Home Blog Page 4

शिवनंदन पासवान को क्यों भुला दिया गया : जननायक कर्पूरी ठाकुर को दिया था ‘मरणोपरांत न्याय’ !

प्रखर समाजवादी नेता, पूर्व मंत्री, विधानसभा के पूर्व उपाध्यक्ष शिवनंदन पासवान की 90वीं जयंती आयोजित

पटना: बिहार के वरिष्ठ समाजवादी नेता , पूर्व मंत्री, विधानसभा के पूर्व उपाध्यक्ष और कार्यकारी अध्यक्ष शिवनंदन पासवान की 90वीं जयंती सह व्याख्यामाला मंगलवार को विधानसभा के विस्तारित भवन में आयोजित की गयी। इस मौके पर उन पर एकाग्र एक स्मारिका का भी विमोचन किया गया।
इस मौके पर वक्ताओं ने कहा, शिवनंदन पासवान ने जननायक कर्पूरी ठाकुर को मरणोपरांत न्याय दिया। नेता प्रतिपक्ष पद से विस्थापित कर दिये गये जननायक को मरणोपरांत नेता प्रतिपक्ष पद पर पुनर्स्थापित करने वाला ऐतिहासिक निर्णय सुनाया। तब वे विधानसभा के कार्यकारी अध्यक्ष थे। अपने संक्षिप्त कार्यकाल में उन्होंने इतिहास रच दिया। लेकिन वे बिसार दिये गये। अपनों ने, दोस्तों ने, राजनीतिक संगी साथियों ने उन्हें बिसार दिया। इतिहास ने उनके साथ न्याय नहीं किया।

राष्ट्रीय जनता दल के प्रदेश अध्यक्ष मंगनी लाल मंडल की अध्यक्षता में आयोजित इस कार्यक्रम को पूर्व केंद्रीय मंत्री संजय पासवान, विधान पार्षद अब्दुलबारी सिद्दिकी, पूर्व एमएलसी गणेश भारती,पूर्व विधायक रमाकांत पांडे, वरिष्ठ पत्रकार हेमंत कुमार, संजीव चंदन, श्वेता सागर और पंकज आनंद सहित कई लोगों ने संबोधित किया । इस अवसर पर पत्रकार वेदप्रकाश, वीरेंद्र यादव, अरविंद कुमार, मुसाफिर बैठा , कंचनमाला आदि लोगों की उपस्थिति रही।



अपने अध्यक्षीय भाषण में मंगनी लाल मंडल ने कहा कि शिवनंदन बाबू समाजवादी पार्टी के जमे हुए नेता थे उन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन में जिस ईमानदारी और साहसिक व्यक्तित्व का परिचय दिया, उसका उदाहरण वीरल है। श्री मंडल ने आपातकाल के दिनों को याद किया और कहा कि इंदिरा गांधी की इमरजेंसी में पक्षी भी डरते थे लेकिन प्रशासनिक अधिकारी के रूप में शिवनंदन बाबू ने जिस साहस का परिचय दिया वह अपने आप में दुर्लभ है। उन्होंने कहा कि आज के विपरीत माहौल में शिवनंदन बाबू जैसे नेताओं को याद करना अपनी पुरानी समाजवादी परंपरा से को जुड़ना है।


उपस्थित वक्ताओं और भागीदारों का स्वागत करते हुए शिवनंदन पासवान के सुपुत्र पंकज आनंद ने कहा कि ‘ शिवनंदन पासवान उन लोगों में से थे—जो सत्ता के पीछे नहीं चले,बल्कि सत्ता से सवाल करते हुए चले। वे पद के मोह में नहीं पड़े,बल्कि मूल्यों की राजनीति करते रहे।वे मानते थे—राजनीति का अर्थ कुर्सी नहीं, जिम्मेदारी है; और नेतृत्व का अर्थ भाषण नहीं, बलिदान है।’
पूर्व केंद्रीय मंत्री संजय पासवान ने कहा कि आज के बदले हुए समय में शिवनंदन पासवान जैसे नेताओं को याद करना अपनी पुरानी राजनीतिक परंपरा को पुनर्जीवित करने के समान है। उन्होंने कहा कि उनके परिवार ने उनकी स्मृति में जो कार्यक्रम किया है ,वह स्वागत योग्य है।
पूर्व मंत्री एवं एमएलसी अब्दुल बारी सिद्दीकी ने कहा कि शिवनंदन बाबू बिहार की समाजवादी परंपरा के जीवंत मिसाल थे आज के समय में उनको याद करना अपनी पुरानी विरासत को जीवित करने के समान है।पूर्व एमएलसी गणेश भारती ने कहा कि शिवनंदन बाबू हासिए के समाज से आने वाले अपने दौर के चमकते सितारे थे उन्होंने समाजवादी राजनीति में जिस साहस और सादगी का परिचय दिया वह आज के समय में दुर्लभ है।
पूर्व विधायक रमाकांत पांडे ने कहा कि शिवनंदन बाबू सादा जीवन उच्च विचार के प्रतीक थे उन्होंने अपने समय में जिस सादगी और ईमानदारी का परिचय दिया आज की राजनीति में वह एक नजीर की तरह याद किए जाने योग्य है।
स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन ने कहा कि समाजवादी परंपरा में शिवनंदन बाबू जैसे लोगों को याद करना अपने समय के ज्वलंत शख्सियतों को याद करने के समान है। उन्होंने कहा कि आज बिहार में जिस तरह का अपर कास्ट नैरैटिव काम कर रहा है मीडिया और अकादमी की जगत में उसको तोड़ने की जरूरत है। और आज की बहुजन राजनीति को यह कार्यभार अपने ऊपर लेना चाहिए।
वरिष्ठ पत्रकार हेमंत ने कहा कि शिवनंदन पासवान अपने समय के वीरल नेता थे। उन्होंने जननायक कर्पूरी ठाकुर को ‘मरणोपरांत न्याय’ दिया। उन्होंने नेता प्रतिपक्ष के पद से हटा दिये गये जननायक को नेता प्रतिपक्ष के पद पर पुनर्स्थापित किया। लेकिन इतिहास ने उनके साथ न्याय नहीं किया। अपनों और राजनीतिक संगी साथियों ने उन्हें बिसार दिया। उन्होंने राजस्व एवं भूमिसुधार राज्यमंत्री, बिहार विधानसभा के अध्यक्ष कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में उन्होंने अपनी कार्य पद्धति की जो मिसाल पेश की वह दुर्लभ है।

जयंती का आयोजन शिवप्रभा फॉउंडेशन ने किया।

खालिदा जिया बेगम (1945-2025): अधिकार, विरोधाभास और दक्षिण एशिया की जटिल विरासत

दक्षिण एशिया की राजनीति में कुछ स्त्रियाँ केवल सत्ता तक नहीं पहुँचीं, उन्होंने सत्ता की संरचना में स्त्री की उपस्थिति को दृश्य बनाया। बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा ज़िया बेगम ऐसी ही एक ऐतिहासिक शख़्सियत थीं। उनके निधन के साथ बांग्लादेश की राजनीति का वह दौर समाप्त हुआ जिसमें महिला नेतृत्व एक अपवाद नहीं, बल्कि लोकतंत्र की केंद्रीय धुरी बन चुका था—भले ही वह धुरी अंतर्विरोधों से भरी रही हो।

खालिदा ज़िया का सार्वजनिक जीवन एक सैन्य शासक जनरल ज़ियाउर रहमान की विधवा के रूप में शुरू हुआ, लेकिन उन्होंने स्वयं को केवल ‘राजनीतिक उत्तराधिकार’ तक सीमित नहीं रखा। 1991 में वे बांग्लादेश की पहली निर्वाचित महिला प्रधानमंत्री बनीं। यह उपलब्धि प्रतीकात्मक भर नहीं थी—यह उस समाज में एक निर्णायक हस्तक्षेप था जहाँ राजनीति लंबे समय तक पुरुष कुलीनता, सेना और नौकरशाही के नियंत्रण में रही।

महिला अधिकारों के पक्ष में नीतिगत हस्तक्षेप

अपने कार्यकालों (1991–1996, 2001–2006) में खालिदा ज़िया सरकार ने महिलाओं से जुड़े कई महत्वपूर्ण क़ानूनी और संस्थागत कदम उठाए, जिन्हें दक्षिण एशिया के महिला अधिकार इतिहास में दर्ज किया जाना चाहिए।

स्थानीय शासन में महिलाओं का आरक्षण:

यूनियन परिषदों और स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों को प्रभावी रूप देने की प्रक्रिया को उनकी सरकार ने आगे बढ़ाया। इससे ग्रामीण और निम्नवर्गीय महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को औपचारिक मान्यता मिली।

महिला और बाल उत्पीड़न निरोधक क़ानूनों का सुदृढ़ीकरण:

उनके कार्यकाल में Women and Children Repression Prevention Act को सख़्त बनाया गया, जिसमें बलात्कार, घरेलू हिंसा, तेज़ाब हमले और मानव तस्करी जैसे अपराधों के लिए कठोर दंड का प्रावधान किया गया। यह कानून बाद के वर्षों में महिला अधिकार संघर्षों का एक अहम औज़ार बना।

तेज़ाब हिंसा के विरुद्ध राज्य हस्तक्षेप:

बांग्लादेश में तेज़ाब हमले एक गंभीर सामाजिक अपराध रहे हैं। खालिदा ज़िया सरकार के दौरान इस हिंसा को रोकने के लिए विशेष क़ानूनी ढाँचे और पीड़ित सहायता तंत्र को मज़बूती मिली—जिससे यह मुद्दा निजी शर्म से निकलकर सार्वजनिक अपराध के रूप में स्थापित हुआ।

महिला शिक्षा और रोज़गार पर ज़ोर:

माध्यमिक स्तर पर लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने वाली योजनाएँ, महिला शिक्षकों की नियुक्ति और कुछ क्षेत्रों में रोज़गार कोटा—ये सब उस नीति दृष्टि का हिस्सा थे जिसमें महिला सशक्तिकरण को केवल नैतिक प्रश्न नहीं, बल्कि विकास का प्रश्न माना गया।

इन पहलों की सीमाएँ थीं—कई क़ानून ज़मीनी स्तर पर पूरी तरह लागू नहीं हो सके, और पितृसत्तात्मक संस्थाएँ जस की तस बनी रहीं। फिर भी यह सच है कि महिला अधिकारों को राज्य की ज़िम्मेदारी के रूप में स्वीकार करने की प्रक्रिया में खालिदा ज़िया सरकार की भूमिका रही।

सत्ता, द्वंद्व और आलोचना

खालिदा ज़िया का राजनीतिक जीवन शेख़ हसीना के साथ लंबे और तीखे द्वंद्व में बीता। यह टकराव केवल दो महिलाओं का नहीं था, बल्कि राष्ट्र की स्मृति, मुक्ति संग्राम की व्याख्या और सत्ता के नैतिक अधिकार को लेकर था। इस संघर्ष ने बांग्लादेशी राजनीति को जीवंत भी रखा और कई बार जकड़ भी दिया।

उन पर संस्थागत राजनीतिकरण, परिवार-केंद्रित राजनीति और भ्रष्टाचार के आरोप लगे। बाद के वर्षों में जेल, बीमारी और राजनीतिक अलगाव ने उनके जीवन को त्रासद आयाम दिया। एक स्त्री नेता के पतन को जिस कठोर नैतिकता से देखा गया, वह भी दक्षिण एशियाई राजनीति की लैंगिक असमानता को उजागर करता है।

स्त्रीवादी मूल्यांकन

स्त्रीवादी दृष्टि से खालिदा ज़िया न तो आदर्श नायिका थीं, न ही मात्र सत्ता की कठपुतली। वे उस पीढ़ी की महिला नेता थीं जिन्होंने पितृसत्तात्मक राजनीति में प्रवेश किया, उसमें टिके रहने के लिए समझौते किए, और कुछ दरवाज़े अगली पीढ़ियों के लिए खोल दिए।

उनके निधन के साथ यह स्पष्ट होता है कि दक्षिण एशिया में महिला नेतृत्व का इतिहास सरल रेखा में नहीं चलता—वह संघर्ष, सत्ता, क़ानून, सीमाएँ और संभावनाओं का मिश्रण होता है।

स्त्रीकाल खालिदा ज़िया बेगम को उनके योगदान, विरोधाभासों और महिला अधिकारों के इतिहास में उनकी जगह के साथ स्मरण करता है।

“धुरंधर” के लड़ाके

इस तरह भले ही इन रक्तपाती रोमांचक क्रूरतम खेल की शुरुआत वीडियो गेम्स से न हुई हो लेकिन माँग और पूर्ति के नियमानुसार वीडियो गेम खेलने वाली अधीर जेनरेशन का डोपामिन (डिजिटल एडिक्शन) आज ‘और ज़्यादा’ ख़ून की माँग कर रहा है अत: ‘धुरंधर’ जैसे सिनेमा को ‘प्रोपेगंडा’ कहना बेवकूफी ही है । क्या सिनेमा क्या राजनीति दोनों ने देश और समाज की नब्ज़ को पकड़ा हुआ है।

धुरंधरों की लड़ाई ! जी हाँ, यह लड़ाई ही है कोई ‘युद्ध’ नहीं जिसे देख देश-प्रेम जागे। धुरंधर फ़िल्म देखते हुए ‘शतरंज के खिलाड़ी’ का एक दृश्य याद आ रहा था, आप सभी को याद होगा जबकि दो नवाबों को पत्नी के क्रोध से बचकर ‘शतरंज की बिसात और चालें’ छोड़नी पड़ती हैं। रास्ते में वे भेड़ों की लड़ाई देखने रुक जाते हैं। उनमें से एक रुस्तम नामक भेड़ पर बोली यानी सट्टा भी लगा देता है लेकिन हार जाता है। “शतरंज” जैसे बेहतरीन खेल के खिलाड़ी भेड़ों की लड़ाई को ज्यादा बर्दाश्त नहीं कर पाते और वहां से निकल लेते हैं।  धुरंधर ‘खिलाड़ी’ दूसरों के ‘खेल’ में देखने में समय और पैसा बर्बाद नहीं किया करते। मुझे कभी समझ नहीं आता कि तीतर,बटेर, मुर्गों या कि भेड़,बकरों की लड़ाई देखने वालों को क्या ही मजा आता है। उनका ख़ून बहता है और ‘ये’ ‘आदमी लोग’ मज़ा ले रहे (आनंद नहीं) होते हैं । घायल की देह से बहता खून आज मज़ा देने लगा है । फ़िल्म का संवाद भी है “घायल हूँ इसलिए घातक हूँ” वैसे यह जानना भी रोचक है कि तीतर, बटेर, मुर्गा, भेड़ और बकरा लड़ाई सभी पुल्लिंग हैं और इस क्रूर, हिंसक खून भरी (‘माँग’ नहीं) लड़ाई को देखने वाले भी अधिकतर आदमी ही होते हैं। शायद ‘अधिकतर’ भी नहीं ‘सभी’ कहना चाहिए। ‘धुरंधर’ फ़िल्म देखते हुए कुछ ऐसा ही अनुभव हुआ मानो सभी लड़ाकों के सर पर भेड़ों की तरह सींग निकल आए हैं और एक दूसरे को लहू-लुहान कर रहे हैं। कौन कितना ज्यादा क्रूर हो सकता है ! इसका कंपटीशन चल रहा है। अजब-गजब तो यह है कि जिसने सबसे ज्यादा क्रूरता दिखाई उन्हीं अक्षय खन्ना को सबसे ज़्यादा प्रशंसा मिल रही है।

लगभग साढ़े तीन घंटे की इस “हिंसा-प्रधान” फ़िल्म में लड़कियों की क्या भूमिका रही होगी कहने की जरूरत नहीं वे लड़ाकुओं (तथाकथित ‘योद्धाओं’) को सुकून देने का खिलौना भर। एक बार कहानीकार उदय प्रकाश जी ने अपनी वॉल पर लिखा था ‘देखना चाहता हूँ कि फ़िल्मों में हिंसा कितने क्रूरतम रूप में हो सकती है’ उनके लिए एक फ़िल्म और ऐड हो चुकी है! संभवतः उनकी ओर से कुछ अलग विश्लेषण या निष्कर्ष सामने आएं। वैसे एक चीज और समझ में आई कि हक़, बारामूला के बाद धुरंधर तीसरी फ़िल्म है जो ‘कला के नाम’  पर अपनी पूरी सज-धज के साथ आई है। सिनेमा में हमेशा जनता की नब्ज को समझते हुए फ़िल्म निर्माण किया जाता रहा है। वरना लोग थियेटर तक कैसे जाएंगे! ओटीटी और टेलीग्राम की सुविधा उपलब्ध होने के बावजूद लोग थियेटर में हिंसा का मज़ा लेने जा रहे हैं। तो बाकी सभी फैक्टर्स के अतिरिक्त समाज का मनोविज्ञान यहां काम कर रहा है। डिजिटल सूचना के युग में  आपने डोपामाइन के विषय में सुना ही होगा! डोपामाइन एक हार्मोन जो अपने रक्त प्रवाह में स्रावित होता है। यह “लड़ों या भागो” सिंड्रोम में भूमिका निभाता है।“लड़ो या भागो” प्रतिक्रिया अर्थात् किसी वास्तविक या काल्पनिक तनावपूर्ण स्थिति में खतरे से बचने या निपटने के लिए शरीर की प्रतिक्रिया । डोपामाइन की कमी से शरीर की हरकतें धीमी और कठोर हो सकती हैं जिसे ADHD यानी अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर । दो-ढाई दशकों पूर्व बच्चों को वीडियो गेम्स का चस्का लगा था। इनमें नज़र आने वाले एनीमेटेड लड़ाकू निरंतर अपडेटेड होते रहे हैं । इन गेम्स को बनाने वाले “डोपामाइन” के खेल भी समझ चुके हैं, इसलिए उनकी हिंसात्मक गतिविधियों को क्रूरतम किया जाता रहता है । PUBG,Free Fire, COD mobile या LUDO KING के अलावा स्ट्रीट फाइटर , मोर्टल कोम्बेट टेक्कन,सुपर स्मैश, किंग ऑफ़ फाइटर जैसी गेम्स में काल्पनिक किरदारों के बीच रोमांचक लड़ाईयां होती हैं और बच्चे और युवा सभी उनका मज़ा लेते हैं ।

क्रूरतम खेलों से रोमांच या मज़ा लेने की शुरुआत इन वीडियो गेम्स से हुई हो ऐसा नहीं है! वास्तव में वर्चस्व की यह लड़ाई सदियों पुरानी है । इस सन्दर्भ में मुर्गा लड़ाई जो एक रक्तपातपूर्ण खेल है जिसमें पालतू मुर्गों को लड़वाया जाता है । “गेम” खेल मनोरंजन या शौक के रूप में मुर्गे का उपयोग के लिए ‘गेमेकॉक’ का पहला दस्तावेज़ी प्रयोग 1636 में दर्ज़ किया गया ऐतिहासिक रूप में (16 वीं शताब्दी में) इस लड़ाई को उन्मादपूर्ण मनोरंजक गतिविधियों के लिए भी किया जाता रहा है अक्सर अखाड़े के किनारे घेरा बनाकर खड़े लोग सट्टेबाजी में अपनी पूरी सम्पति तक गँवा दिया करते थे ।

https://en.wikipedia.org/wiki/Cockfighting

जैसे कि मैंने शतरंज के खिलाड़ी में भेड़ों की लड़ाई का उदाहरण दिया तो उसके लिए मैंने गूगल बाबा से गुहार लगाई तो उन्होंने बताया कि ये RAMS: यानी बड़े सींग वाले नर मेढ अपने झुण्ड में सामाजिक पदानुक्रम (hierarchy) स्थापित करने और अपनी स्थिति बनाये रखने के लिए लड़ते हैं । इन जंगली नर भेड़ों में एक-दूसरे के सिर पर टक्कर मारकर ‘अल्फ़ा मेल’ का दर्ज़ा हासिल किया जाता है जो एक स्वाभाविक प्रवृति होती है । याद आया “एनिमल” फ़िल्म का नायक भी नायिका पर रौब जमाने के लिए “अल्फ़ा मेल” पर एक टिप्पणी करता है और नायिका रीझ भी जाती है खैर! आने आने वाले समय में कुछ संस्कृतियों में इसे एक खेल के रूप में विकसित किया गया इसे राष्ट्रीय मनोरंजन के रूप में मनाया जाने लगा और इसमें सट्टेबाजी भी शामिल है । अधिकतर देशों में यह बैन हो चुका है कुछ देशों में आज भी यह स्वीकार्य है । https://en.wikipedia.org/wiki/Ram_fighting

(Ram fight in Tbilisi,1884)

गूगल बाबा कुछ मेहरबान हुए तो उन्होंने एक दिलचस्प पेज ओपन कर दिया https://www.theguardian.com/news/2018/feb/16/algeria-sheep-fighting-illegal-sport-angry-young-men इसमें बताया गया है कि Combat taa lkbech जिसका अल्जीरिया अरबी बोली में अर्थ है ‘भेड़ों की लड़ाई’, कुछ हद तक फुटबाल जैसी है । यह निष्क्रिय पुरुषों की दबी हुई ऊर्जा को बाहर निकालती है और उन्हें राष्ट्रीय, क्षेत्रवाद और पड़ोस के गौरव जैसी विभाजनकारी भावनाओं को खुलकर व्यक्त करने का मौका देती हैं।अजीब तो नहीं है कि ‘फुटबाल’ लड़कियों में अभी तक क्रिकेट की तरह लोकप्रिय नहीं हो पाया है हाँ,फ़िल्में इस पर भी बनी हैं । आगे लिखा था कि ‘भेड़ों की लड़ाई के लिए प्रशिक्षित करने वाले अल्जीरियाई लोग भय ,भ्रष्टाचार, कर्फ्यू के दुआर में पले-बढ़े हैं जिनके पास रोजगार के अवसर बहुत कम हैं और समाज में उनकी कोई सार्थक भूमिका नहीं है’। अल्जीरियर्स फोटोग्राफर युसूफ क्राचे का कहना है “इन लोगों को मौज-मस्ती करने देना अन्य परिस्थितियों में हिंसा कम करता है कि ये लोग राजनीति में उलजहने के बजाय तमाशों में ही उलझे रहें ।” आपको क्या लगता है “धुरंधर” जैसी फ़िल्में किन लोगों की ख़ुराक है?

इस तरह भले ही इन रक्तपाती रोमांचक क्रूरतम खेल की शुरुआत वीडियो गेम्स से न हुई हो लेकिन माँग और पूर्ति के नियमानुसार वीडियो गेम खेलने वाली अधीर जेनरेशन का डोपामिन (डिजिटल एडिक्शन) आज ‘और ज़्यादा’ ख़ून की माँग कर रहा है अत: ‘धुरंधर’ जैसे सिनेमा को ‘प्रोपेगंडा’ कहना बेवकूफी ही है । क्या सिनेमा क्या राजनीति दोनों ने देश और समाज की नब्ज़ को पकड़ा हुआ है। अभी हाल ही में 50 वर्ष पूरे करने वाली ‘शोले’ जिसे मनोरंजक फ़िल्म माना जाता है लेकिन इसमें अपने समय के हिसाब से हिंसा का चरम रूप था। गब्बर ठाकुर के परिवार का नरसंहार करता है,निहायत क्रूरता से ठाकुर के मासूम पोते के सीने पर गोली चला देता है। हालाँकि उस समय सेंसर बोर्ड ने अत्यधिक हिंसा के कारण क्लाईमेक्स पर आपति दर्ज की थी। फिर आता है उदारीकरण जो अपने साथ लाता है प्रेम कहानियाँ-मैंने प्यार किया, क़यामत से क़यामत तक, दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे। साथ में लाता है पूँजी तो खर्च करने के लिए बाज़ार खुला बाज़ार!     

कहा जा रहा है कि ‘धुरंधर’ फ़िल्म हिंसा अपने चरम रूप में है क्या ये ठीक वैसे ही ही नहीं है जैसे 50 वर्ष पहले शोले में हिंसा का चरम रूप था । उत्तर आधुनिकता की एक विशेषता है कि यहाँ से आलोचना को अपदस्थ कर दिया गया है जबकि हम तो पूर्व आधुनिक युग में रिवर्स लौट रहे हैं लेकिन आलोचना को अब बर्दाश्त नहीं किया जाता साहित्य में यदि आलोचना (प्रशंसात्मक) कमज़ोर हो रही है तो राजनीति में इसका वज़ूद कुचल दिया गया है लेकिन आज सिनेमा के समीक्षक भी (यहाँ आलोचक शब्द नहीं प्रयोग होता) असमंजस में हैं, लगता है अंतिम साँस गिन रहे हैं । अन्यथा ऋतिक रोशन जैसे सुपर स्टार को अपनी टिप्पणी बदलनी नहीं पड़ती । कहावत है “मुर्गा जान से गया और खाने वाले को मज़ा भी न आया” वो दिन दूर नहीं जब और-और-और की माँग पर ये ‘खून’ वीडियो गेम्स से बाहर बहना शुरू हो जाएगा । ये नायक मानो पर्दे से निकलकर सड़कों पर उतर आयेंगे। समाज का यह हिंसात्मक रवैया उसे किस दिशा में ले जाएगा? क्या ये मान न लिया जाए कि समाज क्रूरता की हदें पार कर रहा है? फिलहाल तो यह फ़िल्म ओटीटी के समय भी सिनेमाघरों के लिए संजीवनी का काम कर रही है युवा भले ही गर्त में धंसे चले जा रहे हो! धुरंधर फ़िल्म का अंत पार्ट -2 के संकेत पर होता है यानी हमारे डोपामाइन को हिंसा के अगले क्रूरतम (चरम?) रूप के लिए तैयार किया जा रहा है।’वर्चस्व के खिलाड़ी’ भेड़ों को लड़वा रहेंगे और आम जन बहते खून का मज़ा!

और अंत में- आपकी जानकारी के लिए बतला दूं कि धुरंधर फ़िल्म में कई दफा विहंगम दृश्यों में (ड्रोन) पाकिस्तान /कराची को दिखाया है। अगर ‘पाकिस्तान’ ही देखना है तो पाकिस्तान के सीरियल यूट्यूब पर उपलब्ध है, देखे जा सकते हैं  आपको पता लगेगा कि वहाँ पर भी हमारे भारत जैसे ही संवेदनशील इंसान रहते हैं वहाँ की औरतें भी अपने ‘हक’ के लिए अपने ढंग से लड़ रही हैं ।

शिवानी सिद्धि

स्वतंत्र पत्रकार  

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की पहली महिला अध्यक्ष: संगीता बरुआ पिशरोटी

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की पहली महिला अध्यक्ष: संगीता बरुआ पिशरोटीएक ऐतिहासिक उपलब्धि, एक स्त्रीवादी संकेत

“प्रतिनिधित्व कोई ‘कृपा’ नहीं, बल्कि अधिकार है”

नई दिल्ली। भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में दर्ज यह क्षण केवल एक संस्थागत बदलाव नहीं है, बल्कि यह उस दीर्घ स्त्री-संघर्ष का सार्वजनिक प्रतिफल है, जो मीडिया संस्थानों के भीतर वर्षों से अदृश्य बना रहा। वरिष्ठ पत्रकार संगीता बरुआ पिशरोटी को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया (PCI) की पहली महिला अध्यक्ष चुना गया है। दशकों पुराने इस प्रतिष्ठित संस्थान में महिला नेतृत्व का यह पहला अवसर न केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि मीडिया जगत में बदलते सामाजिक‑पेशेवर संतुलन का भी संकेत देता है।

चुनाव में ऐतिहासिक जीत

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के हालिया चुनावों में संगीता बरुआ पिशरोटी के नेतृत्व वाले पैनल ने लगभग सर्वसम्मति के साथ जीत दर्ज की। अध्यक्ष पद पर उनकी जीत ने यह स्पष्ट कर दिया कि पत्रकार समुदाय के एक बड़े हिस्से ने उनके अनुभव, वैचारिक स्पष्टता और संगठनात्मक दृष्टि पर भरोसा जताया है। यह चुनाव केवल पद परिवर्तन नहीं, बल्कि प्रेस क्लब के इतिहास में एक नए अध्याय की शुरुआत माना जा रहा है।

कौन हैं संगीता बरुआ पिशरोटी

संगीता बरुआ पिशरोटी एक जानी‑मानी वरिष्ठ पत्रकार और लेखिका हैं। असम से आने वाली पिशरोटी ने राष्ट्रीय पत्रकारिता में अपनी अलग पहचान बनाई है। वे लंबे समय से नई दिल्ली में सक्रिय हैं और राष्ट्रीय राजनीति, शासन, उत्तर‑पूर्व भारत तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं पर उनकी रिपोर्टिंग और लेखन को विशेष महत्व दिया जाता है।

उन्होंने अपने करियर की शुरुआत यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया (UNI) से की और बाद में द हिंदू जैसे प्रतिष्ठित अख़बार में विशेष संवाददाता के रूप में कार्य किया। वर्तमान में वे डिजिटल मीडिया मंच द वायर से जुड़ी रही हैं, जहाँ उन्होंने राष्ट्रीय मामलों पर संपादन और लेखन का कार्य किया।

पत्रकारिता में योगदान और पहचान

संगीता बरुआ पिशरोटी की पत्रकारिता की पहचान सत्ता से सवाल पूछने, हाशिये के क्षेत्रों और समुदायों की आवाज़ सामने लाने तथा संवैधानिक मूल्यों के पक्ष में स्पष्ट रुख रखने के लिए रही है। उत्तर‑पूर्व भारत से जुड़े राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर उनकी गहरी पकड़ मानी जाती है।

वे कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों और फ़ेलोशिप्स से सम्मानित की जा चुकी हैं। इसके अलावा वे लेखन के क्षेत्र में भी सक्रिय हैं। उनकी पुस्तक “Assam: The Accord, The Discord” असम समझौते और उससे जुड़े राजनीतिक‑सामाजिक विरोधाभासों पर एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ मानी जाती है।

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया और महिला नेतृत्व

1958 में स्थापित प्रेस क्लब ऑफ इंडिया लंबे समय से देश के पत्रकारों का एक प्रमुख मंच रहा है। इसके इतिहास में पहली बार किसी महिला का अध्यक्ष बनना, भारतीय मीडिया संस्थानों में लैंगिक प्रतिनिधित्व को लेकर एक महत्वपूर्ण संकेत है।

संगीता बरुआ पिशरोटी की अध्यक्षता ऐसे समय में आई है, जब पत्रकारिता अभूतपूर्व दबावों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े सवालों और पेशेवर असुरक्षाओं के दौर से गुजर रही है। ऐसे में उनसे अपेक्षा की जा रही है कि वे प्रेस क्लब को एक अधिक सक्रिय, समावेशी और हस्तक्षेपकारी मंच के रूप में आगे बढ़ाएंगी।

आगे की राह

अपने वक्तव्यों में संगीता बरुआ पिशरोटी ने संकेत दिया है कि उनकी प्राथमिकता प्रेस क्लब को केवल एक सामाजिक स्थल तक सीमित न रखकर, पत्रकारों के अधिकारों, सुरक्षा और पेशेवर गरिमा से जुड़े मुद्दों पर सशक्त आवाज़ बनाने की होगी। महिला पत्रकारों, युवा मीडिया कर्मियों और क्षेत्रीय पृष्ठभूमि से आने वाले पत्रकारों के लिए अधिक प्रतिनिधित्व और संवाद के अवसर भी उनकी कार्यसूची में शामिल माने जा रहे हैं।

संगीता बरुआ पिशरोटी का प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की पहली महिला अध्यक्ष बनना केवल एक उपलब्धि नहीं, बल्कि उस पितृसत्तात्मक संरचना में दरार है जो दशकों से मीडिया संस्थानों को संचालित करती रही है। यह घटना याद दिलाती है कि प्रतिनिधित्व कोई ‘कृपा’ नहीं, बल्कि अधिकार है। Streekaal के लिए यह क्षण इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पत्रकारिता के भीतर स्त्री नेतृत्व की उस संभावना को रेखांकित करता है, जिसे अक्सर योग्यता के बावजूद हाशिये पर रखा गया। यह पद एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस सामूहिक संघर्ष का है जो स्त्रियों ने न्यूज़रूम से लेकर प्रेस क्लबों तक लड़ा है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

‘कथाक्रम’ का 33 वां ‘आनंद सागर स्मृति सम्मान’ लेखक श्री भालचंद्र जोशी को

0

 –लेखन मेरे लिए पहले और अंतिम विकल्प की तरह है — भालचन्द्र जोशी

हिन्दी त्रैमासिक पत्रिका ‘कथाक्रम’ का तैंतीसवां वार्षिक समारोह 7 दिसंबर को लखनऊ के कैफ़ी आज़मी सभागार में आयोजित किया गया , जिसमें वरिष्ठ कथाकार श्री भालचंद्र जोशी को ‘आनंद सागर स्मृति सम्मान’ प्रदान किया गया | श्री भालचंद्र जोशी को सम्मान स्वरूप मानपत्र और रु.21000 प्रदान किये गए | सम्मान समारोह में अध्यक्ष के रूप में प्रसिद्ध आलोचक श्री वीरेंद्र यादव, मुख्य अतिथि के रूप में कथाकार श्री शिवमूर्ति आमंत्रित थे | सम्मानित कथाकार भालचंद्र जोशी ने अपने वक्तव्य में शैलेंद्र सागर और कथाक्रम सम्मान से जुड़े सभी लोगों के प्रति कृतज्ञता प्रकट की और उन्होंने कहा कि ऐसे ही लोग और ऐसे ही संस्थाएँ हैं , जो पुरस्कार और सम्मानों की प्रतिष्ठा बचाए हुए है । अपने लेखन के बारे में उन्होंने कहा कि – “लिखना मेरे लिए पहले और अंतिम विकल्प की तरह है क्योंकि इसके सिवा मुझे कुछ आता भी नहीं है । मेरे लिए शब्दों का संसार ही अंतिम विकल्प है । लेखन मेरी अंतिम शरणस्थली है । लेखक के लिए लिखने से बड़ा सुख कुछ भी नहीं है । एक लेखक जो दुनिया में हारता है या जो दुनिया से हारता है , अपने जैसे सैकड़ो , हजारों , असंख्य लोगों को हारते हुए देखता है तो लेखक उसकी विजय का स्वप्न लेखन में देखता है ।संभवतः इसी स्वप्न में लेखन की सार्थकता और सामाजिकता छिपी होती है । दुष्टता की ललक के बीच शब्द ही आसरा देने आते हैं । कला और कला -अभ्यास अलग-अलग चीजें हैं । जो व्यक्ति एक जैसी सैकड़ो मूर्तियाँ बना लेता है वह कला का अभ्यास है लेकिन मेरे लिए हर कहानी एक बड़ी चुनौती की तरह सामने होती है । हर बार उसके लिए पहली रचना की तरह ही श्रम करना पड़ता है । मेरे जीवन का लंबा हिस्सा आदिवासियों के बीच घने जंगलों में बीता है इसलिए मेरे भीतर भी आदिवासियों की तरह एक जंगली संकोच मौजूद है , जो शहरी संपर्क में दाखिल होने पर प्रकट होता है ।”

भालचंद्र जोशी के कृतित्व पर बोलते हुए सुप्रसिद्ध कथाकार रूपा सिंह ने कहा – “भालचन्द्र जोशी एकमात्र ऐसे कहानीकार हैं जिनकी कहानियाँ गंभीर और गहरे सरोकारों से जुड़ी हैं । वे हिंदी के संभवतः पहले ऐसे कहानीकार हैं , जिनकी कहानियों में छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के आदिवासियों के जीवन के अभाव , दुख और संघर्ष इतने गहरे यथार्थ और मानवीय मार्मिकता के साथ आए हैं ।” सुप्रसिद्ध कथाकार शिवमूर्ति ने कहा कि कथाक्रम सम्मान के लिए बहुत तठस्थता से चुनाव होता है । और संबंधित लेखक की रचनात्मकता को गंभीरता से देखा परख जाता है । और निर्णय लिया जाता है । इस बार भालचन्द्र जोशी के चयन पर सब लोग एक मत से सहमत थे और इस बात की हम सब लोगों को प्रसन्नता है । कार्यक्रम के संयोजक तथा कथाक्रम पत्रिका के संपादक शैलेंद्र सागर ने अपने वक्तव्य में कहा कि लिट फेस्ट जैसे चकाचौंध वाले कार्यक्रमों की तुलना में सादे ढंग से आयोजित इस सम्मान समारोह को लेखक और पाठकों का भरपूर प्यार मिला है । चकाचौंध की होड़ में हम नहीं हैं । कथाक्रम सम्मान का यह तैंतीसवाँ वर्ष है और भालचन्द्र जोशी को यह सम्मान देते हुए हम सब लोगों को बेहद प्रसन्नता है । कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे सुप्रसिद्ध आलोचक वीरेंद्र यादव ने कहा कि – भालचंद्र जोशी ने ग्रामीण जीवन और सांप्रदायिकता जैसे विषयों को लेकर बहुत गंभीरता से लिखा है । उनकी ‘रिहाई’ कहानी और ‘जस का फूल’ जैसा उपन्यास सांप्रदायिकता के विषयों को बहुत गंभीरता से प्रस्तुत करता है । उन्होंने इसी संदर्भ में प्रेमचंद का स्मरण किया और कहा कि वैसे ही दायित्व बोध भालचंद्र जोशी की कहानियों में मौजूद है । और इनकी रचनाएँ गंभीर सरोकारों से जुड़ी हैं । सत्र का संचालन इरा श्रीवास्तव ने किया ।

प्रतिवर्ष की तरह इस वर्ष भी ‘आनंद सागर स्मृति सम्मान’ के अवसर पर ‘हिन्दी साहित्य और जनपदीय भाषाएँ ‘ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया । इस सत्र में प्रो. राजकुमार ने साहित्य और जनपदीय भाषाओं के अंतर्संबंधों पर बात की । लोक बाबू ने छत्तीसगढ़ की बोलियों के नष्ट होने के खतरे की ओर संकेत किया । अवधेश मिश्र ने जनपदीय भाषाओं की आंतरिक संरचना पर बात रखी । ईश्वर सिंह दोस्त ने कहा कि यह सिर्फ अकादमी चिंता की बात नहीं है। इसके अतिरिक्त जगदीश्वर चतुर्वेदी ,कालीचरण सनेही , प्रो. रामबहादुर मिश्र , सुश्री सुजाता , परमेश्वर वैष्णव , प्रकाश उदय ने भी इस विषय पर वक्तव्य दिए ।

सत्र संचालन प्रो. श्रुति तथा नलिन रंजन सिंह द्वारा किया गया |

और संपूर्ण कार्यक्रम के अंत में वीरेंद्र सारंग ने लेखन और श्रोताओं का आभार व्यक्त किया ।

0
No comments on ‘कथाक्रम’ का 33 वां ‘आनंद सागर स्मृति सम्मान’ लेखक श्री भालचंद्र जोशी को
No comments on ‘कथाक्रम’ का 33 वां ‘आनंद सागर स्मृति सम्मान’ लेखक श्री भालचंद्र जोशी को

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

नीले गुलाब का रहस्य :डॉ सुनीता मंजू

वनमाली कथा के अगस्त2025 अंक में युवा कथाकार वैशाली थापा की कहानी “नीले गुलाब का संगीत” की समीक्षा

वनमाली कथा के अगस्त2025 अंक में युवा कथाकार वैशाली थापा की कहानी “नीले गुलाब का संगीत” पढ़ी। ऐसा लगा ताजी हवा का खुशबूदार झोंका चेहरे को छूकर निकल गया। एक प्रतिभाशाली, संगीत प्रेमी लड़की ऐसी ही कल्पना कर सकती है। कहानी का नायक बहुत रसूखदार घराने का दिखाया गया है। वह अपने अमीर और पाई-पाई जोड़ने वाले परिवार से ऊबा हुआ है। प्रकृति, संगीत, कलाएं, उसे आकर्षित करते हैं। मात्र 10 वर्ष की उम्र में “मोगरे के फूल” पर लिखी कविता इसे प्रमाणित करती है। परिवार की समृद्धि और हिसाब किताब का एक नमूना देखिए। “मेरे लिखे को बड़े संदेह से देखकर, उन हवेली वालो ने, मेरे ही सामने नष्ट कर दिया। सफाई में कहा गया कि मैं स्टेशनरी खराब कर रहा हूँ। उन कागजों और स्याही से कई सारी दी गई उधारी का हिसाब हो सकता था।”01 एक ऐसे नीरस परिवार को छोड़कर, नायक एक नए शहर के गुमनाम मोहल्ले में किराए पर रहने लगा। वह कहता है “मैं इस शहर आया था, सिर्फ उस एक ही लय में बजने वाली जंजीरों से बचने के लिए, जो इंसान को कुछ नया नहीं करने देती।”02 यह नया करना ही मनुष्य के मनुष्य होने की पहचान है। संवेदनशील और भावुक नायक को अपनी पसंद के गीत, सामने की बालकनी से बजते हुए सुनाई देते हैं। आश्चर्य है कि, सामने की बालकनी में रहता शख्स उसकी पसंद कैसे जानता है। जबकि उसकी मित्र मंडली में, उसकी पसंद के गीत, किसी को पसंद नहीं। “मेरे सारे दोस्त मेरे पसंद के गानों से खींझते थे। वह लोग वही सुनते थे, जिससे मेरा सिर दर्द करता था। वह मुझे संगीत की पसंद के मामले में एक वृद्ध व्यक्ति समझते थे।”03 नायक की यह पसंद उसकी माँ की देन है। उसकी माँ को मेहंदी हसन की गजलें, रजिया सुल्तान के गीत, पसंद थे। वह टेप रिकॉर्डर पर सुनती थी। परंतु दकियानूस परिवार ने उससे टेप रिकॉर्डर छीन लिया। संभवत जेनेटिक प्रभाव के कारण नायक को यह गजलें पसंद हैं। परंतु वह सामने की बालकनी वाले को कैसे पता?? यह रहस्य है।

 कुछ दिनों बाद नायक उस गीत बजाने वाले को देख पाता है। वह एक बेहद खूबसूरत लड़की है। हमेशा चुपचाप रहती है। उसकी बालकनी का नीला गुलाब एक रहस्य है। नायक ने सफेद, गुलाबी, लाल रंग के गुलाब देखे थे, परंतु नीला गुलाब कभी नहीं देखा था। मकान मालिक की डरावनी शक्ल और घूरती लाल आँखों के बावजूद, नायक उस लड़की से पहचान बढ़ाता है। दोनों की पसंद एक जैसी, विचार एक जैसे हैं। दोनों में दोस्ती होती है।साथ घूमना, खाना पीना, शॉपिंग करना, शुरू होता है। नायक के लिए सबसे महत्वपूर्ण और अजीब बात थी- “बातें जो पल प्रतिपल प्यार को पोषित कर रही थीं। बातें जिनकी देह नहीं थी, और देह नहीं थी, तो वासना नहीं थी। मैंने पहले कभी किसी लड़की से इतनी सारी बातें नहीं की। पहले लड़कियों से जब मिलता था, पहले उनकी देह दिखती, फिर सुंदरता, और फिर कुछ छोटी-मोटी बातें। यहाँ सब उलट था। पहले बातें थी, विचार थे, फिर खूबसूरती थी, फिर चुप्पी थी। देह का फिलहाल कहीं कोई निशान नजर नहीं आता था।”04 तो यह इस कहानी की सबसे महत्वपूर्ण बात है। स्त्री देह के अलावा भी बहुत कुछ है। उसके विचार, उसके गुण, उसकी पसंद-नापसंद। वह एक मोम की गुड़िया नहीं है, जो जरा सी आँच से पिघल जाए। परंतु पितृसत्तात्मक पुरुष वर्ग, स्त्री की केवल सुंदरता देखता है। रंग-रूप देखता है। कहानी के अन्य पात्र- मकान मालिक, नायक/नायिका के मित्र नंदू, राघव, नायक के पिता, इसी पुरुष वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। नंदू को अपने पिता और दूसरी महिला दोनों पर भरोसा नहीं। राघव अपने से बड़ी उम्र की लड़की से प्रेम करता है, परंतु वह प्रेम वासना रहित नहीं है। नायक के पिता को, उसकी माँ का टेप रिकॉर्डर पर गीत सुनना पसंद नहीं है। वह उसके गीत सुनने पर पाबंदी लगा देते हैं। कहानी में एक संवाद है- “ऊपर वाला औरतो को इतने दुख क्यों देता है?

 मैंने सिर्फ दूसरे प्रश्न का उत्तर दिया – क्योंकि शायद जिसने यह दुनिया बनाई, वह भी मर्द ही था।”05

कहानी चरम पर आती है। अब नायक की बजाय, नायिका के दृष्टिकोण से कही जाती है। एक लड़की अपने लिए कैसा प्रेमी चाहती है? ऐसा जो उसे पूरी तरह समझे। उसकी भावनाओं की कदर करे। उसके विचारों का सम्मान करे। ऐसा लड़का वास्तविक दुनिया में मिलना मुश्किल है। नायक का यह संवाद बहुत महत्वपूर्ण है- “उसकी पुकार सुनते हुए मुझे लगा, वह और कोई नहीं था। उस पार मैं ही था। मैं ही वहाँ सारे गीत सुन रहा था। मैं ही था, जो मैं को बुला रहा था।”06 अंत में नायिका/नायक के मित्र राघव और नंदू उसकी मदद करते हैं। कल्पना और वास्तविकता में अंतर समझाते हैं। यहीं नीले गुलाब का रहस्य भी खुलता है। परंतु एक और रहस्य पाठकों के मन में रह जाता है। “अगली सुबह मैं उस घर में गयी। सीढ़ियों से होते हुए, उसके कमरे तक। मैंने दरवाजा खोला। होश फाख़्ता हुए। कमरे के दृश्य ने आत्मा को आतंकित किया। पैरों के नीचे की जमीन, बर्फ़ की तरह चटक गयी। वह कमरा रंगा हुआ था, पूरा रंगा हुआ।”07 

कथानक बिल्कुल कसा हुआ है। कहीं व्यर्थ के प्रसंग नही हैं। रोचकता अंत तक बनी रहती है। रहस्य ऐसे, कि एक बैठक में कहानी पूरी किए बिना, आप कहीं हिल भी नहीं सकते। शिल्प भी एकदम नया है। ‘वैशाली थापा’ ने सिद्ध किया है, कि नयी पीढ़ी कहानी के नए शिल्प और नए तेवर लेकर आई है। गीता श्री के शब्दों में “कथा की नई पीढ़ी आ चुकी है। लैंड कर चुकी है। कथा की जमीन पर नया तेवर, नया कंटेंट, नया शिल्प भी। सब कुछ अलग पहले से।”08 हालाँकि यह टिप्पणी, वनमाली कथा के एक अन्य युवा विशेषांक पर है, परंतु “वैशाली थापा” की कहानी “नीले गुलाब का संगीत” पर भी पूरी तरह फिट होती है।  

संदर्भ सूची

1.वनमाली कथा, अगस्त 2025 पृष्ठ संख्या 97

2.वही पृष्ठ संख्या 96

3.वही पृष्ठ संख्या 97

4.वही पृष्ठ संख्या 104

5.वही पृष्ठ संख्या 97

6.वही पृष्ठ संख्या 102

7.वही पृष्ठ संख्या 107

8.वही पृष्ठ संख्या 13

डॉ० सुनीता मंजू 

सहायक प्रोफेसर 

हिंदी विभाग 

राजा सिंह महाविद्यालय 

सीवान

बिहार 

सभी चित्र गूगल से साभार

One response to “नीले गुलाब का रहस्य :डॉ सुनीता मंजू”

  1. रक्षा गीता Avatar
    रक्षा गीता

    बहुत बढ़िया
    बधाई

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

समाज, संस्कृति और पितृसत्ता से ‘जूली’ का संघर्ष

जूली’ फ़िल्म के पचास वर्ष

हिंदी सिनेमा की प्रेम कहानियाँ अमूमन एक सीधी-सरल रेखा की तरह विवाह की परिणति तक पहुँचती हैं। अमीरी-गरीबी की आड़ में हिंदी सिनेमा का प्रेम जाति-धर्म की चुनौतियों को नज़रंदाज़ कर देता है । हिंदी सिनेमा की तुलना में दक्षिण भारतीय सिनेमा विशेषकर मलयालम सिनेमा हमेशा प्रगतिशील रहा है । ‘जूली’ मलयालम फिल्म ‘चट्ट्कारी’ का ही हिंदी रीमेक थी जिसके निर्देशक थे के.एस. सेथूमाधवन । 1975 का वर्ष हिंदी सिनेमा के लिए शानदार और ऐतिहासिक रहा । दर्शक जहाँ एक ओर ‘शोले’ में हिंसा का चरम रूप देख अचंभित-रोमांचित थे तो दूसरी ओर ‘जय संतोषी माता’ का धार्मिक उन्माद उन्हें थियटर तक खींच कर ला रहा था । हिन्दी सिनेमा की रोमांटिक-ट्रेजेडी-कॉमेडी प्रेम कहानियों के बीच एक एंग्लो इंडियन लड़की जूली  महत्वपूर्ण मोड़ लेकर आती है । सतही तौर पर एक प्रेमकथा और पारिवारिक संघर्ष को दिखाती ‘जूली’ में धर्म, संस्कृति और सामाजिक रूढ़ियों का टकराव स्पष्ट दिखाई देता है। पतिता, धर्मपुत्र , एक फूल दो माली, हमराज , दाग़ जैसी फ़िल्में उदाहरण हैं जिसमे नायिका को विवाह पूर्व गर्भवती होने के कारण संघर्ष करना पड़ा । विवाह पूर्व बार गर्भवती होने पर ‘जूली’ आत्महत्या नहीं करती बल्कि बच्चा होने के बाद भी उसे पालने का निश्चय करती है लेकिन माँ की धमकी के आगे विवश हो जाती है । ‘जूली’ का संघर्ष इसके अलावा सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक भेदभाव का भी है । एक एंग्लो इंडियन परिवार जिनका रहन-सहन, खान-पान आज भी भारतीय परिवेश के अनुरूप नहीं हो पाया । ‘जूली’ की माँ (नादिरा) के किरदार में विस्थापित प्रवासी का दर्द भी झलकता है जो भारत को अपना मुल्क नहीं मानती । जूली के पिता की विदेशी गाड़ी का बीच रास्ते में रुक जान एस बात को रेखांकित करता है कि उनका जीवन यहाँ ठहर-सा गया है ।   जबकि ‘जूली’ को उसकी सहेली उषा का हिन्दू-परिवार अपने परिवार से आकर्षित करता है ।

सत्तर का दशक जबकि मध्यमवर्गीय परिवारों के भीतर आधुनिकता और परंपरा के टकराव गहरे स्तर पर सामने आ रहे थे। शिक्षित युवाओं को पाश्चात्य संस्कृति लुभा रही थी । ‘जूली’ फिल्म  इन्हीं सामाजिक और सांस्कृतिक टकरावों का एक मार्मिक चित्रण है।इसलिए फ़िल्म सिर्फ  प्रेमकथा नहीं , बल्कि उस दौर के भारतीय समाज में स्त्री की स्थिति, धर्म और विवाह की राजनीति, और परिवार की रूढ़ियों के बीच प्रगतिशील दृष्टिकोण की खोज का आख्यान है। हिंदी सिनेमा के इतिहास में ‘जूली’ एक साहसिक प्रयोग के रूप में भी याद की जाती है। ईसाई युवती ‘जूली’ है, जो एक हिंदू युवक से प्रेम करती है और विवाह-पूर्व गर्भवती हो जाती है। यहाँ ‘स्त्री और नैतिकता’ के प्रश्न फ़िल्म में स्पष्ट होता है कि विवाह-पूर्व गर्भधारण के लिए केवल लड़की को दोषी माना जाता है। उषा अपनी माँ को कहती है ‘जूली ने शशि को खराब नहीं किया बल्कि शैतान तो ये आपका बेटा है जिसने जूली को शादी से पहले माँ बना दिया जो अब माँ-बाप दोनों के होते अनाथालय में पल रहा है’। उषा जो जूली और शशि के रिश्ते की गवाह है वह स्त्रियों के बीच भावनात्मक सह-अस्तित्व का प्रतीक भी बन जाती है ।

अन्य पक्ष यहाँ यह भी है कि  जूली की स्थिति सिर्फ “लड़की” होने से कठिन नहीं है, बल्कि एक एंग्लो इंडियन  समुदाय से होने सके कारण उसका संघर्ष और जटिल हो जाता है। उसके साथ होने वाले इस भेदभाव को उषा प्रखरता से उजागर करती है, तब उसका पिता भी साथ देता है उसका सहानुभूतिपूर्वक व्यवहार प्रगतिशील भी है और यहाँ हम ‘सिस्टरहुड’ की खूबसूरत झलक देखते हैं । ‘जूली’ का उन हज़ारों स्त्रियों का प्रतिनिधित्व करती है जिन्हें अपनी भावनाओं और इच्छाओं पर नियन्त्रण करने के लिए बाध्य किया जाता है। फ़िल्म स्त्री की देह पर नियंत्रण की प्रवृत्ति की गहरी पड़ताल करती है। जूली का दयनीय मातृत्व हमें विचलित करता है जब उसे अपने बच्चे को दूध तक पिलाने नहीं दिया जाता।  जूली की माँ हिंदू लड़के से विवाह करने के बजाय उसके बच्चे को अनाथालय भेजने को तैयार हो जाती है। दूसरी ओर, लड़के की माँ केवल इस वजह से लड़की और बच्चे को अस्वीकार करती है क्योंकि वे ईसाई समुदाय से हैं। यह अंतर्द्वंद्व दर्शाता है कि भारतीय समाज में धर्म और जातीय पहचान प्रेम और मानवीय रिश्तों पर हावी रहती है। लेकिन उत्पल दत्त का प्रगतिशील चरित्र नादिरा को चुनौती देता है- ‘जाओ उस बच्चे को गोद में उठाओ और बताओ कि उसकी जात या धर्म क्या है ?  वह सामाजिक बंधनों से ऊपर उठकर मानवीयता की बात करता है। वह धर्म या जाति की दीवारों को नहीं मानता और जूली को बहू के रूप में स्वीकार करने को तैयार रहता है। उनका यह दृष्टिकोण भारतीय सिनेमा में प्रगतिशील सोच का प्रतीक है। मानवीयता के सन्दर्भ में इसी तरह ‘धूल का फूल’ का गीत ‘तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा इन्सान की औलाद है इंसान बनेगा’ उल्लेखनीय है।

फ़िल्म में नायक विवाह करने को तैयार भी है, किंतु परिवारों की संकीर्ण सोच विशेषकर दोनों की माएँ इस रिश्ते को अस्वीकार कर देती है। जो इस तथ्य को भी उजागर करता है कि पितृसत्ता हो या धार्मिक रुढ़ियाँ स्त्रियाँ उनकी सबसे बड़ी पोषक और संवाहक हैं। जबकि जूली का पिता अपने परिवार विशेषकर जूली से बहुत प्रेम करता है लेकिन उसे हर वक्त नशे में दिखाया गया है जो ट्रेन भी शराब पीकर चलाता है। जूली की यथास्थिति से वह अवगत नहीं और समय से पहले ही मर जाता है । फ़िल्म में जूली, मैगी और उषा तीनों स्त्रियाँ पितृसत्ता से अलग-अलग स्तर पर टकराती हैं जूली का किरदार मातृत्व प्रेम के संघर्ष के साथ विद्रोही बनता है जबकि उसकी माँ मैगी परंपरागत मातृत्व और सामाजिक दबाव का प्रतिनिधित्व करती है लेकिन बेटी की पीड़ा उसे बदलने को विवश करती है। उसकी सहेली उषा नई पीढ़ी की प्रगतिशील आवाज़ है, जो सहानुभूति और दोस्ती से बदलाव का संकेत देती है।

इस स्तर पर फ़िल्म केवल एक निजी प्रेमकथा नहीं रह जाती, बल्कि प्रेम और विवाह,समाज संस्कृति और  धर्म के बीच देह पर स्त्री के अधिकार पर भी गंभीर प्रश्न उठाती है। फ़िल्म अपने समय के समाज की मानसिकता, धार्मिक पूर्वाग्रहों और सांस्कृतिक संक्रमणों को भी दर्शाती है। फ़िल्म में हिन्दू और गैर-हिन्दू (एंग्लो इंडियन) पात्रों का चित्रण विशेष ध्यान देने योग्य है। हिन्दू परिवार को जहाँ उदार, सहिष्णु और प्रगतिशील बताया गया है, वहीं ईसाई परिवार को संकीर्ण मानसिकता और शराब-प्रेमी से जोड़ा गया है। हालाँकि ईसाई परिवार को शराबी और असंयमी दिखाना एकमात्र सच्चाई नहीं है । अकेले घर में नायक शशि भी नायिका जूली को शराब पीने पर विवश करता है यह कहकर कि ‘क्यों तुम तो पीती होंगी न अपने घर में’ जो वास्तव में शोचनीय है । इस दृष्टि से यह फ़िल्म एंग्लो इंडियन परिवारों के प्रति नकारात्मक छवि को उभारती है। मिश्रा जी नामक किरदार नादिरा और जूली दोनों को मात्र इसाई होने के कारण आसान उपलब्ध वस्तु मान लेता है । बाद में जूली मिश्रा का विरोध करती है कि- ‘अगर कल को कोई तुम्हारी बेटी को कोई 300 रुपये में खरीदना चाहे तो तुमको कैसा लगेगा’ इसी तरह जूली एक दूकानदार को भी थप्पड़ मार देती है जब वह उसके साथ छेड़छाड़ करता है । वह अपनी माँ से शिकायत करती है कि ‘आप नहीं जानती कि वो हमें किस कीमत पर उधार दे रहा है।’  फ़िल्म सामाजिक यथार्थ के साथ ही सांस्कृतिक पूर्वाग्रहों को भी दिखाती है। एक दृश्य में जूली उषा के पिता से कहती है ‘आपके घर से कितनी अच्छी सुगंध आती है जबकी हमारे घर से अंडे मांस मछली शराब की और एक बदबू वो जो इन सबसे मिलकर बनी है।’  

गीतों की बात करें तो ‘ऊँची ऊँची दीवारों सी इस दुनियां की रस्में’ जैसा गीत समाज की कठोरता और प्रेम की तरलता के बीच संवाद स्थापित करती है। राजेश रोशन का संगीत फिल्म की आत्मा है। हिंदी सिनेमा में पहली बार कोई गीत पूरा अंगेजी में है ‘माय हार्ट इस बीटिंग’ एक अनूठा सफल प्रयोग रहा जिसका आज भी रिकॉर्ड नहीं टूट पाया यद्यपि प्रीति सागर को इसके लिए फिल्फेयर पुरस्कार नहीं मिल पाया । यह गीत एंग्लो इण्डियन  संस्कृति के सम्मिश्रण और परिवार की जीवन्तता को सामने लाता है। गीत का फीमेल गेज़ जो जूली की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करता है आज भी प्रासंगिक है । फिल्म के लिए लक्ष्मी को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का व नादिरा को सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का पुरस्कार मिला ।  विक्रम मकंदार, नादिरा, रीता भादुरी, ओमप्रकाश, बाल कलाकार श्रीदेवी और उत्पल दत्त जैसे कलाकारों के प्रभावी अभिनय से सजी यह फ़िल्म जूली अपने समय से आगे जाकर समाज में स्त्री के संघर्ष और संभावनाओं की कहानी कहती है। समाज, संस्कृति, धर्म, विवाह, प्रेम, प्रगतिशीलता और स्त्री भावों की मार्मिक अभिव्यंजना का समावेश है ‘जूली’। विवाह, धर्म और नैतिकता के प्रश्नों पर समाज अब भी गहरी रूढ़ियों से बँधा हुआ था। इस मायने में आज भी यह फ़िल्म प्रासंगिक है। हम जानते हैं कि भारतीय समाज अभी भी अंतर्धार्मिक विवाह, स्त्री की स्वायत्तता और नैतिकता के सवालों से जूझ रहा है।  

सभी चित्र गूगल से साभार

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

नीतीश के राज में महिलाओं का सशक्तिकरण या आंकड़ों का भ्रम?

पलायन, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और अपराध के आंकड़ों पर नजर

नीतीश कुमार ने 2005 में सत्ता संभालने के साथ ही महिलाओं को केंद्र में रखकर राजनीति की नई पटकथा लिखी। पंचायत चुनावों में 50% आरक्षण, साइकिल योजना, पोशाक योजना और महिला स्वयं सहायता समूहों की शुरुआत करके एक बड़ी लकीर खींचने की कोशिश की। दसवीं, बारहवीं और ग्रेजुएशन पास करने पर प्रोत्साहन राशि का भी ऐलान किया। शराबबंदी का फैसला भी उन्होंने महिलाओं की मांग पर किया, जबकि इससे राज्य को राजस्व के रूप में भारी आर्थिक नुकसान होता रहा है। इसी साल जुलाई में मूल निवासी महिलाओं के लिए सरकारी नौकरियों में 35% आरक्षण को भी मंजूर किया गया है। जीविका दीदी योजना, दहेज़ के विरोध में विश्व की सबसे लम्बी मानव श्रृंखला और अब तक 1.21 करोड़ महिलाओं के खाते में रोजगार शुरू करने के लिए 10 हजार की रकम ट्रांसफर की जा चुकी है। लेकिन 2025 विधानसभा चुनाव से ठीक पहले लॉन्च हुई योजनाएं महिला सशक्तिकरण से ज्यादा चुनावी रणनीति होने की इसकी पुष्टि करते हैं।


नीतीश कुमार की योजनाओं की वाहवाही से अलग जमीनी पड़ताल कुछ और भी बयां करती है। मसलन, 2021 के पंचायत चुनाव के आकड़ों के आधार पर मौजूदा समय में बिहार में लगभग 1.10 लाख महिलाएं निर्वाचित हुईं है जो कुल प्रतिनिधियों का 55.35% है यानी 50 प्रतिशत के आरक्षण सीमा से भी ज्यादा। लेकिन सरपंच पति सिंड्रोम’ इसका दूसरा पक्ष और अलग चुनौती है। एक रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीण क्षेत्रों में केवल 25% महिला सरपंच स्वतंत्र निर्णय लेती हैं। इससे स्पष्ट है कि निर्णय-क्षमता अभी भी पुरुष-प्रधान ढांचे में सीमित है।

बिहार में 2025, SIR के तहत जारी अंतिम मतदाता सूची में कुल 7.43 करोड़ मतदाता हैं जिनमें 48% यानी कुल 3.72 करोड़ महिलाएं हैं, यह संख्या पुरुषों (3.92 करोड़) से थोड़ा कम हैं, लेकिन पिछले वर्षों की तुलना में 15 लाख की वृद्धि हुई है। बिहार की महिलायें पुरुषों के मुकाबले ज्यादा वोट करती हैं, 2010 के चुनाव में 51.12% पुरुषों ने वोट किया था तो महिलाओं का वोट प्रतिशत 54.49 % था। 2015 के चुनाव में 53.32% पुरुष और 60.48% महिलाओं ने वोट किया था, 2020 विधानसभा चुनाव में 54.45 % पुरुषों के मुकाबले 59.69 % महिलाओं ने वोट किया, यानी पिछले 3 चुनावों में हर बार महिलाओं ने ज्यादा वोट किया है। बल्कि उत्तरी बिहार के 167 में से अधिकांश निर्वाचन क्षेत्रों में महिलाओं ने पुरुषों से अधिक वोट डाले। यह ट्रेंड 2015 से जारी है, जहां महिलाओं ने 202 निर्वाचन क्षेत्रों में अधिक भागीदारी दिखाई।


कुल मिलाकर आंकड़े यह बताने के लिए काफी हैं कि बतौर मतदाता महिलायें क्यों महत्वपूर्ण हैं। लेकिन, इन आंकड़ों के पीछे ये सवाल भी हैं कि क्या सिर्फ भागीदारी का बढ़ना सशक्तिकरण है? बिहार की महिलाओं की राजनीति में भागीदारी कितनी है, प्रतिनिधित्व और नेतृत्व के पदों पर कितनी है? कैबिनेट में कितनी है और प्रशासन में कितनी है ?
हकीकत ये है कि मौजूदा 243 सदस्यीय विधानसभा में साल 2020 के चुनाव के आंकड़ों के मुताबिक 24 महिलाएं हैं यानी मात्र 10% जबकि राष्ट्रीय औसत 14% है। और हर चुनाव के साथ हिस्सेदारी घटते क्रम में है मसलन 2005 में 37 महिलाएं थीं जो 15% था, 2010 में 27 यानी 11% फीसदी, और 2020 में 24 (10%) रह गई। ADR के विश्लेषण के अनुसार, महिलाओं की जीत का प्रतिशत लगातार कम हो रहा है, जबकि वे मतदान करने में आगे हैं।
बिहार कैबिनेट में महिलाओं की संख्या सीमित है। वर्तमान नीतीश कुमार सरकार (NDA) में कुल 31 मंत्रियों में 3 महिलाएं हैं ( केंद्रीय कैबिनेट राष्ट्रीय औसत 11% से कम लगभग 10%)। ये हैं, रेनू देवी,लेशी सिंह, शीला मंडल। 2022 के कैबिनेट विस्तार के बाद भी मंत्रिपद पर 3 महिलाओं को ही रखा गया।और वित्त या गृह जैसे प्रमुख विभाग उन्हें नहीं दिए जाते।

हालाँकि 2020 में JDUने कुल 115 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, इनमें से 22 महिलाओं को टिकट दिया गया था। यानि महिला उम्मीदवारों का प्रतिशत लगभग 19.13% था, जो JDU का उच्चतम स्कोर कहा जा सकता है और नीतीश कुमार की महिलाओं के प्रति प्रतिबद्ध नीति को दर्शाता है, लेकिन राज्य स्तर पर कुल उम्मीदवारों में महिलाओं की संख्या केवल 3% थी। राजनीति में महिलाओं की भागीदारी के सन्दर्भ में इसका जिक्र उल्लेखनीय है और समग्रता में पिछले 20 साल में बिहार में महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण की असली तस्वीर रखता है।


इसी तरह बिहार कैडर में महिलाओं का प्रतिनिधित्व कम है। राज्यवार भर्ती में बिहार से 16% महिला IAS अधिकारी आती हैं, राष्ट्रीय औसत 30% है। कुल बिहार कैडर लगभग 350 IAS में महिलाओं की संख्या 50-60 यानि 15-17% अनुमानित है। वर्तमान जिलाधिकारियों (DM) में केवल 8% महिलाएं हैं (38 जिलों में 3-4 महिलाएं)। अंडमान-निकोबार, जम्मू-कश्मीर, दादरा नगर हवेली को छोड़ दें तो विधायिका से लेकर उच्च प्रबंधकीय पदों तक बिहार की महिलाएं ही सबसे कम संख्या में केवल 7.8 % तक ही पहुंच रहीं है, जबकि राष्ट्रीय औसत 22.2% का है। हाँ पुलिस बल में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 29 % तक है, जो राष्ट्रीय औसत से काफी ऊपर है।

2006 में जीविका योजना, ग्रामीण महिलाओं के SHG के माध्यम से आर्थिक सशक्तिकरण के लिए शुरू हुई। इसके तहत 11 लाख SHG बने और 1.40 करोड़ महिलाएं जुड़ीं; 2025 तक के आंकड़े के मुताबिक इसके मार्फ़त अब तक ₹12,200 करोड़ बैंक लोन दिया गया लेकिन रिकवरी का आंकड़ा ₹5,000 ही करोड़ है और 10 लाख SHG का लक्ष्य ही हासिल हुआ है। इण्डिया टुडे की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक बिहार की 1.09 करोड़ महिलाओं ने माइक्रोफाइनेंस कंपनियों से औसतन 30 हजार रुपए का कर्ज ले रखा है। और पिछले डेढ़ साल में बीस से अधिक लोगों ने इस कर्ज के जाल में फंस कर खुदकुशी कर ली है। इस तस्वीर को CPIML से संबद्ध ऐपवा की महिला साथियों के द्वारा निर्मित डॉक्यूमेंटरी “क़र्ज़ फांस” भी सामने लाती है,मीडिया में प्रचलित नीतीश कुमार की महिला पक्षधर छवि से अलग जो बताती है कि गरीबी, माइक्रोफाइनेंस कंपनियों की लूट और कर्ज के जाल में फंसी बिहार की गरीब महिलाओं सरकार की बेरुख़ी के कारण कर्ज़ के दलदल में हैं, आत्महत्याएं कर रही हैं, उनका परिवार रातों रात अपना गांव -घर छोड़कर निकल जा रहा है।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5, 2021) बताता है कि बिहार में केवल 25% महिलाएं ही किसी प्रकार की निजी आय अर्जित करती हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत करीब 43% है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के आंकड़ों के मुताबिक महिलाओं के लिए बेरोजगारी के मामले में देश में पटना शीर्ष पर है।

बिहार आर्थिक सर्वे 2024–25 के अनुसार बिहार का क्रेडिट-डिपॉजिट (सीडी) अनुपात सिर्फ 47.6% है, जो पूरे देश में सबसे कम है। इसका मतलब यह है कि बिहार के बैंकों में जितना पैसा जमा होता है, उसका बहुत छोटा हिस्सा ही बिहार में ऋण के रूप में वापस आता है। बाकी पैसा दूसरे राज्यों में निवेश या उधार के रूप में चला जाता है और वहीं की अर्थव्यवस्था को मज़बूत करता है। बिहार में अंतरराज्यीय पलायन पूरे भारत की तुलना में पाँच गुना ज्यादा है, यानी यहाँ बुनियादी रोजगार के मौके भी नहीं हैं। बिहार में महिलाओं के लिए श्रम बल भागीदारी दर (LFPR) राष्ट्रीय औसत से काफी कम है, जिसका मतलब है कि बहुत कम महिलाएँ श्रम बल का हिस्सा हैं या नौकरी की तलाश कर रही हैं। 2022-23 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, बिहार में पुरुष एलएफपीआर 70.6% है जबकि महिला एलएफपीआर केवल 15.6 % और कुल एलएफपीआर 43.4%है, जो राष्ट्रीय औसत 56.0% से बहुत कम है। पुरुष और महिला भागीदारी दर के बीच का अंतर बहुत अधिक है, कामकाजी आबादी में महिलाओं का अनुपात बिहार में सबसे कम है।

बिहार में 15 से 29 आयु वर्ग के करीब एक तिहाई लोग शिक्षा, रोजगार या ट्रेनिंग से नहीं जुड़े हुए हैं। इस मामले में महिलाओं की स्थिति ज्यादा चिंताजनक है। इस आयु वर्ग की आधी से ज्यादा महिलाएं इनसे महरूम हैं। बिहार की वार्षिक बेरोजगारी दर 3.9% राष्ट्रीय औसत 3.2 %से थोड़ी अधिक है। नीतीश के शासनकाल में GSDP में औसतन 10% वृद्धि दर रही, लेकिन बेरोजगारी दर 12% (CMIE, 2024) तक जा पहुँची। दूसरी ओर एक हकीकत ये भी है कि बिहार स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड के तहत ₹4 लाख तक का लोन लेने वाले लगभग 55 हजार छात्र गायब हो गए हैं, जिस पर सरकार मुकदमा करने की योजना बना रही है। जबकि कितनी लड़कियां स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड के तहत लोन लेकर पढ़ाई करती हैं इसका कोई आंकड़ा ही उपलब्ध नहीं है। इण्डिया टुडे की ही रिपोर्ट के मुताबिक बिहार की लगभग 83 % महिलाएँ स्वरोजगार में हैं नियमित वेतनभोगी लगभग 4.8 % ही हैं। स्वरोजगार का सच आप सब जानते हैं, एशियन रिव्यु ऑफ़ सोशल साइंस के एक सर्वें में बिहार में ग्रामीण महिला-पुरुष आय असमानता 58 % है बिहार 27वें स्थान पर है हाँ शहरी महिला-पुरुष आय असमानता 11.53 प्रतिशत है और बिहार 10वें स्थान पर है। नीति आयोग के आंकड़ों के मुताबिक 2012-13 और 2021-22 के बीच बिहार का वास्तविक जीएसडीपी औसतन 5.0 प्रतिशत की दर से बढ़ा, लेकिन राष्ट्रीय औसत वृद्धि दर 5.6 प्रतिशत से कम ही रहा। यही नहीं पिछले तीन दशकों के दौरान, राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद में बिहार का हिस्सा 1990-91 में 3.6 प्रतिशत से घटकर 2021-22 में 2.8 प्रतिशत हो गया। 2021-22 में इसकी प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय प्रति व्यक्ति आय का केवल 30 प्रतिशत थी। अब समझा जा सकता कि बिहार से बड़े पैमाने पर पलायन क्यों हुआ है, 2011 की जनगणना के अनुसार लगभग 74.54 लाख लोग राज्य से बाहर हैं, जो राज्य-जनसंख्या का लगभग 7.2 % है।ग्रामीण बिहार में लगभग 18.8 % आबादी ‘माइग्रेंट’ है एवं इनमें 85.2 % पुरुष हैं।

कुछ और मानकों पर भी देखें तो 2023 में राष्ट्रीय प्रजनन दर जहाँ प्रति महिला 1.98 है वहीँ बिहार में प्रजनन दर 2.8 है यानी राष्ट्रीय औसत से अधिक। पूर्ण टीकाकरण वाले बच्चों की हिस्सेदारी, 71 प्रतिशत, भी 2019-21 के राष्ट्रीय औसत 93.5% से कम है। साक्षरता दर 61.8 प्रतिशत है, जो 2011 के राष्ट्रीय औसत 73 प्रतिशत से काफी कम है। लेकिन महिलाओं के मामले में प्रदर्शन और ख़राब है, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (2020-21) के आकड़ों के मुताबिक महिलाओं की राष्ट्रीय औसत साक्षरता दर लगभग 70.30% है जबकि बिहार की महिलाओं की 51.50% ही। 5 से 49 वर्ष की महिलाओं की साक्षरता दर राष्ट्रीय औसत से 21.4 प्रतिशत अंक कम है। राष्ट्रीय औसत 40.7 से काफी कम महज 27.8% ही महिलाएं आठवीं या दसवीं पास हैं। तकनीकी दक्षता के आधार पर रोजगार के मामले में भी बिहार की महिलाएं देश में सबसे पीछे हैं 100 में मात्र 32 महिलाओं को ही टेक्निकल काम मिल पाता है। बिहार में ग्रेजुएट या पोस्ट ग्रेजुएट की डिग्री रखने वाली मात्र 0.4% महिलाओं को ही काम मिल पा रहा है. यह देश में सबसे कम है, राष्ट्रीय औसत 2.4% का है। इसी तरह आर्थिक स्वतंत्रता के संदर्भ में महिला श्रम-भागीदारी में हिस्सेदारी भी बिहार में देश में सबसे कम है, देश का आंकड़ा 25 % – 27 % है और बिहार का 12 % – 15 %। महिलाओं की अनुमानित औसत वार्षिक आय देश स्तर पर जहाँ ₹ 1,03,000 है वहीँ बिहार की महिलाओं की ₹ 33,000 – ₹ 35,000 सालाना।

udiseplus.gov.in के आंकड़ों के मुताबिक बिहार में महिलाओं का GPI राष्ट्रीय से बेहतर (1.12 माध्यमिक पर) है, साइकिल योजना आदि से नामांकन बढ़ा। उच्च शिक्षा में महिलाओं का नामांकन 49.2% (UG/PG) पहुंचा। लेकिन माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट 25.6% (राष्ट्रीय 14.1%) है, ट्रांजिशन रेट 31.5% (राष्ट्रीय 75.1%)है। उच्च शिक्षा GER 14.9% (राष्ट्रीय 28.4%), ग्रामीण क्षेत्र, गरीबी और बाल विवाह के कारन 24.5% लड़कियां 7-18 वर्ष में ड्रॉपआउट से प्रभावित होती है। कुल नामांकन में 87 लाख की गिरावट (2023-24), बिहार में सबसे अधिक रहा है। NEP 2020 के तहत माध्यमिक स्कूलों की कमी का आंकड़ा बिहार में राष्ट्रीय 9.8% के मुकाबले 2% है।

लिंगानुपात की बात करें तो बिहार में 2022 में प्रति 1,000 लड़कों पर केवल 891 लड़कियों का जन्म हुआ था, जो पूरे देश में जन्म के समय का सबसे कम लिंगानुपात था। भारत के रजिस्ट्रार जनरल के कार्यालय की नागरिक पंजीकरण प्रणाली की रिपोर्ट के अनुसार, यह अनुपात 2020 में 964 था जो 2021 में घटकर 908 और 2022 में 891 हो गया है, यानी जन्म के समय लड़कियों की संख्या में पिछले तीन साल से लगातार गिरावट दर्ज की गई है। 2022 के नवीनतम आँकड़े में भी बिहार में प्रति 1,000 लड़कों पर 891 लड़कियों का लिंगानुपात है। राष्ट्रीय स्तर पर यह भारत के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में जन्म के समय का सबसे कम लिंगानुपात रहा है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार, 2010 से 2023 के बीच बिहार में महिला अपराधों में 40% की वृद्धि दर्ज की गई है। दहेज हत्या, घरेलू हिंसा और यौन अपराध अब भी गंभीर चुनौती बने हुए हैं। दहेज़ उत्पीड़न मामलों में बिहार उत्तर प्रदेश के बाद दूसरे स्थान पर है यूपी में इसकी संख्या 7151 है, बिहार में 3665 तक। और दहेज़ हत्या के मामले में भी एनसीआरबी रिपोर्ट कहती है कि साल 2023 में कुल 6156 महिलाओं की जान गई। इसमें उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा 2122 मौतें हुईं। बिहार दूसरे नंबर पर रहा, जहां 1143 मौतें दर्ज की गईं। और यूनिसेफ की 2019 की एक रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में 2.2 करोड़ लड़कियों की शादी 18 साल से पहले होती है और नाबालिग लड़कियों के विवाह के मामले में बिहार का स्थान उत्तर प्रदेश के बाद है। NCRB की रिपोर्ट के मुताबिक ही वर्ष 2023 में पटना में अपहरण दर सबसे अधिक 71.3 प्रतिशत रहा। हत्या और अपहरण के मामलों में उत्तर प्रदेश और बिहार टॉप पर रहे। हत्या के दर्ज मामलों में देशभर में सबसे अधिक हत्याएं उत्तर प्रदेश में हुई। जबिक दूसरे नंबर पर बिहार राज्य रहा। 2018-22 में महिला-विरुद्ध अपराध के लगभग 89,038 मामले दर्ज हुए जो सीधे16.3 % का इजाफा है। यानी नीतीश ने केवल “सुरक्षित समाज” का नारा दिया, आंकड़े बताते हैं कि सुरक्षा का अनुभव आम नागरिक तक नहीं पहुंच पाया।
बिहार के इस चुनावी माहौल में लगातार 2005 से पहले के जंगलराज की बात की जा रही है, और नितीश कुमार धराधर महिलाओं के लिए योजनाओं और पैसों की बरसात कर रहे हैं। जबकि तस्वीर का दूसरा पहलू कुछ और है, हाँ ये जरूर है कि उन्होंने महिलाओं के लिए जो अच्छा किया उसे ख़ारिज नहीं किया जा सकता। लेकिन ये भी सच है कि 2025 चुनाव में खुद उन्हें अपने काम या रिपोर्टकार्ड पर भरोसा नहीं है, आत्मविश्वास की कमी ने ही इस बार JDU – BJP की डबल इंजन सरकार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार को रेवड़ियों पर ला दिया। इसलिए 23 योजनाओं से महिला वोटरों को साधने की कोशिश की है। देखते हैं महिलाएं कितना आकर्षित होती हैं।
राजद समाचार से समाचार

 “स्पंदन सम्मान, 2025” फ़िल्म और रंगमंच में अभिनय के लिए विभा रानी को मिलेगा ‘ललित कला सम्मान’

अपनी ताज़ातरीन फिल्म “माँ” में पुरोहिता की भूमिका से चर्चित अभिनेत्री, रंगकर्मी तथा मैथिली और हिंदी की साहित्यकार, अनुवादक और नाट्य-लेखक विभा रानी को “स्पंदन ललित कला सम्मान, 2025” से सम्मानित किया जा रहा है। यह सम्मान उन्हें उनके नाटकों और फिल्मों में उत्कृष्ट अभिनय के लिए प्रदान किया जाएगा।

27 जून, 2025 को देशभर के थिएटरों में रिलीज़ देवगन फिल्म्स की काजोल स्टारर फिल्म “माँ” में विभा रानी की पुरोहिता की प्रभावशाली भूमिका ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशिष्ट पहचान दिलाई है। अब यह फ़िल्म नेटफ्लिक्स पर भी उपलब्ध है, जहाँ इसे देश-विदेश के दर्शक देख रहे हैं। अंग्रेज़ी सबटाइटल्स के कारण विदेशी दर्शकों तक भी यह फ़िल्म पहुँची है, और विभा रानी को प्रशंसा व सराहना के असंख्य संदेश मिल रहे हैं।

विभा रानी कहती हैं-“सच पूछिए तो फिल्मों में काम करना, और खासकर माँ  फिल्म में काजोल जैसी सुपरस्टार के साथ अभिनय करना, मेरे लिए बचपन के स्वप्न के साकार होने जैसा अनुभव रहा।”

विभा रानी की फ़िल्मी यात्रा वर्ष 2018 में नवदीप सिंह निर्देशित फिल्म “लाल कप्तान” से शुरू हुई, जिसमें उन्होंने ‘लाल परी’ का किरदार निभाया था। इसके बाद उन्होंने शमशेरा, अनवांटेड, ए ब्रोकन स्टोरी, सजनी शिंदे का वायरल वीडियो, मॉनसून फुटबॉल, भोर, वेब सीरीज़ महारानी 1, ताज 2, ताज़ा खबर (1 और 2), तथा धारावाहिक अवंतिका, एकलव्य, टिकुली आदि में यादगार भूमिकाएँ निभाईं।

इसके पहले उन्होंने ‘फिल्म्स डिविज़न’ के लिए भारतेंदु हरिश्चंद्र और जयशंकर प्रसाद पर दो फ़िल्में लिखीं।सीमा कपूर के मेगा सीरियल ‘अवंतिका’ के चालीस से अधिक एपिसोड्स के लिए संवाद लेखन किया। नितिन चंद्रा की राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फ़िल्म ‘मिथिला मखान’ के लिए दो गीत लिखे तथा कामाख्या नारायण सिंह की बहु-पुरस्कृत फ़िल्म ‘भोर’ में वोकल दिया। साथ ही ‘पाथेर पांचाली’ की मैथिली डबिंग में “बुआ” के किरदार की आवाज़ भी दी।

वर्तमान में वे नेटफ्लिक्स और अमेज़न प्राइम जैसी ओटीटी प्लेटफॉर्म्स की फिल्मों व वेब सीरीज़ के लिए भी डबिंग का कार्य कर रही हैं।

विभा रानी का मानना है कि-“लेखन, अनुवाद, नाट्यलेखन, सोलो मंचन, मोटिवेशनल स्पीकिंग और POSH Enabler के रूप में सक्रिय रहते हुए भी फिल्मों में अपनी पहचान बनाना संभव है, क्योंकि लेखन से लेकर अभिनय तक हर विधा एक-दूसरे की पूरक है।”

उनके अनुसार, फ़िल्म क्षेत्र में मिला यह “स्पंदन ललित कला सम्मान 2025” इस विश्वास को और सुदृढ़ करता है कि रचनात्मकता की कोई उम्र नहीं होती; रचनारत व्यक्ति न तो बूढ़ा होता है, न ही रिटायर।

भविष्य में विभा रानी के कई नए प्रोजेक्ट्स – फिल्में, सीरीज़ और धारावाहिक – आने वाले हैं। वे कहती हैं,

“आप सबका स्नेह और सहयोग ही मेरी सबसे बड़ी प्रेरणा है।”
विभा स्पष्ट करती हैं कि फिल्मों में सक्रियता का अर्थ यह नहीं कि उन्होंने साहित्य को अलविदा कह दिया है। उनके शब्दों में-“अभिनय, लेखन और प्रस्तुति – ये मेरे लिए हृदय, फेफड़े और मस्तिष्क की तरह हैं; इनके बिना अपने अस्तित्व की कल्पना भी नहीं कर सकती।”

खनकते स्वर में वे बताती हैं कि जब उर्मिला शिरीष जी का फोन उन्हें बधाई देने आया, तो उन्हें लगा कि यह बधाई उनके नाती अकीरा नूर के जन्म की खुशी में दी जा रही है, क्योंकि उस समय अकीरा उनकी गोद में था। विभा कहती हैं-“अकीरा के शरीर का स्पंदन मेरे शरीर के साथ मिल रहा था। उसी स्पंदन में उर्मिला जी के स्वर, स्नेह और उनके शब्द – ‘मुझे आपका काम हमेशा आकर्षित करता रहा है। आज इस सम्मान की घोषणा करते हुए मुझे बेहद खुशी हो रही है।’ मुझे और भी स्पंदित कर गए।”

विभा रानी बताती हैं कि स्पंदन संस्था की शुरुआत से ही वह उन्हें आकर्षित करती रही है “शायद इसलिए कि इसे उर्मिला जी जैसी जागरूक और संघर्षशील लेखिका ने प्रारंभकिया। मुझे लगता है कि स्त्रियों के हर रचनात्मक कार्य से उनकी सृजनात्मकताऔर भी ऊर्जस्वित होती है।” 

भोपाल से घोषित इस सम्मान को लेकर वे भावुक होकर कहती हैं-

“भोपाल मेरा प्रिय स्थल रहा है। यहाँ आना हमेशा अपने दूसरे घर आने जैसा लगता है। इस शहर की सजीव सांस्कृतिक हलचल और आत्मीय लोग हर बार मन को छू जाते हैं। मैंने यहाँ अपने एकल नाटक नौरंगी नटनी का मंचन भी किया है, बालेंदु सिंह ‘बालू’ के थिएटर फेस्टिवल में।”

लड़की और चाँद

बॉडी शेमिंग पर संदीप तोमर की कविता “लड़की और चाँद “बॉडी शेमिंग जबकि किसी व्यक्ति को उसके शरीर के आकार और बनावट के बारे में अपमानजनक ढंग से मज़ाक बनाया जाता है| विशेषकर लड़कियों के सन्दर्भ में जबकि  उन पर अच्छा दिखने का दबावहमेशारहता है और खरा न उतरने पर उन्हें भावनात्मक आघात हो सकते हैं उन्हें मानसिक रूप से कमजोर बनाता है| भाई-बहन,दोस्त,सहेलियों के साथ-साथ, माता-पिता भी इस व्यवहार में शामिल हो सकते हैं ।   

अब भी शरीर से बेडौल हो गयी लड़कियां

पहनती हैं ढीले और हल्के रंग के वस्त्र

अब भी वे चलती हैं नज़रें नीची करके
उनके कंधे भी झुके होते हैं नज़रों से भी कहीं अधिक

अब भी कोई हमउम्र नहीं देखता उनके लिए सपने
उनके हिस्से नहीं आया है प्रेमी का सुख

अब भी वे नहीं हंस पाती हैं खिलखिलाकर
दब जाती हैं उनकी हंसी उनके वजन के बोझ तले

अब भी उनकी सखी-सहेलियां देती हैं ताने
नहीं करती शामिल उनको अपनी हँसी ठिठोली में

बहुत कुछ बदला है इन सालों में
नहीं बदली है स्थूलकाय लड़कियों के लिए दुनिया

मनुष्य जरूर पहुंचा है चाँद और मंगल पर
लेकिन नहीं बदली उसकी सोच शरीर को लेकर।

चित्र गूगल से साभार

सन्दीप तोमर

साहित्यकार

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *