कब तक नचवाते और तालियाँ बजवाते रहेंगे हम !

( थर्ड जेंडर की पीडा के प्रति संवेदनशीलता के साथ धर्मवीर सिंह ने अस्मिता की आवाज , उसके भीतर के अंतरविरोध , साहित्य , समाज और संस्कृति का इस मानव समुदाय के प्रति उपेक्षा भाव ,आदि को अपने इस आलेख का विषय बनाया है .)   धर्मवीर हिंदी साहित्य समाज और संस्कृति के प्रति अपनी तीक्ष्ण दृष्टि और संवेदना के साथ एक मह्त्वपूर्ण युवा आलोचक हैं तथा स्त्रीकाल के सम्पादक मंडल के सद्स्य हैं ) 
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सामाजिक समता और न्याय तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता की दृष्टि से भारतीय समाज की मनोभूमि इतनी बेअसर और बंजर है कि इस विचार का कोई बीज यहाँ लम्बी जद्दोजहद एवं संघर्ष के बाद ही किसी पौधे या वृक्ष का रूप अख्तियार कर सकता है। इसके बाद भी उसे नष्ट किये जाने के कितने षड्यन्त्र होंगें यह संदेह परे नहीं है । इतिहास में चार्वाक, लोकायत, भक्ति कालीन संतों और अधुनिक काल में सावित्री बाई फुले, जोतिबा फुले, बाबासाहब अम्बेडकर के साथ तमाम स्त्रियों, आदिवासियों और मानवाधिकारों की लड़ाई लड़ने वालों का संघर्ष इस तथ्य की ताकीज करता है । वसुधैव कुटम्बकम्का छल रचने वाले भारतीय समाज की बुनियाद ही जाति, वर्ग, वर्ण और लिंग भेद की उत्कृष्टता व निकृष्टता वाले गैर बराबरी के विचार पर टिकी है । जहाँ किसी भी स्तर पर बराबरी और समतामूलक समाज की स्थापना का सपना देखने वालों का लम्बा संघर्ष जायज और लाजमी है । खतरे की इस चेतावनी को सुनते हुए कि आने वाले समय में उनके संघर्ष को निर्रथक सिद्ध कर दिया जाएगा, अपदस्थ कर दिया जाएगा, प्रतिनायक बना दिया जाएगा और गायब कर दी जायेंगी वे तिथियाँ जहाँ अन्याय, अत्याचार, उत्पीड़न और गैर-बराबरी के खिलाफ उनकी सबसे बड़ी जीत दर्ज हुई थी । संकट के बावजूद संघर्ष के इस दौर में मुख्य धारा के उन लोगों का भी शामिल होना बेहद जरूरी है  जो उत्पीड़ितों के मानाधिकारों को अनिवार्य समझते हैं । अनका यह जुड़ाव सहानुभूतिवश नहीं बल्कि इस शर्त पर तय होगा कि किसी भी स्तर की गैर-बराबरी उनकी सांस्कृतिक-सामाजिक व्यवस्था के लिए एक कलंक है, जिसके खिलाफ संघर्ष में उनकी भागीदारी उनका प्रायश्चित है । तभी इन जनान्दोलनों के साथ हम संवाद का रिश्ता कायम कर सकते हैं अन्यथा हम हमेशा अपनी प्रतिक्रियावादी भूमिका में ही रहेंगे ।

स्त्रीवादी और दलित साहित्य से अपने जुड़ाव के चलते अनेक आयोजनों में मैंने सिद्दत से महसूस किया कि आयोजन के शीर्षक के विपरीत जाति या लिंग वाला विद्वान/विदुषी उसमें शामिल होते हुए या मुख्य अतिथि और विशिष्ट अतिथि होते हुए भी उससे एक समानान्तर अलगाव बनाये रखते हैं । अपनी शुरूवाती दो-तीन पंक्तियों में ही हमारे ये अकादमिक विद्वान अपने पुरूष या ब्राहम्ण होने की स्पष्ट उद्घोषणा करके अपनी वैचारिक स्पष्टता को सामने नहीं रखते हैं वरन् अवचेतन में ही अपने प्रतिक्रियावादी होने का प्रमाण-पत्र जारी करते हैं । यह इन जनान्दोलनों के प्रति मुख्य धारा के लोगों की गैर जनतांत्रिक एवं संवादहीन भूमिका है । एक अर्थों में इन आन्दोलनों की असफलता भी कि वे अब तक इस समाज को संवाद बनाने के लिए विवश नहीं कर सके । हालांकि मैं इस बात को स्वीकार करता हूं कि अस्मिता कि किसी भी लड़ाई को अपना लम्बा संघर्ष पहले स्वंय के दम पर ही शुरू करना होता है और उत्पीड़क को संवाद-स्थापित करने के लिए मजबूर हो जाने की प्रक्रिया को अपनाना होता है। लेकिन शेष समाज के शिक्षित प्रगतिशील लोगों का भी यह अनिवार्य कर्तव्य है कि वे इस उत्पीड़ित समाज के प्रति मानवीय-गरिमोचित सम्बन्ध को अपनायें । 

अस्मिताओं के इस संघर्ष में एक दूसरी स्थिति भी निर्मित होती है जब एक उत्पीड़ित अस्मिता दूसरी उत्पीड़ित अस्मिता के संघर्ष में साथ होने के स्थान पर आपसी टकराहट के चलते अचेतन में ही उत्पीड़क अस्मिता को ही मजबूत करने लगती है जिसका शिकार वे दोनों हैं । इस सन्दर्भ में दलित और स्त्री अस्मिता की टकराहट को देखा जा सकता है । या अब किन्नर समुदाय को भी ओ.बी.सी. वर्ग में आरक्षण देने के बाद ही स्थिति को देखा जा सकता है । इस पर हम आगे चर्चा करेंगे । बहरहाल ! अस्मिताओं के संघर्ष में यह स्थिति लाजमी होते हुए भी हमें सूजन ग्रिफिन का यह कथन याद रखना चाहिए - ष्जब कोई मुक्ति आन्दोलन सम्भावना के इस विजन की अपेक्षा शत्रु के प्रति घृणा से प्रेरणा लेने लगता है तो मानना होगा कि यह अपने आप को नष्ट करने लगा है । इसकी क्रियाएँ ही अब घावों को भरना बन्द कर देती हैं । हालाँकि यह आन्दोलन अपने आप को मुक्ति का पक्षधर घोषित करता है पर इसकी भाषा मुक्तिकारी नहीं रह जाती । इसे स्वंय अपने ही भीतर एक सेंसरशिप की जरूरत होने लगती है । सत्य की इसकी अवधारणाएँ संकीर्ण से संकीर्णतर होती जाती है और जो आन्दोलन सत्य का हृदयस्पर्शी आव्हान करते हुए शुरू हुआ था, बाहर से पांखड सा प्रतीत होने लगता है । जिन चीजों का विरोध करने का यह दावा करता है वे सभी इसमें प्रतिबिम्बित होने लगती हें, क्योंकि अब यह भी कुछ सत्यों और वक्तव्यों को दबाने लगाता हैं, और पूर्ववर्ती दमनकर्ता की भांति ही यह भी अपने-आप से छिपाने लगता है । (फेमिनिस्ट थियोरी में सूजन ग्रिफिन का लेख द वे ऑफ ऑल आइडियोलोजी ,पुनः उद्धृत बजरंग बिहारी तिवारी.)

जैसा कि मैंने पहले कहा कि अस्मिताओं के इस संघर्ष में ये तमाम स्थितियाँ सम्भव हैं । बावजूद इसके एक  समताधारित समाज-निर्माण के संघर्ष में मुख्यधारा के समाज को इनसे मुंह फेरने की जरूरत नहीं, इनके साथ चलने और इनसे संवाद कायम करने की आवश्यकता है । प्राकृतिक रूप से पुरूष और स्त्रीलिंग के श्रेणी में न आ सकने वाले किन्नर, हिंजड़ा, कोठी, अरावनी या जोगप्या नाम से पहचाने जाने वाले इस तीसरे लिंग के साथ भी हमारा उपेक्षा भाव बदस्तूर कायम है । हमारा समाज सदैव इस वर्ग को उपहास और हिकारत की नजर से देखता है । उनके प्रति अपशब्दों का इस्तेमाल आम बात है । रेलवे-स्टेशन, बस-स्टैण्ड, स्कूल, कार्यस्थल, मॉल, थियेटर और अस्पतालों जैसे सार्वजनिक स्थलों पर उन्हें एक किनारे करके उनके साथ अछूतों से भी बदतर सलूक किया जाता है । सांस्कृतिक परम्पराओं के नाम पर हम जहाँ विवाहोत्सव या जन्मोत्सव पर इनकी उपस्थिति और नाच-गान को शुभ मानते हैं, वही दिन में किसी हिंजड़े का अंतिम संस्कार हो जाना भी हमारे लिए सबसे बड़ा सांस्कृतिक पाप है । हमारी गौरवपूर्ण संस्कृति की यह संहिता है कि हिंजड़े के रूप में मरने वाले किसी व्यक्ति का अंतिम संस्कार रात में ही हो और मरने के बाद भी हिजड़े समुदाय को अपने साथी की मौत के शोक पर दो कतरा आंसू बहाने की छूट भी न देकर यह प्रावधान किया जाता है कि मृत देह को जूतों से पीटा जाए।

शादी और जन्मोत्सव पर इनकी मौजूदगी को शुभ मानकर इन्हे कुछ दान-दक्षिणा दे देना भी मुख्य धारा के समाज का एक बहुत बड़ा षड़्यन्त्र है ताकि समाज के इस वर्ग को परम्परागत तौर पर इनके पेशे में बांधकर रखा जा सके और वह शिक्षा, चिकित्सा, इंजीनियरींग और विधि जैसे मुख्य धारा के लिए आरक्षित क्षेत्रों में अपनी सहभागिता की दावेदारी न कर सके । लेकिन इस परम्परागत पेशे से जीवन-स्तर की न्यूनतम सुविधाएँ भी जुटा पाने में यह वर्ग स्वंय को असाहय पाता है, तो फिर इसे मुख्य धारा की हिंसा और यौन हमलों का शिकार होना पड़ता है । इनके साथ दुर्व्यवहार, बलात्कार, गुदा मैथुन, मुख-मैथुन, सामूहिक बलात्कार और नग्न कर तमाशा करने जैसी विभत्स घटनाओं को अंजाम दिया जाता है । इस जीवन-त्रासदी के विषय में किन्नर अधिकार कार्यकर्ता लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी अपनी पुस्तक Words without Borders में लिखती है , "There is no one in this world they can truly call their own.  They do not have any easy means of making a living…..  Their sex work causes mental pressure and anxiety and nagging questions about their identity." और इस त्रासद जीवन का अंजाम जिस रूप में होता है उसे लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी अपनी मित्र रूपा, किरण और पायल के जीवन को न बचा सकने की मजबूरी के सन्दर्भ में इस प्रकार दर्ज करती है - SALA; What is life and to bloat out this misery, make liquor his best friend.  But this association proves costly.  I thus failed to save the life or Roopa, Kiran and Payal."प्राकृतिक रूप से तीसरे लिंग में जन्म लेने की पीड़ा के ऐसे ही त्रासद अनुभव पेंग्विन द्वारा प्रकाशित ए. रेवती की पुस्तक 'A Truth about me' में भी दर्ज हैं ।

इस सामाजिक और सांस्कृतिक अपेक्षा भाव के खिलाफ और तीसरे लिंग की कानूनी स्वीकृति के लिए किन्नर-समुदाय विगत कई दशकों से अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रहा है । वर्ष 2002 में दिसम्बर में बैंगलूर के किन्नर समाज के लोगों ने बैठक कर विविधाका गठन किया और समलैंगिकता से सम्बन्धित आई.पी.सी. की धारा 377 को खत्म करने की मांग की । वर्ष 2013 के जून महिने में ही एक संगठित आन्दोलन कर ओडिशा और दिल्ली के किन्नरों ने सरकारी नौकरियों में आरक्षण की मांग की । देशभर में लगभग तीस लाख की आबादी वाले इस समुदाय को 1994 में जब भारत सरकार ने उसे कुछ सुविधाएँ देने की सोची तो भी इस शर्त के साथ कि वे स्त्री या पुरूष के विकल्प के भीतर ही खुद की पहचान तय करें । वर्ष 2009 के लोक सभा चुनाव में तीन किन्नरों का नामांकन इसलिए खारिज कर दिया गया क्योंकि उन्होंने स्त्री या पुरूष के किसी भी विकल्प को मानने से इन्कार कर दिया था । वर्ष 2014 के लोक सभा चुनाव के दौरान भी विभिन्न पार्टियों द्वारा जारी किये अपने घोषणा पत्रों में भी किन्नरों का जीवन-सन्दर्भ गायब है । किसी भी पार्टी ने देश के इतने बड़े समुदाय पर बात करनी भी जरूरी नहीं समझी, उपेक्षा का इससे बुरा आलम क्या होगा ! (हालांकि मार्क्सवादी पार्टी का घोषणा-पत्र इसका अपवाद  है) । संवेदना की तीव्रता का दावा करने वाले हमारे हिन्दी साहित्यकारों ने भी इस समुदाय की जीवन शैली और जीवन संघर्षों की अपनी रचनाशीलता का विषय बनाने में परहेज ही रखा है । राहुल सांकृत्यायन, रांगेय राघव जैसे रचनाकारों को छोड़कर आधुनिक काल में एस. आर. हारनोट, कुसुम भट्ट और कादम्बरी मेहरा जैसे लोगों की एक दो कहानियाँ या कविताएं इसका अपवाद हैं । यौनिकता (Sexuality)  को विमर्श का विषय बनाया जाना क्यों जरूरी है इसे इस सन्दर्भ से भी समझा जाना चाहिए । यौनिकता पर लिखने वालों पर हिन्दूवादी नैतिकता का डंडा  चलाने वालों के दिन अब लदने वाले हैं ।

दिनांक 15 अप्रैल, 2014 को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति के.एस. राधाकृष्णनन और न्यायमूर्ति ए. के. सीकरी ने तीसरे जेंडर को मान्यता देते हुए किन्नरों के हक में ऐतिहासिक फैसला दिया है । संविधान के तहत पुरूष और महिलाओं को प्राप्त सभी अधिकारों की तरह ही इस समुदाय के अधिकारों की संरक्षण की आवश्यकता पर बल देते हुए न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि ष्इस वर्ग के साथ हमारे समाज में हो रहा पक्षपात अकल्पनीय है । और गुणसूत्र सम्बन्धी, सैक्स, लिंग, या जन्म का लिंग या लिंग की भूमिका आदि के बावजूद उनके अधिकारों की रक्षा करनी होगी । इसलिए हम हिजड़ें या किन्नरों का संविधान के भाग-3 (मौलिक अधिकार) और संसद तथा राज्य विधान मंडलों द्वारा बनाये गये कानूनों के प्रदत्त उनके अधिकारों की रक्षा के लिए तीसरे लिंग के रूप में मानने की घोषणा करते हैं । साथ ही केन्द्र तथा राज्य सरकारों को निर्देश देते हुए न्यायालय की खंडपीठ ने कहा कि – हम केन्द्र तथा राज्य सरकारों को निर्देश देते हैं कि वे उन्हे सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के नागरिक मानें और उन्हें शैक्षिक संस्थाओं में प्रवेश तथा सार्वजनिक नौकरियों में सभी प्रकार के आरक्षण का लाभ दें ।

किन्नर समुदाय को तीसरें लिंग के रूप में कानूनी स्वीकृति मिलने की घोषणा निःसंदेह उनकी लम्बी लड़ाई के ऐतिहासिक परिणाम के रूप में देखा जाना चाहिए। जिस पर खुशी जाहिर करते हुए किन्नर अधिकार कार्यकर्ता लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी ने कहा कि ‘देश की प्रगति लोगों के मानवाधिकारों पर निर्भर करती है । हम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले से खुश हैं क्योंकि कोर्ट ने हमें भी महिला-पुरूषों की तरह अधिकार दिये हैं ।‘ लेकिन इस तीसरे लैंगिक समूह को समानता और बराबरी के लिए अभी भी एक लम्बा रास्ता तय करना है। वह केवल सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ा समुदाय नहीं है, जैसा कि सर्वोच्य-न्यायालय ने माना है । न्यायालाय के निर्णय का सम्मान करते हुए भी मैं समझता हूं कि अगर इस समुदाय को प्राकृतिक रूप से एक अलग जेंडर कैटेगरी मानकर ओ.बी.सी. से अलग कोटे के तहत इनके आरक्षण की व्यवस्था की जाती तो वह इनके लिए अधिक फायदेमंद होती । शिक्षा और सार्वजनिक नौकरियों में भी इनकी भागीदारी इस तरह की व्यवस्था करने से अधिक बढ़ती । 

लेकिन इससे भी बड़ा सवाल है कि मुख्य धारा का समाज इनके प्रति अपनी सोच बदले । इस समुदाय के प्रति अपने मन में बैठा रखे पूर्णग्रहों को दूर करते हुए इनकी पीड़ा के प्रति संवेदनशील हो । ताकि देश का यह वृहत्तर समुदाय अपने जीवन को बोझ मानते हुए आत्महत्या के लिए विवश न हो । उम्मीद की जानी चाहिए कि किन्नर समुदाय को मिले सामाजिक - आर्थिक अधिकारों की बदौलत मुख्य धारा के समुदाय की सोच में इनके प्रति बदलाव आयगा । वे मानेंगे कि इस समुदाय में पैदा हुए लोगों का जीवन केवल नाचने-गाने व हमारे मनोरंजन के लिए नहीं बना है । इसे भी मानवीय गरिमापूर्ण जीवन जीने का हक है । उनकी लड़ाई केवल उनकी अपनी नहीं है । किसी भी स्तर की गैर-बराबरी को सामाजिक कलंक समझने वाल तमाम लोगों की लड़ाई है यह । उनके संघर्ष में हमारा शामिल होना हमारा प्रायश्चित है । साथ ही यह उम्मीद हमारे साहित्यकारों से भीकी जानी चाहिए कि उनकी संवेदना के दायरे का भी विस्तार होगा । वे भी इस उपेक्षित जीवन के भीतर झांकने का साहस कर पायेंगें ।


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