महिलाओं द्वारा हासिल प्रगति ही समुदाय की प्रगति: डा. आंबेडकर: महिला आरक्षण बिल, आठवी क़िस्त

महिला आरक्षण को लेकर संसद के दोनो सदनों में कई बार प्रस्ताव लाये गये. 1996 से 2016 तक, 20 सालों में महिला आरक्षण बिल पास होना संभव नहीं हो पाया है. एक बार तो यह राज्यसभा में पास भी हो गया, लेकिन लोकसभा में नहीं हो सका. सदन के पटल पर बिल की प्रतियां फाड़ी गई, इस या उस प्रकार  से बिल रोका गया. संसद के दोनो सदनों में इस बिल को लेकर हुई बहसों को हम स्त्रीकाल के पाठकों के लिए क्रमशः प्रकाशित करेंगे. पहली क़िस्त  में  संयुक्त  मोर्चा सरकार  के  द्वारा  1996 में   पहली बार प्रस्तुत  विधेयक  के  दौरान  हुई  बहस . पहली ही  बहस  से  संसद  में  विधेयक  की  प्रतियां  छीने  जाने  , फाड़े  जाने  की  शुरुआत  हो  गई थी . इसके  तुरत  बाद  1997 में  शरद  यादव  ने  'कोटा  विद  इन  कोटा'  की   सबसे  खराब  पैरवी  की . उन्होंने  कहा  कि ' क्या  आपको  लगता  है  कि ये  पर -कटी , बाल -कटी  महिलायें  हमारी  महिलाओं  की  बात  कर  सकेंगी ! ' हालांकि  पहली   ही  बार  उमा भारती  ने  इस  स्टैंड  की  बेहतरीन  पैरवी  की  थी.  अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद पूजा सिंह और श्रीप्रकाश ने किया है. 
संपादक

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की सौंवी वर्षगांठ ( 8 मार्च 2010) 

 डी. राजा (तमिलनाडु): धन्यवाद महोदय. महोदय,  मेरी पार्टी - भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी - इस ऐतिहासिक कानून के प्रति अपना पूरा समर्थन व्यक्त करती है. इस अवसर पर मैं महिला नेताओं की पंक्ति में मौजूद प्रख्यात सांसदों में से एक कॉमरेड गीता मुखर्जी को अपनी तरफ से लाल सलाम - रेड सैल्यूट – करना पसंद करूंगा, जिन्होंने इस देश में महिला आरक्षण के मुद्दे को समर्थन देने में अग्रणी भूमिका निभाई थी. महोदय, जो यह सम्माननीय सदन आज कर रहा है, वह भारतीय महिलाओं को कुछ दान नहीं दे रहा है, बल्कि देश की निर्णय लेने वाली संस्था में उनका उचित स्थान प्रदान कर रहा है. महोदय, किसी भी समाज के एक सभ्य राष्ट्र के रूप में विकसित होने के लिए जेंडर समानता और महिला सशक्तिकरण मूलभूत आवश्यकताएं हैं. यह एक संविधान संशोधन विधेयक है. आदरणीय सदन में इस विधेयक पर चर्चा कर रहा है. भारतीय संविधान के मुख्य वास्तुकार, डॉ. अम्बेडकर के साथ क्या हुआ है, मैं इस सदन को याद दिलाना चाहूंगा. दलित वर्गों की हजारों महिलाओं के एक समूह को संबोधित करते हुए 18 जुलाई, 1927 को डॉ अम्बेडकर ने कहा था, "मैं महिलाओं द्वारा हासिल की गई प्रगति की डिग्री से ही समुदाय की प्रगति का अंदाज लगाता हूं." डॉ. अम्बेडकर ने यही कहा है. वही डॉ. अम्बेडकर 11 अप्रैल 1947 को हिन्दू कोड बिल लाते हैं. विधेयक पर चर्चा 1951 तक चलती रही. दुर्भाग्य से वह क्रांतिकारी विधेयक पारित नहीं हो सका. बढ़ते विरोध को देखते हुए, तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री जवाहर लाल नेहरू ने बिल छोड़ने का फैसला किया. डॉ. अम्बेडकर इतने निराश हुए कि उन्होंने श्री नेहरू के मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था. इस्तीफा देते वक्त  डॉ. अम्बेडकर ने कहा था, "हिंदू कोड बिल की हत्या कर दी गई और उसे बिना जांचे और गुमनामी में उसे दफन कर दिया गया." महोदय, माननीय प्रधानमंत्री यहां बैठे हैं. मैं प्रधानमंत्री को बताना चाहूंगा कि उनको श्री पंडित जवाहर लाल नेहरू जैसी स्थिति को नहीं स्वीकार करना चाहिए. हमारे प्रधानमंत्री, हमारे पूरे समर्थन के साथ, संसद के दोनों सदनों द्वारा विधेयक पारित करने में सक्षम रहेंगे और जल्द ही यह देश का एक अधिनियम बन जायेगा. इसके अलावा, मैं दो मुद्दों पर बोलना चाहूंगा. पहला मुद्दा है: मैं इस विधेयक का विरोध कर रहे सभी राजनीतिक दलों से अपील करता हूं. वे अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण या आरक्षण के भीतर आरक्षण के सवाल पर विरोध कर रहे हैं. मैं उन्हें बताना चाहूँगा कि तमिलनाडु के माननीय मुख्यमंत्री,  द्रमुक के अध्यक्ष,  श्री करुणानिधि और बिहार के माननीय मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार ने एक समझदारी भरा सुझाव दिया है. उन्होंने कहा है कि विधेयक को पारित होने दें और उन मुद्दों पर बाद में चर्चा की जा सकती है. विरोध करने वाले दलों की यही भावना होनी चाहिए. फिर, महोदय, मैं एक और मुद्दा रखना चाहता हूं. यह अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के आरक्षण का मुद्दा है. विधेयक का कहना है कि पंद्रह वर्षों तक हर पांच साल बाद रोटेशन हो सकता है. अपने जवाब के दौरान माननीय कानून मंत्री,  एक मुद्दे को संबोधित कर सकते हैं और सरकार को आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर विचार करना होगा. वह मुद्दा है -  संविधान अनुच्छेद 334 में संशोधन करना जो अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के आरक्षण से संबंधित है. यह सरकार के सामने एक चुनौती के रूप में दिख सकता है, क्योंकि हर दस साल बाद हम आरक्षण को नवीनीकृत करते हैं. लेकिन, इस ऐतिहासिक कानून को मजबूत करने के लिए, यह अनुच्छेद 334 में कुछ संशोधन की आवश्यकताहो सकती है.


डी. राजा (जारी): अगर कोई विरोधाभास है तो मुझे अच्छा लगेगा कि कोई मुझे सही करे; और, कानूनी विशेषज्ञों से परामर्श किया जाना चाहिए. अन्य मुद्दा है कि मैं कानून को हर बात का अंत नहीं मानता हूं. यह सिर्फ महिलाओं को उनके व्यापक विकास के लिए, उनके राजनीतिक सशक्तिकरण के लिए, उनके आर्थिक सशक्तिकरण के लिए, उनके सांस्कृतिक और सामाजिक सशक्तिकरण के लिए अवसर एवं स्थान देने की शुरुआत है. जेंडर समानता पूरे संसद और पूरे देश का उद्देश्य होनी चाहिए. इन शब्दों के साथ मेरी पार्टी पूरी तरह से इस विधेयक का समर्थन करती है.

उपसभापति: माननीय सदस्य,  अन्य लोगों में,  लगभग सोलह नाम हैं. उनमें से कुछ छोटे दलों ने अपने सभी सदस्यों के नाम दिए हैं. लेकिन, हम केवल एक ही नाम लेगें, प्रत्येक पार्टी से एक नाम लेगें. तो, प्रत्येक सदस्य के लिए केवल तीन मिनट संभव हैं. अब श्री मलीहाबादी! आपके पास केवल तीन मिनट हैं.

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महिला आरक्षण को लेकर संसद में बहस :पहली   क़िस्त

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महिला संगठनों, आंदोलनों ने महिला आरक्षण बिल को ज़िंदा रखा है : वृंदा कारत: पांचवी  क़िस्त


एम. वी. मैसूरा रेड्डी (आंध्र प्रदेश) : श्रीमान उपसभापति महोदय, मैं तेलुगू देशम पार्टी की ओर से बात करने के लिए मौजूद हूं. इस ऐतिहासिक बहस में हिस्सा लेने पर मुझे गर्व है. इसमें कोई शक नहीं है कि महिलाओं को सशक्त बनाना जेंडर असमानता और भेदभाव को दूर करने के एक अनिवार्य उपकरण के रूप में काम करेगा. महात्मा गांधी ने ठीक ही कहा था, "पुरुष की शिक्षा अपने खुद की शिक्षा है, जबकि औरत की शिक्षा समाज की शिक्षा है. मैं दृढ़ता से महसूस करता हूं कि महिला सशक्तिकरण केवल खुद को सशक्त बनाने के लिए नहीं है बल्कि समाज को भी सशक्त बनाने के लिए है." हमारी पार्टी पूरी तरह से,  पूरे दिल से संविधान संशोधन विधेयक का समर्थन करती है, और यह कहना दायरे से बाहर नहीं होगा कि यह तेलुगू देशम पार्टी ही थी जिसने सबसे पहले स्थानीय निकायों महिलाओं के लिए आरक्षण लागू किया था और एनटीआर  आंध्र प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री थे, जिन्होंने 1986 में महिलाओं को संपत्ति का अधिकार दिया था. मैं इस सम्मानित सदन की जानकारी में लाना चाहता हूं कि हमारी पार्टी पिछड़े वर्गों की महिलाओं और अल्पसंख्यक समुदाय के लिए भी आरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है. अगर सरकार आधिकारिक संशोधन भी आगे कदम बढ़ाती है तो हमारी पार्टी उस आधिकारिक संशोधन का समर्थन करेगी. हमारी पार्टी पूरे दिल से इस संविधान संशोधन विधेयक का समर्थन करती है. धन्यवाद.

 माया सिंह (मध्य प्रदेश) : आदरणीय उपसभापति जी, मुझे याद है आज से 22 साल पहले पंचायती राज संस्थाओं के माध्यम से, महिलाएं राजनीतिक क्षेत्र में गांव-गांव तक मज़बूती के साथ उभरकर आएं, इसकी पहल की गई थी और बाद में 1992 में 73वां संविधान संशोधन कर केंद्र सरकार ने पंचायती राज में एक-तिहाई महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की थी.  उस वक्त यह एक क्रांतिकारी पहल थी और इसके माध्यम से महिलाओं का एक नया स्वरूप राजनीति में उभरकर सामने आया. बिहार सरकार ने इसके अच्छे परिणामों  के कारण पंचायतों में महिलाओं का आरक्षण 33 प्रतिशत से बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया और इसका अनुसरण अन्य प्रदेशों ने भी किया, जिसमें मध्य प्रदेश, उत्तराखंड,हिमाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, केरल और गुजरात की राज्य सरकारें शामिल हैं. इस आरक्षण के कारण ही गांवों के स्तर पर एक ओर तो महिलाओं में उम्मीद से ज्यादा जागरूकता पैदा हुई, दूसरी ओर पढ़ी-लिखी और अनपढ़, दोनों ही तरह की महिलाओं की नेतृत्व क्षमता भी सामने उभरकर आई. यह महिलाओं की इच्छाशक्ति और लगनशीलता का प्रतीक है कि आज गांवों में महिलाएं अपने पैरों  पर खड़ी हैं और राजनीतिक क्षेत्र में अपनी बढ़ी हुई जिम्मेदारी का बखूबी निर्वहन कर रही हैं. वे घर के चौके-चूल्हे से लेकर प्रदेश के विकास में भी हाथ बंटा रही हैं. उपसभापति जी, अभी हाल ही में मध्य प्रदेश में पंचायतों के, स्वायत्त संस्थाओं के जो नगरीय चुनाव हुए हैं, मुझे यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है कि 50 प्रतिशत आरक्षण के कारण गांवों में और शहरों में विकास की बागडोर 2,00,000 से ज्यादा महिलाओं के हाथ में आई है. वहां 1,80,000 से ज्यादा महिलाएं पंच बनी हैं, 11,520 महिलाएं सरपंच बनी हैं, 3,400 महिलाएं जनपद की सदस्य बनी हैं, 415 महिलाएं जिला पंचायत की अध्यक्ष हैं, 25 महिलाएं जिला पंचायत महिला अध्यक्ष बनी हैं, 1,780 महिलाएं पार्षद चुनकर आई हैं और हमारे यहां 8 महिलाएं नगर निगम की महापौर बनी हैं, जिसमें भोपाल में सामान्य महिला की जो सीट आरकि्षत थी, उस पर ओ.बी.सी. की महिला महापौर चुनकर आई है. ये आंकड़े बताते हैं कि यह कितना क्रांतिकारी बदलाव है. उपसभापति जी, भारतीय जनता पार्टी  ने तो सर्वप्रथम विधान सभा और संसद में महिलाओं की 33 प्रतिशत आरक्षण की शुरुआत बड़ौदा राष्ट्रीय परिषद में जून, 1994 में प्रस्ताव पास करके की.  महोदय, उस समय महिलाओं को यह जानकारी भी नहीं थी कि महिलाओं को राजनीतिक क्षेत्र में अधिकार सम्पन्न बनाने के लिए इस तरीके का कोई प्रस्ताव हमारी पार्टी पास करेगी, लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने महिलाओं के लिए यह प्रस्ताव पास किया और इसके बाद हमारी पार्टी  ने संगठन में 33 प्रतिशत आरक्षण महिलाओं को देकर राजनीति में आगे बढ़ाने का काम पहले से ही शुरू कर दिया. मुझे याद है कि एन.डी.ए. के कार्यकाल में दो बार पूर्व प्रधान मंत्री, अटल बिहारी वाजपेयी जी ने इस विधेयक को पास कराने के लिए आम सहमति बनाने के प्रयास किए और सुषमा स्वराज जी, जो उस समय पार्लियामेंट री अफेयर्स मिनिस्टर थीं , उन्होंने  इसके लिए बेहद परिश्रम किया और इसे संसद में चर्चा के लिए रखा, पर उस वक्त हमें सफलता नहीं मिली. महोदय, इस महिला आरक्षण विधेयक का मेरी पार्टी समर्थन करती है. भारतीय जनता पार्टी  हमेशा ही महिलाओं को संसद और विधान सभाओं में आरक्षण देकर उन्हें समाज की मुख्य धारा में निर्णायक भूमिका देने की पक्षधर रही है.


 माया सिंह (क्रमागत) : हम कोई राजनैतिक खेल खेलना नहीं चाहते और न ही श्रेय लेने की होड़ में इस विधेयक में रोड़ा डालना या अवरोध पैदा करना चाहते हैं, बल्कि जो दल विरोध कर रहे हैं, उनसे भी मेरा आग्रह है कि महिला आरक्षण विधेयक में संशोधन और सुधार की गुंजाइश हमेशा हो सकती है. संसद में बहस के दौरान सभी दल अपनी भावनाओं और विचारों  को रखते हुए विधेयक में उसे समाहित करने का प्रयास करें. लेकिन मेरा यह भी आग्रह है कि इस विधेयक को उसके वर्तमान स्वरूप में ही पास कराया जाए. आने वाले समय में अनुभव के आधार पर विधेयक में संशोधन और परिमार्जन किए जाने की संभावना सर्वथा बनी रहेगी. उपसभापति महोदय, पिछले कई वर्ष से संसद में महिला आरक्षण विधेयक लमि्बत रहने से आम जनता में यह संदेश जा रहा है कि हमारी संसद महिलाओं के अधिकारों  के प्रति संवेदनशील नहीं है जबकि वास्तविकता यह है कि इसी संसद ने महिलाओं के हितों और अधिकारों  की रक्षा तथा उनकी तरक्की के लिए कई कानून बनाए हैं. इसीलिए मेरी सबसे यह अपील है, मैं सबसे यह आग्रह करना चाहती हूं कि सब इस विधेयक के प्रति उदार भाव रखें ताकि इसके पारित होने की सूरत उभर सके. महोदय, भारतीय जनता पार्टी  शुरू से ही इस विधेयक की पक्षधर रही है. आज, जब सदन में यह विधेयक प्रस्तुत हुआ है और इस पर मैं अपनी बात रख रही हूं तो इस विधेयक पर अपने विचार रखते हुए मैं स्वयं को गौरवानि्वत महसूस कर रही हूं. लेकिन दो दिन का जो घटनाक्रम था, उसने जो पीड़ा पहुंचाई है, अगर हम पहले से इसका थोड़ा सा होमवर्क  कर लेते तो शायद ऐसी कटुतापूर्ण सि्थति न आती अौर हमें उन भाइयों  का, उन दलों  का समर्थन भी मिलता, या उनकी सहमति भी हो सकती. ..(समय की घंटी).. एक जिम्मेदार विपक्ष के रूप में हम आज इस विधेयक का जिस तरीके से समर्थन कर रहे हैं....

उपसभापति : माया सिंह जी, अभी आपकी पार्टी  से एक और मैंबर बोलने वाले हैं

माया सिंह  : मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि कांग्रेस पार्टी  भी उसी जिम्मेदारी का परिचय देकर इस विधेयक का समर्थन करती तो एनडीए के शासनकाल में ही यह विधेयक पारित हो गया होता और इसका लाभ हमारे देश की महिलाएं ले रही होतीं. उसके खिलाफ यदि कड़ी कार्रवाई नहीं होगी, तो भविष्य में भी यह विधेयक भारतीय लोकतंत्र की मजबूती की दिशा में एक ऐसा ऐतिहासिक कदम है, जो हमारे संविधान निर्माताओं के उस सपने को मूर्त रूप देगा, जो महिलाओं और पुरुषों के बीच में गैर-बराबरी को मिटाने की हसरत रखता था.
मुझे यह बताने की जरूरत नहीं है कि भारतीय समाज में महिलाएं किस तरीके से अत्याचार, शोषण, उत्पीड़न और दूसरी नागरिकता का शिकार रही हैं. ..(समय की घंटी).. संसद के भीतर और बाहर महिलाओं के हितों और अधिकारों  की रक्षा के जो भी प्रयास हुए हैं, उनमें से महिला आरक्षण विधेयक एक ऐसा मील का पत्थर साबित होगा जो उन्हें राजनैतिक और शासन चलाने की प्रक्रिया  में अधिकार सम्पन्नता के साथ सबद्ध करता है. दुनिया भर में चल रहे नारी मुक्ति आंदोलन और स्वतंत्रता आंदोलनों से भी आगे बढ़कर यह महिलाओं को अधिकार देगा. सर, आजाद भारत के इतिहास में महिलाओं को मजबूत करने का, महिलाओं के सशक्तिकरण का हमारा इतिहास रहा है. आज जब संसद में महिलाओं को यह कानूनी अधिकार मिलने जा रहा है, मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि मेरी पार्टी  इस ऐतिहासिक प्रसंग की मूक गवाह नहीं है, बल्कि इसकी सक्रिय भागीदार बनने जा रही है. मैं अपनी पार्टी की ओर से इस महिला आरक्षण विधेयक का पुरजोर समर्थन करती हूं और अन्य दलों  से अपेक्षा करती हूं तथा उनसे आग्रह करती हूं कि वे भी इस विधेयक का समर्थन करें ताकि यह विधेयक सर्वसम्मति से पास हो. आपने मुझे बोलने का अवसर दिया, इसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद.

डॉ.  कपिला वात्स्यायन (मनोनीत) :  श्रीमान उपसभापति महोदय, मैं यहाँ राज्यसभा के मनोनीत सदस्यों की ओर से बोल रही हूं. हमारा संबंध किसी दल से नहीं है, बल्कि मानव जाति से है. इस महत्वपूर्ण क्षण में,  जो कुछ मैं कह सकती हूं वह राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का एक वाक्य है जो मैं इस सदन को याद दिलाना चाहूंगी. यह वाक्य जब यूनेस्को की शुरुआत हुई थी,  तब 1946 में उन्होंने जूलियन हक्सले को लिखा था. उन्होंने कहा था, "मैं अपने अनपढ़ परन्तु बुद्धिमान माँ से अधिक सीखा है. इस दुनिया में शांति कैसे लाई जाये, यह मैंने मेरी अनपढ़ मां से अधिक सीखा है''.

डॉ.  कपिला वात्स्यायन (जारी):  आज, मुझे लगता है कि अनपढ़ माताएं हो या साक्षर माताएं,  उनको एक सभ्य समाज बनाना ही होगा; एक ऐसा सभ्य समाज जो, अपनी खुद की सहज प्रकृति में,  उस तरह की कार्रवाई में लिप्त नहीं हो सके जैसा हमने कल देखा है. इन शब्दों के साथ, महोदय, मैं कहती हूं कि यह एक महत्वपूर्ण क्षण है, लेकिन जो हमने कानून में दिखाया है उसे कारवाई में दिखाना की जिम्मेदारी हमारे ऊपर है. आपको धन्यवाद,  उपसभापति महोदय.


सरदार तरलोचन सिंह  (हरियाणा) : शुक्रिया  डिप्टी चेयरमेन साहब, आज इस हाउस को यह श्रेय जाता है कि हम यह हिस्टोरिक बिल पास करने जा रहे हैं. अभी किसी सदस्य ने कुछ कहा, किसी ने कुछ कहा, लेकिन इस बिल की हिस्ट्री यह है कि 1997 में जब श्री इन्द्र कुमार गुजराल प्राइम मिनिस्टर थे, तो पहली बार यह बिल लाया गया, दो बार श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी भी लाए, लेकिन पास नहीं हुआ. अब जब इस हाउस में आया तो एक कमेटी बनाई गई, पार्लियामेंट्री स्टेंडिंग कमेटी ने इस पर दो साल काम किया, जिसका श्रेय इस कमेटी को जाता है. इस कमेटी के पहले चेयरमेन श्री नाच्चीयप्पन थे और फिर श्रीमती जयन्ती नटराजन चेयरमेन बनी. मैं भी उस कमेटी का मेंबर था. इस कमेटी ने पूरे देश में जाकर अध्ययन किया और आज यह बिल आया है. मैं धन्यवाद देता हूं प्रधानमंत्री जी और लीडर ऑफ दि अपोजीसन  को कि आज हमारा हाउस इस बिल को पास करने जा रहा है, इसलिए ये दोनों बधाई के पात्र हैं. हम सारे लोग इकट्ठे होकर इसको आज पास कर रहे हैं. लेकिन मैं एक और बात भी कहना चाहता हूं कि गुरु नानक देव जी ने 540 साल पहले हिन्दुस्तान में यह जो सोशल रिवोल्यूशन जिसका आज आप जिक्र कर रहे हैं, उन्होंने  कहा था कि :
 "सो क्यों  मन्दा आखिए जित जम्मे राज़ान"
 वह लेडी जो किंग सेंट को पैदा करती है, वही सबसे ज्यादा सम्मान की पात्र है. मझे खुशी है कि आज गुरु नानक देव जी के गिरोत्री डा0 मनमोहन सिंह आज इस बिल को पास करवा रहे हैं. मैं ज्यादा बातें न कहता हुआ, क्यों कि समय कम है, पंजाब और हरियाणा में यह बिल अमली तौर पर  ऑलरेडि अपने मन से किया हुआ है. पंजाब में लोक सभा की 13 सीटों में से तीन वूमेन इलेक्ट हुईं, जिसमें 33 परसेंट हो जाता है. हरियाणा में 10 सीटें हैं, जिसमें दो वूमेन इलेक्ट हुईं. तो ऑलरेडि पंजाब और हरियाणा इसकी तरफ चल रहा है. हरियाणा की कल्पना चावला astronaut भी बनी. तो औरतों के प्रति सम्मान में हमारे यहां कोई कमी नहीं है. चौधरी देवी लाल को श्रेय जाता है कि सबसे यंगेस्ट सुषमा स्वराज जी को मंत्री बनाया. आज सुषमा स्वराज जी जिस सीट पर बैठी हैं उसका श्रेय चौधरी देवी लाल को जाता है. मैं यह ही नहीं, यह भी कहना चाहता हूं कि इस बिल में जब कमेटी ने काम किया तो कई सुझाव आए. इसमें यह सुझाव भी आया कि सीटें बढ़ाओ और डबल सीटें करो. यह भी सझाव आया कि अपोजिशन पार्टी  को यह मांग करो. लेकिन एक सझाव यह भी आया कि जो आज डिमांड ओ0बी0सी0 के बारे में है, इसको आप स्टेट्स को दे दें. जैसे पंचायती राज में हर स्टेट को पॉवर है और अगर वह चाहे तो ओ0बी0सी0 की सीटें कर सकता है. तो इस बिल में भी यह प्रोविजन हो सकता है, तो यह किया जाए. महोदय, मैं एक और बात बिना कहे नहीं रह सकता हूं. जब आज लेडीज के नाम पर हम सब कार्य कर रहे हैं तो प्रधानमंत्री जी, सिख लेडीज की छोटी सी बात पैंडिंग पड़ी हुई है. मझे खुशी है कि लॉ मिनिस्टर साहब ने तथा पिछले लॉ मिनिस्टर साहब ने भी प्रोमिस किया था कि आनन्द मैरिज एक्ट जिसमें सिखों  की मैरिज होती है, उसमें रजिस्ट्रेशन क्लॉज नहीं है. इतनी छोटी सी मांग जो मैं यहां तीन साल से पेश कर रहा हूं, पूरी नहीं हुई है. इस बारे में तमाम सिख मेंबर पार्लियामेंट  ने भी कहा है, आज लॉ मिनिस्टर साहब बैठे हैं, उसका भी आज यहां वूमेन डे पर ऐलान कर दो, ताकि सिख लेडीज भी आपका धन्यवाद करें. धन्यवाद.

मनोहर जोशी (महाराष्ट्र): महोदय, सदन के समक्ष विचार के लिए प्रस्तुत विधेयक वास्तव में एक महत्वपूर्ण विधेयक है. मुझे सदन को याद दिलाना चाहिए कि यही विधेयक 1996 में लोकसभा में आया था.

मनोहर जोशी (जारी): मुझे याद है कि जब उस सदन में बहस शुरू हुई थी, तब महाराष्ट्र विधानसभा ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित कर दिया था जो मेरे द्वारा मुख्यमंत्री के रूप में लाया गया था और उस प्रस्ताव में कहा गया था कि महिला आरक्षण विधेयक न केवल महाराष्ट्र राज्य द्वारा समर्थित होना चाहिए,  बल्कि देश के सभी विधानसभाओं द्वारा उसे समर्थन मिलना चाहिए. और, इसलिए, मुझे यह स्पष्ट कर देना चाहिए कि यह विधेयक, लंबे समय से, 1996 से ही, मेरी पार्टी द्वारा स्वीकृत है. इसलिए, हमारे सामने कोई सवाल नहीं था कि हमें विधेयक का समर्थन करना चाहिए या विधेयक का विरोध करना चाहिए. महोदय, मुझे याद है कि जब भी इस विधेयक को चर्चा के लिए संसद में आया, मेरे पार्टी प्रमुख श्री बालासाहेब ठाकरे, ने हमेशा हमें विधेयक के पक्ष में मतदान करने के लिए कहा था. शुरू से बस मेरी पार्टी की एक ही मांग थी कि महिलाओं के लिए विशेष निर्वाचन क्षेत्र आरक्षित नहीं किया जाना चाहिए. हम चाहते थे कि जैसाकि विपक्ष के नेता पहले ही कह चुके हैं, महिलाओं के लिए निर्वाचन क्षेत्रों के आरक्षण के बारे में निर्णय सभी राजनीतिक दलों द्वारा लिया जाना चाहिए. हर पार्टी को फैसला करना चाहिए और संसद द्वारा आज्ञा पत्र दिया जाना चाहिए कि जो भी पार्टी चुनाव, चाहे वह लोकसभा हो या विधान सभा हो, लड़ती है, तो 33 प्रतिशत उम्मीदवार महिलाएं होनी चाहिए. और, यही वह मुद्दा था जिसके लिए हम सरकार के विभिन्न अधिकारियों से अनुरोध किया था कि विशेष रूप से निर्वाचन क्षेत्रों को आरक्षित करने का अनुभव अच्छा नहीं है क्योंकि चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार सुनिश्चित नहीं होते कि अगली बार उनका निर्वाचन क्षेत्र आरक्षित रहेगा या नहीं. इसलिए, निर्वाचन क्षेत्र के लोगों के व्यापक हित में,  मैं अभी भी माननीय प्रधानमंत्री से अनुरोध करूंगा क्योंकि मैं कई राजनीतिक दलों बात कर चुका हूं और उनकी भी यही अपेक्षा है कि 33 प्रतिशत का आरक्षण स्वयं राजनीतिक दलों द्वारा किया जाना चाहिए. इसके अलावा, मैंने हमेशा सोचा था कि इस विधेयक को पारित करके,  हम अपनी माँ, बहन और पत्नी के हितों के बारे में विचार करेंगे. इस विधेयक को पारित करने का अर्थ न सिर्फ अपने निर्वाचन क्षेत्र में प्रसन्नता लाना है, बल्कि अपने परिवार में भी खुशी लाना है. और, इसलिए, शिवसेना सदन के समक्ष दृढ़ता से विधेयक का समर्थन करती है और हम उम्मीद करते हैं कि इस विधेयक के पारित होने के बाद देश में महिलाएं राजनीति में गहरी रुचि लेना और जितना संभव हो, सामाजिक काम करना आरंभ कर देंगी. महोदय, इन कुछ शब्दों के साथ, मैं अपनी पार्टी की राय व्यक्त करता हूं कि पूरे सदन को सर्वसम्मति से इस विधेयक को पारित कर देना चाहिए और एक रास्ता बनाने की कोशिश करनी चाहिए जहां निर्वाचन क्षेत्र दलों द्वारा स्वयं ही निर्धारित किये जायें. आपका बहुत बहुत धन्यवाद.
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