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आपहुदरी : रमणिका गुप्ता की आत्मकथा -पहली किस्त

रमणिका गुप्ता


रमणिका गुप्ता स्त्री इतिहास की एक महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं . वे आदिवासी और स्त्रीवादी मुद्दों के प्रति सक्रिय रही हैं . ‘युद्धरत आम आदमी’ की सम्पादक रमणिका गुप्ता स्वयं कथाकार , विचारक और कवयित्री हैं . आदिवासी साहित्य और संस्कृति तथा स्त्री -साहित्य की कई किताबें इन्होने संपादित की है. इनसे इनके मोबाइल न. 9312039505 पर संपर्क किया जा सकता है.

( हम यहाँ रमणिका गुप्ता की शीघ्र प्रकाश्य आत्मकथा सीरीज ‘ आपहुदरी’ के एक अंश किश्तों में प्रकाशित कर रहे हैं. रमणिका जी के जीवन के महत्वपूर्ण हिस्से धनवाद में बीते , जहां वे खुदमुख्तार स्त्री बनीं, ट्रेड यूनियन की सक्रियता से लेकर बिहार विधान परिषद् में उनकी भूमिका के तय होने का शहर है यह. ‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’ से कोयलानगरी की राजनीति को समझने वाली हमारी पीढी को यहाँ स्त्री की आँख से धनबाद से लेकर राज्य और राष्ट्रीय राजनीति के गैंग्स्टर मिजाज को समझने में मदद मिलेगी, और यह भी समझने में कि यदि कोइ स्त्री इन पगडंडियों पर चलने के निर्णय से उतरी तो उसे किन संघर्षों से गुजरना पड़ता रहा है , अपमान और  पुरुष वासना की अंधी गलियाँ उसे स्त्री होने का   अहसास बार -बार दिलाती हैं. उसे स्थानीय छुटभैय्ये नेताओं से लेकर मंत्री , मुख्यमंत्री , राष्ट्रपति तक स्त्री होने की उसकी औकात बताते रहे हैं . ६० -७० के दशक से राजनीति के गलियारे आज भी शायद बहुत बदले नहीं हैं. इस आत्मकथा में अपनी कमजोरियों को अपनी ताकत बना लेनी की कहानी है  और ‘ हां या ना कहने के चुनाव’ की स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष की भी कहानी है. इस जीवन -कथा की स्त्री उत्पीडित है, लेकिन हर घटना में अनिवार्यतः नहीं.   इस आत्मकथा के कुछ प्रसंग आउटलुक के लिए रमणिका जी एक इन्टरव्यु में पहले व्यक्त हो चुके हैं )

दहशतजदा धनबाद और मुक्ति की छटपटाहट

धनबाद! कोयले की नगरी धनबाद! मज़दूरों और मालिकों की नगरी धनबाद! गरीबी और अमीरी के मापदण्ड तोड़ती, माफिया और पहलवानों के भय को भोगती,भ्रष्टाचार  के बटखरे पर सबसे भारी उतरने वाली,राजनीति की बड़ी-बड़ी हस्तियों का आकर्षण  केंद्र,आकांक्षाओं की धुरी,पैंतरेबाजी के लिए प्रसिद्ध अखाड़ा,सरकारों को बदलने, उलटने-पलटने, मन्त्रिायों के विभाग और मुख्यमंत्रियों के बनने-बनाने, हटने-हटाने की मंत्रणाओं का गढ़। इनके कार्यान्वयन हेतु धन जुटाने का अजस्र स्रोत  भी यही धनबाद। इस शहर में गॉडडफादर भी जबरदस्त थे। सबसे बड़े गॉडडफादर थे बी.पी. सिन्हा,मज़दूर नेता। आई.एन.टी.यू.सी.,कांग्रेस पार्टी (सत्ता पार्टी) से सम्बद्ध ‘कोलियरी मजदूर संघ’ यूनियन के अध्यक्ष थे। उनके विरोधियों का भी एक भारी-भरकम मजमा था। सारी नौकरशाही इन गॉडडफादरों  की ताबेदारी करती थी, खासकर बी.पी. सिन्हा की। दरअसल कोयला एशिया  में सबसे बड़ा रोजगार देने वाला उद्योग था, जहाँ मजदूर लाखों की तादाद में काम करते थे। वहाँ सैकड़ों की तादाद में नेता थे और हजारों की तादाद में दलाल। नौकरशाही की भी एक बड़ी फौज़ थी। इन सबसे तालमेल रखने वाले थे गॉडडफादर । नेता और अफसर, अक्सर इनके तलवे चाटते थे। मजदूर एवं उन मजदूरों के छोटे-बड़े नेता इनकी जागीर थे। ये उन्हें जितना ज्यादा से ज्यादा भुना सकते थे, भुनाते थे। मालिकों का नुकसान न हो,मजदूरों को भी कुछ टुकड़े मिलते रहें,यही यहाँ के नेताओं, अफसरों और दलालों की तिकडि़यों का धन्धा था। मजदूरों की गरीबी पर ये दिन-प्रतिदिन अमीर से अमीर हो रहे थे। दिनों-दिन रूतबा बढ़ रहा था इनका। कभी-कभार कोई चालाक अफसर इन दोनों गुटों को लड़वा भी दिया करता था पर प्रायः अफसर इनके बाहर नहीं जा सकते थे। ट्रांसफर, पोस्टिंग, प्रमोशन सब के पैरवीकार यही गॉडडफादर थे। ये राजधानी पटना के एजेन्ट थे। कोई भी नया अफसर आता, खासकर श्रम विभाग काµउसे बी.पी. सिन्हा के यहाँ हाजरी देनी ही होती थी। उनके यहाँ आयोजित रात्रि भोज और शराब पार्टियों में जाकर, साथ में शराब पीना और आगे की राजनीति, स्ट्रेटेजी या यूनियन की कार्यनीति, सभी तो इनके यहाँ तय होती थी। यहाँ कोयले की सबसे बड़ी यूनियन ‘इन्टक’ से सम्बद्ध ‘कोलियरी मजदूर संघ’ थी, जिसके सिरमौर बी.पी. सिन्हा ही थे। (बाद में इसका नाम बदल कर राष्ट्रीय  कोलियरी मजदूर सभा कर दिया गया जो आज तक चला आ रहा है) बी.पी. सिन्हा के यहाँ आयोजित पार्टियों में कोलियरी मालिक भी शामिल रहते थे, इसलिए मालिकों से सम्बन्धों के संदर्भ में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सभी हिदायतें, इन्हीं पार्टियों में दी जाती थीं। पुराने अफसरों के जरिए  भी नये अफसरों को यह हिन्ट मिल जाता था कि क्या करना है,किस मालिक से कैसे पेश  आना है और किस हद तक मज़दूरों के मुद्दों की पक्षधरता करनी है।

बड़ा चन्दा करना हो तो पटना के सभी लीडर-जन बी.पी. सिन्हा के घर आ जाते थे,वहीं कोलियरियों के मालिक व ठेकेदार, जिनमें ज्यादा यूनियन के लीडर ही होते थे,जमा हो जाते,और तय राशि पटना से आए नेताओं को दे दी जाती थी. कुछ सिन्हा साहब भी रख लेते थे ,अपने छुटभैयों में बांटने के लिएु, बाकी अपने या अपने खास लोगों के लिए।सबसे पहले जयप्रकाश  नारायण ने धनबाद में ‘हिन्द मज़दूर सभा’ (एच.एम.एस.) से सम्बद्ध यूनियन का गठन किया था। बाद में उन्होंने इस यूनियन की दो शाखाएं बर्ड कम्पनी की दोकोलियरियों,सिरका तथा अरगड्डा,जो हजारीबाग जिला में पड़ती हैं, में भी खोल दी थीं। उन दिनों इमामुल हई खान भी उनके साथ थे। बाद में बी.पी. सिन्हा ने उनसे अलग होकर इन्टक से सम्बद्ध कोलियरी मजदूर संघ नामक यूनियन बना ली। कुछ कोलियरियों पर इमामुल हई खान का भी दबदबा बना रहा। हई खान की यूनियन एच.एम.एस. से सम्बद्ध थी।

फ्लोरा स्मिथ का रेखांकन

इसी धनबाद में एक बंगाली लेबर लीडर को काले पानी की सजा हुई थी। वे एक ईमानदार नेता थे, जो मालिकों के आगे बिके नहीं थे। मारपीट में मालिक के अतिरिक्त मारे तो ज्यादा मजदूर ही गये थे, पर वे मालिकों पर मजदूरों की हत्या करने का जुर्म साबित नहीं कर सके थे। उलटे लेबर लीडर को ही सजा भोगनी पड़ी थी।
इन्टक में ही दो खेमे थे, जिनमें प्रायः हिंसक संघर्ष  भी हो जाया करते थे। हत्या तो आम बात थी। इन्टक चूंकि कांग्रेस से सम्बद्ध थी, इसलिए सत्ता में उसका दखल था। पटना किसके हाथ में रहे,लड़ाई यही थी। मालिक किसका आदेश  मानें,झगड़ा यहाँ था। जहाँ तक मज़दूरों के हक का सवाल था,वह इंटक के लिए खास मायने नहीं रखता था। मालिक ही मज़दूरों का चन्दा और यूनियन की सदस्यता काट कर दफ्तर में भिजवा देते थे। दरअसल यूनियन के प्रायः सभी नेता व कई सरकारी अफसर भी, सच कहा जाए तो बी.पी. सिन्हा के प्रति ही वफादार थे और उन्हीं की कृपा  से ठेकेदारियां भी करते थे। बस, जो साहब (बी.पी. सिन्हा को सभी साहब कह कर सम्बोधित करते थे) ने एग्रीमेंट कर दिया ,वह मज़दूर से लेकर मालिक, ठेकेदार, अफसर और सरकारी श्रम मशीनरी को मंजूर करना पड़ता था। बड़े-बड़े लठैत यूनियन के कार्यकर्ता थे,उनके खिलाफ बेचारा कौन मजदूर बोलेगा? जो बोलेगा पिट जाएगा या नौकरी से बर्खास्त हो जाएगा।

कांग्रेस पार्टी में बी.पी. सिन्हा के खिलाफ रंगलाल चैधरी सक्रिय थे, जो धनबाद कांग्रेस के अध्यक्ष भी थे। वे एकदम विशुद्ध  शाकाहारी भूमिहार नेता थे। यूनियन के भीतर राम नारायण शर्मा ,जो लोकसभा सदस्य भी चुने जा चुके थे,बी.पी. सिन्हा के विरोधी गुट में थे। वे यूनियन के जनरल सेक्रेटरी थे। बी.पी. सिन्हा अध्यक्ष थे। राम नारायण शर्मा ईमानदारी के लिए मशहूर थे और वे बी.पी. सिन्हा के गलत समझौतों का विरोध भी करते थे। कान्ती भाई (गुजराती) और दास गुप्ता भी यूनियन में थे और बी.पी. विरोधी थे,पर वे मुखर नहीं हो पाते थे। उन्होंने बाद में कोयला की फेडरेशन बनाकर खुद को फेडरेशन का अध्यक्ष और दासगुप्ता को महामन्त्री बना दिया था। वे असन्तुष्ट , यानी बी.पी. लॉबी के विरोधियों तथा बिहार के बाहर के कोयला प्रतिनिधियों के समर्थन से जीत जाते थे। फेडरेशन के स्तर पर वे ठेकेदारों को यूनियन में लाने के विरोधी थे,पर जहाँ सारा संगठन ही ठेकेदारों को हाथ में हो, तो वहाँ फेडरेशन के एक-दो नेताओं की कौन परवाह करता?ऐसे एक बार बी.पी. सिन्हा ने धनबाद से बर्ड कम्पनी के एक बड़े अफसर प्राण प्रसाद को धनबाद से सांसद का चुनाव लड़वाया था। उस चुनाव में लोगों को साइकिल भी बांटे थे। इस पर भी प्राण प्रसाद बुरी तरह पराजित हुए थे और उनकी जमानत जब्त हो गई थी। रामनारायण शर्मा ही सदैव कांग्रेस से जीतते थे,वे ही अन्ततः जीते। बी.पी. सिन्हा की जनता में नहीं चली।

बड़ी-बड़ी अंग्रेजी कम्पनियों  के अतिरिक्त वोरा, चंचनी और अग्रवाल बड़े खदान मालिकों में थे। कुछ ठाकुर,कुछ भूमिहार, जो पहले ठेकेदारों के यहाँ पहलवानी करने आए थे,छोटी-मोटी ठेकेदारियां लेकर बाद में मालिकों को भ कर खुद ही मालिक बन बैठे थे। वे लेबर लीडर भी थे। शंकर दयाल सिंह, सतदेव सिंह, सूरजदेव सिंह आदि पहले पहलवान के रूप में ही बी.पी. सिन्हा की शरण में धनबाद आए थे,फिर ठेके लिए और बाद में खदानें हड़प कर मालिक बन गए।अन्त में तो अपनी स्वतन्त्रा सत्ता कायम करने के बाद, सभी के सभी मुख्यतः जातीय आधार पर या जिला-जवार के नाम पर बी. पी. सिन्हा के खिलाफ हो गये या इन्होंने अपने स्वतंत्र गुट व खेमे बना लिये। इन सबके तार पटना से जुड़े थे। धीरे-धीरे इन्होंने राजनीति में भी हिस्सा लेना शुरू कर दिया और कांग्रेस पार्टी में अपनी जाति के नेताओं और मंत्रियों से जुड़कर अपनी पैठ बना ली। शंकरदयाल सिंह जैसे लोग, तो न केवल जिला बोर्ड के अध्यक्ष बन गये बल्कि बिहार सरकार में केबिनेट मंत्री  भी बन गये थे। उनके भाई सतदेव सिंह कोलयरियों के मालिक थे और शंकर दयाल सिंह मालिक तो थे ही, मजदूर नेता और सरकार में मंत्री  भी थे। धनबाद एवं उसके आस-पास के क्षेत्रों, बल्कि कहा जाए बंगाल तक बड़ी-बड़ी अंग्रेजी कंपनियों के अतिरिक्त राजस्थान के मारवाड़ी और गुजरात के चंचनी और व्होरा ग्रुप की भी कई-कई खदानें थीं। खदानों में स्थानीय लोगों की बजाय बाहरी लोग ज्यादा थे। खासकर प्रबन्धन में या ठेकेदारियों में आरा, छपरा, बलिया, भोजपुर, दरभंगा और गया के लोग थे या फिर पंजाबी, गुजराती, मारवाड़ी और बंगाली। इनके सारे के सारे मजदूर या तो स्थानीय होते थे या फिर मध्य प्रदेश  के रायगढ़, बिलासपुर, उड़ीसा के गंजाम जिला, बंगाल के पुरूलिया और उत्तर प्रदेश  के गोरखपुर से लाए जाते थे।  प्रायः बिहार के पलामू, गया, भोजपुर, आरा, छपरा व मुंगेर से भी मजदूर लाए जाते थे, जो मजदूर-कम-लठघर (ठेकेदारों की तरफ से) दोनों होते थे अपने डील-डौल के कारण, खास कर गोरखपुर और पलामू के लेबर मालिक के लिए लठैती भी करते थे। छोटानागपुर के लोग यानी वर्तमान झारखण्ड के लोग प्रायः ठेकेदारियों में खटते थे।
सब ठेकेदार अपने-अपने पहलवान रखते थे, जिनका मकसद था यूनियनों को उभरने न देना, खासकर इन्टक विरोधी यूनियनों को। इन्टक सम्बद्ध यूनियनों में प्रायः ठेकेदार ही यूनियन के लीडर होते थे।

जब हम 1960 में धनबाद आए तो बी. पी. सिन्हा इन्हीं जमातों के नेता थे और इनके मार्फत कोलियरी मलिकों और मजूदरों, दोनों पर अपना दबदबा बनाए रखते थे। लेकिन धीरे-धीरे सबने अपनी स्वतन्त्र सत्ता कायम करनी शुरू कर दी। के. बी. सहाय के बाद संविद की सरकारें बननी शुरू हो गईं और इनमें से कुछ नेता कांग्रेस और इन्टक छोड़कर जनता दल में भी चले गये। कांग्रेसी सरकार में तो पांच साल में दो-दो तीन-तीन बार मुख्यमंत्री बदलने लगे थे, यानी राजनीति में अस्थिरता आ गई थी। कांग्रेस की केन्द्र सरकार ने खासकर मोहन कुमार मंगलम, जो कोयला मंत्री  थे और इंदिरा गांधी, दो बातों से काफी विचलित थे। एक बात तो यह कि धनबाद, जो कोयला क्षेत्र का केन्द्र था, के पैसे का पटना की कांग्रेस सरकारों के मुख्यमंत्रियों या सरकारों को हटाने या बनाने में जबरदस्त दखल था। बाद में दूसरे दलों के लोग भी धनबाद के खजाने में हिस्सा बंटा कर सरकार को बनाने-गिराने लगे थे। कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व के लिए इस ‘सरकार भंजक केन्द्र’ को तोड़ना जरूरी हो गया था।

नोट: इसी बीच में संसोपा से कुज्जू माँडू चुनाव लडने पहुँची

दूसरा महत्वपूर्ण कारण यह था कि देश  के विकास के लिए बिजली की सख्त जरूरत थी, रेलों के विस्तार की जरूरत थी, जिसके लिए उर्जा का एकमात्र स्रोत  कोयले की खदानें थीं, जिनके विस्तार की बहुत आवश्यकता  थी। इसकी पूर्ति के लिए धन की जरूरत थी। सरकार ने कोलियरी मालिकों से कोयला खदानों के विस्तार की पेशकश  की थी। कोयला बोर्ड में सरकारी नुमाइंदों के अतिरिक्त कोलियरी मालिक भी शामिल  होते थे और मजदूर नेता भी। कोलियरी मालिकों ने कोलियरियों के विस्तार के लिए पर्याप्त पूंजी लगाने में असमर्थता जाहिर की थी। ऐसे भी सरकार के पास ये रिपोर्ट थी कि कोलियरी मालिक कोलियरियों का उत्खनन बहुत ही अवैज्ञानिक ढंग से कर रहे हैं। वे कम पूँजी लगाकर ज्यादा मुनाफा पाने के लिए ऊपर  की परतों से कोयला निकाल कर, नीचे बची हुई परतों को ओवरवर्डेन से ढक देते थे और अंडरग्राउंड खदानों के कोयले में आग लगने अथवा पानी भर जाने से बचाने की बजाय उन्हें ढँक कर नया मुहाना खोल देते थे। खदानों की कटाई भी वर्टिकल होती थी और भूगर्भ खदानों को बालू भरे बिना छोड़ दिया जा रहा था। आग बुझाने के लिए भी बालू केवल कागजों में ढोया जाता था।

ऐसे हालात में सरकार ने खदानों के सरकारीकरण का फैसला किया। चूंकि  स्टील कारखानों के लिए कोयले की सख्त जरूरत थी ,जिसमें केवल कोकिंग कोल ही इस्तेमाल हो सकता था, इसलिए सरकार ने सन् 1970 में पहले केवल कोकिंग कोल वाली खदानों का ही सरकारीकरण किया, जिसमें धनबाद की सारी और बंगाल की अधिकांश  खदानें चली गईं। इस प्रकार धनबाद में ‘भारत कोकिंग कोल लिमिटेड’ (बी.सी.सी.एल.) बनी।
इन्टक का नेतृत्व  भौंचक रह गया, क्योंकि उनकी सारी कमाई तो कोलियरी मालिकों से होती थी। इन्टक के जितने भी ठेकेदार या मजदूर लीडर थे वे सब के सब रातों-रात कोलियरियों के स्टाफ बन गये। सबके भाई-भतीजे और लठैत-पहलवान, मुंशी  या मजदूर बन गये। असली मज़दूर खदेड़े जाने लगे। अफसर, पुलिस और प्रशासन की मदद से, यहाँ तक कि कोर्ट के जजों की मदद से नये-नये लोग काम पाने लगे और पुराने लोग भगाये जाने लगे। नौकरी की इस भ्रष्ट  मिलीभगत में लाखों रुपए के वारे-न्यारे होने लगे। स्थानीय और असली मजदूर हक्के-बक्के रह गए। उनकी आँखों के सामने लूटी जा रही थी उनकी नौकरियाँ और वे कुछ नहीं कर पा रहे थे। उनके अपने ही नेता उन्हें बेच रहे थे। बस, एक दिन सब्र का बाँध फूट गया,खासकर स्थानीय मजदूरों और किसानों का। मजदूर स्पष्ट  रूप से दो खेमों में बंट गया,बाहरी और स्थानीय अर्थात् देशज ।
ठेकेदारी के जमाने से ही ए. के. राय की यूनियन धनबाद में अपने पाँव पसार चुकी थी और इन्टक की कोलियरी मजदूर संघ (बाद में राष्ट्रीय  कोलियरी मजदूर संघ) एवं ‘बिहार कोलियरी मजदूर सभा’ में प्रायः रोज हिंसक झड़पें होने लगी थीं। इन्टक के अधिकांश  लीडर सूदखोर थे। ए. के. राय की यूनियन, जो सी. आई. टी. यू. से सम्बद्ध  थी, ठेकेदारी और सूदखोरी के विरुद्ध लड़ाई के साथ-साथ लोकल की बहाली और विस्थपितों की लड़ाई भी लड़ रही थी। ए. के. राय पहले पेशे  से इंजीनियर थे लेकिन मजदूरों की दुर्दशा  देख कर वे नौकरी छोड़ कर मजदूर संगठन से जुड़ गए। उन दिनों विनोद बिहारी महतो एक नामी वकील थे और शिबू  सोरेन छोटानागपुर के उभरते आदिवासी नेता, जो अलग झारखण्ड की माँग कर रहे थे। तीनों एकजुट हुए और एक बड़ा संघर्ष  चला। खासकर कोलियरियों के सरकारी होने के बाद। इस संघर्ष  के नारे थे स्थानीय लोगों को नौकरी दो, विस्थापितों  का पुनर्वास करो, नौकरी दो। ये लड़ाइयाँ बहुत लम्बी चलीं। हालांकि बाद में शिबू  सोरेन ए.के. राय से अलग हो गये लेकिन विनोद बिहारी महतो आजीवन ए. के. राय के साथ रहे।
मैं इन स्थितियों का वर्णन इसलिए कर रही हूँ कि धनबाद में एक गॉडडफादर से कई गॉडडफादरों  का बनना, आपस में लड़ना, मारा जाना, मजदूर शक्तियों का उभरना, पटना में सत्ता केन्द्रों का बदलना या केन्द्र में नीतियों का बदलना, बहुत हद तक धनबाद की धरती से ही जुड़ा था। इस तिकड़म, षड़यंत्र , धोखाधड़ी, हत्या और दूसरी तरफ विद्रोह, बलिदान, हक, पहचान और क्रांति की उभरती हुई इच्छा,एक साथ घटते-बढ़ते हुए सुदृढ़  हो रही थी। मैं उसी माहौल में एक बहुत छोटी-सी इकाई के रूप में उभरी और मैंने अपना एक छोटा सा केन्द्र कायम किया। लोग मुझसे जुड़ने लगे या कहूँ मेरे गिर्द जमा होने लगे। मेरे घेरे का दायरा विस्तृत होता गया।

हाँ, तो मैं चर्चा कर रही थी कि गॉडडफादर जब आपस में लड़-लड़कर कमज़ोर हो गए, तो खुले मंच पर जनता के बीच ही एक-दूसरे का गला पकड़ने लगे। एक बार तो कतरास में हो रही इन्टक की बहुत बड़ी सभा में, जो शंकर  दयाल सिंह ने बुलाई थी और जिसमें राष्ट्रीय  कोलियरी मजदूर संघ के अध्यक्ष बी. पी. सिन्हा, महासचिव बिन्देश्वरी  दुबे और कार्यकारिणी के सदस्य सूर्यदेव सिंह भी उपस्थित थे, में मंच पर ही हाथापाई शुरू हो गई। सूर्यदेव सिंह ने मंच पर ही बी. पी. सिन्हा का गिरेबां पकड़ कर उन्हें झकझोर दिया था। बिन्देश्बरी  दुबे तटस्थ बने बैठे रहे थे, जबकि वे महासचिव थे। दरअसल भूमिहार और राजपूत की लड़ाई में ब्राहमणों  की आदत है, दूसरों को लड़ा कर अपने नेता बने रहना, कोई फैसला ही नहीं होने देना। मेरी और दामोदर पाण्डेय की लड़ाई में भी दुबे जी प्रायः चुप्पी साध लेते थे, जबकि एकांत में वे मुझे कहते थे कि मैं ही ठीक हूँ। मैं उन्हें हमेशा  कहती,‘‘हम दोनों की लड़ाई में दोनों कैसे ठीक हो सकते हैं ,कोई एक तो गलत होगा। आप हममें से किसी एक को गलत बता कर लड़ाई का समाधान कीजिए। दोनों को सही बता कर आप खुद तो नेता बने रहते हैं पर हमारी लड़ाई का समाधान नहीं करते।’’

सूर्यदेव सिंह द्वारा बी. पी. सिन्हा को अपमानित करने का असर यह हुआ कि इन्टक के जिस भी नेता ने बी.पी. सिन्हा के अपमान के बारे में सुना वह मजदूरों को लेकर इन्टक कार्यालय धनबाद में आ जुटा। मैं भी लगभग दस हजार मजदूर लेकर बी. पी. सिन्हा के समर्थन में हजारीबाग से धनबाद पहुँच गई। उन दिनों मैं इन्टक में थी और ‘राष्ट्रीय  कोलियरी मजदूर संघ’ की उपाध्यक्ष थी।बरसों से बी. पी. सिन्हा के नेतष्त्व में चला आ रहा भूमिहार और राजपूतों का मेल और संगठन उस दिन दो फाड़ हो गया। हालांकि संगठन में नेतृत्वकारी  भूमिका में या हस्तक्षेप करने की क्षमता रखने वालों में भूमिहार ही ज्यादा थे। राजपूत या पिछड़ा फैक्टर हमेशा  कम था। विडम्बना यह थी कि बी .पी. सिन्हा का विरोध राजपूतों से ज्यादा भूमिहार ही किया करते थे। इसका एक कारण तो यह था कि मालिकों और सत्ता में दबदबे के कारण और राजपूत लठैतों के बल पर बी.पी. सिन्हा दूसरे भूमिहार नेतृत्व  को पीछे धकेल देते थे और मजदूरों की बलि चढ़ा कर अकेले धन-सुख और सत्ता-सुख भोग रहे थे। हालांकि  धनबाद से हमेशा  रामनारायण शर्मा, जो भूमिहार ही थे, सांसद चुने जाते थे। वे राष्ट्रीय  कोलियरी मजदूर संघ के महासचिव भी थे। वे ईमानदार माने जाते थे। वे बी. पी. सिन्हा की गतिविधियों में भाग नहीं लेते थे। या यह कहा जाए कि वे बी. पी. विरोधी थे। बी. पी. सिन्हा ने उन्हें हटाकर राष्ट्रीय  कोलियरी मजदूर संघ का महासचिव बिन्देश्बरी  दुबे को बना दिया था। विडम्बना यह हुई कि एक ब्राहमण के आ जाने से बी. पी सिन्हा द्वारा निर्मित किया गया वर्षों  पुराना राजपूत-भूमिहार-पिछड़ा समीकरण बिगड़ गया और बी. पी. सिन्हा कमज़ोर पड़ गये। हालांकि  संकट की इस घड़ी में उनके कट्टर विरोधी राम नायायण शर्मा (बिरादरी द्वारा) उनके साथ जुड़ने को बाध्य कर दिये गये।

सूर्यदेव सिंह जनता पार्टी के विधायक बन गये। बाद में उसने बी.पी. सिन्हा की हत्या भी करा दी। मैं कई बार बी. पी सिन्हा को चेतावनी दे चुकी थी। बिहार विधान परिषद के सदस्य होने के नाते मैंने कतरास में हुए इंटक के कार्यकर्ता की हत्या पर प्रश्न  उठाए थे, जिसमें सूर्यदेव सिंह और उनके साथियों का हाथ था। तब भी मैंने सिन्हा साहब को उनकी पत्नी डोरोथी के माध्यम से और प्रत्यक्ष रूप से चेताया था। मैंने कहा था,
‘‘देखिए, यह सूर्यदेव सिंह ही आपके लिए खतरनाक साबित होगा। वह आपके लिए खतरा है क्योंकि वह हत्यारा है। उससे स्वयं को बचा कर रखिए।’’ बी. पी. सिन्हा हँस दिया करते थे चूंकि उन दिनों सूर्यदेव सिंह उनके यहाँ बहुत आता था। बी. पी. सिन्हा की पत्नी मुझसे सहमत थी.’ ‘‘रमणिका सही कह रही है, बी केयरफुल ऑफ़  हिम।’’

वर्षों  से बी. पी. सिन्हा की पहली पत्नी उनके यहाँ नहीं आती थी। बी.पी. सिन्हा स्वयं ही गाँव हो आया करते थे। इनका बेटा जवान हो चुका था पर वह घर पर ही रहता था। उसकी पढ़ाई और हॉस्टल का खर्च बी.पी. सिन्हा भेज देते थे। शायद असुरक्षित महसूस होने के कारण ही अपनी हत्या के पहले यानी अपने अन्तिम दिनों में बी. पी सिन्हा ने अपनी पत्नी और बेटे को अपने पुराने घर में आने की इजाजत दी, जहाँ वे अपना दरबार लगाते थे। बी. पी सिन्हा की पकड़ अन्त में अपने कार्यकर्ताओं पर भी ढीली हो गई थी।उनकी पत्नी डोरोथी, जो पार्टियों की रौनक और अंग्रेजी की अच्छी-खासी कवयित्री थीं, से मेरी काफी घनिष्टता  थी। मैं काफी मुंहफट थी। साफ-साफ बात कर दिया करती थी। बी.पी. सिन्हा के कई भूमिहार कार्यकर्ताओं को डोरोथी पसन्द नहीं करती थी, खासकर उमा बाबू को,चूंकि बी.पी. सिन्हा राजनीति में जब कमज़ोर पड़ गए, तो उनके उमा बाबू जैसे चेले-चमचे,काफी अश्लील  हरकतें करके डोरोथी को अपनी ओर आकर्षित  करने की कोशिश  करते थे। डोरोथी मुझसे बताती,बी.पी. सिन्हा से शिकायत भी करती, पर शायद  वे अपनी अक्षमता और उन चमचों को अपनी रक्षा हेतु जरूरी समझ कर, कुछ बोलते नहीं थे। ये काफी बाद की बात है। जब 1960 में मैं धनबाद पहुँची थी तब सभी उनसे बहुत डरते थे।

उपरोक्त परिदृश्य  धनबाद और बिहार के इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। मेरे साथ आगे घटने वाली घटनाओं की पृष्ठभूमि  का भी यह एक महत्वपूर्ण अंग है। मैंने 1960 से लेकर 1980-82 तक का एक संक्षिप्त या कहूँ अधूरा-सा ब्योरा दिया है। मैं स्वयं इसका हिस्सा थी। 1967 में, जब तक मैं धनबाद में रही तब तक बी.पी. सिन्हा की दखलन्दाजी मेरे कार्यों में रही,हालांकि उनकी वर्चस्वता को भी तोड़कर अपनी स्वतंत्र पहचान कायम करने की, उनकी नज़र में हिमाकत,अपनी नज़र में हिम्मत, मैंने की थी। इसके बाद मैं हजारीबाग चली गई, माण्डू से सोशलिस्ट पार्टी का चुनाव लड़ने। 1960 से 1967-68 तक धनबाद में मेरी राजनीति में मेरी सक्रियता विकसित हुई और लक्ष्य पनपा। यह परिदृश्य  आगे घटी घटनाओं के संदर्भ में कई मायने में महत्वपूर्ण रहा। मुझे यह कहने में कोई झिझक नहीं है कि धनबाद में इन सबसे जूझने के लिए जहाँ मेरी जिद ने साथ दिया, वहाँ मैंने अपने समर्थकों का सहारा लेकर भी अपना साध्य साधा। मैंने उनके दुष्मनों का इस्तेमाल भी किया। जहाँ मैंने नेताओं का सहयोग लिया,वहीं उनका उपयोग भी किया। उन्होंने भी मेरा कम दोहन नहीं किया। राजनीति में ऐसा होना आम बात है,फिर मैं उससे कैसे बच सकती थी?आइए अब देखें क्या हुआ जब 1960 में हम धनबाद पहुँचे।

हम धनबाद पहुँचे

हम धनबाद पहुँचे! रहने को कोई घर नहीं था। हम लोग रीजनल लेबर कमिश्नर  रंजीत सिंह के कार्यालय में ही उनके साथ रहने लगे। वे भी कार्यालय के एक हिस्से में रहते थे। उनके पास तीन कमरे थे। उनमें से उन्होंने एक हमें रहने के लिए दे दिया। हमारा किचन साझा था। उनकी पत्नी और छोटी बच्ची हमारी बहुत मदद करती थीं।

धनबाद में मैं नई उड़ान की चाह लिए पहुँची थी। अब तक मैं धरती पर से ही सपने देखती थी,धनबाद में मैंने मुंडेर पर बैठ कर नीचे धरती और ऊपर  आकाश  को देखना शुरू  किया। मुंडेर को ही अपनी उड़ान का प्रस्थान बिन्दु बना कर, आकाश  के पार जाकर आने की, आकाश  गंगाओं को खंगालने की सपना साकार करने की धुन मुझ पर सवार हो गई । ‘मुंडेर’ अगर दूसरे की हो या कमज़ोर हो, तो डर बना रहता है,मुंडेर ढह या छिन गई, तो क्या होगा? कई मुंडेरों के दरकने, ढहने, कमज़ोर पड़ जाने या छिन जाने के बाद मैंने सीखा था,‘खुद ही अपनी मुंडेर बनाना,जो मदद करना चाहे उससे मदद लेना, मुंडेर ढहाने वालों से लोहा लेना!’ और फिर तो! मैं अपनी मुंडेर खुद बन गई। मदद लेना स्वीकार है,पर अहसान नहीं ! तोड़ना चाहते हो, तो आओ, हाथ आज़माओ! जूझने को तैयार हूँ! फिर मैंने इस मुद्रा में और शुरुआत की! प्रकाश  की अफसरी का मैंने कभी सहारा नहीं लिया, उलटे उसकी पत्नी होने के कारण मेरे सब दुश्मन  उसके भी दुश्मन  बन गए थे। खैर! धनबाद धनबाद ही था,है और रहेगा भी!

खैर, जब मैं उससे उबरी और मेरी स्त्री  ने अपनी खोज-खबर लेनी शुरू  की तो मेरी स्वाभाविक प्रवृत्तियाँ लौटने लगीं और मेरी देह में देह की जरूरतें भी हरकत करने लगी थीं। बेरोक-टोक और असीमित प्यार की एक भूख-सी जगने लगी। ऑपरेशन से पहले तो न जाने क्यों जैसे ही प्यार की भूख जगती, मेरे भीतर से डर का एक पुतला स्प्रिंग लगे खिलौने की तरह उछल कर खड़ा हो जाया करता था। वह बार-बार सिर हिला कर पूछने लगता,‘कहीं फिर माँ बन गई तो?’ यह प्रश्न  मेरे प्यार की भूख को ही खा जाता। स्त्री  के लिए यह डर बहुत मारक होता है। अन्तिम क्षणों तक पहुँचते-पहुँचते कभी-कभी इसी भय के कारण वह एक दम ठण्डी पड़ जाती है, शायद यद प्यासी भी रह जाती है। जैसे खड़ी फसल में लगे कनकउए को देखकर चिडि़याँ उड़ जाती हैं, उसी तरह इस डर के कनकउए को देख मेरे आवेश  और जोश  की चिडि़याँ भी उड़ जाया करती थीं। शायद इसी डर से सजग स्त्रियाँ प्रायः अधूरी रह जाती हैं। ऑपरेशन के बाद मुझे बड़ी राहत मिल गई थी। एक विश्वास  जग गया था कि अब नहीं रहूँगी प्यासी,शायद मैं अधूरेपन को भी पूर्णता दे सकूँ।

मैं बच्चा होने के भय से मुक्त हो चुकी थी। मुझे नृत्य  और अभिनय का बड़ा शौक  था उन दिनों। बच्चे नहीं होंगे,तो मुझे अपने शौक  पूरे करने, नृत्य  सीखने और करने का मौका मिलेगा। अभिनय और साहित्य के विकास के लिए समय मिलेगा। हर समय एक डर-सा बना रहता था कि कहीं गड़बड़ हो गई, तो बच्चा पैदा करने और उसे पालने के लिए घर में कैद रहना पड़ेगा। अब वह भी खत्म हो गया था। अनचाहे गर्भ से मुक्ति पाने की सात त्रासदियों से गुजरने के जोखि़म मैं उठा चुकी थी। माँ बनने का डर मनचाहे प्यार-प्रणय की छूट तो देता ही नहीं,उल्टे भविष्य  को भी एक ढर्रे में बांध देता है। स्त्री  को अपना पूरा अस्तित्व आने वाले अस्तित्व के निमित्त खत्म करना पड़ जाता है, चूँकि माँ बनते ही स्त्री  स्त्री  न रह कर माँ में बदल जाती है। माँ के साथ ममता का नाभि-नाल का सम्बन्ध जुड़ा। सच तो यह है कि ममता ही स्त्री  को माँ बनाती है। वह अपनी अन्य पहचानें खो कर, उसी में इतना रम जाती है कि उसे अपने होने की खबर तक नहीं रहती। मैं इस दौर से गुजर चुकी थी। टूटू के पैदा होने के बाद मैं अपना होना ही भूल गई थी।

बच्चे न होने के अहसास ने मुझे स्त्री -सुलभ वर्जनाओं और अनिवार्यताओं से मुक्ति दिलाई थी। अब तो केवल जन्मे हुए बच्चों को पालना है,स्कूल भेजना है। इस आभास ने ही मुझे स्वतंत्राता और निडरता का अहसास करवाया। ‘अब समय पर मेरा अधिकार रहेगा’,यह एहसास मुझे गुदगुदाने लगा। अब माँ पर स्त्री  हावी हो रही थी या कहूँ, अब स्त्री  मुक्त हो रही थी थोपे गये स्त्रीत्व  से और ममत्व की मजबूरियों से। शायद  उर्वशी  की दुविधा भी कुछ ऐसी ही होगी, जब उसने प्यार का अनन्त रास्ता चुना,पुरूरवा के बदले अपने पुत्र के प्यार को चुना। मैंने भी प्यार की प्रक्रिया को चुना। व्यक्ति गौण था मेरे लिए। वह कौन होगा,यह मेरा निर्णय होगा? प्यार का ढंग क्या होगा,वह भी मैं ही तय करूँगी?  मैं खुद को प्रकाश  से मुक्त करने का प्रयास करने लगी थी।
अब मेरी देह मेरी देह बन गई थी और एक औरत की देह को मुक्त प्यार ही पूर्णता दे सकता है।मैं अब मुक्त थी। भय मुक्त ! निडर! मेरे आवेश  पर कोई रोक नहीं थी। यह आवेश  ही तो स्त्री  को पूर्ण करता है। पुरुष  के लिए इस डर के कोई मायने नहीं होते। मैं अब सब परिधियाँ लाँघ सकती थी,सीमाएँ तोड़ सकती थी। दरअसल सीमा में रहना मुझे सदैव कचोटता है, इसलिए सीमा को तोड़ने मात्रा का आभास ही मुझे अत्यधिक सुखकारी लगता है। मैं वर्जनाएँ तोड़ सकती हूँ,इसी की अनुभूति मुझे सुकून देती है। सीमा तोड़ना, मर्यादा उलाँघना, वर्जनाओं को नकारना, मुझे एक विश्वास  देता है कि अपनी देह की मैं खुद मालिक हूँ। मैं संचालक हूँ, संचालित नहीं। स्त्री  के लिए ममत्व एक बहुत ही कोमल-स्नेहसिक्त अहसास है,तो यह एक कड़ा और कठिन बन्धन भी है। इस ऑपरेशन  के बाद मैं उस ढर्रे से मुक्त हो गई, बस रह गया अपने बच्चों के प्रति केवल ममत्व का कोमल अहसास।
(आगे भी जारी )

हरियाणा की मनीपुरी बहुएं

अफ़लातून अफलू


अफ़लातून समाजवादी चिन्तक हैं . समाजवादी जनपरिषद के राष्ट्रीय सचिव हैं ,इनसे इनके ई मेल आई डी : aflatoon@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है

( विकास के सूचकांक में शीर्षतम राज्यों में शामिल हरियाणा में स्त्रियों के प्रति घोर पुरुषवादी नजरिया व्याप्त है . हाल के दिनों में हरियाणा में कुंवारे लड़कों की शादी बिहारी लड़कियों से जीत के मूल्य के रूप में करवा देने की घोषणा भी हुई . इस छोटे से आलेख में अफ़लातून अफलू हरियाणा की इसी पुरुषवादी व्यवस्था ,पतित राजनीति और विकास के मिथ का जायजा ले रहे हैं .) 


स्त्री-पुरुष विषमता को लोहिया आदि-विषमता कहते थे। जाति जैसा ठहरा हुआ वर्ग भी स्त्री-पुरुष विषमता के खत्म होने के पहले टूट सकता है यह अब सिर्फ अनुमान अथवा कल्पना की बात नहीं रही। हरियाणा की खाप-पंचायतों द्वारा अन्तरजातीय  विवाहों का अनुमोदन इसका जीता जागता नमूना है।जातियों का अस्तित्व रोटी-बेटी संबंध से टिका रहता है। जाति के हितों की रक्षा के लिए बनी ये खाप पंचायतें भी हरयाणवी समाज में लुप्त हो रही बेटियों के दुष्परिणाम से घबड़ा कर जाति-बन्धन शिथिल करने के आदेश दे रही हैं। मुख्य तौर पर कन्या-भ्रूण हत्या के कारण हरियाणा में लिंगानुपात लगातार कम होता जा रहा है। अतिशय चिन्ताजनक लिंगानुपात के कारण गरीब राज्यों से बहुएं ब्याह कर हरियाणा लाई जा रही हैं।   हरित क्रांति से समृद्ध बने प्रान्तों में हरयाणा की भी गिनती होती है। हमारे देश के गैर-बराबरी  बढ़ाने वाले विकास के कारण , बिहार, झारखण्ड,ओडीशा,उत्तर बंग,पूर्वी उत्तर प्रदेश के देहाती बेरोजगार पंजाब ,हरियाणाके खेतों में मजदूरी करने जाते हैं । अब लुप्त हो रही स्त्रियों के कारण इन्हीं राज्यों से हरयाणा में बहुएं भी लाई जा रही हैं। इस प्रकारहरियाणावी  समाज ने अपने प्रान्त की लुप्त की गई स्त्रियों को बचाने का कोई सामाजिक आन्दोलन चलाने के बजाए पिछडे प्रान्तों की बहुओं को लाकर तथा उनसे विवाह करने में जाति के बन्धन छोड़ने की छूट देने को बेहतर समझा है।

इस सन्दर्भ मेंस्त्रीकाल में प्रकाशित अमृता ठाकुर का लेख अवश्य पढ़ें : क्लिक करें : बदलाव की बयार : जद्दोजहद अभी बाकी है

मेरे एक हरियाणावी मित्र की माताजी श्रीमती निर्मला देवी ने बताया कि सभी पर-प्रान्तीय बहुओं को ‘मनीपुरी बहु’ कहा जाता है। गौरतलब है कि इस नामकरण का मणिपुर राज्य से संबध नहीं है अंग्रेजी के शब्द ‘मनी’ से संबंध है। शादी-विवाह के मौकों पर गाए जाने वाले लोक-गीतों को मनीपुरी बहुएं नहीं गा पाती। मुझे यकीन है कि कुछ ही वर्षों में इन लोक गीतों को मनीपुरी बहुएं भी सीख जाती होंगी। पर-प्रान्त में विवाह करने वाली मेरी नानी,मामी,मां और भाभियों द्वारा नई भाषा सीख लेने में गजब की निपुणता प्रकट होती थी।

करीब १८ वर्ष पहले रेवाड़ी जिले के एक गांव में चार पांच दिवसीय कार्यक्रम में शरीक होने का मौका मिला था। गांव के बाहर लगी एक सरकारी सूचना को देख कर मैं चौका था। उस सरकारी बोर्ड में गांव में स्त्रियों और पुरुषों की संख्या में अन्तर चौंकाने वाला था।लिंगानुपात राष्ट्रीय औसत से काफी कम था। अनुसूचित जाति के स्त्री-पुरुषों की संख्या भी राष्ट्रीय औसत की तुलना में विषम जरूर थी किन्तु गैर – अनुसूचित तबकों से बेहतर थी। मैंने लौट कर मेजबान साथी को इस विषय में एक पत्र लिखा। बहरहाल , २००१ की जनगणना के बाद से हरियाणा में चिन्ताजनक तौर पर घट रहा लिंगानुपात शैक्षणिक चर्चा का विषय बन गया है।

हरियाणा भाजपा के एक नेता द्वारा मुफ्त में बिहारी बहुएं दिलाने के वायदे  से बिहार के कई नेता आहत होकर बयान दे रहे हैं ।हरियाणा में लुप्त हो रही स्त्रियों और पर-प्रान्त की दारिद्र्य झेल रही स्त्रियों के हरियाणा में मनीपुरी बहु बन कर जाने की बाबत इन बयानों में गहराई से चर्चा नहीं की जा रही है और न ही कोई संवेदना प्रकट हो रही है।हरियाणा में यह समझदारी बन चुकी है कि मनीपुरी बहुओं के न आने से वहां कानून और व्यवस्था की स्थिति बिगड़ जाएगी। इस समझदारी के व्यापक होने के कारण इस प्रकार के विवाह रुक जाएं यह हरियाणा का कोई भी दल अथवा खाप पंचायत नहीं कहेगी । बिहार के नेता इस संबंध के मुफ्त न होने और विधान सभा चुनाव बाद मुफ्त कर दिए जाने के आश्वासन से अपमान-बोध कर रहे हैं।
हमारे देश की विकास नीति कई बार सामाजिक पहेलियां भी गढ़ देती है। यह विदित है कि केरल और नागालैन्ड में लिंगानुपात स्त्री के हक में है। इन राज्यों की साक्षरता और किसी जमाने में प्रचलित मातृ सत्तात्मक समाज की इस सन्दर्भ में शैक्षिक जगत में चर्चा हो जाया करती है। हकीकत यह है स्त्री-उत्पीड़न और हिंसा के मामलों में अब केरल भी पीछे नहीं रहा । पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में स्त्री बहुलता वाला लिंगानुपात पाया गया है । पहली नजर में यह अबूझ पहेली लगता है। जनगणना की जिला रपटों के आधार पर स्थानीय अखबारों में इस बाबत कुछ ऊलजलूल सुर्खियां भी प्रकट हो गई थीं। इस तथ्य के बहाने दावा किया जाने लगा कि यह सूचकांक स्त्री की बेहतर हो रही स्थिति का द्योतक है। वास्तविकता यह है कि भारी तादाद में  प्रवासी पुरुष मजदूरों के कारण जनगणना के दौरान लिंगानुपात स्वस्थ हो जाता है ।

भारतीय समाज की यह विडंबना है कि विकास की दौड़ में जिस राज्य को लाभ पहुंचा वहां औरत की स्थिति इतनी चिन्ताजनक है। राजनीति इतने पतनशील दौर से गुजर रही है कि सामाजिक और क्षेत्रीय गैर-बराबरी के मूल मसलों के समाधान की बात तो दूर उन्हें समझना भी नहीं चाहती । किसी रचनात्मक पहल से उम्मीद बचती है।
अमर उजाला से साभार

थेरीगाथा , बौद्ध धर्म और स्त्रियाँ

रजनीश कुमार


रजनीश कुमार दिल्ली विश्वविद्यालय में बौद्ध अध्ययन विभाग में शोधरत हैं. रजनीश से इनके मोबाइल न 09911639095 पर संपर्क किया जा सकता है

( महात्मा बुद्ध के द्वारा स्त्रियों का संघ में प्रवेश की अनुमति एक युगांतकारी घटना थी . प्रव्रज्या प्राप्त स्त्रियाँ थेरी कहलाती थीं , जिन्होंने कविता में अपनी गाथाएँ लिखीं . थेरी गाथाएँ  तत्कालीन समाज में स्त्री की स्थिति  की समझ के लिए महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज हैं . रजनीश कुमार बौद्ध कालीन इस सामाजिक क्रान्ति की व्याख्या कर रहे हैं इस आलेख में. स्त्रीकाल के दलित स्त्रीवाद अंक में प्रकाशित आलेख का यह एक बड़ा हिस्सा है   )

भगवान बुद्ध  ने संघ में जातिवाद या लिंग भेद को कोई स्थान नहीं दिया। उनकी दृष्टि में सभी लोग समान थे, भगवान बुद्ध ने चुल्लवग्ग में स्पष्ट कहा था, ‘ हे! भिक्षुओं! जिस प्रकार महानदियाँ, महासमुद्र में  मिलकर अपने पहले नाम गोत्र को छोड़ देती हैं ,अर्थात महासमुद्र के ही नाम से ही प्रसिद्ध होती हैं ऐसे ही भिक्षुओ! विभिन्न जाति वर्णों के लोग तथागत द्वारा बतलाये गये। धर्म -विनय में प्रव्रजित होकर पूर्व के नाम गोत्र को छोड़ देते हैं।  अर्थात् दीक्षा लेकर यह भूल जाते हैं कि हमारा अमुक वर्ण था अमुक वंश था।‘
तत्कालीन भारतीय समाज में स्त्रियों की सामाजिक स्थिति काफी निम्नस्तर की थी, उन्हें  सम्मान प्राप्त न था, उसको देखते हुये भिक्षुणी संघ की स्थापना एक बड़ा ऐतिहासिक और साहसिक निर्णय था.  भिक्षुणी संघ की स्थापना कराने में आनन्द का विशेष योगदान रहा- उन्होंने ही भगवान बुद्ध से महिलाओं को संघ में दीक्षित करने के लिए प्रार्थना की थी और तर्क सहित प्रेरित भी किया था।

आनन्द भगवान बुद्ध  के चचेरे भाई थे। इनकी माता का नाम विदेह कुमारी था तथा पिता का नाम अमितोदन था- जो शुद्धोदन  भगवान बुद्ध  के पिता से छोटे थे। बुद्धत्व  प्राप्ति के दूसरे साल भिक्षु आनन्द की प्रव्रज्या हुयी थी। आनन्द पच्चीस वर्ष तक छाया की तरह भगवान बुद्ध  की सेवा करते रहे। आनन्द को चैरासी हजार धर्मस्कंध याद थे। पहली बौद्ध  संगीति में ध्म्म का ज्ञाता होने के कारण उन्हें ‘धम्मधर’ की उपाधि से विभूषित किया गया था .  इन्होंने इस संगीति में मुख्य रूप से भाग लेकर ध्म्म का संगायन किया।
भिक्षुणी-संघ की स्थापना का विवरण  चुल्लवग्ग में मिलता है वह महत्वपूर्ण व ऐतिहासिक है-‘उस समय भगवान बुद्ध  शाक्यों के देश में कपिलवस्तु के न्योग्राधराम में विहार कर रहे थे। तब महाप्रजापतीगौतमी ने भगवान के सम्मुख जाकर निवेदन पूर्वक याचना की , ‘ भन्ते! अच्छा हो यदि स्त्रियाँ भी तथागत के दिखाये धर्म – विनय में प्रव्रज्या पायें.’                  पूरा आलेख पढ़ने के लिए क्लिक करें ( स्त्रीकाल अंक ९ )

गौतमी ने तीन बार प्रार्थना की, भगवान बुद्ध  ने तीनों बार प्रार्थना अस्वीकार कर दी और वहाँ से वे वैशाली चले गये और वैशाली जाकर महावन की कूटागार शाला में विहार करने लगे। कुछ समय पश्चात् महाप्रजापती गौतमी अपना सिर मुड़वाकर पाँच सौ शाक्य स्त्रियों को साथ लेकर  भगवान बुद्ध के पास वैशाली आ गयीं। यात्रा करते-करते उनके पैर फूल गये थे, शरीर धूल से भर गया था और काफी दुःखी व उदास लग रही थीं। जब यहाँ स्थविर आनन्द ने उनकी उदासी का कारण पूछा तो महाप्रजापती गौतमी ने आनन्द को बताया कि ‘स्त्रिायों को बौद्ध  संघ में प्रव्रज्या देने के लिये भगवान आज्ञा नहीं दे रहे,  इसलिये मैं उदास हूँ। तब आनन्द ने भगवान बुद्ध  के पास जाकर स्त्रिायों को संघ में प्रव्रजित करने के लिये तीन बार आग्रह किया ,परंतु भगवान ने तीनों बार अस्वीकार कर दिया। तब आनन्द ने दूसरी प्रकार से भगवान से अनुज्ञा माँगते हुये कहा कि ‘भन्ते! क्या तथागत प्रवेदित धर्म   घर से वेघर,  प्रव्रजित हो स्त्रिायाँ स्रोतापत्ति फल,  सक्रदागामिफल, अनागामि फल तथा अर्हत्व का साक्षात् कर सकती हैं?  भगवान ने कहा, ‘साक्षात् कर सकती हैं, आनन्द !
तब आनन्द ने पुनः कहा, ‘ भन्ते! यदि तथागत-प्रवेदित धर्म -विनय में प्रव्रजित होकर स्त्रियाँ साक्षात् कर सकने योग्य हैं। तो भन्ते! जो अभिभाविका हैं,पोषिका हैं, वह भगवान की मौसी महाप्रजापति गौतमी बहुत उपकार करने वाली हैं, उन्होंने माँ की मृत्यु के बाद भगवान का पालन पोषण किया है। भन्ते! अच्छा हो यदि महिलाओं को प्रव्रज्या की आज्ञा मिले।‘ और तब भगवान बुद्ध ने उत्तरदायित्व पूर्ण नियमों के साथ महाप्रजापतीगौतमी व अन्य पाँच सौ शाक्य महिलाओं को प्रव्रज्या की अनुमति दे दी।

थेरीगाथा-

थेरीगाथाओं में 73 भिक्षुणियों की 522 गाथाओं  का संग्रह किया गया है, जो कि 16 भागों में विभक्त हैं। कुछ  गाथाओं का संग्रह सामूहिक रूप में किया गया है। ये सभी भिक्षुणियाँ बुद्ध कालीन थीं और उनकी शिष्यायें भी थीं। अत्यन्त संगीतात्मक भाग में आत्म अभिव्यंजना पूर्ण गीत काव्य शैली के  आधर पर भिक्षुणियों ने अपने जीवन अनुभव को बताया है.  नैतिक सच्चाई और भावनाओं की गहनता की विशेषता ही उसका काव्यगत सौन्दर्य है। भिक्षुणियाँ निराशावदी नहीं है। निर्वाण की परम शक्ति का वे खुशी से वर्णन करती हैं- ‘अहो सुखं ति सुखो झायामी ‘ ‘अहो! मैं कितनी सुखी हूँ! मैं कितने सुख से ध्यान करती हूँ’ यह उद्गार आत्मध्वनि को प्रदर्शित करते हैं। बार-बार उनका यही प्रसन्न उद्गार होता है, ‘सीतिभूतम्हि निब्बुता’ अर्थात ‘ निर्वाण को प्राप्त कर मैं परम शांत हो गई,  निर्वाण की परम शांति का मैंने साक्षात्कार कर लिया है।‘  थेरीगाथा के स्वरूप को आम्रपाली की गाथाओं  में सन्निहित उद्गारों से समझा जा सकता है-‘ पुष्पराशि से सुगन्ध्ति मेरे केश सुगन्ध् से परिपूर्ण मंजूषा के  समान महकते थे। परंतु आज इनमें खरगोश के  रोमों की सी दुर्गन्ध् आती है। सत्यवादी बुद्ध  के  वचन कभी मिथ्या नहीं होते।‘ इस प्रकार अन्य उत्कृष्ट उद्गारों के  साथ आम्रपाली ने अपनी वृद्धावस्था में अपने शरीर के  प्रति विचार प्रकट किये हैं। इसी तरह के  सभी उदाहरण साहित्यिक दृष्टि से काव्य के  सर्वोत्तम उदाहरण हैं। थेरीगाथा के  संबंध् में  डा.रायस डैविड्स का कथन है कि ‘थेरीगाथा की बहुत सी गाथायें न केवल उनके  बाह्य रूप की दृष्टि से अत्यंत मनोरम हैं बल्कि वे उस उँची आध्यात्मिक साध्ना की भी गवाही देती हैं, जिसका आदर्श बौद्ध  जीवन से  सम्बन्ध् था। जिन स्त्रियों ने भिक्षुणी की दीक्षा ली , उनमें से अधिकांश उँची आध्यात्मिक पहुँच के  लिए और नैतिक जीवन के  लिए प्रसिद्ध  हुईं। कुछ स्त्रियाँ तो न केवल पुरुषों की शिक्षिका तक बन गईं ध,र्म की बारीकियों को समझा सकने वाली, बल्कि उन्होंने उस चिरन्तन शन्ति को भी प्राप्त कर लिया था, जो आध्यात्मिक उड़ान और नैतिक साध्ना के  ही पफलस्वरूप प्राप्त की जा सकती है।‘

थेरीगाथा ग्रंथ की महत्ता इस संबंध् में और अधिक  बढ़ जाती है , जब हमें उसमें इतिहास के  उस कालखण्ड की विशेष जानकारी मिल जाती है, जहाँ भगवान बुद्ध  ने एक ऐसे समय में महिलाओं को आध्यात्म का रास्ता बताया, जब समाज में महिलाओं की भूमिका काफी सीमित व निम्न स्तर की रही हो ,व विश्व की रचना व प्रगति में महिलाओं को भागी मानने के  बजाय पुरुषों ने उन्हें बाधक  के  रूप में देखा हो, तथा ग्रंथ द्वारा यह भी जानकारी उपलब्ध् होती है कि स्त्रियाँ किसी भी दृष्टि से पुरुषों से कम नहीं होती और वे बहन, माँ, पत्नी के  अतिरिक्त एक कुशल शिक्षिका व उपदेशकर्ता भी बन सकती हैं। थेरी शुक्ला द्वारा राजगृह निवासियों को ध्म्म उपदेश देना , थेरी नन्दउत्तरा द्वारा निग्र्रन्थ साधुओं के  साथ तर्क  करना, सोणा भिक्षुणी को स्वयं भगवान बुद्ध  ने भिक्षुणी – साधिकाओं में अग्रणी उद्घोषित किया था, पटाचारा भिक्षुणी द्वारा अपनी भिक्षुणी-शिष्याओं को कुशलता से उपदेशित करना, किसा गौतमी तथा अन्य और बहुत सारी भिक्षुणियों का समाज में अग्रणी भूमिका निभाने का साक्ष्य मिलता है। जो ऐतिहासिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है।
संघ में सभी वर्णों की महिलायें दीक्षित हुई थीं, इससे यह स्पष्ट होता है भगवान बुद्ध  ने सभी के लिये समान रूप से संघ में प्रवेश को बल दिया था। थेरीगाथा में संदर्भ मिलता है कि भिन्न-भिन्न जाति, कुल ,धर्म से प्रव्रजित होने वाली महिलाओं में ब्राह्मण कुल  से- कुल अट्ठारह थेरी  मैत्रिका, दंतिका, सोमा, भद्राकापिलायिनी,नंदउत्तरा, मुक्ता-१ , मुक्ता-2, उत्तमा-2, मित्तकाली, सवुफला,चन्द्रा,गुप्ता, चाला,उपचाला, शीर्षोपचाला, रोहिणी,सुन्दरी,शुभा-2 सम्मिलित थीं। क्षत्रिय वुफल से दो थेरीयाँ, आतरा और सिंहा थीं। पूर्णा, तिष्या-1,तिष्या 2, अभिरूपानन्दा,  मित्रा, सुंदरीनंदा,महाप्रजापतीगौतमी, ये सभी शाक्य कुल  से सात-थेरी संबंध् रखती थी,वैश्य कुल  की सात-थेरी- महिलाओं में ध्म्मदिन्ना, उत्तमा-1, भद्राकुण्डलवेफशा, पटाचारा, सुजाता, अनुपमा, दासी सम्मिलित थीं। जबकि राजवंशों की चार-थेरी- महिलाओं में सुमना-2 ,वृद्ध आलविका ,शैला, क्षेमा, सुमेध आदि थीं। अड्ढकासी और विमला वैश्यायें थीं तो पद्मावती और आम्रपाली जैसी गणिकाओं ने भी संघ में दीक्षा ली थी. इसके अतिरिक्त उच्चकुल -प्रतिष्ठित व कुलीन घरों की महिलाओं की संख्या भी काफी थी यदि पूर्णिका दासी की पुत्री थी तो चापा बहेलिया सरदार की  और शुभा-1 सुनार की पुत्री थी। सारांश यह है कि अनेक जाति-कुलों से आकर महिलाओं ने बुद्ध शासन में दीक्षा ग्रहण की थी, यह एक क्रांन्तिकारी सफलता थी कि महिलाऐं मुक्ति की खोज में स्पष्ट रूप से शामिल थीं,  दूसरे शब्दों में भगवान बुद्ध  व उनके  शिष्य आनन्द- जैसे कुछ  अन्य शिष्यों का यह स्पष्ट मानना था कि जाति की तरह लिंग भी किसी व्यक्ति द्वारा दुःख से छुटकारा पाने के  लक्ष्य में बाधा नहीं हो सकता।

सामाजिक जीवन में ‘स्त्री जीवन  की यदि बात की जाये तो ग्रंथ में तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था के विषय में संपूर्ण जानकारी मिलती है,  थेरीगाथा में सम्मिलित गाथाओं के आधर पर तत्कालीन स्त्री  की स्थिति, घर परिवार की जानकारी, दास-प्रथा, वैश्यावृत्ति,पुनर्विवाह,जाति-वर्ग,अश्पृश्यता आदि को लेकर समाज में क्या मान्यतायें थी, क्या रूढि़याँ थी, सभी का विश्लेषण करने का प्रयास किया है। महिलाएँ घर से बाहर निकल कर उपदेशकर्ता गुरु के रूप में स्वीकारी गयीं ,जो संघ कि में आकर संभव हो सका। उनको संपूर्ण स्वतंत्राता के साथ पूर्ण विकास का माहौल लगभग शत प्रतिशत संघ में मिला, पर यदि बुद्ध  से पूर्व और बुद्ध  काल के सामाजिक जीवन के चिह्न  तलाशें जाएँ तो थेरीगाथा में बहुतायत में मिलते हैं जिनका सहज अनुमान किये गये विश्लेषण के आधर पर लगाया जा सकता है-

गृहकार्यो और उनके कारण उत्पन्न-दुखों से उद्विग्न होकर मुक्ता, गुप्ता और शुभा जैसी स्त्रियों ने घर छोड़कर सन्यास ले लिया था। इसके अतिरिक्त हमें थेरीगाथा से पता चलता है कि इस समय पर दास प्रथा लागू थी। धनिकों  की औरतें अपने घरों का काम नहीं करती थीं,  उनके घर का काम दासियाँ करती थीं। पुण्णिका ऐसी ही दासी थी, वह अपनी गाथा में कहती है- ‘मैं पनहारिन थी। सदा पानी भरना ही मेरा काम था। स्वामिनियों के दण्ड के भय से,उनकी क्रोध् भरी गलियों से पीडि़त होकर मुझे कड़ी सर्दी में भी सदा पानी में उतरना पड़ता था।‘

थेरी सुमंगल माता अपनी गाथा में कहती हैं ‘ सुमुत्तिका सुमुत्तिका, साधुमुत्तिकाम्हि मुसलस्स। अहिरिको मे छत्तकं वा पि, उक्खलिका में देड्डुभं वा ति।।  ‘अहो! मैं मुक्त नारी हूँ। मेरी मुक्ति कितनी ध्न्य है! पहले मैं मूसल ले कर धान कूटा करती थी, आज मैं उससे मुक्त हो गई हूँ। मेरी दरिद्रावस्था के वे छोटे-छोटे ,खाना पकाने ,  बरतन धोने के कामों से मैं मुक्त हो गई हूँ , मेरा निर्लज्ज पति मुझे उन छातों की छतरी से भी तुच्छ समझता था, जिन्हें वह अपनी जीविका के लिए बनाता था।‘

मुत्ता थेरी की अपनी गाथा इस प्रकार है– ‘सुमुत्ता साधुमुत्ताहि, तीहि खुज्जेहि मुत्तिया, उदुक्खलेन मुसलेन, पतिना खुज्जकेन च। मुत्ताम्हि जातिमरणा, भवनेत्तिसमूहता ति।। ‘मैं अच्छी तरह से विमुक्त हो गई हूँ। तीन टेढ़ी चीजों से ओखली से, मूसल से और अपने कुबड़े स्वामी से, मैं अच्छी तरह मुक्त हो गई हूँ। मैं आज…..जाति और मरण से भी मुक्त हो गई हूँ। मेरी संसार-तृष्णा ही समाप्त हो गई है।‘
गुत्ता थेरी  ने पुत्र और धन  संग्रह आदि भौतिक ऐश्वर्यों को त्याग कर प्रव्रज्या ग्रहण की थी- गुत्ते यदत्थं पब्बज्जा, हित्वा पुत्तं वसुं पियं.’

सुनार की बेटी सुभा थेरी  ने क्या-क्या छोड़ा, गाथा में उत्तर इस प्रकार है- ‘मैं अपने सभी भाई-बंधु, सम्बन्धी  जनों,दास, सेवक, ग्राम, विस्तृत और समृदद्ध  खेत, जीवन की सभी रमणीय प्रमोदकारी वस्तुएँ और विपुल सम्पत्ति आदि सब को छोड़ कर प्रव्रजित हो गई।‘

संघा थेरी  इस मामले में मनोवैज्ञानिक बात कहती हुई वर्णन करती है- ‘प्रव्रज्या ले कर मैंने घर छोड़ा, अपनी प्रिय सन्तान को छोड़ा, अपने प्रिय पशुओं को छोड़ा। राग और द्वेष को छोड़ा, अविद्या को छोड़कर विरक्त हुई। तृष्णा को समूल नष्ट कर अब मैंने निर्वाण की परम शक्ति का अनुभव किया है। निर्वाण का अनुभव करके मैं परम शान्त हो गई हूँ।’ थेरी इसिदासी की गाथाओं में असमान समाज-व्यवस्था और परिवार में अपने ही पति द्वारा तिरस्कृत-स्त्री  की कथा मिलती है। वह निर्दोष व सदाचारिणी रूप में रहकर दासी के समान सबकी सेवा करती रही। जिस पुरुष की उसने सेवा की उसी ने उपेक्षा की और तिरस्कृत किया और अपमानपूर्वक त्याग भी दिया था। इसी वितृष्णा से पूर्ण इसिदासी ने उसी को छोड़कर सभी वासनाओं पर मुक्ति पा ली थी,  और उसी अन्याय से क्षुब्ध् होकर उसने उपसम्पदा ग्रहण की और भिक्षुणी-संघ में प्रवेश लिया था। अतः नारी की समाज में क्या स्थिति थी कुछ हद तक इसका साक्षात् प्रतिबिम्ब इसिदासीथेरी की गाथाओं में वर्णित है।

सोमा थेरी श्यामा ने अपनी प्रिय सखी की मृत्यु के कारण शोक  मग्न होकर प्रव्रज्या ली और चित्त की शान्ति प्राप्त करने में सपफल रही। उब्बिरी थेरीगाथा में उब्बिरी के रूप में उस स्त्री  की करुण स्वर है जो पसेनदि राजा की राजमहिषी होने के उपरान्त भी अपनी कन्या की मृत्यु के कारण निरन्तर श्मशान में विलाप करती थी। पुत्री  से पुत्रा की श्रेष्ठता तो युगीन सामाजिक-सन्दर्भों की अपनी विशेषता थी। तथागत के उपदेश से उब्बिरी ने अपनी शोक-विमुक्ति की उद्घोषणा की थी। कठोर-साध्नारत चीरवरधरिणी भिक्षुणियों में प्रधान  मानी जाने वाली किसागोतमी थेरी की गाथा में दुःख का अनुभव करने वाली सहस्रों उन अनेक स्त्रिायों की मानसिक-वेदनाओं की यातना भरी है जो सदैव दुखमय-जीवन की यात्रा में ही अपनी नियति देखती है।
शाक्यवंशीय सुन्दरी नन्दा अपने परिवारजनों के प्रव्रजित होने के कारण भिक्षुणी-संघ में सम्मिलित हुई थी। तथागत ने जिस मानव-मुक्ति का द्वार खोला, उसके प्रभाव से उसके सभी परिवार जन बौद्ध  ध्म्म में दीक्षित हो बुद्ध  के अनुयायी बन गए। तब नन्दा ने सोचा- ‘इस सांसारिक जीवन का मेरे लिए भी क्या महत्व है!  बाद में भगवान ने जिस रूप की अनित्यता का उपदेश दिया था उसके कारण उसका स्वयं के प्रति भी आकर्षण नहीं रहा। जीवन की अनित्यता और दुःख के कारण नन्दा का चित्त वैराग्य में स्थित हुआ और देह-सौन्दर्य से विमुख उस नन्दा ने अपनी ही प्रज्ञा से शाश्वत-सत्य का अवलोकन किया व निर्वाण प्राप्त किया।

पटाचाराथेरी की मर्मान्तक वेदना कठोर से कठोर चित्त वाले के हृदय को विचलित करने वाली वेदना की कथा है। धनी  श्रेष्ठि-परिवार की कन्या पटाचारा अपने दुःखों को सहती अकेली विक्षिप्त सी घूमती रही थी। सब कुछ अनित्य है इस तथ्य का बोध् होने पर पटाचारा की चित्त-साध्ना निर्वाणोन्मुख दीपशिखा की भांति पूर्ण निवृत्त रूप में उसके उद्गारों में व्यंजित हुई है। महाप्रजापतीगौतमी भारतीय नारी-जीवन के इतिहास में युगान्तरकारी चेतना की अग्रदूत बनीं। अनेक जाति-संस्कार से विमुक्त होकर प्रजापति द्वारा भगवान् बुद्ध  के दर्शनोपरान्त भाव-विभोर होकर की गयी वन्दना निश्चय ही पालि-साहित्य का उत्कृष्ट अंश है। अतः सर्वोत्तम व कालजयी ऐसे ही उद्गार अन्य थेरियों ने भी व्यक्त किये हैं। बौद्ध भिक्षुणियों द्वारा व्यक्त की गई सभी गाथाएँ मानव इतिहास की सबसे सशक्त अभिव्यक्तियाँ हैं।

भगवान बुदद्ध स्त्रिायों को संघ में ऐतिहासिक प्रव्रज्या देकर, शिक्षा के अध्किार की दृष्टि से उनके ज्ञान प्राप्ति में सहयोगी बने थे। अतः स्त्रियों के सम्पूर्ण उत्थान पतन के लिये भगवान बुद्ध  से पूर्व काल से लेकर आधुनिक काल तक की स्थिति पर ध्यान देना आवश्यक है। आदिकाल से लेकर इतिहास के सभी कालखडों में विभिन्न रूपों में स्त्री  की स्थिति में बहुत परिवर्तन हुये हैं ,समाज में उसे कभी तो मानवीय तथा कभी अमानवीय दृष्टियों से देखा गया। जिनका सम्पूर्ण  प्रभाव स्त्री की शिक्षा, विवाह, परिवार, संपत्ति और सत्ता संबंधी  अध्किारों पर पड़ा है। इन अधिकारों के प्रकाश में किसी भी समाज में स्त्री  की सामान्य स्थिति को परखा जा सकता है। लेकिन समाज में स्त्री  का स्थान और स्वरूप जानने के लिये उसकी दीर्घ जीवन परम्पराओं को देखना जरूरी है। और इसके लिये सभी उपलब्ध् ऐतिहासिक ग्रंथों , दस्तावेजों और साहित्यिक रचनाओं को ही आधर माना जा सकता है। थेरीगाथा ग्रन्थ  व सम्पूर्ण पालि साहित्य इसी क्रम की महत्वपूर्ण कड़ी हैं।

कर्मानन्द आर्य की कवितायें

कर्मानन्द आर्य


कर्मानन्द आर्य मह्त्वपूर्ण युवा कवि हैं. बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय में हिन्दी पढाते हैं.इनसे इनके मोबाइल न 8092330929 पर संपर्क किया जा सकता है

( कर्मानन्द आर्य ने स्त्रीकाल के आग्रह पर अपनी कई कवितायें भेजी . इस मह्त्वपूर्ण युवा कवि को प्रकाशित कर हमें खुशी हो रही है , समय -समय पर इनकी और कवितायें ह्म यहां प्रकाशित करते रहेंगे. )

1. इस बार नहीं बेटी

मैं तुम्हें प्रेम की इजाजत देता हूँ
और काँपता हूँ अपने व्यक्तिगत अनुभवों से
अपने जीवन की सबसे अमूल्य निधि तुम्हें भी मिलनी चाहिए

देखता हूँ तुम तल्लीनता में खोई रहती हो
निश्चित तौर पर प्रेम बढ़ाएगा तुम्हारा अनुभव
तुम चाहो तो जी भरकर प्रेम करो

प्रेम करो इसलिए नहीं कि प्रेम पूजा है
प्रेम पर टिकी हुई है दुनिया
इसलिए क्योंकि सबसे बुरा अनुभव मिल सकता है प्रेम से
मिल सकता है रूठने मनाने का हुनर

जिसने सीखा है अपने अनुभवों से
वह जिन्दगी में कभी असफल नहीं हो सकता
कभी टूट नहीं सकता रूठने मनाने वाले का घर

प्रेम प्रयोग की वस्तु है
प्रेम करो और बताओ अपनी सहेलियों को
अपनी माँ को बताओ अपनी मूर्खताएं

वह सब करो जो किया है मैंने
जो मैंने जिया तुम भी जी सकती हो
पर सीखना अपनी माँ से भी

वह प्रेम में हारकर सब हार गई

2 . सार्त्र और सिमोन दि बोउवार

एक :
जब सात्र ने उसे मुखाग्नि दी
वह लिपटकर बहुत रोई

वह राख से रोई
वह आग में सिमटती रही
जब तक प्रेम जला

एकान्त में उसने देखा
प्रेमी की आँखों में जल रही थी एक चिता

धुएं जैसा धुँआ
आग जैसे आग
प्रेम जैसा प्रेम
उसने पहले भी महसूस किया था

उसने हर पल प्यार किया था
अनुभव की थी सात्र की गंध

सात्र ने उसको देखा था
उसने सात्र को जिया था प्राण देकर
दो :
दफ़न होने के ठीक पहले उसका प्रेम जिन्दा था
खेलता था
नहाता था
खाता था

रगों में दौड़ता था खून बनकर
किताबों में अक्षर बन फैल जाता था

उसकी खुशबू फैली थी रसोई में
बाग़ में फूलों में
खेत में

उसने किया था नौका विहार भी
वह गया था लांग ड्राइव

उपेक्षिता उसकी नियति नहीं
सिमोन को पता लग गया था बहुत पहले

उसने मृत्यु के साए में जिया था प्रेम
किया था युद्ध पहले समाज से
फिर स्वयं अपने खिलाफ

रोज हार जाती थी
वह रोज हार जाती थी
प्रेम का खेला

तीन :

उस सदी में वह अकेली औरत थी
जिसने किया था प्रेम
बहुत पढ़े-लिखे आदमी से

आदमी के देखने, चलने, सोचने
सबसे उठती थी मीठी खुशबू

उसकी रगों में प्रेम मृत्यु के बाद भी जिन्दा था
जवानी थी सुख भरी
सात्र उसकी जिन्दगी था

मृत्यु कुलबुला रही थी भीतर
वह जब-जब उससे मिली थी
वह मिली थी जब जब खुद से

सात्र की हथेलियों ने पहली बार छुआ था
औरत के फौलादी हाथ
जो लोहा पिघलाते थे

वे खुरदुरे हो गए थे प्रेम के कारण
प्रेम उन्हें जगह देता था

प्रेम फुदकता था
मृत्यु की छाया में
जीवन खेलता था अठखेलियाँ

सात्र ने तैरना सीख लिया था माँ के गर्भ में
चौबीस कैरेट का होना उसने जान लिया था

अक्सर होने और खत्म हो जाने के बाद भी
अनजान रहते कि उनके भीतर कोई दिल भी था

सिमोन जानती थी
उसके पास अपनी जान के सिवाए कुछ नहीं है,
प्यार तो मरते दम तक (…शायद मरने के बाद भी) रहेगा.

3. देह बहकती है देह साधो योगिनी
………………………………………………………

उसको साधो जो मिट्टी का बना है
हवा को साधो
पानी और आग से बनी इस काया में
थोड़ा निर्वात रहने दो

तुम्हारे समर्पण का नाम है प्रेम
तुम्हारे झुक जाने का नाम है श्रद्धा
झुको नहीं काया फूट पड़ती है

यम नियम सबसे ज्यादा तुम साधती हो
पुरुष साधता है आसन
फिर तुम्हें धकेल देता है विस्तर से नीचे

तुम नीचे और नीचे झुकती जाती हो
जब तक तुम लगा लो न वज्रासन

प्राणायाम तुम्हारे लिए नहीं हैं
नहीं हैं कुंजल क्रियाएं
नेति और धोती भी नहीं है तुम्हारे लिए

समझो जिसे तुम छुपाती हो
वही मिट्टी तुम्हारे जीवन को नरक बनाती है

नरक बनो स्त्री
नरक का द्वार तुम्हारे लिए नहीं है

4. घायल देश के सिपाही

(इरोम शर्मिला के लिए जिसने मृत्यु का मतलब जान लिया है)

लड़ रही हूँ की लोगों ने लड़ना बंद कर दिया है
एक सादे समझौते के खिलाफ
कि “क्या फर्क पड़ता है”
मेरी आवाज तेज और बुलंद हुई है इन दिनों
घोड़े की टाप से भी खतरनाक

मुझे जिन्दगी से बहुत प्यार है
मैं मृत्यु की कीमत जानती हूँ
इसलिए लड़ रही हूँ

लड़ रही हूँ की बहुत चालाक है घायल शिकारी
मेरे बच्चों के मुख में मेरा स्तन है
लड़ रही हूँ जब मुझे चारो तरफ से घेर लिया गया है
शिकारी को चाहिए मेरे दांत, मेरे नाख़ून, मेरी अस्थियाँ
मेरे परंपरागत धनुष-बाण
बाजार में सबकी कीमत तय है
मेरी बारूदी मिट्टी भी बेच दी गई है

मुझे मेरे देश में निर्वासन की सजा दी गई है
मैं वतन की तलाश कर रही हूँ

जब मैं फरियाद लिए दिल्ली की सड़को पर घूमती हूँ
तो हमसे पूछा जाता है हमारा देश
और फिर मान लिया जाता है की हम उनकी पहुँच के भीतर हैं
वो जहाँ चाहें झंडें गाड़ दे

हमारी हरी देहों का दोहन
शिकारी को बहुत लुभाता है
कुछ कामुक पुरुषों को दिखती नहीं हमारी टूटी हुई अस्थियाँ
सेना के टापों से हमारी नींद टूट जाती है
उन्होंने हमें रण्डी मान लिया है

उन्हें हमारे कृत्यों से घृणा नहीं होती है
उन्हें भाता है हमारा लिजलिजापन
वह कम प्रतिक्रिया देता है
सोचता है मैं हार जाउंगी

घायल शिकारिओं आओ देखो मेरा उन्नत वक्ष
तुम्हारे हौसले से भी ऊँचा और कठोर
तुम मेरा स्तन पीना चाहते थे न
आओ देखो मेरा खून कितना नमकीन और जहरीला है

आओ देखो राख को गर्म रखने वाली रात मेरे भीतर जिन्दा है
आओ देखो ब्रह्मपुत्र कैसे हंसती है
आओ देखो वितस्ता कैसे मेरी रखवाली करती है
देखो हमारे दर्रे से बहने वाली रोसनाई
कितनी लाल और मादक है

क्या सोचते हो मेरा पुनर्जन्म नहीं होगा
मैं अपनी पीढ़ियों में कायम हूँ
मैं इरोम हूँ इरोम
इरोम शर्मिला चानू

पूनम शुक्ला की कवितायें

पूनम शुक्ला


पूनम शुक्ला कवितायें , कहानियाँ और गजल लिखती हैं . हिन्दी की प्रमुख पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं . गुडगाँव में रहती हैं . पूनम से उनके ई मेल आई डी : poonamashukla60@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है

1.  इच्छा -1

मौन भी एक हथियार है मेरे पास
पर उसका इस्तेमाल करते-करते
थक चुकी हूँ मैं
अब चीखना चाहती हूँ बहुत जोर से
ताकि गूँज उठे पूरा ब्रह्मांड ।

2.   इच्छा- 2

कहाँ सुनी गईं
हमारी धीमी आवाज़ें
कभी रिरियाना
कभी मौन
याचना,प्रार्थना
सिसकना, रोना
अब जोर से बोलना चाहती हूँ
खूब जोर से हँसना चाहती हूँ
पर पहले चीखूँगी
इस निढ़ाल पड़े शरीर
और मस्तिष्क को
इस स्नायु तंत्र को
मौन ने जकड़
कर दिया है संवेदनहीन
स्पंदित तो हो पहले
ऊर्जा का स्रोत
आओ मिलकर चीखें ।

3.   इच्छा – 3

जब भी आते हो घर में
झल्ला ही पड़ते हो
पता नहीं कहाँ से
कुछ न कुछ
दिख ही जाता है तुम्हें
तुम्हारा चीखना
पुश्तैनी हथियार है
या पुरुषत्व की धार
पर अब चाहती हूँ
तुम्हारा मौन
अब मैं चीखना चाहती हूँ ।

४ . जीवन एक युद्ध है

नजर आता है
हर तरफ
एक युद्ध
अंदर बाहर
घर में गली में
दुकानों में,माल्स में
अस्पतालों,दफ़्तरों ,बैंकों की
लंबी कतारों में
अपने उनके सबके विचारों में
खुद के विचारों में

इस शरीर के भीतर भी
युद्ध ही है
लड़ती हैं सैकड़ों कोशिकाएँ
आक्रमण,संक्रमण के खिलाफ

हर दिन लोहा लेती है
एक स्त्री
विभिन्न विचारों
विभिन्न अनिच्छित कार्यों
विभिन्न जुल्मों के खिलाफ
पर लोहा लेते हुए
कम हो जाता है
उसके रुधिर में
लोहे का स्तर

एक स्त्री
नव सृजन को
दे देती है
अपनी मजबूत हड्डियों का
एक अंश
फिर थोड़ी कमजोर हुई
हड्डियों के सहारे
अपने शरीर का बोझ उठाते
चलती रहती है
सुबह से रात तक
साथ छोड़ने लगती हैं हड्डियाँ
कहीं पोली ,
कहीं आकृति बदलने लगती हैं हड्डियाँ
औरत फिर लड़ती है
अपनी ही हड्डियों के खिलाफ

कैल्शियम और आयरन की
गोलियाँ गटकती हुई
बखूबी जानती है
आज की औरत
जीवन एक युद्ध है ।

५. . सुनने में

मैं सुनती हूँ
ये सभी बोलते हैं
और मैं बस सुनती हूँ ।

एक बार मेरे शिक्षक नें
कहा था मुझसे
तुम बहुत ध्यान से सुनती हो
तुम एक अच्छी श्रोता हो

तब से सुनने की
आदत ही डाल ली है
लगता है कि शायद
ये एक बहुत बड़ी कला है
एक अच्छे श्रोता से
अच्छा ,भला और क्या है

पर हरदम बोलने वाले
ये नहीं जानते
कि सुनना भी
एक कला है
वे बस बोलते है
बस बोलते ही जाते हैं
और मैं सुनती हूँ
मैं एक-एक शब्द सुनती हूँ
इनकी तेज आवाजें
इनकी सिरफिरी बातें
इनके खून का उबाल
जबान का तीखापन
हँसी भी आती है
कि ये कितना बोलते हैं

पर इसी सुनने में
मैं पा जाती हूँ
सुलझी हुई गुत्थियाँ
एक नया रास्ता
कँटीले रास्तों पर
चलने का नायाब तरीका
इस गुत्थमगुत्थ रहस्यमयी
जीवन का रहस्य
और ये ………
बस बोलते हैं ।

स्केच / सुनीना

६. . नया मिश्रण

भरा हुआ था
कल से ही भीतर
कुछ खौलता सा
आज फिर एक और चिन्गारी
और चिल्ला उठी वो
पर तभी एक आवाज़

चुप बोलना नहीं
ऊँची आवाज़ में
नहीं तो …….

उफनते दूध को
किसी तरह
समेट लिया उसने
वरना गिरता
फैलता,जलता
दुर्गंध ही फैलाता

पर उसकी आँखों में
उमड़ आया सैलाब
जोर की एक हिचकी और

चुप ……..
रोना नहीं…..
मेरे सामने नौटंकी नहीं

रोक लिया उसने
उफनते सैलाब को भी
खारा सैलाब
उफनता दूध
दोनों को समेट लिया है
उसने भीतर
उसे भी नहीं पता
क्या होगा
इस नए मिश्रण का
नया परिणाम ।

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ आगे आये महिला संगठन

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दहेज़ कानूनों के दुरुपयोग को लेकर सर्वोच्च न्यायालय के हालिया निर्णय के खिलाफ चारो ओर आक्रोश है . आज पटना में भी ८ महिला संगठनो ने सर्वोच्च न्यायालय से इस पर पुनर्विचार की अपील की है और बिहार सरकार से भी अपील की है कि वह सर्वोच्च न्यायालय में एक पुनर्विचार याचिका दाखिल करे .

क्या है पूरा फैसला :  पढने के लिए क्लिक करें ; अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य 

फैसले के मुख्य बिंदु को हिंदी में पढ़ने के लिए क्लिक करें : हम चार दशक पीछे चले गए हैं 

महिला संगठनो की अपील :

माननीय सर्वोच्च न्यालय का 498(A) से संबंधित फैसला चिंताजनक

महिला आंदोलन के लंबे संघर्ष का नतीजा था कि महिला उत्पीडन के खिलाफ सख्तकानून बने, इन्ही कानूनों में था 498(A). पर 2 जुलाई 2014 को 498(A) सेसंबंधित जो फैसला माननीय सर्वोच्च न्यालय ने दिया वह महिलाओं के आंदोलनके  दशकों के संघर्ष के लिए एक बड़ा धक्का है. यह फैसला ऐसे वक्त में आया जब दहेज विरोधी आन्दोलन की एक नेत्री सत्य रानी चड्ढा अब हमारे बीच नहीं रहीं. सत्य रानी चड्ढा का संघर्ष उनकी बेटी के लिए न्याय से शुरू हुआ. जिसकी ह्त्या दहेज के लिए 1979 में की गयी, और दिल्ली उच्च न्यायालय से उन्हें 2013 में न्याय प्राप्त हुआ जब उनके दामाद को दोषी पाया गया.

इस सन्दर्भ में आज 8 महिला एवं सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों की बैठक हुई जिसमें यह चिंता व्यक्त की गयी की 2 जुलाई 2014 को ‘अर्नेश कुमार बनाम बिहार सरकार’ के मामले में जो फैसला माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने दिया उस से महिलाओं को न्याय पाने में अब अधिक कठिनाई का सामना करना पडेगा क्यूंकि यह आदेश सिर्फ इस वाद तक सीमित नहीं बल्कि इस का असर हर महिला उत्पीडन के मामले पर होगा. इसका अनुपालन न होने पर माननीय सर्वोच्च न्यालय की अवमानना का मामला दर्ज होगा.

दुखद यह है की जिस तरह की भाषा का इस्तमाल इस आदेश में किया गया है वह हिंसा का सामना कर रही महिलाओं को नीचा दिखाता है. उदाहरण के लिए आदेश में कहा गया है कि 498(A) को “असंतुष्ट पत्नियों” द्वारा एक “हथियार” के रूप में इस्तमाल किया जा रहा है. साथ ही यह आदेश एक संज्ञेय अपराध को गैर-संज्ञेय अपराध बनाने की दिशा में एक कदम है. यह गौरतलब है कि आपराधिक दंड संहिता की धारा 41 (A) के हम सब पक्षधर हैं क्यूंकि यह सुनिश्चित करता है की कोई भी गिरफ्तारी बिना सोचे समझे नहीं की जानी चाहिए और यही आदेश के बिंदु 1 से 4 में दिया गया है हमारी आपत्ति  बिंदु 5 से है जिस से यह कानून संज्ञेय से लगभग असंज्ञेय हो जाता है और यह पुलिस की गिरफ्तारी करने की ताकत को छीन लेता है. न्यायालय
को एक संज्ञेय अपराध को असंज्ञेय बनाने का अधिकार नहीं है ऐसा करना लोक सभा का अधिकार है.

माननीय सर्वोच्च न्यालय के फैसले में उन लोगों के लिए चिंता व्यक्त की गयी है जिन्हें 498(A) के झूठे मामलों में गिरफ्तारी का असम्मान सहना पड़ा, हम भी ऐसे मामलों में सहानुभूति रखते हैं, पर साथ ही यह पूछना चाहते हैं कि क्या इस सदर्भ में एक वैज्ञानिक शोध की आवश्यकता माननीय सर्वोच्च न्यालय को नहीं लगती? क्या कुछ व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर हिंसा की शिकार हज़ारों महिलाओं को सिर्फ “असंतुष्ट पत्नियां” कह कर उचित न्याय से वंचित रखा जाएगा? इस सन्दर्भ में हम सभी प्रतिनिधि मांग करते हैं कि :

.             माननीय सर्वोच्च न्यायालय अपने निर्णय पर पुनर्विचार करे
२.             बिहार सरकार इस निर्णय में “review petition” सर्वोच्च न्यायालय में दायर करे

सुधा वर्घीज़ (नारी गुंजन), निवेदिता, शरद, अनिता मिश्रा (बिहार महिला समाज), अमृता भूषनण (लायंस क्लब), शशि यादव, अनीता सिन्हा (ऐपवा), संजू सिंह (महिला हेल्पलाइन), सुधा (शक्तिवर्धिनी), मोना (रंगकर्मी), कामायनी (NAPM)आदि के द्वारा जारी इस अपील के साथ यह निर्णय भी लिया गया है कि महिलाओं का एक प्रतिनिधि मंडल इस मसाले पर बिहार सरकार से बात करेगा. इस फैसले की सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ताओं ने भी आलोचना की है .

फैसले पर अरविंद जैन के द्वारा  वृहद्  आलोचनात्मक टिप्पणी को पढ़ने के लिए क्लिक करें : न्याय व्यवस्था में दहेज़ का नासूर 

लल द्यद की काश्मीरी वाख कविता

(  लल द्यद मध्यकालीन भक्त कवयित्रियों में प्रमुख नाम है . स्त्रीकाल के लिए फारूक शाह लल द्यद की कविताओं की प्रस्तुति कर रहे हैं , इन कविताओं के अनुवाद  फारूक शाह ने किये हैं.
मध्यकाल की भक्ति कविता पर काफी काम हो  रहे हैं , कुछ स्त्रीवादी भी. लल द्यद पर भी स्त्रीवादी कामों में एक उल्लेखनीय काम  है  , जयश्री काक का  . )

अनुवादक का नोट :

लल द्यद : ललमोज, ललारिफ़ा, लल्लेश्वरी आदि नामों से भी ख्यात काश्मीरी शैव धर्म (त्रिक, प्रत्यभिज्ञा दर्शन) की परंपरा से संबंधित संत कवयित्री है. काश्मीरी लोक की मौखिक किंवदंतियों में योगी सिद्ध श्रीकंठ, नून्द रुषी (शेख नूरुद्दीन वली) और पीर अली हमदानी के साथ जुड़ी हुई यह रहस्यवादी संत-कवयित्री का स्वीकार सभी धार्मिक वर्गों व जाति के लोगों में समान रूप से है. इसलिए कश्मीरी लोक में वे शैव योगिनी, सूफी दरवेश तथा अपने अपने समुदाय की मानी जाती हैं. सदियों से उनकी वाख (सूक्ति) कविताएँ मर्मी लोक के ह्रदयों में उजाला फैलाती आई है. ऐतिहासिक साक्ष्यों से जो जानकारी मिलती हैं उसके अनुसार : जीवनकाल 1317 से 1388 ई. के दौरान. जन्म-स्थान पाम्पोर के निकट पान्द्रेठन (वर्तमान सिमपोर). निधन श्रीनगर-जम्मू के मार्ग पर स्थित बिजबिहाड़ा गाँव में माना जाता है.

उन्होंने मानप्रतिष्ठा की सारी मर्यादाओं को तिलांजलि देकर सतचिंतन में निरत एक रमती-डोलती योगिनी के रूप में जीवन बिताया. भीतर की अंतरी चाल से अस्तित्व के उँचे मुकाम पार किये, सत्य के प्रदेशों को दूर तक जाना. साथ ही लल द्यद ने उस समय के प्रसिद्ध सूफ़ी नून्द रुषी और पीर अली हमदानी के साथ मिलकर हाशिये के ग्रामीण लोगों में बौद्धिक व प्रगतिशील चेतना जगाकर उनके उत्कर्ष का बहुत बड़ा काम किया था. वे ऐसे लोकशिक्षक के तौर पर सदियों से काश्मीर के लोक-हृदयों में बिराजती आईं हैं जिसने जीवन विरोधी प्रथाओं से मुक्त मानव-मूल्य आधारित समाज-व्यवस्था का निर्माण करने का प्रयत्न अपने युग में किया हो.

उनकी ‘वाख’ कविताओं में अस्तित्व के सत्य की खोजी एक स्त्री का संघर्ष, लोकशिक्षण की भूमिका और अस्तित्व के पूरे सत्य की ऊंचाई से उच्चरित पूर्ण मनुष्यत्व के बोध की अभिव्यक्ति – ये तीनों स्तर दिखाई देते हैं. लिखित व मौखिक परम्पराओं के जरिये सदियों का रास्ता तय करती हुई ये कविताओं में लल द्यद की प्रखर मेधाशक्ति की प्रतीति देते ऐसे सच की ध्वनि गूँज रही है जो पूरे भाव से अंतर्सिद्ध चेतना को जगाए. चौदवें शतक में लल ने कही हुई इन कविताओं को आज आधुनिक इसलिए मानें कि वे आज भी जीवंत रूप से बह रही हैं, अस्तित्व की स्वर्णिम संभावनाओं को संकेत करती…
जार्ज ग्रियर्सन और डॉ. बर्नेट ने 1914 में लल-वाखों का संचय किया था. रिचर्ड टेम्पल ने भी वाखों का अंग्रेजी में अनूदित ग्रन्थ 1924 में दिया था. इन अनुवादों और मूल काश्मीरी पाठ की रोमन-देवनागरी प्रतियों के आधार पर यहाँ पर उनकी कुछ वाखों का रूपांतर हिन्दी में देखें :

लल द्यद की कविताएं :

आ गई सीधी राह से
लेकिन वापस न जा सकी
सीधी
चली जा रही थी बीच के पुल पर
कि दिन ढल गया
जेब में हाथ डाला तो
मिले न एक पैसा भी
अब पार उतरने के लिए
नाविक को
दूँ भी तो क्या दूँ ?

O

किस दिशा
और किस मार्ग से आई
नहीं जानती
किस दिशा और किस मार्ग से जाऊँगी
यह भी नहीं जानती
कोई तो मुझे सच बता दे
केवल प्राण–साधना का आधार तो
किसी काम का नहीं

O

बाण मिला
काठ के धनुष के लिए
तो वह घास का
बढ़ई मिला राजमहल बनाने
तो वह भी निपट बुद्धिहीन
मेरी दशा तो हो गई
बीच बाज़ार में
बिना ताले की दुकान हो ऐसी
रही मेरी देह तीर्थ-विहीन
भला, कौन समझ सकता है
मेरी इस लाचारी को ?

O

सड़क पर चिपक गया
पैर के तलुवों का मांस
तभी दिखाया
मुझे जिसने मार्ग
जो उस एक का नाम सुनेंगे
वे क्यों न पागल हो जाए ?
लल ने तो निकाल ली
सौ बातों में से

सार की एक बात
O

मैं एक थी
अनेक हो गई
पास रहकर भी रही दूर
अंदर–बाहर
दिखाई देता था एक
पर ये चौपन चोर (1)
सब कुछ खा-पी गए
और
मुझे धोखा देकर चले गए

O

सूई की नोक
या बाल जितनी भी
कभी पीछे न रही
मैंने भीतर के अंधकार को
पकड़ लिया
पकड़ के उसे चीर डाला

O

प्रेम की ओखली में
मैंने हृदय को कूटा
मेरी कुवृत्ति नष्ट हो गई
मैं हो गई बिलकुल शांत
बाद में
इस हृदय को भूना-पकाया
और चखा

अब मैं यह न जानूँ
मर जाउँगी
या जीवित रहूँगी ?

O

आई संसार में
तप करने के लिए
बुद्धि के प्रकाश में
पाया सहज (2) को
न मेरा कोई मरेगा
न तो मैं
किसी के लिए मरूँगी
मरूँ भी तो वाह
जीवित रहूँ भी तो वाह !

O

हृदय का सारा मल
जला डाला
जिगर का भी किया अंत
उसकी दहलीज पर अंचल पसार
बैठ गई अडिग
तभी कहीं जाकर हुआ
मेरा ‘लल’ नाम प्रसिद्ध

O

तन मन से खो गई
उसके ध्यान में
मुझे सत की घण्टी बजती
सुनाई दी

मैंने धारण कर लिया
अपनी धारणा को
और
आकाश-पाताल का भेद
जान लिया

O

पठन सरल
पर पालन मुश्किल
मुश्किल है सहज की खोज भी
अभ्यास के घने कुहरे में
भूल गई सभी शास्त्र
तब पा लिया चेतन आनंद को

O

अभी देखी
बहती नदी
और अभी देखा
उस पर न कोई सेतु
या पार उतरने
छोटी-सी कोई पुलिया भी

अभी देखी
फूलों से लची हुई डाली
और अभी देखे
उस पर
न फूल, न तो काँटे

O

कौन सोया हुआ है
और कौन जागा हुआ ?
कौन सा वह सरोवर है
जिससे रिसती है बूंद बूंद ?
वह कौन सी चीज़ है
जो हर के लिए आराधनीय है ?
और वह कौन सा परमपद है
जो प्राप्त होता है ?

O

अपनी चमड़ी को काटकर
तूने गाड़ दिए खूंटे
शरीर में चारों ओर
बोया नहीं भीतर ऐसा कोई बीज
मिले जिससे फल
अब तुझे समझना तो ऐसा
जैसे शिखर पर कंकर फेंकना
या बैल को गुड़ खिलाना

O

एक ज्ञानी को देखा
भूख से मरता
मानो पोष के पवन से जर्जर होता
और देखा
एक रसोइये को
मूर्ख के हाथों पीटता

मैं लल,
उस घड़ी की राह देखने लगी
जिसमें मेरा भवबंधन छूटे

O

देव पत्थर
देवल भी पत्थर
ऊपर – नीचे
एक समान ही स्थिति
रे पंडित,
इसमें किसकी करेंगा तू पूजा ?
इसीलिए कहती हूँ
अपने मन और प्राण को
एक कर दे !

O

जानते हुए भी
बन जा मूढ़
देखते हुए भी अंध
सुनते हुए भी बन जा बधिर
और जागते हुए भी जड़
जो जैसा बोले
उसके साथ वैसा ही बोल
यही अभ्यास है तत्त्वविद्‌ का

O

सर्वत्र व्याप्त है शिव
बारीक जाल बिछाये
कैसे वह रच-पच गया है
सबके शरीर में
उसे जीते जी नहीं देखेगा
तो क्या मरकर देखेगा ?
विवेक और मार्गचिंतन से काम ले
और ढूँढ़ निकाल उसे
अपने अंदर ही

O

वहाँ नहीं
वाणी, मन, कुल या अकुल
मौन मुद्राओं का भी
वहाँ प्रवेश नहीं
शिव और शक्ति भी
वहाँ रहते नहीं
तुम्हारे पास
बचा है जो शेष
वही परम उपदेश है

O

शील और मान तो
टोकरी में जल भरने जैसे
हाँ,  जो पवन को
मुट्‌ठी में बंद कर सके
और हाथी को
एक बाल से बाँध सके
वह हो जाएगा निहाल

O

अभ्यास से विस्तार का
लय हो जाए
तब दिखाई देने लगे
सगुण और गगन एक
शून्य भी हो जाता है नामशेष
बच जाता है केवल
अनामय शिव (3)
हे पंडित,
यही एकमात्र उपदेश है

O

छ: वनों को पार करके
मैंने शशिकला (4) को जगाया
मुझे पवन से प्रकृति को
सुखाना पड़ा
तब कहीं जाकर मैं
अपने शिव को पा सकी

O

तन पर
ज्ञानवस्त्र धारण कर
लल ने कहे जो पद
उन्हें हृदय में उतारना
प्रणवधून (5) के वाद्य पर
जैसे लल हो गई लीन
वैसे ही तेरे भीतर भी प्रकट होगी
मृत्यु की भ्रांति को नष्ट करती
जाग्रत ज्योत

O

शून्य का एक असीम मैदान
पार किया
तब मुझे, लल को
न बुद्धि रही न होश
सहज का भेद पाकर
कीचड़ में उगे कमल जैसी
हो गई

_____________________
1. ज्ञानेन्द्रियाँ-मनोवृत्तियाँ और विकार आदि चौपन पिण्ड व मनोगत घटक 2-3. समस्त अस्तित्व का पूरा सच, पूर्ण सत्य 4. शैवतंत्र अनुसार समस्त अस्तित्व के परम सत्य की ओर जाने वाला स्थान 5. उस सत्य की अनादि ध्वनि, अनाहत नाद, नाम, इस्मे-आज़म

स्त्रीकाल पर फारूक शाह की प्रस्तुतियां और  उनकी रचनायें : ( क्लिक करें )
1. एक ऐसा इतिहास जो लिखा न गया किताबों में
२. जब अपने संकल्प के साथ एक निर्भ्रांन्त जीवन शुरू किया
३. कुएं में मेढक : तेलगू कहानी

जोहरा आपा तुम्हें लाल सलाम!

स्वतंत्र मिश्र


स्वतंत्र मिश्र अपनी प्रतिबद्ध पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं. उनकी सरोकारी पत्रकारिता के लेखन का एक संकलन ‘जल, जंगल और जमीन : उलट-पुलट पर्यावरण’ नाम से प्रकाशित हो चुकी है.स्वतंत्र स्त्रीकाल के प्रिंट एडिशन के सम्पादन मंडल के सदस्य भी हैं . इनसे उनके मोबाइल न 9953404777 पर सम्पर्क किया जा सकता है.

( स्वतंत्र मिश्र ने १० जुलाई को दुनिया को अलविदा कह गई जोहरा सहगल को याद करते हुए मशहूर अदाकारा की जिन्दादिली  तथा शासन व्यवस्था और तंत्र की बेदिली का चित्र खींचा है और स्त्री स्वतन्त्रता तथा   कला के प्रति जोहरा के जज्बे को सलाम किया है. )

इसी साल,   अभी-अभी तो बीते 27 अप्रैल को ,  मशहूर नर्तकी-कोरियोग्राफर-अभिनेत्री (रंगमंच और फिल्म)जोहरा सहगल, ने 102 साल पूरे किए थे और इतनी जल्दी दुनिया को उनके अलविदा कह जाने की खबर से थोड़ा सकते में हूं ,क्योंकि जोहरा का मतलब जिंदगी और जिंदादिली से है। ऐसा उनके नाम का शाब्दिक अर्थ है या नहीं है, मुझे नहीं पता है। हां,  उनकी जीवटता को देखकर उनके नाम का अर्थ यूं ही कुछ-कुछ हो सकता है। उन्होंने कुछ साल पूर्व एक साक्षात्कार के दौरान एक पत्रकार के यह पूछे जाने पर कि वे 97  की हो गई,  उन्हें मौत से डर नहीं लगता तो उन्होंने पलट कर इस बेहूदे सवाल के जवाब में एक सवाल किया- ‘कौन दुनिया से पहले जाएगा,  मैं या आप,  यह कौन तय करेगा ?’ इसके बाद उन्होंने उस पत्रकार से कहा- ‘ मौत तय है, फिर क्यों डरना ! हां,  जिंदगी अनिश्चित है ,इसलिए  खुशी और सुकून पाने के लिए कुछ चीजें जरूरी हैं , मिसाल के तौर पर , मेहनत  , और मैं ताउम्र ऐसा करती रहूंगी।‘ जाहिर है कि उन्होंने अपने जीवन के लिए तय किए गए इस अनुशासन का सामर्थ्य  रहने तक दृढ़ता से पालन किया। टाइम्स ऑफ इण्डिया को एक साक्षात्कार में उन्होंने ९७ साल में भी अपनी जीजीविषा के लिए ‘ ह्यूमर और सेक्स’ को श्रेय दिया था. उन्होंने कहा था कि ‘ ह्यूमर के बिना जिन्दगी बोरियत से भर जाती है और सेक्स मैं आज भी चाहती हूँ , क्योंकि वह आपकी सक्रियता को बनाए रखता है.’  उन्होंने 95 वर्ष तक फिल्मों में काम किया। इसी साल की सर्दियों में मुझसे ‘शुक्रवार’ के तात्कालिक संपादक विष्णु नागर ने सरकार द्वारा उन्हें एक भूतल का मकान मुहैया नहीं कराने को लेकर एक स्टोरी करने को कहा। यह तो मेरे लिए मानो बिन मांगी मुराद जैसी ही बात थी। मैंने फिल्म निर्माण से जुड़े अनवर जमाल से उनकी बेटी किरण का मोबाइल नंबर लिया।किरण ने भी बहुत सहजता से समय दे दिया और उनके दिल्ली स्थित मंदाकिनी एन्कलेव वाले घर में हुई बातचीत के दौरान उन्होंने ही बताया कि अनवर ने जोहरा सहगल पर एक शानदार डाक्यूमेंट्री फिल्म भी बनाई है। मेरे साथ ‘शुक्रवार’ के ही मेरे वरिष्ठ सहयोगी मित्र नरेंद्र कुमार वर्मा और छाया पत्रकार मित्र रवि गिरोटा ने भी जोहरा से मिलने के लोभ में साथ चलने की इच्छा जताई। हम उनके घर पहुंचे। किरण से खूब सारी बातचीत हुई लेकिन जोहरा आपा से मिलने की मुराद पूरी नहीं हो पाई। इसकी वजह उनका स्वास्थ्य का दिन-ब-दिन गिरता चला जाना था। इसकी वजह केंद्र और दिल्ली सरकार द्वारा उनकी एक अदना से भूतल वाले घर की मांग पूरी न किया जाना था। एक वजह शायद यह भी हो कि जिन्होंने सात दशक से भी ज्यादा समय तक रंगमंच, कोरियोग्राफी,  विज्ञापन और फिल्मों में काम किया हो और कभी हार न मानी हो। जिसने हर बार कैमरे या व्यक्तिगत जीवन में सभी से पूरे जोशोखरोश से मिलना-मिलाना किया हो, जिनके पांवों ने कभी थिरकने से मना न किया हो, अब वे पूरी तरह अशक्त और कुर्सियों से बंध सी गई थी,  ऐसे में वे किसी के सामने कैसे आना मंजूर करतीं ! जो हमेशा यह कहतीं रही कि मैं रोहिल्ला पठान हूं, कभी हार नहीं मानूंगी,  ऐसे में  भला शून्य में टकटकी लगाए हुए जोहरा क्यों किसी से मिलना पसंद करतीं। सो हम उनके दर्शन से वंचित रह गए। हालांकि ओडिशी की मशहूर नृत्यांगना किरण ने हमारा बहुत गर्माहट से स्वागत किया और हम जोहरा से नही ,तो उनके अक्श, उनकी बेटी से तो मिल ही आए। वे भी सत्तर से ज्यादा की हो चुकी हैं। बच्चों को नृत्य सीखाने का काम करती हैं।

किरण ने हमसे मां और खुद के प्रति सरकारी उपेक्षा का दुःख बांटा और उम्मीद भी की कि शायद खबर छपने से कुछ असर हो जाए। हमारे  सहित तमाम अखबारों का कोई असर नहीं हुआ और सरकार ने उन्हें मरने तक भी भूतल का मकान नहीं मुहैया कराया। हां, मेरी खबर का असर इतना जरूर हुआ कि मुझे प्रसिद्ध पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र, वरिष्ठ कहानीकार अशोक गुप्ता सहित कुछ और लोगों ने फोन करके इस बारे में दिल्ली, केंद्र सरकार को पत्र लिखने की बात की थी पर यह किसी वजह से नहीं हो पाया। हम जिंदगी की तेज रफ्तार में कई बार कीमती आखिरी सांसों की परवाह करना तो दूर उन्हें रौंदते हुए आगे बढ़ जाना चाहते हैं। ऐसा ही इस मामले में भी हुआ। आज जब दफ्तर से जब घर लौटा तो जिंदगी और रोजीरोटी की जद्दोजहद में शरीर पस्त हो चुका था। संजीव चंदन का फोन आया कि जोहरा ने दुनिया को अलविदा कह दिया। मैं अवाक रह गया। संजीव चंदन ने पूछते हुए और लगभग याद दिलाते हुए उनके घर, उनकी बेटी के साथ की मुलाकात को समेटते हुए स्त्रीकाल वेबसाइट के लिए कुछ लिखकर देने का आग्रह किया। थोड़ी देर के लिए मुझे लगा कि क्या लिखूं और इस समय क्या लिखूं। पर उनकी जीवनी के किस्से मुझे एक-एक करके याद आने लगे। मेरे अंदर एक आवेग पैदा हुआ। मुझे लगा शायद इसी आवेग का नाम जोहरा है।

किरण ने जोहरा से मिलने की बात करने पर कहा कि वे मुलाकात के लिए 5000 रुपये और फोटो खीचने के दस हजार रुपये मांगती हैं। मैंने अफसोस जताया कि मेरे पास अगर 15 हजार रुपये होते तो मैं मुलाकात के पांच और फोटो के दस हजार रुपये जरूर देता क्योंकि मेरा मानना यह था कि जोहरा की मुलाकात का कीमत नहीं लगाया जा सकता है। मुंबई में कुछ होटल सिने तारिकाओं के साथ डिनर करने के भारी-भरकम रकम वसूल करता है। यह रकम उनकी चमकती त्वचा और उनके ग्लैमर की होती है। जोहरा के पास अब यह सब कुछ भी नहीं था ,लेकिन जोहरा के पास अतीत में किए गए काम की लंबी-चैड़ी पूंजी थी, जो किसी भी संवेदनशील व्यक्ति के लिए जोहरा के एक दर्शन पर न्योछावर करने के लिए काफी थी। अब उनके दांत टूट चुके थे। उन्हें न के बराबर दीखता है। सुनने की मशीन (हियरिंग एड) लगाने के बाद वह अपनी बेटी किरण सहगल से शाम के समय 15-20 मिनट बात कर पाती थीं। उल्लास और पूरे लय के साथ जिंदगी की गाड़ी खींच लेने के बाद सरकारी रवैये से खिन्न होकर जोहरा सबसे दूर अपने कमरे में ही बंदी जैसा जीवन बिता रही थीं। डाक्टर ने उन्हें अनिवार्य तौर पर सर्दियों में धूप खाने को कहा था लेकिन दूसरे मंजिल पर स्थित  से नीचे पार्क तक पहुंचने का मतलब एक भीषण पीड़ादायी प्रक्रिया से गुजरना होता था। जोहरा और किरण ने संयुक्त रुप से केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय, राज्यसभा सांसद श्याम बेनेगल,संगीत नाटक अकादमी और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री और दिल्ली के वर्तमान लेफ्टिनेंट गवर्नर को एक सरकारी आवास (ग्राउंड फ्लोर) मुहैया कराने के बारे में लिखा था, लेकिन मंत्रालय ने उनकी फाइल पर इस आशय का एक नोट लिखा कि कलाकार श्रेणी के अन्तर्गत 40-60 साल के लोगों को ही आवास मुहैया कराए जाने का प्रावधान है और वे इस श्रेणी में नहीं आती हैं। किरण ने बताया था कि ऐसी स्थिति में कैबिनेट से मंजूरी लेकर सरकार जोहरा और किरण को आवास मुहैया करा सकती थीं लेकिन उन्हें ऐसा करना बीते चार सालों में मुनासिब नहीं लगा। कभी जिनके पांवों के थिरकने और भाव-भंगिमा को देखने के लिए दुनिया के अलग-अलग मुल्कों में उनके प्रशंसक मचल उठते थे अब वे पैर कुर्सियों से बेजान होकर बंध से गए थे।

जोहरा का जन्म 27 अप्रैल 1912 में उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में एक रोहिल्ला पठान के घर हुआ था। एक साल की उम्र में उनकी आंखों की रोशनी ग्लूकोमा की वजह से खो गई थी। वर्मिंघम में काफी इलाज के बाद उनमें रोशनी लौट पाई। छोटी सी उम्र में उनकी मां गुजर गईं लेकिन मां की इच्छा थी कि उनकी बेटियां लाहौर में पढ़ें। जोहरा को शिक्षा-दीक्षा के लिए लाहौर भेज दिया गया। वे वहां से जर्मनी के ड्रैसडेन स्थित मैरी विगमैन नृत्य स्कूल में दाखिला लिया। वे यहां दाखिला लेने वाली पहली भारतीय थीं। उन्होंने यहां बुर्का उतारकर फेंक दिया और कहा कि इस कपड़े से अच्छा पेटीकोट बन सकता है। उस जमाने के मशहूर नर्तक उदयशंकर अपनी टीम के साथ नृत्य प्रदर्शन के लिए यूरोप की यात्रा पर थे।

किरण सहगल के साथ स्वतंत्र मिश्र : छाया रवि गिरोटा

जोहरा ने उदयशंकर से मिलकर उनके साथ काम करने की इच्छा व्यक्त की तो उदय ने पाठ्यक्रम पूरा करने के बाद उन्हें अपनी टीम में नौकरी देने का वादा किया लेकिन जोहरा को अचानक एक दिन उदयशंकर जी का एक तार मिला-‘हमलोग जापान नृत्य-यात्रा पर जा रहे हैं, क्या तुम हमारे साथ आ सकोगी?’  1935 में वे उदयशंकर के साथ जुड़ीं और पांच साल लगातार मिस्र, यूरोप और अमेरिका के अलग-अलग इलाकों में नृत्य टोली के साथ मुख्य नर्तकी की भूमिका का निर्वहन किया। इसके बाद उदयशंकर ने अल्मोड़ा में ‘उदयशंकर इंडियन कल्चरल सेंटर’ की नींव रखी। यहां जोहरा लोगों को नृत्य सिखाती थीं। उदयशंकर नृत्य शैली की उस जमाने में इतनी धूम थी कि उनसे नृत्य सीखने के लिए बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता और निर्देशक गुरूदत्त भी कुछ महीने अल्मोड़ा में टिक गए थे। जोहरा ने उदयशंकर के साथ आठ साल काम किया। यहीं जोहरा की मुलाकात वैज्ञानिक, पेंटर और नर्तक कामेश्वर सहगल से हुई। जोहरा ने कामेश्वर के खुद से आठ साल उम्र में छोटे होने और रूढि़वादी परिवार से नाता रखने के बाद भी शादी की। शादी के दो दिन बाद ही भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गांधी जी को समर्थन देने के चलते पति-पत्नी दोनों को जेल जाना पड़ा। जेल से छूटने के बाद वे मुंबई पलायन कर गए।

जोहरा 1945 में पृथ्वीराज कपूर की पृथ्वी थियेटर से जुड़ गईं। उनकी छोटी बहन उजरा बट्ट पहले से ही पृथ्वी थियेटर के लिए काम कर रही थीं। इन्हीं दिनों जोहरा इंडियन पीपल्स थियेटर एसोसिएशन (इप्टा) से जुड़ गईं। इन्होंने इप्टा से जुड़कर 14 साल तक काम किया। इप्टा के प्रोडक्शन में बनी ख्वाजा अहमद अब्बास द्वारा निर्देशित फिल्म ‘धरती के लाल’ में इन्होंने पहली बार पर्दे पर काम किया। इसके बाद इन्होंने चेतन आनंद की ‘नीचा नगर’ और गुरुदत्त की ‘बाजी’ में काम किया। सलमान खान के साथ ‘हम दिल दे चुके हैं सनम, शाहरुख खान के साथ ‘वीरजारा’ रणवीर कपूर के साथ ‘सांवरिया’ में काम किया। इन्होंने 2007 में आखिरी फिल्म ‘चीनी कम’ में  अमिताभ बच्चन के साथ काम किया था।

जोहरा के इस दुनिया से चले जाने के बाद क्या अपसंस्कृति के इस दौर में सांस्कृतिक अभियान को खड़ा करने के लिए कोई मुहिम छेड़ी जा सकेगी ? अगर ऐसा कुछ भी किया जा सका ,तो निश्चित तौर पर यह जोहरा के प्रति दी गई सच्ची श्रद्धांजलि होगी,  अन्यथा यह दुनिया तो आनी-जानी है ही। दिलों में वही पीढ़ी दर पीढ़ी बने रह जाते हैं, जो जीवन या समाज के लिए कुछ रच देना चाहते हों। जोहरा का इप्टा से 14 वर्षों तक जुड़े रहना, शादी के दो दिन बाद जेल जाना, यह अपने आप में यह बताता है कि वे मुक्ति का सपना देखती थीं। वे औरतों, बच्चों, युवाओं की मुक्ति का सपना देखती थीं तभी तो उन्होंने बहुत छोटी उम्र में बुर्का उतारकर फेंक दिया था। जोहरा का पर्देदारी और घुटन से भरी इस दुनिया से आज तक मुक्ति मिल पाई है ? आज भी औरतों के चेहरे को तेजाब से जलाने की कोशिश जारी है। आज उनकी देह पुरुषवादी सत्ता के निशाने पर है और यही वजह है कि यहां हर 22वें सेकेंड में दुष्कर्म की घटना को अंजाम दिया जा रहा है। जोहरा के सपनों की दुनिया को पूरा करने की मुहिम चल रही है पर उसकी धार अभी भी मर्दवादी समाज की कोशिशों के आगे कमजोर दिखाई पड़ते हैं। जोहरा को श्रद्धांजलि देने का मतलब तभी पूरा हो पाएगा जब मर्दवादी समाज की दीवारें ध्वस्त करके समतामूलक और स्वतंत्र समाज की स्थापना की जा सकेगी।

जोहरा आपा तुम्हें लाल सलाम!


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पुष्पा गोस्वामी की कवितायें

पुष्पा गोस्वामी


पुष्पा गोस्वामी मीडिया से जुड़ी हैं, इनसे इनके ई मेल आइ डी : <pushpagoswami@gmail.com> पर सम्पर्क किया जा सकता है

. अलाव में स्त्रियाँ
दहकते , सुलगते
गृहस्थी के अलाव में भुनती हैं
ताउम्र स्त्रियाँ
काली स्याह रातों में
सर्द उम्मीदों ,
उंघते सपनों
और ठिठुरती आत्मा से
सहेजती हैं
खोया हुआ पाने
और पाए हुए को न खोने की इच्छाएं
वे तमाम इच्छाएं
जो आशाओं और आशंकाओं के मध्य
चटखती , सुलगती है दिन रात
कमबख्त न कोयला बनती हैं
न होती हैं राख .

२. देह भर हैं वे
ये कैसी आग है
जिसमें
केवल देह बन कर
भुनती हैं स्त्रियाँ
रिश्तों , मान्यताओं और संस्कारों से परे
जिनका कोइ नाम
नहीं होता ,
सुर्ख़ियों में ढलकर
वे रोज आती हैं
अखबारों के पहले पन्ने पर,
वितृष्णा उपजाते हुए

वे बनती हैं केवल नगरवधू
न राधा , न सीता , न दूर्गा
न कोइ दूसरा नाम
चटखारों , गलीज मान्यताओं
और भद्दी कल्पनाओं के बीच
वे बस माध्यम भर बन जाती हैं
एक प्रक्रिया का ,
एक गलीज प्रक्रिया का !
३. सबक
ठोकनी होगी
कुछ मजबूत कीलें
पृथ्वी के ताबूत में ,
आँखें मूंदे –मूंदे
सूरज के चक्कर काटते हुए
थक चुकी है वह ,
उनींदे सपनों  से जागकर
कुनमुनाने लगी है,
और तो और
तारों को भी बताने लगी है
कि प्रकाश का जादू तो
हमारे स्वयं के भीतर होता है ,
सूरज के उजाले का उधार चुकाए बिना ही
उसने तोड़ दिया है सप्तपदी का घेरा ,
सूरज समझता है सब
तान ली है इसीसे से
उसने भस्म कर देने वाली दृष्टि
पृथ्वी को सबक सिखाने के लिए ,
इसी से दिन ब दिन बढ़ती जा रही है
पृथ्वी की गरमी इन दिनों !

न्याय व्यवस्था में दहेज़ का नासूर

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अरविंद जैन


स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. अ‍रविंद जैन से उनके मोबाइल न . 9810201120 पर या उनके ई मेल आई डी : bakeelsab@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है

“आमतौर पर सिर्फ कानून बनाने से ऐसी सामाजिक समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता, जिन की जड़ें बहुत गहरी हैं. कानून बनाना जरूरी और अनिवार्य है, हालांकि इन्हें हर संभव दृष्टि से देखना चाहिए. देखना चाहिए ताकि कानून के साथ-साथ सामाजिक चेतना का प्रसार हो सके और समय को नया रूप-स्वरुप दिया जा सके.” (दहेज़ निषेध अधिनियम, 1961 पर संयुक्त संसदीय समिति की रिपोर्ट में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु की टिप्पणी)

दहेज उत्पीड़न विरोधी कानून की मूल विडंबना है कि यह स्त्रियों को सुरक्षा कम देता है, आतंकित और भयभीत ज्यादा करता है. आज तक इसका लाभ, वास्तविक पीड़िताओं को कम ही मिल पाया है. ईमानदारी से कहूँ तो साफ़ तौर पर कारण यह है कि कानून की भाषा में दहेज़ माँगना, लेना या देना किसी भी तरह ‘अपराध’ नहीं है, दहेज़ हत्या ‘दुर्लभतम में दुर्लभ’ मामला नहीं, दहेज़ उत्पीड़न ‘मृत्यु से ठीक पहले’ होना सिद्ध करो और अब दहेज़ अपराधियों की गिरफ्तारी पर भी रोक या अंकुश. नैशनल क्राइम रेकॉर्ड ब्यूरो 2013 की रिपोर्ट के मुताबिक, देश में हर घंटे एक महिला दहेज हत्या का शिकार हो रही है लेकिन दहेज प्रताड़ना के अधिकाँश मामले तो दर्ज ही नहीं होते. कानूनी जाल-जंजाल या समाज में बदनामी के भय से, उत्पीड़ित महिलाएं सामने नहीं आतीं और घुट-घुटकर जीती-मरती रहती हैं. इस सब के बावजूद देश की सब से बड़ी अदालत का कहना है कि महिलाएं कानून का ‘नाजायज इस्तेमाल’ ढाल की बजाय, हथियार के तरह कर रही हैं. सच यह है कि इस देश में बहुत से कानून हैं, मगर महिलाओं के लिए कोई कानून नहीं है और जो हैं वो अंततः स्त्री विरोधी हैं.

दहेज कानून का ‘दुरुपयोग’: गिरफ़्तारी पर अंकुश

2 जुलाई 2014 को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति चंद्रमौली कुमार प्रसाद और पिनाकी चन्द्र घोष की खंड पीठ ने, अरनेश कुमार बनाम बिहार राज्य  ( क्लिक करे) के मामले में दहेज कानून का ‘दुरुपयोग’ रोकने के लिए महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है. सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि जिन मामलों में 7 साल तक की सजा हो सकती है, उनमें गिरफ्तारी सिर्फ इस आधार पर नहीं की जा सकती कि आरोपी ने वह अपराध किया ही होगा.
गिरफ्तारी तभी की जाए, जब पर्याप्त सबूत हों, आरोपी की गिरफ्तारी ना करने से जांच प्रभावित हो, और अपराध करने या फरार होने की आशंका हो. अदालत के निर्देश यह भी हैं कि दहेज मामले में गिरफ्तारी से  पहले केस डायरी में कारण दर्ज करना अनिवार्य होगा, जिस पर मजिस्ट्रेट जरूरी समझे तो गिरफ्तारी का आदेश दे सकता है. इस आदेश की अनदेखी करने पर अधिकारी के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई की जानी चाहिए. माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश जारी किया है कि दहेज उत्पीड़न के मामलों में भी आरोपी को बहुत जरूरी होने पर ही  गिरफ्तार किया जाना चाहिए. सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 498 ए या दहेज़ प्रतिषेध अधिनियम की धारा 4 तक ही सीमित नहीं है, बल्कि ऐसे सभी मामलों के लिए है जिनमे अपराध की सजा सात वर्ष से कम हो या अधिकतम सात साल तक हो. उल्लेखनीय है कि इस निर्णय द्वारा पति के सम्बन्धियों को भी ‘रक्त-विवाह और गोद संबंधों’ तक ही सीमित कर दिया गया है. शेष किसी सम्बन्धी के खिलाफ मामला नहीं चल सकता.

सत्या रानी चड्ढा अपनी बेटी शशिबाला की तस्वीर के साथ , शशिबाला १९७९ में
दहेज़ ह्त्या की शिकार हुई . इसके बाद सत्या रानी चड्ढा न सिर्फ अपनी के लिए
लड़ती रहीं , बल्कि वे दहेज़ के खिलाफ लड़ाई की प्रतीक बन गई. इसके पहले कि
उच्चतम न्यायालय का यह फैसला दो जुलाई को आया वे १ जुलाई को दुनिया को
अलविदा कह गईं

सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार फिर से महिलाओं द्वारा दहेज़ कानून के ‘दुरूपयोग’  पर ‘गहरी चिंता’ जताते हुए कहा है कि यह कानून बनाया तो इसलिए गया था कि महिलाओं को दहेज़ प्रताड़ना से बचाया जा सके, परन्तु कुछ औरतों ने इसका ‘नाजायज इस्तेमाल’ किया और दहेज उत्पीड़न की झूठी शिकायतें दर्ज कराईं हैं. उल्लेखनीय है कि यह सर्वोच्च न्यायालय का ऐसा पहला या आखिरी निर्णय नहीं है, जिसे किसी न्यायमूर्ति विशेष का पूर्वग्रह या दुराग्रह मान-समझ कर नज़र अंदाज़ किया जा सके. हिंसा, यौन-हिंसा, घरेलू  हिंसा से लेकर सहजीवन में सहमति के संबंधों तक पर, उच्च न्यायालयों समेत और भी न्यायालय विवादस्पद सवाल उठा चुके हैं. दहेज़ कानूनों से परेशान ‘पति बचाओ’ या ‘परिवार बचाओ’ आन्दोलन भी सक्रिय है.

कानून अधिकार या हथियार?

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए के ‘दुरुपयोग’ पर दिशा-निर्देश महिला संगठनों को बेहद चौंकाने वाले हैं. विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में ही स्त्रियों द्वारा दहेज़ कानूनों का ‘दुरूपयोग’ किया जा रहा है या पुलिस-अभियोग पक्ष की कमजोरियों के कारण सजा नहीं हो पाती ? क्या अपराधियों को गिरफ्तारी में असीमित छूट से पुलिस की निरंकुशता और भ्रष्टाचार को बढ़ावा नहीं मिलेगा? सही है कि स्त्री-पुरुष के लिए एक जैसा होना चाहिए, मगर क्या दोनों की सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक स्थिति समान है? यह भी सही है कि निर्दोष की अविवेकपूर्ण गिरफ़्तारी या सजा नहीं होनी चाहिए, परन्तु यह काम तो पुलिस अधिकारी का है ना कि जांच-पड़ताल से पता लगाए- कौन-कौन अपराध में शामिल थे या नहीं थे? न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत ही है कि भले ही ‘हजारों निर्दोष छूट जांए, पर किसी निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिए.’ ‘न्यायिक बुद्धिमता’ और ‘विवेक’ के कैसे-कैसे सिद्धान्त गढे-मढे जा रहे हैं, जो सचमुच अन्याय, शोषण और उत्पीड़न के खिलाफ उठने वाली हर आवाज़ का गर्भ में ही गला घोंट देना चाहते हैं.

हम क्यों और कैसे भूल जाते हैं कि दहेज अपराध में सजा की दर इसलिए भी बेहद कम है कि अपराध घर की चारदीवारी के भीतर होते हैं, जिनके पर्याप्त सबूत नहीं होते या नहीं हो नहीं सकते. कौन देगा ‘बहू’ के पक्ष में गवाही? ऊपर से कानून में इतने गहरे गढ्ढे हैं, कानून के रखवाले भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं, साधन-संपन वर्ग में दहेज के चलन का पहले से अधिक बढ़ा है, कानून ऊपरी तौर पर बेहद प्रगतिशील दिखते हैं पर दरअसल बेजान और नख-दन्त विहीन हैं. कहा यह जा रहा है कि महिलाएं कानून का ‘नाजायज इस्तेमाल’ हथियार के तरह कर रही हैं, ना कि ढाल के रूप में. कानून अगर हथियार ही है तो क्या सिर्फ महिलाएं ही इसका ‘नाजायज इस्तेमाल’ कर रही हैं? बाकी कानूनों के ‘दुरूपयोग’ और बढ़ते अपराधों के बारे में, आपका क्या विचार है?
सजग और चेतना संपन्न महिलाएं पूछ रही हैं “कहीं दहेज़ कानून के ‘दुरूपयोग’ की आड़ में असली मकसद, उन सत्ताधीशों, उच्च पदों पर आसीन अफसरों, संपादकों और भूत-पूर्व अपराधियों को बचाना तो नहीं- जिन पर गंभीर यौनाचार, शोषण या उत्पीड़न के आरोप लगते रहे (रहते) हैं.” निश्चय ही यह ‘ऐतिहासिक फैसला’ मेरे देश की ‘आधी आबादी’ को ‘कटघरे’ में खड़ा करके, स्वयं बहुत से संदेहास्पद सवालों में घिरा नज़र आता है. संदेह की सुई ना जाने कहाँ जा कर टिकेगी.

दहेज़ माँगना, लेना या देना ‘अपराध’ नहीं

निस्संदेह दहेज़ विरोधी कानून तो 1961 में ही बन गया, लेकिन इस पर लगाम लगने की बजाय, समस्या निरंतर जटिल और भयंकर होती गई. इसलिए 1983 में संशोधन करके भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 498A जोड़ा गया, साक्ष्य अधिनियम में बदलाव किये. कारण कानून की भाषा में दहेज़ माँगना, लेना या देना किसी भी तरह ‘अपराध’ नहीं माना-समझा गया. परिणाम स्वरुप दहेज़ उत्पीड़न और दहेज़ हत्याओं के आंकड़े, साल-दर-साल बढ़ते ही चले गए और आज तक दहेज़ हत्या किसी भी मामले में फाँसी की सज़ा नहीं हुई. जिन मामलों में हुई भी तो वो उच्च अदालतों ने, आजीवन कारावास में बदल दी. सर्वोच्च न्यायालय से उम्रकैद की सजा पाए हत्यारे, फाइलें गायब करवा के तब तक बाहर घुमते रहे जबतक अखबारों में “भंडाफोड़” नहीं हुआ. सुधा गोयल (State Delhi (Administration) vs Laxman Kumar & Ors,1986) और शशिबाला केस में “चौथी दुनिया” और टाइम्स ऑफ़ इंडिया में सनसनीखेज रिपोर्ट-सम्पादकीय छपने के बाद ही, हत्यारों को जेल भेजा जा सका. इस बारे में मैंने विस्तार से ‘वधुओं को जलाने की संस्कृति’ (‘औरत होने की सज़ा’ क्लिक करें ) में लिखा है.

दहेज़ हत्या : फाँसी नहीं उम्रकैद 

आश्चर्यजनक तो यह है कि जब दहेज़-हत्या के मामलों में फाँसी की सजा के मामले सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचने लगे, तो भारतीय संसद को 1986 में कानून बदलना पड़ा. सैंकड़ों मामले हैं, किस-किस के नाम गिनवाएं. भारतीय दंड संहिता, 1860 में, दहेज़ हत्याओं के लिए चालाकी पूर्ण ढंग से विशेष प्रावधान धारा 304B पारित किया. इस कानून में यह कहा गया कि शादी के 7 साल बाद तक अगर वधु की मृत्यु अस्वाभाविक स्थितियों में हुई है और ‘मृत्यु से ठीक पहले’ (‘soon before death’) दहेज़ के लिए प्रताड़ित किया गया है, तो अपराध सिद्ध होने पर उम्रकैद तक की सजा हो सकती है. इससे पहले दहेज़ हत्या के केस भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 302 के तहत दर्ज़ होते थे और अधिकतम सजा फाँसी हो सकती थी. मगर संशोधन द्वारा यह पुख्ता इंतजाम कर दिया गया कि दहेज़ हत्या के जघन्य, बर्बर और अमानवीय अपराधों में भी, फाँसी का फंदा ‘पिता-पुत्र-पति’ के गले तक ना पहुँच सके और अगर सजा हो भी तो, सात साल से लेकर अधिकतम सजा ‘उम्रकैद’ ही हो.
मीडिया में प्रचारित-प्रसारित यह किया गया कि महिलाओं की रक्षा-सुरक्षा के लिया सख्त कानून बनाए गए हैं. ऐसे अनेक मामले हैं, जिनमे सर्वोच्च न्यायालय सहित विभिन्न अदालतों ने अपराधियों को, इसी आधार पर बाइज्ज़त रिहा किया कि पीडिता को ‘मृत्यु से ठीक पहले’     (‘soon before death’) दहेज़ के लिए प्रताड़ित नहीं किया गया था.

दहेज़ उत्पीड़न, ‘मृत्यु से ठीक पहले’ अनिवार्य 

5 अगस्त 2010 को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति आर. एम. लोढ़ा (अब २०१४ में बने मुख्य न्यायाधीश) और पटनायक की खंड पीठ  ने अमर सिंह बनाम राजस्थान केस के फैसले में कहा कि दहेज़ हत्या के मामले में आरोप ठोस और पक्के होने चाहिए, महज अनुमान और अंदाजों के आधार पर ये आरोप नहीं ठहराए जा सकते . पति के परिजनों पर ये आरोप महज अनुमान के आधार पर सिर्फ इसलिए नहीं गढ़े-मढ़े जा सकते कि वे एक ही परिवार के है, सो उन्होंने ज़रूर  पत्नी को प्रताड़ित किया होगा. जस्टिस आर. एम. लोढ़ा (अब २०१४ में बने मुख्य न्यायाधीश) और पटनायक की  खंडपीठ ने यह कहते हुए पति की माँ और छोटे भाई के खिलाफ लगाये गए दहेज़ प्रताड़ना और दहेज़ हत्या के आरोपों को रद्द कर दिया. आरोपियों को बरी करते हुए खंडपीठ ने कहा “दहेज़ माँगना अपराध नहीं है और दहेज़ के लिए उत्पीड़न मृत्यु से ठीक पहले होना चाहिए, वरना सजा नहीं हो सकती. वधुपक्ष के लोग पति समेत उसके सभी परिजनों को अभियुक्त बना देते हैं, चाहे उनका दूर-दूर तक इससे कोई वास्ता ना हो. अनावश्यक रूप से परिजनों को अभियुक्त बनाने से असली अभियुक्त के छूट जाने का खतरा बना रहता है .
दहेज़ हत्या- ‘दुर्लभतम में दुर्लभ’ या नहीं?

दूसरी और 2010 में सुप्रीम कोर्ट जस्टिस मार्कंडेय काटजू और जस्टिस ज्ञान सुधा मिश्रा ने एक मामले में कहा कि दहेज हत्या के मामले में फांसी की सजा होनी चाहिए। ये केस ‘दुर्लभतम में दुर्लभ’ की श्रेणी में आते हैं। स्वस्थ समाज की पहचान है कि वह महिलाओं को कितना सम्मान देता है, लेकिन भारतीय समाज ‘बीमार समाज’ हो गया है। समय आ गया है कि वधु हत्या की कुरीति पर जोरदार वार कर इसे खत्म कर दिया जाए, इस तरह कि कोई ऐसा अपराध करने की सोच न पाए.सर्वोच्च न्यायालय की. खंड पीठ  ने कहा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले और आदेश से असहमत होने का कोई कारण नहीं है. वास्तव में  में यह धारा 302 (नृशंस और बर्बरतापूर्ण हत्या) का केस है, जिसमें मौत की सजा होनी चाहिए. लेकिन आरोप  धारा 302 के तहत नहीं लगाया गया, सो हम ऐसा नहीं कर सकते। वरना मामला तो यह दुर्लभतम में दुर्लभ की श्रेणी में आता है और अपराधियों को मौत की सजा होनी चाहिए. होनी चाहिए मगर…….! इस मुद्दे पर विधि आयोग की २०२वी रिपोर्ट पढने लायक है. विधि आयोग ने भी कोई विशेष संशोधन की सिफारिश नहीं की.

हकीक़त यह भी है कि विधायिका ने जानबूझ कर ‘आधे-अधूरे’ कानून बनाए और कभी समीक्षा करने की चिंता ही नहीं की. जिनके लिए कानून बनाया गये, उनसे न्याय व्यवस्था का कोई सरोकार बन ही नहीं पाया. दहेज कानून के मौजूदा रूप-स्वरूप पर पुनर्विचार कब-कौन करेगा? लाखों पीड़ित-उत्पीड़ित स्त्रियां ना जाने कब से, सम्मानपूर्वक जीने-मरने का अधिकार पाने के लिए रोज़ कचहरी के चक्कर काटती घूम रही हैं. क्या विधि-विधान की देवी (देवता) की आँखों पर पड़ी पट्टी कभी नहीं खुलेगी? ‘महिला सशक्तिकरण’ और ‘न्यायिक सक्रियता’ के दौर में भी नहीं!

स्त्रीकाल में अरविंद जैन को यहाँ भी पढ़ें : (आलेखों के  लिंक क्लिक करें )
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३. मर्दों के लिए घर आशियाना और औरतों के लिए जेलखाना है