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पत्थलगड़ी के खिलाफ बलात्कार की सरकारी-संघी रणनीति (!)

अश्विनी कुमार पंकज 


क्या बिरसा मुंडा की धरती खूंटी से शुरू हुए पत्थलगडी आंदोलन को वहां  21 जून को 5 नुक्कड़ नाट्यकर्मियों  से हुए सामूहिक बलात्कार से जोड़कर आदिवासियों के आन्दोलन और आवाज को दबाने की साजिश कर रही है सरकार? अभी एक कार्यक्रम में 20 जून को संघ प्रमुख मोहन भागवत ने जतायी थी इस आन्दोलन पर चिंता. आदिवासी अधिकार के प्रखर प्रवक्ता साहित्यकार अश्विनी कुमार पंकज इस प्रयास को  सरकार और संघ की रणनीति बता रहे हैं. 


किसी भी सत्ता का चाल, चरित्र और चेहरा उसकी वैचारिक भावभूमि से बनती है जिसका प्राण तत्व उसका धार्मिक आचार संहिता होती है। यह सत्ता राजनीतिक तौर पर जितनी संगठित होती है उससे कहीं ज्यादा सामाजिक और व्यक्तिगत स्तर पर जीवन के सभी संस्थानों में पैवस्त होती है। झारखंड के खूंटी जिले के कोचांग इलाके में हुई पांच लड़कियों के साथ हुए बलात्कार की खबरें सत्ता संस्थानों के हवाले से जिस तरह से मीडिया में प्रायोजित रूप में आती हुई दिख रही हैं, वह इसी नस्लीय विद्वेष और सांप्रदायिक वैमनष्य को दर्शाता है। बलात्कारी जो भी है, वह निःसंदेह जघनतम अपराध का दोषी है। लेकिन इसको जिस सुनियोजित ढंग से आदिवासी हक-हकूक के लिए चल रहे ‘पत्थलगड़ी’ आंदोलन के साथ जोड़ा जा रहा है और यह साबित करने की राजकीय कोशिश हो रही है कि ‘अपने गांव में अपना राज’ का असली उद्देश्य यही है, यह बताता है कि सत्ता के सारे सरकारी और निजी संस्थान किस कदर आदिवासी एवं जनांदोलनों के विरोधी हैं।

देश के स्त्री, आदिवासी, दलित, पिछड़े और वंचित तबकों के साथ होनेवाला यह ‘सरकारी’ और ‘मीडिया ट्रायल’ कोई नई बात नहीं है। तकनीकी और शैक्षणिक तमाम छोट-बड़े बदलावों के बावजूद मनु युग से लेकर आज के परमाणु और नैनो युग तक सत्ता का यह धार्मिक अनुष्ठान बदस्तूर जारी है। पर चूंकि इस समय में, जब पत्थलगड़ी आंदोलन ने संविधान की जन-व्याख्या को देशव्यापी बहस में बदल दिया है और आदिवासी लोग संविधान की पांचवीं अनुसूची के प्रावधानों को गांव-गांव में लागू कर बहुराष्ट्रीय कंपनियों और उनकी दलाल सरकारों को वास्तविक ‘गणराज्य’ से चुनौती दे रहे हैं, इस तरह के सत्ता षड्यंत्रों की पड़ताल और उनका विवेकी प्रतिरोध जरूरी है।

खबरों में कहा गया है कि खूंटी के कोचांग में मानव तस्करी के खिलाफ जागरूकता फैलाने और शिक्षा से बच्चों को जोड़ने के लिए नुक्कड़ नाटक करने पहुंची मंडली की पांच लड़कियों के साथ गांव के अपराधियों ने गैंगरेप किया। पुलिस के मुताबिक, घटना को अंजाम देने वाले ‘अपराधी’ पत्थलगड़ी से जुड़े लोग हैं। अपराधियों ने बलात्कार का वीडियो बनाकर पीड़ितों को चुप रहने की धमकी दी थी कि यदि उन्होंने मुंह खोला तो वीडियो को वायरल कर दिया जाएगा। अपराधियों ने पीड़ितों से यह भी कहा था कि वे प्रशासन-सरकार के इशारे पर काम करती हैं, इसीलिए उन्हें यह ‘सजा’ दी जा रही है।

खूंटी के अड़की थाना के कोचांग स्थित एक मिशनरी स्कूल ने जागरूकता कार्यक्रम के लिए नुक्कड़ नाटक मंडली को आमंत्रित किया था। नाटक का विषय मानव तस्करी के खिलाफ जागृति फैलाना था। मंगलवार 19 जून की दोपहर लगभग ढाई बजे जब स्कूल में नाटक हो रहा था तब छह अपराधी दो मोटरसाइकिल पर आए और बंदूक दिखाकर, मंडली की ही गाड़ी पर लड़कियों को बिठाकर किसी अज्ञात जगह पर ले जाकर उनके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया।

पुलिस को इसकी जानकारी दूसरे दिन करीब 30 घंटे बाद बुधवार की रात को मिली। जब एक पीड़िता ने इस दुष्कर्म की जानकारी अपने कुछ जानने वालों को दी। पहले तो पुलिस मामले को दबाने में लगी रही लेकिन गुरुवार को ‘मीडिया’ में आने बाद एफआईआर दर्ज हुई। खबरों के ही अनुसार पीड़ितों और उन्हें बुलाने वाली संस्था के लोगों को पुलिस ने रात में थाने में बिठाए रखा। खूंटी एसपी ने पीड़िताओं से तो यहां तक कहा कि वे गांव में गई ही क्यों थीं। वहीं मुख्यमंत्री रघुवर दास का बयान है कि ‘पहले नक्सली ऐसी घटनाओं को अंजाम देते थे, अब पत्थलगड़ी के नाम पर समाज विरोधी काम करने वाले ऐसी हरकत कर रहे हैं।’

जिस दिन झारखंड के कोचांग में नाटक हो रहा था, जिसके बाद यह घटना घटी थी, ठीक उसी दिन यानी 19 जून को ही, छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में संघ प्रमुख मोहन भागवत आदिवासी क्षेत्रों में पत्थलगड़ी के संकट से घिरी भाजपा सरकार को निकालने के लिए आयोजित दो दिवसीय चिंतन शिविर में भाग ले रहे थे। ‘भारत की जनजातियों की अस्मिता एवं अस्तित्व’ विषय पर इस चिंतन शिविर का आयोजन अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम ने किया था। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने जब शिविर में पूछा कि आदिवासी हितों के लिए केंद्र व राज्य सरकार की ढेरों योजनाएं है तो फिर पत्थलगड़ी जैसी घटनाएं क्यों हो रही हैं। तब उन्हें बताया गया कि ईसाई मिशनरी सरकार के खिलाफ काम कर रही हैं और आदिवासियों को भड़काने में जुटी हैं। चुनावी लाभ के लिए विरोधी दल पत्थलगड़ी करवा रहे हैं। इस सवाल-जवाब के आलोक में यह तय हुआ कि इस भ्रम को तोड़ने के लिए संघ के लोग बुधवार को ठोस रणनीति बनाएंगे।

और बुधवार 20 जून की रात 8 बजे पत्थलगड़ी आंदोलन के सबसे सघन आदिवासी केंद्र में ‘कुछ लोगों की सूचना’ पर पहले मीडिया में खबर प्लांट  की गई, फिर के एक थाने में ‘मामले को दबाने’ की कोशिश की गई। लेकिन अंततः तीन आरोपियों की पहचान पत्थलगड़ी समर्थक के रूप में करते हुए प्राथमिकी दर्ज की गई और कोचांग इलाके में भयानक छापेमारी श्रुरू हुई। जाहिर है कि अब आंदोलनकारियों के दमन का, जो सरकार और मीडिया के मुताबिक ‘बलात्कारी’ हैं, संविधान विरोधी हैं, विदेशी विचारों से संचालित ईसाई मिशनरी हैं, रास्ता गढ़ लिया गया है।
यह भी पढ़ें: आदिवासियों का पत्थलगड़ी आंदोलन: संघ हुआ बेचैन, डैमेज कंट्रोल को आगे आये भागवत

जहाँ नुक्कड़ नाटक के लिए गयी थी लडकियां

बहुत सोची-समझी रणनीति के तहत संघ और सरकार ने इस बार ‘बलात्कार’ की आड़ ली है। चूंकि यह बहुत संवेदनशील मुद्दा है समाज के लिए इसलिए उनको पूरा विश्वास है कि इससे उनके ‘दमन’ को व्यापक सामाजिक समर्थन मिलने में आसानी होगी। क्योंकि अब तक दिखावटी मेल-मिलाप, सरकार गवर्नर-जनता संवाद, कंबल-राशन वितरण का लोभ-लालच, फर्जी देशद्रोह के मुकदमे लगाकर गिरफ्तारी आदि अनेक तरीके अपनाकर उन्होंने देख लिया था। पत्थलगड़ी रुक ही नहीं रही थी। लिहाजा अब ‘बलात्कार’ के संवेदनशील मुद्दे को दमन का नया हथियार बनाया है।

आदिवासी परम्परा और इतिहास के जानकार साहित्यकार अश्विनी कुमार पंकज आदिवासी अधिकार के प्रखर प्रवक्ता के रूप में जाने जाते हैं. संपर्क: akpankaj@gmail.com

तस्वीरें गूगल से साभार 

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महिला की मुहीम का असर: पासपोर्ट अधिकारी ‘मिश्रा’ का तबादला, अंतर्धार्मिक विवाह को आधार बना महिला का पासपोर्ट बनाने से किया था इनकार

आवाज उठाने पर कट्टरपंथ के खिलाफ भी जीता जा सकता है. इसका ताजा उदाहरण है लखनऊ के पासपोर्ट अधिकारी ‘विकास मिश्रा’ पर कार्रवाई. उसने एक हिन्दू महिला का मुस्लिम पुरुष के साथ शादी का आधार बना उसका पासपोर्ट बनाने से मना कर दिया था. ऐसे कई मामले इन दिनों आ रहे हैं. एक लडकी ने धर्म के आधार पर एयरटेल के मुस्लिम अधिकारी का किया अपमान तो कम्पनी ने अधिकारी का साथ देने की जगह लड़की का साथ दिया, वहीं ‘ओला’ टैक्सी सर्विस ने इसी पैटर्न पर अपने मुस्लिम ड्रायवर का अपमान होने पर ड्रायवर का साथ दिया और हिन्दू कस्टमर के खिलाफ सार्वजनिक बयान भी दिया था. क्या है ताजा मामला:  

तन्वी सेठ और अनस सिद्दकी

एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में लखनऊ के रीजनल पासपोर्ट अधिकारी ने बताया कि तनवी को पासपोर्ट जारी कर दिया गया है, वहीं अनस का पासपोर्ट रिन्यू हो गया है. पत्नी तन्वी और पति अनस को गुरुवार को पासपोर्ट ऑफिस बुलाया गया था, जहां उन्हें उनके नए पासपोर्ट सौंप दिए गए हैं.  अधिकारी ने कहा, ‘पासपोर्ट जारी कर दिए गए हैं. आरोपी अफसर विकास मिश्रा के खिलाफ कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है और उनके खिलाफ जल्द कार्रवाई की जाएगी. हमें इस घटना पर खेद है और ये सुनिश्चित करते हैं कि ऐसी घटना दोबारा नहीं होगी।’ इस बीच विकास मिश्रा का तबादला भी कर दिया गया है.

तन्वी सेठ का ट्वीट

हुआ क्या था:
तन्वी ने धर्म के आधार पर अपमानित करने का आरोप पासपोर्ट अधीक्षक ‘विकास मिश्रा’ पर लगाया था. इस आशय का ट्वीट करते हुए विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का ध्यान उसने इस ओर खींचा. गौरतलब है कि लखनऊ की तन्वी सेठ ने 2007 में अनस सिद्दकी से शादी की थी. तन्वी का आरोप है कि 20 जून को वे अपनी 6 साल की बच्ची के साथ पासपोर्ट बनाने लखनउ स्थित पासपोर्ट ऑफिस गये थे. दो काउन्टर पर प्रक्रिया पूरी कर जब वह तीसरे काउंटर पर पासपोर्ट अधीक्षक विकास मिश्रा के पास गयी तो उसने कागजों का निरीक्षण करने के बाद कहा कि ‘अपना नाम बदल लो. तुमने मुस्लिम से शादी की और अभी तक अपना नाम नहीं बदला?’ वह उसके पति के धर्म को लेकर उसे अपमानित करने लगा. जब वह इसकी शिकायत लेकर ऊपर के अधिकारी के पास गयी तो इसी बीच विकास मिश्रा ने उसके पति को धर्म बदलने को कहा. मिश्रा और अन्य कर्मचारी उन्हें अपमानित करते रहे और अंतर्धार्मिक शादी पर टिप्पणियाँ करते रहे. इस घटना से आहत तन्वी ने विदेशमंत्री सुषमा स्वराज को ट्वीट किया तो महकमे में हडकंप मच गया. तन्वी और अनस नोएडा की एक कम्पनी में कार्यरत हैं.

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आदिवासियों का पत्थलगड़ी आंदोलन: संघ हुआ बेचैन, डैमेज कंट्रोल को आगे आये भागवत

झारखंड, छत्तीसगढ़ के आदिवासी पत्थलगड़ी की अपनी पुरानी परम्परा का नये रूप में अपने अधिकारों को स्थापित करने के लिए राजनीतिक रूप से इस्तेमाल कर रहे हैं. बिरसा मुंडा की धरती खूंटी से प्रारम्भ हुआ यह आन्दोलन आदिवासी समाज में व्यापक होता जा रहा है. इसका असर झारखंड, छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकारों को बेचैन कर रहा है. पत्थलगड़ी का असर इस कदर है कि डैमेज कण्ट्रोल के लिए संघ और संघ प्रमुख को सामने आना पड़ा है. सुमेधा चौधरी की खूंटी से ग्राउंड रिपोर्ट: 

मुर्हू ब्लाक में पत्थलगड़ी

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने रायपुर में मंगलवार को संघ के वनवासी कल्याण आश्रम के चिंतन शिविर में कहा कि ‘आदिवासियों के बीच पैदा हुए दुराव को पेसा, वनअधिकार कानून और आरक्षण से कम किया जा सकता है.’ संघ प्रमुख का यह कथन आकारण नहीं आया है, वे पिछले कुछ महीनों से आदिवासियों के पत्थलगड़ी आन्दोलन के असर से पैदा बेचैनी के कारण बोल रहे थे. आदिवासी मामलों से जुड़े तीन केंद्रीय मंत्रियों जुएल उरांव, अनंत हेगड़े, सुदर्शन भगत और एसटी आयोग के अध्यक्ष नंदकुमार साय की मौजूदगी में आश्रम के चिंतन शिविर में वे बोल रहे थे. उनके पूर्व  के कई वक्ताओं ने, केन्द्रीय मंत्रियों ने भी आदिवासियों के पत्थलगाड़ी आन्दोलन पर चिंता जतायी और कहा कि ऐसे आन्दोलनों के जरिये लोकतांत्रिक संस्थाओं का विरोध लोकतंत्र के लिए खतरनाक है.

क्या है पत्थलगड़ी आन्दोलन 
झारखंड में खूंटी और आसपास के कुछ खास आदिवासी इलाके के कई गांवों में आदिवासी, पत्थलगड़ी कर ‘अपना शासन, अपनी हुकूमत’ की मुनादी की शुरुआत साल के शुरुआती महीने में हुई. यह मुनादी इलाकों के ग्राम सभाओं ने शुरू की, जो धीरे-धीरे प्रशासन से टकराव की घटनाओं में भी बदलने लगा. कई गांवों में पुलिस वालों को घंटों बंधक बनाये जाने की घटनाएं भी सामने आई. गौरतलब है कि खूंटी इलाका आदिवासियों के बीच ‘भगवान;’ का दर्जा प्राप्त बिरसा मुंडा का भी इलाका है. 19वीं सदी के आख़िरी वर्षों में आदिवासियों के अधिकारों के लिए बिरसा मुंडा ने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष किया था और शहादत दी थी. इस लिहाजा से  खूंटी से शुरू हुआ आन्दोलन एक ऐतिहासिक संदर्भ  भी रखता है. 25 फरवरी को खूंटी के कोचांग समेत छह गांवों में पत्थलगड़ी कर आदिवासियों ने अपनी ‘हुकूमत’ का ऐलान किया.

प्रशासन ने अपने प्रारम्भिक कार्रवाइयों में कई ग्राम प्रधानों, आदिवासी महासभा के नेताओं और उनके सहयोगियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा, लेकिन आन्दोलन की गति बढ़ती ही गयी, जिसे लेकर संघ और भाजपा खेमे में बेचैनी है. मुख्यमंत्री रघुबर दास ने अपनी प्रतिक्रिया में इस आन्दोलन को देशद्रोहियों का आन्दोलन भी बता डाला. और अब छत्तीसगढ़ के रायपुर में संघ और भाजपा के नेताओं की प्रत्यक्ष बेचैनी देखने को मिली.

पुरानी परम्परा के अनुसार

पुरानी परम्परा की नई शुरुआत. 

झारखंड के कई बुद्धिजीवियों ने बताया कि पत्थलगड़ी की परम्परा पुरानी है, सिमडेगा, लातेहार जैसी जगहों पर इस परम्परा का राजनीतिक इस्तेमाल नहीं हुआ है, लेकिन खूंटी इलाके में चूकी खनन क्षेत्र पर सरकार और कंपनियों की नजर है इसलिए वह इस रूप में प्रकट हुआ है. उन्होंने बताया कि बुजुर्गों की याद में, वंशावली की जानकारी के लिए अथवा किसी एनी निर्देश जैसे ग्राम सभा की जानकारियों या इलाके की सीमा आदि की जानकारी के लिए पत्थलगड़ी की जाती है, जिसे शिलालेख भी कहा जा सकता है. शहीदों की याद में भी कुछ जगहों पर पत्थलगड़ी की गयी है.  अब नए स्वरूप में ग्राम सभाओं द्वारा की जा रही पत्थलगड़ी के मुद्दे राजनीतिक हैं. जगह-जगह पत्थलों पर लिखा है:
–पांचवी अनुसूची क्षेत्रों में संसद या विधानमंडल का कोई भी सामान्य कानून लागूनहीं है. भारत का संविधान के अनुच्छेद 13 (3) क के तहत की शक्ति है.
— अनुच्छेद 19 (5) के तहत अनुसूचित जिला या क्षेत्रों में कोई भी बाहरी गैर रूढी प्रथा व्यक्तियों का स्वतंत्र रूप से आना-जाना, घूमना-फिरना, निवास करना वर्जित है.
–अनुच्छेद 19(6) के अनुसार आदिवासियों के स्वशासन व नियंत्रण क्षेत्र में गैररूढ़ि प्रथा के व्यक्तियों का रोजगार-कारोबार करना या बस जाना, पूर्णतः प्रतिबंध है.
–पांचवी अनुसूचित जिला या क्षेत्रों में भारत का संविधान के अनुच्छेद 244 (1) भाग (ख) धारा 5 (1) के तहत संसद या विधान मंडल का कोई भी सामान्य क़ानून लागू नहीं है. 
–वोटर कार्ड और आधार कार्ड आदिवासी विरोधी दस्तावेज हैं तथा आदिवासी लोग भारत देश के मालिक हैं, आम आदमी या नागरिक नहीं.

पारम्परिक तीर-धनुष के साथ आदिवासी





पत्थलगड़ी पर एकमत नहीं हैं आदिवासी बुद्धिजीवी

झारखंड विश्विद्यालय के आदिवासी एवं जनजाति विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष गिरिधारी राम गंजू आदिवासियों की पुरानी परम्परा के राजनीतिकरण के पक्ष में नहीं हैं वहीं दूरदर्शन के पूर्व अधिकारी एवं लेखक वाल्टर वेंगरा के अनुसार कानूनों की की जा रही व्याख्या आदिवासियों के हित में नहीं है.

क्या कहते हैं खूंटी के लोग 

मुर्हू और अरकी  ब्लाक के आदिवासियों से जब इस रिपोर्ट के लिए बात करने की कोशिश की गयी तो वे इससे बचते नजर आये. मुर्हू की दोह रेजा ने कहा कि ‘ मुझे इस बारे में सिर्फ इतना पता है कि यह पुरखों की परम्परा है और सदियों से गांवों में यह होता रहा है.’ वहीं खूंटी में ही बिरसा मुंडा के जन्मस्थल उलीहातु के एक दुकानदार सलोनी पूर्ती ने बताया कि ग्रामसभा में इसपर बात होती है. हालांकि ग्रामसभा की कई महिलाओं ने इसपर बात करने से मना कर दिया. खूंटी के जनसम्पर्क पदाधिकारी इस विषय के अलावा किसी भी विषय पर बात करने को तैयार थे, इस विषय पर नहीं.

झारखंड विकास मोर्चा (प्रजातांत्रिक) के प्रवक्ता तौहीद आलाम ने कहा कि ‘ सरकार इस बारे में भ्रम फैला रही है.’ वही भाजपा के प्रवक्ता प्रतुल ने कहा कि ‘गैर आदिवासी भी किसी के मरने पर पत्थलगड़ी करते हैं लेकिन विपक्षी राजनीतिक ताकतें इसे दूसरी दिशा में मोड़ दे रहे हैं.. प्रतुल कहते हैं ‘ इस आन्दोलन में शामिल लोग अपने को भारत गणराज्य का हिस्सा नहीं मानते वे अपना बैंक खोल रहे हैं, और दूसरे बैंकों में पैसा जमा करने से मना कर रहे हैं, यह खतरे की घंटी है.’

संघ प्रमुख मोहन  भागवत

 ‘पूर्व आइपीएस अधिकारी और कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव अरुण उरांव कहते हैं कि राज्य के कई जिलों में हो रही पत्थलगड़ी के पीछे लोगों की भावना समझनी होगी. इसके लिए सरकार को आगे आना होगा. विरोध की जो तस्वीरें सामने है उसके संकेत यही हैं कि गांवों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव है और इससे नाराज लोग गोलबंद होने लगे हैं. उनका कहना है कि 1996 में खूंटी के कर्रा में बीडी शर्मा और बंदी उरांव समेत स्थानीय नेताओं ने पत्थलगड़ी की थी और इसके माध्यम से पेसा कानून के बारे में लिखा गया था.’

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आत्मकथा नहीं चयनित छविनिर्माण कथा (!)

संजीव चंदन


रामशरण जोशी की आत्मकथा  ‘मैं बोनसाई अपने समय का’ में बहुत से प्रसंग छोड़े और एडिट किये गये हैं. स्त्रीकाल में हमने इस किताब की दो समीक्षायें प्रकाशित की हैं. अब कुछ प्रसंग मेरे द्वारा भी जिसका गवाह मैं भी रहा हूँ. ये प्रसंग स्पष्ट करते हैं संस्थानों में प्रवेश के इनके तिकडमों को, जो शायद हिन्दी साहित्य और साहित्यकारों का अधिकांश सच हो. हालांकि इन प्रसंगों के बीच जोशी जी के दो ओरिजिनल लेख, जो हंस में 2004 में प्रकाशित हुए थे,  भी आप पढ़ सकेंगे, जो इस लेख के साथ प्रकाशित हैं, ताकि शोधार्थियों को सनद रहे. इस लेख के साथ मैं प्रस्तावित करता हूँ कि हिन्दी साहित्यकारों, पत्रकारों को आत्मकथा नहीं लिखनी चाहिए.



‘ समझ नहीं पा रहा हूं कि हम हिंदी के लोग दोगले, पाखंडी क्यों होते हैं? हम पारदर्शी जीवन जीना क्यों नहीं जानते? हम लोग नैतिकता के मामले में “सलेक्टिव” क्यों हो जाते हैं? क्यों अपने स्खलनों की सड़ांध को प्रखुर वत्कृता और जादुई कथा शैली से ढांपे रखना चाहते हैं? कभी तो यह मैनहोल खुलेगा और दोगली जिदंगी का गटर खुद-ब-खुद बाहर बहेगा, तब क्या वे नंगे नहीं हो जाएंगे? ऐसी विकृत नैतिकता को ओढ़े रखने का क्या लाभ?

(पृष्ठ299),  ‘मैं बोनसाई अपने समय का’  रामशरण जोशी.


यह भी पढ़ें:  लेखकीय नैतिकता और पाठकों से विश्वासघात!
इस आत्मकथा के लेखक के उनकी ही भाषा में ‘दोगले, पाखंडी’ होने का वह प्रसंग मैं लिखता हूँ, जो उन्होंने आत्मकथा में नहीं लिखा. उन्होंने केन्द्रीय माखनलाल चतुर्वेदी विशवविद्यालय, भोपाल, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा, हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा का विस्तार से प्रसंग लिखा लेकिन किस जुगाड़, धोखा और छल के साथ वे हिन्दी विश्वविद्यालय पहुंचे, उसकी कहानी नहीं लिखी, तो हो गये न ‘सेलेक्टिव’, ‘दोगला’ और ‘पाखंडी’. हालांकि उनके द्वारा इस्तेमाल किये गये इस ‘दोगला’ शब्द के खिलाफ हूँ. डा. बाबा साहेब अम्बेडकर बास्टर्ड/दोगला शब्द को महिलाओं का अपमान मानते थे, जो वास्तव में है भी. हिन्दी विश्वविद्यालय पहुँचने के उनके तिकडम, अर्जुन सिंह के यहाँ से आख़िरी तौर पर सम्बन्ध-विच्छेद को पाठक समझ जायेंगे तो आत्मकथा पढ़ते हुए उन सारे बिटवीन द लाइन्स को भी पढ़ सकेंगे, जिन्हें जोशी जी गोल कर गये हैं.

साहित्यकारों के साथ रामशरण जोशी तस्वीर में नंदकिशोर आचार्य, कमला प्रसाद, नन्द भारद्वाज भी दिख रहे हैं
जोशी जी से हमारी (राजीव सुमन और मेरी) मुलाक़ात 2007 के आखिर में हुई थी. हमलोग हिन्दी विश्वविद्यालय में तत्कालीन प्रशासन और कुलपति के खिलाफ सक्रिय थे. उधर विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद्, जिसके सदस्य कमला प्रसाद, विष्णु नागर, मधुकर उपाध्याय, असगर वजाहत, गगन गिल आदि थे, भी कुलपति के खिलाफ मोर्चाबंद थी. हमें शायद कमला जी ने ही सुझाव दिया था कि हम रामशरण जोशी से मिलें, वे तब केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के उपाध्यक्ष थे और मानव संसाधन विकास मंत्री, अर्जुन सिंह के बेहद करीबी भी (करीबी होने के कई सबूत वे इस आत्मकथा में देते हैं). इसके पहले हमलोग, (राजीव सुमन और मैं) प्रफुल्ल विदबई के साथ अर्जुन सिंह से मिल चुके थे. खैर, हम दिल्ली आये, जोशी जी को फोन किया. वे खुद ही हमसे मिलने श्रीराम सेंटर, मंडी हाउस के कैंटीन में पहुंचे. बात हुई और तय हुआ कि हमलोग न सिर्फ अर्जुन सिंह से मिलेंगे, बल्कि एक डेलिगेशन लेकर जायेंगे. हम सब एक मुहीम चालायेंगे हिन्दी साहित्य से बाहर के किसी कुलपति के लिए, खासकर सोशल सायंस से. हमने एक मीटिंग बुलाई इस मसले पर जेएनयू, जामिया के कुछ प्रोफेसर आये. फिर एक डेलिगेशन गया अर्जुन सिंह से मिलने- उसमें जोशी जी, प्रोफेसर प्रमोद यादव (जेएनयू), प्रोफेसर अरुण कुमार (जेएनयू) आदि थे. राजेन्द्र यादव जी को लेकर मैं आया था और पंकज बिष्ट भी वहां जोशी जी के आमन्त्रण पर शायद पहुंचे थे. अर्जुन सिंह से मिलने से एक बात जरूर हुई ‘गोपीनाथन जी को एक भी दिन का एक्स्टेंशन नहीं मिला.’ इतना वादा उन्होंने प्रफुल्ल जी के साथ हमारे जाने पर भी किया था. वहां, बाहर निकलने के बाद पंकज बिष्ट तो तुरत चले गये, अन्य लोग रुके, हंसी-मजाक करते रहे-जोशी ने रमणिका जी को लेकर कुछ व्यंग्यात्मक लहजे में अनपेक्षित कहा, लोगों ने ठहाके लगाये.
आगे कुछ एक महीने में ही नये कुलपति के लिए चयन समिति के गठन की प्रक्रिया शुरू हुई. इसमें एक सदस्य, जो समिति को चेयर करता है, राष्ट्रपति द्वारा नामित होता है. उन्होंने पहली कोशिश तो यही की कि यह नाम उनका हो. मंत्रालय के सेक्रेटरी रहे सुदीप बनर्जी के पास उठना-बैठना तेज कर दिया उन्होंने. हालांकि राष्ट्रपति के यहाँ से बिपिन चन्द्रा का नाम फायनल हुआ. अब जोशी जी लग गये कि उनका नाम विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद द्वारा नामित होने वाले सदस्यों में जाये. उन्होंने हमसे कहा कि हम कार्यपरिषद के सबसे सक्रिय सदस्य कमला प्रसाद जी को मनायें क्योंकि जोशी जी के अनुसार कमला जी कभी नहीं चाहेंगे कि वे चयन समिति के सदस्य बनें. हमारे लिए जोशी जी का आना इसलिए जरूरी था कि हिन्दी विश्वविद्यालय में सोशल सायंस के कुलपति को लाने की मुहीम में वे शामिल थे. हालांकि जोशी जी नहीं आये. कमला जी ने सुदीप बनर्जी का नाम दिया और एक और सदस्य का नाम भी.


कहानी उसके बाद विभूति नारायण राय के पक्ष में रही. बाद में उनसे नाराज हुए सीपीआई के अतुल अंजान से लेकर कई लोगों ने उनके लिए पैरवी की और वे हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति हुए. इस बीच रामशरण जोशी का रिश्ता अर्जुन सिंह से खराब हुआ. खबर तो यह भी उड़ी कि जोशी जी किसी विश्वविद्यालय, शायद अमरकंटक, में कुलपति बनाने के लिए सक्रिय थे-धन-बन का भी मामला था (हालांकि हम नहीं मानते) इसलिए अर्जुन सिंह नाराज हुए. कारण जो भी हो अर्जुन सिंह ने उनसे मिलने तक से इनकार कर दिया था.

जोशी की आत्मकथा
उसके बाद बहुत कुछ हुआ. हिन्दी का छिनाल प्रकरण घटा. साहित्यकारों ने विभूति राय का बहिष्कार किया, उनमें से कुछ फिर उनसे संबंध बनाने लगे.
आगे 3.12.2011 की मेरी डायरी का एक अंश
रामशरण जोशी भी ‘राय साहब ‘ के खेमे में आ चुके थे. आलोक धन्वा पहले से ही ‘राय साहब ‘ की छवि निर्माण में व्यस्त थे. राजकिशोर पहले विरोध कर अब सरेंडर कर चुके थे- 50 हजार रुपये की नौकरी और सुविधाओं के आगे.
लेकिन राम शरण जोशी! हमारे लिए वह सब सदमा सा था: उन दिनों जब जोशी जी गोपीनाथन विरोधी हमारे मुहीम से जुड़े तो अर्जुन सिंह की निकटता की वजह से हमारे अगुआ भी हो गये थे, दिल्ली में हमारे साथ काफी सक्रिय थे. उन दिनों हमारे कई मित्र उन्हें अवसरवादी बताते थे , लेकिन जोश के साथ वे ‘ हिंदी विश्वविद्यालय ‘ बचाओ की मुहीम में शामिल थे, उससे हमें लगता था कि वे पूरे मन से निश्च्छलता के साथ हमारे साथ हैं .
जोशी जी जब ‘छिनाल प्रकरण’ के बाद विजिटिंग प्रोफ़ेसर होकर वर्धा नहीं आये थे तभी कुछ दिनों के लिए वे वर्धा प्रवास पर थे. मैंने उन्हें एस.एम.एस किया -उन दिनों मेरा विश्वविद्यालय कैम्पस में प्रवेश बैन था. एस.एम.एस में मैंने लिखा कि ‘निजाम बदल गया है , हालात ज्यों के त्यों हैं. जिन कारणों से हम गोपीनाथन जी के खिलाफ थे , वे कारण आज भी बने हुए हैं. मैंने उन्हें कैम्पस के बाहर ‘बिरयानी’ खाने के लिए आमंत्रित किया. उन्होंने मेरा एस.एम.एस न सिर्फ कुलपति विभूति राय को दिखाया बल्कि टिप्पणी भी की कि ‘ वे (मैं और राजीव पिछले कुलपति से लड़ता रहा , अभी लड़ रहा हूँ, आगे भी लड़ता रहूंगा.’
जोशी जी को इनाम मिल गया. वे ‘ अनिल चमडिया ‘द्वारा खाली की गई जगह पर नियुक्त किये गये, अनिल जी नियुक्ति पर स्टे लेकर आ गये तो जोशी जी टर्म बेस पर विजिटिंग प्रोफ़ेसर होकर आ गये.

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राय उन दिनों एसएमएस दिखा रहे थे, कि कैसे ‘छिनाल प्रकरण‘ में उनके खिलाफ खड़े लोग नए साल का मुबारकबाद देकर उनसे सम्बन्ध पुनर्जीवित कर रहे हैं.
इस चरित्र और प्रसंग को और समझने के लिए 14.12.2011 की मेरी डायरी
नामवर सिंह ! हिंदी विश्वविद्यालय के कुलाध्यक्ष ! हिंदी के महान आलोचक-विद्वान् !!
क्या कुछ प्रतिमानों के व्यक्तित्व के आभामंडल को बने रहने देना चाहिए- आखिर हम अपने बाद की पीढी को क्या प्रतिमान देंगे , क्या ध्वस्त प्रतिमानों के साथ हमारी पीढी आदर्शविहीन नहीं हो जायेगी !!
सच तो सच होता है , आखिर हमें देखना होगा कि ऐसे प्रतिमानों को इतिहास में प्रस्तुत करते वक्त हम इनके विचलनों को कैसे प्रस्तुत करते हैं– विचलन इनके व्यक्तित्व नहीं हो सकते, लेकिन भावी पीढी को ऐसे विचलनों से भी सतर्क रहना होगा!!!
लखनऊ के प्रगतिशील लेखक संघ के कार्यक्रम में नामवर जी ने दलितों के आरक्षण पर खासे जातिवादी ढंग से तंज कसा . ईश्वर सिंह दोस्त पिछले दिनों जब हमारे घर आये थे तो गोवा विश्वविद्यालय में एक कार्यक्रम का वाकया बता रहे थे कि कैसे नामवर जी आयोजक ब्राह्मणों के प्रकार (उप जाति) से ‘राजपूतों’ के रिश्ते पर ही कुछ मिनट बोलते रहे थे .
हिंदी का शिखर आलोचक जातिवादी है – हिंदी समाज का प्रतिरूप तो नहीं. दो लड़के नामवर सिंह से मिलने जाते हैं —रजनीश और आशीष , उन दिनों नामवर जी हिंदी विश्वविद्यालय के गेस्ट हाउस में टिके थे- दोनों लड़कों ने एम.फिल परीक्षा में धांधली और आरक्षण नियमों के उल्लंघन की शिकायत नामवर जी से की. नामवर जी ने उन दोनों लड़कों से उनकी जाति पूछी – एक ब्राह्मण , एक कायस्थ —नामवर जी आश्वस्त हुए. फिर उन्होंने लड़कों से कहा कि विभूति जातिवादी है —भूमिहारवाद करता है. उसके कुछ ही दिनों बाद ‘सत्ताचक्र/ मोहल्ला पर उनकी एक चिट्ठी सामने आई , जिसमें वे विभूति को unscrupulous कह रहे हैं.

एक कार्यक्रम में रामशरण जोशी विभूतीनारायण राय (बोलते हुए)
सबलोग में विश्वविद्यालय के सम्बन्ध में  मेरा लेख पढ़कर नामवर जी ने मुझे फोन किया था. वे मेरे लेख के हवाले से कह रहे थे कि विश्वविद्यालय के विषय में इतना कुछ वे उसी आलेख से जान पाये , उन्होंने संबंधित  कागजात मुझसे मांगे — उनके अनुसार मंत्री महोदय नाराज थे और वि.वि. से संबंधित कागजात चाहते थे , कारवाई करने के लिए.
मैं उन दिनों रामशरण जोशी के ‘यू-टर्न’ से झुंझलाया हुआ था. मैंने नामवर जी को याद दिलाया कि मैं  इसके पहले भी उनसे उनके घर मिल चुका था . मैं , राजीव और सत्यम श्रीवास्तव उनके घर गये थे . -गोपीनाथन जी का कार्यकाल था . हमने उनसे  कुलाध्यक्ष के नाते हमारे कागजातों की आधार पर राष्ट्रपति (विजिटर)  को लिखने का आग्रह किया था. उन्होंने मना कर दिया प्रोटोकाल बता कर .हमने फिर उन्हें रास्ता सुझाया कि क्यों न हम उन्हें एक आवेदन दें और वे उसे अपनी टिप्पणी के साथ राष्ट्रपति को अग्रसारित कर दें – उन्होंने ऐसा करने से भी मन कर दिया .
वे बड़े प्रेम से हमसे मिले थे -अच्छा नाश्ता… अच्छी चाय पिलाई थी- गोपीनाथन जी के खिलाफ भी खूब बोले. उनके अनुसार उन्होंने गोपीनाथन जी को नियुक्तियां न करने के लिए कहा था क्योंकि बकौल उनके  ‘ एक ख़राब नियुक्ति लगभग 30 सालों तक वि.वि.को नष्ट कर देती है .’
लेकिन किसी ठोस पहल से उन्होंने इनकार कर दिया था. उन्हीं दिनों एन.डी.टी.वी के रवीश से मिले थे . उन्होंने कहा कि अगर नामवर जी कैमरे पर गोपीनाथन के खिलाफ बोल दें तो वे एक लम्बी रिपोर्ट चलवा सकते हैं- रवीश को नामवर जी का अनुभव था शायद इसीलिए उन्होंने हमें यह प्रस्ताव दिया था.
नामवर जी राजकमल के किसी प्रकाशन के लोकार्पण के अवसर पर इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में मिले. नामवर जी और अशोक वाजपयी, दोनों थे वहां . नामवर जी ने हमारी तरफ इशारा करते हुए अशोक जी से कहा कि ‘ इनसे मिलिए आपके विश्वविद्यालय का हाल ख़राब है. अशोक जी ने हंसते हुए कहा  ‘ अब आपका विश्वविद्यालय ‘ . खैर, जब हमने नामवर जी को रवीश का प्रस्ताव सुनाया तो उन्होंने फिर से इनकार कर दिया .

यानी, नामवर जी से हम वाकीफ थे और रामशरण जोशी के ‘यू -टर्न’ से झुंझलाए. हमने नामवर जी को रामशरण जोशी वाला वाकया  सुना दिया और कागजात भेजने के वादे के साथ बात ख़त्म की.
हमें कागजात भेजना था नहीं , भेजा भी नहीं. लेकिन हमारे सामने यक्ष प्रश्न था कि नामवर जी ने यह अचानक से फोन क्यों किया! मामला इतना सीधा भी नहीं था कि सबलोग के आलेख ने उनकी आँखें खोल दी थी. किसी निष्कर्ष पर हम नहीं पहुँच पा रहे थे . वे दुबारा कुलाध्यक्ष बना दिये गये थे , फिर नाराजगी किस बात की थी उन्हें विभूति से. पता चला कि विभूति निर्मला जैन को कुलाध्यक्ष बनवाना चाह रहे थे, वे नामवर सिंह के दूसरे टर्म के पक्ष में नहीं थे – शायद नामवर जी को इसी बात का आक्रोश हो.
रामशरण जोशी की प्रतिक्रिया में , नामवर जी के पुराने व्यवहार के कारण हमने फोन वाला प्रसंग विभूति को बताया. उनसे ही जानना चाहा कि नामवर जी उनसे इतने खफा क्यों हैं- तब हम अपने माइग्रेशन के प्रसंग में विभूति से मिलने गये थे. सुनकर विभूति हँसे, उन्होंने कहा कि “पता नहीं क्यों चाह रहे होंगे वे ऐसा,  मेरे ऊपर उनका बड़ा उपकार है . ‘ नया ज्ञानोदय‘ विवाद (छिनाल प्रकरण) के दौरान उनके प्रिय कमला प्रसाद लगभग धरना देकर बैठ गये थे उनके घर के वे मेरे खिलाफ बयान दें. लेकिन नामवर जी ने उन दिनों मेरा साथ दिया.’’

मुझे लगता है कि ‘सत्ता चक्र ‘ के ऐसे प्रसंगों से रामशरण जोशी या नामवर सिंह का आकलन नहीं किया जाना चाहिए- विचलन कभी भी समग्रता को बोध नहीं देते.
मेरी डायरी के इन हिस्सों में जोशी जी दर्ज हैं वही उनका व्यक्तित्व रहा होगा, आजीवन. हाँ बस्तर के विश्वासघात के दौरान भी. वे अपनी आत्मकथा में हिन्दी विश्वविद्यालय के कई प्रसंग तो लेकर आते हैं लेकिन इन प्रसंगों को नहीं लिखते, कारण व्यक्तित्व का सही अंदाज जो लग जाता पाठकों को. वे आलोक धन्वा के प्रसंग में तो लिखते हैं कि कैसे एक घटना के बाद विभूति उन्हें रातोरात विदा कर देते हैं. लेकिन अपना प्रसंग नहीं लिखते,उनके बारे में भी कैम्पस में अनेक कथायें मौजूद थीं. वे अपने ही शब्दों में ‘दोगला’ पाखंडी हैं.

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मेडिकल की छात्रा का सुसाइड नोट शिक्षा और व्यवस्था पर तीखा सवाल

12 जून को इंदौर के इंडेक्स मेडिकल कॉलेज में एक छात्रा ने आत्महत्या कर ली. उसने यह निर्णय लेने के पहले जो आख़िरी नोट लिखा है वह इस देश की शिक्षा-व्यवस्था की अमानवीयता को उजागर करता है. पढ़ें डॉ स्मृति लहरपुरे का मार्मिक पत्र: 

‘मुझे माफ कर देना मम्मी, स्वामी और सूर्या, मै डॉ स्मृति लहरपुरे पूरे होश हवास में लिख रही हूं न ही कभी मैने कोई नशे या दवाई का सेवन ही किया है। सबसे पहले मै अपनी माँ और भाईयों से माफी चाहती हूं कि मैं ऐसा कदम उठा रही हूं क्योंकि तुम तीनों ने हर विपरीत परिस्थितियों में मेरा साथ दिया, मै इन लोगों ने और नहीं लड़ सकती इसलिए मुझे माफ कर देना।

मेरी मौत के लिए सीधे तौर पर इंडेक्स कॉलेज के चैयरमैन सुरेश भदौरिया और उनके कॉलेज का मैनेजमेंट है, इनमें मुख्यरूप से डॉ के के खान हैं क्योंकि इन दोनों के द्वारा मुझे लगातार प्रताडित किया जा रहा था। मैने जून 2017 में नीट परीक्षा के माध्यम से ज्वाइन किया था। काउंस्लिंग के दौरान मुझे जो फीस बताई गई थी उसके अनुसार टयूशन फीस 8 लाख 55 हजार और होस्टल फीस 2 लाख थी। इसके बाद जब मैं कॉलेज में ज्वाइन करने आई तो इंडेक्स कॉलेज प्रबंधन ने मुझसे कॉशन मनी और एक्सट्रा करिकुलर एक्टीविटी के नाम पर फिर 2 लाख मांगे। चूंकि मैं मध्यमवर्गीय परिवार से हूं इसलिए अतिरिक्त फीस नहीं चुका सकती थी लेकिन नीट परीक्षा के बाद बामुश्किल मिला पीजी करने का यह अवसर हाथ से न निकल जाए इसलिए मैने 2 लाख का फिर लोन लिया, इसके बाद जैसे ही मैं ज्वाइन करने पहुंची कॉलेज प्रबंधन ने फिर दो लाख मांग लिए इसके बाद रातभर के प्रयास के बाद मैने अपनी सीट खोने के डर से मैंने यह व्यवस्था भी की लेकिन कॉलेज ने टयूशन फीस 8 लाख 55 हजार से 9 लाख 90 हजार कर दी और सभी छात्रों से यह फीस जमा करने को बोला जाहिर से अचानक एक लाख 35 हजार की फीसवृद्धि सहन करना हर किसी के लिए मुश्किल था इसलिए हम सभी लोग इसके खिलाफ जबलपुर हाईकोर्ट गए। इसके बाद कॉलेज प्रबंधन ने मुझे व्यक्तिगत तौर पर प्रताड़ित करना शुरु कर दिया इसके अलावा फोन पर भी मुझे यह केस वापस लेने के लिए धमकाया जाने लगा। इसके बाद कोर्ट ने इंडेंक्स कॉलेज को निर्धारित फीस लेने का आदेश दिया लेकिन इसके बाद फिर अगले साल 2017 में फिर 9 लाख 90 हजार मांगने लगे जो मैने जमा नहीं कर कोर्ट के अादेशानुसार 8 लाख 55 हजार ही जमा किए, इस मामले में कोर्ट जाने पर कॉलेज प्रबंधन हमे लगातार प्रताडि़त करने लगा खासकर एचओडी डॉ खान, इसके बाद इसी मामले में केस वापस लेने की शर्त पर एचओडी डॉ खान ने अमानवीय व्यवहार करते हुए सार्वजनिक तौर पर हमे 2 से 3 महिने तक ओटी और डिपार्टमेंट से बाहर निकाले रखा। इसके बाद हमारा स्टायपेंड भी काट लिया गया और बिना कारण हमपर हजारों रुपए का फाइन लगाया जाने लगा। कॉलेज प्रबंधन हमे इस समय का स्टायपेंड कभी नहीं देना यदि कॉलेज में उस दौरान मेडीकल काउंसिल का दौरा और इनकम टैक्स का छापा नहीं पड़ता।

मेरी एचओडी के के खान मुझे व्यक्तिगत तौर पर प्रताडि़त करती थी वह यह सोचती थी कोर्ट केस करने में मेरी सक्रिय भूमिका है दरअसल वह मानसिक रूप से बीमार है इसलिए वह सायकिक रोग का इलाज भी करवा रही है वह मेडीकल कॉलेज के इस प्रोफेशन के लिए फिट नहीं है खासकर एनेस्थेटिक ब्रांच के लिए। वह हर किसी को प्रताड़ित करती है पर मैं नहीं जानती कि उसे मुझसे क्या प्रॉब्लम रहती थी वह मेरे लीव एप्लीकेशन पर साइन नहीं करती थी और मेरे लीव पर होने पर एचआर विभाग से मुझपर हजारों रुपए का फाइन लगवाती थी। हम पीसी स्टूडेंट होने के बावजूद भी यहां प्रताड़ित हो रहे हैं हमारा ड्यूटी टाइम सुबह 8 बजे से रात 8 बजे तक है इसके बावजूद दिन में चार बार एटेंडेंस के लिए पंच करना पड़ता है, हद तो यह है कि एक दिन की लीव पर एचओडी डॉ खान ने मुझपर 4500 से 6000 रुपए का फाइन लगाया, जिसपर पहले से ही भारी लोन हो उसके लिए यह राशि भर पाना संभव नही था। कुछ दिनों पहले मैने थर्ड ईयर की फीस जमा करने को बोला तो फिर फीस 9 लाख 90 हजार कर दी गई जिसे जमा करने से मैने मना कर दिया इस बारे में मैने डॉ अमोलकर को भी बताया था, इसके बाद चैयरमैन सुरेश भदौरिया ने मैनेजमेंट को उन सभी छात्रों से बकाया फीस वसूलने का आदेश दिया जिन्होंने कोर्ट के निर्देशानुसार फीस जमा की थी यह राशि तीन साल की प्रति छात्र चार लाख 5 हजार थी और किसी भी हालत में मैं बढ़ी हुई फीस जमा नहीं कर सकती थी। मेरे माता पिता पहले से ही बढ़ी हुई फीस के लिए रिश्तेदारों और दोस्तों से रुपए उधार ले चुके थे जिनके बस में यह राशि जमा करना संभव नहीं था। मेरी उम्र में अन्य इंजीनियरिंग लॉ और आर्ट सब्जेक्ट इतना कमा लेते हैं कि अपना खर्चा उठा सकें जबकि मैं सिर्फ अपने घरवालों पर ही निर्भर हूं, वह भी इसलिए कि मैं एक डॉक्टर हूं।

 मैने स्कॉलर और स्कूलिंग रेपुटेड कॉलेज गांधी मेडिकल  कॉलेज और सेंट्रल स्कूल से की है मैने इंडेक्स कॉलेज जैसा फर्जी संस्थान पहले कभी नहीं देखा था। यहां कोई इंफ्रास्ट्रक्चर और व्यवस्था डॉक्टरों और मरीजों के परिजनों के लिए नहीं है। इन्होंने अभी भी रिश्वत और धमकी देकर एमसीआई की मान्यता हासिल की है। मान्यता के दौरान मैने खुद इनके कंसलटेंट के फर्जी दस्तावेज और फर्जी साइन देखे हैं। ये लोग सिर्फ पीजी स्टूडेंट को प्रताडि़त करने में लगे हैं और खुद की नाकामी का आरोप हमपर लगाकर फीस बढ़ाते हैं और आए दिन हमारा स्टायफंड काटते रहते हैं। आधी रात को इनके इशारे पर शराब पीकर कुछ लोग स्टूडेंट के पास भेजे जाते हैं और लोग हमसे कोरे कागज पर साइन मांगते हैं। जो पीजी स्टूडेंट साइन करने से मना कर देता है उसपर अगले दिन मेडीकल सुप्रीटेंडेंट बिना कारण के हजारों रुपए का फाइन लगा देता है। यह असहनीय है मैं इतने इतनी प्रताड़ना और लूट सहते हुए इतने दबाव में काम और पढ़ाई नहीं कर सकती। इसलिए मैने इससे मुक्त होने का निर्णय लिया है मैं हमेशा इन लोगों से नहीं लड़ सकती।

मैं जानती हूं मैं सुरेश भदौरिया के सामने बहुत छोटी हूं पर मैं अपने माता पिता और परिवार को कर्ज और लोन के बोझ तले नहीं देखना चाहती। मेरी एक ही अंतिम इच्छा है कि सुरेश भदौरिया को इसके बदले में सजा मिलनी चाहिए और मेरे परिवार को मेरी पूरी फीस लौटाई जाना चाहिए। और मेरे साथ पढ़ने वाले पीजी स्टूडेंट से विनती है कि आखिर तक इकट्‌ठे रहकर एक दूसरे की मदद करते रहें। प्लीज इस कॉलेज को बंद करो जहां मरीजों की जिंदगी और कॉलेज स्टूडेंट के करियर का विनाश किया जाता हो।

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रानी बेटी

प्रीति प्रकाश 


तेजपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में शोधरत प्रीति प्रकाश की कहीं भी प्रकाशित यह पहली कहानी है. शारीरिक और आर्थिक रुग्णता की शिकार एक लडकी की यह कहानी उम्मीद है आपको निराश नहीं करेगी- न शिल्प के स्तर पर और न कथावस्तु के स्तर पर. 

“एक ,दो ,ढाई …|”
“चावल तो ढाई डब्बे ही है | पर रोज तो तीन डब्बे बनते है |”
आज खाना कैसे बनेगा?
कही किसी और डब्बे में हो ?
पुष्पा ने चादर उठाकर चौकी के नीचे झाँका ?
दो तीन डब्बे भी खीचे | पर चावल किसी में नहीं था |
“अब क्या करू ?” थोड़ी देर वैसे ही बैठे रही फिर जाने क्या सोच कर उठी और चावल धोने लगी | फिर तसली में लेवा लगाकर अदहन दे दिया |

जब से माँ काम करने जाने लगी है ,खाना बनाना पुष्पा का ही काम बन गया है | पहले माँ सब काम करती थी और पुष्पा स्कूल जाती थी | स्कूल की याद आते ही पुष्पा मुस्कुराई | कितना मजा आता था न तब | वह रोज खूब तैयार होकर पढने चली जाती | पढाई क्या खाक होती थी| दिन भर दोस्तों के बीच गपास्टिंग होती और कॉपियो पर मेहंदी के डिजाईन बनाये जाते| बिना बात के हँसी आती | सर डाँटते तो सब सहेलियां हसंती और सर अगर सीधे क्लास में आकर चुपचाप बैठ जाते तो भी सबको हँसी आती | अगर हसने के लिए सजा के रूप में क्लास के बाहर  सबको खड़े कर देते तो भी एक दूसरे के पीछे छुप छुप के हसंती |

पुष्पा को सच में हँसी आ गयी | हँसते-हँसते अचानक उठकर शौचालय चली गयी | पेशाब के साथ खूब  गिरा | आज उसका बीसवा दिन है माहवारी का | शायद कोई बीमारी है | कपड़ा पूरा गीला हो गया है | डोलची में से पुष्पा ने माँ की पुरानी साड़ी निकली | फाड़ कर उसे हो मोड़ कर ले लिया | जाने कौन सी बीमारी हो गयी है | अब उसका मन बेचैन हो गया है |

किसी तरह पुष्पा ने भात डभका दिया | चन्दन ,नंदन दोनों को खिला के खुद भी खा लिया |माँ वापस आई तो पुष्पा जैसे उनके ही इन्तेजार में बैठी थी | माँ को खाना परोस के वही बैठ गयी |
“माँ , चावल ख़तम हो गया है |”
“हूँ” माँ ने कहा और दो कौर खा कर पानी उठा कर पीने लगी |
“ माँ , आज भी बहुत खून गिरा है”
माँ चुपचाप बैठे रही |
“माँ लगता है डॉक्टर के यहाँ जाना पड़ेगा”
“अरे हा,सोनी की माँ बता रही थी कि सोनी को भी ऐसे ही था तब वो अडहुल का फूल पीस के पीई थी तो ठीक हो गया”
अचानक जैसे माँ को याद आया |
“रे नंदन,जाके कहीं से उड़हुल का फूल तोड़ के ले आओ |”
पुष्पा मन मसोसकर रह गयी | जब भी वो माँ से डॉक्टर के पास जाने के लिए कहती , माँ ऐसा ही कोई देसी नुस्खा बता देती | सब समझ रही थी पुष्पा |

जाने कितनी देर बाद चन्दन पोलोथीन में चावल लेकर आया | दरवाजा बंद था | बहुत देर तक दरवाजा बजाने के बाद भी जब नहीं खुला तब खिड़की के पास जाकर झाँका |
फिर जोर से चिल्लाया|



“बीसों बार समझा चुकी है माँ –“एक तो डॉक्टर के पास जाने का मतलब हजार रुपया का सूई ,दवाई | ऊपर से किसके साथ जाये | अगर पटीदार जान गया सब कि पुष्पा के माहवारी में खराबी है तो सात गाँव ढोल पीट देगा सब | बियाह काटने के लिए तो तैयार बैठा है सब | ई त किसी से होगा नहीं कि बाप नहीं है तो उहे लोग बाप भाई जैसा बनके लड़का खोज दे |’

अंतिम वाक्य चुभता है हमेशा,पुष्पा को | बाप है उसका | तो क्या अगर चार साल से घर नहीं आया | जिन्दा तो है अभी | पापा कहती थी उन्हें वह |  हमेशा से लगता है कि कभी अचानक ही आ जायेगे  | और सुबह जब पुष्पा सोकर उठेगी तो अंगनाई में बैठे दातुन करते मिलेंगे |
जब पुष्पा पाचवी में पढ़ती थी तो देखा था उन्हें  | वह सोके उठी तो वही अंगनाई में बैठे दातुन कर रहे थे |
“उठ गयी मेरी बेटी| बोल क्या खाना खाएगी आज |”
“पापा,आप कब आये |”
तब आया जब तुम सोयी थी नींद से |”
पापा ने उसका सर सहलाते हुए कहा और पुष्पा एकदम सीने से लग गयी |
आज भी बार बार वो वह सीना ढूढती है ,जिससे लगकर अचानक से वो राजकुमारी बन जाती थी |
पापा अपने साथ ढेर सारा सामान लेकर आये थे | चन्दन ,नंदन के लिए गाड़ी,पिस्तौल और उसके लिए सैंडल |
“पापा ये सैंडल तो बहुत बड़ा है”
उसने ठुनकते हुए कहा था |
“अच्छा मेरी रानी बेटी इस बार दूसरा सैंडल यही से खरीद देता हूँ | यह वाला जब तुम थोड़ी बड़ी हो जाना तब पहनना |”

दोनों बातें कभी नहीं हुई | ना पापा ने दूसरा सैंडल खरीदा और ना बड़ी होने के बाद उसने कभी उस सैंडल को हाथ लगाया | उस दिन कितनी खुश थी न वो |पापा आये थे,घर में मीट बना था | उसका नया सैंडल आने वाला था | ख़ुशी-ख़ुशी वह स्कूल गयी पर जब लौटी तो सब बदल गया था | पापा गली में शराब पीकर धुत्त चिल्ला रहे थे ,माँ दरवाजे की ओट में खड़ी रो रही थी और पूरा मोहल्ला तमाशा देख रहा था |
“साली, मैं रात दिन मेहनत करता हूँ,साहेब लोग की गलियां खाता हूँ और तू यहाँ दूसरे मर्द को घर में बुलाती है |”
“बेहया,लाज नहीं आती ,पति के पैसे किसी और पर उड़ाते |”
“टुकी,टुकी काट दूंगा तुझे |
“कुतिया कही की | रे कुत्ता भी तुझ से ठीक है |”
“पापा,” सहमते हुए पुष्पा ने कहा | पर पापा ने नहीं सुना | वो तो अपनी ही रौ में बोलते गए |
“जा , मर गयी तू मेरे लिए,मर गया मेरा परिवार, जा रहा हूँ मैं| नहीं आऊंगा कभी |”

और पापा चले गए | इस बार जो गए तो कभी नहीं लौटे | माँ कई दिन तक रोती रही | कोसती रही उसको जिसने पापा के कान भरे थे | फिर पापा को भी, जिन्होंने जाने किसकी बात पर भरोसा किया | कभी-कभी खुद को भी कोसती कि वह क्यों बूत बनी खडी रह गयी उस दिन |जाकर हाथ पकड़ कर रोक लेती | पापा को कई बार खोजने की भी कोशिश की | पर शायद पापा ने फ़ोन नंबर के साथ साथ पता भी बदल दिया | तब तो दर्जनों चिट्ठियाँ भेजने के बाद एक बार भी जवाब नहीं आया |
अचानक माँ उठने लगी तो पुष्पा को ध्यान आया |
“माँ ,तुमने आधा क्यों खाया ?”
“अरे , पेट भर गया | इतना ज्यादा तुमने परोसा था | मैं क्या भैस हूँ |”
माँ ने हसंते हुए कहा | माँ हसंते हुए भी कैसे दिखती है न| लगता है रो रही है |
“नहीं माँ,ज्यादा नहीं है|”
“बैठो”
“ हम सब ने खा लिया है | बस तुम्ही बाकी थी |”
पुष्पा ने मानो हुकुम देते हुए कहा | फिर हाथ पकड़कर जबरन बिठा दिया |
“अच्छा,ठीक है | तू मानेगी नहीं |”
“जा, जरा जाके आचार ले आ |”
“नहीं ,नहीं, तू नहीं ला |
“चन्दन , जरा तू डब्बे से अचार निकाल के तो दे|”
चन्दन आचार निकाल के देने लगा तो पुष्पा उठी | एक बार मुड कर माँ को देखा | माँ अभी भी सर झुकाए बैठी थी | वह जब माँ को देखती है तो सोचती है कि क्या ऐसा ही भावहीन चेहरा शुरू से माँ का था ?

पहले उसे माँ पर गुस्सा आता | पापा तो अच्छे भले थे , जब वो उन्हें छोड़कर स्कूल गयी थी , पता नहीं माँ ने क्या कहा कि पापा यूं रूठकर चले गए | पर अब उसे माँ पर जरा भी गुस्सा नहीं आता | पापा तो चले गए ,पर माँ ,वो तो कही नहीं गयी | चाहे लाख मुसीबत आये वो बच्चो के साथ ही रही | पापा ने गुस्से से जाने के बाद घर में एक रुपया भी नहीं भेजा | माँ ने घर चलाने के लिए घर घर बर्तन मांजने का काम पकड़ लिया | चन्दन नंदन प्राइवेट स्कूल से सरकारी में आ गए और वह सरकारी स्कूल से सीधे घर आ गयी | माँ दूसरो के घर काम करती और वह अपने घर | खेल , तमाशे,स्कूल ,सहेलियां,और बिना वजह की बातें, सब जाने कहाँ छूट गयी | अब तो उसे बातें करना बिलकुल अच्छा नहीं लगता |
चन्दन,नंदन तो दिन भर बाहर गिल्ली ,डंडा खेलते है,माँ से कुछ कहो तो हाँ,हूँ में जवाब देती है| मोहल्ले में किसी के घर जाओ तो पहला सवाल करते है –
“बेटी ,पापाजी के बारे में कुछ मालूम चला?” और फिर इतना अफ़सोस जताते है जैसे सारी मुसीबत उन्ही के घर आयी है |
“ओह”

अचानक पुष्पा को फिर से पेशाब जैसा महसूस हुआ और खून कपडे को तर करता हुआ सलवार तक पहुँच गया |
किसी तरह पुष्पा उठी | फिर से दूसरा कपड़ा लिया | हाथ पैर पोछे | माँ जा चुकी थी |सुबह शाम दोनों वक़्त लोगो के घर काम करती है माँ | पुष्पा के लिए लड़का भी देखा है | उसकी शादी के लिए ही इतना काम करती है |
रात होने तक पुष्पा को कई बार कपडे बदलने पड़े | नंदन का लाया अड हूल पीस कर पी लिया|पर  कोई फायदा नहीं हुआ | रात को पुष्पा माँ के पास सोयी तो रोने लगी |
माँ भी रोने लगी |रोते हुए कहा –
“क्या जाने भगवान् कौन परीक्षा ले रहे है ? आज मेधा का छेका था | उसी का पूड़ी सब्जी भेजी है | क्या जाने हमारे घर में शुभ काम कैसे होगा ?”
फिर पुष्पा को और सीने से लगा लिया |
“ऐ बेटी, तुम मत रोना | तुम्हारे लिए ही तो हम जिन्दा है | खूब सुन्दर लड़का से हम शादी करेंगे तुम्हारा |”
पुष्पा को और रोना आया | रोते-रोते वह सो गयी | सुबह उठी तो माँ जा चुकी थी |
बिछावन पर दाग लग गया था | पुष्पा ने अपने कपडे बदले | फिर अपने कपडे धोये | फिर चादर धोया | अभी नहा के बैठी ही थी कि मेधा की मम्मी आ गयी छेका का पकवान लेकर |
“ तब न तुम्हारी माँ साफ बेचैन रहती है | ताड जैसा देह भाग गयी  है | “
पुष्पा को देखते ही मेधा की माँ शुरू हो गयी |
“कलप रही थी बेचारी,कह रही थी कि खाली पुष्पा का दिन रात चिंता लगा रहता है |”
“के जाने कौन जनम का पाप है कि बेचारी इस जनम में भी भोग रही है |”
“मानता है सब लड़का वाला?, पचास हजार रुपया और एगो हीरो हौंडा दिए है तब जाके शादी के लिए तैयार हुआ है सब | छेका और बियाह का खर्चा अलग से |”
मेधा की माँ चली गयी | पुष्पा सोचने लगी माँ कहा से लाएगी उतना रुपया | डॉक्टर के पास जाने भर तो रुपया नहीं है |

पीरियड्स के दौरान एकाकी जीवन को बाध्य महिलायें

सारा कपड़ा फिर भर गया पुष्पा का | जाकर डोलची में देखा तो अब एक भी पुरानी साड़ी नहीं बची थी | साफ़ घिना गया था पुष्पा का मन इस बीमारी से | माँ का बक्सा खोला पुष्पा ने | ऊपर ही एकदम नयी साड़ी रखी थी | पापा लाये थे यह साड़ी माँ के लिए | माँ ने एक बार भी नहीं पहनी है | कहती है कि जब उसकी शादी होगी तो उसी को दे देगी |
“हूँ”
“शादी तो तब होगी न जब माँ के पास पैसे होंगे”
जाने क्या हो गया पुष्पा को , खुद से ही बतियाने लगी |
“पैसा जोड़ते जोड़ते माँ ही मर जायेगी |”
“हूँ”
बक्सा में ऊपर से नीचे तक देखा | एक भी कपड़ा ऐसा नहीं जो फाड़कर वो माहवारी में ले ले |
“हूँ”
“मर तो मैं रही हूँ इस बीमारी से”

जाने कितनी देर बाद चन्दन पोलोथीन में चावल लेकर आया | दरवाजा बंद था | बहुत देर तक दरवाजा बजाने के बाद भी जब नहीं खुला तब खिड़की के पास जाकर झाँका |
फिर जोर से चिल्लाया|
सब मोहल्ले वाले दौड़े | कुछ मजबूत शरीर वालो ने दरवाजा धक्का देकर तोड़ दिया |
अन्दर पंखे से पुष्पा झूल रही थी | सलवार पखाना,पेशाब और खून से भरा था |गले में एकदम नयी साड़ी का फंदा पड़ा था |

प्रीति प्रकाश की यह कहीं भी प्रकाशित पहली कहानी है. वे फिलहाल तेजपुर विश्वविद्यालय में शोधरत हैं. 



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पवन करण की कवितायें (तुम जैसी चाहते हो वैसी नही हूं मैं और अन्य)

पवन करण


पवन करण हिन्दी के महत्वपूर्ण कवि हैं, स्त्री मेरे भीतर, स्त्री शतक आदि काव्य संग्रह प्रकाशित. सम्पर्क: pawankaran64@rediffmail.com

पढ़ें पवन करण की कवितायें. पुरुष रचनाकारों की बहुत कम कवितायें हैं, जहाँ स्त्री को सुकून हो, जहाँ स्त्री को अपना स्पर्श, अपना राग महसूस हो. पवन करण की कवितायें ऐसी हैं, जहाँ स्त्री सुख से नींद लेती है, स्नेहिल माहौल में.  

1. 
तुम जैसी चाहते हो वैसी नही हूं मैं

मुझे इस बात का कोई पश्चताप नहीं है
न ही कोई अपराध बोध मेरे भीतर
हमेशा के लिए उसकी होते समय आज
जैसी वह मुझे चाहता है, वैसी नही हूँ मैं

हमेशा के लिए उसकी होने से पहले
सदा के लिए किसी और की भी थी मैं
हम दोनो की आज पहली मुलाकत जरूर है
लेकिन ऐसी मुलाकात मेरे लिए कोई पहली नही
शायद उसके लिए भी न हो

उसके दोनों हाथों में मिट्टी के घड़े जैसी
कोरी नहीं हूँ मैं, ना ही एकदम अनछुई
मुझे इससे पहले पुरूष के हाथों ने छुआ है
और ठीक-ठीक छुआ है एक रसीले पुरूष ने
बड़ी खामोशी के साथ मेरे अन्तःपुर में
कुछ बार किया है बडे गौरव से प्रवेश

दरअसल कुंआरेपन को मैंने अपने
उस पूंजी की तरह माना ही नहीं
जिसे मुझे हर हाल में रखना था सॅंभालकर
और सौंपना था सिर्फ अपने पति को ही
मैंने उसे बंधन की तरह नही अपने हक की तरह लिया
मैं तो समझ ही नहीं पाई और इसकी बरसात
एक दिन अचानक पड़कर भीतर तक भिगो गई मुझे

मैं उन लडकियों में रही हूं जो अक्सर इसी तरह
इसमें भीगकर जिन्दगी भर गीली बनी रहती है
और कभी इस बारिष में भींगे अपने बदन को
पोंछने की नही करती कोशिश
इससे पहले इस बारे में मैं जब भी सोचती
मुझे सभी पुरूष एक से लगते
सभी का स्वर एक सा देता सुनाई

कि हमें उनसे पहले किसी पुरूष के हाथों ने तो क्या
खुद हमारे हाथों ने भी न छुआ हो
लगता है ये पुरूष भी कितनी भोली उम्मीद रखते है हमसे
हमें पाकर मंत्रमुग्ध हो जाने और सुध-बुध
खो बैठने की जगह पहली मुलाकात में ही ऐसी
खटास को देना चाहते है जन्म
जो जीवन-भर दोनो के बीच बसी रहे उस स्वाद में

हमेशा के लिए आज होते समय उसकी
एक बात जो मेरे हक में जाती है
वो ये कि ऐसे कोई संकेत छूटते ही नही
अगर ऐसे कोई चिन्ह मन के अलावा कहीं और बचते
तब पता नही मुझ जैसी ऐसी कितनी लडकियॉं होती
जो अपनी देह पर घूमता हुआ पति का हाथ रोककर कहतीं
नही जैसी तुम चाहते हो वैसी नही हूं मैं’

2.
एक खूबसूरत बेटी का पिता 

एक खूबसूरत बेटी का पिता हूं मैं
हालांकि इसमें नया कुछ भी नहीं है
इस दुनिया में तमाम पिता हैं जिनकी बेटियां खूबसूरत हैं
फिर बेटी कैसी भी हो वह अपने पिता को
खूबसूरत ही आती है नजर

दरअसल उन तमाम पिताओं की तरह
मेरा भय भी यही है कि मैं एक खूबसूरत बेटी का पिता हूं
और मेरी बेटी की खूबसूरती चुभती हुई है

क्योंकि मैं उसका पिता हूं इसलिये तमाम बातें ऐसी हैं
जो मैं नहीं कर सकता उससे
लेकिन वे बातें मेरी सोच में रेंगती रहती हैं अक्सर
किसी लड़की को रिझाने उसके घर के चक्कर काटते
किसी लड़के की तरह मेरे भीतर घूमती रहती हैं निरंतर

जिंदगी के सबसे विस्फोटक पंद्रहवे साल में चलती
मैं अपनी बेटी को समझाना चाहता हूं कि उसने खुद को
परेशानी में डाल लेने वाली खूबसूरती पाई है
इसका अर्थ यह नहीं कि जो लड़कियां कम सुंदर होती हैं
उन्हें समझाइश की जरूरत नहीं होती
दरअसल उन लड़कियों पर वैसा दबाव नहीं होता,
जैसा होता है मेरी बेटी जैसी खूबसूरत लड़कियों पर
इसलिये जितना रख सके वह रखे अपने आपको संभालकर
बहुत कच्ची उम्र है यह और यही उम्र है जब
देह पर कच्चापन उसी तरह दमकता है
जैसे पेड़ पर लटकी अमियों पर गाढ़ा हरापन

हालांकि यह बहुत कठिन है फिर भी
ऐसा नहीं कि इससे बचा नहीं जा सके
मैं उससे कहना चाहता हूं वह जितनी हो सके
कोशिश करे उन नजरों से खुद को बचाने की
जो इसी उम्र को अपने तीखेपन से बेधती हैं
और नहीं छोड़तीं कहीं भी पीछा

एक बात यह भी कि दुनिया-भर की खूबसूरत बेटियों के
पिताओं से थोड़ा हटकर पिता मानता हूं मैं खुद को
मैं जानता हूं कि वह लड़की है तो किसी से
प्यार भी करेगी, चाहेगी भी किसी को कोई पसंद भी आयेगा उसे
और मैं भी नहीं चाहता मेरी बेटी किसी से प्रेम नहीं करे,

फिर दुनिया का कोई भी पिता अपनी बेटी को
प्रेम करने से रोक भी नहीं सकता
उसके भीतर पल रहे उस अहसास को
किसी भी तरह नहीं सकता खदेड़
और तमाम प्रयासों के बाद भी अपने
उसके भीतर की गुलाबी दीवार पर चिपके
किसी चित्र को नहीं फैक सकता फाड़कर
और नहीं रोक सकता उसे किसी भी उम्र में करने से प्रेम
प्रेम के लिए क्या पंद्रह और क्या पच्चीस

दरअसल मैं अपनी बेटी से कहना चाहता हूं
वह प्रेम करे तो थोड़ा रूककर
प्रेम करने की सही उम्र नहीं यह,
हालांकि यह भी सच है कि एक यही उम्र है
जिसमें सबसे तेज होती है प्रेम की गति
इसी उम्र में कुए की देह से निकलकर जल
मेड़ के चारों तरफ बगरता है
और मन की कोमल चिड़िया अपनी चोंच में
आकाश से सबसे बड़ा तारा उठा लाती है

दरअसल मैं चाहता हूं कि मेरी बेटी
कांपते और डरते हुए नहीं, इस डगर पर
संभलकर चलते हुए करे प्रेम,
अपने भीतर अद्भुत स्वाद लिए बैठे प्रेम के इस फल को
वह हड़बड़ी में नहीं धैर्य से नमक के साथ चले
इसकी खुशबू को वह इस तरह अपने भीतर रोपे
कि वह जिंदगी-भर फूटती रहे उसके भीतर

हालांकि प्रेम के बारे में इतना सोचना
इतना गणित प्रेम न करने जैसा ही है
और सभी जानते हैं कि प्रेम का हरा रंग
जब आंखों में बिखरता है आकर
मन बौरा जाता है
एक पागलपन हो जाता है इस पर सवार
और मैं चाहता हूं कि वह इस पागलपन को
अपने पर पूरी तरह से न होने दे हावी,
लेकिन प्रेम के लिए जरूरी इस पागलपन को
वह नकारे भी नहीं पूरी तरह से

प्रेम की तीव्रता एकांत चाहती है और वह
प्रेमाभिव्यक्ति से देहाभिव्यक्ति की ओर बढ़ती है
और प्रेम में यह बढ़ना हो ही जाता है
मैं नहीं कहता कि देह अपवित्र चीज है
लेकिन वह पवित्र भी नहीं उतनी
कि हर समय उसकी चिंता में घुलते रहा जाये
लेकिन मैं कहता हूं कि प्रेम अमूल्य है
उसका अहसास अवर्णनीय
बहुत गहरा संबंध है प्रेम का देह से
दरअसल प्रेम का बचना ही देह का बचना भी है
प्रेम बचा रहता है तो देह भी बची रहती है अपने विश्वास में

सिर्फ भय ही नहीं एक खूबसूरत बेटी का पिता होने का
जो उल्लास होना चाहिये मेरे भीतर
वह मेरे भीतर है और दो गुना है
फिर भी मेरी चिंता में मेरी बेटी की खूबसूरती
शामिल है और शा मिल है यह दृढ़ता
यदि इस सबके बावजूद भी उससे कोई गलती होती है
तो हो जाये उसके पीछे उसे उबारने के लिये मैं खड़ा हूं तत्पर



3. 
स्पर्श जो किसी और को सौंपना चाहती थी वह

जितनी खामोश वह उतना ही शान्त एक चेहरा
लेता जा रहा उसके भीतर आकार

सहेलियों से घिरी वह सोचती जब मैंने बचा ही लिया
किसी के जादुई स्पर्श से खुद को
तब मैं आराम से तैरूंगी किसी की मीठी झील में,
वह सोचती कैसे बच गई मैं बिना संग के
जबकि मेरी साथिनों से बांट लिए क्षण -विरल

वह सोचती कितना गजब यह किन्हीं हाथों ने
छुआ तक नहीं उसे, भला कोई मानेगा
मगर यह सच जानती वह ही, सुनकर
मन ही मन उसे झूठा कहती सहेलियां
दवा लेंती दांतों तले उंगलियां
जब वह बतलाती कि उसे दिखाकर फेंका गया
पत्थर से लिपटा ऐसा कोई खत नहीं
छोटे-से उसके जीवन में जिसे उठाने
अकेली गई हो वह घर की छत पर

ऐसा नहीं कि वह भीतर से सूखी थी
या अब तक झरना नहीं फूटा था उसके भीतर
या पानी ने षुरू नहीं किया था उसे परेशान करना
या उसे स्वप्न नहीं आते थे, या पसन्द नहीं थे उसे गीत
वह भी सबकी तरह अकेले मे खुद को
देर तक निहारती थी और लजाते हुए
खुद को हाथों से ढांप लेती थी

जब कोई उसे भी कुहनियां जाता वह भी
गुस्से या हंसी को अपने भीतर दबा जाती
सबकी तरह देह को नजरों से बचा पाना
उसके लिये भी असंभव था सो वह लगातार
अपनी नजरों को बचाती, और जब तक उसकी
चालाकी समझ पाता वह फिसल जाती अपने पानी में

हालाकि खुद को प्रेम से बचाने की कोई
निश्चित योजना नहीं थी उसकी लेकिन वह बची हुई थी
सो बची हुई थी और अपने नशे में चुप थी
सब सोचते बड़ी हो रही है कोई तो होगा ?
सबके साथ वह भी सोचती कहीं कोई तो होगा
और जो होगा उसका चेहरा भी होगा एक
अभी तो वह उसके भीतर बे-चेहरा था,

वह कम बोलती लेकिन उससे करने के लिए
वह लगातार अपने भीतर ढेर सारी बातें
करती जा रही थी जमा, उसे अपने रंग में रंगने के लिए
रंगों में रंग मिला-मिलाकर बनाती जा रही थी
नए-नए रंग, उस पर झुक जाने के लिए पेड़ों पर
पत्तियों की शक्ल में उगाती जा रही थी स्वप्न

मगर बाहर खुद को महफूज मानती वह
नहीं रख सकी खुद को घर में महफूज
जिनके बारे में वह कभी सोच भी नहीं सकती थी
ऐसे दो हाथ अचानक आए
और आकर छेड़ गए उसके तारों को
किसी के लिए प्रतीक्षारत उसके भीतर की
साफ सुथरी दुनिया को कर गए अस्त-व्यस्त
अनचाहे ही उसके भीतर आकार ले रहे
एक चेहराविहीन चेहरे पर आकर चिपक गया एक चेहरा

वह स्पर्श जो किसी और को सौंपना चाहती थी वह
उस पर फेर गया अपनी खुरदुरी उंगलियां

4. 
इस जबरन लिख दिये गए को ही 

घर चाहता है इस बारे में किसी से
कुछ नहीं कहा जाये
जहां तक सम्भव हो अपने आपसे से भी
नहीं किया जाये इसका जिक्र

इस सम्बन्ध में कुछ कहने से
कुछ नहीं होने वाला इससे तो बेहतर है
स्लेट पर इस जबरन लिख दिए गए को ही
मिटाने की की जाये कोशिश

इससे अच्छा और क्या होगा
इसने इस बारे में अब तक किसी को
कुछ नहीं बताया चुपचाप चली आई
किसी ने देखा भी नहीं कुछ होते

किसी को कुछ पता ही नहीं चलेगा
तब काहे का बलात्कार ?
कैसा बलात्कार ??
कब किसके साथ बलात्कार ???
धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा
देह से मिट जाएंगे खरोचों के निशान
आंखों से लगातार ओझल
होता चला जाएगा वह कामान्ध चेहरा

घर चाहता है वह अपना घाव
किसी को नहीं दिखाए
पोंछ ले अपनी आंखें अच्छी तरह धोले योनि
कुछ दिन नहीं निकले घर से
रही बलात्कारी की बात
उसे दंड देने के लिए ईश्वर है न

5. 
स्त्री-सुबोधिनी

हमें अपने इकलौते लड़के के लिए एक ऐसी बहू चाहिये
जो दुनिया की सबसे अच्छी बहू हो और उसे ये बात
कि वह दुनिया की सबसे अच्छी बहू है पता न हो

जिसे बोलना भले ही आता हो मगर हो वह गूंगी
न इस शब्द को वह पहचानती ही न हो
और हां उसकी जुबान पर दरवाजे के बाहर
हाथ बांधे खड़े नौकर की तरह रहता हो खड़ा

जिसके दोनों पैर तो साबुत हों मगर हो वह लंगड़ी
न वह चलना जानती हो न दौड़ना
नाचना तो उसे बिल्कुल न आता हो
और गुस्से में पैर पटकते तो उसने किसी को देखा ही न हो

जिसके कान भले ही हो मगर उसे सिर्फ
हमारे घर के लोगों की आवाज के
बाहर की कोई आवाज सुनाई न दे
आंखें होने पर उनसे दूर तक देखने लायक होने के बाद भी
उसकी घर से बाहर देखने की इच्छा ही न हो

जिसके पास डिग्रियां तो खूब हों
लेकिन वह पढ़ी-लिखी न हो जरा भी
दस्तखत करने के नाम पर वह आगे कर देती हो
अपने हाथ का स्याही लगा अंगूठा
और अपनी डिग्रियों को महज कागज के टुकड़े मानकर
छोड़ आए पिता के घर अपने

ऐसी कि सब उसे देखते रह जाएं और हमसे बार-बार कहें
टपने लड़के लिए क्या बहू ढूंढकर लाए हैं आप
लेकिन वह न तो अपनी खूबसूरती बार-बार
आईने में देखती हो और नहीं खुद को हमारे घर की
साधारण से चेहरेवाली लड़कियों से अधिक सुन्दर मानकर चले

जिसके पिता के घर के लोग
हमारे घर को समय से बढ़कर
और सच से अधिक मानकर चलें
और यह बात बार-बार कहतें रहें
आपके घर में अपनी लड़की देकर धन्य हो गए हम
हम तो इस लायक थे भी नहीं

जिसे रोना बिल्कुल न आता हो
चीखना तो वह जानती ही न हो
और उसकी पीठ ऐसी हो कि उस पर उभरते ही न हों नीले निशान
उसके गालों पर छपती हीं न हों उंगलियां
और वह पिटते समय बिलखती नहीं, हंसती हो

चेहरे से जिसके पीड़ा झलके नहीं
दुख दिखाई न दे जिसकी आखों में
बातों में जिसकी कष्ट बजें नहीं

जिसे हमें ढूंढने कहीं जाना नहीं पड़ें उसका पिता
नाक रगड़ता निहोरे करता हमारे घर आए
और हम उस पर करते हुए एहसान
बहू के रूप में उसकी बेटी को अपने बेटे के लिए रख लें

तस्वीरें: शीरीन निशात (2 और 3) और लीडा वेलेस्को के आर्ट वर्क (1)

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महिला शोधार्थियों की प्रताड़ना: विश्वविद्यालय नहीं कलह का केंद्र, पुलिस पर भी सवाल

स्टाफ रिपोर्टर 

हिन्दी विश्वविद्यालय में प्रशासनिक भ्रष्टाचार की खबरें आती रहती हैं, विद्यार्थियों के खिलाफ उनके मनमाने निर्णय की भी. इधर विश्वविद्यालय के शोधार्थी एक छात्रा के साथ शादी का वादा कर यौन-शोषण के एक मामले में एक-दूसरे के आमने-सामने हैं.  पुलिस पीड़ित पक्ष के खिलाफ सक्रिय भूमिका में है. पीड़िता का साथ दे रही शोधार्थियों पर भी अपराधिक वारदात का मामला दर्ज किया गया है.  इस मामले में सवाल दलित संगठनों पर भी उठ रहे हैं. क्या है पूरा मामला: 



घटना1 : महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की एक शोधार्थी, वर्तमान में बीएड-एमएड की छात्रा,  ने 29.12.2017 को एक अन्य शोधार्थी चेतन सिंह के खिलाफ शादी का झांसा देकर यौन शोषण करने के आरोप में रामनगर थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई। 7 फरवरी 2018, को  आरोपी विद्यार्थी ने किसी अन्य लडकी के साथ शादी भी कर ली। यह प्रकरण दलित समाज के भीतर ब्राह्मणवादी प्रवृत्ति का भी बताया जाता है। जाति सोपान में लडकी की जाति कुछ पैदान नीचे है और लड़के की ऊपर, जबकि दोनो ही दलित समुदाय से हैं। बहरहाल, पीड़िता द्वारा पुलिस से बार-बार चेतन सिंह के खिलाफ की गयी कारवाई के बारे में पूछने पर कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिलता था। 18 मार्च 2018 को पीड़िता ने बहुत जोर दे करकर रामनगर थाना से कारवाई करने के बावत पूछा तब उसे जांच अधिकारी आरपी यादव ने झिडकी दे दी और यह भी कहा कि दिल्ली चलकर आरोपी की गिरफ्तारी में मदद करो।  ठीक 2 घंटे बाद आईओ ने फोन करके बताया कि आरोपी को पकड़ लिया गया है। बहुत कुछ बातें पीड़िता की समझ में आज तक नहीं आई कि क्या चल रहा था।? आखिर पुलिस इतनी जल्दी चेतन सिंह को दिल्ली से कैसे पकड़कर वर्धा (महाराष्ट्र) लायी? जबकि खबर है  कि आरोपी  ने 19 मार्च को अपने आप को रामनगर थाना में सरेंडर किया था। 25 दिन बाद उसकी जमानत भी होने दी गयी। इस दौरान वह विश्वद्यालय के पास पंजाब कॉलोनी में ही रूम लेकर अपनी पत्नी के साथ रहने लगा। गौरतलब है यह कि छात्रावास से शहर जाने का रास्ता इसी कॉलोनी से होकर गुजरता है।

घटना 2.  पहली घटना से ही सम्बद्ध दूसरी घटना 3 मई 2018 को घटती है।  पीड़िता के अनुसार ‘जब वह अपने रूममेट के साथ रोजमर्रा का सामान के लिए शाम लगभग साढ़े सात बजे मार्केट की तरफ जा रही होती है तभी अचानक से चेतन सिंह और उसकी पत्नी का सामना होता है, वह पीड़िता पर अभद्र टिप्पणी करता है। दोनों की बीच फिर कहासुनी होती है आरोपी शोधार्थी पीडिता को ज़ोर का चाटा मारता है और हाथ पर चोट करता है।’ पीडिता के अनुसार उसपर तेजाब फेकने और जान से मारने की धमकी दी जाती है। पीड़िता उसी समय वि वि प्रशासन से अनुमति लेकर 4 गार्ड और एक केयर टेकर के साथ रामनगर थाने जाकर रिपोर्ट लिखाती है थाना उसका मेडिकल कराता है, और उसके आधार पर 323/324/504/34/506 धारा  के तहत एफआईआर दर्ज ली जाती है। पीड़िता व उसके साथ गयी चार लड़कियों को 3 बजे तक रामनगर थाने में बिठाकर रखा जाता है। उक्त समय पर चार्ज में रहे आरपी यादव द्वारा यह कहकर धमकाया भी जाता है कि विश्वविद्यालय में मेरी गाड़ी रोकी गयी थी। ‘मी छोड़नार नाही तुम यूपी, बिहार चे पोरगी चांगली नाही आहे। तुमचा यूनिवर्सिटी मधे नक्सलवादी रहेत होत, मी छोड्नार नाही।’ चेतन सिंह द्वारा पीड़िता से पहले ही उसी दिन के घटना की एनसीआर (नॉन काग्निजेबल रिपोर्ट) कराई जाती है। जिसमें 506/504 की धारा लगती है। इस बीच चेतन सिंह सोनिया सिंह द्वारा विश्वविद्यालय में 11 मई 2018  को एक शिकायत पत्र दिया जाता है जिसके बाद पुनः 17 मई को दूसरी शिकायत की जाती है और उसमें अचानक से 4 शोधार्थियों के नाम जोड़े जाते हैं, पीडिता की उन साथियों के, जो उसका साथ दे रही थीं। हालांकि चेतन सिंह और उसकी पत्नी का आरोप है कि उन छात्राओं ने उनके साथ मारपीट की, जिसके कारण उसका गर्भपात हो गया।

आरोप-प्रत्यारोप का दौर: सोशल मीडिया में, फेसबुक पर और अलग-अलग वेबसाइट्स पर आरोपी छात्र के दोस्तों ने इसके बाद पीडिता और उसके साथ खडी शोधार्थियों के खिलाफ दोषारोपण शुरू कर दिया.  वेबसाइट्स पर जो कहानी चालाई गयी उसमें रिपोर्टर दावे के साथ कहती है कि पीड़िता से बात करने कि कोशिश की गयी लेकिन पीड़िता ने बात नही की। जबकि पीड़िता के अनुसार ‘उसने यह बनावटी कहानी पढ़कर खुद ही शीत मिश्रा से बात करने की कोशिश की लेकिन प्रकरण लिखे जाने तक भी उसे कोई जबाब नही मिला है।’ वह कहती है, ‘इस घटना के आलोक में सच्चाई इस प्रकार है:
आरोपी के पक्षकारों द्वारा पीड़िता के यौन शोषण को सोशल मीडिया में उछाला जाता है। फेसबुक, व्हाट्सप पर 5 लड़कियों का सामाजिक आपराधीकरण किया जाता है।  यह लिख कर अफवाह फैलाई जाती है कि चेतन सिंह की पत्नी सोनिया को इन 5 लड़कियों ने इतनी बेरहमी से पीटा है कि उसका गर्भपात हो गया है।’  इस दूसरी घटना के लिए आरोपित की गयी लड़कियों का कहना है कि उस घटना से उनका दूर-दूर तक कोई सरोकार नही है।’ सोशल मीडिया की इन धमकियों को लेकर अपनी सुरक्षा के संबंध में विश्वविद्यालय प्रशासन को वे अवगत भी कराती हैं और उक्त घटना से कोई संबंध न होने की पुष्टि लिखित रूप में करती हैं। इस बीच लड़कियों को पता चलता है कि 3 मई को चेतन द्वारा की गयी एनसीआर को फर्जी तरीके से 7 जून 2018  को  एफआईआर में तब्दील किया जाता है। और इन 4 लड़कियों के नाम बाद में फर्जी तरीके से जोड़े जाते है और उन्हे फंसाकर पुलिस प्रशासन द्वारा उनका अपराधीकरण इसलिए किया जाता है क्योकि वे पीड़िता द्वारा चेतन सिंह के खिलाफ किए गए केस में मुख्य गवाह हैं। लड़कियों का दावा है कि ‘वे विश्वविद्यालय परिसर के अंतर्गत हमेशा से ही स्त्री मुद्दों के प्रति जागरूक व उसकी पक्षधर रही हैं। यह कैसे संभव है कि महिला अधिकारों की पक्षधर होकर वे दूसरी महिला के साथ दुर्व्यवहार करेंगी और उसे क्षति पहुंचाएंगी?  यह सवाल भारत के उन तमाम विश्वविद्यायालयों में अध्ययन करने वाले शोधार्थियों/ विद्यार्थियों, उच्च बौद्धिक वर्गों और प्रगतिशील संगठनों से भी है?’ हालांकि सोशल मीडिया में सक्रिय कुछ शोधार्थियों का कहना है कि ‘ये लडकियां कोई दूसरा पक्ष सुनना ही नहीं चाहती हैं।’

कुलपति विद्यार्थियों के बीच

इन घटनाओं से बनते सवाल : विश्वविद्यालय में लगातार घट रही इन घटनाओं से न सिर्फ विद्यार्थियों की गुटवाजी का संकेत मिलता है बल्कि कई सवाल भी खड़े होते हैं. मसलन जाति के सोपानीकरण का, जिसके चलित ऊंचे पैदान का एक दलित युवा प्रेम और शादी के वादे के बावजूद लडकी से शादी जाति के कारण नहीं करता है. इस घटना पर विश्वविद्यालय में दलित संगठनों की चुप्पी भी एक सवाल है क्योंकि आरोपी और पीडिता दोनो दलित समुदाय के जागरूक लोग हैं. इनके बीच मुकदमों के आगे की बातचीत और एक स्टैंड इन संगठनों ने क्यों नहीं लिया? पीड़ित शोधार्थियों का कहना है कि ‘दलित संगठनों यह कहकर पल्ला झाड़ लिए हैं कि ‘यह दलित दलित का मामला है, यह तो पर्सनल है। चेतन दलित भाई है। यह वही दलित संगठन के लोग है जो स्त्री विरोधी बात करते है और यह दावा करता है कि हम लोग अंबेडकरवादी हैं। बल्कि पीड़िता पर दबाव भी बनाते हैं कि केस वापस ले लो दलित-दलित आपस में नही लड़ना चाहिए।’ एक सवाल यह भी है कि जब पीडिता ने मुकदमा दर्ज करा दिया और आरोपी की गिरफ्तारी हो गयी, वह जमानत पर है तो फिर मामला कानूनन न निपटाकर सडक पर क्यों लड़ा जा रहा है, आरोप होना ही दोष सिद्ध होना नहीं होता, उसे क़ानून के रास्ते लड़ा जाना चाहिए. सवाल पुलिस से भी है कि वह पीडिता की जगह आरोपी के पक्ष में क्यों और कैसे दिख रहा है? विश्वविद्यालय प्राशासन, जहां विद्यार्थियों से ज्यादा कर्मचारियों की संख्या है इस गुटवाजी को क्यों पनपने दे रहा है या हवा दे रहा है?  और आख़िरी सवाल यह भी कि दो युवा पढाई करते हुए जब प्रेम  करते हैं और किसी कारण से सम्बन्ध टूटता है तो उसे किस रूप में सामाजिक संदर्भ दिया जाये?

सबसे महत्वपूर्ण है इन घटनाओं के पीड़ितों को मिलने वाला न्याय, जिसे सुनिश्चित कराया जाना चाहिए और वह कानून के रास्ते से ही हो सकता है.एक महत्वपूर्ण सवाल पितृसत्तात्मक ढाँचे का भी है, जिसमें शादी का वादा कर एक लडकी के शोषण के लिए एक युवा मुकदमे लड़ रहा है और इस बीच उससे शादी कर आयी एक दूसरी लडकी, जो प्रकारांतर से खुद भी पीडिता है, क्या करे, वह प्रिगनेंट है, स्त्रीवाद का रास्ता उसे पीडिता के साथ खडा करता है और उसका खुद का अस्तित्व खुद के साथ और आरोपी पति के साथ, जिसके लिए वह किसी भी स्तर तक लड़ सकती है.

गांधी हिल्स पर विदेशी विद्यार्थी

पीड़ित पक्ष के सवाल:  वह पितृसत्ता की कौन सी कुंजी है? जो पुरुष को यह अधिकार दे देती है कि वह बिना विवाह के जब तक चाहे किसी भी महिला का शारीरिक शोषण (प्रेम या सहमति का नाम देकर) करता रहता है। 2- सवाल यह भी है कि शादी करने की बात आने पर अपने अभिभावककों के कहे अनुसार दहेज लेकर के पारंपरिक विवाह करने का हठ करता है? 3- सवाल यह भी बनाता है कि समाज में प्रेम एक प्रतिरोध का प्रतीक माना जाता है। फिर पारंपरिक विवाह और दहेज पर इतना ज़ोर क्यो? 4- क्या आरोपी के पारंपरिक विवाह कर लेने भर से समाज उस पर कोई सवाल नही खड़ा करेगा? क्या पढ़ा-लिखा जागरूक कहलाने वाला वर्ग भी प्रेमिका को वेश्या, रखैल, चुड़ैल, व्यभिचारिणी जैसे अपमानजनक शब्द प्रत्यरोपित करेगा?

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महाराष्ट्र में बौद्ध विवाह क़ानून: नवबौद्ध कर रहे स्वागत और विरोध

संजीव चंदन


महाराष्ट्र की भाजपा सरकार द्वारा हिन्दू विवाह क़ानून से अलग बौद्ध विवाह कानून बनाने की पहल 2015 से ही शुरू हो गयी थी, जिसका ड्राफ्ट सरकार ने बुद्धिस्ट मैरेज एक्ट, 2017 के नाम से जारी किया है और लोगों के सुझाव मांगे हैं. इसके साथ ही महाराष्ट्र में इसके समर्थन के साथ-साथ विरोधी स्वर भी आने लगे हैं. बौद्ध महिलाओं ने भी इसका विरोध शुरू कर दिया है. देश भर में 80 लाख के करीब बौद्ध हैं, जो पूरी आबादी के 0.8% होते हैं. 2001 की जनगणना के अनुसार 73% बौद्ध महाराष्ट्र में रहते हैं, जिन्हें नवबौद्ध भी कहा जाता है. यह क़ानून मराठी बौद्धों पर लागू हो जायेगा. 

बौद्ध विवाह कानून के विरोध में आगे आयी  बौद्ध महिलायें


कानून बनाने की जरूरत और तर्क 
बौद्ध विवाह क़ानून के लिए मांग पिछले एक दशक से तीव्र हुआ है. हालांकि आरपीआई के पूर्व सांसद प्रोफेसर जोगेंद्र कवाडे, कांग्रेस के पूर्व विधायक नितिन राउत आदि के अनुसार इस क़ानून की मांग  1957 से ही होने लगी थी, जब बाबा साहेब ने 1956 में लाखों दलित अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया. नितिन राउत ने 2007 में ही इस मांग के साथ न सिर्फ भूख हड़ताल की थी बल्कि विधानसभा में बौद्ध विवाह और उतराधिकार क़ानून, 2007 नामक प्राइवेट मेम्बर बिल भी लाया था. कानून बनाने की मांग करने वाले लोगों का मानना रहा है कि चूकी हिन्दू मैरेज एक्ट में सप्तपदी विधि अनिवार्य है और उसके बिना विवाह अमान्य माना जाता है और बौद्ध रीति से विवाह को मान्यता नहीं मिलती इसलिए अलग विवाह क़ानून की जरूरत है. इस तर्क के साथ कानून का मुहीम चलाने वाले लोग विभिन्न न्यायालयों के निर्णयों का हवाला देते हैं. 1973 के शकुन्तला-निकनाथ मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट का फैसला शकुन्तला के खिलाफ गया था और कोर्ट ने उनके विवाह को वैध न मानते हुए उसे मेंटेनेंस देने से मना कर दिया था. कोर्ट का मानना था  कि विवाह के वक्त वे कानूनी रूप से कन्वर्ट नहीं हुए थे इसलिए वे हिन्दू थे और उन्होंने हिन्दू रीति से शादी नहीं की थी. कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी ऑब्जर्व किया था कि ‘पिछले 10-15 सालों से ऐसे विवाह हो रहे हैं, यानी बौद्ध रीति से, यह काफी नहीं है किसी कस्टम को स्थापित करने के लिए.

बुद्धिस्ट मैरेज एक्ट, 2017 का ड्राफ्ट 
2015 में प्रदेश की नई सरकार ने एक 13 सदस्यीय समिति बनायी थी बौद्ध विवाह और उत्तराधिकार मामले पर राय के लिए. समिति में राज्य के सामाजिक न्याय मंत्री राजकुमार बडोले सहित कुछ अधिकारी, एक रिटायर्ड जज, कुछ क़ानूनविद और बौद्ध समाज के कुछ प्रतिनिधि शामिल थे. सरकार जून के पहले सप्ताह में जिस ड्राफ्ट के साथ सामने आयी है वह बौद्ध रीति से विवाह की मान्यता के लिए कानून जरूर है लेकिन तलाक, मैटेनेंस, उतराधिकार आदि की मामले उसमें शामिल नहीं हैं. यह क़ानून लागू होने पर महाराष्ट्र में रह रहे बौद्ध एवं 1956 में बाबा साहेब अम्बेडकर के साथ या आबाद में बने बौद्धों पर लागू होगा. इस कानून में दहेज के खिलाफ भी प्रावधान हैं. वर या वधु तलाक होने या किसी एक की मौत होने पर ही दूसरा विवाह कर सकते हैं. यह क़ानून उस दिशा में लागू नहीं होगा, यदि दोनों में से कोई एक बौद्ध धर्म से कन्वर्ट होकर किसी और धर्म में शामिल हो गया हो. गौतलब है कि महाराष्ट्र में पिछले पांच सालों में 20 हजार से अधिक अंतरजातीय विवाह हुए हैं.

क़ानून के विरोध में आयोजित कार्यक्रम में छाया खोब्रागड़े



विरोध के स्वर और कारण 
इस मामले पर महाराष्ट्र का बौद्ध समाज एकमत नहीं है. इसके विरोध में स्वर उठने लगे हैं, गोष्ठियां हो रही हैं. विरोधी अम्बेडकरवादी समूहों के अनुसार ”जरूरत बाबा साहेब अम्बेडकर के अनुसार ‘सामान नागरिक संहिता’ के लिए मुहीम चलाने की है न कि अलग एक्ट की मांग की.” रिपब्लिकन विचारक रमेश जीवने, सम्बुद्ध महिला संगठन की संयोजक छायाखोब्रागडे इसे एक विभाजनकारी और महिला विरोधी कदम बता रहे हैं.’ हालांकि स्त्रीकाल से बातचीत करते हुए रिपब्लिकन नेता और भारत सरकार के सामाजिक कल्याण राज्य मंत्री रामदास आठवले कहते हैं कि ‘इसकी मांग समाज के भीतर से ही हो रही है. यह मांग पुरानी है.’ जबकि उनकी ही पार्टी के एक नेता अविनाश महत्कर इस पहल की अपेक्षा करते हुए भी  कहते हैं कि ‘तलाक, मेंटेनेंस, निबंधन, अंतरजातीय विवाह, संपत्ति के मसले आदि के प्रावधान के बिना यह कानून अधूरा है. हालांकि कानून के समर्थक विवाह पद्धति के अलावा ‘तलाक, मेंटेनेंस, निबंधन, अंतरजातीय विवाह, संपत्ति के मामले में हिन्दू कानून के अनुसार आचरण की बात कहते हैं. यह निस्संदेह एक विरोधाभासी स्टैंड है.  कुछ वकीलों के अनुसार इस कानून के बाद अदालती मामले बढ़ेंगे.

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रमणिका फाउण्डेशन का मासिक रचना मंच: हीरालाल राजस्थानी, अनिल गंगल और रानी कुमारी का रचना-पाठ

स्त्रीकाल डेस्क 
रमणिका फाउण्डेशन व आल इण्डिया ट्राईवल लिटररी फोरम के तत्वाधान में प्रत्येक माह के दूसरे शनिवार होने वाली साहित्यिक गोष्ठी में इस बार वरिष्ठ कवि अनिल गंगल के नये कविता संग्रह ‘कोई क्षमा नहीं’ का लोकार्पण हुआ। समकालीन हिन्दी कविता के महत्वपूर्ण कवि अनिल गंगल का यह चौथा कविता संग्रह है। उन्होंने अपनी कविताओं का पाठ किया।

दलित लेखक संघ के अध्यक्ष हीरालाल राजस्थानी अपनी कहानी ‘व्यतिरेक’ का पाठ किया। इस कहानी में अंतरजातीय विवाह तथा संवैधानिक तरीके से कोर्ट मैरिज पर कथानक बुना गया है। युवा कवयित्री रानी कुमारी ने भारतीय समाज में स्त्रियों की पर कविताओं का पाठ किया। ‘बीस साल की बूढ़ी लड़की’, ‘गैसबर्नर-सी औरतें’ तथा ‘छोटा भाई’ कविताओं का पाठ किया।

अनिल गंगल की कविताओं पर परिचर्चा करते हुए कवि एवं आलोचक संजीव कौशल ने कहा कि छन्द को तोड़कर जो कविता कही गयी वह कितना कुछ ख़ास कह पाती हैं, यह महत्वपूर्ण है। गद्य कविता की परम्परा से जोड़ते हुए कहा कि अनिल गंगल की कविता युद्ध की तरह हमारे भीतर उतर जाती है। आइडियोलॉजी कविताओं को निखारती हैं। ‘घर’ कविता में ‘गर्माहट’ के बिना घर नहीं बन सकता। गंगल जी पॉलिटिकली अवेयर कवि हैं, इतना कि विचार कविता को ग्रिप में ले लेता है। यह माँ-बेटे की सम्वेदना तथा पति-पत्नी का वैचारिक सम्बन्ध है।‘धागा’ में बारीक़ बुनाई है। इसमें बारीक़ धागा सम्भ्रान्त वर्ग का प्रतीक तथा मोटा धागा मज़दूर धागा का प्रतीक है। ‘तुमने मुझे कॉमरेड कहा’ में स्पष्ट होता है कि इन शब्दों से आज भी कोई जुड़ा हुआ है। गंगल जी चाहते हैं कि कवि मज़दूरों के बीच जाए।  ‘पिता का कोट’ में कोट के छेद तो दिख जाते हैं, परेशानियों के नहीं दिखते।

परिचर्चा में कवि एवं आलोचक जगदीश जैन्ड ‘पंकज’ जैंड ने कहा कि अनिल गंगल की कविता समय व समाज पर तीख़ी प्रतिक्रिया हैं। वैचारिकी में प्रतिबद्ध होकर भी समय के सवालों से टकराती है अनिल की कविता। ‘गुलामी’ इसका सबसे सशक्त उदाहरण है।

हीरालाल राजस्थानी की कहानी पर टिप्पणी करते हुए बजरंग बिहारी तिवारी ने कहा कि हीरालाल राजस्थानी अपनी कहानी में संभावना तलाशते हैं। वे आकांक्षा के रचनाकार हैं जो संघर्ष से गुजरकर इस मुक़ाम पर पहुँची पीढ़ी का मुख्य स्वर है। आंबेडकर के ‘जाति का ख़ात्मा’ की संभाव्यता की कहानी है ‘व्यतिरेक’. रानी कुमारी की कविताओं पर बात करते हुए उन्होंने तीन पीढ़ियों की चर्चा की। विमर्शपरक, विचारपरक और जीवनपरक काव्य-दृष्टियों के परिदृश्य में रानी कुमारी जीवनपरक रचनाकार हैं। दलित स्त्रीवादी कविता पर अपने विचार व्यक्त करते हुए बजरंग बिहारी तिवारी ने रानी कुमारी की कविताओं को संक्षोभ से जोड़ा।

इस अवसर पर दिल्ली विवि के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. हरिमोहन शर्मा भी उपस्थित रहे। कार्यक्रम पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि इसमें अनिल गंगल की कविता पर चर्चा की गयी जिसमें वंचित-दलित लोगों की भी कोई मानवीय गरिमा होती है– इसके जहाँ-तहाँ संकेत इनकी कविताओं में मिलते हैं। हीरालाल राजस्थानी की कहानी समाज के शिक्षित लोगों से दृष्टि-परिवर्तन का आह्वान है। वे अन्धविश्वास-रूढ़ियों को धता बताकर आगे बढ़ने की चर्चा की गयी है। युवा कवयित्री रानी कुमारी की कविता अपने आसपास की ज़िन्दगी से बुनी गयी हैं जिसमें विचार है, विरोध है, आगे बढ़ने की सम्भावना है। इन पर की गयी टिप्पणियाँ सार्थक विचार-विमर्श को जन्म देती हैं ।

अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए रमणिका फाउंडेशन की अध्यक्ष रमणिका गुप्ता ने कहा कि यह कार्यक्रम महीने के हर दूसरे शनिवार को होता है — हमारा उद्देश्य है एक ऐसा मंच बनाना जिस पर कवि-कहानीकार, नाटककार या विचारक– नए-पुराने दोनों ही साहित्य के माध्यम से समय के साथ मुँह-दुह होते हुए– साहित्य को एक दिशा देते हुए विभेदपूर्ण दृष्टिकोण बदलने और नया दृष्टिकोण बनाने की भूमिका निभाएं।

उन्होंने कहा साहित्य स्वान्तःसुखाय नहीं– साहित्य एक लक्ष्य लेकर चलता है। इसे भी हम प्रस्थापित करना चाहते हैं। आज का समय बहुत ख़तरनाक है– इसलिए ऐसी गोष्ठियां एक भूमिका अदा कर सकती हैं– प्रेरणाजनक सृजन के माध्यम से। वंचित समाज, वर्जित समाज व नये सृजकों को हम विशेष ध्यान देते हैं, उनके साथ प्रतिष्ठित लेखकों को भी बुलाते हैं ताकि वे दिशा दे सकें–और नये लेखक मंच पा सके।

मंच सञ्चालन टेकचन्द ने किया। 

 
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