदायत भी दे डालती है। इस घटना के द्वारा लेखिका ने स्त्री की आधुनिक विकसीत सोच को उजागर करने का प्रयास किया है।


तीसरी कहानी आठ गुना आठ सुख है ।इसमें स्त्री पात्र रामरती जो एक नौकरानी है,को यही लगता है कि आठ गुना आठ माप वाले बिस्तर पर सोने वाले लोग ज्यादा सुखी होते हैं। यह एक तरफ उसकी निर्दोषता और अबोधता को व्यक्त करता है तो दूसरी ओर नौकरों और मालिकों के बीच के आर्थिक अंतर की भयावहता को भी दर्शाता है। आठ गुना आठ सुख पाने की कामना रखने वाली रामरती यह भी सोचती है कि क्या नौकरों को एक टूटी खाट भी नसीब नहीं होनी चाहिये। यह विचार अमीरी-गरीबी के फांक को समझते हुए वर्ग चेतना का प्रथम बिंदु है।


चौथी कहानी पांच लड़कियां और उनके सपने है। इसमें पांचों लड़कियों को पैसा, चमचमाती कारें, सजीले नौजवान आदि ही लुभाते हैं। उनकी इस प्रकार की सोच से आख़िरी तौर पर सहमत नहीं हुआ जा सकता  कि पैसा कमाने के लिए देह व्यपार ही एकमात्र साधन रह गया है। क्या यह स्त्रियों की बदलती सोच पुरातन से विद्रोह है?


किस किस को कटवाओगे केशू कहानी में एक स्त्री पात्र हिम्मा के साथ बलात्कार की घटना सुनकर कहानी की वक्ता उससे पूर्ण सहानुभूति रखती है। वह इस घटना को चाह कर भी नहीं भूल पाती है। वह कहती है ,“बलात्कार हिम्मा के साथ हुआ था लेकिन उससे उत्पन्न मानसिक पीड़ा को मैं भी झेल रही हूं। ‘उसका यह कथन इस बात की ओर इशारा करता है कि आज एक महिला दूसरी महिला पर हो रहे अत्याचार और अन्याय को देखकर शांत रहने वाली नहीं है। आज जब किसी लडकी के साथ किसी भी शहर में बलात्कार या अन्य अमानवीय अत्याचार होता है तो स्त्रियों का हुज़ूम सडकों पर उतर आता है। यह सब होना कोई मामूली बात नहीं है। यह  चेतस होती स्त्री की ओर ही संकेत करता है।



घो घो रानी कित्ता पानी कहानी में लेखिका शरद सिंह ने बडी ही कुशलता के साथ यह स्पष्ट किया है कि आज कोई भी प्रेमी किसी भी स्त्री के लिए जान देने के लिए तैयार नहीं होता है।वह समय बीत गया जब ऐसी घटनाएं सुनाई देती थीं। आज यदि कोई कुंआरी लडकी मां बन जाती है तो उस बच्चे का कथित बाप भी उसे अपना नाम देने को शायद ही तैयार हो। ध्यातव्य है कि आज की स्त्रियां इस बात को बखूबी समझने लगी हैं। और उनकी यही सोच और समझ मुझे व्यक्तिगत आत्मिक सुकून प्रदान करती है।


सुअरबाड़े की जान्ह्वी कहानी में जान्ह्वी ने अपनी समझदारी और बुद्धिमत्त्ता से अपने वैवाहिक जीवन में आने वाली उन कठिनाइयों, जिन्हें शायद आसानी से हल न किया जा सके,को दूर कर सुखद वैवाहिक जीवन व्यतीत किया। हथियारों वाले कहानी में मुख्य स्त्री  पात्र चाची ने अपनी सूझ-बूझ से ससुर के समक्ष मुंह न खोलने की रूढिवादी और गैरज़रूरी परंपरा को तोड़ते हुए अपने परिवार में होने वाले खून खराबे तथा गांव में प्रस्तावित दंगे को रोक पाने में सफल रही थीं।

एक अदद प्यार के लिए कहानी की पात्र विपुला को अंत तक प्यार की परिभाषा को ही समझ पाने की उधेड़बुन में परेशान दिखाया गया है। अंतत: एक पल ऎसा भी आता है जब वह अपने प्यार का इज़हार करना तो चाहती है,पर उसे कोई ऐसा व्यक्ति ही नहीं मिलता जिससे प्यार किया जा सके। इसी तरह कथा संग्रह में गीला तौलिया,वो गंदले मुंह वाली,बही खाता आदि ऐसी कहानियां है, जिनमें अभिव्यक्त स्त्रियों की सोच और मानसिकता को सलाम करने का जी चाहता है।


इस तरह कथा संग्रह की अधिकतर कहानियां पुरुषसत्तात्मक समाज को चुनौती देती हुई प्रतीत होती हैं। इन कहानियों की स्त्री पात्र अपनी सोच और विचारों की गहनता की सार्थकता एवं सच्चाई को साबित करती हैं। इन कहानियों में पुरुष की अहंवादी सोच को भी बेनकाब किया गया है। यही नहीं स्त्री चरित्रों की भीतरी हलचल भी विस्तार से सामने आती है।
’तीली-तीली आग’ 
लेखिका – डॉ. शरद सिंह
सामयिक प्रकाशन, दिल्ली 

डॉ.जीतेंद्र प्रताप 
जवाहर नवोदय विद्यालय, मुडिपु, 574153
दक्षिण कन्नड़, कर्नाटक, मो.9739198095)

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महिषासुर: मिथक व परम्पराएं

डेस्क 

स्त्रीकाल की अनुषंगी संस्था ‘द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन ‘ की आगामी किताबों की अग्रिम बुकिंग शुरू है. आगामी तीन से चार सप्ताह में आने वाली किताबों के लिए अग्रिम बुकिंग ‘पहले आओ पहले पाओ की नीति’ के तहत विशेष छूट के साथ शुरू की जा रही है. किसी एक किताब (पेपर बैक) की खरीद पर पायें 35% की विशेष छूट और दो किताबों पर 40% की. हार्ड बाउंड किताबों पर  45% की छूट दी जायेगी. बुकिंग ऑनलाइन या अकाउंट ट्रांसफर के जरिये की जा सकती है.

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महिषासुर: मिथक व परम्पराएं 
                   संपादक: प्रमोद रंजन 


असुर-विमर्श के आधार पर खड़ा हुआ ‘महिषासुर-रावेन आंदोलन’ फुले, आंबेडकर और पेरियार के भारतीय सांस्कृतिक इतिहास को देखने के नजरिए को व्यापक बहुजन तबके तक ले जाना चाहता है, जिसमें आदिवासी, दलित, पिछड़े और महिलाएं शामिल हैं। इस सांस्कृतिक संघर्ष का केंद्रीय कार्यभार पुराणों के वाक्-जाल में ढंक दिए गए बहुजन के इतिहास को उजागर करना है, हिंदू मिथकों में अपमानित और लांछित किए गए, असुर, राक्षस और दैत्य ठहराए गए बहुजनों के महान नायकों के वास्तविक चरित्र को सामने लाना है।

इस आंदोलन ने दो तरह की प्रतिक्रियाओं को जन्म दिया है। एक ओर इसके माध्यम से सांस्कृतिक अधीनता के शिकार तबके अपनी खोई हुई सांस्कृतिक पहचान को पाने की कोशिश कर रहे हैं तो दूसरी ओर, वर्चस्वशाली तबकों में बौखलाहट है। इस बौखलाहट की एक तीखी अभिव्यक्ति संसद में (फरवरी, 2016) भी हुई थी।
इस आंदोलन का मानना है कि स्थापित और आदर्श के रूप में प्रस्तुत की गई सांस्कृतिक संरचना को तोड़े बिना वर्तमान में स्थापित प्रभुत्व को तोड़ा नहीं जा सकता है। अपने अंतःस्वरूप में यह द्विज-राष्ट्रवाद के बरक्स बहुजन-राष्ट्रीयता को रखता है तथा हिंसा की संस्कृति के खात्मे की पुरजोर वकालत करता है।
विमर्श और आंदोलन के स्तर पर इसकी बढ़ती लोकप्रियता ने इसके सामने बहुत सारे प्रश्न भी खड़े किए हैं। ये प्रश्न दोनों स्तरों पर हैं। विमर्श के स्तर पर भी और आंदोलन के स्तर पर भी। ये प्रश्न महिषासुर आंदोलन की एक सैद्धांतिकी की मांग कर रहे हैं। इस बात की भी मांग कर रहे हैं कि इस आंदोलन की संरचनात्मक विश्लेषण की जाय। यह किताब इन आवश्यकताओं की पूर्ति करती है।

मूल्य:  अजिल्द: 350 रूपये
सजिल्द: 850 रूपये

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इग्नू रोड, नेबी सराय, दिल्ली, 68
रजिस्टर्ड कार्यालय: सनेवाड़ी, वर्धा, महाराष्ट्र-1
ईमेल: themarginalisedpublication@gmail.com, फोन: 9650164016, 8130284314

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‘छोटके चोर’



श्रीमती मोहिनी चमारिन


जब-जब हिन्दी दलित साहित्य की बात चलती है, तब-तब प्रथम दलित रचना की प्रामणिकता को लेकर यह प्रश्न उठता है कि आखिर प्रथम दलित रचना कौन-सी थी? प्राप्त दसतावेजों के आधार पर यह तो प्रमाणित होता है कि हिंदी की प्रथम दलित रचना एक कविता थी जो इंडियन प्रेस, इलाहाबाद से आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपादन में प्रकाशित होनेवाली पत्रिका ‘सरस्वती’ के सितंबर 1914 के अंक में प्रकाशित हुई थी ‘अछूत की शिकायत’ शीर्षक से प्रकाशित इस कविता के रचयिता पटना (बिहार) के हीरा डोम माने जाते हैं । ‘सरस्वती’ में प्रकाशित हिंदी की यह प्रथम दलित रचना संभवतः भोजपुरी की प्रथम रचना भी है। यह सही है कि उस समय तक हिंदी में दलित साहित्य जैसी कोई चीज नहीं थी। किसी अति निम्न दलित जाति, वह भी एक डोम द्वारा इस तरह की कविता लिखने की तो कल्पाना भी नहीं की जा सकती थी। 


मगर यहां एक प्रश्न व शोध का विषय यह है कि यदि हीरा डोम हिंदी के प्रथम दलित पुरूष रचनाकार थे, तो हिंदी की प्रथम दलित लेखिका कौन थी और किसे प्रथम दलित-स्त्री रचना माना जाए? हालांकि आलोचकों का एक तबका हीरा डोम की सरस्वती में प्रकाशित कविता में ‘दलित-चेतना’ का अभाव चिह्नित करता है. 
इसे महज संयोग कहा जाए या दलितों में तेजी से पैदा हाती चेतना का विकास कि एक ओर ‘सरस्वती’ के सितंबर 1914 के अंक में ‘अछूत की शिकायत’ कविता प्रकाशित होती है, तो दूसरी ओर उसके मात्र 11 माह बाद इलाहाबाद से ही ओंकारनाथ वाजपेयी के संपादन में प्रकाशित होने वाली एक अल्पज्ञात पत्रिका ‘कन्या-मनोरंजन’ के अगस्त 1915 के ग्याहरवें अंक में भाग दो में (पृष्ठ 307 से पृष्ठ 310 में फैली) एक कहानी प्रकाशित होती है, कहानी का शीर्षक है ‘छोटे का चोर’ । इस कहानी का रचयिता कोई पुरूष नहीं अपितु एक स्त्री है और इसका नाम है – श्रीमती मोहिनी चमारिन। लेखिका के बारे में इससे अधिक जानकारी नहीं मिली है। यहां यह उल्लेखनीय है कि श्रीमती मोहिनी चमारिन की यह कहानी ‘छोटै के चोर’ हिंदी की प्रथम दलित कहानी के रूप मं अवधी की पहली प्रकाशित रचना है।


‘छोटे का चोर’ की विषय-वस्तु शिल्प और तेवर को देखते हुए कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की ‘कफन’ की तरह यथार्थवादी आधुनिक कहानी के तत्व विद्यमान हैं। इसलिए इसे पथम यथार्थवादी आधुनिक दलित कहानी भी माना जा सकता है। यथार्थवादी आधुनिक इस मायने में कि उस दौर में होनेवाला पूरा स्त्री-लेखन सदाचार, नैतिकता, आदर्शवादी और एक हद तक शुचितावादी परंपराओं के नाम पर पूरी तरह पुरूष मानसिकता और वर्चस्व को पोषित करनेवाला लेखन था। 

यहां यह रेखांकित करनेवाली बात है कि संभ्रांत और तथाकथित बड़े घरों की शिक्षित स्त्रियां जहां अपने आपको खुलकर अभिव्यक्त करने में संकोच करती थी, वहीं श्रीमती मोहिनी चमारिन ने ऐसा कथ्य चुना जो कानून और व्यवस्था के रक्षकों से सीधे-सीधे मुठभेड़ करता है। शायद ऐसा लेखिका के जीवन-संघर्ष सामाजिक परिस्थितियों और विषमताओं के अंतर्विरोधों के चलते हुआ।

‘छोटके चोर’


एक दांव बहुत दिन भवा चोर बहुत उधरान रहें, कहुं आज ओकर लोटा थरिया उठैगे, कहुं ओकर टाठी, कहुं फलनवां खियाँ सेन्ध होयगै, सब बिन बटौर लैगा पानी पिये का लुटिया तक न बची- जहं देखौ उधरै यही सुनाय- बजार मां जेब मां पैसा रखके हाथे से दबाये जाउ औ तनीसा गाफिल भये कि पैसा नदारद, चोर का कि आंखी के काजर काढ़ लेत रहै- हाकिमों पुलिस आरी रहें- बहुत तलाशी तहकियात करे मुदा कुछ पता चलै न – चोरी दुइ चार छः रोजे होय-जब बहुत उत्पात होय लाग तो हाकिम ई हुकुम निकारेस कि जो कौनौ एक चोर या गिरह कट पकड़ के लै आव ओ का 100 इनाम मिलै,


एक बिचारी अहिरिन रहै, ओकर मनई पांच छ – बरिस भवा मरगा रहै, मेहनत मजूरी कैके तीन लड़कन का पालत पोसत रही लड़कवन छोटे-छोटे रहैं उनका खवाव पियाव कपड़ा लत्ता का अकेले मेहराख के कमाई में कहां अटै, तौन बिचारी दिन ज्ञभ् मजूरी करै और रात के पिसौनी, इतना मेहनत करत करत औके देहीं के बल बिलकुल टूट गया, औ बेराम रहै



लग महतारी का बेराम देख के बड़का और मझिलका लड़का दुइनौ कौनों खियां काम करै लागे, पै कहूं थूकन सतुआ सनात है, नान नान लड़कन के कमाई से चार चार जने के गिरिस्तीके खरचा चल सकत है? बिचारी अहिरिनया थेरमिऊं मों काम थोड़ा बहुत करतै जाय, ए हिंयां तक भा कि एक दम्मै खटिया लै लिहिस, अब कर कीन जाय महतारी बेराम, घर मां खाय का नहीं, मझिलका और छुटका लड़का मनावें लागे कि हेराम एक ठो चोर कहुं से मिल जाय तो बहुत अच्छा।
छोटा लड़का – आऔ जी चली कहूं चोर ढूंढी काजानी मिलन जाया तौ, नारायन दै दें, चोर केह तरह के होत है,
मझिलका – चोर काला-काला होत है मोट के ओकर लाल आंखी होत है।
छोटा – जसे जगेसरा है, का जगेसरा चोर आय?
मझिलका – अबे धू पगला! जगेसरा तो मनई आय।
छोटा – तौ फिर चोर केह तरह के होत है?
मझिलका – अबग! चेर चोरी करत थे, रात के निकरत हैं, उनका देखे बड़ी डर लागत थी, मुरदानी माटी लिहे रहत थें, जहां घर मां घुस के फेंक दिहेन कि मनई वेहोस सोवे लागें।
छोटा – तैं चोर देखे हस?
मझिलका – मैं देखौं तो नहीं एक्का कि सुनेउ है ननका देखेस ही तीन मोसे बतावह रहा।
छोटा – ओ ननका कहां देखेस?
मझिला – एक दिन ऊ अपने बाप के साथ रात के पांचायत से आवत रहा तौ चोर तलाब मां पानी पियर रहें तीन ऊ मोका झुटकावे कि चोर मनईन के तरह होत हैं?
छोटा – तौन तैं फिर का कहे।
मझिला – मैं कहि दिहेऊं कि मोसे न छट्टैली बताव मैं जनतेवे नहीं काकि चोर दमसर, मनई दूसर।
बड़का लड़का – अरे ओ द्वारका ओ लल्लू चलौ दौड़ौ बुआ आई है। द्वाराका, औ (मझिला) औ लल्लू (सबसे छोटा) दौड़ै। एक तो बुआके लपेटे दूसर जने गठरी मुठरी खोलै लागैं, गठरी से गुड़ लाई चना निकार के खाय चबाय लागै औ बुआ से बातैं छुअन लागीं।
द्वारका – बुआरे तैं चोर कभों देखे हस केह तरह के होत हैं?
बुआ – चोर मनई के तरह होत है और केह तरह के?
द्वारका – मैं तौं सुनेउं हैं कि चोर करिया करिया होत हैं औ ओकर लाल-लाल आंखी होत है, बुआ! मैं दोई चीज अबै तक कबहुं नहीं देखेउं एक चोर और एक हाकिम।
बुआ – अरे तैं तो बड़ऊ जान परत थे, चोरौ मनई आय औ हाकिमों मनई आय। चोरी करैं लागे चोर बाज लागे। हमही तहीं जौ चोरी करी गठरी मारी तौ हमही तैं चोर कहे जाय लागी। चोर के का कुछ कान पूंछ थेरौ होत थी जसे हम तुम मनई तैसे उनहूं मनई रात के चोर दिन के खासे मनई। और हाकिम हुद्दा पाय गयें कपड़ा पहिर लिहिन हाकिम हुय गयें। मनई छोड़ को जनाऊर थोडै़ अहीं।
द्वारका – हां बुआ होई ऐसन, परसों हियां हाकिम आये रहें तौन उनके खातिर तीन चार दिन पहिलेन से बहुतासा खूटा ऊंटा गाड़े जातर रहैं, मैं सोचेऊं कि कौनौं बड़ा जनाउर होई तौ तो इतने खूंटा मां बांधा जात है। नहीं भैंस गाय बिचारी तो एकय खूंटा मो रहती हैं। तौन बुआ मैं रस्ता मां खेलत रहेउं कि मनई कहेन भाग-भाग हाकिम आवत है। सब कौनों इधर-उधर लुकै दिपाय लागें। मैं तो भैया पहिलेन से डेरान रहेऊं भागेऊं जिव लैके कि कहुं काट न लेय। पे तनी साह पिछउंड़ होय के मैं देखऊं तौ मोका निनार मनईहस लाग। ऐसेन चोरै निनार मनइन के तरह होत हैं?
बुआ – इ दहिजरवा न बौरहै मां, न सरेख मां, अरे नास गड़वा हाकिमों मनई आय और चोरौ मनई आय।
द्वारका – मैं तोसुनउ है कि हाकिम मारत हे मनई का पकड़त है। ओका ताकै का सिपाही रहत है।
बुआ – बिना कसूर के हाकिम के बाप दहि जरा तो सजा दैय दई। औ कसूर कौन किहे होय तो हमही तुम सजा दै सकि त थी हाकिम से डराय न चाही हाकिम चोर बदमास का मारत और सजा देत है कुछ भले मनई का नहीं।
द्वारका – अच्छा जौ चोर दिन को चला जात होय तौ चिह्नय पडै़ कि चोर आय।
बुआ – चोर के कान पूंछ थेरै होत है जौन चिह्नय पडे़ जब तक पकड़ न जाए तब तक सब कौनों साकहैं है। आज चले मोरे साथ मैं तोका हाकिम और चोर दोइनों दिखाव दैहौं।

बुआ के साथ जाए के द्वारका व लल्लू चोर और हाकिन देख आये। अब अकीन आया कि हां चोर और हाकिम मनइन आहोए इतनी लम्बी चैड़ी बात सुनत सुनत तुम उकताय गई हौवौ पै जौन बात के बारे मैं ई सब बात कहेउं है ऊ अबहिन कहइन का काफी है – घर मां पैसा कौड़ी की तंगी रावे करै –  महतारी बेराम होय गेदवा दरमा का अब खर्चा कहां से आव, और द्वारका विचारे के दिनौं रात के मनाये से भगवान एहौ चोर न भेजन तौ लल्लू द्वारका एक दिन कहेन कि ‘‘भययाहो! मैं तो कुछ घर के काम काज करतै नहीं अहिऊं – मोका कौनौ नौकरो नहीं राखत, मैं घर मां खात भी हौं । औ न कहूं से रूप्या मिलै औ न चोर – तौ ऊअस काम न कीन जाय कि मैं चोर बन जाऊं औ तुम मोका पकड़ के हाकिम के पास लै जाय जौन रूप्या मिलै आसे घर के काम-काज की जाय। औ महतारी के दवा दरमत होय। मोका सजा होइ तौन होई।

द्वारका – जौ एसेन करै का हैं – तौ फिर में कहे न चोर बनौ तै इतना छोट
चोर के कान पूंछ थेरै होत है जौन चिन्हाय पडे़ जब तक पकड़ न जाए तब तक सब कौनों साकहैं है। आज चले मोरे साथ मैं तोका हाकिम और चोर दोइनों दिखाव दैहौं।
हम भला तोसे घर से बाहर जोल खाना मा कैसे रहि जाई – महतारिऊ तोरे बिना जिऊ दै देई।
लल्लू – नहीं भरूया तु हौ तो कुछ काम काज कै के कुछ खरिच वरिच का लैइन आयत हो महतारिव के कुछ सेवा टहल कै देत हौ। मैं तो कुछौ नहीं कै सकतेऊं तौ मोरै चोर बनव अच्छा है – महतारी पूंछे तो कहि दिहेव कि बुआ के साथ जबरजस्ती भाग गाए।

बहुत कहा सुनो के पीछे द्वारका राजी भयो दूसरे दिन डिपटी के सामने गये – लल्लू कबूलेन कि हां हम चोरी करत रहे द्वारका कहेन कि हां साहब मैं इस चोर का पकडे़व है – डिप्टी सोचेन कि कसत भाई चोर औ रचोर के पकड़वयया आहों- खर खानची से कहेन कि सौ रूप्या इनाम दें देव – रूप्या लै के घर कैतो चले – डिप्टी रहै हुशियार, द्वारका जस कहे रहा औ रजसे बहुत से हाकिम होत हैं इ डिप्टी जनाउर न रहै, इ सोचेन कि इनाम पायके ओर लोग तौ बड़े खुशी होत रहें पद इ बड़ा उदास है हैं न है, कुछ दाल मां काला है – इ सोच के ऊ द्वारका के पीछे-पीछे चले कि देखो तौ का बात है – द्वारका रूपया लै के घर आये महतारी के खातिर कुछ फल फलायी और दवाई लेत आयें इ डर के मारे कि कहूं महतारी लल्लू का पूंछ न तुरतै। दुआरे का भागैं, जौ बेर होइ चल औ लल्लू न देखाने तौ महतारी के जिव मों सकका भै कि लल्लू कहां गा- बोलायस ‘द्वारका’ औ द्वारका! द्वारका के जिव अब चुंदई कैती से उड़ा कि होय न होय महतारी लल्लू का पूंछी जौ महतारी बहुत नरियान चिल्लान बकी भूं की तौ द्वारका का सामने आये पड़ा।



महतारी पूछेस कि लल्लू का कहां छोंड़ आये – अब सो बहकावं के तरकीव भूल गै जो कौनों कबहूं झूंठ न हीं बोलत का जनी कहो ओके मुहंना से झूंठ निकरतै नहीं बुलुक से रोय दिहेन औ सब हाल सच-सच कहि दिहेन अब तौ महतारी बहुत रिसान कहेस ‘‘किमोर जिव तौ ऐसेन कल नहीं रहत मां नाराइन हम का लड़का अस सपूत दिहेन कि हमरे जिउ का एक न एक चिढ़येन रहत हैं – मैं जिव सम्हारौ नहीं परितिउं और जिव का एक न एक कलकान ठाढे़ रहत हैं – नारायेन मोका मौतो नहीं देतें एतना बेरामी अरामी होत थी महारानी भवानी हैं- मोका कौनों भूलिऊ के नहीं पूंछत – पूछैं कैसे मोका तौ भोगै कबदा है अब लल्लू का जौ जल्दी न लिअए तौ मैं न कुछ खइहौं न पीहौं आपन जिउ दइहे-दों द्वारका विचरऊ का अब हसिया के लालच होइगा। काकरैं! क्रेंन तौ अच्छे का होईगै बुराई ‘‘होम करत हाथ जरगा’’ इधर इ रोचैं कि कहां से हम अस करबौ भयेन उधर मंहतारी रोय -रोय जिव देय कि मोर ललुआ का जनी कसत होय कस न होय, डिप्टी परधी लोग के इ सब बात सुनत रहैं। वही पावं तुबू का लौट गये।औ लल्लू का बुलायिन पूछेन कि सच-सच की तुम चोराये हो लल्लू जेो कुछ चुराये हों तो कहैं। डिप्टी पूछेन कि हमैं सब हाल बतायगयें कि महतारी के दवा दरमत के खातिर इ सब हुत भेई हाकिम बउे़ खुसी भे। मारे पियाह के लल्लू का गोदी मों बैठाय के मुंह चूमंन कि भगवान हमहूं का ऐसेन लड़का दिहेव, और कहेंन कि बेटा तुम ऐस काम किहेवह ळे कि तुम्हारे हस लड़का पाय हे तुम्हार गरीब महतारी सातें मुलुक के राजा से भी बढ़के अमीर है,’’ खजानची का हुकुम दिहिनकि इ लड़का का दुइ थैली रूपिया औ रदेव और सिपाही का साथ् के देव। लल्लू रूप्या लैके हंसी खुसी घर लौ द्वारका के जिव में में जिरा आवा और महतारी तौ इतना खुसी भई कि जानौं सांप के हेरान मन मिलगा होय बिना दवा दरमत के आठ दिन मां चंड़ी होयगै।
नरायण करै ऐसन बिटिया बेटवा सब के होए।

प्रथम दलित स्त्री-रचना ‘छोटे का चोर’ हमें जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की नैया के सौजन्य से प्राप्त हुई है। यह रचना उन्हें अपने शोध के दौरान हासिल हुई। 

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‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

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डेस्क 

स्त्रीकाल की अनुषंगी संस्था ‘द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन ‘ की आगामी किताबों की अग्रिम बुकिंग शुरू है. आगामी तीन से चार सप्ताह में आने वाली किताबों के लिए अग्रिम बुकिंग ‘पहले आओ पहले पाओ की नीति’ के तहत विशेष छूट के साथ शुरू की जा रही है. किसी एक किताब (पेपर बैक) की खरीद पर पायें 35% की विशेष छूट और दो किताबों पर 40% की. हार्ड बाउंड किताबों पर  45% की छूट दी जायेगी. बुकिंग ऑनलाइन या अकाउंट ट्रांसफर के जरिये की जा सकती है.

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1.               सावित्रीबाई फुले रचना समग्र :
                  संपादक: रजनीतिलक, मराठी से अनुवाद: शेखर पवार

यह किताब 19वीं सदी की उस युगनायिका के लेखन का समग्र संकलन है, जिसे आधुनिक भारत में स्त्री शिक्षा की मशाल जलाने का श्रेय जाता है. पुस्तक में संकलित सावित्रीबाई फुले की रचनायें, उनके विचार पाठकों के विचारोन्मेष के लिए जितने उपयोगी हैं, उतना ही इतिहास, साहित्य और समाजशास्त्र के शोधार्थियों के लिए भी.

मूल्य:  अजिल्द: 160 रूपये
सजिल्द: 350 रूपये

2. चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु ग्रन्थावली (चार खण्डों में प्रकाशित)
   संपादक : कँवल भारती 


डा. भीमराव अम्बेडकर (बाबा साहेब) के जीवन और कार्यों से उत्तर भारत को परिचित कराने वाले चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु  और कँवल भारती द्वारा संपादित उनकी ग्रंथावाली पर चिंतक/ साहित्यकार प्रेमकुमार मणि की टिप्पणी:
बोधानन्द और अछूतानंद की वैचारिकता को चन्द्रिकाप्रसाद जिज्ञासु ने  आगे बढ़ाया और इस पूरे संघर्ष को एक व्यवस्थित गति दी . यह चुनौती पूर्ण कार्य था . लखनऊ के सआदतगंज में उन्होंने एक प्रेस और प्रकाशन की स्थापना की . प्रकाशन का नाम था बहुजन कल्याण प्रकाशन और प्रेस का नाम समाज सेवा प्रेस .  उन्होंने स्वयं बोधानन्द और अछूतानंद की जीवनियां लिखी और प्रकाशित की . बाबासाहेब का जीवन संघर्ष उनकी लिखी ऐसी महत्वपूर्ण कृति है ,जिसे पढ़कर हिंदी भाषी भारत के लोग आंबेडकर के जीवन और कृतित्व से परिचित हुए . आंबेडकर की अनेक पुस्तकों के अनुवाद और प्रकाशन का श्रेय जिज्ञासु जी को जाता है . हिंदी भाषी इलाके को उन्होंने आंबेडकर  से परिचित कराया . लेकिन इतना ही कहना शायद उनके महत्त्व को सीमित करना होगा  .  उन्होंने एक मन्त्र दिया कि दलित और पिछड़ी जातियों को एक साथ आये बिना ब्राह्मणवाद से निर्णायक लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती . मार्क्सवाद ,गांधीवाद ,लोहियावाद और अन्य दूसरे समाजवादी संघर्षों से चुपचाप अलग रहते हुए उन्होंने मनोयोग पूर्वक फुले -अम्बेडकरवाद की ज़मीन उत्तरभारत में तैयार की

इतने महत्त्व पूर्ण लेखक -विचारक की रचनावली उपलब्ध नहीं थी . उन्ही की परम्परा के योद्धा लेखक कँवल भारती ने जिज्ञासु जी की रचनावली परिश्रम पूर्वक सम्पादित कर ऐतिहासिक महत्त्व का कार्य किया है . यह रचनावली बहुजनों के समग्र संघर्ष को बल तो प्रदान करेगी ही ,एक नए आधुनिक भारत का स्वरूप भी निर्धारित करेगी ,जो अधिक लोकतान्त्रिक और न्यायपूर्ण होगा .

मूल्य:  अजिल्द: 450 रूपये ( चौथे खंड का मूल्य 250 रूपये)
सजिल्द: 900 रूपये ( चौथे खंड का मूल्य 500 रूपये)
नोट:   पूरा सेट खरीदने पर ( 1000 रूपये में अजिल्द और 1900 रूपये में सजिल्द उपलब्ध है)

3. भारत के राजनेता: अली अनवर 
  संपादक : राजीव सुमन 
  श्रृंखला संपादक : प्रमोद रंजन 


यह किताब एक खास उद्देश्य से एक सुनिश्चित श्रृंखला के तहत प्रकाशित की जा रही किताबों का हिस्सा है. ‘भारत के राजनेता’ सीरीज के तहत प्रकाशित किताबों का उद्देश्य है कि लोग यह समझें कि जिन विचारों, जिन मुद्दों के लिए वे अपने नेता को चुनकर विभिन्न सदनों में भेजते हैं, जिन्हें अपने हितों के लिए जनादेश देते हैं वे क्या और कितना उनकी उम्मीदों पर खरे उतरते हैं. चुने हुए प्रतिनिधि अपनी जनता की समस्याओं, उनके दुःख-दर्द  और अपने क्षेत्र की मूलभूत समस्याओं के साथ-ही-साथ राज्य और देश के विकास में कितने मुखर रूप से और प्रभावी ढंग से संसद के या विधान सभा के पटल पर रख पाते हैं. सदनों के पटल पर उनका हर कार्य-व्यवहार उनकी बोली और भाषा उनके भाषण, मुद्दे उठाने और उनके जुझारूपन का सीधा संबंध उन सबकी सामूहिक चेतना और उत्तरदायित्व से जुड़ता है और उसी का प्रतिबिम्बन माना जा सकता है, जिनकी और जिस क्षेत्र की वे नुमाइंदगी कर रहे होते हैं. संसदीय या विधानसभा की कार्यवाहियों में उनकी सक्रीय भागीदारी और हिस्सेदारी उनका व्यक्तिगत मसला नहीं होता. वे कितनी सिद्दत और कितनी सहजता से अपने लोगों, अपने क्षेत्र की समस्याओं को आवाज दे पाने में सफल होते हैं उससे उनकी नियत की झलक मिलती है.

यह किताब भारत में ‘पसमांदा आन्दोलन के सूत्रधार राज्यसभा में दो बार चुने हुए प्रतिनिधि ‘अली अनवर’ की संसदीय सहभागिता और समाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर उनकी पहलों को केन्द्रित है.  इस किताब के संपादन में ऐसी रूपरेखा और सम्पादन के क्रम में ऐसे मानक तय किये जो विश्वसनीय हों और जिसके द्वारा तय हो सके कि जनता का वोट जाया नहीं गया. हम संसद के दोनों सदनों और या विधानसभाओं में विभिन्न मसलों पर उनके वक्तव्यों, उनके दर्ज भाषणों और उनके हस्तक्षेपों के साथ-साथ स्पेशल मेंशन, शून्य काल, और तारांकित प्रश्नों-उत्तरों के माध्यम से उनके कंसर्न को देखने समझने की कोशिश कर रहे हैं. इन सबके अलावा एक लंबा साक्षात्कार भी इस पुस्तक में शामिल किया गया है जिससे उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि से लेकर उनके सामाजिक राजनैतिक और आर्थिक पृष्ठभूमि को समझने में मदद मिल सके.  यह किताब आधुनिक भारत के समाज शास्त्र, राजनीति विज्ञान और इतिहास के शोधार्थियों तथा राजनीति और अपने जन प्रतिनिधि को समझने के लिए आम जन के लिए उपयोगी है.

मूल्य:  अजिल्द: 200 रूपये
सजिल्द: 400 रूपये




4. प्रसाद काव्य-कोश 
    संपादक : कमलेश वर्मा 
               सुचिता वर्मा 


हिन्दी कविता के शिखर कवि जयशंकर प्रसाद का यह काव्य-कोश हिन्दी के पाठकों शोधकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण पुस्तक है.

मूल्य:  सजिल्द: 950 रूपये

अग्रिम बुकिंग

संपर्क: द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन
इग्नू रोड, नेबी सराय, दिल्ली, 68
रजिस्टर्ड कार्यालय: सनेवाड़ी, वर्धा, महाराष्ट्र-1
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भारत के राजनेता: अली अनवर

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  भारत के राजनेता: अली अनवर 
  संपादक : राजीव सुमन 
  श्रृंखला संपादक : प्रमोद रंजन 


यह किताब एक खास उद्देश्य से एक सुनिश्चित श्रृंखला के तहत प्रकाशित की जा रही किताबों का हिस्सा है. ‘भारत के राजनेता’ सीरीज के तहत प्रकाशित किताबों का उद्देश्य है कि लोग यह समझें कि जिन विचारों, जिन मुद्दों के लिए वे अपने नेता को चुनकर विभिन्न सदनों में भेजते हैं, जिन्हें अपने हितों के लिए जनादेश देते हैं वे क्या और कितना उनकी उम्मीदों पर खरे उतरते हैं. चुने हुए प्रतिनिधि अपनी जनता की समस्याओं, उनके दुःख-दर्द  और अपने क्षेत्र की मूलभूत समस्याओं के साथ-ही-साथ राज्य और देश के विकास में कितने मुखर रूप से और प्रभावी ढंग से संसद के या विधान सभा के पटल पर रख पाते हैं. सदनों के पटल पर उनका हर कार्य-व्यवहार उनकी बोली और भाषा उनके भाषण, मुद्दे उठाने और उनके जुझारूपन का सीधा संबंध उन सबकी सामूहिक चेतना और उत्तरदायित्व से जुड़ता है और उसी का प्रतिबिम्बन माना जा सकता है, जिनकी और जिस क्षेत्र की वे नुमाइंदगी कर रहे होते हैं. संसदीय या विधानसभा की कार्यवाहियों में उनकी सक्रीय भागीदारी और हिस्सेदारी उनका व्यक्तिगत मसला नहीं होता. वे कितनी सिद्दत और कितनी सहजता से अपने लोगों, अपने क्षेत्र की समस्याओं को आवाज दे पाने में सफल होते हैं उससे उनकी नियत की झलक मिलती है.

यह किताब भारत में ‘पसमांदा आन्दोलन के सूत्रधार राज्यसभा में दो बार चुने हुए प्रतिनिधि ‘अली अनवर’ की संसदीय सहभागिता और समाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर उनकी पहलों को केन्द्रित है.  इस किताब के संपादन में ऐसी रूपरेखा और सम्पादन के क्रम में ऐसे मानक तय किये जो विश्वसनीय हों और जिसके द्वारा तय हो सके कि जनता का वोट जाया नहीं गया. हम संसद के दोनों सदनों और या विधानसभाओं में विभिन्न मसलों पर उनके वक्तव्यों, उनके दर्ज भाषणों और उनके हस्तक्षेपों के साथ-साथ स्पेशल मेंशन, शून्य काल, और तारांकित प्रश्नों-उत्तरों के माध्यम से उनके कंसर्न को देखने समझने की कोशिश कर रहे हैं. इन सबके अलावा एक लंबा साक्षात्कार भी इस पुस्तक में शामिल किया गया है जिससे उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि से लेकर उनके सामाजिक राजनैतिक और आर्थिक पृष्ठभूमि को समझने में मदद मिल सके.  यह किताब आधुनिक भारत के समाज शास्त्र, राजनीति विज्ञान और इतिहास के शोधार्थियों तथा राजनीति और अपने जन प्रतिनिधि को समझने के लिए आम जन के लिए उपयोगी है.

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प्रसाद काव्य-कोश



डेस्क 
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 प्रसाद काव्य-कोश 
    संपादक : कमलेश वर्मा 
                   सुचिता वर्मा 


‘प्रसाद काव्य-कोश’ छायावाद के महाकवि जयशंकर प्रसाद
की समस्त कविताओं का संदर्भ ग्रंथ है। ‘चित्राधार’ से लेकर ‘कामायनी’ तक को शामिल करते हुए इसमें प्रसाद के नाटकों के गीतों से भी प्रविष्टियाँ ली गयी हैं। प्रसाद के नाटकों में विपुल मात्रा में गीत मौजूद हैं।इसके ‘मुख्य खंड’ में 5875 प्रविष्टियाँ हैं और ‘ब्रजभाषा खंड’ में 729 प्रविष्टियाँ। लगभग 6600 प्रविष्टियों के इस कोश में प्रत्येक प्रविष्टि पाँच कॉलम के साथ है- शब्द, काव्य-पंक्ति, अर्थ, प्रसाद ग्रंथावली का खंड/पृष्ठ संख्या, संदर्भ/स्रोत। परिशिष्ट में प्रसाद की सभी कविताओं की सूची वर्णानुक्रम से दी गयी है। इस सूची में प्रत्येक कविता का प्रकाशन वर्ष और संबंधित पुस्तक का नाम दिया गया है।दूसरे परिशिष्ट में प्रसाद के नाटकों के गीतों की सूची इसी तर्ज़ पर वर्णानुक्रम से दी गयी है। प्रयास किया गया है कि जयशंकर प्रसाद की कविताओं का यह व्यापक संदर्भ-ग्रंथ बन सके।

मूल्य:  सजिल्द: 950 रूपये

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सावित्रीबाई फुले रचना समग्र

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1.               सावित्रीबाई फुले रचना समग्र :
                  संपादक: रजनीतिलक, मराठी से अनुवाद: शेखर पवार

यह किताब 19वीं सदी की उस युगनायिका के लेखन का समग्र संकलन है, जिसे आधुनिक भारत में स्त्री शिक्षा की मशाल जलाने का श्रेय जाता है. पुस्तक में संकलित सावित्रीबाई फुले की रचनायें, उनके विचार पाठकों के विचारोन्मेष के लिए जितने उपयोगी हैं, उतना ही इतिहास, साहित्य और समाजशास्त्र के शोधार्थियों के लिए भी.

मूल्य:  अजिल्द: 160 रूपये
सजिल्द: 350 रूपये

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12वीं की छात्रा ने चलाई मुहीम: बुलेट ट्रेन नहीं सुरक्षित रेलवे दो मोदी सर

मुंबई में हुई भगदड़ ने मुंबई-अहमदाबाद के बीच बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट  के खिलाफ गुस्सा और भड़का दिया है। मुंबई के एक स्कूलल में 12वीं की छात्रा श्रेया चव्हााण ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को याचिका लगाकर ‘हमें बुलेट ट्रेन  नहीं, बेहतर रेलवे चाहिए’ कहा है। शुक्रवार शाम को शुरू की गई पिटीशन पर साढ़े चार हजार लोग साइन कर चुके हैं। 20 सितंबर को एक जूनियर छात्र की लोकल ट्रेन से गिरकर मौत से श्रेया नाराज हैं। उन्हों ने कहा, ”हमने तब (छात्र की मौत के बाद) मामला उठाने का फैसला किया। अगर छात्र ट्रेनों के जरिए कॉलेज नहीं जा पाएंगे तो बुलेट ट्रेन का क्याह मतलब है?” Change.org पर डाली गई पिटीशन में रेल मंत्री पीयूष गोयल और महाराष्ट्र  के मुख्यपमंत्री देवेंद्र फणनवीस को भी संबोधित किया गया है। याचिका में कहा गया है, ”आंकड़ों के हिसाब से कहें तो, मुंबई के ट्रैक्स‍ पर हर दिन नौ लोग जान गंवाते हैं। इन हालात में पैसा मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन पर खर्च करने की बजाय मुंबई लोकल ट्रेनों की हालत सुधारने पर खर्च होना चाहिए।”

श्रेया और उनकी दोस्तो तन्वी म्हा पानकर ने अपने दोस्त की मौत होने के बाद यह मुद्दा उठाने की सोची। आपको बता दें कि मीठीबाई कॉलेज की 17 वर्षीया छात्रा मैत्री शाह की, बोरीवली से दहिसार के बीच लोकल ट्रेन से गिरने के चलते मौत हो गई थी। शुक्रवार (29 सितंबर) को मुंबई के एलफिंस्टोन रोड स्टेेशन पर हुए हादसे के बाद लड़कियों ने इसे लेकर ऑनलाइन मुहिम चलाने की सोची।

मुंबई के पश्चिम रेलवे में एलफिंस्टन रोड स्टेशन पर शुक्रवार सुबह करीब 10 बजे मची भगदड़ में आठ महिलाओं सहित 22 यात्रियों की मौत हो गई और 38 अन्य घायल हो गए। केईएम अस्पताल में शनिवार को एक घायल की मौत के बाद शुक्रवार की भगदड़ में मृतकों की संख्या बढ़कर 23 हो गई है।
इस भगदड़ के बाद, आम जनता और राजनीतिज्ञों की ओर से मुंबई में रोज यात्रा करने वाले 80 लाख से अधिक रेल यात्रियों को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने के बदले महंगी बुलेट ट्रेन परियोजना को प्राथमिकताएं दिए जाने पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की जा रही हैं।

जनसत्ता से साभार 


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लड़कियाँ सड़को पर आईं तो सौ सालों में बीएचयू को पहली महिला प्रॉक्टर (कुलानुशासक) मिली

सामाजिक परिवर्तन का परिणाम, एक सौ एक वर्ष का इतिहास टूटा

अनिल कुमार


सौ सालों में बीएचयू में नियुक्त पहली महिला कुलानुशासक रोयोना भले ही लड़कियों के शराब पीने के अधिकार और मनमुताबिक कपड़े (कथित तंग कपड़े) पहनने की स्वतंत्रता जैसी क्रांतिकारी बातें कर रही हैं लेकिन वहाँ पढने वाली लड़कियां अपनी इस सायंस फैकल्टी पर इसलिए विश्वास नहीं कर पा रहीं कि उनके मुताबिक़ ब्राह्मणवादी पितृसत्ता से संचालित विश्वविद्यालय में कोई पदाधिकारी संकुचित दक्षिणपंथ से अलग हो ही नहीं सकता, महिला हो या पुरुष. हालांकि इस लेख में अनिल कुमार ब्राह्मणवादी पितृसत्ताक विश्वविद्यालय के माहौल में इस नियुक्ति को बदलते बयार की तरह देख रहे हैं, वे बता रहे हैं कि यहाँ लड़कियों की संख्या और अनुपात बढ़े हैं, बढ़ रहे हैं, आन्दोलन, कुलपति,मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री की बेचैनी तथा महिला कुलानुशासक की नियुक्ति इसी बढ़त का परिणाम है. पढ़ें पूरा लेख और रपट.

क्रांतियाँ और जनसंघर्ष कभी बेकार नहीं जाते.बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी (बीएचयू)की स्थापना 1916 में हुई थी.तब से लेकत आज तक वहाँ लड़कियों और महिलायों के साथ एडमिशन से लेकर विभिन्न पदों पर नियुक्तियों में भेद भाव होता रहा है. इसके लिए बहुत हद तक समाज की सोच को जिम्मेवार माना जा सकता है. लेकिन यह यूनिवर्सिटीयों की जिम्मेदारी है कि वह समाज को सकारात्मक दिशा में ले जाने के लिए नई सोच विकसित करे. लेकिन भारत के यूनिवर्सिटी इसमें असफल रहें हैं. यह सिर्फ बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी तक ही सिमित नहीं है. फिर भी हम कह सकतें हैं कि बीएचयू के मठाधीश समाज के अन्दर के परिवर्तन को न तो पहचान सके और न ही लड़कियों पर बर्बर लाठी चार्ज कर उसे रोक सकें.

नवनियुक्त कुलानुशासक रोयोना

भारत के यूनिवर्सिटी अपने ही समाज के अन्दर के बदलाव को नहीं पहचान सके.
समाज के अन्दर सकारात्मक बदलाव का नतीजा था बीएचयू में लड़कियों का एक बड़ा प्रतिरोध प्रदर्शन. भारतीय समाज में आज लड़कियों के प्रति सम्मान और बराबरी का भाव बढ़ा है. यही कारण है कि भारत में लैगिक अनुपात में सकारात्कम बदलाव आया हैं, अर्थात लड़कियों का प्रतिशत बढ़ा है. यह सोच सिर्फ यहीं तक सिमित न रह कर आगे भी जाता है – समाज के सकारात्मक सोच का ही परिणाम है कि पिछले दस सालो में बीएचयू में लड़कियों के संख्या में 131% की बढ़ोतरी हुई है. “द इंडियन एक्सप्रेस” में27.09.2017 को प्रकाशित सरह हफीज की रिपोर्ट के अनुसार लड़कियों के प्रतिरोध प्रदर्शन के लिए लड़कियों का बढ़ता हुआ यही प्रदर्शन जिम्मेवार है. उनके रिपोर्ट के अनुसार 2007-2008 में बीएचयू में7,754 लड़कियों और13,283 लड़को का एडमिशन हुआ जबकि2016 में17,950 लड़कियों और 23,665 लड़कों का एडमिशन हुआ. इस बीच पहले जो कॉलेज सिर्फ लड़को के लिए था उसे लडकियों के लिए भी खोलकर सह-शिक्षा में बदला गया तो दूसरी और कई नए कॉलेज भी खोला गया. अंततःलड़कियों की संख्या और प्रतिशत दोनों में वृद्धि हुई.

सरह हाफिज को बीएचयू रजिस्ट्रार ने बताया कि “… कई अभिभावकों ने अपनी लड़कियों को बीएचयू भेजा क्योंकि उन्हें लगता है कि यह लड़कियों के लिए सुरक्षित जगह है क्योकि जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू)और दिल्ली यूनिवर्सिटी (डीयू) का माहौल ख़राब है … लेकिन इस घटना (लड़कियों पर लाठी चार्ज)के बाद अभिभावक बीएचयू में लड़कियों के एडमिशन कराने से कतारायेंगें.”

आज बीएचयू में ऐसी लडकियां भी पढ़ रही हैं जो अपने घर से पहली बार कॉलेज और यूनिवर्सिटी पढ़ने जा रही है, अगर उसका भाई कॉलेज या यूनिवर्सिटी का मुहन हीं भी देखा हो तब भी. बीएचयू में लड़कियों की संख्या और प्रतिशत में वृद्धि निश्चित रूप से समाज के सकारात्मक सोच का परिणाम है. बीएचयू का प्रशासन इसे नहीं समझ सका .भारतीय यूनिवर्सिटी समाज के बदलाव को पहचानने और उसके अनुसार अपने को ढालने में नाकाम रहें हैं – यही कारण है कि आज भी बीएचयू में शिक्षक और शिक्षकेत्तर क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी को बलपूर्वक रोका गया है.

जब मैं 2014 में जेएनयू पढ़ने आया तब उसके बाद बीएचयू से पढ़े-लिखे लडके-लड़कियों से भी मिला. उन्होंने कहा कि बीएचयू में लड़कियों के साथ सामाजिक रूप से दुर्व्यवहार होता है.जिसमें उनको देखकर फब्तियां कसने से लेकर उनको देखकर अश्लील हरकते करने या इसके इशारे तक शामिल है.

21 सितम्बर 2017, को भी इसी तरह की एक घटना हुई. यूनिवर्सिटी कैंपस में तीन लड़कों ने एक लड़की को सेक्सुअली असॉल्ट किया. इस घटना के बाद लड़कियों ने अपनी सुरक्षा के लिए कुलपति जी. सी. त्यागी से बात करना चाही, उनकी मांग बहुत साधारण थी, सुरक्षा, जो किसी का भी हक़ है. लेकिन उन्होंने बात करने इंकार कर दिया. बाद में वो लड़कियों के हॉस्टल जातें हैं और कहतें हैं “तुमलोगों को इतना हंगामा करने की क्या जरुरत थी? … तुम लोग यूनिवर्सिटी को बदनाम कर रहे हो?” इसके बाद, यूनिवर्सिटी के इशारे पर 23 अक्टूबर 2017 को अपनी सुरक्षा की मांग और सेक्सुअल हरासमेंट के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे लड़कियों पर पुलिस ने बर्बरता पूर्वक लाठीचार्ज किया. इस बर्बर कार्यवाही के बाद अपने एक इंटरव्यू में कुलपति जी. सी. त्यागी कहतें हैं कि “अगर मैं हर एक लड़की की सुनता रहूँ तो यूनिवर्सिटी चलाना मुश्किल हो जाएगा.” इससे भी शर्मनाक यह हुआ कि कुलपति जी. सी. त्यागी को सजा देने के बदले 1000 स्टूडेंट्स पर FIR दायर कर दिया गया और कुछ पुलिस वालो को सस्पेंड कर दिया गया. यह सब हुआ प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में उनकी मौजूदगी में. यह अकारण नहीं हो सकता कि केन्द्रीय यूनिवर्सिटी के बावजूद केन्द्रीय शिक्षा मंत्री ने इसपर कोई बयान नहीं दिया. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने रिपोर्ट मंगवाई, जबकि बीएचयू एक केन्द्रीय यूनिवर्सिटी है और प्राथमिक रूप में यह उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं था.

इसी बीच बृहस्पतिवार 28 अक्तूबर 2017 को निवर्तमान प्रॉक्टर (कुलानुशासक) ओ. एन. सिंह ने लड़कियों पर लाठीचार्ज की नैतिक जिम्मेवारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया. इनके स्थान पर बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी ने रोयोना सिंह (Royona Singh), प्रोफेसर, एनाटोमी विभाग (Anatomy Department), मेडिकल साइंस को प्रॉक्टर बनाया है.उ नका जन्म यूरोप में हुआ है और उनका नाम फ्रांस के एक शहर रोयोना(Royona) के नाम पर है. यहाँ उन्होंने अपना बचपन गुजारा है.
रोयोना सिंह प्रॉक्टर बनने से पहले यूनिवर्सिटी के महिला शिकायत प्रकोष्ट के प्रमुख का पद संभल रही थी, साथ ही वे एनाटोमी विभाग के विभागाध्यक्ष भी हैं. इससे पहले वे डिप्टी-प्रॉक्टर (उप-कुलानुशासक) रह चुकी हैं उन्होंने हिंदुस्तान टाइम्स (28.09.17) को बताया कि “मैं स्टूडेंट्स के साथ संवाद स्थापित करुँगी, प्रत्येक शिकायत को उचित तरीके से देखा और निवारण किया जाएगा. मैं प्रत्येक हॉस्टल को विजिट करके उसके समस्या को जानने का प्रयास करुँगी.”

उन्होंने आगे टाइम्स ऑफ़ इंडिया (29.09.17) को बताया कि “मैं यूरोप में जन्मी हूँ. मैं यूरोप और कनाडा की यात्रा करती रहती हूँ. लड़कियों के पहनावे पर प्रतिबन्ध लगाना उसी तरह से होगा जैसे मैं अपने ही ऊपर इसे थोप रही हूँ. आप सुबह छः बजे से अपना काम शुरू करती हैं, औरसाढ़े दस बजे ख़त्म करती हैं, और अगर आप अभी भी अपने मन का पहनावा नहीं पहन सकते हैं जो आपको सुविधानाजक लगे तब यह इस क्षेत्र के लिए शर्म की बात है. मुझे अजीब लगता है जब लडके इसके लिए ‘तंग कपडे’ शब्द का इस्तेमाल करतें हैं. अगर लड़कियाँ अपने पहनावे में सुविधाजनक महसूस कर रही हैं तो इसमें किसी को क्या दिक्कत है.”

उन्होंने जोर देकर कहा कि यूनिवर्सिटी ने न तो कभी पहले किसी प्रकार कोई प्रतिबन्ध लगाया था और न भविष्य में कोई प्रतिबन्ध लगाने की योजना है. “जहाँ तक ड्रिंकिंग (शराब पीने) का सवाल है, यहाँ जो भी लड़कियाँ हैं सभी 18 वर्ष से ऊपर की हैं, हमें उनपर ऐसी कोई चीज क्यों थोपना चाहिए?” उन्होंने टाइम्स ऑफ़ इंडिया से कहा.
उन्होंने शाकाहार-मांसाहार विवाद पर कहा कि “जहाँ तक मुझे अपने मेडिकल हॉस्टल की जानकारी है,अगर लड़कियों का बहुमत चाहे तो, वहाँ सिर्फ शाकाहारी भोजन दिया जाता है. लेकिन दूसरो के लिए अभी भी विशेष दिन मांसाहार भोजन दिया जाता है.

नये प्रॉक्टर रोयोना सिंह ने वार्डन और सुरक्षा अधिकारी के इस बयान पर खेद जताया जिसमें उन्होंने पीडिता और उसके मित्रो को कहा था कि उन्हें छः बजे के बाद हॉस्टल के बाहर नहीं जाना चाहिए था. रोयोना ने कहा कि “लड़कियाँ किसी भी समय कहीं भी घूम सकती हैं. अभी तक मैं शिकायत समिति के पमुख होने के नाते, मैंने इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए, महिलाओं का सम्मान सुनिश्चित किया है. हम सुरक्षा बल और वार्डन को इन विषयो पर संवेदनशील(sensitise) करेंगें.

रोयोना ने यह भी जोड़ा कि वे छेड़खानी, आवारागर्दी, और आपत्तिजनक प्रदर्शन को रोकने के लिए कड़े कदम उठाएंगी. इसके लिए “सीसीटीवी के लिए खंभे गाड़े जा रहें हैं, साथ ही बड़े कार और ट्राली सभी रास्तो से नहीं जा सकेंगें. बैरिकेटिंग का काम पूरा हो गया है जिससे मोटरसाइकिल तेज नहीं चलाया जा सकेगा. अच्छी लाइटिंग के लिए पेड़ो की छटाई का काम चल रहा है.”
“जहाँ तक महिलायों के मुद्दों का सवाल है, मैं ज्यादा संवेदनशील होउंगी. और महिलायें अपनी समस्यायों को साझा करने में ज्यादा सहज महसूस करेंगी.”

नये प्रॉक्टर ने जो हिंदुस्तान टाइम्स और टाइम्स ऑफ़ इंडिया को बयान दिया है उसके अनुसार कम से कम अभी के लिए तो यह कहा ही जा सकता है कि बीएचयू में बदलाव के साफ़ संकेत देखे जा सकतें हैं. और अब यह संस्थानिक बदलाव की ओर संकेत करतें हैं.बीएचयू में जिस समाज के बच्चे पढ़ने आतें हैं उस समाज में तो सकारात्मक बदलाव आ रहें हैं लेकिन बीएचयू में उसी अनुपात में संस्थागत बदलाव नहीं देखे जा रहें हैं. भारतीय यूनिवर्सिटी अपने ही समाज के बदलाव को देखने-समझने और उसके उसके अनुसार अपने को ढालने में असफल रही है. इसके लिए अपने ही समान मनोविचार वालो की नियुक्ति ज्यादा जिमेदार रही है, जिसके कारण यह अपनी ही संरचना और विचार को दुहराते रहता है. लेकिन जैसे ही इसका वास्ता वास्तविक समाज और अपने संरचना (स्ट्रक्चर) केबाहर वालो से पढ़ता है यह दरकने लगता है. पिछले दस साल में लड़कियों ने नामांकन में 131 प्रतिशत की वृद्धि समाज के इसी परिवर्तन को दर्शाता है. समाज की सोच यहाँ तक गई कि लड़कियाँ सड़क पर उतर गई. रोयोना सिंह के बयान भी इसी परिवर्तन को उधृत करता है.

बीएचयू के एक सौ एक साल के इतिहास में लड़कियों ने जो विद्रोह किया है उसका तत्काल से लेकर दूरगामी सकारात्मक संस्थानिक परिणाम होंगें. इसके दूरगामी परिणाम तो भविष्य के गर्भ में छुपा है लेकिन वर्तमान में हम कह सकतें हैं कि बीएचयू में लड़कियों का विद्रोह भारतीय समाज में हो रहे बदलाव को परिलक्षित करता है. यह समाज बदलाव ही है कि, जनसामान्य ने लड़कियों का ही समर्थन किया है, बनारस, लखनऊ से लेकर दिल्ली तक इनके समर्थन में रैलियां निकाली गई हैं.

लेखक समाजशास्त्र के प्राध्यापक और अध्येता हैं.


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