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किले में समंदर : आखिरी किस्त

रोहिणी अग्रवाल

रोहिणी अग्रवाल स्त्रीवादी आलोचक हैं , महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं . ई मेल- rohini1959@gmail.com

( रोहिणी अग्रवाल की यह अभिव्यक्ति अतीत से वर्तमान और वर्तमान से अतीत की आवाजाही है , स्वप्न -कल्पना और यथार्थ के परस्पर गुम्फन के साथ . स्त्री के संघर्ष और पीड़ा तथा मुक्ति के अहर्निश अभियान की कथा पढ़ें दो किस्तों में  : आखिरी किस्त  ) 


पहली किस्त के लिए क्लिक करें : किले में समंदर : पहली किस्त 

मैं किश्ती लेकर अपने भीतर की गहराइयों में उतर गई हूं। दादी मेरे संग चलेगी। कृशता और उम्र के भार से झुकी दादी बार-बार मेरे कोरे पन्नों को चाव से सहलाया करती थी। ”तेरी तरह पढ़ी-लिखी होती तो अपने जीवन की कहानी इन पन्नों पर उतार देती।”


”तुम्हारे जीवन में क्या है दादी – हर डेढ़ साल बाद का अनिवार्य जापा, चूल्हे की धुंआती आग, रोटियां बेलने और बच्चे पालने में घुलती हर सुबह-सांझ! इनसे आत्मकथाएं नहीं बनतीं दादी! आत्मकथा लिखने के लिए जिंदगी एक बड़े कॉज को समर्पित करनी पड़ती है।” मैं अभिमान में उद्धत छोकरी! तुरत-फुरत भागने को तैयार!
दादी लम्बी सांस खींच कर मुझे रोकने और बात करने की ताकत बटोरतीं – ”फिर मेरे पास रोज की चख-चख में ही कहने को इतना कुछ क्यों है? क्यों चूल्हे की आग कलेजे में भी जलती है? पकता रहता है कुछ भीतर ही भीतर। पक-पक कर जल जाता है – तप कर बुझे तंदूर की राख में राख होती जली रोटी के ढेर सा।”

दादी के संग कोई है। पंजाबी सुथ्थण, लम्बी कमीज और भारी सा दुपट्टा। पांव में बेढब जूती। ऊँची-लम्बी जट्टणी कद काठी। चेहरा ताम्बई लाल – ओज-आक्रोश, पीड़ा-अपमान, संघर्ष-जिजीविषा के विविध रंगों से तैयार! सुलगती चिंगारियों के बावजूद आंखों में ठंडक देता अपनापन। खासी तेजस्वी महिला।
”यह निम्मो है।” दादी ने मेरी आंखों में झांकते अपरिचय को पढ़ लिया, ”निम्मो! मेरी सहेली! पहली बार मिली तो लगा यह मेरी जुबान ही नहीं, चुप्पियों को भी समझती है। समझती है मेरी कसक, मेरे सपने, छलांग की लंबाई और ऊँचाई . . . ”
”छलांग जो कभी लगाई नहीं तुमने।” निम्मो ने तरेरा।
”लगाने ही नहीं दी किसी ने।” दादी मिमियाई।

रुख्मा बाई 

निम्मो की तरेरे में नेह की नदियां थीं। दादी मुस्काई -”तुमसे हारती हूं बाबा! तब उस जमाने में भरी जवानी के दिनों मिली होतीं तो तुम्हारी संगत में अपनी जिंदगी के सफे पर अपने ही हरफ लिखती। तुम्हारी तरह।” दादी बेहद उत्साहित भाव से मेरी ओर मुखातिब हुई, ”जानती हो, निम्मो ने वही सब लिखा है जो मैं लिखना चाहती रही ताउम्र। तुम तो इतना पढ़ती रहती हो। निम्मो की किताब भी पढ़ी होगी न।”
”निम्मो की किताब. . . . कौन निम्मो? कौन सी किताब?” मैं परेशान। दादी की सहेली और लेखिका!
”अरे, किताब-विताब कहां? जो सोचा, लिख दिया। भाषा तो थी नहीं, सिर्फ आग थी। कलेजे में ढांप कर रखने की बजाय बाहर उगल दी। जलना तो दोनों ही सूरतों में था।”
”आपकी किताब . . . ?” मैं अदब और आश्चर्य से अभिभूत!
”सीमंतनी उपदेश।”
”सीमंतनी उपदेश???” मेरी सांस धौंकनी सी। स्त्राी-गीता की व्यास सामने और मैं परिचय मांग रही हूं? ये दादी भी न! तब से निम्मो-निम्मो की रट लगाए है।। कोई धोखा न खा जाए तो क्या करे?
”आप अज्ञात हिंदू महिला हैं न
”मूर्ख लड़की।” दादी ने फटकारा, ”अज्ञात हों इसके दुश्मन। यह निम्मो है।”
निम्मो मेरे बचाव में आगे आईं। ”हां, तुम लोग मुझे अज्ञात हिंदू महिला कहते हो। पुन्नी ने मुझे निम्मो नाम दिया है।”
अब यह पुन्नी कौन? एक और पहेली।
”पुन्नी। पूनम। तुम्हारी दादी।”
”ओ!!! दादी, तुम्हारा नाम पूनम है? मुझे तो पता ही नहीं था।”
”औरतों के नाम खुद औरतों को याद नहीं रहते। उनसे नाम छीन लिए जाते हैं ताकि कोई अलग पहचान न बना सके। नामविहीन व्यक्ति चेहराविहीन हो जाता है पहले, फिर भावहीन, विचारहीन, व्यक्तित्वहीन। औरत की पहली लड़ाई अपना नाम पाने की होनी चाहिए। पद नहीं, विशेषण नहीं, नाम! अपनी अलख जगाता, धूनी रमाता नाम!”

अज्ञात हिंदू महिला सॉरी निम्मो अब कितना संयत होकर बोलती हैं। ‘आवेश लड़ाई का ऐलान करने के लिए जरूरी होता है। लेकिन बाद में निर्माण और प्रबंधन के लिए विवेक और संवेदना, व्यावहारिकता और सर्जनात्मकता की ही जरूरत होती है।”
”मैं बीजी कहूं आपको?” मेरे मुंह से बस इतना ही निकला। आदर का अतिरेक। उन्होंने मेरा मस्तक चूम लिया तो मैं हुलस कर वाचाल हो गई -” बीजी, आजकल हम औरतों ने अपना नाम पाने की लड़ाई जीत ली है। बीवी और मां बन कर अब हम अपना नाम नहीं खोतीं। वंशवृक्ष में भी हम हैं और कानूनी दस्तावेजों में भी।”
”लेकिन बेटा, तुम्हारे हरियाणा की पंचायतों में जो कबीलाई संस्कृति घुस आई है, वह तो ऐसा कुछ नहीं कहती। उससे करोगी दो-दो हाथ? जान लो, हठ को हिंसा से नहीं जीता जा सकता, न ही प्रेम को दंड से दबाया जा सकता है। औरत के हकों की बात करते हुए मर्द के अस्तित्व, स्थिति और प्रतिशोधात्मक खिसियाहट को नजरअंदाज कभी न करो। मैं करती थी ऐसा अपने दिनों में। प्रताड़ित-दमित थी न! सो लगता था तमाचे के जवाब में झन्नाटेदार तमाचा न मारा तो दर्द को पचाऊँगी कैसे? लेकिन औरत क्या अपनी दुनिया में सिर्फ औरत ही चाहती है?”

नहीं! दुविधा की कोई गुंजाइश नहीं। औरत नहीं चाहती निखालिस मर्द या औरत की दुनिया। वह चाहती है इंसानी दुनिया – एक दूसरे के प्रति आदर, विश्वास और प्यार की दुनिया।
”बीजी, क्या ऐसी दुनिया संभव है? सम्बन्धों की रूढ़ संरचनाओं को बदलती बहिश्ती दुनिया?”
”हां, और इसे जमीन पर लाओगी तुम। तुम्हारी पीढ़ी। तुम्हारी पीढ़ी की संतति। अपने चिंतन को अनुभव से सान कर, दर्प की बर्फ को विवेक की मद्धम आंच से गला कर तुम्हें ही नव-संस्कारित करना है समाज। तुम लोग ही हो हमारे समाज की रमाबाई। रख्माबाई।”

मैं सकुचा गई। मैं – आत्मनिर्भर, सुशिक्षित, चिंतनशील जाग्रत स्त्राी! फेमिनिस्ट! क्या अपने ही स्वार्थ की परिधि में घूमते-घूमते अपने से भिन्न स्त्री  समाज से बहुत कट नहीं गई हूं? क्या बोली-बानी, चाल-पोशाक के मोटे-बारीक फर्क के आधार पर मैंने स्त्रियों की कई कोटियां नहीं बना लीं? और कई-कई-कई कोटियों पर ‘संवाद निषिद्ध’ की तख्ती भी। बीजी क्या मेरा दोगलापन जानती हैं? मैं भय से सिहर उठी, इसलिए आत्मरक्षा के प्रयास में बेहद आक्रामक – ”बीजी, विवाह और पति के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ कर जीतने वाली रख्माबाई क्या सचमुच पति नामधारी पुरुष की मृत्यु के बाद विधवा की तरह रहने लगीं थीं?”
”हां।” तथ्य को तथ्य की तरह कह देने की लालसा।
लेकिन मैं इसे तथ्य कैसे मान लूं? यह तो भीषण अंतर्विरोध है। रख्माबाई का रख्माबाई होना खारिज करता अंतर्विरोध। तो क्या अंतर्विरोधों से कोई मुक्त नहीं?
”न्न बेटा! अंतर्विरोध अपमान या ग्लानि उपजाती दुर्बलताएं नहीं, वैचारिक विकास के अगले सोपान पर आरूढ़ होने के बाद पीछे छूट गई अपरिपक्व भावनात्मक भ्रांतियां हैं। अंतर्विरोध व्यक्ति को खारिज नहीं करते, वक्त और व्यवस्था के साथ उसकी मुठभेड़ को दर्ज करते हैं।”
”इजाजत हो तो अपनी बात मैं खुद कहूं?” रख्माबाई को देख निम्मो बीजी और दादी खिल उठीं।
”हां, उस पति नामधारी पुरुष की मृत्यु के बाद विधवा की तरह रहने लगी थी मैं। शायद इसलिए कि हमारे यहां औरत मर्द से ब्याही नहीं जाती। ब्याही जाती है सपने से जो सिंदूर बन कर उसकी जिंदगी की रवानगी को गिरफ्त में ले लेता है। औरत पैर टिकाने के लिए आधार चाहती है। पति का नाम उसे आधार देता है। पति का नाम लेकर औरत मर्द को नहीं, भावनात्मक सम्बन्ध को थामे रहना चाहती है।”
मैं मानने को राजी नहीं हुई।

रख्माबाई आजी की बात शायद खत्म नहीं हुई थी। ”बड़ी-बड़ी कानूनी लड़इयां लड़ना आसान है बेटा। आपके पास वैचारिक और नैतिक बल होता है। नया वक्त रचने और क्रांति करने का जनूनी जज्बा भी। शिकस्त को मुंह चुरा कर नौ दो ग्यारह होना ही पड़ता है। लेकिन अपनी ही संस्कारग्रस्तत से लड़ना आसान नहीं होता। दरअसल संस्कारों में पैठा दुश्मन दिखाई ही नहीं देता। वह खून और सांस बन कर रग-रग में दौड़ता है। जो जीने की शर्त हो, उसी पर जानलेवा प्रहार कैसा?”
”सिर कलम करके ही दुश्मन को हमेशा जीता नहीं जाता। उसे पालतू बना कर भी राह से हटाया जा सकता है।” यह शिवरानी देवी थीं।
”अम्मा!” मैं लाड़ से उनके कंधे पर झूल गई।
”बेहद उद्दंड औरत हूं मैं। खासी दबंग। इसलिए बहनो, मेरी बात का बुरा न मानना। लेकिन एक बात जरूर कहूंगी, औरत हो या मर्द, अपने को जीते बिना संसार को जीतने का सपना देखना निरा पागलपन है।”
सबने सहमति में सिर हिला दिए।
”अपने को जीतना माने अपनी कमजोरियों और विकारों को दूर करना। अंत तक औरत या मर्द बने रह गए तो इंसानी समाज की बात करना बेमानी हो जाएगा। औरत न मर्द, सिर्फ इंसान – अपने तईं मैं इतनी सी बात जानती हूं, बस।”
मैं शिवरानी देवी की उद्दण्डता की मुरीद! औरत की उद्दण्डता यानी साफगोई और निर्भीकता।
”अम्मा, क्लास में जब मैं सूरदास का बाल-लीला वर्णन पढ़ाती हूं तो खीझ उठती हूं। मुख पर दही और गात पर मिट्टी का लेप करके नहलाया-धुलाया बच्चा घर लौटे तो मेरे हृदय में ममता के सोते नहीं फूटते। बाद में जो करूं सा करूं, पहले जम कर धुनाई जरूर करूंगी।”

‘यह है स्त्री  पर छवियों का आरोपण।” जाने कब से रमाबाई हमारी बातें सुन रही थीं। ”स्त्री  की भरपूर ठोस लौकिक स्वतःस्फूर्त इयत्ता को क्षरित कर किन्हीं महिमामंडित दैवीय अमूर्तनों में बांधने की क्रमिक प्रक्रिया है स्त्राीत्व की रचना। खंडों में विभाजित स्त्राी अपूर्ण, निर्भर और अडोल रहे; हृदय, बुद्धि, गति और कर्मठता को जोड़ कर किसी एक दिशा की ओर प्रयाण न कर सके। स्त्राी की तेजस वैयक्तिक अस्मिता की हत्या कर स्त्राीत्व उसे लैंगिक इकाई बनाता है – पुरुष की परिक्रमा मेें जीवन पाती लैंगिक इकाई। मातृत्व, सतीत्व, गृहिणहत्व – स्त्रीत्व  की संरचनाएं। स्त्री को  छलती प्रवंचनाएं।”
इसलिए तो पसंद हैं शिवरानी देवी मुझे। स्त्रीत्व  की रूढ़ छवियों को ओढ़-बिछा कर कातर भाव से रोती-बिलखती नहीं वे। ताल ठोंक कर उन्हें चुनौती देती हैं।
”मैंने तो भई कह दिया था, पूत कपूत तो क्या धन संचै, पूत सपूत तो क्या धन संचै। अपने पैरों पर खड़े होने का माद्दा नहीं हुआ लड़कों में तो समझ लूंगी ये मेरे बच्चे हई नहीं।”
”सचमुच, यशोदा को ऐसी पटकनी दी आपने कि . . .” मुझे खूब मजा आता है इस प्रकरण को सुन-गुन कर। शयद इसलिए कि परंपरानुमोदित अच्छी मां न हो पाने का अपराध बोध घुल जाता है कहीं। मैं मां हूं, लेकिन मेरा मातृत्व दूध की फुहारों से भीगा नहीं है। वह पुचकार और फटकार दोनों को जरूरी महत्व देता है। मेरा आंचल दुनिया भर की बदमाशी करके पनाह मांगते बेटे की सीनाजोरी ढांपने के लिए परदा बनने से इंकार करता है। मैं उसे जिम्मेदार नागरिक बनाना चाहती हूं। धूप-ताप, आंधी-पानी झेल कर जमीन के अंदर ही अंदर जड़ों का सख्त जाल फैलाते चले जाने और विनम्र छायादार ढंग से अपनी भूमिका निभाते चले जाने वाला जिम्मेदार नागरिक। ममता की तरलता जितनी जरूरी है, बस उतनी ही दूंगी। जानती हूं ज्यादा नमी से कच्ची जड़ंे गल जाया करती हैं।

”सूरदास के जरिए मुझे जानने का दावा करोगी तो सच से हमेशा दूर रहोगी। दूसरा व्यक्ति आपको समग्रता में चीन्ह ही नहीं सकता। वह उतना ही देखता है, जितना चाहता है, और उतना ही पेश करता है जिससे उसके वर्चस्व पर आंच न आए।” यशोदा हांफती-हांफती वहां आई, ”अभी जल्दी में हूं, इसलिए जा रही हूं, लेकिन इतना भर जान लो कि छवियों में कैद औरत की सुनवाई के लिए कहीं कोई अदालत नहीं। रिहाई की उम्मीद किससे करे वह?”
”अरे!” मुझे मानो सांप सूंघ गया।
”मैं मां होने से इंकार नहीं करती, लेकिन मेरा मातृत्व मेरे ‘मनुष्य’ होने को क्यों निगले? मैं मनुष्य रूप में अखंड, समग्र क्यों न पढ़ी-गुनी जाऊँ? क्यों नहीं क्लास में सूरदास की नजर से मुझे देखने की बजाय मेरी पीड़ा को अपने भीतर जीतीं तुम? तब करना मेरे और अपने युग की सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था की पड़ताल। फिर निकालना निष्कर्ष। पुराने से असंतुष्ट होकर खीझा जा सकता है। उसे बदलने के लिए नया नजरिया पैदा करना ही होगा।”

”ठहरो।” यशोदा को बांह पकड़ कर रोक लिया एक बंदिनी ने। ”यशोदा के साथ-साथ मेरी बात भी सुन लो। मैं  . . . सावित्राी . . . सत्यवान की परिणीता। यम से लौटा लाई पति के प्राण, राज्य, सुख, स्वत्व, संतान, भविष्य! मैं अकेली! फिर भी कहलाई अबला, परनिर्भर! मेरी अपराजेय जिजीविषा, संघर्ष-संकल्प, व्यूह रचना और रण लड़ने की कूटनीति – सब अलक्षित! अदृश्य! बना दी गई पतिव्रता पत्नी! सतीत्व का चरम! पुरुष को मौत के मुंह से लौटा लाने की जुर्रत करती स्त्राी को उन्मुक्त कैसे छोड़ दे समाज? वह हस्तक्षेप कर व्यवस्था को पलटेगी। इसलिए मैं पुरस्कृत की गई – सतीत्व में कैद करके।”

हम सब चुप रहीं। कठघरे में अकेली मैं। मेरा स्त्रीवादी  होने का दर्प क्या सिर्फ अपने को गुनने-बुनने, तराशने और समुन्न्त करने का स्वार्थपूर्ण अभियान ही है? अपने से बाहर दूसरे से न जुड़ना, न सुनना। दादी मुझे अपने साथ समूची स्त्री  जाति के तलघर में ले जाना चाहती थी लेकिन मैंने उनकी पुकार अनसुनी छोड़ दी और भटकती रही पुरुष रचित इतिहास की कंदराओं में – उनकी दृष्टि और निष्कर्षों के साथ।
”हमें सबसे पहले स्त्राी की सामाजिक-सांस्कृतिक संरचनाओं को छिन्न-भिन्न करना होगा।” गहरे दायित्व बोध के साथ मेरा अंग-अंग ऊर्जस्वी हो गया। ”छवियों से मुक्त नहीं हुई तो कैसे अपने आप को मनुष्य समझे-समझाएगी स्त्राी? कैसे आत्मानादर और भय से मुक्त होगी?”

रमाबाई और निम्मो बीजी मुस्करा दीं। मैं झेंप गई। नया क्या कह रही हूं भला? एक सदी पहले की उनकी पुकार को दोहरा रही हूं न!
”दोहराव हमेशा निरर्थक और अनुत्पादक नहीं हुआ करता। निःसंग आत्मालोचना बन कर वह व्यवधान को गति देता है और गति को निरंतरता।” रख्माबाई आजी ने मेरी पीठ थपथपा दी, ”लेकिन तुम अकेली क्यों? तुम्हारी बिट्टी कहां है?”
”आती होगी आजी। एम .एन .सी .में है न। सो रात-बिरात आने का कोई समय नहीं। ये नए-नए टैक्नोक्रैट्स – तगड़ा पे-पैकेज देखते हैं बस। वक्त और शरीर नहीं।”
”नई पीढ़ी को लेकर इतनी शंकाएं ठीक नहीं बेटी।”

”ठीक कहती हो बीजी। लेकिन शायद हम लोगों ने संवाद करके नई पीढ़ी को मूल्य और मानवीय दृष्टि दी ही नहीं। नौकरी और कैरियर की दौड़ में समय ही नहीं बचा बच्चों के लिए। उन्हें पहले क्रैच-टी .वी . के संग छोड़ा, फिर अपने संग बदहवास चूहा दौड़ में लगा दिया। वक्त को पहचानने और गढ़ने की तमीज दी ही नहीं।” मैं रुआंसी हो गई, ”बीजी, हम लोग स्पेस देने-पाने की बहुत बात करते हैं, लेकिन शायद देने और पाने की रचनात्मक परिपक्वता हममे है ही नहीं। इसलिए उन सब रूढ़ियों को गले लगा कर बैठे हैं जिनके खिलाफ आप लोगों ने जान की बाजी लगा दी थी।” मैंने पल भर को रुक कर शिवरानी देवी की ओर निहारा, ”अम्मा, गहनों से बेहद चिढ़. थी न आपको। और उससे भी ज्यादा नफरत पति की उस पुरुषवादी सोच से कि औरतें गहनों के लिए पति से लड़ती-क्लेश करती और गहने पाकर रीझती बहुत सुंदर लगती हैं।”

”हां!” शिवरानी देवी ने निम्मो बीजी के दोनों हाथ पकड़ लिए, ”तुम न होतीं बहन तो गहनों की हत्यारी भूमिका को मैं जान ही न पाती। लेकिन कितनों तक तुम्हारी बात पहुंची भला? खुद मेरे पति . . . प्रोग्रेसिव होने के बावजूद औरत को देखने का वही सामंती नजरिया। सामने जीती-जागती औरत गहनों के प्रति स्त्री -मोह के मिथ केा नकार रही है और आप हैं कि उसी को स्त्री -सत्य बना कर उपन्यास लिख रहे हैं, किस्से गढ़ रहे हैं।”
”पचास-साठ के दशक में पैदा होने वाली हमारी पीढ़ी ने भी सादगी को विरासत में पाया लेकिन आज की पीढ़ी . . . अम्मा, मुझे कहते लाज आती है, लेकिन तुम जानो, बिट्टी की आठों उंगलियों में अलग-अलग पत्थरों की अंगूठियां हैं और कानों में तीन-तीन बालियां। बाहों पर टैटूनुमा गोदने अलग से। पत्थरों से किस्मत बदल लेगी लड़की?” मैं आवेश में तन गई।

”निम्मो बीजी, जैसे आपकी साीधी-सच्ची बातों को कड़वा जान गले उतारना मुश्किल हो गया था आपके समकालीनों के लिए, वही हाल हमारे समकालीनों का भी है। आपके नाम और विचारों को निगल कर किताब को दफना दिया था उन्होंने। वैसे ही नारीवादी चेतना से भय खाकर वे स्त्राी को देह बना रहे हैं -चूम-चाट कर थूक दी जाने वाली देह। चेतना जैसी सूक्ष्म व्यंजनाओं के सामने जब दैहिक अलंकरण जैसी स्थूलताएं खड़ी हों, तब वही-वही दिखेंगी न सब ओर। और बीजी, स्तब्ध खड़ी औरत अपने से पूछ रही है कि देह मुक्ति के नाम पर दैहिक तिजारत के अधिकारों के लिए कब लड़ी वह? वह तो चाहती है देह में स्थित मस्तिष्क और हृदय, विवेक और विश्लेषण के सामर्थ्य पर अपना नियंत्राण।”

हम बिट्टी की प्रतीक्षा में हैं। आजकल उसका पति विदेश गया है। इसलिए ऑफिस से सीधे यहीं लौटेगी। सॉरी, पति नहीं, दोस्त! ब्याह नहीं किया न उसके साथ। बस, संग-संग रहते हैं दोनों – बिना किसी अपेक्षा, शर्त और समझौते के। मन मिलने तक रहेंगे संग-संग। फिर? पता नहीं।
”बच्चे? उनका भविष्य?” मैंने धड़कते दिल से पूछा था बहुत पहले।
”हू थिंक्स अबाउट दैम?” बिट्टी डिंक कल्चर में दीक्षित है। इसके बाद संवाद की क्या गुंजाइश बचती भला?
”बात-बात पर आंसू और आशंका! मुझे नहीं रुचता तुम्हारा हाहाकार! रास्ते बंद हैं तो उठो और ज्यादा ताकत लगा कर खोलो।’ शिवरानी देवी बरस पड़ीं, ”कहा न, जंग अपने से ही लडऩी है हमें और जीतना भी अपने को ही है। हमारी सबसे बड़ी बाधा हम स्वयं हैं।”
रख्माबाई मेरे पास आकर बैठ गईं। उनकी उंगली पर मेरी आंख से टपका मोती था। ”तुम लोगों से चूक कहां हुई, जानती हो?”
मैंने आहत प्रश्नाकुल दृष्टि उनकी ओर उठा दी।
”तुम लोगों ने सवाल उठाए, संदेह किए, गलत को खारिज किया। हर गलत को – व्यवस्था, समाज, व्यक्ति, सम्बन्ध, संस्कार। सिर्फ खारिज। उग्र नकार के साथ लेकिन साथ-साथ कुछ नया रचनात्मक तो गढ़ा ही नहीं। अपने दायरे तंग करता चले आदमी तो एक दिन अपने लिए भी जगह नहीं पाता। तुमने मातृत्व, पत्नीत्व, गृहिणीत्व की छवियों में खंड-खंड होने का विरोध करते हुए साबुत मनुष्य बनी रहना चाहा। बहुत ठीक। लेकिन अपने सहयोगी पुरुष – अखंड मनुष्य – से परहेज क्यों किया बेटा? दाम्पत्य और गृहस्थी – तुम दोनों का सपना है तो संयुक्त होकर साझी आंख से इस सपने को क्यों नहीं देखते? मिल कर चार हाथों से उस सपने को साकार क्यों नहीं करते तुम दोनों? नई पीढ़ी के साथ दोस्ती क्यों नहीं? अलग-अलग पालों में बंटने से प्रतिद्वंद्विता बढ़ती है, मिठास नहीं। तुम्हें साझी दुनिया बनना है क्योंकि दायित्व साझे हैं; प्रकृति और सृष्टि पर अधिकार साझे हैं।”

”और दादी अम्मा! जिंदगी हम सबकी साझी प्रयोगशाला भी तो है न।” बिट्टी लौट आई थी। उसने मेरे गले में बाहें डाल दीं, ”बात करने में परले सिरे की कंजूस मेरी मां। सारा दिन जाने किस अबूझ किताबी दुनिया में गुम। लेकिन फिर भी मैंने उनसे सीख ही लिया स्पेस और उसके सदुपयोग का विवेक।” बिट्टी ने मेरी आंखों में सीधे झांका, ”तुम परंपरा और व्यवस्था को जस का तस स्वीकारने की बजाय उसे जांचती रहीं हमेशा! लेकिन संदेह से भर कर हर चीज को परे ठेलते हुए। है न? ” उसने मुझे तोला। मैंने आंखें झुका लीं।
” और मैं . . . उछाह में बौरा कर हर चीज को गले लगाती रही। सही-गलत, सब कुछ चखा, पचाया और फिर जो रुचा, उसे अपना बना लिया। सो सिम्पल!”

न, सिंपल नहीं। यह बिट्टी के किसी जटिल निर्णय की भूमिका है। मैं उसकी आदत जानती हूं। ”कुछ कहना है बेटा?”
वह मुस्करा दी, शर्म से नहाई मुस्कान, ”जैसे ही विनय विदेश से लौटेगा, हम लोग शादी कर लेंगे।”
”अरे!” ब्याह से दूर भागने वाली बिट्टी और ब्याह . . .
”नहीं मां, ब्याह-परिवार किसी से भी इंकार नहीं हमें। इंकार है सम्बन्धों की ऊबड़खाबड़ जमीन पर खड़े होने से। दरअसल साथ-साथ रह कर एक-दूसरे के बरक्स हम अपने को तोल रहे थे, खोज रहे थे। मैंने विनय में पाया अपना सपना – स्त्राी सरीखा कोमल संवेदनशील मन। विनय ने मुझमें साकार देखी अपनी कामना – पुरुष सरीखी विवेकपूर्ण कर्मठता। हम शायद अपने ही अक्स को दूसरे में ढूंढते थे और दूसरे की ताकत को अर्जित कर अपनी कमी पूरने में लगे हुए थे।’
दादी ने आगे बढ़ कर बिट्टी को चूम लिया। मुझे लगा, वहां उपस्थित सभी स्त्रिायां अपनी-अपनी तेजस्विता के साथ बिट्टी में विलीन हो गई हैं।
बिट्टी की दबी मुस्कान फूट पड़ी, ”जानती हो मां, विनय मुझे क्यों पसंद था? क्योंकि उसे देख कर हरे-भरे खेतों में मुंह मारते सांड की याद नहीं आई कभी।”

मैं फिर अपराध बोध से ग्रस्त! बेटे को सांड बनाने के लिए क्या मैं अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ सकती हूं?
बिट्टी अपने अनुभव शेयर कर रही है मुझसे। ”मां, अंधेरा घिरते ही दफ्तर या सड़क के सूनेपन से आज भी घबरा जाती हूं मैं। सामने से कोई लड़का आता दिखे, तो सांप सूंघ जाता है। नहीं, जिसे तुम लोग इज्जत कहते हो, उसके खोने का भय नहीं, लेकिन कोई रौंद दे अकारण . . . थूक दे आपकी शख्सियत पर और आप निरीह कांपते रहें घृणा और बेबसी से भर कर .. . . यह अपमान सालता है मुझे।”
मैं भी क्या इस भय से मुक्त हो पाई हूं?
बिट्टी रोने में ज्यादा वक्त जाया नहीं करती। उसकी आवाज में ओज और चमक दोनों लौट आईं। ”हमने तय किया है मां, हम अपने बच्चों को लड़कियों की तरह गहरी निष्ठा और कन्सर्न के साथ पालेंगे और उन्हें लड़कों सा खुद्दार व्यक्तित्व देंगे। हमने खुद को लैंगिक जकड़न से मुक्त कर लिया है, इसलिए अपनी संतान को मनुष्य बना पाना हमारे लिए आसान हो जाएगा।” वह सपनों के समंदर में दूर तक निकल गई – ”मेरा बेटा अंधेरे का प्रेत बन कर कभी किसी को नहीं डराएगा। पैतृक सम्पत्ति में बराबर का हिस्सा मांगने वाली बहन को तिरस्कार की नजर से नहीं देखेगा। मानव मुक्ति के लिए नारीवाद नाम से लड़ी जाने वाली लड़ाई में बराबर की शिरकत करेगा वह। बल्कि इस लड़ाई को नया नाम देगा – ‘मानवीय अस्मिता की लड़ाई’।”
”मैं जानती हूं, तुम लोग ही मिलजुल कर रचोगे साझी दुनिया के सम्बन्धों की नई सैद्धांतिकी।”

बिट्टी ने असहमति में सिर हिला दिया। ”नहीं मां, सम्बन्ध रचे नहीं जाते, जिए जाते हैं – विश्वास और संवाद के साथ, अनायास भाव से।”
”और संस्कार दिए जाने चाहिएं बेहद सजग-सचेत ढंग से – मनुष्य बनने का संस्कार और उतने ही सजग-सचेत होकर पूर्वग्रहों से लड़ते वे संस्कार अपने भीतर उतार लिए जाने चाहिएं। तैराकी सीखने की तरह पहले पहल बेहद श्रमसाध्य प्रशिक्षण होगा यह, लेकिन फिर रिलैक्स करने का सरलतम उपाय भी।” मुझे अपनी चूक समझ में आने लगी थी।
रोज-रोज अलक्षित सी टूट-फूट के साथ घर, परिवार और समाज में जो जुड़ रहा है धीरे-धीरे, वह नयापन ही तो है। कुछ ग्राह्य! कुछ अग्राह्य! उदार संवेदनशील दृष्टि के साथ इसका चयन और अभिषेक करना क्या मेरा दायित्व नहीं?

सच्चे अर्थों मे जनकवि थे नामदेव ढसाल

 एच . एल दुसाध 


15 फरवरी,1949 को पुणे के निकट ‘पुर’ ग्राम में जन्मे तथा मुंबई के ‘कमाठीपुरा’ और ‘गोलपीठा’ के रेड लाईट एरिया में पले-बढे विश्व कवि नामदेव लक्ष्मण ढसाल गत वर्ष आंत के कैंसर से जूझते हुए 15 जनवरी की सुबह मुंबई के बॉम्बे हॉस्पिटल में जीवन युद्ध हार गए थे.उनके परिनिवृत होने के बाद किस तरह मुंबई के लोगों ने शेष विदाई दिया था इसका आकलन चर्चित कवि  विष्णु खरे द्वारा इस लेखक को भेजे गए उस इ-मेल सन्देश से लगाया जा सकता है जिसमें उन्होंने लिखा था-‘पता नहीं आपने नामदेव की शवयात्रा के चित्र देखे हैं या नहीं ,किन्तु वह एक बड़े नेता के सम्मान जैसी निकली थी.उसमें करीब साठ हजार लोग शामिल हुए थे.मुंबई का ट्रैफिक रुक गया था.दिल्ली में हिंदी के साठ लेखकों की यदि एक साथ मृत्यु हो जाय तो उसमें 600 से ज्यादा लोग नहीं आयेंगे और जो आएंगे उनमें भी अधिकांश पारिवारिक लोग होंगे’.

नामदेव ढसाल

 तो यह थे अवाम पर बहुत गहरा प्रभाव छोड़ने वाले पद्मश्री नामदेव ढसाल जिनका जाना डॉ.आंबेडकर और कांशीराम के बाद दलित आन्दोलन की सबसे बड़ी क्षति थी.कारण,वे इन दोनों के बीच के सेतु थे.बहुतों को विश्वास नहीं होगा कि दलित राजनीति पर अविस्मर्णीय छाप छोड़ने वाले कांशीराम ने कभी अपने से पन्द्रह साल छोटे ढसाल के नेतृत्व में कुछ समय काम किया था.बहरहाल  उनकी बहुत बड़ी त्रासदी यह रही कि वे दलित और मुख्यधारा,दोनों ही समुदाय के बुद्धिजीवियों की उपेक्षा के बुरी तरह शिकार रहे.दलित बुद्धिजीवी जहां उनकी जीवन की शेष बेला में शिवसेना से बने  रिश्तों के कारण उन्हें डॉ.आंबेडकर और कांशीराम की पंक्ति में स्थान देने में व्यर्थ रहे,वहीँ जिस-तिस को गाँधी-जेपी बना देने वाले मुख्यधारा के बुद्धिजीवी भी उनको योग्य सम्मान न दे सके.उन्होंने जिस तरह नोबेल विजेता टैगोर और नायपाल इत्यादि के मुकाबले अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितियों में रहकर साहित्य और राजनीति के क्षेत्र में विश्व स्तरीय कार्य किया था,उसे अगर सही तरीके से सामने लाया गया होता,अवश्य ही भारत के खाते में एक और नोबेल विजेता का नाम जुड़ जाता.
वैसे तो विषम परिस्थितियों में रहकर ढेरों लोगों ने अपनी प्रतिभा से दुनिया को विस्मित किया है,पर, ‘कमाठीपुरा’ और ’गोल पीठा’ जैसे धरती के नरक से निकल कर ढसाल जैसी कोई अन्य विश्व स्तरीय शख्सियत शायद ही सामने आई. एक बुचडखाने के साधारण कर्मचारी की संतान ढसाल रेड लाईट एरिया में रहते एवं टैक्सी ड्राइवरी से लेकर छोटी-मोटी नौकरियां करते हुए अपना कविता कर्म जारी रखे.जिस रेड लाईट इलाके में ढसाल पले-बढ़े थे,वहां रहते हुए अंततः सब कुछ तो बना जा सकता था,पर विश्व स्तरीय कवि नहीं.खुद ढसाल ने लिखा है कि अगर कविता मुझे नहीं खींचती तो मैं टॉप लेवल का गैंगस्टर या स्मगलर होता या फिर किसी चकला घर का मालिक.किन्तु उनके अन्दर का कवि जीत गया और महानगरीय अधोलोक ने उन्हें एक ऐसे विद्रोही कवि के रूप में जन्म दिया,जिसने अभिजनों की भाषा और व्यवस्था पर शक्तिशाली प्रहार किया.

नामदेव ढसाल की कविता

उनकी कविता की शायद इन्ही खूबियों ने कुछ साल पहले कवि विष्णु खरे को यह उद्गार व्यक्त करने के लिए प्रेरित किया था -“अगर कविता का लक्ष्य मानव जाति की समस्यायों का समाधान ढूंढना है तो ढसाल ,टैगोर से ज्यादा प्रासंगिक और बड़े कवि हैं.अंतर्राष्ट्रीय कविता जगत में भारतीय कविता के विजिटिंग कार्ड का नाम नामदेव ढसाल है.उन्होंने कविता की संस्कृति को बदला है;कविता को परम्परा से मुक्त किया एवं उसके आभिजात्यपन को तोडा है.संभ्रांत कविता मर चुकी है और इसे मारने का काम ढसाल ने किया है.आज हिंदी के अधिकांश सवर्ण कवि दलित कविता कर रहे हैं तो इसका श्रेय ढसाल को जाता है.ढसाल ने महाराष्ट्र के साथ देश की राजनीति को बदलकर रख दिया है.ऐसा काम करनेवाला भारत में कोई और कवि नहीं हुआ.’
लेकिन क्या सिर्फ भारत!नहीं,दुनिया में एक से बढ़कर एक कवि हुए पर,किसी भी विश्वस्तरीय कवि ने दलित पैंथर जैसा उग्र राजनीतिक संगठन नहीं बनाया.अवश्य ही वैचारिक लेखन करने वाले कुछ लेखक स्वतंत्र रूप से ऐसा संगठन बनाने में सफल रहे,पर अपवाद रूप से ढसाल को छोड़कर कोई अन्य बड़ा कवि नहीं.उन्होंने कैसा संगठन खड़ा किया था,उसका जायजा लेने के लिए हमें एक बार दलित पैंथर की भूमिका का सिहावलोकन कर लेना चाहिए.

अब से चार दशक पूर्व जब भारत के पूर्वी हिस्से में नक्सलवाद सुविधासंपन्न वर्ग में भय का संचार कर रहा था,उन्ही दिनों 9 जुलाई 1972 को पश्चिम भारत में 23 साल के युवा ढसाल ने ‘दलित पैंथर’ जैसे विप्लवी संगठन की स्थापना की.इस संगठन ने डॉ.आंबेडकर के बाद मान-अपमान से बोधशून्य दलित समुदाय को नए सिरे से जगाया.इससे जुड़े प्रगतिशील विचारधारा के दलित युवकों ने तथाकथित आंबेडकरवादी नेताओं की स्वार्थपरक नीतियों तथा दोहरे चरित्र से निराश हो चुके दलितों में नया जोश भर दिया जिसके फलस्वरूप उनको अपनी ताकत का अहसास हुआ तथा उनमें ईंट का जवाब पत्थर से देने की मानसिकता पैदा हुई.इसकी स्थापना के एक महीने बाद ही ढसाल ने यह घोषणा कर-‘यदि विधान सभा या संसद सामान्य लोगों की समस्यायों को हल नहीं करेगी तो पैंथर उन्हें जलाकर राख कर देंगे’-शासक दलों में हडकंप मचा दिया.

नामदेव ढसाल की अंतिम यात्रा में उमडा हुजूम

दलित पैंथर के निर्माण के पृष्ठ में अमेरिका के उस ब्लैक पैंथर आन्दोलन से मिली प्रेरणा थी जो अश्वेतों को उनके मानवीय,सामाजिक,आर्थिक व राजनैतिक अधिकार दिलाने के लिए 1966 से ही संघर्षरत था.उस आन्दोलन का ढसाल और उनके क्रन्तिकारी साथियों पर इतना असर पड़ा कि उन्होंने ‘ब्लैक पैंथर’ की तर्ज़ पर दलित मुक्ति के प्रति संकल्पित अपने संगठन का नाम ‘दलित पैंथर’ रख दिया.जहाँ तक विचारधारा का सवाल है पैन्थरों ने डॉ.आंबेडकर की विचारधारा को न सिर्फ अपनाया बल्कि उसे विकसित किया तथा उसी के अनुसार संगठन का निर्माण किया.यद्यपि यह संगठन अपने उत्कर्ष पर नहीं पहुंच पाया तथापि इसकी उपलब्धियां गर्व करने लायक रहीं.बकौल चर्चित मार्क्सवादी चिन्तक आनंद तेलतुम्बडे ,’इसने देश में स्थापित व्यवस्था को हिलाकर रख दिया और संक्षेप में बताया कि सताए हुए आदमी का आक्रोश क्या हो सकता है.इसने दलित राजनीति को एक मूल्यवान अंतर्दृष्टि प्रदान की जोकि पहले बुरी तरह छूटी थी.अपने घोषणापत्र पर अमल करते हुए पैन्थरों ने दलित राजनैतिक मुकाम की खातिर परिवर्तनकामी अर्थो में नई जमीन तोड़ी.उन्होंने दलितों को सर्वहारा परिवर्तनकामी वेग की पहचान प्रदान की तथा उनके संघर्ष को दुनिया के अन्य दमित लोगों के संघर्ष से जोड़ दिया.’ बहरहाल कोई चाहे तो दलित पैंथर की इन उपलब्धियों को ख़ारिज कर सकता है किन्तु दलित साहित्य के विस्तार में इसकी भूमिका को नज़रंदाज़ करना संभव नहीं है.

दलित पैंथर और दलित साहित्य एक ही सिक्के के दो पहलूँ हैं.इसकी स्थापना करनेवाले नेता पहले से ही साहित्य से जुड़े हुए थे.दलित पैंथर की स्थापना के बाद उनका साहित्य शिखर पर पहुँच गया और देखते ही देखते मराठी साहित्य के बराबर स्तर प्राप्त कर लिया .परवर्तीकाल में डॉ.आंबेडकर की विचारधारा पर आधारित पैन्थरों का मराठी दलित साहित्य हिंदी पट्टी सहित अन्य इलाकों को भी अपने आगोश में ले लिया.दलित साहित्य को इस बुलंदी पर पहुचाने का सर्वाधिक श्रेय ढसाल को ही जाता है. धरती के नरक में रहकर उन्होंने जीवन के जिस श्याम पक्ष को लावा की तरह तपती कविता में उकेरा,वह दलित ही नहीं,विश्व साहित्य की अमूल्य धरोहर है.

(लेखक ‘टैगोर बनाम ढसाल’ और ‘महाप्राण नामदेव ढसाल’  पुस्तकों के रचनाकार हैं.  भारत मे डायवर्सिटी सिद्धांत लागू होने के लिए प्रयासरत सिद्धांतकार हैं  )

किले में समंदर : पहली क़िस्त

रोहिणी अग्रवाल

रोहिणी अग्रवाल स्त्रीवादी आलोचक हैं , महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं . ई मेल- rohini1959@gmail.com

( रोहिणी अग्रवाल की यह अभिव्यक्ति अतीत से वर्तमान और वर्तमान से अतीत की आवाजाही है , स्वप्न -कल्पना और यथार्थ के परस्पर गुम्फन के साथ . स्त्री के संघर्ष और पीड़ा तथा मुक्ति के अहर्निश अभियान की कथा पढ़ें दो किस्तों में  ) 


बेहद भीत सशंकित एकाकिनी मैं।


चाहती हूं ढेर सारा संवाद – मन से मन के तारों को जोड़ कर भीतर तक दरके बंजर को सुकून और विश्वास की तरलता से सींच देने वाला संवाद। ऐसी बतकही कि मन के सारे उद्वेग, द्वंद्व और तनाव बिला जाएं कहीं। बिला जाएं वे सारे भय और अंतर्विरोध जिनकी उलझी परतों तले अपने को दाब-ढापं कर अपने को ही मुद्दत से नहीं निहार पाई हूं मैं। मैं अस्वस्थ हूं – और अशांत! उपचार सिर्फ संवाद – बस, धीरज से सुन भर ले कोई। पूरे विश्वास और स्नेह के साथ, आत्मीयता और तन्मयता के साथ। न, तर्क की भाषा नहीं सुहाती मुझे। वह याज्ञवल्क्य की भीषण गर्जना बन कर मेरी समूची स्वतः स्फूर्त अस्मिता पर गार्गी को चस्पां कर कहीं हांक ले जाती है।

मेरे भीतर के हर रग-रेशे में समंदर का गहन विस्तार है। ऐसी अभिशप्तता कि समंदर का आलोड़न और गर्जन-तर्जन सब कुछ अंदर ही अंदर जब्त करने को बाध्य। आंखों की राह समंदर का खारा मूक हाहाकार बह जाता है कभी-कभार। संवाद का पुल बन जाए तो कितने ही समंदरों को लांघ ले इंसान। लेकिन पुलों के निर्माण के इतिहास में व्यापारिक नीतियां या विजय अभियान ही क्यों आ जुड़ते है। बार-बार?

पुल – यानी फोन – मैं बेतहाशा नम्बर घुमाती हूं – इसका नंबर, उसका नंबर। बात नहीं करूंगी तो घुट कर मर जाऊँगी। मैं नहीं चाहती लेडी ऑव शैलोट की तरह दुनिया की ओर से पीठ मोड़ कर परंपरा और विरासत की सलीब ढोते रहना। दूसरों की नजर और लब से छन कर आते नजारे और लफ्ज मेरे अपने क्यों हों? मैं – कुछ न होऊँ – ‘मैं’ तो हूं न। अपने अंदर जीते साबुत अखंड विराट सत्य, शिव, सुंदर के साथ। मैं – एक स्त्री ! सृष्टि की एक बूंद!

लेकिन संवाद के नाम पर बर्फीली चुप्पी या गंधाता कीचड़ . . . न! न!! न!!!


मैं बिफर कर रेशा-रेशा फैल गई। समंदर का खारा हाहाकार मेर कुल सत्य क्यों? समंदर के भीतर के रहस्यमय समृद्ध संसार से मुझे भय क्यों? मैं उतरूंगी भीतर . . . और भीतऱ . . उहूं, घबराहट क्यों भला? नवजात मछली को गोताखोरी का प्रशिक्षण नहीं लेना पड़ता न!

भावाकुलता का अतिरेक व्यक्ति को बचकाना बना देता है, या फिर जाबांच खिलाड़ी। मैंने आव देखा न ताव, समंदर की बालू पर अपनी चाहत की इबारत लिख डाली – ”चाहती हूं अनंत प्रशांत सघन संवाद-तरणी पर सवार होकर भीषण घ्ंघावात से घिरे, हिमखंडों से अटे समंदर का दूसरा छोर छू लूं। हमराही है कोई? कहीं?”

तभी मेरे किले का घंटा जोरों से घनघना उठा। साढ़े आठ बजे का अलार्म। शाम के साढ़े आठ! खाना बनाने का वक्त! यानी छः से साढ़े आठ के बीच की वह मियाद खत्म जब किले के सुरंगी रास्ते से बाहर मैं समुदर की सैर को निकल सकती थी। अब मैं गृहिणी हूं, पत्नी हूं, मां हूं। त्योहारों का सीजन शुरु हो गया है और हर रोज मुझे पकवानों की नई वैरायटी परोसनी है। नून तेल लकड़ी में देर तक पकती-खदबदाती रही मैं। गृहिणी, पत्नी, मां बन जाने के बाद मद्धम आंच पर सिंझने का सुख पोर-पोर में आत्मप्रवंचक मादक आलस्य पिरो देता है।

‘डोंगी तैयार है। आओ, समुद्र का दूसरा छोर छूने चलें।’ किसी ने मेरे कंधे पर नरम हाथ रख दिया। मैं चिहुंक उठी। गहरी नींद में थी। मुस्करा भर दी – ‘डोंगी से समुद्र का दूसरा छोर नहीं छुआ जा सकता। पागलपन है, निरा पागलपन!’
‘और बालू पर सपनों की इबारत लिख कर हमराही को टेरना?’
‘पागलपन! निरा पागलपना!’ मैंने दोहरा दिया।
नींद की मिठास में खोने का जो सुख है, वह पाने के संघर्ष में कहां? मैं नहीं चीन्हती कोई राह! नहीं चाहती कोई हमराही!
सपने में देखा – दुर्गा-अष्टमी के अवसर पर मैं – गृहिणी – आठ कन्याओं को कंजक बना कर खाना खिला रही हूं। नौवीं कंजक तो है ही नहीं। मेरे हाथ-पैर फूल गए हैं। सात या नौ! आठ की गिनती शुभ काम में शुभ नहीं मानी जाती। तभी नवीं कंजक के रूप में मैंने अपने आप को आते देखा – सात बरस की मैं। गृहिणी कंजकों की प्लेटों में हलवा-पूड़ी और हाथ में दक्षिणा रख रही है। वह मुझ कंजक के बढ़े हाथ पर कुछ रखे कि कंजक मैं रोती हुई वहां से भाग लेती है। सारा दृश्य जैसे वहीं फ्रीज हो गया है। मां दुर्गा का अपमान! गृहस्थी पर अनिष्ट की आशंका! अपने परिवार की खैर मनाते मन ही मन मैं उस कंजक को कोस रही हूं – बित्ते भर की छोकरी अपशकुन करके चली गई। मैं देख रही हूं कंजक-मैं मां की गोद में मुंह छिपाए जार-जार रोए जा रही है।

”क्यों मां, तुम रोई क्यों?” मेरी बिट्टी मुझ से पूछ रही है – ”तुम्हें मजा नहीं आता था घर-घर जाकर प्रसाद और दक्षिणा लेने में? हाय! मैं तो कितना बेसब्री से इंतजार करती थी इस त्योहार का। अ लॉट ऑव फन!”
हम मां-बेटी स्थिति का विस्तार नहीं, विलोम हैं। शायद संवाद का वह बिंदु गायब है जो सपनों को सहारे संकल्प की डोर से मनुष्यों को बांधा करता है। इस अनुपस्थिति के दोषारोपण के लिए मैं किसकी ओर उंगली उठाऊँ? एक उंगली उठा लूंगी  तो भी तीन मेरी ओर ही रहेंगी न! क्या मैं तिहरा ट्रायल झेल सकती हूं?

सुबह उठी तो सिर भारी था और दिमाग में ठक-ठक बजता सवाल कि कंजक बन कर आत्मतुष्ट लौटने की बजाय मैं रोई क्यों? रोई सो रोई, मुंह छिपा कर भागी क्यों? रोने और भागने से तो किसी समस्या का समाधान नहीं होता। रोना माने लाचारगी। भागना माने कायरता। मैं कमर कस कर आत्म-भर्त्सना के लिए तैयार!
”नहीं! दुनियादारी का बूढ़ा चश्मा चढ़ा कर देखोगी तो जिंदगी में नया कुछ नहीं मिलेगा। रोना और भागना हमेशा कायरता के लक्षण नहीं होते। वे विरोध दर्ज करने के औजार भी होते हैं।”
मैं चौंक पड़ी।
असम्भव!
”मां दुर्गा! आप?”
”विरोध दर्ज करने के लिए जरूरी है चेतना। चेतना संवेदना और विवेक के बिना पैदा नहीं होती।”
मैं जड़! भगवान को सामने देख किसकी सिट्टी-पिट्टी गुम न हो जाए?
मां दुर्गा की आवाज लरज उठी – ”संवेदना और विवेक के घालमेल से ही बनता है इंसान। अपने को पूरी कुव्वत और ताकत के साथ दर्ज करने वाला इंसान। हर शै को सिरजने वाला इंसान।”
मैं काठ!
”’मुझे देखो, न रो सकती हूं, न गलत को बरज सकती हूं। चलना तो कभी सीखा ही नहीं। कलेजे पर वर्जनाओं के पत्थर रखते-रखते पथरा गई हूं बिल्कुल। पूजा और दुत्कार – पत्थर के सामने कोई मानी नहीं रखते।” मैंने देखा मां दुर्ग की पथरीली  आंख की कोर भाीग आई – ”काश! मैं तुम्हारी तरह अपनी मनोवृत्तियों के साथ जी पाती! रग-रग में चटकते आवेश और आक्रोश के साथ अपने को ही मथ डालती। अपने को मथे बिना मर्म नहीं पाया जा सकता बेटी। लेकिन तुम मंथन की त्वरा उत्पन्न करती मथानी को रोक कर खुद बंध क्यों जाती हो? मुक्त होना सीखो। और विकसित होना भी। आत्मदाह अभिशाप है। इसे सूरज का ताप बना कर सृष्टि को लहलहाया नहीं जा सकता।”

मैं फूट-फूट कर रो पड़ी। धारासार! सात बरस की उम्र से लेकर पचास बरस की उम्र के आंसुओं की बरसात! ”अब कह रही हो ऐसा! जाने कितनी ही सृष्टियों को तबाह करके! तुम . .  तुम ही तो मेरे अपमान का मूल कारण हो। साल दर साल. . . बल्कि साल में दो-दो बार! दुर्गा अष्टमी के बहाने मुझे हर बार सात साल की कंजक में तब्दील करतीं तुम . . . ” मैं आवेश, क्रोध और घृणा से कांपने लगी।
दुर्गा निर्विकार! न स्तम्भ, न अवसाद! माने जानती हो अपने अपराध की सघनता और परिणाम!
”क्या लड़की की रोटी परिवार पर इतनी भारी पड़ती है कि बचपन से ही उसे दूसरों के द्वार पर जाकर टुकड़े बटोरने का अभ्यास कराया जाए? क्या उसके आत्मसम्मान और आत्माभिमान का कोई मूल्य नहीं? वह याचक भर है? या बोझ से लदी पाप की गठरी जिसे इस-उस के गले मढ़ कर परिवार का पुरुष अपने कंधे हल्के करता फिरे? तुम नहीं जानतीं मां, मैं कितनी नफरत करती हूं तुमसे! तुम्हारे छद्म से!”

घृणा के उफान में हमेशा घृणा नहीं हुआ करती। प्यार, अपेक्षा, दूरी और दर्द का अतिरेक भी हुआ करता है।
”कन्याओं पर देवी मां का आरोपण ‘ ‘ ‘ जानती हो, यह प्रवंचक महिमामंडन कैसी-कैसी अभेद्य दीवारें खड़ी करता है चहुं ओर कि  ‘ ‘ ‘ ” मैं आवेश में हकला पड़ी। संयत होने का प्रयास किया तो रुआंसी हो उठी -”हर बार दूसरों के घर से खाना और दक्षिणा लेकर खुशी से किलकती लड़की को देख कर मैं कितना-कितना लहूलूहान हो जाती हूं – कृपा और खुद्दारी का फर्क इतना महीन नहीं हुआ करता कि नंगी आंख से देखा न जाए। तो क्या महिमामंडन अमोघ मूर्च्छा का संचार करता है?”
”हर मूर्च्छा के लिए कोई न कोई संजीवनी बूटी तैयार करती है प्रकृति। लेकिन बिटिया, क्या मूर्च्छितों के बीच तुम खुद मूर्च्छितवत् नहीं रहीं?”
मुझ पर घड़ों पानी! क्रॉस एग्जामिनेशन! क्या बिट्टी को कभी सीने से लगा कर बताया देवी और इंसान होने का फर्क? देवी होने की जडता! इंसान होने की ताकत! जरूरत! हमेशा चाहती रही हूं कि मेरी जमीन पर मेरी मानसिक-बौद्धिक ऊँचाई तक आकर संवाद करे कोई। दूसरे की जमीन पर उसकी कद-काठी लेकर संवाद करने की जरूरत क्यों महसूस नहीं की मैंने? संवद का अभ्यास ही नहीं शायद। है तो सजगता के थोथे दंभ का लाउड प्रकटीकरण और उसके साथ गुत्थमगुत्थ पारंपरिक अनुदेशों की तत्पर पालना का बीभत्स सत्य! क्या हूं मैं? अंतर्विरोधों का पुलिंदा? निष्क्रियता को चाव के साथ जीती मूढ़ता?

चेतना का अर्थ चिंतन-मनन के बाद अर्जित बौद्धिक समृद्धि का एकांत विलास नहीं होता। संज्ञान और विश्लेषण के बाद ही चेतना गति पाती है – पानी की तरह मिट्टी के कण-कण में समो कर उसे तरल करती। मैं तैंतालीस बरस तक कंजक बनने के जिस टीसते अभिशाप को कलेजे में लिए हूं, क्या उसे परिवार-समाज में एक भी व्यक्ति तक बांट पाई हूं? क्यों हर रक्षाबंधन, करवा चौथ, अहोई अष्टमी पर अकेले बिसूरती हूं कि रक्षणीया मैं ही क्यों? मैं – बहन, पत्नी, मां। मुझसे मिले भावनात्मक सम्बल के बिना क्या मेरा भाई, पति, पुत्रा परिपूर्ण-परितृप्त हो पाएगा? पूर्णता और तृप्ति क्या आदान-प्रदान की सतत संवेदनशील मानवीय प्रक्रिया नहीं? फिर पालों के आरपार लिंगों में बंटी मानवीय अस्मिताएं क्यों? लैंगिक विभाजन क्या सबसे पहले मनुष्यता को ही छिन्न-भिन्न नहीं करता? लैंगिक विभाजन के आधार पर सम्बन्ध नहीं बनते, बनता है सम्बन्धों का सत्ता विमर्श। मैं इस सत्ता विमर्श के निहित मंतव्यों को पहचानती हूं, लेकिन उन्हें बेनकाब नहीं करती। मेरी चुप्पी क्या वर्चस्ववादियों की ताकत नहीं बनती? फिर क्यों नहीं बताया बिट्टी को कि त्योहार धर्म का उत्सवीकरण नहीं हुआ करते, धार्मिक अनुदेशों को व्यावहारिक रूप देने का क्रूर समादेश हुआ करते हैं।

स्त्री जागृति की पहली मशाल : सावित्रीबाई फुले

सुधा अरोड़ा

सुधा अरोड़ा सुप्रसिद्ध कथाकार और विचारक हैं. सम्पर्क : 1702 , सॉलिटेअर , डेल्फी के सामने , हीरानंदानी गार्डेन्स , पवई , मुंबई – 400 076
फोन – 022 4005 7872 / 097574 94505 / 090043 87272.

( ३ जनवरी को सावित्रीबाई फुले जयंती पर विशेष .  उनकी जयंती अवसर पर स्त्रीकाल ने सुप्रसिद्ध स्त्रीवादी चिन्तक शर्मिला रेगे को ‘ सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान‘  (खबर के लिए लिंक पर क्लिक करें ) देने  की घोषणा की है. ) 

सावित्रीबाई फुले का जीवन कई दशकों से महाराष्ट्र के गाँव कस्बों की औरतों के लिए प्रेरणादायक रहा है। उनकी जीवनी एक औरत के जीवट औेर मनोबल को समर्पित है। सावित्रीबाई फुले के कार्यक्षेत्र और तमाम विरोध और बाधाओं के बावजूद अपने संघर्ष में डटे रहने के उनके धैर्य और आत्मविश्वास ने भारतीय समाज में स्त्रियों की शिक्षा की अलख जगाने की महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे प्रतिभाशाली कवयित्री, आदर्श अध्यापिका, निस्वार्थ समाजसेविका और सत्य-शोधक समाज की कुशल नेतृत्व करने वाली महान नेता थीं।

महाराष्ट्र के सतारा जिले में सावित्रीबाई का जन्म ३ जनवरी सन १८३१ में हुआ। इनके पिता का नाम खंडोजी नवसे पाटिल और माँ का नाम लक्ष्मी था। १८४० में ९ वर्ष की अवस्था में उनका विवाह पूना के ज्योतिबा फुले के साथ हुआ। इसके बाद सावित्री बाई का जीवन परिवर्तन आरंभ हो गया। वह समय दलितों और स्त्रियों के लिए नैराश्य और अंधकार का समय था। समाज में अनेक कुरीतियाँ फैली हुई थीं और नारी शिक्षा का प्रचलन नहीं था। विवाह के समय तक सावित्री बाई फुले की स्कूली शिक्षा नहीं हुई थी और ज्योतिबा फुले तीसरी कक्षा तक पढ़े थे। लेकिन उनके मन में सामाजिक परिवर्तन की तीव्र इच्छा थी। इसलिये इस दिशा में समाज सेवा का जो पहला काम उन्होंने प्रारंभ किया, वह था अपनी पत्नी सावित्रीबाई को शिक्षित करना। सावित्रीबाई की भी बचपन से शिक्षा में रुचि थी और उनकी ग्राह्य शक्ति तेज़ थी। उन्होंने स्कूली शिक्षा प्राप्त की और अध्यापन का प्रशिक्षण लिया।

महाराष्ट्र  के पेशवाकालीन समाज में धार्मिक और सामाजिक वातावरण में पाखंड और अंधविश्वास  अपने चरम पर था । चमार, मांग, वाल्मीकि, महार जैसी अछूत मानी जाने वाली जातियों की दुर्दशा  का आलम यह था कि इन जातियों के  लोगों को कमर के पीछे झाड़ू या या कंटीली झाड़ी बांधकर भी चलना पड़ता था,  जिससे कि रेत या सड़क पर बने उनके पांव के निशान मिटते चले जाएं ताकि किसी ब्राह्मण का पांव उनपर न पड़े । उन्हें अपने गले में हंडिया या मटकी लटकाकर चलना पड़ता था ताकि वह उसमें ही थूकें , सड़क पर नहीं जिससे ब्राह्मणों के अपवित्र होने का खतरा न रहे । वे लोग सिर्फ़ तपती दोपहरी में घर से बाहर निकल सकते थे क्यों कि सुबह शाम उनकी लंबी परछाईं किसी ब्राह्मण को अपवित्र कर सकती थी । किसी ज़रूरी काम से अगर बाहर निकलना ही पड़ता तो वह एक हाथ से थाली, दूसरे हाथ से पत्थर से टन टन बजाते हुए अपने आने की सूचना देते हुए चलते । अछूत मानी जाने वाली जातियों के वजूद को किस तरह रौंदा जाता था , इसका सिर्फ़ अनुमान ही लगाया जा सकता है । पेशवा बाजीराव द्वितीय निहायत स्वेच्छाचारी , व्यभिचारी और लंपट था । उसके व्यभिचार के किस्से इतने कुख्यात थे कि उसके दौरे की खबर मिलते ही पूना से लगभग सौ किलोमीटर दूर वाई नामक गांव की कई स्त्रियों ने कुंए में कूदकर जान दे दी ।

1 जनवरी 1818 में दलित विरोधी ब्राह्मणों के समर्थक पेशवा राज्य का अंत हुआ और अंग्रेज़ी हुकूमत कायम हो गई । ज्योतिबा फुले ईसाई मिशनरियों की पाठशाला में पढ़ने जाते थे । समाज के दबाव में उनके पिता ने पाठशाला से निकाल कर उन्हें खेती करने में लगा दिया । 1842 में सरकारी स्कूल में दाखिला लेकर उन्होंने दोबारा पढ़ाई शुरू  की ।सावित्रीबाई के बचपन की एक घटना मशहूर है । छह सात साल की उम्र में वह हाट बाजार अकेले ही चली जाती थी । एकबार सावित्री शिखल गांव के हाट में गई । वहां कुछ खरीद कर खाते- खाते उसने देखा कि एक पेड़ के नीचे कुछ मिशनरी स्त्री -पुरुष गा रहे हैं । एक लाटसाहब ने उसे रुककर गाना सुनते और खाते हुए देखा तो कहा -‘इस तरह रास्ते में खाते-खाते घूमना अच्छी बात नहीं है‘ सुनते ही सावित्री ने हाथ का खाना फेंक दिया । लाट साहब ने कहा – बड़ी अच्छी लड़की हो तुम । यह किताब ले जाओ , तुम्हें पढ़ना नहीं आता तो भी इसके चित्र तुम्हें अच्छे लगेंगे ।’’ घर आकर सावित्री ने वह किताब अपने पिता को दिखाई । आगबबूला होकर पिता ने उसे कूड़े में फेंक दिया -‘‘ ईसाइयों से ऐसी चीज़ें लेकर तू भ्रष्ट  हो  जाएगी और सारे कुल को भ्रष्ट  करेगी । तेरी शादी कर देनी चाहिये ।’’ सावित्री ने किताब उठाकर चुपचाप एक कोने में छुपा दी । 1840 में जोतिबा के साथ विवाह होने पर वह उस किताब को सहेज कर ससुराल ले आई और शिक्षित होने के बाद उस पुस्तक को मनोयोग से पढ़ा ।

सावित्री-ज्योतिबा दम्पति ने इसके बाद अपना ध्यान समाज-सेवा की ओर केन्द्रित किया। १ जनवरी सन १८४८ को उन्होंने पूना के बुधवारा पेठ में पहला बालिका विद्यालय खोला। यह स्कूल एक मराठी सज्जन भिंडे के घर में खोला गया था। सावित्रीबाई फुले इस स्कूल का प्रधानाध्यापिका बनीं। इसी वर्ष उस्मान शेख के बाड़े में प्रौढ़-शिक्षा के लिए एक दूसरा स्कूल खोला गया। दोनों संस्थाएँ अच्छी चल निकलीं। दबी-पिछड़ी जातियों के बच्चे, विशेषरूप से लड़कियाँ , बड़ी संख्या में इन पाठशालाओं में आने लगीं। इससे उत्साहित होकर  ज्योतिबा दम्पति ने अगले ४ वर्षों में ऐसे ही १८ स्कूल विभिन्न स्थानों में खोले।

सावित्री-ज्योतिबा दम्पति ने अब अपना ध्यान बाल-विधवा और बाल-हत्या पर केन्द्रित किया. उन्होंने विधवा विवाह की परंपरा प्रारंभ की और २९ जून १८५३ में बाल-हत्या प्रतिबंधक-गृह की स्थापना की. इसमें विधवाएँ अपने बच्चों को जन्म दे सकती थी और यदि शिशु को अपने साथ न रख सकें तो उन्हें यहीं छोड़कर भी जा सकती थीं। इस अनाथालय की सम्पूर्ण व्यवस्था सावित्रीबाई फुले सम्भालती थी और बच्चों का पालन पोषण माँ की तरह करती थीं। उनका ध्यान खेत-खलिहानों में काम करने वाले अशिक्षित मजदूरों की ओर भी गया।
१८५५ में ऐसे मजदूरों के लिए फुले दंपत्ति ने रात्रि-पाठशाला खोली. उस समय अस्पृश्य जातियों के लोग सार्वजानिक कुएँ से पानी नहीं भर सकते थे . १८६८ में अंततः  उनके लिये फुले दंपत्ति ने अपने घर का कुआँ खोल दिया। सन १८७६-७७ में पूना नगर आकाल की चपेट में आ गया। उस समय सावित्री बाई और ज्योतिबा दम्पति ने ५२ विभिन्न स्थानों पर अन्न-छात्रावास खोले और गरीब जरूरतमंद लोगों के लिये मुफ्त भोजन की व्यवस्था की।

ज्योतिबा ने स्त्री समानता को प्रतिष्ठित करने वाली नई विवाह विधि की रचना की। उन्होंने नये मंगलाष्टक (विवाह के अवसर पर पढ़े जाने वाले मंत्र) तैयार किए। वे चाहते थे कि विवाह विधि में पुरुष प्रधान संस्कृति के समर्थक और स्त्री की गुलामगिरी सिद्ध करने वाले जितने मंत्र हैं, वे सारे निकाल दिए जाएँ। उनके स्थान पर ऐसे मंत्र हों,  जिन्हें वर-वधू आसानी से समझ सकें। ज्योतिबा के मंगलाष्टकों में वधू वर से कहती है -‘‘स्वतंत्रता का अनुभव हम स्त्रियों को है ही नहीं। इस बात की आज शपथ लो कि स्त्री को उसका अधिकार दोगे और उसे अपनी स्वतंत्रता का अनुभव करने दोगे। ’’ यह आकांक्षा सिर्फ वधू की ही नहीं, गुलामी से मुक्ति चाहने वाली हर स्त्री की थी।

कहते हैं – एक और एक मिलकर ग्यारह होते हैं। ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले ने हर स्तर पर कंधे से कंधा मिलाकर काम किया और कुरीतियों, अंध श्रद्धा और पारम्पारिक अनीतिपूर्ण रूढ़ियों को ध्वस्त कर गरीबों – शोषितों के हक में खड़े हुए। १८४० से १८९० तक पचास वर्षो तक ज्योतिबा और सावित्रीबाई ने एक प्राण होकर समाज सुधार के अनेक कामों को पूरा किया।

ज्योतिबा-दम्पति संतानहीन थे। उन्होंने १८७४ में काशीबाई नामक एक विधवा ब्राहमणी के नाजायज बच्चे को गोद लिया। यशवंतराव फुले नाम से यह बच्चा पढ़लिखकर डाक्टर बना और आगे चलकर फुले दम्पति का वारिस भी। २८ नवंबर १८९० को महात्मा ज्योतिबा फुले के निधन के बाद सावित्रीबाई ने बड़ी मजबूती के साथ इस आन्दोलन की जिम्मेदारी सम्भाली और सासवड, महाराष्ट्र के सत्य-शोधक समाज के अधिवेशन में ऐसा भाषण दिया,  जिसने दबे-पिछड़े लोगों में आत्म-सम्मान की भावना भर दी। सावित्रीबाई का दिया गया यह भाषण उनके प्रखर क्रन्तिकारी और विचार-प्रवर्तक होने का परिचय देता है।

१८९७ में जब पूना में प्लेग फैला तब वे अपने पुत्र के साथ लोगों की सेवा में जुट गई. सावित्रीबाई की आयु उस समय ६६ वर्ष की हो गई थी फिर भी वे निरंतर श्रम करते हुए तन-मन से लोगों की सेवा में लगी रही। इस कठिन श्रम के समय उन्हें भी प्लेग ने धर दबोचा और १० मार्च १८९७ में उनका निधन हो गया। सावित्रीबाई प्रतिभाशाली कवियित्री भी थीं। इनके कविताओं में सामाजिक जन-चेतना की आवाज पुरजोर शब्दों में मिलाती है। उनका पहला कविता-संग्रह सन १८५४ में ‘काव्य फुले’ नाम से प्रकाशित हुआ और दूसरी पुस्तक ‘बावनकशी सुबोध रत्नाकर’ शीर्षक से सन १८८२ में प्रकाशित हुई।

समाज सुधार के कार्यक्रमों के लिये सावित्रीबाई और ज्योतिबा को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। पैसे की तंगी के साथ-साथ सामाजिक-विरोध के कारण उन्हें अपने घर परिवार द्वारा निष्कासन को भी झेलना पड़ा लेकिन वे सब कुछ सहकर भी अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित बने रहे। भारत में उस समय अनेक पुरुष समाज सुधार के कार्यक्रमों में लगे हुए थे लेकिन महिला होकर पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर जिस प्रकार सावित्री बाई फुले ने काम किया वह आज के समय में भी अनुकरणीय है। आज भी महात्मा ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले का एक दूसरे के प्रति औेर एक लक्ष्य के प्रति समर्पित जीवन आदर्श दाम्पत्य की मिसाल बनकर चमकता है।

( कथादेश मार्च 2004 में सुधा अरोड़ा के स्तम्भ ” औरत की दुनिया ” की पहली क़िस्त थी — सावित्री बाई फुले — एक परछाईं का आकार लेना — जिसमें सुषमा देशपांडे का दो अंकों में सम्पूर्ण एकालाप नाटक था – ”हां मैं सावित्रीबाई” और उसकी भूमिका के रूप में यह आलेख था ! कथादेश : मार्च 2004 से साभार प्रस्तुत )

सावित्री बाई फुले की कवितायें

( आज 3 जनवरी को भारत की आदि शिक्षिका सावित्री बाई फुले की जयंती है . उन्होंने 1848 में लडकियों के लिए प्रथम स्कूल खोला था. उनकी जयंती को कुछ लोग शिक्षक दिवस के रूप में मनाने की बात करते हैं तो एक जमात इस दिन को भारतीय महिला दिवस के रूप में मनाता है . उनकी कविताओं को स्त्रीकाल के लिए प्रस्तुत कर रही हैं  प्रसिद्द लेखिका , आलोचक और दलित स्त्रीवादी सामाजिक कार्यकर्ता अनिता भारती . उनकी जयंती अवसर पर स्त्रीकाल ने सुप्रसिद्ध स्त्रीवादी चिन्तक शर्मिला रेगे को ‘ सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान‘ ( पूरी खबर के लिए लिंक पर क्लिक करें ) देने  की घोषणा की है.  ) 

अनिता भारती के द्वारा प्रस्तुति नोट : 
यह बहुत कम लोग जानते है कि भारत की पहली अध्यापिका तथा सामाजिक क्रांति की अग्रदूत सावित्रीबाई फुले एक प्रसिद्ध कवयित्री भी थी। इस ब्राह्मणवादी जाति-  समाज ने महान क्रांति सूर्या सावित्रीबाई फुले के अमूल्य योगदान का आंकलन कभी ठीक से किया ही नहीं, पर अब वह दिन दूर नही जब उनके सम्पूर्ण योगदान के पन्नों को एक एक करके खोल लिया जायेगा। उनका पूरा जीवन समाज में वंचित तबके,  खासकर स्त्री और दलितों,  के अधिकारों के लिए संघर्ष में बीता। उन्होंने लड़कियों के लिए स्कूल खोले तथा समाज में व्याप्त सामाजिक और धार्मिक रूढ़ियों के खिलाफ जंग लड़ी. उनकी एक बहुत ही प्रसिद्ध कविता है,  जिसमें वह सबको पढ़ने लिखने की प्रेरणा देकर जाति तोड़ने और ब्राह्मण ग्रंथों को फेंकने की बात करती हैं.
सावित्रीबाई फुले के दो काव्य संग्रह है- काव्यफुले( 1854) और दूसरा बावनकशी सुबोधरत्नाकर.
यहां उनके योगदान का एक पन्ना कविताओं के रुप में आपके सामने प्रस्तुत है:

नोट : कवर पेज साभार एम जी माली की किताब क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले के पेज नंबर 44 से लिया गया है. प्रकाशक- प्रकाशन विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय , भारत सरकार

सावित्री बाई फुले की किताब का कवर

1.
जाओ जाकर पढ़ो-लिखो
बनो आत्मनिर्भर, बनो मेहनती
काम करो-ज्ञान और धन इकट्ठा करो
ज्ञान के बिना सब खो जाता है
ज्ञान के बिना हम जानवर बन जाते है
इसलिए, खाली ना बैठो,जाओ, जाकर शिक्षा लो
दमितों और त्याग दिए गयों के दुखों का अंत करो
तुम्हारे पास सीखने का सुनहरा मौका है
इसलिए सीखो और जाति के बंधन तोड़ दो
ब्राह्मणों के ग्रंथ जल्दी से जल्दी फेंक दो

2,
जो वाणी से उच्चार करे
वैसा ही बर्ताव करे
वे ही नर नारी पूजनीय
सेवा परमार्थ
पालन करे व्रत यथार्थ
और होवे कृतार्थ
वे सब वंदनीय।
सुख हो दुख
कुछ स्वार्थ नही
जो जतन से कर अन्यो का हित
वे ही ऊँचे,
मानवता का रिश्ता जो जानते है वे सब
सावित्री कहे सच्चे संत ।

3.
ज्ञान नही विद्या नही उसे अर्जित करने की जिज्ञासा नही
बुद्धि होकर भी उस पर जो चले नही उसे इंसान कहे क्या ?

दे दो ईश्वर बिना काम किए बैठे बिठाए खाट पर
ढोर ड़गर भी ऐसा कभी करता नही
जिसका कोई विचार – अस्वार नही, उसे इंसान कहे क्या ?

पत्नी बिचारी काम करती रहे और पति फोकट में मौज उड़ाए
पशु पंछी में यह बात होती नही ऐसो को इंसान कहे क्या ?

दूसरों की मदद ना करे सेवा त्याग दया माया ममता आदि
जिसके पास यह सदगुण नही उसे इंसान कहे क्या ?

पशु पंछी, बंदर आदमी जन्म मृत्यु सब को ही
इस बात का ज्ञान जिसे नही उसे इंसान कहे क्या ?
4.
स्वाबलंबन का उद्योग, ज्ञान धन का संचय करो निरंतर
विद्या के बिना व्यर्थ जीवन पशु जैसा,
आलसी बन चुप ना बैठो।

विद्या प्राप्त करे शूद्रों-अतिशूद्रों के दुःख  निवारण हेतु
अंग्रेजी का ज्ञान हासिल करने का शुभ अवसर हाथ आया

अंग्रेजी पढ़ लिखकर जात-पात की दीवारों को ढहा दो।
भट ब्राम्हणों के षडयंत्रों के पिटारों को दूर फेंक दो।

5.
काम करना है जो आज, उसे अब कर तत्काल ।
जो करना है दोपहर में, उसे कर अब आकर ।

कुछ क्षणों के बाद का कार्य, इसी वक्त करो पूरा जोर लगाकर।
हो गया समाप्त कार्य या नहीं, मौत नही पूछती आकर।
( सावित्रीबाई फुले की यह कविताएं मराठी भाषा के प्रसिद्ध कवि शेखर पवार द्वारा मराठी से हिन्दी में अनुदित है)

6.
Rise to learn and Act
Savitribai Phule

Weak and oppressed! Rise my brother
Come out of living in slavery.
Manu-follower Peshwas are dead and gone
Manu’s the one who barred us from education.
Givers of knowledge– the English have come
Learn, you’ve had no chance in a millennium.
We’ll teach our children and ourselves to learn
Receive knowledge, become wise to discern.
An upsurge of jealousy in my soul
Crying out for knowledge to be whole.
This festering wound, mark of caste
I’ll blot out from my life at last.
In Baliraja’s kingdom, let’s beware
Our glorious mast, unfurl and flare.
Let all say, “Misery go and kingdom come!”
Awake, arise and educate
Smash traditions-liberate!
We’ll come together and learn
Policy-righteousness-religion.
Slumber not but blow the trumpet
O Brahman, dare not you upset.
Give a war cry, rise fast
Rise, to learn and act.

(  Sunil Sardar and Victor Paul have translated this poem)

स्त्रीकाल देगा शर्मिला रेगे को ‘सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान ‘

३ जनवरी,  सावित्रीबाई फुले -जयन्ती की पूर्व सन्ध्या पर शर्मिला रेगे की किताब को सम्मान की घोषणा 

स्त्रीवादी पत्रिका , ‘ स्त्रीकाल, स्त्री का समय और सच’ के द्वारा ‘ सावित्री बाई फुले वैचारिक  सम्मान’ के लिए प्रथम सम्मान की घोषणा कर दी गई है . अर्चना वर्मा , अरविंद जैन , हेमलता माहिश्वर , अनिता भारती , बजरंग बिहारी तिवारी , परिमला आम्बेकर की सदस्यता वाले निर्णायक मंडल ने २०१५ के लिए शर्मिला  रेगे को उनकी किताब ‘ अगेंस्ट द मैडनेस  ऑफ़ मनु : बी आर आम्बेडकर्स  राइटिंग ऑन ब्रैहम्निकल  पैट्रीआर्की ‘ के  लिए  सम्मानित करने का निर्णय लिया . यह किताब 2013 में नवयाना प्रकाशन से प्रकाशित हुई है .

इस सम्मान के लिए २००८ से २०१३ तक हिन्दी में लिखी गई या अनूदित स्त्रीवादी वैचारिकी की  प्रकाशित किताबों पर विचार करते हुए निर्णायक मंडल ने कहा कि ‘ शर्मिला रेगे का अकाल-गमन और उनकी संभावनाओं का असमय समापन इस समय हमारे मन में सर्वोपरि है। हालाँकि हमारे नियमों के अनुसार लिखित अथवा अनूदित किसी भी रूप में हिन्दी में उपलब्ध किताबें ही पुरस्कार के लिये विचारणीय हैँ और शर्मिला रेगे ने यद्यपि अपनी मातृभाषा मराठी में भी पर्याप्त मात्रा में महत्त्वपूर्ण लेखन किया किन्तु उनकी कोई किताब अभी हिन्दी में उपलब्ध नहीं है। यह हिन्दी की कमी है, शर्मिला की नहीं। हम सब एकमत से यह अनुभव करते हैँ कि उनके काम और उनकी संभावनाओं को रेखांकित किया जाना चाहिए। हिन्दी की स्त्रीवादी सैद्धान्तिकी में शर्मिला रेगे की टक्कर का दूसरा काम आसानी से नज़र नहीं आता और उनके नाम, काम और प्रतिबद्धता की स्मृति को रेखांकित करना ज़रूरी लगता है। उनका लेखन और चिन्तन इतना महत्त्वपूर्ण है कि हिन्दी के पाठक समुदाय को यथाशीघ्र उपलब्ध होना चाहिये और इसके लिये एक अपवाद को जगह देना भी उचित ही होगा – इस निश्चहय के साथ कि उनकी पुस्तक को यथाशीघ्र हिन्दी में उपलब्ध कराने का दायित्त्व हमारा है।’
शर्मिला रेगे ( 7 अक्तूबर 1964 – 13 जुलाई २०१३ ) ने क्रान्ति सूर्य सावित्री बाई फुले स्त्री अध्ययन विभाग , पुणे विश्वविद्यालय का संचालन किया और राइटिंग कास्ट , राइटिंग जेंडर के लेखन के साथ दलित स्त्रीवाद की सैद्धांतिकी में महत्वपूर्ण पहल की. वे प्रसिद्द स्त्रीवादी विचारक रही हैं .

यह सम्मान पत्रिका के द्वारा  19 -20 फरवरी को , गया ( बिहार ) में  आयोजित होने वाले एक कार्यक्रम में दिया जाएगा. रेगे के लिए उनके किसी रिश्तेदार या पुणे विश्वविद्यालय के स्त्री अध्ययन विभाग को , जहाँ वे पढ़ाती थीं , सम्मान की राशि ( 12 हजार ) तथा प्रशस्ति पत्र दिया जायेगा.

निर्णायक मंडल का सम्मति नोट
स्त्रीवादी पत्रिका स्त्रीकाल के द्वारा ‘ सावित्रीबाई फुले वैचारिकी सम्मान’ की कडी मे पहले सम्मान के लिए हम शर्मिला रेगे ((7 October 1964 – 13 July 2013) की किताब “AGAINST THE MADNESS OF MANU”.B.R. Ambedkar’s writings on Brahmanical Patriarchy’की अनुशंसा करते हैं। उनका जीवन, चिन्तन और लेखन स्त्री के पक्ष से संघर्ष के लिये समर्पित रहा। उनकी अन्य किताबें “WRITING CASTE/ WRITING GENDER : NARRATING DALIT WOMENS TESTIMONIES”,”SOCIOLOGY OF GENDER :THE CHALLANGE OF FEMINIST SOCIOLOGICAL THOUGHT” भी इसी क्षेत्र में उनका बेहद महत्त्वपूर्ण योगदान है। अनुशंसित किताब का प्रकाशन 2013में हुआ जो उनके असामयिक निधन के कारण दुर्भाग्यवश उनका अंतिम काम रह गया।

शर्मिला रेगे एक समाजशास्त्री, स्त्री-पक्ष की मानवाधिकार-कर्मी और एक सजग लेखिका थीं । भारतीय स्त्री और स्त्रीवाद; खासकर दलित स्त्री और दलित स्त्रीवाद; की सैद्धांतिकी के लिए उनके कार्य आज के समय में बेहद महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक हैं। स्त्री- मुक्ति की चिन्ताओं को लेकर वे कई प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में लगातार लिख रही थी। शर्मिला जी समाज के सबसे वंचित तबके यानी दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक वर्ग की स्त्रियों के साथ खडी रही तथा उनके अधिकारों के मुद्दों पर काम करती रही।

शर्मिला रेगे का अकाल-गमन और उनकी संभावनाओं का असमय समापन इस समय हमारे मन में सर्वोपरि है। हालाँकि हमारे नियमों के अनुसार लिखित अथवा अनूदित किसी भी रूप में हिन्दी में उपलब्ध किताबें ही पुरस्कार के लिये विचारणीय हैँ और शर्मिला रेगे ने यद्यपि अपनी मातृभाषा मराठी में भी पर्याप्त मात्रा में महत्त्वपूर्ण लेखन किया किन्तु उनकी कोई किताब अभी हिन्दी में उपलब्ध नहीं है। यह हिन्दी की कमी है, शर्मिला की नहीं। हम सब एकमत से यह अनुभव करते हैँ कि उनके काम और उनकी संभावनाओं को रेखांकित किया जाना चाहिए। हिन्दी की स्त्रीवादी सैद्धान्तिकी में शर्मिला रेगे की टक्कर का दूसरा काम आसानी से नज़र नहीं आता और उनके नाम, काम और प्रतिबद्धता की स्मृति को रेखांकित करना ज़रूरी लगता है। उनका लेखन और चिन्तन इतना महत्त्वपूर्ण है कि हिन्दी के पाठक समुदाय को यथाशीघ्र उपलब्ध होना चाहिये और इसके लिये एक अपवाद को जगह देना भी उचित ही होगा – इस निश्चाय के साथ कि उनकी पुस्तक को यथाशीघ्र हिन्दी में उपलब्ध कराने का दायित्त्व हमारा है।

हम अंतिम निष्कर्ष पर हैं कि  शर्मिला रेगे द्वारा इतने कम समय में अपनी पूरी प्रतिबद्धता, लगन, ईमानदारी और सच्चाई के साथ किया गया इतना महत्वपूर्ण काम, दलित और गैरदलित स्त्रीवाद में उसी तरह मील का पत्थर साबित होगा जैसा कि सामाजिक क्रांतिसूर्य, भारत की पहली शिक्षिका, समाज सुधारक, कवयित्री, दार्शनिक, और स्त्री अधिकारों की पुरोधा सावित्री बाई फुले का माना जाता है। हमारे अनुसार शर्मिला रेगे ही स्त्रीकाल द्वारा घोषित सावित्रीबाई फुले सम्मान 2014 की सबसे पहली और सर्वोत्तम अधिकारिणी हैं।”.

अर्चना वर्मा , अरविन्द जैन , हेमलता माहिश्वर , अनिता भारती , बजरंग बिहारी तिवारी , परिमला आम्बेकर 

स्त्रीकाल : स्त्रीवादी चिंतन का आर्काइव

नूतन यादव

नूतन यादव दिल्ली विश्वविद्यालय  में पढ़ा रही  हैं. फेसबुक पर सक्रीय स्त्रीवादी टिप्पणीकार हैं. संपर्क  :09810962991

 ( स्त्रीकाल , स्त्री का समय और सच , प्रिंट के बाद ऑनलाइन रूप में भी लोकप्रिय है . अप्रैल 2014 के से हम यहाँ स्त्रीवादी विचार , आलोचना , साहित्य प्रकाशित कर रहे हैं. साल के अंत होते -होते इसे अब तक 1 लाख हिट मिल चुके हैं. औसतन एक पोस्ट प्रतिदिन के साथ . इसके फेसबुक पेज को अब तक 1700 से अधिक लाइक मिल चुके हैं  . इस बीच हमने कुछ लेखकों , कवियों , आलोचकों से , स्त्रीकाल में प्रकाशित रचनाओं , आलेखों में से उनकी पसंद के कुछ (कम से कम 5 ) पोस्ट पर  आलेख मंगवाये हैं . गुलज़ार हुसैन ने इस कड़ी में पांच कविता -पोस्ट पर लिखा है .  इनमें आशा पांडे ओझा , सोनी पाण्डेय , रजनी अनुरागी ,  अनिता भारती सुजाता तेवतिया और अवनीश गौतम की कवितायें शामिल हैं . आज नूतन यादव की समीक्षा , जो उन्होंने वसीम अकरम , शैलेन्द्र सिंह , रजनी दिसोदिया , अरविंद जैन के आलेखों  को पढ़ते हुए लिखा है , साथ ही उन्होंने स्त्रीकाल में प्रकाशित रेहाना के पत्र के हवाले से भी अपनी बात कही है . स्त्रीकाल के पाठकों से आग्रह है कि इस तरह की आलोचनात्मक टिप्पणी के साथ यहां प्रकाशित अन्य आलेखों और रचनात्मक साहित्य पर अपनी राय ‘ themarginalised@gmail.com पर भेजें . 2015 में हम आपकी अपेक्षाओं पर और अधिक खरे उतरने की कोशिश करेंगे.  ) 


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स्त्रीकाल के ऑनलाइन एडिशन में स्त्रीवादी आलेखों , चिंतन और वैचारिकी को पढ़ना हमेशा विचारोत्तेजक रहा  पिछले साल यहाँ अकादमिक आलेख , और स्त्री मुद्दों पर चर्चा का निरंतर प्रकाशित होते रहे . सुधा अरोड़ा , अर्चना वर्मा , अनीता भारती , अरविंद जैन , निवेदिता आदि जहां नियमित कंट्रीब्युट करते  रहे  हैं वहीं दर्जनो शोध और विचार आलेख यहाँ पढ़ने को मिले . मैं अपनी इस टिप्पणी में कुछ आलेखों पर बात कर रही हूँ , छोटी टिप्पणी की अपनी सीमा है .

यहाँ वसीम अकरम का एक आलेख है ‘ धर्म की खोखली बुनियाद में दबी स्त्री ’ वसीम ने अपने इस लेख में मुस्लिम समाज में तलाक से पैदा हुई समस्याओं का एक भावुक लेकिन संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है |इस आलेख में अकरम उत्तरप्रदेश के गाजीपुर जिले के एक कस्बे बहादुरगंज की मुस्लिम महिलाओं की तलाक के बाद पैदा हुई बद से बदतर परिस्थितियों का वर्णन किया है |ये वो स्त्रियाँ है जिन्हें शादी के बाद पति द्वारा या तो छोड़ दिया गया है या तलाक दे दिया गया है| अकरम ने इस आलेख में मुस्लिम समाज की खोखली धार्मिक सामजिक और सांस्कृतिक कुरीतियों का  बहुत कड़े और सधे शब्दों में खंडन किया है |मुफ़्ती मुल्ले धार्मिक ज्ञान के नाम पर क़ुरान और शरियत का हवाला देकर धार्मिक कट्टरता का प्रचार प्रसार तो करते है लेकिन अपनी स्त्रियों की दुर्दशा के प्रति आँखें मूंदे रहते हैं |मुस्लिम नेता भी अपने धर्म और उनके मानने वालों की  गिरती आर्थिक और सामजिक स्थितियों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़े हुए हैं |

‘ स्त्री एवं भाषा : तीसरी परम्परा की खोज एवं वैकल्पिक भाषावैज्ञानिक अध्ययन’ के लेखक प्रोफ. शैलेन्द्र सिंह ने भाषा को किसी दैवीय उत्पत्ति से अलग एक विशुद्ध सामाजिक वस्तु माना है,  जिसके निर्माण में स्त्री एवं पुरुष दोनों की बराबर की सहभागिता होती है |जिस प्रकार समाज निर्माण में दोनों की भूमिका अनिवार्य है उसी प्रकार भाषा निर्माण भी  स्त्री पुरुष दोनों में से किसी एक की उपस्थति और अभिव्यक्ति के अभाव में असंभव है | भाषा दोनों के साथ समान रूप से कार्य करती है किसी विशिष्ट भाषा की रचना ना तो स्त्री  की होती है और ना ही पुरुष की |लेखक ने स्त्री भाषा एवं सैद्धांतिकी को  अनेक भागों में विभाजित कर समझाने का प्रयास किया है | मूल सिद्धांत ,अतिवादी सिद्धांत  एवं वैकल्पिक सिद्धांत |लेखक मानता है कि स्त्री अध्ययन का उद्देश्य संसाधन निर्माण है तो मूल्य मानवीय और सीमा सार्वभौम है | स्त्री विमर्श को अकादमिक दायरों से निकाल कर सामाजिक यथार्थ के रूप में देखे जाने की जरूरत है |और इसी यथार्थ के साथ नए नए विषयों और नयी भूमिकाओं के लिए नयी स्त्री भाषा गढ़नी होगी

रजनी दिसौदिया ने अपने आलेख ‘शिक्षा में जातिगत और लिंगगत असमानता’ में कॉलेज की लड़कियों के बीच इस मुद्दे पर कराई गई  चर्चा के निष्कर्ष हमारे सम्मुख रखा है | वे लिखती हैं कि लडकियां लिंगगत असमानता पर मुखर होकर आवाज उठाती है | इस से जुड़े हर आयाम पर इन लड़कियों की  पैनी नजर है |इसके कई कारण भी वे गिनाती हैं जैसे ‘लड़कियों को लड़कों के मुकाबले स्कूलों में कम भेजा जाना’, ‘स्त्रियों और पुरुषों के बीच कामों का बँटवारा’ , सार्वजनिक स्थानो पर होने वाली छेड़छाड़ से लेकर बलात्कार तक’  आदि | लेकिन जातिगत असमानता के मूद्दे पर उनमें एक  ख़ास तरह की उदासीनता है  जिससे भविष्य में विशिष्ट प्रकार की स्थ्तियाँ पैदा होने की संभावना दिखती है | रजनी ने इस आलेख में जातिगत असमानता के कई पहलुओं को सामने रखा है  |उनके अनुसार “ ब्राह्मणवादी परम्परा ने सायास और अनायास : प्रत्येक भारतीय को यह सिखाया है कि ब्राह्मण, बनिया या ठाकुर होना कोई कमाल की बात है और चमार, चूहड़ा या धानुक होना कोई शर्मसार होने वाली बात है” | उन्होंने शिक्षा और अन्य सामाजिक समस्याओं के प्रति भी ब्राह्मणवादी मानसिकता पर कुठाराघात किया है | उच्च जातियों की राजनैतिक सांस्कृतिक अवसरवादिता को बहुत स्पष्ट रूप से पाठक के सम्मुख रखा साथ ही उनके द्वारा  निम्न और गैर सवर्ण जातियों को अलग अलग प्रकार से दबाने की कोशिशों को सामने लाने का प्रयास किया है  |अपने इस आलेख में आरक्षण पर सवर्णों की दया दृष्टि से लेकर निम्न जातियों की श्रम संस्कृति के अपमान आदि पर विस्तार से चर्चा की |

26 वर्षीय ईरानी महिला रेहाना जब्बारी को  आख़िरकार फांसी दे दी गयी |अपने साथ जबरदस्ती करने वाले की ह्त्या के आरोप में लभग सात साल की सजा काटकर 25 अक्टूबर को उसे फंसी दे दी गयी |अंतर्राष्ट्रीय हलकों में इस मामले की कड़ी भर्त्सना की गयी | । रेहाना की मां ने जज के सामने पूर्व खुफिया एजेंट मुर्तजा अब्दोआली सरबंदी की हत्या के आरोप में अपनी बेटी रेहाना की जगह खुद को फांसी दे दिए जाने की गुहार लगाईजिसे वहां की सरकार ने अनसुना कर दिया | उसने अंतिम समय में अपनी माँ के लिए एक पत्र लिखा जिसमें उसने अपनी माँ से कुछ बातें साझा की | स्त्रीकाल में वह पत्र पढ़ा जा सकता है .

उस पत्र के माध्यम से रेहाना को और उसकी मानसिक स्थिति को समझने में एक नयी दृष्टि मिलती है | रेहाना चली गयी लेकिन जाते जाते वो एक सवाल उठा गयी| स्त्रियों के लिए क्या जरूरी है जीना या सर उठाकर जीना | अपने पत्र में ये सवाल उठाती है कि कैसा होगा वो समाज जो एक स्त्री को उस पर यौन हमला करने वाले को मारने पर उस स्त्री को ही फाँसी की सजा देता होगा |इस तरह की सजा का प्रावधान रखने वाला समाज सीधे सीधे स्त्रियों को ये सन्देश देता हैं  कि गलती से भी वे  अपने दोयम दर्जे को न भूलें और अगर वे इस पुरातन पंथी समाज से किसी तरह की प्रगतिशील और आधुनिक समझ की अपेक्षा रखती हैं तो उन्हें इस तरह की सजाओं के लिए तैयार रहना होगा |

रेहाना की फांसी के बाद कानूनी सुधारों पर बात आरम्भ हो गयी है लेकिन यह  स्पष्ट है कि बात सिर्फ इरानी कानूनों पर बहस करने से पूरी नहीं होगी |भारत में भी तो इसी तरह के तथाकथित कानूनों से भरा समाज है जो स्त्रियों को बचपन से ही बलात्कारियों से लड़ने के बजाए उनसे भागने, बचने और डरने की सीख ( ट्रेनिंग या प्रशिक्षण ) देता है | बचपन से हम अपनी बच्चियों के दिमाग में ये बात दाल देते हैं कि रात  में बाहर नहीं निकलना चाहिए| हर बार किसी बलात्कार पर हमारा दिमाग हम बिना एक क्षण गँवाए ये सोचने के इस बात के लिए प्रशिक्षित कर दिया गया है कि हम उस बलात्कार के लिए जिम्मेदार एक कारण खोज लें |

प्रसिद्ध लेखक एवं कानूनविद अरविन्द जैन के आलेख शादी का झूठा आश्वासन यौन शौषण हमें कई कानूनी प्रावधानों और अड़चनों से वाकीफ कराता है . आज के दौर में लड़कियों की सुरक्षा एक बहुत बड़ी जरूरत है जिसके अंतर्गत उन्हें कानूनी सूचनाओं से वाकिफ कराना बहुत जरूरी है |अरविन्द जी का ये आलेख इसी तरह की महत्वपूर्ण जानकारियाँ देता है | इस आलेख में अरविन्द जी ने  शादी का झांसा देकर किसी लड़की के साथ शारीरिक रिश्ते बनाने और बाद में शादी से मना करने को बलाकार  के दायरे में लाने जैसी महत्वपूर्ण कानूनी सूचना विस्तार के साथ  पाठकों के साथ साझा की है| लेखक ने बलात्कार से पहले बलात्कार करने के कारणों में कामुक फ़िल्मी छवियों, उद्दाम फैंटसी ,और कई बार खानदान की इज्जत के नाप पर भी बलात्कार आदि को गिनाया है| कई ऐसे मामले सामने आते रहे हाँ जिनमें लड़की को शादी का झांसा देकर शारीरिक सम्बन्ध बनाए जाते हैं और ये सिलसिला तब तक चलता रहता है जब तक लड़की गर्भवती नहीं हो जाती  |चूँकि भारतीय अदालत कई बार इस तरह के सवाल उठाती रही हैं शादी के झाओठे वायदे करके  बनाये गए शारीरिक संबंधों को बलात्कार जैसे आपराधिक मामले में लाया जाए या नहीं |जयंती रानी पांडा बनाम पश्चिम बंगाल सरकार वाले मामले में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने भी  माना “अगर कोई बालिग लड़की शादी के वादे के आधार पर, शारीरिक रिश्ते को राजी होती है और तब तक इस गतिविधि में लिप्त रहती है, जब तक कि वह गर्भवती नहीं हो जाती, तो यह उसकी ओर से ‘स्वच्छंद संभोग’ के दायरे में आएगा |” “साथ ही बंबई उच्च न्यायालय ने  भी कहा भारतीय दंड संहिता की धारा-415 में ‘धोखाधड़ी’ के अपराध को परिभाषित किया गया है।  शादी का झूठा वायदा कर, जानबूझकर दिए गए प्रलोभन के बाद शारीरिक रिश्ते बनाना, ‘धोखाधड़ी’ की परिभाषा के तहत ‘शरारत’ के दायरे में आते हैं और दंडनीय अपराध है। (आत्माराम महादू मोरे बनाम महाराष्ट्र राज्य (1998 (5) बीओएम सीआर 201)”

इस तरह के कई मामले उच्चतम न्यायालय में भी सामने आये जिनमें लड़की की सहमती सिद्ध करके इस तरज के कुकृत्य को सिर्फ धोखाधड़ी माना गया लेकिन एक मामले में उच्चतम न्यायालय में न्यायमूर्ति ए.के माथुर और अल्तमस कबीर ने 2006 में एक अलग फैसला सुनाया जिसके अंतर्गत उन्होंने एक तार्किक किन्तु संवेदलशील धरातल पर माना किआरोपी ने  पीड़ित लड़की को राजी करते हुए सब किया लेकिन ये सब उसने उसे शादी के लालच में करवाया | और गवाहों की गवाही से पूरी तरह स्पष्ट होता है कि गवाह पंचायत की तरह काम कर रहे थे। आरोपी ने पंचायत के समक्ष स्वीकार किया कि उसने लड़की के साथ शादी करने का वायदा कर उसके साथ शारीरिक रिश्ते बनाये लेकिन पंचायत के सामने वायदे के बावाजूद वह पलट गया इससे साफ़ पता चलता है कि उसका शुरू से ही लड़की से विवाह करने का कोई इरादा नहीं था | न्यायालय भी अब ये मानते हैं कि इस तरह के मामले  ‘न सिर्फ घोर निंदनीय कृत्य है बल्कि प्रकृति से भी आपराधिक है |” इस तरह से शादी को धोखाधड़ी के लिए एक आधार मिलेगा और आर्थिक सामजिक वर्ग की लड़कियों पर एक दबाव बनाकर उनका शौषण किया जाता रहेगा  | लेखक का मानना है कि इस तरह के मामलों में न्याय प्रक्रिया और न्यायाधीश भी बंटे हुए दिखते हैं |ऐसे मामले सिर्फ आपसी समझ और सामजिक भागेदारी के साथ कानूनों में संशोधन से ही सुलझ सकते है |

बदलते समय की कवितायें

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गुलज़ार हुसैन


गुलज़ार हुसैन जितने संवेदनशील और बेहतरीन कवि हैं उतने ही अच्छे रेखा -चित्रकार. मुम्बई में पत्रकारिता करते हैं . संपर्क: मोबाईल न. 9321031379

( स्त्रीकाल , स्त्री का समय और सच , प्रिंट के बाद ऑनलाइन रूप में भी लोकप्रिय है . अप्रैल 2014 के से हम यहाँ स्त्रीवादी विचार , आलोचना , साहित्य प्रकाशित कर रहे हैं. साल के अंत होते -होते इसे अब तक 1 लाख हिट मिल चुके हैं. औसतन एक पोस्ट प्रतिदिन के साथ . इसके फेसबुक पेज को अब तक 1700 से अधिक लाइक मिल चुके हैं  . इस बीच हमने कुछ लेखकों , कवियों , आलोचकों से , स्त्रीकाल में प्रकाशित रचनाओं , आलेखों में से उनकी पसंद के कुछ (कम से कम 5 ) पोस्ट पर  आलेख मंगवाये हैं . गुलज़ार हुसैन ने इस कड़ी में पांच कविता -पोस्ट पर लिखा है .  इनमें आशा पांडे ओझा , सोनी पाण्डेय , रजनी अनुरागी ,  अनिता भारती , सुजाता तेवतिया और अवनीश गौतम की कवितायें शामिल हैं . यह गुलजार हुसैन , जो स्वयं कवि हैं और स्त्रीकाल में जिनकी कवितायें प्रकाशित हैं , के अपने चुनाव हैं , किसी सर्वोत्तम की सूची बनाने का यह प्रयास नहीं है . गुलज़ार के अनुसार वर्तमान में जिन समस्याओं से स्त्रियाँ सबसे अधिक जूझ रही हैं , उन्हीं विवध विषयों पर  आधारित कविताओं को उन्होंने प्राथमिकता दी है . स्त्रीकाल के पाठकों से आग्रह है कि इस तरह की आलोचनात्मक टिप्पणी के साथ यहां प्रकाशित अन्य आलेखों और रचनात्मक साहित्य पर अपनी राय ‘ themarginalised@gmail.com पर भेजें . 2015 में हम आपकी अपेक्षाओं पर और अधिक उतरने की कोशिश करेंगे.  )
इनकी कवितायें पढने के लिए ऊपर इनके नामों पर क्लिक करें :


‘स्त्री काल’ (वेबसाइट ) पर प्रकाशित कविताएं बदलते समय में करवट लेती हुईं नई पीढ़ी की आवाज़ हैं। इन कविताओं में स्त्री नए तेवर के साथ उपस्थित है। वह आँखों में आँखें डालकर बिना विचलित हुए सवाल करती है। इन नई कविताओं से लगभग गायब हो चुकी ‘प्रेम- पंक्तियों’ की जगह स्त्री-पुरुष के रिश्तों की नई पड़ताल है। पुरुषों को नई कसौटी पर कसती ये कविताएं स्पष्ट रूप से दुनिया को दो हिस्सों में बांटती हैं। एक वह हिस्सा है, जहां स्त्री अपने स्वाभिमान और अधिकारों के साथ स्वतंत्र है और दूसरा वह हिस्सा है, जहां वह पुरुषवादियों के जाल में फंसी हुई मुक्ति के लिए आंदोलित है। इन दोनों हिस्सों की कविताओं में पुरुषवाद पर कड़ा प्रहार है।

आशा पांडेय ओझा

आशा पांडे ओझा की कविता ‘ वो तिलचट्टा’ पुरुष के अंतर्मन की क्रूर वासनात्मक कुंठा को सामने लाती है। इस कविता में पुरुषों की यौन अभिव्यक्ति में छुपी संकीर्णता को सफल रूप से सामने लाया गया है। आशा लिखती हैं – ” किसी बस स्टॉप, रेलवे स्टेशन/ बाजार, राह चलते शहर, ऑफिस या कॉलेज में / बार- बार उसकी आँखें/  अँधेरे में, गर्म स्थान खोजती हुई/ तिलचट्टों सी रेंगती है जब मुझ पर/ या बार -बार छूने का करती है यत्न/भोजन ढूंढती फिरती तिलचट्टे के/ एक जोड़ी संवेदी श्रृंगिकाएं सी/ उसकी वासना के कीच से लिपटी गन्दी उँगलियाँ मुझे/ तब मैं खूबसूरत नहीं लगती खुद को/”
इन पंक्तियों में स्त्रियों को केवल देह और भोग की वस्तु समझने वाले पुरुषों के खिलाफ स्त्री मन का आक्रोश उभरा है। यह कविता वर्तमान में स्त्री विरोधी अपराधों के लिए जिम्मेदार पुरुषवादी मानसिकता पर चोट करती है।

इस कविता की कुछ और पंक्तिया देखिए-

” बचा -बचा कर नजर जांचती हूँ अपने अंगों को बार -बार/ सब कुछ ठीक है की तसल्ली के बावजूद/ कुछ गड्ढे से हो आए हों जिस्म पे/ उसकी पैनी नज़र से होता है यह आभास/ और तब अचानक/ मेरे बदसूरत हो जाने का एहसास होने लगता है मुझे/

इन पंक्तियों में घर से बाहर निकल कर काम काज करने वाली स्त्रियों की सबसे बड़ी समस्या को रेखांकित किया गया है। यहाँ स्त्री ताड़ती है पुरुष की दृष्टि और स्पर्श में घुली -मिली कुंठित मानसिकता को। स्त्री के मन में उपजी पुरुषवादियों के प्रति घृणा उसे स्वयं सुन्दर से बदसूरत में बदल देती है। इस कविता का चरम वहां है जहां स्त्री कह उठती है- ” तब मेरे अंदर जरा नहीं बचते/ नारी वाले कोमल एहसास/”
यहां स्त्री की घृणा के हिंसा में बदलने की जो प्रक्रिया है, वह कविता को प्रासंगिक और जरूरी बना देती है। इस कविता की अंतिम दो पंक्तियां बदलते समय की आक्रोशित स्त्री का चेहरा सामने लाती है। ये पंक्तियाँ हैं- ” हाँ, तब मैं पीटती हूँ उसे फिर जानवरों की तरह/ खो कर अपना आपा कभी- कभी बीच बाज़ार.”

अनिता भारती

धर्मों, संस्कारों और परम्पराओं के नाम पर बांधी गई स्त्री का विद्रोह सोनी पांडे की कविता ‘ ये जो पर्दा है…” में ज्वालामुखी के लावे सा फूट पड़ा है। यह कविता स्त्री के पुरूष की दासी बने रहने का पूर्ण अस्वीकार है। यहां स्त्री मन में स्वतंत्रता की आकांक्षा का प्रबल स्वर पुरुषवादियों की ओर से थोपी गई लिजलिजी परम्पराओं को धिक्कारता है। कुछ पंक्तियाँ देखिए- ” नैतिकता के साँचे में/ संस्कारों की सूई से/ सिली गई चादर/ और धर्म, कर्म पाखण्ड के/ सैंकड़ों बूटे टाँके गए/ मेरी सीमा रेखा से सटे पर्देे में/ इस पर्दे के बाहर पाँव रखते ही/ मैं घोषित कर दी जाउंगी/ बे-पर्दा औरत…”

सोनी की कविता में परम्पराओं की ड्योढ़ी लांघने  और नया पर्दा बुनने की जद्दोजहद स्त्री के जीवन संघर्ष को नया मोड़ देने की जिद का नाम है। यहां स्त्री केवल अपने अस्तित्व को बचाए- बनाए रखने के अलावा थोपे गए संस्कारों के तटबंध को तार- तार करने को व्याकुल है। पुरुषवाद के उस डोर को तोड़ने की कोशिश है यह कविता, जिस डोर के सहारे टिक कर पुरुष सदियों से विजय पताका लहराता रहा है।

कविता की कुछ पंक्तियों को देखिए, ” बह सकती है /अविरल, उन्मुक्त/ परम्पराओं की ड्योढ़ी उलाँघ/ बुन सकती है/ एक नया पर्दा/ जिसे सदियों से अपनी विजय पताका बना/ लहराता रहा पुरुष…”

कविता के अंत में पुरुष को ललकारती हुई स्त्री सवाल करती है। यह सवाल ही पुरुषवाद के लिए वर्तमान समय का सबसे बड़ा प्रश्न भी है। सदियों से बिछाए जाल को हटाती हुई स्त्री पूछती है- ” कहो पुरुष/ तुम क्यों नहीं रखते कल्याण कामना के लिए / असंख्य निर्जला व्रत?/ क्या ये सारे ठेके/ केवल मेरे हिस्से हैं?…”

सोनी पांडेय


अनिता भारती की कविता ‘हमें तुम्हारी बेटियां पसंद हैं ‘ दलित समाज से जुड़ी सबसे गंभीर समस्या की ओर इशारा करती है। इस कविता में दलित स्त्री को लगातार हाशिए पर करते चले जाने का रोंगटे खड़े करने वाला वर्णन है। यहां जवानी की दहलीज पर खड़ी दलित किशोरियों को किस तरह सवर्णवादी घरों में जानवरों की तरह जांच-परख कर कर रखा जाता है उसका मार्मिक चित्रण है। यहां सवर्ण स्त्री किसी ऐसी दलित लड़की को काम पर रखना चाहती है, जो केवल मन लगा कर काम कर सके।

कविता की कुछ पंक्तियाँ देखिए- ” बताओ तुम्हारी बेटियां/ काम करने में कैसी हैं?/ कामचोर तो नहीं?/साफ- सुथरे रहने की आदत है या नहीं?/ लालची तो नहीं खाने की?/ शौक़ीन तो नहीं ना/ मोबाइल, लिपस्टिक, टेलीविजन की?/ हमें जरूरत है/ ऐसी ही लड़कियों की/ जो हों अल्प वयस्क/ जो मन लगाकर काम कर सकें सारे…”

इस कविता से सवर्ण परिवारों की महिलाओं की दलित लड़कियों के प्रति गैर जिम्मेदारी से भरी सोच का पता चलता है। कविता इस समय के सबसे बड़े सवाल को उठाने में सफल रही है कि क्या दलित परिवार के आर्थिक रूप से कमजोर होने का खामियाज़ा दलित लड़की को एक गुलाम बनकर भुगतना पड़ता है? यह कविता वृद्ध होती सवर्ण स्त्री को उसके घरेलू कार्यों से छुटकारा पाने की मनःस्थिति को भी दर्शाती है।

रजनी अनुरागी की कविता ‘माँ ‘ बेटी और माँ के रिश्ते को बहुत अलग तरीके से सामने रखती है।  इस कविता में एक वृद्ध माँ के बारे में सोचती स्त्री थोड़ी सी सशंकित भी है कि क्या मैं खुद एक दिन माँ की तरह हो जाउंगी? यहां माँ के सब कुछ संभाल कर रखने का बहुत भावुक चित्रण हुआ है।
कुछ पंक्तियां देखिए- ” आज तक नहीं फेंकी मेरी छोटी फ्रॉक/ मेरा लिखा पहला अक्षर उसके संग्रहालय में / आज भी सुरक्षित है…”

रजनी अनुरागी


माँ- बेटी के बीच का यह मौन -संवाद मन को गहरे छू जाता है। यहां वृद्धावस्था के कारण माँ की आँखों की कम होती रोशनी, सुनने की कम होती क्षमता को लेकर चिंतित बेटी की मनःस्थिति कहीं से भी ख़ुशी ढूंढ लाने की है। माँ तो बेटी का हर दर्द महसूस कर ही लेती है- ” वह मुझे ठीक से नहीं देख पाती/ हाथों से देखती है मेरा चेहरा/ महसूसती है मेरा दर्द/ पोछती है अपने आंसू…”

माँ की पुराने चीजों को सहेजने की आदत एक बेटी की नजरों में एक बड़ी बात है, लेकिन बेटी उस तरह कहाँ से हो सकती है । कविता में बेटी कहती है- ” सोचती हूँ, क्या मैं भी एक दिन माँ जैसी हो जाउंगी/ लेकिन मुझमें इतनी सब्र कहाँ/ कि चीजों को संभाल कर रख पाऊँ/ मैं अभी से चीजों को भूलने लगी हूँ…”

 सुजाता तेवतिया

 सुजाता तेवतिया की कविता ‘ अगर नहीं होती गुफा मैं’ स्त्री के अंतर्मन के जटिल गांठों को खोलती है। यहाँ स्त्री- मन हवा में बदल जाने के उल्लास से भरा है। यहां निर्बंध, स्वतंत्र स्त्री कह रही है कि मैं प्यार सीखने लगूंगी फिर से।कविता में ‘आज’ का हर क्षण महत्वपूर्ण है । सुजाता लिखती हैं- ” कभी नहीं हो पाती मैं/ जैसे हो सकती हूँ आज!/ हवा हो जाती मैं शायद या बयार/ लेकिन सिर्फ बाढ़ हो पाती हूँ अक्सर!” इस कविता में ऊब को भूल आगे बढ़ने की बात है। यहाँ स्त्री के उत्साह से उसके सपने भी जुड़े हैं। वह पंख फैला कर उड़ना चाहती है। कुछ पंक्तियाँ देखिए- “तुम ऊब न जाओ/ चलो फिर से गाए वही कविता/ जिसमें मैं बन जाती थी चिड़ियाँ और तुम भंवरा..”

अवनीश गौतम

अवनीश गौतम की कविता ‘सफाई कार्यक्रम’ वर्तमान समय के राजनीतिक छल से पर्दा उठाती है। सियासी सत्ता से सम्मोहित नेताओं ने जिस तरह जन- समस्याओं से मुंह मोड़कर अपने फोटो छपवाने के लिए व्यर्थ नीतियों का सहारा लिया है, उससे उनकी कलई खुल गई है। गौतम की इस रोंगटे खड़ी देने वाली कविता में राजनीतिक दिशाहीनता पर बड़ा कटाक्ष है। कुछ पंक्तियाँ देखिए- ” सफाई कार्यक्रम जोरों पर है/ और ये कोई आज की बात नहीं/ यह तो सांस्कृतिक कार्यक्रम है/ जो चलता रहता है/ धार्मिक अनुष्ठानों के साथ- साथ..”
इस कविता में जहां एक ओर बिछी हुई लाशों का जिक्र है, वहीँ दूसरी ओर हत्यारों के नई चालों का जिक्र है. गौतम लिखते हैं – ” अब तो हत्यारों ने/ नए तंत्रों/ नए यंत्रों/ नए मन्त्रों से / वधस्थलों का ऐसा आधुनिकीकरण कर दिया है/  कि लाशें भी शामिल होती जा रही हैं/ अपनी मृत्यु के उत्सव में…”

इसके अलावा ‘स्त्री काल’ में प्रकाशित अन्य कविताएं भी पाठकों को झकझोरने में सफल हैं। इन कविताओं में स्त्री के विद्रोह, संघर्ष, आत्मसम्मान और अंतर्मन की उथल-पुथल के अलावा कई ‘रूप ‘ उपस्थित है। आशा है कि इसी तरह नव वर्ष में ‘स्त्री काल’ के इस ‘गुलदस्ते’ में नए समय की आहट और तेवर लिए कविताएं पढ़ने को मिलती रहेंगी।

अरुण चंद्र राय की कवितायें

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अरुण चंद्र राय

अरुण चंद्र राय प्रकाशक हैं. ‘ ज्योति पर्व’ प्रकाशन का संचालन करते हैं. संपर्क  : 9811721147

धान रोपती औरतों का प्यार


खेतों के बीच
घुटने भर कीच में
धान रोपती औरतों से पूछो
क्या होता है प्यार
मुस्कुराकर वे देखेंगी
आसमान में छाये बदरा की ओर
जो अभी बरसने वाला ही है
और प्रार्थना में
उठा देंगी हाथ
धान रोपती औरतों का प्यार
होता है अलग
क्योंकि होते हैं अलग
उनके सरोकार
उन्हें पता है
बरसेंगे जो बदरा
मोती बन जायेंगे
धान के गर्भ में समाकर
और मिटायेंगे भूख
उन्हें कतई फ़िक्र नहीं है
अपनी टूटी मडैया में
भीग जाने वाले
चूल्हे, लकड़ी और उपलों की
हां , उन्हें
फ़िक्र जरुर है
जो ना बरसे बदरा
सूख जायेंगी आशाएं

जब प्रेमी की याद आती हैं उन्हें
जोर जोर से गाती हैं वे
बारहमासा
और हंसती हैं बैठ
खेतों की मेढ़ पर
गुंजित हो उठता है
आसमान
ताल तलैया
इमली
खजूर
और पीपल
दूर ऊँघता बरगद भी
जाता है जाग
उनकी बेफिक्र हंसी से
फ़िक्र भरी आँखों
और बेफिक्र हंसी के
द्वन्द में जीता है
धान रोपती औरतों का प्यार

.
पानी लगे पैर

बचपन से
अब तक
सुनता आ रहा हूँ
पैरों में
पानी लगने के बारे में
सोचता भी आया
लेकिन कहाँ समझ पाया
मैं भी

औरतें
जो करती हैं
घरों/ खेतों में काम
उनके पैरों में
लगा होता है पानी
फैक्ट्री और दफ्तरों में
काम करने वाली औरतें भी
अछूती नहीं रहतीं

घुटने भर पानी लगे खेतों में
जो हरवाहे बनाते हैं हाल
जो मजूर बोते हैं धान
उनके पैरों में भी लगा होता है पानी
एक्सपोर्ट हाउस/एम् एन सी के कामगार
अपने सपनों के साथ
पैरों में लगाये होते हैं
अलग तरह का पानी
जो पैर
लक्ष्मी होते हैं
पूजे जाते हैं
उन पैरों में भी
लगा होता है पानी
बुरी तरह से
आज भी .

आँगन से घर
घर से दालान
दालान से खेतों तक
चकरघिन्नी खाती माँ के पैरों में भी
लगा होता था पानी
और लगा रहा वह
उमर भर
नहीं समझा गया
उसे या
उसके पानी लगे पैरों को
अलग बात है कि
उसके नहीं रहने के बाद सूना हो गया था
घर आँगन
अनाथ हो गए थे
खेत खलिहान, बैल-गोरु

जबकि
फटे हुए
विवाई भरे पैर
दिख भी जाते हैं
नहीं दिखता
पैरों में लगा हुआ पानी
चुपचाप लिपटा रहता है पानी
पैरों से किसी जोंक की तरह

आँखों के पानी की तरह
सुख-दुःख में
छलक नहीं उठता
पैरों में लगा पानी.

मजदूर औरतों की पीठ


मजदूर औरतों की पीठ
अक्सर दिख जाती है
पाथते हुए उपले
गढ़ते हुए ईट
उठाते हुए धान की बोरियां
हांकते हुए बैल , गाय
चराते हुए बकरी
एक्सपोर्ट हाउस में काटते हुए कपडे
सिलते हुए सपने
या फिर
गहराती रात में स्ट्रीट लाईट के नीचे
मजदूर औरतों की पीठ

शक्ति पीठ होती हैं
ये पीठ
जिन पर खुदा होता है
सृजन का इतिहास
तरक्की के राजमार्ग पर
नहीं होता कोई साथ
मजदूर औरतों की पीठ के लिए

अनुसन्धान होते हैं
सामाजिक और आर्थिक शोध
किये जाते हैं
इन पीठों के रंग पर
बनाई जाती हैं
नीतियां
लेकिन सब की सब
चली जाती हैं दिखा कर पीठ
मजदूर औरतों की पीठ को

जब दे रही होती हैं औरतें
धरने , ज्ञापन
लगा कर काले चश्मे
सनस्क्रीन लोशन
मजदूर औरतों की पीठ
दिखा रही होती हैं
सूरज को पीठ
और सूर्य का दर्प भी
पड़ जाता है मंद
मजदूर औरतों की पीठ के आगे

भले ही
दिख जाती हो
मजदूर औरतों की पीठ
कभी पीठ नहीं दिखाती हैं
ये मजदूर औरतें ।