बदलाव की बयार : जद्दोजहद अभी बाकी है


 अमृता ठाकुर

( यह आलेख हरियाणा के सतरोल खाप के द्वारा , महिला विंग बनाने , अन्तरजातीय विवाहों को मान्यता देने आदि के फैसलों के बाद एक केस स्टडी है . इस आलेख में  पितृसत्ता के द्वारा अपनी हेजेमनी बनाए रखने के नए -नए तरीके अपनाने की पड़ताल है , लेकिन कोइ भी आधुनिक बदलाव दूरगामी असर भी लेकर आता है , उसके संकेत भी हैं इसमें . अमृता ने एक पत्रकार की दृष्टि  के साथ -साथ अकादमिक दृष्टि से भी इन फैसलों को पढ़ा है . यह आलेख स्त्री अध्ययन के विद्यार्थियों को भी पढ़ना चाहिए .  )


 विवाह क्या  है व्यक्तिगत मामला, सामाजिक मामला,  या पारिवारिक मामला.  हकीकत यह है कि विकसित समाज व्यक्तिगत आजादी को जितना महत्व देता है बंद समाज अपना वजूद खोने के डर से व्यक्तिगत आजादी पर उतने ही पहरे लगाता।  विवाह जैसी संस्था हमेशा से व्यक्तिगत आजादी और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच झूलती रही है। खासतौर पर उस समाज में जहां स्त्री  को दोयम दर्जा दिया  जाता है। स्त्री मात्र वंश आगे वढाने वाली मशीन होती है . जहां विवाह के ऊपर समाज का शिकंजा मजबूती से कसा होता है, उस शिकंजे पर थोडा सा भी प्रहार उस समाज को हिला देता और वह बौखला कर प्रहार करने वाले को नस्तेनाबूत करने का भरसक प्रयास करता है। समय -समय पर ऐसे ही बंद समाज के प्रतिनिधियो ने चुनौती देने वाले प्रेमियों को सामाजिक बहिष्कार से लेकर मृत्युदंड और सामूहिक बलात्कार जैसी सजाएं दी हैं। और वह अब उतनी ही मजबूती से अपनी इस परंपरा को थामे रखने का पक्षधर है। पर क्या  समय के साथ इनकी सोच में बदलाव आया  है। सतरोल खाप की अंतरजातीय विवाह की स्वीकृति और महिलाओं के लिए अलग विंग की घोषणा कुछ ऐसी ही खुशफहमी पैदा करती है।  यह बडी बात थी। कई और खुशफहमियाँ मन में जन्म लेने लगीं। लगा अब शायद प्रेमियों की लाशे पेडो पर लटकी हुई नहीं मिलेंगी। लडकी को प्रेम करने के जुर्म में बलात्कार नहीं झेलना पडेगा । अब ऊंची जाति की लडकी या  लडके से प्रेम करने के एवज में गांव के गांव नहीं जलाए जायेगे। खुशफहमियों का क्या  है ! बस वक्त और वजह खोजती रहती है, और हो जाती है । एक और खबर आई। औरतों ने सर से घूंघट का बोझ उतारा। हरियाणा के गांव की महिलाओं ने सर पर घूंघट न रखने का फैसला किया । महिला अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले मेरे मन को इस खबर ने भी सकून का एहसास करवाया । पर पता नहीं विश्वास नहीं हो रहा था कि जो समाज समय की ओर पीठ करके चल रहा है वह अचानक कदम मिला कर कैसे चलने लगा गया  क्या  यह बदलाव की बयार  है या बस मन का भ्रम ! यह  देखने हम सतरोल खाप में शामिल कुछ गांवों का जायजा लेने निकले-

.....  लंबा कुर्तानुमा ब्लाउज, खूब घेर वाला लहंगा। हाथ और पैर में मोटे मोटे चांदी के कडे। लंबी तगडी कद काठी। एक ने गोद में बच्चा भी लिया  हुआ था। बातचीत में इतनी मशगुल की आस पास का ख्याल  ही नहीं। बगल से गुजरती बुजुर्ग महिला ने उनमें से किसी एक महिला को टोका –‘गाय नै बाछडा दे दिया तेरी सासू ने कही थी......।‘  जवाब न मिलने पर मुंह बिचकाती बगल से गुजर गई। वो तीनों औरतें पैंतीस से चालीस के उम्र की थी। चलती हुईं बातचीत की उसी तारतम्यता को बनाए हुए तीनों औरतों ने अचानक चेहरे के सामने एक बित्ते का घूंघट खींच लिया । मैनें आस पास देखा कहीं कोई नहीं। फिर किससे परदा ! थोडी दूर पर एक चबूतरा से बना था जहां कुछ कुर्सियाँ पडी थीं। औरतों ने अपनी चाल तेज कर दी थी। तेजी से वहां निकल कर फिर अपना घूंघट ऊपर कर लिया । ये  गांव का चौपाल है। औरतों की भागीदारी तो बहुत दूर की बात है औरते यहां से गुजरती भी हैं तो एक बित्ते का घूंघट चेहरे के सामने खींच देती हैं क्या  पता कोई बुजुर्ग वहां बैठा हो! यह वो चौपाल है, जहां दूसरों की जिंदगी को प्रभावित करने वाले फैसले लिए जाते है। ऐसे एकतरफे फैसले जिसमें औरतें अपना पक्ष नहीं रख सकती, चुप चाप फैसलों को स्वीकारती हैं। पर शायद अब वह अपना पक्ष रख पाएंगी। यह  दूसरी बात है कि उसके पक्ष को कितना महत्व दिया  जाएगा,  यह  वहां औरतों की स्थिति को देख कर समझा  जा सकता है। 650 साल के इतिहास में पहली बार सतरोल खाप ने महिलाओं के पक्ष को पंचों के सामने रखने के लिए, महिला विंग का गठन किया और सुदेश चौधरी का उसका प्रधान बनाया ।


 सडक के दोनो ओर फैले खेत। आलू की फसल तैया र थी। खेत के मेडों के पास कई जोटा बग्गी खडी थी। औरतें आलू की सफाई में लगी हुई थीं। कहीं कहीं उनके साथ पुरुष भी दिखे। ‘हरियाणा की औरतें बहुत मेहनती होती हैं।‘ गाडी चला रहे ड्राईवर ने कहा। ‘ पर यहां के आदमी....’  इतना कह कर चुप हो गया । वह खुद भी हरियाणा का ही है। हमारा पहला ठिकाना था बीबीपुर के सरपंच सुनील जागलान का घर। गाडी जब उनके घर के आस पास रुकी तो आस पडोस के किवाड में भी हलचल हुई। कुछ घुंघट से ढंके सिर झांकते  नजर आए। कुछ बच्चे  दौड कर गाडी के पास आ गए। सुनील जागलान घर में नहीं थे। उनकी बहन ऋतु से बातचीत का मौका मिला। एम ए -बी एड ऋतु विवाह का इंतजार कर रही है। पर साथ ही महिलाओं के सशत्तिकरण के कार्य  में भाई का साथ दे रही है। ऋतु अब पंचायत में पंचों के सामने मुंह खोलने की हिम्मत भी करने लगी है। जब पहली बार उसने ऐसा किया  तो उसे खुद विश्वास नहीं हो रहा था कि वह  पंचायात  में पंचों के सामने कैसे बोल पाई.  उसमें इतनी हिम्मत कैसे आई !  उसपर शायद उतना सोचा विचारा नहीं बस बोल दिया , क्योंकि  वहां पक्ष रखना जरूरी था।  बकौल ऋतु ‘ औरतें अब बोलने लगीं हैं। सोचने लगी हैं। अपनी जिंदगी के आस पास के मसलों पर जागती है।‘  ऑनर किलिंग के मामलें कैसे खत्म होंगे ? इस सवाल पर ऋतु बिल्कुल रटे रटाए लफ्जों को दोहरा देती है, ‘ और प्रेम व्रेम गांव के अंदर पॉसिबल नहीं है। इसमें खाप की क्या  गलती है। परिवारों की गलती है। वे इस तरह के मामले खाप के पास लाते। सच तो यह है कि यह सब पश्चिमी सभ्यता के दुष्प्रभाव की वजह से है। लडकियाँ परिवार के विरुद्ध जा कर प्रेम कर रहीं हैं। बेटी गांव की इज्जत होती है। पहले इतने रेप केसेज नहीं होते थे। गांवों में आपस में भाईचारा था। अब यह खत्म हो रहा है।‘  अंतर्जातीय्ा विवाह को खाप ने स्वीकृति दे दी है,  और सुनील कह रहे हैं कि वह इसकी पहल अपने घर से ही यानी आपके विवाह से ही करेंगे,  इस सवाल पर ऋतु थोडी गंभीर हो गई। ‘ मैने भी सुना। पर मै  अपने लाईफ में यह  नहीं चाहती।जो करना है वह अपने बच्चों के साथ करें।‘ युवा सुनील जागलान के पंचों में तीन महिलाएं भी शामिल है। यह  महिला सशत्तिकरण की उनकी सोच को दर्शाता है। पर वास्तविक बदलाव कितनी सूक्ष्मता की अपेक्षा करता है यह समझना भी जरूरी है। उनकी पत्नी हमें कहीं नजर नहीं आई। सुना वो सामने नहीं आती, पिछलीं बार भी दिखीं तो लंबे घूघट में ही, वह भी केवल ‘ हूं हां के साथ ही।

 अगला पडाव सुदेश चौधरी। एक अखबार के लोकल रिपोर्टर का दफ्तर और सुदेश चौधरी का दफ्तर -टू इन वन। सुदेश चौधरी और अखबार का संवाददाता व दो तीन अन्य पुरुष वहां बैठे थे। सतरोल खाप की उस बैठक में वह अकेली औरत थी। बकौल सुदेश , ‘ उस बैठक में मैं पहले चौपाल के नीचे खडी हुई थी। अजीब तो लग रहा था। सभी पुरुष थे मैं अकेली महिला थी। बैठक में बातचीत हो रही थी। फिर मेरा नाम खाप के सदस्यों के सामने रखा गया कि महिला विंग की प्रधान यह  होंगी। सबने सहमति दे दी।  मै चौपाल के ऊपर चढी।‘  सुदेश के चौपाल पर चढने पर बाकी वहां बैठे पुरुषों की प्रतिक्रिया  के सवाल पर सुदेश का कहना था , ‘ समान्य ही था हां कुछेक माथों पर थोडी सिलवट दिखीं थीं। पर क्योंकि खाप के प्रधान ने ही मेरा नाम कहा था तो फिर विरोध नहीं हो सकता था।‘  सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में सुदेश की पहचान सभी गांववालों के बीच पहले से ही मौजूद है। वास्तव में सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में उनकी पहचान उनके औरत होने की पहचान पर काफी हद तक हावी है। कोई हर दुख ,मुसीबत,  जरूरत में साथ खडा हो,  औरत ही सही, उसका विरोध कैसे किया  जा सकता। सवाल है, ‘  क्या  एक समान्य लडकी यह  औरत अपने पक्ष को रखने के लिए पंचायत के उस चौपाल पर पैर रख सकती है?  हालांकि सुदेश चौधरी ,जो इतिहास में एम ए हैं महिला स्वतंत्रता पर आजाद खयाल रखती हैं। महिलाओं पर कपडों और सेलफोन जैसी पाबंदियों की सख्त खिलाफ हैं , लेकिन शादी ब्याह  के मामले में खासतौर पर प्रेम विवाह के मामले में खाप की ही तरह प्रेम को शर्तों में बांधती हैं। उनका कहना है कि प्रेम विवाह गोत्र से बाहर, गांव से लगे सभी पडोसी गांवों से दूर, और अभिभावक की स्वीकृति के बाद ही होनी चाहिए। खाप की सबसे ज्यादा मार तो प्रेमी युगलों पर ही पडती है। बकौल सुदेश लड़के लडकियों में अच्छे संस्कार भरे जाएंगे, हम उन्हें समझाएगे  की शादी ब्याह  में क्या  बातें ध्यान  रखें,  अभिभावक की इच्छा के अनुसार चलें, अच्छे संस्कार डलेंगे तो लडकियाँ इस तरह से शादी करेंगी ही नहीं और ऑनर किलिंग जैसी घटना भी नहीं होगीं। खाप में एक महिला को शामिल करने के पीछे महिला सशत्तिकरण का कौन सा उद्देश्य, कितना काम कर रहा था,  वह तो स्पष्ट ही था। तथाकथित पश्चिमी सोच से युवाओं को बचा कर रूढिवादी परंपरा के बंधन में जकडे रहने के लिए मानसिक रूप से तैयार  करना। सुदेश इस कर्तव्य को अच्छे से निभा भी रही हैं। अक्सर महिलाओं और लडकियों के साथ बैठक करतीं और खाप और उसके नियम कानून के फायदे का ब्योरा  देकर खाप की दीवारों केा मजबूत करतीं।

  ज्ञात हो की हाल ही में हरियाणा के बडे खापों में से एक , सतरोल खाप,  ने अपने एक ऐतिहासिक फैसले में अन्तर्जातीय  विवाहो को मंजूरी दे दी है।  खाप के इन 42 गांवों में भाईचारा माना जाता रहा है,  इनमें आपस में शादियाँ नहीं होती।  सतरोल खाप के प्रमुख इंद्र सिंह मोर ने अंतर्जातीय विवाह व गोत्र और गुहांड के अलावा भाईचारे के अन्य गांवों में विवाह से बैन हटाने की घोषणा की। अब इस फैसले का मूल्यांकन हरियाणा की स्थिति पर नजर डालते हुए करें। हरियाणा में लिंगानुपात की स्थिति सबसे खराब है। प्रति हजार पुरुष पर 877 महिलाएं है। बडी संख्या  में पुरुष कुंवारें हैं , यहाँदूसरे राज्यों से लडकियाँ खरीद कर,  या ब्याह कर लाई जा रही हैं। इंद्र सिंह मानते हैं कि यह बैन हटाना एक व्यवहारिक जरूरत थी। इंद्र सिंह के अपने गांव में, जहां की  आबादी 18000 है ,200 बहुएं पूर्वोत्तर राज्यों से लाई गई हैं। बकौल इंद्रसिंह , ‘ ये  लडकियाँ आराम से परिवार में घुल मिल जाती हैं, फिर क्या दिक्कत है, दूसरी जाति में शादी करने से।  लेकिन भाईचारे वाले गांव, एक गोत्र में और अभिभावकों की मंजूरी के बिना शादी नहीं होनी चाहिए। खाप के नियमों को तोडेगा कोई तो उसका विरोध किया जाएगा।‘ बारह गांवों ने इस फैसले का विरोध किया  है। पर इंद्रसिंह ने साफ कहा है कि इसे वापिस नहीं लिया  जाएगा। इंद्रसिंह के इस फैसले का विरोध करने वालेां में एक , हांसी  (हिसार जिला) ब्लॉक काउंसिल के पूर्व अध्यक्ष बीर सिंह कौशिक का कहना है कि, ‘  अगर महिलाओं को इतनी आजादी दे दी जाएगी तो वे अपनी पसंद से शादियाँ करने लगेंगी और समाज और मर्यादा  की सभी अवधारणाएं नष्ट हो जाएंगी। यह परंपरा के विरुद्ध है।


 सुनील जागलान से बातचीत हमारी यात्रा  का अंतिम पडाव था। युवा ,  उत्साही, आधुनिक विचारों से कदम मिला कर चलने की कोशिश करने वाले सपरंच । पूरा कमरा कई तरह के पदक व शिल्ड से भरा हुआ। बकौल सुनील , ‘ सामाजिक बंधन मनवाने और दिल में बिठाने की बात है। लडके लडकियों को गोत्र और भाईचारे वाले गांव की जानकारी होनी चाहिए ताकी वह सोच समझ कर रिश्ते बनाएं। वह गलत काम नहीं करेंगे, तो फिर खाप क्यों कडे फैसले लेगा। और खाप क्यों है,  खाप इसलिए है कि सरकार अपनी भूमिका ठीक से नहीं निभा रही। सरकार अपनी भूमिका ठीक से निभाए, हर गांव में पुलिस स्टेशन हो न्याय व्यवस्था  हो तो खाप की जरूरत नहीं ।‘ पर कई बार तो खाप ने कानून से इत्तर अपने फैसले सुनाएं हैं,  तो केवल व्यस्था  को इस बात के लिए दोषी कैसे ठहराया  जा सकता है ? मेरे इस तर्क पर एक चुप्पी कमरे में पसर गई। सुनील जागलान खाप के फैसलों से पूरी तरह इत्तेफाक रखते हैं। मेरे यह पूछने पर की  क्या  खाप अब प्रेम का विरोध नहीं करेगा ! सुनील झट से बोल पडे , ‘ हां! हां! किसने मना किया ,  प्रेम करने से,  करो ना! खाप बस मना कर रहा है कि गांव कें अंदर और आस पास के गांव के लडके लडकी न हो। उसके बाहर शादी करो ना! गांव के अंदर और आस- पास के गांव के साथ तो भाई बहन का रिश्ता हो जाएगा ना!’  अपने तर्क को वैज्ञानिक जामा पहनाने की कोशिश करते हुए बोलें-‘ रिश्ते जितने दूरी में हों बच्चे स्वस्थ्य और इेंटेलीजेंट होते हैं। इसमें पिछडापन क्या ! यह तो विज्ञान के साथ चलना हुआ। यह  हमारी परंपरा है। परंपरा को जिंदा रखने की कोशिश है।‘  अपने इस जवाब पर संतुष्टि  की रेखाएं उनके चेहरे पर साफ दिख रही थी। और प्रेम, प्रेम तो उसी से होता है ना , जिसके साथ आप उठते बैठते है,  पंद्रह गांव दूर के लडके लडकी के बीच प्रेम कैसे होगा ? अच्छा यह बताइए आप तो युवा हैं आप नहीं चाहते थे कि आप की पत्नी ऐसी हो जिससे आपके विचार मिलते हो। मतलब एक दूसरे को अचछी तरह से समझते हों ! ’  मेरे इस सवाल पर सुनील जरा अटक गएं। उन्हें यह समझ ही नहीं आया  कि पत्नी से विचार मिलने जैसी क्या  बात होती है,  पत्नी का काम घर परिवार संभालना, सास ससुर की सेवा करना है, इसमें विचार मिलने की कहां बात से आती है।  फिर कुछ उपलब्धियाँ गिनाई ,जो उन्होंने महिला सशत्तिकरण के लिए किए हैं। उनकी पत्नी कहीं नजर नहीं आईं। देखना चाहती थी , सुना था बहुत खूबसूरत हैं। पर शायद सामने आती भी तो लंबे से घूंघट में चेहरा दिखता कहां।
    बदलाव की यह बया र मंद - मंद बहती हुई कुरुक्षेत्र के बीर पिपली गाँव  की गलियों तक पहुंची हुई है। यहां 31 महिलाओं के पतियों ने अपनी अपनी पत्नियों के घूंघट उठाकर उन्हें इस कैद से मुक्ति  दी।  इन महिलाओं में 60 साल की रोशनी देवी से लेकर चालीस साल तक की महिलाएं हैं। रोशनी देवी ने चालीस साल उसी घूंघट के अंधेरे में बिताए हैं। शादी के चालीस साल के दौरान रौशनी ने इसी घूंघट तले रोजमर्रा के काम निपटाए। किलोमीटर चल कर पानी लाईं। इस दौरान कई बार ठोकर खाकर गिरीं भीं। चोटें खाईं। जाट समुदाय से आने वाली रोशनी ने जब भी पर्दा उठाने की कोशिश की हर बार तो हर बार बुजुर्गो ने ऐसा न करने के लिए दबाव बनाया  । अब उन्हें इस घूंघट से मुक्ति  तो मिल गई,  या  कहिए पति ने घूंघट सर पर न रखने की छूट उन्हें दे दी।  अब बच्चे भी तो बडे हो गए हैं,  और उम्र भी ढल गई।  रोशनी नहीं चाहती कि उसके बच्चों को घूंघट की यह कैद मिले।      इक्कीसवी सदी में स्त्री  पुरुष संबंधों को नियंत्रण में रखने वाले इन पंचायतो ने खुद में बदलाव के संकेत दिए है। पर हकीकत यह है कि ऊपरी तौर पर दिखने वाला बदलाव वास्तव में मजबूरी है। लिंगानुपात में आए असंतुलन की वजह से लडकों का विवाह नहीं हो पा रहा,  ऑनर किलिंग, बलात्कार जैसी घटनाओं में लगातार बढोतरी ऐसे क्रांतिकारी फैसले लेने के लिए खाप को मजबूर कर रहा है। सोच में कोई विशेष बदलाव नजर नहीं आ रहा है- आज भी लडकी, यानी  गांव और परिवार की इज्जत, और इज्जत इंसान की जिंदगी से ज्यादा  महत्वपूर्ण हैं। यह परंपरा कहीं न कहीं घबरा रही है कि उसकी पकड से युवा सोच छूट न जाए। कहीं इतना हो हल्ला न हो कि कानून के शिकंजे में इस परंपरा के प्राण पखेरू उखड जाएं। इस परंपरा में निहित सोच पुरातन जरूर है, लेकिन इस परंपरा को बचाए रखने के लिए ढूंढा गया  तरीका विज्ञानिक हैं। युवाओं को मानसिक रूप से इस सोच को आत्मसात् करने के लिए तैयार  किया  जा रहा है। घूंघट स्वयम  पुरुष उठा कर विद्रोह की सोच को दबाने की कोशिश कर रहा। ताकि स्त्री  इस पहल को अपना अधिकार नहीं एहसान समझे । और एहसान के तले कुछ समय विद्रोह को दबा कर शांत हो जाए। लेकिन मजबूरी ही सही परंपराओं की मुट्ठी से परिवर्तन की आंधी को रोका नहीं जा सकता उसे आनी है और वह आएगी ही। कई बार मजबूरी परिवर्तन  का आधार बनती है, शायद ऐसा ही इस बार हो रहा है।


अमृता स्त्रियों की पत्रिका बिंदिया से संबद्ध हैं

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