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बलात्कृत रंगकर्मियों को पुलिस ने कैद कर रखा है: फैक्ट फाइंडिंग टीम



‘यौन हिंसा एवं दमन के खिलाफ महिलायें (WSS)’ की अगुआई में झारखंड गयी फैक्ट फाइंडिंग टीम ने अपने अंतरिम रिपोर्ट में कोचांग में गत 19 जून को रंगकर्मियों से हुए सामूहिक बलात्कार के मामले में कई सवाल उठाये हैं. सबसे बड़ा सवाल है कि पीड़िताओं को न तो उनके परिवार से मिलने दिया जा रहा है और न महिला एक्टिविस्ट से. पुलिस को भी इस पर कुछ भी बोलने से मनाही है. सारे मामले को एसपी ने अपने तक केन्द्रित रखा है. टीम ने उठाये कई सवाल और की कई मांगें: 


खूंटी फैक्ट फांइडिंग टीम की अंतरिम रिपोर्ट

फैक्ट फांइडिंग की तारीख: 28/06/2018 से 30/06/2018


स्थानः खूंटी

जैसा कि ज्ञात है कि, 19/06/2018 को कोचांग गांव (ब्लाक-अड़की, जिला-खूंटी) में मानव तस्करी पर नुक्कड़ नाटक करने गईं पांच महिलाओं के साथ कथित तौर पर घटे गैंग रेप की घटना की खबर मालूम हुई। इस घटना के बाद भारत के विभिन्न राज्यों में महिला अधिकारों पर काम करने वाले संगठनों और झारखण्ड़ के स्थानीय सामाजिक कार्यकत्ताओं ने डब्लू.एस.एस.की अगुवाई में एक जांच टीम का गठन किया। जांच टीम दिनांक 28/06/2018 को रांची पहुंची ताकी मामले से संबंधित तथ्यों की सही जानकारी इकट्ठी की जा सके। इस क्रम में फैक्ट फांइडिंग के मेमर्ब्स ने घटना से प्रभावित लोगों और घटना की जानकारी रखने वाले लोगों से बातचीत की। फैक्ट फांडिंग के मेमबर्स तथ्यों की पुख्ता  जानकारी के लिए पीड़ित महिलाओं से भी बात करने के लिए पीड़िताओं से मिलने गए, पर फैक्ट फांइडिंग टीम को उनसे मिलने नहीं दिया गया। साथ ही, खूंटी के डी. सी. और एस. पी. से फैक्ट फांइडिंग टीम ने मिलने के लिए समय मांगा, पर वे फैक्ट फांइडिंग टीम से नहीं मिले। फैक्ट फांइडिंग टीम की जांच -पड़ताल के बाद कुछ खास बाते सामने निकलकर आती हैं। जैसे कि, आम जनता तक घटना की जानकारी का स्रोत केवल पुलिस द्वारा गढ़ी गई कहानी है, जो अखबारों के माध्यम से उन तक पहुंच रहा है। साथ ही, फैक्ट फांइडिंग टीम की जांच के बाद जो तथ्य निकल कर सामने आए हैं, वे पुलिस द्वारा बनाई गई कहानी की प्रमाणिकता पर सवाल उठाते हैं।

फैक्ट फांडिंग टीम की जांच में पाए गए तथ्य:

1.19/06/2018 को एफ. आई.आर. के मुताबिक कथित तौर पर गैंग रेप की घटना घटी। इस घटना में स्थानीय संस्था की देख-रेख में रहने वाली दो बालिग महिलाओं और नुक्कड़ नाटक करने वाले संस्था के संचालक की टोली से तीन बालिग महिलाओं के साथ कथित गैंग रेप की घटना को कोचांग नामक गांव में अंजाम दिया गया। फैक्ट फांइडिंग की टीम को जांच के दौरान यह पता चला कि खूंटी के एक स्थानीय संस्थान के कर्मी और नुक्कड़ नाटक करने वाले संस्था के संचालक की मंडली साथ में मानव तस्करी के खिलाफ खूंटी में नुक्कड़ नाटक किया करते थे। इस पूरे मामले में गौर करने लायक बात यह है कि, एफ. आई. आर. में नुक्कड़ नाटक करने वाले संस्था के संचालक द्वारा खूंटी के एक स्थानीय संस्थान की सिस्टर पर यह आरोप लगाया गया है कि उन्होंने नुक्कड़ नाटक की मंडली को जोर देकर कोचांग मिशन स्कूल में नुक्कड़ नाटक करने को कहा। जबकि, उनका प्रोग्राम कोचांग स्थित बाजार में चल रहा था। लेकिन, अन्य सूत्रों से बात करने पर यह पता चला कि, सिस्टर पर नुक्कड़ नाटक करने वाले संस्था के संचालक द्वारा 19 जून का कार्यक्रम करने को लेकर दबाव डाला गया था। जबकि, सिस्टर द्वारा नुक्कड़ नाटक का टारगेट पूरा कर लिया गया था। साथ ही, नुक्कड़ नाटक मंडली का कोचांग में यह पहला कार्यक्रम था और नुक्कड़ टोली के लोग और दोनों सिस्टर इस इलाके से परिचित नहीं थे।

2. फादर के बारे में एफ. आई. आर. में यह आरोप लगाया गया है कि, उन्होंने ननों को रोक लिया जबकि शेष महिलाओं को जानबूझ कर मोटर साइकिल पर सवार चार अज्ञात लोगों के साथ जंगल में जाने दिया। उनपर एफ. आई. आर. में षडयंत्र करना, जबदस्ती रोककर रखना और गैंग रेप और भारतीय दंड संहिता के अन्य प्रावधान लगाए गए हैं। पर, फैक्ट फांइडिंग टीम को अन्य सूत्रों से यह पता चला है कि फादर खुद उस परिस्थिति में डरे हुए थे और उन अज्ञात अपराधियों के दबाव में थे।

3. एफ. आई. आर. के मुताबिक, गैंग रेप की घटना के बाद जब पीड़ित महिलाएं वापस आई और उन्होंने स्थानीय संस्था की दोनों सिस्टर (जो उनके साथ थीं) को घटना के बारे में बताया, तो उन्होंने घटना की जानकारी देने से मना किया।
जबकि, फैक्ट फांडिंग टीम ने जब इसके बारे में पूछ-ताछ की तो पता चला कि जब पीड़ित महिलाएं घटना के बाद गाड़ी में सिस्टर के साथ बैठीं, तब कोचांग से खूंटी के रास्ते में उन्होंने सिस्टर के पूछने पर बलात्कार की घटना के बारे में बताया। सिस्टर ने उसी वक्त डी. सी. के पास खबर देने को कहा। पर, पीड़ित महिलाओं ने उन्हें ऐसा करने से यह कहकर मना कर दिया कि, उन्हें खतरा होगा क्योंकि कथित गैंग रेप को अंजाम देने वाले अज्ञात लोगों ने उनका नाम, पता और पूरे परिवार का ब्योरा ले लिया है।

एफआईआर का एक हिस्सा

4. 20 जून को पुलिस को घटना की जानकारी मिली, लेकिन एफ. आई. आर. या मीडिया में चल रहे खबरों के मुताबिक यह स्पष्ट नहीं है कि, उन्हें घटना की जानकारी कहां से मिली। फैक्ट फांइडिंग की टीम द्वारा सूत्रों से पूछ-ताछ करने पर यह पता चला कि एस0 पी0 ऑफिस से ही थानों को कथित गैंग रेप की घटना की सूचना मिली थी। पुलिस के अनुसार, 20 जून की रात से ही पुलिस ने पीड़ित महिलाओं से संर्पक साधने की कोशिश की। पर, वे 21 जून को पीड़ित महिलाओं तक पहुंच पाए। उसके बाद 21 जून को पांचों पीड़ित महिलाओं का मेडिकल करवाया गया। पर, यहां गौर करने लायक बात यह है कि, पीड़ित महिलाओं के मेडिकल जांच के बारे में जब हमने सदर अस्पताल, खूंटी में पूछ-ताछ की तो हमें पता चला कि दो पीड़ित महिलाओं को मेडिकल जांच के लिए 20 जून को ही लाया गया था। फिर, 21 जून को मेडिकल जांच के लिए सभी पांच पीड़ित महिलाओं को लाया गया, जिसकी जांच के लिए मेडिकल बोर्ड की टीम बनाई गई थी।

5. एफ. आई. आर. में फादर के अलावा अज्ञात अपराधियों और पत्थलगढ़ी समर्थकों को अपराधी के रुप में डाला गया था। फैक्ट फांडिंग टीम के पूछ-ताछ के मुताबिक फादर के अलावा दो अन्य लोगों को गिरफ्तार किया गया है। पुलिस द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार, दोनों संदिध लोगों ने तीन अन्य लोगों का नाम लिया। इनमें दो को पत्थलगढ़ी का नेता बताया गया है और एक बाजी सामंत नामक व्यक्ति का नाम लिया गया है, जो पीएलएफआई. का एरिया कमांडर है।

पुलिस से जब यह पूछा गया कि दोनों गिरफ्तार आरोपियों और सभी आरोपियों की शिनाख्त पीड़ित महिलाओं द्वारा की गई है या नहीं, तो कहा गया कि कानूनी प्रक्रिया की सारी जानकारी एस. पी. से ही मिलेगी और उन्हें इस मामले में किसी से कुछ भी न कहने को कहा गया है। यह बात साफ है कि, आरोपियों की शिनाख्त पीड़ित महिलाओं द्वारा नहीं की गयी है। इसके अलावा, आस-पास के गांवों के लोगों और अन्य स्त्रोत के अनुसार जो चार अज्ञात लोग मोटरसाइकिल पर सवार होकर पांचों महिलाओं को ले गए थे, वे उस इलाके के नहीं थे और पत्थलगढ़ी के नेता और उससे जुड़े व्यक्ति तो बिलकुल नहीं थे।

6. 26 जून को घाघरा में पुलिस के जवानों ने यह कहकर अंदर घुसने की कोशिश कि, की वहां कथित गैंग रेप के मामले में शामिल आरोपी पत्थलगढ़ी में शामिल होने वाले हैं। जबकि घाघरा गांव में पत्थलगढ़ी को लेकर ग्राम सभा हो रही थी, जहां आस-पास के गांव के लोग आए थे। वहां पुलिस और गांव वालों के बीच झड़प हुई। इस क्रम में महिलाओं ने पुलिस को करिया मुंडा के घर तक खदेड़कर भगा दिया। इस बीच करिया मुंडा के घर से चार जवानों को महिलाएं अपने साथ ले आए।

7. 27 जून को सी. आर. पी. एफ., रेफ, जे. ए. एफ. और होम गार्ड के 1000 जवान घाघरा (300 लोगों का गांव) और उससे सटे गांवों में घुस गए। फैक्ट फांडिंग टीम द्वारा घाघरा से सटे गावों का 30 जून को दौरा करने पर यह पता चला कि, घाघरा से सटे 7 गांव है जहां पुलिस गई थी, पर उनमें से केवल 3 से 4 गांवों में पत्थलगड़ी हुई थी। पुलिस जब उन गावों में घुसी जहां पत्थलगढ़ी हुई थी, तब अर्धसैनिक बलों द्वारा इन गांवों में लोगों को मारा-पीटा गया, जिसमें एक व्यक्ति मारा गया, कुछ लोगों को चोट पहुंची और एक बच्ची का हाथ भी टूट गया। कुल 150 से 300 लोगों को हिरासत में लिया गया जिसमें महिलाऐं भी काफी संख्या में थी। बाकी के लोग पुलिस के आने की सूचना पाकर अपने घरों को छोड़कर चले गए थे। जबकि, अन्य गांवों में जहां पत्थलगढ़ी नहीं हुई थी, वहां पुलिस ने लोगों के घर में घुसकर तलाशी ली। फैक्ट फांडिंग टीम ने घाघरा में भी घुसने की कोशिश की पर वहां पर भारी संख्या में जवान तैनात थे। उन्होंने यह कहकर फैक्ट फांडिंग टीम को रोक दिया कि एस0 पी0 की अनुमति के बिना हम वहां नहीं जा सकते।

हमने एस. पी. से संर्पक करने की कोशिश की पर वे हमें नहीं मिले।

8. 29 जून को गार्ड को रिहा कर दिया गया, इसके बावजूद 30 जून तक घाघरा में भारी मात्रा में पुलिस तैनात थी। पुलिस ने प्रेस कान्फरेंस में कथित गैंग रेप के आरोपियों का वीडियो जारी किया और जिस व्यक्ति बाजी सामंत का फोटो दिखाया वह पत्थलगढ़ी से जुड़ा व्यक्ति नहीं बल्कि पी. एल. एफ. आई. का मेंमबर है।

फैक्ट फांडिंग टीम की जांच से उठते कुछ सवाल

• पुलिस को कथित तौर पर गैंग रेप की घटना की जानकारी सबसे पहले कब और किसके द्वारा मिली?

• पुलिस के अनुसार, वह पीड़ित महिलाओं से पहली बार 21 जून को मिली और वह पीड़ित महिलाओं को मेडिकल जांच के लिए 21 जून को ले गई। जबकि सदर अस्पताल, खूंटी के मुताबिक 20 जून को दो पीड़ित महिलाओं की मेडिकल जांच की गई, वहीं 21 जून को पांचों पीड़ित महिलाओं की मेडिकल जांच फिर से की गई। पुलिस और सदर अस्पताल, खूंटी के द्वारा बताए गए तत्थों में अनियमितता क्यों है?
• जब पुलिस के पास कथित तौर पर घटे गैंग रेप आरोपियों का वीडियो था, तो उन्होंने अज्ञात लोगों, पत्थलगडी समर्थकों के खिलाफ केस क्यों दर्ज किया?
• पुलिस घाघरा में जहां पत्थलगढ़ी को लेकर ग्राम सभा हो रही थी वहां घुसने की कोशिश यह कहकर क्यों की, कि वहां कथित तौर पर घटे गैंग रेप के आरोपी आ रहे हैं? जबकि उन्हें पता है कि रेप का एक आरोपी बाजी सामंत दूसरे इलाके (खरसावां, सराईकेला) का रहने वाला है।
• पुलिस ने पीड़ित महिलाओं के द्वारा पकडे़ गए कथित तौर पर गैंग रेप के आरोपियों की शिनाख्त क्यों नहीं करवायी? और जिन तीन आरोपियों के लिए वह छापेमारी कर रही है, उसकी शिनाख्त पीड़ित महिलाओं द्वारा ना करवाकर पुलिस की हिरासत में लिए गए दो आरोपियों द्वारा क्यों करवा रही है?
• पीड़ित महिलाओं को प्रशासन की हिरासत में अब तक क्यों रखा गया है और उन्हें किसी से मिलने क्यों नहीं दिया जाता है?
• नुक्कड़ नाटक करवाने वाली संस्था का संचालक जिसने एक एफ0 आई0 आर0 दर्ज किया है, वह कौन है और एफ0 आई0 आर0 दर्ज कराने के बाद वह कहां गायब हो गया है? क्या वह प्रशासन की हिरासत में है?

एफआईआर का एक हिस्सा

फैक्ट फांडिंग टीम की जांच के कुछ निर्ष्कष:

• इस पूरे मामले में पीड़ित महिलाओं (जिनमें कुछ शादीशुदा हैं और उनके बच्चे भी हैं) का पक्ष पूरी तरह से गौन है। उनके परिवारों द्वारा मामले में कोई भी बयान नहीं आया है। हमने यह भी पाया कि, पीड़ित महिलाओं के परिवारों को पुलिस द्वारा घटना की जानकारी नहीं दी गई है।

• सरकार एवं स्थानीय पुलिस प्रशासन द्वारा पूरे मामले में गोपनीय तरीके से कार्यवाई की जा रही है। पीड़ित महिलाओं को सरकार की हिरासत में रखने के नाम पर किसी से मिलने नहीं दिया जा रहा है। अज्ञात आरोपियों के नाम पर पत्थलगड़ी के नेताओं को टारगेट किया जा रहा है और उनके खिलाफ छापेमारी की जा रही है। ये सभी चीजें पूरे मामले में अपनाई गई कानूनी और जांच की प्रक्रिया पर सवाल खड़ा करती हैं, क्योंकि सभी जानकारियों का पुलिस प्रशासन ही एकमात्र स्रोत है। इससे केवल प्रशासन द्वारा दिखाया जाने वाला पहलू ही देखने को मिल रहा है। बांकि जानकारी के माध्यमों को बंद कर दिया गया है।

• इस पूरे मामले में मीडिया की भूमिका संदिग्ध रही है। मीडिया ने पूरे मामले में तत्थों को तोड़-मरोड़कर पेश किया है। मामले में मीडिया ने पत्थलगढ़ी, आदीवासी समुदाय और चर्च एवं मिशन की संस्थाओं की नाकारात्मक छवि पेश की है।

• मीडिया और सरकार द्वारा चर्च एवं मिशन की संस्थाओं को फंसाने और बदनाम करने की कोशिश की गई है, इससे साफ पता चलता है कि तत्थों के साथ खिलवाड़ करके ऐसा किया गया है। इससे मामले से संबंधित सभी संस्थाओं के लोगों में भी भय का माहौल है।

• ये पीड़ित महिलाएंे जिन संस्थाओं से संबंध रखतीं हैं, उन संस्थाओं को प्रेस या किसी से भी बात करने की स्वतंत्रता नहीं है। इन संस्थाओं में काम करने वाले लोगों को जिनका संबंध मामले से है, उन्हें संस्था के चाहरदीवारी से न निकलने को कहा गया है। इन संस्थाओं के कर्मीयों को किसी भी बाहरी व्यक्ति से बात करने से मना किया गया है और संस्थाओं के अंदर किसी को भी घुसने की अनुमति नहीं दी गई है।


फैक्ट फांडिंग टीम की मांगें 

• फैक्ट फांडिंग की टीम कथित तौर पर घटे गैंग रेप की घटना की एक स्वतंत्र जांच एक उच्च स्तरीय जांच कमिटी द्वारा करवाने की मांग करती है। इस जांच को खूंटी प्रशासन से बिलकुल स्वतंत्र हो कर कराने की जरुरत है। इस जांच कमिटी में रिटायर्ड जज, वकील और महिला अधिकारों पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकत्ता होने चाहिए।

• मामले की तहकीकात खूंटी पुलिस द्वारा ना करवा कर एक स्वतंत्र जांच द्वारा करवानी चाहिए।

• इस पूरे घटनाक्रम में, ऐसा मालूम पड़ता है कि प्रशासन द्वारा पीड़ित महिलाओं के पक्ष और उनकी इच्छा को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ और गौन कर दिया गया है। यह साफ नहीं है कि पांचों पीड़ित महिलाओं को उनकी मर्जी से पुलिस की हिरासत में रखा गया है या नहीं। इनमें से कुछ शादीशुदा हैं और उनके बच्चे भी हैं। इस मामले में खूंटी पुलिस और प्रशासन की संदिग्ध भूमिका को देखते हुए, यह तय है कि खूंटी पुलिस प्रशासन की देख-रेख में मामले की स्वतंत्र और निष्प्क्ष जांच संभव नहीं है। ऐसे में पीड़ित महिलाओं का खूंटी पुलिस और प्रशासन की हिरासत में रखना उनके लिए सुरक्षा की दृष्टि से सही नहीं होगा। महिलाओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए फैक्ट फांडिंग टीम की यह मांग है, कि पांचों पीड़ित महिलाओं को खूंटी पुलिस और प्रशासन की हिरासत से निकाल कर राज्य द्वारा अपने संरक्षण में रखे या उन्हें अपने घर वापस जाने दिया जाए।

• इसके अलावा, कथित तौर पर घटे गैंग रेप की घटना के बाद घाघरा और आस-पास के गांवों में पुलिस और अर्धसैनिक बलों द्वारा किए गए दमन की भी स्वतंत्र जांच होनी की सख्त जरुरत है। पुलिस और अर्धसैनिक बलों द्वारा किए गए दमन के दौरान एक व्यक्ति की मौत हो गई और कई अन्य घायल हो गए। इसमें यह जांच होनी चाहिए कि प्रशासन द्वारा बल प्रयोग करने की जरुरत थी भी या नहीं। और अगर थी तो जिस प्रकार से बल प्रयोग किया गया वह उचित था या नहीं।

• साथ ही, घाघरा और आस-पास के गांवों में जहां पत्थलगढ़ी हुई है, वहां से पुलिस और अर्धसैनिक बलों को हटाया जाना चाहिए। ताकि, इन गांवों में रहने वाले लोग अपने घरों को लौट पाएं। वे आज भी अपने घरों को लौटने में संकोच कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि पुलिस और अर्धसैनिक बलों द्वारा वहां दोबारा हिंसा होगी। ऐसे में, इस पूरे घटनाक्रम में आम जिंदगी इन गांवों में ठहर सी गई है। बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं और लोग जीविका चलाने के लिए रोजमर्रा के कामकाज नहीं कर पा रहे हैं।

-रिनचिन, राधिका, पूजा


डब्लू. एस. एस. की फैक्ट फांइडिंग टीम


यौन हिंसा व दमन के खिलाफ महिलाएं (WSS)

नवंम्बर 2009 में गठित एक गैर-अनुदान प्राप्त ज़मीनी प्रयास है। इस अभियान का मकसद है – हमारे शरीर व हमारे समाज पर हो रही हिंसा को खत्म करना। हमारा नेटवर्क पूरे देश में फैला हुआ है और इसमें औरतें अनेक राजनीतिक परिपाटियों, जन संगठनों, नारी संगठनों, छात्र व युवा संगठनों, नागरीक अधिकार संगठनों एवं व्यक्तिगत स्तर पर हिंसा व दमन के खिलाफ सक्रिय हैं। हम औरतों व लड़कियों के विरुद्ध किसी भी अपराधी/अपराधियों द्वारा की जा रही यौन हिंसा व दमन के खिलाफ हैं।

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आदिवासी गरीब स्त्रियों का ‘शिकार’ करके भी जनवादी कहलाने वाले कलाकार की आत्मकथा (!)

 मंजू शर्मा


हिन्दी की शिक्षिका,  सोशल मीडिया में सक्रिय. सम्पर्क:  manjubksc@gmail.com



रामशरण जोशी जी आप साहित्य की दुनिया में किसी परिचय के मोहताज नहीं।यूँ भी अपनी आत्मकथा लिखने के लिए एक साहित्यकार तभी सोचता है जब उसे जान पड़ता है कि उसे अब वे सारे मुकाम मिल गए हैं जिसकी उसे चाह रही थी। खैर यूँ भी यहाँ मैं आपका कोई परिचय देने के लिहाज से कुछ भी लिख नहीं रही हूँ। बस कुछ बातें जो निरन्तर कचोटती रही आपकी आत्मकथा पढ़ते हुए कि आपने कोशिश तो बहुत की है कि सेलेक्टिव होकर आप बस वही लिखे जो आपको ‘समय के बोन्साई’ के रूप में स्थापित करे ।

आप बोन्साई नहीं हो सकते हैं।एक बोन्साई के पौधे को तो पूरी तरह-से बढ़ने और फैलने का अवसर तक नहीं दिया जाता है।समय से पहले ही साजो-सज्जा के नाम पर उसे काट-छाँटकर ऐसा बना दिया जाता है जो उतनी ही भूमि और मिट्टी में पनपना सीख जाए जो उसे उसका मालिक दे और वह पौधा फलने-फूलने तक से वन्चित रह जाता है।बेचारे बोन्साई के पौधे से आपने अपनी तुलना कर दी है, आप अपनी आत्मकथा के शीर्षक(मैं बोन्साई अपने समय का:कथा एक आत्मभन्जक की) के साथ आरंभ से ही खुद को जस्टीफाई करने की जुगत में लग जाते हैं और फिर तो आप अपनी छवि को उदात्त कर ले जाने को अधीर हो जाते हैं। अपनी ही आत्मस्वीकृतियों को आप बड़े ही घाघ तरीके-से एडिट कर देते हैं जिसपर पहले आपकी आलोचना हुई थी और आप आलोचकों को आत्मकथा में बड़ी लानत-मलानत करते हैं, आपको लगा कि आत्मकथा लिखते हुए उन अंशों को एडिट कर देना पुन: छवि को बोन्साई व्यक्तित्व प्रदान करने में कारगर सिद्ध होगा। आपने भी सोच लिया होगा कि कम-से-कम वर्तमान नई पीढ़ी के पाठकों को तो आपकी करतूतों को जानने से वंचित करके अपने लिए ही आत्मभंजक विशेषण की उपाधि देकर भरपूर सहानुभूति तो बटोरी ही जा सकती है।
आपने अपने आलोचकों को खूब लानत भेजी है इस आत्मकथा में पर चूक आपसे यह हो गई अपने आपको बोन्साई कहते हुए कि छ्पी हुई सामग्री कितनी भी पुरानी हो कहीं-न-कहीं से लोगों को पढ़ने को मिल ही जाती है(विशेषकर उनलोगों को जो इस आत्मकथा को पढ़ते हुए और अधिक आपको जानने और समझने हेतु इच्छुक हैं)।

रामशरण जोशी

दरअसल आप तो उन अतितुष्ट व्यक्तियों में से हैं, जिन्होंने खुद ही स्वीकारा भी है कि मेरे भीतर अनेक ‘मैं’ है।आप सच्चे न तब थे न हीं आज और अब हैं मान्यवर!


पढ़ें : घृणित विचारों और कृत्यों वाले पत्रकार की आत्मप्रशस्ति है यह, आत्मभंजन नहीं मिस्टर जोशी


इस बात से भी इन्कार नहीं किया जा सकता है कि आप स्त्री-मनोविज्ञान के ज्ञाता न होकर भी स्वयं को बार-बार स्त्री को जानने-समझने का ढोंग करते हैं।हकीकत तो यह है कि आपको लेशमात्र भी स्त्री के मनोविज्ञान का भान नहीं है।तीन स्त्रियों के जीवन में आने के बाद भी आपने स्त्री को महज सामान से ज्यादा कुछ समझा ही नहीं। शायद तभी यह बताने तक में भी आपने परहेज नहीं किया कि मैत्रेयी पुष्पा जी ने स्वीकार किया था कि औरत पुरुष को रिझाने के लिए ‘श्रृंगार’ के हथियार का इस्तेमाल करती है।मुझे भान होता है कि आप सम्पूर्ण स्त्री जाति की इसी प्रवृ्त्ति को उभारना चाहते हैं ।यह भी हो सकता था कि इसे केवल एक वाकये या एक सामान्य-से वक्तव्य के रूप में आपने इसे देखा होता तो इसे अपनी आत्मस्वीकृतियाँ में न लिखते और यह स्त्रियों के लिए एक आम राय तो कम-से-कम आप निर्धारित करने की गलती कत्तई नहीं करते।यह मानकर चलते तो आपकी इज़्ज़त कई गुना बढ़ जाती हम स्त्रियों की निगाहों में कि यह केवल एक स्त्री-विशेष की अपनी आत्माभियक्ति या स्वीकारोक्ति हो सकती है सभी स्त्रियों को उसी साँचे में नहीं रखा जा सकता है।सबके अपने जुदा-जुदा व्यक्तित्व और राग-बिराग भी हो सकते हैं,पर नहीं जोशी जी यह आपने नहीं किया यही वज़ह है कि आपके परसेप्शन स्त्रियोँ को लेकर हरेक जगह पर लगभग बायस्ड ही होते चले गए।

वह हिस्सा जो आत्मकथा से हटा दिया गया है: 

बात केवल इतनी भी होती तो शायद मन को कुछ कम कचोटता!ज़ाहिर-सी बात है कि बात निकली है तो दूर तलक जाने से भी इसे न रोका जा सकेगा।हंस के दोनों अंकों की स्वीकारोक्ति में आपने अपने किसी नृतत्वशास्त्री मित्र का उल्लेख किया है जो बस्तर किसी शोध के सिलसिले में पहुँचा हुआ है नृतत्वशास्त्री(Antrhropology) मित्र का नाम लेने से आप बचते रहें ,जानें क्यों आप बचते रहे यह भी समझ से परे ही है कि आखिर क्यों आपने ऐसे महान मित्र को बचाने की कोशिश करते हैं जिसकी वज़ह से आप उस गर्त में धकेल दिए जाते हैं जिसमें आपकी चाह गिरने की नहीं थी। सुधि पाठकों को मिथ्या भ्रमित करने की चाह आपकी तब अधूरी रह जाती है जब आप सांड-मित्र (या कि मित्र-सांड कहने से क्या फर्क पड़ता है) के बनाए हुए सोकॉल्ड हवन-कुंड में अपनी दैहिक क्षुधा को भी शांत कर ही ली। जोशीजी,मेरा मानना है कि मित्र लगभग समान स्वभाव वाले दो लोग ही बनते हैं,आर्थिक समानता बेशक न हो पर वैचारिक धरातल पर बहुत हद तक समानता तो होनी ही चाहिए।खैर, बहती गंगा में हाथ धोने के बाद उसका मुआवज़ा आपने तयशुदा राशि से पाँच रुपये अधिक दिये।कितनी मेहरबानी की आपने और आपके मित्र-सांड ने उस आदिवासी औरत पर और स्त्री को भोग्या वस्तु और कमोडिटी बनाने में तनिक भी परहेज़ नहीं किया। अच्छा किया कि आपने अपनी आत्मकथा मैं अपने समय का बोन्साई लिखी है जिससे हम जैसे लोग जो हंस के उस अंक में आपकी आत्मस्वीकृतियों को तब न पढ़ पाए थे कम-से-कम अब पढ़ लिया। आजकल बहुत सारे अलग-अलग टैलेंट हंट अलग-अलग चैनलों द्वारा प्रायोजित किए जाते हैं जिसमें सबकुछ पूर्व-प्रायोजित ही होता है। अब देखिए आपकी तरह ही एक विषय को छोडकर दूसरे विषय पर फुदकना(आपकी विक्षनरी से लिया हुआ एक विशेष शब्द) एब्सर्ड लग सकता है सो यहाँ टैलेंट हंट की बात करनी पड़ी है क्योंकि एक और हंट तब आप और आपके मित्र अयोजित करते थे और यह हंट था बस्तर क्षेत्र की आदिवासी, मासूम और गरीब स्त्रियों का । उफ़ क्या लिखूँ और क्या न लिखूँ कुछ दु:खी हो जाती हूँ!उस वाकये को पढ़ते हुए तो लगा कि आप भी अपने उसी मित्र-सांड की तरह स्त्रियों के शिकार में एकदम उस्ताद थे तभी तो आपकी भाषा भी स्त्री के लिए एक सामान की तरह प्रतीत होती है।मान्यवर,यह ‘विजिबल भूगोल’ शब्द स्त्री के लिए आपने जब लिख ही दिया था तो बाकी के आख्यानों की कहाँ ज़रूरत थी?औरत को देखने का नज़रिया तो आपका इतना वाहियात है कि उचित शब्द तक नहीं मिले आपको,कभी क्रिकेट की मैदान के पिच तो कभी भौगौलिक ढाँचे से तुलना करके स्त्री-अस्मिता की जो धज्जियाँ आपने उड़ाई है न आपकी वो भाषा वाकई में हम स्त्रियों को बताती है कि पितृ-सत्तात्मक व्यवस्था के आप सबसे चिर-परिचित प्रतिनिधि और वाहक हैं जो इस व्यवस्था को कभी तोड़ना नहीं चाहेंगे।


वह हिस्सा जो आत्मकथा से हटा दिया गया है: 

सच कहूँ तो आपके साहित्यकार होने तक-से मुझे शर्मिंदगी और कोफ़्त होती है आज क्योंकि अगर साहित्यकारों की भाषा ऐसी होती है जिससे एक जुगुप्सा की भावना उत्पन्न होने लगे और वह भी स्त्रियों के लिए प्रयुक्त भाषा आपकी इतनी महान है कि साहित्य में भी सर्टिफिकेट जारी होने ही चाहिए थे-मसलन ‘सी’ ग्रेड(इससे अधिक के हकदार नहीं हैं माननीय)! मान्यवर,आपकी तमाम भाषा जो आपने अपनी दोनों अंकों की आत्मस्वीकृतियों में स्त्रियों के लिए अपनी ही बनाई विक्षनरी से लिया है उससे मुझे स्त्री होने के नाते गुरेज़ है-लखनपाल,स्त्रियों के शिकार,लपको-माल ताज़ा है,उरोज सम्हाले नहीं सम्हल रहे हैं,उछल.……उछल,फुदक फुदक,रसीले पयोधर!रसीले गोल-मटोल आम्र से पयोधर…………………………कई और हैं और साहित्यिक मर्यादित भाषाई सीमाओं का उल्लंघन होते और पढ़ते हुए किस दु:ख से दो-चार हुई हूँ वह भी अपनी ही प्रजाति के लिए नहीं लिख सकती हूँ।

देखिए तो,आज के सम्मानित समाज के लेखक और लेखिकाओं के कितने ही लेख पढ़ चुकी हूँ फेसबुक पर और दूसरे सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर कि ‘वीरे द वेडिंग’ बड़ी ही वाहियात फिल्म है स्वरा भास्कर और उसके दोस्तों की फिल्म में दी गई गालियों को लेकर भी कितनी ही आपत्तियों से भरे हुए लेख भी पढ़ने को मिले कि इससे वाहियात फिल्म नहीं हो सकती है।खैर मुझे सोकॉल्ड वाहियात फिल्म की चर्चा यहाँ इसलिए करनी पड़ी क्योंकि मुझे लगा कि क्या सचमुच सभी लोग हंस के दोनों अंकों में आपकी भाषा को भूल गए हैं या भूलना चाहते हैं ज्ञात नहीं होता। यह भी हो सकता है कि आज का साहित्य ही मिथ्याजगत है जहाँ सच को सच कहने का साहस बहुत ही कम लोगों में रह गया है।जोशीजी,आपसे इस फिल्म की गालियों की तुलना करूँ तो मर्यादित भाषा का जिम्मा तो केवल स्त्रियों का ही होना चाहिए,ढँके-छिपे हुए शरीर की तरह उसके दोनों होंठ भी बस चिपके होने चाहिए,उसे कभी भी नहीं खुलने का अधिकार है,गालियों के लिए तो कत्तई नहीं,तभी तो इस फिल्म में नायिकाओं का गाली देना तनिक भी न सुहाया। चाहे कितनी भी कुंठा भीतर दबी हुई हो,बेचैनी हो और उनकी भी इच्छाएँ होती होगी चीख-चीख कर सबकुछ सबको बताने की या मर्दजात को गालियाँ देने की, पर हमारा यह सुशिक्षित समाज आपकी तरह ही शायद सोचता है जहाँ उसके गुस्से में भी उसके मुँह से फूल झरने चाहिए पर आपकी भाषा जब-से मैं पढ़ी हूँ तब-से मर्यादित भाषाओं को लेकर नासमझ हो गई हूँ और सभी साहित्यकार मित्रों से अब जानना चाहती हूँ कि अनुचित भाषा किसे कहते हैं?

हाँ एक विरोधाभास और जो मुझे कचोटती है कि आप जबकि स्वयं ही स्वीकारते रहे हैं कि विनाश के बचाव के लिए मेरे जीवन में ‘इस्केप रूट्स’ हमेशा रहे हैं(पृष्ठ संख्या-26 नवंबर,2004) तो क्या उसी स्वभाव के वशीभूत होकर आपने हंस के कुछ खास अंशों को एडिट करवाया होगा! जब इस्केप करने का हुनर आप जानते हैं तब आप बोन्साई कैसे हो सकते हैं क्योंकि उसको कतरने-छाँटने का काम तो कोई दूसरा ही करता है।
भला कौन वह बेचारा होगा जो चाहेगा इस ज़माने में बोन्साई बनकर ताउम्र जीना
जिसके लिए मुकर्रर किया जाता है बस कहीं सजावट के लिए एक छोटा-सा कोना।

पढ़ें : लेखकीय नैतिकता और पाठकों से विश्वासघात!

सारे सुखों को जीने,भोगने,आदिवासी गरीब स्त्रियों का शिकार करके भी अपने को जनवादी  कहने वाले (और-तो-और आप साहित्य की दुनिया में संवेदनशील भी जाने जाते हैं), आप इस विद्रूप समय के बोन्साई नहीं हो सकते हैं,कत्तई नहीं। यूँ भी आपका परिचय तो एक व्यक्ति के रूप में नहीं एक संस्था के रूप में दिया जाता है तब आप बोन्साई कैसे हुए नहीं समझ में आता है।

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महिलाओं के गाड़ी चलाने से सऊदी अरब का कस्टोडियन लॉ संकट में

तारा शंकर

 कमला नेहरु कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय) में बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर अध्यापन . संपर्क :tarashanker11@gmail.com

पिछले दिनों सऊदी अरब में महिलाओं के गाड़ी चलाने पर लगी रोक हटायी गयी तो पूरी दुनिया में ख़बर फ़ैल गयी! महिलाओं की व्यक्तिगत, आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक आज़ादी के बारे में सऊदी अरब की आलोचना दुनियाभर में होती रहती है! ताराशंकर का यह लेख पाबंदी की वजहों, उससे मुक्त होने के उदारवादियों के संघर्ष, इस संघर्ष का  कट्टरपंथियों और महिला विरोधियों द्वारा विरोध, जिनमें खुद महिलायें भी शामिल थीं, आदि कई मसलों को समेटता है.

अब तक सऊदी अरब पूरी दुनिया का एकमात्र देश था जहाँ औरतों को ड्राइविंग करने से मनाही थी! वहाँ वर्ष 1957 से ही क़ानूनी तौर औरतों के गाड़ी चलाने पर पाबंदी थी! ड्राइविंग लाइसेंस सिर्फ़ मर्दों को जारी किये जाते थे! इसलिए कई लड़कियाँ विदेशों से लाइसेंस बनवाती थीं! हालांकि शरिया अथवा किसी भी इस्लामिक क़ानून पाबंदी के बाबत कोई बात नहीं लिखी गयी है! लेकिन सरकारी तौर पर मनाही थी! तो सवाल उठता है कि फिर क्यों थी ऐसी पाबंदी? असल में सऊदी वहाबी इस्लाम (सुन्नी परंपरा) औरत-मर्द में कई विभेद करता है (Male Gaurdianship Law) और चूंकि औरतों द्वारा ड्राइविंग इस विभेद से कई जगह टकराता है इसलिए अब तक ड्राइविंग पर बैन था!


क़रीब 30 सालों से वहाँ महिलायें इस पाबंदी के ख़िलाफ़ बोल रही थीं! और धीरे-धीरे आज सऊदी में बहुसंख्यक जनता भी इस पाबंदी को हटाने के पक्ष में आ चुकी थी! हाल-फ़िलहाल में वहाँ हुए लगभग सभी सर्वेक्षणों में अधिकतर लोगों ने औरतों को ड्राइविंग की आज़ादी के पक्ष में बोला! पिछले साल सऊदी के सर्वाधिक प्रभावशाली व्यक्तियों में से एक प्रिंस अल वलीद बिन तलाल  ने सीधे ट्वीट किया कि “बहस बंद करो. अब औरतों के ड्राइव करने का वक़्त आ गया है” और पिछले साल शूरा काउंसिल (शूरा काउंसिल सऊदी सरकार की मजहबी मसलों पर सलाहकारी परिषद् है) के हेड अब्दुल रहमान अल रशीद ने भी औरतों के गाड़ी चलाने की तरफ़दारी करते हुए कहा सऊदी के यातायात विभाग के पास भी ऐसा कोई नियम नहीं जो औरतों को गाड़ी चलाने से रोकता हो!
साल 1990 में सऊदी महिलाओं ने तमाम समाज सुधारों की माँग शुरू की जिसमें राइट टू ड्राइव भी एक था! काउंसिल ऑफ़ सीनियर इस्लामिक स्कॉलर्स के साल 2010 में आये एक फ़तवे के ख़िलाफ़ कैंपेन ने फिर ज़ोर पकड़ा जिसमें कहा गया था कि “औरतों के गाड़ी चलाने से ग़ैरक़ानूनी खुल्वाह (किसी ग़ैरमर्द के साथ अकेले होना) के मौके देगा, चेहरा ढँका नहीं रहेगा, औरत और मर्दों में बेपरवाह और बेख़ौफ़ इंटरमिक्सिंग होगा, और व्यभिचार को भी बढ़ावा मिलेगा! और इस तरह सामाजिक बढ़ेगा!”

साल 2013 में क़रीब 60 औरतों ने सऊदी की सड़कों पर पाबंदी के बावजूद कार चलाकर इसका विरोध किया! कुछ औरतें जेल भी गयीं! कैम्पेनर मनाल अल-शरीफ़ कहती हैं कि औरतों को गाड़ी चलाने से इसलिए रोका गया है क्योंकि इससे मर्दों का गार्जियन सिस्टम को ख़तरा होगा! साल 2016-17 में #StopEnslavingSaudiWomen और #Women2Drive जैसे बड़े कैम्पेन चल रहे हैं! साल 2017 में राइट टू ड्राइव कैंपेन की वेबसाइट को सऊदी सरकार ने बंद कर दिया!
हालांकि कुछ एक महिलाओं ने ही इस तरह के कैंपेन के ख़िलाफ़ “My Guardian Knows What’s Best for Me” कैम्पेन चलाया! इसी तरह शेख़ सालेह बिन साद अल-लोहायदन जो कि गल्फ़ साइकोलोजिस्ट असोसिएशन के न्यायिक सलाहकार हैं, ने एकदम वाहियात तर्क दिया कि “अगर औरत कार चलाती है तो उसका पेल्विस ऊपर ख़िसक सकता है और पैदा होने वाले बच्चे में क्लिनिकल प्रॉब्लम हो सकती है..” कुछ इसी तरह  डिप्टी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने कहा कि औरतें को गाड़ी चलाने की इज़ाजत मिले और कब मिले, इस बात का निर्णय सरकार नहीं, सऊदी समाज करेगा और समाज अभी इसके लिए तैयार नहीं है!
महिला अधिकारों के संगठनों ने कई छोटे छोटे प्रदर्शन किये हाल के सालों में. कुल मिलाकर इस पूरे मसले को दो हिस्सों में बाँटकर देखा जा सकता है:

पहला, वो कारण जिनकी वजह से अब तक औरतों पर ड्राइविंग की पाबंदी थी और दूसरा, वो जिनके कारण ये पाबंदी हटाई गयी! कुरान अथवा शरिया में ऐसा कोई क़ानून नहीं जो औरतों को गाड़ी चलाने पर सीधा पाबंदी लगाता हो! लेकिन वहाबियत (सुन्नी इस्लाम) के हिसाब से चलने वाले सऊदी में औरतों का गाड़ी चलाना कई तरह से उनकी मर्द-औरत में फ़र्क करने वाली परंपराओं के ख़िलाफ़ जाता था! इन परंपराओं में सबसे उल्लेखनीय है कस्टोडियन लॉ. जिसके अनुसार एक औरत को पति अथवा किसी मेहराम के गार्जियनशिप (अथवा इजाज़त से) में ही कहीं आने-जाने, नौकरी करने, पढ़ने, शादी करने, यात्रा करने, वीसा-पासपोर्ट बनवाने, खाता खोलने इत्यादि की छूट है! मेहराम का मतलब होता है जिससे पर्दा करने की ज़रुरत नहीं, जिनसे शादी अथवा सेक्स करना हराम हो, एक क़ानूनी सहायक जो औरतों को 24 घंटे से अधिक की यात्रा में मदद करे जैसे: माँ-बाप, भाई, बेटा और खून के रिश्ते वाले लोग!

अब ज़ाहिर है कि अगर औरत ड्राइव करेगी तो सड़क पे उसकी ग़ैर-मर्दों से बात होगी, एक्सीडेंट की स्थिति में किसी ग़ैर-मर्द से मदद भी लेनी पड़ सकती है, गाड़ी चलते समय ज़ाहिर है चेहरा ढँका नहीं रहेगा, अगर महिला टैक्सी ड्राइवर है तो वो किसी ग़ैर-मर्द से साथ अकेली होगी वो भी किसी मेहराम के बगैर. अर्थात पूरे कस्टोडियन लॉ की धज्जी उड़ जायेगी! यही वजह थी सरकार की तरफ इस पाबंदी की! लेकिन और गहराई में जायें तो असल में ये बेकार का कस्टोडियन लॉ कट्टरपंथियों के मर्दवाद, मैस्क्युलिनिटी, औरतों पर उनकी बादशाहत को कायम करता था! सिर्फ़ ड्राइविंग की आज़ादी देना मसला ही नहीं था और न ही मसला कुरान या शरिया से जुड़ा था, बल्कि ड्राइविंग की आज़ादी इन कट्टरपंथियों की उस सोच को तमाचा मारती है जिसमें वो बीवी, बहन, माँ, बेटी को अपनी निजी संपत्ति मानते हैं. और इसीलिए इस पाबंदी से उन्हें औरतों की सुरक्षा की ठेकेदारी स्वाभाविक रूप से मिल जाती थी. और औरतों को घरों की चहारदीवारी तक सीमित करके उनपर वर्चस्व जताना भी आसान रहता था! और अंदरूनी बात कि वो इससे औरतों की ‘सेक्सुअलिटी’ पर ज़बरन कण्ट्रोल कर सकते थे! ऐसी न औरतों पर भरोसा रखती है और न ही मर्दों पर! ड्राइविंग पर पाबंदी इसी औरत-मर्द विभेद का मजहबी विस्तार था! ये उस सोच का भी विस्तार था जिसमें मर्दों को औरतों की सुरक्षा का ठेका मिला हुआ होता था! अब औरत ड्राइव करेगी तो घर में न रहकर पब्लिक में रहेगी तो इस ठेके और स्वामित्व को धक्का तो लगेगा ही! इसी कस्टोडियन लॉ की वजह से वजह से सऊदी में औरतों के लिए सार्वजनिक जीवन बहुत सीमित रहा है!

लेकिन हाल के वर्षों आये तमाम सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक बदलावों ने इस पाबंदी के ख़िलाफ़ माहौल तैयार कर दिया! सऊदी की महिला अधिकार एक्टिविस्ट हाला-अल-दोसारी कहती हैं कि औरतों की ड्राइविंग पे पाबंदी का मतलब है कि सरकार औरतों को  पूरी तरह वैध एडल्ट नहीं मानता! पूर्व शूरा काउंसिल मेम्बर मोहम्मद अल-ज़ुल्फा ड्राइविंग को मजहबी नहीं, सामाजिक और सांस्कृतिक मसला मानते हैं और कहते हैं कि तमाम विधवा और तलाक़शुदा औरतें बहुत अच्छी तरह घर संभालती हैं! हमें उनपर भरोसा करना चाहिए! इसी तरह सोशल सर्विस के प्रोफेसर नासेर अल-औद का मानना है कि महिलाओं के गाड़ी चलाने से मर्दों की सत्ता को क्या ख़तरा भला? वैसे भी आज बहुतेरे घर ग़ैरमर्द टैक्सी ड्राइवर की वजह से चल रहा है!

सऊदी में औरतें आर्थिक तौर से मजबूत हो रही हैं, उच्च शिक्षा हासिल कर रही हैं! औरतों में पढ़ी-लिखी बेरोज़गारी बढ़ी है, नौकरी की माँग तेज़ी से बढ़ी है! और ये पाबंदी उससे मेल नहीं खा रही थी! तमाम विधवा, तलाक़शुदा महिलायें जिनके कोई मर्द गार्जियन नहीं, उनका हिसाब कौन करेगा! टैक्सी से आना-जाना तमाम ग़रीब घरों के लिए ख़र्चे का मसला बनता जा रहा था! जैसे विदेशी टैक्सी ड्राइवर रखने का महीने का औसत ख़र्च क़रीब 3800 रियाल है और इस हिसाब से अगर महिलाओं को ख़ुद की कार चलाने की इज़ाजत मिल जाये तो देश का 30 अरब रियाल बच जायेगा (सरकार द्वारा सौंपी गयी रिपोर्ट से)! ऊबर जैसे विदेशी कंपनी का सरकार द्वारा प्रमोशन जिसमें ड्राइवर अक्सर विदेशी होता है, देश का काफ़ी पैसा बाहर जा रहा है! इसलिए पाबंदी हटाने से न सिर्फ़ घरेलू पैसा बचेगा बल्कि महिलाओं को रोज़गार भी मिलेगा!

लेकिन ये पाबंदी भी अभी तमाम शर्तों के साथ हटाई गयी है! फिर भी इस छोटे से सकारात्मक बदलाव का स्वागत करना चाहिए और इसके लिए सऊदी महिलाओं, सोशल एक्टिविस्ट और मौजूदा सुल्तान जो ऐसे बदलावों के हिमायती हैं, को बधाई! हालांकि असली जीत तब होगी जब कस्टोडियन लॉ (जो वहाँ औरतों की आज़ादी में सबसे बड़ा रोड़ा है) में आमूलचूल बदलाव आयेगा!

कुछ संदर्भ:
http://www.alwaleed.com.sa/news-and-media/news/driving/
https://www.theguardian.com/commentisfree/2016/oct/07/saudi-arabia-women-rights-activists-petition-king
https://www.independent.co.uk/news/world/middle-east/saudi-arabia-is-not-ready-for-women-drivers-says-deputy-crown-prince-mohammed-bin-salman-a7004611.html
http://www.loc.gov/law/foreign-news/article/saudi-arabia-shura-council-denies-social-media-reports-on-resolution-to-allow-women-to-drive/

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यौन सुख पर अपना दावा ठोंकने वाली महिलाओं की कहानी है – लस्ट स्टोरीज़

जया निगम 
लोकप्रिय नारीवादी लेखिका सिल्विया प्लाथ ने लिखा है – If they substituted the word ‘Lust’ for ‘Love’ is the popular songs it would come nearer the truth

इसका अर्थ है कि यदि लोकप्रिय गीतों में लव की जगह लस्ट यानी कामेच्छा का इस्तेमाल किया जाता तो वह सच के ज्यादा करीब होता. ज्यादातर शुद्धतावादी इस कोट पर ऐतराज़ कर सकते हैं कि प्यार और सेक्स कैसे अलग-अलग हो सकता है लेकिन हमारे देश ने वैश्वीकरण के 25 सालों में इतनी प्रगति कर ली है कि अब हम कम से कम प्रेम और वासना को अलग-अलग देख सकते हैं खासकर पॉपुलर मीडियम में ये हिमाकत कर पाना उपलब्धि ही कही जायेगी.

फिल्म का एक दृश्य

नेटफ्लिक्स ने लस्ट स्टोरीज़ बना कर कुछ ऐसी ही हिमाकत की है. इन दिनों देश में सेक्सुअल एंगल लगभग हर स्टोरी में मिल जायेगा. हालांकि यह हम पर है कि हम उसे नोटिस भी करना चाहते हैं या नहीं. सेक्स अब केवल सावधान इंडिया या क्राइम पेट्रोल की बैकबोन नहीं है बल्कि भाभी जी घर पर हैं की यूएसपी भी एडल्ट कॉमेडी है. इसी तरह अध्यात्म और राजनीति का हार्डवेयर इन दिनों जैसे सेक्स के सॉफ्टवेयर पर ही लिखा जा रहा है. इनकी अंदरूनी गाथायें सुन कर ऐसा लगता है जैसे दशकों से देश के गिरहर में पड़ा ‘परदा’ किसी ने नोच दिया हो.

इससे पहले घर-संसार और माया मेमसाहब के सिरे ही औरतों के चुनाव के दो पड़ाव माने जाते रहे हैं. इस बीच औरतें कैसे इतनी बदल गयीं कि ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’ अब ‘हेट स्टोरीज’ और ‘मस्ती’ बन चुकी है. औरतें अब अपनी जिंदगी को क्लोज इंडेड न होने देने पर अड़ रही हैं. फिर भी देश का बहुमत 90 के दशक के गानों के कैसेट की तरह औरतों को दो साइड A और B पर ही सुनना चाह रहा है. हालांकि देश की अर्थव्यवस्था 90 के समय से अब तक 360 डिग्री पर घूम चुकी है, ठीक उसी तरह वैश्वीकरण ने औरतों की जिंदगियों को भी सीडी की तरह गोल बना दिया है. जिसमें हर सिरा अब ओपेन इंडेड है.

फिल्म के अलग-अल्ड दृश्य

लस्ट स्टोरीज़ ने चार कहानियों के जरिये हमारे समाज के 4 सच सामने रखे हैं. पहली कहानी अनुराग कश्यप की है जो डार्क फिल्मों के लिये जाने जाते हैं. उन्होने कुछ इसी अंदाज़ में अपनी बात भी रखी है. बौद्धिकता के साथ जुड़ा कपट, अविश्वास और अहंकार राधिका आप्टे के किरदार की सेक्सुअल डिज़ायर के फॉर्म में सामने आया है. जहां मक्कारी के साथ असुरक्षा और दबंगई, चरम पर है. कुछ ऐसी ही कहानी हरामखोर फिल्म की भी है, लेकिन वहां उम्मीद है और क्लास का अंतर है. हरामखोर के नवाजुद्दीन सिद्दीकी और लस्ट स्टोरी की राधिका आप्टे में अंतर करना मुश्किल है कि कौन ज्यादा मक्कार है!

दूसरी कहानी ज़ोया अख्तर की है, इस कहानी में भूमि पेडनेकर का निभाया शहरी घरेलू नौकरानी का किरदार इतने डीटेल और इतने कम संवादों के साथ आता है कि उसे देख कर निम्न मध्यमवर्गीय किसी विवाहित स्त्री की जिंदगी की झलक देर तक मिलती रहती है. ज़ोया की दूसरी फिल्मों की ही तरह ये कहानी भी बेहद आम है लेकिन विजुअल ट्रीटमेंट के लेवल पर यह कहानी खास है. यह स्टोरी शबाना आज़मी की फिल्म अंकुर की याद भी दिलाती है बस फर्क यही है कि शबाना की जिंदगी अब शहर की कोई भूमि निभा रही है और उसकी जिंदगी का पूर्वार्ध है, उत्तरार्ध में क्या होगी ये कहना बहुत मुश्किल है.

दिबाकर बैनर्जी द्वारा निर्देशित तीसरी कहानी में मुख्य किरदार मनीषा कोईराला ने निभाया है. ये इस फिल्म की सबसे लेयर्ड और कॉम्पलेक्स स्टोरी कही जा सकती है. अपने पति के दोस्त के साथ अवैध संबंधों में जिंदगी का सुकून तलाशने वाली दो बच्चों की मां का किरदार बहुत इंट्रेस्टिंग है. इस प्लॉट पर बनी और किसी कहानी का नाम मुझे याद नहीं आता लेकिन याद आती है अपने पड़ोस के घर की एक घटना जिनसे हमारी बहुत करीबी थी. वहां दीदी जो अपने पति के शराब पीने और अनाप-शनाप पैसे खर्च करने की आदत से त्रस्त थीं उनका अफेयर अपनी ही एक सहेली के पति से हो जाता है जो उसे छोड़ कर किसी दूसरे आदमी के साथ रहने चली गयी थीं. इस कहानी में सेक्स बहुत था, डर बहुत था, दीदी की दो बच्चियां थीं, उनके कॉलेज और कस्बाई जीवन में मौजूद सहकर्मियों और रिश्तेदारों से छुप्पन-छुपाई थी. इसके बावजूद दीदी अपने पति से तलाक लेने को तैयार थीं लेकिन प्रेमी जिम्मेदारी लेने के मूड में नहीं था. जल्द ही दीदी को इस रिश्ते की सच्चाई समझ आ गयी. उन्होने अपने पति को सारी बात बता दी क्योंकि रिस्क लेना उन्होने सीख लिया था और खो देने का डर खत्म हो गया था. दीदी के आत्म-विश्वास से सनाका खाये पति महोदय सुधरने के लिये तैयार हो गये और साथ ही दीदी के ऊपर से सारी पाबंदियां भी हट गयीं. ज़ाहिर है पड़ोस की वो दीदी भी अब लिबर्टिना बनी हुई हैं और वो संबंध तो तभी समाप्त हो गया था.

मनीषा कोईराला एक दृश्य में

करन जौहर द्वारा निर्देशित चौथी कहानी पर बाहर की एक फिल्म से मूल आइडिया लेने का आरोप है. बावजूद इसके उनकी फिल्मों ने पीढ़ी दर पीढ़ी भारतीयों तक यौनिक आधुनिकता का पैकेज ले जाने का जोखिम उठाया है भले ही वह कितना भी आधा-अधूरा क्यों ना रहा हो. ये कहानी भारतीय परिवेश में सबसे नयी कहानी कही जा सकती है. पति के साथ रात-दिन कमरा बंद करके पड़ी रहने वाली औरत को यौन सुख न मिलता हो यह अब भी अधिकांश महिलाओं के लिये सोच पाना कल्पना से परे हैं. महिलाओं का अपने चरम सुख और यौन फंतासियों को पूरा करने के लिये वाइब्रेटर का इस्तेमाल करना, संस्कारी घरों की संस्कृति के लिये कितनी विस्फोटक स्थिति पैदा कर सकता है, वही दृश्य सबसे मज़ेदार है.

तकनीक के जरिये महिलाओं का चरम सुख हासिल करना, बहुतों के लिये अनैतिक हो सकता है लेकिन समाज की हिप्पोक्रेसी को ढ़ोती महिला अपने लिये कोई कदम ना उठाये, ये कॉमन सेंस के परे तर्क है. जापान की तरह हमारे देश में भी महिलाओं को लिबरेट करने में ऐसे यंत्रों की भूमिका प्रमुख हो सकती है (यदि छद्म संस्कृति और राजनीति की जानलेवा चाशनी यूं ही पकायी जाती रही). करन जौहर की कहानी को इस फिल्म का चरम सुख कहा जा सकता है जिसने तकनीक के जरिये यौन सुख तलाशने वाले लोगों पर एक डिबेट शुरू करने की हिम्मत की है. स्त्रियों का ऑर्गैज्म यानी चरम सुख भारतीय परिप्रेक्ष्य में अमूमन नैतिकता की छद्म बहस और वर्गीय राजनीति की आलोचनाओं की फेंस के बीच कहीं अटका रहता है. लेकिन एक कोट के मुताबिक दुनिया कि आबादी कितनी कम होती यदि औरतों को उनके हिस्से का सुख दिये बगैर मर्द उनसे बच्चे पैदा नहीं कर सकते! सच ही :
‘Imagine how small the world’s population would be if a woman have to have an orgasm in order to get pregnant.’ 

 
 आईआईएमसी की पूर्व छात्रा जया निगम सोशल सेक्टर से जुड़ी हैं. 
 
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किसी एक ब्राह्मण से अम्बेडकर, बुद्ध, रैदास की ताकत वाला दलित आन्दोलन खत्म नहीं हो सकता: रमणिका गुप्ता



रमणिका गुप्ता 


हिन्दी और दलित साहित्य संसार में फेसबुक पर पिछले दिनों हुए आरोपों-प्रत्यारोपों पर ‘युद्धरत आम आदमी’ की संपादक और वरिष्ठ साहित्यकार रमणिका गुप्ता की यह टिप्पणी नये सिरे से एक बहस को जन्म देगी . यह टिप्पणी उन्होंने ‘युद्धरत आम आदमी’ के अपने सम्पादकीय में की है: 


पूरे देश में 2 अप्रैल को दलित प्रतिरोध ने अपनी जोरदार उपस्थिति दर्ज करा कर, सत्ता को यह अहसास तो करा दिया है कि वे अब अपने अधिकारों के साथ किसी को छेड़-छाड़ करने नहीं देंगे। ऐसे समय में दिल्ली के दलित आन्दोलन के कतिपय बुद्धिजीवी वर्ग के लेखक आपस में बन्दूकें ताने खड़े हैं। वे एक बड़ी लकीर खींच कर बड़ा बनने की बजाय, खिंची हुई लकीरों को ही छोटा करके बड़ा बनना चाह रहे हैं। दलित आंदोलन, विशेषकर दिल्ली के दलित लेखकों का आंदोलन आज कई भागों में विभक्त हो चुका है। उन्होंने अलग-अलग संगठन भी बना लिए हैं। एक-आध संगठन तो जाति के आधार पर भी बन गए हैं। अलग-अलग संगठन बनाना कोई इतनी बुरी बात नहीं, बशर्ते उनकी मंशा सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्ध होकर ज्यादा से ज्यादा काम करना हो, ना कि ज्यादा से ज्यादा दूसरे को नीचा दिखाना। हो यह रहा है कि वे अब एक-दूसरे को ‘आउस्ट’ (बाहर) करने के लिए, एक दूसरे पर आरोप लगाने और एक-दूसरे की भर्त्सना  करने लगे हैं। उन्हें दूसरे की हर बात में षड्यंत्र की बू आने लगी है।

रमणिका गुप्ता दलित लेखक संघ के सम्मान कार्यक्रम में

कुछ लेखक तो खुलेआम बाबा साहेब डॉक्टर अम्बेडकर की ब्राह्मण महिला से शादी करने के प्रश्न को लेकर भी उनसे केवल नाइत्तेफ़ाक़ी ही नहीं जताते बल्कि उन पर प्रश्न भी खड़े कर रहे हैं। उनके बारे में तुच्छ शब्दों में बतियाते भी हैं। इतना ही नहीं, कोई-कोई तो गौतम बुद्ध को भी क्षत्रिय कहकर नकार रहे हैं। कुछ दलित लेखक व उनके परिवार वाले अभी भी उनका आदर्श ब्राह्मण ही है। अपने घरों में हिन्दूवादी अनुष्ठानों को यथावत् मान रहे हैं पर मंच पर वे ‘वचनं किमं दरिद्रम’हैं। एकजुट होकर एक जमात बनने की बजाय, वे मनु संहिता के अनुसार दलित साहित्य को भी जातीय खेमों में बांट रहे हैं। आज वे धड़ल्ले से जातीय उन्नयन की बात भी करने लगे हैं। अन्तरजातीय विवाह के विरुद्ध तो वे अलग से मुहिम ही चला रहे हैं। यह बाबा साहेब की 22 प्रतिज्ञाओं के बिल्कुल विपरीत है। कभी-कभी तो वे बड़े जोर से एक-दूसरे को संघी कहकर दलित संगठनों से बाहर करने की बात भी करने लगते हैं-पता ही नहीं चलता कि वास्तव में उनमें संघी कौन है-आरोपित या आरोप लगाने वाला? ये बात भी सच है कि किसी संगठन को कमजोर करना हो तो संका और भ्रम सबसे कमजोर कारगर हथियार होता है। इस समय, दलितों को एकजुट होकर एक जमात बनना चाहिए और लोगों को छांट या हटाकर दलित आंदोलन की धार को कुन्द नहीं करना चाहिए। अगर वे एक संगठन नहीं बन सकते तो न सही-पर उन्हें आपस में जुड़ना तो चाहिए। भले ही संगठन अलग हो लेकिन मुद्दे तो एक हों-उनमें आपसी कटुता तो न हो।
अपनी बात मनवाने यानी दलित आंदोलन को और सशक्त बनाने और आज के हिंदुत्ववादी खतरे से निजात पाने के लिए, दलितों को प्रगतिशील जनों के साथ एक साझा मोर्चा बनाना भी जरूरी है। ऐसे समय में दलित बुद्धिजीवियों का आपस में ही मारामारी करना तो हिंदुत्ववादी शक्तियों को ही बल देगा। वे आपस में ही इतनी तोड़फोड़ करने में लिप्त हैं कि एक जमात बनने की सोच ही नहीं रहे। बहुत पीड़ा होती है यह सब देख कर
वे सोशल मीडिया, फेसबुक, व्हाट्सएप के माध्यम से प्रगतिशील साथियों पर भी स्वयं को चर्चा में लाने या अपनी व्यक्तिगत खुन्नसें निकालने हेतु बिना प्रमाण आरोप भी लगाने लगते-कभी-कभी। इतना बड़ा आंदोलन, जो सामाजिक न्याय के लिए लड़ा जा रहा है, उसे कतिपय दिल्ली के बुद्धिजीवी अपने व्यक्तिगत विकास की सीढ़ी बनाने के लिए, आपस में लड़कर कमज़ोर कर रहे हैं। अगर कोई शंका है, तो उन्हें मिल-बैठकर बात करके, पत्राचार करके सुलझाना चाहिए, न कि फेसबुक या व्हाट्सएप पर-जैसे अगंभीर भाषा में 2 अप्रैल, 2018 को चलाई गई बहस। गंभीर लोग प्रायः ऐसी भाषा का उपयोग नहीं करते। यह सवर्णों की भाषा है। दरअसल आजकल अपने को चर्चा में लाने का यह एक अच्छा ढंग निकला है। किसी पर कीचड़ उछाल दो फेसबुक पर या व्हाट्सएप पर-और चर्चा में आ जाओ! कुछ अच्छा लेख लिखकर, अच्छी बात कहकर चर्चा में आना ज्यादा सार्थक होता है। यदि आप किसी के मत से सहमत नहीं हैं, तो लेख के माध्यम से भी लेख के माध्यम से भी अपना विरोध दर्ज़ करवा सकते हैं। उसमें कटुता या शत्रुता तो नहीं आनी चाहिए।
हम लोग, जो संपादन करते हैं, उन्हें बड़े-से-बड़े लेखक की रचनाओं को भी संपादित करना पड़ता है। कई बार टाइप की अशुद्धियां भी होती हैं, कई बार व्याकरण की गलतियां भी होती हैं। कई बार कुछ रचनाएं तो इतनी ज्यादा बड़ी होती हैं कि उन्हें काट-छाँट कर संपादित भी करना पड़ता है। यह संपादक का काम होता है। उसमें संपादक यह देखता है कि मूल भाव नष्ट ना हो और पूरी बात भी चली जाय। अनूदित रचनाओं में तो भयंकर गलतियां होती हैं। महाराष्ट्र से रचना मराठी-हिन्दी, गुजरात से गुजराती-हिन्दी, तेलुगु से तेलुगु-हिन्दी में आती हैं, यानी हर भाषा की रचनाओं में अपने-अपने व्याकरण के उपयोग के चलते गलतियां हो जाती हैं-उन्हें भी ठीक करना पड़ता है। कई बार पुनः लेखन करना पड़ता है, जैसे प्रेमचन्द किया करते थे। इसीलिए अगर कोई साथी दलित रचनाओं को ठीक करके, उन्हें और अच्छा बना कर प्रकाशित करने लायक बना कर किसी दलित साथी की मदद कर प्रकाशित करता या करवाता है, तो उसको शाबाशी मिलनी चाहिए, ना कि उसकी भर्त्सना करनी चाहिए। ऐसा तो केवल व्यक्तिगत खुन्नस के मामले में या चर्चा में आने की अथवा अपनी जगह बनाने की योजना होने पर ही होता है। आज यह भी गंभीरता से सोचने का एक जरूरी और महत्वपूर्ण विषय है कि आखिर दलित समाज और उसका बुद्धिजीवी तबका भगवा में क्यों चला गया? इस पर भी सभी गुटों के दलितों को मिल बैठकर बात करनी चाहिए और राष्ट्रीय स्तर पर सेमिनार होने चाहिए।

दलितों को जागृत व एकजुट करने हेतु जरूरत है कि दलित लेखक गांव से जुड़ें, केवल शहरों में बैठकर यह काम नहीं होगा। उन्हें दिवंगत रजनी तिलक की तरह एक्टिविस्ट होने के मार्ग पर चलने के बारे में तय करना होगा, अगर वे सचमुच दलित समाज को जागरूक कर सवर्ण शोषण व सवर्ण ब्राह्मणवादी मानसिकता-सवर्ण व दलित दोनों की-से मुक्त कराना चाहते हैं। आज दलित वर्ग मध्यम वर्गीय प्रवृत्ति अपनाता जा रहा है। पढ़-लिख कर वह अपने घर की औरतों के प्रति भी वही सवर्ण दृष्टि अपना रहा है। पुरुष ‘शावनिज़्म’ (मर्दवाद), जो उसमें पहले से ही था-अब और बढ़ गया है। वे अभी भी ब्राह्मण को अपना आदर्श मानते हैं, और मन से हिन्दू हैं-हिन्दू अनुष्ठानों को निभाते हैं-बौद्ध रीति से विवाह करते हैं दिखावे के लिए-फिर घर जाकर हिन्दू रीति से विवाह करते हैं।

रमणिका फाउंडेशन की एक तस्वीर

मैंने पहले भी कई बार लिखा है कि दलितों को अपने आलोचक पैदा करने चाहिए। सवर्णों से सर्टिफिकेट लेने की चिरौरी नहीं करनी चाहिए किन्तु आज भी वे अपनी किताबों की समीक्षा उनसे लगातार करवाते आ रहे हैं और व्यक्तिगत मतभेद होने पर उन्हें ‘घुसपैठिया’ या कुछ और कहकर या दलित आन्दोलन के टूटने का भय दिखाकर, उनमें आरोप भी मढ़ने  लगते हैं-बिना प्रमाण के आरोप लगाना भी निन्दनीय हरकत होती है। हालांकि अब कुछ दलित लोग आलोचना भी करने लगे हैं, ये अच्छी बात है पर वहां भी जब खेमेबाजी नज़र आती है तो दुख होता है। एक-दूसरे को प्रोत्साहित करने की बजाय वे नये लेखकों को डराने व भगाने वाली आलोचना करने लगते हैं या अपने खेमे के लेखक की इतनी अधिक आधारहीन प्रशंसा कर देते हैं कि वह आत्ममुग्ध हो जाए और उसका विकास ही बंद हो जाए। वे नई-नई उपाधियां देने की पेशकश कर रहे हैं, जो बड़ी ही अच्छी बात है। पर आज हमें  महाकवियों की नहीं, जन-कवियों की उपाधि की दरकार है। महाकवि शास्त्रीय प्रणाली थी। वे महाकवि आम आदमी के लिए अबूझ थे। हमें सूरजपाल चैहान, मलखान सिंह जैसे जन-कवियों की दरकार है-हमें जयप्रकाश कदर्म और मोहनदास नैमिशराय, ओमप्रकाश वाल्मीकि आदि खोजी और गंभीर लेखकों की दरकार है, जो आंदोलनों को प्रेरित कर सकें और मानसिकता बदल सकें, जागृति ला सकें-हमारी कमज़ोरियों से भी हमें अवगत करवा सकें ताकि हम उन्हें दूर कर सकें और हमारा इतिहास भी तैयार करें। साथी गंगाधर पन्तावणे जी का तो कहना था कि दलित साहित्य में ‘शिव का तीसरा नेत्रा खुलेगा’ जैसे वाक्य या बिम्ब नहीं आने चाहिए। दलितों को अपनी श्रमण संस्कृति व जीवन के अनुरूप नये बिम्ब-प्रतीक लाने होंगे। इसलिये सवर्णों की शास्त्रीय भाषा का प्रयोग मत कीजिये-अपने लेखों को आम आदमी के लिये पठनीय बनाइये। इसलिए अपने कवि को कोई उपाधि देनी है, तो जनकवि की उपाधि दीजिए, महाकवि की नहीं। हमें कालिदास नहीं चाहिए, हमें कबीर-रैदास-तुकाराम की जरूरत है।

2 अप्रैल को सवर्ण घुसपैठ के नाम पर जिस भद्दे ढंग से एक व्यक्ति को टारगेट करके पोस्ट चलाई गई है, उस बहस की भाषा संघी है। यह प्रगतिशील दिमाग की उपज नहीं है। एक अभियान कँवल भारती के खिलाफ भी चला है, मैं उसकी भी भर्त्सना  करती हूं। ऐसी निरर्थक बहसें दलित लेखन व दलित आंदोलन को नुकसान पहुंचाती हैं-उनके आइकन्स को विद्रूप करती हैं।

दलित आंदोलनकारियों को इस बात के लिए मुतमइन होना चाहिए कि किसी एक ब्राह्मण या व्यक्ति से आन्दोलन ख़त्म नहीं होता। …घुसपैठ से अगर कोई आंदोलन खत्म हो जाए, तो वह कैसा आंदोलन है? इसका अर्थ है कि उसकी नींव ही कमज़ोर है। और दलित आन्दोलन इतना कमज़ोर नहीं है। दलित आंदोलन के पीछे अम्बेडकर हैं, बुद्ध हैं, रैदास  हैं, कबीर हैं और सामाजिक न्याय की लगन है सदियों के शोषण की पीड़ा है-उसे कैसे कोई एक व्यक्ति मिटा सकता है? संगठन जहां 2 जोड़ 2 बराबर चार-गणनात्मक’ होता है; वहीं वह मां की ममता की तरह सब को समा लेने की क्षमता रखने वाला सागर भी होता है। एक बूंद दूसरी बूंद से मिल जाने पर दो नहीं एक हो रहती है। दलित एक-एक बूंद मिल कर समुद्र बन जाएं! आओ इस ऐके को कायम करें।
यदि आन्दोलन चलाने वाले व्यक्तिवादी न होकर सामूहिकता में विश्वास रखते हों और अपने सिद्धान्त के प्रति प्रतिबद्ध हों, तो उन्हें कोई नहीं तोड़ सकता। संगठन संवादहीनता व शंका-अविश्वास से टूटते हैं। होना तो यह चाहिए कि जितने लोग दलित आंदोलन से अभी बाहर हैं, उन्हें भी सब दलित साथी संपर्क करें और अपने संगठन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता और आन्दोलन के बल पर उनकी मानसिकता भी बदलें।

दलित साहित्य के पक्ष में रमणिका जी का एक लेख 1998 में

हमारे गंभीर दलित साथी, जो इस पचड़े या विवाद में नहीं पड़े हैं, उनसे मेरा विशेष अनुरोध है कि वे इन सब साथियों को एक साथ बिठाकर कोई रास्ता खोजें। कृपया आपसी छीछालेदर बंद करवायें। उन्हें जो भी करना हो आपस में बातचीत करके या पत्राचार करके गलतफहमियां दूर करें बनिस्पत सोशल मीडिया पर आने के। यह जग हंसाई की बात है। वे गम्भीर लेखन के माध्यम से बात करें-अपनी कमज़ोरियों को भी ध्यान में रखें। दलित आंदोलन सोच बदलने का, दृष्टिकोण बदलने का आन्दोलन है। वह मानवता के कल्याण और सामाजिक न्याय का आन्दोलन है। करोड़ों दलितों को जागरूक करने की ज़िम्मेवारी है इस आंदोलन पर। उनकी बहस व्यक्ति-आधारित न होकर दृष्टिकोण-परक या मानसिकता आधारित होनी चाहिए।

अभी केवल एक अनुरोध है दलित साथियों से कि वे आपसी विवाद खत्म करें और एकजुट होकर एक साथ बैठें। जो दलित साथी उनसे इसलिए दूर हो गए हैं कि किसी विशेष दलित जाति ने उनका अपेक्षित नोटिस नहीं लिया और उन्हें लेखन में स्थान नहीं दिया, उनसे गंभीरता से बात करनी चाहिए ताकि वे जातिगत खेमों में न बंटें। वर्णाश्रम के अंतिम डंडे पर बैठे दलित को भी यह अहसास कराएं कि वह उसके साथ पूरी दलित जमात खड़ी है। यह बहुत खतरनाक समय है-आज बहुत बड़े-बड़े दलित नेता भगवा गोद में जा बैठे हैं। जब बाहर के दुश्मनों का हमला होता है तो घर के दुश्मन-दोस्त मिलकर उसका मुकाबला करते हैं-अपनी लड़ाई स्थगित कर देते हैं। अभी देश पर जातिवादी धर्मान्ध अंधविश्वासियों, तर्कहीन अंधभक्तों, धर्मान्ध हिन्दुत्ववादियों, दंगावादियों का ख़तरा मंडरा रहा है-जिनके खि़लाफ़ एक साझा मोर्चे की जरूरत है, और ऐसे समय में ऐसी बहसें उस साझे मोर्चे को कमज़ोर करने की साज़िश है-यही आरएसएस का अभीष्ट भी है। दलित बुद्धिजीवियों को प्रगतिशील तत्वों से मिलकर इसका मुकाबला करना चाहिए ताकि हिन्दुत्ववाद-जिसने दलितों को पशुवत जिंदगी दी, उसे परास्त व ध्वस्त किया जा सके।

पुनश्च: राजकिशोर जी के जाने से बड़ा आघात लगा। वे बड़े बेबाक और तर्कशील आलोचक होने के साथ-साथ वंचित समाज व हाशिये के लोगों की भी चिंता करते थे और उन पर लिखते थे। एक अच्छे विश्लेषक का अचानक हमारे बीच से चले जाना बड़ा दुखदायी है। रमणिका फाउंडेशन, युद्धरत आम आदमी और अखिल भारतीय आदिवासी साहित्यिक मंच उनको अपनी श्रद्धा अर्पित करते हैं।

 
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रंगकर्मियों से बलात्कार : क्या बलात्कारी पीड़िता को खुद सही-सलामत वापस छोड़ते हैं? आदिवासी अधिकार की प्रवक्ता दयामनी बारला ने उठाये ऐसे कई सवाल

विक्रम कुमार 
रांची के खूंटी जिले के कोचांग में नुक्कड़ नाटक करने गयीं रंकर्मियों के साथ बलात्कार की घटना ने रंगकर्म की दुनिया और देश को हिला दिया है. एक ओर पुलिस इस घटना को उस इलाके में आदिवासियों के पत्थलगड़ी आन्दोलन के नेताओं से जोड़ रही है, उसके समर्थकों को बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार कर रही है तो दूसरी ओर देश भर में रंगकर्मी इसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. लेकिन आदिवासी अधिकार और मुद्दों के लिए निरंतर संघर्ष करने वाली और उसपर मुखर रही दयामनी बारला इस घटना में पीड़िताओं को वास्तविक न्याय न मिलने की आशंका जता रही हैं और बलात्कार के मामले में पुलिस की थेयरी पर सवाल उठा रही हैं. घटना स्थल से लौटकर दयामनी बारला ने स्त्रीकाल से बातचीत की और उठाये ये सवाल:

कोचांग का वह स्कूल जहाँ लडकियां नुक्कड़ नाटक करने गयी थीं

पिछले उन्नीस जून को कोचांग के एक मिशनरी स्कूल में गयी 5 रंगकर्मियों को बताया जाता है कि कुछ लोग जंगल में उठा कर ले गये और उनके साथ बलात्कार किया. पुलिस के अनुसार उस इलाके में उनके आने से नाराज पत्थलगड़ी के समर्थकों ने इस घटना को अंजाम दिया है. बलात्कार के बाद पीड़िताओं को वापस वहीं छोड़ दिया गया जहाँ से वे ले जाई गयी थीं. मामला प्रकाश में आने के दौरान दयामनी बारला हैदराबाद में एक कार्यक्रम में शिरकत के लिए गयी थीं वहां से रांची लौटकर वे कुछ और सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ कोचांग के घटनास्थल पर गयीं.

दयामनी बताती हैं कि वहां के लोग काफ़ी डरे हुए हैं और कोई मुंह नहीं खोल रहा है. लेकिन दबी जुबान से कुछ तथ्य सामने रखते हैं. मसलन कोई नुक्कड़ नाटक की संचालक संस्था के निदेशक पर सवाल क्यों खड़े नहीं कर रहा है? पुलिस के अनुसार नुक्कड़ नाटक की जानकारी पुलिस को नहीं थी और उसके आयोजन की अनुमति नहीं ली गयी थी. दयामनी सवाल करती हैं कि नाटक कराने वाली संस्था सरकारी अनुदान पर उनके साथ मिलकर नाटक कराती है, आखिर ऐसा क्यों हुआ कि कोचांग जैसे तनावग्रस्त इलाके में वह बिना पुलिस को सूचना दिये पांच लड़कियों को नाटक के लिए लेकर जाती है?

पढ़ें : आदिवासियों का पत्थलगड़ी आंदोलन: संघ हुआ बेचैन, डैमेज कंट्रोल को आगे आये भागवत

दयामनी बारला

कौन हैं असली अपराधी? 

पुलिस की थेयरी के अनुसार फादर अल्फोंस के कहने पर दो ननों को छोड़ दिया गया और पीड़िताओं को ले जाते वक्त फादर ने कहा कि ‘कुछ नहीं होगा वे तुम्हें छोड़ देंगे.’ इसपर दयामनी सवाल उठाती हैं कि ‘आखिर फ़ादर ही क्यों, लड़कियों के साथ उस संस्था का संचालक भी वहां था, उसने लड़कियों को क्यों नहीं रोका?’ वे आश्चर्य प्रकट करते हुए कहती हैं कि ‘ यह शायद पहली घटना होगी जिसमें लड़कियों को जंगल में ले जाकर गैंगरेप किया जाता है और उन्हें पुनः वापस उसी जगह छोड़ दिया जाता है, जहाँ से वे उठाकर ले जाई गयी थीं. क्या अपराधी पहले भी ऐसा करते रहे हैं.?

दयामनी कहती हैं ‘जरूरत है कि इस घटना के असली अपराधियों को सजा मिले. सजा दिलाने से ज्यादा पुलिस का यकीन इस मामले को पत्थल गड़ी आन्दोलन से जोड़ने में है.’ उनके अनुसार ‘पीड़िताओं के नाम और उनके परिवार का नाम काफी गुप्त रखा जा रहा है, जिसके कारण उनसे मिलकर घटना की वास्तविकता को समझना संभव नहीं हो रहा है. अभी तक नाटक- संचालक पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है, वह इस मामले में एक जिम्मेवार है लेकिन वह खुद ही विक्टिम बन गया है. वह सरकारी प्रोजेक्ट पर नुक्कड़ नाटक करता है, वह फादर के बारे में बयान दे रहा है और खुद विक्टिम बना है, जबकि वह सरकारी प्रोजेक्ट करता है तो उसे उसकी जिम्मेवारियां तो पता ही होंगी. उसकी संस्था का नाम भी इस मामले में सामने नहीं आ रहा है. जबकि मामले को अलग मोड़ देते हुए स्कूल के फादर को गिरफ्तार किया गया है.. दयामनी कहती हैं ‘असली साजिशकर्ता असली अपराधी को गिरफ्तार होना चाहिए.’

वे आगे कहती हैं ‘सवाल यह भी है कि सरकार ने जगह-जगह सीआरपीऍफ़ बैठा रखा और संवेदनशील इलाके में उससे ही अनुदान प्राप्त लोग नाटक करने आ रहे हैं और उसे ही नहीं पता है कि इस इलाके में कौन, क्यों और कब आ रहा है? ऐसे सवालों को बाईपास करके चले जाने से न्याय तो होगा नहीं उथल-पुथल जरूर हो जाएगा. आपको जिन्हें गिरफ्तार करना उन्हें गिरफ्तार कर नहीं रहे.’

खूंटी और कोचांग के इलाके में सवाल और भी तैर रहे हैं. इस घटना को अंजाम देने में पीप्लस लिबरेशन फ्रंट ऑफ़ इंडिया (पीएलएफआई) का नाम आ रहा है. लोग सवाल कर रहे हैं कि इस संगठन के सरकारी कनेक्शन पर भी लोगों की राय अलग-अलग रही है. इसकी भूमिका पर भी संदेह है. वही लोग छत्तीसगढ़ में संघ की बैठक, उसमें संघ प्रमुख का आना और पत्थलगड़ी पर बयान देना तथा फिर सरकार की कार्रवाइयों में या ऐसी घटनाओं में तेजी में भी कोई सूत्र देख रहे हैं. दयामनी कहती हैं कि ‘संघ हो या भाजपा उनसे सवाल है कि यदि पत्थलगड़ी जैसे आन्दोलन इस इलाके में हो रहे हैं तो उनके लोग जनता से संवाद क्यों नहीं बनाते. उनका संगठन, सांसदों, विधायकों के प्रतिनिधि, सरकारी अमले इस इलाके में काम कर रहे हैं तो वे संवाद क्यों नहीं बनाते, दमन और बलप्रयोग की जगह. अखबारों में खबरे प्लांट हो रही है कि एसपी, डीएसपी सडक पर सो रहे हैं, तो सवाल है कि आप इतने क्रांतिकारी हैं तो आज झारखंड जल क्यों रहा है? सवाल यह भी उठ रहा है कि पुलिस के अनुसार पीड़िताओं के गुप्तांगों में लकड़ी डाली गयी. फिर जब वे वापस सामान्य कंडिशन में कैसे वापस आयीं? नाटक की संस्था के संचालक के अनुसार वह उन्हें उस वक्त थोड़ा असहज देख रहा था तो सवाल है कि गैंगरेप के ऐसे मामलों में थोड़ी असहजता भर ही होती है? संचालक ने तुरत पुलिस को क्यों नहीं बुलाया?

 बलात्कार की सरकारी-संघी रणनीति (!)

राजधानी में विरोध प्रदर्शन 

उधर देश की राजधानी दिल्ली में विकल्प साझा मंच के तहत रंगकर्मियों ने इस घटना का व्यापक विरोध किया और 2 जुलाई को मंडी हाउस से झारखंड भवन तक मार्च का ऐलान किया. रंगकर्मियों ने जारी एक विज्ञप्ति में कहा कि कोचांग, झारखंड में नुक्कड़ नाटक करने गयीं पांच महिला कलाकारों के सामूहिक बलात्कार के दोषियों को तुरंत गिरफ़्तार करने और राज्य की भाजपा सरकार द्वारा यौन हिंसा का राजनीतिक इस्तेमाल बंद करने की हमारी मांग है.

26 जून को नेशनल ब्लैक डे या आपातकाल विरोधी दिवस को याद करते हुए हाल के वर्षों में देश में नफ़रत, हिंसा और फ़ासीवाद के बढ़ते ख़ूनी आतंक की रंगकर्मियों ने एक स्वर से निन्दा की और कहा कि आज देश में आपातकाल से भी बुरे हालात हैं, जहां सरकार मुट्ठी भर कारपोरेट पूंजीपतियों को असीमित फ़ायदा पहुंचाने के लिये जनता के जनतांत्रिक अधिकारों को बेशर्मी के साथ कुचल रही है। उन्होंने देश के तमाम संस्कृतिकर्मियों, कलाकारों और अमन-पसंद नागरिकों से यह अपील की कि वे अपनी चुप्पी तोड़ें और समाज-विरोधी ताक़तों का आगे बढ़ कर मुक़ाबला करें।

पत्थलगड़ी

इस अवसर पर संगवारी और अस्मिता थियेटर के कलाकारों ने प्रतिरोध के दर्जनों जनगीत प्रस्तुत किये। अस्मिता के कलाकारों ने यौन हिंसा के ख़िलाफ़ अपने बहुचर्चित नाटक ‘दस्तक’ की प्रस्तुति भी की। बड़ी संख्या में आयोजन में शिरक़त कर रहे कलाकारों और दर्शकों ने भी नारों और जनगीतों की प्रस्तुति में सक्रिय रूप से भाग लिया। कार्यक्रम के अंत में कलाकारों से संवाद के क्रम में अधिकतर दर्शकों ने यह स्वीकार किया कि देश सचमुच एक भयावह दौर से गुज़र रहा है, जब अपराधियों के गिरोह सड़कों पर राष्ट्रभक्ति के नारे लगाते घूम रहे हैं और वे विरोध की हर आवाज़ को कुचल देना चाहते हैं। दलितों, आदिवासियों और छात्रों के ख़िलाफ़ राज्य ने एक अघोषित युद्ध छेड़ रखा है और सत्ता में बैठे मंत्रियों-नेताओं द्वारा किसानों की आत्महत्याओं तक का मखौल उड़ाया जा रहा है। लेखकों, पत्रकारों, जजों और विचारकों को धमकाया जा रहा है और उनकी हत्या तक कर दी जाती है। हत्यारे बेख़ौफ़ हैं क्योंकि उन्हें सरकार का समर्थन प्राप्त है। ऐसे में हर अन्याय के ख़िलाफ़ बोलना और आवाज़ उठाना बेहद ज़रूरी है।

विकल्प साझा मंच की तरफ़ से कार्यक्रम का संचालन कर रहे राजेश चन्द्र ने यह भी बताया कि कोचांग में महिला कलाकारों के सामूहिक बलात्कार के दोषियों की तुरंत गिरफ़्तारी और पीड़ितों को न्याय मिलने तक यह प्रतिरोध ज़ारी रहेगा। इस क्रम में आगामी 2 जुलाई (सोमवार) को मंडी हाउस से लेकर झारखंड भवन तक कलाकारों द्वारा एक बाइक मार्च निकाला जायेगा। झारखंड भवन पर दोपहर के 2 बजे एक शान्तिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन का आयोजन है, जिसके बाद रंगकर्मी झारखंड सरकार के नाम एक ज्ञापन भी सौंपेंगे। उन्होंने दिल्ली के रंगकर्मियों, कलाकारों और नागरिकों से अपील की कि वे 2 जुलाई के प्रदर्शन में भी अवश्य शामिल हों।

विक्रम  कुमार फ्रीलांस पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट हैं.

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मुनिरका से अमेरिका तक: कल्चरल शॉक और द्विध्रुवीय समानता के दृश्य

मुनिरका से अमेरिका तक-यह वाक्य हमेशा आप जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू ) में सुन सकते हैं. मतलब, जेनयू से निकलते ही लोग दो ही जगह जाते हैं, मुनीरिका नहीं तो अमेरिका. या मुनीरिका के बाद अमेरिका.

चन्द्रसेन अमेरिका में

ये मुनीरिका क्या है?

दरअसल मुनिरका, जेएनयू- मुख्य गेट के सामने वाली बस्ती हैं.  मतलब ये है कि जो भी जेएनयू से ताल्लुक रखता है उसका मुनिरका से नाता होना लाजिमी है. वैसे इसे ‘जाटलैंड’ भी कहते हैं.

खैर, मेरा भी जेएनयू से एक दशक का नाता रहा है.  पिछले वर्ष, जुलाई में पीएचडी जमा किया और मुनिरका में आकर रहने लगा. रूम रेंट की टेंसन, जाटों की छीलने वाली बोली, एडहॉक इंटरव्यू में लगातार असफल प्रयास और घर वालों  की तरफ से शादी की जल्दबाजी .ये सब एक साथ शुरू हो गया. मतलब, दिन-रात पोलिटिकल डिबेट की चाशनी में डूबने वाले जेनयू के लालों का दाल रोटी से नाता शुरू हो जाता है.

‘मुनिका या फिर अमेरिका’- ये वाक्य, हम सबका तकियाकलाम  बन गया था। क्या पता था, मेरे साथ भी ये सुखद सयोंग घटित होने वाला है .  21 मई को अमेरिका रवाना ही हो गया. मतलब न्यू स्कूल यूनिवर्सिटी, न्यूयॉर्क. 22 जून को वापस फिर मुनीरिका में आ गया.  और गंगा ढाबा पर दोस्तों के साथ जेनएयू की सदाबहार बहसों में लुप्त हो गया।


आईये पहले मैं आपको 22 मई की सुबह की तरफ ले चलता हूँ . 

‘ देवियों और सज्जनों, जॉन ऍफ़ केनेडी एयरपोर्ट पर आप का स्वागत है. सुबह के  नौ बजकर 18 मिनट हैं.  यहाँ का तापमान 18 डिग्री सेल्सियस है. एयर इंडिया से सफर करने के लिए आपका धन्यवाद ‘. अमेरिका पहुँचने का संदेश हमें इस तरह से मिला.

हवाई जहाज से निकलते ही वह पहली चीज क्या  थी जो आभास दिला गई कि अब अमेरिका पहुँच गया हूँ?  ‘अमेरिकन ऐक्सेंट’ में इनकी अंग्रेजी.  लेकिन दो कदम आगे बढ़ाते ही एक एफ्रो-अमेरिकन मिला जो हाथ में झाड़ू पकड़े खड़ा था. और आगे बढ़ा तो दूसरा मिला जो सामान ढ़ोने की ट्राली लिए चला आ  रहा था. चेहरे पर उदासी, आत्मविश्वास गिरा हुआ . काले लोगों को देखकर अचानक भारत के ऐसे ही लोंगो की याद आ गयी जो सदियों से हाथ में झाड़ू पकड़े सफाई के काम में लगे हुए हैं. पहले गाँव में जमींदारों के दुआर, चौपाल और शादी विवाह में जनवास की सफाई की देख रेख करते रहें हैं. वहीँ अब शहर में अस्पताल, स्कूल, रोड की सफाई करते हुए देखे जाते हैं.  हाँ, मैं भारत के लगभग 20 करोड़ दलितों की  बात कर रहा हूँ. अपने अमरीकी प्रवास के दौरान, मैं हर रोज दलितों को याद इन एफ्रो-अमेरिकन लोगों को देख करता था. वास्तव में मार्टिन लूथर किंग, मैलकॉम एक्स जैसे नेताओं की कुर्बानी के बाद  इनको एक सम्मान-जनक जिंदगी जीने का हक़ मिला.  लेकिन समाज आज भी रंग के आधार पर बंटा  हुआ है. सारी बड़ी पोस्ट पर गोरे और छोटी पोस्ट पर काले आप को मिल जाएंगे. लेकिन इन लोगों ने एक काला राष्ट्रपति (ओबामा) टॉलरेट कर लिया है.  क्या भारत एक दलित प्रधानमंत्री टॉलरेट करने को सक्षम है ? मुझे इस पर पूरा संदेह है.

छोड़िये, अब अमेरिका की बात करते हैं.    

दूसरी बात जो मुझे अमरीकी समाज की अच्छी लगी वह है इनका टोलरेन्स लेवल. एक लेवल तक ये विभिन्न नस्ल, भाषा, खान-पान, प्यार, मुहब्बत, बर्दाश्त कर लेते हैं.  खुला समाज है, पार्क में या सड़क पर इश्क फरमाईये, बीफ खाइये या सुअर। इसको रोकने वाले न एंटी रोमियो स्क्वाड मिलेंगे न ही भक्तों की बेरोजगार फ़ौज.

‘अच्छे बच्चों की तरह चुपचाप बैठ जाओ, क्लास है घर नहीं , गुरु जी के पैर छुओ’. ये हम सबकी भारतीय स्कूल ट्रेनिंग होती है.  लेकिन, अमेरिकी चाल-चलन तो कुछ और ही है भाई. ये पढ़ाते कम, बहस ज्यादा करते हैं, भूख लगी है तो, क्लासरूम में ही खाना शुरू कर देते हैं. बैठे-बैठे थक गए, तो खड़े होकर एक्सरसाइज करने लगते हैं. ये एकदम नया अनुभव था. हलाकि जेएनयू ने कुछ अनुभव पहले ही दे दिए थे.  सबसे ज्यादा अचरज तो मैं अपने चीनी दोस्तों से होता था.  दो लड़कियां थी, ये अचानक खड़ी होकर कमर में हाथ ऱख कर हिलने-डोलने लगती थीं. पहली बार तो समझ में ही नहीं आया कि इन चीनियों को हुआ क्या है ? बाद में मैं भी कमर में हाथ ऱख कर  हिलने डोलने का आदी हो गया.  मतलब क्लास-रूम में ही योगासन.

चन्द्रसेन अपने साथियों के साथ

अपने बचपन के स्कूल को याद करता हूँ , तो कांप जाता हूँ.  पता है, दलितों को आगे बैठने तक की भी इजाजत नहीं होती थी.  क्लास में हम दलित सबसे पीछे बैठने को मजबूर रहते थे, न साला सुनायी देता था नहीं दिखाई.  डायनामाइट लगाओ ऐसी व्यवस्था को.


खैर, अब अमेरिका की बात करते हैं.

‘अरे लाल बत्ती होने वाली है, गाड़ी भगा. दिखाई नहीं दे रहा है क्या, अभी फाटक बंद हो जायेगा, थोड़ा स्पीड बढ़ा ले’.भारतीय मन और दिमाग में ये शब्द कूट-कूट कर भरे हुए थे .  कल्चरल शॉक होना ही था.  दूसरे देशों पर बमबारी, हाई स्पीड ट्रेन, फ़ास्ट लाइफ का माहिर अमेरिका, अपनी सड़क पर बहुत स्लो और संभल कर गाडी चलाता है.  इन लोगों ने एक सिविक सेन्स पैदा कर लिया है. लाल बत्ती होने  से पहले ही गाडी रोक देते हैं, किसी को लाल बत्ती पर कोई जल्दबाजी ही नहीं होती है. यहाँ तक कि अगर कोई रोड क्रॉस भी कर रहा होता है तो अपनी गाडी रोककर उसे जाने को कहते हैं.  मतलब पहले-आप, पहले-आप वाला सिस्टम है.

हाँ मैं कल्चरल शॉक की बात कर रहा था. कई मुझे भी मिले. जैसे, हमारी डोरमेट्री में फ्री का कंडोम होना, बाथ-रूम सभी का एक ही होना, गे-लेस्बियन का खुले आम प्रेम करना, पार्क में सनी लियोनी स्टाइल में धूप सेकना इत्यादि.  लेकिन जो बात मेरे जेएनयू प्रवास और छात्र राजनीति में नहीं समझ में आयी थी वह वहां जाकर एकदम समझ में आ गयी.  आप सैद्धांतिक और दार्शनिक रूप से कितना भी प्रोग्रेसिव हो जाईये लेकिन जब उसे इम्प्लीमेंट करना होता है तो बड़ा कठिन काम लगता है।  इसलिए बेचारे सवर्ण मार्क्सवादियों के कथनी और करनी में  फरक रहा है।   हमेशा जमीन बटवारे की बात करेंगे लेकिन जब अपना बाटने की बारी आयी तो कम्मुनिस्ट पार्टी को ही हाई-जैक कर लिया.

खैर, अब फिर से अमेरिका की बात करते हैं..

एक महीने के प्रवास के दौरान हम लोग वाशिंगटन,  न्यूयार्क , ब्रुकलिन और ब्रोंक्स गए. शिक्षण संस्थाओं, मूयूसियम और पुस्तकालयों को देखकर मुझे , ग्रीक, ब्रिटेन की अनायास याद आ गयी.  पता है क्यों? यह इसलिए की यूनानियों ने पूरी दुनिया में अपने ज्ञान का डंका बजाया और राज किया, अंग्रेजों, ने दुनिया के महानतम संस्थाएं खोली और दुनिया पर राज किया, अमेरिका भी वही कर रहा है।  चीनी अध्ययन का छात्र होने के नाते, मैं ये कह सकता हूँ की अगला नंबर चीनियों का  है.

भारत में भी कुछ ऐसा है? हैं न. जिसने शिक्षा और ज्ञान को कंट्रोल किया उसने रूल किया.  ब्राह्मणों  ने तो यही किया है।  पूँजीवाद का क्रूरतम रूप है मजदूरों की छटनी और मशीनों का राज.  आप अमेरिका जैसे पूंजीवादी देश में जायेंगें तो कंस्ट्रक्शन साईट पर मजदूर पाएंगे ही नहीं.  एक साथ बहुत सारी मशीनें काम करती हुई दिखाई देतीं हैं.  लेकिन इन मशीनों का ड्राइवर जरूर एक  इंसान  होता है.  एक उदाहरण से समझिये. अगर आप को अपनी गाडी में गैस भरवाना है तो पंप पर जाइए, पैसा डालिए, गैस भरिए और चलते बनिए.  इसलिए मैं अपने गाँव के लौंडों से कहता रहता हूँ कि आने वाले दिनों में तुम सब बेकार हो जाओगे क्योँगे कंपनियों को पढ़े लिखे मजदूर चाहिए न कि तुम्हारे जैसे अंगूठा छाप मजदूर. लेकिन ये लौंडे सुनते कहाँ हैं?

खैर, अब अमेरिका की बात करते हैं. बल्कि बात की इतिश्री करते हैं।

बात मुनीरिका-जेएनयू से शुरू हुई थी.  ख़तम भी यही पर होना है. 


दोस्तों, ने पूछा कैसा रहा एक महीने का क्लास ?

वास्तव में एक महीने का वहां पर मेथडोलॉजी का क्लास था.  आसान भाषा में कहूं तो कैसे रिसर्च करना है उसकी ट्रेनिंग. जैसे ही मेथोडोलॉजी के बारे में पूछा तो जेएनयू , खासकर अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन वाले  प्रोफेसरों पर बहुत गुस्सा आया.  वास्तव में इनको  मेथोडोलॉजी पता ही नहीं है.  मजेदार बात बताऊ, यहाँ लोग विकिपीडिया से पढ़कर मेथडोलॉजी पढ़ाते हैं.  मेथडोलॉजी  मल्टीडिसिप्लिनरी अप्प्रोच की डिमांड करता है और एक प्रोफेसर जो नेपाल या नाइजीरया का  एक्सपर्ट है वह अकेले ही पूरा मेथडोलॉजी का ज्ञान बाँट देता है. ये हुनर कहाँ से लाते हो गुरुदेव ?

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चंद्र सेन , इंडिया चाइना इंस्टिट्यूट, द न्यू स्कूल यूनिवर्सिटी, न्यू यॉर्क, अमेरिका.

आपातकाल : पुलिसकर्मियों की पत्नियां, बहनें, बेटियाँ, मायें कर रही हैं आन्दोलन: गिरफ्तार हो रहे पुलिसकर्मी

 छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह एवं उनके पुत्र अभिषेक के चुनावी क्षेत्र से जुड़े जिला मुख्यालय राजनाँदगांव में पिछले कुछ दिनों से छत्तीसगढ़ में पुलिसकर्मियों के परिवार आन्दोलन पर हैं, पुलिसकर्मियों में से कुछ को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया है, कुछ बर्खास्त किये गये हैं. आज 25 जून को जब देश में इमरजेंसी लागू की गयी थी, उस दिन पुलिसकर्मी व्यापक आन्दोलन कर रहे हैं, वे एक दूसरे आपातकाल से गुजर रहे हैं. क्या है आन्दोलन की पृष्ठभूमि, कैसा है उनपर दमन का तरीका बता रहे हैं विवेक कुमार, वे इस आंदोलन को 2009 की एक घटना और 20 साल पहले थाने पर हुए हमले के बाद बर्खास्त पुलिसकर्मियों के संघर्ष की पृष्ठभूमि में भी देख रहे हैं: 

पुलिसकर्मियों के आन्दोलनरत परिवारवाले


गत 18 जून को मुख्यमंत्री रमन सिंह
एवं उनके पुत्र अभिषेक के चुनावी क्षेत्र से जुड़ा जिला मुख्यालय राजनाँदगांव में पुलिस विभाग में कार्यरत कर्मचारियों-सिपाही, हवलदार, एएसआई, एसआई की पत्नियों और परिवार के सदस्यों ने एक सांकेतिक धरना प्रदर्शन किया जिसमे पुलिसकर्मियों के परिवार के सदस्यों की ओर से विभिन्न मांगों को लेकर मुख्यमंत्री के नाम   को  ज्ञापन सौंपा गया, इससे पहले 15 जून को बिना किसी संगठन के ही 25 जून को धरना प्रदर्शन की अनुमति बाबत डीएम तथा एसडीएम को पत्र के माध्यम से सूचना दी गयी। सूचना देते ही पूरे प्रशासनिक अमले में हड़कंप मच गया। प्रदर्शन की जानकारी सम्भवतः मुख्यमंत्री को तत्काल ही दे दी गयी थी। इसीलिए मुख्यमंत्री के निर्देश से सांकेतिक धरना प्रदर्शन के समय ही प्रशासन की ओर से उनके पंडाल आदि उखाड़ फेके गये। जिस वजह से पटवारी कार्यलय के सामने एकत्रित होकर एसडीएम कार्यालय तक रैली निकाल कर ज्ञापन सौंप कर अपना कार्यक्रम समाप्त कर दिया।

आंदोलन की महत्वपूर्ण कड़ी: 
परंतु अगले ही दिन उच्च पुलिस अधिकारियों द्वारा अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को दिशा निर्देश जारी कर दिए गए जिसमे आंदोलन में शामिल न  होने की बात कही गयी। तथा परिजनों को भी दूर रखने की शख्त हिदायत दी गयी । इसके पश्चात ही शाम तक मे आंदोलन भड़काने के आरोप में कई रिटायर्ड पुलिस कर्मियों को गिरफ्तार कर लिया गया, जिन्हें बाद में कोर्ट से जमानत मिल गयी। अगली सुबह से पहले ही कई पुलिस कर्मियों को कारण बताओ नोटिस मिल चुकी थी तथा कई कर्मियों को बर्खास्त करने का आदेश भी जारी हो चुका था। इसी बीच मुख्य आन्दोलनकर्ता के रूप में राकेश यादव (पूर्व पुलिस कर्मचारी, इसी मामले में बर्खास्त) की पहचान की जा चुकी थी।

आंदोलन की निर्धारित तिथि 25 जून के पहले आंदोलन क्यों भड़का ??: 
पुलिस विभाग के आला अधिकारियों द्वारा अपने ही कर्मचारियों पर की गई इस सख्ती एवम बर्बरता से पूरे प्रदेश में पुलिश विभाग के कर्मचारियों में व्यापक असंतोष फैल गया। जिससे व्हाट्सएप, फेसबुक आदि के माध्यम से आंदोलन की व्यापकता और बढ़ गयी। हद तो तब हुई जब विभाग द्वारा अपने ही कर्मचारियों के फोन कॉल, व्हाट्सएप कॉल, मैसेज, लोकेशन आदि पर नजर रखी जाने लगी। अनुशासनहीनता मानते हुए  5 दिन के भीतर ही 3000 से ज्यादा लोगों को जवाब पेश करने का नोटिस जारी किया जा चुका एवं 300 से ज्यादा लोगों को बर्खास्तगी का तुगलकी फरमान जारी कर दिया गया, तथा 2 दर्जन से गिरफ्तारी भी की जा चुकी है। विदित हो कि यह पूरा का पूरा आंदोलन केवल पुलिस कर्मियों के परिजनों ( पत्नी, माता-पिता, बहन ) ही चला रहे थे इस आंदोलन में पुलिस कर्मी शामिल नही हैं, पुलिस कर्मी पहले ही की  तरह ड्यूटी कर रहें हैं।

आन्दोलन को समर्थन देने आगे आयी कांग्रेस

आखिर क्या थी मांगे और माँगों का आधार ? कितनी जायज थी मांगे :


1. बुलेटप्रूफ जैकेट्स की मांग : अन्य राज्यों की अपेक्षा छत्तीसगढ़ के सर्वाधिक जिले नक्सल प्रभावित हैं , ऐसे में आए दिन नक्सल वारदातें होती रहती हैं , पुलिस के जवानों को नक्सल मोर्चे पर जाना होता है ऐसे में जान का जोखिम सर्वाधिक है, कम संसाधनों की वजह से पुलिस मृत्यु दर छत्तीसगढ़ में सबसे ज्यादा है और यही मोर्चे में असफल होने का कारण भी। सबसे ज्यादा जरूरी है ये मांग। 


2.  8 घंटे की ड्यूटी : पुलिस के जवानों का आने का तो समय तय है किंतु जाने का कोई समय नहीं, ज्यादातर थानों एवं चौकियों में स्टाफ की कमी की वजह से 12 से 18 घंटे काम लिया जा रहा जिससे वे न तो परिवार को समय दे पा रहे हैं और न ही अपने स्वास्थ्य को संभाल पा रहे हैं । सारे सामाजिक और पारिवारिक दायित्वों को छोड़ कर 18 घंटे की कठिन ड्यूटी आखिर कोई कब तक करेगा।
3. उचित वेतन और भत्ते : छत्तीसगढ़ में पुलिस कर्मचारियों को अन्य राज्यों की अपेक्षा एक तिहाई ही वेतन मिलता है। जान की बाजी लगा कर ड्यूटी करने वाले पुलिसकर्मियों को यहीं के चपरासी भृत्य , चौकीदारों या अन्य चतुर्थ वर्ग कर्मचारी से भी कम वेतन मिलता है, जिसकी शुरुआत 15 हजार के तनख्वाह से होती है। इन्हें आज के जमाने मे साइकिल भत्ते के नाम पर 25 रुपये मासिक, वर्दी के नाम पर 60 रुपये, खानपान एवं पौष्टिक आहार के लिए 150 रुपये  मासिक मिलते हैं जो एक बेहूदा मजाक की तरह है ।
4. ड्यूटी पर मृत्यु में शहीद का दर्जा, उचित मुआवजा, एक सदस्य को अनुकंपा नियुक्ति आदि जायज एवं प्रमुख मांगे हैं। 
छत्तीसगढ़ में इन्हीं बातों से आहत हो कर कई कर्मियों ने आत्महत्या जैसा कदम भी उठाया है ।

आंदोलन की पृष्ठभूमि: 
आंदोलन की वजहों को पहचानने के बाद इसकी पृष्ठभूमि पर जाते हैं; वर्ष 2009 में नक्सल प्रभावित राजनांदगांव जिले के सुदूर अंचल  मानपुर में  पुलिस नक्सली मुठभेड़ में एसपी सहित 3 दर्जन से अधिक पुलिस कर्मी मारे गए थे जिसकी मुख्य वजह बुलेटप्रूफ जैकेट्स जैसे संसाधनों की कमी थी। जिसके बाद एसपी को तो शहीद का दर्जा दिया गया उनके बेटे को डीएसपी की नौकरी भी तत्काल दे दी गयी। एसपी ऑफिस के सामने ससम्मान मूर्ति भी लगाई गई, किंतु अन्य शहीद नौजवानों को भुला दिया गया मृत्यु उपरांत भी उन्हें किसी वीरता पुरस्कार आदि से नवाजा नही गया, न ही उन्हें उचित सम्मान दिया गया। शहीद का दर्जा भी नही दिया गया। और न ही परिजनों की सुध ली गयी। न ही उचित एवं सम्मानजनक मुआवजा आदि दिया गया। इस मसले को जाति के कोण से भी देखा जा रहा था। माना जाता है कि मारा गया एसपी ब्राह्मण जाति से था। शायद इसलिए उसे सम्मान दिया गया। इस भेदभाव ने विभाग के कर्मचारियों में असंतोष पैदा किया। नक्सल मोर्चे पर रोज ही पुलिस कर्मियों की जानें जा रही हैं किंतु विभाग के रवैये में कोई सुधार आने का नाम ही नही ले रहा था। ऐसे में अनुशासन में बंधे जवान अपने दर्द को किससे बयान करें?

इससे पहले मानपुर में ही छत्तीसगढ़ निर्माण के पूर्व भी एक घटना हुई थी जिसे जनता ने तो भले ही भुला दिया हो पर शायद ही कोई पुलिस कर्मी भूला हो,  वह घटना है आज़ादी के बाद पहली बार पुलिस थाना लूटने की घटना! हाँ ये अपने तरह की पहली घटना थी जिसमें जान की हानि तो नही हुई थी किन्तु पूरा थाने का मालघर यथा सभी हथियार आदि नक्सलियों ने योजनाबद्ध तरीके से लूट लिया था, जिसकी भी मुख्य वजह संसाधनों व स्टाफ की कमी ही थी, किन्तु इसका भी दोष सरकार ने उन जवानों पर डाल कर पूरे थाने को बर्खास्त कर दिया था। इस घटना को भले ही आज 20 वर्ष हो गए हों किन्तु मुकदमे की लड़ाई बर्खास्त पुलिस कर्मियों ने पूरे 20 वर्ष तक लड़ी और अंततः फैसला पुलिस कर्मियों के पक्ष में ही आया। परंतु जबतक पुनः बहाली का आदेश आया तब तक ज्यादातर लोगों की उम्र रिटायरमेंट से पार हो चली थी। ऐसे में ये निर्णय कितना कष्टदायी रहा होगा उनके लिए जिन्होंने ये लंबी लड़ाई लड़ी होगी, नौकरी जाने के बाद घरबार बेच कर कानूनी खर्चों का निपटारा किया होगा और वर्षो एक मजदूर का जीवन यापन किया होगा। इन्ही दो घटनायों को जेहन में लेकर ही पुलिस कर्मियों के परिजन अपने मांगों को लेकर अंदिलंकारी बने।

अब जब ऐसे ही मामलों के बाद छुट्टी एवम उचित वेतन भत्ते को लेकर एक ज्ञापन मात्र को अनुशासनहीनता मानते हुए वर्षों पहले किसी पुलिसकर्मी  को बर्खास्त कर देना और अब उसी बर्खास्त कर्मी को मुख्य आंदोलनकर्ता मानते हुए गिरफ्तार कर लेना क्या पुलिस की दमनकारी नीति को साबित नही करता है? छत्तीसगढ़ पुलिस अपने दमनकारी नीति के लिए जग चर्चित थी ही अब अपने ही कर्मचारियों पर ये नीति अपना कर शासन ने तो अघोषित आपातकाल की स्थिति पर ला खड़ा किया है।गौरतलब है इस एक हफ्ते में गिरफ्तार सभी लोगों को कोर्ट ने जमानत पर रिहा तो कर दिया है परंतु इनकी गिरफ्तारी ने असंतोष को और ज्यादा बढ़ा दिया है।

देशद्रोह का मुकदमा 
आज की खबर अनुसार पूर्व में बर्खास्त (कथित अनुशासनहीनता के लिए) 3 कर्मियों को देशद्रोही, मानते हुए बड़े ही हाईटेक तरीके से गिरफ्तार कर लिया है। छत्तीसगढ़ के 30 से अधिक अन्य कर्मचारी संगठनों ने समर्थन की घोषणा की है। आंदोलन की तिथि 25 जून निर्धारित है , परन्तु इसके पहले ही इसे दबाने के लिए शासन ने एडी चोटी का जोर लगा दिया है, मीडिया को भी मौखिक हिदायत दे दिया गया है , राजा के आदेश की तरह पुलिस कर्मियों को अपने परिजनों को आंदोलन करने से रोकने एवं खत्म करने के लिए कहने कहा गया है , आंदोलन से दूर रहने कहा गया है,  समस्त जानकर लोगों को बर्खास्त कर लिया गया है। व्हाट्सएप करने को देशद्रोह की श्रेणी में रखा गया है। बात चीत द्वारा आंदोलन की चर्चा को भी अनुशासनहीनता माना गया है । परिजनों को धमकाने का काम जारी है। कई लोगों का आनन फानन में नक्सली क्षेत्र में स्थान्तरण का आदेश भी दे  दिया गया है। महिलाओं की तलाशी ली जा रही है, पुलिस परिजन होने पर थाने में ही पेशी ली जा रही है। फोन पर धमकाने की सीमा पार हो चुकी है। कई कर्मियों को मानसिक प्रताड़ना कर पागल बनाया जा रहा है ..पुलिसिया दमनकारी नीति पुलिस व उनके परिजनों पर ही अपना ली गयी है। आज आपातकाल की सी स्थिति निर्मित हो चुकी है।  पुलिसकर्मियों के परिजनों को आन्दोलन के लिए आने से रोका जा रहा है। गाँव-देहात, कस्बों से आने वाली हर गाडी रोक दी जा रही है, चेक की जा रही है।

आगे लिखने पर एनकाउंटर का पूरा खतरा उठाना होगा जिसकी स्थिति में अब बस्तरिया और नक्सल एवं आदिवासी क्षेत्र का पत्रकार नही है। माफी चाहता हूं पर आगे लिखने में मुझे भी डर लग रहा है जो सरकार अपने ही सैनिक पर संविधान खिलाफत की धारा लगाए वो सरकार हम अदलों का क्या करेगी जिंदा रहने पर आगे की खबर आगे जरूर भेजी जाएगी।

विवेक कुमार सामाजिक कार्यकर्ता हैं. 

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
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पुलिस अधिकारों के लिए लड़ रही महिलायें: शासन के खिलाफ प्रशासन

उत्तम कुमार 
आज 25 जून को जब देश में इमरजेंसी लागू की गयी थी, उस दिन छत्तीसगढ़ पुलिसकर्मी परिवार की महिलायें व्यापक आन्दोलन कर रही हैं.छत्तीसगढ़ के राजनंद गाँव के चप्पे-चप्पे में कड़ी बंदोबस्ती है, फिर भी आंदोलनकारी पहुंचे धरना स्थल पर. इस बीच राज्य के मानव अधिकार संगठन तथा पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी भी पुलिसकर्मियों के समर्थन में आगे आये. ग्राउंड जीरो से उत्तम कुमार की रिपोर्ट:


सैकड़ों जवानों के पहरों के बावजूद आखिरकार 200 से ज्यादा की संख्या में पुलिस परिवार 11 सूची मांगों के साथ अपने छोटे-छोटे बच्चों को हाथ में लेकर मांगे पूरी करने के लिए नारेबाजी करते हुए धरना स्थल पर पहुंच गये। रायपुर से पत्रकार प्रफुल्ल ठाकुर कहते हैं कि लाखे नगर धरना स्थल में कड़ी पुलिस व्यवस्था है। महादेव घाट पुल पर चेकिंग चल रही है। घरना स्थल लाखेनगर मैदान में एक पंडाल लगा हुआ है लेकिन यह किसका है कोई जानकारी नहीं है यहां से किसी राहगीर को भी गुजरने नहीं दिया जा रहा है। एक एक वाहन को रोका जा रहा है महिलाओं के स्कार्फ निकाल कर चेहरा पहचाना जा रहा है। इन सब से मजदूर ज्यादा परेशान हो रहे हैं। अमलेश्वर से आने वाले वाहनों की चेकिंग हो रही है। पुलिस के बड़े अधिकारी भी लगातार भ्रमण कर रहे हैं। आंदोलन को समर्थन देने वाले अजित जोगी निवास के सामने भी खाकी और सादी वर्दी में पुलिस बल तैनात हैं। शहर के एंट्री वाले हर इलाके में चेकिंग हो रही है। भिलाई-बिलासपुर की तरफ से आने वाले मार्ग पर कुम्हारी टोल नाका, नंदनवन एंट्री मार्ग, टाटीबंध चौक के तीनों मार्ग में चेकिंग है, इधर विधानसभा इलाके रिंग रोड तीन के चौक के पास भी बल तैनात। हर सवारी बस की जांच की सूचना मिल रही है। पंडरी बस स्टैण्ड और रेलवे स्टेशन में भी तलाशी ली जा रही है। खबर यहां तक आ रही है कि आंदोलन में शामिल कुछ आरक्षकों को रात में ही पुलिस उठाकर कहीं गुप्त स्थान ले गई है। स्टेशन में बल तैनात हैं।

मुझसे कोई व्यक्तिगत पूछे तो मैं कहूंगा कि पुलिस आंदोलन का समर्थन करता हूं लेकिन पुलिसिया रवैये का नहीं। आखिर पुलिस को पता तो चला होगा कि लोकतंत्र में असहमति, विरोध, आंदोलन, धरना, प्रदर्शन का काई मतलब भी है। पुलिस की मानसिकता ऐसी बन गयी है कि लोगों के हालतों, सामाजिक परिस्थितियों और उनके मानवाधिकार से उनका कोई वास्ता ही नहीं। सबसे ज्यादा संविधान, कानून व्यवस्था और मानवाधिकार का उलंघन पुलिस ही करती है। जबकि ये जानते हैं कि तनख्वाह के साथ देशभक्ति और जनसेवा नहीं बल्कि गरीब, मजदूर, किसान, एससी, एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यकों के खिलाफ इनका गुस्सा ड्यूटी के नाम पर उतरते रहता है। गिरफ्तारी के साथ मारना-पिटना और हत्या तक पुलिस कर देती है। इन्हें अब बाज आ जाना चाहिए। इनके अधिकार को लेकर सहानुभूति है। जबकि शिक्षाकर्मी आंदोलन के दौरान पुलिस ने महिलाओं पर बर्बरता के साथ व्यवहार किया था नारीशक्ति की जानकारी अब जाकर पुलिस को हुई है जब उनके लिए उनके परिवार की स्त्रियाँ आगे आई हैं।

पीयूसीएल ने छत्तीसगढ़ पुलिस को विरोध प्रदर्शन का हक दिलाने के पक्ष में तथा  उन पर हो रहे दमन,  मानवाधिकार आदि को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है। अपने ब्लॉग छत्तीसगढ़ बास्केट में पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टिस (पीयूसीएल) छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष डा. लाखनसिंह और महासचिव अधिवक्ता सुधा भारद्धाज ने कहा है कि’छत्तीसगढ़ पुलिस को विरोध प्रदर्शन का हक है, पुलिस पर पुलिस का दमन बंद करें, यह राजद्रोह नहीं बल्कि जिने योग्य सुविधाओं के लिये किये गये आंदोलन है।’

यह आन्दोलन  इतिहास में दर्ज होगा कि इसका नेतृत्व घरेलू  महिलाओं ने किया है.क्षेत्र में सुरक्षागत कार्यों में लगे छत्तीसगढ़ सिपाहियों के आंदोलन से सरकार की नींद हराम है। छत्तीसगढ़ में तृतीय श्रेणी के पुलिस कर्मियों के परिजनों ने अपनी रोजमर्रा की जरूरतों और अन्य शासकीय सेवकों के समक्ष वेतन भत्ते और समान सुविधाओं के लिए आज का आंदोलन मायने रखता है। रायपुर में आज चप्पे-चप्पे पर पुलिस की पहरेदारी है। धरनास्थल ईदगाहभाठा से दो-ढाई सौ की संख्या में आंदोलनकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया है। हां यह प्रदर्शन संवैधानिक और कानूनन है, परिजनों का विरोध पुलिस मैनुअल का भी उलंघन नहीं है।

पीयूसीएल ने प्रमुखता के साथ कहा है कि ‘भारत का संविधान सभी को संगठन बनाने और विरोध का हक देता हैं, जिसमें यूनियन बनाने का अधिकार भी निहित है। यह आंदोलन संवैधानिक और कानून सम्मत है, पुलिस कर्मियों के परिजनों को किसी भी प्रकार से प्रताडि़त करना उनके मौलिक अधिकारों के हनन के साथ साथ गैरकानूनी भी है, शासकीय कर्मचारी के परिजनों को परिवार नामक संस्था को बचाने के लिए सामने आना पड़ा है क्योंकि पुलिस की अनियमित ड्यूटी और कम वेतन उसके परिवार के ढांचे को तोड़ रहा है जिसे बचाने की जिम्मेदारी सरकार की है अत: सरकार परिजनों को यह आश्वासन दे कि उनका पारिवारिक ढांचा सुरक्षित रहेगा।’

मानवाधिकार संघ ने कहा है कि ‘छत्तीसगढ़ में पुलिस कर्मी हमेशा प्रशासन से प्रताडि़त रहते हैं, अभी भी परिजनों ने पत्र लिखकर यही मांग की हैं कि कामों में राजनीतिक हस्तक्षेप, सजा के तौर पर स्थानांतरण, समान वेतन भत्ते, रहने योग्य आवास की व्यवस्था, वर्तमान में मिलने वाला आवास भत्ता, पेट्रोल भत्ता हास्यास्पद रूपए से 13 रूपये हैं इसे बढ़ाने, पुलिस किट या उसका भत्ता, ड्यूटी के दौरान मरने पर शहीद का दर्जा और एक करोड़ का मुआवजा, अनुकंपा नियुक्ति,अन्य विभागों की तरह साप्ताहिक अवकाश और काम के लिये आठ घंटे तय किये जायें, अधिक समय काम लेने पर अतिरिक्त भुगतान, अन्य विभाग की तरह परिजनों को मुफ्त इलाज, नक्सली क्षेत्र में काम करने पर उच्च मानक के सुरक्षा उपकरण, बुलेटप्रूफ जाकेट और आधुनिकतम हथियार,10 साल में पदोन्नति, वर्दी भत्ता अभी मात्र पांच रूपये मिलता हैं इसे बाजार की कीमत के अनुसार बढ़ाया जाये,आदि आदि मांग के लिये बकायदा पत्र पुलिस डीजीपी और अन्य अधिकारियों को लिखा था।

इस आंदोलन पर दिल्ली से नजर रख रहे तथा स्वास्थ्य लाभ ले रहे अजीत जोगी ने कहा है कि ‘किसी राज्य में अगर प्रशासन ही शासन से तंग आकर आंदोलन छेड़ दे तो यह समझ लेना चाहिए कि वह राज्य अपनी बर्बादी के चरम पर पहुंच चुका है और उस राज्य में कुछ भी ठीक नहीं हो रहा है। छत्तीसगढ़ के पुलिसकर्मियों द्वारा सरकार के विरूद्ध किया जा रहा यह आंदोलन इसका जीवंत उदाहरण है। छत्तीसगढ़ में उत्पन्न इस भयावह स्थिति के लिए मैं पूरी तरह से राज्य सरकार को दोषी मानता हूं। पब्लिक के साथ साथ अब पुलिस भी सरकार से त्रस्त हो चुकी है। छत्तीसगढ़ राज्य के प्रति भाजपा सरकार की नीति और नियत दोनों गंभीर नहीं है। राज्य में फैली इस अराजकता के लिए मुख्यमंत्री सीधे तौर पर दोषी हैं। मैं स्वयं एक आईपीएस अधिकारी रहा हूं। छत्तीसगढ़ के पुलिस कर्मियों की पीड़ा से भली भंति परिचित हूं। इस समय दिल्ली में स्वास्थ्य लाभ लेने के कारण पुलिसकर्मियों के आंदोलन में उपस्थित होने में असमर्थ हूं। हमने जनता के हित के लिए पुलिस की लाठियां खाई है और अब पुलिस हित के लिए सरकार की लाठी भी खाने को तैयार हैं।’

(लेखक दक्षिण कोसल में सम्पादक है )

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राजस्थान पत्रिका की पत्रकार ने की आत्महत्या लेकिन पत्रिका ने ही ओढ़ी चुप्पी

उत्तम कुमार


छत्तीसगढ़ में पत्रकारों की आत्महत्या (हत्या) के बाद स्तब्धता ने श्मशान सी चुप्पी ओड़ रखी है

दिन ब दिन आदिवासी क्षेत्रों में पत्रकारों को काम करना मुश्किल होता जा रहा है। छत्तीसगढ़ में 16 जून को एक के बाद दो प्रतिभावान पत्रकारों रेणु अवस्थी और शैलेन्द्र विश्वकर्मा द्वारा आत्महत्या की खबर दिल को दहला देने वाली है। जगदलपुर में राजस्थान पत्रिका से जुड़ी रेणु अवस्थी ऑनलाईन पत्रकारिता करती थी। वह  जगदलपुर के प्रतापगंज में एक किराए के मकान में रहती थी, जहां उसने फांसी लगाकर आत्महत्या की है। बताया जा रहा है कि रेणु अवस्थी ने करीब दोपहर एक बजे अपने कमरे में फांसी लगाकर आत्महत्या की । पुलिस को इस घटना की सूचना दी गई। जिसके बाद पुलिस ने मौके पर पहुंचकर शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। पुलिस का कहना है कि आत्महत्या की वजह का पता नहीं चल सका है। मामले की जांच की जाएगी जिसके बाद आत्महत्या करने की वजह साफ हो सकेगी। फिलहाल इन पंक्तियों के लिखे जाने तक पुलिस मामले की जांच कर रही है तथा पोस्टमार्टम  रिपोर्ट अबतक नहीं आया है। रेणु पिछले साल ही छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय से पास आऊट हुई थी। जिसके बाद वह जगदलपुर में रहकर अखबार में कार्य कर रही थी।

इन दोनों पत्रकारों ने की आत्महत्या

इसी तरह ठीक इसी दिन तडक़े ही अंबिकापुर के आइएनएच न्यूज चैनल के पत्रकार शैलेंद्र विश्वकर्मा ने भी फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। आत्महत्या का कारण अज्ञात बताया जा रहा है। शैलेंद्र अंबिकापुर स्थित केदारपुर गांव में रहने वाले थे। पीएम रिपोर्ट के बाद शव को परिजनों को सौंप दिया गया था। इस मामले में भी पुलिस जांच जारी है। इन दोनों घटनाओं के बाद प्रदेश की पत्रकारिता स्तब्धता के बहाने चुप्पी ओड़े बैठी है ना कहीं जांच और ना ही पोस्टमार्डम रिपोर्ट के बाद पुलिस की पहलकदमी? दबी  जबान यह खबर आ रही है कि पुलिस मामले को लेकर गंभीर है और जांच में जुट गई है। प्रदेश के मुखिया डॉ. रमन सिंह ने भी दोनों पत्रकारों को श्रद्धांजलि देते हुए कार्रवाई के संकेत दिए हैं।

इस कड़ी में 20 जून को तेलंगाना के सिद्दीपेट का मामला आपको अंदर तक हिला देगी जहां कर्ज के दबाब से एक पत्रकार इस कदर टूट गया कि उसे खुदखुशी करने पर मजबूर होना पड़ा। पेशे से पत्रकार शख्स ने पहले अपने दो मासूम बच्चियों की गला दबाकर हत्या कर दी और फिर खुद फंदे पर झूल गया। इस दौरान उसकी पत्नी ने भी जहर खा लिया। हालांकि पड़ोसियों को शक हुआ तो वे महिला के घर पहुंच गए और महिला के विरोध के बावजूद उसे अस्पताल में भर्ती करवाया, जहां उसकी हालत नाजुक बनी हुई है। जानकारी के मुताबिक, तेलंगाना के सिद्दीपेट जिले के रहने वाले पत्रकार हनुमंत राव तेलुगु अखबार ‘आंध्रा भूमि’ में रिपोर्टर के तौर पर काम करते थे। पुलिस ने बताया कि हनुमंत राव इन दिनों गंभीर वित्तीय संकट से जूझ रहे थे। उनके सिर पर 10 लाख से ज्यादा का कर्ज था। कर्ज के चलते काफी समय से लोग उन्हें वसूली के लिए दबाव भी बनाते थे, यही वजह है कि अपने साख और बड़े कर्ज ने हनुमंत को काफी परेशान कर रखा था। बुधवार को उन्होंने अपनी पत्नी मीना के साथ पहले अपने 5 और 3 साल के बच्चों को गला दबाकर मार डाला और उसके बाद खुद फांसी लगा ली। हनुमंत की पत्नी ने भी जहर खा लिया। गुरुवार सुबह जब पड़ोसियों ने घर के भीतर से मीना के रोने की आवाज सुनी, तो उन्होंने दरवाजा खटखटाया लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं मिला, जिस पर उन्होंने घर का दरवाजा तोड़ दिया। कमरे के अंदर का मंजर देखकर पड़ोसी हैरान रह गए। वहां हनुमंत राव और दोनों बच्चों की लाश पड़ी थी, जबकि हनुमंत की पत्नी मीना जिंदगी और मौत के बीच जूझ रही थी। फौरन पुलिस को घटना की सूचना दी गई और मीना को अस्पताल में भर्ती कराया गया। पुलिस ने इस संबंध में मामला दर्ज कर लिया है। जबकि तीनों शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है। पुलिस अब मामले की छानबीन में जुटी हुई है।

पत्रकारिता चापलूसी मात्र रह गई है, नेता,अधिकारी से लेकर अपने सीनियर की मस्काबाजी कीजिये-फल जरूर मिलेगा।! ‘नहीं किया इसलिए वहीं रह गया’

शैलेन्द्र विश्वकर्मा ने फेसबुक में यह अंतिम लाईन लिखी यह लाईन बहुत कुछ कह जाती है। इन दोनों ने खुदकुशी क्यों की, इसका पता नहीं चला है। शैलेंद्र सुसाइड के ठीक पहले तक सोशल मीडिया पर सक्रिय थे। उन्होंने जो कुछ पोस्ट किया, वो कुछ बैचेनी की तरफ इशारा कर रहे हैं। रेणु अवस्थी की सुसाइड का राज अबतक सामने नहीं आ सका है। खबरों की माने तो रेणु ने सुसाइड से पहले रायपुर स्थित पत्रिका समूह के स्टेट हेडक्वार्टर में फोन किया था। उसी फोन के आधार पर रायपुर मुख्यालय से जगदलपुर कॉल किया गया। जब तक जगदलपुर आफिस से रेणु के घर तक दफ्तर के लोग पहुंच पाते, तब तक रेणु ने खुदकुशी कर ली थी। रेणु ने अपनी चुनरी से पंखे से लटककर खुदकुशी कर ली। रेणु अपनी एक दोस्त के साथ बस्तर में किराये के मकान में रहती थी। इन सभी बातों से स्पष्ट होता है कि दोनों ही पत्रकार परेशान तो थे और हम उन्हें नसीहत भी दे सकते हैं कि उन्हें ऐसा नहीं करना था। आश्चर्य का विषय यह कि किसी भी अखबार ने इन होनहार पत्रकारों पर सम्पादकीय लिखने की जहमत नहीं उठाई है ना ही श्रद्धांजलि प्रकाशित की । राज्य का प्रेस क्लब और कुशभाऊ पत्रकारिता विश्वविद्यालय ने आज  तक श्रद्धांजलि आयोजित नहीं की। मेरा साफ मानना है कि तमाम आत्महत्याएं किसी न किसी रूप में हत्या ही होती है। कश्मीर में राइजिंग कश्मीर के सम्पादक शुजात बुखारी की हत्या के बाद अंदर तक आहत करने वाली छत्तीसगढ़ व तेलंगाना के पत्रकारों की आत्महत्या (हत्या) से किसी साजिश की बू आती है। कश्मीर से लेकर छत्तीसगढ़ तक की ये तमाम घटनाएं लोकतंत्र में चौथे पाए की हत्या है। यह घटना पूरे भारतीय परिवेश में चिंताजनक तो है। मैंने अपनी पत्रिका दक्षिण कोसल से सरकार से मांग की  है कि शुजात के साथ छत्तीसगढ़ तथा तेलंगाना के इन पत्रकारों की हत्या और असामयिक मौत की स्वतंत्र जांच एजेंसी से जांच करवाई जाएं। छत्तीसगढ़ में पत्रकारों पर बढ़ते जुल्म और अत्याचार किसी से छुपी नहीं हैं ऐसे हालातों में यह घटना नि:संदेह हमें पत्रकारों के खिलाफ रचे जा रहे साजिश की ओर हमारा ध्यान खींच ले जाता है। आप सभी को मालू म हो कि हमारा देश पत्रकारों पर जुल्म और ज्यादती के मामले में पिछले वर्ष की तुलना में दो पायदान नीचे उतरते हुए पूरे विश्व में 138वें स्थान पर शुमार है। ऐसी स्थिति में इन पत्रकारों का ना रहना लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी तो है।

राजस्थान पत्रिका लोगो

करूणाकांत ने अपने फेसबुक वाल में लिखा है कि हमे गौरी लंकेश भी याद हैं और शुजात बुखारी भी लेकिन इन दोनों की हत्या के दरमियान और उसके बाद भी कितने और पत्रकारों की हत्या हुई क्या ये हमें याद हैं? एक  नेटवर्क प्रोवाइडर, कैब सर्विस और हिन्दू मुस्लिम के नाम  पूरा देश हिला देने वाले मीडिया के पास ऐसे पत्रकारों के लिए वक्त क्यों नहीं है ? क्या सिर्फ राष्ट्रीय पत्रकारों की हत्या ही पत्रकारिता के लिए क्षति है? इन दोनों के मरने के इतने दिन बाद भी पुलिस ने अबतक कोई ठोस कार्यवाही नहीं की है ।

अचरज की बात ये है कि इन दोनों  की  आत्महत्या की खबर को मीडिया भी  भुला  चुकी है किसी भी संस्थान ने इस मामले में पुलिस या प्रशासन से सवाल करने की जहमत नहीं उठाई। यहां तक कि रेणु् जिस संस्थान  के लिए काम करती थी उसकी चुप्पी भी निराश करती है। 

करूणांकात आगे लिखते हैं कि रेणु बस्तर जैसे पिछड़े और आदिवासी इलाके से आती थी आपको उसके संघर्ष को समझना होगा कि ऐसे इलाके की किसी लडक़ी के लिए पत्रकारिता जैसे क्षेत्र में कैरियर बनाने के बारे में सोचना भी बहुत हिम्मत का काम है। रेणु उन तमाम लड़कियों के लिए नजीर बन सकती थी जो कुछ कर गुजरना चाहती थी लेकिन उसकी मौत के साथ ही उन लड़कियों के सपनो की भी एक हद तक मौत हो गयी। जिसका नजीर देकर वहां की लड़कियां समाज से लड़ सकती थी अब उसी को नजीर बना कर समाज उन्हें रोक देगा ।इन दो पत्रकारों की मौत बाकी पत्रकारों के लिए एक उदाहरण है कि आप खून पसीना देते रहिये अपने संस्थान को,लड़ते रहिये समाज के लिए लेकिन आपकी मौत पर ना आपका संस्थान सामने आएगा और ना ही ये समाज ।
शुभम सिंह ने लिखा है बात यहां खत्म नहीं होती है। कुशाभाऊ ठाकरे यूनिवर्सिटी के तमाम बुद्धिजीवी भी थोड़ा सुन लें…राज्य में पत्रकारिता को नई दिशा देने का जिम्मा है आपके कंधों पर। एक पत्रकार ने आत्महत्या की है.
क्या आपको ये छोटी घटना लगती है? क्यों आपकी बोलती बंद है।  चुप्पी देखकर लगता नहीं है कि रेणु अवस्थी आपके यूनिवर्सिटी की छात्रा थी।मीडिया एथिक्स की बात करने वाले तमाम शिक्षकों से मेरी अपील है। अगर थोड़ी भी एथिक्स आपके अंदर बाकी है तो आगे आइये। नहीं तो अगली बार क्लास में मीडिया एथिक्स पर ज्ञान देने से पहले एक बार सोच लीजियेगा।

करमजीत कौर फेसबुक पर रेणु के लिए लिखती हैं, ‘मुझे यकीन नहीं हो रहा है रेणु कि तुम जैसी बहादुर और हौसलों से लबरेज पत्रकार आत्महत्या जैसा घातक कदम उठाएगी। अभी तो तुम्हें आसमां की बुलंदियों को छूना था। अपना दर्द बयां करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। आज मैंने एक प्यारी बेटी को खो दिया है।’
कुछ साल पहले मुंगेली जिले में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकार वैभव केशरवानी ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। वैभव के जाने से पत्रकारिता जगत शोक में डूब गया था।

सुदर्शन न्यूज चैनल के छत्तीसगढ़ ब्यूरो प्रमुख योगेश मिश्रा लिखते हैं- ‘छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में पत्रकारों पर नक्सलियों और पुलिस दोनों तरफ से दबाव बनाया जाता है जिससे पत्रकारिता करने की चुनौतियां कई सालों से तीखी हुई है। छत्तीसगढ़ में इन्हीं तनावों के कारण पत्रकार आत्महत्या तक करते रहे हैं। वैभव के बाद अब अंबिकापुर जिले में शैलेंद्र विश्वकर्मा की फांसी से झूलती लाश मिली। छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता जगत ने एक के बाद एक कई प्रतिभाशाली पत्रकार खो दिया है। अंबिकापुर में जिला संवाददाता के तौर पर कार्य कर रहे शैलेंद्र विश्वकर्मा की मौत की खबर पत्रकारिता जगत में जिस किसी भी को मिली हर कोई स्तब्ध रह गया। शैलेंद्र विश्वकर्मा एक सक्रिय पत्रकार के तौर जाने जाते थे। शैलेन्द्र प्रिंट मीडिया समेत कई इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में सक्रिय तौर पर काम करने के बाद इस चैनल में जिला संवाददाता के रूप मेंकाम कर रहे थे। हाल ही में हुए विकास यात्रा में भी शैलेंद्र ने बेहतरीन रिपोर्टिंग की थी। वह समय समय पर देश के राजनीतिक परिदृश्य पर भी अपने विचार सोशल मीडिया में लिखा करते थे। आखिरी रात भी शैलेंद्र ने सोशल मीडिया पर करीब 12:14 बजे रात को एक पोस्ट लिखा था। ऐसे में अलसुबह उनकी लाश फांसी पर झूलते मिलने से उनके जान-पहचान वाले लोग और पत्रकारिता जगत से जुड़े लोग गम में डूब गए।

दो पत्रकारों ने आत्महत्या ( हत्या) कर ली और राज्य में तूफान के आने के पहले की शांति पसरा हुआ है कोई लिखना नहीं चाहता और न ही अब किसी की कलम स्टोरी के लिए उठ रही  है लिहाजा संपादकों ने इसे संपादकीय के लायक तक नहीं समझा और ना ही श्रद्धांजलि सभा। वाह रे लोकतंत्र तेरा चौथा पाया। पत्रकारों के आत्महत्या (हत्या) के बाद कैसे आप बहाना करते हुए बच जाएंगे कि व्यक्तिगत जिंदगी और सार्वजनिक जिंदगी दो अलग-अलग चेहरे हैं। मातम तो दूर जांच के लिए भी किसी की कलम नहीं उठ रही है। प्रदेश में एक अजीब ट्रेंड चल पड़ा है हत्या को आत्महत्या कहने का। बहुत खतरनाक है यूं ही चुप रह कर अपने अंत पर लिखना!

(लेखक दक्षिण कोसल के सम्पादक हैं. विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन. सम्पर्क: 7828046252)


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