जो वैध व कानूनी है वह पुरुष का ........

अरविंद जैन
स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब 'औरत होने की सजा' हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com
( प्रज्ञा पांडेय के अतिथि सम्पादन में हिन्दी की पत्रिका ' निकट ' ने स्त्री -शुचितावाद और विवाह की व्यवस्था पर एक परिचर्चा आयोजित की है . निकट से साभार हम उस परिचर्चा को क्रमशः प्रस्तुत कर रहे हैं , प्रारंभ करते हैं अरविंद जैन के जवाब से ) 
बकौल सिमोन द बोउआर "स्त्री पैदा नहीं होती बनायी जाती है". आपकी दृष्टि में स्त्री का आदिम स्वरुप क्या है।
सिमोन द बोउआर (सेकंड सेक्स) की यह अवधारणा कि “स्त्री पैदा नहीं होती बनाई जाती है” अपने समय और समाज में सही रही है. दरअसल स्त्री पैदा ही नहीं होती बनाई भी जाती है, ताकि वो ज्यादा से ज्यादा ‘पुरुष’ पैदा करे, जिन्हें पितृसत्ता ‘मर्द’ बना अपना व्यापार चला सके. व्यापक स्तर पर यह फैलाया गया कि मातृत्व  के बिना स्त्री अधूरी है. अविवाहित, विधवा, तलाकशुदा और ‘बाँझ’ स्त्री समाज पर बोझ मानी-समझ जाती हैं.
पूरी साज़िश समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि सारी दुनिया की धरती और (स्त्री) देह यानी उत्पादन और उत्पत्ति के सभी साधनों पर पुरुषों का ’सर्वाधिकार सुरक्षित” है. उत्पादन के साधनों पर कब्जे के लिये ‘उत्तराधिकार कानून’ और उत्पत्ति यानी स्त्री देह पर स्वामित्व के लिये ‘विवाह संस्था’ की स्थापना (षड्‌यन्त्र) बहुत सोच-समझकर की गयी होगी.
भारतीय विधि-व्यवस्था में भी उत्तराधिकार के लिए ‘वैध संतान’ और ‘वैध संतान’ के लिए ‘वैध विवाह’ होना अनिवार्य है. कानून और न्याय की नज़र में, ‘वैध संतान’ सिर्फ पुरुष की और ‘अवैध’ स्त्री की समझी जाती है. इसीलिए वैध संतान का ‘प्राकृतिक संरक्षक’ पुरुष (पिता) और ‘अवैध’ की संरक्षक स्त्री (माँ) होती है. विवाह संस्था की स्थापना से बाहर पैदा हुए बच्चे ‘नाजायज’, ‘अवैध’, ‘हरामी’ और ‘बास्टर्ड’ कहे-माने जाते हैं. इसलिए पिता की संपत्ति के कानूनी वारिस नहीं हो सकते. हाँ, माँ की सम्पत्ति (अगर हो तो) में बराबर के हकदार होंगे.
इसका मतलब यह हुआ कि जो वैध और कानूनी है, वो पुरुष का और जो अवैध है या गैरकानूनी है, वो स्त्री का. ‘वैध-अवैध’ बच्चों के बीच यही कानूनी भेदभाव (सुरक्षा कवच) ही तो है, जो विश्व-भर में ‘विवाह संस्था’ को अभी तक बनाए-बचाए हुए है. जी हाँ! फिलहाल यही और ऐसे ही दोहरे और चरित्र(हीन) हैं हमारे कानून.
अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (संयुक्त राष्ट्र) की एक रिपोर्ट के अनुसार "दुनिया की 98 प्रतिशत पूँजी पर पुरुषों का कब्जा है. पुरुषों के बराबर आर्थिक और राजनीतिक सत्ता पाने में औरतों को अभी हज़ार वर्ष और लगेंगे." पितृसत्तात्मक समाजों के अब तक यह पूँजी पीढ़ी-दर-पीढ़ी पुरुषों को पुत्राधिकार में मिलती रही है, आगे भी मिलती रहेगी. आश्चर्यजनक है कि श्रम के अतिरिक्त मूल्य को ही पूँजी माना जाता है, मगर श्रम की परिभाषा मे घरेलू श्रम या कृषि श्रम शामिल नहीं किया जाता. परिणामस्वरूप आधी दुनिया के श्रम का अतिरिक्त मूल्य यानी पूँजी को बिना हिसाब-किताब के ही परिवार का मुखिया या पुरुष हड़प कर जाते हैं. उत्तराधिकार कानूनों के माध्यम से पूँजी और पूँजी के आधार पर सम्पत्ति, समाज, शिक्षा, न्यायपालिका और राजसत्ता पर मर्दों का कब्ज़ा है. आदिम स्त्री ऐतिहासिक प्रक्रिया से होते हुए ही वर्तमान स्थिति तक पहुँची है. जाहिर है कि पूँजी पर पुत्राधिकार  और विवाह संस्था में कैद स्त्री के सामने पुरुष वर्चस्व के विरुद्ध लड़ाई बहुत लम्बी और पेचीदा है.

क्या दैहिक शुचिता की अवधारणा स्त्री के खिलाफ कोई साजिश है ?
निसंदेह अक्षत योनि की कामना और वैध संतान की सुनिश्चितता के लिए स्त्री देह पर ‘पूर्ण स्वामित्व’ तथा नियंत्रण बनाए रखने की ही साज़िश है- यौन-शुचिता, पवित्रता, सतीत्व, नैतिकता या मर्यादा. तथाकथित महान भारतीय सभ्यता,संस्कृति, धर्म ग्रन्थ और परम्परा हमेशा सिर्फ स्त्रियों को ही शील, संयम, मर्यादा, नैतिकता, आदर्श और देह शुचिता के पाठ पढ़ाती रही है. सहमती से सम्भोग की उम्र सीमा 18 साल तय करने के पीछे भी यही अवधारणा रही है. इन संस्कारों की सीलन अभी भी मौजूद है, सो बदलते समय और समाज में महिलाओं को इससे मुक्त हो कर ही अपनी भूमिका निभानी होगी.

समाज  के सन्दर्भ में शुचितावाद और वर्जनाओं को किस तरह परिभाषित किया जाए।
सच तो यह है कि समाज के सन्दर्भ में “शुचितावाद और वर्जनाओं” को भी उन्ही  मौजूदा दोहरी सामजिक नैतिकता और चरित्रहीन मानसिकता में देखना होगा, जिनके अनुसार यौन संबंध ‘वैवाहिक पार्टनर’ के बीच ही ‘नैतिक’ है, बाकी सब ‘अनैतिक’. हालांकि कानून का ‘नैतिकता’ या ‘अनैतिकता’ से कोई लेना-देना नहीं है. आपसी सहमती से दो बालिग स्त्री-पुरुष के बीच विवाह-पूर्व यौन सम्बन्ध भले ही ‘अनैतिक’ माने-समझे जाते हों, मगर कानूनन कोई अपराध नहीं है.
‘व्यभिचार’ (धारा-497 आई.पी.सी.) सम्बन्धी कानून के अनुसार पुरुष (भले ही विवाहित हो) किसी भी अविवाहित, विधवा या तलाकशुदा स्त्री (स्त्रियों) के साथ सहमती से यौन रिश्ते (आप कहते रहें ‘अनैतिक’) बना सकता है। आपसी सहमती से दूसरे पुरुष की पत्नी के साथ यौन संबंध ‘व्यभिचार’ है (अगर उसके पति की सहमति या मिलीभगत नहीं है) लेकिन यदि पति (मालिक) भी सहमत हो तो, यह कोई अपराध नहीं। यानि आपस में पति-पत्नियाँ बदलना विधान-सम्मत है.
हालांकि ‘व्यभिचार’ एक मायने में स्वेच्छा से ‘सहमती’ नहीं, मानसिक अनुकूलन के बाद ‘बलात्कार’ ही है. पुरुष विवाह संस्था से बाहर जब चाहे ‘व्यभिचार’ करे, मगर पत्नी को पति या उसकी प्रेमिका के विरुद्ध आपराधिक शिकायत करने तक का अधिकार नहीं. इस आधार पर वह  तलाक लेना चाहे तो ले सकती है, बशर्ते कि प्रामाणित कर सके. यही वो कानूनी संरक्षण है जिसकी छत्रछाया में देह व्यापार फल-फूल रहा है. वर्जित समलैंगिक संबंधों को भी अपराध-मुक्त करने के लिए, सुप्रीम कोर्ट से लेकर संसद तक बहस जारी है. कभी भी ‘अध्यादेश’ जारी हो सकता है. कानूनी जाल-जंजाल में, ऐसे और भी बहुत से प्रावधान हैं मगर उन पर फिर कभी.....

बाल विवाह की ‘सामजिक कुप्रथा’ अभी भी जिन्दा है. समाज ही नहीं, बाकायदा कानून-विधि-विधान में फल-फूल रही है. वर्तमान कानून के अनुसार विवाह के लिए लड़के की उम्र 21 साल और लड़की की उम्र 18 साल होनी चाहिए, पर यदि कोई 18 साल से कम उम्र का लड़का, 18 साल से कम उम्र कि लड़की से विवाह करे, तो ना कोई कानूनी जुर्म है और ना कोई सजा. 18 साल से कम उम्र की लड़की से विवाह दंडनीय अपराध है (अगर लड़का 18 साल से बड़ा हो) और सहमती से यौन सम्बन्ध बनाने  की उम्र भी 18 साल है, मगर 15 साल से बड़ी उम्र की अपनी पत्नी से जबरदस्ती यौन सम्बन्ध ‘बलात्कार’ नहीं.
भारतीय कानून-विधान-संविधान पत्नी से ‘बलात्कार का कानूनी लाइसेंस या अधिकार’ और समाज ‘बलात्कार की संस्कृति’ को बढ़ावा देता है. विवाहित स्त्री की स्थिति “घरेलू गुलाम’ या ‘यौन दासी’ से बेहतर नहीं. स्त्री देह शोषण के लिए विवाह और वेश्यावृति की जड़ें तो भारतीय समाज की महान सभ्यता और संस्कृति का स्वर्णिम अध्याय माना जाता है. विवाह संस्था में स्त्री, पति की ‘निजी संपत्ति’ है और वेश्यावृति के प्राचीनतम धंधे में स्त्री ‘सार्वजनिक संपत्ति’. देवदासी से लेकर आधुनिकतम ‘एस्कॉर्ट्स’ तक, यह मर्दों का ‘आनंद बाज़ार’ ही नहीं ‘व्यवसाय भी है. हालांकि वेश्या या ‘काल-गर्ल’ से यौन सम्बन्ध बनाना, भले ही ‘अनैतिक’ बताया जाता है, मगर पुरुष ग्राहक पर कोई अपराध नहीं. पकड़ी गई तो वेश्या को ही जेल जाना होगा.
ऐसे आधे-अधूरे और गड्ढे भरे कानूनों से ना तो 'बाल विवाह', 'बाल तस्करी', 'बाल वेश्यावृति' को रोका जा सकता है और ना ही स्त्री विरोधी हिंसा या यौन हिंसा को. वैधानिक प्रावधानों में अंतर्विरोधी और विसंगतिपूर्ण 'सुधारवादी मेकअप' से, स्त्री के विरुद्ध हिंसा कम होने की बजाये बढ़ी है, बढती रही है और बढती रहेगी। ऐसे में सामाजिक नैतिकता और शुचिता या वर्जना को भी नए सिरे से परिभाषित करना होगा.


यदि स्वयं के लिए वर्जनाओं का  निर्धारण  स्वयं स्त्री करे तो क्या हो? 

वर्जनाओं का स्वयं निर्धारण करने वाली शहरी, शिक्षित, साधन संपन्न स्त्री (बागी  नायिकाओं) का निर्णय हमारे सामने है कि "हम देह नहीं सिर्फ देह की (कामुक-उतेजक) छवि बेच रही हैं, जो सचमुच देह बेचने या गुजारे के लिए विवाह बंधन में बंधने से कहीं ज्यादा फायदेमंद और सम्मानजनक है”. सह जीवन में भी वह अपनी स्वतंत्रता, प्रेम, इच्छा, आकांक्षा और सपने को ही अभिव्यक्त कर रही है. विशेषकर आज़ादी के बाद शिक्षा-दीक्षा के कारण स्त्रियाँ निरंतर बदली हैं, बदल रही हैं, मगर यह भी मत भूलें कि देश की अधिकांश ‘आधी आबादी’ अभी भी अशिक्षित, निर्धन और अधिकारहीन हैं....दलित और आदिवासी हैं.
अधिकांश भारतीय पुरुष या ‘मर्द’ अपनी मानसिक बनावट-बुनावट बदलने को तैयार नहीं है. उनके लिए यह सत्ता से भी अधिक, लिंग वर्चस्व की लड़ाई है. राष्ट्रीय स्तर पर हम लोकतांत्रिक देश के नागरिक हैं, जिन्हें संविधान के तहत तमाम मौलिक अधिकार प्राप्त हैं. लेकिन घर में तो अभी भी मुखिया की तानाशाही चलती है, गाँव में ‘खाप’ का हुकुम चलता है और ‘सभ्य समाज’ हरदम स्त्री पर ‘स्टेनगन’ ताने रहता है. समानता के संघर्ष में स्त्रियों का दबाव-तनाव बढ़ता है, तो कुछ ‘कॉस्मेटिक सर्जरी’ की तरह नए विधि-विधान बना दिए जाते हैं और कुछ और सुधारों के सपने दिखा दिए जाते हैं.

विवाह की व्यवस्था में स्त्री  की मनोवैज्ञानिक ,सामाजिक एवं आर्थिक स्थितियां कितनी स्त्री  के पक्ष में  हैं?  
      इस संदर्भ में दहेज़, दहेज़ हत्या, हत्या, आत्महत्या, घरेलू हिंसा और मानसिक उत्पीड़न के आंकड़े   बताने-गिनानें की जरूरत नहीं है. जैसा मैंने पहले कहा कि उत्तराधिकार के लिए ‘वैध संतान’ और ‘वैध संतान’ के लिए ‘वैध विवाह’ होना अनिवार्य है. मौजूदा उत्तराधिकार कानून और विवाह व्यवस्था का कारगर विकल्प तलाशे बिना, स्त्री की सामाजिक और आर्थिक स्थिति में कोई आमूल-चूल बदलाव होना असंभव है. स्त्री के लिए विवाह संस्था सचमुच एक ऐसा कारागार है, जिससे भागना नामुमकिन और भागो तो संगीन अपराध. तमाम विधि शास्त्र पुरुषों ने अपने ही   पक्ष में गढ़े है. वैवाहिक पुनर्स्थापना ( Restitution of conjugal rights) से लेकर विवाह विच्छेद तक सारे कानून, स्त्री के खिलाफ इतने हत्यारे शब्दों में रचे-बसे हैं कि सालों कोर्ट-कचहरी करने के बाद भी समझना मुस्किल है.
      अंतरजातीय और अंतर्धार्मिक विवाहों में तो हालात और जटिल हैं. भारत की संसद ने ‘विशेष विवाह अधिनियम,1954’ बनाया, जिसमें अलग अलग धर्म से सम्बद्ध दो वयस्कों के विवाह का प्रावधान है, जिसमें जरूरी नहीं कि कोई स्त्री या पुरुष अपना धर्म बदले। मगर इस कानून में आज भी यह प्रावधान है कि अगर कोई अविभाजित हिन्दू परिवार का सदस्य गैर धर्म के व्यक्ति से विवाह करता है, तो विवाह के फ़ौरन बाद उसके अविभाजित हिन्दू परिवार से सारे सम्बन्ध समाप्त माने जायेंगे। संपत्ति में अगर कोई हिस्सा बनता है तो ले लो, लेकिन सदा के लिए दफ़ा हो जाओ। हम (हिन्दू) अपने परिवार में, गैर धर्म की बहू या दामाद को स्वीकार नहीं कर सकते और नहीं करेंगे। भारत बना रहे, ‘धर्म-निरपेक्ष’ और ‘लोकतांत्रिक’ देश।

मातृसत्तात्मक व्यवस्था में विवाह-संस्था क्या अधिक  सुदृढ़ और समर्थ होती। तब  समाज भ्रूण हत्या, दहेज़ हत्या एवं बलात्कार जैसे  अपराधों से कितना मुक्त होता? 
नहीं... मातृसत्तात्मक व्यवस्था में भी पूँजी का नियंत्रण मर्दों के ही हाथ में (रहता) है. बीना अग्रवाल की पुस्तक ‘ए फील्ड ऑफ़ ओन’ पढ़ कर देख लें. इस संदर्भ में यह किताब दक्षिण एशिया के देशों के में महिलाओं की आर्थिक स्थिति के बारे में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है. सामजिक-आर्थिक-राजनीतिक सत्ता पर, वहाँ भी पुरुषों का ही कब्जा और कानून लागू है. संसद और विधान सभा में मर्दों का बहुमत है, सो वो ऐसा कोई कानून नहीं बनायेंगे, जो उनकी जड़ों में मट्ठा डालने का काम करे. ‘महिला आरक्षण विधेयक’- अभी नहीं, कभी नहीं. सारे कानून मर्दों के हितों और वर्चस्व को बनाये-बचाये रखने वाले ही बने-बनाये गए हैं. हालांकि उपरी तौर पर ढिंढोरा यह पीटा जाता है कि ‘स्त्री सशक्तिकरण’ के लिए, संसद और विधान ने ना जाने कौन-कौन से विधेयक पारित किये है. वास्तविकता यह है कि दांपत्य में यौन संबंधों के बारे में सदियों पुराने कानून, सामंती सोच और सीलन भरे संस्कारों में, कोई बदलाव नहीं हो पा रहा। मालूम नहीं इस सवाल पर सबने, क्यों 'मौनव्रत' धारण कर लिया है।
मातृसत्तात्मक व्यवस्था वाले राज्यों में भी अपराधियों का राजनीतिकरण और राजनीति का अपराधीकरण बढ़ गया है. राजनीति में वहां भी, स्त्रियाँ परिधि पर हैं और निर्णायक स्थलों पर उनकी भूमिका गौण ही है. वर्तमान दहशतज़दा माहौल में यौन हिंसा की शिकार औरत की चीख, आखिर कौन और कब सुनेगा? मेरे विचार से स्त्री के दमन, उत्पीड़न और शोषण के खिलाफ़ कानून बनने-बनाने में सबसे बड़ी बाधा है- राजनीति और सत्ता में ‘मर्दवादी’ नेताओं की षड्यंत्रपूर्ण चुप्पी और अपने अधिकारों के प्रति स्त्री आन्दोलन के दिशाहीन भटकाव. 67 साल से दमित, शोषित और पीड़ित आत्माओं की चीत्कार, न संसद को सुनाई देती है और न ही सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच पाती है। इसे 'आधी दुनिया' का दुर्भाग्य कहूं या अपने ही पिता-पति और पुत्र का सुनियोजित षड्यंत्र?

सह जीवन की अवधारणा क्या स्त्री के पक्ष में दिखाई देती है। 
 सह-जीवन मौजूदा कानूनों के जाल-जंजाल से बचने के विकल्प के तौर पर ही अपनाया      गया लेकिन इसके अपने अंतर्द्वंद और विसंगतियां हैं. विवाह संस्था में सड़ते संबंधों और घुटन की वजह से ही ये नई पगडंडियाँ विकसित हुई हैं. सहजीवन की अवधारणा स्त्री के पक्ष में कितनी कारगर सिद्ध होगी अभी कहना मुश्किल है. यह सही है कि फिलहाल संकट टालने के लिए संसद ने “घरेलू हिंसा अधिनियम” में इसे स्वीकार कर लिया, लेकिन समाज ही नहीं बल्कि सर्वोच्च न्यायालय तक, समय-समय पर विरोधी मुद्रा अपनाता रहता है और सहजीवन में स्त्री और बच्चों की वैधानिक स्थिति, विवाह में पत्नी और बच्चों की वैधानिक स्थिति के बराबर मानने को तैयार नहीं है. इस संदर्भ में आये निर्णय बेहद विवादास्पद है. उपनिवेशों को सम्पूर्ण रूप से मुक्त ना होने देने के हर संभव प्रयास किये जा रहे हैं. धार्मिक, साम्प्रदायिक, जातीय और सांस्कृतिक पहचान के संकट और संघर्ष भी निरंतर गहरा रहे हैं.
     धार्मिक आस्थाओं और विश्वास की नींव पर निरंतर बढ़ रहे उन्माद और हिंसक माहौल में सहजीवन का हार्दिक स्वागत कैसे हो सकता है? ‘धर्म का सवाल’ अभी भी बहुत से ‘अगर-मगर’ और ‘किन्तु-परन्तु’ से बुरी तरह घिरा हुआ है। जन्म से लेकर अंतर्धार्मिक विवाह, गुजाराभत्ता, बच्चों की द्त्तकता, संरक्षता, उत्तराधिकार, नौकरियों में आरक्षण और धर्मांतरण तक, धर्म के बन्धनों से मुक्ति के यक्ष प्रश्न समाप्त नहीं हुए। दरअसल ऐसे ‘विद्रोही स्वर’ को लेकर संविधान और समाज के बीच पसरे अन्तर्विरोध और विसंगतियां, रोज़ नए भेष-भूषा में नज़र आयेंगे। सहजीवन में भी रही या रह रही स्त्री के विरुद्ध हिंसा, यौन हिंसा, उत्पीड़न, शोषण और अत्याचार किसी भी मायने में कम होने की बजाय बढ़ा ही है. ऐसे में स्त्री पहले से अधिक अकेली खड़ी दिखाई देती है, क्योंकि घर छोड़ने के बाद परिवार भी साथ नहीं देता.
      संयुँक्त परिवार लगभग टूट चुके हैं, एकल परिवार गंभीर संकट में हैं, युवा रक्त सहजीवन में नव परिवार और प्रेम की सहज अभिव्यक्ति के साथ अपने सुखद भविष्य या विकल्प की खोज में लगा है. कारण स्पष्ट है कि विवाह और तलाक़ सम्बन्धी एक तरफ़ा कानून स्त्री को सुरक्षा कम देते हैं, भयभीत ज्यादा करते हैं. उम्र से लम्बी, उबाऊ-थकाऊ और घर बिकाऊ ‘कोर्ट-कचहरी’ से हैरान-परेशान स्त्री-पुरुष, निश्चित रूप से एक नए समाज की संकल्पना करेंगे...कर रहे हैं. यहीं से व्यक्ति, परिवार और समाज के बीच आपसी टकराहट शुरू होती है, जो सांस्कृतिक क्रांति को जन्म देगी.
8. साथ होकर भी पुरुष एवं स्त्री की स्वतंत्र परिधि क्या है।
कैसे बताऊं- समझाऊं कि जिस समाज में आये दिन (दलित) महिलाओं को कहीं न कहीं निर्वस्त्र घुमाया या जिंदा जलाया जाता हो, धमकाया जाता हो, जबरन वेश्या बनाया जाता हो, धर्म के नाम पर बहलाया- फुसलाया जाता हो, बेटियों को गर्भ में ही मरवाया जाता हो, भेड़-बकरियों की तरह खरीदा-बेचा जाता हो और  खाप पंचायतों के आदेश-अध्यादेश पर प्रेमी युगलों को पेड़ों पर लटकाया जाता हो- वहाँ पुरुष और स्त्री की स्वतंत्र परिधि क्या हो सकती है.
हां! शिक्षित-समृद्ध-साधन-सम्पन्न और कुछ अति-आधुनिक शहरी औरतों को थोड़ा आजाद  माना-समझा जा सकता है, जिनकी पहुंच ‘ऊपर तक’ है. मगर देश की उन आम औरतों का क्या, जिनकी व्यथा-कथा सुनने वाला कोई नहीं. अफसोस कि अधिकांश प्रतिभाशाली और क्रांतिकारी संभावनाओं को,  सत्ता संस्थानों ने खरीद लिया हैं या राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पूंजी की गुलाम या पेशेवर दलाल बना दिया हैं.
लेकिन धीरे-धीरे स्त्री ने इसे सड़क से संसद और सर्वोच्च अदालत तक, भरपूर चुनौती देते हुए तोड़ना शुरू कर दिया है. उसने अपने आप को “मर्दों के पाँव की जूती”, बनने-मानने से मना कर दिया है. तमाम अवरोधों और सीमाओं के बावजूद, वह “स्त्री उपेक्षिता” नहीं, बल्कि खुद अपने आप को तलाशती-तराशती रही है. पुरुषों की “यौन राजनीती” के चक्रव्यूह को भेद ध्वस्त करती रही है. स्त्री- देह, धरती या योनि नहीं है, इसलिए ‘वसुंधरा’ और ‘बीज’ के अंतर्संबंधों की प्रक्रति, नए सिरे से गढ़ी जा रही है. यौन शोषण-उत्पीड़न और दमन के खिलाफ़ लामबंद हो, पुरजोर विरोध (विद्रोह) करती रही है. भ्रूण हत्या, दहेज़ हत्या, हत्या, यौन हिंसा, घरेलू-हिंसा से लेकर यौन शोषण और अन्याय के विरुद्ध, इंसाफ़ की तलाश में निर्णायक स्त्री-संघर्ष लगातार मुखर होता जा रहा है. ‘चुप्पी का षड्यंत्र’ या “षड्यंत्र की चुप्पी’ निरंतर टूट-फूट रही है. अपने कानूनी और मानवीय अधिकारों के प्रति सचेत-सजग और जागरूक होती ‘मानुषी’ सिर्फ अपने अस्तित्व की ही नहीं, बल्कि अस्मिता की भी लड़ाई लड़ती रही है.
यह सच है कि जैसे-जैसे स्त्री का विरोध-विद्रोह बढ़ रहा है, वैसे-वैसे पुरुष अधिक हिंसक और हत्यारा होता जा रहा है. स्त्री के विरुद्ध पुरुष जितना हिंसक और हत्यारा हो रहा है, स्त्री का “घरे-बाहिरे” प्रतिरोध-प्रतिशोध भी उतना ही बढ़ रहा है. मैं इसे ‘वस्तु से व्यक्ति बनती’ औरतों की “मौन क्रांति” मानता हूँ, जो सतह पर कम मगर समाज में भीतर-ही-भीतर ज्वालामुखी की तरह फैल रही है. कहना कठिन है कि संरचना की इस ऐतिहासिक प्रक्रिया में ज्वालामुखी, कब-कहाँ और कैसे नज़र आएगा. ‘स्त्री मुक्ति का सपना’, हर स्तर पर बराबरी और इन्साफ का ही सपना है. 
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