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बिहार में बच्चियों के यौनशोषण के मामले का सच क्या बाहर आ पायेगा?



संतोष कुमार 
मुजफ्फरपुर के बालिकागृह में यौन शोषण मसले पर आज जहां विपक्ष के तेवर हमलावर हैं वहीं सत्तापक्ष इसे बिहार की छवि खराब करने से जोडकर अपना बचाव कर रहा है. लेकिन इसकी समग्र जांच के लिए क्या राजनीतिक साहस बिहार के राजनीतिक दायरे में है? उधर एक जिले के बालिका गृह में यौन शोषण के तार कई और जिलों से जुड़ते दिख रहे हैं. इस मामले को उठाने में शुरू से सक्रिय और पटना हाईकोर्ट में सीबीआई जांच के लिए जनहित याचिका दायर करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता संतोष कुमार इस मामले की तह में जाने की कड़ी में स्त्रीकाल में सिलसिलेवार लिखेंगे: 

विधान परिषद के बाहर राबडी देवी के नेतृत्व में आवाज उठाता विपक्ष

दिनेश कुमार शर्मा, ADCPU(Assistant Director Child Protection Unit) द्वारा महिला थाना मुजफ्फरपुर में मई, 2018 के आख़िरी सप्ताह में इस मामले में एफआईआर दर्ज की गई, जिसका आधार बनी टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल सांयसेज (TISS),मुम्बई की सोशल ऑडिट रिपोर्ट. 26 मई को सब्मिट की गयी सोशल ऑडिट रिपोर्ट के पेज नम्बर 52 में उल्लिखित है कि” The girl children in Muzaffarpur run by ‘Seva Snkalp Evam Vikash Samiti’ was both find by us to running highly questionable manner along with grave instance of violation that was reported by the residents. Several girls reported about violence and being abused sexually. This is the very serious and need to be further investigation promptly. Immediate legal procedure must be followed to enquire into the charges and corrective measures be taken” इसी को आधार बनाकर प्राथमिकी 30/05/2018 को की गई जिसे 31/05/2018 को महिला थाना ने  केस नवम्बर 33/18 को u/s 120(B)/376/34 IPC & 4/6/8/10/12 POCSO Act के तहद मामला दर्ज हुआ।

एफआईआर दर्ज होने के बाद बच्चियों ने न केवल पुलिस पदाधिकारियों के सामने बल्कि धारा 164 में मजिस्ट्रेट के सामने भी अपनी आपबीती सुनाई जो रूह कांप जाने वाला है। अपनी आपबीती में बच्चियों बताया कि एक बच्ची ने जब जबरन यौन शोषण का विरोध किया तो उसे इतना मारा-पीटा गया कि उसकी वहीं, यानी बलिकागृह में ही मौत हो गई। उसके शव को उसी के अहाते में कहीं दफना दिया गया।  पॉक्सो कोर्ट ने डीएम को मजिस्ट्रेट की निगरानी में वीडियो रिकार्डिंग के साथ उस जगह की खुदाई के लिए आदेश दिया था। प्रतिनियुक्त दंडाधिकारी शीला रानी गुप्ता सहित अन्य सीनियर पुलिस ऑफिसर की निगरानी में 23/07/2018 को न्यूज चैनलों के कैमरे की नजरों के बीच खुदाई शुरू हुई। ख़ुदाई शुरू होने से पूर्व उन तीन बच्चियों को उस जगह को शिनाख़्त करने के लिए पटना से लाया गया जिन्होंने हफ्तों पहले इसके बारे में बताया था। सोमवार के सुबह से न्यूज चैनलों के ओवी वैन, कमरों के साथ-साथ आस-पास के लोगों का जमावड़ा होने लगा था।

जगह की निशानदेही के लिए पटना से लायी गयी बच्ची को सीधे उस परिसर में, जहां जेल में बंद बलिकागृह-संचालक ब्रजेश ठाकुर का आवास भी है, लाया गया। निशानदेही पर मिनी जेसीबी बॉब कट मशीन से खुदाई की गई। करीब चार फीट गहरी खुदाई के बाद लाश दफन किये जाने का साक्ष्य नही मिला। नीचे जायजा लेने पर एक सुरंग दिखा पर शव का कोई अवशेष नहीं मिला। मजिस्ट्रेट के आदेश पर दूसरी जगह भी खुदाई की गई। इसके लिए स्वान डॉग की भी मदद ली गई।

एसएसपी ने बलिकागृह का रजिस्टर देखने के बाद कहा कि यहां तीन अन्य किशोरियों  की पहले मौत हुई है? फिर यह सवाल अनुत्तरित है कि मरने के बाद शव का पोस्टमार्टम कराया गया या नही? समाज कल्याण विभाग ने इस पर क्या कार्यवाही की? मर चुकी किशोरियों के परिजनों का क्या कहना है? इस तमाम बिन्दुओं को लेकर जांच टीम गठित की गई है।

मालूम हो कि इस कांड में मुजफ्फरपुर बालिकागृह में 29 किशोरियों, जिनमे 7 साल की एक  बच्ची है, के बलात्कार की पुष्टि पीएमसीएच(पटना मेडिकल कालेज एवं हॉस्पिटल) के डॉक्टरों की टीम द्वारा हो चुकी है। बलिकागृह के संचालक ब्रजेश ठाकुर एवं बलिकागृह के 7 अन्य कर्मियों के साथ बाल कल्याण समिति के सदस्य विकास कुमार एवं मुजफ्फरपुर के बाल संरक्षण पदाधिकारी रवि रौशन(कुल 10) की गिरफ्तारी हो चुकी है। बाल कल्याण समिति , के अध्यक्ष, दिलीप वर्मा, जिन्हें फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट का अधिकार है की गिरफ्तारी के लिए पुलिस लम्बे समय से कोशिश कर रही है।

सामाजिक कार्यकर्ता संतोष कुमार

इस बीच कई सवाल उठ रहे हैं. सवाल है कि क्या इस मामले की जांच का हस्र सृजन घोटाले की जांच जैसा ही हो जायेगा? विपक्ष की मांगों के बावजूद सरकार सीबीआई जांच से क्यों घबड़ा रही है?  सवाल शहर से भी है कि इन मासूम बच्चियों के लिए वह इतना उद्द्वेलित क्यों नहीं जितना कभी गोलू अपहरण कांड के लिए हुआ था? कहा यह भी जा रहा है कि ऐसे मामले राज्य के अन्य जिलों में भी हो सकते हैं. आज बिहार विधानपरिषद में प्रतिपक्ष की नेता राबड़ी देवी ने सीबीआई जांच की मांग उठायी, सवाल है कि क्या विपक्ष इसे बच्चियों को न्याय मिलने तक मुद्दा बना सकेगा?

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समाज का नजरिया बदलने वाली फोटोग्राफर संगीता महाजन

पुष्पेन्द्र फाल्गुन 


बोलती तस्वीरों की फोटोग्राफर संगीता महाजन की फोटोग्राफी और उनके इस सफ़र की कहानी कह रहे हैं संवेदनशील साहित्यकार और पत्रकार पुष्पेन्द्र फाल्गुन. आइये समझते हैं संगीता महाजन की फोटोग्राफी यात्रा को कुछ शब्दों कुछ तस्वीरों के जरिये:  

लंबी-चौड़ी सड़कें, चकाचक सड़कें, लकदक सड़कें, विकास के नाम पर सबसे ज्यादा यही चित्र आम तौर पर आँखों के सामने रखा जाता है, लेकिन इन्हीं चित्रों के सहारे मशहूर फोटोग्राफर संगीता महाजन ने वर्तमान सरकार द्वारा किए जा रहे विकास एवं उसकी चपेट में आयी स्थानीय अर्थव्यवस्था और सामाजिकता की बदहाली को न सिर्फ सबके समक्ष रखा है, बल्कि अपने छायाचित्रों के माध्यम से आमजन के मन-मस्तिष्क में यह सवाल उत्पन्न करने में कामयाबी हासिल की है कि यह तथाकथित विकास सर्वसमावेशी विकास नहीं है.

 यह विकास कुछ धन्नासेठों और सफेदपोशों का ही विकास है, समाज के शेष वर्ग इस विकास से सिर्फ और सिर्फ बुरी तरह प्रभावित होंगे. संगीता महाजन की यह तस्वीरें आमजन को यह सन्देश दे रही हैं कि यदि इस तथाकथित विकास का विरोध नहीं हुआ तो इस देश का आम नागरिक न सिर्फ बदहाल होगा बल्कि बचे रहने की लाचारी में खुद अपने ही लोगों के खिलाफ खड़े होने पर मजबूर हो जाएगा.

संगीता महाजन, इसी तरह के छायाचित्रों के लिए पूरे देश में ख्यात हैं. जन-सरोकार उनके फोटोग्राफी का केन्द्रीय विषय है. सरोकारीय फोटोग्राफी कैसे आमजन को व्यवस्था के प्रति संदेह, सवाल और प्रतिरोध के लिए प्रेरित कर सकती है, संगीता महाजन के छायाचित्र इसकी मिसाल हैं.

अपने समय के बरक्स जो सवाल खड़े होते हैं, एक फोटोग्राफर होने के नाते संगीता जी उनसे जूझती हैं और उन्हें अपने छायाचित्रों का विषय बनाती हैं. उनकी वर्तमान हॉकर सीरीज उसी सिलसिले को आगे बढ़ा रही है. इन छायाचित्रों में आम और खास का भेद इतना स्पष्ट रेखांकित है कि समाज के आम इंसान को यह तय करने में देर नहीं लगती कि उसे किस तरफ खड़ा होना चाहिए और क्यों?

फोटोग्राफी विथ विज़न
संगीता महाजन ने फोटोग्राफी को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम इसलिए बनाया कि उन्हें लगता है कि यह एकमात्र ऐसी विधा है जो विसंगतियों के सारे आयाम देखने वाले के समक्ष खोलकर रख देती है. छायाचित्रों को देखने वाला किसी भी छायाचित्र से तात्कालिक और दीर्घकालिक, दोनों ही अवस्थाओं में जुड़ता है, यह उसके मानवीय स्वभाव के अनुकूल है. शायद इसीलिए कला-माध्यमों में सबसे नया होने के बावजूद पूरी दुनिया में फोटोग्राफी ने अपने लिए दीगर कला माध्यमों के बनिस्बत पुख्ता जगह बना ली है. फोटोग्राफी की इसी विशेषता को संगीता महाजन फोटोग्राफरों के लिए चुनौती मानती हैं. वह कहती हैं, ‘कैमरे से खींची जाने वाली हर तस्वीर पहली ही बार खींची जाती है, चाहे फोटोग्राफर ने कितने ही फोटो खींचे हो, लेकिन हर बार जब वह फोटो खींचता है तो दरअसल पहली बार ही वह फोटो खींच रहा होता है, फोटो पहले दिमाग में क्लिक होती हैं, बाद में कैमरे में, इसलिए फोटोग्राफर की दृष्टि और उसका नजरिया साफ़ होना चाहिए, नहीं तो वह इस कला-माध्यम के साथ न्याय नहीं कर पाएगा.’

संगीता महाजन

महिलाएं ही उम्दा फोटोग्राफर

संगीता महाजन मानती हैं कि फोटोग्राफी विधा के साथ महिलाएं ज्यादा न्याय कर पाती हैं, क्योंकि इस विधा में कला, संवेदना, संयम, कौशल, पारदर्शिता और ईमानदारी की एक ही समय पर जरुरत होती है, महिलाएं कुदरती तौर पर इन गुणों की सम्यक संवाहक हैं, इसलिए जब उनकी आँख कैमरे की आँख बन जाती है तो वह वो सब कुछ दिखा पाती हैं, जो आम तौर पर हमारे आग्रहों की वजह से हमसे देखने से छूट जाता है. संगीता महाजन का मानना है कि महिलाओं के हाथ में फोटोग्राफी का भविष्य उज्ज्वल है.

आजीविका का साधन

स्नातक होने के बाद संगीता महाजन ने फोटोग्राफी को ही अपनी आजीविका का साधन बनाया. पुणे में एक वर्कशॉप के दौरान उनका परिचय एक महिला फोटोग्राफर से हुआ तभी उनके मन में इस माध्यम को आजीविका बनाने का ख्याल आया. वह कहती हैं,’ साम्यवादी विचारों से जुड़ी होने के नाते मुझे ऐसे ही किसी माध्यम की तलाश थी, जिससे आजीविका भी चले और सरोकारों को जीने में भी आसानी हो. फोटोग्राफी ने मुझे दोनों मौके मुहैया कराए.’ अपना पहला कैमरा उधार लेकर उन्होंने नागपुर के एक सांध्य दैनिक के लिए काम शुरु किया. काम इस आधार पर मिला था कि तस्वीर छपेगी तो पारिश्रमिक मिलेगा.

13 अप्रैल 1993 को उनका पहला चित्र उस सांध्य दैनिक में छपा, फिर इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़ के नहीं देखा. 1994 में नागपुर में अपने अधिकारों के लिए प्रदर्शन कर रहे आदिवासी-गोवारी समाज के जन-समुदाय पर पुलिस ने बेंत प्रहार किया, इससे भगदड़ मच गयी और 113 निर्दोष गोवारी स्त्री-पुरुष, बुजुर्ग-बच्चे मारे गए. मारे गए लोगों में महिलाएं और बच्चे ही ज्यादा थे. संगीता महाजन उस प्रदर्शन को कवर करने गयी थीं, सारा मंजर उनकी सामने ही घटा था, उन्होंने उन दर्दनाक दृश्यों को अपने कैमरे में कैद किया. कुछ चित्र इतने मार्मिक थे कि जिन्हें देखकर कठोर से कठोर दिल मनुष्य का हृदय पिघल जाए. गोवारी हत्याकांड के उनके चित्र लन्दन से प्रकाशित होने वाले दैनिकों लन्दन टाइम्स और लन्दन इंडिपेंडेंट में प्रकाशित हुए.

नागपुर की एक छायाचित्रकार के छायाचित्र लन्दन के अख़बारों में छपे तो पूरे देश का ध्यान उनकी फोटोग्राफी की तरफ गया. 1995 में नागपुर से एक अंग्रेजी दैनिक का प्रकाशन शुरु हुआ. संगीता महाजन को उसमें पक्की नौकरी मिल गयी. हालाँकि नौकरी देने के पहले संपादक ने वही रटे-रटाए सवाल पूछे थे कि क्या एक महिला होने के नाते देर रात तक काम कर पाएंगी? काम ईमानदारी और निष्ठा से करेंगी? आदि. 2001 में उक्त अख़बार ने नागपुर से अपना प्रकाशन स्थगित किया तो संगीता महाजन का पुणे स्थानान्तरण हुआ, लेकिन उन्होंने पुणे जाने की बजाय नागपुर को ही अपनी कर्मभूमि बनाए रखने का फैसला किया.

व्यावसायिक फोटोग्राफी

नौकरी छूटने के बाद संगीता महाजन ने व्यावसायिक फोटोग्राफी का रुख किया. व्यावसायिक फोटोग्राफी पुरुषों के वर्चस्व का क्षेत्र है. प्रेस फोटोग्राफर के तौर पर भी चुनौतियाँ थी लेकिन व्यावसायिक फोटोग्राफर के तौर पर अब सबसे बड़ी चुनौती पुरुष के आग्रही मानसिकता की थी, लेकिन संगीता महाजन ने अपनी सूझबूझ और समझ से जल्दी ही इस क्षेत्र में भी अपनी पहचान स्थापित कर ली. विजन और मानवीय गरिमा को महत्व देने से उनकी व्यावसायिक फोटोग्राफी ने जल्दी ही सभी का ध्यान आकृष्ट किया. बहुत कम समय में वह नागपुर एवं मध्य भारत के एक मुख्य व्यावसायिक फोटोग्राफर के तौर पर पहचानी जानी लगीं.

महिलाओं को इस विधा से जोड़ने के उपक्रम

संगीता महाजन कहती हैं, ‘मानवीयता छायाचित्रों का एक प्रमुख तत्व है और महिलाएं ही इस तत्व को बखूबी इस माध्यम में निखार सकती हैं. क्योंकि समाज के विसंगतियों का सबसे ज्यादा शिकार महिलाएं ही होती हैं इसलिए मानवीय दृष्टिकोण उनमें पुरुषों के मुकाबले ज्यादा होता है, अतः फोटोग्राफी के जरिए यदि महिलाएं खुद को अभिव्यक्त करती हैं तो विसंगति, शोषण एवं अत्याचार मुक्त समाज बनाने की गति तेज हो सकती है.’

महिलाओं को इस विधा से जोड़ने के लिए संगीता महाजन फोटोग्राफी की कार्यशालाएं आयोजित करती रहती हैं. इस समय समूर्ण महाराष्ट्र भर में उनकी कार्यशालाएं आयोजित हो रही हैं. अत्यल्प शुल्क में महिलाओं के साथ नयी पीढ़ी के युवाओं को वह फोटोग्राफी सिखा रही है, ताकि नयी पीढ़ी संवेदना के इस कला-माध्यम में खुद को अभिव्यक्त करते हुए समाज की बेहतरी की दिशा में सक्रिय हो सके.

अनेक पुरस्कार और प्रदर्शनियां

संगीता महाजन को उत्कृष्ट फोटोग्राफी के लिए अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है. इसमें प्रतिष्ठित के.के. मूस फाउंडेशन पुरस्कार, स्वरवेध पुरस्कार, फूजी वर्ल्डकप क्रिकेट अवार्ड शामिल हैं. संगीता महाजन के छायाचित्रों की अनेक एकल एवं सामूहिक प्रदर्शनियां भी आयोजित हो चुकी हैं और सभी प्रदर्शनी चर्चित हुई हैं.


साहित्य और पत्रकारिता में समान रूप से गतिमान रहे पुष्पेन्द्र फाल्गुन नागपुर रहकर फ्रीलांस करते हैं. संपर्क: pushpendrafalgoun@gmail.com

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भारत में दलित स्त्री के स्वास्थ्य की स्थितियां और चुनौतियाँ

संदीप कुमार मील
समाज के किसी भी तबके की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के निर्माण में उसके स्वास्थ्य की स्थितियाँ बहुत निर्णायक भूमिकाएँ निभाती हैं। साथ ही, इसका दूसरा पक्ष देखा जाए तो यह भी उभरता है कि इन परिस्थितियों पर ही मनुष्य का स्वास्थ्य स्तर निर्भर करता है। पहला पक्ष पूँजीवादी व्यवस्था द्वारा दिये जाने वाले तर्क का है जो मानता है कि व्यक्ति स्वतंत्र प्रतियोगिता में अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएँ प्राप्त कर सकता है। जबकि दूसरा पक्ष उन आधारों को रेखांकित करता है जो संसाधनों के असमान वितरण के कारण उत्पन्न हो जाते हैं।

चूंकि राष्ट्र राज्य की संकल्पना में सरकार के प्रमुख कर्तव्यों में यह भी शामिल है कि वह अपने नागरिकों को पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराये ताकि वे उत्पादन में सक्रिय भूमिका निभा सकें। सरकार की संकल्पना के साथ जिस तरह से बाहरी आक्रमणों से सुरक्षा का विचार जुड़ा है उसी तरह से प्राकृतिक और अन्य मानवीय आपदाओं जिसमें सभी तरह की बीमारियाँ भी शामिल उनसे भी सुरक्षा का विचार भी नीहित है। यहाँ सिर्फ बीमारियों के अभाव या उनके ईलाज मात्र को ही स्वास्थ्य के मानकों में शामिल नहीं किया जा सकता बल्कि अंतर्राष्ट्रीय मानकों द्वारा निर्धारित पौषटिक भोजन और अन्य स्वास्थ्य के लिए आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता भी सरकार को ही सुनिश्चित करनी होती है। स्वस्थ और शिक्षित नागरिक ही उस देश की विकास की दिशा तय कर पाते हैं। इसलिए लोक कल्याणकारी राज्य में स्वास्थ्य को प्रमुख स्थान देकर उसे सार्वजनिक क्षेत्र में रखने का प्रावधान किया जाता है ताकि लोग कम से कम उस व्यवस्था में अपने जीवन के अधिकार को तो सुरक्षित रख पायें। पूंजीवादी समाजों में स्वास्थ्य एक निजी दायित्व की तरह से देखा जाता रहा है जिसमें जो अमीर वर्ग होता है उसके पास स्वास्थ्य के सभी साधन उपलब्ध होते हैं और गरीब वर्ग महामारियों की चपेट में आकर जीवन हार जाता है। विकसित देशों में स्वास्थ्य के उच्च स्तर के कारण वहाँ पर औसत आयु विकासशील देशों और अल्प विकसित देशों की तुलना में ज्यादा है।

स्वास्थ्य किसी भी देश की स्थाई पूँजी के रूप में देखा जाता है और इसे व्यापक रूप में समझा जाये तो यह वैश्विक मानवाधिकार बन जाता है जो पृथ्वी पर जन्म लेने वाले हर मनुष्य को मिलना चाहिए। विश्व स्वास्थ्य संगठन शिशुओं और माताओं के संबंध में कहता है, ‘‘लोगों का हवा में साँस लेने, भोजन प्राप्ति, पेयजल, उन्हें जिन दवाइयों और टिकों की आवश्यकता होती है उनकी उपलब्धता हम सुनिश्चित करते हैं।’’ 1

विश्व स्वास्थ्य संगठन की इस टिप्पणी से दो तर्क स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आते हैं, पहला तर्क तो यह है कि विश्व में स्वास्थ्य सुविधाएँ सुनिश्चित नहीं हैं, लोग उनसे वंचित हैं। इसलिए ऐसे मंचों से यह घोषणा की जाती है। बहुत से देशों द्वारा ये सुविधाएँ अपने नागरिकों को उपलब्ध नहीं कराई जा रही हैं। या तो उन देशों के पास पर्याप्त संसाधनों का अभाव है कि वे स्वास्थ्य सुविधाओं को उपलब्ध नहीं करा पा रहे हैं या यह भी देखा जाता है कि अपनी जनता के स्वास्थ्य को लेकर उन देशों की सरकारें प्रतिबद्ध नहीं हैं। उनकी प्राथमिकताओं में स्वास्थ्य उतना महत्वपूर्ण नहीं माना जाता हो लेकिन मेरे विचार से जब भी किसी देश के ‘राष्ट्रीय हित’ का प्रश्न आता है तो उसकी संप्रभुताओं, अखण्डता, स्वतंत्र विदेश नीति के बाद जनता के स्वास्थ्य का स्थान आता है। अगर किसी देश की जनता स्वस्थ्य नहीं है तो वह बहुत समय तक न तो उसकी अखण्डता स्थायी रह सकती है और न ही सम्प्रभुता।

कुछ देशों में दोनों ही कारण देखे जा सकते हैं जिनमें अधिकांश अफ्रीका के अविकसित देश हैं। दूसरा तर्क यह उभरकर सामने आता है कि हवा, भोजन और पानी जैसी प्राथमिक चीजों का समाज से स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। इसलिए जो शक्तियाँ समाज में ताकतवर होती हैं वे इन पर आधिपत्य स्थापित कर लेती हैं या उनकी सुविधाओं के विस्तार के कारण इनकी उपलब्धता और स्वच्छता पर प्रभाव पड़ता है। जिस तरह से विश्व में जलवायु परिवर्तन हो रहा है उसके पीछे अमीर देशों और अमीर लोगों का अति-प्राकृतिक दोहन सामने आ रहा है उसके कारण भी लोगों के स्वास्थ्य पर कुप्रभाव देखा जा सकता है। इस तर्क के साथ उस देश की सरकार अपनी स्वास्थ्य सुविधाओं को पूरी तरह से राज्य नियंत्रण से मुक्त कर देते हैं।

विश्व की माध्यिका आयु का अवलोकन करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि कृषि आधारित अर्थव्यवस्थाओं के देशों में माध्यिका आयु कम है और औद्योगिक अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों में यह ज्यादा है। सन् 2018 में विश्व में सबसे कम माध्यिका आयु अफ्रीका महाद्वीप के एक देश नाईजीरिया की है जो 15.3 वर्ष है। जापान में यह 46.9 वर्ष है और भारत में 27.6 वर्ष है।2   इन देशों में मृत्यु की अनिश्चितता तुलनात्मक रूप से विकसित देशों से ज्यादा है जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वहाँ के निवासी स्वास्थ्य संबंधी उचित उपचार के अभाव में जीवन प्रत्याशा से पूर्व में भी काल कल्वित हो जाते हैं।

अब भारतीय संदर्भ में स्वास्थ्य की स्थितियों की चर्चा से पूर्व यहाँ के ऐतिहासिक संदर्भों का विवेचन करना होगा। चूंकि भारतीय समाज विश्व की तरह पितृसत्ता का वाहक रहा है और साथ ही, यहाँ पर जाति व्यवस्था सम्पूर्ण समाज के संचालन को निर्धारित करने वाली प्रमुख संरचना रही है। इसलिए जो बाह्मणवादी पितृसत्ता में ज्ञान पर आधिपत्य रखने वाला वर्ग था उसी के पास उपचार से संबंधित विज्ञान अध्ययन-अध्यापन का दायित्व और अधिकार दोनों थे। वंचित समाज जिसमें शुद्र प्रमुख हैं उन्हें ज्ञान से दूर रखने के लिए सभी धार्मिक कानून और दण्ड विधान रचे गये थे। शुद्र के कानों में ज्ञान पहुँचने पर शीशा भरने के अमानवीय दण्ड विधान ने हमेशा से शुद्रों को स्वास्थ्य से दूर रहने के लिए अभिशप्त कर दिया। उस स्वास्थ्य से जो तात्कालिक राजसत्ता द्वारा पोषित होता था। ऐसी स्थिति में दलित स्त्रियों के स्वास्थ्य की राजसत्ता के उत्तरदायित्व के बारे में तो कल्पना भी नहीं की जा सकती।

बाह्मणवादी पितृसत्ता ने विज्ञान में होने वाली प्रगति को ही अवरुद्ध कर दिया क्योंकि ज्ञान को जब पैतृक सम्पत्ती के रूप में परिवर्तित कर दिया जाता है तो उसकी द्वंद्वात्मकता समाप्त हो जाती है और वह विकास के रास्ते पर जाने की बजाय यथास्थितिवादिता से होकर रुढ़ीवाद तक पहुँच जाता है। काँचा इल्लैया कहते हैं, ‘‘हिन्दू समाज ने निस्संदेह ने अपने आध्यात्मिक फासीवादी सार के कारण और उस सामाजिक निष्क्रियता के भी कारण, जो जाति व्यवस्था का सीधा परिणा थी, कभी भी किसी वैज्ञानिक नवाचार को होने नहीं दिया। 3  जिस समाज में नवाचारों के स्वागत के लिए लोकतांत्रिक और सम्मानजनक परिवेश नहीं उपलब्ध होता है वहाँ पर लोग नए प्रयोग करने के प्रति प्रोत्साहित ही नहीं होते हैं, वे एक परम्परागत ढ़ाँचे में सोचते रहते हैं। ऐसी स्थिति लम्बे समय तक चलने के कारण यह एक सांस्कृतिक मनोविज्ञान का रूप धारण कर लेती है जो समाजिक संचालन की शक्तियों का एक दिशा दे रही होती है। ऐसे समय में लोग इन परम्पराओं और सोच के दायरों से बाहर सोचने का साहस भी नहीं कर पाते हैं।

दलित स्त्री के स्वास्थ्य की स्थितियों पर उनके काम के प्रकारों का गहरा असर होता है। समाज ने जिस तरह से सबसे गंदे कामों को करने के लिए दलित स्त्री को अभिशप्त किया है वे जगहें समाज की सबसे गंदी और कचरा युक्त होती है। यहाँ पर साफ-सफाई की बात तो दूर, पीने के साफ पानी तक की व्यवस्था नहीं होती है। एक छोटी-सी चोट आने पर भी कोई स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हो पाती हैं। यही स्थिति न सिर्फ बड़े शहरों और मध्यम कस्बों की है बल्कि गाँवों में भी देखी जा सकती है। गाँवों की सामाजिक-भौगोलिक संरचनाएँ ब्राह्मणवादी होने के कारण पूरे भारत में दलितों को गाँव से बाहर की अनुपजाऊ, गंदी और प्राकृतिक आपदाओं से असुरक्षित जमीनों पर रहना होता है। वे अपने श्रम से इन जमीनों को रहने लायक बनाते हैं तो उच्च जातियों के लोगों द्वारा अपने बाहुबल से इन्हें यहाँ से विस्थापित कर दिया जाता है। यही स्थिति बड़े शहरों में देखी जा सकती है। चूँकि दलित पितृसत्ता के जकड़नें मजबूत होने के कारण कार्यस्थलों पर दलित स्त्रियों के स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने के लिए राज्य की संस्थाओं का सहयोग होना तो दूर उनके अपने पुरुष जो पति, पिता, भाई और बेटे के रूप में होते हैं वे भी पूर्ण उदासीन और गैरजिम्मेदार होते हैं। उसे तीन स्तर पर स्वास्थ्य की विपरीत परिस्थियों से जूझना पड़ता है, पहली स्थिति परिवार की आंतरिक स्थिति है जहाँ पर दलित स्त्री पितृसत्ता के स्त्री के लिए निर्मित किये गए बंधनों में कैद रहती है। दूसरी स्थिति समुदाय की है जहाँ पर वह श्रम करने जाती है वहाँ की पूरी व्यवस्था जाति व्यवस्था आधारित होने के कारण वह किसी प्रकार के स्वास्थ्य अधिकार का दावा कर ही नहीं सकती और तीसरी स्थिति एक लोकतांत्रिक राज्य द्वारा उपलब्ध कराई गई स्वास्थ्य सेवाओं की हैं जहाँ पर इन दोनों स्थितियों की बुराइयाँ तो उपस्थित हैं ही, साथ ही पूँजीवादी के तमाम अमानवीयतायें और असमानतापूर्ण व्यवहार भी स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी अपनी एक रिपोर्ट में यह मान लिया है कि स्त्रियों पर होने वाला भेदभाव केवल लैंगिक ही नहीं है, जातिय और आर्थिक स्थिति पर भी आधारित है। चूँकि भारत के समाज में आर्थिक स्थितियों के ढ़ांचों की निर्भरताएँ जाति व्यवस्था पर होती हैं और संसाधनों का बँटवारा इस प्रकार से किया जाता है कि उच्च जातियों के पास अधिकतम संसाधनों का केंद्रीकरण हो जाता है और निम्न जातियाँ सभी संसाधनों से वंचित हो जाती हैं। उनके पास केवल श्रम बचती है। वह श्रम दलित स्त्री और पुरुष के पास समान रूप से होता है लेकिन वहाँ पर भी दलित पुरुष की सोच को इस तरह से निर्मित किया जाता है कि स्त्री के श्रम का महत्व कम है और इस सोच को निर्मित होने के बाद उच्च वर्णों द्वारा दी जाने वाली यातनाओं के समय वह दलित स्त्री के स्वामी होने के गर्व भाव को महसूस करता है और जब भी अवसर मिलता वैसा ही व्यवहार वह अपनी स्त्री से करता है। एक तरह से कहा जा सकता है कि अपनी चेतना के स्तर दलित पुरुष उत्पीड़िन की व्यवस्था का एक पुर्जा बन जाता है।

‘टर्निंग प्रामिसेस इन टू एक्षन-जेंडर इक्वालिटी इन द 2030’ एजेंडा नाम की इस रिपोर्ट के अनुसार एक सवर्ण महिला की तुलना में एक दलित महिला करीब 14.6 साल कम जीती है। इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ दलित स्टडीज के 2013 के एक शोध का हवाला देते हुए इस रिपोर्ट में कहा गया है कि जहाँ एक ऊँची जाति की महिला की औसत उम्र 54.1 साल है, वहीं पर एक दलित महिला औसतन 39.5 साल ही जीती है।’4 इससे सिर्फ यही स्पष्ट नहीं होता कि दलित स्त्री को पोषण न मिल पाने के कारण वे सवर्ण स्त्री की तुलना में कम उम्र प्राप्त करती है बल्कि यह भी स्पष्ट हो रहा है कि सवर्ण स्त्री की स्थिति भी कोई बहुत बेहतर नहीं है। इस कम उम्र के भेद के अलग कारणों को रेखांकित करने पर कुछ साझे बिंदु प्रस्तुत हो सकते हैं जो सामाजिक पायदानों पर दोनों वर्णों की स्त्रियों को झेलने पड़ते हैं और वे कारण जो जाति के कारण सिर्फ दलित स्त्री को झेलने पड़ते हैं, स्पष्ट हो जाते हैं।

दलित स्त्री भारत की कुल स्त्री आबादी की 16.4प्रतिशत है।5   इसकी औसत आयु कम होने के लिये जिम्मेदार कारकों को देखा जाये तो प्राथमिक कारक तो एक दलित मजदूर को मिलने वाले श्रम का न्यूनतम मूल्य है और उसमें भी स्त्री के श्रम का मूल्य ओर कम होना होता है। घर में पुरुष का आधिपत्य होने के कारण उसकी कमाई को खर्च करने का अधिकार भी वह स्वयं प्राप्त नहीं कर पाती है। घर खर्च, बच्चों की पढ़ाई से लेकर तमाम तरह के कर्ज के चुकाये जाने वाले ब्याज की रकम भी इन्हीं की आमदनी से जाती है। इनका अपना स्वास्थ्य सबसे अंतिम प्राथमिकताओं में होता है जो पूर्ण होने से पहले ही बिमारियाँ बहुत विकराल रूप ले लेती हैं। यहाँ पर वे स्वयं पितृसत्ता के विभिन्न रूपों में इस तरह से सहायक बनती हैं कि अपने अस्तित्व को ही खतरे में डाल देती हैं।

अशिक्षा एक बहुत बड़ा कारक है जो दलित स्त्रियों के कमजोर स्वास्थ्य की दिशा निर्धारित कर देती है। इसी के कारण से वह बाल विवाह जैसी कुरीतियाँ की शिकार हो जाती हैं जो आगे चलकर उन्हें कम उम्र में माँ बनने जैसे खतरों तक पहुँचा देती है। कम उम्र में माँ बनने की स्थिति शहरों की तुलना में ग्रामीण परिवेश में अधिक होती है।

सार्वजनकि स्वास्थ्य सुविधाओं और जागरुकता के अभाव में बहुत-सी दलित स्त्रियाँ अंधविश्वासों का शिकार होकर अपने जीवन से हाथ धो बैठती हैं। वे अत्याचारों के प्रतिकार करने की चेतना प्राप्त करने के अवसर तक ही नहीं पहुँच पाती हैं। ग्रामीण इलाकों में वे जाति के कारण जमीन जैसी परिसंपत्तियों से वंचित होती हैं और किसी जमींदार के खेत पर खेत मजदूरी करने को अभिशप्त होती हैं। दलित बालिकों को बाल श्रम भी करना पड़ता है जिससे वे बचपन से ही कुपोषण की शिकार हो जाती हैं और कार्य स्थलों पर यौन हिंसा की शिकार भी होती हैं। सुबह जल्दी घर का काम पूर्ण करके श्रम बाजार समय पर पहुँचने और शाम को काम से लौटने के पश्चात फिर से घर का काम देर रात तक पूर्ण करने की मजूबरी दलित स्त्री को अपने स्वास्थ्य पर ध्यान देने का समय ही नहीं देती।

देखा जाये तो भारत में स्वास्थ्य सेवाओं का नवउदारवादी नितियों के बाद जिस तरह से निजीकरण हुआ है उसका प्रभाव सभी वर्गों की स्त्रियों पर पड़ा लेकिन हाशिये के समाजों की स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच ही चुनौतीपूर्ण हो गई है। नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे, इंडिया के अनुसार भारत की अधिकांश स्त्रियाँ खून की कमी का शिकार हैं और उनमें भी दलित स्त्रियों का प्रतिशत अधिक है। 25 से 49 आयु वर्ग की 55.9 प्रतिशत दलित स्त्रियाँ खून की कमी से ग्रस्त हैं। दलित स्त्रियाँ स्वास्थ्य के समक्ष दोहरे संकटों से गुजरती हैं, पहला तो यह कि उन्हें आर्थिक तंगी के कारण पौषटिक आधार उपलब्ध नहीं हो पाता है और दूसरा स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव भी उसे झेलना पड़ता है।

जो सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध हैं वे भी भेदभाव रहित नहीं हैं, वहाँ पर भी जाति आधारित भेदभाव अपने पूरी मजबूती के साथ उपस्थित है। अस्पतालों में दलित स्त्रियों पहुँचने के बाद किया जाने वाला व्यवहार भी इतना भेदभरा होता है कि उपचार से पहले ही उनका इस तंत्र से विश्वास उठ जाता है और उनमें से कई स्त्रियाँ पाखंडों की तरफ जाने को मजबूर हो जाती हैं। जो अपने ईलाज के लिए निजी अस्पतालों में जाती हैं वहाँ की उच्च फीस के कारण वे बीमारी भूलकर ईलाज के लिए होने वाले कर्ज की चिंताओं से ग्रसित हो जाती हैं। नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे, इंडिया के अनुसार दलित समुदाय की 70.4प्रतिशत स्त्रियों को स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच स्थापित करने में ही परेषानियों का सामना करना पड़ता है। 15 से 49 आयु वर्ग की उच्च वर्ग की स्त्रियों की तुलना में दलित वर्ग की केवल एक स्त्री को पौषटिक खान-पान उपलब्ध हो पाता है। ऐसा इसलिए होता है कि देश में रोजगार के साधनों के निजीकरण होने का सर्वाधिक प्रभाव दलित स्त्रियों पर पड़ा क्योंकि एक तरफ उनके कामों का मशीनीकरण कर दिया गया तो दूसरी तरफ नस्लीय सौन्दर्य प्रतिमानों के आधारों पर उसे सभी कामों से दूर कर दिया। ये निजी कारखाने अस्पृष्यता के नए अड्डे बनकर उभरे और श्रम के सौन्दर्य का हाशियाकरण कर दिया।

दलित स्त्रियों के स्वास्थ्य में आने वाले अवरोधों में रूढ़ीवादी धारणाएं और परम्पराएं भी प्रमुख हैं। इन परम्पराओं का विस्तार गाँव से लेकर शहरों तक में देखा जा सकता है। आज भी भारतीय समाज अंधविश्वास और घोर पाखंडों से घिरा हुआ है जहाँ पर पोषण के अभाव और अन्य बीमारियों को दैवीय प्रकोप माना जाता है। इन दैवीय प्रकोपों को दूर करने के लिए अनेक तरह के आर्थिक और शारीरिक शोषण के केंद्र पूरे देश में पाये जाते हैं। शिक्षा, चेतना और तर्क के अभाव में इन केंद्रों की मान्यताओं में किसी प्रकार की कमी नहीं दिखाई देती है। बहुत से लोग वैज्ञानिक उपचार के साथ-साथ इन परम्परागत रुढ़ीवादी तरीकों को भी अपनाते हैं और स्वास्थ्य बेहतर होने की स्थिति में हमेशा ही इन परम्परागत पाखण्डों को उसका श्रेय दिया जाता है। दरअसल, समाज अपनी मजबूरियों और डर की वजह से वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग करता है चाहे वह चिकित्सा हो या फिर जीवन के अन्य आयाम, उसकी सामूहिक चेतना का वैज्ञानिकरण होना अभी शेष है और इसी कारण से समाज अधिकांश कार्यों के एक अंतद्वन्द की स्थिति में रहता है। यह अंतद्वन्द परम्पराओं को त्यागकर आधुनिकता की देहरी पर आने की इच्छाओं के होने की बजाय ऐसे ज्यादा होते हैं कि कैसे आधुनिकता के उपकरणों का पूरा उपभोग करते हुए चेतना को परम्परागत दृष्टिकोण से संबद्ध कर पायें।

स्वास्थ्य सुविधाओं को समाज की प्राथमिक ढ़ाँचागत विकास से अलग करके नहीं देखा जा सकता है क्योंकि देश के सुदूर गाँवों से कस्बों के स्वास्थ्य केंद्रों तक जाना अपने आप में मुश्किल काम है और अगर कोई दलित स्त्री तमाम मुश्किलों को झेलते हुए वहाँ तक पहुँच भी जाए तो उसका ईलाज सुनिश्चित नहीं है। वहाँ ना तो पर्याप्त उपकरण होते हैं और ना ही अन्य सुविधाएं।

संविधान में स्वास्थ्य राज्य अनुसूची का विषय है लेकिन केंद्र की भूमिका मार्गदर्शक के रूप में हमेशा रहती है। स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण को नए रूप में सामने लाकर उसे पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) का नाम दिया जाता है। इस मॉडल के तहत जमीन और भवन से लेकर तमाम सरकारी सुविधाओं से बने स्वास्थ्य केंद्र और अस्पतालों को प्रबंधन के नाम पर निजी कम्पनियों को उपलब्ध कराया जाता है जो जनता से सेवाओं के बदले में फीस प्राप्त करते हैं। जब सारे संसाधन सरकार के पास उपलब्ध हैं तो उसका बेहतर उपयोग सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के लिए किया जाना चाहिए। वैसे तो स्वास्थ्य के स्तर पर गुणवत्तापूर्ण सेवाओं का अभाव पूरे विश्व में है लेकिन विकसित देशों में स्वास्थ्य पर अपने बजट का बहुत बड़ा हिस्सा खर्च किया जाता है जिससे वहाँ के स्वास्थ्य सूचकांक में बढ़ोतरी हो जाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुसार विश्व में एक हजार लोगों पर एक डॉक्टर होना आवश्यक है और भारत में सत्रह सौ लोग पर एक डॉक्टर उपलब्ध है और यही स्थिति सन् 2016 में प्रति व्यक्ति की लिए तय साढ़े तीन बैडों की है कि यहाँ पर केवल 1.3 प्रति व्यक्ति बिस्तर उपलब्ध हैं।

भारत के स्वास्थ्य के सांस्कृतिक ऐतिहासिक परिपेक्ष्य को देखना भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आधुनिकता की देहरी पर आकर भी यहाँ के लोगों की चेतना में स्वास्थ्य को लेकर किसी तरह की सजगता नहीं है क्योंकि वे जीवन के भौतिक अस्तित्व की बजाय उसके परलौकिक अस्तित्व को ज्यादा महत्वपूर्ण मानते हैं और मनुष्य के बेहतर भविष्य की परिकल्पना निर्धारण में पुनर्जन्म और नियतिवाद का महत्वपूर्ण स्थान होता है। इसलिए यहाँ के लोगों में श्रम प्रधान जीवन होने के बावजूद भी स्वास्थ्य को प्राकृतिक उपचारों से भी नहीं जोड़ा गया। इसकी संलग्नता दिखाई देती है ब्राह्मणवादी आर्थिक संरचना में जहाँ पर किसी भी प्रकार के अस्वास्थ्य के उपचार को एक निश्चित फीस जिसे ‘दक्षिणा’ कहा जाता है उसे देकर प्राप्त किया जा सकता है। जब भी समाज में स्वास्थ्य पर चर्चा होती तो उसका सांस्कृतिक पक्ष अंत में ब्राह्मणवाद के पोषक की भूमिका निभाता। इसका एक प्रभाव यह हुआ कि लोग राज्य से सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की माँग करने और चुनावी राजनीति में स्वास्थ्य एक जन अधिकार के रूप में सामने आने से वंचित हो गया, पूरे चक्र में कुछ लोग ब्राह्मणवादी संस्कृति की पोषक और लाभकारी पक्षों की भूमिका में उपस्थित थे तो कुछ उसकी पूर्ती के पक्षधर छोटे घटकों के रूप में थे। दलित स्त्री के जीवन में इसका विपरीत प्रभाव इसलिए पड़ा क्योंकि वह ब्राह्मणवादी संस्कृति के पोषक तत्वों में होने की बजाय उसके शोषितों में से थी और वह किसी भी प्रकार से उसके छोटे पक्षधर घटकों में भी नहीं थी।

दलित स्त्री की सांस्कृतिक अवस्थिति ही ऐसी है कि वह सभी परम्परावादी जकड़नों की अंतिम भुक्ता होती है। यही स्थिति स्वास्थ्य सेवाओं की हुई क्योंकि जब दलित पितृसत्ता के सभी अत्याचारों और अवसादों से उत्पन्न स्थिति की पीड़ायें झेलती है। विवाह संस्था जिस तरह से भारतीय समाज में जकड़नों से युक्त है वह स्त्री के स्वास्थ्य के भविष्य को निर्धारित कर देती है। बाल विवाह, बेमेल विवाह आदि सामाजिक अभिशापों के कारण देश में स्वस्थ गर्भवती प्रतिशत बहुत कम पाया जाता है। स्त्री का स्वास्थ समय के दो बिंदुओं पर आकर निर्धारित होता है और पितृसत्ता में वह हमेशा उसके मानवीय अधिकारों के विपरीत ही जाता है। इस व्यवस्था में पहला बिंदु स्त्री का पैदा होना है जहाँ पर पिता के घर में उसको प्राप्त होने वाले भोजन, खेलकूद और विकास के अन्य अवसर सामाजिक स्तरीकरण में सबसे नीचे के पायदान पर चले जाते हैं। घर में उसे सबसे बाद और बचा हुआ खाना दिया जाता है। बीमारी की स्थिति में भी लड़कों को तो अस्पताल में ले जाया जाता है और लड़कियों को झाड़-फूक के हवाले करके उनके जीवन के प्रति लापरवाही बरती जाती है।

दूसरा बिंदु आता है स्त्री की शादी का जिसमें उसकी किसी प्रकार की सहमति लिए बिना उसे अपरीचित लोगों के बीच भेज दिया जाता है जहाँ निर्णय लेने में उसकी भागीदारी तो दूर की बात है, उसकी परेशानियों को ठीक से सुनने वाला भी कोई नहीं होता। उसे देह के उपभोग और बच्चा पैदा करने वाली मशीषीन के रूप में देखा जाता है। इसी व्यवस्था का परिणाम है, ‘‘42.2प्रतिशत भारतीय महिलाएं गर्भावस्था की शुरुआत में कम वज़न की होती हैं। इसका मतलब है कि उनका भार सूचकांक 18.5 से कम रहता है जो, जीर्ण ऊर्जा की कमी के लिए, खाद्य व कृषि संगठन द्वारा बताई गई न्यूनतम सीमा है। कम वज़न वाली गर्भवती महिलाओं में यह दर दुनिया के गरीब और कम विकसित क्षेत्रों की तुलना में भी बहुत ज्यादा है, सब-सहारा अफ्रीका के गरीब देशों में गर्भावस्था की शुरुआत में केवल 16प्रतिशत महिलाएँ ही कम वज़न की होती हैं।’’ भारत की स्त्रियाँ जब गर्भावस्था में ही कम वज़न की होती है तो गर्भ के बाद तो निश्चित रूप से उनके पोषण पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाता है वे जल्दी ही कैल्षियम की कमी की षिकार हो जाती हैं जिसके कारण इन्हें हड्डियों और दाँतों के बहुत रोगों का सामना करना होता है।

चूँकी दलित स्त्रियाँ अधिकांश खेत मजूदरी जैसे असंगठित क्षेत्र के कामों में लगी होती हैं जहाँ पर किसी प्रकार की प्रसुति सुविधाओं के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता है। वे बच्चा पैदा होने के कुछ समय बाद ही काम पर जाने को मजबूर हो जाती हैं जहाँ पर भारी मेहनत और पोषण के अभाव में वे कई तरह की बीमारियों से ग्रसित हो जाती हैं। घर में मिलने वाले पोषण की स्थिति भी उसकी द्वारा पैदा किये गए बच्चे के जेंडर पर निर्भर करती है अगर लड़का होता है तो कुछ पोषण युक्त भोजन मिलने की संभावनाएँ हो जाती हैं क्योंकि दलित पितृसत्ता को अपना वंश चलाने के लिए लड़के की आवश्यकता होती है। जबकि लड़की होने पर जच्चा और बच्ची दोनों के प्रति एक रूखापन पैदा हो जाता है। इसे ‘अशुभ’ मानकर परिवार के लिए हानिकारक माना जाता है क्योंकि लड़की के विवाह में दहेज देना होता है जबकि लड़के के विवाह में दहेज प्राप्त होता है। यह स्थिति भारत में आम है जो सवर्ण परिवारों में भी पाई जाती है क्योंकि वहाँ पर भी पितृसत्ता उसी तरह से सभी कार्य-व्यवहारों को नियंत्रित करती है। लेकिन दलित स्त्रियों और सवर्ण स्त्रियों के गर्भावस्था और बच्चा पैदा होने के बाद की स्थितियों में एक महत्वपूर्ण अंतर यह है कि दलित स्त्रियों को गरीबी के कारण काम पर जाने की मजबूरी में जीना पड़ता है जहाँ पर सामान्यतः गाँवों में जमींदार और शहरों में ठेकेदार उनसे कठोर परिश्रम करवाते हैं। वहाँ किसी तरह की सुविधाओं का होना तो दूर कुछ समय के लिए छाया में सुस्ता भी लिया जाता है जो जमींदार और ठेकेदार के प्रतिनिधियों की डाँट पड़ती है और दिहाड़ी काट लेने का संकट हरपल की मानसिक परेषानी बनकर उपस्थित रहता है। अपने नवजात शिशु के प्रति लगाव से वे इतनी जुड़ी हुई होती हैं कि काम करते हुए भी हरपल उस पर ध्यान रहता है। जबकि सवर्ण स्त्रियों को एक तो घर से बाहर काम करने नहीं जाना पड़ता है जिससे वे उस कठिन मेहनत से बच जाती हैं। दूसरा उस पूरी मानसिक प्रताड़ना का शिकार भी नहीं होती हैं। फिर भी उन्हें पितृसत्ता के द्वारा पैदा किये गए सभी उत्पीड़नों को सहन करना पड़ता है। उन्हें बाहर तो मजदूरी नहीं करनी होती लेकिन एक घरेलू कामगार के रूप में अपने ही घर का सारा काम करना होता है जिससे उसके स्वास्थ्य पर भी विपरीत असर पड़ता है।

दलित स्त्री को प्रसव काल के दौरान मजदूरी और घर का कार्य दोनों ही करने होते हैं तो उसको थकान अधिक होती है और अधिक ऊर्जा और पौषटिक आहार की आवश्यकता होती है जो उन्हें उपलब्ध नहीं हो पाती हैं। एक तो पहले से ही आर्थिक स्थिति इतनी खराब होती है और फिर शिशु के पैदा होने के बाद निभाई जाने वाली विभिन्न रस्मों और उनमें दिये जाने वाले उपहारों का इतना अधिक आर्थिक दबाव होता है जो केवल स्त्री को ही सहन करना पड़ता है। पुरुष को इसके बारे में बताने पर वह कह देगा कि इनकी कोई आवश्यकता नहीं है और फिर वह ही यह भी कह देगा कि मेरे रिश्तेदारों को उचित उपहार न देकर मेरा अपमान किया है। यह एक तरह से मानसिक उत्पीड़न का दौर भी होता है। उपहारों से किसी को भी खुष नहीं किया जा सकता क्योंकि यह उपहार अपने मन से देने वाले उपहार न होकर एक सामाजिक दबाव होते हैं जो हर परिस्थिति में दिया जाना आवश्यक है। अभी जिस तरह से आधुनिक बाजार का विस्तार हुआ है उसमें यह उपहार रूपी सामाजिक उत्पीड़न ने अधिक व्यवस्थित और एकरूपता का स्परूप धारण कर लिया है। इन्हें राजस्थान की स्थानीय भाषा में ‘लाग’ कहा जाता है यही उसी प्रकार से है जैसे राजाशाही व्यवस्था के दौरान राज परिवार हर उत्सव और विलासिता के लिए जनता से वसूल की जाती थी। इनमें अन्तर सिर्फ इतना है कि सामाजिक व्यवस्था के तौर पर स्थापित है और वह अधिकांश रूप से स्त्रियों को ही निभानी होती है। इस ‘लाग’ का एक बड़ा पक्ष पुराहितवाद को समर्पित हो जाता है, कुछ हिस्सा परिवार के मुखियाओं को मिलता है और कुछ हिस्सा स्त्रियों को मिलता है। पहले दोनों पक्षों को मिलने वाला हिस्सा अधिकांश अर्थ के स्वरूप में होता है। स्त्रियों को दिया जाने वाला भाग उन सौन्दर्यपरक आयामों को पूरा करने वाला होता है जो पितृसत्ता द्वारा निर्मित किये जाते हैं। अर्थात पूरी ‘लाग’ का स्वरूप ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के अनुकूल होता है। यहाँ पर ‘स्त्री ही स्त्री की दुश्मन है’ जैसे मुहावरे भी कई स्त्रीवादियों द्वारा सुने जा सकते हैं लेकिन मेरा मानना है कि यहाँ पर स्त्री और पुरुष की बजाय वह मानसिकता अधिक महत्वपूर्ण हो प्रभावी होती है जिससे वे संचालित होते हैं। स्त्रियाँ भी उसी मानसिकता के तहत ऐसा व्यवहार करती हैं। देखा जाये तो पुरुष को इस पितृसत्तात्मक व्यवस्था से बहुत अवसर और लाभ मिले हैं लेकिन उसका मन और विवेक भी तो समानता और बराबरी के उन्मुक्त समाज में अपने मानवीय विकास को उच्चतम स्तर तक ले जाने को करता ही है। वह अपनी प्रकृति से तो प्रेम, शांति और बराबरी में जीना चाहता है, यह व्यवस्था ही उसे इस सुनहरे भविष्य की तरफ जाने से रोकती है।

नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे के अनुसार आज देश में 70.4प्रतिशत दलित स्त्रियों की स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच ही नहीं बन पा रही है। स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव के साथ उन्हें स्वास्थ्य के लिए बाहर जाने की अनुमति नहीं होना भी इसका एक कारण हैं।

इन सभी कारणों के उपस्थित होने और पूरी तरह से लोगों के जीवन को प्रभावित और नियंत्रित करने के उपरांत राज्य की भूमिका का विश्लेषणआवश्यक है। राज्य ने किन तरीकों से अंधविश्वासों को समाप्त करने की कोशिश की है, बेहतर स्वास्थ्य के लिए दलित स्त्रियों के लिए बजट में क्या प्रावधान किये गये हैं, उनका क्रियांवन कितना हुआ है आदि ऐसे प्रमुख प्रष्न हैं जो वर्तमान संकटों को स्पष्ट करने के साथ भविष्य की एक रूपरेखा भी सामने रखते हैं। यह जिम्मेदारियाँ राज्य की इसलिए हो जाती हैं कि संविधान का लक्ष्य ही एक समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतांत्रिक राज्य की स्थापना करना है और संविधान के अनुच्छेद 46 में यह स्पष्ट किया गया है कि कमजोर वर्गों की शिक्षा और आर्थिक हितों का विशेष ध्यान रखकर उन्हें प्रोत्साहित करेगा। खासकर अनुसूचित जाति और जनजाति का, उन्हें सभी प्रकार के शोषण से बचायेगा और सामाजिक अन्याय से उनकी रक्षा करेगा। इस का पूरी तरफ से प्राप्त् न कर पाने के विभिन्न कारणों में एक कारण यह भी है कि भारतीय राजनीति में जाति की भूमिका समाज में जाति की भूमिका की तरह की प्रभावित रही। राजनीति समाज से आगे चलकर उसे परिवर्तन के लिए प्रेरित करने में असफल रही। जहाँ आवश्यकता हुई वहाँ पर जाति का अपने पक्ष में उपयोग कर लिया और अन्य जगहों पर स्वयं को जातिवाद से मुक्त घोषित किया। भारतीय राजनीति में यह ‘सहूलियत की समझदारी’ का जो प्रतिमान विकसित हुआ उसका इतना अधिक विकेंद्रीकरण हुआ कि हर सार्वजनिक सवालों पर जाति का अपनी सहूलियत के अनुसार उपयोग होने लगा।

सन् 2017-18 के केंद्रीय बजट में दलित आदिवासी महिलाओं के लिए कुल रुपये 2,322 करोड़ रुपये आवंटित किये गए जो कुल बजट का यह लैंगिक बजट सिर्फ 0.11प्रतिशत है।7   दलित स्त्रियों के लिए इतनी कम मात्रा में बजट के आवंटन में सारी सुविधाएँ शामिल होती हैं जो उनके शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य सुविधाओं पर विशेष ध्यान देकर समाज की मुख्यधारा में लाने का प्रयास होता है। ऐसी स्थिति में उनके स्वास्थ्य के स्तर के ग्राफ को बहुत अधिक उठाये जाने की संभावनाएँ नहीं बनती हैं। बहुत से दलित कार्यकताओं की माँग है कि संख्या के आधार पर बजट का आवंटन होना चाहिए जो जितनी संख्या में है उसे उतना ही बजट दिया जाये। मेरा मानना है कि उत्पीड़ित तबकों को उनकी संख्या से दोगुना अधिक बजट का प्रावधान कम से कम होना चाहिए और स्वास्थ्य जैसे जीवन के प्रमुख सवालों पर तो इसमें कोई समझौता नहीं होना चाहिए। दोगुना इसलिए हो कि एक तो वर्तमान में उनके स्वास्थ्य तक पहुँच और विश्वास स्थापित करने में ही खर्च हो जायेगा और दूसरा भाग उन्हें उन्नत स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने में लगाना होगा। समाज को अंधविश्वास से मुक्ति दिलाकर उन्हें वैज्ञानिक चेतना के प्रसार की तरफ ले जाने के प्रति राज्य के कोई विशेष प्रयास नहीं दिखाई देते हैं। ऐसे योजनाओं का भी पूर्ण अभाव है जो दलित स्त्री के कार्यस्थलों पर स्वास्थ्य के मानकों को निर्धारित और नियंत्रित करे क्योंकि वह कार्यस्थल पर शक्ति संरचना में घर से भी कमजोर हो जाती है और किसी प्रकार की सुविधाओं की माँग करने की बात तो दूर अपनी असहजता को भी व्यक्त नहीं कर पाती है। दलित स्त्रियों के कार्यस्थल उनके लिए भययुक्त और असुरक्षित होते हैं। वहाँ पर उस असंगठित क्षेत्र के बारे में श्रम कानूनों बनाकर राज्य को श्रमिकों के हितों को सुरक्षित रखना चाहिए। सामान्यतः होता ऐसा है कि असंगठित क्षेत्र में जमींदार और ठेकेदार की कोई जवाबदेहिता नहीं होती श्रमिक के प्रति और यह इसलिए नहीं होती के वे किसी कानून की परीधि में नहीं आते हैं।

यह राज्य के समक्ष बहुत बड़ी चुनौती है कि भारत की जनसंख्या जिन विभिन्न भौगोलिक इलाकों के स्थिति हैं वहाँ के अपने कुछ प्राकृतिक संकट हैं। इन विविध संकटों के अनुरूप योजनाएँ बने और यह सुनिश्चित हो कि अगर मरीज स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच बनाने में संकट या चुनौती महसूस कर रहा है तो स्वास्थ्य सेवाएँ उनके घर तक पहुंचाई जाएँ। दलित स्त्रियों के बीच प्रचलित अंधविश्वास और अन्य परम्परागत धारणा को शिक्षा के माध्यम से तो तोड़ा जाए ही साथ ही, उन्हें एकविश्वास दिलाया जाए कि सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली किसी भी निजी स्वास्थ्य प्रणाली से कमजोर नहीं है। वहाँ पर अधिक योग्य चिकित्सक, मशीनें और दवाइयाँ उपलब्ध हैं और सरकार यह सब किसी विशेष लाभ के लिए ना करके अपने जिम्मेदारी निभाने के लिए कर रही है। उन्हें सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधा स्थलों पर सहजता अनुभव हो जो सभी असमानतापूर्ण व्यवहार को समाप्त करके भी स्थापित की जा सकती हैं। उन्हें ऐसा लगना चाहिए कि इन स्वास्थ्य केंद्रों पर उनके साथ बहुत सम्मानजनक व्यवहार होता है और यहाँ पर समाज में प्रचलित अन्यायकारी धारणाएँ उपस्थित नहीं हैं।
राज्य को आर्थिक असमानता को मिटाने के लिए संचालित होने वाली योजनाओं में दलित स्त्रियों पर विशेष ध्यान देना होगा। स्वास्थ्य स्थलों पर पहुँचने के बाद सबसे बड़ी चुनौती आती है कि जिस तरह की दवाइयाँ सुझाई जाती हैं वह सरकारी अस्पताल में उपलब्ध ही नहीं होती हैं। बाहर निजी दुकानों पर उनकी कीमतें इतनी अधिक होती हैं कि एक दवा लेने के बाद मरीज दोबारा अस्पताल की तरफ आता ही नहीं है। एक तो दलित स्त्रियाँ जब भी स्वास्थ्य सेवाओं के लिए स्वास्थ्य केंद्रों पर जाती हैं तो उन्हें काम से छुट्टी लेनी होती है जिसके कारण दिहाड़ी का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। वहीं जब दवाइयाँ भी निजी दुकानों से खरीदनी पड़ती हैं तो वे इस आर्थिक भार को सहन नहीं कर पाती हैं। इसलिए राज्य को स्वास्थ्य के निजीकरण को रोककर उसे पूरी तरह निशुल्क, पारदर्शी और सहज उपलब्धता स्थापित करनी होगी।

भारत में स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक चुनौती चिकित्सकों का अभाव भी है और उसका कारण यह है कि सरकारी सेवाओं को चिकित्सकों को उचित वेतनमान और सुविधाएँ उपलब्ध न होने के कारण वे निजी क्षेत्र में चले जाते हैं। यह एक बहुत व्यापक प्रवृति के रूप में स्थापित हो चुका है। इस प्रक्रिया को रोकने के लिए आवश्यक है कि चिकित्सकों के वेतनमानों को बढ़ाया जाए और उन्हें ऐसी सुविधाएँ दी जाएँ कि वे सरकारी क्षेत्र में अपनी सेवाओं को अधिक प्रतिबद्धता और मन से प्रदान कर पायें। साथ ही, चिकित्सा के अध्ययन के लिए सरकारी मेडिकल कोलेजों की संख्या बढ़ाने और उनकी गुणवत्ता में सुधार की आवश्यकता है।

दलित स्त्री के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए राज्य को अपनी संस्थाओं को मजबूत और कार्यकारी बनाना होगा और निजीकरण को रोकना होगा। साथ ही, जाति उन्मूलन के लिए प्रयासों की आवश्यकता है जहाँ पर लोगों की चेतना का विस्तार होकर वे विवेकवान बन सकें। नीति निर्माण के दौरान स्वास्थ्य की नीतियों में दलित स्त्रियों की भागीदारी और उनके कार्यस्थलों पर सुविधाओं की सुनिश्चित करना भी आवश्यक है।

 
संदीप कुमार मील, शोधार्थी, राजनीति विज्ञान विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर. सम्पर्क: 9636036561

 सन्दर्भ : 
1. http://www.who.int/about-us
2. http://worldpopulationreview.com/countries/median-age/
3. काँचा इल्लैया, हिन्दुत्वमुक्त भारत: दलित-बहुजन-सामाजिक-आध्यात्मिक और वैज्ञानिक क्रांति, सेज पब्लिकेशन इंडिया प्रा. लिमिटेड, नई दिल्ली,      2017, पृ.4।
4. http://thewirehindi.com/34320/average-dalit-women-die-younger-than-       higher-caste-women-says-un-report/
5.http://www.rightlivelihoodaward.org/fileadmin/Files/PDF/Literature_Recipients/Manorama/Background_Manorama.pdf
6. डियाने काफ़े, सामाजिक पदक्रम में हैसियत, गर्भवती महिलाओं का स्वास्थ्य और देश का विकास, सेंटर फॉर दि एडवांस स्टडी ऑफ़ इंडिया (पेनिसिलिया विश्वविद्यालय का एक चैप्टर)
7. दलित-आदिवासी बजट विश्लेषण 2017-18, राष्ट्रीय दलित मानवाधिकार अभियान-दलित आर्थिक अधिकार आंदोलन

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पारदर्शी अधोवस्त्र में कास्टिंग का आमंत्रण: मर्दवादी कुंठा या स्त्री सेक्सुअलिटी का प्रतीक?

सुशील मानव 

पिछले दिनों कलाकारों के लिए कास्टिंग कॉल के एक विज्ञापन में सिर रहित अधोवस्त्र में स्त्री की तस्वीर पर कुछ रंगकर्मियों, कलकारों, साहित्यकारों ने सवाल उठाये. फिल्म के डायरेक्टर ने अपनी सफाई भी दी. सुशील मानव ने इस विवाद का विश्लेषण किया है: 


यशपाल का एक उपन्यास है दिव्या। उपन्यास में कला को जीवन पूर्ति का साधन मानने वाला मूर्तिकार मॉरिस एक मूर्ति बनाता है। एक औरत की मूर्ति। मूर्ति में सिर्फ वक्ष और योनि है। एक मूर्तिकार की यह डेढ़ हजार साल पहले की स्त्री परिभाषा है। और एक युवा फिल्म निर्देशक हैं पवन के. श्रीवास्तव। बिहार के पवन श्रीवास्तव क्राउड फंडिंग से फिल्म बनाकर चर्चा में आये थे.  इक्कीसवीं सदी के इस युवा निर्देशक की अपनी परिभाषा में भी स्त्री वक्ष और योनि है। माने डेढ़ साल के वक्त में चाहे भले ही दुनिया बदल गई है लेकिन पुरुष की सोच में स्त्री की परिभाषा असका स्वरूप नहीं बदला है।

उन्होंने अपने फेसबुक वॉल पर नई फिल्म की कास्टिंग कॉल के लिए एक इश्तहार दिया है। इश्तहार में उसी मूर्ति की तर्ज पर एक जनान धड़ है बिकिनी पहने हुए, सिर और पाँव विहीन धड़। जिसके बगल में लिखा है 20-35 उम्र की लड़कियां (15) चाहिए। और 20-40 उम्र के आदमी (10) चाहिए। फिल्म के कास्टिंग कॉल के लिए दिए उस इश्तहार की तस्वीर पर ख्यातिलब्ध नाट्यकर्मी और गारी विधा की लोकगायिका विभारानी ने आपत्ति करते हुए अपने फेसबुक वॉल पर लिखा- ‘भाई मेरे। आप कास्टिंग कॉल कर रहे हैं या आपकी मंशा कुछ और है? 20 से 35 साल तक कि लड़कियों की आपकी फ़िल्म में ज़रूरत का मतलब यह तो नही कि लड़कियां ऐसी ही होती हैं । तनिक दिमाग से काम लीजिए।’

कवयित्री मृदुला शुक्ला विभारानी की पोस्ट में कमेंट करते हुए और एक तरह से फिल्म डायरेक्टर को सपोर्ट करते हुए लिखती हैं-‘यह अच्छा तरीका है इस तरह से लड़कियां खुद सोच समझ कर ऑडिशन के लिए जाएंगी यह अच्छा तरीका है इस तरह से लड़कियां खुद सोच समझ कर ऑडिशन के लिए जाएंगी’
वीणा पाठक निर्देशक के सौंदर्यबोध पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए कमेंट में लिखती हैं,- ‘दिमाग हो तब न ,यहां तो सिर्फ आंखें हैं ,सौन्दर्यबोध आएगा कहाँ से।’

50 के दशक में कास्टिंग

पत्रकार निराला युवा डायरेक्टर के बहाने प्रगतशीलों और वामपंथियों पर अतिरिक्त निशाना साधते हुए अपनी वॉल पर लिखते हैं,-‘मैम, इनकी इतनी कारगुजारी और हरकत से ही आप चकित हैं? फेहरिश्त लम्बी है। ढेरो किस्से हैं। और यह सब सामाजिक न्याय,जेएनयू की प्रगतिशीलता, वामपंथ, जनपक्षधारिता,सरोकार,सिनेमा आदि का मुलम्मा चढ़ाकर होता है। दिल्ली और दूसरे शहर के भी कुछ फैशनिया-रोमांटिक कामरेड साथी और कुछ सतही सामाजिक न्याय धारी इनका झंडा उठाये फिरते हैं।’

एक पोस्ट से प्रगतिशीलों पर निशाना का कार्य पूरा न होते देख निराला  दूसरा लगाकर लिखते हैं-‘स्त्री को नँगा करने और नँगा कर बेचने से पहले ब्राम्हणवाद को गरियाने और सामाजिक न्याय का छद्म चादर ओढ़ने का नया फैशन चला है। खासकर सिनेमा,साहित्य,कला की दुनिया मे। ऐसे खिलाड़ी एक और तैयारी इसके पहले करते हैं। फैशनिया प्रगतिशीलों,रोमांटिक वामियों और बिना अपनी जानकारी के भेड़चाल चलनेवाले सामाजिक न्याय के सो कॉल्ड बुद्धिजीवियों को अपने साथ करते हैं।
दिल्ली के साथियों को आगाह करनेवाली सूचना है।खासकर पत्रकार साथियों को जो जल्दबाजी में किसी को क्रांतिकारी,प्रगतिशील,सरोकारी,स्त्रीवादी,समाजिकन्यायवादी घोषित और साबित करते हैं। और हां, यह पोस्ट सामान्यीकरण कर न पढ़े। सबको इससे रिलेट न करें।’

मंदाकिनी मिश्रा विभारानी की पोस्ट पर तर्क करते हुए लिखती हैं,-  ‘ लड़के की अंडरवियर में फोटो नहीं डाली लड़की ही क्यूँ, लड़के भी तो चाहिए’।

सामाजिक कार्यकर्ता कवि संपादक और रंगकर्मी राजेश चंद्र ने कमेंट में लिखा है- ‘इन्हें बस जिस्म चाहिये, प्लेट में सजा कर। शर्मनाक।’

एक्टिंग शिक्षक और स्कूल ऑफ एक्टिंग ACTENECT गुड़गाँव में डायरेक्टर महेश वशिष्ठ लड़कियों को ही दोषी ठहराते हुए लिखते हैं- ‘और तकलीफदेह ये कि पहुंच जाती हैं लड़कियां।हमारी लड़कियों को परिपक्वता से काम लेना चाहिए न कि फिल्म में रोल करने की भावनाओं में बह कर।’
विभारानी महेश वशिष्ठ के कमेंट पर मुँहतोड़ जवाब देती हैं,-‘आप फिर किसी दूसरी जगह बात को ले जा रहे हैं और चीजे लड़कियों पर थोप रहे हैं। मेरा कहना है कि लड़कियां हमेशा परोसी जाती हैं। जो परोसने वाले हैं, उन पर बात कीजिए। इस पोस्टर को बनानेवाले की बात कीजिए ना कि लड़कियों पर। क्या लड़कियां फिल्म में काम ना करें? घर में बैठकर चूल्हा-चौका करें और क्या घर में भी ये सुरक्षित रह जाती हैं? हर चीज में लड़कियों पर तोहमत देना बंद कीजिए।’

विभा रानी के कमेंट का समर्थन करते हुए प्रणीता सिंह सीधे महेश वशिष्ठ से मुखातिब होती हैं-‘महेश वशिष्ठ जी मैं आपसे आदरपूर्वक कहना चाहूंगी कि जिस तरह पुरुषों में आगे बढ़ने की इच्छा होती है, अपनी प्रतिभा दिखाने की चाह होती है उसी तरह स्त्रियों में भी आगे बढ़ने की और अपनी प्रतिभा दिखाने की चाह होती है। फिल्मों में काम करना क्या पुरुषों का ही हक है ? आप स्त्रियों की तुलना पशुओं से करना चाहते हैं या मशीन से जो भावना शून्य हो कर पुरुष व परिवार की तीमारदारी करती रहे। उसका अपना कोई वजूद ना रहे।’
तिस पर पर विडंबना ये कि महेश वशिष्ठ जैसे बुजुर्ग शिक्षक ‘वेश्याएं न हों तो समाज गंदा हो’ जैसे मर्दवादी सामंती मुहावरों के तर्ज पर पुनः प्रतिक्रिया देते हुए लिखते हैं,- ‘यानि कोई घटिया सोच वाला हमें कीचड़ के गड्ढे में डालने का निमंत्रण दे तो हम बिना सोचे समझे आंख मूंद कर चले जाना चाहिए???’

कास्टिंग डायरेक्टर शानू शर्मा

ऑल इंडिया रेडियो-आकाशवाणी और दूरदर्शन जैसे संस्थानों के लिए जर्नलिज्म करने वाले और नाम के साथ सोशल एक्टीविस्ट जोड़ने वाले बिनय कुमार सिंह अपने सामंती मूल्य को सँजोते हुए लिखते हैं,-‘विभा जी!लड़कियां परोसी नहीं जा रही है,बल्कि वे खुद प्रस्तुत हो रही है। उनके लिए सुख संसाधन और ऐश्वर्या सब कुछ है। यही भूमण्डलीकरण और ग्लोबलाइजेशन है। इसलिए जो जा रहीं हैं वे इस बात से चिंतित नहीं है,आप नाहक परेशान हो रही हैं। यह चलेगा हमारे आपके रोकने से रुकने वाला नहीं है। “जिस्म की बेहया नुमाईश है,गीत जैसे कि उसपे मालिश है।”
सीमा मलिक ने बिनय कुमार को जवाब देते हुए पूछा है कि,-‘क्या महत्वाकांक्षा और ऐश्वर्यपूर्ण जीवन जीना सभी का विशेषाधिकार नहीं है?’

आगे बिनय कुमार को ही उत्तर देते हुए संगीत निर्देशक बापी तुतुल लिखते हैं,-‘प्रिय बिनय जी, मैं विभा दीदी के साथ सहमत हूं क्योंकि ये हमारीवो हिंदी फिल्म उद्योग नहीं है, जो होती थी उदाहरण के लिए हमने मीना कुमारी, नर्गिस, इतने सारे कलाकार # महिला #देखेहैं जिन्होंने समाज में इतना योगदान दिया है।जो मैं निजी रूप से नापसंद करता हूं वह है पोस्टर की सामग्री और पोस्टर तस्वीर में अपमानजनक महिलाएं हैं।हां हम बहुत खुले दिमाग के हैं लेकिन यह ऑडिशन कॉल का पिक्चर नहीं है बल्कि एक महिला अंडरगारमेंटबेंचने का विज्ञापन है।’ ‘

मनोज गोयल निर्देशक तस्वीर को जस्टीफाई करते हुए लिखते हैं,- ‘मंशा साफ है प्रोड्यूसर की और उनके विज्ञापन में वह सही अर्थों में दिख रही है। प्रोड्यूसर एक ऐसी फ़िल्म बनाने जा रहे हैं जिसमें अंगप्रदर्शन बहुत ज्यादा होगा। अब इस विज्ञापन को देख कर सिर्फ ऐसे कलाकार ही सम्पर्क करेंगे जो ऐसी फिल्म में सहजता से काम कर सकें। प्रोड्यूसर ने शुरू में ही बता दिया फ़िल्म में यह सब होगा if you are ready to do so then only you welcome’

अंजली बाजपेयी लिखती हैं,- ‘गर इतिहास से लेकर आज तक के आधुनिक जगत पर गौर करे तो हम यही पाएगे की औरत को हमेशा कौमोडिटि समझा गया। जब औरत की बात करते है तो उसकी सुंदरता रूप रंग शारीरिक बनावट की बात जरूर करेगे । जैसे यही पैरामीटर किसी लड़की को योग्य या अयोग्य मानने के। ये बहुत शर्मनाक बात है की आज भी यही हो रहा है। यही वजह है की जब कोई आपसे १० बार कहें की आप बहुत खूबसूरत है तो फूल के कुप्पा होने की बजाय ये जाने की आखिर अगले के मन में चल क्या रहा है।’

पवन श्रीवास्तव

कास्टिंग कॉल के पोस्टर के विरोध में विभारानी के स्टैंड के बाद जिस तरह वर्तमान राजनीति में गुजरात दंगों या मॉब लिंचिंग के बाबत सवाल उठाने पर सत्तापक्ष केराजनेता अश्लील कुतर्क करते हुए 1984 के सिख दंगा का उदाहरण देकर मॉब लिंचिंग को जस्टीफाई करते हैं बिलुकल उसी तर्ज पर कुतर्क करते हुए फिल्म के डायरेक्टर पवन के. श्रीवास्तव तर्क देते हुए दूसरा पोस्ट लिखते हैं कि,- ‘एक फिल्म के कास्टिंग कॉल के लिए मेरे द्वारा पोस्ट की गई तस्वीर पर बहुत अधिक आपत्ति की गई है। मैं आपको बताता हूं कि मैंने कुछ सस्ता प्रचार हासिल करने की कोशिश नहीं की है या महिलाओं को वस्तुकरण नहीं किया है। पोस्टर में उपयोग की गई तस्वीर फिल्म के विषय के अनुसार बहुत उपयुक्त और कलात्मक रूप से सही है। इसका इस्तेमाल फिल्म के विषय के बारे में एक आइडिया देने के लिए किया गया है। मैं कास्टिंग के लिए आने वाले उम्मीदवारों को फिल्म की एक स्पिरिट बताना चाहता था। यह उन्हें गुमराह होने से बचाएगा। महिला का बिकनी में होना ऑब्जेक्टिफिकेशन नहीं हैं। यह सिर्फ एक पोशाक है। मेरी फिल्म महिलाओं और उनकी कामुकता के बारे में है, यह सेक्स के बारे में बात करती है और हां इसमें नग्नता भी है। तो मैं इसे पोस्टर के माध्यम से व्यक्त करना चाहता था। मुझे पता है कि मैं क्या कर रहा हूं और मुझे पता है कि जब हम इस तरह के एक संवेदनशील विषय में हाथ लगाते हैं तो राजनीतिक औचित्य क्या है। मैं आप सभी से अनुरोध करूंगा, इतना जजमेंटल मत बनो, मैं समाज को नुकसान पहुंचाने वाला कुछ भी नहीं कर रहा हूं। मैं एक कलाकार के रूप में अपनी ज़िम्मेदारी जानता हूँ। कृपया एजेंसी न बनें । मुझे मेरास्पेस दो।’

हो सकता है कि कल पवन के श्रीवास्तव स्त्री की सेक्सुअलिटी पर कोई सार्थक और संवेदनशील फिल्म बना ही लें लेकिन आज उनके द्वारा कास्टिंग कॉल के लिए जारी किये गये पोस्टर की तस्वीर उनकी स्त्री और स्त्री सेक्सुअलिटी की समझ पर सवाल खड़ी करती ही है। स्त्री अपनी सेक्सुअलिटी एक्सप्लोर करते हुए सिर्फ स्तन, नितम्ब और योनि नहीं हो जाती है-उसका सर गायब नहीं हो जाता, उसका व्यक्तिव घुट नहीं जाता। 

क्राउड फंडिंग से बनी पवन की फिल्म: नया पता

फिल्म और सिनेमा अभिव्यक्ति और सामाजिक बदलाव का सबसे सशक्त और कारगर हथियार है जिसका सबसे ज्यादा दुरुपयोग किया गया है। समाज में स्त्रियों को चुड़ैल, डायन और नागिन बनाकर स्थापित करने एवं समाज को स्त्रियों के प्रति असंवेदनशील बनाने में सिनेमा का बहुत बड़ा हाथ है। कुछेक अपवादों को छोड़ दें तो हिंदी फिल्में हमेशा से ही सामंतवादी मूल्यों की पोषक रही हैं। फिल्मों ने औरतों को अच्छी और बुरी दो कटेगरी में बाँटकर ही समाज में पेश किया है।अपनी सेक्सुअलिटीके प्रति जागरुक और पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव में अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाने वाली मर्दों के साथ कदमताल मिलाकर चलने वाले औरतों को हिंदी सिनेमा उद्योग वैंप बनाकर और स्त्री की यौनेच्छा को सामाजिक विकृति की तरह उभारकरपेश करता आया है। कुछेक लोगो को छोड़ दें तो हिंदी फिल्मोद्योग में स्त्री की छवि,स्थिति और उपस्थिति आज भी जस की तस है। पूँजीवादी बाजार और समाज में स्त्री के अंडरगार्मेंट्ससिर्फ एक पोशाक भर नहीं पुरुष की शिश्नोत्तेजना का साधन भी है। जिसका हिंदी फिल्में अपनी तरह से पर्दे पर इस्तेमाल करती रही हैं। मुख्यधारा के हिंदी फिल्मोद्योग में स्त्री को एक कमोडिटी से ज्यादा कुछ समझा ही नहीं गया। न कल न आज।

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छायावादी कविता में पितृसत्तात्मक अभिव्यक्ति

मनीष कुमार 
भक्तिकाव्य के बाद छायावादी काव्य अपनी युगीन संवेदनशीलता में अद्वितीय है| दो विश्व-युद्धों के बीच के इस युग की यह अद्वितीयता महज़ कैशोर्य भावुकता की संरक्षिका नहीं अपितु शाश्वत मानवीय संवेगों को ऊर्ध्वतर बनाने हेतु भी प्रतिबद्ध है| राजा राममोहन और ज्योतिबा फुले के सार्थक प्रयासों के उपरान्त गांधी – आंबेडकर युग में स्त्री अस्मिता को नए आयाम मिल रहे थे| वैश्विक परिदृश्य में रूसी क्रांति की सफलता के उपरान्त स्त्री को अनेक अधिकार दिए गए| अमेरिका और यूरोप में फर्स्ट-वेव फेमिनिज्म की सफलता मताधिकार के रूप में रेखांकित की जा सकती है| अतः समग्रता में दुनियावी परिवर्तन दिखाई पड़ते हैं| छायावादी कविता में अपने पूर्ववर्ती साहित्य से प्राप्त तमाम नैतिकताओं से प्रशंसनीय प्रश्नाकुलता का तेवर मौजूद है| इसकी स्त्री – पक्षधरता की परिव्याप्ति इस क़दर रही कि विरोधियों ने सजनी-सखी संप्रदाय कहकर उपहास किया| बावजूद इसके इस युग के प्रबुद्ध कवि भी पितृसत्तात्मक मूल्यों से पूर्णतः मुक्त नहीं हो पाए| दरअसल पितृसत्ता के बीज मानवीय – अवचेतन में इतने गहरे पैठे हैं कि अनजाने ही क्यूँ न सही, वे अंकुरित होने लगते हैं| छायावाद के अंतर्गत पितृसत्ता को रेखांकित करने हेतु क्रमवार कवियों का अध्ययन किया जायेगा-
छायावाद के शिखर-कवि जयशंकर प्रसाद की कालजयी कृति ‘कामायनी’ का एक रूपकमय बिम्ब है-
“सिन्धु सेज पर धरा वधू अब तनिक संकुचित बैठी-सी

प्रलय निशा की हलचल स्मृति में मान किये-सी ऐंठी-सी” …(‘आशा’ सर्ग)

धरा-रूपी बहू के साथ प्रलय-रूपी रात्रि में ऐसा हुआ कि उसकी स्मृति में ऐंठन का आविर्भाव हुआ? दरअसल परंपरागत भारतीय – दाम्पत्य जीवन के आरम्भ में अपरिचय की प्रक्रिया के दौरान देह से प्रेम (प्रायः पहले प्रेम फिर देह के स्थान पर) उपजाने की ऐसी विडंबना रही है, जिसने संबंधों को अपेक्षाकृत अधिक उंचाई तक नहीं ले जाने दिया| स्त्रियों की तुलना में ज्यादा मर्दों का स्वभाव भी प्रेमपूर्ण नहीं होता; समागम को वे भोग से ऊपर ले ही नहीं जा पाते| इन्हीं सब कारकों के चलते वोल्स्टनक्राफ्ट 1 ने तो बहुत पहले ही विवाह को कानूनी – वेश्यावृत्ति घोषित किया था , जिसे उनके समय ने सिरे से खारिज़ किया|
प्रसाद ने इसी पुस्तक में अन्यत्र लिखा है-
“पगली! हाँ सम्हाल ले कैसे छूट पड़ा तेरा अंचल?” …(कामायनी)
यह घूंघट वास्तव में पितृसत्ता का कवच है| इसका ‘चित और पट’ दोनों ही पुरुष – मानसिकता के पक्ष में है. पुरुष घूंघट डलवाएगा भी और मन-मुताबिक़ उघाड़ेगा भी| इसके आविष्कार में ही षड्यंत्र के अलावा और क्या है? स्वयं की कामांधता का दोषारोपण स्त्री पर क्यूँ?
प्रसाद के नाटक की पात्रा मालविका गाती है-
“मधुप कब एक कली का है
पाया जिसमें प्रेम रस, सौरभ और सुहाग
बेसुध हो उस कली से, मिलता भर अनुराग
बिहारी कुंजगली का है” …(‘चन्द्रगुप्त’ नाटक)

बेशक़ मधुप कब एक कली का ही रहा है? किन्तु कली-रूपक के बहाने स्त्री अगर चयनात्मक होते हुए एकाधिक पुरुषों का वरण करना चाहे तो पौरुष घायल क्यों होने लगता है? बिहारी ही नहीं, बिहारिनी भी कुंजगली की हो सकती है| किन्तु तत्कालीन समय ने इस सोच को अवकाश ही नहीं दिया| अगर इस सन्दर्भ में ‘मैडम बावेरी’ को याद किया जाये तो तथाकथित आधुनिक यूरोपीय समाज को भी कठघरे में खड़ा किया जा सकता है| इसके प्रकाशन मात्र ने फ्रांस में भूचाल ला दिया था|
‘कंकाल’ के अंतर्गत विजय और यमुना की वार्त्ता को प्रसाद इस तरह लिखते हैं-
“मैंने और भी ऐसा कुंड देखा है, जिसमें कितने ही जल पियें वह भरा ही रहता है|”
“सचमुच! कहाँ पर विजय बाबु?”
“सुंदरी के रूप का कूप” …(‘कंकाल’ उपन्यास)
असल में यह उस मनोवृत्ति की धारणा है जो इस तर्क का हवाला देती रहती है- एक मुर्गा, पंद्रह मुर्गियों को यौन-तृप्ति देता है किन्तु पंद्रह मर्द मिलकर भी एक स्त्री को यौन-तृप्ति नहीं दे पाते|
प्रसाद अपनी एक कविता में लिखते हैं-
“जो पथिक होता कभी इस चाह में
वह तुरत ही लुट गया इस राह में” …(‘सौंदर्य’, प्रसाद)


स्त्री – सौंदर्य पर लुटेरे आदि के आक्षेप नए नहीं हैं| ‘माया महाठगिनी’… जबकि असल बात उलटी है| आवश्यकता पुरुष के आत्ममंथन की है| सुधीश पचौरी ने नाओमी वोल्फ़ की मशहूर किताब ‘ब्यूटी मिथ’ पर विचार करते हुए लिखा है- “ब्यूटी मिथ के बाहर जाना आसान नहीं है| क्या स्त्री की स्त्रीवादी सौंदर्य की परिभाषा हो सकती है? यह पुनर्परिभाषा दरअसल सत्ता की पुनर्परिभाषा है|”2.  वास्तव में ऐसी परिभाषा देना मुश्किल ज़रूर है किन्तु, असम्भाव नहीं| संभवतः स्त्रियों को पुरुषों की अपेक्षाओं के इतर आत्मनिष्ठ सौंदर्य को ही तवज्जो देनी होगी; उनके परिधान में पुरुषों द्वारा आरोपित दृष्टिकोण से फ़र्क नहीं पड़ना चाहिए|
प्रसाद की कविता ‘प्रियतम’ का एक अंश है-
“औरों के प्रति प्रेम तुम्हारा, इसका मुझको दुःख नहीं
जिसके तुम हो एक सुहाग, उसको भूल न जाव कहीं|” …(‘प्रियतम’, प्रसाद)
तत्कालीन समाज में पुरुषों का एकाधिक विवाह/सम्बन्ध रखना आम बात थी; पत्नी/प्रेमिका की एकनिष्ठता के सापेक्ष वह निम्न स्तर पर था| वैसे भी स्त्री पर एकाधिकार, पितृसत्ता का आधार रहा है|
प्रसाद की कविता ‘चित्रकूट’ की उद्धृति है-
“जनकसुता ने कहा- ‘नाथ! यह क्या कहते हैं?
नारी के सुख सभी साथ पति के रहते हैं” …(‘चित्रकूट’, प्रसाद)

जयशंकर प्रसाद

पुरुष-मानसिकता ने पितृसत्ता को इस तरह जमाया है कि वे स्त्रियों के ऐच्छिक – अनुकरण के अभिलाषी है| उपर्युक्त अंश की उक्ति सीता की है| यद्यपि सीता को इसी तरह की आज्ञाकारिता से बांधकर देखा जाता रहा है| किन्तु इसकी व्याख्या भिन्न भी हो सकती है| इस इंजैक्ट की जाने वाली पितृसत्ता को लेकर जे. एस. मिल ने लिखा है- “पुरुष कोई बाध्य ग़ुलाम नहीं चाहते; बल्कि इच्छित दास चाहते हैं| इसीलिए वे स्त्रियों से दासता हेतु प्रत्येक प्रक्रम का अभ्यास कराते हैं|”3  सीता के मुख से पति का हर स्थिति में साथ देने वाली प्रेम की आधार-भूमि विश्वास है| किन्तु, अविश्वास से ‘अग्नि-परीक्षा’ लेने का कलंक राम के माथे से कैसे मिटेगा? सीता के पुनः वनवास की त्रासदी झेलने और धरती में समा जाने पर राम की मूकता कैसे क्षम्य हो सकती है?
प्रसाद की काव्योक्ति है-
“किसका यह सूखा सुहाग है,
छिना हुआ किसका सारा रस|” …(‘विषाद’, प्रसाद)

कथित सुहाग उजड़ जाने पर जीवन को नीरस घोषित करने वाली शक्तियों ने स्त्री को जिंदा लाश बनाए रखा| महादेवी वर्मा ने विधवा के लिए ‘मृत पति का निर्जीव स्मारक’ 4 पद का अर्थवान प्रयोग किया है| इस सूखे सुहाग और छिने हुए रस के प्रतिकूल सीमंतनी उपदेश की लेखिका की विधवाओं को सलाह थी- “तुम्हारी बेहतरी की यही तजवीज अच्छी है कि जब दिल इस इन्द्रिय के विषय को चाहे दूसरी शादी कर लो|”5
प्रसाद ने आंसू के अंतर्गत लिखा है-
“छलना थी, तब भी मेरा
उसमें विश्वास घना था
उस माया की छाया मैं
कुछ सच्छा स्वयं बना था|” …(‘आंसू’, प्रसाद)

इन पंक्तियों में पितृसत्ता का समर्थन और विरोध दोनों एक साथ हैं| स्त्री को जहाँ ‘छलना और माया’ का संबोधन है; बावजूद इसके कवि का उसमें विश्वास होने व सच्चा बनने की स्वीकारोक्ति उस समय की परंपरा बनाम आधुनिकता की संघर्षमय लिपि जान पड़ती है|
प्रसाद की कविता ‘प्रलय की छाया’ के दो अंश हैं-
“…सुना- जिस दिन पद्मिनी का जल मरना
सती के पवित्र आत्म गौरव की पुण्य – गाथा
गूँज उठी भारत के कोने – कोने जिस दिन;
उन्नत हुआ था भाल
महिला – महत्व का| …
… मैं भी थी कमला,
रूप – रानी गुजरात की|
सोचती थी-
पद्मिनी जली स्वयं किन्तु मैं जलाऊंगी –
वह दावानल ज्वाला
जिसमें सुलतान जले|” …(प्रलय की छाया, प्रसाद)

महादेवी वर्मा

इस काव्यांश का सम्बन्ध अल्लाउद्दीन खिलजी के कोहराम से है, जो उसने भारत पर मचा रखा था| वाकई स्त्रियाँ पुरुषों की निगाह से युद्धों को नहीं देख सकतीं| क्या दुनिया में ऐसा कोई युद्ध हुआ है जिसका पक्ष-प्रतिपक्ष सिर्फ और सिर्फ़ स्त्रियों का ही हो? निश्चित तौर पर नहीं| ऊपर से एक जुमला अक्सर उछाला जाता है कि- सारे युद्ध दरअसल स्त्रियों के ही कारण हुए हैं| करे कोई भरे कोई… उपर्युक्त कविता में जहाँ एक ओर रानी पद्मिनी के जौहर का महिमामंडन किया गया है; वहीँ दूसरी ओर कमलावती अपनी ‘स्त्रियोचितता’ पर खेद प्रकट कर रही है| ‘आगे कुआँ पीछे खाई’ की स्थिति में स्त्री क्या करे? आत्मसम्मान को बचाए या आत्मप्राण को? आखिर किसलिए भी? पुरुषों के आपसी वर्चस्व की लड़ाई ने स्त्रियों को असह्य पीड़ाओं के अतिरिक्त और कुछ नहीं दिया| कई बार युद्ध एक आवश्यक बुराई भी प्रतीत होते हैं; लेकिन मानव-सभ्यता को इस क्रूरता से बाहर आना ही होगा|

विषयक – वैविध्य की दृष्टि से छायावाद के सबसे बड़े कवि निराला के काव्य में पितृसत्ता की उपस्थिति को अधोलिखित उक्तियों से पुष्ट किया जा सकता है-
छंद के बंध को तोड़ने वाले कवि की कविता ‘नयनों के डोरे लाल’ में पितृसत्ता का बंध बरक़रार रहता है-
“प्रिय कर, कठिन – उरोज – परस कर कसक मसक गयी चोली
एक – वसन रह गयी मंद हंस अधर – दशन अनबोली-
कली – सी कांटे की तोली|” …(‘नयनों के डोरे लाल’, निराला)

उक्त दृश्य तब घटित होता है जब कलीरूपी नायिका कुछ अलसाई हुयी है और इस अवस्था में नायक के आने पर, उसकी सुध न लेने पर; नायक को अपना अपमान महसूस होता है| उसका अतार्किक पौरुषीय दंभ जाग उठता है| वह उसकी चोली को मसक देता है| प्रतिक्रियास्वरूप वह अपने प्रिय को ‘मंद – हंसी’ और बिन बोले स्वर की प्रेम-पूर्णता देती है| वस्तुतः इस उद्धरण में नायक की कामासक्त भावना भी स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है| वह नारी को ‘पैसिव’ मानता है और खुद को ‘एक्टिव’| यदि कोई स्त्री ‘एक्टिव’ फॉर्म में देखी जाती है तो इसे एक अपराध की भांति देखा जाता है| ‘कली सी कांटे की टोली’ इसी तरह के सम्भोग का चित्र है|
‘वन-बेला’ के अंतर्गत निराला लिखते हैं-
“वर्ष का प्रथम
पृथ्वी के उठे उरोज मंजु पर्वत निरुपम
किस्लायों बन्धे
पिक भ्रमर – गूंज भर मुखर प्राण रच रहे सधे” …(वन-बेला, निराला)

पर्वतों की उपमा हेतु उरोजों की ही आवश्यकता पड़ गयी? कवियों की चेतना में स्तनीय – रूढ़छवि का आग्रह स्त्री – समाज पर नकारात्मक असर डालता है| जर्मेन ग्रीयर ने अपनी पुस्तक ‘द फीमेल यूनक’ में ग्रेगरी (अ फादर्स लिगेसी टू हिज डाटर्स) को उद्धृत किया है- “प्रकृति का गढ़ा सुन्दरतम वक्ष भी उतना सुन्दर नहीं होता जितना कल्पना का गढ़ा वक्ष होता है|” 6  जर्मेन स्त्रियों से आग्रह करती हैं- “ऐसी चोलियाँ पहनना बंद कर दें जो गुब्बारे की जैसी छातियों की कल्पना को आगे बढ़ाये चली जाती हैं, ताकि पुरुष असली चीज़ की विविधता को स्वीकार करें|”7 सौन्दर्य के रूढ़ – प्रतिमानों ने स्त्री – क्षमताओं की कितनी हानि की है, जर्मेन ने इसका वैज्ञानिक वर्णन किया है|
‘कुकुरमुत्ता’ के अंतर्गत निराला लिखते हैं-
“हाथ जिसके तू लगा,
पैर सर रखकर व पीछे को भगा
औरत की जानिब मैदान यह छोड़कर,
तबेले को टट्टू जैसे तोड़कर,
शाहों, राजों, अमीरों का रहा प्यारा
तभी साधारणों से तू रहा न्यारा|” …(‘कुकुरमुत्ता’, निराला)

‘औरत की जानिब’ पर विचार करिए… साध्य को ललकारने के साथ यह स्त्री को भी गाली है| हमारा दुराग्रह नारियों को अबला और कायर मानता है| जैविक रूप से संभव है कि वे पुरुषों जितनी शक्तिशालिनी न हों किन्तु इसका सामान्यीकरण उचित नहीं है| हमारा समाज संवेदनहीन उपमाओं पर प्रायः आत्ममंथन नहीं करता- ‘औरत की तरह’, ‘हिजड़े की तरह’, ‘लंगड़े की तरह’ आदि ऐसी ही उपमाएं हैं|
‘प्रेम संगीत’ कविता का एक अंश है-
“जात की कहारिन वह,
मेरे घर की पनहारिन वह,
आती है होते तड़का
उसके पीछे मैं मरता हूं|
कोयल – सी काली, अरे,
चाल नहीं उसकी मतवाली,
ब्याह नहीं हुआ, तभी भड़का,
दिल मेरा, मैं आहें भरता हूँ|” …(प्रेम संगीत, निराला)

निराला

कविता को पढ़कर चंद्रभान यादव की पुस्तक ‘भक्तिकाव्य में स्त्री – चिंतन’ में उद्धृत प्रो. चौथीराम यादव का कथन प्रासंगिकजान पड़ता है- “जाति – पांति और ऊंच – नीच के भेदभाव पर आधारित वर्ण – व्यवस्था से नारी की अधीनता का बड़ा गहरा सम्बन्ध है|”8 जाति – व्यवस्था की कुरीति से दबी कहारिन स्त्री के पीछे निराला कामांध – से प्रतीत होते हैं| कथित ‘कहारिन’ का ब्याह न होने पर कवि का भड़कना पुरुषों की उस मनोवृत्ति का सूचक है जो स्त्रियों से यौन – शुचिता का दुराग्रह रखता है| उसके मानस में काम – संबंधी ‘कौमार्य’ की धारणा बलवती होती है| यदि वह कहारिन निराला के स्थान पर किसी और घर की हो; तो कहना मुश्किल है कि उस पर यौन – हमला नहीं हो सकता| वैसे इस प्रकरण पर निराला सिद्धांत और व्यवहार दोनों स्तर पर घिरे नज़र आते हैं| डॉ रामविलास शर्मा ने उनके वेश्यालय जाने को इस प्रकार न्यायसंगत ठहराने की कोशिश की है- “निराला साफ़ तौर पर और खुलकर कहते थे कि मैं सेक्स की ज़रूरत पूरी करने के लिए कोठे पर जाता हूँ| यह बहुत बड़ी नैतिकता है| मनुष्य की अपने प्रति और समाज के प्रति जो ईमानदारी है, वह सबसे बड़ी ईमानदारी है|”9  अगर इसे उचित मान भी लें तो क्या समानता के तर्क से आज की तरह ‘प्लेबॉय – कल्चर’ अस्तित्व में थी? वेश्यावृत्ति किसी भी समाज की सबसे बड़ी विकृतियों में से एक है| तर्क-कुतर्क से वेश्यालय पुरुष – दृष्टि से भले ही वाज़िब जान पड़े मगर स्त्री – दृष्टि से सिवाय उसके शोषण के और कुछ नहीं हो सकता| वास्तव में वेश्यालय सामंती – सोच के शिखर हैं|
कविता ‘रानी और कानी’ का यह हिस्सा ग़ौरतलब है-
“जब पड़ोस की कोई कहती है-
‘औरत की जात रानी
ब्याह भला कैसे हो
कानी जो है वह|’
सुनकर कानी का दिल हिल गया…” …(रानी और कानी, निराला)

प्रथम तो ब्याह की अवश्यम्भाविता का प्रश्न? द्वितीय, लड़की कानी हो तो उससे जुड़ा विमर्श? स्त्री चिंतकों ने यूँ ही परिवार को शोषण का आधार बताते हुए विवाह संस्था पर सवाल खड़े नहीं किये थे| स्त्री की उन्मुक्त – पहचान स्थापित होने में परिवार ने काफी बाधा पहुंचाई है| यह भी सही है की इसका निदान ‘परिवार’ संस्था को ख़त्म करना नहीं है| एकाधिक विवाहों को ललचाये रहे वृद्धों     ने भी इनकी तरफ कभी नहीं देखा| ‘अपंग’ लड़कियों को अपशकुनी मानने की रूढ़ – मनःस्थिति की व्याप्ति खूब रही है|
‘खजोहरा’ नामक हास्य – कविता का प्रसंग है-
“सावन में भतीजा होने को हुआ
पहले से बुला लायी गयीं बुआ|”…
“नैहर में घूँघट के उठने से
बुआ जी की जान बची छुटने से|” …(खजोहरा, निराला)

भतीजा होने पर प्रायः बुआ का ही आगमन होता है, फूफा कम ही आते हैं| खैर… जिस नैहर में बुआ कभी फुदकती रही होगीं, अब उसके लिए वे पराई – सी हो चुकी हैं| वास्तव में जिस ससुराल को भी स्त्री को ‘असली घर’ बताया जाता है, उसमें उसको कितना अपनापा मिलता है यह बताने की ज़रूरत नहीं है, अन्यथा ‘स्त्री विमर्श’ अस्तित्व में ही क्यूँ आता? ससुराल छोड़ दीजिये, अब मायके में भी ‘घूंघट के उठने से’ उनकी जान को खतरा है| इसी कविता की एक और पंक्ति है जिसमें गाँव का एक युवक बुआजी से मज़ाक करता है- “अकेली – अकेली कहाँ चलीं बुआ?” भारत के कुछ हिस्सों में भाभी – साली के अलावा मामी – बुआ आदि रिश्तों में भी ‘परिहास का रिवाज़’ है| इस परिहास को लोक – संस्कृति का जामा पहनाकर स्वीकार्यता दिलाई जाती है| क्या यह मज़ाक सदैव शुद्ध – परिहास ही रहता है? प्रथमतः मज़ाक अपनी प्रकृति में ही विशुद्ध रूप से मज़ाक – मात्र नहीं होता| द्वितीयतः स्वस्थ परिहास के पैमाने प्रायः पुरुष – मानसिकता ने ही तय कर रखे हैं| मज़ाक की इस असमानतापूर्ण – अनगढ़ता पर विचार होना चाहिये|

प्रकृति के साथ मिथकों का सर्जनात्मक वर्णन करने वाले कवि सुमित्रानंदन ‘पन्त’ जी के विषय में प्रसिद्ध है कि आप स्त्रैण थे| प्रकृतिगत दृष्टि से यह स्वीकार्य होना चाहिए लेकिन हमारी सामाजिक मान्यताएं इसकी इजाज़त नहीं देतीं| बहरहाल पन्त के काव्य में पितृसत्ता का रेखांकन निम्न पद्यांशों के आधार पर किया जा सकता है-
‘ग्राम्या’ के अंतर्गत पन्त की कथात्मक काव्योक्ति है-
“घर में विधवा रही पतोहू,
लछमी थी, यद्यपि पति घातिन,
पकड़ मंगाया कोतवाल ने,
डूब कुँए में मरी एक दिन!
खैर, पैर की जूती, जोरू
न सही एक, दूसरी आती,
पर जवान लड़के की सुध कर
साँप लोटते, फटती छाती!” …(‘वे आँखें’, पन्त)

प्रथमतः पति – घातिन कहते हुए विधवा स्त्री को ताना दिया जा रहा है| कोतवाल के दुस्साहस पर मौन रहते हुए स्त्री के कुँए में डूब मरने पर अफ़सोस का प्रकटीकरण ही ग़ायब नहीं है, स्त्री को महत्वहीन भी बताया जा रहा है| उसको पैर की जूती के रूप में देखने वाली पुरुष – वृत्ति को जवान लड़के की मौत पर तो छाती पीटने की फुर्सत है; किन्तु स्त्रीत्व के हनन से उसे कोई सहानुभूति नहीं|
‘पूर्वस्मृति’ के अंतर्गत सीता के विषय में पन्त लिखते हैं-
“जनरव भय से राघव ने पत्नी को
छोड़ा था क्या? कथा पुरातन रे यह,
आई थी वह अग्नि – परीक्षा देने,
जन – भू का दुःख भार झेलने दुःसह!” …(पूर्वस्मृति, पन्त)

जन के ‘आरोपों’ के कारण सीता को वन – गमन हेतु भेजना और अंत में परीक्षा एने हेतु बाध्य करना, राम के चरित्र का स्याह – पक्ष है| अपनों के विश्वास से अधिक चिंता दूसरों के अप्रामाणिक आक्षेप की क्यूँ? मिथकीय नायक अपने विविध आयामों में इक क़दर गूँथा जाता है कि आदर्शमयता पर खतरा ना आये; किन्तु आवश्यकता उनका सापेक्षिक अध्ययन करने की है| तभी प्रक्षिप्त पितृसत्ता का दिग्दर्शन संभव है|
‘पूर्वस्मृति’ की ही एक अन्य पंक्ति है-
“गला शिला उर, हुई अहल्या उर्वर|”

अहल्या – प्रसंग’ गंभीर रूप से पितृसत्तात्मक है| अहल्या के साथ छल करने वाले ‘देवों के राजा’ इन्द्र, शुचितावाद के प्रकोप से पीड़ित करने वाले गौतम ऋषि और उद्धार करने वाले राम, तीनों ही पुरुष हैं| अहल्या निर्दोष है फिर भी पत्थर बनाये जाने हेतु अभिशप्त है| इंद्र और गौतम को सज़ा तो छोड़िये, इनके सम्मान में कोई कमी भी नहीं दिखाई देती| यानी हमारा समाज पुरुष के व्यभिचार और अन्याय पर मूक रहते हुए स्त्री के आत्म – सम्मान को कुचलता रहा है|
‘अशोक वन’ की एक अवलि है-
“साक्षी राम बिना क्या सीता
नहीं दिव्य जग जननी, पुनीता?” …(अशोक वन, पन्त)
कवि ने ‘प्रश्नवाचक – चिह्न’ का प्रयोग क्यों किया है? यह सीता के समर्थन में है या विरोध में? यदि ‘जय श्री राम’ या ‘राम – राम’ के रूप में राम का स्वतंत्र अस्तित्व है तो सीता का ऐसा अस्तित्व क्यूँ नहीं हो सकता? उपर्युक्त पद्यांश वास्तव में पुरुष में ही स्त्री की पहचान के विलय के उपक्रम की स्पष्ट अभिव्यक्ति है|
‘सत्यकाम’ की कथा में पितृसत्ता और मातृसत्ता का तनाव देखा जा सकता है| पन्त ने लिखा है-
“ ‘ब्रह्मज्ञान की दीक्षा? क्या है गोत्र तुम्हारा?’
‘गोत्र? गोत्र?’ रुक कर बोला जाबाल हतप्रभ,
‘गोत्र नहीं अब मुझे ज्ञात! माँ से पूछूँगा!’ ” …(सत्यकाम, पन्त)
सत्यकाम, गौतम ऋषि के पास ब्रह्मज्ञान की दीक्षा लेने के लिए जाता है तो गौतम के शिष्य उससे उसका गोत्र पूछते हैं| पितृसत्तात्मक समाज में गोत्र का निर्धारण पिता – पक्ष के आधार पर होता आया है| जब वह माँ से गोत्र पूछने की बात गौतम के शिष्यों से कहता है तो इस पर उनकी प्रतिक्रिया निन्द्य है-
“ हा, हा, हा, हा – लहर हँसी की दौड़ी उच्छल
शिष्य – वर्ग में! कहा दूसरे ने – ‘क्या यह भी
ज्ञात नहीं तुमको कि ब्रह्मविद्या पाने का
अधिकारी केवल ब्राह्मण होता है! … जाओ,
भगो यहाँ से! ब्रह्मज्ञान की दीक्षा लेने
किस मुंह से आये हो? जब तुम गोत्रहीन हो!’
… ‘अरे, वर्णसंकर होगा यह कोई निश्चय!’
कहा तीसरे ने, अपमानित कर किशोर को!
‘गुरु दुत्कार बताएँगे इस तुच्छ श्वान को!’

सुमित्रानंदन पन्त

जैसा कि पहले संकेत किया है कि – भारत में पितृसत्ता को स्थायित्व प्रदान करने में वर्ण – जाति ने भी बड़ी भूमिका निभाई है| सत्यकाम की माँ जबाला का परिचारिका के रूप में कार्य करने के क्रम में किसी ऐसे पुरुष से सत्यकाम का जन्म हुआ था, जिसने जबाला को अपेक्षित सम्मान ही नहीं दिया| जबाला जब सत्यकाम को उसके पिता का गोत्र बताने में अक्षम रही तो उसने अपने ही नाम के आधार पर सत्यकाम का नया नाम ‘सत्यकाम जाबाल’ रखा| एक तरह से यह माँ के गोत्र की प्रतिष्ठा थी| अन्यथा वह शिक्षा से वंचित रह जाता|

करुणा – स्त्रोतनी महादेवी वर्मा की कविताओं में भी पितृसत्ता की उपस्थिति है| असल में पितृसत्ता की पैठ इतनी गहरी है कि स्त्रियों को भी बाक़ायदा इससे संपृक्त किया गया है| बकौल सिमोन, ‘वह पैदा नहीं होती, बनाई जाती है’| इनकी कविताओं में पितृसत्ता के उदाहरण विरले हैं| वह भी सघनता नहीं, सांकेतिकता के साथ-
‘कोयल’ कविता में महादेवी लिखती हैं-
“डाल हिला कर आम बुलाता
तब कोयल आती है|
आम लगेंगे इसीलिए यह
गाती मंगल गाना…” …(कोयल, महादेवी)
प्रसंग है- एक बालिका के छोटे भाई का जन्म नजदीक है तो ‘सोहर’ गाने हेतु स्त्रियाँ पहुंची हुई हैं| उपमा हेतु बालिका यह सोच रही है कि जब आम लगने की आहट के क्रम में जिस तरह कोयलें कूजन करती हैं, उसी तरह ये स्त्रियाँ भी मंगल गान (सोहर) करेंगीं| ‘सोहर’ पितृसत्तात्मक गान है| हमारे शब्दकोष में ‘सोहरी’ नामक कोई शब्द नहीं है| लड़का पैदा होने की ‘ख़ुशी’ में उत्सव (स्त्रियों द्वारा ही) होता है; जबकि लड़कियों के पैदा होने पर अक्सर ग़म पसर जाता है|
‘नीरजा’ के अंतर्गत महादेवी का एक गीत संकलित है-
“बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ!
दूर तुमसे हूँ, अखंड सुहागिनी भी हूँ|”

दूर होकर भी सुहाग की अखंडता? प्रेम के दर्शन की महानता के आधार पर इस उक्ति को जायज़ ठहराया जा सकता है; किन्तु वह ‘प्रेम’ हो तब न! स्त्री – विरह (लौकिक या अलौकिक किसी भी सत्ता के प्रति हो) पर काव्याधिक्य और पुरुष – विरह की अत्यल्प मौजूदगी इस अर्थ में पितृसत्तात्मक है कि प्रायः प्रेम में स्त्रियाँ अधिक प्रतिबद्ध होती हैं| यही सीमातिरेक प्रतिबद्धता स्त्री को उसी के विरोध में खड़ा कर देती है| इसका नोटिस लिया जाना आवश्यक है| कुछ इसी तरह की अभिव्यक्ति उनके एक गीत की इस अवलि में पुनः देखिये-
“शलभ मैं शापमय वर हूँ! किसी का दीप निष्ठुर हूँ|”
वास्तव में परतंत्रता की अतिरंजना में ग़ुलाम को अपनी बेड़ियाँ तक प्यारी लगने लगती हैं| स्वयं को ‘शापमय वर’ कहने के माध्यम से महादेवी आखिर और क्या संकेत करती हैं?
छायावादी काव्यान्दोलन के सामानांतर राष्ट्रवादी काव्यधारा की सशक्त कवियित्री सुभद्राकुमारी चौहान के काव्य में पितृसत्ता की उपस्थिति का रूप इस प्रकार है-
अपनी सर्वाधिक प्रसिद्ध कविता ‘झांसी की रानी’ के अंतर्गत सुभद्राजी लिखती हैं-
“बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी
ख़ूब लड़ी ‘मर्दानी’ वह तो
झाँसी वाली रानी थी|” …(झाँसी की रानी, सुभद्राकुमारी)
एक स्त्री को एक स्त्री के ही विषय में इतना आत्मविश्वास क्यूँ नहीं कि वह ‘जनाना’ तरीक़े से लड़ सकेगी? जबकि रानी लक्ष्मीबाई के साथ अन्य साथियों के रूप में भी स्त्रियाँ (झलकारी, काना व मंदरा इत्यादि) थीं| असल में सुभद्राजी हेतु परंपरा पुष्ट हीन – ग्रंथि से पीछा छुडाना संभव न हो सका|
‘मुन्ना का प्यार’ कविता का अंश है-
“माँ मुन्ना को तुम हम सबसे
क्यूँ ज्यादा करती हो प्यार? …(मुन्ना का प्यार, सुभद्रा)
एक बच्ची द्वारा अपनी माँ से किया गया यह प्रश्न पारिवारिक संस्था के भेदभाव को सरल भाषा में इंगित करता है| बावजूद इसके आश्चर्य नहीं कि कल को जब यह बच्ची औरत बने तो भोगने के यथार्थ से गुजरने के बावजूद इस चक्र को न बदल पाए| यह स्थिति पितृसत्ता को जीवंत बनाये रखने में बड़ा रोल अदा करती है|
‘प्रियतम से’ में सुभद्रा जी का संबोधन है-
“मैं भूलों की भरी पिटारी,
और दया के तुम आगार
सदा दिखाई दो तुम हँसते
चाहे मुझसे करो न प्यार|”
‘प्रियतम दया के आगार हैं’, संभव है| मगर, खुद को भूलों की पिटारी कहकर प्रेम न मिलने की भी स्थिति में सर्वोपरि का-सा स्थान दिए जाने की क्या व्याख्या की जाये? कहने की क्या ज़रूरत कि ये ‘मेल – डोमिनैंस’ का असर है|
राखी – विषयक अभिव्यक्ति ध्यान खींचती है-
“देखो भैया! भेज रही हूँ
तुमको, तुमको राखी आज|
साखी राजस्थान बनाकर
रख लेना राखी की लाज” …(राखी, सुभद्राजी)

राखी महान – पर्व है, इससे इनकार नहीं; किन्तु क्या उपर्युक्त बयाँ दाता और प्राप्तकर्ता के भाव की स्थापना नहीं करता? राखी का मनोवैज्ञानिक पहलू आरम्भ से ही लड़कियों की एक भिन्न मनःस्थिति का निर्माण करने लगता है| इसके निहितार्थ को नए अर्थ देने चाहिए|
अतः स्पष्ट तौर पर तद्युगीन परंपरा और आधुनिकता के तनाव को उपर्युक्त अभिव्यक्तियों से समझा जा सकता है| इस तनाव का अवलंब लेकर ‘मल्टी-लेयर्ड पैट्रिआर्की’ को समझा जा सकता है| तदुपरांत आज के समय के सापेक्ष सभ्य समाज को ध्यान में रखते हुए, इसके उपचार के प्रयास भी किये जा सकते हैं| कोई प्रशनांकित कर सकता है कि इतने गहरे विमर्श की क्या आवश्यकता है किन्तु, ध्यातव्य है कि ये बारीकियां भी पितृसत्ता को दृढ़ बनाये रखने में अपनी भूमिका निभाती हैं|

मनीष कुमार हैदराबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में शोधार्थी हैं. संपर्क:9560883358 / 8187900928

  सन्दर्भ: 
1. वोल्स्टनक्राफ्ट, मैरी- स्त्री अधिकारों का औचित्य साधन (अनु.- मीनाक्षी), राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2014, पृ.- 20
2.पचौरी, सुधीश- पितृसत्ता के नए रूप (संपा.- राजेंद्र यादव, प्रभा खेतान, अभय कुमार दूबे), राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2010, पृ.- 40

3. Mill, J. S.- On Liberty & other Essays (Ed. by- John Gray), OUP, London, 1998, p.- 486
4. वर्मा, महादेवी- श्रृंखला की कड़ियाँ, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2015, पृ.- 20
5. एक अज्ञात हिन्दू औरत- सीमंतनी उपदेश (संपा.- डॉ. धर्मवीर), वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2008, पृ.- 6
6. ग्रीयर, जर्मेन- बधिया स्त्री (अनु.- मधु बी. जोशी), राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2005, पृ.- 36
7. वही
8. यादव, चौथीराम- भक्तिकाव्य में स्त्री चिंतन (ले.- चंद्रभान यादव), ओमेगा पब्लिकेशन, दिल्ली, पृ.- 151
9. शर्मा, रामविलास- स्त्री मुक्ति के प्रश्न (संपा.- अलोक सिंह), विकास पब्लिकेशन, दिल्ली, 2013, पृ.- 69

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थियेटर ऑफ रेलेवेंस – स्वराजशाला

राजेश कासनियां 


थियेटर ऑफ रेलेवेंस के बारे में एक शोधार्थी, एक अभिनेता का अनुभव, जिसने इसकी एक कार्यशाला में भाग लिया :

मैंने 1 से 5 जुलाई , 2018 तक अम्बाला में  ‘थियेटर ऑफ रेलेवेंस’ स्वराजशाला की कार्यशाला में प्रतिभागिता की । इससे 2 वर्ष पूर्व भी मैं इस कार्यशाला में भाग ले चुका था । मैंने जब शैड्यूल देखा तो पहला सत्र हर सुबह 6:30 बजे चैतन्याभास से शुरु था । इस सत्र का संचालन  ‘थियेटर ऑफ रेलेवेंस’ के संस्थापक मंजुल भारद्वाज व उनकी टीम के सदस्य –अश्विनी , सायली , कोमल , योगिनी व तुषार कर रहे थे । मैं अपने पिछले अनुभव से वाकिफ़ था कि मंजुल सर समय के बड़े पाबंद हैं । इसलिए मैं समय का ख़ास ख़याल रखता था । क्योंकि सर हमेशा एक बात कहते हैं – यदि आपने काल (समय) पर विजय पा ली तो आप हर क्षेत्र में विजय प्राप्त कर सकते हैं ।

मंजूल भारद्वाज प्रशिक्षण देते हुए

सर का नारा है – हम…..हैं । जो हम में एकता व अपने वज़ूद का अहसास करवाता ,  वहीं हमें जोश से भर देता । सुबह की मुलाकात इसी नारे के साथ होती । वैसे बीच-बीच में ये नारा पूरे दिन सुनने को मिलता । चैतन्याभ्यास में आलाप(आवाज़ निकालाना)  करवाया जाता । इसका आशय है कि हमें अपनी अभिव्यक्ति की आज़ादी के प्रति जागरुक रहना वहीं शोषण व अन्याय के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद करनी है । चैतन्याभ्यास में अनेक तरह की गतिविधियां करवाई जाती , जैसे – विभिन्न आकृतियां बनाना , क्षेत्रीय खेल व नृत्य करना , बचपन का खेल , प्रकृति से बात करना , चिंतन-मनन के माध्यम खुद को जानना आदि ।

इस कार्यशाला के माध्यम से मेरी दृष्टि दो आयामों के प्रति आकृष्ट हुई वों हैं – सांस्कृतिक व राजनैतिक चेतना ।सांस्कृतिक चेतना :-  ‘थियेटर ऑफ रेलेवेंस’ के जनक मंजुल भारद्वाज जी का कथन है कि इतिहास साक्षी है कि व्यवस्था को सांस्कृतिक चेतना के द्वारा बनाया और टिकाया गया है तो क्यों न आज सांस्कृतिक चेतना के द्वारा ही व्यवस्था को बनाया और टिकाया जाए ।  ‘थियेटर ऑफ रेलेवेंस’ इसी विचार के साथ काम करता है । आज जो संस्कृति है वो सामंती मूल्यों को पोषित करती है जो मनुवाद द्वारा संचालित है । यह शोषण पर आधारित है जो समाज को विघटन की ओर ले जाती है ।इस संस्कृति को समता , स्वतंत्रता और बंधुता के मूल्यों से संचालित किया जाए इसी उद्देश्य को समर्पित है –   ‘थियेटर ऑफ रेलेवेंस’ ।

थियेटर ऑफ रेलेवेंस

कार्यशाला में ‘मैं औरत हूं’ नाटक (जो मंजुल भारद्वाज द्वारा निर्देशित व अश्विनी , सायली , कोमल , योगिनी व तुषार द्वारा अभिनीत) की प्रस्तुति की गई । इसमें औरत के विविध आयामों को दिखाया गया । औरत कैसे पितृसत्ता के द्वारा गुलाम बनाई गई , किस-किस रूप में औरत का शोषण होता है । नाटक में दिखाया गया कि जिन औरतों ने अपने स्व को पहचान लिया वो सभी इस कुचक्र को भेदने में कामयाब भी हुई हैं । मंजुल भारद्वाज जी ने नारी विमर्श के चालू मुहावरों से हटकर एक अलग दृष्टि प्रदान की । उन्होंने बताया कि नारी शोषण की मूल जड़ – सम्पति , पितृसत्ता और पितृसत्ता द्वारा संचालित मूल्य और संस्कृति है । जब तक इन पर चोट नहीं की जायेगी तब नारी को शोषण से बचा पाना मुश्किल है।

राजनैतिक चेतना :- कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य प्रतिभागियों में राजनैतिक चेतना का विकास करना था। विभिन्न विचारधाराओं के सत्र का संचालन अजीत झा जी ने किया । उन्होंने मार्क्सवाद , अंबेडकरवाद , गांधीवाद ,लोहियावाद आदि विचारधाराओं से अवगत करवाया । ‘थियेटर ऑफ रेलेवेंस’ की टीम ने राजनीति पर केन्द्रित 2 नाटकों की प्रस्तुति की – राजनीति- भाग 1 और राजनीति-भाग 2 । नाटकों का निर्देशन किया मंजुल भारद्वाज ने व अभिनय किया – अश्विनी , सायली , कोमल , योगिनी व तुषार ने ।

कला जो काम कर सकती है वो व्याख्यान नहीं कर सकता । अजीत झा सर की बात को गहराई से समझाने का काम इन नाटकों ने किया । नाटक सामंतवाद से शुरु हो कर पूंजीवाद , समाजवादी व्यवस्था से लोकतंत्र की राह के माध्यम से स्वराज तक पहुंचा । प्रत्येक व्यवस्था के शोषण – दमन व खामियों को प्रतिभागियों के सामने जीवंत कर दिया । ये कला की ताकत – अश्विनी , सायली , कोमल , योगिनी व तुषार के कमाल के अभिनय व मंजुल भारद्वाज सर के सशक्त निर्देशन से ही संभव हो पाया ।

थियेटर ऑफ रेलेवेंस

नाटक की प्रस्तुति के बाद मंजुल भारद्वाज जी ने मंडल , कमंडल और भूमंडल(उनका कथन) व WTO की नीतियों का खेल स्पष्ट किया । सोवियत संघ के विघटन के बाद उदारीकरण , वैश्वीकरण और निजीकरण की नीतियों ने पूरे विश्व को प्रभावित किया । भारत में खेती-किसानी पर संकट , मंडल कमीशन के बाद बाबरी मस्जिद का विध्वंश इन सब नीतियों का ही दुष्परिणाम है । सामाजिक न्याय के प्रश्न पर राजीव गोदारा और सुरेन्द्र पाल सिंह ने व्यापक सन्दर्भों के साथ सहभागियों की भ्रांतियों को दूर किया ।

मंजुल भारद्वाज जी के अनुसार वर्तमान सत्ता आत्महीनता से ग्रस्त है जिसे हर पल अपने ढहने का खतरा रहता है । आत्महीनता से ग्रस्त व्यक्ति या सत्ता हिंसा का सहारा लेती है और वह देश व समाज के लिए विध्वंशक व विनाशकारी होती है । इस सत्ता को आत्मबल से ही उखाड़ा जा सकता है । क्योंकि आत्मबल से विचार पैदा होता है और विचार सृजनशील होता है । मंजुल सर इस सत्ता का विकल्प स्वराज के विचार में देखते हैं ।

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सैनिटरी नैपकिन जीएसटी मुक्त: महिलाओं की मुहीम ने लाया रंग

स्त्रीकाल डेस्क 


केंद्रीय वित्त मंत्री पीयूष गोयल की अध्यक्षता में जीएसटी काउंसिल की 28वीं बैठक में महत्वपूर्ण फैसले लिए गए हैं.  मनीष सिसोदिया सहित अलग-अलग राज्यों के वित्तमंत्री ने इस बैठक के बाद बताया कि  सैनिटरी नैपकिन को जीएसटी से बाहर रखने का फैसला लिया गया है.अभी इस पर 12 फीसदी टैक्स वसूल किया जा रहा था.

नैपकिन को टैक्स के दायरे में रखने के सरकार के निर्णय का व्यापक विरोध हो रहा था. संभवतः इन विरोधों को देखते हुए सैनिटरी नैपकीन को  जीएसटी के बाहर कर दिया गया है. सरकार की मंत्री मेनका गांधी, कांग्रेस की सांसद सुष्मिता देव आदि ने वित्तमंत्री से अनुरोध किया था कि सेनेटरी नैपकिन पर जीएसटी नहीं लगाया जाये, लेकिन सरकार ने इनकी तब नहीं सुनी थी. अब इस कदम का महिलाओं के बीच व्यापक स्वागत किया जा रहा है. स्त्रीकाल में हम सरकार द्वारा नैपकिन पर जीएसटी लगाने के फैसले के विरोध की खबरों को प्रमुखता से प्रकाशित करते रहे हैं.

पढ़ें और देखें वे रिपोर्ट. 


वित्तमंत्री को सेनेटरी पैड भेजने की मुहीम: एसएफआई और कई संगठनों ने देश भर में आयोजित किया कैम्पेन

जजिया कर से भी ज्यादा बड़ी तानाशाही है लहू पर लगान

गांधी के गाँव से छात्राओं ने भेजा प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री को सेनेटरी पैड: जारी किया वीडियो

महावारी से क्यों होती है परेशानी 

उस पेड़ पर दर्जनो सैनिटरी पैड लटके होते थे

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आदिवासी स्त्री जिसे मीडिया प्रस्तुत नहीं करती है



अंजली


मीडिया से अलक्षित आदिवासी स्त्री-छवि और मीडिया द्वारा स्टीरिओटाइप का विश्लेषण कर रही हैं अंजली


स्त्री को वैश्विक स्तर पर एक इकाई माना गया है जिसका समाज व्यवस्थाएं सर्वाधिक शोषण करती है। स्त्री को तथाकथित सभ्य और कम विकसित समाज दोनों जगह पर एक अलग तरह का व्यवहार भुगतना पड़ता है। समाज के स्तर पर, खानपान में और आत्मसम्मानपूर्वक जीवन जीने के लिए प्रदत्त मूल अधिकारों में भी स्त्री से भेदभाव बरता जाता है। यद्यपि भारतीय संविधान देश के नागरिक को लिंग, जाति, धर्म आदि के भेदों से परे मूलभूत सुविधाएँ प्रदत्त कराने को सुनिश्चित करता है और मूल अधिकार प्रदान करता है। किन्तु इन प्रावधानों के होने के बावजूद भी स्त्री समुदाय पीड़ित अवस्था में है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के उत्थान के लिए संविधान में किए गए प्रावधानों के बावजूद भी इन वर्गों से सम्बन्ध रखने वाली स्त्रियों को अपने दिन-प्रतिदिन के जीवन में तरह-तरह की यातनाओं का सामना करना पड़ता हैं। ऐसा माना जाता है कि मीडिया के उदय से लोकतंत्र को लागू करने में सहायता मिलती है और जनतंत्र मजबूत होता है। आदिवासी समुदाय भारतीय सन्दर्भ में जातीय आधार पर बटे समुदाय से अलग है। आदिवासी समुदाय का अपना जीवन दर्शन है, जिसमें प्रकृति को सबका मूल माना गया है। इसलिए आदिवासी समुदाय में लिंग आधारित भेद उतने जड़ रूप में विद्यमान नहीं है जितने अन्य समुदायों में व्याप्त है। किन्तु जब से आदिवासी क्षेत्रों में बाहरी समुदाय का हस्तक्षेप बढ़ा है, तब से आदिवासी जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो रहा है। इसके परिणाम के रूप में हम देखते है कि आदिवासी स्त्री और पुरुष किस प्रकार उत्पीडित हो रहे है और इस उत्पीड़न के विरोध में लड़ रहे हैं। बात यदि आदिवासी स्त्री की करें तो हम पाते हैं कि आदिवासी स्त्री की छवि हमें आज विभिन्न रूपों में दिखाई दे रही है।
आदिवासी समुदाय में बाहरी संपर्कों के दबाव के कारण अलग-अलग तरह की समस्याएँ झेलती स्त्री, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेल-कूद में भागीदारी करती आदिवासी युवती को मीडिया अपनी रिपोर्ट में कितना स्थान देती है। आदिवासी स्त्री को किस रूप में प्रस्तुत करती है, विभिन्न क्षेत्रों में उसके योगदान को किस प्रकार रेखांकित करती है। आदिवासी स्त्री की देह को किस प्रकार प्रस्तुत करती है और उसके प्रति क्या नजरिया रखती है। मीडिया के बारे में आदिवासी स्त्री की छवि या तो एक रोमांटिसिज्म की है या वस्तुतः निकृष्ट जबकि जरुरत यह है कि आदिवासी की वास्तविक मानवीय छवि को मीडिया में दिखाया जाए, उसकी समस्याओं और संघर्षों पर बात की जाए और उसका हल निकालने का रास्ता सुझाया जाए। मीडिया में आदिवासी स्त्री की प्रस्तुति- मांसल देह के रूप में, राज्यद्वारा या अन्य वर्चस्वशाली समुदायों द्वारा आदिवासी स्त्री का शोषण होने पर उसकी खबर को किस रूप में प्रस्तुत करती है। उससे भी आदिवासी स्त्री की मीडियाकरण की छवि निर्मित होती है। मानव तस्करी की शिकार स्त्री के रूप में, आदिवासी स्त्री की खेल में परफोर्मेंस के आधार पर उसकी छवि, अपने और राष्ट्र के हित में जो छवि आदिवासी स्त्री की है उसको मीडिया दिखाता है जैसे खेल प्रतिस्पर्धाओं में जीतने पर कितना ध्यान उन पर देता है।

इन सब मुद्दों पर मीडिया का क्या स्टैंड है इसके माध्यम से हम देखने की कोशिश करेंगे कि आदिवासी स्त्री का मीडियाकरण कैसे किया गया है। आदिवासी समुदाय वस्तुतः जल, जंगल और जमीन पर पोषण करने वाले समुदाय है। जिनका अपना प्रकृति धर्म और अखड़ा समुदाय है। किन्तु वर्णव्यवस्था आधारित ग्रंथों में आदिवासी स्त्री और पुरुष दोनों को गैर-मानवीय और आर्य सौन्दर्य प्रतिमानों से इतर दिखाया जाता है। आज मीडिया जो मनोरंजन का दायित्व भी फिल्मों और नाटकों के माध्यम से वहन किए हुए है, वह इन धर्मशास्त्रों आधारित जड़ताओं को तोड़ने की बजाय मजबूत कर रहा है। मात्र भव्यता दिखाने के लोभ में आदिवासी स्त्री को अधिक मिथकीय और अपनी कल्पनाके रूप में प्रचारित कर रहा है। जिसके नख-केश-त्वचा इत्यादि मानवीय न होकर बेड़ोल रूप में दिखाए जाते है। ये सब बाहरी रूप-रंग के पैमाने आदिवासी स्त्री को गैर-आदिवासी समाज की नजरों में आभासी और गैर-यथार्थमयी बनाता है। मीडिया और आदिवासी विषय पर चर्चा करते समय हरिराम मीणा अपनी किताब आदिवासी दुनिया में कुछ सवाल मीडिया की भूमिका पर उठाते है जैसे उनके सवाल हैं “मुख्यधारा के जन संचार माध्यम अर्थात मास मीडिया में आदिवासियों को कितना स्पेस दिया जाता रहा है? इस सवाल का जवाब तलाश करते वक्त यह मुद्दा भी सामने आता है कि उस दिए गए स्पेस में आदिवासियों के प्रति कहाँ तक यथार्थ के निकट है? दूसरा सवाल यह उठा है कि आदिवासियों का अपना मीडिया कहाँ तक विकसित हुआ है चाहे उस मीडिया में योगदान देने वाले व्यक्ति आदिवासी समुदाय के सदस्य हों या आदिवासी जीवन में रूचि रखने वाले गैर-आदिवासी लोग?”  मीडिया के सन्दर्भ में बात करते समय हमें यह भी ख्याल रखना होगा कि यहाँ जन संचार के सभी माध्यमों को सम्मिलित किया जा रहा है जैसे प्रिंट मीडिया, अखबार और पत्रिकाएं, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जिसमें दूरदर्शन और सिनेमा और साथ ही साथ खबरी चैनल भी सम्मिलित है। इन्टरनेट जैसी सुविधा होने के कारण बहुत सारे अन्य सोशल नेटवर्किंग संचार माध्यमों को भी शामिल किया जाता है जैसे ऑनलाइन पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल, ब्लॉग, फेसबुक-ट्विटर और अन्य डिजिटल सामग्री भी शामिल है।

इन सब संचार माध्यमों में आदिवासी स्त्री की छवि देखने के लिए यह आधारभूत जानकारी होना भी जरुरी है कि इन संचार माध्यमों में कितने बुद्धिजीवी शामिल है, उनकी मान्यताएं और विश्वास क्या है यानी वे किस समुदाय से आ रहे है। जिन समुदायों से वे आ रहे है क्या मीडिया में आकर वे अपनी पूर्व प्रदत्त विचार शैली से इतर मीडिया सिद्धांत और नैतिकता के अनुसार पत्रकारिता करते है या नहीं। भारत में खासकर हिन्दी मीडिया में एथिक्स और मोरलिटी का बहुत अभाव है। जिसके कारण आदिवासी स्त्री की मीडिया में गलत छवि पेश की जाती है। अख़बार और पत्रिकाओं में निरंतर ऐसी खबरे छपती रहती है जिसमें मानव तस्करी के मामलें होते हैं किन्तु इन मामलों की पृष्ठभूमि क्या है इसको मीडिया नहीं खंगालता। लड़की और स्त्री इन मानव तस्करी की शिकार होती है जिन्हें आदिवासी क्षेत्रों जीविकोपार्जन का लोभ देकर ऐसे क्षेत्रों में लाया जाता है जहाँ स्त्री का लिंगानुपात कम होता है। ऐसी जगहों पर लड़कियों को गलत तरीके से पुरुषों को बेच दिया जाता है। ऐसे मामलों में मीडिया अपनी सिर्फ इतनी ही भूमिका का निर्वहन करके छोड़ देता है कि अमुक जगह इतनी आदिवासी जगहों की स्त्रियों को तस्करों से छुड़ाया गया आदि। इस तस्करी के पीछे की जमीन क्या है इस पर बात नहीं की जाती कि किस प्रकार आदिवासी क्षेत्रों की जमीन को विभिन्न भारी उद्योग-धंधों के लिए आदिवासियों से बलपूर्वक राज्य या माफिया सरगना ले लेते हैं। जिसका परिणाम होता है विस्थापन और जीविकोपार्जन के लिए एवं बसने के लिए नई जमीन की तलाश करना। इससे आदिवासी परिवार के विभिन्न लोग एक-दूसरी जगह पर जाने के लिए बाधित होते है। जिसमें से कई बार आदिवासी स्त्रियों को काम दिलाने के बहाने से गैर-आदिवासी क्षेत्रों से गए पुरुष ही आदिवासी स्त्रियों का घरेलू शोषण और तस्करी करते है। इन मुद्दों पर तथाकथित मीडिया में चुप्पी साध ली जाती है। गैर-सरकारी संगठनों के प्रयासों को भी अधिकतर दरकिनार कर दिया जाता है। जिससे यह होता है कि गैर-आदिवासी समाज में आदिवासी स्त्री की छवि इस प्रकार पीड़ित और शोषित के रूप में बनती तो है लेकिन स्त्री के प्रति मानवीय छवि मीडिया बनाने में असफल रहता है। यदि हालिया समय में आदिवासी स्त्री से जुड़े कुछ मुद्दों की मीडिया में प्रस्तुति पर बात की जाए तो देखा जा सकता है कि मीडिया जनतंत्र की ओर है या राज्य की ओर। आदिवासी क्षेत्रों में जब भी सैन्य बल या अर्ध सैन्य बल जाते है, तब वे वहाँ के गाँव तहस-नहस करते है, किसी आदिवासी स्त्री-पुरुष को नक्सली के नाम पर नृशंस हत्या करके उसे नक्सली कहकर प्रचारित करते है और आदिवासी लड़कियों और स्त्रियों के साथ जबरदस्ती यौन अपराध करते है। आदिवासी समुदाय द्वारा प्रतिकार करने पर उन्हें फंसाकर क़ानूनी शिकंजों में बाँध देते है। आदिवासी क्षेत्रों में हिंसा के बहुत सारे मुद्दे इसी तरह घटते है। यहाँ मीडिया इस तरह की रिपोर्टिंग करता है जिसमें राज्य और उसकी छवि को साफ तौर पर बचाने की कोशिश की जाती है और उल्ट आदिवासी स्त्री को ही नक्सली स्त्री बनाकर उसके साथ हुए हर वीभत्स तरीके से किए गए यौनाचार को देश हित एवं सुरक्षा के नाम पर ढँकने की कोशिश की जाती है। आदिवासी क्षेत्र में अध्यापन का कार्य करने वाली सोनी सोरी और सन् 2016 में सुकमा जिले के गोमपाड़ गाँव की आदिवासी युवती मडकम हिडमे के साथ सैन्यबलों द्वारा किया गया व्यवहार और उसकी मीडिया द्वारा की गई पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग आदिवासी स्त्री के मीडियाकरण का स्पष्ट उदाहरण है।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर सोना झरिया मिंज

समयांतर के फरवरी, 2017 के अंक में रामू द्वारा लिखे गए लेख ‘मानवाधिकारों का हनन और आदिवासी’ में हम स्पष्टतया देख सकते हैं कि किस प्रकार राज्य और मीडिया आदिवासी स्त्री के लिए निष्पक्ष न्याय के पथ में बाधा पहुँचाते है। जो पत्रकार एवं कानूनी सहायता प्रदत्त कराने वाले समूह है और इन अपराधों पर से पर्दा उठाने का प्रयास करते हैं तो उन्हें देश के हित के खिलाफ काम करने वाले लोगों के रूप में राज्य संरक्षण प्राप्त मीडिया चित्रित करती है। उन्हें देशद्रोही, माओवादी-नक्सली ठहराने की कोशिश की जाती है और जेलों में अपराधियों की तरह रखा जाता है। रामू अपने इस लेख में लिखते हैं “भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा अंजाम दिएगये ऐसे ही जघन्य अपराधों के एक छोटे से अंश की पुष्टि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने की है, शायद यह स्वीकृति गिनी-चुनी महिलाओं को ही सही न्याय दिलाने की दिशा में एक छोटा कदम साबित हो।”  एन. एच. आर. सी. ने 7 जनवरी 2017 की अपनी रिपोर्ट में माना कि “प्रथम दृष्टया यह पाया गया कि 16 महिलाओं के साथ बलात्कार, यौन हिंसा और शारीरिक प्रताड़ना हुई है और इसे छतीसगढ़ राज्य पुलिस बल के जवानों ने अंजाम दिया है।”  छत्तीसगढ़ में 11 जनवरी से 14 जनवरी 2016 के बीच बीजापुर जिले के बेल्लाम लेंद्रा (नेंद्रा) गाँव की 13, सुकुमा जिले के कुन्ना गाँव की छह और दांतेवाडा जिले के छोटेगडम गाँव की महिलाओं के साथ सुरक्षा बलों ने सामूहिक बलात्कार किया था।”  “11 और16 मार्च 2011 की घटना, जिसमें दंतेवाड़ा जिले के 250 आदिवासी घरों को केंद्रीय और राज्य सुरक्षा बलों द्वारा फूँक दिया गया था, इस घटना की जांच सीबी आई द्वारा कराने का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने दिया था। इस जांच में यह पाया गया कि घरों को जलाने का काम सुरक्षा बलों ने ही किया था, वहीं जांच के दौरान इस बात की भी पुष्टि हुई थी कि तीन महिलाओं के साथ सुरक्षा बलों ने बलात्कार किया था।”  “8 जनवरी 2016 को दांतेवाडा थाने के पदम गाँव की 14 वर्ष की लड़की, जब अपनी किराने की दुकान बंद कर रही थी, उसी समय एक के रिपुब का एक जवान आया और  उसके साथ पूरी रात बलात्कार किया।”  “बलात्कार की शिकार एक पीड़िता ने इंडियन एक्सप्रेस संवाददाता को बताया कि ‘वह अदालत गई। अदालत के दरवाजे पर खड़े पुलिस वालों ने उसे अंदर ही नहीं जाने दिया, लोग आते-जाते रहे हम वापस आ गए।’”  पत्रिका में जाहिर इन सब घटनाओं को पढ़कर हम यह सवाल उठा सकते हैं कि मुख्यधारा का मीडिया क्यों इन आदिवासी स्त्रियों के शोषण पर मौन है और यही मुख्यधारा का मीडिया बेंगलुरु और दिल्ली में घटित स्त्री शोषण की घटनाओं पर सचेत रहता है लेकिन आदिवासी स्त्री पर लम्बे समय से हो रहे निरंतर शोषण पर कोई आवाज़ नहीं उठाता। यह मीडिया की यह चयनित रिपोर्टिंग बताती है कि शोषित के लिए न्याय उठाने के रास्ते कितने कठिन और संकीर्ण है। रामू अपनी रिपोर्ट में जिस एक ओर बात की तरह ध्यान दिलाते हैं वह है कि आदिवासी स्त्री के सवालों को नक्सलवादी, माओवादी बताकर किनारे कर दिया जाता है लेकिन कोई मीडिया आदिवासी स्त्री के हक में बात उठाते वक्त यह नहीं बताता कि आदिवासी इलाकों में जहाँ नक्सलवाद या माओवाद नहीं है वहाँ के आदिवासी भी अपने जल, जंगल और जमीन की लड़ाई लड़ रहे हैं। और ऐसा वे अपनी संविधान प्रदत्त पांचवीं अनुसूची और वन अधिकार अधिनियम के तहत कर रहे हैं। आदिवासी स्त्री की लड़ाई मुख्यत: अपने जीविको पार्जन के साधनों के संरक्षण की है, जल-जंगल-जमीन को बचाने की है लेकिन बाहरी लोगों के प्रवेश ने और सैन्यबलों ने उनके आत्मसम्मानपूर्वक जीने के अधिकार को बाधित किया है। जिसकी छवि मीडिया में कुछ इस तरह से प्रस्तुत की जाती है जिससे आदिवासी स्त्री को अपनी न्याय की लड़ाई में कोई मदद नहीं मिलती। रामू की मानवाधिकारों के हनन पर लिखी गई इस रिपोर्ट में यह सवाल भी उठाया गया है कि आदिवासी महिलाओं के साथ हुए यौनशोषण पर देश की मुख्यधारा की मीडिया चुप्पी की रणनीति (थ्योरी ऑसायलेंस) अपनाते हुए चुप्पी साधे रहती है क्योंकि कोर्पोरेट द्वारा संचालित और पोषित मुख्यधारा का मीडिया राज्य के साथ खड़ा हुआ है न कि अपने नागरिकों के साथ। इसलिए इन सब मीडिया के नजरियों से देश का आदिवासी और देश की आदिवासी महिलाओं की ऐसी छवि तैयार की जा रही है जिसमें उन्हें देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बताया जा रहा है और उन्हें इस आधार पर नेस्तानाबूद किया जा रहा है। इस छवि के रूप में आदिवासी स्त्री का मीडियाकरण देश की नागरिकता के लिए खतरा है जिसमें नागरिकता का अधिकार भी चयनित और सुविधाभोगी तबकों को ही उपलब्ध है।

हॉकी के लिए ध्यानचंद खेल सम्मान से सम्मानित सुमारी टेटे

छोटे स्तर पर बहुत कम पत्रिकाएँ ऐसी है जो दलित-आदिवासी जीवन की वास्तविक सच्चाइयों से पाठक को रूबरू कराती है। ‘गोंडवाना सन्देश’ और ‘दलित आदिवासी दुनिया’ ऐसे ही प्रिंट मीडिया के लघु प्रयास हैं जिनके माध्यम से आदिवासी समाज की स्त्रियों के जन-जीवन से संघर्ष और लड़ाई की वास्तविक छवि जनसमुदाय तक पहुँच पा रही हैं। लेकिन मुख्यधारा के मीडिया में कोई भी प्रयास आदिवासी स्त्री की छवि को सकारात्मक रूप में नहीं जाहिर करता। कभी कभार कुछ घटनाओं में ही आदिवासी जीवन को सीमित कर दिया जाता है जिसका कोई नतीजा आदिवासियों के हक में नहीं निकलता। जैसे ओडिशा के कालाहांडी जिले के भवानीपटना में एक व्यक्ति अपनी पत्नी के शव को 12 किलोमीटर बांधकर और कंधे पर रखकर लाने की घटना को मुख्यधारा के मीडिया ने खूब भुनाया लेकिन उसके बावजूद कभी आदिवासी स्त्री के स्वास्थ्य की स्थिति का जायजा लेने का प्रयास नहीं किया। इसी तरह गेट्स फाउंडेशन ने सर्वाइकल कैंसर की दवाओं का आदिवासी स्त्रियों पर प्रयोग किया, जिस पर मीडिया महकमें में कोई खास हलचल नहीं हुई। इनसब घटनाओं के माध्यम से आदिवासी स्त्री की मीडिया में बन रही छवि का मोटा-मोटा अंदाजा हो जाता है कि उसकी राष्ट्र निर्माण में क्या स्थिति है।

इसी तरह की विस्तृत रिपोर्ट समयांतर के अगस्त  2016 के अंक में संजय पराते, विनीत तिवारी, अर्चना प्रसाद और नंदिनी सुंदर की भी प्रकाशित हुई है जिसका शीर्षक है ‘गैर जिम्मेदार युद्ध में पिसते छत्तीसगढ़ के आदिवासी’ इस रिपोर्ट में आदिवासी स्त्री के साथ सुरक्षा बलों द्वारा की गई यौन शोषण और हत्या का जिक्र है जिसके अनुसार चुचकुंटा गाँव की एक नवजवान औरत फुल्लो के साथ 17-18 जनवरी 2016 को, जब वह एक सिंचाई तालाब पर काम कर रही थी, सुरक्षा बलों ने बलात्कार किया। उस पर पुलिस ने नक्सली होने का इल्जाम लगाया हालाँकि ग्रामीण इस बात से इंकार कर रहे थे। इसी तरह अंतागढ़ के गाँव में बीएसएफ, एसपीओ द्वारा बलात्कार और यौन शोषण की घटना की भी रिपोर्टिंग इसमें की गई है, जिसके माध्यम से हम जान सकते है कि ऐसी घटनाएँ कितने बड़े स्तर पर घटती है और उनकी रिपोर्टिंग कहीं भी मुख्यधारा की प्रिंट और मास मीडिया में रिपोर्टिंग नहीं की जाती। और अधिक विस्तार से जानने के लिए समयांतर के इस अंक को देखा जा सकता है।
आदिवासी स्त्री की जो एक और छवि हम देखते है वह है खेलों में उनकी सक्रिय भागीदारी। आदिवासी समुदाय से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेल-कूद में भागीदारी करने वाली आदिवासी युवती को ही कितना स्थान देता है। मयूरभंज, उड़ीसा की 24 वर्षीय पूर्णिमा हेम्ब्रेम ने अभी तुर्कमेनिस्तान में आयोजित 5वें ‘एशियन इंडोर गेम’ में पेंटाथलॉन खेल प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक प्राप्त किया। इसी तरह हॉकी खेल में भी आदिवासी युवतियों की प्रस्तुति सराहनीय है लेकिन हॉकी को राष्ट्रीय खेल होने के बावजूद मीडिया में क्रिकेट की तुलना में हॉकी को कम कवरेज दी जाती है। चूँकि हॉकी में व्यापारिकता और ग्लैमर का अभाव है, जो कि बाजार के नियंत्रक और नियंता भी काफी हद तक है इसलिए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में सिर्फ एक हैडलाइन तक ही आदिवासी स्त्री खिलाडियों की बुलंदियां सिमट कर रह जाती है। प्रिंट मीडिया के सहारे इक्का द-
क्का राष्ट्रीय व स्थानीय अख़बारों और पत्रिकाओं में ही क्षेत्रीय अभिमान के द्वारा आदिवासी स्त्री की खिलाडी की छवि सामने आती है।

आदिवासी वीमेन एक्टिविस्ट

ऐसी ही कहानी है असुंता लकड़ा की, जो हॉकी खिलाडी है लेकिन बिरले ही हममें से उनका नाम जानते है। नीचे दी गई बातचीत जोहार झारखण्ड के फेसबुक पृष्ठ से ली गई है जिसे एक व्यक्ति ने अपने अनुभव के माध्यम से साझा किया है| किस तरह खेलों में भी आदिवासी स्त्री की उपेक्षा सिर्फ मीडिया ही नहीं बल्कि सरकार भी करती है| “क्या आप इन्हें पहचानते हैं? एक नजर में शायद आप भी इन्हें न पहचान पायें, लेकिन नाम और इनके काम का जिक्र आते ही आप इन्हें जरूर पहचान जायेंगे। ये हैं असुंता लकड़ा। ओलंपिक खेलों के लिए क्वालिफाइंग इंडियन टीम की कप्तान और झारखंड के सिमडेगा से आने वाली हॉकी सनसनी। दोपहर में रांची के हटिया स्थित डीआरएम ऑफिस के बाहर यूं ही पैदल चलते हुए मिल गयीं। शुरुआत में मैं भी उन्हें एक आम आदमी समझ आगे बढ़ चला था, लेकिन फिर गौर किया, तब समझा कि ये तो हमारी अपनी असुंता हैं। झिझकते हुए उनसे सवाल किया- आप असुंता हैं न? सरल तरीके से उन्होंने जवाब दिया- हां। फिर सवाल कौंधा और पूछ डाला, आप इतनी बड़ी हॉकी खिलाड़ी और आप ऐसे ही घूम रही हैं? कोई ताम-झाम नहीं, आस-पास कोई फैन भी नहीं? असुंता कहती हैं- मैं कोई क्रिकेट खिलाड़ी थोड़े ही हूं!! उनके इसी जवाब में छिपा दर्द भी सामने आ गया। फिर उन्होंने बताया कि कैसे आज भी उन्हें डिबडीह में एक किराये के मकान में रहना पड़ रहा है। आज तक सरकार की ओर से उन्हें न तो भूखंड मिला और न ही कोई क्वार्टर ही उपलब्ध कराया गया। असुंता इस देश में क्रिकेट के बाजारवाद के कारण तेजी से मरते जा रहे अन्य खेलों के भुक्तभोगी खिलाड़ियों की एक बानगी हैं। खैर, डीआरएम ऑफिस में उनका आना इसलिए होता है, क्योंकि वे रेलवे में कार्यरत हैं। वैसे उन्हें भोपाल में हॉकी कैंप में जाने के लिए टिकट कटाना था, इसलिए खुद इस दफ्तर में आना पड़ा। पहले तो रिजर्वेशन मिलना ही मुश्किल होता था, लेकिन जब से रेलवे ने उन्हें पहचान लिया है, तब से कम परेशानियां झेलनी पड़ती हैं। असुंता बताती हैं कि 2014 में दक्षिण कोरिया में होने वाले एशियाई खेल और ग्लासगो, स्कॉटलैंड में होने वाले कॉमनवेल्थ खेलों को लेकर टीम की तैयारी चल रही है। झारखंड की सरकार से उन्हें क्या अपेक्षा है? इस सवाल पर असुंता मुस्कराती हैं, फिर जवाब देती हैं- मैं आज भी किराये के मकान में रह रही हूं, और क्या कहूं। आप लोग खुद समझ सकते हैं।” वर्तमान में भारतीय हॉकी टीम में  खिलाडी नवजोत कौर दीप, ग्रेस एक्का, मोनिका मलिक, निक्की राधन, अनुराधा देवी, सविता पुनिया, पूनम रानी, वंदना कटारिया, दीपिका ठाकुर, नमिता टोप्पो, रेणुका यादव, सुनीता लाकरा, सुशीला चानू, रानी रामपाल, प्रीती दुबे और लिलिमा मिंज हैं। इनमें से कई आदिवासी समुदाय से आने वाली खिलाडी है| हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय नेहरू हॉकी प्रतियोगिता में 6 अक्टूबर 2017 को झारखण्ड की टीम ने पंजाब को 6-1 से पराजित किया लेकिन विस्तार से इन खबरों के बारे में हमें किसी मुख्यधारा की प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में देखने-पढ़ने को नहीं मिलता| यहाँ हम देख सकते हैं कि किस प्रकार आदिवासी स्त्री को खेल के क्षेत्र में भी सक्रिय होने पर मीडिया में उसकी प्रतिभा और खेल के प्रति जूनून को नजरअंदाज किया जाता है|

मॉडल रीनी कुजूर

मीडिया में आदिवासी स्त्री की प्रस्तुति – मांसल देह के रूप में–
इस तरह यदि मीडिया की भूमिका आदिवासी स्त्री की छवि को प्रस्तुत करने में देखी जाए तो हमें मीडिया की बहुत कम दिलचस्पी आदिवासी स्त्री के जन-जीवन को जानने-समझने और उसके सवाल उठाने में नहीं दिखाई देती| इसकी बजाय मीडिया बरगलाने की राजनीति अधिक करती है क्योंकि मीडिया सरकार को देश मान बैठी है और उसकी गलत नीतियों के विरोध में खड़े होने वाले आदिवासी समुदाय जिसमें आदिवासी स्त्री और पुरुष दोनों सम्मिलित है, उन्हें अपना विरोधी मान बैठी है| जो मीडिया का आचार और नैतिकता के विरोध में है| यही कारण है कि मीडिया आदिवासी स्त्री को या तो नक्सली के रूप में चित्रित करती है या उससे जुड़े मुद्दों के बारे में चुप्पी साधे रहती है लेकिन जब मीडिया को आदिवासी स्त्री का भुनाने लायक कुछ मुद्दा मिल जाता है तो उससे फायदा उठाना भी नहीं भूलती| यही कारण है कि हमारे देश की मीडिया की रैंकिंग विश्व में 136वें स्थान पर है, इसका मतलब हुआ कि मीडिया की विश्वसनीयता, नैतिकता और निष्पक्षता बहुत ही कम है| इस रैंकिंग का अर्थ है कि मीडिया अपने देश के लोगों के लिए, लोकतंत्र की एकता और अखंडता के लिए काम नहीं करता| आदिवासी इलाकों में स्त्रियों पर किए जाने वाले अलग-अलग तरह के अपराधों के बारेमें अधिसंख्य मीडिया फर्म रिपोर्टिंग करने में दिलचस्पी नहीं लेते| इसके साथ ही साथ खेल-कूद जगत में आदिवासी इलाकों से उभरती प्रतिभाओं को किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है, देश के लिए खेलने में आगे किस-किस तरह की चुनौतियों का सामना आदिवासी स्त्री खिलाडियों को करना पड़ता है| इस लिए यह कहा जा सकता है कि मीडिया जिसमें आज अधिकतर प्राइवेट फर्म के रूप में बाजार में है और हमारे घर में सूचना प्रसारण की जिम्मेदारी इन मीडिया फर्मों ने अधिकतर अपने जिम्मे ही ले ली है| ऐसी मीडिया ने आदिवासी स्त्री की छवि को बहुत नुक्सान पहुँचाया है| इसलिए स्थानीय मीडिया, सोशल नेटवर्किंग साइट्स, वेब न्यूज़पोर्टल आदि जैसी वैकल्पिक मीडिया ने आदिवासी स्त्री की छवि को प्रस्तुत करने की एक ईमानदार कोशिश शुरू की है| जिसमें उनकी यथास्थिति को समझने की कोशिश की जा रही है, और उसके माध्यम से उनके लिए न्याय और लोकतान्त्रिक नागरिक अधिकारों के लिए सवाल उठाए जा रहे है|

अंजली जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के  भारतीय भाषा केंद्र में शोधार्थी हैं  सम्पर्क : anjali1441992@gmail.com

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ग्यारहवीं ‘ए’ के लड़के देश का भविष्य हैं, असली खतरा ग्यारहवीं ‘बी’ की लड़कियां हैं

जया निगम 

सनी लियोनी  और सपना चौधरी हमारे समय के पुरुषों के लिये सपनीली परियां हैं, क्लास और कल्चर की ऊंची-ऊंची दीवारों को लांघते हुए इन दोनों ही औरतों ने अपनी लोकप्रियता की बड़ी शानदार मीनारें खड़ी की हैं. इसी तरह भाभी जी घर पर हैं की शिल्पा शिंदे की सेक्स अपील के चर्चे हर घर में हैं. सदियों से गणिकाओं और नगरवधुओं के नाम पर पुरुषों की यौन फंतासियों को पूरा करने वाली औरतें का जो अस्तित्व बाज़ार में रहा है, उन्ही लालसाओं के ऑन स्क्रीन अवतार के रूप में ये महिलायें दिख रही हैं. सविता भाभी की शोहरत के किस्से अभी पुराने नहीं हुए हैं.

भारत में इन महिलाओं की विराट सफलता के बरक्स कोई पुरुष अपनी सेक्स अपील के चलते बाजार में छाने में इतना कामयाब रहा हो ऐसा याद नहीं आता हालांकि इसके अपवाद स्वरूप केवल फवाद खान का नाम ही याद आता है जिनकी सेक्स अपील के फंदे में महिलायें मास लेवेल पर फंसीं लेकिन क्लास और कल्चर की सीमाओं को लांघना उनके लिये भी बहुत दूर की कौड़ी थी.

क्या इन दीवानावार आदमियों को अपने घर की महिलाओं के ‘टेस्ट’ के बारे में कुछ पता है? माना कि ज्यादातर ने ये जानने की जरूरत कभी महसूस ही नहीं की होगी लेकिन जिन्हे ‘जरूरतों का ख्याल’ आता है जो ये मानने के दावे करते हैं कि औरतें भी आदमियों की तरह इंसान होती हैं. उनकी भी इच्छायें-वासनायें, हार-जीत, संघर्ष-पराक्रम और अहम-कुंठायें होती हैं. उनके लिये भी सेक्स का चैप्टर खुलते ही केवल पुरुषों के फलसफे ही वास्तविक रह जाते हैं.

हिंदी के युवा लेखक गौरव सोलंकी की एक कहानी है, 11वीं A के लड़के. यूं तो ये कहानी बेहद विवादास्पद है और नयेपन की संभावनाओं से भरपूर भी, लेकिन मेरे लिये इस कहानी की खास बात है – एक ही क्लास में पढ़ने वाले भाई और बहन की सेक्सुअल फैंटेसीज़ का समानांतर चलना और उनका आपस में एक-दूसरे से ये सब साझा करना. कहानी में शायना, नायक की हमउम्र बहन है जिसका प्यार अमरजीत से है जो उसी की क्लास में पढ़ने वाला पढाकू किस्म का, चॉकलेटी संभावनाओं से भरपूर लड़का है जिसकी शक्ल के पीछे पूरे क्लास की लड़कियां एक साल फेल होने को तैयार हैं जबकि इस हल की दुकान चलाने वाले लड़के को केवल किताबों से मुहब्बत है. शायना और उसका भाई सर्विस क्लास मां-बाप की नौकरों के दम पर पलने वाली संतानें हैं. शायना का भाई अमरजीत की भाभी के साथ सविता भाभी की कल्पनाओं के सच होने से शुरुआत करते हुए उसकी सलवार तक धोने लगता है जबकि शायना अमरजीत की किताबों के पैसे चुकाते-चुकाते उसकी दाढ़ी बनाने लगती है.
इस किताब पर भारतीय ज्ञानपीठ की आपत्ति थी कि भाई-बहन के रिश्ते को इस तरह से कहानी में दिखाया जाना अश्लील है और हिंदी समाज भी इस तरह की कहानियों के लिये तैयार नहीं है, ये उद्गार उन्होने लेखक गौरव सोलंकी को लिखे गये अपने पत्र में व्यक्त किये जिसके लिये वो तायार नहीं हुए, उन्हे ये भी गवारा नहीं था कि वो अपनी कहानी में सगे भाई-बहन के रूप में दिखाये गये अपने पात्रों का रिश्ता बदल कर कुछ ममेरा या चचेरा कर दें. इस संग्रह का नाम पहले था – सूरज कितना कम जो बाद में एक अन्य प्रकाशन से ग्यारहवीं ए के लड़के के नाम से छप कर आया.

दरअसल ये पूरा किस्सा साल 2012 का है और हमारे समाज में यौन फंतासियों और सुखों पर लगे लैंगिक पहरों के अलग-अलग किस्सों की केवल एक नज़ीर भर है. देश के आकाओं को रानी जैसी गरीब घर की बहू-बेटियों का सविता भाभी में बदल जाना तो पुश्तैनी प्रहसन लगता है लेकिन दिक्कत उन्हे होती है शायना जैसी लड़कियों के अपने भाईयों के बरक्स अपनी प्रेम और वासनाओं के सिलसिले चलाने से, यौन सुखों और फंतासियों को अपनी तरह से जीने के उनके वादों और दावों से.

जो भाई अपनी बहनों को घर, परिवार, पड़ोस, देश और धर्म की चौहद्दी में बांध कर खुद अपने शिकारी अभियानों में व्यस्त रहते हैं, उनके हाथों इस देश का धर्म, संस्कृति और अर्थव्यवस्था बिल्कुल सुरक्षित रहती है लेकिन जो लड़के अपने साथ अपनी बहनों के इंसानी हकों को पहचान कर उन्हे नहीं दबाना नहीं सीखते, धमकाना और जरूरत पड़ने पर मारना नहीं सीखते वो ‘गुड़गांव’ जैसे शहरों के लिये किसी मतलब के नहीं बनते. क्या इत्तफाक है कि गौरव ने ये कहानी जिस शहर से भाग कर लिखी, उसी शहर के बनने की कहानी शंकर रमन ने लिखी.
देश में चलते सेक्सी बवंडर की एक से बढ़ कर एक डरावनी कहानियां सामने आ रही हैं – मगर देश को खतरा इन सच्ची कहानियों के वास्तविक अपराधियों से ज्यादा ऐसी काल्पनिक कहानियों के सच्चे किरदारों से हैं जो किस्सा, गुड़गांव, तितली, सिटीलाइट्स, अनफ्रीडम, एंग्री इंडियन गॉडसेज, एस दुर्गा और ग्यारहवीं ए के लड़के जैसी कहानियां कह रहे हैं.

इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि ‘गुनाहों का देवता’ पढ़ कर मंत्रमुग्ध हो जाने वाली पीढ़ी उसी देवता की निजी जिंदगी पर आधारित ‘रेत की मछली’ को सुनने के लिये बिल्कुल तैयार नहीं है.
हमारी सोसायटी जिस किस्म के सेक्सी चक्रवात से गुजर रही है उसके बीचोबीच एक किस्म का ‘निर्वात’ है. निर्वात टूटेगा तो चक्रवात बिखर जायेगा. इस निर्वात को तोड़ने के औजार ‘रानी’ के पास नहीं हैं पर शायना के पास हैं, इसलिये उसका चुप रहना जरूरी है.

 आईआईएमसी की पूर्व छात्रा जया निगम फिलहाल फ्रीलांस करती  हैं. 
 

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