दलित स्त्री आंदोलन तथा साहित्य- अस्मितावाद से आगे

स्त्रीकाल के ताजा अंक 'दलित स्त्रीवाद ' में प्रकाशित  बजरंग बिहारी तिवारी का यह आलेख दलित स्त्रीवाद को समझने के  लिए अनिवार्य  पाठ है. बजरंग बिहारी तिवारी हिंदी के प्रसिद्द आलोचक हैं।  दलित मुद्दों पर इनकी प्रतिबद्धता जगजाहिर है और यही इनके आलोचकीय व्यक्तिव की खासियत भी है। इनसे इनके मोबाइल न .९८६८२६१८९५ पर संपर्क किया जा सकता है .

भारतीय भाषाओं में दलित स्त्री लेखन को रूपाकार लिए हुए दो दशक से ज्यादा गुजर चुके हैं। यह पूरा दौर दलित स्त्रीवादी कार्यकर्ताओं, रचनाकारों के लिए कठिन संघर्षों का रहा है। सामाजिक बदलाव की दिशा में काम करने वाले तमाम संगठनों,मंचों और समूहों तक अपनी बात पहुँचाने, उन बातों की गम्भीरता का अहसास कराने और उनकी कार्यसूची में मुमकिन हद तक अपने मुद्दों को जगह दिला सकने में उन्हें जटिल दिक्कतों का सामना करना पड़ा है। जाति-व्यवस्था के खिलाफ लड़ने वाले दलित संगठनों ने जहाँ इस मुहिम को थोडे शक की नज़र से देखते हुए दरकिनार करने की कोशिश की वहीं स्त्रीवादी संगठनों ने जाति और पितृसत्ता के गठजोड़ को तवज्जो देने लायक नहीं समझा। यह जुझारू दलित स्त्रियों और उनके समर्थकों की सतत और पुरजोर पैरोकारी का नतीजा था कि स्त्री आन्दोलन के चौथे राष्ट्रीय अधिवेशन में जाति आधारित यौन-हिंसा और दलित स्त्री के प्रश्नों पर विस्तार से चर्चा हुई। यह अधिवेशन 1990 में कालिकट में आयोजित हुआ था। (1), यह सिलसिला बाद के अधिवेशनों में सघनतर होता गया। जाति के प्रश्न के साथ आदिवासी स्त्रियों का सवाल भी तिरूपति (1994) के राष्ट्रीय अधिवेशन में शामिल हुआ। कोलकाता का 2006 में हुआ अधिवेशन भी उल्लेखनीय रहा। 2, जेण्डर को जाति से जोड़कर देखने-समझने की अकादमिक गतिविधि क्रमश: गति पकड़ती गयी। बेला मलिक ने अपने निबंध ‘अनटचेबिलिटी एंड दलित वीमेंस ऑप्रेशन’ में 20 दिसम्बर, 1998 को दिल्ली में ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक वीमेंस असोसिएशन (ए आई डी डब्ल्यू ए) द्वारा अस्पृश्यता और दलित महिला के उत्पीड़न पर आयोजित सम्मेलन को खासा महत्व देते हुए लिखा है कि इस सम्मेलन ने जातिउत्पीड़न तथा पितृसत्तात्मक शोषण की जुगल-बंदी की ओर ध्यान दिलाया। 3, इस सम्मेलन में पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश की हजारेक दलित महिलाओं ने हिस्सा लिया था। अलग-अलग पृष्ठभूमि से आयी इन समाजकर्मी महिलाओं ने दलित स्त्री की जिंदगी की वास्तविकता से रूबरू कराया और अपने अनुभवों तथा संघर्षों को बेलाग तरीके से प्रकट किया। इन दलित स्त्रियों में कुछ राजनैतिक रूप से सक्रिय थीं, कुछकृषिमजदूर थीं, कुछ भवन-निर्माण में दैनिक मजदूरी या ठेकेदार के अन्तर्गत काम करती थीं।

बेला मलिक के अनुसार उक्त सम्मेलन ने यह तथ्य रेखांकित किया कि वैसे तो पूरा दलित समुदाय उत्पीड़ित किया जाता है लेकिन उत्पीड़न का अधिकांश दलित स्त्रियों के हिस्से में पड़ता है। घर में भीतर का श्रम विभाजन जोड़दें और पेय जल तक पहुँच, जलावन तथा शौचादि समस्याओं को ध्यान में रखें तो दलित स्त्रियों की बदतर स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है। अवमानना व हिंसा की घटनाएं दलित स्त्रियों के साथ सर्वाधिक घटती हैं। उनके उत्पीड़न में ऊंची जाति की स्त्रियों की भागीदारी अक्सर दिखाई पड़ती हैं। (4), दलित महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों की प्रकृति को देखते हुए बेला सुझाव देती हैं कि उनकी बेहतर जिंदगी के लिए किए जाने वाले संघर्ष को व्यापक सामजिक मुक्ति के अजेंडा से जोड़कर देखे जाने की जरूरत है। (5), संगठनों का निर्माण पर्याप्त नहीं, मजबूत और सक्रिय प्रतिरोध अपेक्षित है। सतत संघर्ष के बगैर परिवर्तन की संभावना नहीं बनती।

शार्मिला रेगे सामान्य नारीवादी संगठनों के महत्व को नहीं नकारतीं लेकिन दलित स्त्रियों के प्रश्न पर दलित स्त्री संगठनों का होना आवश्यक मानती हैं। (6), उन्होंने उचित ही इस बिडंवना की ओर ध्यान खींचा है कि दलितवाद पुरूषीकरण तथा स्त्रीवाद सवर्णीकरण के आशय तक सिमट गया है। उनके अजेंडें में दलित स्त्रियों को जगह न मिलने के कारण ही इस आशय की निर्मिति हुई है। 1971 में बने दलित पैंथर में भी दलित स्त्रियों की, उनसे सम्बद्ध मुद्दों की अनुपस्थिति रही। शार्मिला रेगे के मत से वाम झुकाव वाले नारीवादी संगठनों ने जाति को वर्ग में विलीन कर दिया तथा स्वायत्त स्त्री समूहों ने उसे भगिनीवाद में। दोनो ने ही ब्राह्मणवाद को चुनौती नहीं दी। (7), ऐसा नहीं है कि इस (नारीवादी) आन्दोलन ने दलित, आदिवासी तथा अल्पसंख्यक समुदायों की स्त्रियों के मुद्दों को उठाया ही न हो। यह मुद्दे उठे ज़रूर और कुछ ठोस उपलब्धियां भी रहीं मगर इन स्त्रियों को केंद्र में रखने वाली नारीवादी राजनीति उभर नहीं सकी। (8), दलित स्त्री की पहचान वाले स्वतंत्र और स्वायत्त संगठन 1990 के बाद बने। अखिल भारतीय स्तर पर बनने वाले संगठनों में ‘नेशनल फेडरेशन ऑफ दलित वीमेन’ तथा ‘आल इंडिया दलित वीमेंस फोरम’ (1994) उल्लेखनीय है। ‘महाराष्ट्र दलित महिला संघठना’ की स्थापना 1995 में की गई। इसी प्रदेश के चंद्रपुर में 1996 में ‘विकास वंचित दलित महिला परिषद’ का गठन हुआ। इस संगठन ने मांग की कि 25 दिसंबर को ‘भारतीय स्त्री मुक्ति दिवस’ के रूप में मनाया जाए। 1927 मे इसी तारीख को डॉ.अम्बेडकर ने मनुस्मृति दहन किया था। (9),

 दलित स्त्रीवाद की वैचारिकी के निर्माण के संदर्भ में गोपाल गुरू के लेख ‘दलित वीमेन टॉक डिफरेंटली’ की चर्चा की जाती है। यह लेख  ‘इकॉनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली’ के अक्टूबर 14-21,1995 अंक में प्रकाशित हुआ था। इस लेख की पृष्ठभूमि में दो तात्कालिक घटनाएं थीं- नेशनल फेडरेशन ऑफ दलित वीमेन (एन एफ डी डब्ल्यू) का निर्माण तथा बीजिंग सम्मेलन में दलित महिलाओं की भिन्न समूह के रूप में भागीदारी। दलित महिलाओं की ‘बात की भिन्नता’ को रेखांकित और स्थापित करना इस लेख में गोपाल गुरू का मकसद है। इसके लिए वे दो कारकों की चर्चा करते हैं- बाहरी कारक तथा भीतरी कारक। बाहरी कारकों में वे उन  ‘गैर दलित ताकतों’ का हवाला देते हैं जो ‘दलित स्त्री के मुद्दे का समरूपीकरण’ कर रही हैं। भीतरी कारकों में  ‘दलितों के बीच पितृसत्तात्मक प्रभुत्व’ का होना है। सत्य के अवबोधन में सामाजिक अवस्थिति को गोपाल गुरू निर्णायक मानते हैं। उनका कहना है कि इसी तर्क से ग़ैर दलित स्त्रियों द्वारा दलित स्त्रियों के मुद्दों का प्रतिनिधित्व ‘कम वैध और कम प्रामाणिक’ ठहरता है। वे यह भी जोड़ते हैं कि दलित स्त्री कार्यकर्ताओं के इस दावे का अर्थ नारीवाद की प्रायोगिक बहुलता का उत्सव नहीं है। दलित स्त्रियों ने महाराष्ट्र में नए किसान आन्दोलन के शुरूआती दौर में नारीवादी रेडिकल राजनीति का समर्थन किया था। यह समर्थन जारी नहीं रह पाया क्योंकि किसान संगठनों की ऊंची आवाज़ में दलित आवाज़ दब गयी। दूसरे, किसान आन्दोलन समृद्ध किसानों के पक्ष में चला गया और दलित कृषि मजदूरों के हित भुला दिए गए। गोपाल गुरू जोर देकर कहते है’ कि राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर स्त्री मात्र की एकता (सॉलिडरिटी) का दावा ऊँची जाति और दलित महिलाओं के बीच मौजूद अन्तर्विरोधों पर लीपापोती कर देता है।दलित स्त्रियों ने इसीलिए गैर दलित स्त्रियों के लेखन अथवा भाषण में अपने यदा-कदा उल्लेख (गेस्ट अपीरेंस) का विरोध किया और अपनी शर्तों पर खुद को संगठित किया। गैर दलित स्त्रियों द्वारा विकसित नारीवादी सिद्धांत उनकी समझ से अप्रामाणिक हैं क्योंकि वे दलित स्त्री के यथार्थ को नहीं समेटते। इसकी स्पष्ट अभिव्यक्ति एन एफ डी डब्ल्यू द्वारा स्वीकृत बारह सूत्री अजेंडे में तथा मई 1995 में पुणे में संपन्न महाराष्ट्र दलित वीमेंस कॉनफरेंस में पढ़े गए तमाम पर्चों में देखी जा सकती है। गोपाल गुरू बताते हैं कि दलित स्त्रियों ने दलितपन की व्याख्या कड़ाई के साथ जाति के संदर्भ में की और ग़ैर दलित स्त्रियों द्वारा खुद को दलित मान लिए जाने के दावे को नकार दिया।

आंतरिक कारणों का विश्लेषण करते हुए गोपाल गुरू का कहना है कि उत्तर अम्बेडकर काल में दलित नेताओं ने हमेशा दलित स्त्रियों की स्वतंत्र राजनीतिक अभिव्यक्तियों को गौण समझा है और कई बार उनका दमन किया है। कला और संस्कृति के क्षेत्र में भी दलित पुरूषों का दबदबा कायम रहा है। साहित्य की दुनिया में दलित लेखकों के एकाधिकार की दलित लेखिकाओं ने आलोचना की है। गोपाल गुरू सूचित करते हैं कि दलित लेखक दलित स्त्री रचनाकारों की कृतियों को गंभीरता से नहीं लेते। उनकी प्रवृति इन लेखिकाओं की उपलब्धियों को खारिज करने की होती है। अपने विश्लेषण को सूत्रबद्ध करते हुए गोपाल गुरू तीन निष्कर्ष देते हैं- क) जाति और वर्ग की पहचान के साथ लैंगिक पहचान भी किसी परिघटना में समान भूमिका अदा करती हैं; ख) दलित पुरूष उसी मेकनिज़्म का पुनउत्पादन कर रहे हैं जिसका इस्तेमाल सवर्णों ने उन्हें दबाने के लिए किया था; ग) दलित स्त्रियों का अनुभव बताता है दलित(दायरे) के भीतर का स्थानीय प्रतिरोध कम महत्वपूर्ण नहीं है। कुल मिलाकर, जो स्थिति बनती है उसमें यह मानने को बाध्य होना पड़ता है कि दलित स्त्रियों की भिन्न बात का दावा सही है। अपनी तरफ से यह साबित करने के बाद कि दलित स्त्री ही दलित स्त्री समुदाय का वैध और प्रामाणिक प्रतिनिधित्व कर सकती है गोपाल गुरू यह चेतावनी भी जोड़ते हैं कि भिन्नता दलित स्त्रियों में भी है। शिक्षा, नौकरी और संगठन में महाराष्ट्र की दलित स्त्रियां जितनी आगे है कर्नाटक की नहीं। तब प्रतिनिधित्व का पेंच उलझ जाता है। लेखक ने समाधान के तौर पर इस सुझाव पर अपनी सहमति दी है कि दलित स्त्री आंदोलन को ग्रासरूट स्तर की दलित स्त्रियों से जुड़ना चाहिए। उन्होंने दलित स्त्रियों को इसके प्रति भी सावधान किया है कि उनकी राजनीतिक आकांक्षाओं को स्पेस मुहैया कराने के क्रम में राज्य द्वारा उनका सहयोजन किया जा सकता है। इस आशंका के साथ ही उन्होंने दलित स्त्रियों की राजनीतिक समझ पर भरोसा भी किया है। सबूत के तौर पर उन्होंने भारत सरकार द्वारा निजीकरण और वैश्वीकरण वाली नयी आर्थिक नीति थोपे जाने की एन एफ डी डब्ल्यू द्वारा संघर्ष छेड़ने के संकल्प का उल्लेख किया है।(10),

 गोपाल गुरू के उक्त लेख पर बहस चली। इस बहस में प्रमुख नाम शार्मिला रेगे का उभरा। रेगे ने मोटे तौर पर लेख की स्थापनाओं पर अपनी सहमति व्यक्त की, लेकिन, उन्होंने ‘प्रामाणिकता’ पर आत्यंतिक बल दिए जाने को उचित नहीं पाया। उनके अनुसार हाशिए के लोगों के आंदोलन में आवाजाहीपर रोक नहीं लगनी चाहिए। अपने-अपने संघर्षों तक महदूद रहने के बजाए इन संघर्षों से अर्जित अनुभवों का, विचारों का साझा करना संघर्ष को आगे ले जाने में सहायक होता है। दलितेतर नारीवादी दलित स्त्रियों ‘की तरह’ या दलित स्त्रियों ‘के लिए’ भले ही न बोल सकती हों लेकिन वे दलित नारीवादी की तरह अपनी ‘पुनर्खोज’ तो कर ही सकती हैं। इस तरह की छूट प्रत्यक्ष अनुभवजन्य ‘प्रामाणिकता’ की संकरी गली से बचाती है तथा ‘अस्मितावादी राजनीति’ की संकीर्णता को भी परे ढकेलती है। (11), अस्मितावादी दृष्टि की आलोचना करते हुए महाराष्ट्र की ही चर्चित नारीवादी चिंतक छायादातार ने कहा कि ‘भिन्नता’ और ‘आइडेंटिटी’ पर केन्द्रित हो जाने से आर्थिक शोषण और बाजार की जकड़बंदी की उपेक्षा होती है। स्त्रियों को अधिकार वंचित करने वाली स्थितियों का जन्म यहीं होता है। छाया दातार ने यह भी कहा कि अगर नारीवादी आंदोलन के इतिहास का पुनरावलोकन किया जाए तो मालूम होगा कि पितृसत्ता के खिलाफ संघर्ष में कई मोड़ ऐसे भी आए हैं जब जाति प्रभुत्व के खिलाफ मोर्चा खुला है।  ‘मथुरा रेप केस’ मामला इसका उदाहरण है। दलित पैंथर के साथ भी नारीवादियों ने सहयोग किया है।(12)

 दलित आंदोलन में दलित स्त्रियों की भूमिका का पहले-पहल सशक्त रेखांकन मीनाक्षीमून और उर्मिला पवार ने किया। 1989 में प्रकाशित ‘हमने भी इतिहास बनाया’ में इन दोनों आदोंलनधर्मी लेखिकाओं ने डॉं. अम्बेडकर के सामाजिक अभियानोंमें दलित स्त्रियों की भागीदारी का वृतांत लिखा है। दलितस्त्री कार्यकर्ताओं की पहली पीढ़ी इसी दौर में निर्मित हुई। परिवार, समाज और राजनीति में व्याप्त पुरूष वर्चस्व से लड़कर परिवर्तन के ऐतिहासिक दस्तावेज में अपना हस्ताक्षर करने वाली दलित स्त्रियों की पहली पीढ़ी का परवर्ती आंदोलन ने लाभ नहीं उठाया। किसी दलित स्त्री का नाम न तो पैंथर के, न ही रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के नेतृत्वकारियों की सूची में दिखाई पड़ता है। इसकी वजह जानने में बहुत मशक्कत करने की ज़रूरत नहीं। गोपाल गुरू ने पूर्वोद्धत लेख में दलित नेताओं की पितृसत्तात्मक सोच का स्पष्ट जिक्र किया है।

बेबी कांबले मुख्यत: सामाजिक कार्यकर्ता रहीं। आन्दोलनों में शिरकत करते हुए उनके व्यक्तित्व का निर्माण हुआ। उनकी जुझारू शख्सियत की अभिव्यक्ति उनके आत्मकथन ‘जिण आमुच (जीवन हमारा) में हुई है। यह आत्मकथन धारावाहिक रूप में सन् 1982 में छपा और पुस्तक रूप में 1086 में आया। भारत में किसी दलित लेखिका का यह संभवत: पहला आत्मकथन है । इसमें बेबी कांबले ने अपनी जिंदगी से ज्यादा दलित समुदाय में हो रही उथल-पुथल का चित्रण किया है। उत्तर अम्बेडकरकालीन दलित राजनीति में घुस आई निजी महत्वाकांक्षाओं को निशाने पर लेते हुए लेखिका ने नेताओं के स्वभाव पर तल्ख टिप्पणियाँ की हैं। इस आत्मकथा के अंग्रेजी अनुवाद में लिखे ‘आफ्टरवर्ड’ मे गोपाल गुरू ने लिखा है-‘ दलित स्त्रियों की आत्मकथाएं एक तरफ राज्य के शोषण का प्रतिरोध करती है तो दूसरी तरफ बाज़ार का। उनका लेखन ‘दलित पब्लिक स्फीयर’- साहित्यिक सभाओं, अकादमिक संगोष्ठियों, प्रकाशन केन्द्रों और पहचान दिलाने वाले अन्य क्षेत्रों मसलन राजनीतिक पार्टियों से बाहर रखे जाने के खिलाफ बयान हैं। दलित लेखकों की आत्मकथाओं में उनका उल्लेख चलताऊ ढंग से किया जाता है। (13), सार्वजनिक गतिविधियों-रैलियों धरने-प्रदर्शनों में बेबी कांबले की भागीदारी को ध्यान में रखकर गोपाल गुरू टिप्पणी करते हैं कि दलित स्त्रियाँ घरेलू से सार्वजनिक क्षेत्रों में निर्बाध आवाजाही करती हैं (‘दे फ्लो फ्रीली फ्रॉम द डोमेस्टिक टू द पब्लिक स्फीयर्स’) (14), यह बात जितनी आसानी से कह दी गई है वस्तुस्थिति वैसी है नहीं। हाँ, यह अवश्य है कि बेबी कांबले ने आत्मकथा में अपनी पारिवारिक स्थिति-पति-पत्नी के रिश्तों पर कुछ खास नहीं लिखा है। गोपाल गुरू की उक्त धारणा के निर्माण में इसी खामोशी की भूमिका है। अंग्रेजी अनुवादिका को यह खामोशी खटकी होगी। तभी उन्होंने बेबी कांबले का इण्टरव्यु लेते हुए उनकी अंतरंग जिंदगी पर प्रश्न पूछे। यह इण्टरव्यु आत्मकथा के आखीर में अंग्रेजी अनुवाद में दे दिया गया। इसमें बेबी कांबले ने बताया है कि उनकी जिंदगी अन्य दलित औरतों की जिंदगी से बहुत भिन्न नहीं रही। “इन दिनों पत्नियों की पिटाई सामान्य बात थी। पत्नी की निष्ठा पर शक किया जाता था और मैं भी कोई अपवाद नहीं थी। एक बार हम (मैं और पति) एक बैठक में हिस्सा लेने मुंबई गए। हमने सामान्य डिब्बे में यात्रा की। डिब्बा खचाखच भरा हुआ था। कुछ युवाओं ने मुझे देख क्या लिया कि मेरे पति ने तत्काल मुझ पर शक किया। उन्होंने मुझे इतने जोर से मारा कि मेरी नाक से खून का फौव्वारा फूट पड़ा। भला बताओं कोई किसी को घूरने से कैसे रोक सकता है। लेकिन, यह सब कहने का कोई फायदा नहीं था। हम प्रोग्राम में भी नहीं रूके। उसी शाम को लौट आए। उनका क्रोध ऐसा था कि लौटती बेर ट्रेन में पूरे रास्ते मुझे पीटते रहे।(15), इस प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए प्रश्नकर्ता ने जब अगला सवाल किया तो बेबी कांबले का जवाब था- ‘वे (पति) मुझे बेहद मामूली कारणों पर पीटते थे। बड़े शक्की थे। अपने को निर्दोष साबित करना मेरे लिए बहुत कठिन था। मैं रोती  थी, गिड़गिड़ाती थी, मनाती थी। कभी माहौल हफ्ते भर सामान्य रहा तो बहुत गनीमत थी। शक फिर से अपना सिर उठा लेता था। मुझे फिर यातना की उस चक्की से गुजरना पड़ता था। ज्यादातर औरतों की जिंदगी ऐसी ही थी। ...एक मर्द छोड़ दूसरी से शादी करना समस्या का हल नहीं था। हर मर्द में वहीं “पति” मिलता था। इसलिए मैंने तय किया कि दूसरा घर नहीं करूंगी। (16), ‘आत्मकथा’ में इन अनुभवों को क्यों नहीं लिखा? इस प्रश्न पर बेबी कांबले का कहना था कि ‘मैंने व्यक्तिगत पीड़ा के बदले समुदाय की व्यथा को तरजीह दी। फिर अधिकांश औरतों पर जब ऐसी ही हिंसा की जाती थी तो मैं उनसे अलग कहाँ थी?’(17), प्रस्तुत प्रसंग को थोड़े विस्तार से उद्धृत करने की जरूरत इसलिए महसूस हुई कि गोपाल गुरू के कथन का समुचित संदर्भ सामने रहे। उस कथन का प्रत्याख्यान भी हो सके। आत्मकथा के हिन्दी या मराठी संस्करणों में चूंकि यह साक्षात्कार नहीं है,इसलिए संभव है कुछ लोग लेखिका की जिंदगी के इस पक्ष से वाकिफ न हों। इस आत्मकथा का हिन्दी अनुवाद वैसे भी थोड़ा संदिग्ध लगता है। किसी समर्थ अनुवादिका/अनुवादक को यह काम अपने हाथ में लेना चाहिए।

बेबी कांबले ने खुद को अम्बेडकरी आन्दोलन का उत्पाद कहा है। ऐसी तमाम दलित स्त्रियों ने अनगिनत खतरे उठाकर इस आन्दोलन में भागीदारी की, उसे आगे बढ़ाया। यह बिडम्बना ही कही जाएगी कि आन्दोलन दलित स्त्रियों के प्रति पर्याप्त संवेदनशील नहीं हो पाया। आन्दोलन की कार्यसूची में दलित स्त्रियों के अपने मुद्दे उच्च प्राथमिकता पाने से वंचित रहे।

तमिलनाडु में सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता और लेखिका गैब्रियल डीट्रिख ने अपने एक लेख में दलित आन्दोलन और महिला आन्दोलन के अंतस्संबंध को समझाने के क्रम में कई घटनाओं काउल्लेख किया है। इसमें दो-एक का जिक्र यहाँ बानगी के तौर पर किया जा सकता है। पहली घटना दलित बहुल जिला उत्तरी आरकोट के अरक्कोणम की है। परैयार जाति के भूमिहीन कृषि मजदूरों के बीच काम करने वाले यहाँ तीन महत्वपूर्ण संगठन हैं-अम्बेडकर मंत्रम्, रूरल वीमेंस लिब्रेशन मूवमेंट (आर डब्ल्यू एल एम) और भूमिहीन श्रमिक आंदोलन (एल एल एम) मजदूरी, बिजली,पानी और ज़मीन जैसे मुद्दे आर डब्ल्यूएल एम और एल एल एम उठाते हैं और अक्सर मिलकर काम करते हैं। लेकिन कुछ स्थानीय मुद्दों तथा अम्बेडकर जयंती जैसे समारोहों को वे अम्बेडकर मंत्रम्  से जुड़कर मनाते हैं। 20 अप्रैल 1990 को यहाँ कला नामक पचीस वर्षीया युवती ने ट्रेन के आगे कूदकर अपनी जान दे दी। कला तीन बच्चों की माँ थी। सूचना मिलने पर आर डब्ल्यू एल एम के कार्यकर्ता कला के माता-पिता से मिले। बेटी की लाश दिखाने के लिए उन्हें अस्पताल भी ले गए। प्रारंभिक खोजबीन से उन्हें पता चला कि कला के पति के विवाहेतर संबंध थे और वह अपनी पत्नी को लगातार उत्पीड़ित कर रहा था। कला के माँ-बाप इस घटना की गवाही देने को तैयार थे। चूंकि परिवार दलित (परैयार) था इसलिए अम्बेडकर मंत्रम् के कार्यकर्ता भी अस्पताल पहुँचे। ग्राम प्रधान पेशे से वकील और अम्बेडकर मंत्रम् का कानूनी सलाहकार था। उसने कला के माँ-पिता पर दबाव डाला कि वे बयान दें कि कला बहरी थी और मानसिक रोगी तथा उसकी मृत्यु के लिए कोई अन्य जिम्मेदार नहीं है। पोस्टमार्टम की रिर्पोट  बेनतीजा रहीं । आर डब्ल्यू एल एम चाहता था कि आत्महत्या के लिए उकसाने वाला केस दर्ज हो। अम्बेडकर मंत्रम् पति के पक्ष में था। प्रधान पर दबाव डालकर पंचायत बुलायी गयी। पंचायत ने कला के पति को सभी आरोपों से बरी कर दिया। अम्बेडकर मंत्रम् के सहयोग से लाश का अंतिम संस्कार कर दिया गया। आर डब्ल्यू एल एम ने इसकी सार्वजनिक भर्त्सना की। अम्बेडकर मंत्रम् तथा ग्राम प्रधान ने आर डब्ल्यू एल एम के घेराव के विरोध में मार्च निकाला और दबाव बनाया कि आर डब्ल्यू एल एम इस केस से हट जाए। आर डब्ल्यू एल एम का तर्क था कि दलित उत्पीड़न पर सक्रिय होने वाला अम्बेडकर मंत्रम् एक दलित स्त्री को पति द्वारा आत्महत्या पर मजबूर किए जाने के सिर्फ अनदेखा ही नहीं कर रहा है, वह आरोपी की हर तरह से सहायता भी कर रहा है। आखिरकार कला की आत्महत्या का मुकद्दमा चल नहीं पाया।

दूसरी घटना भी इसी जिले की है। श्रीलंका से आए एक परिवार की तीन साल की बच्ची के साथ बलात्कार हुआ। बलात्कारी पड़ोसी दलित युवक था। घटना 7 जुलाई 1990 की है। बच्ची के परिवार के पास बलात्कार के ठोस साक्ष्य थे, फिर भी पीड़िता का मेडिकल परीक्षण नहीं हो सका। अम्बेडकर मंत्रम् ने आनन-फानन में पंचायत बुलायी और आरोपी पर ढाई सौ रूपये का जुर्माना लगाकर मामला रफा-दफा करना चाहा। आर डब्ल्यू एल एम ने जब आरोपी को तलब किया तो अम्बेडकर मंत्रम् के कार्यकर्ताओं ने बलात्कारी का साथ देते हुए आर डब्ल्यू एल एम को यह केस अपने हाथ में लेने से रोका। बड़ी कहा-सुनी के बाद उन्होंने आर डब्ल्यू एल एम की महिला कार्यकर्ताओं को थाने में खबर करने की मोहलत दी। 14 जुलाई को पीड़िता को न्याय दिलाने के लिए सभा बुलायी गयी। डीट्रिख बताती हैं कि अम्बेडकर मंत्रम् से अलग हुए एक गुट ने न्याय मांगने वालों को समर्थन दिया। (20), अम्बेडकर मंत्रम् पुरूष-बहुल संगठन है।

ऐसे तमाम प्रसंग हैं जिनके आधार पर यह बेहिचक कहा जा सकता है कि न्याय और अस्मितावाद के बीच द्वन्द्व की स्थिति पैदा होने पर दलित स्त्रियों तथा उनके संगठनों ने न्याय का पक्ष लिया है। पहचान की राजनीति बराबरी, आजादी और इंसाफ को परममूल्य मानकर नहीं की जा सकती। अपना दायरा बढ़ाने के लिए इन शब्दों को अलंकरण की तरह इस्तेमाल अवश्य किया जाता है। लेकिन, निर्णायक अवसरों पर इन मूल्यों को स्थगित किए जाते हुए देखा जा सकता है। दलित स्त्रियों का संघर्ष मानवाधिकारों के लिए है। मानवाधिकारों की लड़ाई बुनियादपरस्त नहीं लड़ सकते। मानवाधिकारों की सच्ची चिंता अस्मितावादियों के अजेंडे में नहीं आ सकती। अतीत के स्वर्णिम बोझ से दबा मूलनिवासी आंदोलन भी मानवाधिकारो का पैरोकार नहीं हो सकता। दलित स्त्रियां इसी अर्थ में इन सबसे भिन्न हैं। तमिल की प्रख्यात दलित लेखिका एस. तेनमोषी अपने एक निबंध में इसीलिए  बड़ी व्यथा से कहती हैं- ‘इस युद्धभूमि मे दलित स्त्रियां बिल्कुल तनहा हैं, एकदम मित्ररहित। उन्हें इस संघर्ष को इसीलिए सावधानी, आत्म-चेतनता तथा उत्कटता से लेना है।’(21), तेनमोष़ी का मानना है कि ‘अगर वे (दलित स्त्रियां) इस स्थिति को इतिहास के अभिशाप के रूप में नहीं अपितु सुअवसर के रूप में लेंगी तो स्थिति-परिवर्तन नामुमकिन नहीं हैं। (22), इसी निबंध में लेखिका ने यह भी कहा है कि तीव्र जातिगत (रेशियल) उत्पीड़न के समय हम (दलित पुरूषों से) अपने विचार वैभिन्य को पीछे रख देती हैं कुछ वैसे ही पितृसत्ता के खिलाफ संघर्ष में हमारा ग़ैरदलित स्त्रियों के साथ एका बन सकती है। (23),

पारंपरिक वर्चस्ववादियों और दलित अस्मितावादियों में अपने-अपने ढंग से प्रयास किया कि दलित स्त्रीवाद का नारीवादी आन्दोलन से दूरी ही न बनी रहे बल्कि उनके बीच अविश्वास भी बढ़े। जाति में गुंथी पितृसत्ता की उपेक्षा करके,उसके खिलाफ मुकम्मल लड़ाई न छेड़कर स्वयं नारीवादी आन्दोलन ने इस दूरी को बरकरार रखने में जाने-अनजाने सहयोग किया। लेकिन, जल्दी ही दोनों आन्दोलनों को यह बात समझ में आ गयी कि अवसर-विशेष में उनके बीच पनपी पारस्परिकता और समर्थन सार्थक नतीजों का ओर ले जा सकते हैं। नारीवादी संगठनों नें दलित स्त्रीवाद के सामान्य नारीवाद में विलय की कोई मांग न उठाकर आपसी भरोसे की नींव ही मजबूत’ की। दलित लेखिकाओं की रचनाएं इस बात की गवाही देती हैं कि उन्होंने सीखने-सिखाने और संवाद के दरवाज़े कभी बंद नहीं किए। दलित स्त्री आन्दोलन का आकलन करते हुए विमल थोरात ने लिखा है-‘वह स्त्री पुरूष संबंधों की समतावादी व्याख्या करने के साथ ही, दलित स्त्री के तिहरे शोषण की त्रासदी की अभिव्यक्ति द्वारा दलित स्त्री के प्रति नारीमुक्ति आन्दोलन के संकीर्ण मध्यवर्गीय नजरिए को भी कुछ हद तक बदलने में कामयाब हो रही है। व्यक्ति पहचान के संघर्ष में स्त्री अस्मिता का प्रश्न लेकर साझे समतावादी आन्दोलन में भी वह शामिल हुई है।’(24), कुछ ऐसा ही रजनी तिलक का भी मानना है। वे दलित और स्त्रीआन्दोलन में दलित स्त्रियों की भागीदारी को रेखांकित करते हुए यह भी जोड़ती हैं दलित आन्दोलनमें ‘पितृसत्ता का विद्रूप चेहरा’ तथा स्त्री आन्दोलन में ‘जाति व्यवस्था का विकृत रूप’ पाकर दलित स्त्रियों ने अपने को अलग से संगठित किया। (25), तेलुगु दलित लेखिका नामबूरि परिपूर्णा की कहानी ‘प्रेरणा’ परिवार के ढांचे में ‘पति’ संस्था की क्रूरता दर्शाते हुए सवर्ण और दलित स्त्री के दुख की समानता का बयान करती है। मस्तनम्मा विमला के यहाँ नौकरानी है। विमला औऱ उसका पति प्रसाद जिला परिषद में नौकरी  करते हैं। मस्तनम्मा का पति कोटी रिक्शा चलाता है। प्रसाद और कोटी दोनों ही घर की जिम्मेदारियों के प्रति बेपरवाह। अपनी सारी कमाई पीने-पिलाने पर उड़ाने वाले। पत्नी के प्रति हिंसक भी। मस्तनम्मा रोज-रोज की पिटाई से तंग आकर एक दिन अपने पति पर हाथ उठाती है। इधर घरेलू हिंसा से त्रस्त विमला भी मस्तनम्मा से प्रेरणा लेकर कानूनी सलाह केन्द्र का रूख करती है। (26), बानगी के तौर पर उद्धृत की गई यह कहानी प्राय: सभी भाषाओं में मिल सकती है। ध्यान देने की बात है कि इस ढर्रे की कहानियों में प्रेरणा स्रोत दलित स्त्रियां है। उनकी संघर्ष क्षमता और विकट प्रतिकूलताओं में जिन्दा रहने की कूवत ही उन्हें प्रेरणा केन्द्र बनाती है।

दलित स्त्रीवादी आन्दोलन का जन्म भले ही अस्मितावाद की जमीन पर हुआ मगर जल्दी ही इस आन्दोलन ने अपने को अस्मितावाद की अनुदार चौहद्दी से मुक्त कर लिया। अस्मितावाद उत्तर आधुनिकता की कोख से पैदा हुआ माना जाता है। उत्तर आधुनिकता की जो धारा आधुनिकता के प्रबल विरोध में फूटी है उसी की सिचांई से अस्मितावाद की फसल पली-बढ़ी है। अस्मितावादी बहस को ‘विमर्श’ कहा जाता है। इस विमर्श की परिभाषा है- एकल पहचान की बहिर्गामी, एकोन्मुखी और उदग्र पैरोकारी। अन्य पहचानों के प्रति गहरा शक इसके मूल में है। यह विमर्श अपारदर्शी होता है। ‘ऐतिहासिक अनुभव’ इसे खुलेपन की ओर, पारदर्शिता की तरफ जाने से रोकते हैं। ‘पीड़ा’ पर बोलने का अधिकार पीड़ित को है। पीड़ा के खिलाफ संघर्ष चलाने का अधिकार भी उसी को है। अस्मितावाद के एक समर्थ प्रवक्ता गोपाल गुरू हैं। पीछे हमने चर्चा की कि दलित स्त्रियों पर ग़ैरदलित स्त्रियों के लेखन को वे ‘कम वैध और कम प्रामाणिक’ मानते हैं। इस कथन के अर्थ बोध की प्रक्रिया में ‘कम’ विशेषण का विलोपन लेखक का अभीष्ट है। विमर्श के अध्येताओं को यह बताने की ज़रूरत नहीं। अन्यत्र गोपाल गुरू ने यह प्रतिपादित किया कि दलितों के अनुभवों पर सिद्धांत निर्माण का अधिकार मात्र भुक्तभोगियों को है। इतनी छूट उन्होंने अवश्य दी कि ग़ैरदलितदलित-अनुभवों को मात्र पढ़ने-सुनने के हकदार हैं। (27), लेकिन, यह कैसे हो सकता है कि पढ़ने की छूट मिले और राय बनाने पर प्रतिबंध हो। इस सिद्धांत को स्वीकार लिए जाने पर कई बिडम्बनाएं पैदा होंगी । दर्शनशास्त्री सुंदर सरूक्काइ ने इनका वाजिब संज्ञान लिया है। अब यह महत्वपूर्ण बहस पुस्तक रूप में उपलब्ध है। (28), शायद इस सिद्धांत में निष्ठा के चलते ही  ‘अवमानना’ (ह्युमिलिएशन) पर संपादित अपनी मूल्यवान पुस्तक में गोपाल गुरू ने दलित स्त्री की स्थिति को विचार के बाहर रखा है। यह कहने की ज़रूरत नहीं की जाति और पितृसत्ता के दो पाटों में पिसती दलित स्त्री अवमानना के स्थूल व सूक्ष्म अध्ययन का अपरिहार्य संदर्भ बनती है।(29)

दलित स्त्रीवाद उत्तर अस्मितावादी विचार व आन्दोलन है। आधुनिकता की ओर पीठ किए हुए नहीं, उससे संवाद करता हुआ, मानव-मुक्ति के उसके विश्वास में साझा करता हुआ। देखा जा सकता है कि अस्मितावाद जहाँ वैश्वीकरण, बाजारीकरण और सार्वजनिक क्षेत्रों के कारपोरेटीकरण का समर्थन करता है या उसे चिंता का विषय मानने से इंकार करता है वहीं दलित स्त्रीवाद शुरू से ही उसका विरोध करता रहा है। नैशनल फेडरेशन ऑफ दलित वीमेंस ने निजीकरण और वैश्वीकरण के खिलाफ संघर्ष करने का जो संकल्प लिया उसकी चर्चा पीछे की जा चुकी है। दलित स्त्रीवाद की  प्रमुख हस्ताक्षर उर्मिला पवार ने अपने आत्मकथन की भूमिका में लिखा है:  ‘हम देखते हैं कि वैश्वीकरण, निजीकरण तथा धार्मिक सत्ता के ध्रुवीकरण से जो होड़ का वातावरण निर्माण हो गया है, उसके कारण अगली और उससे अगली पीढ़ियों का भविष्य संकट में पड़ गया है।’(30), बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मकड़जाल का पर्दाफाश अनिता भारती ने अपनी कहानी ‘बीजबैंक’ में किया है। (31), अपनी आलोचना-पुस्तक में वे लिखती है: ‘भूमंडलीकरण, बाजारीकरण के चलते उसके (दलित स्त्री के) श्रम की कीमत दिन पर दिन कम होती जा रही है, जिसके कारण उसके परिवार पर व उसके ऊपर सीधा असर पड़ रहा है। आर्थिक चुनौतियां सुलझने की जगह और उलझ रही हैं’।(32),

एक अर्थ में अस्मितावाद अतीतोन्मुखी है। इधर के अस्मितावादियों में कोई नागवंश का गुणगान करता हुआ उसकी पुनर्स्थापना के सपने देखता है, कोई मौर्य युग की पुनर्प्राप्ति के लिए तड़पता है। इन दिनों मूल निवासी  ‘आन्दोलन’ ज्यादा जोर पकड़े हुए है। इस ‘आन्दोलन’ का मानना है कि इस देश में रहने का हक सिर्फ मूल निवासियों को है। हमलावरों और घुसपैठियों को बाहर किया जाना चाहिए। यहाँ यह याद कर लेना ठीक रहेगा कि डॉ. अम्बेडकर आर्य आक्रमण के इस सिद्धांत को नहीं स्वीकारते थे। ब्राह्मणों को सर्व शक्तिमान मानने से भी उन्हें गुरेज था। भारतीय समाज पर जाति व्यवस्था थोपने का ‘श्रेय’ भी वे ब्राह्मणों को नहीं देते थे। हाँ, उनकी सहयोगी भूमिका से उन्हें इंकार न था। (33), अस्मितावाद ने ब्राह्मणों को (ज्यादातर प्रसंगो में ब्राह्मणवाद का प्रयोग नहीं किया जाता।) इतिहास की नियामक शक्ति मानते हुए उनका लगातार ‘शक्ति संवर्धन’ किया है। अस्मितावादी व्यक्ति की  ‘उत्पीड़ित’ की छवि इसीलिए रूढ़ हो चली है। दलित स्त्री के नजरिए से देखे तो मूल निवासी आन्दोलन एकदम अस्वीकार्य ठहरता है। मूल निवासी व्यवस्था जिस रोमानीकृत रूप में पेश की जाती है उसमें सारी भीतरी दिक्कतें विलुप्त हो जाती हैं। इन दिक्कतों की चर्चा करना भी मूल निवासी सिद्धांतकारो को नागवार गुजरता है। फिर जिस संस्कृति की रूपरेखा पेश की जाती है उसमें स्त्रियाँ दायित्व के बोझ से दबी हुई, संदेह की शूली पर चढ़ाई हुई और सर्वथा अधिकार वंचित ऩजर आती हैं। सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों की स्वर्णिम अतीत की कल्पना और उसकी परिणतियों पर बेहतर अध्ययन उपलब्ध हैं। सांस्कृतिक अस्मितावादियों से उनकी समानता को ध्यान में रखते हुए प्रस्तुत संदर्भ में उऩ अध्ययनों से सहायता ली जा सकती है।

  उत्तर अस्मितावाद ने प्रयत्न करके ‘उत्पीड़ित’ की छवि से दूरी बनायी है। दलित स्त्रीवाद की विकासयात्रा पर दृष्टि डालने से स्पष्ट होता है कि पीड़ित स्त्री से क्रमश:  शक्ति सम्पन्न दलित स्त्री की अवधारणा निर्मित हो रही है। अस्मितावादी वैचारिकी के तहत लिखी गई आत्मकथाओं के शीर्षक देखें और उसकी दलित स्त्रीवादी दृष्टि से सृजित आत्मकथाओं के शीर्षकों की तुलना करें तो यह बात समझने में आसानी होगी। पहली धारा में ‘अक्करमाशी’, ‘जूठन’, ‘तिरस्कृत’, ‘घाव’, ‘छांग्या रूक्ख’ आदि हैं तो दूसरी में ‘जीवन हमारा’, ‘करक्कु’, ‘आयदान’ हैं। (34), दलित स्त्री की शुरूआती आत्मछवि तमिल की कवि तरेसम्मा के शब्दों में यों मिलती है-

हम गरीब
इसलिए करते हैं मजदूरी
लेकिन वही सिल्की बिस्तर उपहास करता है हमारा
जब हमारा दिन-दहाड़े बलात्कार होता है।
अशुभ-अभागी हैं हमारी जन्मकुंडलियाँ।
हमारे लड़खड़ाते पति भी
खटिया के एक कोने में पड़े हुए
फुफकारते और बदला लेने को चीखते हैं
अगर हम उनकी पकड़ न झेल सकें। (35)

संक्रमण के दौर से गुजरती, क्रमश: आत्मविश्वास अर्जित करती दलित स्त्री तेलुगु दलित रचनाकार जलदि विजयकुमारी की एक कविता में इस तरह आकार पाती है:

  अनखिला फूल
  विफल ध्यान
  ...     ...     ...

  मैं एक शापित
  पुरूष जाति की दासी
  जिसने रूग्ण अक्षरों को बना डाला है सजावटी
  और
  हैवानियत से सत्ता का इस्तेमाल करते हुए
  अपनी लंपट वासनाओं का बंदी
  विवाह के नाम पर धोखा
  पुरूष-असुरों की मृत्यु धुन पर नाचती लाश
  दहेज के कब्रिस्तान में
  गूंज रही लय विरोधी विचारधारा की
  लेकिन, अगर तुम्हारे हाथ में शहनाई जरा भी अचेत हुई
  मैं व्यथित होने वाली नहीं
  भीषण बदला
  प्रतिरोधी बाना
  इसीलिए ओ मां
  हताशा और विफलता से पीड़ित
  यह हमारा युग है।
  आगे बढ़ो हिम्मती बहनों
  मैं दूंगी तुम्हारा साथ
  मैं अबला नहीं
  मैं हूँ, शक्ति
  जिसने रचे ढांचे
  लुढकाने को पंक
  “मैं एक मां”
  जिसने जिंदगी बख्शी स्वयं इस जन्म को। 36

पीड़ित से शक्तिसंपन्न व्यक्तित्व में अंतरण प्राय: सभी भाषाओं की दलित स्त्री रचनाकारों में देखा जा सकता है। नयी दलित स्त्री खुदमुख्तार है। अपनी जिम्मेदारियों से वाकिफ़ और अपने अधिकारों के प्रति सचेत है। उसका संघर्ष और संकल्प बेहतर वर्तमान के साथ काम्य भविष्य के निर्माण के लिए है। नयी दलित स्त्री की कुछ अभिव्यक्तियां देखिए:

1.‘एक दिन आऊंगी मैं/दबावों के चलते नहीं/न किसी की दासी बनकर/तनी हुई रीढ़ के साथ/किसी के सामने झुकती हुई नहीं/बगैर किसी चूक के/किसी को बातचीत की अनुमति दिए बिना/सोचने का समय दिए बिना/आलोचना की परवाह न करके/प्रतिक्रियाओं के लिए अवकाश दिए बगैर/तब मेरा साथी होगा सत्य/कर्म मेरी ताकत.’(के.के. निर्मला, मलयालम)37,

2. ‘बहुत दिनों से देख रही थी/कुछ झंडे पड़े हुए थे/धूप-छांह, वर्षा-पानी से भी/कुछ फ़र्क नहीं पड़ा था इन पे/पास से गुजर रही जनता की आँखें भी/नहीं पड़ रही थीं इन पे/अयोग्य है यह पकड़ने के लिए/कंधे पर उठाकर ज्यों चलना शुरू किया। जनता  के ये सवाल तभी से/आप में से किसी ने उठाया नहीं इसे/इसलिए मैंने उठा लिया/इसके बाद देख रहीं हूँ/एक-एक करके सभी उस स्तूप से/झंड़ा उठाकर चलना शुरू कर दिए/कौन किस तरह जाएगा, यह समझे बिना/कुछ लोग तितर-बितर हुए/कुछ लोग इधर-उधर चल दिए/अंत में देखती हूँ/सभी का गंतव्य/उस एक ही दिशा की तरफ हैं’38,(कल्याणी ठाकुर, बाग्ला)

3.‘मैं हूँ शक्ति/मैं हूँ आशा/मैं हूँ तो कैसी निराशा?/मैं तेरे खेतों में बहती।शीत-जल प्रवाहिनी हूँ।/बांध जब मुझ पर बने/ तो दामिनी हूँ/जो करोगे प्रेम/ तो मैं रागिनी हूँ/झूठी मर्यादाओं में/न मैं बधूंगी/परम्परा और संस्कृति के नाम पर न/मैं दबूंगी‘ (39),(पूनम तुषामड़, हिन्दी)

4.‘बेआवाज़ लहरों वाला सागर/किलकारियां भरता चंद्रमा/बेसुर रात में झींगुरों के प्रेम पर/सोचती-जागती/काली चमड़ी के भीतर सुनने की हामी/भरतीहुई/वार्तालाप/आक्रोश/अट्ठाहास/कराहें/लड़कियां/आदि मचल रहे हैं/एक सिनेमाघर!’ (40), (धन्या ए.डी. मलयालम)

5. अनिता भारती, हिन्दी ‘आँखों में भर लूं/आसमान/दौड़ जाऊं इठलाकर/बादलों पर/सारी दुनिया मेरी है/मन की कलियां/सतरंगी सपने बुन रही हैं/सूरज की गमक आँखों में/भर रही हैं (41),(अनिता भारती, हिन्दी)

जैसे पारम्पारिक वर्चस्ववादियों को शिकायतों का पिटारा लिए बैठा दलित सह्य लगता है वैसे ही अस्मितावादियों को व्यथा में डूबी दलित स्त्री की आवाज़ स्वीकार्य लगती है। लेकिन, यह स्त्री जब स्वयं कदम उठाती है, बाहरी और भीतरी हिंसा के खिलाफ संघर्ष में उतरती है, न्याय का माँग करती है,अपनी शर्तों पर जिन्दगी जीने के ख्वाब बुनती है तो अस्मितावादियों और पारम्परिक वर्चस्ववादियों-दोनों को खटकने लगती है। वर्चस्ववादियों का खटकना तो तुरन्त समझ में आ जाता है लेकिन अस्मितावादियों का बिडम्बनापूर्ण लगता है। इस असुविधाजनक स्थिति से निपटने के लिए आम तौर पर अस्मितावादियों के तीन खेमे बनते देखे जा सकते हैं। पहले वर्ग में वे लोग होते हैं जो स्त्री मात्र के प्रति घृणा से भरे रहते हैं। दलित स्त्रियां भी उनकी कोप दृष्टि से बाहर नहीं रहतीं। दूसरी श्रेणी सांस्कृतिक अस्मितावादियों की होती है। भीतर की कमजोरी बाहर न प्रकट हो इस तर्क से, तथाकथित दलित संस्कृति/ मूलनिवासी संस्कृति/ नाग संस्कृति... की पुनर्रचना,पुनर्प्राप्ति के तर्क से, यह लड़ाई हम लड़ ही रहे हैं, के तर्क से दलित स्त्रियों को चुप कराने या अपने अजेंडे की अनुगामिनी  बनाने पर उनका ज़ोर रहता है। तीसरे वर्ग में ऐसे विचारक होते हैं जो दलित स्त्रियों का विरोध नहीं करते। यही नहीं,वे दलित स्त्रियों की बदनामी करने वाले पहले वर्गकी खुलकर आलोचना भी करते हैं। लेकिन, इस वर्ग के लिए जाति का प्रश्न सर्वोपरि होता है। पितृसत्ता को जाति जैसी प्राथमिकता देना उन्हें विचलन लगता है। वे इसीलिए ऐसी लेखिकाओं और जाति तथा पितृसत्ता को समान महत्व देने वाली रचनाओं की चर्चा करने से यथासंभव बचते हैं। दलित स्त्री जीवन को सामान्य दलित जीवन में अन्तर्भुक्त मानकर वे दलित स्त्रीवाद की अलग से चर्चा करना जरूरी नहीं समझते। (42),

दलित स्त्रीवाद में सौंदर्यशास्त्र को लेकर उत्सुकता का प्राय: अभाव दिखता है। दलित अस्मितावाद में ‘अपना’ सौन्दर्यशास्त्र गढ़ने की जैसी व्यग्रता पनपी औऱ बनी हुई है वैसी  मांग दलित स्त्रीवादियों की तरफ से नहीं की गई है। इसके कारणों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। पहली वजह यह लगती है कि जो समुदाय मानवधिकारों की लड़ाई लड़ रहा हो उसके लिए राजनीतिक चेतना का महत्व हैं, सौन्दर्यशास्त्र का नहीं। दूसरी यह कि सौंदर्यशास्त्र की प्रकृति में स्त्री के वस्तूकरण की आशंका अंतर्ग्रथित है। तीसरी, विश्व बाजार की घुसपैठ ने वस्तूकरण की आशंका को मजबूती दी है। विचारणीय है कि दलित सौंदर्यशास्त्र के दोनों अधिकारी विद्वान वैश्वीकरण तथा बाजारवाद के समर्थक भी हैं।(43) चौथी वजह यह है कि यह दौर नयी दलित स्त्री के निर्माण का है। इस दौर की प्राथमिक चिंता सशक्तीकरण के संसाधन जुटाने और अनुकूल माहौल बनाने की है। सौन्दर्यशास्त्र इस संदर्भ में दलित स्त्रीवादियों को शायद कोई सहायता नहीं देता। पांचवी और फिलहाल आखिरी वजह दलित सौन्दर्यशास्त्र के ऊपर छपे ग्रंथों की विषयवस्तु है। शरण कुमार लिंबाले द्वारा लिखित ‘दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र’ देशी-विदेशी साहित्य की चर्चा करने वे बावजूद दलित स्त्री लेखन की नोटिस तक नहीं लेता। ‘दलित वीमेंस राइटिंग, की संपादक के. सुनीता रानी ने प्रस्तुत पुस्तक के बारे में यह कहते हुए अपनी आपत्ति दर्ज कि पश्चिमी साहित्य, भारतीय साहित्य और दलित साहित्य की चर्चा करने वाले लेखक ने दलित स्त्री साहित्य का उल्लेख तक क्यों नहीं किया। यह तब जबकि मराठी दलित साहित्य में दलित स्त्रियों की सशक्त आवाज़ मौजूद थी। (44), अपनी इस पुस्तक के नए (दूसरे) संस्करण में लिंबाले ने इन पंक्तियों के लेखकों द्वारा लिया गया इंटरव्यू शामिल किया है। दलित स्त्री पर केन्द्रित मेरे प्रश्न के जवाब में उन्होंने यह अवश्य माना कि ‘उसका दोहरा शोषण होता है’, लेकिन, दलित स्त्रियों की आलोचना के केन्द्र डॉ. धर्मवीर का संदर्भ आने पर उन्होंने धर्मवीर का पक्ष लिया। (45),दलित सौन्दर्यशास्त्र के विशेषज्ञ  से यह उम्मीद ग़ैरवाजिब नहीं कि वह दूसरों के मुकाबले ज्यादा संवेदनशील होगा। लिंबाले की संवेदनशीलता का पता चला दलित स्त्रीवादी उर्मिला पवार की आत्मकथा  ‘आयदान’ के प्रकाशन पर। उर्मिला पवार पर हमला करने वालों में शरणकुमार लिंबाले दूसरों से आगे रहे। उर्मिला पवार की आलोचना के मुख्य बिन्दु ये थे-

·         उनकी (उर्मिला की ) सोच फेमिनिस्ट है। (फेमिनिज़्म- आरोप, विपथन के रूप में)

·         अंतरंग बातों को सार्वजनिक करना अम्बेडकरवाद के दायरे में नहीं आता। पति से उनके संबंध कैसे थे- यह बताने में अम्बेडकरवादी दर्शन कहाँ है?

·         क्योंकि उर्मिला नारीवादियों के सम्पर्क में हैं इसलिए ऐसा (ग़ैर अम्बेडकरवादी लेखन) कर रही हैं।

·         जब वे अपने पति हरिश्चन्द्र का शराब पीना नहीं छुड़वा सकीं तो सामाजिक समस्याओं के संदर्भ में विफल रहेंगी ही।

·         मरणासन्न पति की किडनी एक ज़रूरतमंद युवती को दान करने के उर्मिला के विचार पर स्तब्ध लिंबाले ने कहा कि यह सोच नारीवादी विचारधारा की देन है। ‘एक विवाहिता भला अपने पति के बारे में ऐसा सोच भी कैसे सकती है?’(46),

दलित साहित्य के सौन्दर्यशास्त्र पर दूसरी किताब ओम प्रकाश वाल्मीकि की है। किताब में एक दर्जन से अधिक अध्याय हैं लेकिन दलित स्त्री की पीड़ा या उसका साहित्य किसी भी अध्याय का विषय नहीं बन सके हैं। (47), वाल्मीकि (सौन्दर्यशास्त्री होने के साथ) कवि, कथाकार, आलोचक भी हैं। नहीं याद पड़ता कि किसी कविता या कहानी में उन्होंने नयी दलित स्त्री की शिनाख्त़ की हो, उसका चरित्र रचा हो। उसे समर्थन देने की बात तो इसके बाद हीआती है। उन्होंने किसी आलोचना ग्रंथ में दलित स्त्री आन्दोलन की चर्चा तक नहीं की है। हाँ, उनकी कई कहानियों में ‘पारम्परिक’ दलित स्त्रियों के चरित्र हैं। इनमें कुछ-एक की संघर्ष-क्षमता प्रेरणास्पद लग सकती है। लेकिन नैतिकता/यौन मर्यादा के प्रश्न पर लेखक ने परम्परा का ही समर्थन किया है।(48),

दलित सौन्दर्यशास्त्र और उसके प्रस्तावकों की इन भूमिकाओं से दलित स्त्रीवादियों का शंकित होना स्वाभविक ही है। सौन्दर्यशास्त्र से उनके विकर्षण में इस परिस्थितिजन्य अनुभव की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता।

  दलित स्त्रीवादी आन्दोलन ने अपने विकास का दूसरा पड़ाव कठिनाइयों से गुजरते हुए सफलतापूर्वक पार कर लिया है। अब उसकी सामर्थ्य और स्वतंत्र-स्वायत्त स्थिति पर बहस करने की जरूरत नहीं रह गयी। अस्मितावाद अपनी ऐतिहासिक भूमिका लगभग निभा चुका है। जैसे अर्सा पहले जातिवादी संस्कृति का मानव विरोधी  रूप पहचाना जा चुका है वैसे दलित धर्म और संस्कृति के किसिम-किसिम के संस्करण भी मानवाधिकारों की राह में अवरोधक के रूप में चिन्हित होने लगे हैं। दलितवाद को छोड़कर अम्बेडकरवाद की तरफ जाना इसीलिए श्रेयस्कर माना जा रहा है। अम्बेडकरी आन्दोलन की विरासत से निकला स्त्रीवाद अपने दम पर अग्रसर है। अम्बेडकरी आन्दोलनों से निकली, जन अभियानों के बीच निर्मित हो रही युवाओं की नयी पीढ़ी इन स्त्रीवादियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलती देखी जा सकती है। यह पारस्परिक सहयोग भरोसा पैदा करता है। रूप के स्तर पर ‘जेंडर से ‘सेंसिटिव’ नयी पीढ़ी को अंतर्वस्तु के स्तर पर भी समृद्ध करना इस आन्दोलन की बड़ी जिम्मेदारी है।(49),

अपने संघर्षों, सरोकारों को यह आन्दोलन जितना भविष्योन्मुखी, जनोन्मुखी तथा संवेदनक्षम बनाता जाएगा उतना ही पीड़ित मानवता के काम का साबित होगा। इस क्षेत्र के अध्येताओं तथा सिद्धांतकारों को अस्मितावाद से बाहर आकर उत्तर अस्मितावाद की चर्चा की शुरूआत करनी है। उत्तर अस्मितावाद का स्वरूप अभी बन ही रहा है। स्वरूप निर्माण की दिशा दलित स्त्री आन्दोलन को तय करना है। दलित स्त्री विमर्श रूप के स्तर पर नयी दलित स्त्री को गढ़ सकता है, लेकिन आवश्यकता अन्तर्वस्तु से संपन्न नयी दलित स्त्री के निर्माण की है। यह तभी संभव हो सकता है जब दलित स्त्री आन्दोलन जीवन के आधारभूत मुद्दों पर संघर्ष छेड़े। इन मुद्दों पर संघर्षशील संगठनों, समूहों के साथ सहयोग करे तथा ईमानदार प्रयासों को साझे मंच पर लाने में अपनी भूमिका निभाए। अभी भी सबसे कम साक्षरता दलित स्त्रियों में है। पारिवारिक सम्पत्ति में उनका हिस्सा प्राय: नहीं होता। उन पर हुए जुल्म को प्रशासन हर संभव नज़रअंदाज करने की कोशिश करता है। पुरूषों के मुकाबले उनकी मजदूरी अक्सर कम होती है। काम के घण्टे, अवकाश, उचित परिवेश और हिंसामुक्त परिवार चिंता का विषय बने हुए हैं। इन सबसे टकराए बिना न मानवाधिकारों की रक्षा की बात सोची जा सकती है और न नयी दलित स्त्री के निर्माण को पूरी तरह साकार किया जा सकता है।

 दलित स्त्री की सक्रियता, संघर्ष क्षमता और समानधर्माओं के प्रति संवादोन्मुख रवैये से उनके पक्ष को मजबूती मिल रही है।

संदर्भ

1.  ‘Dalit Feminism: Where Life- Worlds and Histories Meet’,

v.Geetha in ‘Women Contesting Culture: Changing

Frames of Gender Politics in India’ (2012), Edited by Kavita Panjabi and ParomitaChakravarti, STREE, Kolkata, P.244.

2.  वहीं. पृ. 245

3.  ‘Untouchabity and Dalit Women’s Oppression’, Bela Malik in ‘Gender and Caste’ (2003 Reprint 2006)  Edited by AnupamaRao. Kali for Women, New Delhi,Pp.102-107

4.  वहीं. पृ.103.

5.  वहीं पृ.103

6.  ‘A Dalit Feminist Standpoint’, SharmilaRege in ‘Gender and Caste’, Pp.90-101. This paper was originally pubslished in Seminar 471, Nov.1998, pp.47-52.

7.  वहीं पृ.93.

8.  वहीं पृ.93.

9.  वहीं पृ.95.

10. ‘Dalit Women Talk Differently’, Gopal Guru, Economic and Political Weekly, Oct.14-21,1995, pp. 2548-50. This essay is reprodueed in ‘Gender and Caste’, pp. 80-85.

11. शार्मिला रेगे, पूर्वोक्त, पृ.99.

12. अनुपमा राव द्वारा ‘जेंडर एंड कास्ट’ की भूमिका में उद्धृत, पृ.4.

13. ‘The Prisons We Broke’ (2008), Baby Kamble, Trans. MayaPandit, Orient Longman, Afterword-Gopel Guru, p.160

14. वहीं पृ.161.

15. वहीं पृ.154-55

16. वहीं पृ.155.

17. वहीं पृ.156-57.

18. ‘Dalit Movements and Women’s Movements’, Gabriele Dietrich in ‘Gender and Caste’, pp.65-66.

19. वहीं पृ.66.

20. वहीं पृ.66.

21. ‘Power That Transcends’, S, Thenmozhi in ‘The Oxford  India Anthology of Tamil Dalit Writing’ (2012) edited by Ravikumar and R.Azhagarasan, Oxford Univorsity Press P.305

22. वहीं पृ.305

23. वहीं पृ.305.

24. ‘दलित साहित्य का स्त्रीवादी स्वर’(2008), विमल थोरात, अनामिका पब्लिशर्स, नई दिल्ली, पृ10.

25. ‘समकालीन भारतीय दलित महिला लेखन’(2011), सम्पादक रजनी तिलक, रजनी अनुरागी, स्वराज प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ.12.

26. ‘Flowering from the soil: Dalit Women’s Writing form Telugu’(2012) Translated and Compiled by K.SuneethaRani,Prestige Books International  New Delhi.pp. 38-44

27. ‘The Cracked Mirror: An Indian Debate on Experience and Theory’(2012) Gopal Guru, Sunder Sarukkai, Oxford University Press.

28. कुल नौ अध्यायों की उक्त पुस्तक गोपाल गुरू और सुन्दर सरूक्काइ के बीच संवाद के रूप में है।

29. ‘Humiliation: Claims and Context’(2009) edited by Gopel Guru, Oxford University press.

30. ‘आयदान’(2010) उर्मिला पवार, अनु.माधवी प्र.देशपाण्डे, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, ‘आत्मभान’(भूमिका) से उद्धृत।

31. ‘बीजबैंक’ अनिता भारती, ‘कथादेश’ नवम्बर 2011 अंक में प्रकाशित। यह कहानी लेखिका के संग्रह ‘एक थी कोटेवाली’ में भी संग्रहीत है।लोकमित्र प्रकाशन 2012

32. ‘समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रतिरोध’ (2013) अनिता भारती, स्वराज प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ.295.

33. Gabriele Dietrich in ‘Gender and Caste’, pp.74-75.

34. ‘अक्करमाशी’- (दोगला)- मराठी-शरण कुमार लिंबाले, ‘जूठन’,-हिन्दी- ओमप्रकाश वाल्मीकि, ‘तिरस्कृत’- हिन्दी- सूरजपाल चौहान ‘घाव’- तमिल- के.ए. गुणशेखरम,  ‘छांग्या रूक्ख’-(कटा छंटा पेड़)- पंजाबी- बलबीर माधोपुरी।

 ‘जीवन हमारा’-मराठी- बेबी कांबले, ‘करक्कु’-(एक विशेष पेड़ की धारदार पत्ती) –तमिल- बामा, ‘आयदान’(डलिए की बुनाई)- मराठी- उर्मिला पवार। हिन्दी में सुशीला टाकभौरे की आत्मकथा  ‘शिकंजे का दर्द’ प्रकाशित है। यह कृति दलित स्त्री लेखन को समझने में सहायता कर सकती है परन्तु लेखिका को दलित स्त्रीवादी कहने में संकोच है।

35. गैब्रिएल डीट्रिख द्वारा उद्धृत  ‘जेंडर एंड कास्ट’, पृ.70. इस भावधारा की दलित स्त्री कविताओं का एक अध्ययन मैंने ‘हमारे हिस्से का सच: तेलुगु दलित स्त्री लेखन’ ‘कथादेश’ मार्च 2006 में प्रकाशित करवाया था।

36.’Flowring from the soil’, pp.300-301.

37. ‘कथादेश’ फरवरी 2010, दिल्ली, पृ.66.

38.‘कथादेश’ सितम्बर 2009, पृ.72-73. अनुवाद-निशांत। जिन कविताओं के अनुवादक/अनुवादिका का नाम नहीं दिया गया है उनका अनुवाद इन पंक्तियों के लेखक ने किया है।

39. ‘मां मुझे मत दो’  (2010), पूनम तुषामड़, सफाई कर्मचारी आन्दोलन, नई दिल्ली, पृ. 51.

40. कथादेश, जून 2012, मलायलम दलित स्त्री कविता पर विशेष आयोजन, अनुवाद- प्रमीला के.पी., पृ.80.

41.‘एक कदम मेरा भी’ (2013), अनिता भारती, बुक्स इंडिया, दिल्ली, पृ.152.

42. ‘हिन्दी दलित साहित्य’ (2011) मोहनदास नैमिशराय, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली। कुल चौदह अध्यायों वाले इन ग्रंथ में एक भी अध्याय दलित स्त्री लेखन पर नहीं है।

 ‘दलित अस्मिता’ जनवरी-मार्च 2011 अंक में डॉ.रामचंद्र का लेख ‘दलित काव्य में दलित चेतना’ प्रकाशित है। इसमें लेखक ने दलित काव्य/साहित्य की प्राथमिकताएं गिनाई हैं। अपेक्षित विस्तार के साथ परिगणित पंद्रह प्रवृतियों में एक का भी संबंध दलित स्त्री जीवन/संघर्ष/साहित्य तथा पितृसत्ता से नहीं है। नयी पीढ़ी के एक अस्मितावादी द्वारा दलित स्त्री लेखन तथा आन्दोलन का पूर्ण नकार मानीखेज है। पृ.21-24.

43. दलित सौन्दर्यशास्त्र के अधिकारी विद्वान हैं शरणकुमार लिबांले तथा ओमप्रकाश वाल्मीकि। वैश्वीकरण और बाजारवाद पर इनकी मान्यताओं की कुछ चर्चा मैंने अपने एक लेख ‘दलित कविता और समकालीन चुनौतियाँ: जय प्रकाश लीलवान की कविताएं’ में की है। देखिए, ‘दलित अस्मिता’ जुलाई-दिसम्बर 2012, पृ.37-46.

44. ‘Flowering from the Soil’, p.16.ss

45.‘दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र’ (2005), शरण कुमार लिबांले, अनु. रमणिका गुप्ता, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ.169. प्रासंगिक अंश इस प्रकार है: “उन्होंने (धर्मवीर ने) इस (मातृसत्ता) पर रिसर्च किया है। मैंने उनकी थ्योरी पढ़ी नहीं इसलिए इस पर टिप्पणी करना उचित नहीं होगा।...धर्मवीर ब्राह्मणवाद का विरोध करते हैं। वे हमेशा अपनी बात रेडिकल स्टाइल से रखते हैं। इसलिए उनको समझने में दिक्कतें आती हैं।”

46. ‘The Weave of My Life: A Dalit Women’s Memoirs’(2008) UrmilaPawar, Translated by Maya Pandit, Stree, Kolkata, Quoted from Introduction by Maya Pandit, pp.xx viii- xxix.

47.‘दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र’ (2001), ओमप्रकाश वाल्मीकि, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली.

48. ‘दलित कहानियों का परिदृश्य’, बजरंग बिहारी तिवारी, ‘हंस’ दिसम्बर 2001. पृ.25-29.

49. द्रष्टव्य- ‘Post Feminism: Cultural Text and Theories’ (2009) Stephanie Genz and Benjamin A Brabon, Edinburgh University Press.

 

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