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बहुजन भारत के शौर्य-मेधा का प्रतीक बनी हिमा दास

स्त्रीकाल डेस्क 


फ़िनलैंड के टैम्पेयर शहर में 18 साल की हिमा दास ने 12 जुलाई को इतिहास रचते हुए आईएएएफ़ विश्व अंडर-20 एथलेटिक्स चैंपियनशिप की 400 मीटर दौड़ स्पर्धा में पहला स्थान प्राप्त किया. हिमा विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप की ट्रैक स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय हैं. किसान परिवार से आने वाली हिमा असम के नौगांव ज़िले की रहने वाली हैं. पिता-माता उनकी कोचिंग का खर्च उठाने की स्थिति में भी नहीं थे. कोच निपुण दास ने उन्हें ट्रेंड किया.

हिमा दास पीटी उषा के साथ

हिमा दास की इस शानदार उपलब्धि की दावेदारी को लेकर हालांकि सोशल मीडिया में बहस छिड़ गयी है. आरक्षण विरोधी और कथित मेरिट के दावेदार हिमा को अपना बता रहे हैं, ब्राह्मण परिवार से बता रहे हैं वहीं कथित मेरिट को अवसर की समानता से जोड़ने वाले आरक्षण समर्थक उसे बहुजन समाज की नायिका बताते हुए मेरिट के मिथ के खिलाफ लिख रहे हैं.

सोशल मीडिया में बहुजन विचारक के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल लिखते हैं: 

क हायपोथिसिस पर विचार करें.
अमेरिका में जब रंगभेद चरम पर था, शासन-प्रशासन, शिक्षा, बिजनेस वगैरह क्षेत्रों में ब्लैक्स को आगे आने से रोका जा रहा था, तो अश्वेत लोगों ने दो क्षेत्रों में खुद को झोंक दिया.
कला-संगीत और खेल.
इन दो क्षेत्रों में अमेरिका में अश्वेत लोगों ने वह कर दिखाया, जिसकी कल्पना भी वहां के श्वेत नहीं कर सकते थे. वहां एक से एक प्रतिभाएं अश्वेतों के बीच से निकलकर आईं और सारी दुनिया पर छा गईं.
अब वहां का सिस्टम अश्वेतों के प्रति पहले से उदार है और एक ब्लैक बराक ओबामा को वहां के श्वेतों ने ह्वाइट हाउस भेजा.
दो सवाल है –
1. क्या भारत में भी यही दोहराया जा रहा है? हिमा दास, दीपा कर्मकार, उमेश यादव, कुलदीप यादव, पा. रंजीत, नागराज मंजुले….लिस्ट लंबी हो रही है.
2. क्या भारत में मुसलमान संगीत, फिल्म और खेल में बेहतर कर रहे हैं, तो इससे मेरी हायपोथिसिस की पुष्टि होती है?

हालांकि इस बीच विकी बायोग्राफी नामक साईट में हिमा दास की जाति बंगाली ब्राह्मण बतायी जा रही है. इसपर तीखी प्रतिक्रया देते हुए आलोक रंजन अपने फेसबुक पेज पर लिखते हैं ‘ब्राह्मणो से नीच और घटिया मानसिकता का इंसान पूरी दुनिया में कोई नही हो सकता, ये देखिये कैसे ब्राह्मण चाल चलते हैं.’

इस बीच एथलेटिक्स फेडरेशन ऑफ़ इंडिया ने हिमा दास के ठीक से अंग्रेजी न बोल पाने पर एक ट्वीट कर दिया , जिसकी चौतरफा निंदा शुरू हुई. बहुजन विचारक और नेता मनीषा बांगर ने इसके खिलाफ एक के बाद एक तंज कसते हुए पोस्ट लिखे. एक पोस्ट में उन्होंने लिखा ‘Mallya और Nirav इतनी रफ्तार से English बोले की 100 करोड़/ मिनिट की स्पीड से भारत को लूट के फ़रार हो गये.’ 

फेडरेशन की चौतरफा निंदा के बाद उसने अपने बयान पर क्षमा मांग ली: 13 जुलाई को ट्वीट कर फेडरेशन ने लिखा : ‘सभी भारतवासियों से क्षमा अगर हमारी एक TWEET से आप आहत हुए है!असल उद्देश्य यह दर्शाना था कि हमारी धाविका किसी भी कठनाई से नहीं घबराती, मैदान के अंदर या बाहर! छोटे से गाँव से आने के बावजूद, विदेश में अंग्रेजी पत्रकार से बेझिझक बात की! एक बार फिर उनसे क्षमा जो नाराज हैं,  जय हिन्द!’

संजय बौद्ध ने लिखा, ‘ये तस्वीर देख के महापुरुषों का एक कथन ध्यान आ गया की – “अछूतो को अगर फटे हुए बांस उठाने का भी अधिकार होता तो शायद ये देश कभी गुलाम नहीं होता…!”


Reservation Is Our Right For Equality नामक फेसबुक पेज से लेकर कई और पेज पर यह लिखा गया: 
दलित समाज की धानुक  जाति में पैदा हुई हिमा दास ने जीता 400 मीटर दौड़ में जीता गोल्ड मैडल। किया भारत का नाम किया रौशन 
हिमा दास, असम के छोटे से गांव की 18 साल की मासूम सी लड़की जिसने आईएएएफ विश्व अंडर-20 एथलेटिक्स चैम्पियनशिप की 400 मीटर दौड़ स्पर्धा में गोल्ड मेडल जीतकर देश का गौरव बढाया है ।
इस इवेंट में देश को पहली बार गोल्ड मेडल हासिल हुआ है। हिमा ने महिला, पुरुष, जूनियर, सीनियर सभी वर्गों में पहली बार वर्ल्ड ट्रैक इवेन्ट में गोल्ड जीता है वो भी 51.46 सेकेण्ड के रिकॉर्ड समय में। 
जो काम अब तक कोई भारतीय नहीं कर पाया वो हिमा ने किया है। 
बहुजन समाज की शेरनी हिमा असम के नगाँव जिले के धींग के पास कंधूलिमरी गाँव से हैं। उसके पिता रोंजीत दास और मां जोमालि चावल की खेती करते हैं। बेहद गरीब परिवार से आने वाली हिमा 6 बहन-भाइयों में सबसे बड़ी है। तमाम मुश्किलों को हराते हुए हिमा ने ये क़ामयाबी हासिल की है।


शाबाश हिमा! तुमने हर आम लड़की के सपने को हिम्मत दी है ।
अब कुछ और लडकियां जिनके सपने आखों में ही मार दिये जाते हैं ऐसे सपने साकार करने के लिए आगे आयेंगी।
?बधाई हिमा ढेरो बधाई?
आरक्षण विरोधियों, ये है बहुजनों की मेरिट।तुम हमारी मेरिट से डरते हो 
जय भीम जय संविधान

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महिला आरक्षण के समर्थन में राहुल गांधी: पीएम को छोड़ सभी जिम्मेवार नेताओं ने अबतक किया समर्थन

स्त्रीकाल डेस्क 

राहुल गांधी ने अपने ट्वीट के जरिये पीएम मोदी से कहा है कि वह संसद में महिला आरक्षण बिल लाएं, कांग्रेस उनका पूरा समर्थन करेगी. कांग्रेस इस संबंध में प्रेस कांफ्रेंस कर चिट्ठी जारी करने वाली है.

भाजपा ने स्वयं महिला आरक्षण बिल को अपने घोषणापत्र का हिस्सा बनाया था, लेकिन बहुमत के बावजूद इसे पास कराने का कोई कदम अबतक नहीं उठाया है, कारण है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस पर चुप्पी. हालांकि इस बिल के समर्थन में अबतक पूर्व राष्ट्रपति, प्रणव मुखर्जी, सोनिया गांधी, वेंकैया नायडू और अब राहुल गांधी ने आवाज उठायी है. 20 सितंबर 2017 को पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिखकर लोकसभा में महिला आरक्षण बिल को पास करने का निवेदन किया था. पिछले साल कांग्रेस ने शीतकालीन सत्र के दौरान देश के अलग-अलग राज्यों से संसद और विधानसभा में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण के समर्थन में 33 लाख हस्ताक्षर जमा किए थे. बड़ी- बड़ी कागज की पेटियां लेकर देश के अलग-अलग प्रदेशों से महिला कांग्रेस की कार्यकर्ताओं और नेता दिल्ली पहुंचीं थीं. महिला कांग्रेस के पदाधिकारियों और सदस्यों ने 33 लाख हस्ताक्षर जमा करने का दावा किया था.

यह भी पढ़ें : सोनिया गांधी का मास्टर स्ट्रोक: महिला आरक्षण के लिए लिखा पीएम मोदी को खत

राहुल ने कहा है कि संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण मिलना चाहिए।  बता दें कि महिला आरक्षण विधेयक पिछले काफी समय से लटका है। 1996 में तत्कालीन पीएम एच. डी. देवगौड़ा के कार्यकाल में इस बिल को संसद में पेश किया गया था। 2010 में राज्यसभा में पास होने के बाद यह बिल लोकसभा में पास नहीं हो सका। वर्ष 1993 में संविधान में 73वें और 74वें संशोधन के जरिए पंचायत और नगर निकाय में एक तिहाई सीटों को महिलाओं के लिए आरक्षित किया गया था। स्त्रीकाल में पढी जा सकती है इस बिल पर अब तक हुई पूरी बहस. हमने प्रिंट में इस पर एक अंक भी प्रकाशित किया है. लेकिन सवाल राहुल गांधी से भी है कि वे आरक्षण के भीतर आरक्षण यानी दलित-आदिवासी और पिछड़ी जाति की महिलाओं के लिए आरक्षण के साथ इस बिल पर मानस क्यों नहीं बनाते?

इन्हें पढ़ें: सारे दल साथ -साथ फिर भी महिला आरक्षण बिल औंधे मुंह : क़िस्त सात
  महिलाओं द्वारा हासिल प्रगति ही समुदाय की प्रगति: डा. आंबेडकर
           आरक्षण के भीतर आरक्षण के पक्ष में बसपा का वाक् आउट : नौवीं क़िस्त

स्त्रीकाल के महिला आरक्षण अंक को  पढ़ने के लिए क्लिक करें : महिला आरक्षण 

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दलित छात्राओं को ब्लैकमेल करते रजिस्ट्रार का ऑडियो आया सामने : हिन्दी विश्वविद्यालय मामला

बलवंत ढगे

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार (इन चार्ज) कृष्ण कुमार सिंह मुसीबत में फंस सकते हैं. दरअसल स्त्रीकाल के पास उपलब्ध उनकी बातचीत का एक ऑडियो उनके द्वारा, विश्वविद्यालय प्रशासन और जिले की पुलिस द्वारा दलित छात्राओं के साजिशन उत्पीडन और निलम्बन को पुष्ट करता है. वे बातचीत में छात्रा पर दवाब डालते हुए शादी का झांसा देकर यौन उत्पीडन करने के आरोपी को बचाने की कोशिश कर रहे हैं. रजिस्ट्रार अपने इस कृत्य से न सिर्फ एक अपराधिक साजिश कर कई छात्राओं के करिअर के साथ खिलवाड़ की अपनी और कुलपति की कोशिश का खुलासा कर रहे हैं बल्कि अपने विरुद्ध महिला उत्पीडन और एट्रोसिटी एक्ट की धाराओं के तहत कार्रवाई भी आमंत्रित कर रहे हैं. वे बातचीत में छात्रा पर दवाब डालते हुए शादी का झांसा देकर यौन उत्पीडन करने के आरोपी को बचाने की कोशिश कर रहे हैं. वे छात्रा को कह रहे हैं कि ‘तुम लिख कर दे दो कि चेतन का निलम्बन वापस लिया जाये तो तुम्हारा भी वापस हो जाएगा.’इस मामले में जिले की पुलिस अधीक्षक निर्मला देवी ने कोई भी बात करने से मना कर दिया. ( बातचीत सुनने के लिए रिपोर्ट के बीच में दिया गया वीडियो लिंक क्लिक करें ) 

हिन्दी विश्वविद्यालय का महिला छात्रावास

क्या है पूरा मामला (राजेश सारथी द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति पर आधारित और मीडिया विजिल द्वारा संपादित) 

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा (महाराष्ट्र) प्रशासन ने एक मारपीट की कथित घटना और सम्बंधित एफ.आई.आर. के आधार पर (विभिन्न धाराओं का हवाला देते हुए, जो क्रमश: 143, 147, 149, 312 और 323 हैं ) 5 महिला विद्यार्थियों/शोधार्थियों (04 पीएच-डी., 01 बी.एड.–एम.एड. एकीकृत) को विश्वविद्यालय से निष्कासित कर दिया है। इसके लिए विश्वविद्यालय ने अपने स्तर से कोई जांच कमिटी बनाने कि ज़रूरत भी नहीं समझी। छात्राओं के अनुसार, ’’बिना किसी कमेटी के, न ही प्रोक्टर, न ही छात्र कल्याण अधिष्ठाता और न ही संबन्धित विभाग से कोई पूछताछ की ज़हमत उठायी गयी। घटना वाले दिन दो छात्राओं में से कोई भी परिसर से बाहर ही नहीं गया जिसका पुख्ता सबूत विश्वविद्यालय के सीसीटीवी और हास्टल का आवक-जावक रिकॉर्ड है।”

विश्वविद्यालय प्रशासन से छात्राएं बार-बार अपने गुनाह का सबूत मांगती रही, परन्तु प्रभारी रजिस्ट्रार ने दस दिन घुमाया और बाद में कहा कि कुलपति महोदय ने कोई भी जानकारी देने से मना किया है। जब छात्राओं ने अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने की बात कही तो वे बोले- ये मामला विश्वविद्यालय के बाहर का है। जब छात्राओं के अभिभावकों ने कुलपति एवं कुलसचिव से बात करनी चाही कि बिना किसी कमेटी गठन के निष्कासन कैसे किया, तो कुलपति ने कोई बात सुनने से इंकार कर दिया और पीड़ित छात्राओं को अपना पक्ष रखने का मौका तक नहीं दिया। दिलचस्प है कि न तो घटनास्थल विश्वविद्यालय की परिधि में आता है और न ही शिकायतकर्ता का संबंध इस विश्वविद्यालय से है।

मामला चेतन सिंह बनाम ललिता का है। दोनों दिल्ली के निवासी हैं और हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के छात्र हैं। ललिता बी. एड.–एम. एड. एकीकृत की छात्रा है जबकि चेतन सिंह हिंदी एवं तुलनात्मक साहित्य विभाग का पीएच-डी. शोधार्थी है। दिनांक 29/12/2017 को ललिता, पिता हेतराम ने चेतन सिंह पर यौन शोषण का आरोप लगाते हुए आईपीसी की धारा 376, 323, 506, 417 के तहत स्थानीय राम नगर पुलिस स्टेशन, वर्धा में मामला दर्ज कराया। इस केस में विश्वविद्यालय की चार लड़कियां आरती कुमारी, विजयालक्ष्मी सिंह, कीर्ति शर्मा, शिल्पा भगत पीड़िता के गवाह थीं। हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा ने चेतन सिंह को यौन शोषण के आरोप में विश्वविद्यालय के महिला सेल के सिफारिश पर निष्कासित कर दिया। कुछ दिन बाद आरोपी चेतन सिंह को कोर्ट से इस शर्त पर जमानत मिल जाती है कि जमानत के बाद पीड़िता व गवाहों को किसी प्रकार से परेशान नहीं करेंगे। इसके बाद आरोपी चेतन सिंह विश्वविद्यालय के महिला छात्रावास के निकट ही पंजाब राव कॉलोनी में अपनी पत्नी सोनिया के साथ किराए पर रहने लगा और पीड़िता के साथ-साथ गवाहों को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करने का प्रयास करने लगा।

एक्टिंग रजिस्ट्रार के के सिंह

इसी दौरान दिनांक 03/05/2018 की संध्या को पीड़ित छात्रा ललिता के साथ हाथापाई होती है जिसमें दोनों पक्षों को चोट आती है। घटना के तुरंत बाद चेतन सिंह रात 8:00 बजे अपनी पत्नी सोनिया सिंह के साथ रामनगर पुलिस थाना में जाकर ललिता के खिलाफ एनसीआर दर्ज कराता है जिसमें धारा 504, 506 के तहत आरोप लगाए जाते हैं। ललिता भी विश्वविद्यालय के महिला छात्रावास के कर्मचारी, गार्ड, केयरटेकर तथा 3 महिला मित्र के साथ रामनगर थाने जाकर चेतन सिंह के खिलाफ धारा 324 के तहत केस दर्ज कराती है। दिनांक 08/05/2018 को चेतन सिंह की पत्नी सोनिया सिंह द्वारा हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा को लिखित शिकायत पत्र दिया जाता है जिसमें केस की पीड़िता पक्ष की 4 मुख्य गवाहों के नाम शामिल कर आरोप लगाए गए कि 4 गवाह और पीड़िता (ललिता) ने चेतन सिंह व उसकी पत्नी के साथ मारपीट की जिससे उसका गर्भपात हो गया। इस मामले में सेवाग्राम से बनी एक मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर 07/06/2018 को एफआईआर दर्ज की गई। एन.सी.आर. में पीड़िता के अलावा किसी का भी नाम नहीं था लेकिन बाद में एफआईआर में चार अन्य नाम जोड़ दिया गया।

इसी बीच रामनगर थाने के पी.एस.आई. सचिन यादव द्वारा पीड़िता को धमकाया भी जाता है। रामनगर थाने का  पी.एस.आई. सचिन यादव पीड़िता और उसके साथ के गवाह के अभिभावक को धमकी देता है कि “5 लड़कियों की पीएच-डी. खत्म करवा दूँगा और सब को जेल कराऊँगा”। पी.एस.आई. का यह रवैया देखकर पीड़िता (ललिता) ने इसकी शिकायत नागपुर आईजी से की। आई. जी. ने मामले को तुरंत संज्ञान में लेते हुए वर्धा एस.पी. से जांच प्रक्रिया शुरू करवाई। 6 जुलाई 2018 को आरोपियों के बयान दर्ज़ कराए गए। उसी दिन 6 जुलाई 2018 को एफआईआर को आधार बनाते हुए विश्वविद्यालय द्वारा 5 लड़कियों को बिना किसी प्राथमिक जांच किए निलंबित कर दिया गया।

इस मामले की जांच सिटी एस.पी. वर्धा की देखरेख में आई.जी. नागपुर के अधीन चल रही है। आई.जी. की जांच प्रक्रिया पूरी हुए बगैर इन पाँच छात्राओं को विश्वविद्यालय द्वारा निष्कासित किया गया है जो कि असंवैधानिक है। यह मुंबई न्यायालय के आदेश क्रमांक 9889/2017 का खुला उल्लंघन है जिसमें साफ-साफ लिखा है कि किसी पर भी एफआईआर दर्ज होने के कारण विद्यार्थियों के शिक्षा लेने के संवैधानिक अधिकार का हनन करने का अधिकार किसी संस्था के पास नहीं है।

साजिश का खुलासा 

सामाजिक कार्यकर्ता और आरपीआई के विदर्भ महासचिव अशोक मेश्राम कहते हैं, ‘इस पूरी बातचीत से यह स्पष्ट होता है कि विश्वविद्यालय प्रशासन यौन उत्पीड़न के आरोपी छात्र के पक्ष में मिलकर पांच छात्राओं को प्रताड़ित कर रहा है. यही नहीं पुलिस भी इस प्रसंग में मिली हुई है. क्या कारण है कि मामले की जांच करने वाला पुलिस अधिकारी और रजिस्ट्रार दोनो ही छात्रा को डरा रहे हैं, ब्लैकमेल कर रहे हैं. आम तौर पर ऐसे मामले में दलित आरोपी के साथ प्रशासन कभी खड़ा नहीं होगा लेकिन व्यवहार में महिला विरोधी प्रशासन दलित पीडिता के खिलाफ काम कर रहा है. शिकायतकर्ता और गवाहों पर दवाब बनाने की कोशिश कर रहा है.’ मेश्राम आगे कहते हैं कि ‘ इस पूरे मामले में 5 छात्राओं का निलम्बन और उनपर मुकदमा एक सामूहिक साजिश की ओर इशारा करते हैं.’ दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास के प्राध्यापक और जनता दल लोकतांत्रिक के राष्ट्रीय सचिव रतन लाल कहते हैं कि छात्रा और गवाहों पर दवाब बनाना अपराधिक कृत्य है, कार्रवाई होनी चाहिए. सूत्रों के अनुसार विश्वविद्यालय के कुछ विद्यार्थी इस मामले में कानूनी कार्रवाई के लिए कुलपति और मानव संसाधन विकास मंत्रालय को लिख सकते हैं और हर संभव कानूनी कदम उठा सकते हैं. हालांकि के के सिंह से जब इस प्रसंग में सम्पर्क किया गया तो उन्होंने बिना ऑडियो सुने  कहा कि मैंने कोई बात नहीं की है, मेरी आवाज नहीं है ऑडियो में.

बलवंत ढगे टाइम्स ऑफ़ इंडिया के वर्धा संवाददाता हैं. संपर्क: 9890513257

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काली मॉडल रिनी कुजूर का प्रसिद्धि-पूर्व संघर्ष : रंगभेद का भारतीय प्रसंग

ज्योति प्रसाद

 शोधरत , जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय. सम्पर्क: jyotijprasad@gmail.com  


छत्तीसगढ़ के एक गाँव की लड़की रातोरात इन्टरनेट पर छा गई है. इसकी वजह बहुत बड़ी और खास है. रिनी नी कुजूर नामक इस खालिस भारतीय मॉडल को देखकर लोग दंग हैं. लोग उनकी तुलना बारबेडियन अंग्रेज़ी पॉप गायिका रिहाना से कर रहे हैं. उनकी शक्ल काफी हद तक एक  दूसरे से मिलती भी है. रिनी कुजूर ने अपनी इन्स्टाग्राम प्रोफाइल पर अपना नाम रिहाना से मिलता जुलता रखा है. दोनों में नैन नक्श की समानता के अलावा एक और समानता भी है. दोनों के रंग एक जैसे हैं. अंग्रेज़ी गायिका रिहाना की लोकप्रियता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनको इन्स्टाग्राम पर 64 मिलियन लोग फॉलो करते हैं. यह संख्या हैरान कर देती है. उनका एक गीत जो ‘अम्ब्रेला’ नाम से मशहूर है, को यूट्यूब पर 40 करोड़ से भी अधिक लोग देख चुके हैं. यह आंकड़ा जादुई नहीं बल्कि हकीक़त है. ठीक इसी तरह एक अन्य गायिका बियोंस नोवेल्स को इन्स्टाग्राम पर ही 116 मिलियन लोग फॉलो करते हैं. बात माइकेल जैक्सन की हो, रिहाना की हो, बियोंस की हो या फिर बॉब मार्ले की सभी का एक ही रंग है- काला! रिनी कुजूर का भी यही रंग है. और यह भी एक अच्छी वजह है कि वे आज भारतीय मिडिया में चर्चा का विषय बन चुकी हैं.

अपने नैन नक्श के रिहाना से मिलने जुलने के कारण इन्टरनेट पर छा जाने वाली रेनी कुजूर का रंग अचानक से कई अख़बारों और ऑनलाइन मीडिया वेबसाइट पर प्रमुखता से चमक रहा है. उनका इस तरह से रातों रात चर्चा में आ जाना खास भी है. भारत जैसे देश में जहाँ बात-बात में रंग को लेकर भेदभाव होता है वहीं उसी देश में रेनी अपने इसी रंग के साथ धूम मचा रही हैं. अख़बारों में उनके ऊपर खास रिपोर्ट लिखी जा रही हैं. उनकी तरह-तरह की तस्वीरें छप रही हैं. लोग उनको गूगल पर सर्च कर रहे हैं. लोग उनके बारे में हर तरह की जानकारी जानना चाह रहे हैं. एक ओर उनकी तस्वीर है तो बगल में रिहाना की. ऊपर मोटे मोटे अक्षरों में लिखा गया है- (Meet Indian Rihanna!) मिलिए भारतीय रिहाना से!

रिनी कुजूर



इसे भी पढ़ें : अगर सांवली रात खूबसूरत है तो सांवला चेहरा कैसे बुरा हो सकता हैं?

हालाँकि अभी यह शुरुआत है. रिनी के लिए मॉडल बनने का यह सफ़र आसान नहीं रहा. यह देश इंग्लैंड नहीं है जहाँ नओमी कैम्पबेल जैसी मॉडल का अपना एक रूतबा है. जब वह रैंप वॉक करती हैं तो लोगों की तालियाँ उनका स्वागत करती हैं. पर भारत में ऐसा नहीं होता. नओमी आज 48 साल की हो चुकी हैं पर अभी भी उनका जलवा कायम है. रिनी कुजूर में नओमी का भी अक्स देखा जा सकता है. हमारे देश में जाति, धर्म, अमीरी-गरीबी का भेदभाव तो है ही साथ ही रंग से जुड़ा भेदभाव भी जड़ों तक फैला हुआ है. ऊपर से रिनी का छतीसगढ़ जैसे प्रदेश से होना जो अधिकतर मामलों में पिछड़ा हुआ प्रदेश बताया जाता है, साथ ही उनका आदिवासी होना भी. अख़बारों में उनके दिए गए इंटरव्यूज़ में उन्होंने बताया भी है कि बचपन से लेकर आज तक के संघर्ष में लोगों ने उनके काले रंग को लेकर मजाक बनाया है. अंग्रेज़ी भाषा पर बेहतर पकड़ न होने के चलते और गहरे रंग को देखकर उनको काम का मौका ही नहीं मिलता था. कई जगह काम देने से मना कर दिया जाता था. कई बार मेकअप करने वाले लोग उनके रंग को लेकर तंज कस दिया करते थे. उनके पास ऐसे ढेरों उदाहरण हैं जहाँ वह बतलाती हैं कि रंग को भारत में किस तरह से देखा जाता है.

पर उनके अनुभवों से यह साफ़ हो जाता है कि हमारे यहाँ के लोग गोरे रंग को लेकर किस हदतक पागल हैं. हमारी नस्ल काकेसियन नहीं है. हम काले वर्ण की कतार में आते हैं. भारत एक गरम देश है. हमारे यहाँ के लोगों में यूरोपियन लोगों की तरह सफ़ेद रंग में तब्दील हो जाने की गज़ब की चाहत है. यहाँ के फ़िल्मी सितारे खुद गोरा बनाने वाली क्रीम का जोरशोर से प्रचार करते हैं. यहाँ तक कि शाहरुख़ खान खुद मर्दों वाली क्रीम बेचते हैं. उनके विज्ञापन के मुताबिक यह क्रीम लड़कों ‘मर्दों’ को इस्तेमाल करनी चाहिए क्योंकि यह लड़कियों पर इम्प्रेसन डालने के लिए अच्छा उत्पाद है. लेकिन उन्हें यह भी सोचना चाहिए कि जब वे अपनी रा-वन फिल्म बना रहे थे तब ‘छमक-छल्लो’ गीत एक काले विदेशी गीतकार एकॉन से क्यों गवाया? ये फ़िल्मी सितारे तो ज्यादा नहीं सोच पाते. यह लोगों को सोचना चाहिए कि वे क्यों अन्धे होकर इन्हें फॉलो करते हैं. हाल-फिलहाल में आलिया भट्ट, यमी गौतम, हृतिक रोशन, शाहरुख़ खान, दीपिका पादुकोण, जॉन अब्राहम आदि फ़िल्मी कलाकार गोरापन बेच रहे हैं. इस हद तक रंग से जुदा भेदभाव खुलेआम दिखता है. भारत में गोरा बनाने वाली क्रीम का कारोबार करोड़ों में है. टीवी पर हर दूसरा तीसरा विज्ञापन इन्हीं कंपनियों का है.

टीवी पर हर दस मिनट में फेयर एंड लवली क्रीम का प्रचार करने वाली अभिनेत्री यमी गौतम बार-बार भारतीय दर्शकों और आम लोगों को रंग साफ़ करने का लगभग आदेश देती हैं, पर खुद अपने सोशल साईट इन्स्टाग्राम पर बियोंस नोवेल्स, जेनिफ़र लोपेज़ और प्रियंका चोपड़ा जैसी शख्सियतों को फॉलो करती हैं. यह उनके व्यक्तित्व का दोहरापन है. एक तरफ उनको भारतीय काले रंग के लोगों मरीज लगते हैं दूसरी तरफ वे बियोंस जैसी गायिका को फॉलो करती हैं. युवा होती लड़कियों को यमी गौतम की बजाय रिनी कुजूर को फॉलो करना चाहिए जिसने अपने इस रंग और तमाम रुकावटों के बाद भी अपना हौंसला नहीं छोड़ा. आज दुनिया उन पर चर्चा कर रही है. उनकी खूबसूरती पर कसीदे कहे जा रहे हैं.

रिहाना

भारतीय जनता पार्टी के एक नेता हैं तरुण विजय. पिछले साल अफ़्रीकी मूल के लोगों पर लगातार भारत में होते हमले पर उन्हें अल जजीरा चैनल ने चर्चा के लिए बुलाया था. तभी वे एक ऐसी बात बोल गए जिससे बखेड़ा खड़ा हो गया था. उन्हों ने कहा- “अगर हम नस्लीय होते तो दक्षिण भारत के लोगों के साथ क्यों रहते? आप जानते हैं न उनके बारे में…तमिल, केरल, कर्णाटक और आन्ध्र प्रदेश. हम उनके साथ क्यों रहते फिर. हमारे यहाँ चारों तरफ काले लोग हैं.” (बीबीसी की रिपोर्ट) इस बयान के बाद लोगों ने सोशल मिडिया पर जमकर आलोचना की और यहाँ तक कहा गया कि उन्हें दक्षिण भारत में घुसने न दिया जाये. यह बयान एक राजनितिक सत्तारूढ़ दल के प्रतिनिधि की तरफ से आया. लेकिन कहीं न कहीं इसमें व्यक्तिगत सड़ी हुई मानसिकता की बू भी आती है. इसलिए जब रिनी कुजूर जैसे संघर्ष करने वाले लोग इस माहौल और मानसिकता में अपनी एक जगह बनाते हैं तब उनकी उपलब्धियों  को कम कर के नहीं आंका जा सकता.

स्कूल की शिक्षा में बताया गया कि आर्य का एक मतलब गोरा रंग होता है. फिल्मों की नायिका को काला होने का हक नहीं. वह तो गुंडे अथवा खल पात्रों की संपत्ति है. काले रंग को कुछ इस तरह से साहित्य से लेकर घर तक के माहौल में परिभाषित कर दिया गया है कि हम इसके आदि बन चुके हैं. इस रंग के इर्द गिर्द सलीके से एक घटिया सोच विकसित कर दी गई है. जब 2016 में नवम्बर महीने में नोटबंदी हुई तब एक शब्दावली ‘काला धन या ब्लैक मनी’ का खूब इस्तेमाल किया गया. गौर से शब्दों की बिसात जो भाषा में बिछी है, उसे समझें तो एक पल को अपनी भाषा के ऊपर सोचने का मन हो आएगा. कैसी भाषा है!

जिसे हम काली कमाई पुकारकर गला खराब कर रहे थे वास्तव में वह कमाई तो है पर काली नहीं बल्कि अवैध या गैर कानूनी आय है। कई दफा एक शब्दावली सुनी होगी- ‘आय से अधिक संपत्ति.’ वास्तव में यही सही शब्दावली है. लेकिन हमने काले शब्द को जबरन इस्तेमाल करना शुरू कर दिया क्योंकि हमारे देश के पॉपुलर मंत्री इस शब्द का बिना सोचे समझे इस्तेमाल करते हैं. असल में इस गलत ढंग से कमाई गई आय को अवैधानिक आय कहकर पुकारा जाना चाहिए.

इस बात पर भी गौर करना जरूरी है कि हम कितनी अपनी भाषा बोलते हैं और कितनी दूसरों की नक़ल करते हैं. जो जुबान हमें दी गई है हम उसी में सोचते और बोलते हैं. हमारी खुद की कोई तर्कशील भाषा नहीं दिखती. उधार के शब्द लेकर हम अपनी रोज़मर्रा ढोते हैं. बच्चों की भाषा को गौर से सुने तो पाएंगे की स्कूल जाने के बाद वह अधिक भेदभाव वाली बन जाती है. यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो दिखती नहीं पर असर साफ़ समझ आता है.
भाषा आज के दौर में परोसी जाती है. घर में दरवाजे के नीचे से सुबह सुबह 16 से 17 पन्नों वाला अखबार हो या फिर टीवी में चलते कार्यक्रम, दफ्तर की धूल खाती फाइले हों या फिर सब्जी तरकारी खरीदने तक की प्रक्रिया में एक ज़ुबान चुपके से बैठी होती है. कहीं फुर्सत नहीं है दिमाग को खुद की भाषा के वाक्य रचने की. जो ज़्यादा देखा-सुना वही बार बार जीभ से संचालित होने लगता है. बनाई जा रही व्यस्त दिनचर्या सोचने की प्रक्रिया को रोक रही है और हम दिन पर दिन नक़ली होते जा रहे हैं. हम कभी बैठ कर यह नहीं सोचते कि  त्वचा का रंग आखिर क्यों इतना मायने रखता है? रंग के ऐसा होने की क्या वजहें हैं? गोरे होने की जरुरत क्यों है? काले रंग को इतने बड़े पैमाने पर क्यों ख़राब बताया जा रहा है? ऐसे सवालों के बारे में हम कभी सोचते ही नहीं.
सभी रंग को सोखने के बाद ही काला रंग पनपता है.  काला रंग विपरीत या किसी रंग का विलोम नहीं है. यह सफ़ेद रंग का दुश्मन नहीं है. वास्तव में यह रंग बाकी रंगों की तरह ही एक रंग है। बाज़ार और महान संस्कृति के पोषकों ने इसे एक हद तक नकारात्मक चोला पहनाया हुआ है. इसे अंधेरे से जोड़ा जाता है. अपशगुन का तमगा पहनाया जाता है. सामाजिक धब्बा कहा जाता है. इतना ही नहीं काली शक्ति जैसे शब्द से उन नकारात्मक रूहानी ताक़तों से जोड़ा जाता है जो हमारी दुनिया से परे हैं. अमावस की रात का ज़िक्र भी लगभग कुछ ऐसा ही है. रहस्य का रंग भी यही है. कई लोगों को देखा जा सकता है कि वे पैरों में काला धागा बांधकर रखते हैं या फिर गले में काली माला पहनते हैं कि किसी की नज़र नहीं लगे. नज़र क्या है-काली और बचाव भी काले रंग के धागे से किया जा रहा है. मौजूदा दौर में हम अपनी पीढ़ी को भी ऐसे अन्धविश्वास विरासत के रूप में दे रहे हैं जबकि कोशिश यह होनी चाहिए कि उन्हें समानता और वैज्ञानिक नजर दी जाती.

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बहुत हद तक इस रंग के आसपास घूमती यह बिल्कुल नयी विचारधारा नहीं है. लंबे समय से इसकी बुनाई होती रही है। यही वजह कि अब हमारे दिमाग में काले रंग से जुड़ी छवियाँ अलग थलग हैं. अमूमन हम इन छवियों को काले रंग में रंग देते हैं या फिर हिकारत की नज़र से देखते हैं. धर्म से लिपे-पुते इस देश में हर रंग का अपना मजहब है. हिन्दू या मुस्लिम, सभी के अपने खास रंग हैं और उनका महत्व है. लेकिन ऊपरी नज़र डालने पर काला रंग फिर से बिना कुर्सी के रह जाता है. अब कुछ परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं. इस रंग का अपना एक मुकाम विकसित हो चुका है. अपने पहनावे में लोग इस रंग को जगह तो ही रहे हैं साथ ही साथ इस रंग से जुड़े झूठी कहानियों से बाहर आ रहे हैं.

रिनी कुजूर

 नोटबंदी की घटना ने इस रंग के आगे एक गतिरोधक बना दिया था. हर ज़ुबान पर काला धन या काली कमाई जैसा शब्द फेविकोल से चिपका दिया गया था. इसने अंबुजा सीमेंट सी मजबूती दिखाई दे रही थी. वास्तव में यह रंग उतना अनलकी नहीं जितना सोचा जाता है. कम से कम रिनी कुजूर को देखकर जिस खूबसूरती की समझ बनती है उसे अपनी सोच में शामिल करने की हर किसी को जरुरत है. रिनी जैसे लोगों को कल्पनीय आदर्शों से जो कलेंडर में धुप बत्ती का धुआं सूंघते हैं कि जगह रिप्लेस करने का सोचा जा सकता है.

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जातिरूढ़ सास ‘अनारो’ की भूमिका में मैं अपनी सास को कॉपी कर रही हूँ





स्टार भारत का लोकप्रिय धारवाहिक ‘निमकी मुखिया’ अपनी ड्रैमेटिक सीमाओं के बावजूद ग्रामीण समाज की जाति व्यवस्था और महिला मुखिया के संघर्ष पर बना तुलनात्मक रूप से एक बेहतरीन धारवाहिक है. ‘निमकी मुखिया में ‘अनारो’, दलित नायिका की उच्च जाति की सास, की भूमिका कर रही गरिमा सिंह ने ‘स्त्रीकाल’ से बातचीत करते हुए अपनी इंडस्ट्री, समाज की जाति व्यवस्था, स्त्रियों की स्थिति, खुद सहित अन्य अंतरजातीय विवाहों की मुश्किलों, वर्तमान समय के संकीर्ण हालात तथा खुद के बारे में बेवाक राय रखी. धारवाहिक की अक्खड़, जातिग्रस्त, सामंती मूल्यों में जकड़ी और अनपढ़ ‘अनारो’ की भूमिका कर रही गरिमा की बौद्धिकता और आधुनिक चेतना काबिले तारीफ़ है: स्त्रीकाल के लिए बातचीत संजीव चन्दन ने की है. 

गरिमा सिंह

गरिमा आप एक लोकप्रिय धारवाहिक में महत्वपूर्ण भूमिका कर रही हैं, जिसकी पृष्ठभूमि बिहार के मधुबनी जिले की ग्रामीण व्यस्था है, वहां फैला जातिवाद और स्त्रीविरोधी चेतना, बधाई! इस इंडस्ट्री का अपना अनुभव शेयर करें और इस धारवाहिक से जुड़ने की कहानी भी…
मैं 2005 से इस इंडस्ट्री में हूँ. मैंने शुरुआती दौर में कुछ कॉमेडी किये, कुछ दूसरे किस्म के एपिसोडिक किरदार किये. मेरी बेटी हुई और जब मैं दुबारा काम में वापस लौटी तो मुझे माँ का किरदार ऑफर हुआ-2011 में. तब मैं 30 साल की थी. ‘छोटी बहू’ के दूसरा भाग से शुरुआत हुई, उसके बाद ‘फिर सुबह होगी’. ‘फिर सुबह होगी’ बेड़ियों पर आधारित कहानी थी, जिसमें मैंने एक ‘मामी’ का किरदार किया. लाइफ ओके पर एक और सीरियल में माँ का किरदार किया. अब तक मैं निगेटिव भूमिकाएं करती थी, यहाँ मेरी भूमिका पॉजिटिव थी. उस किरदार को लोगों ने काफी पसंद किया. और अब जमा हबीब साहब द्वारा लिखित ‘निमिकी मुखिया’ में निमकी की सास की भूमिका कर रही हूँ. जमा हबीब साहब से मैं सोशल मीडिया-फेसबुक पर जुडी थी, उनकी सोच से प्रभावित थी और वह मुझसे मिलती भी थी. हबीब साहब कमाल के लेखक हैं, उनके साथ काम करना काफी महत्वपूर्ण है. इमोशनल लेबल पर वे बहुत अच्छा काम करते हैं, हालांकि निमकी मुखिया में इमोशन से ज्यादा ड्रामा है. लेकिन इस धारवाहिक में न्यूआन्सेज को पकड़ने और पेश करने की लेखक की काबिलियत से आप जरूर प्रभावित होंगे. इस प्रोजेक्ट से जुड़ने के पहले मैं बनारस की विधवाओं पर केन्द्रित एक कहानी में माँ का किरदार कर रही थी.

अनारो

हाँ, इस सीरियल की कुछ सीमाओं के बावजूद मैं कहूंगा कि यह अन्य धारवाहिकों से एकदम अलग है, और इसीलिए मेरे जैसा दर्शक भी इसे देखता है. 
अधिकाँश टीवी सीरियल्स के साथ दिक्कत है कि वे बड़े ही फेक पृष्ठभूमि पर होते हैं. वे कहीं भी आपके जीवन से जुड़ते हुए नहीं दिखते हैं. अजीब तरह की कहानी होती है, जिनका निजी जीवन से कोई तालमेल नहीं होता है. मुख्य किरदारों की दो से तीन शादियाँ कर दी जाती हैं. मैं इंडस्ट्री से बाहरी व्यक्ति के तौर पर कहूं तो मैं ऐसे किसी भी सीरियल को देखना पसंद न करूं.


दिक्कत यही है, आप सीरियल्स देखें, काफी लाउड, अतार्किक और महिला-विरोधी होते हैं. हर महिला के कई चेहरे, कई चरित्र…
समस्या ही यह है कि चैनल बैठा हुआ है प्रोड्यूसर के ऊपर. पहले एक दूरदर्शन हुआ करता था. कमलेश्वर जैसे लोग निर्णय की भूमिका में थे. कमलेश्वर की सेंसिवलिटी अलग थी. तब साहित्य ही सोचा जाता था, कहानियाँ जीवन से जुडी होती थीं. गाँव-परिवेश से उनका जुडाव होता था. अब ऐसा नहीं है. लेकिन यहाँ मैं अपने किरदार से खुश हूँ. मेरे किरदार को लेकर बहुत से लोगों के मेसेज आते हैं. वे लोग रिलेट करते हैं खुद को. निमकी मुखिया स्टार भारत का नम्बर वन सीरियल है. हालांकि यह चैनल अपेक्षाकृत नया है. चैनलों की टीआरपी के हिसाब से कलर नम्बर वन पर है, स्टार भारत नम्बर 4 का चैनल है, लेकिन इस सीरियल को देखने वाले लोग अच्छा रिस्पांस दे रहे हैं. ‘निमकी मुखिया’ लोगों को बहुत फेक नहीं दिखता है. हालांकि शुरुआती दिनों में ऐसे कमेन्ट जरूर आते थे कि ‘निमकी मूर्ख क्यों है? वह चीजों को समझ नहीं क्यों सकती है, क्यों वह उसी घर में जाना चाहती है, जहाँ लोग उसे पसंद नहीं करते हैं. हालांकि चीजें अब स्पष्ट भी हो रही हैं, आगे जाकर और स्पष्ट होंगी.

दिक्कत यह है कि इन्डियन सोप ऑपेरा 70 के दशक की फिल्मों से आगे नहीं जा रहा है. फिल्मों में उम्र बरिअर टूट गया है. आज 40 साल की अभिनेत्रियाँ भी लीड भूमिका के साथ फ़िल्में कर रही हैं, जबकि सीरियल्स में 30 की उम्र तक अभिनेत्रियों को माँ की भूमिका के लिए मजबूर किया जाता है. 
दरअसल सीरियल आगे कैसे बढेगा, यहाँ चैनल में बैठे लोग पूछते हैं कि ‘प्रेमचन्द कौन हैं?’ ‘उनका सीवी लेकर आओ’. इससे बड़ा मजाक क्या हो सकता है. अच्छी कहानी करने का माद्दा नहीं है. मैं चैलेन्ज के साथ कह सकती हूँ कि हर सीरियल शुरुआती 10 एपीसोड के बाद एक जैसा मिलेगा-सेट पैटर्न पर. उससे बाहर रिस्क फैक्टर है. प्रोड्यूसर को लेकर चिंता शुरू हो जाती है, उसका दवाब शुरू हो जाता है.  उसके पैसे लगे हैं. हालांकि कम उम्र में माँ की भूमिका में होना काफी चैलेंजिंग भी है एक अभिनेता के तौर पर. मुझे तो दादी भी बना दो तो मुझे अच्छा लगेगा. हालांकि कुछ लड़कियां हैं इंडस्ट्री में जो उम्र के लिहाज से माँ बनना नहीं चाहती हैं.

हाँ लेकिन 30-35 तक लीड भूमिकाओं से हटा दिया जाता है, जबकि अब फिल्मों में 30-35 और उससे ऊपर की लडकियां लीड भूमिका में हैं. खैर, जाति को लेकर आपकी इंडस्ट्री को आप कैसे देखती हैं? 

इंडस्ट्री जाति और रिलीजन से ऊपर है. ये चीजें यहाँ मायने नहीं रखती हैं. रामायण हो, महाभारत हो या महाकाली जैसे सीरियल, उसके ज्यादा से ज्यादा किरदार मुसलमान हैं. कलाकारों की कोई जाति नहीं होती, उन्हें हर किरदार निभाना होता है. मुझे लगता है कि यह कौम ही ऐसा है. हो सकता है पहले ऐसा कभी रहा हो, लेकिन अब तो काफी बदलाव है. हालांकि अभी पिछले पांच साल से विचित्र स्थिति है, अलग माहौल है, फिर भी इसका असर हमारी इंडस्ट्री पर नहीं पड़ा.

शूटिंग के बाद



‘निमकी मुखिया’ की कहानी पर तो आपसब की राय बनती होगी?
शुरुआती दौर में इस पर बात होती थी. जैसे वैसे कलाकार जो बिलकुल शहरों में रहे हैं, मसलन निमकी की भूमिका कर रही भूमिका हो या बब्बू की भूमिका में अभिषेक आश्चर्य करते थे कि ‘ऐसा होता है क्या?’ जिन्होंने गाँव नहीं देखा है, शहरों में रहे हैं उनके लिए यह सब नया है, क्योंकि शहरों में जातिभेद तुलना में कम है. मैं चुकी गाँव से रही हूँ, मैं यह सब समझती हूँ. मैं कायस्थ परिवार की लडकी रही हूँ. मेरे नाना की हवेली थी. मैं देखती थी कि मेरे नाना, नानी वहां बैठे होते तो जो दलित परिवार के लोग उस ओर से गुजरते थे वे चप्पल उठाकर हवेली के एरिया में आते-जाते थे और नाना-नानी को नमस्कार करते. वे अंदर नहीं आ सकते थे. उन्हें बाहर बैठना होता था. इसलिए मैं जानती हूँ कि यह कितना विकट अनुभव हो सकता है. कितना पहाड़ सा अनुभव. यह शहरों के बच्चों को नहीं पता चल सकता है. ऐसी गंदगी उन्हें नहीं पता. मैं उन्हें बताती हूँ कि यह तो कुछ ही नहीं है जो इस सीरियल में दिखा रहे हैं. हो तो बहुत कुछ सकता है, यदि कपड़ा छू जाये, बर्तन छू जाये या शरीर छू जाये तो  कोड़े भी पड़ सकते थे. जमा साहब ने लोगों को बताया अपना अनुभव. हालांकि मैंने ये चीजें तब देखी जब ये ख़त्म हो रही थीं. जब मैंने ऐसा देखा है तो बताइये पहले चीजें कितनी भयावह होंगी. अब ये चीजें फिर से बढ़ रही हैं. हर दिन न्यूज में रहता है कि दलितों को मार दिया गया.

यह सवाल जमा साहब से ज्यादा बनता है कि एक राजनीतिक पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म में दलित नायिका को एकदम से अभिज्ञ किरदार में ढाला गया है, हालांकि हो सकता है वह आगे जाकर ऐसी न रहे
दरअसल यह लिमिटेड एपिसोड्स का सीरियल नहीं है. कई एपिसोड्स में फैला है, इसलिए टीआरपी भी बहुत हद तक कहानी और करेक्टर की गति को प्रभावित करती है. यदि एपिसोड्स लिमिटेड होते तो कहानी और ज्यादा इंटेंस होती.

हालांकि यह भी दिख रहा है कि एक फ्यूडल घर खंड-खंड हो रहा है. 
हाँ, फ्यूडल वर्चस्व को खंड-खंड किया जा रहा है. जमा साहब अपने क्राफ्ट में भी बेहतरीन हैं. उनका हर किरदार दिखता है. इस सीरियल में भी यह है.

बेटी और पति के साथ गरिमा सिंह

अपने बारे में बतायें
मैंने मास्टर्स तक की पढाई इलहाबाद से की है. रिसर्च भी कर रही थी म्यूजिक से, जिसे पूरा नहीं कर पाई. मेरे माँ-पिताजी देवरिया से हैं. पिताजी इलहाबाद में पोस्टेड थे, माँ हाउस मेकर हैं. उन्होंने एमए-एमएड कर रखा है. मेरी माँ की बदौलत ही मैं आगे कुछ कर पायी. वे पढी-लिखी और सुलझे विचारों वाली हैं. पढाई के अलावा मैं जो कुछ भी कर पायी वह माँ की मदद से ही. मेरा समय इलाहबाद में ही गुजरा है, छुट्टियों में गाँव आया-जाया करती थी. हमलोग एक भाई और एक बहन हैं. बड़ा भाई आईएएस है, जम्मू में पोस्टेड है. मैंने पढाई के दौरान ही थिएटर करना शुरू किया. मेरी मुलाकात उन्हीं दिनों विक्रांत- से हुई, जिनकी पत्नी हूँ मैं. वे लोग थिएटर करते थे. वे और उनके भाई. एक म्यूजिकल नाटक के सिलसिले में उनसे मुलाक़ात हुई. मेरे गुरू जी ने उसके लिए म्यूजिक किया था. पहली बार वहीं से मैं थिएटर के बारे में जान सकी. मैं बीच-बीच में प्रोक्सी करने लगी, यानी कोई किरदार निभाने वाला नहीं हो तो मैंने उसकी जगह पर वह कर लिया. वहीं से हमारी दोस्ती डेवलेप हुई. विक्रांत के बड़े भाई शांतिभूषण जी ने मुझे लीड भूमिका में लेकर एक नाटक किया. विक्रांत का परिवार गाजीपुर का है. हालांकि मेरे पिताजी मेरे थिएटर करने के पक्ष में नहीं थे. लेकिन यह संभव हो पाया. दो-तीन साल थिएटर करते हुए विक्रांत के साथ हमारी अंडरस्टैंडिंग अच्छी बनी और फिर हमने शादी कर ली.

अंतरजातीय विवाह?
शादी में जाति एक मुद्दा बना. मैं कायस्थ थी और विक्रांत राजपूत. कायस्थों के लिए कमाई वाली पढाई मायने रखती है लेकिन विक्रांत पढ़े-लिखे तो बहुत थे लेकिन कमाई वाली पढाई नहीं मानी जाती थी वह. माँ चाहती थी कि मेरी शादी डाक्टर इंजीनियर से हो. लेकिन हम जिद्द पर थे, और आखिरकार यह संभव हो पाया. यह 17 साल पहले की बात थी. जाति इलहाबाद जैसे शहर में बहुत मायने रखती थी. लेकिन मेरे ससुर इस मामले में आगे आये. उन्होंने पिताजी को मनाया. हालांकि यह एक बड़ा संकट भी था कि हम दोनो कुछ नहीं कर रहे थे. उसी दौरान हमने आकाशवाणी का फॉर्म भरा और हम आकाशवाणी में चुन लिये गये.

जाति-भेद को तब खुद भी महसूस किया आपने, है न? 
शादी के बाद जाति का दंश हमने लम्बे अरसे तक झेला. विक्रांत के गाँव ने कहा कि हम जाति-बाहर करेंगे. गाजीपुर के उस गाँव में मैंने बहुत कुछ सहा. औरतें आती थीं और मेरा हाथ-पाँव छू-छू कर देखती थीं, मानो यह कोई दूसरे ग्रह से आयी हुई लडकी तो नहीं है न. ससुर मेरे बहुत प्रोग्रेसिव हैं, बहुत ओपन माइंडेड. उनकी वजह से चीजें आसान हो पायीं. घर की महिलाओं की भूमिका मैं कैसे बताऊँ. मेरी सास जो अब मुझे बहुत मानती हैं, तब बहुत स्ट्रिक्ट थीं.

वे पढी-लिखी हैं? 
नहीं बिलकुल नहीं. उनके लिए बड़ी समस्या थी कि वे अपनी जाति से एक लड़की लाना चाहती थीं और उनके घर में एक ऐसी लडकी आकर बैठ गयी थी जिससे वह बिलकुल सहमत नहीं थीं. वे मेरी तरफ देखती भी नहीं थीं.

माँ-पिता के साथ गरिमा सिंह

महिलाएं कास्ट की विक्टिम भी हैं और कास्ट से लोडेड भी. 
बिलकुल, बिलकुल. और मैं बताऊँ मैं कहीं न कहीं अपने सास की कॉपी करती हूँ. वह सब हमने देखा हुआ है, जो निमकी की सास कर रही है. हालांकि समय के साथ उनमें बड़ा बदलाव आया. आज वे मुझे बहुत प्यार करती हैं और यह अहसास भी करती हैं कि उनकी गलती थी. हालांकि मैं उनकी गलती नहीं मानती हूँ. औरतों का दायरा बहुत छोटा है. मेरी सास ने घूँघट से बाहर अपना चेहरा कभी नहीं निकाला. सडक पर चलते हुए कभी उन्होंने घूँघट नहीं उठायी थी. यानी कभी उन्होंने सूरज नहीं देखा होगा. वह रौशनी नहीं देखी होगी, जो दिन के उजाले में होती है. दरअसल महिलाओं की परवरिश ही ऐसी है.

यानी जाति का दंश आपने झेला जबकि आप दलित नहीं थीं. 
हाँ बिलकुल. हमारा समाज अजब है. कहता है कि लडकियों की कोई जाति नहीं होती फिर भी आप भेद भाव करते हैं. औरतों की कोई जाति नहीं होती, घर नहीं होता है.

जाति होती भी नहीं है और जाति उनसे ही सुरक्षित होती है. 
हाँ, कई लड़ाइयाँ लम्बी होती हैं. मैंने इसके लिए बहुत संघर्ष किया है घर के भीतर भी. यहाँ तक कि घूँघट हटाने के लिए. मैंने खूब सवाल किये. सास के पास कोई जवाब नहीं थे. हालांकि विक्रांत और मेरे ससुर ने मेरा बहुत साथ दिया-वह अकेली लडाई मेरे और मेरे सास के बीच थी. आज बदलाव हुआ है.

इंडस्ट्री में सेक्सुअल एक्सप्लॉयटेशन की क्या स्थिति होती है. 
एक्सप्लॉयटेशन होंगे, लेकिन वह दूसरों के अनुभव हो सकते हैं. हालांकि कई मामलों में पीड़ित की इच्छाएं भी काम कर रही होती हैं, अतिरिक्त हासिल की आकांक्षा से प्रेरित. एक्सप्लॉयटेशन जैसी यहाँ है वैसी ही कई संस्थानों में होती है .

संजीव चंदन स्त्रीकाल के सम्पादक हैं 

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यशोधरा को हथियार बनाया गया

अनिता भारती


अनिता भारती साहित्य की विविध विधाओं में जितना लिखती हैं , उतना ही या उससे अधिक सामाजिक मोर्चों पर डंटी रहती हैं  खासकर दलित और स्त्री मुद्दों पर. सम्पर्क : मोबाईल 09899700767.

अनिता भारती का यह लेख साहित्य और साहित्यिक आलोचना में वैष्णव-ब्राह्मणवादी प्रभाव को स्पष्ट करते हुए मैथिलीशरण गुप्त की रचना ‘यशोधरा’ को बुद्ध-विरोधी एजेंडा का काव्य बता रहा है: 

बुद्धकाल में स्त्रियों की स्थिति पर टिप्पणी करते हुए ‘नारी तेरे रूप अनेक’ के संपादक क्षेमचंद्र सुमन पेज न. 41 पर लिखते हैं- “तथागत बुद्ध ने अनेक पीड़ित और दु:खी नारियों को अपमे संघ में दीक्षित कर लिया था। उनके भिक्षुणी संघ में जहाँ अम्बपाली, अड्डाकाशी और विमला जैसी दूषित जीवन बिताने वाली नारियों का प्रवेश था वहाँ उसमें अनेक राजकुमारियों, रानियों और श्रेष्ठिगणों की दुहिताएँ भी थी। ऐसी प्रवज्जित स्त्रियों को बुद्ध पुत्री कहा जाता था। इन भिक्षुणियों द्वारा कही गई उल्लास पूर्ण वाणियाँ ‘’थेरी-गाथा” नामक ग्रंथ संकलित है। गृहस्थ जीवन बिताने वाली नारियों में विशाखा, मल्लिका, सोमा, चन्द्रा, वशिष्ठी आदि के उज्ज्वल चरित्र उस काल के गौरव के प्रतीक है। इन महिलाओं के वचन संयुक्त निकाय और मज्झिम निकाय में समाविष्ट है ‘।

संस्कृति के चार अध्याय के पेज नं.155 पर बुद्धकाल की स्त्रियों की स्थिति के बारे में डॉ. रामधारी सिंह दिनकर का कथन है- बौद्ध धर्म का आविर्भाव ऐसे समय हुआ जब नारी पुरूष के अत्याचारों के बोझ से दबी जा रही थी, शास्त्रकारों ने जिसे कोई व्यक्तिगत स्वतन्त्रता नहीं दी थी,  इसके लिए बौद्धकाल में अमर संवेदना का संदेश मिला।

प्रोफेसर इंद्र अपनी पुस्तक ‘दी स्टेट्स आफ वुमेन इन एशियन इंडिया (पेज-233) में कहते है- “बुद्ध ने अध्यात्मिकता के द्वार विधवाओं और सधवा दोनों के लिए समान रूप से खोल दिए। यहाँ तक की वेश्याओं के लिए भी संघ के द्वार समान रूप से खुले रहते थे। तथागत ने आम्रपाली का निमन्त्रण सहर्ष स्वीकार किया। कन्या का विवाह प्राय: वयस्क हो जाने पर ही होता था। प्रेम विवाह के कतिपय उदाहरण बुद्ध साहित्य में मिलते है।

उपर्युक्त वक्तव्यों और दृष्टान्तों के आलोक में यदि हम बुद्धकाल में स्त्रियों की दशा पर विचार करें तो पाते है कि उस काल में स्त्रियाँ अपने निर्णय लेने में स्वतन्त्र थी, वैदिक काल की अपेक्षा उनकी स्थिति ज्यादा मजबूत थी। बुद्ध के संघ में जितनी स्त्रियाँ है या फिर बुद्ध के सम्पर्क में जितनी स्त्रियाँ आई वे स्त्री चेतना व अपने अस्तित्व के प्रति खूब जागरूक थी।

अब हम जरा एक नज़र ‘यशोधरा’  खंडकाव्य के रचयिता  मैथिलीशरण गुप्त जी के प्रेरणा स्त्रोत या फिर यशोधरा में उनकी वैचारिकता के कुछ आधार सूत्र पर भी डाल लेते है। यशोधरा में जिस वैचारिकता के चलते उन्होने यशोधरा का पूरा चरित्र गढ़ा,  वह हिन्दू वैदिक और वैष्णव संस्कृति है। इस संस्कृति में स्त्रियों की स्थिति पर वेदों से कुछ संदर्भ दृष्टव्य है-

”कन्या जब पति गृह में वधु बनकर प्रवेश करती थी, तब उसका कार्य सास-ससुर की सेवा एवं गृहकार्यों का निरीक्षण था। (अर्थवेद 14/2/27) वैदिक साहित्य में नारी के व्यक्तित्व का चरम विकास उसके मातृत्व में माना गया है। दम्पति की यही कामना थी कि वह पुत्र-पुत्रियों से युक्त होकर जीवन पर्यन्त गृहस्थ सुख का उपभोग करे।  (ऋग्वेद 8/21/8, 1/124/4, अर्थवेद 14/2/31) एक अन्य जगह वीर पुत्रों को उत्पन्न करना पत्नी का प्रमुख कर्तव्य था। उसके लिए दस पुत्रों तक की प्रार्थना की गई है- इमां त्वमित्र मीढ्व: सुपुत्रा सुमगां कृग।दशास्या पुत्राणा चेहि पति मेकादश कृति (ऋग्वेद 10/85/45)

इन सब संदर्भों से बुद्धकाल की स्त्री और वैदिक काल की स्त्री की सामाजिक व वैयक्तिक स्थिति एकदम स्पष्ट हो जाती है। कविवर मैथिलीशरण गुप्त वेदों, पुराणों, भाष्यों, रामायण, महाभारत आदि के साथ-साथ गांधीवादी चिन्तन से भी बहुत प्रभावित रहे हैं। इस चिन्तन के फलीभूत करने उसे लोक जीवन व्यावहारिकता के साथ आदर्श रूप में लोगों के सामने रखने के लिए उन्होंने यशोधरा को अपने खण्ड काव्य का आधार बनाया। यशोधरा 1932 में आई थी, इससे पहले ‘साकेत’ 1931 में आ चुकी थी। लगभग इसी समय कवि मैथिलीशरण गुप्त गाँधी जी के सम्पर्क मे आए थे। यह एक रोचक तथ्य है कि ‘यशोधरा’ खंडकाव्य के आने के बाद ही महात्मा गाँधी ने ही उनको राष्ट्र कवि की पदनाम से सुशोभित किया था।

अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि इतिहास में अनेक पात्र ऐसे हैं या हो सकते थे जिन पर लिखा जा सकता था,  जो वेद पुराण, व अन्य भाष्यो में हिन्दू स्त्री के चरित्र के तौर पर आदर्श है। परन्तु ध्यान देने वाली बात है कि मैथिलीशरण गुप्त इतिहास के पन्नों से उन आदर्श चरित्रों को न चुनकर बुद्धवादी स्त्री यशोधरा को ही क्यों चुनते है?  इसका जवाब हलांकि कई विद्वान आलोचकों ने अध्ययनानुसार दिया है परन्तु मैं यहाँ दो आलोचको के कथन इस संदर्भ में प्रस्तुत करूँगी।

राम रतन भटनागर एम. ए अपनी पुस्तक ‘मैथिलीशरण गुप्त एक अध्ययन’ में लिखते है –  ‘हिन्दू धर्म और हिन्दू पौराणिक गाथाओं की नयी व्याख्या करके उन्होंने हिन्दुत्व की महत्ता स्थापित की और देश के सामने प्राचीन गौरव का आदर्श रखा। परन्तु गुप्त जी मूलत: प्रचारक नही हैं, वे कवि ह- और कवि से अधिक युगदृष्टा। उन्होंने हिन्दू मात्र में प्राचीन गौरव को पुनर्जीवित किया। युग की सबसे बड़ी माँग यही थी इसने राष्ट्रीयता को भी बल दिया। हिन्दू भावना और राष्ट्र भावना में कोई ऐसा विरोध नही है कि दोनों को एक साथ नही साधा जा सके। गुप्त जी ने दोनों की साधना की है और वे इस साधना में सफल रहे है।’

यहाँ ध्यान देने वाली बात है कि जिस हिन्दू प्राचीन गौरव और जिस हिन्दू बनाम राष्ट्रीयता और हिन्दुत्व बनाम हिन्दू की बात राम रतन भटनागर जी ने गुप्त जी की वैचारिकता के संदर्भ में की है और आज जिस हम उग्र हिन्दुत्व व उग्र राष्ट्रीयता का उदय देख रहे हैं उसके बीजारोपण  इस काल के कवियों की कविताओँ में दिखाई पड़ते है।

डॉ. उमाकान्त गोयकृत अपनी पुस्तक ‘मैथिलीशरणगुप्त’ के पेज न. 36 पर लिखते हैं –  ‘य़शोधरा का उद्देश्य यशोधरा के चरित्र सर्जना के साथ-साथ बौद्ध सिद्धान्तों का खण्डन करके वैष्णव विश्वासों का संस्थापन अथवा मंडन निश्चित कवि का उद्देश्य रहा जैसे कि ‘साकेत’ के निर्माण में ‘उर्मिला’ की परिकल्पना के साथ-साथ रामकाव्य का प्रणयन भी उनका ध्येय रहा। यशोधरा के माध्यम से कवि ने बुद्ध वैचारिकी पर हिन्दू वैचारिकी की विजय, बुद्ध की जगह राम की महत्ता, वैदिक व वैष्णवी संस्कृति की स्थापना, स्त्री के हिन्दू स्त्री आदर्श रूप की कल्पना की है। स्वयं कवि ने ‘यशोधरा’ में स्वीकार किया है- अथवा तुम्हारे शब्दों में ही मेरी वैष्णव भावना ने तुलसी दल लेकर या नैवेध बुद्धदेव के सम्मुख रखा है। कविराजों के राजभोग व्यंजन में मैं वहाँ जगह पाऊँगा ? अकिंचन की यह खिचड़ी स्वीकार करते है या नही?

उमाकांत गोयकृत आगे कहते है कि – ‘जिस खिचड़ी की बात मैथिलीशरण गुप्त जी कर रहे हैं दरअसल वह खिचड़ी भी नही है। यदि यशोधरा काव्य मे कुछ बुद्ध वैचारिकती और कुछ हिन्दू वैचारिकी को मिलाजुला कर लिखते तो शायद यह खिचड़ी कहलाने लायक होती। परन्तु यशोधरा तो पूर्ण रुप से बुद्धवाद पर हिन्दूवाद की विजयगाथा है। जहाँ बुद्ध ईश्वर का विरोध करते हैं,  वही मैथिलीशरण गुप्त बुद्ध की पत्नी यशोधरा के माध्यम से ईश्वरवाद का समर्थन करते है। वह बुद्ध को विष्णु का अवतार मानने को इच्छुक हैं। वह सनातनी मूल्यों  के पोषक बन यशोधरा से उनका पालन करवाते हैं, सबसे बड़ी बात तो यह कि वह यह सब काम अर्थात बुद्ध का वैचारिक व आध्यात्मिक विरोध खुद उनकी पत्नी यशोधरा को माध्यम बनाकर करते है। वह बुद्ध से राम का आदर करवाते हैं । उनको बुद्ध और राम में कोई मतभेद नज़र नही आता। बुद्ध का मार्ग मध्यम मार्गीय है, जनकल्याण वाला है, बुद्ध अपने चरित्र में ऐसे अकेले व्यक्तित्व हैं जो सिर्फ वर्षावास में ही एक जगह ठहरते हैं । वर्षावास यानि सिर्फ वर्षा के समय तीन महीने एक जगह ठहरते हैं। बाकी समय गतिमान रहते हैं।

बुद्ध पूरा जीवन घूमकर जन कल्याण में लगाते हैं। बुद्ध की लोक प्रचलित कहानी जिसमें बुद्ध ने एक बीमार, एक मृतक , एक संसार त्यागी मनुष्य देखा और वह संसार से विरक्त हो गए। इसी कारण वे अपनी सोती हुई पत्नी यशोधरा और नवजात पुत्र राहुल को छोड़ कर चले गए। यह कहानी लोकप्रचलित ही सही, परंतु सही नहीं  है। बुद्ध के घर छोड़ने की यह कहानी भ्रमात्मक है और बुद्ध के कारण घर छोड़ने का यह कारण कदापि नहीं हो सकता। डॉ. अम्बेडकर ने ‘बुद्धा एंड हिज धम्म’ में ब्राह्मणवादियों द्वारा प्रचलित इस कहानी को तथ्यहीन बताते हुए अपनी पुस्तक में बताया है – शाक्य और कोलिय राज्य में रोहिणी नहीं के जल बंटवारे को लेकर विवाद था। यह विवाद इतना बढ़ गया कि दोनों राज्यों के लोगों द्वारा आपस में खून -खराबे और युद्ध की नौबत तक आ पहुँची। उन्होंने जल बंटवारे को लेकर अपने ही मत्रिमंडल से  सुलह की अपील की जिसके परिणाम स्वरूप राज्य से विद्रोह अथवा गद्दारी के आरोप में उनके सामने तीन शर्ते रखी गई, जिसमें पहली शर्त बुद्ध को मृत्युदण्ड दूसरी शर्त बुद्ध के घर की सम्पति जब्त करना तथा तीसरी शर्त देश निकाला थी । बुद्ध ने अपनी पत्नी यशोधरा से, जो कि उस समय प्रसूता थी और अपने माता-पिता से विमर्श करने के बाद ही अपने राज्य को छोड़कर जाने का निर्णय लिया। पहले दो निर्णय न लेने का कारण था, यदि वे मृत्युदण्ड स्वीकार करते तो उनके माता-पिता, पत्नी व बच्चे के लिए बहुत दुखद होता। दूसरा निर्णय जिसमें उनके घर की कुर्की हो जाने देने पर परिवार को बहुत कष्ट और तंगहाली में जीना पड़ता। इस वजह से वह दो राज्यों के बीच पानी की लड़ाई से उत्पन्न युद्ध की स्थिति को टालने के लिए उन्होंने अपने परिवार सम्मत तीसरे निर्णय को चुनकर गृहत्याग का रास्ता अपनाया । पूरे बुद्ध साहित्य में ऐसा कहीं ऐसा वर्णन नहीं मिलता जहाँ कि वह यशोधरा को अर्धरात्रि में गहरी निद्रा में सोते हुए चोरी छुपे, रात के अंधेरे में चोरों की तरह घर छोड़कर चले गए हो।

कवि मैथिलीशरण गुप्त  की पूरी काव्य रचना यशोधरा इसी तथ्य पर आधारित है कि यशोधरा  सिद्धार्थ से कहती है कि वह उससे बिना बताऐँ कैसे मुक्ति के लिए चले गए। मुक्ति तो पाना ठीक है, जनकल्याण भी ठीक है, समाज को उनकी मुक्ति प्राप्ति से बहुत लाभ होगा परंतु फिर वह कहकर जरुर जाते। इन्हीं  सब भावों को व्यक्त करते हुए कवि बार-बार यशोधरा से कहलवाते हैं  कि –   ‘सखि वे मुझसे कहकर जाते।’

कवि मैथिलीशरण गुप्त ने यशोधरा के माध्यम से दलित श्रमण बुद्ध संस्कृति के मुकाबले  वैदिक वैष्णवी संस्कृति को ऊपर रखा वे यशोधरा को आदर्श हिन्दू नारी बनाने के चक्कर में एक ऐसी नारी की रचना कर बैठे जो बुद्ध संस्कृति के खिलाफ है। यशोधरा  में मैथिलीशरण गुप्त  ने अपनी कल्पना के अनुसार  तथ्य रख यशोधरा का जो चरित्र गढ़ा है, वह आज के संदर्भ में अविश्वासनीय लगता है। गुप्त जी की यशोधरा पुनर्जन्म,  व्रत, पूजा-पाठ में विश्वास रखती है, जबकि बुद्ध संस्कृति किसी भी तरह के ईश्वरवाद, पूजा-पाठ और अंधविश्वास के खिलाफ है। बुद्ध के प्रस्थान से पूर्व उसका दायां अंग फड़कता है, जो कि हिन्दू धर्म के अनुसार किसी अनिष्ठ या अमंगल की अशंका व्यक्त करता है।

कवि मैथिलीशरण गुप्त यशोधरा में यशोधरा का न केवल आदर्श हिन्दू पत्तिव्रता स्त्री के रूप में स्थापित करते हैं, जो कि न केवल पति के त्यागने के बाद रात-दिन उसके ध्यान में मगन रहती है, अपितु गौतम बुद्ध को स्त्री जाति विरोधी भी मानती है। कवि मैथिलीशरण गु्प्त बहुत ही गुप्त तरीके से बुद्ध की लोक प्रसिद्ध कारुणिक बुद्ध, समतावादी बुद्ध, दार्शनिक बुद्ध, मानवतावादी बुद्द वाली छवि को यशोधरा के माध्यम से धूमिल कर देते हैं। सोचने वाली बात है कि जब बुद्ध के संघ में हजारों स्त्रियों प्रवज्जित हुई, फिर वह स्त्री विरोधी कैसे हुए?

यशोधरा का रचना काल 1933 है। देखने वाली बात यह है कि यह वह काल है जब अम्बेडकर और गांधी के रास्ते दलित समाज के हितों के लिए आपस में टकरा रहे थे। पहला गोलमेज सम्मेलन 1930 में हुआ था जिसमें डॉ. अम्बेडकर ने भारत के अछूतों का प्रतिनिधित्व किया है। डॉ. अम्बेडकर अछूतों की मुखर आवाज़ और नेता के रूप में उभर रहे थे। दूसरे शब्दों में कहे तो सम्पूर्ण दलित समाज डॉ. अम्बेडकर का नेतृत्व स्वीकार कर चुका था और उनको अपने दिल में बैठा चुका था।  जबकि गांधी अपने आप को अछूतों का नेता कहते थे। उस समय का सरकारी तंत्र और उसके लंबरदार व मीडिया भी यही सिद्ध करने में लगा हुआ था। चूंकि कवि मैथिलीशरण गुप्त गांधी जी से और उनके वैष्णववाद से बहुत अधिक प्रभावित थे। इसलिए यही वैष्णववादी मूल्य ‘यशोधरा’ के माध्यम से उन्होंने सबके सामने रखे।

1927 में महाड़ आन्दोलन के समय 25 दिसम्बर को बाबा साहेब ने विशाल दलित समाज के साथ हिन्दू स्त्रियों की गुलामी की पुस्तक ‘मनुस्मृति दहन’ की थी। भारतीय इतिहास का यह एक अनोखा ऐतिहासिक अवसर था। इससे पहले समाज सुधारकों ने भारतीय स्त्री की दुर्दशा के कारणों जिनमें मुख्य रूप से सतीप्रथा, बहुविवाह प्रथा, अनमेल विवाह, कन्या भ्रूण हत्या, बालविवाह, सतीप्रथा आदि के खिलाफ अलख जगाई थी। ज्योतिबा फुले सावित्रीबाई फूले स्त्री की शिक्षा के परम हिमायती था। राजाराम मोहन राय ने सतीप्रथा के खिलाफ अलख जगाई । पंडिता रमाबाई ने नवजात बच्चियों की हत्या पर गम्भीरता से काम करते हुए कटट्टर हिन्दूवादी समाज को चेताया। ताराबाई शिंदे ने अपनी पुस्तक ‘स्त्री -पुरूष तुलना’ के माध्यम से धर्म, पितृसत्ता आदि की खूब अच्छी तरह खबर ली थी । कहने का तात्पर्य यह कि बाबा साहेब से लेकर ज्योतिबाफुले व सावित्रीबाई फुले आदि समाज बदलाव का सपना देखने वाले तमाम समाज सुधारक स्त्रियों की सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक दशा सुधारने और उसमें आमूल चूल परिवर्तन लाने के लिए क्रान्तिकारी का कार्य कर रहे थे और उनके इन सब कार्यों से भारतीय स्त्री की दशा में परिवर्तन आया भी।

अंग्रेजी पढ़ने लिखने या फिर शिक्षित होकर अपने अधिकार, अपनी अस्मिता और अपने खोए आत्मविश्वास की पुन: प्राप्ति के लिए सचेत स्त्री या दूसरे शब्दों में कहे तो एक स्वतंत्र स्त्री की कल्पना से भयभीत हमारा भारतीय पुरूष और ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के शिकंजे में स्त्री को जकड़ने वाला,  समाज स्त्री को ऐसे ही आदर्श भारतीय स्त्री में तब्दील नही करना चाहता। आदर्श स्त्री घड़ने में उसके अपने निहितार्थ है। स्वतंत्र स्त्री से सत्ता कांपती है। ब्राह्मणवादी मूल्य ध्वस्त होते है। इसीलिए पितृसत्ता और धर्म की दुशाला ओढ़े पुरुष कल्पना करके य़थार्थ में अच्छी स्त्री , बुरी स्त्री की छवि घढ़ने लगता है। अ्च्छी स्त्री कौन ? जो समाज के तयशुदा पैमाने पर चले। बुरी स्त्री कौन ? जो समाज के तयशुदा पैमाने को जड़ से ठोकर मारकर उड़ा देने की ताकत रखे। अच्छी और बुरी स्त्री के चक्रव्यूह में फँसाकर पुरुष स्त्री को अच्छी स्त्री के ढ़ांचे में फिट कर पूरे स्त्री समाज को सबक सिखाता है।

कवि मैथिलीशरण गुप्त की यशोधरा सिद्धार्थ की यशोधरा से एकदम भिन्न है। वियतनाम के बुद्ध  विचारक व दार्शनिक भंते तिक न्यात हन्ह की एक पुस्तक है ‘जहाँ जहाँ चरन गौतम के’ हिन्दी अनुवादित पुस्तक में यशोधरा के एक अलग ही रूप के दर्शन होते है। यशोधरा सिद्धार्थ की दोस्त है । दोनों मिलकर समाज कार्य करते है।  समाज कार्य में लोगों से मिलना- जुलना, बीमार लोगों को दवाईयाँ बांटना, दु:खी परेशान,  गरीब,  मजबूर,  किसान लोगों से मिलकर उनके दुख-सुख जानना आदि। ऐसे में यशोधरा-सिद्धार्थ की दाम्पत्य जोड़ी ठीक ज्योतिबा और सावित्री बाई फुले की है। सिद्धार्थ और यशोधरा का यही रूप विश्वसनीय लगता है न कि यशोधरा का रोने धोने वाला रुप।

कवि मैथिलीशरण गुप्त यशोधरा के रूप में पति के लिए सजने-संवरने वाली, सामाजिक कार्य से दूर नितांत अनभिज्ञ की स्थिति में रहने वाली,  आहत,  परेशान, पीड़ित, प्रताड़ित, दुखी, विचलित स्त्री है। वह बुद्ध से बार-बार अपने त्याग की कीमत पर सिद्धी (जिसे बुद्धिज्म में बुद्धत्व) प्राप्त करने की बात करती है। मैथलीशरण गुप्त ने जाने – अनजाने यशोधरा खंड काव्य में, बार बार प्रयुक्त की गई पंक्ति ‘सखि वे मुझसे कहकर जाते’ के माध्यम से बुद्ध का कायर,  पलायनवादी,  स्वार्थी और डरपोक व्यक्तित्व उभार कर प्रस्तुत किया है।
कवि मैथिलीशरण गुप्त से मेरी असहमति दो बातों में बनती है पहली तो यह कि बुद्ध को समझने के लिए अपने पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर ही बुद्ध को समझा जा सकता है। यदि हम अपने पूर्वाग्रह से मुक्त होंगे तभी बुद्ध और उनके चरित्र को कि आज भी बुद्ध कितने बड़े दार्शनिक , मानवतावादी , समतावादी,  न्यायप्रिय , वर्णव्यवस्था के खिलाफ और सामाजिक क्रान्तिकारी व्यक्तित्व से पूर्ण है। दूसरे बुद्ध साहित्य में यशोधरा एक स्वतंत्र स्त्री चिंतक,  बुद्ध के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने वाली मजबूत महिला है जो बुद्ध द्वारा स्थापित मार्ग की सहयोगी है  ना कि अनुगमिनी।

अंत में बस यही कि किसी संस्कृति का इतिहास मिटाना हो,  बदलना हो,  अपने संस्कारों के अनुसार बदलना हो तो उसके पात्रों को बदलकर अपने पात्र रख दो या उनके पात्र के मुहँ में अपनी जुबान रख दो। यही ‘यशोधरा’ के माध्यम से कविवर गुप्त जी ने अपना मंतव्य साधा है।

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आदिवासियों के मानवाधिकार की लड़ाकू पर रिपब्लिक टीवी का निशाना: यह सत्ता का चारण काल है

उत्तम कुमार (फेसबुक पोस्ट से) 

पीयूसीएल द्वारा 2016 का निर्भीक पत्रकारिता सम्मान लेते समय उन्होंने पुरस्कार स्वरूप प्रशस्ति पत्र और धान के कटोरा पुरस्कार में दते हुए कहा था कि ‘उत्तम जी इसकी रक्षा कर पत्रकारिता करनी है और जवाब में मैंने कहा था कि ‘इस सम्मान को मैं असंख्य पीडि़त मानवता को समर्पित करता हूं उन लोगों को भी जो प्राकृतिक संसाधनों की लड़ाई में जेलों में कैद हैं।’ पीडि़त मानवता की  सेवा में अपना सर्वस्व न्योछावर कर देने वाली सुधा भारद्वाज का दोष यह है कि वह एक मानवाधिकार अधिवक्ता होने के नाते लगातार छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में आदिवासियों की मुठभेड़ों में बंदी प्रत्यक्षीकरण के प्रकरणों में पेश हुई और निडरता के साथ लगातार मानवाधिकार रक्षकों की पैरवी करती रही हैं।

जब हाल ही में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने छत्तीसगढ़ के सुकमा के कोडासवाली गांव में एक जांच में उनका सहयोग मांगा था तब भी वह अपनी व्यवसायिक ईमानदारी और साहस के साथ पेश आई। यदि यही उनका दोष है तो वे तमाम लोग भी उतने ही दोषी हैं जो अधिनायकवाद, फासीवाद और भूमंडलीकरण की ताकतों द्वारा पैदा खतरों और चुनौतियों का सामना रचनात्मक और आलोचनात्मक तौर-तरीकों से करते आ रहे हैं।

सभी को मालूम हो कि नेशनल लॉ युनिवर्सिटी, दिल्ली की अतिथि प्रोफेसर और पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज की राष्ट्रीय सचिव अधिवक्ता सुधा भारद्वाज ने रिपब्लिक टीवी चैनल पर 4 जुलाई 2018 को अर्नब गोस्वामी द्वारा प्रसारित उस सुपर एक्सक्लूसिव ब्रेकिंग न्यूज पर आपत्ति जताई है जिसमें उनके खिलाफ बेबुनियाद आरोप लगाए गए हैं। रिपब्लिक टीवी पर ऐंकर गोस्वामी ने ‘शहरी माओवादी’ पर एक बुलेटिन चलाते हुए अधिवक्ता सुधा के नाम से एक पत्र का उल्लेख किया था।

सुधा ने एक सार्वजनिक बयान जारी करते हुए कहा है कि मेरे खिलाफ आरोपों की एक लंबी सूची पेश की जा रही है जो हास्यास्पद, अपमानजनक, झूठी और एकदम निराधार है। इस टीवी कार्यक्रम में गोस्वामी ने दावा किया था कि सुधा द्वारा किसी कामरेड प्रकाश को एक पत्र लिखा गया था जिसमें कश्मीर जैसी परिस्थिति निर्मित करने की बात की गई थी। गोस्वामी ने इस कथित पत्र का हवाला देते हुए माओवादियों और अलगाववादियों के बीच एक संपर्क स्थापित करने की कोशिश की है।

सुधा ने बयान में कहा है, ‘ऐसे किसी भी पत्र से किसी भी तरह का संबंध होने से मैं दृढ़ता और निस्संदेह इनकार करती हूं… अगर ऐसा कोई दस्तावेज अस्तित्व में है तो भी मैंने उसे नहीं लिखा है।’ अपने बयान में अधविक्ता सुधा ने मानवाधिकारों से जुड़े अपने कार्यों का उल्लेख करते हुए पैदा किए जा रहे झूठ, भय और आतंक का मुंहतोड़ जवाब देते हुए कहा है कि ‘मैंने अपने अधिवक्ता से अर्नब गोस्वामी और रिपब्लिक टीवी को मेरे खिलाफ झूठे, दुर्भावनापूर्ण और बदनाम करने वाले आरोपों के लिए कानूनी नोटिस भेजने का अनुरोध किया है।’

आपको जानना चाहिए कि अर्थशास्त्री रंगनाथ भारद्वाज और कृष्णा भारद्वाज की बेटी सुधा का जन्म अमरीका में 1961 में हुआ था। 1971 में सुधा अपनी मां के साथ भारत लौट आईं। जेएनयू में अर्थशास्त्र विभाग की संस्थापक कृष्णा भारद्वाज की सोच के विपरित सुधा ने अपनी अमरीकन नागरिकता छोड़ दी। सुधा 1978 की आईआईटी कानपुर की टॉपर है। आईआईटी से पढ़ाई के साथ वह दिल्ली में अपने साथियों के साथ झुग्गी और मजदूर बस्तियों में बच्चों को पढ़ाना और छात्र राजनीति में मजदूरों के बीच काम करना शुरू कर दिया था। लगभग साल 1984-85 में वे छत्तीसगढ़ में शंकर गुहा नियोगी के मजदूर आंदोलन से जुड़ गईं। उन्होंने 40 की उम्र में अपने मजदूर साथियों के संघर्षों में संवैधानिक लड़ाई के लिए वकालत की पढ़ाई पूरी कर आदिवासियों, मजदूरों के न्याय के लिए उठ खड़ी हुई। जनहित के नाम से वकीलों का एक ट्रस्ट बनाया और समाज के पीडि़त वर्ग के लिए केस लडऩा शुरू किया। उन्होंने बस्तर के फर्जी मुठभेड़ों से लेकर अवैध कोल ब्लॉक, पंचायत कानून का उल्लंघन, वनाधिकार कानून, औद्योगिकरण के मसले पर ढेरों लड़ाईयां लड़ी।

उज्जवल भट्टाचार्या हस्तक्षेप ब्लाग में लिखते हैं कि सुधा की मां कृष्णा भारद्वाज जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में इकोनामिक्स डिपार्टमेंट की डीन हुआ करती थीं। सुधा की मां बेहतरीन क्लासिकल सिंगर थी और अमर्त्य सेन की समकालीन भी थीं। आज भी सुधा की मां की याद में हर साल जेएनयू में कृष्णा मेमोरियल लेक्चर होता है, जिसमें देश के नामचीन स्कॉलर शरीक होते हैं। आईआईटी से टॉपर हो कर निकलने के बाद भी सुधा को कैरियर खींच न सका। उनकी मां ने दिल्ली में एक मकान खरीद रखा था, जो आजकल उनके नाम पर है, मगर बस नाम पर ही है। मकान किराए पर चढ़ाया हुआ है, जिसका किराया मजदूर यूनियन के खाते में जमा करने का फरमान उन्होंने किरायेदार को दिया हुआ है। गुमनामी में गुमनामों की लड़ाई लड़ते अपना जीवन होम कर चुकी हैं। उन पर लगाए जा रहे आरोप साजिशाना है जो लोग पीडि़त मानवता के लिए उठ खड़े हो रहे हैं उन्हें साम, दाम, दंड और भेद के साथ निरंकुश शासन व्यवस्था उनके सामने कठिन चुनौतियां पेश कर रही है। प्रतिवाद में जनसंघर्ष तेज होंगे और नए रास्ते निकाले जाएंगे।

सुधा भारद्वाज जेएनयू में

उन्होंने रिपब्लिक टीवी चैनल और एमडी सह ऐंकर अर्नक गोस्वामी के अटेंशन का जवाब कुछ इस तरह दिया है-

मुझे सूचित किया गया है कि रिपब्लिक टीवी दिनांक 4 जुलाई 2018 को एक कार्यक्रम प्रसारित किया है, उसमें उसके एंकर और एमडी अर्नव गोस्वामी सुपर एक्सक्लूसिव ब्रेकिंग न्यूज के रूप में पेश कर रहे हैं। इस कार्यक्रम में, जो बार-बार पेश किया जा रहा है, मेरे खिलाफ आरोपों की एक लंबी सूची पेश की जा रही है जो हास्यास्पद अपमानजनक, झूठी और एवं निराधार हैं। गोस्वामी का दावा हैं कि मैंने किसी माओवादी को कोई कामरेड प्रकाश को-एक पत्र लिखा है (इसमें मुझे ‘कामरेड अधिवक्ता सुधा भारद्वाज’ के रूप में पेश किया गया है), जिसमें मैंने कहा है कि ‘कश्मीर जैसी परिस्थितियां’ निर्मित करनी होगी। मुझ पर माओवादियों से राशी प्राप्त करने का भी इलजाम मढ़ा गया है। और यह कि मैंने इस बात की पुष्टि की है कि मैं तमाम वकीलों को जानती हूं जिनके माओवादियों से संपर्क है। इनमें से कई को में जानती हूं वे बड़े उत्कृष्ट मानवाधिकार के वकील हैं, और अन्य जिन्हें मैं नहीं जानती हूं।

ऐसे किसी भी पत्र से किसी भी तरह से संबंधित होने से में दृढ़ता और निस्संदेह इंकार करती हूं। मैंने ऐसा कोई भी पत्र नहीं लिखा है। जिसका जिक्र गोस्वामी ने किया है-अगर ऐसा कोई दस्तावेज अस्तित्व में है जो मैंने नहीं लिखा है,रिपब्लिक टीवी द्वारा प्रसारित आरोपों का मैं खंडन करती हूं जो उसमें मेरे खिलाफ मढ़े हैं, मुझे बदनाम करने के लिये लगाये गये हैं जिससे मुझे व्यवसायिक और व्यक्तिगत हानि पहुंची हैं। अपने इस कार्यक्रम में रिपब्लिक टीवी ने इस पत्र के  स्रोत का जिक्र नहीं किया है, मुझे यह बहुत ही अजीबोगरीब मामला लगता है कि वह दस्तावेज जिसमें गंभीर आरोप लिखे गए हैं वह गोस्वामी के स्टूडियो में सबसे पहले प्रगट हो। मैं पिछले 30 वर्षों से ट्रेड यूनियन आंदौलन से जुड़ी हुई हूं और छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा में सक्रिय रही हूं। जिसकी स्थापना शंकरगुहा नियोगी ने की और दिल्ली राजहरा और भिलाई की मजदूर बस्तियों के सैकड़ो मजदूरों के बीच जीवन जिया हैं,जो इस सत्य के गवाह हैं। ट्रेड यूनियन कार्यवाहियों मैं सन 2000 से एक वकील बनी और तब से लेकर आज तक मजदूरों, किसानों, आदिवासियों, दलितों और गरीबों के मुकदमों में पैरवी की है, जो भूमि अधिग्रहण, वन अधिकारों और पर्यावरण अधिकारों के दायरे में आते हैं।

साल 2007 से मैं छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर में बतौर वकील कार्यरत हूं और उच्च न्यायालय ने मुझे छत्तीसगढ़ राज्य स्तरीय सेवा प्राधिकरण के सदस्य के रूप में भी नियुक्त किया पिछले एक वर्ष से मैं नेशनल ला यूनिवर्सिटी दिल्ली में एक अतिथि प्रोफेसर के रूप में शिक्षा दे रही हूं ,जहां आदिवासी अधिकारों और भूमि अधिग्रहण पर मैंने एक संगोष्ठी आयोजित किया और पाठ्यक्रम भी तैयार किया। इसके अलावा गरीबी पर एक नियमित पाठ्यक्रम भी पेश किया हैं। दिल्ली की जूडिशल अकादमी  के कार्यक्रम से मैं अभिन्न अंग के रूप में जुड़ी हूं। श्री लंका के श्रम न्यायालयों के अध्यक्षों को भी संबोधित किया है इस तरह मेरे जनपक्षीय और मानवाधिकार अधिवक्ता के रूप में काम जगजाहिर हैं। मैं पूरी जागरूकता से जानती हूं कि मेरा यह काम अर्नव गोस्वामी और रिपब्लिक टीवी द्वारा जोर-शोर से अकसर व्यक्त किये गए विचारों से प्रत्यक्ष रूप से विरोध में पाये जाते हैं।

मेरे विचार से फिलहाल दुर्भावनापूर्वक प्रेरित और मनगढंत हमला मेरे ऊपर इसलिये किया जा रहा है कि अभी हाल ही में 6 जून को दिल्ली में एक प्रेसवार्ता में अधिवक्ता सुरेंद्र गडलिंग की गिरफ्तारी की मैंने निंदा की। इंडिया एसोसिएशन ऑफ पीपल्स लॉयर्स जो वकीलों का एक संगठन है, उसने भी अन्य वकीलों के मुद्दों को जोर-शोर से उठाया है, जिसने भीम आर्मी के अधिवक्ता चन्द्रशेखर और स्टर्लिंग पुलिस गोली कांड के बिना पर गिरफ्तार किये गये अधिवक्ता सुचिनाथन का मामला भी है। यह स्पष्ट है कि ऐसे वकीलों को निशाना बना कर उन सभी को डराने की कोशिश है जो नागरिकों के जनतांत्रिक अधिकारों के लिये वकालत कर रहे हैं। रणनीति यह हैं कि एक भय का माहौल पैदा किया जाए, और उन सब को चुप कराने की कोशिश हैं। जिससें कि आम जन न्याय से वंचित हो जाये। इसके सातंग ही गौरतलब हैं कि अभी हाल ही में आईएपीएल कश्मीर में वकीलों द्वारा कठिनाइयों का सामना किया जा रहा है उनकी सच्चाई जानने के लिये एक टीम गठित की गई थी।

एक मानवाधिकार अधिवक्ता होने के नाते मैं छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में आदिवासियों की की मुठभेड़ों में बंदी प्रत्यक्षीकरण के प्रकरणों में भी पेश हुई थी और इसके अलावा मैं मानवाधिकार रक्षकों की पैरवी करती रही हूं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एचआरसी)के समक्ष भी पेश हुई हूं। अभी हाल ही में एचआरसी ने छत्तीसगढ़ के सुकमा के कोडासवाली गांव में एक जांच में मेरा सहयोग मांगा था इस प्रकरण में मैं उसी व्यवसायिक ईमानदारी और साहस के साथ पेश आई जो एक मानवाधिकार अधिवक्ता के रूप में मेरी उपलब्धि है। ऐसा लगा कि यही मेरी अपराध हैं। मैं अर्नव गोस्वामी के सुपर एक्सक्लूसिव अटेंशन की शिकार हूं। मैंने अपने अधिवक्ता से अर्बन गोस्वामी और रिपब्लिक टीवी को मेरे खिलाफ झूठे, दुर्भावनापूर्ण और निराधार बदनाम करने के आरोपों के लिये कानूनी नोटिस भेजने का अनुरोध किया है।

(लेखक दक्षिण कोसल में सम्पादक है )

 

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पत्थलगड़ी और कोचांग बलात्कार मामला: रांची से प्रकाशित अखबारों की विश्वसनीयता पर प्रश्न

श्रीप्रकाश 
झारखंड का खूंटी जिला इन दिनों उबल रहा है-एक ओर आदिवासी पत्थलगड़ी कर स्वायत्तता का घोष कर रहे हैं, वहीं कोचांग में 5 रंगकर्मियों का ‘कथित बलात्कार,’ तीन पुलिसकर्मियों का कथित अपहरण, जो बाद में चार निकले, पुलिस का दमन इन दिनों सुर्खियों में है. लेकिन रांची से प्रकाशित होने वाले अखबारों ने किस तरह सरकार के पक्ष में और आदिवासियों के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है यह बता रहे हैं श्रीप्रकाश. इस आलेख  के अनुसार अखबार न सिर्फ अपनी विश्वसनीयता खो रहे हैं, बल्कि पत्रकारिता के सामान्य मापदंड पर भी खरे नहीं उतर रहे. उधर बलात्कार की पीड़िताओं को लगभग नजरबंद रखा गया है-वे न परिवार से मिल पा रही हैं और न ही सोशल एक्टिविस्ट से उन्हें मिलने दिया जा रहा है. यह  आलेख कई कारणों से पढ़े जाने की मांग करता  है, यह पत्थलगड़ी आन्दोलन और उसके दमन की न सिर्फ तस्वीर पेश करता है, बल्कि उसके विस्तृत इतिहास में ले जाता है. साथ ही दो वृत्तचित्रों के माध्यम से इस संघर्ष को बखूबी समझा जा सकता है. 


मध्य व पूर्वी भारत में अभी पत्थलगडी शब्द चर्चा का विषय बना हुआ है। पत्थलगडी मूलतः कोलारीयन समूह के मुण्डा व हो आदीवासी समुदायों की परम्पराओं मे से एक सबसे महत्वपूर्ण  हिस्सा है। मूल मर्म ये है कि जब इस समुदाय के किसी समुह ने जंगल मे अपने बसने के लिये जगह बनाई और उस गोत्र या किली के लोग वहां बस गये तो वे अपने मृतको के हड्डी जिसे ‘जन्धहलंग’ कहा जाता है को एक खास पत्थर के नीचे पूरे  विधि विधान से रखते हैं। ये बड़े पत्थर, ससनदिरी कहलाते है। यदि किसी मुण्डा समुदाय के व्यक्ति की मृत्यु हो जाय तो उसकी अन्तिम क्रिया तब तक पुर्ण नही मानी जाती जब तक की उसकी हड्डिया उनके किली के संसनदिरी में  न रखी जाय।


यह भी पढ़ें: आदिवासियों का पत्थलगड़ी आंदोलन: संघ हुआ बेचैन, डैमेज कंट्रोल को आगे आये भागवत

इसी परम्परा मे अन्य कई तरह के पत्थरों को गाँव व इलाके मे रखा व गाडा जाता है, जिसमें विर्रदिरी- वंशावली निरूपित करता है और सीमानदिरी -गाव की बाउंडरी/सिमाना को दिखाता है, इसके अलावा भोदिरी, होरादिरी, गाडूदीरी आदि कई और भी तरह के पत्थरों की परम्परा है। यहाँ ये बताना महत्वपुर्ण होगा कि वतर्मान मे कई कारणों से इन परम्पराओ मे क्षरण हुआ है जिसमे आर्थिक-संस्कृतिक के अलावा धार्मिक कारण महत्वपुर्ण हैं। खासकर संगठित या सांस्थानिक धर्मो के बढते प्रभावों ने इन परम्पराओं को कमजोर किया है । कारण ये है कि जन्म मृत्यू की अवधारणा विभिन्न धर्मो मे भिन्न-भिन्न होती है।

ये पत्थर सिर्फ धार्मिक या संस्कृतिक महत्व भर नहीं  रखते परन्तु इसके अन्य महत्वपुर्ण आयाम हैं, जैसे मौखिक परम्परा वालो मुण्डा इन पत्थरो को अपने जमीन की मिल्कियत का अकाट्य प्रमाण मानते है। भूमि व पारिवारिक विवाद मे ससनदिरी ही अन्तिम निर्णय के लिये महत्वपुर्ण साक्ष्य होता है, क्योंकि एक ही खानदान के मृत्यु पाये लोगों की हड्डियां एक ही ससनदिरी मे रखी जाती हैं। दुसरे शब्दो में कहें तो ये एक तरह से कुर्सीनामा है जहाँ परिवार अपनी वंशावली को देख सकता है। ये पत्थर लिटाये हुए रहते है। विर्रदिरी इसी क्रम मे अगला है जो एक बडा पत्थर है- मृत व्यक्ति के लिये बडे पत्थर को खडा किया जाता है, जिससे उसकी वन्शावली का पता चलता है।

जब पहली बार  अंगरेजी हुकुमत ने भूमि और जंगल को निजी मिल्कियत मे लाने के लिये कानून बनाये तो आदिवासी क्षेत्रो में विद्रोहों की झड़ी लग गयी और मुण्डा इलाके मे बिरसा उलगुलान के बाद ब्रीटिश  हुकूमत को मुण्डारी खुटकट्टी परम्परा को ध्यान मे रखते हुए छोटानागपूर कास्तकारी अधिनियम बनाने पड़े जो सीएनटी ऐक्ट के नाम से प्रसिद्द है।

आदिवासी अधिकार, कॉरपरेट लूट पर अनेक वृत्तचित्रों के निर्माता

दूसरी तरफ 2014 में वर्तमान भाजपा की सरकार विकास और रोजगार के नारे के साथ प्रचन्ड बहुमत के साथ केन्द्र और राज्य मे आई । पहली बार झारखण्ड मे गैर आदिवासी मुख्यमंत्री  बनाये गये। अब जब अगले चुनाव में एक वर्ष बाकी है, सरकार के पास जनता के सामने अपनी उपलब्धियां दिखने को ज्यादा कुछ है नहीं। सरकार लगातार कॉरपरेट घरानों से राज्य में पूंजी निवेश कराने के लिए हर साल आयेाजन व सैकड़ों एमओयू करा रही है. पर ये सारे धरातल पर उतर नहीं रहे हैं। इसका एक प्रमुख कारण भूमि की अनुपलब्धता  है और यहाँ के लोग अपनी भूमि किसी भी कीमत पर देना नहीं चाहते हैं।






                                                               पत्थलगड़ी की कहानी ( श्रीप्रकाश की एक डॉक्यूमेंट्री)

ऐसा नहीं है कि आदिवासी समुदाय विकास नहीं चाहता, पर विगत में विकास योजनाओं के तल्ख अनुभव ने इस आदिवासी अन्चल के मुल निवासियों  की एक बडे आबादी में  धारणा घर कर दी है कि विकास योजनाओ से उनका का भला तो नही बल्की उनका आर्थिक-सांस्कृतिक विनाश  ही हुआ है। दूसरी तरफ सरकार के सारे एमओयू भूमि की अनुपलब्धता के कारण ठप्प पड़े हैं,  चुनाव सर पर है राज्य का मध्यम वर्ग को लुभाने के लिये सरकार के पास ज्यादा नहीं है। पर वर्तमान सराकर के पास धर्म के रूप मे आखिरी अस्त्र ही बचता है जिससे इसेके वोटर भी फोल्ड से बाहर नही जायेंगे और समाज मे ध्रुवीकरण मजबुत होगा। साथ ही आदिवासी समाज को धर्म के नाम पर विभाजित करने से भूमि अध्रिग्रहण में भी सफलता मिलेगी।

यह भी पढ़ें :  पत्थलगड़ी के खिलाफ बलात्कार की सरकारी-संघी रणनीति (!)

इस पृष्ठभूमि में हम रांची से प्रकाशित अखबारों को देखें कि वे क्या कह रहे हैं: 
18.02.2017  को एक बैनर हेडलाईन हैं, लगभग सभी अखबारों में:

‘3.10 लाख करोड के निवेश के लिए 210 कंपनियो ने किया एमओयू, छह लाख लोगों को मिलेगा रोजगार
निवेशको के लिये सरकार के दरवाजे 24 घंटे खुले’


HIndust an Times 19-02-2017 
Momentum Jharkhand takes social media by storm 
(Nearly 150 million impressions and a reach of 28.2 million on Twitter recorded during GIS)
Times of india – 21.may 2018- Momentum Jharkhand: 21 projects launched
21 project will bring  Rs 700 crore  to the state. 
पर वास्तविकता में एक भी एमओयू धरातल पर नहीं उतरे.


दैनिक भास्कर  में 05.03.2018  को पहले पेज पर पांच कालम का हेडलाईन है :
बोले मुख्यमंत्री रघुवर दास राजनीतिक अस्थिरता की वजह से गांवों मे कई काम पूरे नही हुए
पत्थरगडी की आड़ में अअफीम का अवैध धंधा, राष्ट्रविरोधी ताकतो का इन्हे संरक्षण
हिन्दुस्तान के 05.03.2018 के मुख्य पृष्ठ पर हेडलाईन हैं: 
मुख्यमत्री की चेतावनी ऐसा करनेवालों  को बर्दाश्त नहीं करेंगे
अफीम के लिये हो रही है पत्थलगड़ी

वहीं इसी समाचार को विस्तार से लिखते हुए मुख्यमंत्री के हवाले से अखबार लिखता है कि उन्हे पता है कि 100 एकड़ में अफीम की खेती हो रही है और इसमें उग्रवादी संगठन साथ दे रहे हैं।
वहीं अखबार में खूंटी संवाददाता के डेटलाईन से अलग हेडलाईन लगाई है – अलगावादी नारो के साथ पत्थलगडी, विरोध मे बैठक
 दैनिक भाष्कर ने 6मार्च 2018 को बैनर हेडलाईन लगायी है: 
अफीम के कारण पत्थलगडी की पुष्टि नहीं, लेकिन जहां पत्थलगडी वहीं अफीम का गढ
सिर्फ खुंटी के 1500एकड मे अफीम की खेती
डर या कमाई… पुलिस यहां कभी जाती ही नही
दोनों अखबार अफीम की खेती से जुड़े आंकड़े अलग-अलग बताते हैं पर भाष्कर ने एक बॉक्स मे 9 अन्य जिलों में होने वाले अफीम की खेती का आंकडा दिया है, जिसमें लातेहार मे 300 चतरा मे 525 व पलामू में 170एकड में अफिम की खेती की बात कही गयी है।

13.08.2017 को प्रभात खबर के फ्र्रन्टपेज का हेड लाईन है:
भूअर्जन मे सोशल इंपैक्ट स्टडी नही होगी, विधेयक पारित
धर्म स्वतंत्र बिल सदन से पास, जबरन धर्मातरण कराने पर चार साल की सजा
वहीं हेड लाईन के बगल में दो कालम की खबर है कि एमओयू 3.51 लाख करोड का, काम 3.8 प्रतिशत जमीन पर ही 
इसी खबर में एक फोटो है, जिसका कैप्शन है धर्मातरण बिल पास होन के बाद रांची के अल्बर्ट एक्का चौक पर जश्न मनाते लोग और ठीक नीचे बॉक्स में हेडिंग है भूमि अर्जन पुनर्वसन एव पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकार और पारदर्शिता का अधिकार झारखण्ड संशोधन विधेयक 2017 वहीं  4.4.2018 के प्रभात खबर के मुख्य पृष्ठ पर चार कालम के न्यूज में हेड लाईन है – पत्थलगडी केा लेकर राज्यपाल ने की बैठक कहा:
बहकाने वालों के बच्चे कर रहे विदेश में  पढ़ाई: 



पर अगर आप समाचार को पढ़ें तो पता चलता है कि यह एक भ्रामक व गुमराह करने वाली खबर है जिसे गलत तरीके से हेडलाईन बनाया गया है। आगे समाचार खुद ही ये बताता है कि राज्यपाल ने कहा है कि बहकाने वाले लागो के परीवार को भी देखें उनके बच्चे निश्चित रूप से विदेश या अच्छे शिक्षण संस्थानो मे पढ रहे होंगे।

टेलीग्राफ रांची ने 18 फरवरी 2018 को 
‘Rock protests anti-national’
CM in Khunti, speaks out against Pathalgadi
के शीर्षक से खबर प्रकाशित की है और मुख्यमंत्री के हवाले से कहा गया कि राज्य में  देशविरोधी ताकतों को सर उठाने नहीं दिया जायेगा।
टेलीग्राफ के 3 जूलाई 2018 के अंक में 
Bid to quell Khunti stir
के शीर्षक से खबर लगाई है कि खूंटी प्रशासन ने नक्सल प्रभावित जिले के दारीगुटू में संगठनों के आउटफिट आदिवासी महासभा जैसों के प्रभाव वाले गाव में आमसभा की, जहां महासभा ने बाहरी लोगो के आने पर प्रतिबन्ध लगा रखा है।


इस इलाके मे माओवादी संगठन के अलावा पीएलफआई नामक उग्रवादी संगठन के बीच वर्चस्व की लडाई है। कई जानकार ये कहते हैं कि पीएलफआई को माओवादियों के खिलाफ प्रशासन का परेाक्ष सर्मथन प्राप्त है।
अगर हम गौर से देखें तो यह इलाका व पत्थलगडी प्रकरण राजनीतिक नाटक का एक परफेक्ट प्लाट है और एक राजनीतिक प्रयोगशाला भी है। सरकार अपनी विकास योजनाओं का क्रियान्वयन नही करा पा रही है और उसका टाईम टेस्टेड रिलीजन का कार्ड एक हद तक आदिवासी समाज को विभाजित करता दिख रहा है, वहीं अखबारों की भूमिका सरकार के पक्ष को रखने वाला ही दिख रहा है.  जानकार तो यहाँ तक कह रहे हैं कि अंग्रेजी के एक-आध अखबारों को छोड दिया जाय तो बाकी अखबार सरकार के प्रवक्ता के रूप मे कार्य करते दिखते हैं। क्योकि दुसरे पक्ष की बातें लगभग गौण हैं और अगरहैं तो वह सरकारी वर्जन से ही मिलता जूलता है। वही वे अपनी विश्वसनीयता बनाये रखने के लिए निश्चित अन्तराल में एक-आध बार सरकार को प्रश्न करते दिखते हैं। कायदे से मीडिया में सारे स्टेक होल्डरो के पक्ष आने चाहिए थे और सारे पक्षों से सटीक सवाल पुछे जाने थे, पर उनका नितांतअभाव दिखता है। इसका परिणाम यह हो रहा है कि प्रिन्ट मीडिया की विश्वसनियता पर सवाल खडे हो रहे हैं।
इसे भी पढ़ें : रंगकर्मियों से बलात्कार : क्या बलात्कारी पीड़िता को खुद सही-सलामत वापस छोड़ते हैं? आदिवासी अधिकार की प्रवक्ता दयामनी बारला ने उठाये ऐसे कई सवाल

पत्थलगडी प्रक्ररण मे उबाल तब आया जब अख़बारों में खबर छपी कि एक एनजीओ के नुक्कड नाटक से मानव तस्करी के खिलाफ जागृति  फैलाने वाली मंडली की महिला सदस्यों का पत्थलगडी के इलाके में एक इसाई मिशन स्कूल  से अपहरण कर उनके साथ बलात्कार किया गया । बाद के धटनाक्रम में तीन पुलिसकर्मियों का ,जो खूंटी के लोकसभा सदस्य के घर मे तैनात थे, हथियार समेत अपहरण कर लिया गया और बाद में वे तीनो पुलिस कर्मी सकुशल वापस आ गये पर आश्चर्य यह है कि तीन के बदले चार पुलिसवाले आये, यानी पुलिस को ये भी पता नहीं था कि उनके कितने सिपाहियों का अपहरण हुआ था।
इस धटना की रिपोर्टिंग में लगभग पुलिस का वर्जन ही अखबारों  के हेडलाईन बने। जैसे:
24.05.2018 
पेज-1  प्रभात खबर  ‘फादर समेत तीन गिरफ्तार, पत्थरगडी समर्थक जॉन तिडू मास्टरमाईड, पिएलफआई भी शामिल
यह रिर्पोट कोचांग नामक गाँव,जो पत्थलगडी के इलाके में है, में एक कथित एनजीओ के पांच महिला सदस्यों का, जो उस इलाके मे जागरूकता फैलाने के उदेश्य से नुक्कड नाटक करने गयी थीं, अपहरण और बलत्कार की घटना के बाद की है।
दैनिक भास्कर  के पेज 3 पर ,26.05.2018 को चार कालम के बॉक्स का हेड लाईन है:
अब चेत जाईये संविधान के नाम पर ही बरगला रहे हैं पत्थरगडी के नेता
खूंटी  मे सुनाई दे रहे है कश्मीर जैसे नारे
ग्राम सभा में उठ रही है आजादी की आवाज
एक व्यक्ति की पीठ की तरफ से ली गयी तस्वीर ,है जिसमे एक बच्चा उसके कन्धे पर सर रख कर सो रहा है’ 
कैपसन है: ‘देखिये… कैसे बचपन के कानो मे धुल रहा है अलगाववाद का जहर’
27.06. 2018 दैनिक भास्कर  के  पेज 1 का बैनर
‘ खूंटी  गैंग रेप ! पहली बार पुलिस ने आरोपियों को  पकड़ने  के  लिए पत्थलगडी क्षेत्र में चलाया सर्च आपरेशन
गैग रेप के आरोपियो पर कार्रवाई के जबाव मे सांसद कडि.या मुण्डा के घर पर हमला, 3 गार्ड्स का अपहरण’
22. 06. 2018 के पेज 1 पर दो कालम का शीर्षक है :
‘पत्थलगडी के नाम पर हर कृत्य का समर्थन करने वाले क्या इस कुकृत्य की जिम्मेवारी लेगे?’
पेज 8 पर दो कालम के न्यूज का शीर्षक है:
स्कूल में  स्वागत बैड बन्द होते ही आ धमके वे अपराधी… जैसे हर किसी से परिचित हों
जिस स्कूल में धटना, उसके आस-पास के सारे गांवों में हुई है पत्थलगडी’



23 .06.2018 को भाष्कर में भाजपा के राज्यसभा के सदस्य समीर उराव का वक्तव्य है, जिसमें वे कह रहे हैं कि
‘धर्म बदलने वाले को क्यों  मिले आरक्षण, हम संसद में विधेयक लाएंगे।
वहीं टाईम्स ऑफ  इंडिया के 23 जून 2018 के अंक में   Kochang villagers vow to fight ‘biased probe शीर्षक से छपे न्यूज में ग्रामीणों का पक्ष छपा है, जो कि बाकि अखबारों मे कम ही देखने को मिला है
और 1 जुलाई के भाष्कर मे छपे न्यूज मे कहा गया है कि पत्थरगडी के मास्टर माईड, गैगरेप के अपराधी और पुलिसकर्मियों के अपहरणकर्ता 12 दिनो के बाद भी पकड़  से बाहर हैं।


                                                            एक और उलगुलान: ( श्रीप्रकाश की एक डॉक्यूमेंट्री)

                                                     

अगर पूरे  प्रक्ररण व अखबारो मे छपी खबरों  का विश्लेषण करें तो लगता है कि सरकार व प्रशासन अपने वर्जन को अखबारों में प्रमुखता  से छपवाने में सफल है। पर इसका खामियाजा अखबारों की विश्वसनीयता पर है क्योंकि इस पूरे  पत्थलगड़ी प्रकरण में  सोशल मीडिया ने बढ-चढ कर विभिन्न आयामों को लोगो के सामने लाया और एक तरह से सोशल मीडिया ने जो जगह अखबारो ने छोडी थी उसको भरने की कोशिश की है जिसके कारण  नुक्कड नाटक मे धृणित बलात्कार व पुलिसकर्मी अपहरण काण्ड पर एक धारणा बन गयी है कि ये प्लान्टेड थे। जैसे हथियारों का मिलना,  तीन की जगह चार पुलीसकर्मी की वापसी होना, पीड़ित नुक्कडनाटक कर्मी महिलाओं को छिपा कर रखना, दो एफआईआर एक ही समय पर दो अलग-अलग थानो मे दर्ज होना इत्यादि सोशल मीडिया में अच्छी-खासी जगह पा रहे हैं. ग्रामीणों व पत्थलगडी समर्थको के विडीयो, इंटरव्यू व उनका पक्ष सेाशल मीडिया पर उपलब्ध है ।

दूसरी तरफ देश के प्रमुख महिला संगठनो की सदस्य, जो दो दिनों तक खूंटी मे डेरा डाले रहीं, खूंटी के वरिष्ठ अधिकारियों से मिल पाने में सफल नहीं हो सकीं, और न ही पीड़ित महिला नाटककर्मियों से ही मुलाकात हो पाई है । एक तरफ प्रशासन की भूमिका के बारे में कोई सवाल नही खड़े  कर रहा है वहीं ग्रामसभा के नेतृत्व को ये भी सवाल नहीं पूछा  है कि अगर  स्वशासन व स्वायतता की बाते करते हैं तो पहले अपने इलाके पर तो नियत्रण रखेंगे? आप के इलाके से महिलाओं का अपहरण होता है उनके साथ बलात्कार होता है, इस पर आप की व्यवस्था कुछ नही कहती और न ही कोई ऐक्शन लेती है। जब पत्थलगडी इलाके में बाहरी लोगो का अगमन मना था तो ये नाटक  मंडली कैसे पहुँच गयी?

पुनश्च:

मैंने काफी पहले उन ब्रीटिश  पुलिस अधिकारियों की रिपोर्टें पढी थी जो पुलिस के साथ संथाल हुल और बिरसा मुण्डा आदि की मुटभेड पर थी। रिपोर्ट में बिरसा उलगुलान, जो खूंटी के इलाके में हुआ था, आदिवासीयो के साथ पुलिस के युद्धों का विवरण विस्तार से लिखा था। अधिकारी ने जो लिखा था वह आर्श्चय और विस्मय से भरा था कि ‘मैंने अनेक मुटभेड व युद्ध में हिस्सा लिया है पर यह युद्य एक तरफा था। आदिवासी लडाके नगाडा बजने के साथ ओट से निकल तीरों की बौछार करते। पर उनके तीर हम तक नही पहुँच पा रहे थे जबकि वे हमारे बन्दुक की गोलियों की सीमा पर थे। वे लोग लगातार हमारे गोलियों, के शिकार हो रहे थे पर उन्होंने लडना नहींछोडा। जैसे ही नगाडा बजना शुरू होता बचे हुए आदिवासी फिर बाहर निकल तीर चलाते -ये क्रम तब तक चला जब तक कि सारे गोलियों का शिकार न हो गये।’

इसी तरह की एक और घटना हैं: खूंटी  के तोरपा इलाके में फरवरी 2001 मे ‘कोयलकारो’ जन सगठन के कार्यकर्ताओं पर पुलिस ने गोली चलाई जिसमें 8 लोगों की जान गयी थी। इसका कारण बना था कि जनसंगठन ने डेराग से लोहाजिमी जाने वाली सडक, जो मुडारी खुटकट्टी जमीन पर बनी थी, एक अस्थाई चेक नाका/बेरीकेटीग लगाया था कि कोई भी बाहरी व्यक्ति अगर आये तो यहाँ अपनी गति धीमी करे, जिससे स्थानीय लोगों  को पता चले कि कौन आया है। पुलिस उस नाका को तोड कर हटा रही थी जिसका उस समय उपस्थित एक स्थानीय भुतपुर्व सैनिक ने विरोध किया जिसे पुलिस ने बन्दुक के कुदें से मार कर घायल कर दिया था जिसके विरोध में जनसंगठन तपकारा पुलिस पोस्ट के सामने धरना दे रहा था।

एक और घटना जो 25 अगस्त 2017 मे कांकी, खूंटी में हुई थी जिसमें 200 की संख्या में पुलिस बल और एसपी, मजिस्ट्रेट, खूंटी व मुरहु थाना के थानेदार समेत कई प्रशासनिक अधिकारियों को ग्रामीणों ने 13 घंटे तक गाँव में रोक के रखा था. जो डीसी और जिले के बड़े पुलिस पदाधिकारियों के साथ बातचीत के बाद ही ये अवरोध टुटा था, ये मामला तत्कालीन डीसी मनीस रंजन की सूझ-बूझ से शान्त हो पाया था.

इस घटना का कारण एक बेरीकेटिंग, जो ग्रामसभा ने गावमें जाने वाली सडक में लगाया था, उसे पुलिस तोड़-तोड़ देती है। और यह वही इलाका है जो आज मघ्य और पूर्वी भारत के आदिवासी अंचलों में पत्थलगड़ी नामक आयोजनों के कारण पुरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है। भारत के अन्य कथित सभ्य समुदायों से अलग आदिवासी समुदाय ने बिना किसी मुकूटधारी राजा, बिना किसी स्टैंडिंग आर्मी के उन सभी राज्यसत्ता को हिला कर रख दिया, जिस किसी ने भी इनकी स्वयत्ता को चुनौती देने की कोशिश की। उन्नत सैन्य क्षमता के आगे आदिवासी युद्धों में पराजित भी हुए पर इन्होने गुलामी को स्वीकार नही किया और वे घने जंगलों मे घुसते चले गये।

ससनदीरी, पत्थलगडी जो खुटकट्टी मुण्डा परम्परा का आधारभूत हिस्सा है, जिसमें पत्थरो की अहम भुमिका है-ससनदीरी पत्थरों को मुण्डा समुदाय के लोग भूमि के स्वमित्व में पट्टे के रूप मे इस्तेमाल करते रहे हैं- और एक उदाहण भी है.  कलकते के ब्रीटिश कोर्ट में ससनदीरी पत्थरों को अपनी जमीन के पट्टे के रूप में पेश किया गया था। इन परम्पराओं को विभिन्न सरकारों ने अधिकांशतः आदिवासी बलिदानों के बाद सम्मान करते हुए कानुनी जामा पहनाया, जो झारखण्ड में ब्रीटिशकाल में बने छोटानागपुरटेनेंसी ऐक्ट, संथाल परगना ऐक्ट, आजादी के बाद पेसा और फोरेस्ट राईट एक्ट के रूप में हमलोगों के सामने है। यहाँ यह बताना महत्वपुर्ण होगा कि फ़ॉरेस्ट राईट एैक्ट 2006 की प्रस्तावना में यह लिखित रूप से स्वीकार किया गया है कि विभिन्न सरकारों द्वारा इन समुदायों पर ऐतिहासिक अन्याय हुआ है।

आजादी के बाद भूरिया कमिटी की सिफारिशों के बाद जो पेसा कानून  1996 बना, उसके प्रचार-प्रसार में भारत सरकार के वरिष्ठ ब्यूरोक्रेट स्व. बीडी शर्मा ने पद त्यागकर एक संगठन भारत जनआदोलन गठित किया और गाँव-गाँव में बड़े पत्थरों पर संविधान की धाराओं को लिख र पत्थलगडी का कार्यक्रम चलाया था।

लोकतंत्र का अंतिम उद्देश्य शासन में जनता की अधिकतम भागीदरी है, विकास के निर्णयों पर आख़िरी व्यक्ति की सहमति से लोकतन्त्र अपने शिखर पर पहुँच सकता है। पुरी दुनिया में देखा गया है कि आदिवासी स्वशासन व परम्परागत शासन व्यवस्था अपने आप में अनुठे लोकतांत्रिक मूल्यों का वाहक है। युरोपियनो के अमेरिका में आगमन के साथ ही वहां के आदिवासियों के साथ चले अन्तहीन युद्ध का सम्मानजनक हल अमेरिकी कानूनों के अंतर्गत आदिवासी स्वायत्त प्रदेशों की स्थापना के साथ हुई। लेखक ने स्वयम अमेरिका  के सबसे बडे आदिवासी समुदाय नवाहो इन्डियन लोगों के स्वायत शासीप्रदेश नवाहोनेशन में उनके कार्य और अधिकारो को नजदीक से देखा है। नवाहोनेशन का अपना राष्ट्रपति, अपनी पुलिस और अपने प्रशासनिक-व्यवस्था व अधिकार क्षेत्र हैं। इन इलाकों में स्टेट की पुलिस नही आ सकती है।

(Navajo Nation) is the biggest autonomous territory within USA lies in fore state- Arizona, Colorado,new Mexico and Utah. similarly all other indigenous  communities have their own sovern nation with in the USA constiutution. 

श्रीप्रकाश स्वतंत्र वृत्तचित्र निर्माता हैं. कॉरपरेट लूट और आदिवासी अधिकार, मानवाधिकार को संबोधित अनेक फ़िल्में बनायी हैं. सम्पर्क: prakash.shri@gmail.com

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वीरबालकवाद: हिन्दी साहित्य के भीतर क्रांतिधर्मिता को समझने के लिए जरूर पढ़ें यह व्यंग्यलेख

मनोहर श्याम जोशी 


मनोहर श्याम जोशी के इस व्यंग्य लेख के मुख्य आधार रहे हैं अब बुजुर्ग वीरबालक रामशरणजोशी. माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति बनाये जाने के बाद आत्मकथा ‘मैं बोनसाई अपने समय का के लेखक’ रामशरण जोशी को केन्द्रित यह लेख साहित्य में क्रांतिकारी ‘वीरबालकत्व’ को समझने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है. लेख का शुरुआत सायकिल का पंक्चर बनाते मुम्बई में मिल गये ‘रामशरण जोशी’ से होती है, यह शब्द तभी क्वाइन हुआ-हालांकि यह वीरबालक लेख के अनुरूप ही जनवादिता की शपथ खाता हुआ, जनसंघ की गलियों से भटककर प्रगतिशील होता गया. इस लेख को कुंजी के रूप में पढ़ना चाहिए जोशी जी की राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित आत्मकथा पढने के पूर्व. खासकर उन्हें, जिन्होंने इसे पहले नहीं पढ़ा हो. 


वीरबालकवाद क्या होता है? यह प्रश्न आपके उर में विह्वलता भरने लगे उससे पहले यह समझ लें कि वीरबालकवाद वह होता है जो समझदार वीरबालकों द्वारा किया जाता है और समझदार वीरबालक वे होते हैं जो अपने को वीरगति को प्राप्त नहीं होने देते। अब पूछिए कि समझदार वीरबालकों द्वारा क्या किया जाता है? और समझ लीजिए अपने को जमाया और और दूसरों को उखाड़ा जाता है। और हाँ, हर बात का श्रेय स्वयं ले लिया जाता है। तो इस लेख के आरंभ में ही स्वयं वीरबालकवाद का अच्छा नमूना पेश करते हुए मैं ‘वीरबालक’ और ‘वीरबालकवाद’ दोनों फिकरे चलाने का श्रेय लेते हुए विषय-निरूपण के नाम पर संस्मरण सुनाऊँगा और आपका ध्यान इस ओर दिलाना चाहूँगा कि सभी वीरबालक विषय-निरूपण के नाम पर संस्मरण अवश्य सुनाते हैं क्योंकि आखिर ऐसा हो क्या हो सकता है जिससे वह व्यक्तिगत रूप से जुड़े हुए न रह हों?

तो साहब हुआ यह कि मैं जब साठ के दशक में मुंबई आया तब शुरू में अपने मित्र उमेश माथुर के यहाँ रहा। बंबइया इंडस्ट्री में किस्मत आजमाते हुए संघर्षरत लड़कों के लिए मैंने वीरबालक संबोधन प्रस्तावित किया और उमेश जी ने उसे अनुमोदित कर दिया। उन्हीं दिनों देवानंद के एक सहायक अमरजीत को जुहू में में टायर पंचर लगाते हुआ एक किशोर मिला जो बहैसियत लेखक बंबइया फिल्मों में किस्मत आजमाने अपने घर से भागकर आया था। उस वीरबालक को उमेश जी ने समझाया कि अभी तुम्हारी पढ़ने-लिखने की उम्र है इसलिए पहले पढ़ाई पूरी करो फिर बंबई आओ। उस वीरबालक की वापसी के लिए चंदा इकट्ठा करके हमने उसे बंबई से विदा किया। लगभग सात वर्ष बाद साप्ताहिक हिंदुस्तान में एक नौजवान पत्रकार मुझसे मिलने आया और उसे देखते ही मेरे मुँह से निकला, ‘कहो वीरबालक तुम यहाँ कैसे?’

रामशरण जोशी

रामशरण जोशी जयपुर में अपनी पढ़ाई पूरी करके बहैसियत फिल्म-लेखक बंबई में किस्मत आजमाने आ गए थे। मैंने उस वीरबालक का स्वागत किया और उसकी सारगर्भित पत्रकारिता के कई नमूने छापे। शुरू में रामशरण जनसंघियों की न्यूज एजेंसी ‘हिन्दुस्थान समाचार’ से जुड़े हुए थे। फिर वह एक नक्सलवादी के रूप में प्रकट हुए। उनकी बातचीत और पत्रकारिता से यह संकेत मिलने लगा कि संघर्ष है जहाँ, वीरबालक है वहाँ। इसके साथ ही नेताओं के बारे में उनकी व्यक्तिगत जानकारी में बड़ी तेजी से इजाफा होता चला गया। सत्ता-प्रतिष्ठान के पत्रों के लिए लिख तो पहले से ही रहे थे फिर वह उनमें से एक में अच्छे पद पर नियुक्ति भी पा गए। और इसके साथ ही उनका संघर्षरत क्रांतिकारी वाला स्वरूप ज्यादा जोर पकड़ने लगा।

तो फिर मैंने एक फिकरा गढ़ा – वीरबालकवाद। वीरबालकवादी का जीवन बगैर क्रांति की क्रांतिकारिता को, बगैर संघर्ष के संघर्ष को और बगैर जोखिम के जोखिम को समर्पित रहता है। कलम का सिपाही होने के नाते वह सारी लड़ाई शब्दों में लड़ता है अर्थात उसकी वीरता वाचा के आयाम तक सीमित रहती है। मनसा और कर्मणा वह सयाना बनता चला जाता है और जितना सयाना होता जाता है उतना ही बोलने और दिखने में वीरता को प्राप्त होता है। इसी के चलते आज हिंदी में सारी सत्ता वयोवृद्ध वीरबालकों के हाथ में है और उनकी छत्रछाया में तरुण वीरबालक तेजी से पनप रहे हैं। वह समझ गए हैं कि वाचा ही वीरबालक बनना चाहिए। और अपना कद बढ़ाने के लिए दूसरे वीरबालकों का कद घटाना चाहिए। दस रीत को अपनाकर ‘करियरिस्ट’ और ‘क्रांतिकारी’ दोनों एक साथ हुआ जा सकता है।

पढ़ें : घृणित विचारों और कृत्यों वाले पत्रकार की आत्मप्रशस्ति है यह, आत्मभंजन नहीं मिस्टर जोशी

अगर आप मनसा और कर्मणा भी वीरबालक बने रहें तो आप झगड़ालू, सिरफिरे औ सिनिकल समझ लिए जाएँगे। शैलेश मटियानी की तरह किसी भी गुट में फिट नहीं हो पाएँगे और सभी के हाथों पीटे जाएँगे। आपको अपने जीते जी किसी तरह की कोई मान्यता, पद-प्रतिष्ठा, पुरस्कार-पुरस्कार राशि और सुख सुविधा कभी नहीं मिल सकेगी। मरने के बाद मिलेगी इस भरोसे भी आप तभी मर सकेंगे जब आपको यह विश्वास हो कि दो-चार वीरबालकवादी आपकी आत्मा की शांति के लिए अनुष्ठान कर-करके अतिरिक्त प्रतिष्ठा अर्जित करने को लालयित होंगे। मनसा और कर्मणा वीरता को आप जितना ही छोड़ते जाएँ उतनी ही ‘वाचा’ के स्तर पर अपनी वीरता को उद्घोष शुरू कर दें। ऐसा न करने पर आप अपनी नजरों में भी गिर जाएँगे, दूसरों की नजरों में तो खैर आप गिरे हुए होंगे ही।

कारण सच्चा वीरबालक उसे ही माना जाता है जो भौतिक सुखों को जूते की नोक पर रखने वाला ऋषि और लेनिन के पद-चिह्नों पर चलने वाला रिवोल्युशनरी दोनों हो। इस कसौटी पर खरा उतर सकने वाला साहित्यकार मिल सकना कहीं भी कठिन है और हमारे अर्द्धसामंती समाज में तो असंभवप्राय है। अपने इस इतने लंबे साहित्यिक जीवन में मैंने अब तक कुल एक ऐसा लेखक देखा है जो अच्छी खासी नौकरी छोड़कर नक्सलवादी बनने चला गया। वह था दिनमान में मेरे साथ काम कर चुका रामधनी। लेकिन अभी पिछले दिनों में कोई बात रहा था कि वह भी अब मुख्यधारा में शामिल हो गया है। अपने मित्र मुद्राराक्षस को छोड़ मैंने किसी और लेखक को नहीं देखा जिसने किसान या मजदूर मोर्चे पर काम किया हो। और तो और स्वतंत्र लेखन कर सकने और अपनी बात बेरोक-टोक कहने की खातिर नौकरी छोड़ने वाले पंकज बिष्ट जैसे लोग भी गिने-चुने ही मिल पाएँगे। लुत्फ ये है कि सभी वीरबालक अपने बायोडाटा में एक इंदराज संप्रति अवश्य रखते हैं। यथा – संप्रति – गुरु घासीदास विश्वविद्यालय में अध्यापनरत। मानो इससे पूर्व एवरेस्ट अभियान में रत थे और इसके बाद पेरू के जंगलों में छापामारों के कंधे से कंधा मिलाकर युद्धरत हो जाएँगे।

तो जहाँ सभी अपनी ही मान्यताओं के अनुसार छोंगी, कायर और पतित तीनों ही हों, वहाँ सारा खेल इस बात तक सीमित रह जाता है कि साहित्यिक राजनीति की आवश्यकता और अपने स्वार्थ को ध्यान में रखते हुए कब किसको कितना ज्यादा गिरा हुआ बताना है अथवा मन की बात मन में ही रखते हुए कब कितना उठा देना है? हर समझदार वीरबालक इस बात को समझता है कि अगर मैं कुछ दूसरों को गिरा कुछ दूसरों को उठा हुआ बताऊँगा तो कुछ नासमझ तीसरे मुझे इसलिए उठा हुआ मान लेंगे कि ऊँचाई पर बैठा हुआ इनसान ही इस तरह के प्रमाण पत्र बाँट सकता है, यही नहीं, जिन वीरबालकों को मैंने उठा हुआ बताया है वे सब मुझे हाथोंहाथ उठा लेंगे। कुछ नादान पाठक शंका कर सकते हैं कि क्या दूसरों को पतित बताने वाला वीरबालक यह जोखिम उठा रहा होता है कि वे पलटकर उस पर वार कर देंगे?

इन शंकालुओं को यह समझना चाहिए कि हर वीरबालक जहाँ तक हो सके हेड आफ डिपाट कटगरी के किसी ऐसे व्यक्ति पर प्रहार नहीं करता जो पलटकर उसका कोई नुकसान कर सकता हो। अगर वह ऐसे व्यक्ति पर प्रहार करता भी है तो किसी अन्य हेड आफ डिपाट के आशीर्वाद और कृपादृष्टि आश्वासन ले लेने के बाद ही। रीडर और लेक्चरर कटगरी के वीरबालकों पर प्रहार करना निरापद ही नहीं, आवश्यक भी समझा गया है। नई पीढ़ी के वीरबालक पुरानी पीढ़ी के अब वयोवृद्ध हो चले ऐसे नामवर वीरबालकों पर निर्भय होकर प्रहार करने लगे हैं जिनके पास अब कोई खास सत्ता रह न गई हो। लेकिन पुरानी पीढ़ी के वीरबालक इतने सयाने हैं कि टाप पोजिशन पर रह चुके किसी अन्य वृद्ध वीरबालक पर तब तक वार नहीं करते जब तक उसकी तेरहवीं क्या, बरसी न हो गई हो।

कुछ पाठकों को शंका हो सकती है कि जब वो वाले ‘सर’ सत्तावान अथवा प्राणवान अथवा दोनों ही थे तब वीरबालकों ने जाकर उनसे यह नम्र निवदेन क्यों नहीं किया कि ‘सर’ अन्यथा न लें लेकिन हमारी समझ से आप रिएक्शनरी और डिकाडेंट दूनों हैं। वीरबालक रिवोल्युशनरी के साथ-साथ ऋषि भी होता है और ऋषियों को बड़ों का निरादर करना शोभा नहीं देता। अब शंकालु यह पूछ सकता है कि क्या ऋषियों को गाली-गलौज करना शोभा देता है? अरे ऋषियों को न देता हो रिवोल्युशनरियों को तो देता है ना। इस तरह की क्रांतिकारी कार्रवाई ही तो वीरबालक-बिरादरी के जाग्रतावस्था में पहुँची है वर्ना उसमें तो ऊँघते रहने की महामारी व्याप्त है। वीरबालकों की आँखें तभी खुलती हैं जब कान में गालियों की आवाज पड़े या काकटेल्स के लिए पुकार।

रीडर कटगरी के वीरबालकों के लिए यह भी निरापद समझा जाता है कि वह परोक्ष प्रहार करें अर्थात कोई ऐसी कहानी या कविता लिख दें जिसमें कुछ वीरबालक विशेष या एक वीरबालक विशेष नितांत घृणित किस्म का पात्र बना दिया गया/दिए गए हों। ऐसी हर रचना की बहुत चर्चा होती है और सभी वीरबालक उसके विषय में एक-दूसरे को फुनियाते हैं। इस तरह का प्रच्छन्न प्रहार इसलिए निरापद माना गया है कि जिस किसी पर प्रहार किया गया हो वह तो मानेगा ही नहीं कि इस रचना का निशाना मैं हूँ। स्वयं रचनाकार को भी यह सुविधा मिल जाती है कि आवश्यकता पड़ने पर अपने निशाने से कह दें कि सर आपके शत्रु इतने घृणित हैं कि मेरे और आपके संबंध बिगाड़ने के लिए कहते डोल रहे हैं कि अपनी रचना में मैंने उनका नहीं, आपका पर्दाफाश किया है।

समझदार वीरबालक एक समय में एक से ज्यादा हेड आफ डिपाट को नहीं जुतियाता। और उसे जुतियाने से पहले भी किसी अन्य हेड आफ डिपाट से वचन ले लेता है कि आप हमको एक जोड़ा नया जूता तो दिलवा दीजिएगा ना? सभी सरों के सिर पर ताबड़तोड़ जूते बरसाने में दो खतरे पेश आते हैं। पहला यह कि आप पागल समझ लिए जाएँगे। दूसरा यह कि आपका जूता टूट जाएगा और आप जानिए नंगे पाँव चलने वाले का वीरबालकों के साहित्य में भले ही अनन्य स्थान हो, वीरबालकों की बिरादरी में वे नगण्य समझे जाते हैं। उनके बारे में यह तक नहीं माना जाता कि वे वे मकबूल फिदा हुसैन मार्का बेहतरीन स्टंटबाज हैं। सीरियस वीरबालक बिरादरी में स्टंटबाजी नहीं चलती तो सुजान वीरबालक किसी सर के सिर पर जूता तभी बरसाता है जब किन्हीं अन्य सर की वरद हथेली उसके अपने सिर पर टिकी हुई हो। ज्ञातव्य है कि हिंदी में जूनियर वीरबालक डाक्साब और सीनियर वीरबालक सर कहकर संबोधित किए जाते हैं। जौत्यकर्म के विषय में विधान यह है कि इसे दो अवस्थाओं में ही अधिक करना उचित है। या तो तब जब आप करियर बनाने के लिए हाथ-पाँव मार रहे हों या फिर जब आप हेड आफ डिपाट बन चुके हों। करियर की तलाश में लगभग घिस चुका फटा-पुराना जूता धड़ाधड़ प्रतिष्ठितों के सिर पर बरसाएँगे तभी वयोवृद्ध वीरबालकों की नोटिस में आएँगे। उनमें से हर हेड आफ डिपाट ललचाएगा कि क्यों नहीं इस बलिष्ठ-बाहु को फैलोशिप दिलवाकर पटा लूँ कि यह मेरे दिए जूते से मेरे प्रतिद्वंद्वियों को तसल्लीबख्श ढंग से गंजा करता रहे। फैलोशिप मिल जाने के कुछ ही समय बाद गुरुजनों की संगत में तरुण वीरबालक को यह बात समझ में आती है कि राजनीति की तरह साहित्य में भी स्थायी दोस्त दुश्मन-जैसी कोई चीज नहीं होती। शत्रुता का एक बहुत ही मैत्रीपूर्ण मैच चलता रहता है। सौदेबाजी चलती रहती है और समीकरण बदलते रहते हैं। इसलिए आपसी गाली-गलौज को बहुत सिर-यसली में नहीं टेक किया जाता।

सच तो यह है कि जौत्यकर्म को मनोरंजक रूप से उत्तेजक और उत्तेजक रूप से मनोरंजक विधा का दर्जा दिया जाता है। 70 के दशक से उस मुक्तमंडी का वर्चस्व बढ़ना शुरू हुआ जिसकी संस्कृति ओर राजनीति दोनों में ही इस तरह के उत्तेजक-मनोरंजक जौत्यकर्म का अच्छा भाव लगता है। मुझे याद है कि ज्ञानपीठ पुरस्कार की स्थापना के अवसर पर साहू जैनों द्वारा आयोजित महासम्मेलन में बहैसियत तरुण वीरबालक मैं थोड़ा गरजा-बरसा और मेरे बाद श्रीकांत ने तो उसी हैसियत से सत्ता-प्रतिष्ठान और उससे जुड़े साहित्यकारों पर इतना जोरदार प्रहार किया कि बोलते हुए उसकी कमजोर काया अपने दुस्साहस पर स्वयं ही काँपती रही। वह तब हैरान हो गया जब बाद में श्रीमती रमा जैन ने उसे बुलवाया और बहुत प्यार से समझाया कि जोश बहुत अच्छी चीज है लेकिन थोड़ा संयम भी जरूरी होता है। कुछ ही समय बाद श्रीकांत भी मेरे साथ साहू जैनों के दिनमान में काम करता नजर आया।

अगर मैं भूला नहीं होऊँ तो लगभग उन्हीं दिनों पेरिस में पी.ई.एन. के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में अध्यक्ष पद से बोलते हुए अमरीकी नाटककार आर्थर मिलर ने ने इस विडंबना की ओर ध्यान दिलाया था कि लोकतंत्र वाले देशों में सत्ता प्रतिष्ठान को मुँह बिराते संस्कृतकर्मी अब जेलों में नहीं, भव्य दफ्तरों में कैद किए जा रहे हैं। उनकी हैसियत खतरनाक क्रांतिकारियों की नहीं, मनोरंजक उछल-कूद करने वाले बंदरों की रह गई है इसलिए वे जितना ही ज्यादा गाली-गलौच करते हैं उन्हें उतना ही ज्यादा प्यार से गले लगाया जाता है। उन्हें अपनाकर सत्ता प्रतिष्ठान अपनी छवि सुधार लेता है और साथ ही स्वयं उन्हें सत्ता प्रतिष्ठान का ही एक हिस्सा बना देता है। कृपया ध्यान दें कि मिलर ने यह बात विचारधारा की समाप्ति और मुक्तमंडी की विश्वविजय के मौजूदा दौर से कई दशक पहले कही थी।

आज तो पूँजीवादी मीडिया हर कहीं वामपंथी वीरबालकों को वातानुकूलित दफ्तरों में बैठकर सर्वहारा की पैरवी और मुक्तमंडी की भर्त्सना करने के लिए तगड़ा वेतन और हर तरह की सुख-सुविधा दे रहा है। लोकतंत्र और मुक्तमंडी के अंतर्गत स्वयं राजनीति भी कुल मिलाकर वीरबालकवादी हो चली है इसलिए आज भारत जैसे असामंती देश तक यह संभव है कि आप किसी सेठ की या सरकार की नौकरी करते हुए भी अपने को सत्ता-प्रतिष्ठान-विरोधी क्रांतिकारी मान और मनवा सकें। कभी कम्युनिस्ट होने पर सरकारी नौकरी नहीं मिलती थी, आज विचारधारा की समाप्ति के बाद यह आलम है कि पूँजीपति मीडिया में काम करने वाले पत्रकार और आई.ए.एस., आई.पी.एस. अधिकारी भी अपने को कम्युनिस्ट बता रहे हैं। बहरहाल वीरबालक बिरादरी सेठाश्रय और राजाश्रय का मुक्तकंठ से विरोध करती पाई जाती है उसमें एक-दूसरे पर सेठाश्रय या राजाश्रय लेने का आरोप लगाने का रिवाज है।

हर समझदार वीरबालक यह जानता है कि प्रतिरक्षा का श्रेष्ठ उपाय प्रहार है। इसीलिए वह ‘जो पहले मारे सो मीर’ के सिद्धांत पर पूरी आस्था रखता है। पहले हमला करने वाला अपने पर जवाबी हमला करने वाले को लचर सफाई देने वाला ठहराते हुए पूछ सकता है कि अगर आपको मैं पतित और प्रतिक्रियावादी लग रहा था तो आप अब तक चुप्पी काहे साधे थे? इस पर सफाई देने वाला यदि अतिरिक्त सफाई देते हुए यह कहे कि मैं तो शालीनतावश चुप था तो कोई बात बनती नहीं। कारण, वीरबालक बिरादरी में ‘शालीनता’ की तो होती है लेकिन शालीनता की नहीं। शालीनता अर्थात अपनी समस्त प्रगतिशीलता के बावजूद सरस्वती-वंदना सुनने और शंख-ध्वनि के बीच शाल, श्रीफल, प्रतिमा और चेक लेने की स्वीकृति। मैं बराबर इस प्रतीक्षा में रहा हूँ कि कोई वीरबालक ‘शालीनता’ पर सैद्धांतिक और व्यावहारिक आपत्ति उठाएगा। व्यावहारिक यह कि जब हम न शाल ओढ़ते हैं और न हमें नारियल गिरी की बर्फी पसंद है तब आप शाल-श्रीफल ही क्यों दिए चले जाते हैं? सूट लेंथ और स्काच नहीं दे सकते क्या? सैद्धांतिक यह कि हम क्रांतिकारियों को इस तरह की भारतीयता अर्थात प्रतिक्रियावाद से जुड़ी चीजें क्यों दी और सुनाई जा रही हैं।

यहाँ उल्लेखनीय है कि वीरबालक बिरादरी के लिए ‘भारतीयता’ खासी गड़बड़ सी चीज रही है। किसी के पतित ठहरा देने का अचूक तरीका वीरबालकों में यही माना जाता रहा है कि उसे पुरातनपंथियों या हिंदुत्ववादियों से जोड़ दिया जाए। जब से भाजपा भी सत्ता की भागीदारी होने लगी है तब से वीरबालकों के लिए उससे जुड़ने का लालच और उससे जोड़ दिए जाने का खतरा दोनों ही बहुत बढ़ गए हैं। एक संस्मरण ठोकने की अनुमति चाहता हूँ। मुझे व्यंग्य लेखन के लिए पुरस्कार दिया जाना था। आयोजकों ने कहा कि अपनी पसंद का कोई वक्ता बता दीजिए। मैंने ऐसे अधेड़ वीरबालक का नाम सुझाया जिसकी रचनाएँ मैं बहुत पसंद करता हूँ। आयोजन से हफ्ता भर पहले उसका मेरे पास फोन आया कि जोशी जी मैं दो रात से सो नहीं सका हूँ। आप ही बताइए मैं क्या करूँ?

मैं बड़े चक्कर में पड़ गया, पूछा, ‘क्या हुआ भाई?’ पता चला कि पुरस्कार देने अटल जी आ रहे हैं। और उनके वयोवृद्ध बालकों ने कहा है कि संघ परिवार से जुड़े पी.एम. के साथ मंच शेयर करना ठीक नहीं रहेगा। मैंने उनसे न यह पूछा कि सी.पी.एम. के नेता संघियों के साथ क्यों पर्लियामेंट शेयर कर रहे हैं और न यह कि वयोवृद्ध वीरबालक संघीय पी.एम. की सरकार द्यारा गठित समितियों और आयोजित गोष्ठियों में क्यों चले जा रहे हैं? मैंने उससे सिर्फ इतना कहा कि परेशान क्यों होते हो मना कर दो। इस पर उसने राहत और हैरानी दोनों एक साथ व्यक्त की। वीरबालकवादियों के लिए सही मंत्रों का जाप करना और राजनीतिक छुआछूत बरतना बहुत आवश्यक माना गया है। इसके अभाव में आपकी वीरता संदिग्ध हो जाएगी क्योंकि वीरता दिखाने के लिए कोई और अवसर न प्रस्तुत हुआ है और मुक्तमंडी ने चाहा तो आगे भी प्रस्तुत नहीं होगा। परम प्रसन्नता का विषय है कि स्वाधीनता के बाद से अब तक हिंदी भाषी प्रदेश में कुल एक बार ऐसा अवसर आया जब वीरता के प्रदर्शन से कष्ट में पड़ने का कोई खतरा पैदा हो सकता था।

रामशरण जोशी

वह था आपातकाल। लेकिन उसके दौरान वीरबालकों ने कोई खास वीरता प्रदर्शित की नहीं। शायद इसलिए कि वे जेल नहीं जाना चाहते थे या शायद इसलिए कि वे इंदिरा गांधी को वामपंथी समझते थे। खैर जो हो, उसके वर्षों बाद कुछ वीरबालक आपातकाल के संदर्भ में भी वीरता और कायरता के प्रमाण पत्र बाँटते रहे। मेरी कायरता असंदिग्ध है क्योंकि मैंने कुर्सी नहीं छोड़ी। लेकिन यह भी असंदिग्ध है कि उस दौर में वीरबालक बिरादरी में कुर्सी छोड़ देने की कोई प्रतियोगिता नहीं चली हुई थी। मेरे मित्र साहित्यकारों में केवल कमलेश ही ऐसे थे जो इंदिरा गांधी के विरोध में कुछ कर दिखाने के लिए निकले थे। प्रसंगवश बाद में कमलेश वीरबालक बिरादरी के लिए समर्थ कवि और प्रकांड विद्वान से ज्यादा इस रूप में सांय स्मरणीय हुए कि समर्थ मेजबान हैं। मेरे दोस्तों में कुल निर्मल वर्मा ने ही ‘जोशी हाउ कैन यू…’ वाली शैली में लताड़ते हुए तब कायर संपादक कहा था। औरों को तो यह इलहाम इंदिरा गांधी के हार बल्कि मर जाने के बाद हुआ।

वीरबालक कुर्सी छोड़ना नहीं, कुर्सी पाना चाहते हैं। औसत वीरबालक ने ज्यादा नहीं तो इतना समझने लायक मार्क्सवाद तो पढ़ ही रखा होता है कि हम एक अर्द्धसामंती समाज में जी रहे हैं जिसमें कलम से कहीं ज्यादा महिमा कुर्सी की है। रुतबा, रौब, रुपया, कुर्सी पर बैठने के बाद ही मिलता है। कुर्सी ही जमाने और उखाड़ने के लिए अधिकार दिलाती है, जो भक्तों को आकर्षित शत्रुओं को आतंकित करती है। वीरबालक भयंकर रूप से सत्ता-ग्रंथि का मारा हुआ होता है क्योंकि हिंदीभाषी क्षेत्र में साहित्य और साहित्यकार की अपनी अलग से कोई सत्ता बची ही नहीं है। मुझे अपने दोस्त श्रीकांत का एक सवाल याद आता है जो उसने मुझसे एक दिन दिनमान कार्यालय में पूछा था, यह बताओ जोशी कि ज्यादा पावर किस में होती है – पोस्ट में कि पालिटिशियन में? अगर मैं अपने कसबे बिलासपुर में पावरफुल पोस्ट होकर लौटूँ तो मुझे ज्यादा सम्मान मिलेगा कि पावरफुल मिनिस्टर बनकर लौटने में?

पढ़ें : लेखकीय नैतिकता और पाठकों से विश्वासघात!

श्रीकांत मिनिस्टर तो नहीं बाद में एम.पी. जरूर बन गया और खुद यह देख सका कि जहाँ तक वीरबालकों का सवाल है उनके लिए संसद की सत्ता साहित्यकार की सत्ता से कहीं ज्यादा बड़ी है। श्रीकांत एक बढ़िया कवि के रूप में हमेशा याद किया जाएगा लेकिन उस दौर में वह पी एम के निकट होने और बड़ी दरियादिली से स्काच पिलाने के लिए याद किया जाता था। उसे भाव-विह्वल श्रद्धांजलि देते हुए एक वीरबालक ने कहा था, ‘अब श्रीकांत जैसा स्काच पिलाने वाला कहाँ मिलेगा।’ खैर तो वीरबालक एक-दूसरे पर प्रहार करते हुए यह मानकर चलते हैं कि राजनेता सर्वशक्तिशाली हैं और कुर्सियाँ उनकी कृपा से ही मिलती हैं और जब हमसे छिनती हैं तो राजनेताओं के कोप के कारण ही। बिरादरी में किसी को घटिया साबित करने का सबसे बढ़िया उपाय यह समझा जाता है कि उसे राजनेता की चापलूसी करके कुर्सी पाने और बचाने वाला सिद्ध कर दिया जाए।

अब जैसा रामशरण जोशी ने मुझे आपातकाल में कायरता दिखाने का प्रमाण पत्र देने के साथ-साथ यह भी बताया है कि इंदिरा गांधी के हार जाने के बाद अपनी कुर्सी बचाए रखने के लिए मैंने अटल जी की कुंडलियाँ छापनी शुरू कर दीं। सफाई देना इसलिए व्यर्थ नहीं है कि किस्सा खासा दिलचस्प है। हुआ यह कि जेल से अटल जी ने एक कुंडली संपादक के नाम पत्र के रूप में भेजी जिसमें मारीशस में हुए विश्व हिंदी सम्मेलन पर कटाक्ष किया गया था। पत्र जेल-सेंसर से पास हो कर आया था इसलिए मैंने छाप दिया लेकिन इसके छापे जाने पर सूचना मंत्रालय के सेंसर ने मुझे फटकार सुनाई। फिर विदेशमंत्री बन जाने के बाद अटल जी ने अपने कुछ गीत प्रकाशनार्थ भेजे जिन्हें मैंने तुरंत नहीं छापा। इस पर उन्होंने संपादक पर व्यंग्य करते हुए एक कुंडली भेजी। फिर मैंने उनके गीत छापे और उनकी भेजी कुंडली और जवाबी संपादकीय कुंडली भी साथ ही साथ छाप दिए। संपादकीय कुंडली में कहा गया था कि मंत्री पद पा जाने पर कवि हो जाना सहज संभाव्य है।

मुझे सचमुच बहुत अफसोस है कि मुझे अपनी कुर्सी बचाने के लिए ऐसे घटिया काम करने पड़े। जहाँ तक रामशरण जोशी का सवाल है मेरे लिए यह अपार संतोष का विषय है कि उन्हें अपने नक्सलवादी विचारों के कारण माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कार्यकारी निर्देशक का पद मिल गया है और इसे पाने या बचाने के लिए उन्हें कभी किसी कांग्रेसी सी.एम.,पी.एम. की चाटुकारिता करने की कोई आवश्यकता नहीं पड़ी। खैर शत्रुतापूर्ण मैत्री और मैत्रीपूर्ण शत्रुता में विश्वास करने वाले वीरबालकों में एक-दूसरे के बारे में झूठ बोल देने से परहेज उतना ही कम किया जाता है जितना कि अपने बारे में सच्चाई स्वीकार करने से। दूसरों के बारे में कहीं से कोई गड़ा मुर्दा उखाड़कर ले आया जाता है तो अपने बारे में यह तक भुला दिया जाता है कि अभी कल ही हम कहीं और क्या कह अथवा कर चुके हैं। अरे परिपक्वता आने के साथ-साथ आदमी का विचार बदलता है कि नहीं? कुछ वयोवृद्ध वीरबालक तो इस मामले में इतने भुलक्कड़ हैं कि एक ही गोष्ठी में बोलते-बोलते परिपक्व हुए चले जाते हैं। वीरबालक बिरादरी में कुर्सी इसलिए भी बहुत जरूरी समझी जाती है कि यद्यपि हर वीरबालक अपने को कलम का मजदूर कहता है तथापि वह लिखकर पैसा कमाने को कलम बेच देने का पर्याय मानता है। इसलिए कभी वीरबालकों को पत्रकारिता से भी परहेज था। अब उससे तो नहीं लेकिन फिल्म और टीवी के लिए लिखने से है। खैर पत्रकार या लेखक के रूप में मीडिया से जुड़ने वाला हर वीरबालक यह कहते रहने जरूरी समझता है कि मैंने अपनी कलम बेची नहीं है और सरकार या सेठ से किसी तरह का समझौता नहीं किया है। पूँजीपतियों से जोड़े जाने के कलंक से बचने के लिए कुछ सयाने वीरबालकों ने किसी ऐसे छोटे-मोटे सेठ को पकड़ लेने की युक्ति अपनाई है जो साहित्य का मारा हुआ हो और बुद्धिजीवियों की सोहबत करा देने की एवज में सारे खर्चे-पानी का जुगाड़ खुशी-खुशी कर देता हो।

जो वीरबालक बड़े सेठों के लिए काम करते हैं वे इस बात को छिपा जाते हैं कि मालिक को नौकर की वैचारिक क्रांतिकारिता से कोई फर्क नहीं पड़ता। वह तो केवल जी-हजूरी और हितरक्षा चाहता है। जब तक आप विज्ञापन से आय बढ़वाते और सत्तावान लोगों से संबंध सुधरवाते रहेंगे तब तक सेठ आपको सांस्कृतिक पृष्ठों पर कुछ भी लिखने-छापने की पूरी छूट देता रहेगा। दूसरे वीरबालक आपकी शिकायत करें तो वह अनसुनी कर देगा। जी हाँ, सेठ से यह शिकायत की जाती थी कि आपका संपादक कम्युनिस्ट है और पश्चिमी रंग में रंगा हुआ है। अब यह शिकायत की जाती है कि आपका संपादक पोंगापंथी हिंदी वाला है जो भूमंडलीकरण के तकाजों से अनजान है।

कभी मेरे द्वारा साप्ताहिक हिंदुस्तान कि आवरण पर कांगड़ा-शैली के श्री राधा जी के चित्र के बारे में कृष्ण कुमार जी से यह शिकायत की गई कि पश्चिमी रंग में रंगे कम्युनिस्ट संपादक ने राधा का नग्न चित्र छापकर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाई है। कृष्ण कुमार जी ने मुझे बुलाकर कहा था, कांगड़ा शैली का है वह तो मैं समझ गया लेकिन भई देखो अपन ऐसे फोटो निकालें ही क्यों की लोग नाराज होवें और सर्कुलेशन घटे। मैं समझता हूँ कि अब नई पीढ़ी के सेठ भी नई पीढ़ी के संपादक जी को बुलाकर कुछ यों कहते होंगे, पोर्नोग्राफी के लिए कौन कह रहा है भई लेकिन अपने प्रोडक्ट की अपमार्केट इमेज तो बनानी ही चाहिए। हिंग्लिश यूज करके और लुगाइयों के सेमीन्यूड फोटो निकालकर। नहीं तो अपनी तो एड-रेवेन्यु निल रह जाएगी। जिसे पुराना सेठ अपसंस्कृति की जननी समझता था उसे नया सेठ अपमार्केट की मदर बताता है।

किसी छोटे या बड़े नेता, किसी छोटे या बड़े सेठ की कृपा से किसी गद्दी पर आसीन साहित्यिक सामंत वीरबालक का जलवा देखना हो तो उसके साथ कभी दौरे पर निकलिए। जहाँ जाइएगा स्टेशन या हवाईअड्डे पर स्थानिक वीरबालकों की सलामी गारद अटेंशन में पाइएगा। उसका स्थानिक मन-सबदार उसे हार पहनाएगा और वेरी इंपोर्टेंट वयोवृद्ध वीरबालक वी.आई.वी.वी. की चरण रज अपने माथे लगाएगा। फिर अपने यहाँ के सबसे बड़े नेता, सेठ या अधिकारी की कार में वी.आई.वी.वी. को अपने यहाँ के सबसे बढ़िया होटल या सरकारी विश्राम गृह में ले जाइएगा जहाँ कार-दाता एक और सलामी-गारद, एक और हार के साथ प्रस्तुत होगा। सलामी की रस्म पूरी हो जाने के बाद कारदात अपना स्काचदाता रूप दिखाते हुए एक बोतल सेवा में प्रस्तुत करेगा। जो सभा होगी उसमें वी.आई.वी.वी. अपनी वीरता और शत्रुओं की कायरता का बखान करके स्थानीय वीरबालकों की दाद पाएगा और स्थानीक साहित्यकारों के वीरबालकवादी तेवरों पर स्वयं दाद देगा। साहित्य चर्चा अंतर्गत इतना ही होगा कि स्थानिक वीरबालक वी.आई.वी.वी. को अपनी कोई पुस्तक थमाते जाएँगे कि सर पढ़कर दो शब्द लिखने की कृपा करें। सर प्रोत्साहन के दो शब्द वहीं बगैर पढ़े कह डालेंगे और दिनभर में मिली कई किलो रद्दी स्थानिक मनसबदार के लिए छोड़ आएँगे।

वी.आई.वी.वी. तरुण वीरबालकों को यह नेक सीख दे जाता है कि अच्छा साहित्यकार होने के लिए अच्छा वीरबालक होना जरूरी है, कुछ अच्छा पढ़ना या लिखना नहीं। जहाँ तक हो सके लिखो ही मत। लिखो तो अच्छा मत लिखो क्योंकि रूपवादी समझ लिए जाओगे। और देखो तुम्हें लिखने के जिद ही हो तो ऐसी छोटी-मोटी कविताएँ लिखो जिनकी तारीफ में मित्र आलोचक जितना भी कहें वो कम हो लेकिन जिनके बारे में इतना कहना ही काफी हो कि याद न रखी जा सकने के मामले में ये सर्वथा यादगार है। ऐसी कविताएँ लिखने में समय कम लगता है और संग्रह जल्दी तैयार हो जाता है। संग्रह पढ़ने में भी ज्यादा समय नहीं लगता। उपन्यास लिखोगे तो सभी वीरबालक लोकार्पण गोष्ठी में बिना पढ़े ही पहुँच जाएँगे। लेकिन दि बेस्ट तो यह है कि कुछ भी मत लिखो। बस विवादस्पद वक्तव्य, साक्षात्कार देते रहो। इस बात को समझो कि वीरबालकों के साहित्य-दरबार में राजा इंद्र का रोल ऐसे रिवोल्युशनरी ऋषि को ही नसीब हो पाता है जो आसार-संसार में आकंठ लिप्त होते हुए भी साहित्य संसार में संन्यास ले चुका हो। अब लगे हाथों कुछ बातें वीरबालकवाद के ऋषि पक्ष के संदर्भ में भी कर ली जाए। साहित्यिक हाजमा ठीक रखने के लिए सत्यम, शिवम, सुंदरम की डोज नियमित रूप से पीने और पिलाने वाले हमारे वीरबालकों का ऐसा विश्वास है कि ऋषिगण सुरा-सुंदरी और राजदरबार में मिलने वाले मान-सम्मान तीनों से सख्त दूरी बरतते आए हैं। सांसारिक भोग-विलास से यह परहेज ही उन्हें समाज की आँखों में राजा से ऊँचा स्थान दिलाता आया था। अब सुरा का ऐसा है कि उसका आविष्कार हुआ ही इस लिए की कतिपय कविमन किस्म के प्राणियों ने पाया कि नशे के अभाव में सही सुर लग नहीं पाता है। और सुंदरी का ऐसा है कि मानव जाति ने लँगोट का ईजाद किया ही तब जब आमराय यह बनी कि जो मर्द बच्चा सो लँगोट कच्चा।

प्राचीन ऋषियों के बारे में मेरी जानकारी नहीं के बराबर है इसलिए मैं पंडित वागीश शुक्ल से पूछकर ही आपको बता सकूँगा कि वे सुरा और सुंदरी से कितना परहेज बरतते थे। संभव है तब भी न बता पाऊँ क्योंकि प्राचीन भारत के बारे में किसी तरह की गड़बड़ बात बोलना निरापद नहीं है। दो नवीन ऋषियों उर्फ वीरबालकों में से ज्यादातर सुरा-सुंदरी त्याग नहीं पा रहे हैं बेचारे। तो इस संदर्भ में सारा वीरबालकत्व यह सिद्ध करने में है कि मैं पीता भी हूँ तो अपने पैसे की जबकि दूसरे मुफ्त की पीते हैं? जी हाँ, और अगर कौनो जन बहुत पीछे पड़ जाए तो हमहु पी लेते हैं। इस संदर्भ में वयोवृद्ध वीरबालकों के बारे में तरुण वीरबालक दिलचस्प जानकारियाँ देते रहे हैं मुझे। जैसे यह कि उनमें से एक सुरा-प्रेमियों को दर्शन देने बहुधा आ जाते हैं लेकिन मधुशाला को उनसे एक कानी कौड़ी भी लेने का आज तक कष्ट नहीं उठाना पड़ा है। कलम का कोई भी मजदूर शराब पीने में अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई बरबाद नहीं कर सकता, अपना जिगर भले कर दे।

जहाँ तक सुंदरियों का संबंध है कदाचित इतना ही कह देना पर्याप्त हो कि साहित्यकार होने के नाते वीरबालक में आरंभ से ही उत्कट सौंदर्यबोध रहता है और आयु के साथ-साथ उक्त सौंदर्यबोध तीव्रतर होता चला जाता है। स्वाभाविक है कि जो सुंदरियाँ युवा वीरबालक को माताएँ-बहनें लगती रहीं थीं वे वृद्धावस्था में बेटियाँ प्रतीत होने लगती हैं। पूर्णाहुत से ठीक पहले या ठीक बाद के क्षण में। नितांत प्रीतिकर रूप से पारिवारिक यह सौंदर्यप्रियता वीरबालकों के ऋषिपद की सुरक्षा करती रहती हैं। अब ऐसा है कि वीरबालक ऋषि के साथ-साथ क्रांतिकारी भी होते हैं और क्रांतिकारी आप जानिए आधुनिक भी होता है और आधुनिकता के मारे आप जानिए कि जैनेंद्र जी जैसे गांधीवादी लेखक तक को पत्नी के साथ-साथ प्रेमिका भी आवश्यक प्रतीत होने लगी थी। तो वीरबालक को क्रांतिकारी रूप में एक ठो प्रेमिका भी अपेक्षित रहती है। बल्कि दो ठो क्योंकि अज्ञेय नदी के द्वीप में अपने साथ रेखा और गौरा दूनों को ले गए थे और सौंदर्यबोध के क्षेत्र में अज्ञेय ही क्रांतिकारियों के आदर्श हैं। वीरबालकवादी साहित्यकार अपने आसपास से जुड़ा रहता है इसलिए जोड़ीदार प्रेमिका को भी आस-पास से ही प्राप्त करना चाहता है। इसके चलते साहित्य-साधिका को ही प्रेमिका बनाने की परिपाटी चली आ रही है। आज वीरबालकवादी डींगें वीरबालकवादी ढोंग के अनुपात में ही इतनी बढ़ चली हैं कि अब हर साहित्य-साधिका किसी न किसी वीरबालक को प्रेमिका ठहराई जा रही है। प्रतिपक्ष के वीरबालक हर सफल साहित्य-साधिका के विषय में यहाँ तक कहते सुने जाते हैं कि वह स्वयं नहीं लिखती, भले घर की औरतों को बिगाड़ने वाला अमुक लंपट वीरबालक उसके लिए लिख दिया करता है। यह शंका करना अपनी मूर्खता का परिचय देना होगा कि अगर वह लंपट-लँगोट-लुच्चा इतना अच्छा लिख सकता है तो अपने नाम से ही क्यों नहीं लिख लेता?

वीरबालक अपनी प्रेमिका का इस अर्थ में भी संरक्षक होता है कि वह उस पर दूसरों की बुरी नजर नहीं पड़ने देता। एक साहित्य-सभा के बाद चाय-पान के दौरान मैं अपना परिपक्व सौंदर्याबोध एक नवोदिता पर आजमाने लगा तो एक वयोवृद्ध वीरबालक विशेष मुझे बाँह पकड़कर एकांत में ले गए और उन्होंने फुसफुसाकर मुझसे कहा कि अइसा है ये बहुत ही संभ्रांत घर की महिला हैं और इनसे हमारा पारिवारिक सा संबंध रहा है। आप इनसे कुछ इस टाइप… आप समझ रहे हैं ना? अब इतना नासमझ तो बंधुवर मैं भी नहीं हूँ। इधर कुछ अन्य वीरबालक जो कोई ओर क्रांतिकारी चीज लिखने में अपने को असमर्थ पा रहे हैं, अपनी प्रेम-लीलाओं का सार्वजनिक स्वीकार करके अपनी वीरता का प्रमाण दे रहे हैं। सिद्ध कर रहे हैं कि भले ही वे अपने आराध्य पश्चिमी लेखकों जैसा कुछ रच न सके हों प्रेमिकाएँ अपनाने-छोड़ने के मामले में उनसे कभी पीछे नहीं रहे हैं।

आदिवासी गरीब स्त्रियों का ‘शिकार’ करके भी जनवादी कहलाने वाले कलाकार की आत्मकथा (!)

ऋषि-ग्रंथि के अंतर्गत वीरबालक बिरादरी में राजाश्रय और सेठाश्रय दोनों बड़ी घटिया किस्म की चीजें मानी जाती है। इसीलिए वीरबालक अपने लिए एक ठो स्टैंडर्ड बायोग्राफी गढ़ चुका होता है। मामूली हैसियकत वाले परिवार में जन्म, संघर्षरत माता अथवा पिता अथवा दोनों से प्रेरणा प्राप्त, निर्दय समाज से निर्भीक टक्कर, प्रलोभन ठुकरा क्रांति पथ पर अग्रसर, सीकरी को ठेंगा दिखाने के दंड-स्वरूप मान-सम्मान से वंचित, तिकड़मबाजों द्वारा उपेक्षित किंतु आश्वस्त कि हिस्ट्री बोलेगी ही वाज सिंपली ग्रेट बट हिस्ट्री की डिफिकल्टी यह है कि वह ससुरी मरणोपरांत शुरू होगी। तो वीरबालक दारू से महकती एक आह भरकर कहता है अपने से और अपनों से कि ‘अइसे तो हम निराला, मुक्तिबोध की तरह अनचीन्हे मर जावेंगे’ इसलिए नौकरी-वौकरी करनी पड़ जाती है और अपना स्थान बानने के लिए भी संघर्षरत रहना पड़ता है।

बता ही चुका हूँ कि वीरबालक-बिरादरी में यह माना जाता है कि दूसरों को नौकरी भ्रष्ट विचारधारा और उत्कृष्ट चमचागीरी के कारण मिली है। इसमें इतना और जोड़ना आवश्यक है कि इस बिरादरी में अगर किसी की कुर्सी जाती है तो वह यही कहता है कि मुझे अपनी क्रांतिकारी विचारधारा के कारण प्रतिक्रियावादी प्रतिष्ठान ने पद से हटाया। खैर इतना निर्विवाद है कि वीरबालक नौकरी सरकार की कर रहे हों या सेठ की वे सच्चे सेवक क्रांति के ही होते हैं। जैसा कि सरकारी नौकरी वाले एक नवोदित वीरबालक ने भरी सभा में मुझे ‘सिनिसिज्म’ के लिए लताड़ते हुए घोषणा की थी, जैसे तुलसी ने राम की चपरास गले में डाल ली थी वैसे हमने क्रांति की चपरास गले में डाल ली है। गोया वीरबालक राज हो या सेठ के दिए कपड़े भले ही पहन ले नीचे क्रांति की कोई जनेऊनुमा चपरास बराबर डाले रहते हैं कि नौकरी जाते ही कपड़े उतार के उसे दिखा दें।

राजाश्रय या सेठाश्रय की अनिवार्यता से तिलमिलाते वीरबालक फिर एक क्रांतिकारी स्थापना यह करते हैं कि हमें साहित्य में सेठों और नेताओं की घुसपैठ स्वीकार नहीं करनी चाहिए। अस्तु, न सरकारों और सेठों के दिए पुरस्कार ग्रहण किए जाएँ और न ऐसे किसी साहित्यिक आयोजन में सम्मिलित हुआ जाए जिसमें किसी मंत्री या सेठ को बुलाया जा रहा हो। लेकिन इसमें भी कुछ व्यावहारिक दिक्कतें आ जाती हैं। जैसे यह कि नेता न आए तो टी.वी. कवरेज नहीं होता, और तमाम जिस चीज का टी.वी. में कवरेज न हुआ हो वह न हुई मान ली जाती है। पुरस्कारों का ऐसा है कि सरकारों या सेठों द्वारा ही दिए जाते हैं। उन्हें ग्रहण न किया जाए तो बेटी की शादी से लेकर फ्लैट की खरीद तक कई काम अटके रह जाते हैं और कायदे का बायोडाटा भी नहीं बन पाता। ‘अस्तु, लेने ही पड़ जाते हैं बंधु।’ और फिर आप यह भी तो समझिए ना कि अगर कौनो बड़का मंत्री या कैपिटलिस्टुआ हमको सम्मानित करे के बदे आता है तब हमारा अस्टेटस उससे हाई ही न कहा जाएगा?

इसके बाद ले-देकर यह बचता है कि साधारण साहित्यिक आयोजन में नेता या सेठ न बुलाए जाएँ। महमूर्ख किस्म के लोग ही यह शंका कर सकते हैं कि जब वीरबालकों को नेताओं के दरबार में स्वयं हाजिरी लगाते कोई आपत्ति नहीं होती तब साहित्य के दरबार में उनकी उपस्थित से इतना कष्ट क्यों होता है। हमारे वीरबालक सिद्धांतवादी है। इसलिए उनके तमाम विरोध सैद्धांतिक स्तर पर ही होते आए हैं, व्यावहारिक स्तर पर नहीं। सुनता हूँ कि एक वीरबालक ने अपने घनिष्ठ मित्र और संरक्षक छोटा सेठ से कहा, ‘भाई मेरे बुरा मत मानियो सिद्धांत का मामला है आज मैं भरी सभा में तेरा जौत्य-कर्म करूँगा।’ इस पर छोटा सेठ ने कहा, ‘कर लियो भई लेकिन मीटिंग के बाद मंत्री जी से मेरा सौदा जरूर करवा दीयो।’ इस तरह के तमाम दिलचस्प किस्से मुझे नवोदित वीरबालकों के मुँह से सुनने को मिलते रहते हैं क्योंकि अब मैं वीरबालक बिरादरी में स्वयं ज्यादा चलायमान नहीं रह गया हूँ।

तरुण वीरबालकों के कई किस्से सुनकर अपने कानों पर विश्वास नहीं होता और यही प्रमाणित होता है कि हमारे नेताओं की तरह साहित्यिक मठाधीशों ने भी ऐसा माहौल बना दिया है जिसमें सब एक-दूसरे को और जाहिर है कि अपने को भी चोर मान रहे हैं। तरुण वीरबालक अधेड़ और वयोवृद्ध वीरबालकों की अनैतिकता, चाटुकारिता, भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के किस्से सुनाते जाते हैं और बेसब्री से मुझ वयोवृद्ध वीरबालक की किसी टिप्पणी की प्रतिक्षा करते हैं कि जाके संबद्ध व्यक्ति को सुना आएँ। मैं अपनी जबान को भरसक लगाम देता हूँ लेकिन मैं जानता हूँ कि चुप रहने से भी वीरबालक बिरादरी में कोई बात बनती नहीं है क्योंकि आपके मुँह से निकला कोई-न-कोई उद्गार सुविधानुसार गढ़ लिया जा सकता है। मुझे आश्चर्य होता है कि तरुण वीरबालक आकर कभी कोई साहित्यिक चर्चा नहीं करते। उनकी सारी बातचीत साहित्यिकार चर्चा को समर्पित रहती है। वह यही बताना चाहते हैं कि किसको जमाने-उखाड़ने के सिलसिले में वयोवृद्ध वीरबालकों में क्या सौदेबाजी हुई है।

उनके अनुसार कभी-कभी ये सौदे साहित्य के दायरे तक सीमित होते हैं जैसे यह कि वीरबालक ‘ए’ ने वीरबालक ‘बी” के लेखन की पहली बार निंदा की जगह प्रशंसा इसलिए की है कि वीरबालक बी ने वीरबालक ‘ए’ के विवादास्पद वक्तव्य के समर्थन में कुछ लिख दिया है। लेकिन अकसर ये सौदे अहो रूपम अहो ध्वनि के दायरे से बाहर होते हैं। प्रशंसा की कीमत कैश या कांइड में वसूल की जाती है। तरुण वीरबालक आते हैं और आश्चर्य करते हैं कि सर क्या आपको इतना भी नहीं पता कि अलाँ ने फलाँ को अपने खर्चे से विदेश यात्रा कराई है। अलाँ को तो फलाँ ने अपनी मिस्ट्रेस बना लिया है। अलाँ ने फलाँ के लिए उसकी कृति के विदेश अनुवाद किए जाने का या उसे विदेश में कोई फेलोशिप मिल जाने का जुगाड़ करवा दिया है। यह विदेश वाली बात तरुण वीरबालकों की चर्चा में अक्सर आ जाती है।

वीरबालकवाद के विदेश पक्ष का ऐसा है कि जहाँ ऋषि होने के नाते वीरबालक पश्चिम विरोधी होता है वहाँ क्रांतिकारी होने के होने के नाते वह आधुनिकता और मार्क्सवाद दानों का पक्षधर भी होता है और ये दोनों ही चीजें आप जानिए पश्चिमी ही हैं। इसलिए उसका आग्रह रहता है कि जिस हद तक मैं जीवन और लेखन में आधुनिक हुआ हूँ उस हद तक ठीक है लेकिन उसमें ज्यादातर पश्चिम के रंग में रंग जाना बहुत बुरा है। मेरे पाँव देश की माटी में मजबूती से जमे हुए हैं और मेरी जड़ें गाँव में गहरी गई हुई हैं। इसलिए मैं पश्चिमी-प्रदूषण की चपेट में आ ही नहीं सकता। लेकिन साथ ही वीरबालक को यह बोध भी रहता है कि मुझे गरीब, गँवई और आउट आफ डेट समझ लिए जाने का खतरा है इसीलिए वह सीकरी से कोई काम न रखते हुए भी सीकरी में अपने लिए एक ठो फ्लैट बनवा लेता है क्योंकि गाँव वाला घर तो वह फूँककर निकला होता है। सीकरी में प्रतीकात्मक माटी से सने हाथ वह ओडि क्लोन से धुलाने और प्रतीकात्मक पत्थर तोड़ते हुए सूखे कंठ को स्काच से तर करने की तथा बीच-बीच में फारेन कंट्रीज में हिंदी का झंडा गाड़ आने की व्यवस्था करता है।

वीरबालकों की इस विदेश ग्रंथि का जनक अज्ञेय जी को माना जा सकता है जिनके अभिजात्य से लोग-बाग उतने ही आक्रांत थे जितने कि उनके विदेश में प्रवास करते रहने से। मुझे लगता है कि जो लोग यह कहते सुने जाते थे कि अज्ञेय सी.आई.ए. के पैसे से विदेश जाकर नोबेल पुरस्कार के जुगाड़ में लगे रहते हैं, वे साथ ही इस बात के लिए भी ललक रहे थे कि हमारा भी कोई अंतरराष्ट्रीय चक्कर चले और हमारा भी दूसरों पर उतना ही रौब गालिब हो जितना कि अज्ञेय का हम पर हो रहा है। यही वजह है कि वीरबालक अपने साहित्यिक व्यायाम के लिए अंतरराष्ट्रीय आयाम तलाशते रहते हैं और अपनी हर उपलब्धि की सूचना अन्य वीरबालकों तक किसी न किसी तरह पहुँचाते रहते हैं ताकि जलने वाले जला करें।

तो हिंदी साहित्य में स्त्री-विमर्श पर बोलते हुए आप किसी वी.आई.वी.वी. को यह बोलते हुए सुन सकते हैं, ‘अभी मेरे पूर्व वक्ता आयोवा की अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला का जिक्र कर रहे थे, अमरीका के ही एक अन्य राज्य वरमोंट में उससे भी बड़ा आयोजन होता है जिसमें साहित्यकारों समेत चंद चुने हुए रचना-धर्मी व्यक्ति शांत, सुनम्य वन-प्रदेश में बनी कोटेजेज में साल-छह महीने रहने और विचार-विमर्श करने के लिए आमंत्रित किए जाते हैं। पिछले साल मुझे भी वहाँ बुलाया गया था जहाँ मेरी भेंट एस्ट्रोनिया की प्रसिद्ध कवयित्री जालीमा योन्यारी से हुई जो आजकल मेरी कविताओं का अपनी भाषा में अनुवाद कर रही हैं। तो जालिमा की छोटी सी कविता की ओर मैं आपका ध्यान दिलाना चाहता हूँ जिसमें सारा स्त्री-विमर्श समा गया है – स्त्री अहा, आ स्त्री आ स्त्री बला, जा स्त्री जा, स्त्री हाय-हाय, हाय स्त्री।’ इस पर तालियाँ बजती हैं क्योंकि वीरबालक की कविता में अब इतना भी उक्ति चमत्कार दुर्लभ हो चला है।

तो सभी वीरबालक विदेशों में कहीं-न-कहीं बुलाए जा रहे हैं और वहाँ कोई न कोई उनकी रचनाओं का अपनी भाषा में अनुवाद भी कर रहा है। थोड़ी सी दिक्कत है तो यही कि विदेशों में हिंदी लेखकों की साहित्यिक उपस्थिति कहीं दर्ज हो नहीं रही है जबकि अंग्रेजी में लिखने वाले भारतीय लेखकों को वहाँ तगड़ी रायल्टी और कलमतोड़ दाद मिल रही है। इसे चलते सहसा वीरबालकों का पश्चिम विरोध और अंग्रेजी विरोध भड़क उठता है। एक गोष्ठी में मैंने एक वी.आई.वी.वी. को यह सिद्ध करते हुए सुना कि अंग्रेजी में लिखने वाल सारे भारतीय लेखक चालू किस्म का लेखन करने वाली शोभा डे के भाई-बंद ही हैं। उन्होंने सारे उदाहरण शोभा डे के लेखन से ही दिए। वीरबालकवादियों के पश्चिम-विरोध का एक पक्ष यह भी है कि वे एक-दूसरे को पश्चिम की नकल करने वाला ठहराते रहते हैं। तो वीरबालक आधुनिक तो होता है लेकिन पश्चिम का पिछलग्गू नहीं। कृपया उसके पश्चिम के पिछलग्गू न होने का यह अर्थ भी न लगाया जाए कि वह पोंगापंथी होता है और साहित्य के संदर्भ में भारतीयता की बात करता है।

तो वयोवृद्ध वीरबालकों की कृपा से तरुण वीरबालकों की एक ऐसी पीढ़ी पनप रही है जो अंग्रेजी और संस्कृत दोनों से समान रूप से कटी हुई है और जो पांडित्य और इंटेलेक्टचुअलता दोनों की विरोधी है। वह हिंदी की साहित्यिक पत्रिकाएँ पढ़ लेना ही पर्याप्त समझती है और इन पत्रिकाओं में भी सबसे ज्यादा ध्यान से वी.आई.वी.वी. के वक्तव्य और गोष्ठी-समाचार पढ़ती है। अधिकतर वीरबालक अब अपने को जनवादी कहते हैं लेकिन उमें से अधिकतर के शास्त्रार्थ से कहीं यह संकेत नहीं मिलता कि उन्होंने मार्क्सवादी-लेनिनवादी शास्त्रों का बाकायदा कभी अध्ययन किया है। बल्कि स्थिति यह है कि मार्क्सवादी-लेनिनवादी पोथे बाँचे हुए लोग अब वी.आई.वी.वी. को थोड़े हास्यास्पद प्रतीत होने लगते हैं। मैं समझता हूँ कि कात्यायनी बहुत अच्छी कवयित्री होने के साथ-साथ मार्क्सवाद-लेनिनवाद की गहन समझ रखने वाली विदुषी भी हैं। इसलिए मेरे आश्चर्य का तब कोई ठिकाना नहीं रहा जब मैंने एक वी.आई.वी.वी. बहुल निर्णायक समिति में उनका नाम किसी पुरस्कार के लिए प्रस्तावित किया और पाया कि अनुमोदन करने के लिए कोई तैयार नहीं है।

वीरबालकवाद पर अपने इस वीरबालकवादी लेख की समाप्ति में एक काल्पनिक वीरबालक के बारे में एक ऐसे काल्पनिक संस्मरण से करना चाहता हूँ जो वास्तविकता के काफी निकट है और जो इस ओर इशारा करता है कि वीरबालकवादी तेवर हमें किन ऊँचाइयों की आरे ले जा रहे हैं। किसी कस्बे के हिंदी विभागाध्यक्ष ने ‘अस्तित्ववाद’ पर संगोष्ठी की अध्यक्षता के लिए ऐसे संपादक वीरबालक को आमंत्रित किया जिसने स्वर्गीय सार्त्र और लगभग स्वर्गीय अस्तित्ववाद का नाम नहीं सुना था लेकिन जो अपनी पत्रिका में हर उस गोष्ठी का वृतांत सचित्र छापता था जिसकी उससे अध्यक्षता कराई गई हो। अब पूछिए कि अस्तित्ववाद से अनजान वह वीरबालक अध्यक्ष पद पर विराजमान होकर क्या करता है?

वह ऊँघता है। सभी वीरबालक व्यस्तातिव्यस्त किस्म के व्यक्ति होते हैं और अध्यक्षताओं के सिलसिले में बादल आवारा को मात करते हैं। उन्हें सोने और साँस लेने की फर्सत तक अध्यक्ष पर विराजमान होने के बाद ही मिलती है। ऊँघने को वीरबालकों के संसार में ध्यान से सुनने का पर्याय ठहराया जाता है। और हर वीरबालक ऊँघते-ऊँघते भी बीच-बीच में दो-चार फिकरे सुन ही लेता है ताकि अगर विरोधी खेमे का कोई वीरबालक उसके सो जाने पर चुटकी ले तो फौरन डेढ़ आँख खोले और कहे, ‘अरे आप कहते न रहिए महाराज, हम ध्यान से सुन रहे हैं और जल्दी से मेन पांइट पर आइए नहीं तो हम सचमुच सो जावेंगे। खैर तो जब हमारे वीरबालक अध्यक्ष की बोलने की बारी आती है तब वह ऊँघते-ऊँघते सुनी हुई बातों के आधार पर अपने को वीरबालक सिद्ध करने वाली कुछ बातें कहकर तालियाँ बजवा ही लेता है।’

यथा, हमें यह बहुत गड़बड़ लगता है कि हिंदी के आधुनिक लेखक पश्चिम के बड़े लेखकों की नकल मारकर अपने को बड़ा कहलवाना चाहते हैं। उससे भी ज्यादा गड़बड़ बात यह है कि नामवर सिंह और अशोक वाजपेयी टाइप हमारे मार्डन मठाधीश इन नकली लोगों की पीठ ठोंकते रहते हैं। देखिए हमें भी बहुत लालच दिया गया कि मार्डन बनने के लिए एक्जस्टेन्सवाद अपनाओ। बट हमने कह दिया नो। आप पूछेंगे नो क्यों कहा? हमने तो इसलिए किया कि हम जानते हैं कि जो भी एक्जिस्टेन्सवाद है, वह भारतीयों के मार्डन नहीं एन्सिएंट है। भगवान बुद्ध हमारे यहाँ बहुत पहले कह चुके थे। फ्रांस के सारतरे ने उनके आइडिया की नकल मारकर अपने को बड़ा भारी राइटर और फिलासफर साबित करने की कोशिश की है। इस मरे सारतरे का रौब भारत भवन वाले खाते हों, हम जेनुइन भारतीय नहीं खाते क्योंकि हम प्रेमचंद की परंपरा के लेखक हैं।

इस पर देशभक्ति और हिंदीभक्ति में लीन रहने वाले लोग इतनी तालियाँ बजाते हैं कि गदगदायमान वीरबालक को सहसा याद आता है कि संपादक की हैसियत से पिछली गर्मियों में मुझे पेरिस-प्रवास करने का सुख भी मिला था। अस्तु वह अब दूसरी ताली-तलब बात भी कह डालता है, पिछली गर्मियों में पेरिस विश्वविद्यालय ने हमें एक सेमिनार पर प्रिसाइड करने के लिए बुलाया था। वहाँ अंग्रेजी में लिखने वाले कुछ इंडियन राइटर्स भी थे। लंच ब्रेक में हमने देखा कि वे सब के सब हमें अकेला छोड़कर किसी अभी-अभी पहुँचे आदमी से बात करने के लिए चले गए हैं। तो हमने अपनी फ्रांसिसी मेजबान को बुलाया और उनसे फ्रेंच में कहा, ‘हलो एक्सक्यूज मी’, हू दैट मैन देयर?’ मेजबान फ्रेंच में बोली, ‘अरे दै! ही इज तो अपना सारतरे। सुनते ही हमने फैसला किया कि इसको यहीं सबके सामने खरी-खरी सुनाएँगे ताकि इसे पता चल जाए कि हिंदी राइटर इंडियन इंग्लिश राइटर्स की तरह पश्चिम का थूका हुआ चाटने वाला चाटुकार नहीं है।

इस पर तालियाँ बजती हैं वीरबालक अपनी विनम्रता और दुस्साहस दोनों का परिचय देते हुए बताता है, तो हम अपनी प्लेट लेकर सरतरे के पास पहुँचे। पहले सोच रहे थे कि उससे फ्रेंच बोलें लेकिन एक तो हमारी फ्रेंच इतनी अच्छी नहीं है कि उसमें गूढ़ साहित्यिक चर्चा कर सकें। दूसरे हम चाहते थो कि अदर इंडियन राइटर्स भी हमारी बात समझ सकें। तो हमने सारतरे से कहा, ‘हलो एक्स्क्यूज मी, आई आल्सो इंडियन राइटर बट मैं आपका रौब नहीं खाता। बल्कि पोजीशन यह है कि अब आप यहाँ आ गए हैं तो मैं खाना भी नहीं खाऊँगा। इसका रीजन यह है कि आपने सारा सहित्य उल्टी करने की इच्छा पर लिखा है। इसलिए आपको देखते ही मुझे उल्टियाँ आने लगी हैं। हम इंडियन्स हैं और हमें बड़ों की इज्जत करना सिखाया जाता है इसलिए मैं आपसे बहुत आदरपूर्वक यह कहना चाहता हूँ कि आपको बुद्ध से चुरायी हुई एक्जिस्टेन्सवाद की फिलासफी सैकेंड हैंड है और आपका लिटरेचर थर्ड रेट। थैंक्यु एंड गुड बाई। इतना कहकर हम वाकआउट कर गए।’

हमारा वीरबालक तालियों की गड़गड़ाहट के बीच मंच से उतरता है और जिस स्थानिक कवियित्री के वह दो मुक्तक छाप चुका होता है वह भाव-विभोर होकर उसकी ओर बढ़ती है। एक मुसरचंद-मार्का मूर्खबालक हमारे वीरबालक के आगे वह शंका रखने की धृष्टता करता है, लेकिन सर सार्त्र तो बहुत पहले ही मर चुके थे। वीरबालक बहुत आश्वासन के साथ कहता है, हाँ, मारे शर्म के।

मनोहर श्याम जोशी 1935- (देहांत: मार्च ३०, २००६) आधुनिक हिन्दी साहित्य के श्रेष्ट गद्यकार, उपन्यासकार, व्यंग्यकार, पत्रकार, दूरदर्शन धारावाहिक लेखक, जनवादी-विचारक, फिल्म पट-कथा लेखक, उच्च कोटि के संपादक, कुशल प्रवक्ता तथा स्तंभ-लेखक थे। दूरदर्शन के प्रसिद्ध और लोकप्रिय धारावाहिकों- ‘ बुनियाद’ ‘नेताजी कहिन’, ‘मुंगेरी लाल के हसीं सपने’, ‘हम लोग’ आदि के कारण वे भारत के घर-घर में प्रसिद्ध हो गए थे। वे रंग-कर्म के भी अच्छे जानकार थे। उन्होंने धारावाहिक और फिल्म लेखन से संबंधित ‘ पटकथा-लेखन’ नामक पुस्तक की रचना की है। दिनमान’ और ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ के संपादक भी रहे। (वीकीपीडीया से)

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मेरे हमदम मेरे दोस्त

दलित पुरुष के लेखन में स्त्री

इस मुद्दे पर दलित स्त्री विमर्श प्राय: उत्तेजित और आवेशमयीमुद्रा में रहता आया है। वास्तव में यह मुद्दा दलित स्त्री विमर्श के रूपाकार ग्रहण करने का तात्विक मुद्दा है। अर्थात दलित स्त्री विमर्श के पैदा होने की जड़ में यह मुद्दा मौजूद है। अपनी जड़ों से जुड़े रहना किसी भी समाज, व्यक्ति और संस्थान के लिए जिन्दा रहने की शर्त की तरह जरूरी होता है। यह अलग बात है कि यह जुड़ाव विकास की संभावनाओं को अवरुद्ध करता नहीं होना चाहिए। दलित स्त्री विमर्श पुरुष मात्र का विरोध नहीं पुरुष को तथाकथित पुरुष बनाने की मशीनरी का विरोध है। जिसका हर्जाना दोनों को भुगतना पड़ता है। इस लेख में हम पाँच पुरुष दलित लेखकों की कहानियों का अध्ययन करेंगे। इनमें ओमप्रकाश वाल्मीकि, कैलाश वानखेड़े, मुकेश मानस, अजय नावरिया और सूरज बड़त्या शामिल हैं। यहाँ उद्देश्य केवल यह देखना नहीं है कि दलित पुरुष लेखन में स्त्रियों के मुद्दों को कितना ओर किस स्तर तक उठाया गया है बल्कि यह देखना भी है कि दलित समाज में स्त्री की स्थिति और छवि कैसी है।

इस अध्ययन को इस प्रकार रखा गया है कि यह समझा जा सके कि क्या सचमुच स्वानुभूति और सहानुभूति के तर्क में कुछ दम है? क्या सचमुच स्त्रियों के मामले में पुरुष चिंतन की सीमाएँ हैं? जिस प्रकार गैर दलित, दलित की पीड़ा, मन:स्थति, इच्छाओं और आंकाक्षाओं को समझ पाने में चूक जाते हैं? क्या वैसे ही पुरुष (दलित) भी स्त्रियों (दलित) की दिक्कतों और चाहतों को समझ पाने उनके लिए आवाज़ उठा पाने में चूक जाते हैं? वास्तव में मनुष्य के चिंतन की यात्रा स्व से ब्रह्माण्ड तक फैली है। स्व से शुरू हुई यह यात्रा स्व के परिवार, कुल, बिरादरी, जाति, प्रदेश, देश दुनिया तक तोफैली है; पर यह यात्रास्व की विशिष्ट स्थितियों व अनुभवों को छोड़ नही पाती। लिंग, धर्म, जात, कुल, संस्कृति और जगह विशेष (भूगोल) के अनुभव बहुत हद तक उसके स्व का निर्माण करते हैं और उसके स्व से प्रभावित भी होते हैं। यह सब इतना अनायास परपंरा से होता रहता है कि उपरी तौर पर देखने से पूरी तरह प्राकृतिक (नेचुरल) लगता है जबकि यह होता सामाजिक और राजनैतिक है।

इन कहानियों को पढ़ने के बाद पता चलता है कि दलित पुरुष लेखको की कहानियों में जातीय तिरस्कार, जातीय पहचान के अनुभव सबसे ज्यादा अभिव्यक्त हुए हैं। जाति की समस्या से विभिन्न स्तरों और तरीकों पर जूझने के कारण इनका स्कूली जीवन, कॉलेज और ऑफ़िस का माहौल तथा आस-पड़ौस के संबंध सभी विकृत हैं। जातीय दुर्व्यवहार के अंतर्गत  ही सवर्णों द्वारा दलित स्त्री के यौन शोषण भी किया जाता है जिसे इन लेखकों ने कुछ हद तक अपनी कहानियों का विषय बनाया है इसमें ओमप्रककाश वाल्मीकि की जंगल की रानी, खानाबदोश, अजय नावरिया की इज्जत, विशेष उल्लेखनीय है। पर क्या दलित स्त्री के मुद्दे दलित पुरुष लेखकों को इतना नहीं खींचते कि दलित स्त्री उस लेखन के भरोसे रह सके? असल में दलित पुरुष भी अपनी बुनावट में पुरुष पहले है दलित बाद में। अर्थात उसकी लिगं संबंधी पहचान ज्यादा सघन और दृढ़ है, ज्यादा नेचुरल जैसी लगने वाली। यहाँ कोई कह सकता है कि लिंग की पहचान तो होती ही प्राकृतिक है। हाँ वह है, पर इसी पहचान की वजह से पुरुष परिवार और समाज की धुरी होने, नेता या मुखिया होने की गारण्टी नहीं पा लेता। यह सब ऐतिहासिक  विकासक्रम और परंपरा की देन है।

कमाल की बात है कि दलित समाज के इतिहास में हुबहू ऐसी कोई परंपरा न होने के बावजूद भी सामाजिक और पारिवारिक स्तर पर बखूबी पुरुषसत्तात्मकता देखने को मिलती है। ज्यों-ज्यों दलित परिवार जीविकोपार्जन के लिए सामुहिक श्रम (परिवार और बिरादरी के स्तर पर) को छोड़ कर पूँजीवादी व्यवस्था में अलग-अलग जगहों और संस्थानों मेंकाम करने लगे। अपेक्षाकृत भिन्न शारीरिक श्रम वाले और काम की मानसिक संतुष्टि न दे सकने वाले इन कामों को जीविकार्जन के तौर पर अपनाने से उनके व्यवहार में पुरुषसत्तात्मकता का संचार होने लगा । इस परिवर्तन ने पहले परिवार के आर्थिक तंत्र को विकृत किया। फिर सामाजिक और सांस्कृतिक ढाँचे को (तोड़) बदल दिया। परिवर्तन की इस यात्रा में पहले पुरुष निकले। चाहे कारण सामाजिक और राजनैतिक थे, या वह युग ही परिवर्तन का ही युग था| पर पुरानी व्यवस्था को छोड़ कर पहले पुरुष बाहर आए और उन्होंने नए आर्थिक तंत्र में कदम रखा। जहाँ उनका काम, उनकी मेहनत अलग (परिवार की सामुहिक मेहनत से) दिखाई पड़ती थी और उसका मेहनताना सिर्फ़ उनके हाथ पर रखा जाता था जिसके स्वामी वे खुद थे। एक व्यक्ति के रूप में यह उनका (पुरुष) स्वतंत्र होना था पर भारतीय व्यवस्था में स्त्री इस तथाकथित स्वतंत्रता से वंचित रह गई।  स्त्री जो घर का आधार थी पुराने तंत्र और व्यवस्था के साथ पीछे छूट गई। क्योंकि परिवार और बच्चों को छोड़ कर दूर जाना अपेक्षाकृत पुरुष के लिए आसान होता है दूसरा भारतीय पूँजीवादी व्यवस्था में स्त्रियाँ श्रमिक के तौर पर फिट नहीं होतीं थीं। यहाँ शुरूआती कारखानों और फ़ैक्टरियों को उनके लिए डिजाइन ही नहीं किया गया। धीरे-धीरे दलित परिवारों और समाजों में भी स्त्रियाँ अकेली और कम महत्वपूर्ण होती गईं और पुरुष शहर आकर अधिक महत्वपूर्ण और केन्द्रीय होते चले गए। बाकि उन्होंने अपेक्षाकृत पहले तथाकथित सभ्य हो चुके परिवारों और समाजों का अनुसरण भी किया।

यही वजह है कि पिछले लगभग ३०-४० बरसों से लिखे जा रहे दलित साहित्य में परिवार और समाज की व्यवस्था बहुत कुछ वैसी ही नज़र आती है जैसी प्राय: तथाकथित मुख्य धारा के साहित्य में नज़र आती है। अर्थात् परिवार के केन्द्र में पुरुष है। एक तरह का विशेषाधिकार पुरुषों को प्राप्त है। जैसे जैसे ये परिवार गाँव से शहरों की ओर आते हैं पुरुष ज्यादा मजबूत होकर निकलता है। यह केवल पुरुष लेखकों के ही लेखन में नहीं बल्कि स्त्री लेखकों की कहानियों में भी यह देखने को मिलता है बस अंतर इस बात का है कि पुरुष लेखकों के लिए यह सब सहज है उसे इसमें किसी तरह की परेशानी नहीं नज़र आती, पर स्त्री लेखकों के यहाँ उस पर सवाल उठाए जाते हैं उसकी वजह से उनके (स्त्रियों) व्यक्तित्व के विकास में और समाज के विकास में जो दिक्कतें और बाधाएँ महसूस होती है उनका जिक्र किया जाता है। हांलाकि इसका कोई सटीक जवाब उनके पास भी नहीं है। 

समाज और परिवार के इसी ढाँचे की वजह से प्राय: दलित लेखकों की कहानियों में दलित नायक समाज और परिवार के आमूल चूल परिवर्तन की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ही महसूस करता है। पढ़-लिख कर जब वह बाहर निकला तो स्वत; ही उसने अपने आप को अपने समाज और परिवार का नायक मान लिया। आदर्श के रूप में उसके सामने जो व्यवस्था थी या है उसमें पुरुष ही नेतृत्व करता है। वह ही मुख्य होता है वह ही निर्धारित करता है कि किस दिशा में आगे बढ़ना है। अब चाहे वह इस जिम्मेदारी को निभाना चाहे या न निभाना चाहे पर इसका दबाव जरूर उसे अपने कंधों पर महसूस होता है। प्राय: परिवारों के भीतर इसी कारण उसका झगड़ा और खींचतान चलती है। परिवार और समाज को बदलने की इस मुहीम में स्त्री कितना और किस तरह शामिल होनी चाहिए यह वह खुद निर्धारित करता है और जब ऐसा नहीं हो पाता तो स्त्री-पुरुष के बीच संघर्ष होता है। पहली पीढ़ी के अधिकांश पुरुष लेखकों के लेखन में यह खींचतान साफ़ दिखाई देती है। ओमप्रकाश वाल्मीकि की प्रसिद्ध कहानी ‘घुसपैठिये’; कहानी का नायक राकेश बराबर इस तनाव से भी जूझता दिखाई देता है कि उसकी पत्नी इन्दु नहीं चाहती कि उसका पति इस जात बिरादरी के चक्कर में पड़े और जो सम्मान और इज्जत उन्होंने कमाई है उसे दाव पर लगा दिया जाए। इसी प्रकार सूरज बड़त्या की कहानी में ‘कामरेड का बक्सा’ में भी दलित नायक स्वयं इसी उधेड़बुन से जूझता पाता है। मुकेश मानस की कहानियों में भी पिता और बड़ा बेटा भी परिवार के इस बोझ और उसे पूरा न कर पाने की खीज, झल्लाहट से निरंतर टकराते हैं और इस सब में उनके गुस्से और खीज की शिकार स्त्री (पत्नी और माँ के रूप में) होती है। ‘बड़ा बेटा’ कहानी में रासबिहारी (नायक) ज्यों ही घर में कदम रखता है उसे अपनी साँस घुटती सी महसूस होती है। पिता जिन जिम्मेदारियों को निभाने में अक्षम हो गए अब उन्हें रासबिहारी अपने कंधों पर महसूस करने लगा है। “उसका पिता जो छोटा-मोटा खराद करने वाले से एक ठेकेदार में तब्दील हो गया था, उसके चार नौकर भी थे जो उसके मातहत काम करते थे। चौरासी के दंगों के बाद उसका सब लुट गया क्योंकि जिनसे उसके ठेके बँधे थे वे सब सिक्ख थे और चौरासी के बाद वे सब या तो गाँव चले गए या गुनामानी के अँधेरे में खो गए।तब से वह लुट गया इसी गम में पीने लगा और एक अच्छे इंसान से शराबी, क्रूर, मतलबी, पत्नी और बच्चों को पीटने वाला वहशी बन गया।“(उन्नीस सौ चौरासी पेज न.९७)

इस प्रकार हम देखते हं कि दलित पुरुष कहानीकारों की कहानियों में जो परिवार हैं उनमें पुरुष केन्द्र में है। वह या तो बहुत जागरुक है समाज का नेतृत्व करना चाहता है और इसके लिए उसे प्राय: अपनी पत्नी से निराशा होती है क्योंकि वह उसका साथ नहीं देती। वास्तव में यह साथ उसे अपने साथ कंधे से कंधा मिलाकर बाहर की दुनिया में नहीं चाहिये वह चाहता है कि पत्नी चुपचाप घर और परिवार के प्रति जो पुरुष की भी जिम्मेदारियाँ हैं उन्हें उठा ले और उसे तथाकथित ज्यादा महत्वपूर्ण और ज्यादा जरूरी कामों के लिए मुक्त कर दें। दूसरे वे पुरुष हैं जो समाज से इतर परिवार के प्रति भी अपनी जिम्मेदारियाँ निभाने में असमर्थ होते हैं और इस बात को स्वीकार करने के बजाए वह परिवार और बच्चों को बोझ समझने लगते हैं। आये दिन घर में कलेश मार-पिटाई के दृश्य आम होते हैं। दोनों ही स्थितियों में स्त्री को वह अपनी साथी के रूप में नहीं एक अवरोधक के रूप में एक मातहत कर्मचारी के तौर पर देखते है। असल में यही वह पुरुषसत्तात्मक दृष्टि है जो उसे इस पूँजीवादी व्यवस्था के परिणामस्वरूप मिली है। यही वह पुरुषसत्तात्मक दृष्टि है जो उसने अपने सामने के तथाकथित आदर्श समाजों से सहज ही ग्रहण कर ली।

प्रेमचंद का प्रसिद्ध उपन्यास कर्मभूमि शायद बहुत से लोगों ने पढ़ा होगा। कथा नायक अमरकान्त और उसकी पत्नी सुखदा के बीच हमेशा तनातनी रहती है। अमरकान्त अपने आप को समाज के प्रति ज्यादा जिम्मेवार और समर्पित महसूस करता हुआ यह समझता है कि पत्नी को तो बस पैसे और गहनों से प्यार है, अपनी और अपने होने वाले बच्चे की ही चिन्ता है जबकि वह स्वयं तो देश और समाज का सारा भार अपने सिर पर उठाए है। और शुरुआत में यह सच भी नज़र आता है। पर आगे चलकर हम देखते हैं कि अपने आत्मसम्मान, परिवार और समाज के लिए जब निर्णय लेने का समय आता है, कुछ करने का समय आता है तब यही सुखदा जितनी तत्परता से, जितनी दृढ़ता से निर्णय लेती है उतनी तत्परता से तो स्वयं अमरकांत नहीं ले पाता। निर्णय के क्षणों में वह भटक जाता है। सुखदा अपनी जान तक को जोखिम में डाल कर लोगों के साथ जा खड़ी होती है। सुखदा में जितना पुरुषार्थ है उतना अमरकान्त में नहीं है। ठीक ऐसे ही धनिया के पुरुषार्थ के सामने होरी दब्बू और भीरु है। कुल मिलाकर कहने का मतलब यह है कि ‘पुरुषार्थ’ शब्द से जिस भाव या गुण का बोध होता है वह सिर्फ़ पुरुषों की जागीर नहीं है। बेशक इस भाव व गुण के लिए जो शब्दबना उसमें पुरुष शब्द शामिल है। प्रेमचन्द भारतीय परंपरा के इस भाव को समझ गए थे कि नेतृत्व का गुण अलग-अलग परिस्थितियों में स्त्री और पुरुष किसी में भी हो सकता है, किसी में भी काम कर सकता है। दलित पुरुष लेखकों को भी अपने पुरुष नायकों को परिवार और समाज का अकेले ही  नेतृत्व करने के अनिवार्य कार्यभार से मुक्त करना होगा। इसके लिए जरूरी यह भी है कि स्वयं इस अतिरिक्त दबाव से मुक्त हों।दूसरी जरूरी बात यह कि जैसा कि प्रेमचन्द ने भी ‘कर्मभूमि’ में बताया कि स्त्री और पुरुष के बीच जो अंतर्विरोध है उसका बड़ा कारण भी यह है कि पुरुष अपनी योजना में स्त्री को शामिल ही नहीं करता वह स्वयं ही अपने भीतर यह मान कर चलता है कि स्त्री का, विशेष रूप से उसकी माँ,बहन और पत्नी का कार्य क्षेत्र केवल घर तक सीमित है औरउसका क्षेत्र घर से बाहर का। फिर उन पर यह आरोप और खीज भी कि वे उसकी जिम्मेदारियाँ बँटवाती नहीं हैं। उसे अकेले ही सबकुछ झेलना पड़ता है। घर के भीतर के निर्णयों में भी वह स्त्री को स्वतंत्र नहीं रहने देता, वहाँ भी औरत उसकी इच्छाओं और  आज्ञाओं  को ढोने वाली होती है।

पुरुषसत्ता (ब्राह्मणवादी व्यवस्था भी)कैसे काम करती है, इसको समझने का एक और तरीका है। प्राय: जो काम समाज में ज्यादा महत्वपूर्ण समझे गए हैं, जिनके करने में गौरव, प्रशंसा और प्रशस्ति अधिक है उन्हें पुरुष स्वयं अपने हिस्से में रखना चाहता है। या रखता आया है। ठीक वैसे ही जैसे तथाकथित सवर्ण जातियाँ या कुलीन लोग ऐसे कामों को अपना कार्यक्षेत्र समझते आये हैं। देश, समाज और जाति के बारे में सोचना और काम करना ऐसे ही महत्वपूर्ण काम हैं। ‘रंगभूमि’के राजा महेन्द्रकुमारसिंह को यही समस्या सूरदास चमार से है। निश्चित रूप से एक व्यक्ति सारे काम नहीं कर सकता। देश, समाज, जाति के हित मेंकाम करने वालों को अपने निजी और परिवार की जिम्मेदारियों को दूसरे लोगों पर छोड़ना ही पड़ता है। सिद्धार्थ गौतम की पीछे छूट गई जिम्मेवारियों का निर्वाह यशोधरा ने किया।उसके कंधों की मजबूती मापकर ही सिद्धार्थ समाज हित में निकल पाए। आज बहुत सी स्रियाँ जो घर से बाहर निकल कर समाज में अपेक्षाकृत ज्यादा महत्वपूर्ण कामों में अपनी सफ़लता सिद्ध कर रही हैं तो वह तभी संभव है जब उनके घर में पीछे छूट गईं जिम्मेवारियों को कोई और पूरा कर रहा है। चाहे वे घर-घर काम करने वालीधरेलू नौकरानियाँ ही क्यों हों। ऐसे लोगों को अपने सहयोगी के रूप में देखना, उनका सम्मान करना, उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करना क्या जरूरी नहीं? ऐसे ही पुरुष स्त्रियों को अपने सहयोगी साथी के रूप में देखे तो क्या ज्यादा सही तरीका नहीं है? अक्सर इस कृतज्ञता, सम्मान और विश्वास के अभाव में स्त्री, घर व परिवार के तमाम कामों को करते हुए भी उनसे वह संतोष नहीं पाती है जो कोई भी श्रम और दिमागी काम को करते हुए प्राय: किसी भी व्यक्ति को पाना चाहिए। उसे बेगार करने की सी अनुभूति होती है जिसके कारण वह हमेशा झल्लाई हुई पुरुष को कोसती है। वह उसे गलत सिद्ध करने की कोशिश करती है। पितृसत्ता को समझ पाने के अभाव में वह पुरुष मात्र की विरोधी हो जाती है। वह भी तथाकथित पुरुष हो जाना चाहती है।  पुरुषभी पुरुरसत्ता के कारण ही जबरन यह मानने को मजबूर है कि वह श्रेष्ठ है, सारी जिम्मेदारी उसी की है।वह ही धुरी है और स्त्री उसके आधीनहै। उसे स्त्री को पालना है उसकीरक्षाकरनी है। उसका भरण पोषण करना है।

अब बात करते हैं उन कहानियों की जो सीधे-सीधे स्त्री विमर्श की कहानियाँ हैं। यह सही है कि पुरुष लेखकों की कहानियों में औरतों के मुद्दे और केन्द्रीय स्त्री पात्र प्राय: कम ही होते हैं पर ऐसा भी नहीं है कि वे नहीं ही होते हैं। ओमप्रकाश वाल्मीकि की ‘जिनावार’, ‘खानाबदोश’ और ‘जंगल की रानी’ तीनों ही कहानियाँ स्त्री केन्द्रित कहानियाँ हैं। ‘जिनावर’ कहानी में कहानी का केन्द्रीय पात्र बेशक दलित पुरुष है पर वह स्त्रियों के सम्मान, उनकी इज्जत के प्रति बहुत समर्पित है। कहानी का नायक जगेसर, ठाकुर परिवार का बँधुआ मजदूर है। उन्हीं के यहाँ खाता है उन्हीं के यहाँ रहता है। परिवार की बहु-बेटियों को उनके ससुराल और मायके छोड़ने और लेने जाता है। बहुत विश्वास का आदमी है वह। एक दिन परिवार की बहु को उसके मायके छोड़ कर आते समय वह बहुत परेशान है क्योंकि उसे खटका लग रहा है कि बहु बहुत उदास है, परिवार का कोई सदस्य उसे बाहर तक छोड़ने भी नहीं आया। रास्ते में उसे धीरे-धीरे पता चलता है कि यह ठाकुर खानदान कितना कमीना है। बड़े ठाकुर साहब अपनी ही बहु से यौन संबंध बनान चाहते है। बहु के मना करने पर उसे घर से निकाल दिया गया है। बहु के मायके में भी पिता के न होने पर मामा लोगों ने ही उसका पालन पोषण किया और साथ ही उसका यौन शोषण भी। वह घिन्ना उठता है कि ये लोग इंसान हैं या जिनावर।

असल में यह कहानी एक उद्देश्यपूर्ण कहानी है, और उद्देश्य यह सिद्ध करना है कि ठाकुर लोग अपनी स्त्रियों, अपने खानदान और परिवार की स्त्रियों के प्रति भी कितने क्रूर और लंपट होते है। और दलित पुरुष कितने भले और चरित्रवान। अपने पहले दौर कि कहानियों में दलित कहानियाँ ब्राह्मणों और ठाकुरों को सीधे-सीधे टारगेट करके लिखी गईं थीं। उन्हें विलेन के रूप में तथा दलित पुरुषों को नायक के रूप में चित्रित किया जाता था। बहुत बार और बहुत हद तक यह चित्रण ठीक और समाज का सच्चा चित्रण ही होता था पर कई बार अति उत्साह में अतिरंजना पूर्ण चित्रण और वर्णन भी होता था। जैसे यह ‘जिनावर’ कहानी बेहद कमजोर कहानी है। किसी सुनी सुनाई या मनगढंत घटना पर तब तक मजबूत कहानी नहीं हो सकती जब तक अनुभव का कोई सच्चा स्रोत न हो। यह कहानी सीधे-सीधे ठाकुरों को जानवर और दलित पुरुरष को महान सिद्ध करने के उद्देश्य से लिखी गई है। उद्देश्यपूर्ण कहानियाँप्राय: अच्छी कहानियाँ नहीं होती। दूसरी कहानी ‘जंगल की रानी’ भी लगभग ऐसी ही कहानी है पर फिर भी पहली कहानी से काफ़ी बेहतर बन पड़ी है। आदिवासी समाज की नवयुवती को फाँसने के लिए एक हुए राजनेता, पुलिस और क्षेत्रिय प्रशासन के लोग  और उनकी करतूत का पर्दा फाश करता नायक जो स्वयं दलित समाज से है। कहानी में अगर कुछ जीवंत बन पड़ा है तो उस आदिवासी युवती का जुझारूपन। उसका दुर्दमनीय साहस। पर अंत में वह मारी जाती है और लेखक टिप्पणी करता है-‘जंगल की रानी अपराजेय थी।‘

ओमप्रकाश वाल्मीकि की ‘खानाबदोश’ कहानी भी इसी दिशा की ओर है। ईंट बनाने के भट्टों पर अधिकाँशतया निम्न जातियों के लोग बँधुआ मजदूरों की तरह काम करते हैं। भट्टों के मालिक वहाँ काम करने वाली स्त्रियों का यौन शोषण भी करते हैं। खानाबदोश कहानी ईंट भट्टे पर काम करने वाले ऐसे ही दलित दम्पति की कहानी है। वहाँ मानो और सुखिया दोनों देखते हैं कि महंगें कपड़ों, मुफ़्त की सुविधाओं के लालच में औरतें व्यभिचार के लिए तैयार भी हो जाती हैं। उनके पति नामर्द से अपने आप को दारू के नशे में डुबो लेते हैं। जब भट्टे के मालिक सूबेसिंह की ओर से ‘मानों’ पर दाँव फेंका जाता है तो मानों और सुखिया वहाँ से पलायन करना मंजूर करते हैं पर अपनी इज्जत से समझौता नहीं करते। पर कहानी इतनी सीधी नहीं है। उसमें जबरदस्त घुमाव है इस घुमाव के कारण कहानी दिलचस्प बन जाती है पर साथ कुछ सवाल छोड़ जाती है जिसे लेखक ने तो अनदेखा कर दिया पर पाठक के जहन में वे उठते ही हैं। कहानी में जब मानों को सूबेसिंह के द्वारा उसके कमरे में आने का आदेश मिलता है तो लेखक लिखता है- “मानो ने सुकिया की ओर देखा। उसकी आँखों में भय से उत्पन्न कातरता थी। सुकिया भी इस बुलावे पर हड़बड़ा गया था। वह जानता था, मछली को फ़ँसाने के लिए जाल फेंका जा रहा है। गुस्से और आक्रोश से उसकी नसें खिंचने लगीं थी।“  वहाँ मानो और सुकिया के साथ जयदेव नाम का एक और मजदूर है जो काफ़ी दिनों से उनके साथ काम कर रहा है। उसके साथ उसका परिवार नहीं है इसलिए ठेकेदार ने उसे मानो और सुकिया के साथ लगा दिया है। तीनों मिल कर ईंट थापने, बनाने का काम करते हैं। जो समूह जितनी ईंटे बनाता है उसी के आधार पर उनको पैसा मिलता है। जयदेव अपेक्षाकृत जवान है मेहनत से काम करता है इसलिए मानो और सुकिया से अच्छी ट्युनिंग बन गई है। जब भट्टे के मालिक ने मानो को बुलवाया तो मानो और सुकिया की घबराहट देख कर उनकी स्थति को भांप कर जयदेव ने खुद सूबेसिंह के पास जाना उचित समझा। _ “तुम यहीं ठहरो… मैं देखता हूँ। चलो चाचा।“ बदले में सूबेसिंह की तरफ़ से उसे खूब पीटा जाता है, बल्कि अधमरा कर दिया जाता है। वह उन दोनों को अपना ही समझता था इसलिए मानो और सुकिया को बचाने के लिए वह खामखाह सूबेसिंह से दुश्मनी मोल लेता है। यहाँ तक तो पाठक को सब ठीक समझ में आ रहा है पर अचानक यह जयदेव न जाने किस प्रेरणा से ब्राह्मण करार कर दिया जाता है और वह उस अधमरी अवस्था में भी मानो के हाथ का बना खाना खाने के लिए तैयार नहीं होता। उस रात जयदेव के लिए रोटी बनाकर ले जाती मानो को अचानक से सुकिया कहता है कि “बामण तेरे हाथ की रोट्टी खावेगा… अकल मारी गई तेरी,” मानो का तो पता नहीं पर पाठक एकदम चौंक जाता है। अरे यह एकदम क्या हुआ।इसके बाद तो जयदेव सच में ब्राह्मण बन जाता है बल्कि उसके इस बदले व्यवहार की वजह से उन्हें वह भट्टा छोड़ने को मजबूर होना पड़ता है। जयदेव को लगता है कि वह खामखाह इन चमारों के चक्कर में अपना नुकसान क्यों करे। इनके पचड़े में क्यों पड़े। माना वह नहीं जानता था कि इनका साथ देने का परिणाम उसके लिए इतना भयंकर होगा। पर ऐसा तो वह उन्हीं की जात बिरादरी का होते हुए भी सोच सकता था इसके लिए उसका ब्राह्मण होना कोई जरूरी तो नहीं था। मानो की उसके प्रति जो इतनी आत्मीयता है उसे वह जिस तरह तार तार करता है वह बहुत कष्टप्रद है। यह बात पाठक के गले नहीं उतरती कि जयदेव का ब्राह्ंण होना क्यों जरूरी था। कहीं न कहीं यह उसी मुहीम का हिस्सा है जिसके तहत शरुआती कहानियाँ लिखी गईं जिसमें खल पात्र को किसी ऊँची जाति से होना जरूरी है। पर यहाँ जयदेव का ब्राह्मण होना अखरता है। कहानी में उसे जबरदस्ती ब्राह्मण बनाया गया है। इस तथ्य के साथ कहानी न्याय नहीं कर पाती। जयदेव पर जबरन ब्राह्मणत्व थोपा गया है शायद कोई और सत्य छिपाने के लिए। कहीं इसलिए तो नहीं कि मानो की रक्षा के लिए सुकिया नहीं जयदेव खड़ा होता है। यह सुकिया के तथाकथित पुरुषार्थ को चुनौती तो नहीं?

अजय नावरिया की कहानियों में स्त्रियों के मुद्दे काफ़ी शिद्दत से जगह बनाते हैं। वे स्त्रियों के सवालों पर बहुत सजग होकर विचार करते हैं। और यहीं गलती हो जाती है क्योंकि इस अतिरिक्त सजगता में उनके भीतर का पुरुष गलती कर बैठता है। ‘इज्जत’ एक ऐसी ही कहानी है। दलित स्त्री का यौन शोषण सवर्णों द्वारा होता है, यह एक ऐसा स्वीकृत समाजिक सत्य है जिसे दलितों ने भी ऐसे घोट कर पी लिया है कि जैसे अगर ऐसा न हो तब कोई असामान्य स्थिति है या फिर कोई षडयंत्र। यह कहानी भी एक उद्देश्य पूर्ण कहानी है। जिसमें लेखक सायास यह कहना चाहता है कि सवर्णों द्वारा दलित स्त्री का शोषण तो होता ही रहेगा जरूरत इस बात की है कि अबदलित स्त्री शर्म से मुँह छिपाकर बैठने या लाज से डूब मरने की बजाय उसके खिलाफ़ आवाज उठाये। निश्चित ही यह एक प्रगतिशील समझ है। पर शायद अतिरिक्त उत्साह में कहानी के भीतर कहानीकार का सारा प्रयास, एक बहुत ही मजबूत, बहुत सजग दलित स्त्री का पहले बलात्कार तो हो, इस पर खर्च होता दिखाई देता है। उस नायिका के बच निकलने के सारे रास्ते सायास बंद कर दिये जाते हैं। ऐसा लगता है कि गाँव के दबंगों से ज्यादा कहानीकार खुद यह चाहता है कि उस स्त्री का पहले बलात्कार तो हो तभी न उसके खिलाफ़ आवाज़ उठाने का मौका मिलेगा। और अनायास ही कहानी जो कहना चाहती है उसके बजाए वह कह जाती है जिसका शायद चेतन रूप से लेखक को भी पता नहीं। यह कहानी दलित स्त्री की हिम्मत तोड़ने वाली कहानी है। लेखक का सारा प्रयास बलात्कार के होने में है उसके बाद की मजबूत लड़ाई में नहीं।

अजय नावरिया की अभी पिछले ही साल कथादेश के दलित विशेषांक में छपी ‘आवरण ‘कहानी में भी ऐसी ही चूक हो जाती है। कहानी अपने साथ बहुत सारे आयामों को लेकर चलती है। बहुत सारे आवरण हैं जिन्हें उतार फेंकना है पर शीर्षक की सार्थकता सबसे ज्यादा तब मुखर होती है जब कहानी का प्रौढ़नायक, पत्नी से अलग होने के बाद, कई महिला मित्रों के साथ संबंध बना चुकने के बाद, अंतत: अपने मनोनुकूल जीवन साथी पा जाता है। खुद पर पूरी तरह मर मिटने को तैयार इस नायिका के साथ पहली बार यौन संबंध बनाते समय वह उसे अपने वस्त्र खुद उतारने को कहता है। “पहली बार तुम खुद उतारो ये आवरण” नायक द्वारा नायिका को कहा गया यह संवाद बहुत विशेष होकर उभरता है। कहानी का शीर्षक यहाँ आकर सार्थकता प्राप्त करता है। आखिर वे कौन से आवरण हैं जिनके उतारे जाने की बात यहाँ पर कही गई है? निश्चित ही वे केवल वस्त्र ही तो नहीं हैं। आखिर लेखक क्या कहना चाहता है? असल में घाट-घाट का पानी पी चुके नायक की यह अतिरिक्त चतुराई है जिसमें वह स्त्री से बाद में उलाहना देने के इस अधिकार को भी छीन लेना चाहता है कि वह कह सके कि उसके साथ ज्यादती हुई।  “अब ये तुम्हारी भी मर्जी हुई रम्या”

 दूसरा इसी कहानी में उसी समय संबंध बना चुकने के बाद कहानी की नायिका खून से सनी चादर को इस गर्व से दिखाती और उठाती है कि“आप पहले पुरुष हैं जिसे मैंने इतना नजदीक आने दिया।“  यहाँ न जाने किस मंशा से लेखक स्त्री के संपूर्ण होने के मायने में उसके अक्षत योनि होने को तमगे की तरह रखता है। वह अपने बारे में तो स्वीकार करता है कि “… पिछले चार महीने से, जब से तुम आई, मेरी जिन्दगी में कोई और नहीं है।“ पर आगे बढ़कर यह नहीं कह पाता कि अगर तुम्हारी जिन्दगी में मैं इस कदर पहला पुरुष नहीं भी होता तो मुझे कोई फ़रक नहीं पड़ता। यह इसलिए भी जरूरी था क्योंकि इस कहानी में लेखक इस बात की वकालत करता है कि स्त्री पुरुष दोस्त के रूप में एक दूसरे के साथ घूमने जा सकते हैं, संबंध बना सकते हैं। स्त्री-पुरुष के लिए विवाहपूर्व संबंध बनाने की वकालत करते समय यह कहाँ संभव है कि स्त्री अपने इच्छित संबंध तक पहुचने तक अक्षत यौवना रह सके। वास्तव में इसी कहानी में नायक रम्या (नायिका) से कहता है कि जीवन साथी के रूप में “जीवन भर हम अपने ‘आत्म’ के उस अंश को ही तलाशते रहते हैं, जिसके साथ होने पर हमें अपना ही होना लगे, तुम मेरे लिए मेरा वही सेल्फ़ हो।“ (पेज न.८२) रम्या तक पहुँचने की यात्रा में दीपांकर एक ब्याहता पत्नी के अलावा कितनी ही और महिला मित्रों के साथ संबंध बना चुके थे पर यदि ऐसा ही रम्या के साथ होता तो क्या रम्या का अक्षत योनि होना संभव था।और जब ऐसा संभव नहीं है तो रम्या की सफ़ेद चादर का लाल होना क्यों जरूरी बन पड़ा। यहाँ लेखक के भीतर का पुरुष सक्रिय होकर यह सब लिखवा रहा है। यहाँ तक कि अपने जीवन साथीको अपने ही आत्म के अंश के रूप में देखने की यह आत्मस्वीकारोक्ति भी कुछ यूं देखी जा सकती है।एक पुरुष द्वारा अपनी पत्नी को अपने से भिन्न व्यक्तित्व के रूप में, अपने से भिन्न विचार और मान्यताओं के साथ, अपने से भिन्न रुचियों और आदतों के साथ न देख पाने, न सह पाने की जिद के रूप में भी देखा जा सकता है।

वास्तव में अपने आपको प्रमुख, केन्द्र में और धुरी मानने का यह आग्रह ही पुरुष में पुरुषसत्तात्मकता के रूप में जाना जाता है। अजय नावरिया जी की कहानियों के पुरुष में यह आग्रह लगातार बना रहता है। उसे अकेला चलना मंजूर है पर साथी के लिए अपनी चाल कुछ धीमी करना, अपना रास्ता कुछ बदलना मंजूर नहीं। पुरुष और स्त्री के चिंतन में यही मूलभूत अंतर है। स्त्री अपने यात्रा में अकेली नहीं होती वह अपने संबंधों के साथ होती है। संबंध वही रचती है और बहुत बार अपनी यात्रा अपने संबंधों के हिसाब से बदलती और संशोधित भी करती है। स्त्री के लिए उसके संबंध महत्वूर्ण हैं पुरुष के लिए उसका अहम् (सेल्फ़)। अपनी ही एक दूसरी कहानी “निर्वासन” में अजय नावरिया जी ने पुरुष (दलित) के भीतर की इस प्रवृति को पकड़ा और बखूबी उसे उजागर भी किया है। “कभी-कभी वे (कथानायक के पिता) वहाँ से नीचे उतरते और हमें पढ़ाते, हमें घुमाने भी ले जाते। कभी-कभी बाहर खाना भी खिलाते, माँ भी साथ होती पर बात वे सबसे ज्यादा हम दोनों भाइयों से करते, माँ से भीबातें करते पर कुछ देर बाद ही चिढ़ जाते, ‘यू डोंट हैव कॉमन सेंस’ माँ से झल्लाकर वे कहते ‘तुम एकदम गधी हो।‘ माँ यह सुनकर मुस्कुरा देती तो मुझे गुस्सा आ जाता। यह सब घूमना-विरना, हंसना, बोलना उनकी अपनी सहूलियत के हिसाब से था। हमें तो सिर्फ़ अनुसरण करना होता। वे हमारे पिता थे, हम उनकी ‘प्रजा’… प्रजापति थे वेया फिर एक उदार ‘डान’ की तरह थे।“ (यस सर पेज न.१५२) कहानी का नायक जब तक बच्चा है तब तक उसे माँ के प्रति पिता के इस बर्ताव पर गुस्सा आता है और माँ पर भी कि वह इसे अपना अपमान क्यों नहीं समझती। पर बड़ा होने पर और स्वयं पिता की ही भूमिका में आने पर उसे पिता में दोषनज़र आना बंद हो गया बल्कि फिरसारीकमियाँ माँ में ही नज़राने लगीं। माँ को गुलामी पसंद आ गई थी। माँ को खाने के अलावा कुछ भी काम ठीक से करना नहीं आता था। खाना भी जब चार लोगों का बनाना होता तो वह आठ लगों का बना देती जो बाद में फेंका जाता। “खाना बनाने का ही एक ऐसा काम था जिसमे माँ सबसे कम गलती करती थी। बाकी हर काम वह कई-कई बार गलत करती और पिता से फटकार खाती, जैसे-जैसे हम बड़े हुए हमने यह सच्चाई भी जानी। पापा का यह दुख भी समझ में आने लगा और माँ की विवशता भी, शायद एक आरोपित, अनमेल और अनिच्छित  रिश्ता था पिता के लिए… और माँ के लिए तो कोई विकल्प ही नहीं था और मुश्किल यह थी कि दोनों को इस रिश्ते से निजात मिलना लगभग नामुमकिन था। वे दोनों विवाह के अटूट पाश में थे मृत्यु ही इस अटूट की काट थी।“(पेज न. १५३)

पढ़-लिख कर अपने परिवार और अपनी जाति का उद्धार करने  गाँव से शहर पहुँचे पहली पीढ़ी के दलित पुरुष की सबसे बड़ी समस्या उसके अपने ही घर में थी उसकी पत्नी। यह पत्नी या तो बेपढ़ी-लिखी थी या कम पढ़ी लिखी। घरेलू उपचारक के तौर पर ही काम करने वाली। वह बाहर जाकर कमाकर नहीं लाती थी इसलिए पुरुष की इच्छा और आज्ञा मानने को मजबूर होती भी थी और समझी भी जाती थी। इस पीढ़ी के पुरुष की चेतना में परिवार का मुखिया वही था। घर परिवार की सारी जिम्मेदारी उसकी की थी, घर की इज्जत उसके सिर पर थी। गाँव से भिन्न सामाजिक और सामुदायिक ढाँचे में उसे अपने लिये जगह बनानी थी। यहाँ जाति भिन्न और ज्यादा जटिल रूप में उसके सामने थी। क्योकि घर से बाहर वह ही निकल रहा था इसलिए उसे ही जाति कोइस बदलेहुए रूप में ज्यादा झेलना पड़ता था।ऐसें उसने अपने जैसे पुरुषों का समूह बनाया और उनके साथ हो लिया।और धीरे-धीरे वह अपने घर, परिवार, और पत्नी सभी से कटने लगा।घर में वह अकेला हो गया। उसकी चेतना से स्त्री के अनुभव निकल गए। स्त्री, समाज और परिवार के जरूरी सदस्य रूप में, देश-दुनिया समाज और जाति के बारे में क्या सोचती है? क्या समझ रखती है? उसके अनुभव कैसे है? यह सब उसके लिए जरूरी नहीं रहा। इस सब के प्रति वह लापरवाह हो गया। जब वह घर से बाहर जाती ही नहीं तो उसके अनुभवों का क्या महत्व।

 स्त्री स्वभावत: श्रमशील और सर्जक है, पीड़ा और अभाव में भी वह सृजनशील बनी रहती है इसलिए उसके व्यवहार में तल्खी और तुर्शी अपेक्षाकृत कम रहती है। इसके परिणाम स्वरूप पुरुष यह मान बैठता है कि दलित स्त्री के लिए जाति कोई समस्या नहीं या समस्या को समस्या के रूप में समझ पाने की अक्ल उसके पास नहीं। उल्टा इस पहली पीढ़ी के दलित पुरुष ने स्त्री के नैसर्गिक स्वाभाव को समझ पाने के अभाव में यह मानना शुरू कर दिया कि दलित स्त्री ने सवर्ण पुरुषों के साथ कोई गठजोड़ बना लिया है। या उनके घरों की ये स्त्रियाँ ही हैं जिनके कारण सवर्ण पुरुष उन्हें सरेआम नीचा दिखा सकते हैं। ऐसे में उनकी यही समझ बनी कि अपने घरों और परिवारों की स्त्रियों को घरों के बाहर न निकलने दिया जाए। उन पर भी वैसा ही कठोर नियंत्रण हो जैसा सवर्ण स्त्री पर प्राय: देखा जाता है। वे ये देख और समझ पाने में असमर्थ रहे कि गाँव से शहर की इस यात्रा मेंस्त्री से न केवल उसका ससुराल, मायका, कुनबा छूटा बल्कि उसकी समझ को निखारने वाले, उसके अनुभवों को गहराई देने वाले, उसके आत्मविश्वास को दृढ़ करने वाले तमाम परंपरागत पेशे, हुनर, उसकी सारी सामाजिकता, सारी सामूहिकता उससे छीन ली गई। उसे रंग रस हीन बना कर बेसहारा बना दिया गया। जैनेन्द्र की कहानी ‘पत्नी’ और अज्ञेय की ‘रोज’ पढ़कर अस्सी और नब्बे के दशक की दलित स्त्री (जो अपने पढ़े-लिखे सरकारी नौकरी पाए पति के साथ शहर चली आई थी) की मन:स्थति का कुछ कुछ अंदाजा लगाया जा सकता है। डा. धर्मवीर की पीढ़ी के बहुत से दलित लेखकों और पुरुषों के यहाँ पत्नी को लेकर बनी समस्या को इस तरह देखा और समझा जा सकता है। डा अजय नावरिया जी कीकहानियों में भी पुरुषों की स्त्री दृष्टि इस प्रभाव से मुक्त नहीं है।

कहानी कार मुकेश मानस की कहानियों को पढ़ने के बाद स्त्री के पक्ष में स्थितियाँ चाहे बहुत बेहतर न हों पर यह उनकी ईमानदारी है कि वह अपनी कहानियों को सायास स्त्री विमर्श की कहानी नहीं बनाते। समाज में जो और जैसा उन्होंने देखा उनके संवेदनशील मन ने उसे ज्यों का त्यों रखने की कोशिश की। बिना यह देखे कि वे किसके विरोध और पक्ष में जा रही हैं। उनकी इस ईमानदारी के चलते उनकी कहानियाँ दलित समाज और परिवारों में स्त्री की सच्ची और प्रमाणिक तस्वीर पेश करती  हैं। एक आम आदमी बिना दलित और सवर्ण हुए स्त्री को कैसे देखता है? उससे कैसे व्यवहार करता है? इस संदर्भ में सबसे पहले बात करें ‘धब्बे’कहानी की। कहानी का नरेटर जो एक तरह से कहानी का प्रमुख पात्र भी है, वह महिलाओं के प्रति समाज की विशेष रूप से पुरुषों की सोच व दृष्टि से बेहद आहत और खीजा हुआ है। एक ओर वह स्वयं पत्रकार बनने के लिए संघर्ष कर रहा है दूसरी ओर अपने चारों ओर घटती इस तरह की घटनाओं से रोज दो चार होता है। पर सिवाय अपनी नपुंसक छटपटाहट और निष्क्रिय क्रोध के कुछ कर भी नहीं पाता। अपने कंधे की शाल को नंगे बदन घूमती उस भिखारिन के शरीर पर डालकर और मन ही मन औरत के इस नंगेपन के लिए समाज को लताड़ कर वह आगे बढ़ जाता है। ‘औरत का नंगापन समाज का कलंक है।‘नौकरी की तलाश में पूरा दिन अलग-अलग जगह, अलग-अलग लोगों से मिलकर दिनभर भटकने के बाद जब वह शाम को वापस लौटा तो अपनी उम्र के आवारा लड़कों को उस भिखारिन के साथ जबरन मुँह काला करते देख वह आतंकित हो उठता है। इस भयानक सच पर यकीन न कर पाने के कारण वह अपना ही हाथ काट लेता है। उसके हाथ पर खून के वैसे ही धब्बे उभर आए जैसे उस भिखारिन की टांगों के बीच में दिखाई दे रहे थे।

एक अन्य कहानी ‘सूअर’बहुत ही जबरदस्त ढंग से दृष्टा भाव से निरपेक्ष होकर लिखी कहानी। शहरों की दलित बस्तियों का जीवंत चित्रण, रात-बिरात आदमियों का औरतों को पीटना “साली कापर-टी निकाल मजा नहीं आता।… तेरी माँ की… साली कुतिया। मुझे सिखायेगी। बता किस-किसके संग मुंह काला करेगी साली?” इतना ही नहीं कॉलेज में पढ़ने वाले नई उम्र के लड़कों का भी कोई बहुत बदला हुआ रवैया नहीं है। ‘आँख का कांटा’ और ‘केवल छूना चाहता था’ कॉलेज में पढ़ने वाले लड़कों की लड़कियों के बारे सोच और समझ को दर्शाती है। ‘आंख का कांटा’ की अखिला जो डरी-सहमी सकुचाई लड़कियों की जगह लड़कों से खुलकर मिलती है। अपने प्रेम और भावना का इजहार करती है। भरी बस में लड़कों से बात करना खुलकर हँसना, खुश होकर लड़कों का हाथ पकड़ लेना, कॉलेज के फ़ंक्शन में गाना गाना ये सब उसकी खूबियाँ नहीं उसकी वे खामियाँ है जो शरीफ़ से शरीफ़- बदमाश से बदमाश लड़कों को रास नहीं आती। सब उसे अपनी तरह से तराशना और इस्तेमाल करना चाहते हैं। “वह बहुत खुलकर बात कर रही थी और मैं सकुचा सकुचा। बात-बात में वह मेरे बाजू या पीठ पर धौल जमा देती थी। मैं थोड़ा झेंप जाता। पूरे सफ़र में वह काफ़ी ‘बोल्ड’ बातें करती रही और मैं ‘हाँ-हूँ’ करता आया। बस में वह मुझसे सटकर खड़ी थी। उसकी इस हरकत से मुझे अपने भीतर एक थिरकन सी महसूस हो रही थी जिससे मेरी जुबान लड़खड़ा-सी रही थी।“ उस दिन बस में ही नायक कथावाचक को अखिला की आँखों में गहरी तीखी काँटे जैसी चीज नज़र आई। वह काँटे जैसी चीज क्या है वह सोचता रहा। कहानी के अंत में जाकर स्पष्ट होता है कि वह काँटे जैसी चीज वास्तव में उसी की आँखों में थी जो उसे तब नज़र अई जब अखिला की जिंदगी बर्बाद हो चुकी थी। असल में काँटा पुरुषों की आँखों में होता है जो औरत को अपने तरीके से डिजाइन करना चाहता है। और जब ऐसा नहीं हो पाता तो वे उसे रंडी की संज्ञा दे देते हैं।

दलित स्री की प्रति अपनी संवेदना और बराबरी के आग्रह के चलते कैलाश वानखेड़े दलित पुरुष लेखकों के बीच एक उम्मीद के रूप में उभरते हैं। उनकी कहानियों में दलित स्त्री छवि को बहुत ईमानदारी और संवेदनशीलता के साथ चित्रित किया जाता है। मुकेश की कहानियों में दलित समाज का अति निम्न वर्ग है तो कैलाश वानखेडे की कहनियों में दलित समाज का अपेक्षाकृत पढ़ा लिखा और जागरुक वर्ग चित्रित हुआ है। उनकी कहानी ‘तुम लोग’ में “तुम लोग” का गहरा तीखा कटाक्ष केवल पुरुष पर नहीं पड़ता उसमें स्त्री भी बराबर की भागी दार है। यह पति-पत्नी के समवेत संघर्ष की कहानी है। यहाँ गरीबी, मुफ़लिसी और जातीय अपमान से झल्लाया पुरुष पत्नी को निशाना नही बनाता। गाँव छोड़ जब दलितों ने शहरों में शरण ली तो छोटे, अधेंरे और सीलन से भरेउन इलाकों में उन्हें जगह मिली जहाँ यूँ ही गलियों और सड़कों पर पानी भरा रहता है और बरसात के मौसम का तो क्या ही कहना। कहानी के पति-पत्नी एक ऐसे ही इलाके में रहते हैं।  बरसात का मौसम है सब्जियों के दाम चार गुना बढ़ गए हैं। पत्नी रत्नप्रभा घासलेट की एक-एक बूँद को भी गिनकर खर्च करती है। दूध की एक-एक बूँद अन्न का एक -एक दाना वह ईमान की तरह बचाती है उस पत्नी पर नायक कैसे झल्ला सकता है। उस गरीबी और अवमानना के वे दोनों इक्ट्ठे शिकार हैं केवल पुरुष नहीं।  कहानी शूरू ही वहाँ से होती है कि चूल्हा जलाने के प्रयास में रत्नप्रभा घासलेट का इस्तेमाल करती है क्योंकि बरसात में गीली लकड़ियाँ जलने को तैयार ही नहीं। इस प्रयास में निश्चित गिनती से एक बूँद ज्यादा गिर जाती है जिसका अफ़सोस रत्नप्रभा पर निराशा की तरह छा जाता है। पति सब्जी खरीदने निकला तो है पर जानता है कि सब्जी वाला भी उसकी औकात जानता है। पति सरेआम सब्जी वाले और वहाँ खड़े ग्राहकों के सामने अपमानित होने से बचना भी चाहता है पर पत्नी के भीतर सुखी जिन्दगी के बुझते सपनों को जगाने हेतु जाना भी चाहता है। “जाने की जल्दी नहीं, जल्दी पहुँचना नहीं चाहताहूँ। चाहता हूँ कि जब सब्जी की दुकानों की जगह पहुँच जाऊँ, तब वहाँ सब्जीवाले न हों। वे जा चुके हों अपने अपने घर, और तब कहूँगा घर आकर कि आज नहीं था कोई सब्जीवाला। भला इतनी न थमने वाली बारिश में कैसे आ सकती है सब्जी? तब शेर बन जाऊँगा और बिना रुके तमाम अपमान, पीड़ा और भय को निकाल दूँगा शब्दों से, जो पड़ेंगे हंटर की तरह घरवाली पर तो… तो? हंटर और रत्नप्रभा शब्द जेहन में पड़ते ही उतर गया चेहरा मेरा। कितना सहती है फिर भी कुछ नहीं कहती है, वह मर चुकी हो जैसे और टूट चुका हूँ मैं। क्या कहेँगे हम एक-दूसरे से? नहीं कहूँगा मैं उससे ऐसे शब्द जो जिस भावना के साथ अभी-अभी उतर थे मेरे दिमाग में। शब्दों की मार कितनी खतरनाक होती है— यह वही जान सकता है जिसने सही हो शब्दों से प्रताड़ना। जिसके झुलस गये हों शब्दों की आग से तमाम सपने।“

कैलाश वानखेड़े के यहाँ दलित पुरुष जो ऑफ़िस में, आस-पड़ौस में जिस जातीय अपमान और तिरस्कार को झेलता है। वहाँ हमेशा खुद को पीछे धकेले जाते, अपनी काबलियत को कुचले जाते देखता है। और घर में ठीक ऐसा ही व्यवहार पुरुष को स्त्री के प्रति करते देखता है तो उसे समझ आता है कि ब्राह्मणवादी सोच और पितृसत्ता एक ही तरीके से काम करती है। दोनों वास्तव में एक ही है। पितृसत्ता को पोषित करके आप ब्राहमणवाद का मुकाबला नहीं कर सकते। ‘कितने बुश कित्ते मनु’ कहानी में पिता की पुरुषसत्तात्मक सोच और व्यवहार, ऑफ़िस के बड़े बाबू शर्मा जी की तरह का है। शर्मामानता है कि “धरम रसातल में चला गया। जिनकी औकात हमारे समाने खड़े रहने की नहीं थी वे कुर्सियाँ तोड़ रहे हैं।“ ठीक इसी तरह का व्यवहार नायक के पिता का अपनी पत्नी और बेटे की पत्नी के प्रति है। बड़ी होती बच्ची के सामने तू-तड़ाक से बात करते पिता को जब पत्नी टोक देती है तो पिता का जवाब कुछ ऐसा ही होता है।“ तू सिखायेगी कैसे बोलना?” लेखक लिखता है “पिता में दफ़्तर के शर्मा बाबू का रूपातंरण कब हो गया पता नहीं चला। पिता जिन्होंने ताउम्र कोई काम नहीं किया, जो माँ की तनख्वाह पर ऐश करते रहे… वो पिता जिनका होना न होना बराबर था… वो पिता जिनसे कोई उम्मीद हम भाई-बहनों और माँ को नहीं थी… वो पिता हमसे हमारी जिदंगी छीनना चाहते हैं।… यही पिता जो पत्नी की कमाई पर निर्भर थे उसी पत्नी को वे हमेशा कमतर, बेअक्ल, बेककूफ़ और गधी ही कहते-समझते रहे थे।

दलित स्त्री के मुद्दों पर संवेदनशीलता को लेकर ‘उसका आना’ कहानी परचर्चा जरूर की जानी चाहिए। कहानीकार ने एक कस्बाई मानसिकता में स्त्री और दलित स्त्री के प्रति लोगों की संकीर्ण सोच को बखूबी उजागर किया है। कथानायक प्रकाश एक साइकिल की दुकान पर काम करता है। कविता पढ़ने का शौक रखता है। उसने अखबार में एक स्त्री की स्थिति को बयाँ करती बहुत ही सुन्दर कविता पढ़ी। कविता पढ़कर वह बहुत प्रभावित हुआ। साथ ही वह कवयित्री के प्रति आभार और सम्मान से भर उठा उसने सोचा कि क्यों न उस लेखिका से मिलकर उसका धन्यवाद व्यक्त किया जाए क्योंकि कविता ठीक उसी के विचारों को व्यक्त किये दे रही थी। पर इसके बाद की उधेड़बुन में पूरी कस्बाई मानसिकता उभर कर आती है कि एक स्त्री चाहे वह किसी भी उम्र की हो और किसी भी समाज की हो, उसका परिवार किसी पुरुष प्रसंशक को नहीं झेल पाएगा? क्या पता वह लेखिका अपने परिवार से छिप छिपाकर कविता लिखती और छपवाती हो। जब उसके परिवार को पता चलेगा तो वह परिवार उसके इस कार्य को सम्मान से देखेगा या…. । अगर सम्मान से देखने वाला परिवार होता तो वह छिप कर लिखती ही क्यों। लेखक बताना चाहता है कि अभी भी कस्बाई मानसिकता में औरत का कविता लिखना, मतलब अपने मन का, अपनी समझ का, अपनी इच्छा का इजहार करनाहै,  जो कि पुरुषसत्तात्मक समाज को मंजूर नहीं। कहानी की वह कवयित्री वास्तव में वहीं आसपास की है। और उसके ससुर के हाथ वह अखबार लग भी जाता है। अखबार में उस कविता के ठीक पीछे एक और खबर है जिसमें एक आदिवाली लड़की के सरेआम किसी कॉलेज में घुसकर चोरी करते पकड़े जाने की खबर है। उस छुटभैय्ये नेता टाईप ससुर ने वह अखबार लिया ही उस आदिवाली लड़की की खबर पर चटखारे लेने के लिए है। पर उसके ठीक पीछे अपने ही घर की बहु की कविता छपी देखकर वह भौंचक रह जाता है। उसे लगता है कि उसकी बहु (कविता लिखने और उसके अखबार में छपने के कारण) उस आदिवाली लड़की के स्तर पर आ गई है। जैसे चटखारे लेने के लिए वह उस आदिवासी लड़की की खबर पढ़ना चाहता था उसी  भावसे लोग उसकी बहु के बारे में सोच रहे होंगें। उसे यह बिल्कुल नागवार गुजरता है कि उसकी बहु ऐसा कोई काम करती है जिससे कोई गैर मर्द उसके बारे में सोच पाता है। अपने ख्यालों में भी उसे ला सके। यह पुरुषसत्तात्मक सोच ही है जो अपने घरों और परिवारों की स्त्रियों को तो घर में कैद रखना चाहती है कि कहीं कोई बाहरी आदमी उनके बारे में सोच न सके, उनके नाम छपे अखबार को अपनी जेब में रख न सके।और वे खुद दूसरों विशेष रूप से दलित स्त्रियों के बारे में जैसे हो सके अपनी पहुँच बना सकें।अखबार में खबर के माध्यम से ही उनकी देह का स्वाद ले सकें।

सूरज बड़त्या दलित स्त्री को लेकर पढ़े लिखे खूब जागरुक अंबेडकर वादी पुरुष को ही आलोचना के दायरे में लेकर आते हैं। ‘कामरेड़ का बक्सा’ के पिता बेटी नीलू को खूब प्यार करते हैं। पिता का अपनी मासूम बच्ची के प्रति वात्सल्य का वह चित्रण दलित साहित्य के  लिए बहुत उम्मीद भरा और स्वागतयोग्य है। पर यही बेटी जब ‘गुफ़ाएँ’ नामक कहानी में जवान होकर अपनी मर्जी से चमार वर की जगह जाटव लड़के से शादी करना चाहती है तो पिता के लिए यह उसी तरह नाक का सवाल बन जाता है जैसे सवर्ण पिता के लिए बन जाता है जब बेटी किसी दलित से शादी करने को कहती है। यद्यपि सूरज बड़त्या ने इस सोच समझ और मानसिकता को बहुत ही जीवंतता के साथ चित्रित किया है। ‘गुफ़ाएँ’ की अपूर्वा अपनी पसंद के लड़के राजन से इसलिए शादी नहीं कर पाती क्योंकि राजन जाटव है। और वह खुद चमार। इस जातीय उपसमूह को उसके पिता और मामा अपने से नीचा मानते हैं। जहाँ से लड़की ली तो जा सकती है पर दी नहीं जा सकती। सूरज बड़त्या की कहानियों में पहली पीढ़ी ने जो यात्रा तय की उसे खारिज नहीं किया गया है। पर उस यात्रा में जो कुछ सवाल पीछे छूट गए उन सवालों के प्रति पाठकों को सचेत किया गया है। वरना ऐसा नहीं है कि अपूर्वा के पिता कोई सामंती मानसिकता के पुरुष हैं जो अपना निरंकुश शासन चलाते हैं। पिछली पीढ़ी के उसके पिता तो जब कभी माँ को झिड़क भी देते थे तो उसका उन्हें अपराध बोध भी होता था, उसके लिए वे घर-भर को घुमाने ले जाते जिससे उस अपराधबोध से निजात पा सकें। पर खुद अपूर्वा की पीढ़ी के अमन (उसके पति) का क्या? वह तो उसी की पीढ़ी का है वह सभ्य, शिक्षित और विचारों से वांपमथी अमन कह सकता है “मैंने शादी घरवालों के दबाव में की है, मुझसे ज्यादा उम्मीद मत रखना।“ यही अमन अपने विवाह पूर्व के प्रेम को अपूर्वा के सामने स्वीकार कर सकता है पर विवाह पूर्व अपूर्वा के राजन के प्रति प्रेम को स्वीकार नहीं पाता। “मुझे तो कई बार ऐसा लगता है कि तुम अब भी अपने उस… जाकर मिलती हो।“ लेखक ने तथाकथित अंबेडकरवादी पिता के गलत निर्णय को सही करने के लिए अपूर्वा को राजन तक पहुँचाने का रास्ता खोलातो है पर पता नहीं राजन, अमन से गुजर कर आने वाली अपूर्वा को वैसे ही खुले मन से स्वीकार कर पाएगा जैसे वह उसे शादी के पूर्व चाहता था?

इस प्रकार हम देखते हैं कि दलित पुरुषों की कहानियों में दलित स्त्री को कितना और किस रूप में जगह मिली है। सामान्यतया: पहली पीढ़ी के लेखकों ने घर की स्त्रियों को एक बोझ के रूप में देखा तो बाद की पीढ़ी के दलित पुरुषों ने चुनौती के रूप में। इसके बीच उसे सहयोगी और साथी के रूप में देखने वाले लेखक भी रहे  हैं।  पर क्या इसके बाद यह मान लिया जाए कि दलित स्त्री के मुद्दों और उसके प्रश्नों को उठाने और दिखाने में पुरुष लेखक कामयाब हैं?  पाँच लेखकों की लगभग पचास कहानियाँ पढ़ने के बाद कुछ आठ-दस  कहानियाँ ऐसी कहानियाँ निकलती हैं जिन्हें सीधे-सीधे दलित स्त्री के मुद्दों पर केन्द्रित  कहा जा सकता है। दलित पुरुषों के लिए दलित स्त्री का सबसे बड़ा मुद्दा उसका यौन शोषण है जो केवल सवर्णों द्वारा ही होता है। जब स्वयं दलित पुरुषों के द्वारा दलित स्त्री का यौन शोषण होता है। उसके श्रमकी अनदेखी होती है तो उसके प्रति दलित पुरुषों कास्वर प्राय: मौन रहता है। शिक्षा और नौकरी के मुद्दे पर तो दलित पुरुष की संवेदना फिर भी पहुँचती है पर स्त्री के अपनी मर्जी और समझ से विवाह के अधिकार तक, विवाह के बाद घर और परिवार की जिम्मेदारियों को निभाने में पुरुषों का साथ पाने के अधिकार तक अभी दलित पुरुषों की कहानियों को पहुँचना है। कैलाश वानखेड़े और सूरज बड़त्या इस दृष्टि से बेशक एक उम्मीद जगाते हैं। पर यहाँ अजय नावरिया की कहानी ’अनचाहा’ का जिक्र करना जरूरी है। क्योंकि यह कहानी स्त्री के अपनी कोख़ पर अधिकार को ही खारिज करती है। यह कहानी उस अजन्में बच्चे की ओर से कही गई है जो गर्भ में भी अभी मात्र डेढ़-दो महीने का है। जिसे उसकी कामकाजी माँ ने अपने दूसरे मात्र एक-डेढ़ वर्ष के बच्चे के कारण अबॉर्ट कराने का निश्चय किया है। इस कामकाजी माँ को अपने पहले बच्चे को पालने में ही पति का बहुत सहयोग नहीं मिल रहा, उसके खिलाफ़ पूरी कहानी ऐसे गढ़ी गई है कि जैसे वह कितनी असंवेदनशील है और कितना अमानवीय कृत्य करने जा रही है। पूरी कहानी में कहीं कोई तर्क ओर प्वाइंट लेखक नहीं दे पाता कि जिसमें वह स्त्री दोषी ठहराई जा सके, फिर भी पूरी कहानी कोरी भावुकता और थोथी संवेदना पर बुनी गई है। कहानी में पुरुष अंडा खाता है। उसके लिए वह किसी की हत्या नहीं है। उसके वह नॉनवेज नहीं है पर स्त्री को जबरन यह मानने को मजबूर किया गया है कि अंडे में जान है। इसलिए वह अंडा नहीं खाती। इस तथ्य पर लेखक अपना तर्क जुटाता है कि फिर क्यों अपने गर्भ के बच्चे को गिराने का निर्णय कर रही है। पर इतना विज्ञान तो कानून भी जानता है कि कितने महिने के गर्भ को गिराना वैध करार किया जा सकता है।

इस प्रकार अभी ऐसे बहुत से मुद्दे हैं जिन्हें पूरी संवेदनशीलता से कहानियों में उतारना बाकी है। स्त्री के प्रेमऔर गरिमापूर्ण व्यवहार पाने का अधिकार,  दोस्त बनाने और दोस्ती निभाने का अधिकार,  जिंदगी को अपनी क्षमताओं के हिसाब से सँवारने और तराशने का अधिकार,  अपने आप को अपनी खूबियों और खामियों सहित स्वीकारे जाने का अधिकार दलित स्त्री के ऐसे कितने ही मुद्दे हैं जो संवेदनशील पुरुष लेखकों की बाट जोह रहे हैं।