स्त्रीकाल देगा शर्मिला रेगे को 'सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान '

३ जनवरी,  सावित्रीबाई फुले -जयन्ती की पूर्व सन्ध्या पर शर्मिला रेगे की किताब को सम्मान की घोषणा 

स्त्रीवादी पत्रिका , ' स्त्रीकाल, स्त्री का समय और सच' के द्वारा ' सावित्री बाई फुले वैचारिक  सम्मान' के लिए प्रथम सम्मान की घोषणा कर दी गई है . अर्चना वर्मा , अरविंद जैन , हेमलता माहिश्वर , अनिता भारती , बजरंग बिहारी तिवारी , परिमला आम्बेकर की सदस्यता वाले निर्णायक मंडल ने २०१५ के लिए शर्मिला  रेगे को उनकी किताब ' अगेंस्ट द मैडनेस  ऑफ़ मनु : बी आर आम्बेडकर्स  राइटिंग ऑन ब्रैहम्निकल  पैट्रीआर्की ' के  लिए  सम्मानित करने का निर्णय लिया . यह किताब 2013 में नवयाना प्रकाशन से प्रकाशित हुई है .



इस सम्मान के लिए २००८ से २०१३ तक हिन्दी में लिखी गई या अनूदित स्त्रीवादी वैचारिकी की  प्रकाशित किताबों पर विचार करते हुए निर्णायक मंडल ने कहा कि ' शर्मिला रेगे का अकाल-गमन और उनकी संभावनाओं का असमय समापन इस समय हमारे मन में सर्वोपरि है। हालाँकि हमारे नियमों के अनुसार लिखित अथवा अनूदित किसी भी रूप में हिन्दी में उपलब्ध किताबें ही पुरस्कार के लिये विचारणीय हैँ और शर्मिला रेगे ने यद्यपि अपनी मातृभाषा मराठी में भी पर्याप्त मात्रा में महत्त्वपूर्ण लेखन किया किन्तु उनकी कोई किताब अभी हिन्दी में उपलब्ध नहीं है। यह हिन्दी की कमी है, शर्मिला की नहीं। हम सब एकमत से यह अनुभव करते हैँ कि उनके काम और उनकी संभावनाओं को रेखांकित किया जाना चाहिए। हिन्दी की स्त्रीवादी सैद्धान्तिकी में शर्मिला रेगे की टक्कर का दूसरा काम आसानी से नज़र नहीं आता और उनके नाम, काम और प्रतिबद्धता की स्मृति को रेखांकित करना ज़रूरी लगता है। उनका लेखन और चिन्तन इतना महत्त्वपूर्ण है कि हिन्दी के पाठक समुदाय को यथाशीघ्र उपलब्ध होना चाहिये और इसके लिये एक अपवाद को जगह देना भी उचित ही होगा - इस निश्चहय के साथ कि उनकी पुस्तक को यथाशीघ्र हिन्दी में उपलब्ध कराने का दायित्त्व हमारा है।'
शर्मिला रेगे ( 7 अक्तूबर 1964 – 13 जुलाई २०१३ ) ने क्रान्ति सूर्य सावित्री बाई फुले स्त्री अध्ययन विभाग , पुणे विश्वविद्यालय का संचालन किया और राइटिंग कास्ट , राइटिंग जेंडर के लेखन के साथ दलित स्त्रीवाद की सैद्धांतिकी में महत्वपूर्ण पहल की. वे प्रसिद्द स्त्रीवादी विचारक रही हैं .

यह सम्मान पत्रिका के द्वारा  19 -20 फरवरी को , गया ( बिहार ) में  आयोजित होने वाले एक कार्यक्रम में दिया जाएगा. रेगे के लिए उनके किसी रिश्तेदार या पुणे विश्वविद्यालय के स्त्री अध्ययन विभाग को , जहाँ वे पढ़ाती थीं , सम्मान की राशि ( 12 हजार ) तथा प्रशस्ति पत्र दिया जायेगा.

निर्णायक मंडल का सम्मति नोट
स्त्रीवादी पत्रिका स्त्रीकाल के द्वारा ‘ सावित्रीबाई फुले वैचारिकी सम्मान’ की कडी मे पहले सम्मान के लिए हम शर्मिला रेगे ((7 October 1964 – 13 July 2013) की किताब "AGAINST THE MADNESS OF MANU".B.R. Ambedkar’s writings on Brahmanical Patriarchy’की अनुशंसा करते हैं। उनका जीवन, चिन्तन और लेखन स्त्री के पक्ष से संघर्ष के लिये समर्पित रहा। उनकी अन्य किताबें "WRITING CASTE/ WRITING GENDER : NARRATING DALIT WOMENS TESTIMONIES","SOCIOLOGY OF GENDER :THE CHALLANGE OF FEMINIST SOCIOLOGICAL THOUGHT” भी इसी क्षेत्र में उनका बेहद महत्त्वपूर्ण योगदान है। अनुशंसित किताब का प्रकाशन 2013में हुआ जो उनके असामयिक निधन के कारण दुर्भाग्यवश उनका अंतिम काम रह गया।

शर्मिला रेगे एक समाजशास्त्री, स्त्री-पक्ष की मानवाधिकार-कर्मी और एक सजग लेखिका थीं । भारतीय स्त्री और स्त्रीवाद; खासकर दलित स्त्री और दलित स्त्रीवाद; की सैद्धांतिकी के लिए उनके कार्य आज के समय में बेहद महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक हैं। स्त्री- मुक्ति की चिन्ताओं को लेकर वे कई प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में लगातार लिख रही थी। शर्मिला जी समाज के सबसे वंचित तबके यानी दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक वर्ग की स्त्रियों के साथ खडी रही तथा उनके अधिकारों के मुद्दों पर काम करती रही।

शर्मिला रेगे का अकाल-गमन और उनकी संभावनाओं का असमय समापन इस समय हमारे मन में सर्वोपरि है। हालाँकि हमारे नियमों के अनुसार लिखित अथवा अनूदित किसी भी रूप में हिन्दी में उपलब्ध किताबें ही पुरस्कार के लिये विचारणीय हैँ और शर्मिला रेगे ने यद्यपि अपनी मातृभाषा मराठी में भी पर्याप्त मात्रा में महत्त्वपूर्ण लेखन किया किन्तु उनकी कोई किताब अभी हिन्दी में उपलब्ध नहीं है। यह हिन्दी की कमी है, शर्मिला की नहीं। हम सब एकमत से यह अनुभव करते हैँ कि उनके काम और उनकी संभावनाओं को रेखांकित किया जाना चाहिए। हिन्दी की स्त्रीवादी सैद्धान्तिकी में शर्मिला रेगे की टक्कर का दूसरा काम आसानी से नज़र नहीं आता और उनके नाम, काम और प्रतिबद्धता की स्मृति को रेखांकित करना ज़रूरी लगता है। उनका लेखन और चिन्तन इतना महत्त्वपूर्ण है कि हिन्दी के पाठक समुदाय को यथाशीघ्र उपलब्ध होना चाहिये और इसके लिये एक अपवाद को जगह देना भी उचित ही होगा - इस निश्चाय के साथ कि उनकी पुस्तक को यथाशीघ्र हिन्दी में उपलब्ध कराने का दायित्त्व हमारा है।

हम अंतिम निष्कर्ष पर हैं कि  शर्मिला रेगे द्वारा इतने कम समय में अपनी पूरी प्रतिबद्धता, लगन, ईमानदारी और सच्चाई के साथ किया गया इतना महत्वपूर्ण काम, दलित और गैरदलित स्त्रीवाद में उसी तरह मील का पत्थर साबित होगा जैसा कि सामाजिक क्रांतिसूर्य, भारत की पहली शिक्षिका, समाज सुधारक, कवयित्री, दार्शनिक, और स्त्री अधिकारों की पुरोधा सावित्री बाई फुले का माना जाता है। हमारे अनुसार शर्मिला रेगे ही स्त्रीकाल द्वारा घोषित सावित्रीबाई फुले सम्मान 2014 की सबसे पहली और सर्वोत्तम अधिकारिणी हैं।".

अर्चना वर्मा , अरविन्द जैन , हेमलता माहिश्वर , अनिता भारती , बजरंग बिहारी तिवारी , परिमला आम्बेकर 

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