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स्वप्न समय : बीहड़ में उतरती भाषा

( सुप्रसिद्ध कवयित्री सविता सिंह की किताब स्वप्न समय की समीक्षा कर रहे हैं युवा समीक्षक आशीष मिश्र और इसी किताब की कविताओं के प्रसंग से सुप्रसिद्ध आलोचक विजय कुमार का एक पत्र कवयित्री के नाम ) 


आशीष मिश्र

इस बीच स्त्री लेखन के प्रति हिन्दी में एक स्वीकार भाव आया है, बाजार और मीडिया ने जगह दी  है, पर सजग और सशक्त आलोचना के अभाव में बहुत कुछ कूड़ा-करकट भी उड़ रहा है। अभी तक हिन्दी आलोचना में पुरुष ही प्रभावी हैं, जो स्त्री-लेखन को अपने ही बोध के दायरे में समझने का प्रयास कर रहे हैं। यह आज़ भी श्लील और अश्लील के विवाद में उलझा हुआ है। हिन्दी के महाबली आज़ भी इसे वर्ग की धारणा में किसी तरह समंजित कर या फ़िर अपने सांस्कृतिक अतीत-व्यतीत की सीमा में किसी तरह खपा कर प्रतिमान गढ़ने का प्रयास कर रहे हैं। स्त्री-कविता लेखन इससे बहुत गहरे में प्रभावित भी हुआ है। स्त्री-लेखन का बड़ा हिस्सा मर्दवादी भाव-बोध की ही पुनर्रचना या पुनरुत्पादन है। यह न रचने की अपेक्षा घातक है। यह अपने प्रतिरोधी संसार को ही सांस्कृतिक स्तर पर मज़बूत करना है। अपने मौलिक आत्म पर एक और परत चढ़ा लेना है। इस सबसे निकल पाना एक स्वचेतस आत्म के बिना असम्भव है। इन स्थितियों में सविता सिंह की कविताओं की निर्व्याज दृष्टि, उसकी शुभाकांक्षा और इन सबके साथ गहराइयों में उतर पाने और उसे अभिव्यक्त कर पाने में समर्थ भाषा आशा जगाती है।

सविता सिंह की कविताएं एक मुक्त आत्म से पैदा नई कविताएं हैं। इस संग्रह को हिन्दी स्त्री कविता लेखन की परम्परा में समझने का प्रयास गलत निष्कर्ष पर ले जाएगा। मुक्ति इनके सृजन का सब-सेट नहीं है। एक-एक शब्द मुधुमक्खी की तरह इसी सजग कर्म में नियोजित है। यहाँ स्त्रीवादी नारों का अभाव मिलेगा(फलतः पल्लवग्राहकता सम्भव नहीं)। अतः एक-दो कविताएँ और कविता की(से) छिटकी हुई पंक्तियाँ उठा कर यूरेका-यूरेका चिल्लाते हुए इस गहरे सांस्कृतिक कर्म का इतिसिद्धम कहना कठिन। इस संग्रह की कविताओं से गुजरते हुए गहन सर्जनात्मकता जिस सहजता से हमारे चेतन-अवचेतन के विविध स्तरों को बदलने में सक्रिय होता है, इसका अनुभव हमें अपनी दुनिया के प्रति और ज़्यादा सजग और संवेदनशील बनाता है। सर्जनात्मकता के साथ सहजता इस बात का प्रमाण है, कि उनका मक़सद सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना नहीं है; इसके उलट बे-आवाज़ सब कुछ बदल देना है। इस  संग्रह की दूसरी ही कविता में सविता सिंह अपने जीवन और सृजन का एक बिम्ब रचती हैं; जो उनके रचना-कर्म को समझने में एक सूत्र हो सकता है–
“और यह जीवन भी है जैसे अपना ही हाथ उलटा पड़ा हुआ
किसी पत्थर के नीचे
इसे सीधा करते रहने का यत्न ही जैसे सारा जीवन”
संग्रह की छोटी-लम्बी अधिकांश कविताएं एक सांस्कृतिक व्यूह रचना की तरह लगती हैं। कविताओं के तल में इस बात की सु-व्यग्रता मिलती है, कि हमारे चरों तरफ़ स्त्री आत्म को निरस्त करते हुए जो कुछ फैला है, उसे कैसे बदल दिया जाए। सविता सिंह के पास एक संवेदनशील हृदय और दुनिया-जहान के विस्तृत अनुभवों के साथ जरूरी दार्शनिक विवेक भी है। बिना विवेक के अनुकूलित संवेदन स्त्री के लिए पाश बनता जाता है। और दूनिया का मर्दवादी बोध इसे प्रमाणित करता है। इस तरह एक स्त्री अपने दमन के खडयंत्र में स्वयं ही सम्मिलित हो जाती है। वे एक कविता में लिखती हैं– “मेरे होने और देखने के बीच थी सारी सृष्टि”। स्त्री के लिए अपना ‘स्व’ हो पाना और उसको देख पाना सबसे बड़ा संकट है। उसके होने और देखने के बीच उसे स्थगित रखने वाला पूरा दृश्यप्रपंच है। विवेक और सदाकांक्षा के अभाव के कारण ही स्त्री-लेखन का बहुत बड़ा हिस्सा सह-उत्पादन या पुनरुत्पादन-जैसा है। मर्दवाद के कन्धे पर बैठ कर उसी को गुदगुदाने वाले सांस्कृतिक उत्पादन में लेखिकाओं की बड़ी संख्या नियोजित। इसे बाजार और बहुराष्ट्रीय पूँजी-तंत्र की सह भी प्राप्त है। बाज़ार को आह चाहिए और उन्हें वाह- विन-विन थियरी! स्वप्न के फ़ूल शीर्षक कविता की कुछ पंक्तियाँ

“कमरे के किनारे की गोल मेज़ पर
सजे प्लास्टिक के फूलों की तरह
वह यथार्थ है जिसे वह कुछ और समझ बैठी है
कोई भरमाये हुए है उसको जबकि वह जाए अगर अपनी प्रिय कविताओं की तरफ़
वे दिख सकती हैं किस तरह चीजें रहती हैं
अपनी उदास कृतिमताओं में
हमारी लिप्साओं से कैसे जन्म लेती हैं पुरुषार्थ की शक्तियाँ
महत्वाकांक्षाएं किस तरह वेश्याएँ बनाती हैं”

सविता सिंह एक-एक शब्द का चुनाव बहुत सचेत ढ़ंग से करती हैं। पहली पंक्ति में आए ‘किनारे की गोल मेज़’ पर ध्यान दें,इन्हें खोले बिना लेखिका के रचना-केंद्र तक पहुँचना कठिन है। संग्रह की कविताओं से पता चलता है कि सविता सिंह का स्त्रीवाद बहुत व्यापक है और उनके लिए मुक्ति सिर्फ़ स्त्री-मुक्ति नहीं है। यहाँ कविताएं मुक्त करती हैं; सीमा नहीं बनाती हैं। इनके लिए सीमाएँ और किसी भी तरह का शोषण मर्दवाद का ही प्रतीक है। सभी सुन्दर चीज़ों को बचाना उनके स्त्रीवाद का ही अंग है। उनके यहाँ प्राकृत और उसके विविध उपदानों को विषय बनाने वाली ढ़ेरों कविताएँ हैं। संग्रह में एक कविता है– नई आवाज़ें। सुबह की बारिश का संवेदनशील चित्रण है। इस चित्रण में प्रकृति के साथ भाव और व्यंजना की विविध परतें हैं। अगली पंक्ति में लिखती हैं –“जिनके यूँ होने से बचा रहता है बहुत कुछ”। उनके लिए स्त्रीवाद सबकुछ को मुक्त करने और सुन्दर को बचा लेने की ललक का नाम है। उनके इस स्वप्न का दायरा बहुत व्यापक है। इसमें मध्य भारत के धधक रहे जंगलों की भी अनुगूँज हैं। इस संग्रह में ‘स्वप्न के राग’ और ‘कारतूस’ शीर्षक कविताएं इस सन्दर्भ में उल्लेखनीय हैं।

सविता सिंह के साथ हिन्दी कविता सृजन के उन क्षेत्रों में प्रवेश करती है जहाँ इसके पहले कभी नहीं गयी। मेरी समझ से इसका कारण यह है कि लेखकों का जीवन-बोध सापेक्षतः जीवन का सामान्य बोध होता या उससे बहुत ज़्यादा समंजित। अतः भाषा के लिए भी कोई नितांत मौलिक संघर्ष नहीं होता, भाषाएँ समान्यतः उनके बोध से अनुकूलित हैं। लेखिकाएँ पुरुषों द्वारा गढ़े गए स्त्रीवादी नारों में उलझ कर अपने प्रतिरोधी दुनिया को ही रचती रहती हैं। इस तरह जीवन बोध का एक प्रतिगामी सम्बद्धता बनती है। इसे तोड़ने के लिए एक विरल मेधा की अवश्यकता है होती है। सविता सिंह की कविताएं इस सम्बद्धता को तोड़ती हुई अपने बोध को रोप देती हैं। यहाँ कविता विविध स्तरों पर पुंसत्त्वादी अनुभवों को डिकोड करती हुई अपने अनुभवों की कोडिंग करने में सक्रिय दिखेगी। यह चेतन-अवचेतन के जिन गहरे स्तरों की बात है वहाँ मुक्तिबोध के बाद हिन्दी कविता में किसी ने उतारने की कोशिश नहीं की। ये कविताएं वहाँ पहुँचने और उसे बदलने के लिए नई भाषा, नई प्रविधियाँ ईज़ाद करती हैं। इस प्रक्रिया में अगर संग्रह की कुछ कविताएं मेटाफ़िजिकल लगें तो स्वाभाविविक है। यह एक भाषिक प्रविधि है। यह बात सर्व विदित है कि मुक्तिबोध की भाषा के बारे में रामविलास शर्मा ने यही भूल की थी। यहाँ भाववादी और मेटाफ़िजिकल प्रतीकों का उपयोग है। पर बहुत सजग ढ़ंग से उन्हें नये संदर्भों में अपने अनुकूल ढ़ाल लिया गया है। संग्रह के शीर्षक कविता की आरंभिक पंक्तियाँ

“यूँ स्वप्न से शुरू हुआ यह जीवन
जैसे कि इससे पहले कुछ और न था
चेतना थी तो स्वप्न की ही
नीली सफ़ेद कहीं चितकबरी
किसी भूरे विस्तार में अधलेटी
अलसाई उठती फिर गिरती किसी नीद में”


यह कविता वहाँ खड़ी है, जहाँ एक स्त्री-आत्म मर्दवादी सांस्कृतिक अतीत से अपने वर्तमान को, अपने होने को संभव करती है। यहाँ अपने स्व को उसके वास्तविक रूप में पाने की छटपटाहट है।
एक कविता में लिखती हैं, कि ‘यदि मैं सच्चाई को जानना चाहूँ तो मुझे नीद के उस तट पर जाना होगा जहाँ स्वप्न की नदी बहती है और फ़िर उसके नीले जल में उतरना होगा’। यह एक फांतासी है। संग्रह में एक कविता है-‘चाँद तीर और अनश्वर स्त्री’। यह इनकी सर्जनात्मक क्षमता का प्रमाण है। मुझे लगता है इस संग्रह की कविताओं की भाषा पर अलग से और गम्भीरता से विचार करने की जरूरत है; इसमें ऐसा बहुत कुछ है जो हिन्दी कविता के लिए नया है तथा जिससे कविता के भविष्य के प्रति आशा बँधती है।

विजय कुमार का पत्र 

प्रिय सविता जी

आपकी कविताओं से गुज़रना सचमुच एक आह्लादकारी अनुभव है..सोचते हुए कई बातें दिमाग में आती रहीं. मैं उन्हें लिख देना चाहता हूं.  लेकिन सच तो यह भी है कि आपकी कविताओं पर एक औपचारिक सी प्रतिक्रिया लिखना मुझे एक गहरे संकोच से भी भर दे रहा है  . भीतर उत्साह और संशय दोनों है.   क्योंकि कविताओं को पढना एक बात है और अपने इम्प्रेशंस को  शब्दों में बांधना एक बिल्कुल दूसरी बात . दूसरी बात  यह भी है कि आपने जिस मनोभूमि का संधान किया है  उसे रेखांकित करने और उस  पर कुछ कहने के लिये ज़रूरी टूल्स भी उपलब्ध नहीं है .

ईमामदारी की बात है कि हिन्दी काव्य की आलोचना जिन अवधारनाणों  पर पली- पुसी है वे ज्यादा  काम भी नहीं आते ऐसे वक्त. . मैंने शायद उस  दिन आपसे कहा था कि संवेदन और भाषा की द्वंद्वात्मकता के वे तमाम दुर्गम  इलाके होते हैं , उन्हें परिभाषित करना अपने आप में एक चुनौती होती है.   ऐसी किसी द्वन्द्वात्मकता को निभाते हुए  आप जिस प्रकार के एक sense of inversion को  रचती हैं वह हिन्दी कविता में अनूठा है , गहन है, जोखिम से भरा हुआ है. उसका फौरी अर्थ नहीं लिया जा सकता .मेरा जैसा व्यक्ति इन कविताओं को पढकर एक पाठक के रूप में अपना एक ‘ पाठ ’ ही तो बना सकता है जो कि सम्भव है कि सिरे से गलत भी हो. पर उसके अलावा कोई और राह भी दिखाई नहीं पडती .

कवयित्री सविता सिंह

मैं अपनी बात को इसी  रूप में  कह सकता हूं  कि मेरे लिये रचित  के भीतर से झांकती यह द्वंद्वात्मकता सबसे महत्वपूर्ण चीज़ है ., आपके इस कविता संग्रह के शीर्षक में यह उभयधर्मिता  है और तमाम कविताओं में भी. . स्वप्न और समय के ये रिश्ते जिनमें परिचित , अभ्यस्त और ज्ञात के सीमांत पर वह झिलमिलाता हुआ , अभी दिखता और अभी विलुप्त होता हुआ संसार . वही तो  इन कविताओं की सबसे बडी मार्मिकता है. अपने होने या दिये हुए बोध का अतिक्रमण करने की वह बुनियादी इच्छा . समर्पण और एकांत की विभाजित उपस्थिति – उसका यह निराला sensation  पढने वाले को बांधता है . इस sensation को आप कुछ भी नाम दे सकते हैं. चाहे तो उसे आजकल की दुनिया में सुविधा के लिये ‘स्त्री चेतना ‘ भी कह सकते हैं. पर कविता जैसी विधा में कोई भी अर्थ इतने भर से व्याख्यायित नहीं हो जाता. यह   जिस तरह की कविता  हैं वह निष्कर्षों की नहीं, प्रक्रियाओं की कविता कहलायेगी.सूक्ष्म और जटिल संवेगों की कविता.  वहां  अनुभव प्रक्रियाओं का एक खुला और निष्प्रभ संसार है. अर्थ को आमंत्रित करता हुआ भी और उसे नाकाफी बनाता हुआ भी.  इस द्वंद्वात्मकता में वे चरम से दिखायी देने वाले सारे क्षण जहां रचयिता का सबसे अधिक आत्म- विसर्जन है और सबसे अधिक आत्म -चेतस स्थिति भी;  जहां वजूद की चरम सांसारिकता भी है और एक अधिभौतिकता भी ; मनोभावों के वेग की रचना भी और उन्हें देखनें निरखने की आवश्यक तटस्थता भी . इसे कोई दूसरे से यूं ही सहज उपलब्ध नहीं कर सकता , यह एक रचनाकार की  कुल जमा मानसिक संरचना , यथार्थ बोध और उसके अनुभूति विधान का एक अभिन्न हिस्सा होता है. कहना न होगा कि  कला में ऐसी कोई भी द्वंद्वात्मकता एक सजग रसिक को  हमेशा आकर्षित करती है क्योंकि वह जानता होता है कि इसी मे रचनाकार की रचनात्मक ऊर्जा का वास  है . दूसरे शब्दों में कहूं कि कोई भी रसिक   उस ज़मीन से गहरे obsessed  होने के लिये बाध्य  है जहां उसे एक कलाकार सबसे अधिक निर्वैयक्तिक लगता  है और सबसे अधिक subjective    भी  .

इसी बात पर मुझे याद आता है कि अपने चारों ओर के निज़ाम और जीवन परिस्थितियों के बीच हमारी subjectivities  किस प्रकार से अपना आकार लेती हैं , हमारी ‘ आइडेंटिटी ‘ किस तरह से बनती है, कैसे दैनंदिन हमारी चेतना में शामिल हुआ रहता है , किस प्रकार से वह कला अभिव्यक्तियों  में अपनी भूमिका अदा करता है , इसकी रुचि आज हमारी भाषा में तो लगभग नहीं के बराबर है, पर है वह बहुत बुनियादी और  महत्वपूर्ण बात.  Zizek  को पढता हूं तो उनकी एक दिलचस्प बात याद आती है कि the identity of something is outside of itself. There is, as it were , a hole in everything, a little piece  missing that can be found beyond itself, revealing the truth of being.  यह जो रिश्ता है हमारा अपने चारों ओर से वह किस तरह से हमारे भीतर से अपना रास्ता बनाता है इसे जानना बहुत उत्तेजक अनुभव है. अपने होने के सेंसेशन और और सपूर्णता की किसी छवि , किसी मिथ के बीच पसरा हुआ वह तनाव जिसमें हम कला की दुनिया को रचते हैं , यह लगातार बहुत चुनौतीपूर्ण बना रहता है.
‘ देह ‘ को एक बुनियादी मैटाफर बनाना   और उसी के  आधार पर तमाम तरह के रहस्यों , पार्थिव कामनाओं , गतिशीलताओं , द्वंद्वों  , एहिकताओं,  जकडनों , स्वप्नों , मुक्ति की अभीप्साओ,   , राग- विराग की सघनताओं को रचना , ठहरना , उनका गहन  पर्यवेक्षण  और उनके  पार चले जाने की यह विकलता . सदियों  से स्त्री ने अपनी इस देह के ऑबसेशन को कला में रचा है क्योंकि इसी से गुज़र कर वह वास्तव में देहहीन हो जाना चाहती है –  यही शायद इन कविताओं की अधिभौतिकता है. चेतना पर तमाम तरह के इतिहास , परम्परा , सामाजिकता, समकालीनता के बोझ को आप इनके पीछे लरजता हुआ देख सकते हैं. पर कोई भी अच्छी  कविता उन्हें सीधे सीधे व्यक्त करना नहीं चाहेगी .वह तो भाषा में उन इलाकों का विचरण है जो घटित तो हैं पर अरूप हैं , अमूर्त हैं. कला शायद इन्हीं अर्थों में  किसी immediacy  को रचती है . वह अपनी इस समस्त भटकन का एक रूपांतरण चाहती  है. . आपकी ही उन पंक्तियों को उद्धृत करूं कि –
.
“ किसी ने सुनी है वह सांस हवा की
   जिसमें  चलती रहती है प्यास जीवन की ” 


सविता जी मैं अधिक तो नहीं जानता , पर मुझे अच्छा लगा वह कौशल जहां कविता  एक निरंतरता का  बोध देते देते  हठात किसी जगह चीजों को ‘ फ्रीज़ ‘ कर देती है. या वैसा पढने वाले को लगता है. यह अप्रत्याशित मुझे भाता है . इसमें प्रश्नाकुलता भी होती है,आश्वस्ति भी,  व्यतिक्रम भी, विभाजन भी , मनोदशाओं का एक सुकुमार  अल्हडपन भी ,  अवश उत्तेजना और उन्माद का रचाव भी ,सिमटना – लौटना , एकांत ,  स्मृति और व्यथा भी ,  गुह्य और गोपन की तमाम तरह की अनूगूंजें भी और फिर एक अगले प्रस्थान की एषणा  भी-.. ये अलग अलग शेड्स हो सकते हैं.  कुछ कविताओं के ऐसे अंत दिलचस्प हैं –  .
वह कौन सा रंग है  अकेला

नीले को प्रिय
 क्या कोई जानता है


  *     *    *
हवा आती है सारी छुपी हुई  अतृप्तियों को
उजागर करती
जगाती किन वासनाओं को , आह !
 *    *   *
क्या है जिसके लिये  फिर भी
 यूं गिरती है देह अपने भीतर


 *   *   *


मैं हूं सुकून से जैसी पहले कभी न थी
आस्वस्त भी कि प्रेम पहचान लेगा इस नये एकांत को

शायद मेरी एक बात यहां पहले कही गयी कुछ बातों का दोहराव लगे पर फिर भी मैं यह कहना चाहता हूं कि   आपकी कविताओ में  जो विपर्यय भाव का ताप बना रहता है उसे संवेदन और भाषा की किसी निरंतर और बुनियादी द्वंद्वात्मकता में लक्षित किया जा सकता है.  यह अकारण नहीं है कि आप की बहुत सारी कविताओं में भाषा के इन  सीमांतों  की गवाही है . यह बात ही कितनी अजीब है कि भाषा एक हद तक ही हमारे बहुत सारे  सेंसेशंस  को पकड सकती है  पर भाषा के बाहर उन सेंसेशंस  का कोई अर्थ भी नहीं बनता . जिस भी कलाकार ने प्रत्यक्ष इसे जाना है वह किसी न किसी रूप में इस स्थिति को व्यक्त  करता भी है. हर महत्वपूर्ण कला भाषा की इन सरहदों पर अपनी एक अपूर्णता के बोध के साथ ठिठकी खडी होती है . आपकी कितने सहज तरीके से जगह जगह  से इसे व्यक्त किया है-
 हैं,जहां दिखती हूं खुद को अदृश्य  फिर
प्रकट होती हुई
  *    *
        शब्द उजडे हुए उखडे उखडे  इधर – उधर भटकते
       अस्त व्यस्त  भाषा ज्यों हाथ  बांधे खडी हो
    *    *
       क्या लिखूं यह देखने के बाद क्या कहूं
       क्या करूं कि अब लौटना और भटकना एक सा हो
    *      *
      मेरे लौटने में ज़रूर कोई  विवशता रही होगी
      तभी मैं शब्दों और सभ्यताओं में लौटी
   *        *
     कोई भाषा नहीं वहां कि वह कुछ कहे भी
     एक चुप्पी में सब कुछ होता चला जाता है

सविता जी यह अतिशयोक्ति नहीं यदि मैं कहूं कि आपकी इन कविताओं में ऐसा कुछ है जो हमारे समूचे कविता – परिदृश्य में मुश्किल से कहीं और कहीं दिखायी पडता है. यदि मैं गलत हूं तो कोई इसे प्रमाणित करे .अपने  वस्तुपरक संसार को जज़्ब कर उसे लांघ जाने की यह क्षमता ;  अपनी ‘ सब्जेक्टिविटी की ऐसा अध्ययन ; अपने होने का यह प्रतिनिधित्व ;  एषणा, अकुलाहट , आवेग , करुणा , उत्ताप , आशंका  ,समर्पण, एकांत ,  फैलने और सिमटने के संवेगों का यह प्रकटीकरण  , उनके रूपांतरण का यह  सामर्थ्य ;  किसी अबूझ विस्तार की दहलीज पर खुद को विलयित कर देने  की यह सतत गतिशीलता  ;  मैं और ‘ पर’ का यह निरंतर तनाव – क्या कहीं और इस तरह से दिखाई दे रहा है ? हमारे बुनियादी संवेग वही रहते हैं पर उन्हें व्यक्त करने की विधियां बदलती जाती हैं. हम अपने समय के नये सन्दर्भों में सारी चीजों का पुनराविष्कार करते है   ;  वह सब जो  किन्हीं नये  अनुभवों का विमर्श तैयार करने लगता   हैं. इन अर्थों में आपकी   यह कविता जीवन से लबालब भरी एक ‘ इंटेस  ‘ कविता लगती है.. ऐसे अस्थिर  अर्थों के संसार की कविता लिख कर  आपने  हमारी मौजूदा काव्य अभिरुचियों को बहुत सम्पन्न बनाया है.. कुल मिलाकर यह मेरी बहुत निजी किस्म की प्रतिक्रिया है . यद्यपि बहुत सारी बातें मैं ठीक से लिख नहीं पाया . फिर भी …..जैसा भी लगा , आपको लिख दिया है. .
साभिवादन ,
विजय कुमार

आधुनिक पीढ़ी से मुझे आशा है कि परिवर्तन लाएगी : ममता कालिया

( प्रज्ञा पांडे के अतिथि सम्पादन में हिन्दी की पत्रिका ‘ निकट ‘ ने स्त्री -शुचितावाद और विवाह की व्यवस्था पर एक परिचर्चा आयोजित की है . निकट से साभार हम वह  परिचर्चा  क्रमशः प्रस्तुत कर रहे हैं , आज  सुप्रसिद्ध लेखिका ममता कालिया  के जवाब.   इस परिचर्चा के  अन्य  विचार पढ़ने के लिए क्लिक करें :  ) 

जो वैध व कानूनी है वह पुरुष का है : अरविंद जैन 

वह हमेशा  रहस्यमयी आख्यायित की गयी : प्रज्ञा पांडे 


अमानवीय और क्रूर प्रथायें स्त्री को अशक्त और गुलाम बनाने की कवायद हैं : सुधा अरोडा 

अपराधबोध और हीनभावना से रहित होना ही मेरी समझ में स्त्री की शुचिता है :  राजेन्द्र राव 

परिवार टूटे यह न स्त्री चाहती है न पुरुष : रवि बुले 



बकौल सिमोन द बोउआर “स्त्री पैदा नहीं होती बनायी जाती है ” आपकी दृष्टि में स्त्री का आदिम स्वरुप क्या है ?

सिमोन द बोउआर  का सारा जोर इस बात पर है की स्त्री को पहले मनुष्य समझा जाय.स्त्री की शारीरिक संरचना ने उसको बाधित और सीमित किया है.

क्या दैहिक शुचिता की अवधारणा  स्त्री के खिलाफ कोई साजिश है ?
निस्संदेह.समाज में नियम निर्धारण की स्वाधीनता न जाने कब पुरुष ने अपने हाथ में ले ली और स्त्री के आचरण और मान प्रतिष्ठा के प्रतिमान तय कर डाले.वह स्वयं उसकी रक्षा जब नहीं कर पाया उसने स्त्री के अन्दर इज्ज़त नाम का हौवा बैठा दिया.मनोवैज्ञानिक स्तर पर उसने स्त्री को अस्थिर बना कर देह को  उसकी चलती फिरती जेल बना दिया. देह कितनी ढकी उघाडी जाय , अन्य पुरुष उस के किस अवयव  पर दृष्टि डाले या नहीं ये सब पुरुष तय करने लगा.इसी अवधारणा के रहते बलात्कार एक भीषण मनोसामाजिक ग्रंथि के रूप में सामने आया. अगर शुरू से इस दुर्घटना को भी अन्य दुर्घटनाओं की तरह सामान्य मान कर देखा जाता तो स्त्री का जीवन अपेक्षाकृत सरल होता. बलात्कार को ऐसे लिया जाता जैसे घुटने पर चोट ,जैसे टखने में मोच,तो स्त्री के मान सम्मान की अधिक रक्षा होती और उसे ज्यादा संतुलित जीवन जीने का अवसर मिलता.

समाज  के सन्दर्भ में  शुचितवाद और  वर्जनाओं को किस  तरह परिभाषित किया जाए ?
कई बार हमारे समाज की संरचना खुद हमारी समझ के बाहर  हो जाती है.शुचितावाद का समस्त बोझ स्त्रियों को ही क्यों उठाना होता है. क्या पुरुष की शुचिता के विषय में इतनी चिंता दर्शायी जाती है या उस पर इतना चिंतन होता है ? वर्जनाएं भी इसी कोटि की ग्रंथियां हैं. समस्त वर्जनाएं स्त्री पर लागू की जाती है. स्त्रियाँ भी भय वश इन प्रतिबंधों को स्वीकार कर लेती हैं. इस अतिचार से मुक्त होने के लिए स्त्रियों में शिक्षा और जागरूकता की ज़रुरत है. समाज विमर्श का भी नया लिखित पाठ सामने आना चाहिए.

यदि स्वयं के लिए वर्जनाओं का  निर्धारण  स्वयं स्त्री करे तो क्या हो ? 
बेहतर हो.

विवाह की व्यवस्था में स्त्री  की मनोवैज्ञानिक ,सामाजिक एवं आर्थिक  स्थितियां  कितनी  स्त्री  के पक्ष में हैं ? 
प्रस्तुत समय में जो ढांचा हमें परंपरा से मिला है,वह पूरी तरह से  पुरुष प्रधान है. इसमें पुरुष और उसके
परिवार की सुख सुविधाओं का अचूक ध्यान रखा गया है.शादी के बाद पत्नी को प्रिय की जगह परिचारका की भूमिका में जीना पड़ता है. सभी गंदे काम कर्त्तव्य की कोटि मे डाल कर पुरुष निश्चिन्त हो जाता है.सबसे ज़रूरी है विवाह के बाद स्त्री का आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना. तब उसके जीवन की अधि समस्याएं कम हो जाएँ .संभव है किन्तु यह आशंका होती है की शायद  मातृपक्ष  फिर वैसा ही चालाक निकले जैसा पितृ पक्ष.

मातृसत्तात्मक व्यवस्था में विवाह-संस्था क्या अधिक  सुदृढ़ और समर्थ होती। तब समाज भ्रूण हत्या दहेज़ हत्या एवं बलात्कार जैसे  अपराधों से कितना मुक्त होता ? 
हाँ भ्रूण हत्या और बलात्कार की घटनाएं ज़रूर कम हो जाएँगी.

सह जीवन की अवधारणा क्या स्त्री के पक्ष में दिखाई देती है ?
.सहजीवन एक कामचलाऊ व्यवस्था के तहत कुछ समय के लिए स्वीकार्य हो सकता है.किन्तु इसमें जोखिम है की स्त्री ज्यादा पीड़ा पा जाय. जब तक शुचितावाद का चौखटा उसके ऊपर कसा रहेगा किसी भी सह सम्बन्ध से निकलना स्त्री के विरुद्ध ही देखा जाएगा.

साथ होकर भी पुरुष एवं स्त्री की स्वतंत्र परिधि क्या है ? 
.निर्भरता दो प्रकार की होती है.१.आर्थिक.2.वैचारिक . दोनों ही घातक हैं. अपनी स्वतंत्र इकाई के लिए ज़रूरी है की स्त्री के पास हर हाल में अपना काम हो. दूसरे ने वाला उसके मनोविज्ञान को नष्ट न करने पाए,यह आसान न होगा. फासले तय करने का वक़्त है यह. विवाह के वक़्त पंडित जो श्लोक वगैरह संस्कृत में अगड़म बगड़म उच्चारित करते हैं, समे हिंदी व्याख्या शामिल होनी चाहिए. साथ ही लड़के लड़की से पूछ कर उनकी उम्मीदों को भी उसमे स्थान दिया जाए. आधुनिक पीढ़ी से मुझे आशा है कि परिवर्तन लाएगी.

नरेश मेहता के उपन्यासों में स्त्री-जीवन

नितिका गुप्ता

नितिका गुप्ता डा. बाबा साहब आम्बेडकर विश्वविद्यालय , दिल्ली से शोध कर रही हैं.   संपर्क : nitika.gup85@gmail.com .

नरेश मेहता (जन्म 15 फरवरी 1922, मृत्यु 22 नवम्बर 2000) स्वातंत्र्योत्तर भारत के प्रमुख रचनाकारों में गिने जाते हैं। नरेश मेहता का वास्तविक नाम पूर्णशंकर मेहता था। उनकी काव्य प्रतिभा से प्रभावित होकर एक दिन नरसिंह गढ़ की राजमाता ने उन्हें ‘नरेश‘ नाम से सम्बोधित किया। बस तभी से वह नरेश मेहता नाम से पहचाने जाने लगे। उन्होंने साहित्य की हर विधा-काव्य, खण्डकाव्य, उपन्यास, कहानी, नाटक, एकांकी, निबंध, यात्रा-वृत्तांत आदि में रचना की है। उनकी अब तक लगभग 40 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।

नरेश जी ने लगभग तीन दशकों में कुल सात उपन्यासों की रचना की थीं। उनका प्रथम उपन्यास डूबते मस्तूल सन् 1954 में और अंतिम उपन्यास उत्तरकथा भाग दो सन् 1982 में प्रकाशित हुआ। ‘डूबते मस्तूल’ उपन्यास में रंजना नाम की एक आधुनिक स्त्री का चरित्र, उसी के शब्दों में प्रस्तुत किया गया है। इस उपन्यास की अवधि16 घंटों की है। इन 16 घंटों में रंजना अपनी संपूर्ण जीवनगाथा को (पूर्वदीप्ति पद्धति में) अपरिचित स्वामीनाथन को परिचित अकलंक का आवरण देकर सुनाती है। रंजना का चरित्र पाल-पतवार रहित नौका की तरह उद्देश्यहीन, रोचक और करुण, पर अविश्वसनीय है। उसे जीवनभर कोई भी स्थायी सहारा नही मिलता है। वह जिस भी व्यक्ति के करीब जाती है वहीं उससे दूर चला जाता है या वह खुद ही उससे दूर हो जाती है। जिस कारण वह जिन्दगी भर भटकावग्रस्त जीवन व्यतीत करती रहती है।

8 वर्ष के बाद मेहता जी का दूसरा उपन्यास ‘यह पथ बन्धु था’ सन् 1962 में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास ने उन्हें एक उपन्यासकार के रूप में स्थापित किया। यह उपन्यास एक आदर्शवादी, ईमानदार, स्वाभिमानी युवक श्रीधर की पराजय, थकान और टूटन की कहानी है। साथ ही इस उपन्यास में भारतीय स्त्री की भी करुण गाथा कही गयी है। नरेश मेहता ने मध्यवर्गीय परिवार की सरस्वती, गुणवन्ती के साथ ही सामन्तवर्गीय परिवार की इन्दु का भी यथार्थ चित्रण प्रस्तुत किया है। इस उपन्यास मे नरेश जी ने शिल्प मे प्रौढ़ता प्राप्त कर ली है।
नरेश मेहता ने चार खंडों में एक बृहत् उपन्यास की योजना बनाई थी। इसका प्रथम खंड ‘धूमकेतु: एक श्रुति’ सन् 1962 में और द्वितीय खंड ‘नदी यशस्वी है’ सन् 1967 में प्रकाशित हुआ। लेकिन किसी कारणवश इस उपन्यास का तृतीय और चतुर्थ खंड या तो लिखे ही नही गये या प्रकाशित नही हो सके। लेखक ने इस उपन्यास को संगीत के आधार पर विभाजित किया है। इसके प्रथम खंड को ’श्रुति-विस्तार’ की और द्वितीय खंड को ’श्रुति-आलाप’ की संज्ञा दी गयी हैं। इस उपन्यास में उदयन की आत्मकथा प्रस्तुत की गयी है। जहाँ ‘ धूमकेतु: एक श्रुति’  मे उसके शैशवावस्था का चित्रण है तो वहीं ‘ नदी यशस्वी है’  मे उसकी किशोरावस्था का चित्रण किया गया है।

मेहता जी का ’दो एकांत’ उपन्यास सन् 1964 में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास में विवेक और वानीरा के माध्यम से शिक्षित मध्यवर्गीय दम्पति का चित्रण प्रस्तुत किया गया है। लेखक ने इन दोनों के माध्यम से प्रेम और प्रेम के तनाव की कथा कही है। विवेक और वानीरा एक-दूसरे के साथ होते हुए भी अपने मन की व्यथा एक-दूसरे को नही बता पाते। जिस कारण उनका रिश्ता धीरे-धीरे भस्म होता जाता है और उपन्यास के अंत मे वह दोनों दो एकांत बनकर रह जाते हैं।नरेश जी का अगला उपन्यास ’प्रथम फाल्गुन’ सन् 1968 में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास का केन्द्रीय विषय प्रेम है। गोपा और महिम एक-दूसरे को पहली बार फाल्गुन मे ही मिलते हैं और अगले फाल्गुन मे ही हमेशा के लिए अलग हो जाते हंै। जहाँ गोपा का प्रेम धरती के गर्भ में छिपे जल की तरह है वहीं महिम अन्तरालाप के रूप में गोपा के प्रति तड़पता है। जब गोपा महिम के समक्ष अपने जारज संतान होने की बात स्वीकारती है तो महिम समाज-भीरु होने के कारण उससे अपने सारे नाते तोड़ लेता है। इस तरह एक प्रेम कहानी का दुखद अंत हो जाता है।

प्रथम फाल्गुन के 11 वर्षों  बाद नरेश मेहता का अंतिम उपन्यास ’उत्तरकथा’ दो भागों (प्रथम भाग सन् 1979 और द्वितीय भाग सन् 1982) में प्रकाशित हुआ। यह उनका ’यह पथ बंधु था’ के बाद दूसरा महाकाव्यात्मक उपन्यास है। इसमे भारतीय मध्यवर्ग के जीवन को उकेरा गया है। इसके केन्द्र में ब्राह्मण परिवार की तीन पीढि़यों का चित्रण किया गया है। इसका प्रथम भाग 1900 से 1930 तक के और द्वितीय भाग 1930 से 1948 तक के काल समय में व्यक्ति और समाज के बिखराव को समेटे हुए हैं।नरेश जी ने अपने उपन्यासों में स्त्री के हर रूप-बेटी, बहन, पत्नी, बहू, माँ, सास, प्रेमिका आदि का चित्रण किया हैं। वह स्त्री को आदर्श या पतिता के रूप में चित्रित ना करके मानवीय रूप मे चित्रित करते हैं । उनके उपन्यासों में स्त्री परम्परागत और आधुनिक दोनों रूपों में आई हैं। वह स्त्री के ममतामयी और त्यागमयी रूपों के साथ ही उसके स्वच्छन्द और आत्मनिर्भर रूपों को भी प्रस्तुत करते हैं। उनके उपन्यासों के केन्द्र में हर आयु वर्ग की स्त्रियाँ हैं। प्रभाकर श्रोत्रिय कहते हैं कि “सर्वत्र स्त्री को अपार संवेदना देकर, भाँति-भाँति के प्रदेशों, आयुवर्ग की स्त्रियों का अकंन कर नरेश ने समूची मानवता और उसकी करुणा-धैर्य-संयम-बलिदान की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति कर के समूचे असहिष्णु समाज के प्रति इसी माध्यम से अपनी वितृष्णा और असहमति जताई है।”1

नरेश मेहता ने अपने समय की स्त्री का यथार्थ चित्रण अपने उपन्यासों में किया हैं। उन्हें स्त्री के परम्परागत स्वरूप में जो कुछ भी गलत लगा, उसका उन्होंने पुरुष होते हुए भी खुलकर विरोद्ध किया है। वह अपने समाज में स्त्री की स्थिति का गहनता से अध्ययन करते हुए, उसका मार्मिक चित्रण अपने उपन्यासों में प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने अपने उपन्यासों में स्त्री जीवन की विभिन्न समस्याओं जैसे-अनमेल विवाह, बहुविवाह, दहेज प्रथा, वेश्यावृत्ति, यौन-उत्पीडि़न, जारज संतान आदि का दारुण चित्र प्रस्तुत किया हैं। साथ ही वह स्त्री जीवन के सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष-मातृत्व भाव का भी हृदयस्पर्शी चित्रण प्रस्तुत करते हंै। वह स्त्री की सभी समस्याओं का हल शिक्षा को मानते हैं। वह स्त्री को घर की चारदीवारी में ना रखकर, उसे समाजसेवा और देशसेवा करने के लिए भी प्रेरित करते हैं।

मेहता जी ने स्त्री के विधवा हो जाने पर उसके जीवन में आने वाले उतार-चढ़ावों को अपने उपन्यासों में चित्रित किया हैं। धूमकेतु: एक श्रुति उपन्यास में उदयन की बुआ दादी (माँ) बाल विधवा है, वह श्रृंगार नही करती है, उसके बाल नही है, सफेद साड़ी पहनती है और वह किसी शुभ कार्य में भाग नही लेती है। वहीं रत्नशंकर की विधवा पत्नी को जायदात मे हिस्सा यह कहकर नही दिया जाता कि ’यह शास्त्रगत नही है’। नरेश मेहता ने सूर्यशंकर द्वारा यह प्रश्न भी उठाया है कि-पुरुष को तीन-तीन विवाह करने का हक है तो स्त्री दूसरा विवाह क्यों नही कर सकती? लेकिन उनका यही पात्र सूर्यशंकर अपनी पत्नी को कुरूप होने के कारण त्याग देता है। यह स्त्री जीवन की कितनी बड़ी विडबंना है कि उसके गुणों को ना देखकर उसकी खूबसूरती को देखा जाता है। नरेश जी अनमेल विवाह की समस्या को भी चित्रित करते हंै। यह पथ बंधु था उपन्यास की इन्दु का विवाह एक बुढ़े जमींदार से कर दिया जाता है। विवाह के कुछ समय बाद ही वह विधवा हो जाती है और उसे अपना पूरा जीवन तीर्थाटन करते हुए व्यतीत करना पड़ता है। वहीं अगर स्त्री माँ नही बन पाती तो उसे सामाजिक बहिष्कार झेलना पड़ता है। धूमकेतु: एक श्रुति उपन्यास की मनुमाँ माँ ना बन पाने के कारण समाज द्वारा डाक्कन कहकर पुकारी जाती है। उत्तरकथा भाग एक उपन्यास मे वसुन्धरा के माँ ना बन पाने का कारण उसका बाँझ होना माना जाता है। जबकि वह दुर्गा को बताती है कि ’कमी उसमे नही है उसके पति मे है’। वहीं प्रथम फाल्गुन उपन्यास मे श्रीमती नाथ के माँ ना बन पाने के कारण रिटायर जस्टिस नाथ बाबू दूसरा विवाह कर लेते हंै। नरेश मेहता बताते हैं कि “लग्नोपरान्त भी जब अनेक वर्षों तक कोई सन्तान न हुई तब नाथ बाबू को दूसरे विवाह के लिए बाध्य होना पड़ा।”2 यह स्त्री जीवन का कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि अगर वह माँ नही बन पाती है तो उसमे ही कमी मानी जाती है और पुरुष को दूसरा विवाह करने का अधिकार प्राप्त हो जाता है। जबकि इस समस्या का समाधान बच्चा गोद लेकर भी किया जा सकता है।

मेहता जी अपने उपन्यासों में आए दिन दहेज की बलि चढ़ने वाली स्त्रियों का भी हृदयस्पर्शी चित्रण प्रस्तुत करते हैं। डूबते मस्तूल की रंजना, यह पथ बंधु था की गुणवन्ती, उत्तरकथा के त्र्यम्बक की पहली पत्नी और दुर्गा दहेज के लिए प्रताडि़त की जाती हैं। गुणवन्ती को दहेज के लिए इतना मारा-पिटा जाता है कि वह लंगड़ी हो जाती है। वहीं त्र्यम्बक की पहली पत्नी को दहेज में सोने का पानी चढ़े जेवर लाने के कारण त्र्यम्बक की माँ कृष्णादेवी उसे कुएं में धक्का देकर मार देती है । गोपाल राय सही ही कहते हैं कि “भावनाप्रवण और दुखी स्त्रियों के चित्रण में नरेश मेहता शरच्चन्द्रीय भावुकता के शिकार तो हैं, पर वे उस भारतीय नारी का अत्यंत मार्मिक चित्रण करने में सफल हुए हैं जो करुणा, त्याग, सहिष्णुता, स्नेह और आत्मबलिदान की सजीव मूर्ति होती है।”3
नरेश मेहता बहुविवाह के प्रचलन को भी अपने उपन्यासों में प्रस्तुत करते हैं। उत्तरकथा उपन्यास मे त्र्यम्बक के दादा त्रिलोचन शुक्ल पहली पत्नी के जीवित होते हुए और भरापूरा परिवार होते हुए भी अपने दोस्त की बहन पार्वतीदेवी से दूसरा विवाह कर लेते हैं। इन्होंने  पति-पत्नी के रिश्ते मे किसी तीसरे के आने पर होने वाले दुःखदायी अंत का भी चित्रण किया है। उत्तरकथा उपन्यास मे मनोहरलाल उपाध्याय (कामदार साहब) अपनी पत्नी गायत्रीदेवी को उपेक्षित करके कमला नाम की स्त्री के साथ रहते हैं। उनका यही सम्बन्ध उनकी मृत्यु का कारण बनता है। कमला के भाई रुपयों के लालच मे अपनी बहन और मनोहरलाल उपाध्याय की हत्या कर देते हैं। नरेश मेहता कहते हैं कि लोगों ने कामदार साहब और कमला की इस प्रेम -कथा से यही शिक्षा ग्रहण की कि “पत्नी के अतिरिक्त किसी दूसरी स्त्री के होने पर मनुष्य का ऐसा ही दुःखदायी अंत होता है।”4

नरेश जी ने परित्यक्ता स्त्रियों का भी यथार्थपूर्ण चित्रण प्रस्तुत किया है। यह पथ बंधु था उपन्यास मे जब श्रीधर घर छोड़कर चला जाता है तो सरस्वती जीवन के 25 वर्ष परित्यक्ता स्त्री के रूप मे व्यतीत करती है। वह अपने इस दुःख के कारण यक्ष्मा रोग से भी पीडि़त हो जाती है। वहीं उसकी बड़ी बेटी गुणवन्ती को उसका पति त्याग देता है जिस कारण उसे परित्यक्ता स्त्री बनकर अपना जीवन व्यतीत करना पड़ता है। साथ ही इन्होंने वेश्या जीवन की त्रासदी का भी मार्मिंक चित्रण प्रस्तुत किया है। वैसे तो वेश्या का सामाजिक बहिष्कार किया जाता है लेकिन विवाह समारोह, जनेऊ संस्कार आदि में इन्हीं वेश्यों को बुलाकर नचाया जाता है। यह पथ बंधु था उपन्यास की मालिनी, वेश्या होते हुए भी धार्मिक प्रवृति की स्त्री है, फिर भी उसे समाज द्वारा उचित सम्मान नही दिया जाता।

मेहता जी ने अपने उपन्यासों में स्त्रियों पर हो रही यौन-हिंसा का भी संवेदनशील चित्रण प्रस्तुत किया है। डूबते मस्तूल उपन्यास की रंजना के साथ एक रात रेनाल्ड नामक व्यक्ति बलात्कार करता है। जिससे रंजना को अत्यधिक मानसिक आघात पहुँचता है। धूमकेतु: एक श्रुति उपन्यास मे विधवा वल्लभा का पिता ही उसका शारीरिक शोषण करता है। जब इस शारीरिक शोषण के कारण वल्लभा को गर्भ ठहर जाता है, तो वह आत्महत्या कर लेती है। वहीं उत्तरकथा उपन्यास की दुर्गा को घर मे अकेला पाकर उसका देवर विश्वनाथ उसके साथ बलात्कार की कोशिश करता है। लेकिन दुर्गा यहाँ पर रंजना और वल्लभा की तरह हार नही मानती बल्कि उसे मारकर भगा देती है। नरेश मेहता के उपन्यासों में इन प्रकरणों से पता चलता है कि स्त्री घर के बाहर तो सुरक्षित है ही नही, घर के अंदर भी सुरक्षित नही है। और ऐसी स्थिति मे तो बिल्कुल भी नही, जब उसका रक्षक ही (जन्मदाता ही), उसका भक्षक बन जाए। उन्होंने हिन्दू स्त्रियों के साथ ही मुस्लिम स्त्रियों के शोषण का भी हल्के से रूप मे चित्रण प्रस्तुत कर दिया है। नदी यशस्वी है उपन्यास मे मुनीर खां उदयन को बताता है कि जब वह पांच वर्ष का था तो उसके पिता के जाने के बाद ’उसकी मां को मौलवी साहब ने घर में डाल लिया’ और उसे धक्के मारकर घर से निकाल दिया। अतः स्त्री किसी भी धर्म की हो, पुरुषों द्वारा उन पर एकाधिकार जताया ही जाता है।

नरेश जी स्वतंत्र विचारों वाली और अतिभौतिकताग्रस्त स्त्रियों का भी चित्रण प्रस्तुत करते हैं। दो एकांत उपन्यास की वानीरा वैवाहिक होते हुए भी दूसरे पुरुषों से सम्बन्ध बनाती है। ऐसे ही सम्बन्धों से उत्पन्न संतान है- प्रथम फाल्गुन उपन्यास की गोपा। गोपा जारज संतान होने के कारण अपने प्रेम को विवाह मे परिणत नही कर पाती। समाज उसे ’एक घटिया औरत की संतान कहकर बुलाता है’ साथ ही यहाँ तक कहा जाता है कि ’ऐसी नाजायज औरत को उसकी संतानें कैसे अपनायेंगी’। वहीं यह पथ बंधु था उपन्यास की कमल एक पढ़े-लिखे परिवार की और खुले विचारों वाली स्त्री हैं। पर जब वह अपने परिवार के खिलाफ जाकर, बिशन से प्रेम विवाह कर लेती है तो उसके परिवारजन उसको खूब मारते-पीटते हंै और पुलिस मे झूठा ब्यान दिलवाते हैं कि ’बिशन ने मेरा अपहरण करके जबरदस्ती मुझसे विवाह किया है’। अतः स्त्री संभ्रंात परिवार से ही क्यों न हो उसकी नियति भी समाज की और स्त्रियों जैसी ही होती हैं। यह पथ बंधु था की सावित्री और उत्तरकथा की शारदा अतिभौतिकता से ग्रस्त स्त्रियाँ हैं। वह अपने पतियों के कान भरकर घर का बंटवारा कर देती हैं।  मेहता जी स्त्रियों को समाजसेवा व देशसेवा करने के लिए प्रेरित करते हैं। जहाँ प्रथम फाल्गुन की गोपा समाजसेवा को जीवन का लक्ष्य बना लेती है, वहीं उत्तरकथा की दुर्गा और नर्मदादेवी उपाध्याय स्वतंत्रता आंदोलन के लिए लोगों को जागरूक करके देशसेवा करती हैं। तो दूसरी और यह पथ बंधु था की रतना देश की स्वाधीनता के लिए फांसी पर चढ़ जाती है। साथ ही वह स्त्रियों को शिक्षा द्वारा आत्मनिर्भर भी बनाना चाहते हैं। वह उत्तरकथा उपन्यास मे दुर्गा को पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं और आंनदशंकर दवे (दुर्गा के मामा) भी अपनी विधवा बहू शकुंतला को पढ़ाते हैं । जिससे वह आत्मनिर्भर होकर अपना जीवन व्यतीत कर पाती है।

अंत मे हम कह सकते हैं कि नरेश मेहता ने अपने उपन्यासों के द्वारा समाज मे स्त्री की स्थिति का मर्मंभेदी चित्रण प्रस्तुत किया हैं। स्त्री चाहे पढ़ी-लिखी हो, किसी भी वर्ग की हो या किसी भी धर्म की हो, उसे परिवार द्वारा, समाज द्वारा और पुरुषों द्वारा प्रताडि़त किया ही जाता है। उन्होंने स्त्रियों की अच्छाईयों के साथ ही उनकी बुराईयों को भी चित्रित किया हैं।

संदर्भ-सूची:-
1. श्रोत्रिय प्रभाकर, भारतीय साहित्य के निर्माता नरेश मेहता, साहित्य अकादेमी, पुनर्मुद्रण 2013, पृष्ठ-107
2. मेहता नरेश, प्रथम फाल्गुन, लोकभारती प्रकाशन इलाहाबाद, पहला पेपरबैक संस्करण 2012, पृष्ठ-7
3. राय गोपाल, नरेश मेहता के उपन्यास, वागर्थ पत्रिका, भारतीय भाषा परिषद कोलकाता, नवम्बर 2001, पृष्ठ-19
4. मेहता नरेश, उत्तरकथा भाग एक, लोकभारती प्रकाशन इलाहाबाद, चतुर्थ संस्करण 2011, पृष्ठ-358

मातृसत्तातमक व्यवस्था स्त्रीवादियों का लक्ष्य नहीं है : संजीव चंदन

( प्रज्ञा पांडे के अतिथि सम्पादन में हिन्दी की पत्रिका ‘ निकट ‘ ने स्त्री -शुचितावाद और विवाह की व्यवस्था पर एक परिचर्चा आयोजित की है . निकट से साभार हम वह  परिचर्चा  क्रमशः प्रस्तुत कर रहे हैं , आज  स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन के जवाब.   इस परिचर्चा के  अन्य  विचार पढ़ने के लिए क्लिक करें :  ) 

जो वैध व कानूनी है वह पुरुष का है : अरविंद जैन 

वह हमेशा  रहस्यमयी आख्यायित की गयी : प्रज्ञा पांडे 


अमानवीय और क्रूर प्रथायें स्त्री को अशक्त और गुलाम बनाने की कवायद हैं : सुधा अरोडा 

अपराधबोध और हीनभावना से रहित होना ही मेरी समझ में स्त्री की शुचिता है :  राजेन्द्र राव 

परिवार टूटे यह न स्त्री चाहती है न पुरुष : रवि बुले 

बकौल सिमोन द बोउआर”स्त्री पैदा नहीं होती बनायी जाती है.आपकी दृष्टि में स्त्री का आदिम स्वरुप क्या  है ?

स्त्री के बनाये जाने की प्रक्रिया उसके जन्म से ही शुरु हो जाती है , उसके मनोवैज्ञानिक मानस की तैयारी . बल्कि उसके आस -पास यह माहौल जन्म के पूर्व से बनने लगता है . भारत के कुछ अंचलों में यह मान्यता है कि लडकी के जन्म लेते ही धरती तीन ऊंगल नीचे चली जाती है और बेटे के पैदा होते तीन ऊंगल ऊपर. चीन में लडकियों  के पांव छोटे बनाने के लिए उन्हें लोहे के जूते पह्नाने की प्रथा है तो अफ्रीका के कुछ इलाकों में लडकियों  का खतना किया जाता है. पाठ्य पुस्तकों पर काम करने वालों ने उनमें जेंडर आधारित भेद भाव का विषद वर्णन किया है कि कैसे एक लडकी  गढी जाती है , पिता को अखबार पढते दिखाकर और मां को रसोई में खाना बनाते दिखा कर या राम को पाठशाला जाते दिखाकर और सीता को गुडिया से खेलते दिखाकर . फिर सवाल यह बनता है कि यदि स्त्रियां ऐसे गढी जाती हैं , तो कोई तो समय होगा , जब स्त्रियों का इस गढन से अलग स्वरूप होगा , जिसे आप आदिम स्वरूप कह रही हैं . निस्सन्देह ! इतिहासकारों ने आदिम स्त्री को पुरुषों के साथ बिना काम के जेंडर आधारित बंटवारे के एक साथ काम करते और फैसले लेते हुए बतलाया है , यह भी कि मातृवंशात्मक समाज का इतिहास रहा है , आदिम समाजों मे.

क्या दैहिक शुचिता की अवधारणा  स्त्री के खिलाफ कोई साजिश है ?

यह एक व्यव्स्था बनी होगी अनुमानतः स्त्री -पुरुष के यौन सम्बन्धों में आई अराजकता के कारण . ‘ वोल्गा से गंगा’ मे राहुल सांकृत्यायन दिखाते हैं कि कैसे अपनी  पसन्द के यौन सम्बन्ध के लिए आदिम मानव हत्यायें कर रहे थे . दैहिक शुचिता  रुढ होना प्रारम्भ कैसे हुआ होगा , इसके लिए समझ बनाती है फ्रेडरिक ऐंगल्स की किताब ‘ परिवार , निजी सम्पत्ति और राज्य’ . निजी सम्पत्ति की अवधारणा के साथ विवाह और परिवार संस्था बनी . फिर निजी सम्पत्ति को अक्षुण्ण रखने के लिए स्त्री की यौनिकता पर ‘शुचिता’ का नियंत्रण प्रारम्भ हुआ, ताकि अपनी ही संतान के पास अपनी सम्पत्ति जाये . यही वह पेंच है जिससे स्त्री को कसा जाने लगा और उसके खिलाफ  क्रूरता बनती गई , ‘ दैहिक शुचिता’ उसके अस्तित्व से ज्यादा मह्त्वपूर्ण  होती  गई. इतिहास के विकासक्रम मे यह सब हुआ , धीरे -धीरे व्यवहारगत  पतन  और क्रूरता की ओर उन्मुख होते हुए  . सभ्यता के इतिहास क्रम में हर प्रसंग किसी साजिश का हिस्सा नहीं होता . ऐसा नहीं है कि चार मर्दों ने बैठ कर स्त्रियों  को गुलाम रखने की कोई दीर्घगामी साजिश रची , योजना बनाई.

समाज  के सन्दर्भ में   शुचितवाद और  वर्जनाओं को किस  तरह परिभाषित किया जाए ?

शुचिता , पवित्रता एक ऐसा शब्द है , जो थोडे लोगों का बाकी बचे लोगों पर श्रेष्ठता कायम करते हैं . भारत में जातिवाद का यह सबसे बडा आधार है और स्त्रियों के शोषण का भी . गौरतलब है कि जो समाज स्त्री के रजस्वला होने को ‘ दैवीय घट्ना’ मानता है , वही इस मासिक चक्र को उसकी पवित्रता से भी जोड देता है . पहले दूसरे प्रश्न के उत्तर में मैनें दैहिक शुचिता की संकल्पना के ऐतिहासिक आधार पर बात की. शुचिता और वर्जनायें स्त्रियों की गत्यातमकता पर प्रहार करती हैं , उसे एक देहरी में , लक्ष्मण रेखा के दायरे में बान्ध देती  है. यह लक्ष्मण रेखा सिर्फ दृश्य भर नहीं होती , अदृश्य रहकर मानस को भी नियंत्रित करती है , स्त्रियों के पूरे जीवन पर अदृश्य आंखों की निगरानी बैठा देती है . स्त्री की देह ही उसके अधिकार से निकल जाती है इसप्रकार .  इस निकलने के कारण सिर्फ उसका यह निर्णय ही नही प्रभावित होता कि वह किसके साथ सोये या किसके साथ नहीं सोये , बल्कि धीरे -धीरे उसका यह अधिकार भी छिन जाता है कि वह कब और कैसे तथा किस बच्चे को पैदा करे या नहीं करे. इसे परिवार और उसके बाद ज्यादा ‘ पवित्र ‘ से दिखते कारण के लिए राज्य तय करता है . उसका यह अधिकार भी छिन जाता है कि वह अपने दैहिक श्रम का उपयोग कब और कितना करे , कब उस की देह पवित्र  है और कब नहीं . मैं  यह समझता हूं कि बहुत सारी स्त्रियों के लिए यह प्राथमिक मुद्दा नहीं है कि वह सोये किसके साथ बल्कि उसके दैहिक श्रम पर उसका अधिकार और देह पर लाद दी गई अपवित्रता ज्यादा बडा मुद्दा है . परिभाषा और क्या हो सकती है !

यदि स्वयं के लिए वर्जनाओं का  निर्धारण  स्वयं स्त्री करे तो क्या हो ?

इसमे दो प्रसंग होंगे , चुकी पितृसत्ता ‘ सहमति’ हासिल कर दीर्घकालिक गुलामी तय करती है अतः एक कारण हो सकता है कि ‘अनुकूलित स्त्री’ ऐसे निर्णय ले , लेती भी है , यह उसकी गुलामी को और पुख्ता करती है . दूसरा कारण हो सकता है कि एक सचेत स्त्री अपने पूरे अधिकार से यह निर्णय़ ले ,यह अच्छा है, क्योंकि यह उसका निर्णय है , लेकिन वह किसी सूरत में ऐसा कोई निर्णय शुचिता के सन्दर्भ मे नहीं करेगी , वर्जना वह अपने लिए जीने के अपने तरीके के तौर पर तय कर सकती  है .
विवाह की व्यवस्था में स्त्री  की मनोवैज्ञानिक ,सामाजिक एवं आर्थिक   स्थितियां  कितनी  स्त्री  के पक्ष में  हैं ? 
अभी तो एकदम नहीं .

 मातृसत्तात्मक व्यवस्था में विवाह-संस्था क्या अधिक  सुदृढ़ और समर्थ होती. तब   समाज  भ्रूण हत्या दहेज़ हत्या एवं बलात्कार जैसे  अपराधों से कितना मुक्त होता ?

मातृसत्तातमक व्यवस्था जैसी कोई व्यव्स्था न हुई , न होगी और न यह स्त्रिवादियों का लक्ष्य है . मातृवंशात्मकता  हालंकि ऐतिहासिक हकीकत है , जो अभी भी देश के कुछ राज्य या समाज का सच है . स्त्रीवादियों का लक्ष्य है समानता आधारित समाज , व्यवस्था  , जहां लिंग , जाति , रंग और  वर्ग आधारित असमानतायें न हों . ऐसा हुआ तो स्त्रीविरोधी अपराधों से समाज निश्चित ही मुक्त होगा.

सह जीवन की अवधारणा  क्या स्त्री के पक्ष में दिखाई देती है?

बिल्कुल , दो वयस्कों का निर्णय है यह .

साथ होकर भी पुरुष एवं  स्त्री की स्वतंत्र परिधि क्या है?

जहां से दोनो का अपना अस्तित्व बनता है . वे साथ होते हुए भी दो इकाई है, अपने स्व का वृत्त होता है , उसकी परिधि होती है . इसी लिए वर्जीनिया वुल्फ  ‘ अपना कमरा ‘ चाहती हैं स्त्री के लिए

मनुष्य – आदिम मनुष्य भी – प्राकृतिक नहीं, सांस्कृतिक प्राणी है : अर्चना वर्मा

अर्चना वर्मा

अर्चना वर्मा प्रसिद्ध कथाकार और स्त्रीवादी विचारक हैं. संपर्क : mamushu46@gmail.com .

( प्रज्ञा पांडे के अतिथि सम्पादन में हिन्दी की पत्रिका ‘ निकट ‘ ने स्त्री -शुचितावाद और विवाह की व्यवस्था पर एक परिचर्चा आयोजित की है . निकट से साभार हम वह  परिचर्चा  क्रमशः प्रस्तुत कर रहे हैं , आज  चर्चित आलोचक एवम रचनाकार अर्चना वर्मा  के जवाब .  इस परिचर्चा के  अन्य  विचार पढ़ने के लिए क्लिक करें :  ) 

जो वैध व कानूनी है वह पुरुष का है : अरविंद जैन 

वह हमेशा  रहस्यमयी आख्यायित की गयी : प्रज्ञा पांडे 


अमानवीय और क्रूर प्रथायें स्त्री को अशक्त और गुलाम बनाने की कवायद हैं : सुधा अरोडा 

अपराधबोध और हीनभावना से रहित होना ही मेरी समझ में स्त्री की शुचिता है :  राजेन्द्र राव 



बकौल सिमोन द बोउआर ‘स्त्री पैदा नहीं होती बनायी जाती है’ आपकी दृष्टि में स्त्री का आदिम स्वरुप क्या है?
आदिम स्वरूप से आपका मतलब अगर प्राकृतिक स्वरूप से है तो वह तो केवल स्त्री-देह का माँस-पिण्ड है यानी वह सद्यजात शरीर जिसमें स्त्रीसूचक जननांग है – स्त्रीलिंग। और यद्यपि उसे स्वयं नहीं पता लेकिन उसके आसपास का समाज उसको जन्म के साथ ही स्त्री नाम से चिह्नित कर देता है और उसके साथ वैसा ही व्यवहार करने लगता है जिसकी वजह से वह अपनी चेतना पर पड़ती छापों के संचय से स्वयं को संज्ञान की क्षमता आते ही स्त्री के रूप में पहचानने लगती है और ‘स्त्रियोचित’ व्यवहार करने लगती है। ‘स्त्रियोचित’ व्यवहार सामाजिक सांस्कृतिक संरचना है और यद्यपि प्रत्येक समाज में उसकी अवधारणा अलग अलग होती है लेकिन इस बात में हर जगह समान है कि पुरुष की तुलना में वंचित और अन्यायग्रस्त है।
लेकिन यहाँ मैं ज़रा ठहरकर ‘आदिम’ और ‘प्राकृतिक’ के बारे एक बात कहना चाहूँगी। सिमोन द बोउवा ने जो बात कही उसे कैसे समझा जाय? ‘स्त्री पैदा नहीं होती’ का कुल मतलब क्या सद्यजात शिशु का इस बात से अनभिज्ञ होना है कि वह स्त्री है? ‘वह बनाई जाती है’ का अर्थ क्या यह है कि न बनाये जाने का भी कोई विकल्प मौजूद है? जैसे ही बीज गर्भ में स्थापित होता है, बल्कि उसके भी पहले, जैसे ही कोई युगल इसमें प्रवृत्त होता है वैसे ही इस बात से कि उस युग्म के दोनो सदस्य कौन हैं; किस पृष्ठभूमि, किस कुल, किस परिवार के हैँ; यह तय होजाता है कि इस गर्भस्थ शिशु को पारिवारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, अनुवांशिक उत्तराधिकार के रूप में क्या मिलने वाला है। इन्सान का जन्म ही एक प्रदत्त परम्परा में, प्रदत्त उत्तराधिकार के साथ होता है और जन्म लेते ही उसका ‘बनाया जाना’ शुरू हो जाता है, बाद में वह चाहे तो विद्रोह कर सकता है लेकिन होश आने के पहले ही शायद वह इतना ‘बनाया जा चुकता’ है कि यह भी तय हो जाता है कि वह विद्रोह करना ‘चाहेगा’ या नहीं या अगर ‘चाहेगा’ भी तो उसके विद्रोह की दिशा क्या होगी। मेरा मतलब किसी किस्म के नियतिवाद से नहीं, मैँ केवल यह कहना चाहती हूँ कि ‘पैदा होना’ और ‘बनाया जाना’ असल में एक दूसरे से कोई खास अलग घटनाक्रम नहीं हैँ, सिवा इसके कि पैदा तो एक ही तरह से हुआ जाता है, लेकिन बनाया अलग अलग तरह से जाता है। न केवल स्त्री-पुरुष को एक दूसरे से बल्कि अलग अलग पारिवारिक सामाजिक सांस्कृतिक साँचों के अनुसार स्त्रियों को अन्य स्त्रियों से और पुरुषों को अन्य पुरुषों से भी अलग अलग। लेकिन ये साँचे भी कोई ऐसे ठोस और अनम्य नहीं कि उनमें ढल कर निकलने वाली हर प्रतिमा एक दूसरे की यथावत प्रतिकृति हो। कहने का मतलब यह है कि इंसान को जन्म के साथ जो बना बनाया बहुत कुछ मिलता है वह बड़ी हद तक निश्चित लेकिन एक हद तक अनिश्चि्त अतः लचीला हुआ करता है लेकिन वास्तव में मनुष्य का आदिम या प्राकृतिक रूप क्या है, कौन सा पशु? हम नहीं जानते। ‘जो बनाया गया है’ उसके विरुद्ध विद्रोह के क्षण में हम कहते तो है कि ” औरत पैदा नहीं होती, बनाई जाती है” लेकिन मतलब दरअसल  कुल मिला कर यही निकल सकता है कि ऐसी नहीं, वैसी भी बनायी जा सकती थी। जैसे पैदा होते हैँ वैसे ही कैसे बने रह सकते है ? ‘किसी और तरह से बनने या बनाये जाने’ की बात ही कर सकते हैँ। यानी मनुष्य – आदिम मनुष्य भी – प्राकृतिक नहीं, सांस्कृतिक प्राणी है और प्रकृति को तोड़ने, मरोड़ने, बदलने की दिशा में विकसित हुआ है। वह दिशा कहीं कहीं किसी किसी संस्कृति में प्रकृति के अनुकूल (जैसे परम्परागत भारतीय संस्कृति में) लेकिन आधुनिक संसार में अधिकतर प्रकृति के प्रतिकूल दिशा ही है। स्त्री के आदिम स्वरूप के बारे में सोचना हो तो या तो वन्य गुफ़ा नारी की कल्पना की जा सकती है या फिर स्त्री-शरीर के अन्तःस्रावों या हार्मोन्स के कारण निर्मित होने वाले किसी बुनियादी स्त्री-स्वभाव की।

क्या दैहिक शुचिता की अवधारणा स्त्री के खिलाफ कोई साजिश है ?
साजि़श में ऐसा ध्वनित होता है जैसे कोई सोचा समझा और जान बूझकर रचा गया षड्यन्त्र हो। सामाजिक आचार-संहिताओं की जकड़न और उससे छूटने की छटपटाहट और विद्रोह के दौर में ‘साजिश’ और ‘अभिशाप’ लोकप्रिय और बहुप्रयुक्त शब्द हो उठते है। तब ‘सहज’ और प्राकृतिक के अन्तर को समझने और स्वीकार करने की संभावना नहीं रह जाती क्योंकि सदियों के अभ्यास की वजह से वह आचरण-संहिता भी सहज और प्राकृतिक प्रतीत होने लगती है जिसकी बुनियाद में अन्याय होता है। इसलिये स्त्रीदेह के संग जुड़ी कोख और मासिक धर्म की अनिवार्यता, उसके प्रति पुरुष का दुर्निवार और आक्रामक आकर्षण भी स्त्री के ख़िलाफ़ प्रकृति की साजिश और अभिशाप की भाषा में कहे-समझे जाने लगते हैँ। परिवार, विवाह, दाम्पत्त्य जैसी सामाजिक संस्थाएँ, उनकी मर्यादाएँ, उनकी जड़ताएँ संस्कृति के विकास की सदियों के दौरान उगती, पनपतीं, विकसित, प्रतिष्ठित और जड़ होती हैं। समय समय पर समाज के नियन्ताओं के परस्पर विचार-विमर्श, चिन्तन-अनुचिन्तन से आचरण-संहिताएँ निर्मित और नैतिकताएँ निर्धारित की जाती हैं, शायद उस समय की ज़रूरत को जिस तरह से नियन्ताओं ने समझा, उसके अनुसार।
दैहिक शुचिता भी ऐसी ही एक अवधारणा है जो आज हमारे समाज में अपने एकतरफ़ा, अतिवादी, अविचारी स्वरूप में स्त्री के ख़िलाफ़ एक असम्भव सी सामाजिक साज़िश का रूप ले चुकी है। मूलतः वह किसी न किसी रूप में सारी दुनिया के समाजों में लागू थी, लेकिन दो विश्वे-युद्धों की परिणति में यूरोप मेँ पच्चीस वर्षों के अन्तराल मेँ पूरी की पूरी युवा-पुरुष-पीढ़ियों का सफ़ाया हो जाने की वजह से और जीवन में सृजन-समारोह के अविलम्ब आरम्भ की ज़रूरत से वहाँ नैतिकता-बोध और आचरण-संहिताओं की संरचना बदली। आधुनिकता, औद्योगीकरण, भूमण्डलीकरण इस बदलाव के अगले अध्याय कहे जा सकते हैं। बदलाव कभी इकहरे नहीं हुआ करते। अपने साथ अनेकपरतीय और अनेकतरफ़ा बदलाव लाते हैं।
आदिम वन्य गिरोह-समाज में परिवार की धारणा क्यों और कैसे विकसित हुई? स्त्री-पुरुष को यह जानने समझने में सदियाँ लग गयी होंगी कि सन्तान के जन्म में पुरुष का भी कोई योगदान या भूमिका है। उसके पहले तक प्रजनन की यह रहस्यमयी क्षमता स्त्री को एक रहस्यमयी शक्ति से मण्डित अस्तित्व बनाती थी जिससे वह भयभीत रहा करता होगा। एंगेल्स के अनुसार ‘अपनी’ सन्तान की धारणा के साथ ‘अपनी औरस सन्तान’ की निर्भ्रान्त पहचान की जरूरत से अपना कुटुम्ब, अपनी सम्पत्ति, अपना उत्तराधिकारी इत्यादि की धारणाओं और मर्यादाओं का विकास स्वाभाविक रूप से लाजमी था। उत्तराधिकार के लिये औरस सन्तान निश्चिंत करने के लिये स्त्री की प्रजनन-क्षमता पर कब्जे की ज़रूरत से दैहिक शुचिता की धारणा का विकास हुआ। वह स्त्री की यौनिकता पर एकतरफ़ा कब्जा था, पुरुष उससे मुक्त था।
हमारी परम्परा मेँ महाभारत में प्राप्त एक उल्लेख के अनुसार बृहदारण्यक और छान्दोग्य उपनिषदों के एक प्रमुख ऋषि श्वेेतकेतु को विवाह की संस्था के सूत्रपात का श्रेय प्राप्त है। उन्होंने देखा था कि उनके पिता की उपस्थिति में एक कामग्रस्त ब्राह्मण ने उनकी माँ का हाथ पकड़ा और पिता (सम्भवतः प्रथानुसार) मौन दर्शक बने रहे। माता-पिता और तीसरे आदमी से सन्दर्भित इस घटना से श्वेतकेतु को जो भी महसूस हुआ हो,उन्होंने इस अनुभव से स्त्री-पुरुष सम्बन्ध को गरिमा प्रदान करने की ज़रूरत को महसूस किया और स्त्री-पुरुष सम्बन्ध मर्यादाएँ निर्धारित कीं जो अन्ततः विवाह की संस्था के रूप में विकसित हुईं।
इस सन्दर्भ में संभवतः मनुष्य स्वभाव में निहित परस्पर अधिकार, ईर्ष्या और अनौचित्य की व्यंजनाएँ भी शामिल हैँ जिसकी वजह से भी सीमाओं का निर्धारण जरूरी हुआ होगा। तब का तो पता नहीं लेकिन अब तो जहाँ उत्तराधिकार के लिये सम्पत्ति नहीं होती वहाँ भी सन्तान की आकांक्षा और अधिकार भावना होती है। संभवतः महाभारत के पहले तक विवाह की मर्यादाएँ अनिर्धारित और पर्याप्त लचीली रही होंगीं। श्वेवतकेतु के निर्धारण में मर्यादाएँ दोतरफ़ा हैँ। विकासक्रम मेँ सारी मर्यादाएँ केवल स्त्री के लिये शेष रह गयीं और अन्ततः दाम्पत्य और मातृत्व उसके अस्तित्व का मूल्य निर्धारित करने लगा। इन दोनो स्थितियों को उनके सांस्कृतिक महिमामण्डन और भावुक विगलन से अलग कर दिया जाय तो स्त्री के पास जो अस्तित्व बच रहता वह देह पर कब्जा और प्रजनन-यंत्र का है। अतीत की जिस समाज व्यवस्था में आर्थिक उत्पादन का संसाधन मनुष्य था, उसमें स्त्री की प्रजनन-शक्ति संसाधन के उत्पादन-यंत्र का पर्याय थी और स्त्री स्वयं भी पशु सम्पत्ति के समकक्ष सम्पत्ति में बदल गयी थी। पशु और स्त्री बराबर से लूट का माल होते थे।
मातृसत्तात्मक आदिम समाज के केवल कुछ चिह्न बाकी हैं जिन्हें हम स्मृतिसूचक मानकर इतिहास की निशानदेही की कोशिश करते हैँ अन्यथा वस्तुतः वे मिथक और कल्पना की सत्ता के अधिक निकट हैँ। भारतीय सांस्कृतिक परम्परा में ऐसे बहुत से मिथक और वृत्तान्त हैं जो आज भी जीवित परम्परा की तरह हमारे साथ शेष और जीवन के समारोह का अंग हैं।

समाज के सन्दर्भ में शुचितावाद और वर्जनाओं को किस तरह परिभाषित किया जाए।
बात लम्बी होती जा रही है लेकिन पूरी अभी हुई नहीं है इसलिये ऊपर वाली बात के उत्तर को मैँ आपके इस प्रश्ना में भी जारी रखने की इजाज़त चाहूँगी। स्त्री-विमर्श का मूल वैचारिक आधार तो इसी पहचान से शुरू हुआ है कि अन्याय और उत्पीड़न स्त्री के प्रति सामाजिक व्यवहार की मुख्यधारा है। पितृसत्तात्मक समाज के सूत्रपात के प्रथम क्षण से अब तक का लम्बा इतिहास है, कोई नहीं जानता कितना लम्बा, शायद पूरा का पूरा दर्ज इतिहास, और बहुत सारे मोड़ों से गुजर कर यहाँ तक आया है, बदलाव की भी एक लम्बी यात्रा पूरी की है लेकिन सामाजिक ऐतिहासिक बदलावों के बावजूद ऐसा होता है कि हमारा सामूहिक अवचेतन हमारे पुराने भावात्मक व्यवहारों, मूल्यों, सामूहिक नैतिक निर्णयों के स्मृति-संचय को संस्कारों मे बदल कर वर्तमान तक साथ लिये चला आता है। संस्कृति के निर्माण में संस्कार ही सामग्री है क्योंकि संस्कार उन स्मृतियों का नाम है जो अवचेतन का हिस्सा बन चुकती हैं और अधिकार और कभी कभी तो पुनीत कर्तव्य जैसा भी कुछ मान रखा है क्योंकि उसमें स्त्री को उसकी जगह दिखाने, अनुशासन सिखाने, काबू में रखने, ‘मर्यादा’ का उल्लंघन न करने का पाठ पढ़ाने जैसा कोई भाव निहित और ध्वनित रहता है। शारीरिक ताड़ना, बलात्कार, तेजाबी हमले हत्या और आत्महत्या की ओर धकेलना जैसी हिंसाएँ इस पाठ के विविध अध्याय हैं। हमलावर को सदियों तक स्त्री की शर्म और चुप्पी पर भरोसा रहा है। इसलिये स्त्री के पक्ष में एक के बाद एक कानून बनाते जाने के बावजूद स्थिति बहुत सुधरी नहीं है। कानून का साथ और सहारा लेने के लिये भी चुप्पी तोड़ना ज़रूरी है। और अब वह चुप्पी टूट रही है, तोड़ी जा रही है, वह शर्म छोड़ी जा रही है, तोड़ने और छोड़ने के लिये वातावरण में प्रोत्साहन है। कानूनों की कार्यान्वित का हौसला है। शायद इसीके समतोल की तरह हिंसा और भी अधिक हिंसक, हमला और भी अधिक आक्रामक होता जा रहा है। समाज की इन प्रवृत्तियों और व्यवहारों को देखते हुए शुचितावाद और वर्जनाओं की परिभाषा केवल अन्याय और उत्पीड़न की तरह की जा सकती है लेकिन ये ही संस्कार भी हैं, मर्यादाएँ भी और नैतिक मूल्य भी और नैतिकता और सच्चरित्रता तो हमारे समाज के लिये जैसे कुल मिला कर स्त्री के शरीर मेँ ही बसती हैं। हमारे अनजाने भी/ही हमको नियंत्रित करती हैँ। स्त्री से जुड़ी सामाजिक मान्यताओं के बारे यह खास तौर से सच है। इसकी वजह पर ठीक ठीक उँगली रखना आसान नहीं। अनुमानतः शायद यही सच हो कि पुरुष की जिन आदिमवृत्तियों ने उसके अवचेतन में सबसे गहरी जड़ें जमा रखी हैँ – काम, संग्रह, वर्चस्व की मूलप्रवृत्तियाँ – वे सब की सब स्त्री के मामले में एकसाथ एकजुट सक्रिय होती हैँ और बहुत पुष्ट और सबल विवेक के अभाव में हावी हो बैठती हैं। युग बदल जाय, समाज बदल जाय, स्थितियाँ बदल जाय, यहाँ तक कि स्वयं संस्कृति भी कई सारी परत नीचे तक की गहराइयों में बदल जाय, सबसे निचली और गहरी परत में स्त्री के विषय में वही मान्यताएँ, वही कसौटियाँ जस की तस बनी रहती हैं।
शुचितावाद और देह से जुड़ी वर्जनाएँ हमारे समाज की ऐसी ही संस्कारजन्य मर्यादाएँ हैं लेकिन आज के समय में सिर्फ़ स्त्री के लिये। और उसकी रक्षा और पालन की जिम्मेदारी भी अकेले दम उसकी ही रहती आई है जबकि पितृसत्ता में अक्सर पुरुष-समाज ने उस पर हमले और उसके ध्वंस को अपना अधिकार और कभी कभी तो पुनीत कर्तव्य जैसा भी कुछ मान रखा है लेकिन इसके बावजूद स्त्री-समुदाय के लिये भी उनसे मुक्त होना बहुत आसान नहीं; क्योंकि उसका अपना मानस और आत्मबोध भी उन्हीं तन्तुओं से रचित है; हालाँकि पुरुष के मुकाबले, कम से कम कुछ अंशों में तो जरूर, अधिक आसान है क्योंकि उसके पास अपने साथ अन्याय और उत्पीड़न के लिये पितृसत्ता के विरुद्ध एक न्यायोचित मुकद्मा है। न्याय के पक्ष में खड़े होना, अन्याय सहने से इंकार करना, उत्पीड़न के लिये रोष, लड़ने का साहस और एकजुट आन्दोलन और मोर्चा – ये ऊर्जा का अक्षय स्रोत हैं। फिर स्त्री के पास तो केवल अपनी ही नहीं, सदियों की पीड़ा का उत्तराधिकार भी है। अतीत सदियों का फ़ैसला भी वर्तमान के मैदान में होने लगे तो वह ऊर्जा भी सैकड़ों गुना हो जाती है। तब वह केवल परिस्थितियों से नहीं, संस्कारों से लड़ाई भी बन जाती है।
शुचितावाद और वर्जनाओं का सामाजिक सन्दर्भ यही है कि बड़े पैमाने पर समाज के आग्रह जहाँ के तहाँ, जस के तस मौजूद हैं; स्त्री-पुरुष दोनो के लिये; और उनको एक अनुकरणीय आदर्श का दर्जा देकर रखा गया है लेकिन यह आदर्श स्त्री के लिये कुछ ‘अधिक’ आदर्श है। और दूसरी तरफ़ देह और काम भावना को लेकर उतने ही बड़े पैमाने पर कुण्ठाएँ, ग्रंथियाँ, असहजता और उनसे उत्पन्न झूठ, फरेब, बेइमानी, दोहरापन, व्यक्तित्व का विभाजन, यौन अपराध और हिंसा का अस्तित्व है। दोनो में एक भीतरी कार्य-कारण सम्बन्ध है। इस असम्भव आदर्श का उल्लंघन दोनो से होता हैँ, लेकिन अब तक दण्डनीय केवल स्त्री ही रहती आई है।
लेकिन ये सिर्फ अपने नहीं, पूरे समाज के, पितृसत्तात्मक समाज के संस्कार हैँ जिन्हें जड़ जमाये हुए सदियाँ बीत चुकी हैँ। जो इस अन्याय के विरुद्ध आत्मसजग या आत्मचेत होते हैँ वे भी प्रायः एक स्तर पर विभाजित व्यक्तित्व का शिकार हो जाते हैं। इस विभक्ति को पाटने में पीढ़ियाँ लग जाती हैं। हमारे समाज में विकास और परिवर्तन इतनी सीढ़ियों और इतनी पीढ़ियों से गुजरते हुए सम्पन्न हो रहा है कि मानो एक साथ कई सदियाँ गुजर रही हैँ।
संस्कार के विरुद्ध विद्रोह करते हुए भी एक असमंजस बना रहता है, कहाँ तक ? कितनी दूर तक? कई बार प्रतिक्रिया में या तो सोची समझी तर्कपरायण उग्रता का अतिशय दिखाई देता है या फिर बिना सोचे समझे छलांग या फिर एक हिचकिचाहट, अनिश्चयय, अनिर्णय या ढुलमुल-यकीनी। अक्सर और ज़्यादातर तो कहानियों, कविताओं, आलेखों, भाषणों में गोला-बारूद उगलने वाली महिलाएँ भी सचमुच की ज़िन्दग़ी में ज़मीनी स्तर पर बड़े बड़े समझौते करती नज़र आती हैं। सचमुच का विद्रोह तात्कालिक घटनाओं और परिस्थितियों की असहनीयता में से निकलता है और हमारे समाज में स्त्री के साथ ऐसा सलूक जिसमें से विद्रोह स्वयं फूट निकलता हो, नियम है अपवाद नहीं।

यदि स्वयं के लिए वर्जनाओं का निर्धारण स्वयं स्त्री करे तो क्या हो ?
तमाशा यह है कि बलात्कार अगर पकड़ा जाय तो उसे स्त्री की सहमति से सम्पन्न साबित करने की कोशिश की जाती है लेकिन जो होता है वह अगर सचमुच स्त्री की सहमति से हुआ हो तो स्त्री द्वारा मर्यादा के उल्लंघन और शुचिता के विसर्जन का मामला बना दिया जाता है। स्त्री की स्वेच्छा और सहमति बलात्कार से भी ज़्यादा संगीन और बड़ा अपराध है।
स्त्री स्वयं के लिये वर्जनाओं का निर्धारण करे, इसमें एक ओर यह ध्वनित होता है कि सामाजिक मान्यता प्राप्त वर्जनाओं को वह स्वेच्छा से स्वीकार कर ले और उन्हें स्वयं-निर्धारित मान ले लेकिन दूसरी ओर, अधिक औचित्यपूर्वक, इसमें यह भी निहित है कि उसके स्वयं-निर्धारण में इस तरह की मान्यता-प्राप्त कुछ वर्जनाओं का निषेध भी होगा। ऊपर वाले प्रश्न  में आपने शुचितावाद और वर्जनाओं को एक साथ ब्रैकेट किया है लेकिन वर्जनाओं का दायरा दैहिक शुचिता तक सीमित नहीं है, वह बहुत बड़ा है। उसमें खिलखिला कर हँसने से लेकर, सर उठाकर, गर्दन तान कर चलने, छोटे छोटे भी अपने निर्णय खुद लेने तक लगभग पूरी जीवनचर्या शामिल है। ज़्यादा बड़ा हंगामा प्रायः कपड़ों की नाप और शरीर के खुलेपन को लेकर मचता रहता है जिसे बलात्कार तक को जायज़ ठहराने का बायस बना लिया जाता है। अगर हमारी दुनिया केवल स्त्री आबादी के बसने के लिये उपलब्ध एक द्वीप हो तो, या फिर हमारी स्त्री अगर ‘वीरविहीन मही मैं जानी’ की तर्ज पर इतनी आत्मसम्पन्न, स्वयंपर्याप्त और स्वायत्त हो कि संस्कार के नाम रूढ़ि का प्रश्नहहीन पोषण करने वाले शेष ग्रन्थिबद्ध, कुण्ठाग्रस्त समाज को ठेंगे पर रखते हुए अपनी स्वच्छन्दता को चरितार्थ कर ले और उसके कोई आनुषंगिक नकारात्मक परिणाम न होते हों तो मैं शत प्रतिशत स्वच्छन्दता के पक्ष में हूँ। ( और स्त्री के सिलसिले मेँ वीर, महावीर – मेरा मतलब हनुमान से नहीं, वर्धमान से भी नही – तो हमारे सभी नरपुंगव ठहराये जा सकते हैँ) लेकिन उसका मतलब चाह कर भी मेरे लिये यह नहीं हो सकता, और असल में तो ऐसी चाहना भी मेरे लिये संभव नहीं कि मेरी ज़िन्दग़ी केवल मेरी ज़िन्दग़ी है और आनुषंगिक नकारात्मक वगैरह अगर किसी को कुछ होता है तो वह उसकी समस्या है, वह जाने! चाह कर भी ऐसा चाहा नहीं जा सकता। अपने निर्णयों का जिम्मेदार तो हमें होना ही होता है। मेरे निकट स्त्री होने का एक अर्थ यह भी है।
नयी पीढ़ी में उन लड़कियों/स्त्रियों की गिनती बढ़ रही है और उन्हें देख कर बेहद सुख, सन्तोष औरखुशी होती है जो आर्थिक रूप से इतनी पर्याप्त आत्म-निर्भर और संस्कारों की जकड़न से इतनी मुक्त हैँ कि एक स्वच्छन्द स्वायत्त जीवन जी सकें। उस धरातल पर अपने अस्तित्व के तरल प्रवाह की अनुभूति क्या होती है, उसे केवल वही जानता है जिसने उसको जीकर देखा है, वह जीकर देखना शायद किसी विचित्र भाव-रसायन के योग से सर्जनात्मक क्षमता से सम्पन्न लोगों के लिये ठोस माँसल धरातल पर बिना जिये भी सम्भव होता है कभी कभी। आपके प्रश्नष ‘अगर वर्जनाओं का निर्धारण स्वयं स्त्री करे तो क्या हो’ में ‘क्या हो’ का एक उत्तर इस तलाश की दिशा में जाता है कि उस निर्धारण के सामाजिक प्रभाव-परिणाम क्या होंगे और दूसरा उत्तर इस तलाश की दिशा में कि उन वर्जनाओं का स्वरूप क्या होगा। हमारे अनुमान कुल मिलाकर अकादमिक व्यायाम ही समझिये क्योंकि जमीनी स्तर पर जो कुछ होता है वह अकसर हमारे सारे अनुमानों के परे और कल्पनाओं को झुठलाता हुआ निकलता है। सामाजिक स्तर पर बात इस पर निर्भर है कि आत्मनिर्णय करने वाली स्त्री जिस समाज का हिस्सा है उसकी स्थापित और मान्य वर्जनाओं से वह स्वयं-निर्धारण में कितनी दूर जा रही है। फ़ासला जितना बड़ा उतनी ही खतरनाक परिणति। गाली-गलौज के वाचिक व्यवहार से लेकर बलात्कार और हत्या तक का शारीरिक सलूक भी।और तमाशा यह कि पूरी तरह से वर्जनाओं के दायरे मेँ रहने वाली स्त्री के साथ यह सलूक नहीं होगा , इस बात की कोई गारण्टी नहीं। जैसा कि मैँ बार बार कहती हूँ, वह तो स्त्री होने और पुरुष की पकड़ और पहुँच के भीतर होने मात्र से संभावित है। वर्जनाओं के स्वरूप की जहाँ तक बात है, स्वयं-निर्धारण का मतलब पूरी तरह से एक निजी और व्यक्तिगत चुनाव है। इसके अलावा किसी स्थिति के आमने सामने आ पहुँचने के पहले से ही वर्जनाएँ और निषेध तय करके नहीं रखे जा सकते। जब चौतरफ़ा दबाव के दमघोट में जीना ही ज़िन्दग़ी का पर्याय हो तो आप शायद खुद नहीं जानेंगे कि कब किस वर्जना को आपका आवेग बेसँभाल होकर चुनौती दे बैठेगा, वह आपकी खुद चुनी हुई हो, तो भी। इसलिये इसके बारे में कोई सामान्य सर्व-जन-स्वीकार्य जैसा सिद्धवाक्य मैँ नहीं कहना चाहती। अपने चुनाव का तरीका ही शेयर कर सकती हूँ, बस। निर्णय और निषेध तरह तरह के हो सकते हैं। जब स्त्री के प्रति प्रवृत्ति और व्यवहार के सिलसिले में पूरा का पूरा सामाजिक ढाँचा और सांस्कृतिक साँचा ही बदलने की ज़रूरत हो तो जाहिर है कि यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी नये मूल्यों और विचारों के हस्तान्तरण की एक लम्बी और धैर्यसाध्य प्रक्रिया होने वाली है और आपको अपनी प्राथमिकताओं के चुनाव की ज़रूरत है। एक तो कपड़ों की नाप और फ़ैशन की काट जैसे दैनिकचर्या के सीधे और आसान किस्म के फ़ैसले होते हैं जो अपनी ज़िद से कठिन बनाये जा सकते हैं। किसी ने अगर इसीको अपनी आज़ादी/ सुविधा/स्वच्छन्दता की नाप बना रखा है तो उसकी खुशी; और जाहिर है कि अगर उसके तात्कालिक सामाजिक सन्दर्भ में किसी को उस पहनावे से दिक्कत नहीं है तो मामला यहीं खत्म होता है। इसके उलट हालात मेँ पहनावे को लेकर अशोभनीय किस्म की टीका-टिप्पणी और अभद्र किस्म की फ़िकरेबाज़ी जैसी अश्लीालताओं के मद्दे-नज़र अगर मैं चाहूँ तो इसे अपने शरीर के भीतर सहज भाव से निवास करने और उसे आत्माभिव्यक्ति का माध्यम बनाने के अधिकार को लेकर पूरा दर्शन शास्त्र रच डालने लायक तर्कजाल बुन सकती हूँ। लेकिन अगर सचमुच घूरती हुई और फिकरे कसती हुई और शायद नोच-खसोट जैसे ऐडवेन्चर भी आजमाती हुई तमाशबीनों की टोली के सामने मेरी सहजता और स्वच्छन्दता इस आजादी के आचरण से खण्डित होती है, अगर अपनी नयी काट की पोशाक में अपने सहज शारीरिक अस्तित्व में विचरण करते हुए मैं निर्बन्ध और स्वच्छन्द महसूस करते हुए आगे बढ़ जाने में खुद को असमर्थ महसूस करती हूँ तो व्यक्तिगत रूप से इस को मैँ अपनी आज़ादी के ‘ट्रिवियलाइज़ेशन’ का, अपनी ऊर्जा के अपव्यय का मामला महसूस करते हुए अपनी वर्जना का चुनाव करूँगी। ठहरे पानी में कंकड़ी फेंकने से भी लहरें उठती हैं। अब या तो लहरों से लड़ते रहो, उन्हें उठने से रोकने मेँ अपनी ऊर्जा खपाते रहो या फिर लहरों को वहीं उठता छोड़ कर आगे बढ़ जाओ। और औरत के साथ सलूक के ऐसे संगीन किस्म के हालात में जब ठहरे हुए जल में फेंकने के लिये बड़ी बड़ी चट्टानें और भारी भरकम पत्थर मौजूद हैँ तो कंकरी फेंक कर लहरों से लड़ने की तुक मेरी समझ में नहीं आती। लेकिन यह मेरा बिल्कुल व्यक्तिगत चुनाव है, किसी की आज़ादी की परिभाषा में हस्तक्षेप नहीं।

विवाह की व्यवस्था में स्त्री की मनोवैज्ञानिक ,सामाजिक एवं आर्थिक स्थितियां कितनी स्त्री के पक्ष में हैं ? 
वैसे तो इन स्थितियों की सूची में ‘शारीरिक’ भी जोड़ कर और सारी स्थितियों को शत-प्रतिशत स्त्री के विपक्ष में बता कर एक वाक्य में बात ख़त्म की जा सकती है। वह सामान्यतः दर-अस्ल हैं भी ऐसा ही लेकिन आपके इस प्रश्न  के उत्तर में मेरा संवाद उस स्त्री से है जिसे अपने विवाह को बचा रखने की इच्छा या मज़बूरी है।
विवाह सामाजिक संस्था होने के नाते एक व्यवस्था है तो सही लेकिन आज वह उस अर्थ में व्यावहारिक स्तर पर प्रायः बाकी नहीं कि उसके पास कोई बने बनाये पारिवारिक कायदे-कानून और सामाजिक संविधान है जिन्हें अब तक बड़े पैमाने पर कुल की रीत और परिवार की मर्यादा और खानदान की इज्जत के नाम से जाना जाता था।
दाम्पत्त्य का अर्थ मूलतः स्त्री-पुरुष के एक युगल के युग्मक-सम्बन्ध की सामाजिक मान्यता-प्राप्ति है। वह सृष्टि के ताने-बाने की लघुतम इकाई है। उसके इर्द-गिर्द परिवार है, सम्बन्धी-कुटुम्बी हैँ, नाते रिश्तों  का ताना-बाना है, भूमिकाएँ हैं, पदानुक्रम हैं। आज के दौर में समाज के कई हिस्सों में यह शुरुआत या कम से कम इसकी चेतना की सुगबुग होती नज़र आ रही है कि इनमे से कुछ भी सदा सर्वदा के लिये जड़ रूप से निश्चिेत और निर्धारित नहीं है। अपनी व्यावहारिक कार्यान्विति और दैनन्दिन परिणति मेँ वह नयी-नयी परिस्थितियों में रोज़-रोज़ की छोटी-छोटी समस्याओं, रोज़-रोज़ के समाधानों के द्वारा रोज़ रोज़ निर्धारित और परिभाषित होने वाली व्यवस्था है, या कम से कम ऐसी बनायी जा सकती है।
इस व्यवस्था को स्त्री के पक्ष में लाने मेँ कुछ हद तक आर्थिक स्तर पर स्त्री की आत्मनिर्भरता मददगार होती है लेकिन कुछ हद तक ही। अपवादों को छोड़ दें। अकसर तो उसकी वह आत्मनिर्भरता वास्तव में परिवार की आर्थिक ज़रूरतों के लिये एक पूरक योगदान होती है, इतनी स्वयंपर्याप्त नहीं कि स्त्री को आत्मनिर्भर बना सके। फिर उसके संस्कार जो आत्मनिर्भर होने के इतना विरुद्ध हैँ कि प्रायः वह इसके बावजूद निर्भर तथा स्वयं-अपर्याप्त होने का अभिनय करती पाई जाती है।
दूसरी तरफ़ पुरुष का दुर्बल और कातर अहं जो अपनी कातरता को उद्धत और प्रचण्ड होकर छिपाता है। पितृसत्ता के हाथो केवल स्त्री का ही सत्यानास नहीं किया धरा जाता, पुरुष को भी पौरुष का जो आत्म-बिम्ब थमाया और मरदानगी का खोल पहनाया गया है वह उसके अस्तित्व की नाप से छोटा तो है ही, इतना सख्त भी है कि उसके उगने, बढ़ने और फैलने लायक लचीला नहीं बन पाता। पालक और रक्षक की भूमिका इस तरह उसके आत्मबिम्ब को निर्धारित करती है कि ज़्यादातर उदाहरणों में स्त्री की आर्थिक आत्मनिर्भरता उसके स्वत्व को हालाडोला की हालत मेँ डाल देता है। हो सकता है कि कही कहीं स्त्री का व्यवहार भी इसका जिम्मेदार होता हो, पर जहाँ ऐसा नहीं होता, वहाँ भी स्त्री को उसकी औकात और हैसियत जताने के लिये उसके भीतर का पशु बल-प्रयोग को उतारू हो उठता है। स्त्री को भीत और चुप करके वह खुद को जीत गया समझता है। फिर भी सम्बन्ध अगर चलता है तो मनोवैज्ञानिक और सामाजिक स्थितियाँ इसके अलावा हैँ।
स्त्री की आर्थिक निर्भरता उसके अस्तित्व को पुरुष की मिल्कियत की तरह परिभाषित करती है और पुरुष इसे बोझ में बदल कर स्त्री को भयभीत और अहसानमन्द बनाये रखना चाहता है। घर की, सम्बन्धों की जिम्मेदारियों का, देखभाल और सार-सँभाल के स्त्री-श्रम का कोई आर्थिक मूल्य नहीं कूता जाता। लेकिन संभावना है कि सम्बन्ध के दायरे के भीतर स्त्री का आर्थिक अर्जन उसके लिये सम्मान के अर्जन का कारण भी बने या फिर उसे सम्बन्ध के बाहर आ जाने का साहस दे। बहुत बार सम्बन्ध में ऐसी बेमरम्मत किस्म की टूट-फूट बाहर आ जाने के सिवा दूसरा कोई विकल्प बाकी नहीं छोड़ती। सामाजिक, मनोवैज्ञानिक दबावों के भरोसे सम्बन्ध को ढोते जाने की ज़रूरत स्त्री के लिये अब वैसी विकल्पहीन मज़बूरी नहीं रह गयी है। बहुत अंशों में पुरुष भी अब पहले की अपेक्षा अधिक संवेदनशील बनता हुआ दिखाई दे रहा है। लेकिन कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि मौजूदा हालात में विवाह नामकी संस्था से स्त्री का मोहभंग उत्तरोत्तर बढ़ रहा है, अविवाहित जीवन का चुनाव करने वाले लोगों में स्त्रियों की संख्या बढ़ रही है। आर्थिक आत्मनिर्भरता, दैहिक शुचिता के पूर्वग्रह से मुक्ति, दाम्पत्त्य और परिवार के दायरे के बाहर भावात्मक सम्बल खोज पाने की मानसिक स्वतंत्रता, आत्म-विकासऔर आत्माभिव्यक्ति के लिये जगह इसका बड़ा कारण है। विवाह अब उसके लिये एकमात्र भविष्य अथवा अन्तिम गन्तव्य नहीं लेकिन फिर भी, अब भी विवाह और सन्तान और सन्तान का भविष्य बड़े पैमाने पर अपनाया जाने वाला विकल्प है और दम्पत्ति के सामने संभावना है की बनी बनाई भूमिकाओं और उनके मिथकों से निर्मित-निर्धारित कसौटियों से हट कर युगल अपनी भावात्मक, पारिवारिक, सामाजिक ज़रूरतों के हिसाब से अपने विवाह को परिभाषित और सम्बन्ध को निर्धारित करें। उसके लिये जिस धैर्य और प्रतीक्षा की दरकार है वह टोटे में है और उसी अनुपात मेँ हमारे जैसे समाज में स्त्री के प्रति असहिष्णुता और हिंसा में वृद्धि भी दिखायी देती है। समस्या को देखने समझने और सुलझाने की बजाय अनदेखा करने, दबा देने और कुचल देने का आग्रह अधिक है, बिना यह समझे कि स्त्री को कोसने गरियाने से अगर कुछ होगा तो कुल इतना कि स्थितियाँ और भी तेजी से उस विस्फोट के निकट जायेंगी जिसकी रोक थाम की कोशिश मेँ दमन की यह नीतिया अपनाई जा रही हैँ।

मातृसत्तात्मक व्यवस्था में विवाह-संस्था क्या अधिक सुदृढ़ और समर्थ होती। तब समाज 
भ्रूण हत्या दहेज़ हत्या एवं बलात्कार जैसे अपराधों से कितना मुक्त होता ? 
– यह पूरी तरह से एक अनुमानजनक प्रश्न  है। इसका कोई प्रमाणपुष्ट या सन्दर्भसहित उत्तर नहीं दिया जा सकता। कल्पना को तर्कसम्मत बनाने की सिर्फ कोशिश की जा सकती है। सो वही करती हूँ। वजह चाहे जो रही हो, सामाजिक व्यवस्था के रूप में मातृसत्ता संसार में बाकी नहीं रही। कोई तो वजह रही होगी, शायद बहुत सारी वजहें रही हों। शायद अलग अलग समाजों में अलग अलग वजहें रही हों।
बहरहाल, नतीजा सबका वही एक। कि नियामक व्यवस्था के तौर पर मातृसत्ता कहीं नहीं। हालाँकि पुनः सर्वथा असंभावित भी नहीं, तर्कसम्मत ढंग से कहूँ तो वर्चस्व में उतार-चढ़ाव, स्थानान्तरण, स्थिति-परिवर्तन के अपने नियम-अपवाद हुआ करते हैँ और वे शाश्वसत या सनातन नहीं होते इसलिये । स्त्री की बढ़ती हुई क्षमताओं, विकसित होते हुए व्यक्तित्व, क्षरित होती हुई बाधाओं और व्यवधानों, सामाजिक राजनीतिक व्यवस्था मेँ स्त्री के लिये बढ़ती हुई जगह, उत्पादन व्यवस्था में वन-मैन-इण्डस्ट्री और होम-ग्रोन-इण्डस्ट्री के बढ़ते हुए विकल्पों को देखते हुए इस संभावना को प्रमाण-पुष्ट संभाव्यता भी माना जा सकता है हालाँकि अब तक मातृसत्ता के जिस रूप से हम थोड़ा बहुत परिचित हैं, जैसे केरल का नायर समाज, उसके बारे में भी तथ्य यही है कि वह मातृकुल के नाम से वंशानुक्रम और उत्तराधिकार का पर्याय है लेकिन स्त्री के वास्तविक वर्चस्व का नहीं।
वैसे मातृसत्ता से उम्मीद यह की जाती है कि वह वर्चस्व और पदानुक्रम की धारणाओं और बन्धनों से मुक्त होगी। क्यों की जाती है, इसका अनुमानजन्य आधार किन्हीं सारभूत स्त्री-गुणों से मण्डित सारभूत स्त्री-स्वभाव है लेकिन इस अनुमान में शक्ति और वर्चस्व के परिणामस्वरूप आने वाले संभावित परिवर्तनों को नहीं जोड़ा गया है। यानी कल्पना यह है कि मातृसत्ता अपने मातृ-तत्त्व के कारण माँ के स्वाभाविक वात्सल्य, कृपा और करुणा से लैस व्यवस्था होगी लेकिन इस दिशा मेँ कल्पना को बढ़ाया नहीं गया है कि अपने सत्ता-तत्त्व के कारण उसमे ताकत का अहसास क्या जोड़ेगा या घटायेगा।
जहाँ तक सवाल है मातृसत्ता के समाज में भ्रूण-हत्या, दहेज-हत्या, बलात्कार से मुक्त होने की, अनुमान ही लगाना है और कल्पना ही करनी है तो यही क्यों न की जाय कि हाँ, वह इनसे पूरी तरह से मुक्त समाज होगा।कल्पना में ही खुशी का अनुमान कर लिया जाय।
या फिर पिछले पाँच सात हजार साल के इतिहास को देखते हुए अगले पाँच सात हजार साल के भविष्य की कल्पना मातृसत्तात्मक व्यवस्था के समाज रूप में करते हुए यही क्यों न मान लिया जाय कि जैसे परिस्थितियों के प्रतिबन्ध या ‘कण्डिशनिंग’ के चलते स्त्री ने अपनी वन्य गुफा़-नारी की शिकारी-ऊर्जा, आक्रामकता और शारीरिक बल, खो दिया, कोमल-कमनीय-दुर्बल हो गयी वैसे ही पुरुष भी अगले पाँच सात हजार साल में … लेकिन यह कल्पना मुझसे करते नहीं बनती, मैँ करना नहीं चाहती, कर नहीं सकती कि तब भ्रूण-हत्या, दहेज-हत्या और बलात्कार का शिकार पुरुष हो रहे होंगे। स्त्री के प्रति अन्याय का प्रतिकार जरूरी है लेकिन सदियों का अन्याय जिसने सहा है उसके बारे में कल्पना में भी मैँ सोचना यही चाहती हूँ कि प्रतिशोध के उन्माद से नहीं, परदुखकातरता की इतनी क्षमता से लैस ज़रूर होगी कि उसी अन्याय का विस्तार पुरुष तक न करे।
ऐतिहासिक उत्तराधिकार, खास तौर से पीड़ा और अन्याय के उत्तराधिकार के साथ दिक्कत यही है कि उसके प्रतिकार का उपाय करते समय हम उसके साथ इस तरह तादात्म्य करते हैँ कि याद नहीं रहता कि उस इतिहास में निजी हैसियत से हम मौजूद नहीं थे और प्रतिकार में प्रतिशोध-परायण हो उठते हैँ।
इस सवाल का हल कठिन है कि विवाह की संस्था उस समाज में अधिक सुदृढ़ और समर्थ होती अथवा नहीं। इस प्रश्ना में यह मान्यता निहित है कि उस समाज में भी स्त्री के लिये वही सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण होता जो आज पितृसत्ता के समाज में है – पति, परिवार, सन्तान। और उसमें मातृसत्ता से अन्तर सिर्फ़ इतना हुआ होता कि वह उसे अपने वर्चस्व से सुलभ और सुकर बना लेती।

 सह-जीवन की अवधारणा क्या स्त्री के पक्ष में दिखाई देती है ? 
उत्तर – हमारे सामाजिक जीवन का यह एक नया और बड़ा – कहना चाहिये क्रान्तिकारी – मोड़ है। कुछ दिन पहले तक विरल था, अब उतना विरल नहीं, बल्कि खासी तेजी से बढ़ रहा है।
स्त्री के पक्ष में है या नहीं? समझना होगा कि इस सिलसिले में स्त्री का अपना पक्ष क्या है?
मुझे अभी तक ठीक ठीक समझ में नहीं आया है कि सह-जीवन मेँ प्रवेश करने वाली स्त्री अपने सम्बन्ध और अपने भविष्य के बारे में किस इच्छा या कल्पना या अनुमान के साथ इसमें घुसती है? अलग अलग लोगों की अलग अलग समझ लेकिन इतना निश्चित है कि वह दाम्पत्त्य का या विवाह का स्थानापन्न नहीं है, न हो सकता है। उसका आविष्कार ही विवाह से भिन्न किसी जरूरत या मानसिकता या जीवन-दर्शन या स्वभाव के कारण हुआ है। जब पिछले किसी प्रश्ने के उत्तर में को ही पुनःपरिभाषित करने की बात कही है तो जाहिर है कि मेरी समझ से सह-जीवन तो ऐसा खुला समीकरण है जो शायद अवधारणा में बाँधा भी नहीं जा सकता। साथ साथ जीने में क्या क्या बाँटा जाना है यह भी शायद पूरी तरह से भागीदारों पर ही निर्भर करता है।
सिर्फ़ महँगे आवास में किराया और जगह बाँटने की सुविधा से शुरू होकर घर चलाने की जिम्मेदारियाँ, खर्चे, और अन्ततः शायद उपस्थिति और निकटता के कारण विकसित हो जाने वाला भावात्मक और शारीरिक सम्बन्ध, या फिर पहले भावात्मक और शारीरिक सम्बन्ध स्थापित हो जाने के बाद आवास और जिम्मेदारियाँ और खर्चे बाँटने का निर्णय – किसी भी दिशा से उसमें प्रवेश करने वाली स्त्री को इस विषय में स्पष्ट होना चाहिये कि उसके लिये इसका अर्थ क्या है।
वह क्या इसको विवाह का स्थानापन्न मान कर चल रही है? या इस उम्मीद से इस गली में घुस रही है कि वह अन्ततः उसे विवाह तक पहुँचा देगी? या उसको एक साथ-सहारे-सम्प्रेषण के अलावा अपनी स्वच्छन्दता से इतना प्यार है कि वह स्वयं भी किसी समय इस बन्धन से बाहर निकल आने की स्वच्छन्दता को अपने लिये सुरक्षित रखना चाहती है और अगर किसी समय उसके साथी को भी इसके बाहर निकल जाने की ज़रूरत – एकतरफ़ा भी – महसूस होती है तो इस स्थिति की समझ और स्वीकार की क्षमता रखती है। स्त्री के पक्ष से सहजीवन का औचित्य अथवा सार्थकता मेरी नज़र में तीसरी स्थिति में ही हो संभव है।
एक आत्मनिर्भर स्वच्छन्द जीवन में संयोगवश आ मिलने वाले और स्थानान्तरण या भावनात्मक फासला या किसी अन्य बाधा या कारण से दूर या अलग हो जाने वाले साथ के हिसाब से तय होने वाले सम्बन्ध में बुनियादी तौर पर अस्थायित्त्व की संभावना और स्वीकृति निहित है। ऐसा भी एक सम्बन्ध-विन्यास या जीवन-विन्यास हो सकता है – हालाँकि हमारे देश-समाज में विरल – जो अस्थायी सम्बन्धों द्वारा अपनी अलग अलग किस्म की जरूरतों के अलग अलग समीकरणों से पूरा होता हो। लेकिन उस विन्यास को चुनने वाला शायद व्यक्ति के रूप में भावनात्मक स्तर पर स्वतःपूर्ण, स्वयंपर्याप्त और स्वायत्त होता होगा। जब चाहा, पिट्ठू बाँधा और चल दिये।
चौबीस घण्टे के साथ का मतलब पिकनिक नहीं होता और स्वच्छन्दता – मुझे सोचकर ऐसा लगता है कि – अपनी आखिरी हदों पर दूसरे की उपस्थिति के आभास के दबाव मात्र से खण्डित और बाधित होने लगती है। एक तरह से वह अफाट अकेलेपन का पर्याय है, दोस्त अहबाब की मण्डली की चकल्लस के बावजूद। हर समय की चकल्लस जीवन का पर्याय नहीं होती।
लेकिन फैसला हमेशा स्च्छन्दता की जरूरत से नहीं होता। हमेशा क्या, शायद अक्सर। सहजीवियों की बढ़ती हुई गिनती के साथ अकसर इस किस्म के परिणाम देखने सुनने को मिलने लगे हैँ, जिनमें स्त्री की ओर से कभी विवाह के वादे पर विश्वासस करने के कारण सम्बन्ध में प्रवेश किन्तु विश्वािसघात का या कभी धोखा देकर शारीरिक सम्बन्ध बनाने का या बलात्कार का मुकदमा दायर किया जाता है, वह सहजीवन की अवधारणा को लेकर ही किसी नासमझी या ग़लतफ़हमी का आभास देते हैँ। उन स्थितियों मेँ सहजीवन एक समस्या बन कर सामने आता है।
सहजीवन के पास न कोई कानूनी सुरक्षा है और न मुआवजे इत्यादि का कोई प्रावधान। अगर वह अपनी स्वच्छन्दता की रक्षा के निर्णय से यह सम्बन्ध नहीं बनाती, सम्बन्ध टूटने की दिशा में कभी दुबारा किसी मन लायक साथी के मिलने पर ही फिर से सहजीवन या फिर एक आत्म-निर्भर स्वयं-पर्याप्त जीवन जीने की अनिश्चि त/दुर्लभ/असम्भव तत्परता को अपनी जीवन शैली नहीं मानती तो बेशक सहजीवन उसे शायद मनचाहे व्यक्ति के साथ बीते हुए उस थोड़े से समय की तृप्ति और तुष्टि – अगर मिली हो तो – के अलावा उसे कुछ और नहीं देगा। उतने समय के बाद उम्र का अकसर वह पड़ाव आ पहुँचा होता है जब पहले ही देर हो चुकी होती है और अगर वह उसी एक सम्बन्ध में इतनी तृप्ति ता ऊब पा चुकी हो कि दुबारा शुरू करना ही न चाहे तो बात अलग है अन्यथा हमारे अधिकांशतः शुचितावादी समाज में सहजीवन के अनुभव से निकली हुई स्त्री को दुबारा शुरू करने का मौका अक्सतर नहीं मिलेगा।इसलिये अपनी इच्छा और ज़रूरत को पहचानना और ऐसे किसी सम्बन्ध मेँ खुली आँखों कदम रखना बेहद ज़रूरी है।
स्त्री के अपने स्वभाव के हिसाब से ही तय होगा कि सहजीवन उसके पक्ष में है या विपक्ष में।

साथ होकर भी पुरुष एवं स्त्री की स्वतंत्र परिधि क्या है ? 
आज के समय में उग आई स्थितियों ने ऐसा कर दिया है कि किसी युगल के लिये यह बात आपस में उन दोनो के अलावा कोई तीसरा नहीं परिभाषित कर सकता और उन दोनों में से कोई भी एक अकेला भी नहीं कर सकता। करेगा भी तो उसमें सहमति दूसरे की भी चाहिये। पुराने जमाने के विवाह का नमूना परिवार के सन्दर्भ में स्त्री-पुरुष के कर्तव्य और दायित्त्व के क्षेत्र में अपने अपने वर्चस्व के इलाके बाँट कर चलता है। जहाँ दोनो को घर बाहर दोनो सँभालना होता है वहाँ भी सहयोग के नमूने गढ़े जाते हैं। लेकिन जहाँ ‘स्वतंत्र’ और परिधि में टकराहट हो वहाँ? दाम्पत्त्य की परिधि का ही जहाँ उल्लंघन हो वहाँ?
सुना है कि हमारे समाज के ही किन्हीं इलाकों में ‘ब्लाइण्ड-डेट’, ‘वाइफ़-स्वॉपिंग,’ ‘बेटिंग,’ ‘न्यूड पार्टीज़्, ‘रेव पार्टीज़’ आदि तरह तरह के खेल चला करते हैँ। इन जगहों पर दाम्पत्य में दैहिक एकनिष्ठता की परिधि दोनो की सहमति से भंग होती है और दोनो को स्वीकार भी होती है। स्वतंत्रता के नाम पर यही परिधिभंग विवाहेतर साहसिक अभियानों का भी है, जिसमें अभी तक तो पति ही इकलौता खिलाड़ी हुआ करता था। अब सुना है कि बराबरी का जोड़ होने लगा है। दोनो सहमत हैं तो क्या कीजियेगा। और ज़रूरत भी क्या है कुछ करने की? वह कोई दूसरी दुनिया है। दाम्पत्त्य की परिधि अब परस्पर सहमति है, जहाँ तक भी जाये।
स्वतंत्र परिधि के भीतर एक और ज़रूरत आती है अपनी अपनी स्पेस की। अपनी हॉबीज़, या अपनी अभिव्यक्ति के इलाके, अपना पढ़ना-लिखना या चित्र बनाना या गाना या ऐसा ही कुछ और। और अपने निजी एकान्त स्पेस के मनबहलाव से उसे निकाल कर बाहर अपनी पहचान के तौर पर ले जाना। ऐसी स्थितियों में जहाँ ‘साथ’ भी है और ‘स्वतंत्रता’ भी वहाँ एक दूसरे पर अभिमान किया जाता है। लेकिन बहुत बार, शायद ज्यादातर, ऐसी स्थितियों में प्रतिद्वन्द्विता जागती है। अहंकार आहत होता है। ज़्यादातर पुरुष का जिससे स्त्री की उपलब्धि बर्दाश्ता नहीं होती। इसके बाद, प्रलय!
परिधि के साथ स्वतंत्रता को परिभाषित करना कठिन है। दाम्पत्त्य में दोनो में ही एक लचीलापन रखना ज़रूरी है, ज़रूरी बात है, मंशा में खोट न होना और अपने पक्ष में दूसरे का अनुचित लाभ न लेना। बुनियादी बात एक दूसरे का सम्मान है जिसके कारण ऐसा सम्भव हो सकता है।
नयी पीढ़ी के जिन कुछ युगलों को जानती हूँ उनमेँ आपस का सहयोग, साझेदारी, परस्परता और पूरकता देखकर बेहद खुशी होती है। लगता है कि इस सम्बन्ध जैसा दूसरा कुछ हो नहीं सकता, जैसे एक सपना है, सच होने की दिशा में अपनी यात्रा शुरू कर चुका है। लेकिन उस सम्बन्ध को रचने मेँ बहुत समझदारी, बहुत धैर्य, बहुत समय, बहुत श्रम लगता है, वह बना बनाया नहीं मिलता, वह एक दिन में नहीं बनता, उसमें पुरुष की हिस्सेदारी शत-प्रतिशत दिखती है, उस पुरुष के लिये मन में आभार जागता है।

प्रेमरिक्‍त दैहिक सम्‍बन्‍ध निस्‍संदेह अनैतिक होते हैं : कात्यायनी

कात्यायनी

कात्यायनी चर्चित कवयित्री एवमऐक्टिविस्ट हैं  . संपर्क : katyayani.lko@gmail.com

 ( प्रज्ञा पांडे के अतिथि सम्पादन में हिन्दी की पत्रिका ‘ निकट ‘ ने स्त्री -शुचितावाद और विवाह की व्यवस्था पर एक परिचर्चा आयोजित की है . निकट से साभार हम उस परिचर्चा को क्रमशः प्रस्तुत कर रहे हैं , आज  चर्चित कवयित्री कात्यायनी  के जवाब .  इस परिचर्चा के  अन्य  विचार पढ़ने के लिए क्लिक करें :  ) 

जो वैध व कानूनी है वह पुरुष का है : अरविंद जैन 

वह हमेशा  रहस्यमयी आख्यायित की गयी : प्रज्ञा पांडे 


अमानवीय और क्रूर प्रथायें स्त्री को अशक्त और गुलाम बनाने की कवायद हैं : सुधा अरोडा 

अपराधबोध और हीनभावना से रहित होना ही मेरी समझ में स्त्री की शुचिता है :  राजेन्द्र राव 


परिवार टूटे यह न स्त्री चाहती है न पुरुष : रवि बुले 

 

बकौल सिमोन द बोउवार, ” स्‍त्री पैदा नहीं होती, बनायी जाती है। ” आपकी दृष्टि में स्‍त्री का आदिम स्‍वरूप क्‍या है ?
स्‍त्री और पुरूष के बीच जेण्‍डर का जो भेद है, वह प्राकृतिक है और वह भेद स्‍त्री और पुरूष के बीच के सामाजिक अन्‍तर का, स्त्रियों की सामाजिक पराधीनता एवं उत्‍पीड़न का कारण नहीं है। स्त्रियों की पराधीनता, उत्‍पीड़न, दोयम दर्जे की नागरिकता और पुरूषवर्चस्‍ववाद का मूल कारण सामाजिक-आर्थिक संरचना में निहित है। यह सामाजिक ढांचा ही स्‍त्री मानस को भी अनुकूलित और नियंत्रित करता है। इन अर्थों में सिमोन द बोउवार का कहना सही है। स्‍त्री का सामाजिक अस्तित्‍व,पारिवारिक जीवन और अन्‍तर्जगत समय विशेष के समाज विशेष की निर्मिति होता है। निजी सम्‍पत्ति, वर्ग, राज्‍यसत्‍ता और परिवार के उद्भव से पूर्व आदिम स्‍त्री स्‍वतंत्र थी और वर्ग समाज के विलोपन के बाद फिर वह स्‍वतंत्र होगी।

 क्‍या दैहिक शुचिता की अवधारणा स्‍त्री के खिलाफ कोई साजिश है ?
वास्‍तविक प्रेम एकल ही हो सकता है, यानी एक समय में किन्‍हीं दो व्‍यक्तियों के बीच ही हो सकता है और प्रेमरिक्‍त दैहिक सम्‍बन्‍ध निस्‍संदेह अनैतिक होते हैं। इन अर्थों में दैहिक शुचिता का एक सन्‍दर्भ हो सकता है। लेकिन समाज में दैहिक शुचिता की पाबन्दियॉं सिर्फ स्‍त्री के लिए होती है, पुरूष वस्‍तुत: उससे मुक्‍त होता है। इसी दृष्टि से पहले किसी से प्रेम या विवाह करके अलग हो चुकी स्‍त्री या विधवा स्‍त्री भी हेय दृष्टि से देखी जाती है। बेशक हमारे समाज में व्‍याप्‍त दैहिक शुचिता की धारणा एक पुरुषस्‍वामित्‍ववादी धारणा है जो घोर स्‍त्री विरोधी है।

समाज के  सन्‍दर्भ में शुचितावाद और वर्जनाओं को किस तरह परिभाषित किया जाये ?
हर समाज नैतिक मूल्‍यों और वर्जनाओं की परिभाषाऍं वर्चस्‍वशाली वर्गों और समुदायों के हितों को ध्‍यान में रखकर गढ़ता है। सामंती समाज की अपेक्षा खुला और लोकतांत्रिक होने के बावजूद मौजूदा पूँजीवादी समाज भी एक पुरुष प्रधान समाज है। यह स्‍त्री के पारिवारिक और धार्मिक गुलामी के बंधनों को एक सीमित हद तक ही ढीला करता है, लेकिन पुरुष स्‍वामित्‍व को एक हजार एक रूपों में बरकरार रखता है। यह स्‍त्री श्रम शक्ति को ही नहीं बल्कि देह को भी एक ‘कमोडिटी’ में तब्‍दील कर देता है, लेकिन साथ ही पुरुष स्‍वामित्‍व आधारित परिवार के ढॉंचे और सम्‍पत्ति की विरासत की वंशानुगतता को बचाने के लिए स्त्रियों पर तमाम वर्जनाऍं और यौन शुचिता के तमाम बंधन आरोपित करता है। यानी स्त्रियॉं ”आजाद” तो हों, लेकिन अपने लिए नहीं पुरुषों का आखेट बनने के लिए। दूसरी ओर, पुरुष यौन शुचिता विषयक सभी वर्जनाओं से मुक्‍त होता है।
निस्‍सन्‍देह हर समाज के अपने नैतिक मूल्‍य होते हैं। एक शोषण-उत्‍पीड़न मुक्‍त समाज के नैतिक मूल्‍यों को शुचितावाद और वर्जनाओं की भाषा में नहीं देखा जा सकता। जाहिरा तौर पर जोर-जबर्दस्‍ती, धोखा, बेवफाई और शरीर की खरीद-फरोख्‍त एक आदर्श समाज में अनैतिक और वर्जित होगा। एक समय में एक व्‍यक्ति एक व्‍यक्ति से ही प्‍यार कर सकता है। यानी प्‍यार एकल ही हो सकता है। प्‍यार विहीन दैहिक सम्‍बन्‍ध भी अनैतिक ही होगा। ” मुक्‍त प्रेम ” और ” मुक्‍त यौन सम्‍बन्‍ध ”की अवधारणाऍं विकृत बुर्जुआ मानस की प्रतिक्रियात्‍मक अभिव्‍यक्तियॉं हैं। एक उन्‍नत और समतामूलक समाज स्‍त्री और पुरुष को सम्‍बन्‍ध बनाने और उन्‍हें तोड़ने की बराबर स्‍वतंत्रता देगा और उसमें समाज या राज्‍यतंत्र की कोई भी दखलंदाजी नहीं होगी।

विवाह  की व्‍यवस्‍था में स्‍त्री की मनोवैज्ञानिक, सामाजिक एवं आर्थिक स्थितियॉं कितनी स्‍त्री के पक्ष में है?
उत्‍तर: सामंती समाज की अपेक्षा पूँजीवादी समाज में विवाह की संस्‍था के अन्‍तर्गत, स्त्रियों को बेशक संवैधानिक और वैधिक तौर पर कुछ अधिकार मिले हैं, लेकिन सामाजिक संस्‍थाऍं और मूल्‍य-मान्‍यताऍं काफी हद तक इन अधिकारों को बेमानी बना देती है। भारत जैसे पिछड़े पूँजीवादी समाजों पर यह बात विशेष तौर पर लागू होती है। उन्‍नत से उन्‍नत पूँजीवादी समाजों में भी विवाहोपरान्‍त पारिवारिक जीवन में अहम मामलों में निर्णय की शक्ति पुरुष के हाथों में केन्द्रित होती है और स्‍त्री की घरेलू दासता अनेकश: सूक्ष्‍म रूपों में बरकरार रहती है। विवाह की संस्‍था किसी भी रूप में अपने मौजूदा स्‍वरूप में स्‍त्री के पक्ष में नहीं है। पुरुष यदि वास्‍तव में प्रगतिशील दृष्टि रखता है (वैसे ज्‍यादातर कथित प्रगतिशील अपने निजी जीवन में पुरुषवर्चस्‍ववादी ही होते हैं), तो पत्‍नी के साथ सम्‍मान और समानता का व्‍यवहार करता है। लेकिन यह तो एक विशेष स्थिति की बात है, इसमें विवाह संस्‍था की कोई सकारात्‍मकता नहीं देखी जा सकती। विवाह अपने प्रातिनिधिक रूप में ”संस्‍थाबद्ध वेश्‍यावृत्ति ” के अतिरिक्‍त और कुछ भी नहीं है।

मातृसत्‍तात्‍मक व्‍यवस्‍था में विवाह संस्‍था क्‍या अधिक सुदृढ़ और समर्थ होती? तब समाज भ्रूण हत्‍या, दहेज हत्‍या और बलात्‍कार जैसे अपराधों से कितना मुक्‍त होता ?
यह एक परिकल्‍पनात्‍मक प्रश्‍न है। मातृसत्‍तात्‍मक व्‍यवस्‍था उत्‍पादन और वितरण की आदिम सामाजिक अवस्‍थाओं की देन थी। हम इतिहास में पीछे की ओर वापस नहीं लौट सकते। इतिहास-विकास में पीछे छूट गये जिन जनजातीय समाजों में मातृसत्‍तात्‍मकता बची हुई थी, पूँजी की सर्वग्रासी, सर्वभेदी शक्ति के प्रभाव में वे भी नष्‍ट हो गयीं या हो रही हैं। आने वाले युगों में मातृसत्‍तात्‍मक व्‍यवस्‍था वापस नहीं आयेगी, बल्कि स्‍त्री-पुरुष समानता पर आधारित नयी सामाजिक संस्‍थाऍं अस्तित्‍व में आयेगी।

 सहजीवन की अवधारणा क्‍या स्‍त्री के पक्ष में दिखायी देती है?
उत्तर सापेक्षिक  रूप से सहजीवन की अवधारणा विवाह से बेहतर है, क्‍योंकि इसमें सम्‍बन्‍ध जोड़ने और तोड़ने के मामले में स्‍त्री भी स्‍वतंत्र होती है, और दूसरे, यह विवाह से जुड़ी धर्मशास्‍त्रीय रूढि़यों-मान्‍यताओं के विराध में खड़ा होता है। लेकिन बुनियादी बात सामाजिक-आर्थिक ढॉंचे की है। जबतक सामाजिक-आर्थिक तौर पर स्‍त्री उत्‍पीडि़त होगी और दोयम दर्जे की नागरिक होगी, तबतक विवाह हो या सहजीवन, स्‍त्री-पुरुष अंतरंग सम्‍बन्‍धों में भी स्‍त्री का दर्जा दोयम ही रहेगा, निर्णय की स्‍वतंत्रता के मामले में वह पुरुष के बराबर नहीं हो पायेगी।

 साथ होकर भी स्‍त्री और पुरुष की स्‍वतंत्र परिधि क्‍या है ?
उत्‍तर: पहली बात, दोनों रिश्‍ता बनाने के लिए जितने स्‍वतंत्र हों, तोड़ने के लिए भी उतने ही स्‍वतंत्र हों। स्‍त्री का आर्थिक रूप से स्‍वतंत्र और स्‍वावलंबी होना अपरिहार्य है। पुरुष की तरह स्‍त्री की भी अपनी ‘सोशल सर्किल’ हो, वह अपने शौक, पेशा, सामाजिक गतिविधियों के बारे में स्‍वतंत्र निर्णय ले सकती हो। परस्‍पर सम्‍बन्‍धों में संदेह की स्थिति न हो और ऐसा होते ही अलग हो जाने की पूरी आजादी हो। घरेलू कामकाज और बच्‍चों की देखभाल में पुरुष बराबर का भागीदार हो और सभी बाहरी कामों में स्‍त्री भी बराबरी से हाथ बँटाती हो। घर-गृहस्‍थी के सभी निर्णयों में दोनों बराबरी के हिस्‍सेदार हों। मौजूदा सामाजिक ढॉंचे में हर परिवार को तो इन मानकों पर ढाल पाना सम्‍भव ही नहीं है। हॉं, वैज्ञानिक प्रगतिशील दृष्टि वाले लोग यदि इन्‍हें अपने जीवन पर लागू करें तो जीवन बेशक कुछ सुन्‍दर हो जायेगा और स्त्रियों की इस हद तक की मुक्ति भी सामाजिक मुक्ति के महासमर में आधी आबादी की भागीदारी को बढ़ाकर उसकी सफलता की एक बुनियादी गारण्‍टी हासिल करने की दिशा में एक महत्‍वपूर्ण उत्‍प्रेरण का काम करेगी।

परिवार टूटे, यह न स्त्री चाहती है और न पुरुष

रवि बुले

हाल के दिनों में प्रकाशित ‘ दलाल की बीबी’ उपन्यास के रचनाकार रवि बुले पेशे से पत्रकार हैं. संपर्क : 09594972277 

( प्रज्ञा पांडे के अतिथि सम्पादन में हिन्दी की पत्रिका ‘ निकट ‘ ने स्त्री -शुचितावाद और विवाह की व्यवस्था पर एक परिचर्चा आयोजित की है . निकट से साभार हम उस परिचर्चा को क्रमशः प्रस्तुत कर रहे हैं , आज  साहित्यकार एवं मीडियाकर्मी रवि बुले के जवाब  इस परिचर्चा के  अन्य  विचार पढ़ने के लिए क्लिक करें :  ) 

जो वैध व कानूनी है वह पुरुष का है : अरविंद जैन 

वह हमेशा  रहस्यमयी आख्यायित की गयी : प्रज्ञा पांडे 


अमानवीय और क्रूर प्रथायें स्त्री को अशक्त और गुलाम बनाने की कवायद हैं : सुधा अरोडा 


अपराधबोध और हीनभावना से रहित होना ही मेरी समझ में स्त्री की शुचिता है :  राजेन्द्र राव 


बकौल सिमोन द बोउआर स्त्री  पैदा नहीं होती, बनाई जाती है। आपकी दृष्टि में स्त्राी का आदिम स्वरूप क्या है?
मनुष्यता के जैविक-ऐतिहासिक कालक्रम में पुरुष और स्त्राी दोनों ने विकास किया है। परंतु माना यही जाता है कि चूँकि स्त्री  के पास प्रजनन की प्राकृतिक और समूह/समाज द्वारा दी गई पारिवारिक जिम्मेदारियाँ थीं, इसलिए वह पुरुषों के मुकाबले भौतिक विकास की दौड़ में पिछड़ गई। उसका विकास पुरुष के मुकाबले कम हुआ/आँका गया। हम परिवारों के विकास पर अमूमन चर्चा नहीं करते। परिवारों के बनने और उनके बहाने सामाजिक/राष्ट्रीय विकास में  स्त्री की भूमिका पर बात नहीं होती। विकास की अवधरणा चूँकि सामाजिकता, राष्ट्रीयता और अंतरराष्ट्रीयता से जुड़ी है अतः यह सहज पुरुषों के विकास के जोड़ दी गई
स्त्री  घर में थी, अतः उस पर ध्यान नहीं गया। बाहर पुरुष का आधिपत्य  था, तो मान लिया गया कि घर और  स्त्री पर भी उसका ही अधिकार  है।  स्त्री  का सब कुछ पुरुष का है,  स्त्री पुरुष की है। इस तरह  स्त्री के उस चरित्र की नींव रख दी गई, जिसकी पुरुष और उसके बाहुबल से चलने वाला समाज अपेक्षा करता है। ऐसे में सिमोन का यह कथन सही साबित हुआ कि  स्त्री  पैदा नहीं होती, बनाई जाती है। बाहर ही नहीं, घर के लिए बने नियम कायदे उसके आचार-विचार को तराशते रहे हैं। प्राकृतिक रूप से  स्त्री  शारीरिक रूप से पुरुष से थोड़ी भिन्न है। मगर यह भिन्नता इतनी बड़ी बना दी गई कि कालक्रम में शरीर ही  स्त्री  की मुख्य पहचान बन गया। यह आज भी है। अतः पुरुष से इतर  स्त्री  केंद्रित हर किस्म के बाजार विकसित हुए। जिसने  स्त्री  को  स्त्री  बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाई। अब भी यह जारी है।

क्या दैहिक शुचिता की अवधरणा  स्त्री के खिलापफ कोई साजिश है?
यह समाज के विकासक्रम में  स्त्री -पुरुषों, वर्ण-धर्मों  और जाति-वर्गों के लिए तय की गई तमाम अवधरणाओं में से एक है। मनुष्य समाज ने ऐसी कई साजिशें आपस में एक-दूसरे के लिए रची हैं। स्त्री की दैहिक शुचिता का संबंध् यौन प्रकरणों से है। प्रकृति का सारा कारोबार ही इसी यौनिकता से चल रहा है। पेड़-पौधे से लेकर पशु-पक्षी तक अपनी संतति के लिए निरंतर गतिवान हैं। इसमें एक साथी के साथ संबंधें की मजबूरी या बाध्यता कहीं नहीं है। मानव समाज ने देश-काल के अनुसार इस बारे में नियम बनाए, जो बदलते भी रहे। चूंकि  स्त्री  को पुरुष के मुकाबले कमजोर माना गया, ऐसे में पुरुष की इच्छा और बल को ही प्राथमिकता मिलती रही। दैहिक/यौनिक शुचिता  स्त्री  को घर में कैद रखने का एक खास बहाना रही, जिसने सदियों तक उसके विकास में सबसे बड़ी बाध का काम किया।  स्त्री  अपने पिता, भाई और पति की संपत्ति बनी रही। उसकी दैहिक शुचिता परिवार के पुरुष के मान-सम्मान का प्रतीक रही। विवाह में सदियों तक यह शुचिता सबसे ऊपर रही। हालांकि यह अब भी सबसे ऊपर मानी जाती है, परंतु आंशिक ही सही यह मान्यता नई पीढ़ी में खंडित हो रही है। इसी बीच सदियों तक स्वयं  स्त्री  को अपनी पवित्राता के प्रति सजग और जिम्मेदार बनाया जाता रहा है। माहवारी के दिनों में उसे घर की  स्त्री  ही एहसास दिलाती रही हैं कि वह अपवित्र है। ऐसा धर्म ग्रंथों  में भी लिखा है। हालाँकि अब ऐसी देह-शुचिता के मसले पर समाज में धीरे -धीरे  परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं।

समाज के संदर्भ में शुचितावाद और वर्जनाओं को किस तरह परिभाषित किया जाए ?
शुचितावाद और वर्जनाएँ  स्त्री  के प्रति परिवार और समाज के व्यवहार को तय करती हैं। इसमें  स्त्री  के प्रति  स्त्री  का और  स्त्री  के प्रति पुरुष का व्यवहार शामिल है। वक्त के साथ इनमें सेंध् लग चुकी है। खास तौर पर टेलीविजन के विस्तार ने इसमें परिवर्तन लाना शुरू किया है। उसने लोगों को जागरूक बनाया है। अब गाँवों में भी यह संदेश पहुँचने लगा है कि बेटी किसी बेटे से कम नहीं है। ऐसे में शुचिता की अवधरणाएँ और वर्जनाओं में ढील आने लगी है। हालाँकि इनसे पूरी तरह मुक्त होने में वक्त लग सकता है।

यदि स्वयं के लिए वर्जनाओं का निर्धरण स्वयं स्त्री  करे तो क्या हो ?
स्त्री  क्यों अपने लिए वर्जनाएँ स्वीकार करे और किसके लिए करे? इन वर्जनाओं की शुरुआत संभवतः इस बात को लेकर है कि उसके पास प्रजनन की जिम्मेदारी है। यह प्राकृतिक तथ्य है कि नर अपनी संतति को आगे बढ़ाता रहना चाहता है। इसके लिए वह ज्यादा से ज्यादा मौके और गर्भ तलाशता है। सदियों तक  स्त्री  के गर्भ पर भी पुरुष का अधिकार  रहा है। लेकिन अब आधी  सदी से ज्यादा हो चुका है जब गर्भनिरोधकों के आविष्कार के साथ  स्त्री  अनिच्छा से गर्भाधरण की लड़ाई जीत चुकी है। वैसे उल्लेखनीय तथ्य यह है कि तमाम सर्वे बताते हैं, अधिकांश पुरुष अपने इस्तेमाल के लिए बने गर्भनिरोधक  (कंडोम ) का इस्तेमाल करने से कतराते हैं। अतः आज भी गर्भनिरोधक  के प्रयोग कि जिम्मेदारी ज्यादातर  स्त्री  को ही उठानी पड़ती है। वैसे विज्ञान की तरक्की के नजरिये से देखें तो आने वाले कुछ दशकों में स्त्री  अपने गर्भ से भी आजाद हो सकती है। फिलहाल इतना तो हो ही चुका है कि वैज्ञानिक एक तय समय सीमा तक गर्भ के अंडाणुओं को फ्रीज  करके रख लें, जिन्हें पुनः  स्त्री  के गर्भ में स्थापित किया जा सकता है। आज यह खास तौर पर बेहद प्रतिभाशाली और बड़ी कंपनियों में बड़े ओहदों पर काम करने वाली  स्त्री के लिए बेहद मुफीद है। वे किसी भी उम्र में अपने बच्चे की माँ बन सकती हैं। सरोगेट मदर एक और राह है। हालाँकि ये नई बहसों के मुद्दे हैं कि इनसे  स्त्री का जीवन कितना आसान होगा और कितना जटिल। वैसे विज्ञान इस बात की भी संभावना टटोलने में लगा है कि भविष्य में प्रजनन के लिए  स्त्री  को पुरुष की आवश्यकता ही न रहे। आश्चर्य नहीं होगा अगर अगले कुछ दशकों में सचमुच यह हुआ। इसके बाद का समाज फिलहाल सिर्फ कल्पनाओं में हो सकता है।

विवाह की व्यवस्था में स्त्री  की मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और आर्थिक स्थितियाँ कितनी  स्त्री  के पक्ष में है ?
इस वक्त यह व्यवस्था बहुत ज्यादा  स्त्री  के पक्ष में नहीं है। यही कारण है कि जहाँ-जहाँ  स्त्री  अपने लिए निर्णायक संघर्ष करती है, वहाँ अधिकतर  मामलों में विवाह टूट जाते हैं। इस वक्त समाज में कम से कम यह तो हुआ है कि विवाह टूटना अजूबा नहीं माना जाता और इसमें सिर्फ  स्त्री को कठघरे में नहीं खड़ा किया जाता। मनोवैज्ञानिक रूप से परिवार की जिम्मेदारियाँ आज भी पूरी तरह से  स्त्री  पर हैं। टीवी पर आने वाले विज्ञापन में हम देखते हैं कि दफ्तर  में जो  स्त्री  पति की बाॅस है वही घर में आकर खाना पकाती है। किचन परिवार के केंद्र में है और यह  स्त्री  की ही चिंता है। मनोवैज्ञानिक-सामाजिक रूप से भी विवाह  स्त्री  के लिए संसार में उसका अपना ‘घर’ होने की विधि है । करिअर  में सफल होने के बाद भी उसकी अंतिम परिणती अपना परिवार, अपना घर, अपने बच्चे ही है। आर्थिक मोर्चे पर  स्त्री  जरूर पहले के मुकाबले कुछ राहत की स्थिति में है। परंतु जहाँ परिवार की जिम्मेदारी कमोबेश उसके कंधें पर है, वहाँ आर्थिक राहत ही उसके लिए बोझ बन जाती है। आर्थित जरूरतों को पूरी करने का ध्न के अलावा और कोई विकल्प किसी के पास नहीं है।

मातृसत्तात्मक व्यवस्था में विवाह संस्था क्या अधिक  सुदृढ़ और समर्थ होती। तब समाज भ्रूण हत्या, दहेज, हत्या एवं बलात्कार जैसे अपराधें से कितना मुक्त होता?
पारंपरिक अवधरणा के रूप में विवाह की संस्था आज भी सुदृढ़ और समर्थ है। परिवार टूटे, यह न  स्त्री  चाहती है और न पुरुष। बात सिर्फ इस संस्था में स्त्री  के साथ समानधर्म  व्यवहार की है। समय के साथ हो रहे सामाजिक बदलावों को स्वीकारने और उन्हें अनुकूल ढंग से जीवन में स्थान देने की है। मातृसत्तात्मक व्यवस्था में निःसंदेह अपराध आज के मुकाबले काफी कम होते।

सह जीवन की अवधरणा क्या  स्त्री  के पक्ष में दिखाई देती है?
दिखती तो है, मगर सह-जीवन अगर वैवाहिक जीवन के जैसा है तो  स्त्री पुरुष के लिए वह विशिष्ट कैसे हो सकता है। वही उम्मीदें, वही अपेक्षाएँ, वही चक्र। सिर्फ एक सुविधा  कि जिस पल किसी को और साथी पसंद आ जाएगा या आगे साथ जीवनयापन की इच्छा नहीं होगी तो सह-जीवन से जाने की स्वतंत्राता है! फिर सवाल कि यह स्वतंत्रता रास न आई तब? मनुष्य सिर्फ समाज में ही जीवन नहीं जीता, वह अपने मन-मस्तिष्क में भी जीता है।

साथ होकर भी पुरुष एवं स्त्री  की स्वतंत्रापरिधि  है?
साथ होकर दोनों ही स्वतंत्र नहीं हो सकते। ज्यादा से ज्यादा यह कर सकते हैं कि एक-दूसरे को अधिक  समझें। एक-दूसरे के पूरक बनें।

नरेन्द्र मोदी से नहीं मिलना चाहती है कलावती

संजीव चन्दन

कलावती बांदुरकर अब भूमिहीन मजदूर नहीं रही, उसके पास भी अब ठेके पर ली गई छः  एकड़ खेती है . अपने खेत में काम करती हुई अब वह मजदूरों की कमी की समस्या से जूझ रही है. वह भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से नहीं मिलना चाहती है . वह स्पष्ट करती है कि ‘ पहले नरेन्द्र मोदी खेती –किसानी के लिए कुछ ठोस करें तो मैं उनसे मिलना पसंद करूंगी. उन्होंने बड़े –बड़े वायदे किये हैं , उन्हें पूरा करें.’ कलावती राहुल गांधी की चुनाव में पराजय को उनकी अलोकप्रियता से अलग करके देखती है . वह मोदी से मिलने की किसी इच्छा से इनकार करते हुए राहुल गांधी की प्रशंसा करती है कि ‘उन्होंने गरीबों के लिए बहुत किया है. उनकी सरकार ने किसानों की कर्जमाफी से कई औरतों को विधवा होने से बचाया है .’ राहुल और कांग्रेस की हार पर अफ़सोस जाहिर करते हुए कहती है, ‘ पहले बी पी एल कार्ड पर २० किलो राशन मिलता था , अब मोदी के राज में 12- 13 किलो मिलता है.’

कलावती

नरेन्द्र मोदी ने उडाया था कलावती का मजाक 
2013 में नरेन्द्र मोदी ने फिक्की के एक आयोजन में कलावती का मजाक उड़ाते हुए कहा था कि “गुजरात में जस्सू बेन जैसी आदिवासी स्त्री है , जिसका लिज्जत पापड़ आज ब्रान्ड है, वह कलावती की तरह नहीं है .’ ठेके पर ली गई  अपने कपास की खेत में काम करती हुई कलावती नरेन्द्र मोदी की तरह उनका मजाक तो नहीं बनाती है लेकिन किसानों के लिए किये गए अपने वायदे पूरे करने के लिए उन्हें ललकारती है , ‘  राहुल गांधी और उनकी सरकार ने गरीबों के लिए काफी काम किये हैं, योजनायें चलाई हैं , मोदी भी किसानों के लिए कुछ ठोस करें .’ यह पूछे जाने पर कि वे फिर भी हार गए , वह विश्वास के साथ कहती है कि वे दुबारा आयेंगे . ‘मैं यह नहीं कह सकती कि कब, लेकिन वे प्रधानमंत्री जरूर बनेंगे और तब मैं अपने बच्चों की नौकरी के लिए उनसे मिलाने जाउंगी , उन्होंने वायदा किया था .’

झोपडी की जगह पक्के ईटों का घर

कौन है कलावती बांदुरकर 
किसान आत्महत्या ग्रस्त विदर्भ के यवतमाल जिले के जालका गाँव की किसान –विधवा और 8 बच्चों की माँ ( 2 साल पहले ही मर गए थे , यानी 10 बच्चों की माँ) कलावाती उस समय सुर्खियों में आई जब 2008 में कांग्रेस नेता राहुल गांधी उसके घर पहुंचे और बाद में संसद में किसान आत्मह्त्या ग्रस्त इलाके में गरीब किसान विधावाओं के लिए प्रतीक  के तौर पर  कलावती का उल्लेख किया . इस उल्लेख ने उसे ‘पोस्टर वुमन’ बना दिया . इसके बाद सुलभ इंटरनेशनल ने उसे 36 लाख रुपये देने की घोषणा की और पहली किश्त के तौर पर ६ लाख रुपये का भुगतान भी किया , बाद में 30 लाख रुपये उसके नाम से बैंक में जमा करवा दिए . उसे दूसरी सरकारी सहायता भी महाराष्ट्र सरकार की तरफ से उपलब्ध कराई गई  .

पिछले छः सालों में कलावती 
सुर्ख़ियों में आने के बाद और सरकारी- गैरसरकारी सुविधाएं मिलने के बाद भी कलावती का दास्तान अंतहीन  दुःख और उससे उबरने के संघर्ष का दास्तान है . एक ओर तो सुलभ इंटरनेशनल के द्वारा बैंक में जमा किये गए रुपयों के ब्याज से उसके घर का मासिक खर्च पहले की तुलना में ज्यादा आसान हो गया तो दूसरी ओर उसके दामाद के बाद एक –एक कर दो बेटियाँ  मरती चली गई. विधवा बेटी के बच्चे और अपने बच्चे उसकी परवरिश के जिम्मे हैं . वह कहती है , ‘ अभी एक बेटी की शादी में तीन लाख रुपये खर्च हुए , जिसमें से डेढ़ लाख रुपये लड़के वालों ने लिए . और अब लड़का मेरी बेटी को मारने –पीटने लगा तो वह मेरे घर वापस आ गई है .’  इस बीच उसका घर झोपडी से ईटों के छोटे से घर में तब्दील हो गया , ठेके पर 6 एकड खेती भी ले ली . नियमित आमदनी के ये स्रोत यद्यपि उसके बच्चों की परवरिश को सुविधाजनक , बनाते हैं लेकिन क्रमशः  10 वीं और 12 वीं पढ़ रहे अपने बेटों के खर्चों को चलाने में खुद को असमर्थ बताते हुए वह कांग्रेस के नताओं की वादाखिलाफी को कोसने लगती है , ‘ कांग्रेस के अध्यक्ष माणिक राव ठाकरे ने कहा था कि वे बच्चों को गोद ले लेंगे , यानी दो बच्चों की पढ़ाई का खर्चा देंगे . कांग्रेस के नेताओं के कहने से मेरे घर पर बिजली का मीटर लग गया और ठाकरे ने कहा था कि 20 साल तक बिजली का कोई  बिल नहीं आएगा , लेकिन बिजली का बिल भी मैं दे रही हूँ और बच्चों की पढाई भी जैसे –तैसे करवा रही हूँ .’ संपर्क करने पर माणिकराव ठाकरे इस सन्दर्भ में कुछ भी नहीं कह सके .

राजनीति की डगर और कलावती की राह 
2009 में कलावती के चुनाव लड़ने की घोषणा ने कांग्रेस के खेमे में हडकंप पैदा कर दिया था . कलावती कहती हैं , ‘ वह सब एक धोखा था , मुझे विदर्भ जनांदोलन समिति के नेता किशोर तिवारी के घर पर किसानों और किसान विधवाओं की हालात पर सवाल किये गए थे , जिसपर मैंने कहा था कि उनकी स्थिति बुरी है, किसी एक कलावती की मदद से सारी किसान –महिलाओं की समस्या का समाधान नहीं हो जाता . इसके बाद मुझसे चुनाव संबधी बात धोखे से कहवा ली गई थी .’ तिवारी कहते हैं कि उसके साथ किये गए वायदे जब पूरे नहीं हो रहे थे तो उसे न्याय दिलाने के लिए चुनाव में खड़े होने की घोषणा की गई थी . कलावती के अनुसार वह उन दिनों काफी परेशान रही . 2011 में कलावती को भाजपा के लोगों ने भाजपा नेता लालकृष्ण आडवानी के मंच पर लाने की कोशिश की. उसी समय 24 साल की अपनी बेटी की मौत से दुखी कलावती इससे बचने के लिए घर से गायब हो गई थी .

तालेगाँव में एक किसान विधवा के घर सोनिया गांधी , 2008 में

बड़े नेताओं के आने से नहीं सुधरते हाल  :
किसान नेता विजय जावंधिया कहते हैं ,‘ किसी एक को ब्रांड बनाने से ज्यादा जरूरी है समस्या का सही समाधान’ . पिछले दिनों कलावती के गाँव में ही एक और किसान ने आत्मह्त्या कर ली, जिसकी पत्नी अपने चार बच्चों के साथ  जीवन –संघर्ष कर रही है . वायफड़ में , जहां मनमोहन सिंह ने 2006में किसानों के लिए पॅकेज और कर्जमाफ़ी की घोषणा की थी , वहाँ मनमोहन सिंह के आने के पहले तक कोइ आत्महत्या नहीं हुई थी , जबकि उसके बाद दो आत्महत्याएं हो गईं. वर्धा के तालेगाँव में किसान विधवा रंजना देशमुख से मिलकर सोनिया गांधी ने 18 जुलाई , 2008 को उसे 1 लाख का चेक दिया था . उसके पति की मौत का मुख्य कारण था उसके चार एकड़ जमीन का गाँव के जल निकास में डूब जाना , वह समस्या सोनिया गांधी के जाने बाद काफी सालों तक बनी रही.

अपराधबोध और हीनभावना से रहित होना ही मेरी समझ में स्त्री की शुचिता है

राजेन्द्र राव 


( प्रज्ञा पांडे के अतिथि सम्पादन में हिन्दी की पत्रिका ‘ निकट ‘ ने स्त्री -शुचितावाद और विवाह की व्यवस्था पर एक परिचर्चा आयोजित की है . निकट से साभार हम उस परिचर्चा को क्रमशः प्रस्तुत कर रहे हैं , आज वरिष्ठ साहित्यकार एवं पुनर्नवा के संपादक राजेन्द्र राव  के जवाब .  इस परिचर्चा के  अन्य  विचार पढ़ने के लिए क्लिक करें :  ) 



जो वैध व कानूनी है वह पुरुष का है : अरविंद जैन 

वह हमेशा  रहस्यमयी आख्यायित की गयी : प्रज्ञा पांडे 



अमानवीय और क्रूर प्रथायें स्त्री को अशक्त और गुलाम बनाने की कवायद हैं : सुधा अरोडा 
बकौल सिमोन द बोउआर “स्त्री पैदा नहीं होती बनायी जाती है ” आपकी दृष्टि में स्त्री का आदिम स्वरुप क्या  है।

सभी स्त्रियां किसी सांचे में ढ़ाल कर बनाई जाती हों ऎसा नहीं है।हां पितृसत्तात्मक समाज में कुछ रूढ़ियां हैं जो सामाजिक दबाव में चली आ रही हैं।धीरे धीरे बदलाव भी आ रहा है,बहुत सी स्त्रियां अपने दम खम पर इस कैद से बाहर आ रही हैं।आदिम स्वरूप तो यहां अप्रासंगिक है मगर मुखर होती मुक्तिकामिता जरूर दिशासूचक कही जा सकती है।

क्या दैहिक शुचिता की अवधारणा  स्त्री के खिलाफ कोई साजिश है ?

शुचिता चाहे दैहिक हो या आत्मिक मानव के लिए काम्य है।अपराधबोध और हीनभावना से रहित होना ही मेरी समझ में स्त्री की शुचिता है।

समाज  के सन्दर्भ में   शुचितवाद और  वर्जनाओं को किस  तरह परिभाषित किया जाए ? 

प्रत्येक समाज के अपने कुछ नियम होते हैं,आचरण संहिताएं होती हैंं।ये संहिताएं समय समय पर परिवर्तित होती रहती हैं।गौर से देखें तो हर वर्जना के पीछे कुछ इतिहास होता है,कुछ घटनाएं होती हैं।मैं नहीं समझता कि कोई सामाजिक निषेध किसी को शोषित या उत्पीड़ित करने के उद्देश्य से लागू किया जाता होगा,हां प्रकारांतर में भले ही वह अन्याय और अनीतिपूर्ण सिद्ध हो जाए।यह मानना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण हो सकता है कि स्त्रियों को पूरी तरह सभी प्रकार की वर्जनाओं और निषेधों से मुक्त कर दिया जाए तो वे अधिक तेजस्वी और प्रगतिशील होकर उभरेंगी।किसी भी किस्म का अनाचार,भ्रष्टाचार,छल,प्रपंच और अपराधिक कार्य वर्जित और दंडनीय होना चाहिये।स्त्री होने के लिए कोई छूट इसमें मिले तो यह न्याय के सिद्धांत के विपरीत होगा।एक सास यदि बहू का गर्भपात(भ्रूणहत्या) या उस पर मिट्टी का तेल डाल कर फूंक देती है तो इस संदर्भ में सामाजिक वर्जना और स्त्री के इस कदाचरण(अशुचिता) के लिए उसे छूट कैसे दी जा सकती है ?

यदि स्वयं के लिए वर्जनाओं का  निर्धारण  स्वयं स्त्री करे तो क्या हो ? 

यह तो उसी तरह की बात हो गई कि बजाए चिकित्सक के रोगी अपना उपचार स्वयं करे।छात्राएं अपनी कापी स्वयं जांचें,स्त्रियों के लिए अलग कानून और दंड संहिता हो जिसे वे स्वयं बनाएं।

विवाह की व्यवस्था में स्त्री  की मनोवैज्ञानिक ,सामाजिक एवं आर्थिक  स्थितियां  कितनी  स्त्री  के पक्ष में  हैं ? 

यह इस बात पर निर्भर करेगा कि विवाह किस श्रेणी का है और पति पत्नी संबंधों का स्तर कैसा है।जहां तक औसत मध्यवर्गीय विवाहों का संदर्भ है सामान्य स्थिति में स्त्री को विवाह उपरांत सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा प्राप्त होती है।रही बात मनोविज्ञान की तो यह व्यक्ति विशेष की मनोदशा पर निर्भर करता है।मोटे तौर पर यह माना जाता है कि एक सफल विवाह स्त्री-पुरुष दोनों को जीवन की सार्थकता प्रदान करता है।कुछ अपवादों को छोड़ कर।साहित्य में चूंकि इस समय स्त्री विमर्श का क्रांतिकारी दौर चल रहा है इसलिए सुखी वैवाहिक जीवन जी रही लेखिकाएं भी विवाह की निरर्थकता को रेखांकित करने के लिए भारी दबाव में हैं।यह उनके साहित्यिक कैरियर का सवाल बन जाता है।इसमें हर्ज भी क्या है?दोनों हाथों में लड्डू हैं।

सहजीवन तो पारंपरिक विवाह में भी होता है।यहां लिविंग इन रिलेशन की बात हो रही है जो एक खूबसूरत परिकल्पना के समान है।रूप-रस-गंध उड़ जाने पर भंवरा किसी और फूल पर जाकर बैठ जाएगा।आखिर वृद्धावस्था में कहां जाएगी स्त्री ?और भी बहुत से प्रश्न हैं जो पूछे तो जाएंगे ही।

साथ होकर भी पुरुष एवं  स्त्री की स्वतंत्र परिधि क्या है ? 
यह अलग अलग लोगों पर अलग अलग तरह से निर्भर करता है।एक मूलभूत स्वायत्तता प्रत्येक मनुष्य को प्रकृति से प्राप्त रहती है,उसे परिधि में बांधना संभव नहीं है।

अमानवीय और क्रूर प्रथायें स्त्री को अशक्त और गुलाम बनाने की कवायद हैं

सुधा अरोड़ा

सुधा अरोड़ा सुप्रसिद्ध कथाकार और विचारक हैं. सम्पर्क : 1702 , सॉलिटेअर , डेल्फी के सामने , हीरानंदानी गार्डेन्स , पवई , मुंबई – 400 076
फोन – 022 4005 7872 / 097574 94505 / 090043 87272.

( प्रज्ञा पांडेय के अतिथि सम्पादन में हिन्दी की पत्रिका ‘ निकट ‘ ने स्त्री -शुचितावाद और विवाह की व्यवस्था पर एक परिचर्चा आयोजित की है . निकट से साभार हम उस परिचर्चा को क्रमशः प्रस्तुत कर रहे हैं , आज सुधा अरोड़ा के जवाब  .  अरविंद जैन का जवाब और प्रज्ञा पांडे का सम्पादकीय पढ़ने के लिए क्लिक करें  ) 
जो वैध व कानूनी है वह पुरुष का है : अरविंद जैन 


वह हमेशा  रहस्यमयी आख्यायित की गयी : प्रज्ञा पांडे 




बकौल सिमोन द बोउआर स्त्री पैदा नहीं होती बनायी जाती है – आपकी दृष्टि में स्त्री का आदिम स्वरुप क्या है ?

आदिम स्वरूप हो या आधुनिक – स्त्री का बायोलाॅजिकल पक्ष शुरु से एक जैसा ही रहा है। समाजविज्ञान के अनुरूप लैंगिक स्वरूप और धारणाएं बदली है और लगातार बदल रही है। पुरातन समय में स्त्री को पूरी तरह उसकी प्रजनन क्षमता से जोड़कर देखा जाता था । पुरुष अपने भीतर से एक नये मानव का सृजन कर नहीं सकता था इसलिये पचास के दशक तक स्त्री का सारा महत्व उसकी प्रजनन क्षमता के इर्द – गिर्द समेट दिया गया। सन् 1950 के बाद ही प्रजनन से होने वाले हानिकारक प्रभाव जब स्त्री देह पर देखे गये, तभी प्रजनन को नियंत्रित करने और रोकने के उपाय तलाश  जाने लगे और उनका इस्तेमाल स्त्री के स्वास्थ्य की बेहतरी के लिये सफलतापूर्वक किया गया । मसाला कूटने और चक्की पीसने की मशीनों, कोयले और लकड़ी के चूल्हों की जगह गैस के चूल्हे आविष्कृत  हुए और स्त्री को घरेलू श्रम से राहत मिली । महिला अधिकारों का फिनाॅमिना भी औद्योगिक विकास, लोकतांत्रिक समाज और विज्ञान और तकनीकी प्रगति से बावस्ता है।

सिमोन द बोउआर  का समय वही है जब समाज एक बदलाव की करवट ले रहा था। सिमोन के व्यक्तित्व में एक खास किस्म की सादगी थी जो स्त्रियों के लिये बनाये नियमों और पुरुश वर्चस्व वाले समाज में मानवीय बराबरी के भाव से ही पैदा होती है। सिमोन का पूरा जीवन स्त्री की शारीरिक मानसिक और बौद्धिक स्वतंत्रता का पर्याय बन गया। सिमोन जीवन भर स्त्री के दैहिक आकर्षण , चेहरे पर सौंदर्य प्रसाधनों के इस्तेमाल से पुरुषों को आकर्षित  करने की कोशीशों के बेहद खिलाफ थीं और उन्होंने निजी तौर पर न केवल इसका विरोध किया बल्कि तत्कालीन फ्रांस में विवाह और परिवार की अवधारणा से बहुत आगे बढ़कर सहजीवन का चुनाव किया। सात्र्र के साथ उनके संबंधों का एक आयाम यह भी है कि दोनों ने अपने जीवन, अपने संबंधों और अपनी भावनाओं को कभी छिपाया नहीं। सिमोन ने सार्त्र से  अलग प्रेम संबंध को भी स्वीकृति दी। ऐसी सिमोन जब ‘ स्त्री बनाई जाती है’ , जैसा वक्तव्य देती है ,तो इसके पीछे उसकी जैविकी के आधार पर तय किये जाने वाला दर्जा, शारीरिक बदलावों और जरूरतों के हिसाब से स्थापित मूल्यों और पुरुष  वर्चस्व के अनुरूप गढ़े गये स्त्री विरोधी मिथकों का खंडन एक आधारभूत कारण रहता है।

मेरी अपनी दृष्टि  – पीढि़यों से चली आ रही परंपरा, उनमें आये बदलाव और उसके बाद अपनाए गए आधुनिकता के विचारों से बनती है । मैंने अपनी मां दादी नानी सास ननदों के रिश्ते  में आने वाली स्त्रियों को हमेशा  पारिवारिक और सामाजिक मूल्यों में जकड़े पाया। वस्तुतः यह मूल्य उनकी बेडि़यां ही थीं जैसे सामाजिक सम्मान और सुरक्षा, पिता और पति की आर्थिक हैसियत के अनुरूप संपन्नता जिसका सीधा अर्थ था – खाने पहनने और रहने के लिये मूलभूत सुविधाएं। शिक्षा के क्षेत्र में भी हमें उतना ही आगे बढ़ने की छूट थी, जिससे हम पारिवारिक दायरे और मूल्यों के लिये चुनौती न बन सकें। आत्माभिव्यक्ति के स्तर पर एक संकट यह आया कि स्त्री और पुरुष  के बीच सैद्धांतिक और व्यावहारिक रूप से एक गहरी फांक थी। निर्णय पुरुषों  के और मानना स्त्रियों को पड़ता था। यह प्रक्रिया एक अन्तरपीढ़ी- स्त्रीजगत की ओर जब ले जाती है,  तो यह सवाल बार बार उठता है कि केवल भारत ही नहीं, दुनिया की सारी सभ्यताओं में स्त्री को जैविक कारणों से ही क्यों गुलाम बनाने की शुरुआत की गई होगी और उसके लिये नियमों और मिथकों का इतना भयानक जेलखाना बनाया गया होगा ।

सिमोन

मुझे लगता है कि प्राचीन काल से जब स्त्री पुरुष  के कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ी होगी और दो कदम और आगे बढ़कर तत्कालीन जरूरतों के हिसाब से बच्चे पैदा करने में लगी होगी तब उसे जबरन जंगलों की खोज, युद्धों और विजयों से काटकर कबीले, तंबू और बस्तियों के जीवन में समेटा गया होगा और वह इससे कभी आजाद न हो सके इसके लिये उसके आसपास नियम और मिथक गढ़े गये होंगे। आदिम समाज की यह परिपाटी सभ्यताओं के विकास के साथ साथ विकसित होती रही और आज हम उसको एक पतनशील व्यवस्था के रूप में देख सकते हैं इसका एक उदाहरण महानगरों में कामकाजी औरतों का ट्रेन और बसों में ठुंसकर कार्यस्थल पर जाना, घर और बाहर खटना लेकिन दाम्पत्य की सुरक्षा के लिये करवाचैथ या ऐसे अनेक व्रत उपवास रखना आदि में देखा जा सकता है।

क्या दैहिक शुचिता की अवधारणा स्त्री के खिलाफ कोई साजिश है ?

पहली बात तो यह कि अपनी शुरुआत में दैहिक पवित्रता न तो अवधारणा जैसी कोई चीज़ थी और न ही इसे साजिश  के रूप में देखा जाना चाहिये। यह एक तरह से प्रजनन की आधारभूत प्रक्रिया को न समझकर एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी । एक बच्चे की मां को पहचान पाना जितना आसान था, पिता या पुरुष  की शिनाख़्त उतनी ही मुश्किल  थी । इसलिये स्त्री पर अपना अंकुश  और नियंत्रण बनाने के लिये दैहिक शुचिता को एक मूल्य के रूप में धीरे धीरे स्थापित कर दिया गया और बाद में यह पितृसत्ता की मशीनरी के तहत स्त्री को अनुशासित करने का एक ठोस औजार बन गया ।

आखिर किसे दैहिक शुचिता की ज़रूरत है और क्यों ? यह अवधारणा स्त्री के मनोबल को तोड़ने की एक ऐसी प्रक्रिया है, जहां पहले ही वार में उसकी स्वतंत्रता का सवाल स्वाहा हो जाता है और वह पुरुष  की ऐसी कृपा पर या हिकारत पर आजीवन जीने के लिये अभिशप्त हो जाती है,  जिसका पुरुष  को कोई अधिकार नहीं है, लेकिन अपनी सत्ता बनाये रखने और मनमानेपन और अत्याचार को जायज ठहराने के लिये वह अलिखित रूप से इसका इस्तेमाल आजीवन करता रहता है ।

शुचिता का विचार इतना घातक होता है कि न सिर्फ स्त्री के हंसने बोलने और चहकने को कठघरे में खड़ा कर देता है बल्कि उसकी बौद्धिकता, संवेदनशीलता और समूचे विवेक को भी कुंद कर देता है और वह सिर्फ हां में हां मिलाने के लायक रह जाती है। उसके युवा होते ही उसपर प्रेम न करने की पाबंदियां लगा दी जाती हैं। प्रेम करने पर उस पर पूरा हक और दखल परिवारवालों का होता है। वह किसके साथ जीवन बिताने का निर्णय ले, यह अधिकार उसे नहीं दिया जाता – यह कहकर कि वह नासमझ है, उसे अपने अच्छे बुरे की पहचान नहीं ।

इन स्थितियों के खिलाफ़ बहुत कम लड़कियां सिर उठा पाती हैं, बल्कि ज्यादातर लड़कियां जीवन भर इस अनकिये अपराध की सजा भुगतती रहती हैं। सामान्य रूप से यदि एक मोटा आंकड़ा भी लिया जाए तो लाखों रचनात्मक प्रतिभाएं इस प्रक्रिया में मिट्टी में मिल जाती हैं, जबकि होना इसका उल्टा चाहिये । दैहिक शुचिता का सवाल पुरुषों  के लिये उठाया जाना चाहिये, क्योंकि उन्हें आज़ादी मिली हुई है और सब जानते हैं कि उसने इस आज़ादी का दुरुपयोग स्त्री के खिलाफ़ ही किया है।

भारत की खाप पंचायत इसका एक ठोस उदाहरण है । इसके अलावा मिडल ईस्ट, अफ्रीका , लैटिन अमरीकी देश  और पूर्वी एशिया के कुछ देषों में स्त्रियों को तथाकथित रूप से शुद्ध और सुरक्षित रखने के लिये सुन्नत, लोहे के जांघिये जैसी अमानवीय और क्रूर प्रथाओं  का शिकार बनाया जाता रहा है। चीन में लड़कियों के पैर बांधने की क्रूर प्रथा उन्हें खूबसूरत और कमसिन बनाने के बजाय अशक्त और गुलाम बनाने की ही कवायद थी ।

समाज के सन्दर्भ में शुचितावाद और वर्जनाओं को किस तरह परिभाषित किया जाए ?  

हम शुचितावाद की प्रक्रिया को देखें तो यह समझ पायेंगे कि अब शुचिता के निर्वाह की अपेक्षा रखना स्त्री की वैयक्तिक आज़ादी से उसे बेदखल करना है । सारी हिदायतें, वर्जनाएं और प्रतिबंध एकबारगी अतार्किक होकर खारिज हो जाते हैं , अगर हम किसी भी मनुष्य  की वैयक्तिक आज़ादी को सबसे ऊंचा दर्जा  देते हैं ।

आज के दौर में शुचितावाद और यौन वर्जनाएं मूलतः स्त्री यौनिकता और भावना पर सीधा हमला है। पुरुष  के मुकाबले स्त्री की यौनेच्छा और कामभावना को हमेशा  दोयम दर्जे  पर डाल दिया जाता रहा है, इसलिये उसकी संतुष्टि – असंतुष्टि  का तो सवाल ही बेमानी हो जाता है। शास्त्रों में जिस भारतीय नारी की कल्पना की गई है,  और आज भी जिसे सामाजिक स्वीकृति मिली हुई है वह वस्तुतः एक दमित स्त्री है,  जो अपनी इच्छाओं के मुकाबले पति और परिवार की कल्याण भावना से ही संचालित होती है। स्त्रियों की सारी भावनाओं का दायरा उनके पति की इच्छा -अनिच्छा तक सीमित कर दिया जाता है। इस तरह व्यभिचारियों और नपुंसकों की बहुत बड़ी फ़ौज समाज में नाक ऊपर उठाये हुंकार भरती हुई मिल जायेगी और दुर्भाग्य से ऐसे ही लोग स्त्रियों के नियंता बन जाते हैं।

इसका एक दुर्भाग्यपूर्ण पहलू है – स्त्री का सामान्य जीवन से उदासीन होते हुए संपत्ति का केअरटेकर भर रह जाना और अपने आनंद और सुख को हर तरह भूल जाना। कभी -कभी स्त्रियां इन सब के खिलाफ़ एक विद्रोही  तेवर लेकर शब्दों में उतर जाती हैं और मूल्यवान रचनाएं हमारे बीच आती हैं। लेकिन आज का अधिकांश  स्त्री लेखन देह की आज़ादी से प्रेरित फूहड़ लेखन है, जो वस्तुतः स्त्री की आज़ादी और गुलामी के असली निकष  पहचान ही नहीं पाता और पुरुष  सत्ता में शामिल होने के लिये उसका मोहरा बनकर रह जाता है। यौन केंद्रित दृष्यों की बहुलता और संबंधों के द्वंद्वविहीन विन्यास असल में इसका बहुत बड़ा रूपक है कि स्त्री अपनी बेडि़यों को पहचान ही नहीं पा रही है और न ही उससे पैदा हुई तकलीफों का उसे कोई आभास है और इसीलिये वह पुरुषों की आज़ादी के अनुकूल एक और बेड़ी अपने ऊपर स्वेच्छा से डाल लेती है, जिसकी उसे पहचान तक नहीं होती जबकि उसके भीतर अतीत से गहरा संघर्ष  और भविष्य  की चुनौतियां स्वीकारने का माद्दा होना अधिक जरूरी है।

स्त्रियाँ, जिनका हस्तक्षेप है

यदि स्वयं के लिए वर्जनाओं का निर्धारण स्वयं स्त्री करे तो क्या हो ?

वैयक्तिक स्तर पर स्त्रियों को संबंधों का चुनाव करते समय अपनी भीतरी खुशी और तनावमुक्त स्थिति पर अपने को फोकस करना चाहिये । साथ ही साथ वह इस बात का भी ख्याल रखे कि उसके निजी चुनाव किसी दूसरे की आज़ादी और सुरक्षा में खलल तो नहीं डाल रहे। अपनी आज़ादी को बचाये रखने के साथ उसे दूसरे की आज़ादी पर हमला करने का भी कोई हक नहीं है। यह स्त्री पुरुष  का नहीं, मानवीयता का तकाज़ा है। उसे लिंग विभाजन और लिंग प्राथमिकता के तहत अपनी दिशा  तय नहीं करनी है। सामाजिक स्तर पर भी यही रवैया कारगर होगा। वर्ग, वर्ण और जाति के तहत उसे विभेद रेखायें नहीं खींचनी हैं। हमेशा  यह संभव नहीं होता पर अपनी सीमाओं और मानवीयता की पहचान एक ज़रूरी धरातल है।

आज़ादी को लड़की के लिए कुफ्र माना जाता है।  बहुत सी बातें उनके ऊपर थोप दी जाती हैं।  इसके बरक्स समाजों और राष्ट्रों को सभ्य बनाने की अधिक जरूरत है।  जब स्त्री अपने लिए वर्जनाएं तय करेगी तो मुझे नहीं लगता कि वह बराबरी और मनुष्यता से बाहर कोई मांग करेगी। उसका तो मूलभूत हक भी अब तक उसे मिला नहीं है।  अगर वह अपने हकों के लिए संघर्ष कर रही है और आप उसे अराजक और आवारा समझ रहे हैं तो ठीक वही अपराध कर रहे हैं जो पीढि़यों से लोग करते आ रहे हैं।  आजादी और अपराध की सीमारेखा को एक में नहीं मिलाया जा सकता।

विवाह की व्यवस्था में स्त्री की मनोवैज्ञानिक ,सामाजिक एवं आर्थिक स्थितियां  कितनी स्त्री के पक्ष में हैं ? 

विवाह की शुरूआती अवधारणा ही पूरी तरह से ग़ैरबराबरी पर टिकी है। स्त्री और पुरुष मिलकर एक पारिवारिक इकाई का निर्माण करते हैं लेकिन इस इकाई में कार्यविभाजन, भूमिकाओं के निर्धारण और निर्णय के अधिकार में दोनों को समान  नहीं रहने दिया जाता और इसका बुनियादी कारण संपत्ति और अर्थोपार्जन है। एक समय तो रनिवासों और हरमों में स्त्री की हैसियत एक गुलाम से भी बदतर हो गई। गौरतलब है कि इनमें बंदियों की ही संख्या नहीं थी बल्कि ब्याहताओं की भी संख्या थी।  चूँकि यह परिदृश्य शासक वर्ग के भीतर था इसलिए सामान्य जीवन भी इस असर से अछूता न रहा और इसका सबसे बड़ा असर स्त्री की अस्मिता पर पड़ा और वह सामाजिक जीवन की सबसे उपेक्षित स्थिति तक जा पहुंची।

विवाह का निर्धारण पुरुष के अनुकूल होता रहा है और स्त्री की सहमति-असहमति का उसमें कोई मतलब नहीं रह जाता है।  अक्सर देखा गया है कि बीमार और फटेहाल पति भी अपनी कामकाजी पत्नी को केवल इसलिए दबाता रहा है कि वह पुरुष है। आर्थिक स्थिति में स्त्री के प्राधिकार का अभाव इसका मुख्य कारण था।  पारम्परिक विवाह की व्यवस्था में मनोवैज्ञानिक, सामाजिक एवं आर्थिक स्थितियां स्त्री के पक्ष में अमूमन कम ही रही हैं। हाँ, प्रेम विवाहों और नई अर्थव्यवस्था में चीजें तेजी से बदलने का आभास ज़रूर हुआ पर दोनों पक्षों में गहरे तक परंपरागत संस्कार धंस चुके थे इसलिये मानसिकता को बदल पाना बहुत मुश्किल  हो गया।

समय के साथ साथ इनमें परिवर्तन हुए। आज विवाह में इस गैरबराबरी की प्रचलित अवधारणा से बाहर निकलने की ज़रूरत है। लड़कियों को पहले की तरह इसे भाग्य और नियति मानकर एक गलत संबंध में आजीवन टिके रहकर अपने को होम करने की ज़रूरत नहीं है। सामाजिक सुरक्षा और सुविधा के संबंध को विस्तार देते हुए प्रेम के संबंध में बदलने की भरपूर कोषिष की जानी चाहिये । यह इस बात पर निर्भर करता है कि एक स्त्री अपनी अस्मिता को बरकरार रखते हुए एक कोमल रिश्ता  बनाये रखने में कितनी आश्वस्त  और सर्जनात्मक है। स्त्रियों में प्रेम देने की अंतहीन संभावनाएं हैं। पुरुषों  में भी हैं पर उनका अहं भरपूर आड़े आता रहता है। दो साथियों के बीच अगर मूल्यों , आस्थाओं और अस्तित्व का भीषण  टकराव है , तो उसी स्थिति में विवाह से बाहर निकलकर दोनों का अपने को सम्मान के साथ बचाये रखना निहायत ज़रूरी है ।

मातृसत्तात्मक व्यवस्था में विवाह-संस्था क्या अधिक सुदृढ़ और समर्थ होती ? तब समाज भ्रूण हत्या दहेज हत्या एवं बलात्कार जैसे अपराधों से कितना मुक्त होता ?

मातृसत्तात्मक व्यवस्था की अवधारणा एक यूटोपिया से ज्यादा कुछ नहीं। सत्ता  – वह किसी भी तरह की हो – पितृसत्ता  या मातृसत्ता  – हमेशा  से ही त्याज्य है। उसे स्वीकृति नहीं दी जा सकती। नारीवाद लोकतंत्र और उदारवाद का इच्छुक है। समानता और बराबरी इसका मूलमंत्र है और इसी के तहत हर व्यक्ति को न्याय और सम्मान दिलाया जा सकता है । फेमिनिज़्म में यह स्पष्ट  रूप से कहा गया है कि पितृसत्ता की आलोचना या भर्त्सना  करते हुए वह मातृसत्ता  की स्थापना का हिमायती नहीं है।

यह निहायत गलत अवधारणा है कि भ्रूण हत्या, दहेज हत्या और बलात्कार जैसे अपराध पुरुषसत्तात्मक समाज की विशेषतायें हैं और ज्यादातर मातृसत्तात्मक व्यवस्थाओं में ये कुरीतियां नहीं होतीं।  नारीवादी महिलाएं अगर समाज में बदलाव चाहती हैं तो इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं लगाया जाना चाहिये कि वे पितृसत्तात्मक व्यवस्था की जगह एक मातृसत्तात्मक व्यवस्था चाहती हैं। नारीवादी अवधारणा बराबरी का हक, निर्णय लेने की आज़ादी और मानसिक गुलामी से मुक्ति की अवधारणा है,  जिसमें पुरुष को साथ लेकर ही समाज को बदला जा सकता है, अलग से एक मातृसत्तात्मक व्यवस्था कायम करके नहीं। यह एक शोषक  व्यवस्था से निदान नहीं, सिर्फ़ खुद दूसरी भूमिका में उतर आना है।

सह जीवन की अवधारणा क्या स्त्री के पक्ष में दिखाई देती है ?

सहजीवन की अवधारणा विवाह संस्था की हिलती हुई नींव का ही नतीजा है। ज़ाहिर है इसमें स्त्री और पुरुष  (या समान लिंग के दो साथी भी) दोनों के लिये अपेक्षाकृत ज्यादा आज़ादी है। सहजीवन सबसे पहले संयुक्त परिवार की अवधारणा और बंधन से मुक्ति का रास्ता दिखा देता है,  जिसमें हमेशा  परंपरागत विवाह के छत्र तले आमतौर पर स्त्रियों को ही समझौते करने पड़ते थे। विवाह दो व्यक्तियों के बीच होता है पर एक लड़की को सिर्फ़ अपने पति से नहीं, उसके पूरे परिवार से समझौता करते हुए, तालमेल बिठाते हुए और आखिरकार इस प्रक्रिया में अपने को होम करते हुए इस संबंध को निभाना पड़ता है। अच्छे और सकारात्मक अर्थों में जिसे गठबंधन कहा गया वह अंततः पूरी तरह गर्दन पर जकड़ा हुआ बंधन साबित हुआ । दो वयस्क एक दूसरे के लिये जि़म्मेदार होते हैं और उन्हें इस जि़म्मेदारी को एक खुले मन और दिमाग़ से निभाना चाहिये।

सहजीवन खासतौर पर स्त्रियों के लिये आज़ादी की ओर बढ़ता अगला कदम है पर परिवार और विवाह की पारंपरिक अवधारणा ऐसे सहजीवन को स्वीकृति न देकर इन आज़ाद ख्याल व्यक्तियों को समाज से अलग-थलग रखने का उपक्रम रचती है। अगर कोई औरत ऐसे सहजीवन में रहते हुए मां बनना चाहती है, तो उसे एक लंबे अनुबंध की राह तकनी होती है। मध्यवर्ग की लड़की को सामाजिक रूप से अकेले पड़ जाना प्रभावित करता है। इसलिये सहजीवन का निर्णय एक मध्यवर्ग की लड़की ( और लड़के के लिये भी – क्योंकि परिवार उसे भी छोड़ देता है ) के लिये संकरी रस्सी पर चलने जैसा है। मध्यवर्ग से आये संस्कारी युवाओं के लिये यह एक कठिन निर्णय है। पर आज का युवा वर्ग, विवाह के साइड अफेक्ट्स देखते हुए इस प्रयोग को अंजाम देने से नहीं हिचकता और अक्सर उसे इसका लाभ भी मिलता है।

साथ होकर भी पुरुष एवं स्त्री की स्वतंत्र परिधि क्या है ?

किसी भी संबंध में – चाहे वह शादी हो या सहजीवन – अपनी निजी स्पेस को बनाये रखना बहुत ज़रूरी है। अगर दोनों साथी एक दूसरे की स्वायत्तता बनाये  रखने में मददगार हों तो वे एक दूसरे के साथ रहते हुए अपने को समृद्ध करेंगे और अपना विकास एक स्वस्थ तरीके से कर पायेंगे। इससे सहजीवन का भी स्वस्थ विकास होगा। यह पारस्परिक समृद्धि योजना है । स्वायत्तता  को बरकरार रखना इसमें हमेशा  इजाफ़ा करता है ।

एक दूसरे का ख्याल रखना और सम्मान करना तो पुरुष और स्त्री की स्वतंत्र परिधि का एक आधार होता ही है लेकिन इसके पीछे काम करनेवाले बुनियादी घटकों को और अधिक ध्यान से समझने की जरूरत है। जब तक स्त्री के श्रम , उसकी बौद्धिकता और क्षमता को पूरा महत्व नहीं मिलेगा, तब तक स्त्री स्वतंत्रता पुरुष की दयानतदारी पर निर्भर रहेगी। इसके साथ ही जबतक स्त्री का अपना घर, संपत्ति पर अपना हक, अपना खाता और नियमित आय नहीं होगी और उसको खर्च करने का निर्णय उसका अपना नहीं होगा तब तक यह परिधि कमजोर होगी और स्त्री सुरक्षा के लिए हमेशा पुरुष की चहारदीवारी में जाती रहेगी !