घृणित विचारों और कृत्यों वाले पत्रकार की आत्मप्रशस्ति है यह, आत्मभंजन नहीं मिस्टर जोशी

श्वेता यादव
सामाजिक कार्यकर्ता, समसामयिक विषयों पर लिखती हैं. संपर्क :yasweta@gmail.com

पिछले दिनों एक किताब हाथ आई, नाम है “मैं बोनसाई अपने समय का” लेखक हैं रामशरण जोशी. अब इस नाम से तो सब अच्छे से परिचित हैं इसलिए बात उसके आगे की. हुआ यह कि जैसे ही यह किताब हाथ आई मुझे नवम्बर 2004 के हंस का वह अंक याद आया जिसमें लेखक साहब का लिखा “मेरे विश्वासघात” दो भागों में प्रकाशित हुआ था. अब चूँकि लेखकों से हम जैसे पाठक ईमानदारी की उम्मीद रखते हैं खासकर तब जब लेखक खुद ही कह रहा हो “एक कथा आत्मभंजन की” तब तो और भी ज्यादा लिहाजा हमने किताब पलटनी शुरू की इस उम्मीद से कि आदिवासी लड़कियों की जो खरीद-फरोख्त अपने समय में लेखक साहब ने की थी और जिसे हंस के अंक में खुद स्वीकारा भी है उसका जिक्र भी लेखक ने किया ही होगा. लेकिन मुझे हैरानी इस बात पर हुई कि रामशरण जोशी जी ने बड़ी खूबसूरती से अपने करम किताब में छिपा लिए लेकिन उन लोगों पर पन्ने काले करना नहीं भूले जिन्होंने उस वक्त इनका इस महान काम के चलते विरोध किया था. हालांकि पहली आपत्ति तो मुझे इस किताब के नाम से ही है लेकिन इस पर चर्चा अगले लेख में करुँगी.

यूँ तो उस समय हंस में छपे दो भागों के लेख में इतना कुछ है, कि लिखा जाए तो एक-एक मुद्दे पर अलग से लेख लिखना पड़ जाए लेकिन मैं कोशिश करुँगी की इस लेख को अहम् मुद्दे पर ही केन्द्रित रख सकूँ. अहम् मुद्दा जिसने मुझे सबसे ज्यादा परेशान किया वह है आदिवासी लड़कियों के साथ रामशरण जोशी और उनके साथ जुड़े तमाम लोगों का व्यवहार. कोई भी सभ्य समाज औरतों के प्रति हो रही किसी भी तरह की हिंसा का विरोध करता है लेकिन व्यवहार में कितना अपना पाता है यह देखने और स्टडी का विषय हो सकता है. रामशरण जोशी जी मैं आपके कामों और हाल फिलहाल आये एक भाजपा नेत्री के बयानों को मिला कर देखती हूँ तो मुझे लगता है कि आप में और उसमें ज्यादा अंतर नहीं हैं. जहाँ वह एक व्यक्तव्य देती है कि ‘आदिवासी लड़कियां वेश्यावृति में शामिल हैं. बल्कि मुझे वह आपसे ज्यादा सभ्य नज़र आती है क्योंकि किसी को वेश्या कह देना और किसी को वेश्यावृति के लिए खरीद लेना दोनों बहुत ही अलहदा चीजें हैं. जो बयान आया वह कम दुखद नहीं है लेकिन जो आपने किया वह अपराध है. देखा जाए तो आपको सज़ा होनी चाहिए जेल में होना चाहिए आप जैसे सो काल्ड प्रोग्रेसिव को. हालांकि अगर मुझसे पूछा जाये तो मैं कहूँगी आप निरे  जाहिल और गवांर हैं जी हाँ एकदम होश में कह रही हूँ कि आप जाहिल हैं आपने जाहिलियत  की हर सीमा पार कर दी है. अपने आपको आदिवासियों का हितैषी कहने वाले को आखिर क्यों शर्म नहीं आई आदिवासी औरतों को खरीदते वक्त. माँ की छातियों से टपकते दूध ने आपको इतने अपराधबोध से क्यों नहीं भर दिया कि आप डूब मरते. ऐसा कृत्य करने के बाद भी आप लिखते हैं कि आपको नींद आ गई ... कैसे रामशरण जोशी कैसे??

पढ़ें : लेखकीय नैतिकता और पाठकों से विश्वासघात!

साहित्यकारों के साथ रामशरण जोशी तस्वीर में नंदकिशोर आचार्य, कमला प्रसाद, नन्द भारद्वाज भी दिख रहे हैं


आप सुखदा से मिलने वेटिंग रूम में बैठते हैं तब भी आप उसकी देह में मांसलता निहार रहे होते हैं क्यों?? कभी जो प्रेम रहा वह क्यों खोज नहीं पाते आप? क्योंकि आपके लिए स्त्री मन है ही नहीं वह सिर्फ देह है कभी लखनपाल तो कभी शिकार तो कभी झुंड. आपने उसे सिर्फ अपनी गन्दी नज़रों से तौला जम कर तौला. घिन मच रही थी आपको तब भी पढ़ कर और आज भी.

एक जगह आप लिखते हैं, आपके ही शब्दों को कोट कर रही हूँ

‘तू चुप रह. देखता जा. रात भर के बीस रुपए लगेंगे. शेयर कर लेंगे.’’ मित्र इस अधिकार के साथ बोला मानो मेरी सहमति उसने मुझसे पहले से ही ले रखी हो! सच्चाई यह थी कि इस संबंध में कोई चर्चा नहीं हुई थी. तय यह हुआ था कि दोनों साथ-साथ बैठेंगे. पीएंगे, पिलाएंगे. एक-दूसरे के दुख-दर्द शेयर करेंगे. क्योंकि वह प्रेम में चोट खाया हुआ था. सभी से, और चारों ओर से. ‘रिजेक्टेड’ माल की तरह वह दिल्ली-रायपुर-जगदलपुर के बीच भटकता फिर रहा था. कहीं भी उसे न कूचा मिला, न चैन. बस! गलियां मिलीं, पीड़ाओं से भरी हुईं. देवदास बन गया था, मेरा यार. शराब और शबाब में शरण लेने लगा. रिसर्च के प्रोजेक्ट कबाड़ लेता. आदिवासी क्षेत्रों में घुस जाता. रिसर्च भी करता और अपना फर्सट्रेशन भी कम करता. आज मैं उसके हत्थे थारात आधी बीत चुकी थी. चूंकि वीआईपी एरिया था इसलिए पुलिस की गश्त बढ़ गई थी. मैं भाग भी नहीं सकता था. अंततः तय किया कि मुझे इसी कमरे में रात बितानी चाहिए, और होनी या अनहोनी सभी का गवाह बनना चाहिए. मैं अपने पलंग में धंस गया अब वह औरत मेरे पास आकर लेट गई है. वह बीच में बाथरूम गई थी. उसने धोती बांध ली थी. हम दोनों चुपचाप पड़े हैं. कोई हरकत नहीं है. ऐसा चल रहा है पर मैं पसीने से तरबतर हूं. मेरे लिए यह अनुभव बिल्कुल नया है, ऐसा मैं नहीं कहता. लेकिन जगदलपुर में मेरे लिए यह दृश्य नितांत नया था. विशेष रूप से सुखदा के साथ रागात्मक व भावात्मक संबंध बनने के पश्चात्
इस स्थिति से गुज़रना निश्चित ही अजीबो-गरीब एहसास था. मुझे एक बारगी लगा मुझे चांद की सतह से सीधे रसातल में फेंका जा रहा है. मैं खामोशी के साथ बग़ैर किसी प्रतिवाद के इस नियति को स्वीकार करता जा रहा हूं. मैं बेहद कमज़ोर हो चला था. अब निजात का कोई रास्ता बचा नहीं था. मैंने तयशुदा राशि से पांच रुपए अधिक दिए. वह पलंग पर मेरे साथ क़रीब एक-डेढ़ घंटा बिताकर भोर में कमरे से खिसक गई. मित्र-सांड के खर्राटों और मेरे पाप-बोध के आघातों से कमरा भरा हुआ था. इसमें खर्राटे जेनुइन थे या आघात, यह कहना मुश्किल था. बस! मैं पलंग पर लस्त पड़ा दिन चढ़े तक सोता रहा.

इस पूरे कृत्य के दौरान लेखक लिखते हैं कि वह अपराधबोध से गुजर रहे थे .. उनको फलाना हो रहा था ढिमकाना हो रहा था.. लेकिन मजेदार बात यह है कि मित्र और आदिवासी महिला के साँसों की टकराहट तक महोदय को याद रह जाती है. लेखक महोदय बड़े दुःख के साथ आपको बताना चाहती हूँ कि आपके शब्द आपसे दगा कर गए हैं आपके शब्दों ने ही आपकी मक्कारी को बयान कर दिया है. आपका मित्र जब आदिवासी महिला को इतना बेइज्जत कर रहा था तब आपने विरोध क्यों नहीं किया आप ऊँची आवाज़ में चुप करा सकते थे. उससे भी बढ़ कर आप इस पाप के भागी न बनते बिना साथ सोए ही आप उस महिला की आर्थिक मदद कर देते लेकिन नहीं जैसा कि आपने खुद स्वीकार किया है कि आपकी मर्दानगी ने मुहं उठा लिया था, इसलिए मुहं मारने से आप अपने आप को रोक नहीं सके. जब से पढ़ा है तब से सोच रही हूँ कि अगर किस को अपराधबोध हो जाए कोई बात चुभ जाए तो वह दिन चढ़े तक सो कैसे सकता है लेखक साहब की माने तो उनका अपराधबोध आदिवासी महिला को रौंदने के बाद इतना बढ़ गया था कि वह दिन चढ़े तक सोते रहे. मेरे लिए यह समझना बड़ा ही मुश्किल है कि अपराध के आघात बोध में डूबा हुआ इंसान दिन चढ़े तक सो कैसे सकता है.. मुझ कम अक्ल को यह बात समझ में नहीं आई यह वही इंसान कर सकता है जो बेहद ढीट हो और जिसके लिए जिस्म सिर्फ मांस का लोथड़ा हो और कुछ नहीं ... तो जोशी जी यह आघात वाली बात आप दफा ही कर दिए होते तो अच्छा रहा होता वो क्या है न कि आप के कृत्यों को आपके शब्द जस्टिफाई नहीं कर पा रहे हैं. इससे आप और ज्यादा नंगे हो गए हैं.

आगे आप की ही जुबानी आप लिखते हैं कि इस घटना के बाद की घटनाएं आपको विचलित नहीं करा सकीं अलबत्ता आप आगे की  घटनाओं को फन के रूप में लेते रहे ... फिर वही बात देखिये कैसे अपनी ही बातों में उलझते जा रहे हैं आप ... जिस व्यक्ति ने पहले कहा कि उसे ऐसे काम से आत्मग्लानि हुई पैरा बदलने के साथ ही वही व्यक्ति उसी तरह की घटनाओं को फन के रूप में लेने लगता है अब आप ही कहिये अगर मैं इसे आपका दोगलापन न कहूँ तो क्यों न कहूँ?

हमेशा यह पुरुषों के साथ ही क्यों होता आया है कि एक प्रेम में विफल होने के बाद या ठुकराए जाने के बाद दूसरी औरतों को खेल समझ लेते हैं उन्हें सिर्फ देह के रूप में इस्तेमाल पर उतर आते हैं अक्सर ऐसा उन लोगों को भी करते देखा है जो स्त्री चिंतन को लेकर काफी मुखर भी रहे हैं यह क्या है नियति या फिर द्वेष जो भी है मेरी समझ के लगभग परे है.. अगर यह नियति है तो पुरुषों के साथ-साथ स्त्रियों में भी यह गुण या अवगुण होने चाहिए अगर ऐसा नहीं है तो क्या फिर पुरुषवादी मानसिकता के तहत आने वाले विचार को सही मान लिया जाए कि प्रकृति ने स्वयं ही स्त्री पुरुष के भेद को बरकरार रखा है? प्रकृति ने स्त्री को पुरुष से कमजोर बनाया है?
दंतेवाडा की श्रमशील स्त्रियाँ 

एक बात तो स्पष्ट है पूरे लेख में एक चीज जो कई बार आई वह है 'या तो पुलिस मुझे चांप लेगी या फिर खुद की छवि के बदनाम होने का डर .. ' मानना पड़ेगा आपको पत्रकार महोदय की आप डरे भी रहे और सारे  काण्ड भी किये आपने .. माफ़ करिए भाषा की मर्यादा आपने कहीं रखी ही नहीं तो मुझसे भी उम्मीद बेमानी ही है. यह चांप लेगी, चांप देंगे तुमको, यह कितनी जहीन भाषा है भाषा के मर्म के हिसाब से हम आपको समझाए तो यह औकात से बाहर जाने वाली बात हो जायेगी... है ना! आप ठहरे बड़े नामी पत्रकार हम पिद्दी सी लड़की जो पत्रकारिता में अभी भी कह लीजिये संघर्ष ही कर रही है... हमारी आपकी तुलना अपने आपमें ही बेमानी है... आपके लेख, आपकी कथनी-करनी और आपकी भाषा को अगर लेखक तबका और यह समाज पचा सकता है ख़ुशी ख़ुशी.. तो मुझे तो यह छूट बिना शक मिलनी चाहिए..

एक सवाल जो इन सब बातों के बीच मेरे जेहन में लगातार कौंधता रहा वह है, क्या लेखक महोदय को यह ज्ञात नही है या था, कि बड़े ही सुनियोजित तरीके से आदिवासी लड़कियों और महिलाओं को वेश्यावृत्ति के लिए मजबूर किया जा रहा है? जिनके जीवन से जीने की मूलभूत सुविधाओं को भी ख़तम किया जा रहा हो जिन्हें अपराधी घोषित किया जा रहा हो, जिन्हें नक्सली बोल कर झूठे केस में फंसाया जा रहा हो.. उनकी महिलाओं को परिवार चलाने के लिए किस दुर्गति से गुजरना पड़ रहा होगा क्या यह समझना क्या इतना कठिन था? वह भी एक ऐसे व्यक्ति के लिए जिसके बारे में मुनादी यह हो कि उसने आदिवासियों के लिए काम किया है. सोच रही हूँ अपने आपको मार्क्सवादी कहने वाला यह आदमी आदिवासियों के दर्द की कहने लिखने गया था, राज्य के दमनचक्र को उजागर करने गया था और खुद क्या करके आया आदिवासियों की ही महिलाओं, लड़कियों का बलात्कार .... यह बलात्कार ही है शुद्ध बलात्कार .. आप चाहे जो भी कहते रहिये इसे मेरे लिए यह बलात्कार है.

बात करते करते वहां भी अपनी असहमति दर्ज करती चलूँ जहाँ मैत्रेयी जी का जिक्र आया है.. कुछ श्रृंगार की बात है. क्या मैत्रेयी पुष्पा की आत्म स्वीकृति ही अंतिम सत्य हो सकती है दुनिया के तमाम स्त्रियों के चरित्र निर्धारण की. श्रृंगार एक बाह्य कारण हो सकता है लेकिन वह रिझाने के लिए ही किया जाता है यह कहना कहाँ तक उचित है? क्या यह ठीक वैसी ही उपमा न मानी जाए जैसे मर्दों के लिए कहा जाता है कि अमूमन आदमी कुत्ता ही होता है या फिर आदमी ठरकी ही होते हैं अगर इस बात का विरोध किया जाता है तो फिर उसी लिहाज़ से इस व्यक्तव्य की भी आलोचना होनी चाहिए... जाती रही होंगी मैत्रयी जी सज कर हंस के ऑफिस यह उनकी इच्छा और सोच... खुदा के लिए इसे सभी स्त्रियों पर लागू न करें तो बेहतर!

रामशरण जोशी जी आगे लिखते हैं- मैं लूसी को लेकर निरंतर द्वंद्वों में उलझता  जा रहा था. ‘क्या मैं इसके साथ अपना जीवन निभा सकूंगा?’ ‘क्या यह मेरी गंवई व मामूली साक्षर मां के साथ अपनी पटरी बैठा सकेगी?’, ‘घर का ख़र्च कैसे चलेगा?’, ‘यह एक तेज़ तर्रार लड़की है और संपन्न परिवार से है जबकि मैं मामूली व ग्रामीण पृष्ठभूमि से हूं?’, ‘क्या मैं इसकी उन्मुक्त जीवन शैली व मित्रों को सहन कर पाऊंगा?’‘अभी सुखदा से संबंध टूटे नहीं हैं. क्या लूसी के साथ विवाह उसके साथ विश्वासघात नहीं होगा?’ ‘यदि यह मुझे जर्मनी में बसने के लिए कहेगी तो क्या मैं अपने देश को छोड़ सकूंगा?’ निजी क़िस्म के इन तमाम सवालों से मैं स्वयं जूझता रहता. आधे-अधूरे जवाब भी तलाशता रहता. जहां मैं लूसी से भावनात्मक स्तर पर स्वयं को बेहद जुड़ा पाता था, वहीं यथार्थ के धरातल पर खुद को उससे दूर. ..बहुत दूर पाता. सवाल और जवाब के बीच गहरी खाई नज़र आती. पृष्ठभूमियों की विसंगतियों को दूर करने का रास्ता मुझे सूझ नहीं रहा था




यह एक अजीब द्वन्द भारत के तमाम मर्दों में प्रेम करने से पहले क्यों नहीं आते.. प्रेम से पहले इनको माँ याद नहीं आती जैसे ही प्रेम हो जाता है स्त्री के मन के द्वार ये खोल चुके होते हैं तब इन्हें इनकी बूढी माएं अक्सर याद आ जाया करती हैं यह भारतीय परंपरा है जिसका निर्वहन आज के युवा भी खूब कर रहे हैं... तो इन्हें क्या समझें....जरूरत है अब लड़कियां प्रेम करने से पहले यह समझ लें कि उन्हें लड़के से सबसे पहले क्या पूछना है .. लड़कियों को सबसे पहले यही पूछना है कि बाबूजी घर में पूछ लिए हो न! कि कन्या से प्रेम करने जा रहे हो? उसे शादी के झूठे सपने दिखाने जा रहे हो.. देख लो कहीं सब होने के बाद तुम्हें तुम्हारी बूढी माँ और बीमार पिता जी की चिंता न सताने लगे... क्योंकि माँ-बाप तो सिर्फ तुम्हारे होते हैं लड़कियां तो सर्वथा अनाथ होती हैं ना.. जोशी साहब आपके मामले में तो इस द्वंद ने सारी सीमाएं पार कर दी आप सुखदा के साथ ही थे जब आपको लूसी से प्यार हो गया और आप उस वक्त लूसी और सुखदा दोनों के ही साथ थे जब आपने किसी अन्य से विवाह कर लिया. यहाँ भी आप ठीक न हुए विवाह के उपरान्त जब लूसी आपसे मिलने आती है तो आप बलात उसे चूमने की कोशिश करते हैं जिसे लूसी ठुकरा देती है. आप मानिए या न मानिए लेकिन इन दोनों ही लेखों में आपके अपने ही शब्दों में आप जो साबित हुए हैं वह है सेक्स के प्रति एक कुंठित आदमी. जिसे हर कदम पर औरत सिर्फ देह नजर आई फिर चाहे वह आदिवासी महिलाएं हों या फिर आपकी प्रेमिकाएं.

आपने ही लिखा है कि आप अपने दोस्त के साथ जगदलपुर निकल जाते वहां आदिवासी लड़कियों के दैहिक भूगोल परखते उनकी खरीद  फरोख्त के लिए और उसके बाद तमाम तरह के कमेंट पास करते जैसे कपड़े गंदे हैं, देह मांसल नहीं है, मजा नहीं आएगा, इसकी छातियाँ सपाट हैं तो उसकी ब्रेस्ट पहाड़ियाँ हाथ में नहीं आएँगी, मजा नहीं आएगा वगैरा वगैरा..आप अपने आपको जिस्म का शिकारी बताते हैं और आदिवासी महिलाओं को शिकार .. क्या कहूँ आपको, आपके कुकर्मों को पढ़ते-पढ़ते क्षोभ से भर उठी हूँ मैं.. कोई व्यक्ति इतना नीचे गिर कैसे सकता है? आपको कहीं भी अपराधबोध नहीं हुआ है दरअसल सच्चाई यह है कि आपने यह सारे अपराध अपने पूरे होशो हवास में और मजे में किये हैं. सीधे सीधे कहूँ तो आप पर केस होना चाहिए और आपको जेल में होना चाहिए. दरअसल आप ने आदिवासी महिलाओं के साथ वही किया है जो गली के सोहदे करते हैं लड़कियों के साथ आप ने जो डिसक्रिप्शन दिया है वह ठेले पर बिकने वाले थर्डग्रेड साहित्य से भी गया गुजरा है जिसे पढ़ कर या जिसके गंदे चित्र दिखाकर मनचले अक्सर लड़कियों को राह चलते छेड़ा करते हैं.

कितना अजीब है न आपका दोस्त तो भारत सरकार का अधिकारी है रायपुर में आदिवासी औरत के साथ सोता भी है और उन्हें ऐसी औरतें कह कर भी सम्बोधित करता है ओह आप शायद भूल गए हों तो याद  दिला देती हूँ जब आप पूछते हैं कि ये लखनपाल कौन है तो आपका दोस्त आपको बताता है कि वह “ऐसी” औरतों को लखनपाल कह कर बुलाता है.. अब एक सवाल अगर अपना जिस्म बेचने को मजबूर आदिवासी महिला ऐसी औरत हो गई तो आप जैसा मर्द क्या कहलायेगा? हो सके तो खुद ही सोच कर बता दीजियेगा आप तो वैसे भी कितने मुखर हैं.

लगातार लिखने-पढ़ने वाला तबका भी जब इस तरह की चीजें करता है तो बंटी हुई उम्मीद टूटने लगती है. अपने पेशे की आड़ में जोशी जी आपने जो भी किया वह कोई भी स्त्री किसी भी कारण से जायज़ नहीं ठहरा सकती. स्तब्ध हूँ कोई इतना मानवता विहीन कैसे हो सकता है इसे भी बड़ी विडम्बना ये है कि आप जैसे लोग पत्रकारिता के मानक गढ़ते हैं और पत्रकारिता की नई पीढ़ी के लिए अनुकरणीय माने जाते हैं. जब तक आप जैसे लोग पत्रकारिता में रहेंगे तब तक कम से कम पत्रकारिता का तो कोई भला नहीं होने वाला. मुझे तो लगता है कि किसी संगठन को आगे आकर आपका सार्वजनिक जीवन में बहिष्कार की मुहीम चलाना चाहिए या कानूनी रूप से कार्रवाई सुनिश्चित करवानी चाहिए. आपके इस व्यवहार से स्त्रीवाद के खांचे भी स्पष्ट हुए हैं. आश्चर्य कि आपको बचाने के लिए, जैसा कि आपने लिखा है वृंदा करात के समक्ष आपका पक्ष रखने के लिए कई लेखिकाएं, प्रगतिशील लेखिकाएं सामने आयीं. यही तो स्त्रीवाद और प्रगतिशीलता का सवर्णवाद है. मैं तुलना कर रही हूँ सवर्ण स्त्रीवादियों और प्रगतिशीलों द्वारा आपके  बचाव की और डा. धर्मवीर पर दलित स्त्रीवादियों और प्रगतिशीलों द्वारा हमले की-दोनो दो लोक सा है. फिलहाल तो मैं ही इस सार्वजनिक बहिष्कार का आह्वान करती हूँ.
पुनश्च: स्त्रीवादी लेखक  अरविंद जैन ने अपने एक लेख  (क्लिक कर लेख पढ़ सकते हैं)  माकूल कहा है :
एक सवाल ‘किस हेतु आपने ‘हंस’ का सम्पादन करना शुरू  किया ? का जवाब देते हुए राजेंद्र यादव ने कहा था “अपने समकालीन लेखकों को सामने लाने तथा अन्य नए लेखकों को प्रकाश में लाने हेतु मैंने यह कार्य आरम्भ किया है!मुझे इसमें शान्ति मिलती है!जैसे कुश्ती लड़ने वाला बड़ा पहलवान छोटे-छोटे पहलवानों की कुश्तियां देखकर संतुष्ट होता है!!३९ ‘मेरे विश्वासघाती’ (रामशरण जोशी) की पृष्ठभूमि में, ‘छोटे-छोटे पहलवानों की कुश्तियां’ और ‘बड़े पहलवान’ या ‘बुजुर्ग लेखक’ की सद्भावना समझी जा सकती है !कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि ‘आदमी,बैल और सपने’ लेखक वाले क्रांतिकारी, कामरेड, समाजशास्त्री, लेखक, विचारक द्वारा  स्त्रियों के ‘शिकार’ की ‘गौरवगाथा’ भी पढनी पड़ेगी!किसी संवेदनशील पत्रकार की कलम, स्त्री की अस्मिता को इस तरह और अपमानित करेगी!व्यक्तिगत पापों (अपराधों)का प्रायश्चित भले ही संभव हो, मगर सार्वजनिक पापों का कोई भी प्रायश्चित असंभव है! ‘आधी दुनिया’ऐसे (क्रांतिकारी) नायकों को, न ‘वायदा माफ़ गवाह’ या ‘मुखबिर’ मान सकती है और न ‘संदेह का लाभ’ देकर ‘बाइज्जत बरी’ कर सकती है!

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