Home Blog Page 4

क्यों विवादों में है बिहार सरकार का राजभाषा पुरस्कार

लेखक : विनय कुमार सिंह

साहित्य अकादेमी के पदाधिकारियों की इंट्री राजभाषा विभाग में रामवचन राय की वजह से होती रही है। राजभाषा विभाग में पुरस्कारों की बंदरबांट साहित्य अकादेमी के इन्हीं लोगों के कारण होती रही है। रामवचन राय से पहले प्रेमकुमार मणि नीतीश कुमार के खासम-खास होते थे, तो उन्होंने इसकी कमिटियों में नामवर सिंह, मैनेजर पांडे और देवेंद्र चौबे जैसे सवर्ण लेखकों को शामिल करवाया। उस दौर में भी बिहार के बहुत सारे लेखक इस पुरस्कार से वंचित रहे। इन नामवर लेखकों ने भी यहां आकर अपने ही भाई बंधुओं और परिचितों को सम्मानित करवाया।

मंत्रिमंडल सचिवालय विभाग (राजभाषा) द्वारा वित्तीय वर्ष- 2023-24 के लिए ‘हिन्दी सेवी पुरस्कार दिये जाने की घोषणा के साथ ही विवाद शुरू हो गया है। विवाद की शुरुआत कवि, पत्रकार विमल कुमार ने सोशल मीडिया पर जारी अपने एक पत्र के माध्यम से किया। ज्ञात हो कि मंत्रिमंडल सचिवालय विभाग (राजभाषा) द्वारा राष्ट्रकवि दिनकर सम्मान दिये जाने संबंधी पत्र विमल कुमार को प्रेषित किया था। जिसे उन्होंने लेने से अस्वीकार कर दिया। विवाद का एक तगड़ा प्रकरण अभी सामने आया है। राजभाषा ने डॉ. के श्रीनिवास राव को बाबू गंगा शरण सिंह पुरस्कार से सम्मानित किया है। राव साहित्य अकादेमी दिल्ली के सचिव हैं और यह वही शख्स हैं, जिन्होंने अपने ही संस्थान में काम करने वाली, एक महिला सहकर्मी के साथ यौन दुराचरण के आरोपी हैं। सन 2018 में उनपर जब उक्त महिला ने केस किया तो उसे एक साल बाद बर्खास्त कर दिया गया। उनका यह मामला कोर्ट में चल रहा था। अभी कोर्ट ने उस महिला की सेवा बहाल कर दी है और यह सख्त आदेश दिया है कि आरोप की जांच लोकल कमिटी से होनी चाहिए। विभाग ने इसबार तीन ऐसे लेखकों को पुरस्कृत किया है, जो पहले भी पुरस्कृत हो चुके हैं. ये घटनाएं बतलाती हैं कि साहित्य को लेकर यह विभाग, जो कि स्वयं मुख्यमंत्री का विभाग है, कितना लचर और यथास्थितिवाद का पोषण करने वाला है।


विभाग ने इस बार जिन 15 लेखकों को पुरस्कृत किया है उनमें ब्राह्मण जाति समुदाय के 7. भूमिहार के 3, कायस्थ के 2 और 1-1 लेखक बेलदार और दलित समाज से आनेवाले हैं। पुरस्कार पाने वालों की सूची में ओबीसी समाज का लेखक पूरी तरह से बाहर है। यह नीतीश कुमार का सवर्ण प्रभुत्व आधारित ऐसा छ‌द्म है जिसकी जितनी भी निंदा की जाए, कम होगी। यह गौरतलब है कि जिस बिहार में बहुजन समाज से आनेवाले लेखकों की एक बड़ी आबादी हिन्दी साहित्य में लिख रही है, बावजूद इसके पिछड़े वर्ग से एक भी लेखक को यह सम्मान नहीं दिया गया। यह उपेक्षा नीतीश कुमार की सरकार में ही संभव थी। यूं ही नहीं नीतीश यहां के सवर्णों के प्रिय हैं। बिहार में जिन जाति समूहों की आबादी 88 प्रतिशत है, इस पुरस्कार में उन्हें मात्र 2 पुरस्कार मिले हैं और जिनकी आबादी मात्र 12 प्रतिशत है, उसी सवर्ण जाति समूह के लोगों ने सारे-के-सारे पुरस्कार अपने खाते में डाल दिये।
वित्तीय वर्ष-2023-24-2024-25 के लिए हिन्दी सेवी पुरस्कार, सम्मान योजना के लिए गठित निर्णायक मंडल का अध्यक्ष डॉ-विश्वनाथ प्रसाद तिवारी को बनाया गया था, जो पहले से ही पुरस्कार लेने और दिलवाने की जुगाड टेक्नोलॉजी के मास्टरमाइंड माने जाते रहे हैं। राजभाषा में उनकी पहुंच का माध्यम रामवचन राय रहे हैं, जो नीतीश कुमार के करीबी बतलाये जाते हैं। आगे हम बतलाएंगे कि रामवचन राय के कारण कैसे इस विभाग की विश्वसनीयता गर्क हुई है। निर्णायक मंडल में शामिल सदस्यों में डॉ. एस-सिद्धार्थ (दलित), डॉ पुरुषोत्तम अग्रवाल (बनिया), डॉ श्योराज सिंह बेचौन (दलित) डॉ. मंजुला राणा, अरुण कमल (ब्राह्मण) और डॉ नन्दकिशोर नंदन यादव शामिल थे। इन सभी निर्णायकों में एक भी ऐसे नहीं थे, जो समकालीन रचनाशीलता की श्रेष्ठ प्रतिभाओं को चुन सकें। जाहिर है ये सभी के सभी जुगाड़ टेक्नोलेंजी से आये लोग थे। राजभाषा ने बी.पी. मंडल पुरस्कार शिवनारायण को दिया है। इससे पहले भी विभाग इन्हें 2003 में नागार्जुन सम्मान से सम्मानित कर चुकी है। फिर ऐसा क्या था कि दुबारा इन्हें सम्मानित किया गया? इसके पीछे भी जुगाड़ का पूरा तंत्र काम करता रहा है। शिवनारायण नई धारा पत्रिका के संपादक हैं। वह अरविंद
महिला कॉलेज में हिन्दी के विभागाध्यक्ष हैं। वह जिस ‘नई धारा पत्रिका से जुड़े हैं, उसका स्वामित्व बिहार के चर्चित लेखक राजा राधिका रमण प्रसाद सिंह के परिवार का है।

यह संस्था भी हर साल अपने बैनर तले तीन पुरस्कार देती है। शिवनारायण ने कुछ वर्ष पूर्व राजभाषा पुरस्कार चयन समिति के वर्तमान अध्यक्ष डॉ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी को ‘नई धारा पुरस्कार, दिलवाया और बदले में विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने उन्हें बी.पी. मंडल पुरस्कार देकर उपकृत किया। इससे जुड़ा एक और सच यह है कि जिस शिवनारायण को यह पुरस्कार दिया गया इसमें निर्णायक मंडल के एक और लेखक श्योराज सिंह बेचैन भी शामिल थे। उन्होंने भी खुलकर शिवनारायण को यह सम्मान दिये जाने का पक्ष लिया था, बदले में शिवनारायण ने उनकी पत्नी रजतरानी मीनू को ‘नई धारा रचना सम्मान 2025’ दे दिया। कुछ माह पूर्व भी ‘नई धारा विवादों में घिरा था। हिन्दी कवि कृष्ण कल्पित और एक युवा लेखिका को इस संस्था ने लेखक इन रेजीडेंसी नामक एक फलोशिप के लिए चयन किया था। उक्त कवि ने उस युवा लेखिका के साथ जबरिया यौन संबंध बनाने की कोशिश की, जिसके कारण वह विवादों में रहा। इस पूरे प्रकरण में संस्था ने कोई ऐसी पहल नहीं ली, जिसके कारण कल्पित को सजा दिलायी जा सके ।

विभाग द्वारा अब तक किसी भी गैर ब्राह्मण (सवर्ण) ओबीसी, दलित, अल्पसंख्यक या महिला साहित्यकारों की राशि वाला राजेंद्र प्रसाद शिखर सम्मान नहीं मिला है। इस बार भी एक ब्राह्मण आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी को यह सम्मान दिया गया। यह वही आलोचक हैं जिनके प्रिय कवि तुलसी दास हैं। जिन पर उन्होंने तुलसी का देश’ नामक पुस्तक लिखी है। और जो फणीश्वरनाथ रेणु के गद्य को विचारहीन गद्य मानते हैं। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि किन लोगों ने और किन कारणों से ऐसे जातिवादी लोगों को बिहार के इन बड़े पुरस्कारों से विभूषित करने का निर्णय लिया। इसका सीधा-सा उत्तर यह है कि चूंकि राजभाषा के अध्यक्ष आमतौर पर दिल्ली के लेखक ही होते रहे हैं और प्रायः

‘मंत्रिमंडल सचिवालय विभाग (राजभाषा) द्वारा वित्तीय वर्ष 2023-24 के लिए ‘हिन्दी सेवी पुरस्कार की सूचीके लिए बिहार हलचल पत्रिका का यह इमेज देखें

वे सवर्ण जातियों से आते हैं, इसलिए आमतौर पर उनकी पहली पसंद उनकी अपनी ही जाति के दायरे के लेखक होते रहे हैं। यहां सवाल यह उठाया जा सकता है कि इनके चयन में कौन सा-मापदंड है जिसकी वजह से वे ही इसके अध्यक्ष बनते रहे हैं। इसका मूल कारण यह है कि चूंकि यह विभाग मुख्यमंत्री का है और उनके सभी कामों में प्रो. डॉ. रामवचन राय की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। प्रो. राय चूंकि अरसे से लगातार बिहार से साहित्य अकादेमी के सदस्य मनोनीत होते रहे हैं, इसलिए वह साहित्य अकादेमी में अपनी उपस्थिति की कीमत वहां से उनके पदाधिकारियों को राजभाषा में अध्यक्ष पद और पुरस्कार दिलवाकर पूरा करते रहे हैं। सच पूछा जाए तो इसके मास्टर माइंड रामवचन राय ही हैं।

इनकी ही कृपा से साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी को राजेंद्र प्रसाद शिखर सम्मान से सम्मानित किया गया था। वित्तीय वर्ष 2020-21 एवं 2021-22 के लिए गठित निर्णायक मंडल का अध्यक्ष माधव कौशिक थे, जो वर्तमान में साहित्य अकादमी के अध्यक्ष हैं। ज्ञात हो कि विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने अकादमी के अध्यक्षपद से हटने के बाद अपने विश्वास पात्र डॉ. माधव कौशिक को अकादमी का अध्यक्ष बनवाया। डॉ. कौशिक ने इस उपकार का बदला डॉ. तिवारी को राजेंद्र प्रसाद शिखर सम्मान से सम्मानित कर चुकाया।

वित्तीय वर्ष 2023-24 एवं 2024-25 के लिए ‘हिन्दी सेवी पुरस्कार, सम्मान योजना के लिए गठित निर्णायक मंडल के अध्यक्ष पद पर विश्वनाथ प्रसाद तिवारी हैं। उन्होंने साहित्य अकादमी के सचिव डॉ के. श्रीनिवास राव को बाबू गंगा शरण सिंह पुरस्कार से पुरस्कृत किया। ज्ञात हो कि वर्ष 2018 में साहित्य अकादमी के सचिव डॉ के. श्रीनिवास राव पर उनकी एक महिला सहकर्मी ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था। अकादमी ने उन्हें यह कहकर नौकरी से निकाल दिया था कि उन्होंने काम में खराब प्रदर्शन किया है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने अकादमी के इस कदम को न केवल अनुचित और अवैध बताया बल्कि बदले की कार्रवाई माना है। 28 अगस्त, 2025 को सुनाये गए फैसले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने अकादमी और सचिव दोनों की दलीलों को पूरी तरह से खारिज करते हुए पीड़ित महिला को उनके पद पर दोबारा बहाल कर दिया है। फैसला आने के पांच दिनपूर्व 23 अगस्त 2025 को ऐसे चरित्रहीन व्यक्ति को बिहार सरकार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सम्मानित करते हैं। इससे मंत्रिमंडल सचिवालय विभाग राजभाषा ही नहीं बल्कि पूरी चयन समिति पर प्रश्न उठना लाजिमी है।

साहित्य अकादेमी के पदाधिकारियों की इंट्री राजभाषा विभाग में रामवचन राय की वजह से होती रही है। राजभाषा विभाग में पुरस्कारों की बंदरबांट साहित्य अकादेमी के इन्हीं लोगों के कारण होती रही है। रामवचन राय से पहले प्रेमकुमार मणि नीतीश कुमार के खासम-खास होते थे, तो उन्होंने इसकी कमिटियों में नामवर सिंह, मैनेजर पांडे और देवेंद्र चौबे जैसे सवर्ण लेखकों को शामिल करवाया। उस दौर में भी बिहार के बहुत सारे लेखक इस पुरस्कार से वंचित रहे। इन नामवर लेखकों ने भी यहां आकर अपने ही भाई बंधुओं और परिचितों को सम्मानित करवाया।

नामवर सिंह ने स्वयं अपने छोटे भाई काशीनाथ सिंह को यह सम्मान दिलवाया, जबकि राजभाषा में यह स्पष्ट नियम है कि पुरस्कार निर्णायक से जुड़े लोगों के किसी संबंधी को नहीं दिया जा सकता। पाठकों का यह सवाल उठ सकता है कि कौन से मूर्धन्य आलोचक, लेखक हैं, जिन्हें यह सम्मान दिया जाना चाहिए था ? राणा प्रताप, तारानंद वियोगी, सुरेंद्र नारायण यादव, कमलेश वर्मा, राजेंद्र प्रसाद सिंह, अनंत आदि कई लेखक, साहित्यकारों को आज तक यह सम्मान नहीं दिया गया। यह एक खास पैटर्न की ओर स्पष्ट संकेत देता है। किसी पुरस्कार के दिये जाने का मापदंड यह होना चाहिए कि कौन-सा वह लेखक है, जो समकालीन हिन्दी रचनाशीलता के बड़े सवालों को व्यापक ढंग से उठा रहा है, अगर यह कसौटी होती तो हिन्दी में यह सम्मान ओमप्रकाश कश्यप, वीरेंद्र यादव, अश्विनी कुमार पंकज, कमलेश वर्मा, राजेंद्र प्रसाद सिंह सरीखे लेखकों को मिलना चाहिए था, जो अपने समय की रचनाशीलता को अपने तरीके से आगे बढ़ा रहे हैं, लेकिन उन्हें यह पुरस्कार इसलिए नहीं दिया गया, क्योंकि निर्णायक मंडल के अध्यक्ष ब्राह्मण बनते रहे हैं। उनका एकमात्र उद्देश्य बंदरबांटतक ही सीमित होते रहे हैं। अंगिका में एक कहावत है ‘तोरा ब्याह में हम नटुआ, हमरा ब्याह म तोंय नटुआ। यानि कि एक-दूसरे का सहयोग कर बंदरबांट करना यही खेल यहां भी चल रहा है। और इसके कर्तादृधर्ता हैं प्रो. रामवचन राय।

विवाद का चौथा कारण हृषिकेश सुलभको वर्ष 2023-24 के लिए फणीश्वरनाथ रेणु सम्मान दिया गया। ज्ञात हो कि वर्ष 2015 में हृषिकेश सुलभ को बिहार सरकार के कला एवं संस्कृति विभाग द्वारा रामेश्वर सिंह कश्यप पुरस्कार दिया गया था, जिसे उन्होंने लौटा दिया था। सनद रहे कि उस समय बिहार सरकार में जदयू के साथ राजद भी शामिल थी। आलोचकों का कहना है कि चूंकि उस समय सत्ता में राजद भी शामिल थी इसलिए उन्होंने उस समय उक्त पुरस्कार को लौटा दिया था।शायद छोटी राशि मानकर, या राजद से दूरी बनाने के उद्देश्य से अब चूंकि जदयू के साथ सत्ता में भाजपा भी शामिल है और राशि भी चार लाख रुपये की है इसलिए इस बार पुरस्कार लेने में कोई दिक्कत नहीं हुई।

बिहार सरकार में संवैधानिक पद परआसीन एक वयोवृद्ध प्रो. साहित्यकार ने टिप्पणी करते हुए कहा कि ‘मुझे यह आश्चर्य हो रहा है कि चयन समिति के अध्यक्ष जब डॉ. राजेंद्र प्रसाद शिखर सम्मान का चयन कर रहे थे तब उन्होंने एक क्षण के लिए यह क्यों नहीं सोचा कि एक तो अपने हमनाम और दूसरा एक ही शहर के रहने वाले का चयन वे कैसे कर रहे हैं? तनिक भी संकोच क्यों नहीं हुआ? साथ ही अपने ही स्वजाति का चयन करने में। यदि यही काम कोई बहुजन समाज से आने वाला व्यक्ति करता तो तुरंत यही लोग उस पर जातिवाद करने का ठप्पा लगा देते। इस कमिटी को निश्चित रूप से भंग कर दिया जाना चाहिए। चयन पारदर्शी और समावेशी होनी चाहिए।’

शायद विवादों के कारण ही वित्तीय वर्ष-2024-25 के लिए पुरस्कार, सम्मान की घोषणा नहीं किया गया है। यूं तो पूर्व मेंदो वित्तीय वर्षों का पुरस्कार, सम्मान एक साथ ही दिया गया था। उस समय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने घोषणा किया था कि यह पुरस्कार, सम्मान प्रत्येक वर्ष हिन्दी-दिवस के मौके पर 14 सितंबर को दिया जाएगा, लेकिन इस बार यह पुरस्कार 23 अगस्त, 2025 को दिया गया। शायद आगामी चुनाव को देखते हुए ऐसा निर्णय लिया गया हो। हद तब तब हो गई जब डॉ भीमराव अम्बेडकर पुरस्कार से सम्मानित जियालाल आर्य ने इस बार के समारोह में अपनी एक किताब माननीय मुख्यमंत्री को भेंट करने गए। उन्होंने नीतीश कुमार का नाम भी सही से नहीं लिखा, जिसको लेकर मुख्यमंत्री ने वहां ही उन्हें टोक दिया कि आप कैसे लेखक हैं, जो हमारा नाम भी सही नहीं लिख सकते।

मंत्रिमंडल सचिवालय विभाग (राजभाषा) द्वारा आर्थिक रूप से अक्षम साहित्यकारों को उनकी अप्रकाशित कृति के लिए पांडुलिपि प्रकाशन योजना अंतर्गत अनुदान राशि दिया जाता है, लेकिन उसमें भी बड़े पैमाने पर अनियमितता होती है जिससे पात्र साहित्यकार उक्त योजना के लाभ से वंचित रह जाते हैं। विभाग द्वारा निर्धारित मापदंडों को ताख पर रखकर सारे निर्णय लिए जाते हैं। एक साहित्यकार ने बिहार सरकार के सूचना एवं प्रावैधिकी मंत्री कृष्ण कुमार सिंह ‘मंटू’ को लिखित आवेदन देकर इसकी उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। प्रतिष्ठित साहित्यकार अनंत ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को 17 अगस्त, 2025 को ईमेल द्वारा और 20 अगस्त, 2025 को हार्ड कॉपी में मुख्यमंत्री सचिवालय में कई साहित्यकारों के हस्ताक्षर के साथ आवेदन दिया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले समय में मंत्रिमंडल सचिवालय विभाग (राजभाषा) द्वारा स्वतंत्र और निष्पक्ष रूप से साहित्यकारों का चयन करेगी, जिससे उसकी विश्वनीयता कायम हो सके।

बिहार हलचल से साभार
(लेखक हिन्दी के महत्वपूर्ण बहुजन विमर्शकार हैं। संप्रति बरियारपुर, मुंगेर में रहते हैं।)

पटना में साहित्य अकादमी के आयोजन स्थल पर होगा लेखकों का मार्च: अपील जारी

साहित्य अकादमी की एक महिला कर्मचारी ने सचिव डॉ. के. श्रीनिवास राव पर यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोप लगाए थे, इन आरोपों की जांच करने के बजाय अकादमी ने पीड़िता को चुप करने के लिए झूठे आरोप लगाकर उसे नौकरी से निकाल दिया, जिसे दिल्ली हाईकोर्ट ने 28 अगस्त 2025 को बदले की कार्रवाई बताते हुए अवैध करार दिया और उनकी बहाली का आदेश दिया।

इसी बीच साहित्य अकादमी 25–28 सितंबर को पटना के ज्ञान भवन में एक साहित्यिक आयोजन कर रही है।

विभिन्न संगठनों — जसम प्रलेस, जलेस, इप्टा, जुटान तथा बड़ी संख्या में नागरिक समाज ने निर्णय लिया है कि 25 सितंबर को सुबह 10 बजे से ज्ञान भवन के समक्ष साहित्य अकादमी के खिलाफ़ सशक्त विरोध दर्ज करेंगे।

आप सभी साथियों से अनुरोध है कि कल, 25 सितंबर को प्रातः 10 बजे ज्ञान भवन (गांधी मैदान) के बाहर एकत्र हों और प्रतिरोध सभा में शामिल हों।

एक संभावना का अंत : अलविदा इति !

कोई 2014 या 15 का साल होगा जब इति से बात और मुलाकात हुई होगी। फरवरी 2015 में स्त्रीकाल और साउथ एशियन वीमेन इन मीडिया द्वारा आयोजित ‘ गया सेमिनार’ में तो वह आई ही थी।

उसके बाद उसके साथ नियमित बातचीत होने लगी थी। स्त्रीकाल के लिए कई असाइनमेंट उसने किये। कुछ खुद से तय करके, कुछ मेरे सुझाव पर।

2015 में हमने कई जगह साथ रिपोर्टिंग की। कई जगह वह गई मेरे साथ। पातेपुर से रतन लाल इलेक्शन लड़ रहे थे। वहां रिपोर्टिंग के लिए गई।

दाउदनगर में हम सब गये। यह उसका कल्चरल रिपोर्टिंग का अनुभव था। मनीषा,इति, कर्मानंद आर्य और मैं वहां एक दिन रहे। जितिया आयोजन के लिए।

भाकपा (माले ) के महासचिव कामरेड दीपांकर भट्टाचार्य के साथ उनके इलेक्शन कैंपेन के दौरान इंटरव्यू और कैंपेन मोड देखने के लिए हमलोग साथ गये।

उसने हमारे असाइनमेंट पर उषा किरण खान का इंटरव्यू किया। कई रिपोर्ट और आलेख लिखे।

मैं उसे अपनी छोटी बहन की तरह देखता था। वह भी मुझे बड़े भाई की तरह समझती थी।

उसे कई बार परेशान देखता, लेकिन दुखी नहीं। बहन की शादी की, नौकरी को चिंता हो, या कोई छोटी मोटी परेशानी, जो मुझसे शेयर कर सके, मुझसे मदद ले सके, तो वह बेधड़क नॉक करती।

हेल्थ का इशू उसे तब भी था, जब वह मिली थी। लेकिन इस बार स्वास्थ्य उसे हमसे छीन कर ले गया। वह अपने ऑपरेशन के बाद बेहद तकलीफ में थी।

मेरे किडनी ट्रांसप्लांट के बाद एक बार फोन किया। उसने कहा कि ‘ मैं आपको फोन नहीं कर सकी थी बीमारी में, क्योंकि लगता था कि क्या कहें।’ उसने कहा कि ‘ वह कुछ शुभचिंतकों से खबरें ले रही थी मेरी। ‘ उसने बताया कि गूगल के लिए काम कर रही है। पैसे ठीक ठाक मिल रहे थे। उस दिन वह अपनी बुआ ‘ स्वर्णकांता ‘ यानी मुक्ता बुआ के यहां थी।

फिर उससे बात नहीं हुई, इधर दो तीन सालों से। और अब स्वर्णकांता के पोस्ट से उसकी बीमारी और बाद में न रहने की खबर।😢

उसके पापा सुमंत जी ने परसो- तरसो तबियत में सुधार की बात कही। हालांकि वह सुधार क्रिटिकल दायरे में था। मुझे लगा कि वह ठीक होकर पटना आयेगी। और कल उसके जाने की बात।

वह जुझारू थी, मिलनसार थी,निर्भीक और अकुंठ थी। उसके कुछ महत्वपूर्ण आलेखों का लिंक मैं दे रहा हूं कमेंट में।

इधर बहुत बात नहीं हो रही थी। कल जब उसके जाने की बात सुनी तो मन विचलित हो गया। अपने ध्यान को इस सूचना पर केंद्रित नहीं होने दिया। क्योंकि इन दिनों अपनों के जाने की सूचना मुझे बहुत ज्यादा विचलित कर देती है। लेकिन जब एकांत हुआ तो उसकी यादों से घिर गया। उसके साथ बीते हर क्षण, उसके साथ हुई बातचीत फिर से ताजा हो गये।

इति रंगमंच से भी जुड़ी थी। नाट्य संस्था इप्टा से भी।

अलविदा इति!

जनसंस्कृति मंच की अपील : लेखक करें साहित्य अकादमी के कार्यक्रमों का बहिष्कार

साहित्य अकादमी द्वारा बिहार की राजधानी पटना में 25 से 28 सितंबर को आयोजित अंतराष्ट्रीय साहित्य उत्सव उन्मेष का लेखक करेंगे बहिष्कार ? भाकपा( माले) के अनुसंगी संगठन जन संस्कृति मंच ने की अपील। इसके पहले सीपीआई के अनुसंगी संगठन महिला समाज ने भी जारी की थी अपील। क्या वाम दल और उसके संगठन चार दिवसीय इस आयोजन के दौरान करेंगे कोई प्रदर्शन। यह मामला साहित्य अकादमी के सचिव के. श्रीनिवास राव के खिलाफ यौन उत्पीड़न मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश के बाद बेहद गर्म है।

जन संस्कृति मंच का प्रस्ताव

जन संस्कृति मंच साहित्य अकादमी में हुए यौन उत्पीड़न के गंभीर मामले पर गहरी चिंता व्यक्त करता है।

समाचार पोर्टल द वायर की रिपोर्ट के अनुसार, अकादमी की एक महिला कर्मचारी ने सचिव डॉ. के. श्रीनिवास राव पर 2018-2019 के दौरान अनचाहे शारीरिक संपर्क, अश्लील टिप्पणियां और यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं।

इन आरोपों की जांच करने के बजाय अकादमी ने पीड़िता को चुप करने के लिए झूठे आरोप लगाकर उसे नौकरी से निकाल दिया, जिसे दिल्ली हाईकोर्ट ने 28 अगस्त 2025 को बदले की कार्रवाई बताते हुए गैरकानूनी घोषित किया और पीड़िता की बहाली का आदेश दिया।

कोर्ट के इस फैसले से आरोपों की गंभीरता के बारे में कोई संदेह नहीं रह जाता है।

जन संस्कृति मंच यौन उत्पीड़न और लैंगिक भेदभाव के प्रति शून्य सहनशीलता की नीति का पालन करता है। भारत के लेखकों और कलाकारों के बीच यौन उत्पीड़न संबंधी जागरूकता और संवेदनशीलता का विकास करना हम अपनी प्राथमिक जिम्मेदारी समझते हैं।

इस जिम्मेदारी को ध्यान में रखते हुए
हम मांग करते हैं:
1. डॉ. के. श्रीनिवास राव को तत्काल उनके पद से बर्खास्त किया जाए, ताकि मामले की निष्पक्ष जांच हो सके और न्याय की प्रक्रिया प्रभावित न हो।

2. हम सभी लेखकों , साहित्यकारों से साहित्य अकादमी के आरोपी सचिव की बर्खास्तगी तक साहित्य अकादमी के कार्यक्रमों का बहिष्कार करने की अपील करते हैं।

3 पटना में मुख्यमंत्री सचिवालय द्वारा राजभाषा विभाग (जो मुख्यमंत्री के अधीन है) ने साहित्य अकादमी सचिव को ‘बाबू गंगा शरण सिंह पुरस्कार’ प्रदान किया, जबकि यौन उत्पीड़न का मामला वर्ष 2018 से लंबित है। बिहार सरकार से हम इस पुरस्कार को वापिस लेने की मांग करते हैं।

यह प्रस्ताव पीड़िता के साथ एकजुटता और सांस्कृतिक इदारों में हर व्यक्ति की गरिमा और स्वतंत्रता की रक्षा सुनिश्चित करने के लिए है।
जन संस्कृति मंच
19 सितंबर 2025

नई धारा राइटर्स रेज़िडेंसी प्रकरण—नागरिक समिति की रिपोर्ट, साहित्यिक जगत की जवाबदेही पर उठे सवाल

नई धारा इस पूरी घटना के प्रति बेहद अगंभीर और गैर-जिम्मेदार रही। कैम्पस में स्त्री और पुरुष लेखकों के साथ रहने के लिए अनुकूल और भयमुक्त वातावरण का अभाव दिखा। चयन समिति के सदस्यों का व्यवहार गैर-जिम्मेदार था। अफवाहों के सृजन के लिए नई धारा से संबद्ध लोग भी जिम्मेदार बताए जा रहे हैं।

पटना, 19 सितंबर 2025। साहित्य अकादमी के सचिव के खिलाफ एक महिला कर्मी के आवेदन पर आदेश करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने अकादमी में लगे उत्पीड़न के आरोप को स्वतंत्र इकाई द्वारा जांच का निर्देश दिया एवं पीड़ित महिला की बर्खास्तगी को अकादमी के सचिव के श्रीनिवास राव द्वारा बदले की कार्रवाई माना क्योंकि उसने सचिव के खिलाफ उत्पीड़न का आरोप लगाया था। के श्रीनिवास राव अभी भी सचिव बने हुए हैं।
और बिहार में एक बड़ा आयोजन करने जा रहे संस्कृति मंत्रालय के साथ मिलकर। इसके पहले बिहार के राजभाषा विभाग द्वारा उन्हें सम्मानित भी किया गया था।

इसी बीच स्त्रीकाल की पहल पर गठित नागरिक जांच समिति ने पटना की संस्था ‘नई धारा’ के राइटर्स रेज़िडेंसी प्रोग्राम ( तीन महीने का एक कैम्पस में प्रवास ) में हुए कथित यौन उत्पीड़न प्रकरण पर अपनी अंतरिम रिपोर्ट जारी की है। इस समिति की अध्यक्ष एडवोकेट अल्का वर्मा हैं। इसके सदस्य हैं वरिष्ठ पत्रकार एवं स्त्रीकाल की डिजिटल संपादक मनोरमा, वरिष्ठ पत्रकार हेमंत कुमार, सोशल एक्टिविस्ट, स्त्रीवादी संस्कृति कर्मी दिव्या गौतम। आमंत्रित सदस्य स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन

रिपोर्ट में आयोजक संस्था नई धारा के रवैये, निर्णायक मंडल की भूमिका, सोशल मीडिया पर पीड़िता के खिलाफ दुष्प्रचार और साहित्यिक संगठनों की चुप्पी को गंभीर माना गया है। समिति ने कहा कि यह मामला केवल व्यक्तिगत आरोप का नहीं, बल्कि साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्थाओं की संरचनात्मक जवाबदेही और पारदर्शिता का सवाल है।
_ घटनाक्रम की पृष्ठभूमि

25 जून 2025 को सोशल मीडिया पर एक महिला लेखक ने आरोप लगाया कि पटना में आयोजित नई धारा की रेज़िडेंसी प्रोग्राम ( तीन महीने का एक कैम्पस में प्रवास ) के दौरान वरिष्ठ लेखक कृष्ण कल्पित ने उनके साथ अनुचित व्यवहार किया। दो दिन बाद कृष्ण कल्पित ने आरोपों से इनकार करते हुए सोशल मीडिया पर आवाज़ उठाने वालों को लीगल नोटिस भेज दिया। इसके बाद साहित्यिक जगत में तीखी बहस छिड़ी। जनवादी लेखक संघ ने 27 जून को बयान जारी कर घटना की निंदा की और आयोजक संस्था को जिम्मेदार ठहराया। प्रगतिशील लेखक संघ, राजस्थान ने 28 जून को आरोपी लेखक को संगठन से निष्कासित कर दिया। वहीं कई बड़े लेखक और संस्थाएँ लंबे समय तक चुप रहीं। _
निर्णायक मंडल की भूमिका
नई धारा की रेज़िडेंसी के निर्णायक मंडल में तीन लोग शामिल थे। समिति ने उनसे भी लिखित जवाब मांगे, परंतु ममता कालिया ने बिल्कुल चुप्पी साधी, जी एन देवी ने पहले गोपनीयता की गारंटी चाही फिर जवाब नहीं दिया, प्रियदर्शन ने अपना बयान फेसबुक पर दे दिया था। रिपोर्ट में दर्ज है कि निर्णायकों ने अपनी जिम्मेदारी को सीमित कर केवल चयन प्रक्रिया तक मान लिया और रेज़िडेंसी के दौरान सुरक्षा या जवाबदेही की जिम्मेदारी आयोजक संस्था पर डाल दी।
_ साहित्यकारों की राय समिति को कुछ वरिष्ठ साहित्यकारों की प्रतिक्रियाएँ भी मिलीं। • विकास नारायण राय ने सवालों के जवाब में कहा कि “निर्णायक मंडल केवल प्रतिभागियों के चयन तक सीमित नहीं रह सकता। साहित्यिक आयोजनों में निर्णायकों को भी अपनी नैतिक जिम्मेदारी तय करनी चाहिए। नई धारा का रवैया टालमटोल वाला रहा है और इससे संस्था की साख को नुकसान हुआ है।” उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि साहित्य जगत में “क्विड प्रो क्वो की प्रवृत्ति” भी साफ़ दिखाई देती है — यानी साहित्यकार परस्पर लाभ या अवसर के एवज में चुप्पी, समर्थन या समझौते करते रहते हैं। • कुछ अन्य लेखकों, अनिल पुष्कर, नवनीत पांडेय ने भी समिति को जवाब दिया कि इस घटना ने साहित्यिक संस्थाओं के भीतर पितृसत्तात्मक रवैये और स्त्रियों की सुरक्षा के प्रति असंवेदनशीलता को उजागर कर दिया है। कुछ ने साहित्य जगत से जुड़े सत्तधीशों द्वारा ख़ौफ़नाक स्टाकिंग की घटनाओं की जानकारी होने की बात भी कही। • वहीं कई चर्चित साहित्यकारों ने समिति के सवालों का कोई जवाब नहीं दिया। _
समिति की प्रमुख फ़ाइंडिंग्स
रिपोर्ट में दर्ज अवलोकन इस प्रकार हैं:

  1. नई धारा की भूमिका: संस्था ने घटना के बाद अस्पष्ट और बिना हस्ताक्षर वाले बयान दिए।
  2. जूरी की जिम्मेदारी: निर्णायकों ने जवाबदेही से दूरी बनाई, जबकि प्रतिभागियों की सुरक्षा भी उनकी साझा जिम्मेदारी होनी चाहिए थी।
  3. सोशल मीडिया हमले: पीड़िता पर अफवाहें और चरित्रहनन के प्रयास हुए, जिसे समिति ने “दूसरे स्तर का उत्पीड़न” कहा।
  4. संगठनों की असंगत प्रतिक्रिया: कुछ संगठनों ने तुरंत कार्रवाई की, जबकि अधिकांश बड़े साहित्यिक समूह चुप रहे।
  5. गंभीर असंवेदनशीलता: घटना ने दिखाया कि साहित्यिक आयोजनों में जेंडर और जाति आधारित संवेदनशीलता गहराई से अनुपस्थित है।
    __
    समिति की सिफ़ारिशें
    समिति ने निम्न सिफ़ारिशें कीं:
    1. जिन संगठनों/संस्थाओं में 10 से ज्यादा महिलाएं कार्यरत या सदस्य हैं, उन्हें यौन अथवा जाति उत्पीड़न के खिलाफ एक जांच समिति होनी चाहिए, जिसकी अनिवार्य अध्यक्ष महिला हो, और सदस्यों में कम से कम आधे संस्था एवं संगठन से बाहर की महिला एवं पुरुष हों।
    2. सरकार द्वारा आर्थिक मदद प्राप्त या टैक्स के छूट की सुविधा प्राप्त संस्थाओं और संगठनों के लिए सरकार जाति और जेंडर विभेद की रोकथाम की प्रक्रिया सुनिश्चित करे।
    3. विविध संगठनों द्वारा एक सार्वजनिक नियामक समिति भी गठित की जा सकती है।
    4. लेखक या संस्कृति के अन्य संगठनों को जिम्मेवार और समावेशी होने की पहल करनी चाहिए।
    _ समिति के बयान समिति की चेयरपर्सन अलका वर्मा ने कहा, “हमारा जनादेश है कि पीड़िता की गवाही दर्ज करते हुए साहित्यिक संस्थाओं में संरचनात्मक सुधार की दिशा में ठोस सुझाव दिए जाएँ, जरूरत पड़ने पर अदालतों से निर्देश लेकर एक नियामक व्यवस्था बनवाई जाए। समिति की सदस्य मनोरमा ने कहा, “ यह घटना साहित्यिक दुनिया की असंवेदनशीलता का सबूत भी है।” _
    निष्कर्ष
    समिति ने स्पष्ट किया कि यह मामला केवल एक लेखक और संस्था तक सीमित नहीं है। यह पूरे साहित्यिक परिदृश्य में स्त्रियों की भागीदारी, गरिमा और सुरक्षा का प्रश्न है।

नागरिक समिति के सामने आए तथ्य विस्तार से
अफवाह
इस घटना के सामने आने के बाद से ही पीड़िता को लेकर कई अफवाहें पटना के साहित्यिक समाज में फैलने लगीं। अब इन अफवाहों और गप्पों का स्वरूप भयावह होता गया। इन अफवाहों में पीड़िता अब आरोपी बन गई है।(अफवाहों की चर्चा पटना के एक साहित्यकार ने की; नाम न उल्लेख करने की शर्त पर। शुरुआत पीड़िता का किसी लेखक/संस्कृति कर्मी डॉक्टर के घर पर शराब पीने की घटना या अफवाह से हुई। बाद में उस घटना की तस्वीर जारी की गई। उस तस्वीर में आरोपी कवि नहीं दिख रहे। कहा गया कि तस्वीर उन्होंने ही ली थी और इसे उन्होंने ही जारी किया। उस तस्वीर में पीड़िता के अलावा पटना के चर्चित साहित्यकार भी दिखे।
सेक्सिस्ट टिप्पणियां
समिति के सदस्यों ने देखा कि नई धारा द्वारा राइटर्स रेजीडेंसी कार्यक्रम के तहत पटना में रहने वाले साहित्यकारों—आरोपी और पीड़िता—का नाम और फोटो जैसे ही सोशल मीडिया में जारी हुआ, कई साहित्यकारों ने उस पर सेक्सिस्ट टिप्पणियां लिखनी शुरू कर दी। इनमें आरोपी कवि के साथी भी शामिल थे।
प्रतिरोध का अभाव
इस घटना पर लेखक संगठनों का व्यवहार बेहद आश्चर्यजनक था। सोशल मीडिया में हंगामे का असर था कि घटना के प्रकाश में आने के बाद कुछ लेखक संगठनों ने अपनी प्रतिक्रियाएं जारी की और आरोपी कवि कृष्ण कल्पित के बहिष्कार का संकल्प लिया। संस्था नई धारा की जिम्मेदारी पर प्रस्ताव पास किया।
इन लेखक संगठनों में जनवादी लेखक संघ, प्रगतिशील लेखक संघ और जन संस्कृति मंच आदि शामिल थे। पीयूसीएल (पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज) ने भी बयान जारी किया। प्रगतिशील लेखक संघ ने उन्हें अपने संगठन से बाहर निकालने का प्रस्ताव जारी किया।
सवाल उठे कि कृष्ण कल्पित इसके पूर्व एक चर्चित लेखिका पर सेक्सिस्ट टिप्पणियां कर चुके थे। फिर भी प्रलेस ने उन्हें अपने यहां सदस्य और पदाधिकारी बनाए रखा। प्रलेस ने राष्ट्रीय स्तर पर कोई बयान जारी नहीं किया और इस समिति के सामने उनका कोई बयान प्रस्तुत नहीं हुआ। कुछ लेखक संगठनों के सदस्य पटना में पीड़िता के साथ सार्वजनिक रूप से थे, लेकिन उनमें से किसी ने पीड़िता के पक्ष में बड़ा प्रदर्शन नहीं किया।
साहित्य जगत में ऐसा कोई प्रदर्शन 2010 में नया ज्ञानोदय साक्षात्कार प्रकरण में हुआ था। इसके बाद लेखकों का एक साझा फिर से बन गया। बहिष्कृत साहित्यकार बहिष्कार करने वाले एक लेखक संगठन पर काबिज हो गए।
पीड़िता और आरोपी का पक्ष
पीड़िता ने अपना पक्ष सामने रखते हुए मुख्यतः आरोपी कवि से माफी और शहर छोड़ने की मांग की। आरोपी ने माफी नहीं मांगी, लेकिन शहर छोड़ दिया। संस्था नई धारा का रुख इस पूरी घटना के प्रति असंवेदनशील दिखाई दिया। निर्णायक मंडल भी गंभीर नहीं था। आरोपी कवि इस पूरे घटनाक्रम में सोशल मीडिया में बेखौफ और बुली करते नजर आए।
साहित्य की सत्ता
साहित्य जगत और संस्कृति के क्षेत्र में यौन और जाति उत्पीड़न की घटनाएं होती हैं। यह क्षेत्र यश और यश से हासिल आर्थिक, सामाजिक हैसियत के आपसी बंटवारे का क्षेत्र है। इसीलिए यहां होने वाली ऐसी घटनाएं क्षणिक चर्चाओं का कारण भर बनती हैं।
साहित्य में क्विड-प्रो-क्वो की घटनाएं भी होती हैं, साथ ही असहज करने वाले उत्पीड़न और स्टाकिंग भी। संस्थाओं और उनके प्रमुखों के साथ सहज संबंध रखने की होड़ होती है। साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में सवर्ण हिन्दू पुरुषों का कब्जा है।
संस्था/चयन समिति की असंवेदनशीलता
नई धारा इस पूरी घटना के प्रति बेहद अगंभीर और गैर-जिम्मेदार रही। कैम्पस में स्त्री और पुरुष लेखकों के साथ रहने के लिए अनुकूल और भयमुक्त वातावरण का अभाव दिखा। चयन समिति के सदस्यों का व्यवहार गैर-जिम्मेदार था। एक सदस्य को आरोपी लेखक ने सार्वजनिक तौर पर अपने चयन में उनकी भूमिका रेखांकित करने का प्रयास किया। एक सदस्य ने अपने डिटेल जवाब में यह स्पष्ट नहीं किया कि उन्होंने आरोपी कवि के महिला विरोधी पूर्व आचरण को संस्था के सामने क्यों नहीं रखा। अफवाहों के सृजन के लिए नई धारा से संबद्ध लोग भी जिम्मेदार बताए जा रहे हैं।
संस्तुति

  1. जिन संगठनों/संस्थाओं में 10 से ज्यादा महिलाएं कार्यरत या सदस्य हैं, उन्हें यौन अथवा जाति उत्पीड़न के खिलाफ एक जांच समिति होनी चाहिए, जिसकी अनिवार्य अध्यक्ष महिला हो, और सदस्यों में कम से कम आधे संस्था एवं संगठन से बाहर की महिला एवं पुरुष हों।
  2. सरकार द्वारा आर्थिक मदद प्राप्त या टैक्स के छूट की सुविधा प्राप्त संस्थाओं और संगठनों के लिए सरकार जाति और जेंडर विभेद की रोकथाम की प्रक्रिया सुनिश्चित करे।
  3. विविध संगठनों द्वारा एक सार्वजनिक नियामक समिति भी गठित की जा सकती है।4 . किसी भी का निस्तारण या तो आंतरिक समिति के जरिये हो या लोकल कंप्लेंट कमिटी के जरिये।
    5 . लेखक या संस्कृति के अन्य संगठनों को जिम्मेवार और समावेशी होने की पहल करनी चाहिए।


बिहार महिला समाज पटना में होने वाले अंतरराष्ट्रीय साहित्य उत्सव उन्मेश 2025 का करेगा बहिष्कार

यौन हिंसा के आरोपी साहित्य अकादेमी के सचिव के श्रीनिवास राव की बर्खास्तगी की मांग

पटना, 18 सितम्बर

साहित्य अकादेमी के सचिव के. श्रीनिवास राव पर लगे यौन हिंसा के आरोप को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। बिहार महिला समाज ने राव की तत्काल बर्खास्तगी की मांग करते हुए घोषणा की है कि जब तक उन्हें पद से नहीं हटाया जाता, पटना में होने वाले अंतरराष्ट्रीय साहित्य उत्सव “उन्मेष 2025” का बहिष्कार किया जाएगा।

संगठन की अध्यक्ष निवेदिता झा ने कहा कि इतने गंभीर आरोपों के बावजूद श्रीनिवास राव का सचिव पद पर बने रहना महिलाओं के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा देता है। उन्होंने आरोप लगाया कि साहित्य अकादेमी ने शिकायत करने वाली महिला कर्मचारी का साथ देने के बजाय उसे नौकरी से निकाल दिया था। दिल्ली हाईकोर्ट ने इस बर्खास्तगी को अवैध और प्रतिशोधात्मक करार देते हुए महिला को पुनः बहाल करने का आदेश दिया, साथ ही आरोपी सचिव के खिलाफ जांच का जिम्मा लोकल कंप्लेंट्स कमेटी को सौंपा। साहित्य अकादेमी के सचिव  के . श्रीनिवास राव को पिछले महीने राजभाषा विभाग द्वारा सम्मान दिये जाने पर भी साहित्यकारों ने उठाये थे सवाल।

निवेदिता झा ने कहा, “बीजेपी सरकार ने न केवल आरोपी को संरक्षण दिया, बल्कि उन्हें सम्मानित किया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व का मौका भी दिया। यह बलात्कार संस्कृति को बढ़ावा देने वाला रवैया है।”बिहार महिला समाज ने

तीन मुख्य मांगें रखी हैं—

  1. के. श्रीनिवास राव को तुरंत बर्खास्त किया जाए।
  2. यौन उत्पीड़न की शिकायतों की सुनवाई विशाखा गाइडलाइंस के तहत हो।
  3. पीड़िता की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।

संगठन ने साफ किया है कि जब तक आरोपी सचिव पद पर बने रहते हैं और साहित्य अकादेमी कोई ठोस कदम नहीं उठाती, तब तक पटना में होने वाले साहित्यिक आयोजन का बहिष्कार जारी रहेगा।

साहित्य अकादमी यौन उत्पीड़न मामला: हाईकोर्ट ने बर्ख़ास्तगी को बताया ‘बदले की कार्रवाई’, महिला को बहाल करने का आदेश

नई दिल्ली, 18 सितंबर 2025 — साहित्य अकादमी में कार्यरत एक महिला अधिकारी को यौन उत्पीड़न की शिकायत करने के बाद नौकरी से निकाल देने की घटना पर दिल्ली हाईकोर्ट ने सख़्त रुख़ अपनाया है। अदालत ने महिला की बर्ख़ास्तगी को “प्रतिशोधी कदम” करार देते हुए तत्काल उसे उसके पद पर बहाल करने और बकाया वेतन का भुगतान करने का आदेश दिया है।

मामला क्या है
साल 2018 में अकादमी के तत्कालीन सचिव डॉ. के. श्रीनिवास राव पर महिला अधिकारी ने गंभीर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे। शिकायत के मुताबिक सचिव ने नियुक्ति के शुरुआती दिनों से ही अनुचित व्यवहार किया, जिसमें अनचाहे शारीरिक संपर्क और आपत्तिजनक टिप्पणियाँ शामिल थीं।

महिला ने इसकी शिकायत लोकल कंप्लेंट्स कमेटी (LCC) से की। लेकिन अकादमी ने इसे अपने आंतरिक शिकायत निवारण तंत्र यानी इंटरनल कंप्लेंट्स कमेटी (ICC) के दायरे में लाने की कोशिश की और एलसीसी की वैधता को चुनौती दी। इसी बीच फरवरी 2020 में महिला को “कार्य प्रदर्शन में कमी” का हवाला देकर पद से हटा दिया गया। इस मसले पर स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन ने 2018 में साहित्यकारों से अपील की थी और उसके बाद भी करते रहे हैं।

अदालत की टिप्पणी
28 अगस्त को सुनाए गए फैसले में दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि महिला की बर्ख़ास्तगी सीधा-सीधा प्रतिशोध है और यह कानून की दृष्टि में अवैध है।

न्यायालय ने माना कि सचिव का पद संगठन में “नियोक्ता” (employer) के बराबर है और ऐसे मामलों की सुनवाई का अधिकार एलसीसी को है, न कि अकादमी की आंतरिक समिति को। अदालत ने महिला की सेवा समाप्ति संबंधी आदेश को रद्द करते हुए कहा कि शिकायत दर्ज करने के बाद की गई यह कार्रवाई “न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करने” वाली है।

आदेश
महिला को तुरंत उसके पद पर बहाल किया जाए।
सभी बकाया वेतन और सेवा लाभ चार हफ्तों के भीतर दिए जाएँ।
आगे किसी भी तरह की प्रताड़ना या अनुचित दबाव न डाला जाए।

व्यापक असर
अदालत ने यह भी साफ किया कि किसी भी संस्था में शीर्ष पद पर बैठे अधिकारी यदि आरोपी हों तो मामले की जांच स्वतंत्र निकाय द्वारा ही की जानी चाहिए, ताकि निष्पक्षता बनी रहे।
महिला कर्मचारी ने अदालत के फैसले को अपनी “लंबी लड़ाई की जीत” बताया है, जबकि अकादमी की ओर से अभी तक कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई है।

नहीं सुधरेगा साहित्य जगत :

स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन ने इस मामले को लेकर 2021 में फेसबुक पोस्ट लिखा था :
जब साहित्य अकादमी में यौन उत्पीड़न की शिकायत करने वाली महिला को ही हटा दिया गया था तब मैंने यहीं सोशल मीडिया में आवाज उठाई थी। तब शायद ही इस आवाज के साथ लेखकों का कोई समूह सामने आया था। न पुरस्कार वापसी वाले और न ही पुरस्कार समर्थन वाले। क्योंकि आगे पुरस्कार सबको चाहिए।
सवाल है कि हिंदी के लेखकों की सामूहिक चेतना कब एक साथ ऐसे मुद्दों पर दवाब बना पाती है? जब कठुआ काण्ड प्रसंग में या मुजफ्फरपुर प्रसंग में हम सब ने बहिष्कार का दवाब बनाया था तब भी लेखकों ने इनकार कर दिया था। कुछ ने बहिस्कार किया भी तब हम दवाब बनाने वालों से नाराज होकर या हमें लानते भेजते हुए। उस वक़्त निजी रूप से मैंने तय किया था कि अब बहिष्कार जैसी कोई सार्वजनिक बात नहीं करूंगा। मुझे कोई निर्णय लेना हो तो अलग बात है। इसीलिए साहित्य अकादमी मामले में मैंने चाहा था कि बहिष्कार नहीं जिम्मेवार पर कार्रवाई का दवाब बनाना चाहिए।
यहाँ साहित्य जगत में सन्स्थानों और शक्तिशालियों से शायद ही कोई पंगा लेता है। मुद्दों पर बोलने वाले और उसपर ऐक्शन लेने वाले कम ही लोग हैं। हाँ किसी थोड़े कमज़ोर व्यक्ति का विरोध करना हो तो अलग बात है या उसका विरोध जिससे उनका व्यक्तिगत प्रभावित न हो। विरोध उनका भी हो सकता है जिन्होंने आपका कोई व्यक्तिगत हित सन्धान न किया हो। मसलन आप किसी पुरस्कार के आकांक्षी रहे हों और सम्बंधित ज्यूरि में रहकर आपके पक्ष में निर्णय देने में असफल रहा हो।
विरोध के अवसर और प्रसंग यहाँ विचित्र होते हैं। हाल में ही स्त्री विमर्श के नाम पर जिस तरह सवर्ण कोटरी बनाने की निर्ल्ज्जता हुई और वहाँ सविता सिँह जैसी स्त्री विमर्श की अथार्टी के रहते अशोक वाजपेयी से अध्य्क्षता करवायी गयी चर्चा उसपर होनी चाहिए थी, विवाद उसपर होना चाहिए था, तो विवाद का विषय बनीं मैत्रेयी पुष्पा। अशोक जी ने वहां गाफिल वक्तव्य दिये, पढ़ी गई कविताओं को सुने बिना स्त्री लेखन को ज्ञान दिया, इसपर कोई बात कहीं सोशल मीडिया में देखने को नहीं मिला। मैत्रेयी विवाद होता रहा और देवपुरुष तटस्थता का स्वांग करते हुए मुस्कराते रहे।
साहित्य अकादमी सम्मान को लेकर जिम्मेवार पर कार्रवाई का माहौल दो साल बाद बनाने की कोशिश पर ही अब शक पैदा होगा कि यह आवाज सापेक्ष है या निरपेक्ष। उन दिनों दलित लेखन पर सीरीज शुरू हुए थे। लोग जाने लगे थे अकादमी। मैं भी दो बार पहुँँचा श्रोता के रूप में। यही साहित्य जगत की निरंतर गति है। ऐसे ही चलना है इसे।

कितनी गिरहें खोली हैं मैंने,कितनी गिरहें अब बाक़ी हैं !’: देह,यौनिकता और जेंडर के बरास्ते थर्ड जेंडर सिनेमा की शिनाख्त

(दो फिल्मों ,दायरा और नगरकीर्तन के जरिये हिंदी सिनेमा में थर्ड जेंडर और जेंडर के प्रश्न का एक बेहतरीन विश्लेषण किया है लेखक आशीष कुमार ने। यह आलेख भी एक अलग दृश्यात्मकता पेश करता है। )

क्योंकि वह अदभुत रचना है।वह न तो पंचसती है और न ही पंचकन्या । इतिहास ने उन्हें वृहन्नलला और शिखंडी के रूप में देखा था।साहित्य में वह बिन्दा महाराज है। संझा है।सिनेमा में शबनम मौसी है।लक्ष्मी है। रजियाबाई है।वह कथा का विषय तो है लेकिन कला और सिनेमा की दुनिया में उसकी उपस्थिति सतह पर है।लगभग सतह से उठता आदमी की तरह।( मणि कौल के एक फिल्म का नाम)सच है,मुकम्मल ढंग से पेश हर कला अपना निशान छोड़ जाती है। सेल्यूलाइड के परदे जिंदगी के तहों को खोलना इतना आसान भी नहीं। कॉमर्शियल और गंभीर में यह फासला साफ़ दिखाई देता है। तकलीफ़देह मगर सच है कि समाज का एक बड़ा तबका आज भी सिनेमा को मनोरंजन का माध्यम भर समझता है।’द डर्टी पिक्चर ‘ में सिल्क स्मिता बनी विद्या बालन ने तो कह ही दिया था कि फिल्में सिर्फ़ तीन वजहों से चलती है , इंटरटेनमेंट,इंटरटेनमेंट और इंटरटेनमेंट ! खैर ! मसला यह है कि सिनेमा और जिंदगी के बीच इतना लंबा खालीपन क्यों है ?क्या आज का सिनेमा अपने समय के मौजूं परेशानियों से मुखातिब है ?जबकि जीवन के बड़े हिस्सों में जमीनी उलटफेर हो रहे है।सीधे अपनी बात पर आएं तो ट्रांसजेंडर का मुद्दा भी इनमे से एक है।ट्रांसजेंडर यानी थर्ड जेंडर।शिष्ट शब्दावली में कहूं तो किन्नर।थोड़ा भदेस में कहूं तो हिजड़ा। मैं खुद को ट्रांसजेंडर या थर्ड जेंडर शब्द के ज्यादा नजदीक पाता हूं।लेकिन फिर वही सवाल कि ट्रांसजेंडर / थर्डजेंडर के संदर्भ में सिनेमा का रुख कैसा है ?परंपरागत और आधुनिक विचारों के साथ हम एक ट्रांस समय में जी रहे हैं।यह संस्कृतियों के संक्रमण का समय है।एक परंपरा के समानांतर कई परंपराओं को एक साथ चलाने का समय भी है।जैसे, हाईवे पर गाड़ी चलाते हुए हम एक दूसरे को ओवरटेक करते है। ठीक वैसे ही।मैं सिनेमा को अपने समय और समाज का हमशक्ल मानता हूं।हमशक्ल क्या खुशशक्ल भी और कभी- कभी बदशक्ल भी।जावेदअख़्तर कहते हैं –

” खुशशक्ल भी हैं वो ये अलग बात है मगर
हमको जहीन लोग हमेशा अजीज़ थे।”

जहीन फिल्मकार और फनकार से मैं भी बहुत इत्तेफ़ाक रखता हूं।शायद ! इसलिए थर्ड जेंडर पर बनी फिल्मों की एक लंबी फेहरिस्त मेरी डायरी में दर्ज है।हैरत की बात है कि ये सारी फिल्में चलताऊ,संवेदनहीन और फूहड़ हैं।ये फिल्में इस जमात की संवेदना को पकड़ भी नहीं पाई हैं। इन फिल्मों में ये पात्र मनोरंजक,विदूषक और अश्लील हैं। कॉमिक स्टीरियोटाइप किरदार रचने में ये सिनेमा ज्यादा समर्थ है। अक्सर,हिंदी सिनेमा ने थर्ड जेंडर को महज़ कैरीकेचर के रूप में देखा है।थोड़ा सा नज़र घुमाएं तो क्या कूल हैं हम और मस्ती जैसी तमाम फिल्में मिल जाएंगी।दरअसल,हमारे समाज की बनावट ही फॉर्मूलाबद्ध है।खांचाबद्ध है। लिंगपरक है।जहां स्त्री और पुरुष के लिए अलग – अलग पैमाने हैं।वहां थर्ड जेंडर के लिए तो कोई गुंजाइश ही नहीं बचती। लेकिन ये भी सच है कि इनकी सत्ता तो हमारी संस्कृति में हमेशा से रही है।याद कीजिए,मुगलकाल में ख्वाजासराय। हरम में भी इनकी मौजूदगी थी। रनिवासों में रानियों के सबसे करीब यहीं लोग थे।शायद,उभयलिंगी होना इनके लिए एक कारगर हथियार था।अब इनकी स्थिति काफ़ी बेहतर है।लगभग आमने – सामने की है।ये पितृसत्ता के मानकों को ध्वस्त कर रहे है।अपनी देह और यौनिकता / सेक्सुअलिटी पर खुद फैसले दे रहे हैं। क्या देह और यौनिकता ही इन्हें दोयम दर्जे का इंसान बनाती है ?दोयम क्या तीसरे दर्जे का कहना भी मुनासिब होगा ?आखिर ये ख्याल जेहन में क्यों नहीं आता कि औरत जैसा होने या दिखने में क्या परेशानी है ?आपकी पेशानी पर पसीने क्यों आ जाते हैं?मर्दाना और जनाना खांचे से अलग कोई तीसरी सत्ता क्यों नहीं हो सकती ?
भारतीय सिनेमा के बनिस्बत विश्व सिनेमा के मार्फत इन प्रश्नों की शिनाख्त ज्यादा समीचीन है। अफ़सोस कि कुछ गंभीर फिल्मों को छोड़कर कोई मुकम्मल तस्वीर नज़र नही आती है।बिना किसी मुकम्मल जमीन के बात करना हवा में तीर चलाने जैसा है। इसलिए इस मजमून के लिए मैंने दो फिल्मों को चुना है।पहली जिस हिंदी फिल्म को मैंने चुना है, वह अमोल पालेकर निर्देशित ‘ दायरा ‘ है।इसके साथ ही इसके एक दशक के बाद की कौशिक गांगुली निर्देशित बांग्ला फिल्म ‘नगरकीर्तन’ है।रोचक है कि इन फिल्मों के किरदार कहीं ‘ सर्द ‘ हैं तो कहीं ‘ गर्म ‘।ये किरदार अपने गिरहों में बंद है।बकौल, गुलज़ार, ‘ कितनी गिरहें खोली हैं मैंने, कितनी गिरहें अब बाक़ी हैं !’
ये दोनों फिल्में तीन स्तरों पर संवाद करती है।पहली अपनी निजता / प्रेम पर दूसरी यौनिकता पर और तीसरे अपने समय और समाज पर।लिंग और योनि से परे की ये दुनिया और व्यवस्था का यह अंतर्द्वंद्व मेरे लिए बहुत ही आकर्षक विषय है और इसीलिए ये दोनों फिल्में ख़ास।ये फिल्म हिम्मत और हिमाकत से सभ्य समाज का पर्दाफाश करती है।क्या संसार की हर स्त्री दुष्ट और हर पुरुष लंपट होता है ? जैसे प्रश्नों से टकराती ये फिल्में डार्क रूम में बंद जिंदगियों को हमारे सामने रखती है।यहां हम देखेंगे कि ‘ थर्ड जेंडर ‘ को केंद्रित कर बनी फिल्मों में जेंडर की भूमिका और उसका कर्तापन हिंदी सिनेमा में उसकी पारंपरिक भूमिका से कितना आगे जा सकी है ?आइए ! सफर का आगाज़ करते हैं।

                    (पहला परदा)

‘ हर सफे पे रहती है तुम्हारी अपनी बातें उर्फ़ वजह-ए – बेगानगी नहीं मालूम !’


यह मार्च का बदरंग महीना है। शजर अपने शबाब पर है।तेज सुर्खरू हवा है।सीने में नमी है।मेरे मन का मौसम उदास है।मेरी उदासी किसी से रिश्ता कायम नहीं कर पाती।पूरी दुनिया तेज भाग रही है।पिछले कुछ सालों के बेगानेपन और खालीपन को एकबारगी में ही भर देना चाहती है।खुद की तसल्ली के लिए मैं अमोल पालेकर निर्देशित ‘दायरा’ देख रहा हूं।दायरा यानी द स्क्वायर सर्किल। पितृसत्ता का पेटेंट शब्द। मेरे जेहन में कुछ दृश्य और संवाद तैर रहे हैं।मैं उस नायक को देख रहा हूं,जिसने स्त्री लिबासों से खुद को कैद कर रखा है।सस्ते पाउडर,क्रीम और लिपस्टिक से सज संवर रहा है।क्या वह पुरुष की देह में स्त्री का मस्तिष्क है या स्त्री की देह में पुरुष का मस्तिष्क ?खुद को ही ठग लिया मैंने।अपनी मूल वृत्तियों को त्यागकर वह स्त्री भी हो सकती है और पुरुष भी।दरअसल,यह एक ट्रांसवर्सेटाइल है।पुरुष की देह में स्त्री।वह अनाम है।वैसे भी,नाम में क्या रखा है !आपकी पहचान तो आपका काम है।इनकी पहचान सिर्फ़ ताली है।तीसरी ताली।दायरा का यह नायक अलहदा है।उसके पास एक संवेदनशील मन है।वह दुःख दर्द को पहचानता है। उसमें चिंतन की एक धार है।उसे स्त्री और पुरुष का विभाजन पसंद नहीं है।वह खुद को कुदरत का करिश्मा कहता है।मैं उसके सम्मोहन में हूं। वह रोती हुई बलात्कृता नायिका सोनाली कुलकर्णी को इज़्जत लूट जाने के संदर्भ में समझाता है,” जरा सी चमड़ी का टुकड़ा इज्ज़त कैसे हो सकता है ? इज़्जत हमारी मस्तिष्क में है।”ये संवाद उसके मानसिक स्तर को समझने के लिए काफ़ी है।जीवन से हार चुकी नायिका के भीतर प्राणवायु फूंकता है।उसे जिंदगी के हुनर सिखाता है।निराशा से आशा की ओर लेकर जाता है।यह फिल्म एक यात्रा है।जीवन को समझने की यात्रा।स्त्री – पुरुष संबंधों के व्याकरण की यात्रा।नायक (निर्मल पांडेय)और नायिका इस यात्रा के
साथ जीते हैं।यह फिल्म एक और यात्रा की तरफ़ प्रस्थान करती है। वह है कायांतरण की यात्रा।नायक के कहने पर नायिका का पुरुष वेश में तब्दील होना और अंत में नायिका के अनुसार खुद को स्त्री वेश से पुरुष में बदलना।यह अपने भीतर की यात्रा है। कंटेंट के कई अर्थ को समेटे यह एक अर्थगर्भी सिनेमा है।कथा के बरास्ते वह कई यक्ष प्रश्नों से सामना करती है।मसलन,अपनी आंतरिकता को तवज्जो देकर भीतर की इच्छाशक्ति को जागृत करना और खुद को समझने की भावना विकसित करना।यह एक गझिन और गंभीर फिल्म है।स्मृतियों में आवाजाही करती यह फिल्म नायक के अनकहे सच को भी उजागर करती है।स्मृतियां अपना अलग संसार रचती है।हम स्मृतियों के साथ यात्रा करते हैं। हम स्मृतियों को जीते भी हैं।कुछ स्मृतियां वक्त के साथ धुंधली पड़ जाती हैं और कुछ और भी मजबूत होती जाती हैं।वक्त इरेजर और मार्कर दोनों होता है।इसी वक्त के साथ नायक दर्द को दिल में दफनकर नायिका के साथ उसे घर तक पहुंचाने का सफ़र तय करता है।इस सफ़र में वे एक दूसरे को समझते हैं।समझाते हैं।इस नजरिए से यह एक प्रेमकथा भी है।एक अनोखी प्रेमकथा।ट्रांसवर्सेटाइल डांसर और बलात्कृता नायिका के बीच की प्रेमकहानी।दो हाशिए के किरदारों की मुकम्मल तस्वीर। विरुद्धों के सामंजस्य के बावजूद अंत में नायिका का यह स्वीकार करना कि वह प्रेम करने लगी है।नायक का अपनी जान देकर बलात्कारियों द्वारा नायिका को बचा ले जाना फिल्म का मार्मिक अंत है।यह फिल्म एक साथ कई सवालों को उठाती है।जैसे,प्रेम क्या सिर्फ़ स्त्री – पुरुष के बीच की चीज है ?कुछ चीजें जेंडर से इतर भी होती हैं।एक ऐसे बिंदु पर जहां प्रकृति और स्त्री,पुरुष और पुंसत्व में फर्क मिट जाता है। इसे बेहतर समझने के लिए आप अमोल पालेकर की दो और फिल्में इसके समानंतर देख सकते है।अनाहत और क्वेस्ट।ये तीनों फिल्में त्रिवेणी हैं।

कई फॉर्मूलाबद्ध ढांचे को तोड़ती है ये फिल्म।इस फिल्म के दोनों किरदारों में प्रेम अलग – अलग शेड्स में उभरता है।कुछ नादानियां,कुछ पश्चाताप,पीड़ा और फिर ताउम्र उसकी तपिश में खुद ही जलना।क्या यही प्रेम का हासिल है ?

कोई जरूरी नहीं कि हर किसी के लिए फिल्म का आस्वाद एक ही हो।बकौल अज्ञेय,किसी को बटुली की सोंधी खदबद।*सबको अपने ढंग से व्याख्यायित करने का हक भी है। जिन्हें स्त्री – पुरुष
संबंध,लैंगिकता,मर्दानगी,जैसे विषयों में दिलचस्पी हो
उनके लिए यह जेंडर डिस्कोर्स की आधार भूमि तैयार करती है।अगर आप तर्कवादी हैं तो ज्ञान की लक्ष्मण रेखा को समझेंगे।अगर आप इश्क को समझते हैं तो आप इसके अंजाम को भी बखूबी समझ पाएंगे और शायद इसके पार जाने के लिए ही मीर ने लिखा है –

   " वजह -ए - बेगानगी नहीं मालूम,
    तुम जहां के हो, वां के हम भी है।"

                   (दूसरा परदा)

‘ इस दुनिया के मकतलगाह में फूलों की बात बनाम कितनी ही पीड़ाएं हैं जिनके लिए कोई ध्वनि नहीं.’*


यह एक अभिशप्त कथा है।जिसे देखकर किसी भी संवेदनशील इंसान की नींद उड़ सकती है।यह निर्वीर्य बाशिदों की दुनिया है।विद्रूप हार्मोंसो की दुनिया।यहां की अलग प्रकृति है।संस्कृति है।नैतिकतावादियों की नज़र में विकृति है।मेरे लिए थर्ड जेंडर को समझने का खिड़की है।यह पुटी उर्फ़ परिमल ( ऋद्धि सेन) की दुनिया है।आत्मदर्प और आत्मदया से मुक्त यह एक निर्दोष किरदार है।मासूमियत को अपने भीतर जज्ब किए हुए।रुपहला परदा उसकी मासूमियत को सोख लेता है।जोग जनम की साड़ी ओढ़कर बाकायदा दीक्षित परिमल उस अंग समेत हिजड़ा समुदाय में शामिल हो जाता है। जिसे लेकर पुरुष समाज आत्मगौरव से दीप्त और अपनी शब्दावली में तमाम तरह की गालियों को ईजाद करता रहता है। मैं सदमे में हूं।क्यों यह लड़का नर्क में गया?अब पुटी इसी दुनिया का एक हिस्सा है।यहां गुरु शासक है।तानाशाह है। पुटी के सारे सपने अब नेस्तनाबूत हैं।उसे सपने देखने का हक नही है।प्रेम करने की भी आजादी नहीं।यह जीवन का ग्रे शेड है।लेकिन प्रेम जेंडर देखकर तो नहीं होता न !यही गुस्ताखी पुटी और मधु ( ऋत्विक चक्रवर्ती) कर बैठते हैं।इस दुनिया के लिए यह खतरा है।यह आम रास्ता नहीं है।दर्दनाक रास्ता है।बकौल ग़ालिब,’ इक आग का दरिया है।’इसे पार करने की कूवत सबके भीतर कहां होती है ?और वो भी किसी हिजड़े से प्रेम करना किसी चुनौती से कम नहीं है।मधु हिम्मती है।हुनरमंद है।फुरसत में बांसुरी बजाता है।परिमल के सपने के साथ खुद को जोड़ता है।खलील जिब्रान के शब्दों में कहूं तो,

' ऐसे भी लोग हैं जिनके पास थोड़ा ही है,
  लेकिन वे अपना सब दे डालते हैं।'

दरअसल,परिमल अपनी देह का ट्रांसफार्मेशन / कायांतरण करवाना चाहता है।उसके इस मिशन में हमदर्द और हमराह मधु है।मधु वैष्णव परिवार से ताल्लुक रखता है।कृष्ण भक्त है।कोलकाता में डिलीवरी ब्वॉय का काम करता है।उसे पुटी का सड़क पर पैसे मांगना बिल्कुल पसंद नहीं है। आत्मविश्वासी है। पुटी को लेकर भाग जाता है। मानोबी बंद्योपाध्याय
से मिलता है।चूंकि ट्रांसफार्मेशन की प्रक्रिया खर्चीली है।इसलिए वह पैसे का इंतजाम करना चाहता है। पुटी को अपने घर नवद्वीप लेकर जाता है।यहां से दुनिया जितनी पुटी के सामने खुलती उतनी ही पुटी दुनिया के सामने खुलती है।यह फिल्म का टर्निंग प्वाइंट है।फिल्म फ्लैश बैक में आवाजाही करती है। पुटी का अतीत खौफनाक है।प्रेम पुटी के लिए आतंककारी
सिद्ध हुआ था।अपने पूर्व प्रेमी द्वारा छली गई है पुटी।यूं ही बेगम अख्तर ने नहीं गाया होगा, ‘ मेरे हमनवां,मेरे हमसफर मुझे दोस्त बनाकर दगा न दे !’दुख की महीन चादर पसर गई है चारों तरफ़।सत्संग कीर्तन में सबके सामने पुटी के नकली बालों का गिरना और फिर दुनिया के सामने खुद अपने समुदाय द्वारा नंगा करके पीटे जाना।इन दोनो घटनाओं ने पुटी की आत्मा को खत्म कर दिया है। वह सिर्फ़ एक बेजान देह है।पीड़ा,संत्रास और यातना उसके जीवन के अंग बन चुके हैं। मैंने खुद को दर्द में डुबो लिया।विकल्पों भरी इस दुनिया में वह विकल्पहीन है।उसने आत्महत्या को चुन लिया।उसकी लटकी हुई नीली देह को पकड़कर मधु का विलाप और स्त्री वेश धारणकर हिजड़ा समुदाय के दरवाजे पर दस्तक देना।ये दोनों दृश्य देखकर कई दिनों तक मैं ठीक से सो नहीं पाया था।यानी वहां भी सब कुछ ठीक नहीं चल रहा।यह फिल्म कई सवाल छोड़कर चौतरफ़ा सन्नाटे में समाप्त होती है।परिमल का कसूर क्या था ?अपनी देह को नहीं समझ पाना या मधु से प्रेम करने की सजा ? खुद के बनाए हुए ताजमहलों में टूट – फूट ?क्या सिर्फ़ स्त्री और पुरुष से अलग होने का खामियाजा परिमल को भुगतना पड़ा ?अपने बनाए हुए नियमों में कितने संकीर्ण हैं हम ?मनुष्य होकर भी संवेदना को समझना क्या इतना मुश्किल है ? रघुवीर सहाय याद आ रहे हैं –

“एक भयानक चुप्पी छाई है समाज पर,
शोर बहुत है पर सच्चाई से कतराकर गुजर रहा है।”


*गीत चतुर्वेदी के कविता की एक पंक्ति।
शब ए इंतजार आख़िर कभी होगी मुख्तसर भी…!


मुख्तसर ! यह कि ये दोनों फिल्में दुखांत प्रेमकथाएं है।ऐसा दुख जिसकी कोई दवा नहीं है।ये प्रेमकथाएं रोमांटिक प्रेम के पारंपरिक धारणाओं को ध्वस्त करती हैं।दरअसल,ये दोनों किरदार रूमानी दुनिया से मुक्ति, आत्मसंघर्ष और जिंदगी के अनकहे फलसफे पर गुफ्तगू करते हैं।इन दोनों फिल्मों में कुछ समानताएं भी हैं।जैसे,नायकों का खौफनाक अतीत और ट्रांसफार्मेशन की चाहत। ये दोनो नायक कला की दुनिया से भी बावस्ता रखते है। नगरकीर्तन का मधु बांसुरीवादक है और दायरा का नायक क्लासिकल डांसर।भाषाई स्तर पर भले ही समानता न रखती हो लेकिन समकालीनता और तुलनात्मकता के मद्दे नज़र विमर्श का नया पाठ तैयार करती हैं।कभी – कभी ऐसा भी होता है कि हम रचना को नहीं बनाते,रचना हमें बनाती है। नगरकीर्तन और दायरा हमें उस धरातल पर खड़ा करती हैं,जहां से थर्ड जेंडर के जीवन को हम शिद्दत से महसूस करने लगते हैं।मन के भीतर के स्त्री संवेगो को जगा सकने में ये फिल्में समर्थ हैं।क्या कुछ क्षण जीवन में ऐसे नहीं होते कि उस वक्त न तो हम मर्द होते हैं और न ही औरत ?यानी समभाव में स्थित होते हैं। स्त्री और पुरुष के चौखटे से बाहर एक लिंगेतर मनुष्य ? डी क्लास होना थोड़ा
मुश्किल जरूर है लेकिन असंभव नहीं। आख़िर!विज्ञान में एंड्रोजेनी तो होते ही हैं न !जब प्रकृति समाधिस्थ हो सकती है,तो हम क्यूं नहीं ? लगता है,अर्धनारीश्वर के रूप में शिव ने ऐसी गाढ़ी नींद ली,जो अब टूटने वाली नहीं। क्या हम एक ऐसे समाज का निर्माण नहीं कर सकते,जहां लिंग और योनि को दरकिनार करके इनके साथ समन्वय और सहधर्मिता के साथ खड़े हो जाएं, सिर्फ़ खड़े ही क्यों हो ! इनके दुःख – दर्द में एक समानांतर साझी दुनिया का निर्माण करें। इतना कुछ सोचते हुए एक खुमारी का नशा छा गया मुझ पर।एक सपने में डूब जाता हूं।
देखता हूं कि नगरकीर्तन का परिमल,दायरा का अनाम नायक अपने सपनों,हौसलों और उड़ानों के साथ नृत्य कर रहे है।लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी और मानोबी बंद्योपाध्याय भी साथ – साथ नाच रहे हैं। दूर से आती हुई ढोलक की थाप अब साफ़ सुनाई देने लगी है।अब तो हर जगह लाल ही लाल। जित देखूं तित लाल।गाने के बोल अब समझने लगा हूं मैं। मैं चौक जाता हूं।
अरे !ये तो मेरा पसंदीदा सोहर है –

                 "जुग - जुग जियेसु ललनवा...
                  भवनवा क भाग जागल हो...!"**

नींद से जागकर मैं दूना विस्मय जीता हूं। ढोलक की थाप और घुंघरू की तानअपने उठान पर है। उन्होंने अक्षत मेरे ऊपर फेंक दिया।आंगन में किलकारियां गूंज उठी।


** पूर्वी उत्तर प्रदेश में पुत्र जन्म पर गाया जाने वाला
मशहूर लोकगीत/सोहर.

बीपी मंडल और शहीद जगदेव प्रसाद की स्मृति में परिचर्चा

सामाजिक न्याय के पुरोधा बी.पी. मंडल और शहीद जगदेव प्रसाद की स्मृति में “सामाजिक न्याय की अधूरी लड़ाई और आगे की चुनौतियाँ” विषय पर आज पटना लॉ कॉलेज में एक परिचर्चा का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम सोशल जस्टिस आर्मी एवं रिसर्च स्कॉलर एसोसिएशन के संयुक्त बैनर तले आयोजित हुआ।
संचालन सोशल जस्टिस आर्मी के संयोजक गौतम आनंद ने किया और धन्यवाद ज्ञापन अनंत शाश्वत ने प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर, शहीद जगदेव प्रसाद, जननायक कर्पूरी ठाकुर और बी.पी. मंडल की तस्वीरों पर पुष्प अर्पित करने एवं दीप प्रज्वलन से हुआ। अतिथियों का स्वागत पुष्पगुच्छ और शॉल भेंट कर किया गया।
मुख्य अतिथि के रूप में आईजीआईएमएस के मेडिकल सुपरिटेंडेंट और बी.पी. मंडल के परपोते डॉ. मनीष मंडल, भाकपा (माले) की विधान परिषद सदस्य शशि यादव, स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन तथा कांग्रेस के युवा नेता मंजीत साहू उपस्थित थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. पी.एन.पी. पाल ने की।

डॉ. मनीष मंडल ने कहा कि सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए निरंतर संघर्ष जरूरी है। उन्होंने ज़ोर दिया कि सभी नियुक्तियों और बहालियों में आरक्षण लागू हो, इसके लिए लड़ाई को और मजबूत करना होगा।

शशि यादव ने अपने संबोधन में कहा कि सामाजिक न्याय की लड़ाई को जानबूझकर कमजोर किया जा रहा है। बी.पी. मंडल और जगदेव प्रसाद की राजनीतिक धारा को समाप्त करने की साजिश रची जा रही है।

संजीव चंदन ने कहा कि बिहार में आज जो सत्ता का स्वरूप दिखाई देता है, वह सामाजिक न्याय की देन है। मंडल कमीशन की पूरी रिपोर्ट लागू कराना और निजी क्षेत्रों में आरक्षण सुनिश्चित कराना सबसे बड़ी चुनौती है। उन्होंने चेतावनी दी कि भाजपा लगातार आरक्षण को कमजोर करने की कोशिश कर रही है।

गौतम आनंद ने अपने वक्तव्य में कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में दलितों और पिछड़ों को व्यवस्थित रूप से बाहर किया जा रहा है। उन्होंने आह्वान किया कि हमें सामाजिक न्याय के योद्धाओं के सपनों और विचारों को ज़मीन पर उतारने के लिए एकजुट होकर संघर्ष करना होगा।

युवा कांग्रेस नेता मंजीत साहू ने भी सभा को संबोधित किया।

अध्यक्षीय भाषण में डॉ. पी.एन.पी. पाल ने कहा कि सामाजिक न्याय को नए सिरे से परिभाषित करने और संघर्ष को तेज करने की आवश्यकता है। शिक्षा ही वह साधन है जिससे स्थितियाँ बदली जा सकती हैं, लेकिन शिक्षा पर ही सबसे बड़ा हमला हो रहा है। उन्होंने चेताया कि ब्राह्मणवाद का दबदबा बढ़ रहा है और आरएसएस–भाजपा सरकार जाति व्यवस्था को मजबूत करने का काम कर रही है।

कार्यक्रम में बड़ी संख्या में छात्र, युवा और बुद्धिजीवी शामिल हुए। इनमें प्रमुख रूप से गौतम आनंद, आर्यन, सुदर्शन, सूरज चौरसिया, आशीष, आलोक, शाश्वत, रंजन, अमर आज़ाद, प्रेम ओंकार, प्रभात, रिशु, युवराज, ग्रीजेश, रिशव, चंदन, लालू, अमरेश, अमित, दीपक, गुड्डू, अभिनाश, देवशंकर, ई. मुन्ना, भोलू, दिलखुश, रामकृष्ण, श्वेता, कृष्णा, दिव्यम, अखिलेश, मणि, निखिल, माधव, नितेश, जयवीर, मोलू, यश, आयुष, सागर, गौरव, जयजीत, सौरव, रामशंकर, अंगद, राजेश, ज्योतिष, गुंजन, प्रेम सहित सैकड़ों प्रतिभागी मौजूद रहे।

2025 का ‘कारवां-ए-हबीब सम्मान’ सुप्रसिद्ध निर्देशक , को

इस वर्ष का ‘कारवां-ए-हबीब सम्मान’ सुप्रसिद्ध निर्देशक देवेन्द्र राज अंकुर जी को प्रदान किया जाएगा। यह सम्मान कालजयी रंगकर्मी एवं वरिष्ठ निर्देशक हबीब तनवीर साहब की स्मृति में प्रतिवर्ष दिया जाता है।

‘कारवां-ए-हबीब तनवीर सम्मान’ चयन समिति के सदस्यों ने वरिष्ठ रंगकर्मी, कहानी का रंगमंच के प्रणेता और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के पूर्व निदेशक देवेन्द्र राज अंकुर जी को इस सम्मान से सम्मानित करने का निर्णय किया है।

इस वर्ष की चयन समिति में वरिष्ठ रंग-समीक्षक जयदेव तनेजा, रंगकर्मी, अभिनेता एवं रंग-शिक्षक अमिताभ श्रीवास्तव, सुपरिचित नाटककार एवं संस्कृतिकर्मी राजेश कुमार, सुप्रसिद्ध पत्रकार व साहित्यकार गीता श्री, सिनेमा और रंगमंच की चर्चित अभिनेत्री हिमानी शिवपुरी, हबीब तनवीर की संस्था नया थियेटर के प्रमुख रामचन्द्र सिंह, समकालीन रंगमंच पत्रिका के संपादक और रंग-समीक्षक राजेश चन्द्र, रंग-निर्देशक, कवि एवं समीक्षक ईश्वर शून्य, नारीवादी एक्टिविस्ट और स्त्रीकाल पत्रिका के संपादक संजीव चंदन, वरिष्ठ रंगकर्मी और फिल्मकार उपेन्द्र सूद (एन. एस. डी. 1981 बैच) शामिल हैं।

समिति ने बहुमत से इस प्रतिष्ठित सम्मान के लिये श्री देवेन्द्र राज अंकुर जी के नाम का चयन किया।

‘कारवां-ए-हबीब’ सम्मान की सलाहकार समिति के सदस्यों सुप्रसिद्ध साहित्यकार और नाटककार असग़र वजाहत, वरिष्ठ साहित्यकार उदयप्रकाश, वरिष्ठ रंग-निर्देशक, अभिनेता और रा. ना. वि. के पूर्व निदेशक रामगोपाल बजाज ने सर्वसम्मति से इस प्रतिष्ठित सम्मान के लिये श्री देवेन्द्र राज अंकुर जी के नाम का अनुमोदन किया।

प्रसिद्ध रंगकर्मी और निर्देशक हबीब तनवीर की स्मृति में दिया जाने वाला यह बहुप्रतिष्ठित सम्मान पूर्व में क्रमश: अनामिका हक्सर (2018), प्रसन्ना (2019), उषा गांगुली (2020, मरणोपरांत), राम गोपाल बजाज (2021), राजेश कुमार (2022), भानु भारती (2023) और जयदेव तनेजा (2024) को प्रदान किया जा चुका है।

‘कारवां-ए-हबीब’ सम्मान चयन और सलाहकार समिति के सम्मानित सदस्यों को उनके सहयोग के लिए धन्यवाद।

हबीब तनवीर साहब की वैचारिक , सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से रंगमंच सहित साहित्य, संस्कृति, समाज और राजनीति के क्षेत्र में विशिष्ट, जनपक्षधर और समग्र योगदान के लिये प्रतिवर्ष किसी एक व्यक्तित्व को ‘कारवां-ए-हबीब सम्मान‘ प्रदान किया जाता है। यह सम्मान और नाट्योत्सव ‘कारवां-ए-हबीब तनवीर’, विकल्प साझा मंच और अस्मिता थियेटर ग्रुप की तरफ़ से प्रतिवर्ष आयोजित किया जाता है।

-संयोजक, ‘कारवां-ए-हबीब’ सम्मान समिति।

#हबीब_तनवीर#कारवां_ए_हबीब_सम्मान#देवेन्द्र_राज_अंकुर

#HabibTanvir#DRAnkur#Theatre#Director#IndianTheatre#DelhiTheatre#drama#Playwright#Acting#NationalSchoolOfDrama#AsmitaTheatre