स्त्री-विरोधी लेखन दलित लेखन नहीं हो सकता

( उर्मिला पवार मराठी कथा साहित्य में स्त्री अभिव्यक्ति के रूप में एक महत्वपूर्ण उपस्थिति हैं.   ‘आमची इतिहास गढे़ला’ (इतिहास संबंधी पुस्तक) तथा ‘आयदान’ (आत्मकथ्य) के अतिरिक्त इनकी 9 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है, जिनका अनुवाद अंग्रेजी सहित अनेक भाषाओं में हुआ है।  युवा आलोचक तथा  स्त्रीकाल के सम्पादन मंडल के सदस्य धर्मवीर सिंह ने उनसे दलित -लेखन , दलित राजनीति और दलित स्त्रीवाद  पर ख़ास बातचीत की है ।  )

क्या केवल दलितों द्वारा ही लिखे गये साहित्य को दलित-साहित्य माना जाए या गैर दलितों द्वारा दलित जीवन पर लिखे गये साहित्य को भी दलित-साहित्य की श्रेणी में माना जा सकता है? जैसे हिन्दी में प्रेमचन्द, नागार्जुन, अमृतलाल नागर, गिरिराज किशोर आदि गैर-दलितों ने दलित जीवन पर जो कुछ लिखा है?
उर्मिला पवार 

देखिए! किसी भी साहित्य को जांचने- परखने की कुछ खास कसौटियां होती हैं। दलित साहित्य के संदर्भ में यह कसौटी आम्बेडकरी चेतना की मौजूदगी है। यदि किसी दलित द्वारा लिखे गये साहित्य में भी स्वतंत्रता, समानता एवं बंधुत्त्व की चेतना नहीं है तो मैं उसे दलित साहित्य नहीं मानती। रही गैर-दलितों द्वारा लिखे गये साहित्य की बात तो मैं यह मानती हूं कि दलित जीवन का जितना कटु, ठोस एवं यथार्थ अनुभव खुद दलित के पास होगा, उतना किसी गैर-दलित के पास नहीं हो सकता। लेकिन प्रेमचन्द, नागार्जुन आदि को पूर्णतः खारिज नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि उन्होंने दलित जीवन को अपने साहित्य का विषय बनाने का साहस किया, यहां तक अन्य सवर्ण लेखकों की दृष्टि पहुंचती ही नहीं थी।

समकालीन स्त्रीवाद  और दलितवाद दोनों ही से एक भिन्न एक अलग श्रेणी की मांग रख रहा है, ‘दलित स्त्रीवाद’। आप इस अवधारणा से कहां तक सहमत हैं?

भारतीय संदर्भों में अगर देखें तो स्त्रीवादी आंदोलन और उससे जुड़ी संस्थाओं का नेतृत्व सवर्ण-स्त्रियों के हाथ में रहा है। इसलिए वहां दलित-स्त्री की मुक्ति के मुद्दे केन्द्र में नहीं हैं। जातिवाद की घृणित मानसिकता यहां भी मौजूद है। दूसरी ओर दलितों का मर्दवाद है , इसलिए दलित-स्त्री को आज दोनों ही से पृथक ‘दलित-स्त्रीवाद’ की बात करनी पड़ रही है जो एकदम जायज है।

दलित-स्त्री लेखन की मजबूत उपस्थिति दलित साहित्य के भीतर स्वीकार नहीं की जा रही है जबकि इस  समाज की औरतें अधिक स्वाधीन रही हैं?

इस स्थिति का जिम्मेवार दलित पुरुषों के अवचेतन में बैठा हुआ मनुवाद है। इसलिए अनेक बार स्त्री के साथ वह भी वही व्यवहार करता है जो एक सवर्ण पुरुष करता है। जबकि प्रत्येक भारतीय भाषा में दलित महिला की एक जोरदार सृजनात्मक उपस्थिति है। अब उनकी इस आवाज़ को दबाना किसी के लिए भी मुमकिन नहीं है। यदि दलित पुरुष अपने ही आन्तरिक सवालों से टकराने से बचना चाहता है , तो वह अब संभव नहीं है।

अनेक विचारकों का सोचना है कि दलित साहित्य को अब अधिक व्यापक नजरिये से देखने की जरूरत है। आदिवासियों, प्रत्येक वर्ण की स्त्रियों तथा वर्णवादी उत्पीड़न के शिकार सभी वर्ग के लोगों को इसमें शामिल किया जाना चाहिए। जैसा कि राजेन्द्र यादव सभी वर्ण की स्त्रियों को दलित मानते थे?

वर्णवाद से मुक्ति के संघर्ष में ऐसा बहुत कुछ हो सकता है जो सामूहिक या कॉमन हो। लेकिन जाति का सवाल भारत में बड़ा अहम् सवाल है, इसीलिए हो सकता है कि थोड़ी दूर संघर्ष में सब साथ चलें और फिर किसी मुद्दे पर वे अलग हो जायेंगे । खैरलाजी जैसी भयानक दर्दनाक घटना के खिलाफ मैं लड़ी हूं। जेल भी गई हूं। जो सवर्णवादी मीडिया और स्त्रीवादी संस्थाएं दिल्ली दुष्कर्म का विरोध कर रही थीं , वे उसमें साथ क्यों नहीं आई? समझ रहे हैं प्रतिरोध का सवर्ण चरित्र, घटनाओं के चुनाव में ही है . फिर  राजेन्द्र जी ने सब स्त्रियों को दलित कहा था , तब सवर्ण स्त्रियां ही क्या इसके विरोध में नहीं थीं।

किसी भी उत्पीड़ित या वंचित अस्मिता से यह अपेक्षा रहती है कि वह दूसरी निकटस्थ अस्मिताओं के साथ अधिक संवेदनशीलता से व्यवहार करे। हिन्दी दलित साहित्य की अगर इस संदर्भ में बात की जाए तो अनेक स्थानों पर गहरी निराशा हाथ लगती है। सवर्ण समाज की स्त्रियों को प्रतिशोध का निशाना बनाये जाने को आप किस रूप में देखती है? जबकि छिटपुट ही सही, इस रवैये के प्रति हिन्दी दलित-स्त्री लेखिकाओं ने अपना प्रतिरोध भी दर्ज किया है?

देखिए दलित भी व्यवस्था के मारे हैं। वह व्यवस्था वर्णवाद की देन है। स्त्री भी एक व्यवस्था की मारी है। वह व्यवस्था पितृसत्ता की देन है। अब अगर कोई दलित पुरुष उस व्यवस्था के प्रतिरोध तथा अपने साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय का बदला लेने के लिए अगर स्त्री को टार्गेट करता है तो इस तरह के लेखन को मैं तो दलित लेखन ही नहीं मानती हूं। इस प्रवृत्ति का पुरजोर विरोध सभी को करना चाहिए।

भारतीय संदर्भ में ‘परिवार’ नाम की संस्था की संरचना ब्राह्मणवादी मूल्यों के फ्रेम में ही है जो स्त्री के शोषण का आधार भी है। विवाह, यौन शुचिता, नैतिकता आदि स्त्री-विरोधी अवधारणाओं का आधार परिवार ही रहा है, जबकि दलित साहित्य ने अनेकों स्थानों पर परिवार के इस मॉडल का महिमा-मंडन किया है। क्या यह यथास्थिति को बनाये रखने का प्रयास नहीं है?

मैं मानती हूं कि ‘परिवार’ स्त्री जीवन के लिए बंधन है, पिंजरा है , जिसकी दीवारों को जरूर टूटना चाहिए। लेकिन इसका कोई अच्छा विकल्प नहीं है हमारे पास। इसलिए हमें ‘परिवार’ संस्था के अधिकतम जनतांत्रीकरण के लिए संघर्ष करना चाहिए,  जहां रिश्तों में किसी तरह की वरीयता का कोई अनुक्रम न हो। जहां किसी एक के महत्तर और दूसरे के कमतर की स्थिति न हो।

हिन्दी दलित साहित्य के संदर्भ में अक्सर कहा जाता है कि यह ‘मराठी दलित साहित्य की कलम है’। आप इस धारणा से कहां तक सहमत हैं? और इसी से जुड़ा दूसरा सवाल यह भी है कि विविध भारतीय भाषाओं में अभिव्यक्त दलित चेतना से मराठी दलित साहित्य किन अर्थों में विशिष्ट है?

पहली बात तो यह है कि महाराष्ट्र जनान्दोलनों की जमीन रहा है। जोतिबा फुले, सावित्री बाई फुले और बाबा साहब आम्बेडकर के आंदोलनों का स्थान है यह। इन आन्दोलनों से पैदा हुई चेतना यहां के हरेक दलित में मौजूद है। यह अनायास नहीं है कि गांधी गुजरात से होने के बाद भी सेवाग्राम, वर्धा से आन्दोलन शुरू करते हैं। इन जनान्दोलनों की सीधी अभिव्यक्ति है-मराठी दलित साहित्य। साहित्य और आन्दोलनों का इतना सीधा संबंध अन्य भारतीय भाषाओं में नहीं है, हिन्दी में भी नहीं।

दलित दर्शन में आजकल धर्म की भूमिका को लेकर बहुत से सवाल उठ रहे है। यहां तक कहा जा रहा है कि बाबा साहब ने एक क्षत्रिय का धर्म अपनाकर बहुत बड़ी भूल की। दलित चिंतक दलित धर्म की खोज ‘आजीवक’ धर्म के रूप में कर रहे हैं तथा इस धर्म की खोज को दलित चिंतन की उपलब्धि बता रहे हैं। आपके मत में दलित धर्म की अवधारणा क्या है? तथा एक दलित स्त्री के रूप में जीवन में ‘धर्म’ की भूमिका को किस रूप में देखती है?

धर्म की भूमिका किसी भी स्वस्थ समाज एवं राष्ट्र के निर्माण के तौर पर नकारात्मक ही रही है। धर्म घीरे-घीरे सम्प्रदायवाद एवं वंशवाद में परिणित होकर कट्टरता को ही फैलाता है। वैज्ञानिक सोच को खत्म करता है। स्त्री के लिए तो वह ओर भी खतरनाक होता है। राज्य के नियमों के साथ धर्म भी स्त्री के आचरण के लिए भेदभाव पूर्ण एक संहिता तैयार कर देता है। इसलिए धर्म वही अच्छा है जो समता, न्याय और बंधुत्त्व का पक्षधर हो और इस दृष्टि के उपयुक्त बौद्ध धर्म के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है। बाबा साहब ने बहुत सोच-समझकर धर्मान्तरण किया था और इस विकल्प (बौद्ध धर्म) को अपनाया था। ‘आजीवक’ की बात मुझे समझ नहीं आती; वह दलितों का धर्म नहीं हो सकता।

दलित स्त्रीवादी लेखन पुरुष लेखन की तुलना में अधिक सृजनात्मक नज़र आता है। दलित स्त्री लेखन के शीर्षकों में ही इस बात को देखा जा सकता है। जैसे तिरस्कृत, जूठन, अपने-अपने पिंजरे की तुलना में आयदान (फूलों का टोकरा), हमारा जीवन, एक कदम मेरा भी कितने सृजनात्मक एवं सकारात्मक है। दलित स्त्री-लेखन की इस सृजनात्मकता को आप किस रूप में देखती हैं?

स्त्री सृजन का ही दूसरा नाम है। बच्चा जनने से लेकर, घर की हर सजावट में, खाना बनाने से लेकर तमाम दूसरे कामों में वह हमेशा कुछ नया रच रही होती है। इसलिए सृजनशीलता स्त्री स्वभाव की  बुनियादी विशेषता है जो बच्चे को लोरी सुनाने से लेकर कविता, कहानी, उपन्यास तक में अपनी अभिव्यक्ति पाती है। दूसरा दलित स्त्री के श्रम का सौंदर्य भी उसकी इस सृजनात्मकता में जुड़ता है जो उसे और गहरा और सकारात्मक बनाता है। आपने बहुत अच्छा सवाल रखा इस ओर मेरा भी ध्यान नहीं गया था, मैं भी कुछ और सोचूंगी।

इन्हें  भी देखें :

फैंसी स्त्रीवादी मुद्दों में जाति मुद्दों की उपेक्षा
स्त्रीवाद के भीतर दलित स्त्रीवाद
डा अम्बेडकर और स्त्री अधिकार
डा अम्बेडकर का मूल चिंतन है स्त्री चिंतन

दलित लेखन केवल लेखन नहीं आंदोलन भी है। जिसका उद्देश्य है जाति-मुक्त समता मूलक समाज की स्थापना करना। हम एक ऐसी स्थिति की कल्पना करें जब यह सपना हकीकत हो जाएगा। तब दलित साहित्य की प्रासंगिकता क्या रहेगी? मेरा मतलब कालजयी साहित्य से है जैसे शेक्सपीयर, मिल्टन, प्रेमचन्द, गोर्की,टालस्टाय, चेखव आज भी पढ़े जाते हैं? क्या शाश्वत साहित्य का सवाल दलित चिंतन के केन्द्र में है?

दलित लेखन मानवतावादी लेखन है। मनुष्य मात्र की स्वतंत्रता, उसकी बराबरी और न्यायोचित अधिकार की मांग का साहित्य है यह! क्या स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के ये मूल्य कभी अप्रासंगिक हो पायेंगे? यदि नहीं तो; दलित- साहित्य भी नहीं। जो मानवतावादी है उसका केवल नाम बदलेगा, मूल्य नहीं। समय की प्रवाहमान धारा में दलित- साहित्य में भी तथाकथित शाश्वत साहित्य से उच्च कोटि का साहित्य हमारे सामने आयेगा।

दलित साहित्य के वर्तमान परिप्रेक्ष्य को आप किस रूप में देखती हैं?

साहित्य में आत्मकथाओं के रूप में जगह बनाने वाला दलित साहित्य आज साहित्य की प्रत्येक विधा में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा चुका है। मनुवाद से लड़ने में उसे गहरा संघर्ष करना पड़ा है। समय के साथ दलित साहित्य ने अपेक्षित प्रौढ़ता भी हासिल की है। कलात्मक रूपों में उसकी अपनी आभा है। कला के परम्परागत सौंदर्यशास्त्र को प्रतिस्थापित कर उसने अपना एस्थेटिक्स विकसित किया। इतिहास और परंपराओं के छद्म को उसने उजागर किया है। नये-नये लेखक अपनी गहरी रचनात्मक ऊर्जा एवं समझ को लेकर सामने आ रहे हैं। मैं पूरी तरह आश्वस्त एवं खुश हूं। लेकिन जिस तरह के विचलन की बात आपने पहले कही, उसके स्त्री-पक्ष की जो चर्चा हमने की; मैं उससे निराश हूं। इस तरह का लेखन आम्बेडकरी दलित लेखन नहीं है उसका विरोध होना चाहिए वरना वह दलित साहित्य को पीछे ले जाएगा। बाबा साहब की बात आपको याद होगी,  उन्होंने अपने अनुयायियों से कहा था कि अगर आप मेरे इस कठिनाइयों से यहां तक लाये गये जहाज को आगे नहीं ले जा सकते तो मेरी विनती है कि आप उसे वहीं छोड़ दें। उसे पीछे ले जाने का उपक्रम न करें। दलित-लेखन के इस तरह के स्त्री-दृष्टिकोण को सुनकर मैं आहत हुई हूं।

सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन के बतौर दलित-साहित्य का सपना वर्णमुक्त समता मूलक समाज की स्थापना का है। लेकिन जातियों और उप-जातियों के आधार पर खेमेबाजी तो दलित- साहित्यकारों में भी मौजूद है?

यह वर्णवादी व्यवस्था की देन है। किसी कार्यक्रम में दलित के नाम पर अपनी ही जाति के लोगों को शामिल करना, किसी पत्रिका का संपादक होने पर अपनी ही जाति के लोगों को छापना ये सब वर्णवाद के चिह्न हैं। इस तरह के लोगों में आम्बेडकरी चेतना का अभाव है। लेकिन अच्छे भविष्य के लिए दलित साहित्य को इन चीजों से ऊपर उठना होगा।

वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में 56 इंच चौडे़ सीने वाली सांस्कृतिक-राष्ट्रवादी ताकतों ने सत्ता प्राप्ति के लिए अपनी पूरी जोड़-जुगत लगा दी। दलित समुदाय अपनी मुक्ति की छवि जिन चेहरों में देखता था उनका भी उन्हीं ताकतों के साथ खड़े हो जाना, जिनके विरुद्ध पूरा समुदाय लड़ रहा था, आहत करता है। जैसे रामदास अठावले, रामविलास पासवान, उदित राज आदि।

अवसरवाद एवं व्यक्तिगत स्वार्थ दलित राजनीति में भी पनपा है। पहले बाबा साहब के नाम पर गोलबंदी कर ताकत को अर्जित करना और उस अर्जित ताकत के मुताबिक अपना मोल-भाव तय कर लेना अवसरवाद नहीं तो और क्या है। लेकिन अठावले साहब के एक दूसरे पक्ष को भी मैं देखती हूं। यदि ये कभी सवर्ण हिन्दूत्त्ववादी ताकतों के साथ भी खड़े हुए हैं तो एक चौकीदार की भूमिका के रूप में। एक सिपाही की भूमिका के रूप में, इनके शिवसेना के साथ जुड़ने के बाद मुंबई में ही दलितों पर शिवसैनिकों के अत्याचार बहुत कम हुए हैं। ये वहां वॉच-डॉग की भूमिका में रहे हैं।
( युद्धरत आम आदमी से साभार )



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