Home Blog Page 158

सुजाता तेवतिया की कवितायें : अगर नहीं होती गुफा मैं और

0
सुजाता तेवतिया

सुजाता तेवतिया चोखेरवाली ब्लॉग का संचालन करती हैं और दिल्ली वि वि के श्यामलाल कॉलेज में पढ़ाती हैं . संपर्क : ई-मेल : sujatatewatia@gmail.com

अगर नहीं होती गुफा मैं


अगर नहीं होती गुफा मैं
तो बन जाती नदी एक दिन।
जितना डरती रही
उतना ही सीखा प्यार करना
और गुम्फित हो जाना।
गुफाएँ कहीं चलती नहीं
इसलिए अगर नहीं होती लता मैं
तो बाढ हो जाती क्या एक दिन?
एक परी या तितली या पंखुरी
सूने गर्भगृह की पवित्र देहरी पर पड़ी हुई।
कभी नहीं हो पाती मैं
जैसे हो सकती हूँ आज !
हवा हो जाती मैं शायद या बयार ।
लेकिन सिर्फ बाढ हो पाती हूँ अक्सर !
एक भी अच्छा शब्द,
क्या करूँ ,
छूटा नहीं है मेरे लिए।
तुम ऊब न जाओ
चलो फिर से गाएँ वही कविता
जिसमें मैं बन जाती थी चिड़िया और तुम भँवरा।
तुम्हारी गुन गुनाहट से
मैं प्यार सीखने लगूँगी फिर से।
इसलिए शब्दसाज़ होना होगा
मुझे ही
अबकी बार।
अगर नहीं होते तुम भ्रमर तो
मैं नहीं गाती कभी कविता
मैं गद्य रचती।
मुझे फिर से तलाशने हैं
वे छंद जो गुफासरिता से बहते हैंं।
शापित आस्थाएँ अब भी वहाँ
दिया जलाती हैं
कि गुफाएँ पवित्र ही रहें ।
और चिड़िया – या जो भी कुछ
मैं बनूँगी इस बार-
जब तक बेदखल है
तब तक बार बार पढनी होगी वही कविता
जिसमें तुम बादल बनते थे और
धरा बन जाती थी मैं।

नहीं हो सकेगा प्यार

नहीं हो सकेगा
प्यार तुम्हारे-मेरे बीच
ज़रूरी है एक प्यार के लिए
एक भाषा …
इस मामले में
धुरविरोधी हैं
तुम और मैं।
जो पहाड़ और खाईयाँ हैं
मेरी तुम्हारी भाषा की
उन्हें पाटना समझौतों की लय से
सम्भव नहीं दिखता मुझे
किसी भी तरह अब।
इसलिए तुम लौटो
तो मैं निकलूँ खंदकों से
आरम्भ करूँ यात्रा
भीतर नहीं ..बाहर ..
पहाड़ी घुमावों और बोझिल शामों में
नितांत निर्जन और भीड़-भड़क्के में
अकेले और हल्के ।
आवाज़ भी लगा सकने की  तुम्हें
जहाँ नहीं हो सम्भावना ।
न कंधे हों तुम्हारे
जिनपर मेरे शब्द
 पिघल जाते हैं सिर टिकाते ही और
फिर  आसान होता है उन्हें ढाल देना
प्यार में …
नहीं हो सकता प्यार
तुम्हारे मेरे बीच
क्योंकि कभी वह मुकम्मल
 नहीं आ सकता मुझ तक
जिसे तुम कहते हो
वह आभासी रह जाता है
मेरा दिमाग प्रिज़्म की तरह
तुम्हारे शब्दों को
हज़ारों रंगीन किरनों में बिखरा देता है।

पाँव भर  जगह 

उसे अक्सर देखा
शाम के छह बजे छूटती है जब
भागती है मेट्रो की ओर
सिर्फ माँ होती है वह उस वक़्त
जिसके बच्चे अकेले हैं घर पर
नाम पूछो तो वह भी नही बता पाएगी।
पाँव-भर खड़े रहने की जगह खचाखच भीड़ में
बचाए रखना सिर्फ
उसका प्रयोजन है
किसी रॉड के सहारे से वह जमी रहती है
बेपरवाह धक्कों,रगड़ों और कोलाहल से
बस कुछ पल और
अगले स्टेशन पर मिल ही जाएगी सीट
और बस कुछ ही सालों में बड़े हो जाएंगे बच्चे
लग ही जाएगी नैया पार
फिर सो जाएगी कुछ देर आराम से सीट पर
यूँ भी आँख बंद करने भर की दूरी पर रहती है नींद।
शहर में नौकरी के बिना चलता भी नहीं है।
कभी तो मिलती ही नहीं सीट घर आने तक भी।
माँ कमातीं अगर कुछ पढी लिखी होतीं
जद्दोजहद मेरी कुछ कम हो जाती।
चलो अच्छा है जो जैसा है।
ग्यारहवीं में पढती बड़ी बेटी
पढती है बेफिक्र मन लगाकर
शायद वह जान पाएगी जल्दी ही कि
सारी कोशिश माँ की
पाँव-भर जगह बचाने की नहीं
आने वाली कई पीढियों को बचा लेने की कोशिश थी।

जो आएगा बीच में उसकी हत्या होगी 

तुमने कहा
बहुत प्यार करता हूँ
अभिव्यक्ति हो तुम
जीवन हो मेरा
नब्ज़ हो तुम ही
आएगा जो बीच में
हत्या से भी उसकी गुरेज़ नहीं
संदेह से भर गया मन मेरा
जिसे भर जाना था प्यार से
क्योंकि सहेजा था जिसे मैंने
मेरी भाषा
उसे आना ही था और
वह आई निगोड़ी बीच में
तुम निश्शंक उसकी
कर बैठे हत्या
फिर कभी नहीं पनपा
प्यार का बीज मेरे मन में
कभी नहीं गाई गई
मुझसे रुबाई
सोचती हूँ
इस भाषा से खाली संबंध में
फैली ज़मीन पर
किन किंवदंतियों की फसल बोऊँ
कि जिनमें
उग आएँ आइने नए किस्म के
दोतरफा और पारदर्शी
क्योंकि तुमने कहा था
जो आएगा बीच में
उसकी हत्या होगी ।

भागना था मुझे बहुत पहले 

भागना था मुझे बहुत पहले
लगभग उन्हीं वक़्तों में
जब सोचती थी -‘भागना कायरता है’
लेकिन ,भागना हिम्मत भी होती है
उन वक़्तों में
जब भागा जाता है
असह्य व्यवस्थाओं के निर्मम मकड़जाल से बचकर
जब भाग निकलते हैं हम
उनके पास से
जिनकी कुण्ठाएँ धीरे- धीरे
ग्रस लेंगी हमारे व्यक्तित्व को
भाग जाना बहुत बहादुरी है
उन कमज़ोर पलों में जब
अत्याचारी के चरणों में शीश
झुकाए रखने की आदत पड़ने लगी हो
और उस हिम्मत के पल में भी
जब अत्याचारी को बदल देने का मूर्ख दम्भ जागने लगा हो
गढ्ने के लिए अपने मुहावरे हर एक को
भागने की कायरता या हिम्मत का निर्णय
अपनी पीठ पर उठाना होता है
इसलिए भागना था मुझे बहुत पहले
अब इन वक़्तों में
जब कि उन खूँखार चेहरों से नकाब हट गए हैं
उनकी ढिठाई आ गई है सबके सामने
हद्द है
कि न भाग पाने की अपनी स्वार्थी कायरता को
मैंने उधारी शब्दों की परछाईं में अभी -अभी देख लिया है।

मनुस्मृति दहन के आधार : डा आम्बेडकर

( 25 दिसंबर को  ‘ मनुस्मृति दहन दिवस’  के रूप में भी मनाया जाता है , जिसे स्त्रीवादियों का एक समूह ‘ भारतीय महिला दिवस’  के रूप में मनाने का आग्रह भी रखता रहा है . मनुस्मृति शूद्रों -अतिशूद्रों के साथ -साथ स्त्रियों को भी अपने विधानों का शिकार बनाता है . मनुस्मृति से मुक्ति स्त्री की मुक्ति के लिए भी एक पहल है, जिसकी शुरुआत 25 दिसंबर 1927 को डा आम्बेडकर ने मनुस्मृति के दहन के साथ की थी.  डा आम्बेडकर ने अपने आलेख ‘ हिन्दू नारी का उत्थान और पतन ‘ में स्त्रियों की दुर्दशा का विधान रचाते मनु स्मृति की खबर ली है. पूरा आलेख स्त्रीकाल के दलित स्त्रीवाद अंक में पढ़ा जा सकता है . यहाँ हम आज मनुस्मृति दहन दिवस के अवसर पर इस आलेख का एक अंश प्रस्तुत कर रहे हैं . ) 
पूरा आलेख पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक करें : ‘ हिन्दू नारी का उत्थान और पतन ‘
प्राचीन काल की नारी की स्थिति से तुलना करने पर हमें दिखाई देता है कि आज की नारी घोर पतन की स्थिति में पहुँच गयी है. राजनीति में उनके योगदान के सम्बन्ध में भले ही कुछ संदेह हो, परन्तु बौद्धिक तथा सामाजिक क्षेत्र में उन्होंने ‘बहुत ही ऊँचा स्थान’ प्राप्त कर रखा था, इसमें कोई संदेह नहीं.  अथर्ववेद में आये इस प्रंसग से कि ब्रह्मचर्य-काल पूरा करने के उपरान्त कन्या विवाह के योग्य मानी जाये, यह स्पष्ट होता है कि उस काल की नारी उपनयन की भी अधिकारिणी थी.  श्रोत-सूत्र से हमें विदित होता है कि स्त्रियों को वेदाध्ययन कराया जाता था और वे वेद-मन्त्रों  का उच्चारण कर सकती थी .  और सबसे बड़ा प्रमाण तो पाणिनि का अष्टाध्यायी है, जिससे सिद्ध होता है कि स्त्रियाँ गुरुकुल में रहकर वेदों की विभिन्न शाखाओं का अध्ययन करती थी तथा मीमांसा में पारंगत होती थी.  पंतजलि का ‘महाभाष्य’ हमें बताता है कि स्त्रियाँ उस समय आचार्य भी थी और कन्याओं को वेद पढ़ाती थी. पुरुषों के साथ धर्म,दर्शन,अभ्यास आदि  गूढ़ विषयों पर स्त्रियों के शास्त्राथों के उदाहरण भी कम नहीं है.  जनक और सुलभा,याज्ञवल्क्य और गार्गी, याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी तथा शंकराचार्य और विद्धाधरी के शास्त्रार्थ यह दर्शाते है कि मनुस्मृति के पहले के युग में स्त्रियाँ ज्ञान व शिक्षा के क्षेत्र में, उच्चतम शिखर पर पहुँच सकती थी.

भारतीय इतिहास इस बात को निर्विवाद रूप से सिद्ध कर देता है कि एक युग ऐसा था, जिसमे स्त्रियाँ अत्यंत सम्मान की दृष्टि से देखी जाती थी.  डॉ.काशी प्रसाद जायसवाल की पुस्तक ‘हिन्दू राजतंत्र’ के अनुसार राजाओं के राज्याभिषेक में प्रमुख भाग लेने वाले रत्नों  में रानी भी एक होते थी.  और जिस प्रकार राजा अन्य रत्नों  का अर्चन –वंदन करता था, उसी प्रकार रानी का भी करता था.  यही नहीं, अपनी प्रधान रानी के अतिरिक्त अपनी नीची जातियों की पत्नियों की भी वह सम्मान पूजा करता था.  इसी प्रकार अभिषेक के पश्चात राजा श्रेणियों की प्रमुख महिला का भी वंदन करता था!विश्व के इतिहास की दृष्टी से भी नारियों की उपर्युक्त स्थिति अत्यंत गौरवपूर्ण थी.  इस स्थिति में उनके पतन के लिए कौन दोषी ठहराया जा सकता है ? निश्चय ही इसका श्रेय हिन्दुओं के विधायक मनु को प्राप्त है, इसमे की कोई गुन्जाइश नहीं है. प्रमाण-स्वरूप स्त्रियों के सम्बन्ध में,मनुस्मृति के कुछ विधान प्रस्तुत किये जा रहे है:
स्वभाव एष नारीणां  नराणामिहदूषणम .  
अतोर्थान्न प्रमाद्यन्ति, प्रमदासु विपश्चित: 
अविद्वामसमलं लोके,विद्वामसमापि  वा पुनः 
प्रमदा द्युतपथं नेतुं काम क्रोध वाशानुगम 
मात्रस्वस्त्रदुहित्रा वा न विविक्तसनो भवेत्  
बलवान इन्द्रिय ग्रामो विध्दांसमपि कर्षति !
अर्थात:-पुरुषों को अपने जाल में फंसा लेना तो स्त्रियों का स्वभाव ही है! इसलिए समझदार लोग स्त्रियों के साथ होने पर चौकन्ने रहते है, क्योंकि पुरुष वर्ग के काम क्रोध के वश में हो जाने की स्वाभाविक दुर्बलता को भड़काकर स्त्रियाँ, मूर्ख  ही नहीं विध्द्वान पुरुषों तक को विचलित कर देती है! पुरुष को अपनी माता,बहन तथा पुत्री के साथ भी एकांत में नहीं रहना चाहिए,क्योंकि इन्द्रियों का आकर्षण बहुत तीव्र होता है और विद्वान भी इससे नहीं बच पाते .
नैता रूपं परीक्षन्ते नासां वयसि संस्थिति:
सुरूपं व विरूपं वा,पुत्रनित्येव भुजन्ते 
पौंश्चल्याच्चलचित्ताच्च, नैस्नेह्याच्च स्वभावतः
 रक्षिता यत्नतोअपीह भर्तुष्वेता विकुवते
एवं स्वभावं ज्ञात्वाअअसां प्रजापति निसर्गजम 
 परमं यत्नमातिष्ठेत्पुरुषों रक्षणं प्रति 
श्य्यासनमलंकारं कामं क्रोधं अनार्जवम 
द्रोहभावं कुचर्या च स्त्रीभ्यो मनुरकल्पयत !
अर्थात:- पुरुषों में स्त्रियाँ  न तो रूप का विचार करती है, न उसकी आयु की परवाह करती है!सुरूप हो अथवा कुरूप,जैसा भी पुरुष मिल जाये उसी के साथ भोग-रत हो जाती है. सदा पुरुष-संग की इच्छा रखने वाली ,चंचल-चित्त तथा स्वभाव  से निष्ठुर होने के कारण,कितने भी यत्न  से क्यों न रखी जाये, स्त्रियाँ पतियों  के प्रति निष्ठावान नहीं रह जाती है.  ये दुर्गुण स्त्रियों में सृष्टि के आदि काल से ही विधमान है, अत:पुरुष को बड़े यत्न से रक्षा  करनी चाहिए . सृष्टिकर्ता ने,नारी की रचना करते समय ही उसमे अपनी शय्या,आसन ,आभूषण,के प्रति मोह तथा काम,क्रोध ,बेईमानी ,द्वेष -भाव एवं चरित्रहीनता से दुर्गुण कूट-कूट कर भर दिये .

मनु की दृष्टि में स्त्रियों का क्या स्थान था, वह उपर्युक्त उदाहरणों से स्पष्ट है. स्त्रियों के प्रति मनु के विधान का यह एक नमूनामात्र है. मनु के विचार से स्त्रियों को किसी भी  दशा में स्वतंत्र नहीं होने देना चाहिए, यथा:

अस्वतंत्रता: स्त्रियः  कार्या: पुरुषै स्वैदिर्वानिशम 
विषयेषु च सज्जन्त्य: संस्थाप्यात्मनो वशे
पिता  रक्षति कौमारे भर्ता यौवने 
रक्षन्ति  स्थाविरे पुत्र,न स्त्री स्वातान्त्रयमर्हति 
सूक्ष्मेभ्योपि प्रसंगेभ्यः स्त्रियों रक्ष्या विशेषत:
 द्द्योहिर कुलयो:शोक मावहेयुररक्षिता:
इमं हि सर्ववर्णानां पश्यन्तो  धर्ममुत्तमम
 यतन्ते भार्या भर्तारो  दुर्बला अपि
अर्थात:- पुरुषों को अपने घर की सभी महिलाओं को चौबीस घंटे नियन्त्रण में रखाना चाहिए और विषयासक्त स्त्रियों को तो विशेष रूप से वश में रखना चाहिए! बाल्य काल में स्त्रियों की रक्षा पिता करता है! यौवन काल में पति  तथा वृधावस्था में पुत्र उसकी रक्षा करता है! इस प्रकार स्त्री कभी भी स्वतंत्रता की अधिकारिणी नहीं है! स्त्रियों के चाल ढाल में ज़रा भी विकार आने पर उसका निराकरण करनी चाहिये ! क्योंकि बिना परवाह किये स्वतंत्र छोड़ देने पर स्त्रियाँ दोनों कुलों (पति व पिता ) के लिए दुखदायी सिद्ध हो सकती है! सभी वर्णों के पुरुष इसे अपना परम धर्म समझते है! और दुर्बल से दुर्बल पति भी अपनी स्त्री की यत्नपूर्वक रक्षा करते है!

बालया वा युवत्या वा वृदध्या वापि योषिता
 न स्वतंत्रयेन कर्तव्यं किंचित्कार्य गृहेश्वपी 
बाल्ये पितुर्वशे तिष्ठेत्पानि ग्राहस्य यौवने 
 पुत्राणां भर्तारि प्रेते न  भजेत्स्त्री स्वतंत्रताम !
 पित्र भर्त्र सुतैर्वापी नेच्छेद्विरहमात्मनः 
एषां हि विरहेण स्त्री  गर्ह्ये कुर्यादुभे कुले!
अर्थात: स्त्री को,  चाहे वह बालिका हो, युवती हो अथवा वृध्दा हो, अपने घर में भी कोई कार्य स्वंतंत्रतापूर्वक नहीं करनी चाहिए.  बाल्यावस्था में अपने पिता के,यौवनावस्था में अपने पति के और पिता के न रहने पर उसे अपने पुत्रों के अधीन बन कर रहना चाहिए कभी भी स्वतंत्र नहीं रहना चाहिए .  स्त्री को अपने पिता ,पति और पुत्रों से अलग कभी नहीं होना चाहिए. ऐसी स्वच्छंद स्त्रियाँ निश्चय ही दोनों (पिता व पति)के कुलों की भी बदनामी कराती है.  मनु के विधान में स्त्रियों को पति से सम्बन्ध –विच्छेद (तलाक) का अधिकार नहीं है:

एतावानेव पुरुषो यज्जयात्मा  प्रजेति  ह 
 विप्रा: प्राहुस्तथा चैतद्धोभर्ता  सा स्मृतांगना 
अर्थात: स्त्री और पुरुष मिलकर एक व्यक्तित्व बनाते है. विप्रों का कथन है कि जो पति है वही पत्नी है.

पति-पत्नी के रूप में स्त्री-पुरुष के अविच्छेद-सम्बन्ध-संबंधी मनु के विधान को बहुत से हिन्दू बड़ी श्रधा से देखते है और यह समझते है कि  विवाह-सम्बन्ध चूंकि आत्मा का मिलन होता है,इसलिए मनु ने उसे अविच्छेद बताया है, परन्तु मनु का विधान यहीं तक सीमित होता,तो कोई बात न थी.  आश्चर्य तो यह है कि  वह अविच्छेदता केवल स्त्री के लिए है, पुरुष के लिए नही . यह विधान स्त्री को तो पुरुष से बांधकर रखता है, परन्तु पुरुष को पूरी स्वतंत्रता प्राप्त है! इस विधान में पुरुष स्त्री को छोड़ने का अधिकार ही नहीं, उसको बेचने का भी अधिकारी है! यदि कोई बंधन है, तो यह है कि स्त्री स्वतंत्र  नहीं हो सकती,  भले ही वह बेच  दी जाए या त्याग दी जाये !देखिये इस सम्बधं में मनु की व्यवस्था:
न निष्क्रय विसर्गाभ्यांभर्तुभार्या विमुच्यते
  एवम धर्म विजानीम: प्राकप्रजापति  निर्मितं!
अर्थात:  पति द्वारा त्याग दिये जाने तथा किसी दूसरे के हाथ बेच दी जाने पर भी कोई स्त्री दूसरे की पत्नी नहीं कहीं जा सकती .  उसके विवाहित पति का उस पर आजन्म अधिकार बना रहेगा.
इससे बढ़कर  भी राक्षसी मनोवृति कोई हो  सकती है,इसमें संदेह है, परन्तु स्मृतिकार मनु का उद्देश्य तो बौद्ध -काल में स्त्रियों को मिली स्वतंत्रता का अपरहण करना था.  उन्हें अपने विधान के औचित्य अथवा अनौचित्य से क्या लेना देना था?उन्हें तो स्त्रियों की स्वतंत्रता से सिर में पीड़ा हो रही थी और इस पीड़ा के निवारण का एक ही उपचार,स्त्रियों की स्वतंत्रता का अपहरण था, उन्होंने किया. धन सम्पति के विषय में मनु ने पत्नी को एक दास से अधिक नहीं समझा ,यथा:
भार्या पुत्रश्य दासश्य त्रय एवाधना: स्मृता:
 यत्ते समधीगच्छन्ति  यस्य ते तस्य तद्धनम !
अर्थात :- स्त्री-पुत्र  तथा दास की अपनी कोई धन-संपत्ति  नहीं होती है! जो कुछ ये कमाते है, वह इनका अपना न होकर पति,पिता और स्वामी का ही माना जाएगा! आगे चलकर मनुस्मृति कार ने विधवा पर दया करके, उसे निम्नलिखित अधिकार दिये  है:
१.यदि स्वर्गीय पति संयुक्त परिवार का सदस्य था तो विधवा को गुजारा मिल सकता है!
२.यदि मृत पति अलग होकर रहता था,तो उसकी सम्पति में विधवा का हक तो है, परन्तु व्यवस्था व नियंत्रण में स्त्री का कोई हाथ नहीं रहेगा!
भार्या पुत्रश्च दासश्च प्रेष्यो भ्राता च सोदर:
 प्रप्तापराधास्ता डया: स्यू र  …. वा वेणुदलेन  वा !
अर्थात:- पत्नी ,पुत्र, दास, शिष्य तथा अपने रक्त-सम्बन्ध का भाई यदि अपराध करे, तो उसे रस्सी या फाटे बांस से मारा जा सकता है !इसप्रकार मनु के विधान में स्त्री को शारीरिक दंड देने का अधिकार भी पति को दिया गया है.  इसके अतिरिक्त मनु के विधान में स्त्रियों को ज्ञान प्राप्त करने अथवा वेदाध्ययन का अधिकार नहीं दिया गया है.

अमन्त्रिका तू कार्येयं स्त्रीणां भावृदशेषत:
संस्कारार्थ शरीरस्य यथाकालं यथा क्रमम्
अर्थात :-निर्धारित कालक्रम के अनुसार स्त्रियों के जो संस्कार किये जायें, उनमे वेद-मन्त्रों का पाठ न किया जाये . ब्राह्मण संस्कृति में यज्ञ –कर्म धर्म ही आत्मा माना गया है,परन्तु मनु ने स्त्रियों को इस धर्म-कार्य से भी वंचित रखा है .  इस संबन्ध  में उनका आदेश निन्मलिखित है:

न वै कन्या न युवतिर्नाल्प विद्धो बा बालिश:
 होता स्यादग्निहोत्रस्य नर्तोनासंस्कृतस्तथा!
नरके हि पतन्त्येते जुह्वतः  स च यस्य तत
तस्माद्वैता  न कुशलो होता स्याद्वेदपरागः 
अर्थात:- कन्याएँ युवतियां ,थोड़ा पढ़े -लिखे लोग,कुपढ,बीमार अथवा संस्कार-रहित व्यक्ति यज्ञ के होता न बनाये जायें, वरना होता और यजमान दोनों नरकगामी होंगे . धर्म लाभ से स्त्रियों को वंचित रखने के लिए उनको स्वयं तो यज्ञ करने के लिए अयोग्य ठहराया है,मनु ने ब्राह्मणों पर भी बंधन लगा दिया कि वे भी स्त्रियों के लिए यज्ञ न करे. इस प्रकार  न स्वयं  यज्ञ कर सकती है, न ब्राह्मणों के द्वारा करा सकती है. ब्राह्मणों पर रोक लगाने के लिए मनु ने निम्नलिखित विधान बनाया :

न श्रोति यतते ग्रामयाजिकृते तथा 
स्त्रिया क्लीबेन च हते भुन्जीत ब्राह्मण:क्वचित्
अश्लीलमेतत्साधूनां यत्र जुह्वत्यमी हवि:
 प्रतीप मेतद्देवानां तस्मात्तत्परिवर्जयेत!
अर्थात:- जिस यज्ञ में श्रोत्रिय आचार्य न हो, जिसमे समस्त ग्राम अध्वर्यु हो तथा जिसमे स्त्री  व नपुंसक होता हो,ऐसे यज्ञ को अश्लील माना जाता है,ब्राह्मण ऐसे यज्ञ में भोजन न करे .

और अब जरा स्त्रियों के लिए मनु द्वारा निर्धारित जीवन-आदर्श को भी देखिए:
यस्मैदद्धपित्तात्तात्वेनां भ्राता  चानुमते पितु:
 तं शुश्रुषेत जीवन्तं  संस्थितं च न लंघयेत
विशील: कामवृत्तो वा गुनैर्वा परिवर्जित:
 उपचर्य:स्त्रिया  साध्व्या सततं देववत्पति:
नास्ति स्त्रीणां प्रथग्यज्ञों न व्रतं नीप्युपोषितम
पतिं शुश्रुषते येन तेन स्वर्गे महीयते 
अर्थात :-स्त्री का पिता अथवा पिता की सहमति से इसका भाई जिस किसी के साथ उसका विवाह कर दे,जीवन-पर्यन्त वह उसकी सेवा में रत रहे और पति के  न रहने पर भी पति की मर्यादा का उल्लंघन कभी न करे . स्त्री का पति दु:शील, कामी तथा सभी गुणों से रहित हो तो भी एक साध्वी स्त्री को उसकी सदा देवता के सामान सेवा व पूजा करनी चाहिये . स्त्री को अपने पति से अलग कोइ यज्ञ ,व्रत या उपवास नहीं करनी चाहिए , क्योंकि उन्हें अपने पति की सेवा-शुश्रुषा से ही स्वर्ग प्राप्त हो जाता है.   यहाँ पर मनु की उन व्यवस्थाओं को दे देना भी उपयुक्त रहेगा, जिन्हें स्त्रियों के लिए हिन्दू, अत्यंत श्रेष्ठ व अनुकरणीय आदर्श घोषित करते है:

अनृतादृतुकाले  च मंत्र्संस्कारकृत्पति:
सुखस्य नित्यं दातेह परलोके च योषिच: 
सदा प्रह्ष्टया भाव्यं गृहकार्येषु दक्षया
 सुसंस्कृतोपस्करया  व्यये चामुक्तहस्तया 
अर्थात:-विधिवत मन्त्रों द्वारा गृहीत पति,स्त्री के लिए हर काल व ऋतु में सुखदायक है. लोक-परलोक दोनों में उससे सुख ही मिलता है. अत: उसे सदैव प्रसन्निचत्त रहना चहिएऔर गृह -कार्य को दक्षतापूर्वक करते हुए व घर के बर्तन आदि को साफ़ रखे तथा खर्च में मितव्ययिता बरते.  और आगे दिये जा रहे श्लोक में स्त्रियों के वध को एक हल्का अपराध (उप-पातक)बताकर मनु ने स्त्रियों की जड़ता पर मुहर ही लगा दी :
धान्य कुप्य पशुस्तेयं मद्यप  स्त्री-निषेवणम
 स्त्री शूद्र विटक्षत्र वधो नास्तिक्यं चोपपातकम !

पिछले दिनों पटना में मनु का पुतला जलाया गया

अर्थात:- धान्य,कुप्य ,पशुओं की चोरी, मद्दपान करने वाली स्त्री से प्रसंग, नास्तिकता तथा स्त्री,शूद्र  ,वैश्य तथा क्षत्रिय का वध करना,ये सब उप-पातक है. इस श्लोक में शूद्र ,वैश्य व क्षत्रियों के वध को उप-पातक की बात तो समझ में आ सकती है,क्योंकि मनु ब्राह्मण के वध को महापातक और उसकी तुलना में अन्य वर्ण के लोगों के वध को मामूली पातक  ठहराना चाहते थे, लेकिन इसके साथ सभी वर्णों के पूरे स्त्री समाज को घसीट लेना यही सिद्ध करता है की स्त्रियों के पूरे वर्ग को हेय  दृष्टि से देखते थे . इन उद्धरणों के उपरान्त भी कोई संदेह कर सकता है की भारत में स्त्रियों के अध्:पतन का कारण स्मृतिकार मनु नहीं थे ?अधिकांश लोग इस तथ्य को जानते हुए भी दो बातों से अभिज्ञ प्रतीत होते है. वे यहीं नहीं जानते की इसमें मनु का योगदान क्या है? स्त्रियों के प्रति मनुस्मृति में दी गई व्यवस्थाएओं  कोई नयी या मनु की इजाद की हुई नहीं है. ये सब ब्राह्मण एवं ब्राह्मणवाद की विचारधारा का प्रतिनिधित्व करती है. मनुस्मृति के पूर्व ये सब विचार सामाजिक मान्यताओं के रूप में विद्धमान थे.  मनुस्मृति में केवल उन सब मान्यताओं के रूप परिवर्तन करके धर्म-शास्त्र तथा राज्य-विधान बना दिया गया .

दूसरी बात, जो प्राय: लोग नहीं जानते, यह है कि मनुस्मृति में आखिर स्त्रियों  और शूद्रों पर इतनी अयोग्यताएं क्यों थोपी गयीं ?इसका स्पष्ट कारण है यही है कि बौद्ध –काल में समाज में दो वर्ग(स्त्रियाँ- शूद्र)बुद्ध-धर्म में अधिक श्रद्धा रखते थे और बड़ी संख्या में बुद्ध –धर्म को ग्रहण कर रहे थे,जिसके कारण ब्राह्मण धर्म की नींव ही हिली जा रही थी . अत: अपने धर्म की रक्षा के लिए मनुस्मृतिकार स्त्रियों का झुकाव बुद्ध-धर्म की ओर से मोड़ना चाहते थे . यही कारण है की मनु ने स्त्रियों पर इतनी पाबंदियां लगा दी की वह सदा के लिए पंगु हो जाये. प्रमाण –स्वरूप देखिये :
वृथा संकर जातानां प्रव्रज्यासु च तिष्ठताम 
आत्मन्स्त्यागिनाम चैव निवर्तेतोदकक्रिया 
पाषंडमाश्रितानाम च चरंतीनाम च कामतः 
गर्भ भतृदृर्हाम चैव सुरापीनाम च योषिताम 

अर्थात:-वर्ण-संकर,संन्यासी व आत्मघाती लोगों की पिण्डोदक क्रिया आवश्यक नहीं! इसी प्रकार उन स्त्रियों की भी पिण्डोदक क्रिया न की जाये, जो पाखंडी सम्प्रदाय का अनुसरण करती हों, स्वेच्छाचारिणी ,गर्भपात,पतिघात तथा सुरापान करने  वाली हो. इस व्यवस्था के लक्ष्य अन्य के अतिरिक्त निन्मलिखित दो लोग भी बनाये गये है:
१.प्रव्रज्यासु तिष्ठताम ,और
२.पाखण्डमाश्रीतानां योषितां
पहला शिकार प्रव्रज्या लेने वाले लोगों से तात्पर्य बौद्ध परिव्राजकों से है, जो गृह-त्याग कर संस्यासी का जीवन व्यतीत करते थे , दूसरी ओर पाखंडी सम्प्रदाय के संकेत से निश्चय ही  स्मृतिकार मनु का अभिप्राय बुद्ध-धर्म से है . इस प्रकार एक प्रकार से मनु ने यह प्रबंध कर दिया कि किसी परिवार का जो स्त्री या पुरुष बुद्ध-धर्म का अनुयायी बने , उसकी पिंडोदकक्रिया न की जाये . इसका प्रभाव यह पड़ता था की भयवश कोई स्त्री-पुरुष बुद्ध –धर्म ग्रहण ही नहीं करता और यदि कर लेता, तो परिवार के अन्य सदस्य उसे त्याग देते . स्मृतिकार मनु  बुद्ध-धर्म के सबसे बड़े विरोधी थे और उनका विचार था कि यदि घर-घर में बुद्ध –धर्म का प्रवेश  रोकना है,तो स्त्री समाज को अपनी मुट्ठी में रखना  आवश्यक है.  यही कारण है कि उन्होंने स्त्रियों पर इतने अधिक बंधन व अयोग्यताएं थोप दी.  इससे सिद्ध हो जाता है कि  नारियों के अधो:पतन का उतरदायित्व मनु पर है, न की बुद्ध पर.

सामूहिक नसबंदी के कारण भारतीय स्त्रियों की मौतें: लुटे हुए विकल्प व स्त्री गरिमा

 ( बिलासपुर में नसबंदी के कारण महिलाओं की मौत के कारणों की पड़ताल के लिए चार महिला -स्वास्थ्य संगठनों ने संयुक्त रूप से एक जांच दल बनाया . जाँच दल ने अपने बिलासपुर दौरे के बाद एक रिपोर्ट सौपी . रिपोर्ट की संक्षिप्त प्रस्तुति .)

सामुदायिक स्वास्थ्य  के क्षेत्र में कार्यरत चार संगठनों द्वारा निर्मित तथ्य अन्वेषी दल ने एक स्वतंत्र जांच समिति बनाने की पहल की ,जिससे बिलासपुर नसबंदी शिविर हादसे तथा १६ स्त्रियों की मृत्यु से जुड़े सवालों के जवाब मिल सकें! जाँच दल ने पाया कि इन स्त्रियों  में से अपोलो अस्पताल में भरती हुए कुछ गंभीर रोगियों में प्रो-केलिस्टोनिन का स्तर बढ़ा हुआ मिला जो सेप्टिसीमिया (रक्त-संक्रमण )की ओर इंगित करता है! पहली सात मौतों के बाद हुए शव विच्छेदन में पेरीटोनाइटिस (उदर झिल्ली में संक्रमण )तथा फेफड़ों व गुर्दों में भी संक्रमण के चिन्ह पाए गये! इनसे संकेत मिलता है कि शल्यक्रिया के दौरान या उसके पश्चात संक्रमण के कारण ये मौतें हुई ;न कि उन जाली दवाओं के कारण, जिनके बारे में काफी कुछ लिखा गया !

विष तथा न्याय –वैधक विशेषज्ञों के अनुसार किसी स्त्री के लिए जिंक फास्फाइड की प्राण घातक मात्रा ४-५ ग्राम होती है ,जो कि सिप्रोफ्लोक्सेसिंन की  ५०० मिली ग्राम की एक खुराक से कहीं ज्यादा है यह जानकारी भी इसी तर्क की पुष्टि करती है कि सिर्फ दवायें इन मौतों का कारण नहीं थी!   ‘ पापुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया’, ‘फैमिली प्लानिंग असोसिएसन  ऑफ इंडिया’ ,  ‘परिवार सेवा संस्थान’  और ‘ कॉमन हेल्थ’  इन चार संगठनों ने बिलासपुर शिविर स्थल का सर्वेक्षण किया,  सेवारत चिकित्सकों व अन्य कर्मचारियों  ,नसबंदी कराने वाली स्त्रियों तथा मृतकों के परिजनों के साक्षात्कार लिये !  जाँच दल ने छतीसगढ़ तथा समूचे भारत के लिए कुछ अनुशनासायें भी की हैं , जो हाल ही में दिल्ली में जारी की गई उनकी रिपोर्ट में शामिल है!    इसके बाद राज्य सरकार को भी शव विच्छेदन तथा दवाओं की प्रयोगशाला जांच की रिपोर्ट को सार्वजनिक करने को मजबूर होना पडा तथा मामले की जांच के लिए तुरंत राज्य समिति का गठन करना पडा!

जांच दल ने यह भी पाया की मृतकों के परिवार जनों को अस्पताल के केस –रिकार्ड तथा मृत्यु के संभावित कारणों की कोई जानकारी नहीं दी गई !  परिवार नियोजन पर सरकार दुवारा किये गये  खर्च का विश्लेषण करने से यह पता चला की वर्ष २०१३-१४ के लिए देश ने ३९६.९७ करोड़ रूपये महिला-नसबंदी पर खर्च किये, जो परिवार नियोजन पर कुल  खर्च का ८५% है! कुल ३९,२३९४५ स्त्रियों की नसबंदी की गई !इसका भी एक बड़ा हिस्सा यानि  ३२४.४९ करोड़ ,नसबंदी कराने वाली स्त्रियों को प्रोत्साहन राशि तथा हर्जाना देने में खर्च हो गया जबकि मात्र १४.४२ करोड़ शिविरों की व्यवस्था पर! हर्जाने में दी जाने वाली यह राशि प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों के बुनियादी ढांचे को मजबूत बनाने के लिए दी जाने वाली राशि  की ढाई गुना है!अब लगभग निष्क्रिय पडी,स्वास्थ्य के लिए जोखिम भरी निम्न श्रेणी की अस्पताल /शिविर सुविधा तक स्त्रियों को लुभा कर ले आने के लिए इतनी बड़ी धनराशि खर्च करना कहाँ की बुद्धिमत्ता है? यह गलत है और अस्वीकार्य भी!   वहीँ बच्चों के बीच अंतर रखने के तरीकों पर कुल वार्षिक बजट का १५%से भी कम खर्च किया गया !१.३%उपकरणों ,आवागमन ,IFC प्रक्रिया तथा कर्मचारियों के दैनिक भत्तों आदि पर खर्च हुआ! ठीक इसी प्रकार छतीसगढ़ राज्य के आंकड़े बताते है की परिवार नियोजन के मद के लिए निश्चित १५.५९ करोड़ का ८५% स्त्रियों के (१,१९,१०४  स्त्रियाँ ) नसबंदी मामलों के लिए खर्चा गया !१२,७६करोड क्षतिपूर्ति व प्रोत्साहन राशि पर तथा मात्र १% गर्भ निरोधक पर खर्च किया गया !

रिपोर्ट में विशेषत: इस बात पर जोर दिया गया है कि भारत सरकार  १९९४ में हुए ICPDकरार में एक हिस्सेदार है,जिसका मतलब है कि देश में परिवार नियोजन कार्यक्रम के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए  दम्पति को सभी विकल्पों की पूरी जानकारी देने के बाद परिवार नियोजन का अपना तरीका चुनने की आजादी होगी! हाल ही में सम्पन्न ‘लोकतांत्रिक लाभाशों में निवेश’ पर अंतररास्ट्रीय अंतर –मंत्रालयीन सम्मलेन के बाद हुई दिल्ली घोषणा में भारत सरकार ने ICPD-POA के प्रति अपनी प्रतिबद्धता एक बार फिर जाहिर की है!   तथ्य –अन्वेषी अभियान के परिणामों के बाद जांच दल ने निम्न सिफारिशें की है!

१.    स्वास्थ्य कर्मियों को दिए `जाने वाली प्रोत्साहन राशि पर रोक लगाई  जाए, जिनके लाभान्वितों में  चिकित्सक, नर्सो व अन्य सेवा कर्मी शामिल हैं ) . ये प्रोत्साहन राशियाँ चिकित्सकों को प्रेरित करती हैं कि  वे अस्पताल में उपलब्ध सुविधाओं की सीमा से आगे जाकर अधिक संख्या में नसबंदी करें !चाहे इसके लिए नियम  प्रक्रियाओं व गुणवत्ता नियमों को ताक पर ही क्यों न रख देना पड़ें !दल ने यह भी प्रस्ताव रखा की सिर्फ नसबंदी करवाने वाले व्यक्ति को दैनिक मजदूरी, क्षतिपूर्ति राशि व आवागमन के लिए पैसे दिए जाएँ !प्रोत्साहन राशि को स्वास्थ्य सुविधायें  सुदृढ़ करने व उपकरण खरीदने में उपयोग किया जाये!

२.    बच्चों के जन्म में अंतराल बढाने  के तरीकों जैसे ओरल पिल्स ,कंडोम व कॉपर टी को बढ़ावा दिया जाए और गर्भ निरोधन के नये साधन भी इनमें शामिल किये जाये . इनके अखंड व नियमित उपलब्धता पर जोर दिया जाये तथा इच्छुक दम्पतियों को उचित परामर्श देने का प्रशिक्षण भी स्वास्थ्य कर्मियों को मिले ,जिससे पूरी जानकारी के साथ स्वतंत्र चुनाव सुनिश्चित किया जा सकें !शल्य –क्रिया रहित पुरुष नसबंदी जैसे आसान व सुरक्षित तरीके को अधिकाधिक बढ़ावा देने पर जोर दिया जाय !

३.    बिलासपुर शिविर में शल्य –चिकित्सक ने ८३ शल्य क्रियाओं में से प्रत्येक में मात्र एक से डेढ़ मिनट का समय लगा. ऐसा उसने अपर्याप्त मूल सुविधाओं , कर्मचारियों की कम संख्या तथा एक बेकार पड़े गंदे अस्पताल परिसर के बावजूद किया .  जाँच दल ने पाया कि शिविर में भर्ती स्त्रियों की सहज गरिमा का भी कतई ख्याल नहीं रखा गया !शल्य क्रिया किसी फैक्ट्री की एसेम्बली लाइन की तरह हो रही थी, यहाँ तक की शल्यक्रिया के लिए इन स्त्रियों को नियत स्थिति में लाने का काम पुरुष कर्मियों दुवारा किया जा रहा था और शल्यक्रिया के पश्चात वे ही उन्हें पकड़ कर कक्ष से बाहर ले जा रहे थे ! शल्यक्रिया से पहले परिवार नियोजन के अन्य विकल्पों के बारे में बताने के लिए कोई परामर्श -सत्र आयोजित नहीं किया गया था ,न ही शल्यक्रिया के संभावित दुष्परिणामों की कोई जानकारी उन्हें दी गई थी !अर्थात इन स्त्रियों को चयन की स्वतंत्रता नहीं थी

४.    परिवार नियोजन सेवायें पूर्व निश्चित दिनों पर ,सरकारी अस्पताल में ही तथा पर्याप्त प्रशिक्षित चिकित्सकों एवं सेवाकर्मियों दुवारा दी जायें.  साथ ही मानक प्रक्रियाओं व गुणवत्ता को सुनिश्चित करने वाले निर्देशों का कड़ाई से पालन किया जाए.  सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों को सुदृढ़ बनाया जाये, मांग के अनुसार नियमित सेवा प्रदान करने के लिए जरुरी उपकरण व कर्मचारी उपलब्ध कराये जायें!

५.   ब्लॉक जिला व राज्य पर सभी अधिकारियों को नसबंदी प्रक्रियाओं व उनके गुणवत्ता मानकों के बारे में अवगत कराया जाना चाहिए ! सर्वोच्य न्यायालय के दिशा निर्देशों के अनुसार जिला गुणवत्ता  सुनिश्चयीकरण समितियों को सक्रिय बनाया जाये और परिवार नियोजन सेवाओं में गुणवत्ता सुनिश्चत करने में ख़ास भूमिका रहे! रोगी कल्याण समिति तथा ग्रामीण स्वास्थ्य ,स्वच्छता  व पोषण समितियों को समुदाय के लोगों की हिस्सेदारी द्वारा  सुदृढ़ किया जाये, जिससे स्वास्थ्य मामलों पर हमेशा नजर रखी जा सके !जांच दल ने पाया कि इस शिविर में स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय दुवारा जारी सेवा गुणवत्ता निर्देशों का प्रत्येक कदम पर उल्लंघन किया  गया! दरअसल समूचा कर्मचारी वर्ग सुरक्षा तथा गुणवत्ता मानकों से अनजान था.

६.    राज्य में चिकित्सकों के सभी रिक्त पदों को भरा जाये तथा ज्यादा से ज्यादा राज्यीय चिकित्सकों को नसबंदी शाल्यक्रिया का प्रशिक्षण दिया जाये! बिलासपुर जिले में मात्र तीन लेपेरोस्कोपिक (दूरबीन द्वारा शल्यक्रिया करने वाले)शल्य चिकित्सक हैं , जिनमें से एक अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं . जरुरत है कि जिला अस्पताल तथा सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर कार्यरत स्त्रीरोग विशेषज्ञों  व शल्य चिकित्सकों को दूरबीन द्वारा  शल्यचिकित्सा का प्रशिक्षण दिया जाये,जिससे मिनीलेप (लघु दूरबीन शल्य क्रिया) तथा शल्यक्रिया रहित पुरुष नसबंदी जैसे अधिक आसान व कम जोखिम वाले तरीकों को प्रचलन में लाया जा सके!

७.    औषधी  खरीद नीतियों में सुधार लाया जाए ताकि दवाओं की प्रभाव क्षमता विषाक्तता ,प्राणघातक  व उनके संघटकों के आधार पर उनकी गुणवत्ता पर नियमित रूप से दृष्टि  रखी जा सके. इस शिविर में जिन युवा माँओं की  मृत्यु हुई वे अपने पीछे नवजात शिशु और छोटे बच्चे छोड़ गई हैं .  इनमें से सबसे छोटा बच्चा मुश्किल से एक माह का है.  हालांकि राज्य सरकार  ने इन मातृ -विहीन बच्चों के लिए आर्थिक सहायता मुहैया  कराई है, फिर भी उनके समुचित पोषण व पालन के लिए उनके परिवारों को प्रशिक्षण की तत्काल आवश्यकता है. कई बच्चे अपने दादा- दादी या नाना –नानी की देखरेख में हैं, जिन्हें भी बोतल से दूध पिलाने में आवश्यक स्वच्छता व विसंक्रमण प्रक्रियाओं में मार्गदर्शन चाहिये .   दल ने प्रस्ताव रखा कि आंगनबाड़ी कर्मियों को इन बच्चों की नियमित देखरेख का जिम्मा व प्रशिक्षण दिया जाये !  चारों संगठनों का मानना है कि स्थिति को सुधारने के लिए तत्काल कदम उठाने की आवश्यकता है, क्योंकि बिलासपुर में हुआ दुखद हादसा पूरे देश में परिवार नियोजन कार्यक्रम को पटरी से उतार सकने की क्षमता रखता है(. राज्य में मीतानिं के नाम से जानी  जाने वाली ‘आशा’ कर्मियों में से एक के शब्दों में कहें तो “अब किस मुँह से लोगों को नसबंदी के लिए बोलेंगे ?अब तो वे सामने चल कर भी आयें तो भी हम हिचकिचायेंगे !
अनुवाद : डा अनुपमा गुप्ता

रवींद्र के दास की कवितायें : माँ ! पापा भी मर्द ही हैं न !

0
रवींद्र के दास

रवींद्र के दास के दो काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. कालीदास के मेघदूत का उन्होंने हिन्दी काव्य रूपांतरण भी किया है . संपर्क :मोबाईल: 08447545320
ई-मेल : dasravindrak@gmail.com

माँ! पापा भी मर्द ही हैं न!
बड़ी हिम्मत जुटा कर
सहमते हुए पूछती है माँ से
युवती हो रही किशोरी-
माँ! पापा भी मर्द हैं न?
मुझे डर लगता है माँ! पापा की नज़रों से…
माँ! सुनो न! विश्वास करो माँ!
पापा वैसे ही घूरते हैं जैसे कोई अजनबी मर्द…
माँ! पापा मेरे कमरे में आए
माँ! उनकी नज़रों के आलावा हाथ भी अब मेरे बदन को टटोलते हैं
माँ! पापा ने मेरे साथ ज़बरदस्ती की
माँ! पापा की ज़बरदस्ती रोज़-रोज़…
माँ! मैं कहाँ जाऊँ!
माँ! पापा ने मुझे तुम्हारी सौत बना दिया
माँ! कुछ करो न!
माँ! कुछ कहो न!
माँ! मैं पापा की बेटी नहीं, बस एक औरत हूँ?
माँ! औरत अपने घर में भी लाचार होती है न!
माँ! मेरा शरीर औरताना क्यों है!
बोलो न! बोलो न! माँ!

स्त्रियाँ ईश्वर की शरण में 

इस बात पर कोई विवाद न था
कि स्त्रियाँ धुरी हैं सभ्यता की
स्त्रियाँ सौन्दर्य हैं, सेवा है, त्याग है
….. यानी सद्गुण का मूर्तरूप हैं स्त्रियाँ
ये वाक्य
मंदिर में स्थापित देव-मूर्ति की भांति स्थापित थे
हम मनुष्य बड़े हुए थे
इन्हीं पवित्र वाक्यों को सुनते हुए

या तो हम स्त्रियों से संवाद नहीं करते
या उनके शब्द रहस्यमय थे हमारे लिए
ये तय नहीं था
पर एक अनिवार्य दूरी थी
क्योंकि सभ्यता पर इसका कोई वैसा असर था नहीं
यद्यपि संस्कृति
इस दूरी से अक्सर बौखला उठती थी
संस्कृति का बौखलाना हमें
कविता के लिए प्रेरित करता था

हमें इस बात का ख्याल नहीं रहता
स्त्रियाँ ब-ख़ुद कोई शख्स है
हम उसे हरसत से देखते
और उसकी तस्वीरें बनाते
नाचती स्त्री, संवरती स्त्री, उदास स्त्री …
और सोचते कि हमने सभ्यता का ऋण उतार दिया

उस उतरे ऋण वाले मनोभाव से
स्त्रियों को देखते
और पाते कि स्त्रियाँ मुस्कुरा रही हैं

स्त्रियों के पास अपनी भाषा नहीं होती
वे आपस में भी
हमारी भाषा में बातें करतीं
हम उनकी बातचीत पर नज़र रखते
और व्याकरण की अशुद्धि सुधारते

स्त्रियों की आँखें
हमारी सुधार की कोशिश को न स्वीकारती
पर हिली गर्दन से हम संतुष्ट हो लेते
हम पुरुष
अपने कर्तव्य निभा रहे के भाव में व्यस्त रहते
हमारी इस व्यस्तता को भांप
स्त्रियाँ बहुधा चली जातीं
ईश्वर की शरण में

ईश्वर की शरण में गई स्त्रियाँ
क्या कहतीं ईश्वर से
हम नहीं जानते
पर कल्पना करते कि वे
हमारे लिए दुआ मांग रही होंगी
उन्हें जो भी चाहिए, हम तो दे ही रहे हैं
तभी तो हम आह्लादित हो उठते
जब जातीं
स्त्रियाँ ईश्वर की शरण में

कमाती हुई स्त्री
स्त्री सबलीकरण पर लम्बा लेख लिखने के बाद
कुछ था,
जो रह गया था कहने को
इसके पीछे यह डर था कि इससे कमजोर हो जाएंगे तर्क
जिनका इस्तेमाल मैंने लेख में किया
मैंने लेख लिखते हुए इन तीनों,
मुनिया, मिसेज़ वर्मा और दीक्षा को एक नज़र से देखा
मैं कन्फेस करता हूँ मैंने ईमानदारी नहीं बरती

कमाने का अर्थ नकद पैसा कमाना है
इस अर्थ में
ये तीनों स्त्रियाँ कमाऊ हैं
घर घर जाकर काम करने वाली मुनिया
परिवर्तन से प्रभावित हो शिक्षिका बनी मि. वर्मा
और विदेशों में मनेज़मेंट वगैरह ऊँची डिग्री ले चुकी दीक्षा
लगभग एक समय निकलती हैं काम पे
मुनिया तीन हजार, मि. वर्मा तीस हजार और दीक्षा तीन लाख

मुनिया घर की रोटी जुटाती है
अपनी गिरस्ती चलाती है, बच्चे को पढ़ाती है
मि.वर्मा अपनी शिक्षा का इस्तेमाल करती है
और पैसों से मदद करती है पति की
दीक्षा जॉब इम्ज्वोय करती है, लेटेस्ट लाइफ जीती है
एक्साईटमेंट के नए नए रास्ते खोजती है

ये तीनों एक जमाने की औरतें हैं
तीनों हिंदुस्तान की बेटियाँ हैं
मैं इन तीनों को एक नज़र से देखना चाहता हूँ
पर हरबार बदल जाती है मेरी नज़र
मैं बहुत शर्मिंदा हूँ
मैं इन तीनों में स्त्री सबलीकरण का अर्थ खोजता हूँ
ये तीनों ही तो हैं –
कमाती हुई स्त्रियाँ |

एक उम्र निकल जाने के बाद 

घर वाले निस्पृह हो जाते है
घर में रहती बेटी से
जैसे कि उसका होना कोई बात नहीं
और रात्रि निवास के लगभग
माना जाता है उसका हक़

गोया बेटियाँ घर में नहीं रहती हुई
समेटे रहती है समूचा घर
अपने अंतर में
और चलती है संभल कर
जल से भरे जलद की मानिंद

जिस दिन जन्म लेती है बेटियां
उसी दिन से
चौकन्ने माँ-बाप, पुरुख-पुरखिन
संवारने संजोने में हो जाते हैं व्यस्त
कि जतन से … थोड़ा ध्यान से
पराए घर जाए
तो नाक न कटवाए हमारी

और उनके केलेंडर के हिसाब से
जब नहीं चली जाती हैं बेटियाँ
अपने उस पराये घर
बेहाल हो उठते माँ-बाप, सगे-सहोदर
कि हे प्रभु !
किस पाप का दंड है यह …
यह रिकार्ड चलना हो जाता हैं
तब बंद
जब पराए घर जाने वाली बेटियां
उसी घर के रकबे में
रहकर तलाशने लगती है अपनी ज़िन्दगी
बूढ़े होते माँ बाप की नज़रों से
जब हो जाती हैं अभ्यस्त
तो बेटियां एक आशाहीन ठूंठ की तरह
हिलती रहती हैं अपनी समय सारणी से

शाम को जब आती हैं वापस घर
उनके आने से
नहीं डोलता है एक तिनका भी
खुद ही निकाल फ्रिज से पीती हैं ठंडा पानी
और एक सांस जी लेती हैं और
एक उम्र निकल जाने के बाद

विज्ञापनों में बढती स्त्रियों की मांग से 

उनमें आत्म-निर्भरता आई है
साहूकारों के नए मुंशी
इस की फाँक को समझता है ठीक से
मुस्कुराता है खुल कर
कि हमें तो बस खोलना है खूँटे से
आगे इनकी जिम्मेवारी है खुद की
जो हम काम लेते है
तो दिलवाते है पूरे दाम
इसी बूते जो
ये टकरा जाए जमाने से
सर इनका फूटेगा
हम तो मजबूर हैं पेशे से
चाहे टूटे परिवार या संसार
दुनिया तो मर्दों की है

सुनो नदी !

जहाँ पहुँच कर स्वयं को भूल गई नदी
वह सागर नहीं
कोई जन-संकुल बाज़ार था
नदी रम गई,
मानकर कि समुद्र है.
यह अवधारणाओं में जीने का नतीजा था
नदी के एक आइना है
जिसे वो मन कहा करती है
आस पास के मछुआरे
अपनी मीठी तानों से नदी का हौसला बढ़ाते
गदराई नदी चल पड़ती
बहकती, बलखाती
अपनी कमर लचकाती

नदी उन्मत्त थी,
सराबोर थी,
आत्मग्रस्त थी
शायद, किसी दुविधा से त्रस्त थी
कि जैसे कोई जल्दी हो दूर जाने की

ऊँघती नदी की जब नींद खुली
कई सारी नदियाँ
निढाल पड़ी थी वहीं कहीं
वहां समुद्र नहीं था
बाज़ार भी नहीं था वहां
एक काँपता उजाड़ था
कई रसहीन, निर्वाक नदियाँ अवसन्न पड़ी थी

सुनो नदी !
सिर्फ़ बहना ही नहीं होता है सबकुछ
चलना होता है संभलकर
अन्दर चाहे पानी हो
या भरी हों आग की ज्वालाएँ

बहेलिया जानता है 

कि उन चिड़ियों की हवस है इस मुंडेर पर आने की
यहाँ रखे दाने चुगने की
ऐसे नहीं है कि बहेलिए ने सुच्चे दाने नहीं डाले
डाले
कई दिनों तक डाले
कि जब चिड़ियों के परिजन समझाएँगे
उकसायेंगे चिड़ियों को
उसके खिलाफ़
तो चिड़ियाँ ही उन्हें समझाएंगी
यकीन दिलाएंगी कि ये बहेलिया नहीं हमारा मसीहा है
अब,
जब चिड़ियाँ अभ्यस्त हो चुकी हैं
और उनके परिजन आश्वस्त
बहेलिये ने दानों में मिलाना शुरू कर दी है सुरूर की दवा
गोया चिड़ियाँ अब देर तक करती हैं
इसी मुंडेर पर मटरगस्ती
कि आसपास के जीव जंतु इन्हें मुंडेर की चिड़ियाँ कहने लगे हैं.
शक तो हुआ
कुछ परिजनों को, कुछ चिड़ियों के बढ़ते अल्हड़पन देख
टोका भी इन्होंने
कि चालबाज़ है बहेलिया
चिड़ियों ने पुराने दिनों का हवाला देकर
कर दिया मुंह बंद
और कर दिया साफ़ कि हम तालीमयाफ्ता हैं
अच्छी नहीं बात बात पे टोका टाकी
बहेलिया जानता है
चिड़ियों की अभिलाषा
वह जो चिड़ियों में उन्मत्तता के बीज बो रहा था
हवस को हवा दे रहा था
इन दिनों
बहेलिया कुछ दूसरे मुंडेरों पर दाने बिखेर रहा है

इस दुनिया को जितनी जल्दी हो बदल देना चाहिए

सीमा आज़ाद

ये आंखें हैं तुम्हारी
तकलीफ का
उमड़ता हुआ समन्दर
इस दुनिया को
जितनी जल्दी हो
बदल देना चाहिए

गोरख पाण्डे की ये कविता 16 दिसम्बर से ही बार-बार जेहन में आ रही है। पेशावर के स्कूल में जिस तरह बच्चों को मारा गया उसने कड़े दिल वालों को भी ‘उफ’ कहने पर मजबूर कर दिया। यह अमानवीयता की इन्तेहां है। जब अमानवीयता यहां तक जा  पहुंचे कि बच्चों की हत्या की जाने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि अब ये दुनिया रहने लायक नहीं बची, और इसे जितनी जल्दी हो बदल देना चाहिए। इस दुनिया के कारोबार ने कुछ लोगों को इतना संवेदनहीन बना दिया है कि वे दुनिया की सबसे कोमल सबसे कीमती चीज को रौंदने में भी नहीं हिचकिचा रहे हैं। हालांकि पेशावर की घटना अब तक की सबसे बुरी और जघन्य आतंकवादी घटनाओं में एक है, जिसकी निन्दा के लिए सिर्फ शब्दों का इस्तेमाल करना कम है, लेकिन असंवेदनहीनता का यह कृत्य नया नहीं है। पूरी दुनिया में ही नहीं हमारे अपने देश के अन्दर इस तरह की घटनाऐं होती रहती हैं ये अलग बात हैं कि हमारे देश में इन घटनाओं में जो बच्चे मारे जा रहे हैं, मीडिया के लिए वे महत्वहीन बच्चे हैं, और इन बच्चों को मारने वाले लोग महत्वपूर्ण हैं। इसलिए उनकी हत्या खबर का रूप लेकर लोगों को उस तरह दहला नहीं पाती है, जिस तरह पेशावर की घटना ने लोगों को दहलाया। जिस तरह इन हत्याओं का एक मकसद होता है उसी तरह इसे खबर बनाने या न बनाने का भी मकसद होता है, एक राजनीति होती है।

पेशावर की इस ताजा घटना सहित ऐसी जघन्य घटनाओं को अन्जाम देने वाले लोग आखिर कौन हैं? इनमें कई तरह के लोग हैं। कुछ वे लोग हैं जो हर कीमत पर सिर्फ अपना धर्म बचाना चाहते हैं, दुनिया को पीछे ले जाना चाहते है, मासूमों के कत्ल की कीमत पर भी।कुछ वे लोग हैं, जो इस धर्म पर चढ़कर हत्यारी राजनीति करना चाहते हैं और इसमें शामिल वह सत्ता भी है जो अपने लोगों को डराने के लिए ऐसे कामों को अन्जाम देती है।
पेशावर में जो हुआ वह तथाकथित धर्म बचाने के लिए। क्योंकि रूढि़वादी कट्टर धार्मिक नेता ये नहीं चाहते, कि बच्चे ऐसी आधुनिक शिक्षा हासिल करे जो उन्हें सोचने के निए विवेक भी दे, जो दुनिया के तमाम रहस्यों से धर्म का पर्दा हटाये, और उन्हें वैज्ञानिक दृष्टि प्रदान करे। इसी लिए उन्होंने पहले मलाला को मारा और उसे नोबेल पुरस्कार मिलते ही पेशावर के इन बच्चों को मारा। दूसरे तरह के लोग हमारे अपने देश में ही मौजूद हैं और इस समय तो डंके की चोट पर मौजूद हैं। ये वो लोग हैं जिन्हें ऐसा लगता है कि अपने धर्म की रक्षा के लिए दूसरे धर्म का खात्मा जरूरी है। याद कीजिये गुजरात के 2002 के जनसंहार को जब मुसलमान औरतों के गर्भ में आराम से पल रहे उन मासूमों को भी नहीं छोड़ा गया जिन्होंने अभी दुनिया देखी ही नहीं थी। यदि सबकी बात न भी याद हो तो कौसर बी का मामला तो सबके सामने आ ही गया था, जिसमें हिन्दूवादी हत्यारों ने उसका आठ माह का गर्भ तलवार से चीरकर उसके अजन्में बच्चे को बाहर निकाल कर उसे आग में फेंक दिया। इस तांडव में उन्होंने कई अन्य महिलाओं के गर्भ के बच्चों को उछालकर तलवार के नेजे पर रोपा गया। छोटे बच्चों को ऐसे ही अनगिनत जघन्य तरीकांे को से इसलिए मारा गया ताकि उस धर्म के वंशजों का सफाया किया जा सके। हजारों बच्चों और महिलाओं को इस जनसंहार में मार दिया गया, जिसका दुखद समापन राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने यह शर्मनाक बयान देकर किया कि ‘यह क्रिया की प्रतिक्रिया थी।’ उसी मुख्यमंत्री के प्रधानमंत्री बनने के पहले मुजफ्फरनगर में फिर वैसा ही कत्लेआम हुआ, जिसमें फिर से सैकड़ों मासूम बच्चे सिर्फ इसलिए मारे गये क्योंकि वे एक खास धर्म में पैदा हुए हैं जो कि ‘राजधर्म’ नहीं है। इस जनसंहार का खामियाजा वहां के मासूम बच्चे आज भी उठा रहे हैं ,क्योंकि उनके सर से छत ही छीन ली गयी है और वे आज कड़कड़ाती ठंड में मरने के लिए मजबूर हैं, यह उसी हत्या का विस्तार है।

ये तो धर्म से जुड़े हत्यारें हैं, जिन्हें किसी न किसी रूप में शासन सत्ता का सहयोग प्राप्त है , कहीं प्रत्यक्ष तो कहीं अप्रत्यक्ष। लेकिन कई जगहों पर सत्ता खुद मासूमों की ऐसी हत्याओ में शामिल है। मैं अव्यवस्था से होने वाली बच्चों की मौत की बात नहीं कर रही, बल्कि सीधे-सीधे इन हत्याओं में उनके शामिल होने की बात कर रहीं हूं और इसका उदाहरण भी हमारे देश में ही मौजूद है। अगर आपको याद नहीं आ रहा तो सलवा जुडुम को याद कीजिये। यह उन आदिवासियों के खिलाफ चलाया गया सरकारी अभियान था, जिनके लिए यह कहा जाता है कि वे माओवादियों से मिले हुऐ हैं। माओवादियों से इन लोगों को दूर करने के लिए जब इस अभियान की शुरूआत हुई तो इसने भी अमानवीयता की सारी हदें पार कर दी। आदिवासियों के घर जलाना, सामान लूटना लोगों को मारना, औरतों से बलात्कार करना, उनके स्तन काट लेना जैसी कार्यवाहियों के अलावा सलवा जुडुम के सिपाहियों, वहां मौजूद पैरामिलिटरी और सीआरपीएफ के जवानों ने छोटे बच्चों को भी अपने गुस्से  का निशाना बनाया। कई जगह पर उन्होंने मांओ की गोद से उनका बच्चा छीनकर गेंद की तरह दीवार पर दे मारा था। कई जांच रिपोर्टों में वहां के लोगों ने ऐसी घटनाओं का भी जिक्र किया है। कई जगह पर सैनिकों ने छोटे बच्चों को ऊपर उछालकर अपने राइफल की नोक पर उन्हें रोपा। इन तथ्यों के लगातार बाहर आते रहने और इस पर सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद भी सरकार उन अभियान को बन्द करने की बजाय इसे कई अन्य नामों से देश भर में चला रही है। इसका नया नाम ‘आॅपरेशन ग्रीन हण्ट’ है। और नजर दौड़ाये तो उसी पेशावर में अमेरिका जो कि पाकिस्तान को आतंकवाद से बचाने के नाम पर डटा हुआ है के द्रोनों ने न जाने कितने बच्चों की जान ले ली। अमेरिका की शह ही पर कुछ ही महीने पहले इजरायल ने फिलीस्तीन के हजारों बच्चों की निर्मम तरीके से जान ले ली। खुद अमेरिका में कुछ ही दिनों पहले हजारों लोग इस लिए सड़क पर उतर आये क्योंकि वहां की नस्लभेदी सोच का एक नमूना नमूदार हो गया। एक गोरे सिपाही जिसने एक काले बच्चे की बिना वजह हत्या कर दी, को वहां की कोर्ट ने बरी कर दिया।

पेशावर की घटना इन घटनाओं का ही विस्तार है, जिसने हर किसी को विचलित कर दिया। इस पर दुख जताने के बाद अब गुस्सा जताने का समय है। जब कोई समाज इतना हिंसक हो जाय कि उसमें मासूम, कोमल, हर किसी को सिर्फ खुशी देने वाले बच्चों की भी हत्या होने लगे तो यह कहना ही होगा कि बस अब बहुत हो गया अब यह दुनिया रहने लायक नहीं बची, अब इस दुनिया को जितनी जल्दी हो बदल देना चाहिए।

स्त्रीकाल -अंक 8

( स्त्रीकाल के प्रिंट एडिशन का यह ८ वां अंक है . ‘ वैयक्तिक / राजनीतिक’ विशेषांक का अतिथि सम्पादन   कवयित्री और स्त्रीवादी चिन्तक अनामिका ने किया था , इस अंक में ‘कैरोल हैनीच’ के आलेख ‘ पर्सनल इज  पोलिटिकल’ के साथ -साथ कई संग्रहनीय आलेख हैं. अभय कुमार दुबे , सुधा अरोड़ा , अनिता भारती , निवेदिता अरविन्द जैन , अनामिका प्रिदार्शिनी , हेमलता माहिश्वर , वैभव सिंह, स्वतंत्र मिश्र आदि  के आलेख शामिल हैं . )
स्त्रीकाल अंक ८ , वैयक्तिक /राजनीतिक

स्त्रीकाल अंक 8 , वैयक्तिक /राजनीतिक 

वेश्यावृत्ति को कानूनी बनाना समस्या का समाधान नहीं : महिला संगठन

( पिछले दिनों राष्ट्रीय महिला आयोग की नवनियुक्त अध्यक्ष ने यौनकर्म को कानूनी दर्जा देने की वकालत की थी , जिसके खिलाफ स्त्री अधिकार के लिए सक्रिय राजनीतिक और अन्य संगठनों ने अपनी राय दी . यह पत्र आयडवा, एन एफ आई डवल्यु और जे डव्ल्यु पी ने लिखा है . अनुवाद डा . अनुपमा गुप्ता )

स्त्रीकाल में यौनकर्म पर अन्य शोध आलेख और रपटें पढने के लिए नीचे के लिंक पर क्लिक करें

दिल्ली में नाइजिरियन यौन दासियां
इतिहास का अन्धकूप बनाम बन्द गलियों का रूह -चूह : पहली किस्त
इतिहास का अन्धकूप बनाम बन्द गलियों का रूह -चूह : आखिरी किस्त 

माननीय अध्यक्ष
राष्ट्रीय महिला आयोग
दिल्ली

सबसे पहले हम सभी स्त्री –संगठन आपको राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्षा बनने पर बधाई देना चाहते है;साथ ही आशा करते है कि आपके कार्यकाल के दौरान स्त्रियों के हित न सिर्फ सुरक्षित रहेंगे,बल्कि नए सोपान छूयेंगे  !

हम आपका ध्यान मीडिया में चर्चित उस वक्तव्य की ओर आकर्षित करना चाहते है,जिसमे महिला आयोग की अध्यक्षा के तौर पर आप वेश्यावृति को कानूनी रूप से मान्य करने के पक्ष में है और जिसमे आपने वेश्याओं को ‘सेक्स वर्कर’ के रूप में  पुनर्परिभाषित करने तथा इस कार्य को स्त्रियों के लिए रोजगार के विकल्प की तरह देखने का समर्थन किया है! इस वक्तव्य में जिक्र है कि आप इस मुद्दे पर अपनी सिफारिशें जल्द ही एक उच्चस्तरीय संसदीय समिति को भेजेंगी !

महोदया, आपके इस दृष्टिकोण पर हम अपनी गंभीर चिंता से आपको अवगत कराना चाहते है,क्योंकि हमारी नजर में स्त्रियों के जीवन की सच्चाइयों एवं वेश्यावृति में जबरन धकेले जाने के खिलाफ उनके संघर्षों से यह दृष्टिकोण  अलग दिखाई देता है !हालाकिं आपके वक्तव्य से वेश्यावृति में निहित स्त्रियों के शोषण के प्रति  आपकी वाजिब चिंता झलकती है,फिर भी हम, जो कई दशकों से स्त्रियों के लिए और उनके  बीच काम कर रहे है, आपको बताना चाहते है कि  समस्या के ऐसे हल  निकालने की कोशिश से इन स्त्रियों की तकलीफों में और वृद्धि ही होगी तथा उनका शोषण और भी बढ़ जाएगा ! अत: हम आपसे अनुरोध करते है की इस मुद्दे से जुड़े निम्न पहलुओं पर विचार करके आप अपने आग्रह का पुनरावलोकन करें .

यह एक दुखद सत्य है की वेश्यावृति में संलग्न स्त्रियों (तथा बचिच्यों) का एक बड़ा हिस्सा कम उम्र में ‘मानव व्यापार’ का परिणाम है !कृषि कर्म तथा अन्य  रोजगारों में स्त्रियों के कार्य करने के अवसरों में आई कमी और अपने आश्रित परिवार –जनों के लिए साधन जुटाने का दबाव ही  उन्हें इस जंजाल में धकेल देता है! इसीलिये वेश्यावृति अपनाने वाली स्त्रियों की बहुसंख्या सबसे शोषित, पिछड़े वर्गों दलित व आदिवासी समुदायों से होती है!  जिनके पास रोजगार का कोई और विकल्प उपलब्ध ही नहीं है !वेश्यावृति दरअसल किसी स्त्री की मजबूरियों की चरम –अविव्यक्ति है, इन मजबूरियों पर ध्यान देना हमारा पहला उद्देश्य होना चाहिए ! कानूनी मान्यता देने से  वेश्यावृति अंतररास्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) द्वारा परिभाषित ‘गरिमापूर्ण शालीन एवं सुरक्षित’ रोजगार में तब्दील नहीं हो जायेगी !

यह एक अपमान भरा अमानवीय व्यापार है !साथ ही हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि इनमे से बहुत सी वेश्यायें  दरअसल किशोर-किशोरियों और छोटे बच्चे है! कोठे में एक बार प्रविष्ट होने के बाद वे वहीँ फंसे रह जाते है ! उनके पास बाहर  निकलने के मार्ग बहुत ही कम होते हैं क्योंकि दलालों एवं कोठा मालिकों आदि का समूचा कुटिल तंत्र इस दिनों दिन तरक्की करते उधोग में अपने फायदे के लिए लगातार जुटा  रहता है ! नव –उदारवाद के इस युग में स्त्री को उपभोक्ता सामग्री बना देने का चलन और भी बढ़ गया है! इस व्यापार को समाज में स्वीकार्य बनाने की कोशिश की जा रही है, और इस नजरिये को बढ़ावा दिया जा रहा है कि यह भी बाकी के बाजारों की तरह ही है, जिसमे कुछ उपभोक्ता किसी सेवा की मांग करते है और अन्य उस मांग की पूर्ती (demand and supply )!हम इस बात पर जोर देना चाहते है कि  इस व्यापार में किसी स्त्री को जबरन यह कार्य करने के लिए मजबूर करने वाले के पक्ष को समझना जरुरी है !और यह भी की यह सारी प्रक्रिया एक शोषणतंत्र द्वारा अंजाम दी जाती है ! यह कोई ऐसा रोजगार नहीं है, जिसे  स्त्रियाँ अपनी इच्छा से करें ! वेश्यावृति में उनकी उपस्थिति का उनके ‘स्वयं के चुनाव’ से कोई सरोकार नहीं है! एक बार यह चुनाव उनके ऊपर थोप दिया गया तो वे इस तंत्र का हिस्सा हो जाती है और अंततः इसके घृणित तर्कों को मनाने पर मजबूर हो जाती है!
लाइसेंस देने और कानूनी मान्यता से देह-व्यापार रुक नहीं सकेगा बल्कि उसे और बढ़ावा ही मिलेगा !शोषण कम होने की बजाय उससे कई नए तारीके निकल आने के संभावनाएँ बढ़ जायेंगी ! कई विकसित देशों ,जैसे जर्मनी का अनुभव यही बताता है और इसलिए अब वहां वेश्यावृति के कानूनी मान्यता फिर से रद्द करने के प्रस्ताव पर विचार  किया जा रहा है !

अत: हम सभी राष्ट्रीय  स्त्री संगठन आपसे आग्रह करते है कि  इस मुद्दे की गहराई से पड़ताल करे और तभी किसी प्रकार के परिवतर्न की सिफारिश मंत्रालय से करें ! इसके लिए विधि विशेषज्ञों, जमीनी कार्य कर रहे स्त्री संगठनों तथा वेश्याओं के बीच कार्य करने वाले स्वयंसेवी दलों के साथ गंभीर चर्चा जरुरी है ताकि नीतियों का स्पष्ट व ठोस ढांचा तैयार किया जा सके, जिसमे इन स्त्रियों के हित प्रतिबिंबित हो सकें
इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए हमारी मांग है कि  :-
१. देह –व्यापार (trafficking) को रोकने पर जोर दिया जाये,IIPA  तथा IPC सेक्शन ३७० को कड़ाई से लागू किया जाए !
२. वेश्यावृति में संलंग स्त्रियों व बच्चे के लिए वैकल्पिक रोजगारों के अवसरों को निर्मित तथा उनके पुनर्वास के सक्रिय तरीकें को प्राथमिकता !
३. उनके मूल मानवाधिकारों के रक्षा के लिए विशेष कदम
४. उनके बच्चों की शिक्षा की गारंटी
५. स्त्री-समुदाय के लिए बेहतर रोजगार के अवसर ताकि उन्हें  वेश्यावृति में जाने से रोका जा सके !
हमें आशा है कि  स्त्रियों के अधिकारों के रक्षा और विकास के लिए बनी इस संस्था द्वारा  मंत्रिमंडल को भेजी जाने वाली पहली सिफारिश में स्त्री-संगठनों की इन चिंताओं को शामिल किया जायेगा ! हमारा अनुरोध है कि  मंत्रालय को सिफारिश भेजने के पहले ऊपर उल्लखित बिन्दुओं पर पर्याप्त विचार विमर्श किया जायेगा !

धन्यवाद !

AIDWA,JWP NFIW

इला कुमार की कवितायें

0
इला कुमार

इला कुमार का पहला कविता संग्रह ‘जिद मछली की’ है । ‘किन्‍हीं रात्रियों में’ ‘ठहरा हुआ अहसास’ और ‘कार्तिक का पहला गुलाब’ ‘आज पूरे शहर पर’ आदि अब तक ५ संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. संपर्क : ई -मेल : ilakumar2002@yahoo.co.in

( आज 19 दिसंबर को इला कुमार की कविता पुस्तक ‘ आज पूरे शहर पर ‘ का लोकार्पण हिन्दी भवन , दिल्ली में हो रहा है . इस संग्रह की कुछ कवितायें स्त्रीकाल के पाठकों के लिए )


आज पूरे शहर पर

आज पूरे शहर पर सूर्य का डेरा है
उस डेरे के बीच सड़कें चलायमान
मोटरगाडि़याँ स्वचलित

और लोग ?

वे ठगे से खड़े हैं
स्तंभित

वे मात्र सूर्य को निहारते रहना चाहते हैं
सूर्य उन्हें लगातार निहार रहा है

मैं भी संग-संग
सब कुछ निहारती हूँ
खुशनुमा भोर में

दिसंबर की इस खुशनुमा भोर में
जब सूर्य
कुहरा भेद कर
आलोकित वलयों को रचने
में मशगूल है
अचानक
एक सुंदर दरवाजे
और
गहरी हरी पत्तियों वाले गमलों से सजे घर
के दरवाजे से
टिककर खड़ी स्त्री की
भंगिमा वातावरण में जादू जगा देती है

उधर खड़ी उस आकृति की विस्मित गंध
मुझ तक आ पहुँचती है
उसके आभिजात्यिक परिधान पर कढ़े बूटों
का हर सूत
उसके काले-सुनहरे बालों के सिरों पर
कौंधती हर किरण
मुझमें ताब जगा देती है
मुझ तक वह गंध आ पहुँचती है

कभी मैं उसके करीब जाकर
उसकी सांसों के स्पर्ष तक
पहुँच पाऊँगा क्या ?

कभी भविष्यत्  काल में

शताब्दियों से

कुछ वृक्षों की बाहें गोलाई में झुक कर
आकाश  की ओर उठी हुईं

मानों
किसी को बाहों में उठा लेने को आतुर हों

किसे ?
शायद किन्हीं निष्पाप  शिशुओं

हाँ
अनाम शिशुओं की प्रतीक्षा में रत हैं
वृक्षों की गोल-गोल भरी पूरी बाहें

सौंदर्यित गोलाई के बीच वे डालियाँ
नीचे झुककर ऊपर की ओर औदार्यपूर्वक उठी हुईं
शताब्दियों से

प्रतीक्षित समय

बरस हुए
किन्हीं पंक्तियों के मुखातिब हुए
कहाँ गए
बीच के बरस, महीने और दिन

हिसाब किसके पास है

भारतीय स्त्री
इन बेवजह की बातों पर
ज्यादा ध्यान नहीं दिया करती

उसके पास कई हिसाब-किताब है
पति और बच्चों के सुख
घर का रख-रखाव
सभी बातों के लिए अलग-अलग वक्त नियत है

नहीं है समय तो अपने लिए

कहाँ है वह समय ?
क्या
वाकई आ पाएगा वह प्रतीक्षित समय

अच्छा है

अच्छा है कि मैं अकेली नहीं
मेरे साथ है चेतना के कुहरे में टिमटिमाते नए पुराने कितने ही
अक्स

चौखट के भीतर चुप बैठे माँ पिता की बरसों पुरानी भंगिमा
तिमंजिले की मुंडेर से झाँकते मौसेरे भाई बहनों के चेहरे
चाचा चाची, मामा मामी, मौसी बुआ और ममेरी फुफेरी बहनों
की कथाएँ

अनगिनत किस्से मेरे साथ चलते हैं

जिस कहीं भी मैं गई
विभिन्न वजूदों के कण मेरे आगे पीछे चले
उनके बीच घर के नौकर नौकरानियों की अम्लान छवि
जाड़े की रातों में मालिश  के तेल की कटोरी लिए बिस्तर के
बगल में बैठी दाई
शुरूआती कालेजी दिनों की सुबहों में चाय के गर्म कप के
लिए रसोईघर में पंडित से डाँट सुनता छोटा भाई

जाने-अनजाने रस्तों पर ये सभी मेरे साथ चल पड़ते हैं

नव जागरित व्यक्तियों की जमात जब
अपने आसपास के लोगों की उपस्थिति को नकार
विदेसही  अकेलेपन का स्वांग भरती है
स्वांग रचते-रचते अभिनेता स्वयं पात्र में परिवर्तित हो जाते हैं
विलायती उच्छिष्ट के दबाव तले पृथ्वी की सतह कंपनों के
आवेश  तले थरथराती हुई

नई सदी की दहलीज पर उगे दीमकों की बस्ती के बीच
दिग्भ्रमित
मन दहल जाता है

यह कैसी विरासत
कितना अच्दा है
कि
मैं अकेली नहीं.

अपने बचपन को

अपने बचपन को रख दिया है मैंने
स्मृतियों के ताखे में
वहाँ सुकुन नहीं है
ना ही स्नेहिल बयारें,
लेकिन बचपन तो है
उस समय-खंड में ठिठके कौंध-भरे स्फुरण

बचपन है मेरा
तुर्श -तीता और सन्नाटे भरा
नकार और अंषतः दुत्कार भरा भी

मन की तहों को
अपने नाखून से खरोंचता हुआ

सुनती हूँ लोगों से
(अपने पेट जायों से भी)
कि
कि बड़ा सुंदर होता है बचपन
कैसे सुनहरे दिवस
बेफिक्र लुभावने पल
स्नेहिल बयारों से पूरित
मन-प्राण

सुबहें और षाम
बार-बार झाँकती हूँ
दरारों से अतीत में
बड़े कमरे/खुली छत/एकांत भरा बागीचा
लेकिन नहीं है वहाँ कोई मधु वाक्य
अपनेपन से भरे शब्द नहीं हैं वहाँ
मृदु बयार भी नहीं
जाना चाहती हूँ स्मृतियों की पकड़
थोड़ा और पीछे
पिछले जन्म की वीथियों में
शायद वहाँ कोई खाता खुला हुआ है

मेरा अपना
नकारात्मक कर्मों भरा
उनका प्रतिफलन
यहाँ
जन्म-जन्मांतर से जुड़ी वीथियों के बीच

जीव की यह कातरता भरी यात्रा

बड़ा अंतर है

बड़ा अंतर है असभ्यता
भ्य और संस्कृति का
सुसंस्कृत आचार विचार एवं उच्छृखलता का
साफ, सफैयत, सफाई एवं गंदगी के पहाड़ का

बड़ा अंतर है
विश्व के अलग गोलकों
देषांतर एवं अक्षांश  रेखाओं के
बीच स्थित भूखंडों के बीच

बड़ा ही अंतर है
यह अंतर है
समाज सेवा एवं निष्ठुरता  का
सकारात्मक व्यवहारों एवं
नकारात्मक धरातल का

एक और बड़ा अंतर है
अंतर है मन से मन की दूरी का
अमीरी एवं भुखमरी का
कड़ी मेहनत की कमाई एवं
लूट-खसोंट का
अंतर है जरूर अवश्य
वह यहीं पृथ्वी के अलग-अलग खंडों के बीच खड़ा
प्रश्न चिह्न बना हुआ
उनके और हमारे बीच
लगातार बढ़ रहा है
उनके बीच
कड़े नियम कानून का
निभाव है
हमारे पास नियमहीन
मंत्रीत्व है
उनके पास है सुरक्षा और
सद्भावना से भरी पुलिस
हमारे पास डराती-धमकाती
और हफ्ता वसूलती
तथाकथित पुलिस
अंतर है
नियम कानून के झूठे मुलल और
स्वतंत्र देश  के
परतंत्रता नियमों में
वे अलग-अलग हैं खड़े
नियम हमारे टेम्स  नदी की
धार के साथ बह गए है
गंगा की तली में गंदगी
की शक्ल में जब गए हैं
बड़ा ही अंतर है भरा हुआ स्वच्छ निर्मल
हडसण नदी की
धार और यमुना
के गंधाते जल के बीच एवं सिकुड़ती
काया के बीच
यह अंतर बहुत है

वे कुन्तियाँ नहीं गौरव से भरी माँ हैं

संजीव चंदन 
वह कहती है, “मैं विकलांग हूँ, मेरा बच्चा ही मेरा सहारा होने वाला था, इसलिए मैंने निर्णय लिया कि मैं उसे जन्म दूंगी. मेरी बच्ची ही अब मेरा भविष्य है.”

ऐसा कहते हुए वह मुझे अपनी एक साल की बच्ची, कस्तूरी को खजूर देने से मना करती है, “यह नहीं खाती है, फेंक देगी.”अनीता सोयाम उस समय क्रोध से भर जाती है, जब उन्हें ये लगता है कि उनसे की जा रही बातचीत प्रकाशित किए जाने के मकसद से हो रही है.

अविवाहित आदिवासी माँ

यवतमाल के माथारजुन गाँव की अनीता इस इलाके की उन लड़कियों में से है, जिन्होंने अविवाहित रहते हुए माँ बनने का फैसला किया है.हमारे साथ आंगनबाड़ी की सेविका लता सिडाम को देखकर उन्होंने बातचीत शुरू की थी, उन्हें लगा शायद हम 425 रुपए मासिक उन्हें दिलवा सकेंगे, जो उन जैसी दूसरी लड़कियों को सरकारी तौर पर मिलते हैं.अनीता कहती हैं, “जब यह (बच्ची) मेरे पेट में चार माह की थी, तब तक वह आया लेकिन जब मैंने बताया कि मैं गर्भ से हूँ तो उसने आना बंद कर दिया.”

और भी हैं अविवाहित माताएं

यवतमाल जिले के झरी जामिणी, केलापुर और मारेगाँव तालुका के कुछ आदिवासी पोड़ों (बस्तियों) में विभिन्न आयु वर्ग की ऐसी 50 से भी अधिक महिलाएँ हैं, जो अकेली रहती हैं और अविवाहित होते हुए भी माँ बन चुकी हैं.
कपास और मिर्च उत्पादक ये इलाका अचानक तब सुर्खियों में आया, जब स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता इन अविवाहित माताओं की बढ़ती संख्या मीडिया के सामने लाए, प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किए और इस पर सेमिनार आयोजित किए.इस इलाके में कोलाम और गोंड समुदाय के आदिवासी रहते हैं और आंध्र से लगे होने के कारण यहाँ तेलुगू मूल के लोग भी हर गाँव में रहते हैं. इन सामाजिक कार्यकर्ताओं की पहल पर स्थानीय प्रशासन भी सक्रिय हुआ.

गाँव के आदिवासी बुजुर्ग

पालन-पोषण  की लड़ाई

यवतमाल की समाज कल्याण अधिकारी अर्चना इंगोले बताती हैं कि इस इलाके से लगभग 50 अविवाहित माताएं हमारे साथ रजिस्टर्ड हैं.वे इनके लिए मारेगाँव में एक ट्रेनिंग और काउंसिलिंग सेंटर बना रहे हैं. यह रजिस्ट्रेशन भी कभी-कभी इनके खिलाफ जाता है क्योंकि इस रजिस्ट्रेशन के चलते उन्हें मासिक 425 रुपए दिए जाते हैं.बताया जाता है कि अविवाहित मां मंदा कुलसंगे अपने और अपने बच्चे के मेंटिनेंस की लड़ाई निचली अदालत में इसी कारण से हार गई, जबकि उच्च न्यायालय ने उसके हक़ में फैसला दिया.ज़्यादातर मजदूरी में लगी ये सभी लड़कियां मंदा की तरह कोर्ट तक नहीं जा पाती हैं.

पीड़िता या मजबूत इरादों वाली

सामाजिक कार्यकर्ता लीला भेले इसे प्यार के मामलों का नतीजा कहती हैं.इनके लिए काम करने वाले संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की अलग-अलग राय है.प्रमोदिनी रामटेके कहती हैं कि व्यापार के दिनों में आने वाले व्यापारी और निर्माण क्षेत्र के मजदूर इनके साथ संबंध बनाते हैं, इनका शोषण करते हैं और गर्भ ठहर जाने पर भाग खड़े होते हैं.जबकि सामाजिक कार्यकर्ता और मराठी की प्राध्यापिका लीला भेले कहती हैं, “95 फीसदी मामले प्रेम के होते हैं, जो आदिवासी समाज की लड़की और लड़के के बीच ही पनपते हैं और इन मामलों में लड़के ग़ैर-ज़िम्मेदार निकले.”

सभ्य समाज

लीला भेले बताती हैं, “कुछ मूक बधिर बच्चियां हैं, जिन पर अत्याचार हुआ है. कुछ मामले हैं, जो किसी दबंग के द्वारा प्रेम किए जाने और रखैल बनाने के उदाहरण हैं. लेकिन ज्यादातर मामलों में ये सिर्फ पीड़िता नहीं हैं.”
पांढरकवडा में सृजन संस्था की संचालिका योगिनी डोलके इसे आदिवासी समाजों में सेक्स से जुड़ी बातों के खुलेपन से जोड़कर देखती हैं. जबकि सत्यशोधक समाज की नूतन मालवी कहती हैं, “हमारे आस-पास, तथाकथित सभ्य समाज में भी ऐसी घटनाएं घटती हैं, विवाह के पूर्व किशोरियां गर्भ धारण कर लेती हैं लेकिन नकली इज्जत में फंसा यह समाज चोरी-छिपे गर्भपात करा ले जाता है. ये अविवाहित महिलाएं ज्यादा बहादुर और ज्यादा प्राकृतिक हैं.”

मिथ और हकीकत

इसी गाँव के दो बुज़ुर्ग स्थानीय आदिवासी देवी ‘मरा माई’ के मंदिर के पास बैठे मिले.अविवाहित माताएं- अनीता, कल्पना और मंदा के गांव के नीलकंठ सिडाम और दशरथ अन्ना लड़कियों को इसके लिए दोष देते हैं. वे इसे लड़कियों के चरित्र से भी जोड़ते हैं.गोंड समुदाय से आने वाले अंबेडकरवादी हिन्दी प्राध्यापक डॉक्टर सुनील कुमार ‘सुमन’ कहते हैं, “आदिवासी भी नगरीय समाज के प्रभाव में हैं लेकिन इन आदिवासी बस्तियों में जितनी स्वतंत्रता और सुरक्षा के साथ ये अविवाहित माँएं रह रही हैं, वह शहरी समाज में संभव नहीं है.”मालवी कहती हैं, “शहरी समाज का अपना मिथ कुंती है, जो सामाजिक अपवाद के भय से अविवाहित जीवन में पैदा अपने बच्चे को ही छोड़ देती है. ये तो मजबूत इरादों वाली आदिवासी लड़कियां हैं.”

सामाजिक कार्यकर्ता और मराठी की प्राध्यापिका लीला

आदिवासी परम्परा

आदिवासी समाजों का कुछ हिस्सा अपनी मान्यताओं और परंपराओं से गहरे जुड़ा है.
इसी कारण छह दिसंबर 1959 को पंचैत डैम के उद्घाटन के दौरान झारखंड के धनबाद में पंडित जवाहर लाल नेहरू को माला पहनाने की वजह से आदिवासी लड़की बुधनी को उसका समाज नेहरू की विवाहिता मान लेता है.
और पंचैत डैम के साथ ही उसके संकट की कथा शुरू होती है. विवाह और प्रेम के प्रति लचीले और आसान नियमों के बावजूद इन कोलाम और गोंड समुदाय की अविवाहित माताओं में से कई को अपने घर से अलग घर बनाकर रहना पड़ रहा है.

यह रिपोर्ट बीबीसी के लिए भी की गई थी

मारे गये बच्चों की याद में हेम्ंत जोशी , राजेश जोशी और उदय प्रकाश की कवितायें पढ़ें

0
( तालिबानी चरमपंथियों के द्वारा मारे गये बच्चों को आओ श्रद्धांजलि दें ! हम एक ऐसे तनाव की दुनिया रच रहे हैं , जहां बच्चों का बचपन और जीवन – सबकुछ छीना जा रहा है. आओ मारे गये उन बच्चों की याद में और  अपनी बारी के खौफ में जीते बच्चों के साथ पढें ये कवितायें . हेमंत जोशी , राजेश जोशी और उदयप्रकाश की इन कविताओं में बच्चे हैं, बच्चों के प्रति चिंता है , बाडों मे बंटी दुनिया में घुटता बचपन है और तनाव से भरे माहौल में बच्चों के मासूम सवाल हैं – जो बडे राजनीतिक कथन भी हैं . ) 


हेमंत जोशी की कवितायें 

एक

प्यार तो करते हैं हम सभी बच्चों को

छोटे होते हैं जब बच्चे
करते हैं हम उन सभी को प्यार
दिखते हैं सबके सब सुंदर।

कल जब ये बड़े होंगे
मारे जाएंगे किसी न किसी वाद की आड़ में
मारे जाएंगे अपनी वजह से
अपनी नस्ल, अपनी जाति बतलाने के जुर्म में मारे जाएंगे।

बचे रहेंगे कुछ बच्चे
व्यापक सुरक्षा की बदौलत
बचे रहेंगे वे कि उनके साथ होंगी बंदूकें
और निहत्थे होंगे बाकी सभी बच्चे।

दो

बच्चे बंधे हैं सीमाओं में
बच्चे नहीं मानते सीमाएँ
बच्चे खेल रहे हैं बंदूकों से
बच्चे सिर्फ़ खेलना चाहते हैं

बच्चों के लिए खींची हैं सीमाएँ हमने ही
उनके हाथों में बंदूकें भी हमने ही दी हैं।

राजेश जोशी की कवितायें 

कोहरे से ढँकी सड़क पर बच्‍चे काम पर जा रहे हैं
सुबह सुबह

बच्‍चे काम पर जा रहे हैं
हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है यह
भयानक है इसे विवरण के तरह लिखा जाना
लिखा जाना चाहिए इसे सवाल की तरह

काम पर क्‍यों जा रहे हैं बच्‍चे?

क्‍या अंतरिक्ष में गिर गई हैं सारी गेंदें
क्‍या दीमकों ने खा लिया हैं
सारी रंग बिरंगी किताबों को
क्‍या काले पहाड़ के नीचे दब गए हैं सारे खिलौने
क्‍या किसी भूकंप में ढह गई हैं
सारे मदरसों की इमारतें
क्‍या सारे मैदान, सारे बगीचे और घरों के आँगन
खत्‍म हो गए हैं एकाएक
तो फिर बचा ही क्‍या है इस दुनिया में?
कितना भयानक होता अगर ऐसा होता
भयानक है लेकिन इससे भी ज्‍यादा यह
कि हैं सारी चीज़ें हस्‍बमामूल

पर दुनिया की हज़ारों सड़कों से गुजते हुए
बच्‍चे, बहुत छोटे छोटे बच्‍चे
काम पर जा रहे हैं।

रुको बच्चों 


रूको बच्‍चो रूको !
सड़क पार करने से पहले रुको

तेज रफ़्तार से जाती इन गाड़ियों को गुज़र जाने दो

वो जो सर्र से जाती सफ़ेद कार में गया
उस अफ़सर को कहीं पहुँचने की कोई जल्‍दी नहीं है
वो बारह या कभी-कभी तो इसके बाद भी पहुँचता है अपने विभाग में
दिन, महीने या कभी-कभी तो बरसों लग जाते हैं
उसकी टेबिल पर रखी ज़रूरी फ़ाइल को ख़िसकने में

रूको बच्‍चो !
उस न्‍यायाधीश की कार को निकल जाने दो
कौन पूछ सकता है उससे कि तुम जो चलते हो इतनी तेज़ कार में
कितने मुक़दमे लंबित हैं तुम्‍हारी अदालत में कितने साल से
कहने को कहा जाता है कि न्‍याय में देरी न्‍याय की अवहेलना है
लेकिन नारा लगाने या सेमीनारों में बोलने के लिए होते हैं ऐसे वाक्‍य
कई बार तो पेशी दर पेशी चक्‍कर पर चक्‍कर काटते
ऊपर की अदालत तक पहुँच जाता है आदमी
और नहीं हो पाता इनकी अदालत का फ़ैसला

रूको बच्‍चो ! सडक पार करने से पहले रुको
उस पुलिस अफ़सर की बात तो बिल्‍कुल मत करो
वो पैदल चले या कार में
तेज़ चाल से चलना उसके प्रशिक्षण का हिस्‍सा है
यह और बात है कि जहाँ घटना घटती है
वहां पहुँचता है वो सबसे बाद में

रूको बच्‍चों रुको
साइरन बजाती इस गाडी के पीछे-पीछे
बहुत तेज़ गति से आ रही होगी किसी मंत्री की कार
नहीं, नहीं, उसे कहीं पहुँचने की कोई जल्‍दी नहीं
उसे तो अपनी तोंद के साथ कुर्सी से उठने में लग जाते हैं कई मिनट
उसकी गाड़ी तो एक भय में भागी जाती है इतनी तेज़
सुरक्षा को एक अंधी रफ़्तार की दरकार है
रूको बच्‍चो !
इन्‍हें गुज़र जाने दो

इन्‍हें जल्‍दी जाना है
क्‍योंकि इन्‍हें कहीं पहुँचना है

उदय प्रकाश की कविता 


तिब्बत 

तिब्बत से आये हुए
लामा घूमते रहते हैं
आजकल मंत्र बुदबुदाते

उनके खच्चरों के झुंड
बगीचों में उतरते हैं
गेंदे के पौधों को नहीं चरते

गेंदे के एक फूल में
कितने फूल होते हैं
पापा?

तिब्बत में बरसात
जब होती है
तब हम किस मौसम में
होते हैं?

तिब्बत में जब
तीन बजते हैं
तब हम किस समय में
होते हैं?

तिब्बत में
गेंदे के फूल होते हैं
क्या पापा?

लामा शंख बजाते है पापा?

पापा लामाओं को
कंबल ओढ़ कर
अंधेरे में
तेज़-तेज़ चलते हुए देखा है
कभी?

जब लोग मर जाते हैं
तब उनकी कब्रों के चारों ओर
सिर झुका कर
खड़े हो जाते हैं लामा

वे मंत्र नहीं पढ़ते।

वे फुसफुसाते हैं ….तिब्बत
..तिब्बत …
तिब्बत – तिब्बत
….तिब्बत – तिब्बत – तिब्बत
तिब्बत-तिब्बत ..
..तिब्बत …..
….. तिब्बत -तिब्बत
तिब्बत …….

और रोते रहते हैं
रात-रात भर।

क्या लामा
हमारी तरह ही
रोते हैं
पापा?

( कविता कोश से साभार )