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वह हमेशा रहस्यमयी आख्यायित की गयी

प्रज्ञा पांडे

कवयित्री , कथाकार प्रज्ञा पांडे निकट पत्रिका की कार्यकारी सम्पादक हैं और वर्तमान अंक की अतिथि संपादक. संपर्क : ई-मेल :  pandepragya30@gmail.com

( प्रज्ञा पांडेय के अतिथि सम्पादन में हिन्दी की पत्रिका ‘ निकट ‘ ने स्त्री -शुचितावाद और विवाह की व्यवस्था पर एक परिचर्चा आयोजित की है . निकट से साभार हम उस परिचर्चा को क्रमशः प्रस्तुत कर रहे हैं , आज खुद अतिथि संपादक का सम्पादकीय .  कल शुरुआत की थी अरविंद जैन के जवाब से. अरविंद जैन का जवाब पढ़ने के लिए क्लिक करें  ) 


जो वैध व कानूनी है वह पुरुष का है : अरविंद जैन 


सभ्यता के प्रारंभिक दौर की स्त्री  श्रेष्ठ  थी।  आडम्बरपूर्ण  पूर्वाग्रहों से, आधिपत्यपूर्ण आक्रमणों  से दूर  अपने स्वाभाविक स्वरुप में,  प्राकृतिक गुणों से लबरेज ,  देह के स्तर पर  बलिष्ठ ,नेतृत्व  करने की क्षमता के  साथ वह युद्ध करने में और  शिकार करने में   भी पुरुष की सहायक   हुआ करती थी। महामानव  राहुल सांकृत्यायन की मानें तो उसमें सबको साथ लेकर चलने की शक्ति थी, वह झुण्ड में आगे चलती थी ,वह अपना साथी खुद चुनती थी ।” वोल्गा से  गंगा ” में वे  एक जगह लिखते हैं ” पुरुष की भुजाएं भी ,स्त्री की भुजाओं की  तरह बलिष्ठ थीं ” यानी स्त्री की  भुजाएं तो बलिष्ठ  थीं  ही ……। यो तो  संगठन करने की शक्ति देह=बल से नहीं मानसिक लचीलेपन से  आती है, तभी तो  तमाम नियम कायदों के बंधनों में बंधी हुई भी स्त्री वर्तमान वैवाहिक व्यवस्था में जल्दी ही  अपने नए घर में, जहाँ वह दुबारा रोपी जाती है, वहां अपने लिए जगह बना पाने में कामयाब होती है बल्कि कुछ जगहों पर घर का निपुण संचालन भी करती  है..यह अलग  बात है कि  वह अपना सब कुछ यानी अपने अस्तित्व को बचाने की जद्दोजहद में अपना सम्पूर्ण जीवन,  अपनी रचनात्मकता और अपनी समस्त  ऊर्जा होम करती है।

स्त्री में नेतृत्व  करने  का  आधार   उसके विस्मृत  आदिम गुण ही  हैं।  सदियों से वैधव्य ,सतीत्व , बाँझपन  ,घर के परकोटे, पर्दादारी, शुचिता, वर्जनायें  अशिक्षा और  चरित्र के मारक  चौखटों को झेलती हुई  उसकी वह शक्ति   कमजोर अवश्य  पड़  गयी है और अपनी अस्मिता , अपने अधिकार और  अपनी चेतना से  अनजान वह कई तरह  के समझौते भी  करने लगी है, फिर भी  परिवार से मिले  आत्महनन के  संस्कारों से लड़ती  स्त्री ने खुद को अपराजेय  रखा है तो यह उसका जीवट है। संयुक्त , बड़े परिवारों   में स्त्रियां अपने  एकमात्र  बहुमूल्य जीवन की  आहुति दे देतीं हैं।मेरे पिता अक्सर कहा करते थे कि  लड़की का ब्याह  जितने ही ऊंचे   घर में होता है  उसके संकट उतने  ही बड़े   होते हैं।

साहित्य ,भाषा  और शास्त्र  भी स्त्री को देह बनाने में और उसे भरमाने  में बड़ी भूमिका  निभाते हैं। विश्व की  लगभग हर भाषा के साहित्य में स्त्री   सुकोमल , मधुर और कामिनी  रूप में चित्रित की गयी  है।  उसकी मुष्टिग्राह्या कमर  , उसके भारी नितम्ब , जो उसे गजगामिनी बनाते हैं उसकी वल्लरी सी बाहें और दाड़िम के रंग के होंठ अनारदानों सी दन्तपंक्ति , मृग जैसे नयन, सुराही सी ग्रीवा   और चाँद सा चेहरा  । उसका सौंदर्य ही नहीं उसके श्रृंगार उसके वस्त्र -आभूषण में इतना   सौंदर्य देखा गया कि उसका नखशिख वर्णन करने में जाने कितनी  पोथियाँ भर गयीं।उम्र के अनुसार नायिकाओं के भी  प्रकार बने। सोलह वर्ष से नीचे की स्त्री ,सोलह वर्ष की स्त्री , उससे अधिक और फिर उससे अधिक उम्र की स्त्री।   वह नगर वधू  चुनी जाती रही उसके लिए कोठे बनाये गए। सवाल यह है कि   प्रकृति की बनाई किस चीज़ में सौंदर्य नहीं है लेकिन स्त्री के अप्रतिम प्राकृतिक  गुणों की जगह स्त्री के दैहिक सौंदर्य का  बखान  साहित्य  और शास्त्रों   के प्रति ही नहीं उसको रचने वालों के प्रति भी घोर  संदेह पैदा करता है।इस तरह  प्रकृति की रची स्त्री कहीं गायब हो  गयी । वह हमेशा  रहस्यमयी आख्यायित की गयी।

 प्रकृति की व्यवस्था में  स्वच्छंदता की मनाही है। सामाजिक मूल्यों की सुरक्षा का पूरा  दारोमदार स्त्री के कन्धों पर डालकर पुरुष उसके मूल्यों  के निर्वहन के  प्रति गैरजिम्मेदार होने की हद तक लापरवाह होता है।  आज की स्थितियां, पुरुषसत्तात्मक   स्वच्छंद व्यवस्था ने  पैदा की हैं, जिसका  परिणाम है- दहेज़ हत्याएं ,भ्रूण हत्याएं  और बलात्कार। कारणों की पड़ताल में जाएँ  बिना  इन अपराधों के लिए स्त्री  की दुश्मन स्त्री  यह कहकर  आज भी व्यवस्था रचने वालों को बरी  करके दोष स्त्री के सिर मढ़ने की पुरजोर  साजिश  जारी  है।  स्त्री भी  विनत भाव से यह स्वीकार करती है  और उपकृत  महसूस करती है कि आज भी बहुत से पुरुष अच्छे हैं। ठीक है कि आज भी कुछ पुरुष अच्छे हैं  पर क्या यह सामन्य स्थितियां हैं?  वह इस बात से खुश होती है कि उसका भाई राखी और तीज में उसके लिए साड़ी लाया है।पिता की  संपत्ति पर   उसका कितना हक़ है यह  सवाल कभी उसके मन उठता  भी नहीं।विवाह के बाद  पति के घर में वह स्वामिनी नहीं सेविका की तरह आती है। अधिकतर वे स्त्रियां ही  झगड़ालू और कुलटा कही जातीं हैं जो सवाल पूछतीं हैं। मध्यम वर्ग    में जहाँ परिवार सर्वोपरि है जहाँ स्त्रियां गौण हैंऔर पुरुष प्रधान. स्त्रियों का बहुत बड़ा तबका ऐसा है जो पति का अनुगमन आँखें बंद कर करता है जिनका मानना है  की पति का नाम लेने से , सिन्दूर न लगाने से ,पति  निर्जल व्रत न करने से पति की उम् घटती है इसलिए वे ताजिंदगी पति का नाम नहीं लेतीं ,वे पति को साथी नहीं परमेश्वर कहतीं हैं।ऐसे ही पारिवारिक वातावरण में समाज के  भविष्य का पुरुष बड़ा होता है जो खुद को स्वयंभू और स्त्री को सामान और सेविका से अधिक नहीं  मानता हैं । असल में स्त्री  खुद को पूरी तरह से खो चुकी है।

  सच यह है कि स्त्री की गरिमा पुरुष बनने में नहीं है.स्त्री  तो स्वयं ही अतुलनीय रूप से महत्वपूर्ण है परन्तु  हालात बेहद विडम्बनापूर्ण हैं।   गर्भाशय जो स्त्री   होने की पहली पहचान  है. गर्भधारण उसके लिए  प्रकृति   का   एक वरदान  है  इसलिए स्वछंद और अधीर होना उसका स्वभाव ही  नहीं है तब  समझ में नहीं आता कि  स्त्री के लिए वर्जनाओं का निर्धारण करने का  कोई अधिकार पुरुष   के पास कैसे हो सकता है. स्त्री के लिए जो वर्जित है उसे वह अच्छी तरह पहचानती है। यदि वह अपने अधिकारों का इस्तेमाल करने की आज़ादी पाये तो क्या  पुरुष स्वयं ही अनुशासित नहीं हो जाएगा? पुरुष   सत्तात्मक व्यवस्था ने स्त्री  के लिए  वर्जनाओं का निर्धारण करने में भी दोनों पहलू अपने पक्ष में रखे   हैं।   एक ओर घरेलू स्त्री है और दूसरी ओर बाजारू स्त्री। क्या कोई स्त्री बाजारू होना चाहती है ? क्या उसे कोठों पर सुख मिलता है ? इसीलिए आज  की स्त्री का एक नया चेहरा उभरने लगा है और वह है विद्रोहिणी स्त्री का, जो इस समाज  से नाराज़ होकर अकेली रहती है। विद्रोहिणी स्त्री की शुचिता को लेकर सवाल नहीं उठते तब स्त्री की शुचिता की जिम्मेदारी पुरुष  क्यों लेता है।  वह अपनी शुचिता की जिम्मेदारी क्यों नहीं लेता।  स्त्री की शुचिता उसका अपना अधिकार है।
स्त्री से शुचिता को लेकर सवाल करना  स्त्री  के अस्तित्व पर सवाल करना है।

 आज स्त्री बहुत सी दुविधाओं के बीच  है।  क्या गलत और क्या सही है , इसका निर्णय करने में उसे बहुत सी परेशानियां उठानी पड़ती हैं।उसके पास अधिकार तो हैं लेकिन सामजिक मान्यताएं उसके साथ नहीं हैं। इस भौतिकता के युग में वह खुद को कमोडिटी होने से किस तरह बचाये। चेतना के स्तर  पर यह जागृति अभी  धुंधली है। बहुत  मामलों में वह देह को इस्तेमाल करने लगी है लेकिन यह  क्या उसको उसकी मंज़िल तक  ले जायेगा।   खुले कपडे पहनना कोई अपराध नहीं है  लेकिन उसके पीछे उसकी मंशा  क्या साफ़ है।  क्या वह अपनी देह से इतनी मुक्त है। यदि नहीं तो देहप्रदर्शन को  स्वयं अपना हथियार बना रही है जिसमें पीछे पहाड़  तो आगे खाई  है।  क्या  कपड़ों से प्रगति आयेगी ?आदिवासी स्त्रियां   जिनके स्तन खुले  होते हैं और उनके कपडे  घुटनों  तक  हटे  होते हैं  वे  अश्लील नहीं लगतीं क्योंकि वे अपनी लड़ाई लड़ने में समर्थ हैं देह का  इस्तेमाल  उनकी नीयत में शामिल  नहीं हैं  ।   सच यह है कि  प्रदर्शन की  नीयत से पहने जाने   वाले कपडे  स्त्री को देह-रूप में ही प्रस्तुत करते हैं।उसे अपनी अस्मिता को  पहचानना होगा।

जब तक स्त्री अपने  लिए आर्थिक आधार नहीं खड़ा करती , संगठित होकर अपनी लड़ाई नहीं लड़ती , अपने फैसले खुद नहीं करती तब तक सहजीवन में भी कोई सुख नहीं। पुरुष की मानसिकता ही नहीं स्त्री की मानसिकता भी बदले यह ज़रूरी है नहीं तो वह तो सप्तपदी और वैदिक रीति से   ब्याह न करने भर तक ही अलग है। आज की स्त्री को  आत्मरक्षा के   लिए मार्शल आर्ट की शिक्षा  और स्वावलम्बी होना बहुत  ज़रूरी है ताकि  भाई  ही नहीं  पति भी  गर्व से कह सके कि यह स्त्री  मेरी बहन है  , पत्नी है और यह अपनी रक्षा स्वयं करती  है। ताकि स्त्री अपने आने वाली पीढ़ी को भी आत्मरक्षा के लिए दीक्षित करे।

इस बार  निकट – १० के सम्पादन  के  जिम्मेदारी जब कृष्ण बिहारी जी ने मुझे दी  तो  जिम्मेदारी लेते हुए और विषय को चुनते हुए एक डर  भी शामिल था कि  गुरुतुल्य हमारे वरिष्ठ रचनाकार और मित्र रचनाकार  यदि एक साथ न आये तो यह अंक  तरह अपनी सार्थकता साबित कर सकेगा। मैं यह कहते हुए कृतकृत्य हूँ कि “स्त्री शुचितावाद और विवाह की व्यवस्था ” इस विषय को हमारे वरिष्ठ  और मित्र रचनाकारों ने हाथोंहाथ लिया और खुलकर अपनी बात रखी। राजकिशोर ,अर्चना वर्मा ,नासिरा  शर्मा , सुधा अरोड़ा , शीला रोहेकर ,राजेन्द्र रॉव् , अमरीक सिंह डीप  अरविन्द जैन , कात्यायनी  , तेजिंदर गगन ,देवेन्द्र,  गीताश्री , विभा रानी , रवि बुले ,अनीता भारती एवं  संजीव चन्दन। मैं इन सभी लोगों के प्रति ह्रदय से आभार व्यक्त करतीं हूँ।

इस बार हमारे स्तम्भ ” धमक ” में पहली कहानी दिव्या शुक्ला की है जोअ पनी परिपक्व भाषा  के साथ  कविताओं से  अपनी पहली कहानी  गिद्ध के माध्यम  से कहानी विधा में कदम रख  रहीं हैं। सुशील सिद्धार्थ का  व्यंग्य , कपिल आर्य के संस्मरण के साथ ही विश्वम्भर  नाथ शर्मा “कौशिक” की अप्रकाशित कहानी   के साथ ही आज की कहानी   एवं कविता के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर  हमारे इस अंक में मौजूद हैं।’ दखल” के माध्यम से जो भी मुझे  कहना  था   वह मैंने  सम्पादकीय में कहा  है।

आख़िर हम भी तो इंसान ही हैं, हमें भी दर्द होता है : रवीना बरीहा

( थर्ड जेंडर, ट्रांस जेंडर, तृतीय लिंग, किन्नर आदि नामों से जाना जाने वाला यह समुदाय भारतीय समाज के सबसे उपेक्षित तबकों में से एक है। आज राजनैतिक-सामाजिक-आर्थिक दृष्टि से इसकी शिनाख़्त सबसे उत्पीड़ित तबकों के रूप में की जा रही है। वर्षों से दुत्कार, प्रताड़ना और अपमान झेलने वाला यह तबका अब धीरे-धीरे अंगड़ाई लेने लगा है। मसला शिक्षा का हो, संगठन बनाने-सामाजिक काम करने का हो या फिर राजनीति में सक्रिय भागीदारी का, इस समुदाय की छटपटाहट खुल कर सामने आने लगी है। इन्हीं में से एक हैं छत्तीसगढ़ की रवीना बरीहा, जो रायपुर में ‘मितवा’ नाम की स्वयं सेवी संस्था के जरिये सामाजिक चेतना जगा रही और थर्ड जेंडर के हक-अधिकार के लिए भी प्रयत्नशील है। स्त्रीकाल के पाठकों के लिए डा.  मुकेश कुमार व डिसेन्ट कुमार साहू की उनसे लंबी बातचीत के प्रमुख अंश. स्त्रीकाल में थर्ड जेंडर से संबंधित अन्य आलेख पढने के लिए क्लिक करें  ) :
किन्नर अब थर्ड जेंडर की तरह पहचाने जायेंगे : स्वतंत्र मिश्र 
कब तक नचवाते और तालियां बजवाते रहेंगे हम : धर्मवीर सिंह 

रवीना बरीहा से बात करते डा. मुकेश

आप अपने जीवन-संघर्षों के बारे में बताएं।
इस मामले में मैं थोड़ा भाग्यशाली रही, हमारे समाज में थर्ड जेंडर को जितनी प्रताड़ना झेलनी पड़ती है, उतनी मुझे नहीं झेलनी पड़ी। सामाजिक उपेक्षा और बहिष्कार की जितनी पीड़ा हमारे समुदाय के अन्य लोगों को झेलनी पड़ती है, उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। लेकिन मुझे यह सब कम झेलना पड़ा। छठी कक्षा की पढ़ाई मैंने अपने घर पर ही रह कर की। उस समय तक घर वालों को समझ ही नहीं आया कि मैं ‘किन्नर’ हूँ। उसके बाद रायपुर के रामकृष्ण मिशन स्कूल में मेरा चयन हो गया, जहां रहकर मैंने बारहवीं कक्षा तक की पढ़ाई की। इस आश्रम में मेरी सही ढंग से परवरिश हुई, मुझे कहीं से भी यह एहसास नहीं होने दिया गया कि मैं ‘किन्नर’ हूँ। मानव के व्यक्तित्व के विकास के लिए शिक्षा, भोजन-वस्त्र आदि जिन बुनियादी चीजों की आवश्यकता होती है, सारी चीजें मुझे वहाँ उपलब्ध हुईं। जीव-विज्ञान से 12वीं कक्षा पास करने के बाद मैंने रायपुर के दुर्गा महाविद्यालय से कला (दर्शन, हिन्दी साहित्य, राजनीति विज्ञान) में स्नातक किया। तदुपरांत माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से संबद्ध एक संस्थान से मैंने रायपुर में ही एक वर्ष का फिल्म मेकिंग (पोस्ट ग्रेजुएशन डिप्लोमा इन डिजिटल विडियोग्राफी) कोर्स किया। इसी दौरान मैंने रायपुर के दैनिक अखबार ‘हरीभूमि’ में काम किया। वहाँ मैं प्रूफ-रीडर और संपादकीय में प्रांतीय डेस्क देखती थी। मैंने तीन वर्षों तक वहां काम किया। वर्ष 2009 में हमलोगों ने खुद का एक संगठन बनाने के बारे में सोचा। और हमलोगों ने अन्य चार-पाँच किन्नर साथियों के साथ मिलकर ‘मितवा’ नामक संस्था बनाई।

तब तक आपकी पहचान किन्नर के तौर पर समाज के सामने आ गई थी?
हाँ, बारहवीं की पढ़ाई पूरी कर लेने के बाद मैं खुलकर अपनी जेंडर पहचान के साथ सामने आ गई थी।

बारहवीं के बाद तक भी आपका अपने घरवालों से रिश्ता बना रहा?
बारहवीं के बाद भी मैं आश्रम में ही रही। अपनी पहचान स्पष्ट कर देने के बाद मुझको घर जाना नहीं पड़ा। पढ़ाई करते हुए मैंने टायपिंग भी सीख ली थी। इसी कारण मुझे अखबार में नौकरी मिल गई। प्रारंभ में मैंने देशबंधु अखबार में काम किया। इन पड़ावों से गुजरते हुए मुझे समझ में आया कि थर्ड जेंडर के प्रति समाज की धारणा कैसी है! तब से मेरे मन में एक बीज डल गया कि, मैं अपने लिंग- तृतीय लिंग के लोगों के लिए काम करूंगी। खासकर इन्हें सामाजिक समानता हासिल हो, इसके लिए काम करने का जज़्बा मेरे भीतर पैदा हुआ। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए हमने ‘मितवा’ संस्था बनाई।

‘मितवा’ अत्यंत ही प्यारा नाम रखा आप लोगों ने अपनी संस्था का। इसके पीछे भावना क्या थी? 
तृतीय लिंग समुदाय के हक-अधिकार पर काम करने के लिए हम लोगों ने यह संस्था बनाई। हम यह बताना चाहते हैं कि, हम न कोई दैवीय रूप हैं और न ही उपेक्षा के पात्र। हम ‘मित्र’ हैं। उपनिषदों के ‘एक साथ चलें, एक साथ मिलकर उपभोग करें, एक साथ तेजस्वी बनें’ वाक्य के मद्देनजर हम लोगों ने मित्रता को ‘इष्ट’ और श्रेष्ठ सदगुण समझा। इसी मित्रता के भाव को मितवा का नाम दिया गया। इस संस्था के जरिये हम लोग समाज की मुख्यधारा से थर्ड जेंडर को जोड़ने हेतु तरह-तरह की गतिविधियां चलाते हैं। हर वर्ष नवरात्रि के दिन हमलोग नर्सों का सम्मान करते हैं। उसी प्रकार ट्रैफिक पुलिस को अंबेडकर जयंती के दिन सम्मानित किया जाता है और रक्षा-बंधन के दिन पेड़-पौधों को हमलोग राखी बांधते हैं। रामनवमी में हमलोग गरीबों को भोजन कराते हैं। अस्पताल जाकर हम मरीजों को फल आदि वितरित करते हैं। इन गतिविधियों के जरिये हम समाज की मुख्यधारा से जुडने का लगातार प्रयास चला रहे हैं।

‘मितवा’ के लिए शुरुआती दिनों में आपलोगों ने फंड जेनरेट कैसे किया?
‘मितवा’ के सारे सदस्य कहीं न कहीं काम कर रहे थे, मैं खुद पत्रकारिता में थी, और अन्य सदस्य में से एक वहीं के किसी होटल में वरिष्ठ कुक थे, एक का बहुत अच्छा ब्यूटी-पार्लर था, एक-दो लोग बधाई मांगने का काम करते थे। इन सबके साझे आर्थिक सहयोग से संस्था का काम शुरू किया गया। संस्था को आज भारत सरकार के स्वास्थ मंत्रालय की ओर से लक्ष्यगत हस्तक्षेप परियोजना के अंतर्गत एक प्रोजेक्ट मिला हुआ है। एचआईवी-एड्स और टीबी पर जागरूकता के लिए इस प्रोजेक्ट के तहत संस्था के द्वारा पूरे रायपुर जिले में कार्य किया जा रहा है। इसके तहत जगह-जगह शिविर लगाकर खून की जांच करायी जाती है। स्वास्थ्य जागरूकता के लिए नुक्कड़-नाटक, कार्यशाला-सेमिनार आदि भी आयोजित किए जाते हैं। संस्था में आज 52 वेतनभोगी स्टाफ हैं, जिसमें से सत्तर फीसदी थर्ड जेंडर हैं। संस्था ने यौन-रोग, एचआईवी आदि से संबंधित निःशुल्क जानकारी देने के लिए एक सहायता केंद्र भी खोला था, जहां ऐसे मरीजों को जरूरी जानकारी व काउंसलिंग की जाती थी।

भारतीय समाज में ‘थर्ड जेंडर’ को आप कहाँ पाते हैं? 
यदि हम भारतीय समाज को धार्मिक व व्यावहारिक दोनों दृष्टि से देखें तो जहां धार्मिक दृष्टि से थर्ड जेंडर- किन्नरों को पवित्र और ऊंचा स्थान दिया गया है। लेकिन व्यवहार में थर्ड जेंडर को अत्यंत ही हेय दृष्टि से देखा जाता है। भारतीय समाज में थर्ड जेंडर को हासिये पर रखा गया है। वस्तुतः थर्ड जेंडर आज न्यूनतम मानवाधिकारों से भी वंचित है।

थर्ड जेंडर को लेकर भारतीय व पाश्चात्य अवधारणा में क्या भिन्नताएँ हैं?
भारतीय समाज में थर्ड जेंडर को सामाजिक मान्यता और जेंडर की भूमिका में देखा जाता है। जबकि पश्चिम में केवल यौनिकता ही इसका मूलआधार रहा है। हमारी यौन प्रवृत्ति, यौन-व्यवहार या यौनिकता के आधार पर इस जेंडर को अलग रखा गया है। पर भारतीय समाज में सामाजिक मान्यता और सामाजिक जेंडर के हिसाब से थर्ड जेंडर को देखा जाता है। यूं कहें कि जहां पश्चिम में हमारी बुनियाद ‘यौनिकता’ है वहीं भारत में हमारी बुनियाद ‘जेंडर’ है।

भारत में थर्ड जेंडर को कैसे वर्गीकृत किया गया है? 
भारत में वर्गीकरण सामाजिक और पारंपरिक आधार पर किया गया है। जबकि पश्चिम में सेक्सुअलिटी के आधार पर। वहाँ कई ट्रांस जेंडर बाइ-सेक्सुअल, होमो-सेक्सुअल होते हैं। पश्चिम में आठ प्रकार की यौनिकता के आधार पर वर्गीकरण किया गया है। जबकि भारत में यौनिकता के बजाय परंपरा और सामाजिक-सांस्कृतिक स्थिति के आधार पर यह वर्गीकरण हुआ है। थर्ड जेंडर में जो भिक्षावृत्ति के पेशे में शामिल हैं उन्हें ‘हिजड़ा’ कहा गया, घरों में रहकर सामान्य लोगों की भांति जीवन-यापन करने वालों को ‘ट्रांस-जेंडर’, जो शर्ट-पेंट में रहते हैं उन्हें ‘कोती’ कहा जाता है। कुछ थर्ड जेंडर जो धार्मिक-आध्यात्मिक मार्ग पर चलते हैं, उसे ‘जोगप्पा’ कहा जाता है। यहां मैं यह भी कहना चाहूंगी कि, थर्ड जेंडर के वर्गीकरण की भारतीय और पश्चिमी दोनों अवधारणा अपने आप में एकांगी है। यौनिकता और सामाजिक-सांस्कृतिक दोनों पहलुओं को ध्यान में रखकर ही हमारे साथ वास्तविक न्याय किया जा सकता है और इसी से हमारा समुचित विकास भी होगा।

आपकी नज़र में सेक्स , सेक्सुअलिटी और जेंडर के बीच क्या फर्क है?

सेक्स तीन हैं- एक पुरूष, दूसरा स्त्री  और तीसरा जिनके सेक्स अंगों का सही विकास नहीं हो पाया। ये तीन ही सेक्स मानते हैं हम लोग। जबकि सेक्सुअलिटी कई प्रकार की होती है। हो सकता है किसी को होमो-सेक्सुअलिटी पसंद आये, कोई विषम लैंगिक हो, कोई ट्रांस-जेंडर के साथ सेक्से करना पसंद करें, तो कुछ लोग ऐसे होंगे जो स्त्रीी-पुरूष दोनों के साथ समान रूप से सेक्सुअल संबंध बनाना पंसद करेंगे। इसके और भी बहुत सारे प्रकार हो सकते हैं। हम मानते हैं कि सेक्सप प्रकृति-प्रदत्त अवस्थाएं हैं। जबकि यौनिकता मनुष्य का यौन-व्यवहार है। यह प्रवाहमान होता है और बदल भी सकता है। आज का विषम-लैंगिक कल समलैंगिक हो जा सकते हैं, आदि-आदि। कहने का अभिप्राय यह कि, यौनिकता परिवर्तनशील धारणा है। वहीं ‘जेंडर’ समाज प्रदत्त है, सामाजिक निर्मिति है। इसके जरिये समाज आपकी स्थिति को निरूपित करता है।

आमतौर पर थर्ड जेंडर के प्रति समाज का नजरिया कैसा रहता है? यानी समाज आपके साथ कैसा बर्ताव करता है?
थर्ड जेंडर के प्रति हम लोग समाज की मिलीजुली प्रतिक्रिया देखते हैं। समाज के जिन लोगों का थर्ड जेंडर-किन्नरों के साथ पहले कभी अथवा लगातार मेल-जोल रहा है, वे बहुत जल्दी हमलोगों को एक्सेप्ट (स्वीकार) करते हैं। हमसे अच्छा व्यवहार करते हैं। कई बार तो हमलोगों को एक दैवीय रूप में देखा जाता है। लेकिन समाज का एक बड़ा तबका ऐसा है, जो अपने कुछ पूर्वाग्रहों के कारण हमसे दूर भागता है। शायद थर्ड जेंडर का समाज से पर्याप्त मेल-जोल नहीं होने से वे एक झिझक के कारण हमें कबूल नहीं करते। इस प्रकार हम लोग समाज से दो भिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाएं देखते हैं – एक बहुत साकारात्मक तो दूसरा अत्यंत ही नाकारात्मक-उपेक्षात्मक है।

इसका मतलब यह हुआ कि थर्ड जेंडर को समाज ‘मनुष्य’ के तौर पर कबूल नहीं करता? या तो उसमें ‘देवत्व’ ढूंढा जाता है या फिर उसे हंसी-व्यंग्य और अपमान का पात्र समझा जाता है!
आपने सही कहा, हमारे प्रति ये दोनों नजरिया समाज का रहता है। हमें या तो ‘दैवीय शक्ति’ के तौर पर देखा जाता अथवा उपेक्षा व उत्पीड़न का पात्र समझा जाता है। और समाज का ये दोनों ही अतिवादी नजरिया हमारे विकास के लिए सही नहीं है, बल्कि सच कहें तो बाधक है। क्योंकि हम समाज में यदि बहुत ऊंचे, पूजनीय रूप में माने जायेंगे तो भी हम समाज की मुख्यधारा से नहीं जुड़ पायेंगे। और यदि हम उपेक्षित हैं, तो वह हमारे लिए कष्टदायक है ही। इसलिए हम चाहते हैं कि हमारे साथ भी बाकी लोगों जैसा समानता का बर्ताव हो। हमें भी समानता, न्याय व अवसर की मुकम्मल गारंटी मिले। तभी थर्ड जेंडर का समुचित विकास हो सकेगा और हम समाज की मुख्यधारा से जुड़कर समाज के समुचित-संतुलित बदलाव-विकास में योगदान कर सकेंगे।

आमतौर पर थर्ड जेंडर के साथ पुलिस-प्रशासन का व्यवहार कैसा रहता है ?  
हमारे प्रति पुलिस का व्युवहार नकारात्म क ज्यांदा है। कई बार गंभीर मामलों में भी पुलिस एफआईआर तक दर्ज नहीं करती। यहां तक कि एफआईआर दर्ज कराने जाने पर पुलिस स्टेआशन से हमें भगा दिया जाता है। खासकर रेलवे स्टेकशन में तो मारा-पीटा तक जाता है। कई बार ‘असली’ हो या ‘नकली’ कह कर पुलिस हमारे समुदाय के लोगों से कपड़े तक उतरवाती है। सोचिये महज़ एफआईआर लिखाने के पहले कितनी प्रताड़ना से गुजरना पड़ता है। पीड़ित को पुलिस द्वारा दोबारा उत्पींड़ित किया जाता है। जबकि एफआईआर तो कोई भी लिखा सकता है। चाहे वह स्त्री  – पुरूष या थर्ड जेंडर ही क्यों न हो। इस स्थिति को देखते हुए हमने रायपुर में पुलिस के साथ वर्कशॉप किया था, वहां थोड़ी स्थिति बदली है। लेकिन ज्यादातर जगहों पर पुलिस का हमारे प्रति अमानवीय व्यीवहार ही रहता है। पुलिस को हमारे प्रति अपना व्यवहार नकारात्मक नहीं रखना चाहिए। आख़िर हम भी तो इंसान ही हैं, हमें भी दर्द होता है इससे।

जाहिर है कि थर्ड जेंडर मूलतः एक उत्पीड़ित सामाजिक वर्ग है। भारतीय समाज में दलित-आदिवासी और महिला आदि भी इसी श्रेणी में आते हैं। इस मायने में अन्य उत्पीड़ित समूहों से थर्ड जेंडर कैसे अलग है? 
थर्ड जेंडर से इतर जिन समूहों के बारे में आप कह रहे हैं, वे सचमुच उत्पीड़ित हैं। किंतु कहीं न कहीं इन समूहों को कानून व राज्य का संरक्षण प्राप्त है। अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए कई कानूनी प्रावधान और आयोग बने हुए हैं, स्त्रियों के लिए भी इसी प्रकार की व्यवस्था है। यहाँ तक कि बच्चों, पशु-पक्षियों व पेड़-पौधों के संरक्षण-विकास की व्यवस्था है। पर हमारा दुर्भाग्य है कि किन्नरों के लिए कुछ भी नहीं है। वर्ष 2014 में हमें सर्वोच्च न्यायालय के माध्यम से पहचान मिला। जबकि यह ऐतिहासिक तथ्य है कि मुगलकाल और उससे पहले थर्ड जेंडर को बराबर या समानांतर दर्जा प्राप्त था। हमलोगों ने अपने अध्ययन में पाया कि औपनिवेशिक काल में अंग्रेजों ने किन्नरों को दुरावस्था की स्थिति तक पहुंचाया। अंग्रेजों ने ऐसे-ऐसे कानून बनाये, जो किन्नरों को अपराधी ठहराता था। इसी काल में धारा-377 भी बना। आज हम इन काले क़ानूनों को बदलने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सरकार से हमलोगों का इस मसले पर संवाद चल रहा है। हमें उम्मीद है कि इन काले क़ानूनों को जल्द ही बदला जा सकेगा। इसलिए इस मायने में हमारी उपेक्षा अन्य सामाजिक वर्गों से भिन्न प्रकार की है।

आपकी बातचीत से लगता है कि थर्ड जेंडर की स्थिति में साकारात्मक बदलाव आ रहे हैं। इन बदलावों की आप क्या वजहें मानती हैं?
इस बदलाव के दो-तीन कारण हैं। पिछले दो दशकों में मानवाधिकारों को लेकर देश में आयी जागरूकता एक बड़ी वजह है। पहले इस दिशा में लोग बात तक करने के लिए तैयार नहीं थे। दूसरा कारण, देश के साकारात्मक सोच रखने वाले, जो हमारे प्रति संकीर्ण-नाकारात्मक दृष्टिकोण नहीं रखते, उनलोगों की भूमिका रही है। ऐसे लोगों ने हमारा साथ दिया है। शिक्षा के प्रचार-प्रसार ने भी इस सूरत-ए-हाल को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है।

थर्ड जेंडर की संस्कृति पर कुछ प्रकाश डालिए…  
भारतीय वर्गीकरण, जिसकी चर्चा मैंने आपसे की, जिन सामाजिक-सांस्कृतिक आधारों पर किया गया है, वही उनकी संस्कृति है। हिजड़ा समुदाय, जो भिक्षावृत्ति करता है, उसमें गुरू-शिष्य की परंपरा होती है। उसी प्रकार जो आध्यात्मिक-धार्मिक परंपरा से संबद्ध होते हैं, उनके पहनावे भिन्न होते हैं। वे जाप, भजन-कीर्तन आदि करते हैं। जो लोग घरों में रहते हैं, वे सामान्य लोगों की ही तरह जीते-रहते हैं।

पर्व-त्योहारों में भी इनमें आपस में भिन्नता रहती है क्या? 
हां, पर्व-त्योहार भी इसी वर्गीकरण के आधार पर है। हिजड़ों के पर्व-त्योहार अलग हैं। ये ‘गौचरा माता’ को मानते हैं। गुजरात में इनका तीर्थ-स्थल है। अंतिम संस्कार का भी इनका विधि-विधान अलग है। घरों में रहने वाले अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक परंपरा के मुताबिक होली-दीवाली, ईद मनाते हैं। मंदिरों में रहने वाले मंदिरों की मान्य सांस्कृतिक परंपरा को मानते हैं। इस प्रकार थर्ड जेंडर की कोई सर्वमान्य विशेष परंपरा नहीं है।दुर्भाग्यवश समाज हिजड़ों की संस्कृति को देखकर पूरे थर्ड जेंडर की एक ही संस्कृति मान लेता है, जबकि ऐसा है नहीं।

कुछ लोगों को लगता है कि हिजड़ा समुदाय को बगैर मेहनत के काफी पैसे मिल जाते हैं। एक प्रकार से इन्हें मुफ्तखोर के बतौर देखा जाता है। आपकी प्रतिक्रिया…
हां, भिक्षावृत्ति के द्वारा कुछ लोग आजीविका प्राप्त करते हैं। लेकिन हमलोगों ने जब इस पर सर्वेक्षण किया तो यह बात सामने आयी कि ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है। गांव-कसबों  में रह रहे थर्ड जेंडर के ज़्यादातर लोगों की आर्थिक स्थिति अत्यंत ही दयनीय है। ये अत्यंत ही कम मजदूरी की दर पर अपना पेट पालते, इनके पास वोटर-कार्ड तक नहीं है। ये जहां श्रम करते, कार्य-स्थल पर भी भेदभाव के शिकार बनते हैं। कुछ-कुछ जगह है, जहां किन्नर समुदाय के लोगों ने संगठित तौर पर भिक्षावृत्ति जैसी चीज को बढ़ावा दिया है। लेकिन इनकी संख्या बहुत अधिक नहीं। आज अगर पूरे भारतवर्ष में थर्ड जेंडर की स्थिति का अध्ययन करें तो हम पायेंगे कि इनकी आर्थिक स्थिति अत्यंत ही निम्न है। चूंकि समाज में भिक्षावृत्ति करने वाले दीख जाते हैं, इसलिए लोगों को ऐसा लग सकता है। किंतु थर्ड जेंडर के इससे कई गुना ज़्यादा लोग हैं, जो मेहनत-मजदूरी करके बड़ी कठिनाई से अपना गुजर-बसर कर रहे हैं।

हिजड़ों के बारे में समाज में कई तरह की भ्रांत धारणा है। अक्सर यह कहा जाता है कि इनके जो गुरू होते हैं, वे पूरे रुतबे और भोग-विलास की जिंदगी जीते हैं ! इस पर आपकी टिप्पणी…

यह सही है कि मठाधीशों के पास जब बहुत पैसा आ जाता है तो वे विलासिता का जीवन जीने लग जाते हैं। इनमें से कुछ लोग बहुत संपन्न हो भी गये हैं। आज दिल्ली, इंदौर, जबलपुर, रायपुर आदि कुछ शहरों में उनके अपने बड़े-बड़े फ्लैट हैं। रायपुर में तो लगभग आधे किलोमीटर का उनका कॉम्प्लेक्स है, जिसमें बड़ी-बड़ी दुकानें चलती हैं। यह जो उनकी संपत्ति और विलासिता है उसके पीछे समाज का वह नजरिया, कि लोगों ने उन्हें देवत्व के तौर पर माना है। लोगों ने उन्हें पैसा देना शुरू कर दिया। इसी कारण वे लोग भी अपने इसी दैवीय रूप को बरकरार रखना चाहते हैं। उन लोगों ने अपना अलग-अलग ‘घराना’ बना लिया है। एक-एक घराने में कई शिष्य होते हैं, जिन्हें गुरू का निर्देश रहता है कि बाहर के लोगों से एक सीमा के बाद दूरी बनाए रखें। अपने बारे में ज्यादा जानकारी न दें और न ही लोगों से घुलें-मिलें। अगर कोई बात भी करना चाहे तो उनसे उन्हें गाली-गलौज करने की शिक्षा दी जाती है। इस तरीके से उनको ऐसे नियमों में बांधा जाता है। इन घरानों में कायदे-कानून इतने सख्त हैं जिसके चलते थर्ड जेंडर के सभी लोग वहां नहीं जा सकते। उन्हें जानवरों की तरह रखा जाता है। यह एक बहुत बड़ा सामाजिक दोष है। उनकी स्थिति को बदलकर ही इस समस्या को दूर किया जा सकता है।
इस सबके बावजूद हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जिस समय बच्चे को ‘तीसरा लिंग’ का होने के कारण उनके मां-बाप द्वारा परिवार-समाज से निकाल दिया जाता है, ये गुरू-मठाधीश ही उन्हें संरक्षण देते हैं। उनका भरण-पोषण करते हैं, उन्हें ठौर देते हैं। इन दोनों पहलुओं को हमें देखना चाहिए। क्योंकि जब इनके पास खाने को नहीं था, फुटपाथ पर रात बिताते थे, आए दिन कुछ न कुछ अप्रिय घटनाएँ घटती थीं, तब उन्होंने ही सहारा दिया।

आज की तारीख में देशभर में किन्नरों पर काम करने वाले कितने संगठन सक्रिय हैं?
2009 तक तो केवल 5 संगठन ही सक्रिय थे। 2011 में अखिल भारतीय स्तर पर काम करने के लिए एक नेटवर्क – ‘हमसफर’ का निर्माण किया गया। यह हर राज्य में जाकर वहाँ के किन्नरों को संगठित करने के साथ संगठन को एक संस्था का रूप देता है। आज भारत में उत्तर-पूर्व के राज्यों को छोड़कर, क्योंकि वहाँ किन्नर शेष भारत की तुलना में पहले से ही बेहतर स्थिति में हैं, हर राज्य की राजधानी में एक संस्था का गठन किया जा चुका है। ये संस्थाएं किन्नरों के हितों की ‘एडवोकेसी’ करते हैं और उन्हें संगठित भी।

थर्ड जेंडर को लेकर भारत में अब तक क्या-क्या कानूनी प्रावधान किये गए हैं? 
अभी सर्वोच्च न्यायालय ने थर्ड जेंडर को मान्यता दी है। सामाजिक न्याय मंत्रालय की एक टीम ने कुछ-कुछ बिन्दुओं पर राज्य सरकारों को निर्देश दिया है। सर्वोच्च न्यायालय और मंत्रालय द्वारा दिये गये निर्देशों पर अमल करने का दायित्व राज्य सरकारों का है। जिन राज्य सरकारों ने इन सुझावों पर अमल किया वहां थर्ड जेंडर को सुविधाएं मिलनी शुरू हुई है। जैसे तमिलनाडू में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बहुत पहले से ही थर्ड जेंडर के लिए अलग से अधिनियम है। वहां 2002 में ही इसके लिए बोर्ड का गठन हो चुका है। राजस्थान में भी कुछ-कुछ कानून आया है। छत्तीसगढ़ में अभी हाल ही में अलग बोर्ड का गठन किया गया है। किन्नरों के हितों के मद्देनजर देश के सभी राज्यों की सरकारों को चाहिए कि इस दिशा में त्वरित कदम उठायेँ। इस हेतु हमलोग विभिन्न राज्य की सरकारों से संवाद भी चला रहे हैं।

थर्ड जेंडर के सशक्तीकरण के लिए आप लोगों की प्रमुख मांगें क्या हैं?  
हमलोगों ने दो-तीन चीजें निर्धारित की हैं। पहला तो शिक्षा है। आजीविका है। न्याय के समक्ष समानता है। आर्थिक अवसरों में उन्नति की समानता है। कुछ अधिनियम हैं, जिन्हें सभी राज्यों में लाया जाना चाहिए। सभी राज्यों में बोर्ड का गठन होना चाहिए। केंद्र स्तर पर भी अनुसूचित जाति-जनजाति, महिला आयोग आदि की भांति थर्ड जेंडर के लिए भी स्वतंत्र आयोग का गठन किया जाना चाहिए। इन मांगों को लेकर शासन से हमलोग लगातार बात कर रहे हैं। तीन राज्यों- छतीसगढ़, महाराष्ट्र और तमिलनाडु की सरकार ने अपने यहां बोर्ड का गठन किया भी है। मध्यप्रदेश और बिहार में यह प्रक्रियाधीन है। यदि हमारी इन मांगों पर राज्य सरकारें समुचित ध्यान दें तो किन्नरों की दशा-दिशा बदल सकती है।

थर्ड जेंडर के शिक्षा की स्थिति में सुधार के लिए सरकार को क्‍या कदम उठाने चाहिए? जिस प्रकार सरकार द्वारा बोर्डिंग स्कूहल, नवोदय विद्यालय, सैनिक स्कूरल और अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए अलग आवासीय विद्यालय चलाये जा रहे हैं, क्याच किन्नजरों के लिए भी उसी प्रकार की अलग से व्येवस्था  होनी चाहिए?
यह जरूरी है कि हमलोगों के लिए अलग से आवासीय विद्यालय की व्यजवस्था् हो। हर राज्यस में थर्ड जेंडर के लिए कम से कम एक आवासीय विद्यालय हो तो तत्काल हमारी शिक्षा की जरूरतें पूरी हो सकती है। इस दिशा में केन्द्रय और राज्यी सरकार को यथाशीघ्र कदम उठाना चाहिए। थर्ड जेंडर के लिए ब्यूटीशियन, टेलरिंग, बागवानी आदि के प्रशिक्षण की भी व्यकवस्थाय सरकार को करनी चाहिए। ताकि इनके स्वरोजगार का रास्ता खुल सके।

देश में अब तक किन-किन प्रांतों में थर्ड जेंडर को सरकारी नौकरियों में आरक्षण की सुविधा दी गयी है?
अभी आरक्षण केवल तमिलनाडू राज्यश में ही मिल पाया है। बाकि राज्योंि में यह प्रक्रियाधीन है। केन्द्रं सरकार ओबीसी कोटे के भीतर थर्ड जेंडर को आरक्षण देने की बात कर रही है। लेकिन हम लोग कह रहे हैं कि जो अनुसूचित जाति-जनजाति से आये किन्निर हैं, उन्हेंं उसी कोटे से आरक्षण दिया जाना चाहिए। हालांकि अभी यह विचाराधीन है, इस पर अब तक कोई ठोस निर्णय सामने नहीं आया है।

पिछड़े-दलितों के कोटे से थर्ड जेंडर को आरक्षण देने की स्थिति में इनसे टकराहट की स्थिति भी पैदा हो सकती है। आपको क्या लगता है? 

मुमकीन है कि टकराहटें हों। हमें इसका डर भी है। इसी कारण हम लोग यह मांग कर रहे हैं कि हमें अल्प संख्यडकों की भांति संरक्षण प्रदान किये जायें। जातिगत दायरे में हमारे लिए आरक्षण की व्यसवस्थाी होने से राजनीतिक समीकरण प्रभावित होंगे, जिससे तनाव की स्थिति पैदा हो सकती है। हमलोग दीर्घकाल तक आरक्षण के बजाय मात्र 10-20 वर्षों तक संरक्षण देने की मांग कर रहे हैं। बीस वर्ष बाद सरकार हमारी स्थिति का अध्य यन करा ले और जरूरी समझे तो उसे समाप्त् कर दे।

देश में व्याप्त बेरोजगारी, गरीबी, विषमता, भ्रष्टाचार, मंहगाई और यौन-हिंसा जैसी गंभीर समस्याओं को आप बतौर ट्रांस-जेंडर किस रूप में देखती हैं?
हमारी लड़ाई इसी समाज में जाने की है। इसलिए हमारी प्राथमिकता है कि यह समाज हमें अपना माने। यही वजह है कि अभी हमलोग इन सवालों पर बहुत सोच नहीं पा रहे हैं। हमारी पहली कोशिश सामाजिक समानता लाने की है। पर हम इतना जरूर चाहते हैं कि जो अशिक्षा, गरीबी, भ्रष्टाचार, यौन हिंसा आदि समस्याएँ हैं, वे दूर हों। क्योंकि ये समस्याएँ ऐसी हैं जो पूरे समाज को प्रभावित करने वाली हैं और निश्चित रूप से हमें भी। इन समस्याओं को लेकर हम केंद्र-राज्य की सरकारों से मांग करते हैं कि वे इसका सार्थक समाधान निकालें। सरकार अपने काम-काज में पारदर्शिता लाये। मानवाधिकारों की गारंटी हो। हम चाहते हैं कि सरकार वैज्ञानिक दृष्टि अपनाते हुए इन सवालों का समाधान करे। ये समस्याएँ खत्म होंगी तो हमारे हालात भी बदलेंगे।
आपकी सद-इच्छाएं वाजिब हैं। किन्तु सरकारें बनाने-चलाने वाली पार्टियों की खास विचारधारा व खास समूहों के प्रति प्रतिबद्धताएं होती हैं, सत्ता में रहते हुए इनके नीति-व्यापार सबके सब इसी बिना पर निर्धारित होते हैं।

मुख्यधारा की इन पार्टियों का अपना एजेंडा रहता है, जिसपर ये पार्टियां काम करती हैं। इन पार्टियों के एजेंडे में ‘थर्ड जेंडर’ को आप कहाँ पाती हैं?
इस बार लोकसभा चुनाव के पहले हमलोगों ने मुख्यधारा की पार्टियों के ‘मेनिफेस्टो’ में अपने सवालों को शामिल कराने का प्रयास किया था। दक्षिण भारत के विभिन्न राजनीतिक दलों, पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस पार्टी, कांग्रेस पार्टी और आम आदमी पार्टी ने हमारे सवाल को अपने चुनावी घोषणा-पत्र में शामिल किया भी था। हमारे संपर्क के पूर्व भाजपा का घोषणा-पत्र छप चुका था, इसलिए उसमें यह शामिल नहीं हो पाया। शेष राजनीतिक पार्टियों से हमलोग समय से संपर्क नहीं कर पाये इसलिए उनके घोषणा-पत्र में हमारी बात शामिल नहीं हो पाई। लेकिन मैं यहाँ एक बात कहना चाहूंगी कि जब हम लोगों ने इन पार्टियों का घोषणा-पत्र देखा तो हमें नहीं लगा कि उनमें बहुत अंतर है। सभी विकास, सुशासन, शिक्षा, गरीबी पर बात करते हैं। इसलिए हमलोगों ने तय किया कि हम किसी पार्टी विशेष का पक्ष नहीं लेंगे। इसलिए हमलोग किसी दल को ‘फॉलो’ करने अथवा उनपर टिप्पणी करने से बचते हैं। बावजूद इसके यह बात तो है कि, हमारी कोशिश रहनी चाहिए कि सभी दलों तक हम अपनी बात पहुंचाएं। इस बार हमलोग यह पूरे तौर पर नहीं कर पाये, क्योंकि किन्नर समाज में पढ़े-लिखे लोगों का काफी अभाव है और संगठन में सक्रिय लोगों की संख्या भी अभी पर्याप्त नहीं है। लेकिन आगे हम इसकी कोशिश जरूर करेंगे। जो राजनैतिक दल हमारे लिए काम करेंगे हम उनके साथ हैं।

इन आदर्शवादी अपेक्षाओं के बावजूद इतना तो मानना पड़ेगा कि व्यवहारतः मुख्यधारा की ये पार्टियां /गठबंधन – एनडीए-यूपीए अंतिम तौर पर समाज में यथास्थितावाद बहाल रखने के लिए ही प्रयत्नशील हैं। ऐसी स्थिति में उत्पीड़ित समूह, चाहे वह दलित-आदिवासी व महिला हो या फिर ट्रांस-जेंडर, इनके हक-अधिकार की मुकम्मल गारंटी तब तक संभव नहीं हो सकती जब तक इस यथास्थितिवाद को पलटते हुए पूरे समाज का क्रांतिकारी-समता आधारित मूल्यों के आधार पर पुनर्संगठन न किया जाय। इसी रास्ते उत्पीड़ित समूहों को ‘मनुष्य’ का दर्ज़ा भी हासिल हो सकेगा। क्या कहना चाहेंगी आप? 


इस बात को हमलोगों ने भी महसूस किया। अगर कोई राजनीतिक पार्टी है तो वह बहुत सारे लोगों का जिस चीज पर दबदबा है, उसी को साथ लेकर चलती है। जिनकी संख्या कम है, वे हमेशा उपेक्षित रह जाते हैं। हम इस बात को मानते हैं कि पार्टी वोट बैंक से चलती है, जिस सामाजिक समूह से ज्यादा वोट हासिल होता है, उसी को वे देखती हैं। यह चलता आ रहा है और शायद आगे भी बहुत दिनों तक चलेगा। इसलिए हमलोग दो दिशाओं में काम कर रहे हैं – राजनीतिक पार्टियों से भी संपर्क-संवाद कर रहे हैं और न्यायपालिका का भी दरवाजा खटखटा रहे हैं। वर्तमान में हम देख रहे हैं कि सर्वोच्च न्यायालय ने कई बड़े मामले पर हस्तक्षेप किया है और सरकारों को भी फटकार तक लगाई है। इसे देखते हुए हमलोगों ने महसूस किया कि हम केवल राजनीतिक पार्टियों के भरोसे नहीं रहेंगे बल्कि न्यायपालिका की भी मदद लेंगे। हमें न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है। इसलिए हमलोगों ने तय किया है कि, कानूनी लड़ाई भी लड़ेंगे और लगातार विधायिका-कार्यपालिका के समक्ष अपनी मांगें भी रखेंगे।

संपर्क : 
डॉ. मुकेश कुमार, पोस्ट डॉक्टोरल फ़ेलो, आईसीएसएसआर, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा – 442005, महाराष्ट्र.; मो.: 09431690824; ई-मेल: drmukeshkumar.bgp@gmail.com 


डिसेन्ट कुमार साहू, जूनियर रिसर्च फ़ेलो, यूजीसी, समाज-कार्य, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा – 442005, महाराष्ट्र.; मो.: 08855868445 ; ई-मेल: dksahu171@gmail.com 

उज्जवल भट्टाचार्य की कवितायें : ब्रह्मज्ञान व अन्य

उज्जवल भट्टाचार्य

उज्ज्वल भट्टाचार्य 1979 से 2011 तक जर्मनी में रेडियो पत्रकार के रूप में कार्यरत रहे हैं. कविता और कहानियां आलोचना, पहल, हंस व अन्यत्र प्रकाशित. बैर्तोल्त ब्रेख्त (एकोत्तरशती), एरिष फ़्रीड (वतन की तलाश), हान्स-माग्नुस एन्त्सेन्सबैर्गर (भविष्य संगीत) व गोएथे के जर्मन से हिंदी अनुवाद के संग्रह प्रकाशित. इन दिनों कोलोन, जर्मनी व वाराणसी में रहते हुए स्वतंत्र लेखन.
संपर्क :9717274668

ब्रह्मज्ञान

यह सच है
तुम्हारी हवस के मारे
मुझे भागते फिरना पड़ रहा है
और जिधर भी मैं भागती हूं
तुम्हारा एक चेहरा उभर आता है –
पर इतना जान लो :
मैं नहीं पैदा हुई
तुम्हारे ध्यान से…
तुम्हें धरती पर लाया गया
मेरी जांघों के बीच से…


वो और उसकी कविता

बेचारी औरत का दर्द
दुनिया के सामने रखने की ख़ातिर
एक कविता लिखनी थी
अपनी तसव्वुर से
सहूलियत के मुताबिक
करीने से बनाई
बेचारी औरत की तस्वीर
एक ज़बरदस्त कविता बनी
और मेरी ओर देखते हुए
मुस्कराने लगी.

कौरव सभा में

द्रौपदी की साड़ी खुलती जा रही है
और लिपटती जा रही है
मेरे जिस्म पर
वह शर्म से पानी-पानी हुए जा रही है
नंगी होने के डर से
मैं भी शर्म में डुबा हूं
पुंसत्व का अभिमान खोकर
और टकटकी लगाकर
हम दोनों को देखते हुए
कुत्सित मुस्करा रहा है
हस्तिनापुर !

एक ताकतवर महिला नेता की कविता

मैं जान चुकी थी
औरत होना मेरी कमज़ोरी थी
और सारे मर्द इसका फ़ायदा उठाते थे
चुनांचे मैंने औरत होना छोड़ दिया
और मुझे सबकुछ मिलती गई –
इज़्ज़त, ताकत, धन-दौलत…
सिर्फ़ कभी-कभी
रात को अकेले
सितारों से भरे आसमान की ओर
बांहे फैलाकर अरज करती हूं –
इज़्ज़त, ताकत, धन-दौलत…
एकबार औरत बनकर इन्हें पा लेने दो !

बेचारा मर्द

मां के गर्भ से निकलने के बाद से ही
वह परेशान है
छूट चुका है
उसका बसेरा
जहां उंकड़ू मारकर
घर जैसा महसूस किया जा सके
अब हाथ-पैर फैलाने हैं
धरती-आसमान-समंदर
हर कहीं बनाने हैं बसेरे
डाह भरी नज़रों से
वह देखता है औरत को
उसे बसेरे नहीं बनाने हैं –
बसेरा बनना है !

जो वैध व कानूनी है वह पुरुष का ……..

अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com

( प्रज्ञा पांडेय के अतिथि सम्पादन में हिन्दी की पत्रिका ‘ निकट ‘ ने स्त्री -शुचितावाद और विवाह की व्यवस्था पर एक परिचर्चा आयोजित की है . निकट से साभार हम उस परिचर्चा को क्रमशः प्रस्तुत कर रहे हैं , प्रारंभ करते हैं अरविंद जैन के जवाब से ) 
बकौल सिमोन द बोउआर “स्त्री पैदा नहीं होती बनायी जाती है”. आपकी दृष्टि में स्त्री का आदिम स्वरुप क्या है।
सिमोन द बोउआर (सेकंड सेक्स) की यह अवधारणा कि “स्त्री पैदा नहीं होती बनाई जाती है” अपने समय और समाज में सही रही है. दरअसल स्त्री पैदा ही नहीं होती बनाई भी जाती है, ताकि वो ज्यादा से ज्यादा ‘पुरुष’ पैदा करे, जिन्हें पितृसत्ता ‘मर्द’ बना अपना व्यापार चला सके. व्यापक स्तर पर यह फैलाया गया कि मातृत्व  के बिना स्त्री अधूरी है. अविवाहित, विधवा, तलाकशुदा और ‘बाँझ’ स्त्री समाज पर बोझ मानी-समझ जाती हैं.
पूरी साज़िश समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि सारी दुनिया की धरती और (स्त्री) देह यानी उत्पादन और उत्पत्ति के सभी साधनों पर पुरुषों का ’सर्वाधिकार सुरक्षित” है. उत्पादन के साधनों पर कब्जे के लिये ‘उत्तराधिकार कानून’ और उत्पत्ति यानी स्त्री देह पर स्वामित्व के लिये ‘विवाह संस्था’ की स्थापना (षड्‌यन्त्र) बहुत सोच-समझकर की गयी होगी.
भारतीय विधि-व्यवस्था में भी उत्तराधिकार के लिए ‘वैध संतान’ और ‘वैध संतान’ के लिए ‘वैध विवाह’ होना अनिवार्य है. कानून और न्याय की नज़र में, ‘वैध संतान’ सिर्फ पुरुष की और ‘अवैध’ स्त्री की समझी जाती है. इसीलिए वैध संतान का ‘प्राकृतिक संरक्षक’ पुरुष (पिता) और ‘अवैध’ की संरक्षक स्त्री (माँ) होती है. विवाह संस्था की स्थापना से बाहर पैदा हुए बच्चे ‘नाजायज’, ‘अवैध’, ‘हरामी’ और ‘बास्टर्ड’ कहे-माने जाते हैं. इसलिए पिता की संपत्ति के कानूनी वारिस नहीं हो सकते. हाँ, माँ की सम्पत्ति (अगर हो तो) में बराबर के हकदार होंगे.
इसका मतलब यह हुआ कि जो वैध और कानूनी है, वो पुरुष का और जो अवैध है या गैरकानूनी है, वो स्त्री का. ‘वैध-अवैध’ बच्चों के बीच यही कानूनी भेदभाव (सुरक्षा कवच) ही तो है, जो विश्व-भर में ‘विवाह संस्था’ को अभी तक बनाए-बचाए हुए है. जी हाँ! फिलहाल यही और ऐसे ही दोहरे और चरित्र(हीन) हैं हमारे कानून.
अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (संयुक्त राष्ट्र) की एक रिपोर्ट के अनुसार “दुनिया की 98 प्रतिशत पूँजी पर पुरुषों का कब्जा है. पुरुषों के बराबर आर्थिक और राजनीतिक सत्ता पाने में औरतों को अभी हज़ार वर्ष और लगेंगे.” पितृसत्तात्मक समाजों के अब तक यह पूँजी पीढ़ी-दर-पीढ़ी पुरुषों को पुत्राधिकार में मिलती रही है, आगे भी मिलती रहेगी. आश्चर्यजनक है कि श्रम के अतिरिक्त मूल्य को ही पूँजी माना जाता है, मगर श्रम की परिभाषा मे घरेलू श्रम या कृषि श्रम शामिल नहीं किया जाता. परिणामस्वरूप आधी दुनिया के श्रम का अतिरिक्त मूल्य यानी पूँजी को बिना हिसाब-किताब के ही परिवार का मुखिया या पुरुष हड़प कर जाते हैं. उत्तराधिकार कानूनों के माध्यम से पूँजी और पूँजी के आधार पर सम्पत्ति, समाज, शिक्षा, न्यायपालिका और राजसत्ता पर मर्दों का कब्ज़ा है. आदिम स्त्री ऐतिहासिक प्रक्रिया से होते हुए ही वर्तमान स्थिति तक पहुँची है. जाहिर है कि पूँजी पर पुत्राधिकार  और विवाह संस्था में कैद स्त्री के सामने पुरुष वर्चस्व के विरुद्ध लड़ाई बहुत लम्बी और पेचीदा है.

क्या दैहिक शुचिता की अवधारणा स्त्री के खिलाफ कोई साजिश है ?
निसंदेह अक्षत योनि की कामना और वैध संतान की सुनिश्चितता के लिए स्त्री देह पर ‘पूर्ण स्वामित्व’ तथा नियंत्रण बनाए रखने की ही साज़िश है- यौन-शुचिता, पवित्रता, सतीत्व, नैतिकता या मर्यादा. तथाकथित महान भारतीय सभ्यता,संस्कृति, धर्म ग्रन्थ और परम्परा हमेशा सिर्फ स्त्रियों को ही शील, संयम, मर्यादा, नैतिकता, आदर्श और देह शुचिता के पाठ पढ़ाती रही है. सहमती से सम्भोग की उम्र सीमा 18 साल तय करने के पीछे भी यही अवधारणा रही है. इन संस्कारों की सीलन अभी भी मौजूद है, सो बदलते समय और समाज में महिलाओं को इससे मुक्त हो कर ही अपनी भूमिका निभानी होगी.

समाज  के सन्दर्भ में शुचितावाद और वर्जनाओं को किस तरह परिभाषित किया जाए।
सच तो यह है कि समाज के सन्दर्भ में “शुचितावाद और वर्जनाओं” को भी उन्ही  मौजूदा दोहरी सामजिक नैतिकता और चरित्रहीन मानसिकता में देखना होगा, जिनके अनुसार यौन संबंध ‘वैवाहिक पार्टनर’ के बीच ही ‘नैतिक’ है, बाकी सब ‘अनैतिक’. हालांकि कानून का ‘नैतिकता’ या ‘अनैतिकता’ से कोई लेना-देना नहीं है. आपसी सहमती से दो बालिग स्त्री-पुरुष के बीच विवाह-पूर्व यौन सम्बन्ध भले ही ‘अनैतिक’ माने-समझे जाते हों, मगर कानूनन कोई अपराध नहीं है.
‘व्यभिचार’ (धारा-497 आई.पी.सी.) सम्बन्धी कानून के अनुसार पुरुष (भले ही विवाहित हो) किसी भी अविवाहित, विधवा या तलाकशुदा स्त्री (स्त्रियों) के साथ सहमती से यौन रिश्ते (आप कहते रहें ‘अनैतिक’) बना सकता है। आपसी सहमती से दूसरे पुरुष की पत्नी के साथ यौन संबंध ‘व्यभिचार’ है (अगर उसके पति की सहमति या मिलीभगत नहीं है) लेकिन यदि पति (मालिक) भी सहमत हो तो, यह कोई अपराध नहीं। यानि आपस में पति-पत्नियाँ बदलना विधान-सम्मत है.
हालांकि ‘व्यभिचार’ एक मायने में स्वेच्छा से ‘सहमती’ नहीं, मानसिक अनुकूलन के बाद ‘बलात्कार’ ही है. पुरुष विवाह संस्था से बाहर जब चाहे ‘व्यभिचार’ करे, मगर पत्नी को पति या उसकी प्रेमिका के विरुद्ध आपराधिक शिकायत करने तक का अधिकार नहीं. इस आधार पर वह  तलाक लेना चाहे तो ले सकती है, बशर्ते कि प्रामाणित कर सके. यही वो कानूनी संरक्षण है जिसकी छत्रछाया में देह व्यापार फल-फूल रहा है. वर्जित समलैंगिक संबंधों को भी अपराध-मुक्त करने के लिए, सुप्रीम कोर्ट से लेकर संसद तक बहस जारी है. कभी भी ‘अध्यादेश’ जारी हो सकता है. कानूनी जाल-जंजाल में, ऐसे और भी बहुत से प्रावधान हैं मगर उन पर फिर कभी…..

बाल विवाह की ‘सामजिक कुप्रथा’ अभी भी जिन्दा है. समाज ही नहीं, बाकायदा कानून-विधि-विधान में फल-फूल रही है. वर्तमान कानून के अनुसार विवाह के लिए लड़के की उम्र 21 साल और लड़की की उम्र 18 साल होनी चाहिए, पर यदि कोई 18 साल से कम उम्र का लड़का, 18 साल से कम उम्र कि लड़की से विवाह करे, तो ना कोई कानूनी जुर्म है और ना कोई सजा. 18 साल से कम उम्र की लड़की से विवाह दंडनीय अपराध है (अगर लड़का 18 साल से बड़ा हो) और सहमती से यौन सम्बन्ध बनाने  की उम्र भी 18 साल है, मगर 15 साल से बड़ी उम्र की अपनी पत्नी से जबरदस्ती यौन सम्बन्ध ‘बलात्कार’ नहीं.
भारतीय कानून-विधान-संविधान पत्नी से ‘बलात्कार का कानूनी लाइसेंस या अधिकार’ और समाज ‘बलात्कार की संस्कृति’ को बढ़ावा देता है. विवाहित स्त्री की स्थिति “घरेलू गुलाम’ या ‘यौन दासी’ से बेहतर नहीं. स्त्री देह शोषण के लिए विवाह और वेश्यावृति की जड़ें तो भारतीय समाज की महान सभ्यता और संस्कृति का स्वर्णिम अध्याय माना जाता है. विवाह संस्था में स्त्री, पति की ‘निजी संपत्ति’ है और वेश्यावृति के प्राचीनतम धंधे में स्त्री ‘सार्वजनिक संपत्ति’. देवदासी से लेकर आधुनिकतम ‘एस्कॉर्ट्स’ तक, यह मर्दों का ‘आनंद बाज़ार’ ही नहीं ‘व्यवसाय भी है. हालांकि वेश्या या ‘काल-गर्ल’ से यौन सम्बन्ध बनाना, भले ही ‘अनैतिक’ बताया जाता है, मगर पुरुष ग्राहक पर कोई अपराध नहीं. पकड़ी गई तो वेश्या को ही जेल जाना होगा.
ऐसे आधे-अधूरे और गड्ढे भरे कानूनों से ना तो ‘बाल विवाह’, ‘बाल तस्करी’, ‘बाल वेश्यावृति’ को रोका जा सकता है और ना ही स्त्री विरोधी हिंसा या यौन हिंसा को. वैधानिक प्रावधानों में अंतर्विरोधी और विसंगतिपूर्ण ‘सुधारवादी मेकअप’ से, स्त्री के विरुद्ध हिंसा कम होने की बजाये बढ़ी है, बढती रही है और बढती रहेगी। ऐसे में सामाजिक नैतिकता और शुचिता या वर्जना को भी नए सिरे से परिभाषित करना होगा.

यदि स्वयं के लिए वर्जनाओं का  निर्धारण  स्वयं स्त्री करे तो क्या हो? 

वर्जनाओं का स्वयं निर्धारण करने वाली शहरी, शिक्षित, साधन संपन्न स्त्री (बागी  नायिकाओं) का निर्णय हमारे सामने है कि “हम देह नहीं सिर्फ देह की (कामुक-उतेजक) छवि बेच रही हैं, जो सचमुच देह बेचने या गुजारे के लिए विवाह बंधन में बंधने से कहीं ज्यादा फायदेमंद और सम्मानजनक है”. सह जीवन में भी वह अपनी स्वतंत्रता, प्रेम, इच्छा, आकांक्षा और सपने को ही अभिव्यक्त कर रही है. विशेषकर आज़ादी के बाद शिक्षा-दीक्षा के कारण स्त्रियाँ निरंतर बदली हैं, बदल रही हैं, मगर यह भी मत भूलें कि देश की अधिकांश ‘आधी आबादी’ अभी भी अशिक्षित, निर्धन और अधिकारहीन हैं….दलित और आदिवासी हैं.
अधिकांश भारतीय पुरुष या ‘मर्द’ अपनी मानसिक बनावट-बुनावट बदलने को तैयार नहीं है. उनके लिए यह सत्ता से भी अधिक, लिंग वर्चस्व की लड़ाई है. राष्ट्रीय स्तर पर हम लोकतांत्रिक देश के नागरिक हैं, जिन्हें संविधान के तहत तमाम मौलिक अधिकार प्राप्त हैं. लेकिन घर में तो अभी भी मुखिया की तानाशाही चलती है, गाँव में ‘खाप’ का हुकुम चलता है और ‘सभ्य समाज’ हरदम स्त्री पर ‘स्टेनगन’ ताने रहता है. समानता के संघर्ष में स्त्रियों का दबाव-तनाव बढ़ता है, तो कुछ ‘कॉस्मेटिक सर्जरी’ की तरह नए विधि-विधान बना दिए जाते हैं और कुछ और सुधारों के सपने दिखा दिए जाते हैं.

विवाह की व्यवस्था में स्त्री  की मनोवैज्ञानिक ,सामाजिक एवं आर्थिक स्थितियां कितनी स्त्री  के पक्ष में  हैं?  
इस संदर्भ में दहेज़, दहेज़ हत्या, हत्या, आत्महत्या, घरेलू हिंसा और मानसिक उत्पीड़न के आंकड़े   बताने-गिनानें की जरूरत नहीं है. जैसा मैंने पहले कहा कि उत्तराधिकार के लिए ‘वैध संतान’ और ‘वैध संतान’ के लिए ‘वैध विवाह’ होना अनिवार्य है. मौजूदा उत्तराधिकार कानून और विवाह व्यवस्था का कारगर विकल्प तलाशे बिना, स्त्री की सामाजिक और आर्थिक स्थिति में कोई आमूल-चूल बदलाव होना असंभव है. स्त्री के लिए विवाह संस्था सचमुच एक ऐसा कारागार है, जिससे भागना नामुमकिन और भागो तो संगीन अपराध. तमाम विधि शास्त्र पुरुषों ने अपने ही   पक्ष में गढ़े है. वैवाहिक पुनर्स्थापना ( Restitution of conjugal rights) से लेकर विवाह विच्छेद तक सारे कानून, स्त्री के खिलाफ इतने हत्यारे शब्दों में रचे-बसे हैं कि सालों कोर्ट-कचहरी करने के बाद भी समझना मुस्किल है.
अंतरजातीय और अंतर्धार्मिक विवाहों में तो हालात और जटिल हैं. भारत की संसद ने ‘विशेष विवाह अधिनियम,1954’ बनाया, जिसमें अलग अलग धर्म से सम्बद्ध दो वयस्कों के विवाह का प्रावधान है, जिसमें जरूरी नहीं कि कोई स्त्री या पुरुष अपना धर्म बदले। मगर इस कानून में आज भी यह प्रावधान है कि अगर कोई अविभाजित हिन्दू परिवार का सदस्य गैर धर्म के व्यक्ति से विवाह करता है, तो विवाह के फ़ौरन बाद उसके अविभाजित हिन्दू परिवार से सारे सम्बन्ध समाप्त माने जायेंगे। संपत्ति में अगर कोई हिस्सा बनता है तो ले लो, लेकिन सदा के लिए दफ़ा हो जाओ। हम (हिन्दू) अपने परिवार में, गैर धर्म की बहू या दामाद को स्वीकार नहीं कर सकते और नहीं करेंगे। भारत बना रहे, ‘धर्म-निरपेक्ष’ और ‘लोकतांत्रिक’ देश।

मातृसत्तात्मक व्यवस्था में विवाह-संस्था क्या अधिक  सुदृढ़ और समर्थ होती। तब  समाज भ्रूण हत्या, दहेज़ हत्या एवं बलात्कार जैसे  अपराधों से कितना मुक्त होता? 
नहीं… मातृसत्तात्मक व्यवस्था में भी पूँजी का नियंत्रण मर्दों के ही हाथ में (रहता) है. बीना अग्रवाल की पुस्तक ‘ए फील्ड ऑफ़ ओन’ पढ़ कर देख लें. इस संदर्भ में यह किताब दक्षिण एशिया के देशों के में महिलाओं की आर्थिक स्थिति के बारे में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है. सामजिक-आर्थिक-राजनीतिक सत्ता पर, वहाँ भी पुरुषों का ही कब्जा और कानून लागू है. संसद और विधान सभा में मर्दों का बहुमत है, सो वो ऐसा कोई कानून नहीं बनायेंगे, जो उनकी जड़ों में मट्ठा डालने का काम करे. ‘महिला आरक्षण विधेयक’- अभी नहीं, कभी नहीं. सारे कानून मर्दों के हितों और वर्चस्व को बनाये-बचाये रखने वाले ही बने-बनाये गए हैं. हालांकि उपरी तौर पर ढिंढोरा यह पीटा जाता है कि ‘स्त्री सशक्तिकरण’ के लिए, संसद और विधान ने ना जाने कौन-कौन से विधेयक पारित किये है. वास्तविकता यह है कि दांपत्य में यौन संबंधों के बारे में सदियों पुराने कानून, सामंती सोच और सीलन भरे संस्कारों में, कोई बदलाव नहीं हो पा रहा। मालूम नहीं इस सवाल पर सबने, क्यों ‘मौनव्रत’ धारण कर लिया है।
मातृसत्तात्मक व्यवस्था वाले राज्यों में भी अपराधियों का राजनीतिकरण और राजनीति का अपराधीकरण बढ़ गया है. राजनीति में वहां भी, स्त्रियाँ परिधि पर हैं और निर्णायक स्थलों पर उनकी भूमिका गौण ही है. वर्तमान दहशतज़दा माहौल में यौन हिंसा की शिकार औरत की चीख, आखिर कौन और कब सुनेगा? मेरे विचार से स्त्री के दमन, उत्पीड़न और शोषण के खिलाफ़ कानून बनने-बनाने में सबसे बड़ी बाधा है- राजनीति और सत्ता में ‘मर्दवादी’ नेताओं की षड्यंत्रपूर्ण चुप्पी और अपने अधिकारों के प्रति स्त्री आन्दोलन के दिशाहीन भटकाव. 67 साल से दमित, शोषित और पीड़ित आत्माओं की चीत्कार, न संसद को सुनाई देती है और न ही सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच पाती है। इसे ‘आधी दुनिया’ का दुर्भाग्य कहूं या अपने ही पिता-पति और पुत्र का सुनियोजित षड्यंत्र?

सह जीवन की अवधारणा क्या स्त्री के पक्ष में दिखाई देती है। 
सह-जीवन मौजूदा कानूनों के जाल-जंजाल से बचने के विकल्प के तौर पर ही अपनाया      गया लेकिन इसके अपने अंतर्द्वंद और विसंगतियां हैं. विवाह संस्था में सड़ते संबंधों और घुटन की वजह से ही ये नई पगडंडियाँ विकसित हुई हैं. सहजीवन की अवधारणा स्त्री के पक्ष में कितनी कारगर सिद्ध होगी अभी कहना मुश्किल है. यह सही है कि फिलहाल संकट टालने के लिए संसद ने “घरेलू हिंसा अधिनियम” में इसे स्वीकार कर लिया, लेकिन समाज ही नहीं बल्कि सर्वोच्च न्यायालय तक, समय-समय पर विरोधी मुद्रा अपनाता रहता है और सहजीवन में स्त्री और बच्चों की वैधानिक स्थिति, विवाह में पत्नी और बच्चों की वैधानिक स्थिति के बराबर मानने को तैयार नहीं है. इस संदर्भ में आये निर्णय बेहद विवादास्पद है. उपनिवेशों को सम्पूर्ण रूप से मुक्त ना होने देने के हर संभव प्रयास किये जा रहे हैं. धार्मिक, साम्प्रदायिक, जातीय और सांस्कृतिक पहचान के संकट और संघर्ष भी निरंतर गहरा रहे हैं.
धार्मिक आस्थाओं और विश्वास की नींव पर निरंतर बढ़ रहे उन्माद और हिंसक माहौल में सहजीवन का हार्दिक स्वागत कैसे हो सकता है? ‘धर्म का सवाल’ अभी भी बहुत से ‘अगर-मगर’ और ‘किन्तु-परन्तु’ से बुरी तरह घिरा हुआ है। जन्म से लेकर अंतर्धार्मिक विवाह, गुजाराभत्ता, बच्चों की द्त्तकता, संरक्षता, उत्तराधिकार, नौकरियों में आरक्षण और धर्मांतरण तक, धर्म के बन्धनों से मुक्ति के यक्ष प्रश्न समाप्त नहीं हुए। दरअसल ऐसे ‘विद्रोही स्वर’ को लेकर संविधान और समाज के बीच पसरे अन्तर्विरोध और विसंगतियां, रोज़ नए भेष-भूषा में नज़र आयेंगे। सहजीवन में भी रही या रह रही स्त्री के विरुद्ध हिंसा, यौन हिंसा, उत्पीड़न, शोषण और अत्याचार किसी भी मायने में कम होने की बजाय बढ़ा ही है. ऐसे में स्त्री पहले से अधिक अकेली खड़ी दिखाई देती है, क्योंकि घर छोड़ने के बाद परिवार भी साथ नहीं देता.
संयुँक्त परिवार लगभग टूट चुके हैं, एकल परिवार गंभीर संकट में हैं, युवा रक्त सहजीवन में नव परिवार और प्रेम की सहज अभिव्यक्ति के साथ अपने सुखद भविष्य या विकल्प की खोज में लगा है. कारण स्पष्ट है कि विवाह और तलाक़ सम्बन्धी एक तरफ़ा कानून स्त्री को सुरक्षा कम देते हैं, भयभीत ज्यादा करते हैं. उम्र से लम्बी, उबाऊ-थकाऊ और घर बिकाऊ ‘कोर्ट-कचहरी’ से हैरान-परेशान स्त्री-पुरुष, निश्चित रूप से एक नए समाज की संकल्पना करेंगे…कर रहे हैं. यहीं से व्यक्ति, परिवार और समाज के बीच आपसी टकराहट शुरू होती है, जो सांस्कृतिक क्रांति को जन्म देगी.
8. साथ होकर भी पुरुष एवं स्त्री की स्वतंत्र परिधि क्या है।
कैसे बताऊं- समझाऊं कि जिस समाज में आये दिन (दलित) महिलाओं को कहीं न कहीं निर्वस्त्र घुमाया या जिंदा जलाया जाता हो, धमकाया जाता हो, जबरन वेश्या बनाया जाता हो, धर्म के नाम पर बहलाया- फुसलाया जाता हो, बेटियों को गर्भ में ही मरवाया जाता हो, भेड़-बकरियों की तरह खरीदा-बेचा जाता हो और  खाप पंचायतों के आदेश-अध्यादेश पर प्रेमी युगलों को पेड़ों पर लटकाया जाता हो- वहाँ पुरुष और स्त्री की स्वतंत्र परिधि क्या हो सकती है.
हां! शिक्षित-समृद्ध-साधन-सम्पन्न और कुछ अति-आधुनिक शहरी औरतों को थोड़ा आजाद  माना-समझा जा सकता है, जिनकी पहुंच ‘ऊपर तक’ है. मगर देश की उन आम औरतों का क्या, जिनकी व्यथा-कथा सुनने वाला कोई नहीं. अफसोस कि अधिकांश प्रतिभाशाली और क्रांतिकारी संभावनाओं को,  सत्ता संस्थानों ने खरीद लिया हैं या राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पूंजी की गुलाम या पेशेवर दलाल बना दिया हैं.
लेकिन धीरे-धीरे स्त्री ने इसे सड़क से संसद और सर्वोच्च अदालत तक, भरपूर चुनौती देते हुए तोड़ना शुरू कर दिया है. उसने अपने आप को “मर्दों के पाँव की जूती”, बनने-मानने से मना कर दिया है. तमाम अवरोधों और सीमाओं के बावजूद, वह “स्त्री उपेक्षिता” नहीं, बल्कि खुद अपने आप को तलाशती-तराशती रही है. पुरुषों की “यौन राजनीती” के चक्रव्यूह को भेद ध्वस्त करती रही है. स्त्री- देह, धरती या योनि नहीं है, इसलिए ‘वसुंधरा’ और ‘बीज’ के अंतर्संबंधों की प्रक्रति, नए सिरे से गढ़ी जा रही है. यौन शोषण-उत्पीड़न और दमन के खिलाफ़ लामबंद हो, पुरजोर विरोध (विद्रोह) करती रही है. भ्रूण हत्या, दहेज़ हत्या, हत्या, यौन हिंसा, घरेलू-हिंसा से लेकर यौन शोषण और अन्याय के विरुद्ध, इंसाफ़ की तलाश में निर्णायक स्त्री-संघर्ष लगातार मुखर होता जा रहा है. ‘चुप्पी का षड्यंत्र’ या “षड्यंत्र की चुप्पी’ निरंतर टूट-फूट रही है. अपने कानूनी और मानवीय अधिकारों के प्रति सचेत-सजग और जागरूक होती ‘मानुषी’ सिर्फ अपने अस्तित्व की ही नहीं, बल्कि अस्मिता की भी लड़ाई लड़ती रही है.
यह सच है कि जैसे-जैसे स्त्री का विरोध-विद्रोह बढ़ रहा है, वैसे-वैसे पुरुष अधिक हिंसक और हत्यारा होता जा रहा है. स्त्री के विरुद्ध पुरुष जितना हिंसक और हत्यारा हो रहा है, स्त्री का “घरे-बाहिरे” प्रतिरोध-प्रतिशोध भी उतना ही बढ़ रहा है. मैं इसे ‘वस्तु से व्यक्ति बनती’ औरतों की “मौन क्रांति” मानता हूँ, जो सतह पर कम मगर समाज में भीतर-ही-भीतर ज्वालामुखी की तरह फैल रही है. कहना कठिन है कि संरचना की इस ऐतिहासिक प्रक्रिया में ज्वालामुखी, कब-कहाँ और कैसे नज़र आएगा. ‘स्त्री मुक्ति का सपना’, हर स्तर पर बराबरी और इन्साफ का ही सपना है.

किले में समंदर : आखिरी किस्त

रोहिणी अग्रवाल

रोहिणी अग्रवाल स्त्रीवादी आलोचक हैं , महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं . ई मेल- rohini1959@gmail.com

( रोहिणी अग्रवाल की यह अभिव्यक्ति अतीत से वर्तमान और वर्तमान से अतीत की आवाजाही है , स्वप्न -कल्पना और यथार्थ के परस्पर गुम्फन के साथ . स्त्री के संघर्ष और पीड़ा तथा मुक्ति के अहर्निश अभियान की कथा पढ़ें दो किस्तों में  : आखिरी किस्त  ) 


पहली किस्त के लिए क्लिक करें : किले में समंदर : पहली किस्त 

मैं किश्ती लेकर अपने भीतर की गहराइयों में उतर गई हूं। दादी मेरे संग चलेगी। कृशता और उम्र के भार से झुकी दादी बार-बार मेरे कोरे पन्नों को चाव से सहलाया करती थी। ”तेरी तरह पढ़ी-लिखी होती तो अपने जीवन की कहानी इन पन्नों पर उतार देती।”


”तुम्हारे जीवन में क्या है दादी – हर डेढ़ साल बाद का अनिवार्य जापा, चूल्हे की धुंआती आग, रोटियां बेलने और बच्चे पालने में घुलती हर सुबह-सांझ! इनसे आत्मकथाएं नहीं बनतीं दादी! आत्मकथा लिखने के लिए जिंदगी एक बड़े कॉज को समर्पित करनी पड़ती है।” मैं अभिमान में उद्धत छोकरी! तुरत-फुरत भागने को तैयार!
दादी लम्बी सांस खींच कर मुझे रोकने और बात करने की ताकत बटोरतीं – ”फिर मेरे पास रोज की चख-चख में ही कहने को इतना कुछ क्यों है? क्यों चूल्हे की आग कलेजे में भी जलती है? पकता रहता है कुछ भीतर ही भीतर। पक-पक कर जल जाता है – तप कर बुझे तंदूर की राख में राख होती जली रोटी के ढेर सा।”

दादी के संग कोई है। पंजाबी सुथ्थण, लम्बी कमीज और भारी सा दुपट्टा। पांव में बेढब जूती। ऊँची-लम्बी जट्टणी कद काठी। चेहरा ताम्बई लाल – ओज-आक्रोश, पीड़ा-अपमान, संघर्ष-जिजीविषा के विविध रंगों से तैयार! सुलगती चिंगारियों के बावजूद आंखों में ठंडक देता अपनापन। खासी तेजस्वी महिला।
”यह निम्मो है।” दादी ने मेरी आंखों में झांकते अपरिचय को पढ़ लिया, ”निम्मो! मेरी सहेली! पहली बार मिली तो लगा यह मेरी जुबान ही नहीं, चुप्पियों को भी समझती है। समझती है मेरी कसक, मेरे सपने, छलांग की लंबाई और ऊँचाई . . . ”
”छलांग जो कभी लगाई नहीं तुमने।” निम्मो ने तरेरा।
”लगाने ही नहीं दी किसी ने।” दादी मिमियाई।

रुख्मा बाई 

निम्मो की तरेरे में नेह की नदियां थीं। दादी मुस्काई -”तुमसे हारती हूं बाबा! तब उस जमाने में भरी जवानी के दिनों मिली होतीं तो तुम्हारी संगत में अपनी जिंदगी के सफे पर अपने ही हरफ लिखती। तुम्हारी तरह।” दादी बेहद उत्साहित भाव से मेरी ओर मुखातिब हुई, ”जानती हो, निम्मो ने वही सब लिखा है जो मैं लिखना चाहती रही ताउम्र। तुम तो इतना पढ़ती रहती हो। निम्मो की किताब भी पढ़ी होगी न।”
”निम्मो की किताब. . . . कौन निम्मो? कौन सी किताब?” मैं परेशान। दादी की सहेली और लेखिका!
”अरे, किताब-विताब कहां? जो सोचा, लिख दिया। भाषा तो थी नहीं, सिर्फ आग थी। कलेजे में ढांप कर रखने की बजाय बाहर उगल दी। जलना तो दोनों ही सूरतों में था।”
”आपकी किताब . . . ?” मैं अदब और आश्चर्य से अभिभूत!
”सीमंतनी उपदेश।”
”सीमंतनी उपदेश???” मेरी सांस धौंकनी सी। स्त्राी-गीता की व्यास सामने और मैं परिचय मांग रही हूं? ये दादी भी न! तब से निम्मो-निम्मो की रट लगाए है।। कोई धोखा न खा जाए तो क्या करे?
”आप अज्ञात हिंदू महिला हैं न
”मूर्ख लड़की।” दादी ने फटकारा, ”अज्ञात हों इसके दुश्मन। यह निम्मो है।”
निम्मो मेरे बचाव में आगे आईं। ”हां, तुम लोग मुझे अज्ञात हिंदू महिला कहते हो। पुन्नी ने मुझे निम्मो नाम दिया है।”
अब यह पुन्नी कौन? एक और पहेली।
”पुन्नी। पूनम। तुम्हारी दादी।”
”ओ!!! दादी, तुम्हारा नाम पूनम है? मुझे तो पता ही नहीं था।”
”औरतों के नाम खुद औरतों को याद नहीं रहते। उनसे नाम छीन लिए जाते हैं ताकि कोई अलग पहचान न बना सके। नामविहीन व्यक्ति चेहराविहीन हो जाता है पहले, फिर भावहीन, विचारहीन, व्यक्तित्वहीन। औरत की पहली लड़ाई अपना नाम पाने की होनी चाहिए। पद नहीं, विशेषण नहीं, नाम! अपनी अलख जगाता, धूनी रमाता नाम!”

अज्ञात हिंदू महिला सॉरी निम्मो अब कितना संयत होकर बोलती हैं। ‘आवेश लड़ाई का ऐलान करने के लिए जरूरी होता है। लेकिन बाद में निर्माण और प्रबंधन के लिए विवेक और संवेदना, व्यावहारिकता और सर्जनात्मकता की ही जरूरत होती है।”
”मैं बीजी कहूं आपको?” मेरे मुंह से बस इतना ही निकला। आदर का अतिरेक। उन्होंने मेरा मस्तक चूम लिया तो मैं हुलस कर वाचाल हो गई -” बीजी, आजकल हम औरतों ने अपना नाम पाने की लड़ाई जीत ली है। बीवी और मां बन कर अब हम अपना नाम नहीं खोतीं। वंशवृक्ष में भी हम हैं और कानूनी दस्तावेजों में भी।”
”लेकिन बेटा, तुम्हारे हरियाणा की पंचायतों में जो कबीलाई संस्कृति घुस आई है, वह तो ऐसा कुछ नहीं कहती। उससे करोगी दो-दो हाथ? जान लो, हठ को हिंसा से नहीं जीता जा सकता, न ही प्रेम को दंड से दबाया जा सकता है। औरत के हकों की बात करते हुए मर्द के अस्तित्व, स्थिति और प्रतिशोधात्मक खिसियाहट को नजरअंदाज कभी न करो। मैं करती थी ऐसा अपने दिनों में। प्रताड़ित-दमित थी न! सो लगता था तमाचे के जवाब में झन्नाटेदार तमाचा न मारा तो दर्द को पचाऊँगी कैसे? लेकिन औरत क्या अपनी दुनिया में सिर्फ औरत ही चाहती है?”

नहीं! दुविधा की कोई गुंजाइश नहीं। औरत नहीं चाहती निखालिस मर्द या औरत की दुनिया। वह चाहती है इंसानी दुनिया – एक दूसरे के प्रति आदर, विश्वास और प्यार की दुनिया।
”बीजी, क्या ऐसी दुनिया संभव है? सम्बन्धों की रूढ़ संरचनाओं को बदलती बहिश्ती दुनिया?”
”हां, और इसे जमीन पर लाओगी तुम। तुम्हारी पीढ़ी। तुम्हारी पीढ़ी की संतति। अपने चिंतन को अनुभव से सान कर, दर्प की बर्फ को विवेक की मद्धम आंच से गला कर तुम्हें ही नव-संस्कारित करना है समाज। तुम लोग ही हो हमारे समाज की रमाबाई। रख्माबाई।”

मैं सकुचा गई। मैं – आत्मनिर्भर, सुशिक्षित, चिंतनशील जाग्रत स्त्राी! फेमिनिस्ट! क्या अपने ही स्वार्थ की परिधि में घूमते-घूमते अपने से भिन्न स्त्री  समाज से बहुत कट नहीं गई हूं? क्या बोली-बानी, चाल-पोशाक के मोटे-बारीक फर्क के आधार पर मैंने स्त्रियों की कई कोटियां नहीं बना लीं? और कई-कई-कई कोटियों पर ‘संवाद निषिद्ध’ की तख्ती भी। बीजी क्या मेरा दोगलापन जानती हैं? मैं भय से सिहर उठी, इसलिए आत्मरक्षा के प्रयास में बेहद आक्रामक – ”बीजी, विवाह और पति के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ कर जीतने वाली रख्माबाई क्या सचमुच पति नामधारी पुरुष की मृत्यु के बाद विधवा की तरह रहने लगीं थीं?”
”हां।” तथ्य को तथ्य की तरह कह देने की लालसा।
लेकिन मैं इसे तथ्य कैसे मान लूं? यह तो भीषण अंतर्विरोध है। रख्माबाई का रख्माबाई होना खारिज करता अंतर्विरोध। तो क्या अंतर्विरोधों से कोई मुक्त नहीं?
”न्न बेटा! अंतर्विरोध अपमान या ग्लानि उपजाती दुर्बलताएं नहीं, वैचारिक विकास के अगले सोपान पर आरूढ़ होने के बाद पीछे छूट गई अपरिपक्व भावनात्मक भ्रांतियां हैं। अंतर्विरोध व्यक्ति को खारिज नहीं करते, वक्त और व्यवस्था के साथ उसकी मुठभेड़ को दर्ज करते हैं।”
”इजाजत हो तो अपनी बात मैं खुद कहूं?” रख्माबाई को देख निम्मो बीजी और दादी खिल उठीं।
”हां, उस पति नामधारी पुरुष की मृत्यु के बाद विधवा की तरह रहने लगी थी मैं। शायद इसलिए कि हमारे यहां औरत मर्द से ब्याही नहीं जाती। ब्याही जाती है सपने से जो सिंदूर बन कर उसकी जिंदगी की रवानगी को गिरफ्त में ले लेता है। औरत पैर टिकाने के लिए आधार चाहती है। पति का नाम उसे आधार देता है। पति का नाम लेकर औरत मर्द को नहीं, भावनात्मक सम्बन्ध को थामे रहना चाहती है।”
मैं मानने को राजी नहीं हुई।

रख्माबाई आजी की बात शायद खत्म नहीं हुई थी। ”बड़ी-बड़ी कानूनी लड़इयां लड़ना आसान है बेटा। आपके पास वैचारिक और नैतिक बल होता है। नया वक्त रचने और क्रांति करने का जनूनी जज्बा भी। शिकस्त को मुंह चुरा कर नौ दो ग्यारह होना ही पड़ता है। लेकिन अपनी ही संस्कारग्रस्तत से लड़ना आसान नहीं होता। दरअसल संस्कारों में पैठा दुश्मन दिखाई ही नहीं देता। वह खून और सांस बन कर रग-रग में दौड़ता है। जो जीने की शर्त हो, उसी पर जानलेवा प्रहार कैसा?”
”सिर कलम करके ही दुश्मन को हमेशा जीता नहीं जाता। उसे पालतू बना कर भी राह से हटाया जा सकता है।” यह शिवरानी देवी थीं।
”अम्मा!” मैं लाड़ से उनके कंधे पर झूल गई।
”बेहद उद्दंड औरत हूं मैं। खासी दबंग। इसलिए बहनो, मेरी बात का बुरा न मानना। लेकिन एक बात जरूर कहूंगी, औरत हो या मर्द, अपने को जीते बिना संसार को जीतने का सपना देखना निरा पागलपन है।”
सबने सहमति में सिर हिला दिए।
”अपने को जीतना माने अपनी कमजोरियों और विकारों को दूर करना। अंत तक औरत या मर्द बने रह गए तो इंसानी समाज की बात करना बेमानी हो जाएगा। औरत न मर्द, सिर्फ इंसान – अपने तईं मैं इतनी सी बात जानती हूं, बस।”
मैं शिवरानी देवी की उद्दण्डता की मुरीद! औरत की उद्दण्डता यानी साफगोई और निर्भीकता।
”अम्मा, क्लास में जब मैं सूरदास का बाल-लीला वर्णन पढ़ाती हूं तो खीझ उठती हूं। मुख पर दही और गात पर मिट्टी का लेप करके नहलाया-धुलाया बच्चा घर लौटे तो मेरे हृदय में ममता के सोते नहीं फूटते। बाद में जो करूं सा करूं, पहले जम कर धुनाई जरूर करूंगी।”

‘यह है स्त्री  पर छवियों का आरोपण।” जाने कब से रमाबाई हमारी बातें सुन रही थीं। ”स्त्री  की भरपूर ठोस लौकिक स्वतःस्फूर्त इयत्ता को क्षरित कर किन्हीं महिमामंडित दैवीय अमूर्तनों में बांधने की क्रमिक प्रक्रिया है स्त्राीत्व की रचना। खंडों में विभाजित स्त्राी अपूर्ण, निर्भर और अडोल रहे; हृदय, बुद्धि, गति और कर्मठता को जोड़ कर किसी एक दिशा की ओर प्रयाण न कर सके। स्त्राी की तेजस वैयक्तिक अस्मिता की हत्या कर स्त्राीत्व उसे लैंगिक इकाई बनाता है – पुरुष की परिक्रमा मेें जीवन पाती लैंगिक इकाई। मातृत्व, सतीत्व, गृहिणहत्व – स्त्रीत्व  की संरचनाएं। स्त्री को  छलती प्रवंचनाएं।”
इसलिए तो पसंद हैं शिवरानी देवी मुझे। स्त्रीत्व  की रूढ़ छवियों को ओढ़-बिछा कर कातर भाव से रोती-बिलखती नहीं वे। ताल ठोंक कर उन्हें चुनौती देती हैं।
”मैंने तो भई कह दिया था, पूत कपूत तो क्या धन संचै, पूत सपूत तो क्या धन संचै। अपने पैरों पर खड़े होने का माद्दा नहीं हुआ लड़कों में तो समझ लूंगी ये मेरे बच्चे हई नहीं।”
”सचमुच, यशोदा को ऐसी पटकनी दी आपने कि . . .” मुझे खूब मजा आता है इस प्रकरण को सुन-गुन कर। शयद इसलिए कि परंपरानुमोदित अच्छी मां न हो पाने का अपराध बोध घुल जाता है कहीं। मैं मां हूं, लेकिन मेरा मातृत्व दूध की फुहारों से भीगा नहीं है। वह पुचकार और फटकार दोनों को जरूरी महत्व देता है। मेरा आंचल दुनिया भर की बदमाशी करके पनाह मांगते बेटे की सीनाजोरी ढांपने के लिए परदा बनने से इंकार करता है। मैं उसे जिम्मेदार नागरिक बनाना चाहती हूं। धूप-ताप, आंधी-पानी झेल कर जमीन के अंदर ही अंदर जड़ों का सख्त जाल फैलाते चले जाने और विनम्र छायादार ढंग से अपनी भूमिका निभाते चले जाने वाला जिम्मेदार नागरिक। ममता की तरलता जितनी जरूरी है, बस उतनी ही दूंगी। जानती हूं ज्यादा नमी से कच्ची जड़ंे गल जाया करती हैं।

”सूरदास के जरिए मुझे जानने का दावा करोगी तो सच से हमेशा दूर रहोगी। दूसरा व्यक्ति आपको समग्रता में चीन्ह ही नहीं सकता। वह उतना ही देखता है, जितना चाहता है, और उतना ही पेश करता है जिससे उसके वर्चस्व पर आंच न आए।” यशोदा हांफती-हांफती वहां आई, ”अभी जल्दी में हूं, इसलिए जा रही हूं, लेकिन इतना भर जान लो कि छवियों में कैद औरत की सुनवाई के लिए कहीं कोई अदालत नहीं। रिहाई की उम्मीद किससे करे वह?”
”अरे!” मुझे मानो सांप सूंघ गया।
”मैं मां होने से इंकार नहीं करती, लेकिन मेरा मातृत्व मेरे ‘मनुष्य’ होने को क्यों निगले? मैं मनुष्य रूप में अखंड, समग्र क्यों न पढ़ी-गुनी जाऊँ? क्यों नहीं क्लास में सूरदास की नजर से मुझे देखने की बजाय मेरी पीड़ा को अपने भीतर जीतीं तुम? तब करना मेरे और अपने युग की सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था की पड़ताल। फिर निकालना निष्कर्ष। पुराने से असंतुष्ट होकर खीझा जा सकता है। उसे बदलने के लिए नया नजरिया पैदा करना ही होगा।”

”ठहरो।” यशोदा को बांह पकड़ कर रोक लिया एक बंदिनी ने। ”यशोदा के साथ-साथ मेरी बात भी सुन लो। मैं  . . . सावित्राी . . . सत्यवान की परिणीता। यम से लौटा लाई पति के प्राण, राज्य, सुख, स्वत्व, संतान, भविष्य! मैं अकेली! फिर भी कहलाई अबला, परनिर्भर! मेरी अपराजेय जिजीविषा, संघर्ष-संकल्प, व्यूह रचना और रण लड़ने की कूटनीति – सब अलक्षित! अदृश्य! बना दी गई पतिव्रता पत्नी! सतीत्व का चरम! पुरुष को मौत के मुंह से लौटा लाने की जुर्रत करती स्त्राी को उन्मुक्त कैसे छोड़ दे समाज? वह हस्तक्षेप कर व्यवस्था को पलटेगी। इसलिए मैं पुरस्कृत की गई – सतीत्व में कैद करके।”

हम सब चुप रहीं। कठघरे में अकेली मैं। मेरा स्त्रीवादी  होने का दर्प क्या सिर्फ अपने को गुनने-बुनने, तराशने और समुन्न्त करने का स्वार्थपूर्ण अभियान ही है? अपने से बाहर दूसरे से न जुड़ना, न सुनना। दादी मुझे अपने साथ समूची स्त्री  जाति के तलघर में ले जाना चाहती थी लेकिन मैंने उनकी पुकार अनसुनी छोड़ दी और भटकती रही पुरुष रचित इतिहास की कंदराओं में – उनकी दृष्टि और निष्कर्षों के साथ।
”हमें सबसे पहले स्त्राी की सामाजिक-सांस्कृतिक संरचनाओं को छिन्न-भिन्न करना होगा।” गहरे दायित्व बोध के साथ मेरा अंग-अंग ऊर्जस्वी हो गया। ”छवियों से मुक्त नहीं हुई तो कैसे अपने आप को मनुष्य समझे-समझाएगी स्त्राी? कैसे आत्मानादर और भय से मुक्त होगी?”

रमाबाई और निम्मो बीजी मुस्करा दीं। मैं झेंप गई। नया क्या कह रही हूं भला? एक सदी पहले की उनकी पुकार को दोहरा रही हूं न!
”दोहराव हमेशा निरर्थक और अनुत्पादक नहीं हुआ करता। निःसंग आत्मालोचना बन कर वह व्यवधान को गति देता है और गति को निरंतरता।” रख्माबाई आजी ने मेरी पीठ थपथपा दी, ”लेकिन तुम अकेली क्यों? तुम्हारी बिट्टी कहां है?”
”आती होगी आजी। एम .एन .सी .में है न। सो रात-बिरात आने का कोई समय नहीं। ये नए-नए टैक्नोक्रैट्स – तगड़ा पे-पैकेज देखते हैं बस। वक्त और शरीर नहीं।”
”नई पीढ़ी को लेकर इतनी शंकाएं ठीक नहीं बेटी।”

”ठीक कहती हो बीजी। लेकिन शायद हम लोगों ने संवाद करके नई पीढ़ी को मूल्य और मानवीय दृष्टि दी ही नहीं। नौकरी और कैरियर की दौड़ में समय ही नहीं बचा बच्चों के लिए। उन्हें पहले क्रैच-टी .वी . के संग छोड़ा, फिर अपने संग बदहवास चूहा दौड़ में लगा दिया। वक्त को पहचानने और गढ़ने की तमीज दी ही नहीं।” मैं रुआंसी हो गई, ”बीजी, हम लोग स्पेस देने-पाने की बहुत बात करते हैं, लेकिन शायद देने और पाने की रचनात्मक परिपक्वता हममे है ही नहीं। इसलिए उन सब रूढ़ियों को गले लगा कर बैठे हैं जिनके खिलाफ आप लोगों ने जान की बाजी लगा दी थी।” मैंने पल भर को रुक कर शिवरानी देवी की ओर निहारा, ”अम्मा, गहनों से बेहद चिढ़. थी न आपको। और उससे भी ज्यादा नफरत पति की उस पुरुषवादी सोच से कि औरतें गहनों के लिए पति से लड़ती-क्लेश करती और गहने पाकर रीझती बहुत सुंदर लगती हैं।”

”हां!” शिवरानी देवी ने निम्मो बीजी के दोनों हाथ पकड़ लिए, ”तुम न होतीं बहन तो गहनों की हत्यारी भूमिका को मैं जान ही न पाती। लेकिन कितनों तक तुम्हारी बात पहुंची भला? खुद मेरे पति . . . प्रोग्रेसिव होने के बावजूद औरत को देखने का वही सामंती नजरिया। सामने जीती-जागती औरत गहनों के प्रति स्त्री -मोह के मिथ केा नकार रही है और आप हैं कि उसी को स्त्री -सत्य बना कर उपन्यास लिख रहे हैं, किस्से गढ़ रहे हैं।”
”पचास-साठ के दशक में पैदा होने वाली हमारी पीढ़ी ने भी सादगी को विरासत में पाया लेकिन आज की पीढ़ी . . . अम्मा, मुझे कहते लाज आती है, लेकिन तुम जानो, बिट्टी की आठों उंगलियों में अलग-अलग पत्थरों की अंगूठियां हैं और कानों में तीन-तीन बालियां। बाहों पर टैटूनुमा गोदने अलग से। पत्थरों से किस्मत बदल लेगी लड़की?” मैं आवेश में तन गई।

”निम्मो बीजी, जैसे आपकी साीधी-सच्ची बातों को कड़वा जान गले उतारना मुश्किल हो गया था आपके समकालीनों के लिए, वही हाल हमारे समकालीनों का भी है। आपके नाम और विचारों को निगल कर किताब को दफना दिया था उन्होंने। वैसे ही नारीवादी चेतना से भय खाकर वे स्त्राी को देह बना रहे हैं -चूम-चाट कर थूक दी जाने वाली देह। चेतना जैसी सूक्ष्म व्यंजनाओं के सामने जब दैहिक अलंकरण जैसी स्थूलताएं खड़ी हों, तब वही-वही दिखेंगी न सब ओर। और बीजी, स्तब्ध खड़ी औरत अपने से पूछ रही है कि देह मुक्ति के नाम पर दैहिक तिजारत के अधिकारों के लिए कब लड़ी वह? वह तो चाहती है देह में स्थित मस्तिष्क और हृदय, विवेक और विश्लेषण के सामर्थ्य पर अपना नियंत्राण।”

हम बिट्टी की प्रतीक्षा में हैं। आजकल उसका पति विदेश गया है। इसलिए ऑफिस से सीधे यहीं लौटेगी। सॉरी, पति नहीं, दोस्त! ब्याह नहीं किया न उसके साथ। बस, संग-संग रहते हैं दोनों – बिना किसी अपेक्षा, शर्त और समझौते के। मन मिलने तक रहेंगे संग-संग। फिर? पता नहीं।
”बच्चे? उनका भविष्य?” मैंने धड़कते दिल से पूछा था बहुत पहले।
”हू थिंक्स अबाउट दैम?” बिट्टी डिंक कल्चर में दीक्षित है। इसके बाद संवाद की क्या गुंजाइश बचती भला?
”बात-बात पर आंसू और आशंका! मुझे नहीं रुचता तुम्हारा हाहाकार! रास्ते बंद हैं तो उठो और ज्यादा ताकत लगा कर खोलो।’ शिवरानी देवी बरस पड़ीं, ”कहा न, जंग अपने से ही लडऩी है हमें और जीतना भी अपने को ही है। हमारी सबसे बड़ी बाधा हम स्वयं हैं।”
रख्माबाई मेरे पास आकर बैठ गईं। उनकी उंगली पर मेरी आंख से टपका मोती था। ”तुम लोगों से चूक कहां हुई, जानती हो?”
मैंने आहत प्रश्नाकुल दृष्टि उनकी ओर उठा दी।
”तुम लोगों ने सवाल उठाए, संदेह किए, गलत को खारिज किया। हर गलत को – व्यवस्था, समाज, व्यक्ति, सम्बन्ध, संस्कार। सिर्फ खारिज। उग्र नकार के साथ लेकिन साथ-साथ कुछ नया रचनात्मक तो गढ़ा ही नहीं। अपने दायरे तंग करता चले आदमी तो एक दिन अपने लिए भी जगह नहीं पाता। तुमने मातृत्व, पत्नीत्व, गृहिणीत्व की छवियों में खंड-खंड होने का विरोध करते हुए साबुत मनुष्य बनी रहना चाहा। बहुत ठीक। लेकिन अपने सहयोगी पुरुष – अखंड मनुष्य – से परहेज क्यों किया बेटा? दाम्पत्य और गृहस्थी – तुम दोनों का सपना है तो संयुक्त होकर साझी आंख से इस सपने को क्यों नहीं देखते? मिल कर चार हाथों से उस सपने को साकार क्यों नहीं करते तुम दोनों? नई पीढ़ी के साथ दोस्ती क्यों नहीं? अलग-अलग पालों में बंटने से प्रतिद्वंद्विता बढ़ती है, मिठास नहीं। तुम्हें साझी दुनिया बनना है क्योंकि दायित्व साझे हैं; प्रकृति और सृष्टि पर अधिकार साझे हैं।”

”और दादी अम्मा! जिंदगी हम सबकी साझी प्रयोगशाला भी तो है न।” बिट्टी लौट आई थी। उसने मेरे गले में बाहें डाल दीं, ”बात करने में परले सिरे की कंजूस मेरी मां। सारा दिन जाने किस अबूझ किताबी दुनिया में गुम। लेकिन फिर भी मैंने उनसे सीख ही लिया स्पेस और उसके सदुपयोग का विवेक।” बिट्टी ने मेरी आंखों में सीधे झांका, ”तुम परंपरा और व्यवस्था को जस का तस स्वीकारने की बजाय उसे जांचती रहीं हमेशा! लेकिन संदेह से भर कर हर चीज को परे ठेलते हुए। है न? ” उसने मुझे तोला। मैंने आंखें झुका लीं।
” और मैं . . . उछाह में बौरा कर हर चीज को गले लगाती रही। सही-गलत, सब कुछ चखा, पचाया और फिर जो रुचा, उसे अपना बना लिया। सो सिम्पल!”

न, सिंपल नहीं। यह बिट्टी के किसी जटिल निर्णय की भूमिका है। मैं उसकी आदत जानती हूं। ”कुछ कहना है बेटा?”
वह मुस्करा दी, शर्म से नहाई मुस्कान, ”जैसे ही विनय विदेश से लौटेगा, हम लोग शादी कर लेंगे।”
”अरे!” ब्याह से दूर भागने वाली बिट्टी और ब्याह . . .
”नहीं मां, ब्याह-परिवार किसी से भी इंकार नहीं हमें। इंकार है सम्बन्धों की ऊबड़खाबड़ जमीन पर खड़े होने से। दरअसल साथ-साथ रह कर एक-दूसरे के बरक्स हम अपने को तोल रहे थे, खोज रहे थे। मैंने विनय में पाया अपना सपना – स्त्राी सरीखा कोमल संवेदनशील मन। विनय ने मुझमें साकार देखी अपनी कामना – पुरुष सरीखी विवेकपूर्ण कर्मठता। हम शायद अपने ही अक्स को दूसरे में ढूंढते थे और दूसरे की ताकत को अर्जित कर अपनी कमी पूरने में लगे हुए थे।’
दादी ने आगे बढ़ कर बिट्टी को चूम लिया। मुझे लगा, वहां उपस्थित सभी स्त्रिायां अपनी-अपनी तेजस्विता के साथ बिट्टी में विलीन हो गई हैं।
बिट्टी की दबी मुस्कान फूट पड़ी, ”जानती हो मां, विनय मुझे क्यों पसंद था? क्योंकि उसे देख कर हरे-भरे खेतों में मुंह मारते सांड की याद नहीं आई कभी।”

मैं फिर अपराध बोध से ग्रस्त! बेटे को सांड बनाने के लिए क्या मैं अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ सकती हूं?
बिट्टी अपने अनुभव शेयर कर रही है मुझसे। ”मां, अंधेरा घिरते ही दफ्तर या सड़क के सूनेपन से आज भी घबरा जाती हूं मैं। सामने से कोई लड़का आता दिखे, तो सांप सूंघ जाता है। नहीं, जिसे तुम लोग इज्जत कहते हो, उसके खोने का भय नहीं, लेकिन कोई रौंद दे अकारण . . . थूक दे आपकी शख्सियत पर और आप निरीह कांपते रहें घृणा और बेबसी से भर कर .. . . यह अपमान सालता है मुझे।”
मैं भी क्या इस भय से मुक्त हो पाई हूं?
बिट्टी रोने में ज्यादा वक्त जाया नहीं करती। उसकी आवाज में ओज और चमक दोनों लौट आईं। ”हमने तय किया है मां, हम अपने बच्चों को लड़कियों की तरह गहरी निष्ठा और कन्सर्न के साथ पालेंगे और उन्हें लड़कों सा खुद्दार व्यक्तित्व देंगे। हमने खुद को लैंगिक जकड़न से मुक्त कर लिया है, इसलिए अपनी संतान को मनुष्य बना पाना हमारे लिए आसान हो जाएगा।” वह सपनों के समंदर में दूर तक निकल गई – ”मेरा बेटा अंधेरे का प्रेत बन कर कभी किसी को नहीं डराएगा। पैतृक सम्पत्ति में बराबर का हिस्सा मांगने वाली बहन को तिरस्कार की नजर से नहीं देखेगा। मानव मुक्ति के लिए नारीवाद नाम से लड़ी जाने वाली लड़ाई में बराबर की शिरकत करेगा वह। बल्कि इस लड़ाई को नया नाम देगा – ‘मानवीय अस्मिता की लड़ाई’।”
”मैं जानती हूं, तुम लोग ही मिलजुल कर रचोगे साझी दुनिया के सम्बन्धों की नई सैद्धांतिकी।”

बिट्टी ने असहमति में सिर हिला दिया। ”नहीं मां, सम्बन्ध रचे नहीं जाते, जिए जाते हैं – विश्वास और संवाद के साथ, अनायास भाव से।”
”और संस्कार दिए जाने चाहिएं बेहद सजग-सचेत ढंग से – मनुष्य बनने का संस्कार और उतने ही सजग-सचेत होकर पूर्वग्रहों से लड़ते वे संस्कार अपने भीतर उतार लिए जाने चाहिएं। तैराकी सीखने की तरह पहले पहल बेहद श्रमसाध्य प्रशिक्षण होगा यह, लेकिन फिर रिलैक्स करने का सरलतम उपाय भी।” मुझे अपनी चूक समझ में आने लगी थी।
रोज-रोज अलक्षित सी टूट-फूट के साथ घर, परिवार और समाज में जो जुड़ रहा है धीरे-धीरे, वह नयापन ही तो है। कुछ ग्राह्य! कुछ अग्राह्य! उदार संवेदनशील दृष्टि के साथ इसका चयन और अभिषेक करना क्या मेरा दायित्व नहीं?

सच्चे अर्थों मे जनकवि थे नामदेव ढसाल

 एच . एल दुसाध 


15 फरवरी,1949 को पुणे के निकट ‘पुर’ ग्राम में जन्मे तथा मुंबई के ‘कमाठीपुरा’ और ‘गोलपीठा’ के रेड लाईट एरिया में पले-बढे विश्व कवि नामदेव लक्ष्मण ढसाल गत वर्ष आंत के कैंसर से जूझते हुए 15 जनवरी की सुबह मुंबई के बॉम्बे हॉस्पिटल में जीवन युद्ध हार गए थे.उनके परिनिवृत होने के बाद किस तरह मुंबई के लोगों ने शेष विदाई दिया था इसका आकलन चर्चित कवि  विष्णु खरे द्वारा इस लेखक को भेजे गए उस इ-मेल सन्देश से लगाया जा सकता है जिसमें उन्होंने लिखा था-‘पता नहीं आपने नामदेव की शवयात्रा के चित्र देखे हैं या नहीं ,किन्तु वह एक बड़े नेता के सम्मान जैसी निकली थी.उसमें करीब साठ हजार लोग शामिल हुए थे.मुंबई का ट्रैफिक रुक गया था.दिल्ली में हिंदी के साठ लेखकों की यदि एक साथ मृत्यु हो जाय तो उसमें 600 से ज्यादा लोग नहीं आयेंगे और जो आएंगे उनमें भी अधिकांश पारिवारिक लोग होंगे’.

नामदेव ढसाल

 तो यह थे अवाम पर बहुत गहरा प्रभाव छोड़ने वाले पद्मश्री नामदेव ढसाल जिनका जाना डॉ.आंबेडकर और कांशीराम के बाद दलित आन्दोलन की सबसे बड़ी क्षति थी.कारण,वे इन दोनों के बीच के सेतु थे.बहुतों को विश्वास नहीं होगा कि दलित राजनीति पर अविस्मर्णीय छाप छोड़ने वाले कांशीराम ने कभी अपने से पन्द्रह साल छोटे ढसाल के नेतृत्व में कुछ समय काम किया था.बहरहाल  उनकी बहुत बड़ी त्रासदी यह रही कि वे दलित और मुख्यधारा,दोनों ही समुदाय के बुद्धिजीवियों की उपेक्षा के बुरी तरह शिकार रहे.दलित बुद्धिजीवी जहां उनकी जीवन की शेष बेला में शिवसेना से बने  रिश्तों के कारण उन्हें डॉ.आंबेडकर और कांशीराम की पंक्ति में स्थान देने में व्यर्थ रहे,वहीँ जिस-तिस को गाँधी-जेपी बना देने वाले मुख्यधारा के बुद्धिजीवी भी उनको योग्य सम्मान न दे सके.उन्होंने जिस तरह नोबेल विजेता टैगोर और नायपाल इत्यादि के मुकाबले अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितियों में रहकर साहित्य और राजनीति के क्षेत्र में विश्व स्तरीय कार्य किया था,उसे अगर सही तरीके से सामने लाया गया होता,अवश्य ही भारत के खाते में एक और नोबेल विजेता का नाम जुड़ जाता.
वैसे तो विषम परिस्थितियों में रहकर ढेरों लोगों ने अपनी प्रतिभा से दुनिया को विस्मित किया है,पर, ‘कमाठीपुरा’ और ’गोल पीठा’ जैसे धरती के नरक से निकल कर ढसाल जैसी कोई अन्य विश्व स्तरीय शख्सियत शायद ही सामने आई. एक बुचडखाने के साधारण कर्मचारी की संतान ढसाल रेड लाईट एरिया में रहते एवं टैक्सी ड्राइवरी से लेकर छोटी-मोटी नौकरियां करते हुए अपना कविता कर्म जारी रखे.जिस रेड लाईट इलाके में ढसाल पले-बढ़े थे,वहां रहते हुए अंततः सब कुछ तो बना जा सकता था,पर विश्व स्तरीय कवि नहीं.खुद ढसाल ने लिखा है कि अगर कविता मुझे नहीं खींचती तो मैं टॉप लेवल का गैंगस्टर या स्मगलर होता या फिर किसी चकला घर का मालिक.किन्तु उनके अन्दर का कवि जीत गया और महानगरीय अधोलोक ने उन्हें एक ऐसे विद्रोही कवि के रूप में जन्म दिया,जिसने अभिजनों की भाषा और व्यवस्था पर शक्तिशाली प्रहार किया.

नामदेव ढसाल की कविता

उनकी कविता की शायद इन्ही खूबियों ने कुछ साल पहले कवि विष्णु खरे को यह उद्गार व्यक्त करने के लिए प्रेरित किया था -“अगर कविता का लक्ष्य मानव जाति की समस्यायों का समाधान ढूंढना है तो ढसाल ,टैगोर से ज्यादा प्रासंगिक और बड़े कवि हैं.अंतर्राष्ट्रीय कविता जगत में भारतीय कविता के विजिटिंग कार्ड का नाम नामदेव ढसाल है.उन्होंने कविता की संस्कृति को बदला है;कविता को परम्परा से मुक्त किया एवं उसके आभिजात्यपन को तोडा है.संभ्रांत कविता मर चुकी है और इसे मारने का काम ढसाल ने किया है.आज हिंदी के अधिकांश सवर्ण कवि दलित कविता कर रहे हैं तो इसका श्रेय ढसाल को जाता है.ढसाल ने महाराष्ट्र के साथ देश की राजनीति को बदलकर रख दिया है.ऐसा काम करनेवाला भारत में कोई और कवि नहीं हुआ.’
लेकिन क्या सिर्फ भारत!नहीं,दुनिया में एक से बढ़कर एक कवि हुए पर,किसी भी विश्वस्तरीय कवि ने दलित पैंथर जैसा उग्र राजनीतिक संगठन नहीं बनाया.अवश्य ही वैचारिक लेखन करने वाले कुछ लेखक स्वतंत्र रूप से ऐसा संगठन बनाने में सफल रहे,पर अपवाद रूप से ढसाल को छोड़कर कोई अन्य बड़ा कवि नहीं.उन्होंने कैसा संगठन खड़ा किया था,उसका जायजा लेने के लिए हमें एक बार दलित पैंथर की भूमिका का सिहावलोकन कर लेना चाहिए.

अब से चार दशक पूर्व जब भारत के पूर्वी हिस्से में नक्सलवाद सुविधासंपन्न वर्ग में भय का संचार कर रहा था,उन्ही दिनों 9 जुलाई 1972 को पश्चिम भारत में 23 साल के युवा ढसाल ने ‘दलित पैंथर’ जैसे विप्लवी संगठन की स्थापना की.इस संगठन ने डॉ.आंबेडकर के बाद मान-अपमान से बोधशून्य दलित समुदाय को नए सिरे से जगाया.इससे जुड़े प्रगतिशील विचारधारा के दलित युवकों ने तथाकथित आंबेडकरवादी नेताओं की स्वार्थपरक नीतियों तथा दोहरे चरित्र से निराश हो चुके दलितों में नया जोश भर दिया जिसके फलस्वरूप उनको अपनी ताकत का अहसास हुआ तथा उनमें ईंट का जवाब पत्थर से देने की मानसिकता पैदा हुई.इसकी स्थापना के एक महीने बाद ही ढसाल ने यह घोषणा कर-‘यदि विधान सभा या संसद सामान्य लोगों की समस्यायों को हल नहीं करेगी तो पैंथर उन्हें जलाकर राख कर देंगे’-शासक दलों में हडकंप मचा दिया.

नामदेव ढसाल की अंतिम यात्रा में उमडा हुजूम

दलित पैंथर के निर्माण के पृष्ठ में अमेरिका के उस ब्लैक पैंथर आन्दोलन से मिली प्रेरणा थी जो अश्वेतों को उनके मानवीय,सामाजिक,आर्थिक व राजनैतिक अधिकार दिलाने के लिए 1966 से ही संघर्षरत था.उस आन्दोलन का ढसाल और उनके क्रन्तिकारी साथियों पर इतना असर पड़ा कि उन्होंने ‘ब्लैक पैंथर’ की तर्ज़ पर दलित मुक्ति के प्रति संकल्पित अपने संगठन का नाम ‘दलित पैंथर’ रख दिया.जहाँ तक विचारधारा का सवाल है पैन्थरों ने डॉ.आंबेडकर की विचारधारा को न सिर्फ अपनाया बल्कि उसे विकसित किया तथा उसी के अनुसार संगठन का निर्माण किया.यद्यपि यह संगठन अपने उत्कर्ष पर नहीं पहुंच पाया तथापि इसकी उपलब्धियां गर्व करने लायक रहीं.बकौल चर्चित मार्क्सवादी चिन्तक आनंद तेलतुम्बडे ,’इसने देश में स्थापित व्यवस्था को हिलाकर रख दिया और संक्षेप में बताया कि सताए हुए आदमी का आक्रोश क्या हो सकता है.इसने दलित राजनीति को एक मूल्यवान अंतर्दृष्टि प्रदान की जोकि पहले बुरी तरह छूटी थी.अपने घोषणापत्र पर अमल करते हुए पैन्थरों ने दलित राजनैतिक मुकाम की खातिर परिवर्तनकामी अर्थो में नई जमीन तोड़ी.उन्होंने दलितों को सर्वहारा परिवर्तनकामी वेग की पहचान प्रदान की तथा उनके संघर्ष को दुनिया के अन्य दमित लोगों के संघर्ष से जोड़ दिया.’ बहरहाल कोई चाहे तो दलित पैंथर की इन उपलब्धियों को ख़ारिज कर सकता है किन्तु दलित साहित्य के विस्तार में इसकी भूमिका को नज़रंदाज़ करना संभव नहीं है.

दलित पैंथर और दलित साहित्य एक ही सिक्के के दो पहलूँ हैं.इसकी स्थापना करनेवाले नेता पहले से ही साहित्य से जुड़े हुए थे.दलित पैंथर की स्थापना के बाद उनका साहित्य शिखर पर पहुँच गया और देखते ही देखते मराठी साहित्य के बराबर स्तर प्राप्त कर लिया .परवर्तीकाल में डॉ.आंबेडकर की विचारधारा पर आधारित पैन्थरों का मराठी दलित साहित्य हिंदी पट्टी सहित अन्य इलाकों को भी अपने आगोश में ले लिया.दलित साहित्य को इस बुलंदी पर पहुचाने का सर्वाधिक श्रेय ढसाल को ही जाता है. धरती के नरक में रहकर उन्होंने जीवन के जिस श्याम पक्ष को लावा की तरह तपती कविता में उकेरा,वह दलित ही नहीं,विश्व साहित्य की अमूल्य धरोहर है.

(लेखक ‘टैगोर बनाम ढसाल’ और ‘महाप्राण नामदेव ढसाल’  पुस्तकों के रचनाकार हैं.  भारत मे डायवर्सिटी सिद्धांत लागू होने के लिए प्रयासरत सिद्धांतकार हैं  )

किले में समंदर : पहली क़िस्त

रोहिणी अग्रवाल

रोहिणी अग्रवाल स्त्रीवादी आलोचक हैं , महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं . ई मेल- rohini1959@gmail.com

( रोहिणी अग्रवाल की यह अभिव्यक्ति अतीत से वर्तमान और वर्तमान से अतीत की आवाजाही है , स्वप्न -कल्पना और यथार्थ के परस्पर गुम्फन के साथ . स्त्री के संघर्ष और पीड़ा तथा मुक्ति के अहर्निश अभियान की कथा पढ़ें दो किस्तों में  ) 


बेहद भीत सशंकित एकाकिनी मैं।


चाहती हूं ढेर सारा संवाद – मन से मन के तारों को जोड़ कर भीतर तक दरके बंजर को सुकून और विश्वास की तरलता से सींच देने वाला संवाद। ऐसी बतकही कि मन के सारे उद्वेग, द्वंद्व और तनाव बिला जाएं कहीं। बिला जाएं वे सारे भय और अंतर्विरोध जिनकी उलझी परतों तले अपने को दाब-ढापं कर अपने को ही मुद्दत से नहीं निहार पाई हूं मैं। मैं अस्वस्थ हूं – और अशांत! उपचार सिर्फ संवाद – बस, धीरज से सुन भर ले कोई। पूरे विश्वास और स्नेह के साथ, आत्मीयता और तन्मयता के साथ। न, तर्क की भाषा नहीं सुहाती मुझे। वह याज्ञवल्क्य की भीषण गर्जना बन कर मेरी समूची स्वतः स्फूर्त अस्मिता पर गार्गी को चस्पां कर कहीं हांक ले जाती है।

मेरे भीतर के हर रग-रेशे में समंदर का गहन विस्तार है। ऐसी अभिशप्तता कि समंदर का आलोड़न और गर्जन-तर्जन सब कुछ अंदर ही अंदर जब्त करने को बाध्य। आंखों की राह समंदर का खारा मूक हाहाकार बह जाता है कभी-कभार। संवाद का पुल बन जाए तो कितने ही समंदरों को लांघ ले इंसान। लेकिन पुलों के निर्माण के इतिहास में व्यापारिक नीतियां या विजय अभियान ही क्यों आ जुड़ते है। बार-बार?

पुल – यानी फोन – मैं बेतहाशा नम्बर घुमाती हूं – इसका नंबर, उसका नंबर। बात नहीं करूंगी तो घुट कर मर जाऊँगी। मैं नहीं चाहती लेडी ऑव शैलोट की तरह दुनिया की ओर से पीठ मोड़ कर परंपरा और विरासत की सलीब ढोते रहना। दूसरों की नजर और लब से छन कर आते नजारे और लफ्ज मेरे अपने क्यों हों? मैं – कुछ न होऊँ – ‘मैं’ तो हूं न। अपने अंदर जीते साबुत अखंड विराट सत्य, शिव, सुंदर के साथ। मैं – एक स्त्री ! सृष्टि की एक बूंद!

लेकिन संवाद के नाम पर बर्फीली चुप्पी या गंधाता कीचड़ . . . न! न!! न!!!


मैं बिफर कर रेशा-रेशा फैल गई। समंदर का खारा हाहाकार मेर कुल सत्य क्यों? समंदर के भीतर के रहस्यमय समृद्ध संसार से मुझे भय क्यों? मैं उतरूंगी भीतर . . . और भीतऱ . . उहूं, घबराहट क्यों भला? नवजात मछली को गोताखोरी का प्रशिक्षण नहीं लेना पड़ता न!

भावाकुलता का अतिरेक व्यक्ति को बचकाना बना देता है, या फिर जाबांच खिलाड़ी। मैंने आव देखा न ताव, समंदर की बालू पर अपनी चाहत की इबारत लिख डाली – ”चाहती हूं अनंत प्रशांत सघन संवाद-तरणी पर सवार होकर भीषण घ्ंघावात से घिरे, हिमखंडों से अटे समंदर का दूसरा छोर छू लूं। हमराही है कोई? कहीं?”

तभी मेरे किले का घंटा जोरों से घनघना उठा। साढ़े आठ बजे का अलार्म। शाम के साढ़े आठ! खाना बनाने का वक्त! यानी छः से साढ़े आठ के बीच की वह मियाद खत्म जब किले के सुरंगी रास्ते से बाहर मैं समुदर की सैर को निकल सकती थी। अब मैं गृहिणी हूं, पत्नी हूं, मां हूं। त्योहारों का सीजन शुरु हो गया है और हर रोज मुझे पकवानों की नई वैरायटी परोसनी है। नून तेल लकड़ी में देर तक पकती-खदबदाती रही मैं। गृहिणी, पत्नी, मां बन जाने के बाद मद्धम आंच पर सिंझने का सुख पोर-पोर में आत्मप्रवंचक मादक आलस्य पिरो देता है।

‘डोंगी तैयार है। आओ, समुद्र का दूसरा छोर छूने चलें।’ किसी ने मेरे कंधे पर नरम हाथ रख दिया। मैं चिहुंक उठी। गहरी नींद में थी। मुस्करा भर दी – ‘डोंगी से समुद्र का दूसरा छोर नहीं छुआ जा सकता। पागलपन है, निरा पागलपन!’
‘और बालू पर सपनों की इबारत लिख कर हमराही को टेरना?’
‘पागलपन! निरा पागलपना!’ मैंने दोहरा दिया।
नींद की मिठास में खोने का जो सुख है, वह पाने के संघर्ष में कहां? मैं नहीं चीन्हती कोई राह! नहीं चाहती कोई हमराही!
सपने में देखा – दुर्गा-अष्टमी के अवसर पर मैं – गृहिणी – आठ कन्याओं को कंजक बना कर खाना खिला रही हूं। नौवीं कंजक तो है ही नहीं। मेरे हाथ-पैर फूल गए हैं। सात या नौ! आठ की गिनती शुभ काम में शुभ नहीं मानी जाती। तभी नवीं कंजक के रूप में मैंने अपने आप को आते देखा – सात बरस की मैं। गृहिणी कंजकों की प्लेटों में हलवा-पूड़ी और हाथ में दक्षिणा रख रही है। वह मुझ कंजक के बढ़े हाथ पर कुछ रखे कि कंजक मैं रोती हुई वहां से भाग लेती है। सारा दृश्य जैसे वहीं फ्रीज हो गया है। मां दुर्गा का अपमान! गृहस्थी पर अनिष्ट की आशंका! अपने परिवार की खैर मनाते मन ही मन मैं उस कंजक को कोस रही हूं – बित्ते भर की छोकरी अपशकुन करके चली गई। मैं देख रही हूं कंजक-मैं मां की गोद में मुंह छिपाए जार-जार रोए जा रही है।

”क्यों मां, तुम रोई क्यों?” मेरी बिट्टी मुझ से पूछ रही है – ”तुम्हें मजा नहीं आता था घर-घर जाकर प्रसाद और दक्षिणा लेने में? हाय! मैं तो कितना बेसब्री से इंतजार करती थी इस त्योहार का। अ लॉट ऑव फन!”
हम मां-बेटी स्थिति का विस्तार नहीं, विलोम हैं। शायद संवाद का वह बिंदु गायब है जो सपनों को सहारे संकल्प की डोर से मनुष्यों को बांधा करता है। इस अनुपस्थिति के दोषारोपण के लिए मैं किसकी ओर उंगली उठाऊँ? एक उंगली उठा लूंगी  तो भी तीन मेरी ओर ही रहेंगी न! क्या मैं तिहरा ट्रायल झेल सकती हूं?

सुबह उठी तो सिर भारी था और दिमाग में ठक-ठक बजता सवाल कि कंजक बन कर आत्मतुष्ट लौटने की बजाय मैं रोई क्यों? रोई सो रोई, मुंह छिपा कर भागी क्यों? रोने और भागने से तो किसी समस्या का समाधान नहीं होता। रोना माने लाचारगी। भागना माने कायरता। मैं कमर कस कर आत्म-भर्त्सना के लिए तैयार!
”नहीं! दुनियादारी का बूढ़ा चश्मा चढ़ा कर देखोगी तो जिंदगी में नया कुछ नहीं मिलेगा। रोना और भागना हमेशा कायरता के लक्षण नहीं होते। वे विरोध दर्ज करने के औजार भी होते हैं।”
मैं चौंक पड़ी।
असम्भव!
”मां दुर्गा! आप?”
”विरोध दर्ज करने के लिए जरूरी है चेतना। चेतना संवेदना और विवेक के बिना पैदा नहीं होती।”
मैं जड़! भगवान को सामने देख किसकी सिट्टी-पिट्टी गुम न हो जाए?
मां दुर्गा की आवाज लरज उठी – ”संवेदना और विवेक के घालमेल से ही बनता है इंसान। अपने को पूरी कुव्वत और ताकत के साथ दर्ज करने वाला इंसान। हर शै को सिरजने वाला इंसान।”
मैं काठ!
”’मुझे देखो, न रो सकती हूं, न गलत को बरज सकती हूं। चलना तो कभी सीखा ही नहीं। कलेजे पर वर्जनाओं के पत्थर रखते-रखते पथरा गई हूं बिल्कुल। पूजा और दुत्कार – पत्थर के सामने कोई मानी नहीं रखते।” मैंने देखा मां दुर्ग की पथरीली  आंख की कोर भाीग आई – ”काश! मैं तुम्हारी तरह अपनी मनोवृत्तियों के साथ जी पाती! रग-रग में चटकते आवेश और आक्रोश के साथ अपने को ही मथ डालती। अपने को मथे बिना मर्म नहीं पाया जा सकता बेटी। लेकिन तुम मंथन की त्वरा उत्पन्न करती मथानी को रोक कर खुद बंध क्यों जाती हो? मुक्त होना सीखो। और विकसित होना भी। आत्मदाह अभिशाप है। इसे सूरज का ताप बना कर सृष्टि को लहलहाया नहीं जा सकता।”

मैं फूट-फूट कर रो पड़ी। धारासार! सात बरस की उम्र से लेकर पचास बरस की उम्र के आंसुओं की बरसात! ”अब कह रही हो ऐसा! जाने कितनी ही सृष्टियों को तबाह करके! तुम . .  तुम ही तो मेरे अपमान का मूल कारण हो। साल दर साल. . . बल्कि साल में दो-दो बार! दुर्गा अष्टमी के बहाने मुझे हर बार सात साल की कंजक में तब्दील करतीं तुम . . . ” मैं आवेश, क्रोध और घृणा से कांपने लगी।
दुर्गा निर्विकार! न स्तम्भ, न अवसाद! माने जानती हो अपने अपराध की सघनता और परिणाम!
”क्या लड़की की रोटी परिवार पर इतनी भारी पड़ती है कि बचपन से ही उसे दूसरों के द्वार पर जाकर टुकड़े बटोरने का अभ्यास कराया जाए? क्या उसके आत्मसम्मान और आत्माभिमान का कोई मूल्य नहीं? वह याचक भर है? या बोझ से लदी पाप की गठरी जिसे इस-उस के गले मढ़ कर परिवार का पुरुष अपने कंधे हल्के करता फिरे? तुम नहीं जानतीं मां, मैं कितनी नफरत करती हूं तुमसे! तुम्हारे छद्म से!”

घृणा के उफान में हमेशा घृणा नहीं हुआ करती। प्यार, अपेक्षा, दूरी और दर्द का अतिरेक भी हुआ करता है।
”कन्याओं पर देवी मां का आरोपण ‘ ‘ ‘ जानती हो, यह प्रवंचक महिमामंडन कैसी-कैसी अभेद्य दीवारें खड़ी करता है चहुं ओर कि  ‘ ‘ ‘ ” मैं आवेश में हकला पड़ी। संयत होने का प्रयास किया तो रुआंसी हो उठी -”हर बार दूसरों के घर से खाना और दक्षिणा लेकर खुशी से किलकती लड़की को देख कर मैं कितना-कितना लहूलूहान हो जाती हूं – कृपा और खुद्दारी का फर्क इतना महीन नहीं हुआ करता कि नंगी आंख से देखा न जाए। तो क्या महिमामंडन अमोघ मूर्च्छा का संचार करता है?”
”हर मूर्च्छा के लिए कोई न कोई संजीवनी बूटी तैयार करती है प्रकृति। लेकिन बिटिया, क्या मूर्च्छितों के बीच तुम खुद मूर्च्छितवत् नहीं रहीं?”
मुझ पर घड़ों पानी! क्रॉस एग्जामिनेशन! क्या बिट्टी को कभी सीने से लगा कर बताया देवी और इंसान होने का फर्क? देवी होने की जडता! इंसान होने की ताकत! जरूरत! हमेशा चाहती रही हूं कि मेरी जमीन पर मेरी मानसिक-बौद्धिक ऊँचाई तक आकर संवाद करे कोई। दूसरे की जमीन पर उसकी कद-काठी लेकर संवाद करने की जरूरत क्यों महसूस नहीं की मैंने? संवद का अभ्यास ही नहीं शायद। है तो सजगता के थोथे दंभ का लाउड प्रकटीकरण और उसके साथ गुत्थमगुत्थ पारंपरिक अनुदेशों की तत्पर पालना का बीभत्स सत्य! क्या हूं मैं? अंतर्विरोधों का पुलिंदा? निष्क्रियता को चाव के साथ जीती मूढ़ता?

चेतना का अर्थ चिंतन-मनन के बाद अर्जित बौद्धिक समृद्धि का एकांत विलास नहीं होता। संज्ञान और विश्लेषण के बाद ही चेतना गति पाती है – पानी की तरह मिट्टी के कण-कण में समो कर उसे तरल करती। मैं तैंतालीस बरस तक कंजक बनने के जिस टीसते अभिशाप को कलेजे में लिए हूं, क्या उसे परिवार-समाज में एक भी व्यक्ति तक बांट पाई हूं? क्यों हर रक्षाबंधन, करवा चौथ, अहोई अष्टमी पर अकेले बिसूरती हूं कि रक्षणीया मैं ही क्यों? मैं – बहन, पत्नी, मां। मुझसे मिले भावनात्मक सम्बल के बिना क्या मेरा भाई, पति, पुत्रा परिपूर्ण-परितृप्त हो पाएगा? पूर्णता और तृप्ति क्या आदान-प्रदान की सतत संवेदनशील मानवीय प्रक्रिया नहीं? फिर पालों के आरपार लिंगों में बंटी मानवीय अस्मिताएं क्यों? लैंगिक विभाजन क्या सबसे पहले मनुष्यता को ही छिन्न-भिन्न नहीं करता? लैंगिक विभाजन के आधार पर सम्बन्ध नहीं बनते, बनता है सम्बन्धों का सत्ता विमर्श। मैं इस सत्ता विमर्श के निहित मंतव्यों को पहचानती हूं, लेकिन उन्हें बेनकाब नहीं करती। मेरी चुप्पी क्या वर्चस्ववादियों की ताकत नहीं बनती? फिर क्यों नहीं बताया बिट्टी को कि त्योहार धर्म का उत्सवीकरण नहीं हुआ करते, धार्मिक अनुदेशों को व्यावहारिक रूप देने का क्रूर समादेश हुआ करते हैं।

स्त्री जागृति की पहली मशाल : सावित्रीबाई फुले

सुधा अरोड़ा

सुधा अरोड़ा सुप्रसिद्ध कथाकार और विचारक हैं. सम्पर्क : 1702 , सॉलिटेअर , डेल्फी के सामने , हीरानंदानी गार्डेन्स , पवई , मुंबई – 400 076
फोन – 022 4005 7872 / 097574 94505 / 090043 87272.

( ३ जनवरी को सावित्रीबाई फुले जयंती पर विशेष .  उनकी जयंती अवसर पर स्त्रीकाल ने सुप्रसिद्ध स्त्रीवादी चिन्तक शर्मिला रेगे को ‘ सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान‘  (खबर के लिए लिंक पर क्लिक करें ) देने  की घोषणा की है. ) 

सावित्रीबाई फुले का जीवन कई दशकों से महाराष्ट्र के गाँव कस्बों की औरतों के लिए प्रेरणादायक रहा है। उनकी जीवनी एक औरत के जीवट औेर मनोबल को समर्पित है। सावित्रीबाई फुले के कार्यक्षेत्र और तमाम विरोध और बाधाओं के बावजूद अपने संघर्ष में डटे रहने के उनके धैर्य और आत्मविश्वास ने भारतीय समाज में स्त्रियों की शिक्षा की अलख जगाने की महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे प्रतिभाशाली कवयित्री, आदर्श अध्यापिका, निस्वार्थ समाजसेविका और सत्य-शोधक समाज की कुशल नेतृत्व करने वाली महान नेता थीं।

महाराष्ट्र के सतारा जिले में सावित्रीबाई का जन्म ३ जनवरी सन १८३१ में हुआ। इनके पिता का नाम खंडोजी नवसे पाटिल और माँ का नाम लक्ष्मी था। १८४० में ९ वर्ष की अवस्था में उनका विवाह पूना के ज्योतिबा फुले के साथ हुआ। इसके बाद सावित्री बाई का जीवन परिवर्तन आरंभ हो गया। वह समय दलितों और स्त्रियों के लिए नैराश्य और अंधकार का समय था। समाज में अनेक कुरीतियाँ फैली हुई थीं और नारी शिक्षा का प्रचलन नहीं था। विवाह के समय तक सावित्री बाई फुले की स्कूली शिक्षा नहीं हुई थी और ज्योतिबा फुले तीसरी कक्षा तक पढ़े थे। लेकिन उनके मन में सामाजिक परिवर्तन की तीव्र इच्छा थी। इसलिये इस दिशा में समाज सेवा का जो पहला काम उन्होंने प्रारंभ किया, वह था अपनी पत्नी सावित्रीबाई को शिक्षित करना। सावित्रीबाई की भी बचपन से शिक्षा में रुचि थी और उनकी ग्राह्य शक्ति तेज़ थी। उन्होंने स्कूली शिक्षा प्राप्त की और अध्यापन का प्रशिक्षण लिया।

महाराष्ट्र  के पेशवाकालीन समाज में धार्मिक और सामाजिक वातावरण में पाखंड और अंधविश्वास  अपने चरम पर था । चमार, मांग, वाल्मीकि, महार जैसी अछूत मानी जाने वाली जातियों की दुर्दशा  का आलम यह था कि इन जातियों के  लोगों को कमर के पीछे झाड़ू या या कंटीली झाड़ी बांधकर भी चलना पड़ता था,  जिससे कि रेत या सड़क पर बने उनके पांव के निशान मिटते चले जाएं ताकि किसी ब्राह्मण का पांव उनपर न पड़े । उन्हें अपने गले में हंडिया या मटकी लटकाकर चलना पड़ता था ताकि वह उसमें ही थूकें , सड़क पर नहीं जिससे ब्राह्मणों के अपवित्र होने का खतरा न रहे । वे लोग सिर्फ़ तपती दोपहरी में घर से बाहर निकल सकते थे क्यों कि सुबह शाम उनकी लंबी परछाईं किसी ब्राह्मण को अपवित्र कर सकती थी । किसी ज़रूरी काम से अगर बाहर निकलना ही पड़ता तो वह एक हाथ से थाली, दूसरे हाथ से पत्थर से टन टन बजाते हुए अपने आने की सूचना देते हुए चलते । अछूत मानी जाने वाली जातियों के वजूद को किस तरह रौंदा जाता था , इसका सिर्फ़ अनुमान ही लगाया जा सकता है । पेशवा बाजीराव द्वितीय निहायत स्वेच्छाचारी , व्यभिचारी और लंपट था । उसके व्यभिचार के किस्से इतने कुख्यात थे कि उसके दौरे की खबर मिलते ही पूना से लगभग सौ किलोमीटर दूर वाई नामक गांव की कई स्त्रियों ने कुंए में कूदकर जान दे दी ।

1 जनवरी 1818 में दलित विरोधी ब्राह्मणों के समर्थक पेशवा राज्य का अंत हुआ और अंग्रेज़ी हुकूमत कायम हो गई । ज्योतिबा फुले ईसाई मिशनरियों की पाठशाला में पढ़ने जाते थे । समाज के दबाव में उनके पिता ने पाठशाला से निकाल कर उन्हें खेती करने में लगा दिया । 1842 में सरकारी स्कूल में दाखिला लेकर उन्होंने दोबारा पढ़ाई शुरू  की ।सावित्रीबाई के बचपन की एक घटना मशहूर है । छह सात साल की उम्र में वह हाट बाजार अकेले ही चली जाती थी । एकबार सावित्री शिखल गांव के हाट में गई । वहां कुछ खरीद कर खाते- खाते उसने देखा कि एक पेड़ के नीचे कुछ मिशनरी स्त्री -पुरुष गा रहे हैं । एक लाटसाहब ने उसे रुककर गाना सुनते और खाते हुए देखा तो कहा -‘इस तरह रास्ते में खाते-खाते घूमना अच्छी बात नहीं है‘ सुनते ही सावित्री ने हाथ का खाना फेंक दिया । लाट साहब ने कहा – बड़ी अच्छी लड़की हो तुम । यह किताब ले जाओ , तुम्हें पढ़ना नहीं आता तो भी इसके चित्र तुम्हें अच्छे लगेंगे ।’’ घर आकर सावित्री ने वह किताब अपने पिता को दिखाई । आगबबूला होकर पिता ने उसे कूड़े में फेंक दिया -‘‘ ईसाइयों से ऐसी चीज़ें लेकर तू भ्रष्ट  हो  जाएगी और सारे कुल को भ्रष्ट  करेगी । तेरी शादी कर देनी चाहिये ।’’ सावित्री ने किताब उठाकर चुपचाप एक कोने में छुपा दी । 1840 में जोतिबा के साथ विवाह होने पर वह उस किताब को सहेज कर ससुराल ले आई और शिक्षित होने के बाद उस पुस्तक को मनोयोग से पढ़ा ।

सावित्री-ज्योतिबा दम्पति ने इसके बाद अपना ध्यान समाज-सेवा की ओर केन्द्रित किया। १ जनवरी सन १८४८ को उन्होंने पूना के बुधवारा पेठ में पहला बालिका विद्यालय खोला। यह स्कूल एक मराठी सज्जन भिंडे के घर में खोला गया था। सावित्रीबाई फुले इस स्कूल का प्रधानाध्यापिका बनीं। इसी वर्ष उस्मान शेख के बाड़े में प्रौढ़-शिक्षा के लिए एक दूसरा स्कूल खोला गया। दोनों संस्थाएँ अच्छी चल निकलीं। दबी-पिछड़ी जातियों के बच्चे, विशेषरूप से लड़कियाँ , बड़ी संख्या में इन पाठशालाओं में आने लगीं। इससे उत्साहित होकर  ज्योतिबा दम्पति ने अगले ४ वर्षों में ऐसे ही १८ स्कूल विभिन्न स्थानों में खोले।

सावित्री-ज्योतिबा दम्पति ने अब अपना ध्यान बाल-विधवा और बाल-हत्या पर केन्द्रित किया. उन्होंने विधवा विवाह की परंपरा प्रारंभ की और २९ जून १८५३ में बाल-हत्या प्रतिबंधक-गृह की स्थापना की. इसमें विधवाएँ अपने बच्चों को जन्म दे सकती थी और यदि शिशु को अपने साथ न रख सकें तो उन्हें यहीं छोड़कर भी जा सकती थीं। इस अनाथालय की सम्पूर्ण व्यवस्था सावित्रीबाई फुले सम्भालती थी और बच्चों का पालन पोषण माँ की तरह करती थीं। उनका ध्यान खेत-खलिहानों में काम करने वाले अशिक्षित मजदूरों की ओर भी गया।
१८५५ में ऐसे मजदूरों के लिए फुले दंपत्ति ने रात्रि-पाठशाला खोली. उस समय अस्पृश्य जातियों के लोग सार्वजानिक कुएँ से पानी नहीं भर सकते थे . १८६८ में अंततः  उनके लिये फुले दंपत्ति ने अपने घर का कुआँ खोल दिया। सन १८७६-७७ में पूना नगर आकाल की चपेट में आ गया। उस समय सावित्री बाई और ज्योतिबा दम्पति ने ५२ विभिन्न स्थानों पर अन्न-छात्रावास खोले और गरीब जरूरतमंद लोगों के लिये मुफ्त भोजन की व्यवस्था की।

ज्योतिबा ने स्त्री समानता को प्रतिष्ठित करने वाली नई विवाह विधि की रचना की। उन्होंने नये मंगलाष्टक (विवाह के अवसर पर पढ़े जाने वाले मंत्र) तैयार किए। वे चाहते थे कि विवाह विधि में पुरुष प्रधान संस्कृति के समर्थक और स्त्री की गुलामगिरी सिद्ध करने वाले जितने मंत्र हैं, वे सारे निकाल दिए जाएँ। उनके स्थान पर ऐसे मंत्र हों,  जिन्हें वर-वधू आसानी से समझ सकें। ज्योतिबा के मंगलाष्टकों में वधू वर से कहती है -‘‘स्वतंत्रता का अनुभव हम स्त्रियों को है ही नहीं। इस बात की आज शपथ लो कि स्त्री को उसका अधिकार दोगे और उसे अपनी स्वतंत्रता का अनुभव करने दोगे। ’’ यह आकांक्षा सिर्फ वधू की ही नहीं, गुलामी से मुक्ति चाहने वाली हर स्त्री की थी।

कहते हैं – एक और एक मिलकर ग्यारह होते हैं। ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले ने हर स्तर पर कंधे से कंधा मिलाकर काम किया और कुरीतियों, अंध श्रद्धा और पारम्पारिक अनीतिपूर्ण रूढ़ियों को ध्वस्त कर गरीबों – शोषितों के हक में खड़े हुए। १८४० से १८९० तक पचास वर्षो तक ज्योतिबा और सावित्रीबाई ने एक प्राण होकर समाज सुधार के अनेक कामों को पूरा किया।

ज्योतिबा-दम्पति संतानहीन थे। उन्होंने १८७४ में काशीबाई नामक एक विधवा ब्राहमणी के नाजायज बच्चे को गोद लिया। यशवंतराव फुले नाम से यह बच्चा पढ़लिखकर डाक्टर बना और आगे चलकर फुले दम्पति का वारिस भी। २८ नवंबर १८९० को महात्मा ज्योतिबा फुले के निधन के बाद सावित्रीबाई ने बड़ी मजबूती के साथ इस आन्दोलन की जिम्मेदारी सम्भाली और सासवड, महाराष्ट्र के सत्य-शोधक समाज के अधिवेशन में ऐसा भाषण दिया,  जिसने दबे-पिछड़े लोगों में आत्म-सम्मान की भावना भर दी। सावित्रीबाई का दिया गया यह भाषण उनके प्रखर क्रन्तिकारी और विचार-प्रवर्तक होने का परिचय देता है।

१८९७ में जब पूना में प्लेग फैला तब वे अपने पुत्र के साथ लोगों की सेवा में जुट गई. सावित्रीबाई की आयु उस समय ६६ वर्ष की हो गई थी फिर भी वे निरंतर श्रम करते हुए तन-मन से लोगों की सेवा में लगी रही। इस कठिन श्रम के समय उन्हें भी प्लेग ने धर दबोचा और १० मार्च १८९७ में उनका निधन हो गया। सावित्रीबाई प्रतिभाशाली कवियित्री भी थीं। इनके कविताओं में सामाजिक जन-चेतना की आवाज पुरजोर शब्दों में मिलाती है। उनका पहला कविता-संग्रह सन १८५४ में ‘काव्य फुले’ नाम से प्रकाशित हुआ और दूसरी पुस्तक ‘बावनकशी सुबोध रत्नाकर’ शीर्षक से सन १८८२ में प्रकाशित हुई।

समाज सुधार के कार्यक्रमों के लिये सावित्रीबाई और ज्योतिबा को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। पैसे की तंगी के साथ-साथ सामाजिक-विरोध के कारण उन्हें अपने घर परिवार द्वारा निष्कासन को भी झेलना पड़ा लेकिन वे सब कुछ सहकर भी अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित बने रहे। भारत में उस समय अनेक पुरुष समाज सुधार के कार्यक्रमों में लगे हुए थे लेकिन महिला होकर पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर जिस प्रकार सावित्री बाई फुले ने काम किया वह आज के समय में भी अनुकरणीय है। आज भी महात्मा ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले का एक दूसरे के प्रति औेर एक लक्ष्य के प्रति समर्पित जीवन आदर्श दाम्पत्य की मिसाल बनकर चमकता है।

( कथादेश मार्च 2004 में सुधा अरोड़ा के स्तम्भ ” औरत की दुनिया ” की पहली क़िस्त थी — सावित्री बाई फुले — एक परछाईं का आकार लेना — जिसमें सुषमा देशपांडे का दो अंकों में सम्पूर्ण एकालाप नाटक था – ”हां मैं सावित्रीबाई” और उसकी भूमिका के रूप में यह आलेख था ! कथादेश : मार्च 2004 से साभार प्रस्तुत )

सावित्री बाई फुले की कवितायें

( आज 3 जनवरी को भारत की आदि शिक्षिका सावित्री बाई फुले की जयंती है . उन्होंने 1848 में लडकियों के लिए प्रथम स्कूल खोला था. उनकी जयंती को कुछ लोग शिक्षक दिवस के रूप में मनाने की बात करते हैं तो एक जमात इस दिन को भारतीय महिला दिवस के रूप में मनाता है . उनकी कविताओं को स्त्रीकाल के लिए प्रस्तुत कर रही हैं  प्रसिद्द लेखिका , आलोचक और दलित स्त्रीवादी सामाजिक कार्यकर्ता अनिता भारती . उनकी जयंती अवसर पर स्त्रीकाल ने सुप्रसिद्ध स्त्रीवादी चिन्तक शर्मिला रेगे को ‘ सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान‘ ( पूरी खबर के लिए लिंक पर क्लिक करें ) देने  की घोषणा की है.  ) 

अनिता भारती के द्वारा प्रस्तुति नोट : 
यह बहुत कम लोग जानते है कि भारत की पहली अध्यापिका तथा सामाजिक क्रांति की अग्रदूत सावित्रीबाई फुले एक प्रसिद्ध कवयित्री भी थी। इस ब्राह्मणवादी जाति-  समाज ने महान क्रांति सूर्या सावित्रीबाई फुले के अमूल्य योगदान का आंकलन कभी ठीक से किया ही नहीं, पर अब वह दिन दूर नही जब उनके सम्पूर्ण योगदान के पन्नों को एक एक करके खोल लिया जायेगा। उनका पूरा जीवन समाज में वंचित तबके,  खासकर स्त्री और दलितों,  के अधिकारों के लिए संघर्ष में बीता। उन्होंने लड़कियों के लिए स्कूल खोले तथा समाज में व्याप्त सामाजिक और धार्मिक रूढ़ियों के खिलाफ जंग लड़ी. उनकी एक बहुत ही प्रसिद्ध कविता है,  जिसमें वह सबको पढ़ने लिखने की प्रेरणा देकर जाति तोड़ने और ब्राह्मण ग्रंथों को फेंकने की बात करती हैं.
सावित्रीबाई फुले के दो काव्य संग्रह है- काव्यफुले( 1854) और दूसरा बावनकशी सुबोधरत्नाकर.
यहां उनके योगदान का एक पन्ना कविताओं के रुप में आपके सामने प्रस्तुत है:

नोट : कवर पेज साभार एम जी माली की किताब क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले के पेज नंबर 44 से लिया गया है. प्रकाशक- प्रकाशन विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय , भारत सरकार

सावित्री बाई फुले की किताब का कवर

1.
जाओ जाकर पढ़ो-लिखो
बनो आत्मनिर्भर, बनो मेहनती
काम करो-ज्ञान और धन इकट्ठा करो
ज्ञान के बिना सब खो जाता है
ज्ञान के बिना हम जानवर बन जाते है
इसलिए, खाली ना बैठो,जाओ, जाकर शिक्षा लो
दमितों और त्याग दिए गयों के दुखों का अंत करो
तुम्हारे पास सीखने का सुनहरा मौका है
इसलिए सीखो और जाति के बंधन तोड़ दो
ब्राह्मणों के ग्रंथ जल्दी से जल्दी फेंक दो

2,
जो वाणी से उच्चार करे
वैसा ही बर्ताव करे
वे ही नर नारी पूजनीय
सेवा परमार्थ
पालन करे व्रत यथार्थ
और होवे कृतार्थ
वे सब वंदनीय।
सुख हो दुख
कुछ स्वार्थ नही
जो जतन से कर अन्यो का हित
वे ही ऊँचे,
मानवता का रिश्ता जो जानते है वे सब
सावित्री कहे सच्चे संत ।

3.
ज्ञान नही विद्या नही उसे अर्जित करने की जिज्ञासा नही
बुद्धि होकर भी उस पर जो चले नही उसे इंसान कहे क्या ?

दे दो ईश्वर बिना काम किए बैठे बिठाए खाट पर
ढोर ड़गर भी ऐसा कभी करता नही
जिसका कोई विचार – अस्वार नही, उसे इंसान कहे क्या ?

पत्नी बिचारी काम करती रहे और पति फोकट में मौज उड़ाए
पशु पंछी में यह बात होती नही ऐसो को इंसान कहे क्या ?

दूसरों की मदद ना करे सेवा त्याग दया माया ममता आदि
जिसके पास यह सदगुण नही उसे इंसान कहे क्या ?

पशु पंछी, बंदर आदमी जन्म मृत्यु सब को ही
इस बात का ज्ञान जिसे नही उसे इंसान कहे क्या ?
4.
स्वाबलंबन का उद्योग, ज्ञान धन का संचय करो निरंतर
विद्या के बिना व्यर्थ जीवन पशु जैसा,
आलसी बन चुप ना बैठो।

विद्या प्राप्त करे शूद्रों-अतिशूद्रों के दुःख  निवारण हेतु
अंग्रेजी का ज्ञान हासिल करने का शुभ अवसर हाथ आया

अंग्रेजी पढ़ लिखकर जात-पात की दीवारों को ढहा दो।
भट ब्राम्हणों के षडयंत्रों के पिटारों को दूर फेंक दो।

5.
काम करना है जो आज, उसे अब कर तत्काल ।
जो करना है दोपहर में, उसे कर अब आकर ।

कुछ क्षणों के बाद का कार्य, इसी वक्त करो पूरा जोर लगाकर।
हो गया समाप्त कार्य या नहीं, मौत नही पूछती आकर।
( सावित्रीबाई फुले की यह कविताएं मराठी भाषा के प्रसिद्ध कवि शेखर पवार द्वारा मराठी से हिन्दी में अनुदित है)

6.
Rise to learn and Act
Savitribai Phule

Weak and oppressed! Rise my brother
Come out of living in slavery.
Manu-follower Peshwas are dead and gone
Manu’s the one who barred us from education.
Givers of knowledge– the English have come
Learn, you’ve had no chance in a millennium.
We’ll teach our children and ourselves to learn
Receive knowledge, become wise to discern.
An upsurge of jealousy in my soul
Crying out for knowledge to be whole.
This festering wound, mark of caste
I’ll blot out from my life at last.
In Baliraja’s kingdom, let’s beware
Our glorious mast, unfurl and flare.
Let all say, “Misery go and kingdom come!”
Awake, arise and educate
Smash traditions-liberate!
We’ll come together and learn
Policy-righteousness-religion.
Slumber not but blow the trumpet
O Brahman, dare not you upset.
Give a war cry, rise fast
Rise, to learn and act.

(  Sunil Sardar and Victor Paul have translated this poem)