रंगकर्मियों से बलात्कार : क्या बलात्कारी पीड़िता को खुद सही-सलामत वापस छोड़ते हैं? आदिवासी अधिकार की प्रवक्ता दयामनी बारला ने उठाये ऐसे कई सवाल


विक्रम कुमार 
रांची के खूंटी जिले के कोचांग में नुक्कड़ नाटक करने गयीं रंकर्मियों के साथ बलात्कार की घटना ने रंगकर्म की दुनिया और देश को हिला दिया है. एक ओर पुलिस इस घटना को उस इलाके में आदिवासियों के पत्थलगड़ी आन्दोलन के नेताओं से जोड़ रही है, उसके समर्थकों को बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार कर रही है तो दूसरी ओर देश भर में रंगकर्मी इसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. लेकिन आदिवासी अधिकार और मुद्दों के लिए निरंतर संघर्ष करने वाली और उसपर मुखर रही दयामनी बारला इस घटना में पीड़िताओं को वास्तविक न्याय न मिलने की आशंका जता रही हैं और बलात्कार के मामले में पुलिस की थेयरी पर सवाल उठा रही हैं. घटना स्थल से लौटकर दयामनी बारला ने स्त्रीकाल से बातचीत की और उठाये ये सवाल:


कोचांग का वह स्कूल जहाँ लडकियां नुक्कड़ नाटक करने गयी थीं


पिछले उन्नीस जून को कोचांग के एक मिशनरी स्कूल में गयी 5 रंगकर्मियों को बताया जाता है कि कुछ लोग जंगल में उठा कर ले गये और उनके साथ बलात्कार किया. पुलिस के अनुसार उस इलाके में उनके आने से नाराज पत्थलगड़ी के समर्थकों ने इस घटना को अंजाम दिया है. बलात्कार के बाद पीड़िताओं को वापस वहीं छोड़ दिया गया जहाँ से वे ले जाई गयी थीं. मामला प्रकाश में आने के दौरान दयामनी बारला हैदराबाद में एक कार्यक्रम में शिरकत के लिए गयी थीं वहां से रांची लौटकर वे कुछ और सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ कोचांग के घटनास्थल पर गयीं.

दयामनी बताती हैं कि वहां के लोग काफ़ी डरे हुए हैं और कोई मुंह नहीं खोल रहा है. लेकिन दबी जुबान से कुछ तथ्य सामने रखते हैं. मसलन कोई नुक्कड़ नाटक की संचालक संस्था के निदेशक पर सवाल क्यों खड़े नहीं कर रहा है? पुलिस के अनुसार नुक्कड़ नाटक की जानकारी पुलिस को नहीं थी और उसके आयोजन की अनुमति नहीं ली गयी थी. दयामनी सवाल करती हैं कि नाटक कराने वाली संस्था सरकारी अनुदान पर उनके साथ मिलकर नाटक कराती है, आखिर ऐसा क्यों हुआ कि कोचांग जैसे तनावग्रस्त इलाके में वह बिना पुलिस को सूचना दिये पांच लड़कियों को नाटक के लिए लेकर जाती है?

पढ़ें : आदिवासियों का पत्थलगड़ी आंदोलन: संघ हुआ बेचैन, डैमेज कंट्रोल को आगे आये भागवत

दयामनी बारला
कौन हैं असली अपराधी? 

पुलिस की थेयरी के अनुसार फादर अल्फोंस के कहने पर दो ननों को छोड़ दिया गया और पीड़िताओं को ले जाते वक्त फादर ने कहा कि ‘कुछ नहीं होगा वे तुम्हें छोड़ देंगे.’ इसपर दयामनी सवाल उठाती हैं कि ‘आखिर फ़ादर ही क्यों, लड़कियों के साथ उस संस्था का संचालक भी वहां था, उसने लड़कियों को क्यों नहीं रोका?’ वे आश्चर्य प्रकट करते हुए कहती हैं कि ‘ यह शायद पहली घटना होगी जिसमें लड़कियों को जंगल में ले जाकर गैंगरेप किया जाता है और उन्हें पुनः वापस उसी जगह छोड़ दिया जाता है, जहाँ से वे उठाकर ले जाई गयी थीं. क्या अपराधी पहले भी ऐसा करते रहे हैं.?

दयामनी कहती हैं ‘जरूरत है कि इस घटना के असली अपराधियों को सजा मिले. सजा दिलाने से ज्यादा पुलिस का यकीन इस मामले को पत्थल गड़ी आन्दोलन से जोड़ने में है.’ उनके अनुसार ‘पीड़िताओं के नाम और उनके परिवार का नाम काफी गुप्त रखा जा रहा है, जिसके कारण उनसे मिलकर घटना की वास्तविकता को समझना संभव नहीं हो रहा है. अभी तक नाटक- संचालक पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है, वह इस मामले में एक जिम्मेवार है लेकिन वह खुद ही विक्टिम बन गया है. वह सरकारी प्रोजेक्ट पर नुक्कड़ नाटक करता है, वह फादर के बारे में बयान दे रहा है और खुद विक्टिम बना है, जबकि वह सरकारी प्रोजेक्ट करता है तो उसे उसकी जिम्मेवारियां तो पता ही होंगी. उसकी संस्था का नाम भी इस मामले में सामने नहीं आ रहा है. जबकि मामले को अलग मोड़ देते हुए स्कूल के फादर को गिरफ्तार किया गया है.. दयामनी कहती हैं ‘असली साजिशकर्ता असली अपराधी को गिरफ्तार होना चाहिए.’

वे आगे कहती हैं ‘सवाल यह भी है कि सरकार ने जगह-जगह सीआरपीऍफ़ बैठा रखा और संवेदनशील इलाके में उससे ही अनुदान प्राप्त लोग नाटक करने आ रहे हैं और उसे ही नहीं पता है कि इस इलाके में कौन, क्यों और कब आ रहा है? ऐसे सवालों को बाईपास करके चले जाने से न्याय तो होगा नहीं उथल-पुथल जरूर हो जाएगा. आपको जिन्हें गिरफ्तार करना उन्हें गिरफ्तार कर नहीं रहे.’

खूंटी और कोचांग के इलाके में सवाल और भी तैर रहे हैं. इस घटना को अंजाम देने में पीप्लस लिबरेशन फ्रंट ऑफ़ इंडिया (पीएलएफआई) का नाम आ रहा है. लोग सवाल कर रहे हैं कि इस संगठन के सरकारी कनेक्शन पर भी लोगों की राय अलग-अलग रही है. इसकी भूमिका पर भी संदेह है. वही लोग छत्तीसगढ़ में संघ की बैठक, उसमें संघ प्रमुख का आना और पत्थलगड़ी पर बयान देना तथा फिर सरकार की कार्रवाइयों में या ऐसी घटनाओं में तेजी में भी कोई सूत्र देख रहे हैं. दयामनी कहती हैं कि ‘संघ हो या भाजपा उनसे सवाल है कि यदि पत्थलगड़ी जैसे आन्दोलन इस इलाके में हो रहे हैं तो उनके लोग जनता से संवाद क्यों नहीं बनाते. उनका संगठन, सांसदों, विधायकों के प्रतिनिधि, सरकारी अमले इस इलाके में काम कर रहे हैं तो वे संवाद क्यों नहीं बनाते, दमन और बलप्रयोग की जगह. अखबारों में खबरे प्लांट हो रही है कि एसपी, डीएसपी सडक पर सो रहे हैं, तो सवाल है कि आप इतने क्रांतिकारी हैं तो आज झारखंड जल क्यों रहा है? सवाल यह भी उठ रहा है कि पुलिस के अनुसार पीड़िताओं के गुप्तांगों में लकड़ी डाली गयी. फिर जब वे वापस सामान्य कंडिशन में कैसे वापस आयीं? नाटक की संस्था के संचालक के अनुसार वह उन्हें उस वक्त थोड़ा असहज देख रहा था तो सवाल है कि गैंगरेप के ऐसे मामलों में थोड़ी असहजता भर ही होती है? संचालक ने तुरत पुलिस को क्यों नहीं बुलाया?

 बलात्कार की सरकारी-संघी रणनीति (!)

राजधानी में विरोध प्रदर्शन 

उधर देश की राजधानी दिल्ली में विकल्प साझा मंच के तहत रंगकर्मियों ने इस घटना का व्यापक विरोध किया और 2 जुलाई को मंडी हाउस से झारखंड भवन तक मार्च का ऐलान किया. रंगकर्मियों ने जारी एक विज्ञप्ति में कहा कि कोचांग, झारखंड में नुक्कड़ नाटक करने गयीं पांच महिला कलाकारों के सामूहिक बलात्कार के दोषियों को तुरंत गिरफ़्तार करने और राज्य की भाजपा सरकार द्वारा यौन हिंसा का राजनीतिक इस्तेमाल बंद करने की हमारी मांग है.

26 जून को नेशनल ब्लैक डे या आपातकाल विरोधी दिवस को याद करते हुए हाल के वर्षों में देश में नफ़रत, हिंसा और फ़ासीवाद के बढ़ते ख़ूनी आतंक की रंगकर्मियों ने एक स्वर से निन्दा की और कहा कि आज देश में आपातकाल से भी बुरे हालात हैं, जहां सरकार मुट्ठी भर कारपोरेट पूंजीपतियों को असीमित फ़ायदा पहुंचाने के लिये जनता के जनतांत्रिक अधिकारों को बेशर्मी के साथ कुचल रही है। उन्होंने देश के तमाम संस्कृतिकर्मियों, कलाकारों और अमन-पसंद नागरिकों से यह अपील की कि वे अपनी चुप्पी तोड़ें और समाज-विरोधी ताक़तों का आगे बढ़ कर मुक़ाबला करें।
पत्थलगड़ी


इस अवसर पर संगवारी और अस्मिता थियेटर के कलाकारों ने प्रतिरोध के दर्जनों जनगीत प्रस्तुत किये। अस्मिता के कलाकारों ने यौन हिंसा के ख़िलाफ़ अपने बहुचर्चित नाटक 'दस्तक' की प्रस्तुति भी की। बड़ी संख्या में आयोजन में शिरक़त कर रहे कलाकारों और दर्शकों ने भी नारों और जनगीतों की प्रस्तुति में सक्रिय रूप से भाग लिया। कार्यक्रम के अंत में कलाकारों से संवाद के क्रम में अधिकतर दर्शकों ने यह स्वीकार किया कि देश सचमुच एक भयावह दौर से गुज़र रहा है, जब अपराधियों के गिरोह सड़कों पर राष्ट्रभक्ति के नारे लगाते घूम रहे हैं और वे विरोध की हर आवाज़ को कुचल देना चाहते हैं। दलितों, आदिवासियों और छात्रों के ख़िलाफ़ राज्य ने एक अघोषित युद्ध छेड़ रखा है और सत्ता में बैठे मंत्रियों-नेताओं द्वारा किसानों की आत्महत्याओं तक का मखौल उड़ाया जा रहा है। लेखकों, पत्रकारों, जजों और विचारकों को धमकाया जा रहा है और उनकी हत्या तक कर दी जाती है। हत्यारे बेख़ौफ़ हैं क्योंकि उन्हें सरकार का समर्थन प्राप्त है। ऐसे में हर अन्याय के ख़िलाफ़ बोलना और आवाज़ उठाना बेहद ज़रूरी है।

विकल्प साझा मंच की तरफ़ से कार्यक्रम का संचालन कर रहे राजेश चन्द्र ने यह भी बताया कि कोचांग में महिला कलाकारों के सामूहिक बलात्कार के दोषियों की तुरंत गिरफ़्तारी और पीड़ितों को न्याय मिलने तक यह प्रतिरोध ज़ारी रहेगा। इस क्रम में आगामी 2 जुलाई (सोमवार) को मंडी हाउस से लेकर झारखंड भवन तक कलाकारों द्वारा एक बाइक मार्च निकाला जायेगा। झारखंड भवन पर दोपहर के 2 बजे एक शान्तिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन का आयोजन है, जिसके बाद रंगकर्मी झारखंड सरकार के नाम एक ज्ञापन भी सौंपेंगे। उन्होंने दिल्ली के रंगकर्मियों, कलाकारों और नागरिकों से अपील की कि वे 2 जुलाई के प्रदर्शन में भी अवश्य शामिल हों।

विक्रम  कुमार फ्रीलांस पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट हैं.

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह 'द मार्जिनलाइज्ड' नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. 'द मार्जिनलाइज्ड' मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 

'द मार्जिनलाइज्ड' के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 


संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com
Blogger द्वारा संचालित.