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स्त्रीकाल देगा शर्मिला रेगे को ‘सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान ‘

३ जनवरी,  सावित्रीबाई फुले -जयन्ती की पूर्व सन्ध्या पर शर्मिला रेगे की किताब को सम्मान की घोषणा 

स्त्रीवादी पत्रिका , ‘ स्त्रीकाल, स्त्री का समय और सच’ के द्वारा ‘ सावित्री बाई फुले वैचारिक  सम्मान’ के लिए प्रथम सम्मान की घोषणा कर दी गई है . अर्चना वर्मा , अरविंद जैन , हेमलता माहिश्वर , अनिता भारती , बजरंग बिहारी तिवारी , परिमला आम्बेकर की सदस्यता वाले निर्णायक मंडल ने २०१५ के लिए शर्मिला  रेगे को उनकी किताब ‘ अगेंस्ट द मैडनेस  ऑफ़ मनु : बी आर आम्बेडकर्स  राइटिंग ऑन ब्रैहम्निकल  पैट्रीआर्की ‘ के  लिए  सम्मानित करने का निर्णय लिया . यह किताब 2013 में नवयाना प्रकाशन से प्रकाशित हुई है .

इस सम्मान के लिए २००८ से २०१३ तक हिन्दी में लिखी गई या अनूदित स्त्रीवादी वैचारिकी की  प्रकाशित किताबों पर विचार करते हुए निर्णायक मंडल ने कहा कि ‘ शर्मिला रेगे का अकाल-गमन और उनकी संभावनाओं का असमय समापन इस समय हमारे मन में सर्वोपरि है। हालाँकि हमारे नियमों के अनुसार लिखित अथवा अनूदित किसी भी रूप में हिन्दी में उपलब्ध किताबें ही पुरस्कार के लिये विचारणीय हैँ और शर्मिला रेगे ने यद्यपि अपनी मातृभाषा मराठी में भी पर्याप्त मात्रा में महत्त्वपूर्ण लेखन किया किन्तु उनकी कोई किताब अभी हिन्दी में उपलब्ध नहीं है। यह हिन्दी की कमी है, शर्मिला की नहीं। हम सब एकमत से यह अनुभव करते हैँ कि उनके काम और उनकी संभावनाओं को रेखांकित किया जाना चाहिए। हिन्दी की स्त्रीवादी सैद्धान्तिकी में शर्मिला रेगे की टक्कर का दूसरा काम आसानी से नज़र नहीं आता और उनके नाम, काम और प्रतिबद्धता की स्मृति को रेखांकित करना ज़रूरी लगता है। उनका लेखन और चिन्तन इतना महत्त्वपूर्ण है कि हिन्दी के पाठक समुदाय को यथाशीघ्र उपलब्ध होना चाहिये और इसके लिये एक अपवाद को जगह देना भी उचित ही होगा – इस निश्चहय के साथ कि उनकी पुस्तक को यथाशीघ्र हिन्दी में उपलब्ध कराने का दायित्त्व हमारा है।’
शर्मिला रेगे ( 7 अक्तूबर 1964 – 13 जुलाई २०१३ ) ने क्रान्ति सूर्य सावित्री बाई फुले स्त्री अध्ययन विभाग , पुणे विश्वविद्यालय का संचालन किया और राइटिंग कास्ट , राइटिंग जेंडर के लेखन के साथ दलित स्त्रीवाद की सैद्धांतिकी में महत्वपूर्ण पहल की. वे प्रसिद्द स्त्रीवादी विचारक रही हैं .

यह सम्मान पत्रिका के द्वारा  19 -20 फरवरी को , गया ( बिहार ) में  आयोजित होने वाले एक कार्यक्रम में दिया जाएगा. रेगे के लिए उनके किसी रिश्तेदार या पुणे विश्वविद्यालय के स्त्री अध्ययन विभाग को , जहाँ वे पढ़ाती थीं , सम्मान की राशि ( 12 हजार ) तथा प्रशस्ति पत्र दिया जायेगा.

निर्णायक मंडल का सम्मति नोट
स्त्रीवादी पत्रिका स्त्रीकाल के द्वारा ‘ सावित्रीबाई फुले वैचारिकी सम्मान’ की कडी मे पहले सम्मान के लिए हम शर्मिला रेगे ((7 October 1964 – 13 July 2013) की किताब “AGAINST THE MADNESS OF MANU”.B.R. Ambedkar’s writings on Brahmanical Patriarchy’की अनुशंसा करते हैं। उनका जीवन, चिन्तन और लेखन स्त्री के पक्ष से संघर्ष के लिये समर्पित रहा। उनकी अन्य किताबें “WRITING CASTE/ WRITING GENDER : NARRATING DALIT WOMENS TESTIMONIES”,”SOCIOLOGY OF GENDER :THE CHALLANGE OF FEMINIST SOCIOLOGICAL THOUGHT” भी इसी क्षेत्र में उनका बेहद महत्त्वपूर्ण योगदान है। अनुशंसित किताब का प्रकाशन 2013में हुआ जो उनके असामयिक निधन के कारण दुर्भाग्यवश उनका अंतिम काम रह गया।

शर्मिला रेगे एक समाजशास्त्री, स्त्री-पक्ष की मानवाधिकार-कर्मी और एक सजग लेखिका थीं । भारतीय स्त्री और स्त्रीवाद; खासकर दलित स्त्री और दलित स्त्रीवाद; की सैद्धांतिकी के लिए उनके कार्य आज के समय में बेहद महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक हैं। स्त्री- मुक्ति की चिन्ताओं को लेकर वे कई प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में लगातार लिख रही थी। शर्मिला जी समाज के सबसे वंचित तबके यानी दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक वर्ग की स्त्रियों के साथ खडी रही तथा उनके अधिकारों के मुद्दों पर काम करती रही।

शर्मिला रेगे का अकाल-गमन और उनकी संभावनाओं का असमय समापन इस समय हमारे मन में सर्वोपरि है। हालाँकि हमारे नियमों के अनुसार लिखित अथवा अनूदित किसी भी रूप में हिन्दी में उपलब्ध किताबें ही पुरस्कार के लिये विचारणीय हैँ और शर्मिला रेगे ने यद्यपि अपनी मातृभाषा मराठी में भी पर्याप्त मात्रा में महत्त्वपूर्ण लेखन किया किन्तु उनकी कोई किताब अभी हिन्दी में उपलब्ध नहीं है। यह हिन्दी की कमी है, शर्मिला की नहीं। हम सब एकमत से यह अनुभव करते हैँ कि उनके काम और उनकी संभावनाओं को रेखांकित किया जाना चाहिए। हिन्दी की स्त्रीवादी सैद्धान्तिकी में शर्मिला रेगे की टक्कर का दूसरा काम आसानी से नज़र नहीं आता और उनके नाम, काम और प्रतिबद्धता की स्मृति को रेखांकित करना ज़रूरी लगता है। उनका लेखन और चिन्तन इतना महत्त्वपूर्ण है कि हिन्दी के पाठक समुदाय को यथाशीघ्र उपलब्ध होना चाहिये और इसके लिये एक अपवाद को जगह देना भी उचित ही होगा – इस निश्चाय के साथ कि उनकी पुस्तक को यथाशीघ्र हिन्दी में उपलब्ध कराने का दायित्त्व हमारा है।

हम अंतिम निष्कर्ष पर हैं कि  शर्मिला रेगे द्वारा इतने कम समय में अपनी पूरी प्रतिबद्धता, लगन, ईमानदारी और सच्चाई के साथ किया गया इतना महत्वपूर्ण काम, दलित और गैरदलित स्त्रीवाद में उसी तरह मील का पत्थर साबित होगा जैसा कि सामाजिक क्रांतिसूर्य, भारत की पहली शिक्षिका, समाज सुधारक, कवयित्री, दार्शनिक, और स्त्री अधिकारों की पुरोधा सावित्री बाई फुले का माना जाता है। हमारे अनुसार शर्मिला रेगे ही स्त्रीकाल द्वारा घोषित सावित्रीबाई फुले सम्मान 2014 की सबसे पहली और सर्वोत्तम अधिकारिणी हैं।”.

अर्चना वर्मा , अरविन्द जैन , हेमलता माहिश्वर , अनिता भारती , बजरंग बिहारी तिवारी , परिमला आम्बेकर 

स्त्रीकाल : स्त्रीवादी चिंतन का आर्काइव

नूतन यादव

नूतन यादव दिल्ली विश्वविद्यालय  में पढ़ा रही  हैं. फेसबुक पर सक्रीय स्त्रीवादी टिप्पणीकार हैं. संपर्क  :09810962991

 ( स्त्रीकाल , स्त्री का समय और सच , प्रिंट के बाद ऑनलाइन रूप में भी लोकप्रिय है . अप्रैल 2014 के से हम यहाँ स्त्रीवादी विचार , आलोचना , साहित्य प्रकाशित कर रहे हैं. साल के अंत होते -होते इसे अब तक 1 लाख हिट मिल चुके हैं. औसतन एक पोस्ट प्रतिदिन के साथ . इसके फेसबुक पेज को अब तक 1700 से अधिक लाइक मिल चुके हैं  . इस बीच हमने कुछ लेखकों , कवियों , आलोचकों से , स्त्रीकाल में प्रकाशित रचनाओं , आलेखों में से उनकी पसंद के कुछ (कम से कम 5 ) पोस्ट पर  आलेख मंगवाये हैं . गुलज़ार हुसैन ने इस कड़ी में पांच कविता -पोस्ट पर लिखा है .  इनमें आशा पांडे ओझा , सोनी पाण्डेय , रजनी अनुरागी ,  अनिता भारती सुजाता तेवतिया और अवनीश गौतम की कवितायें शामिल हैं . आज नूतन यादव की समीक्षा , जो उन्होंने वसीम अकरम , शैलेन्द्र सिंह , रजनी दिसोदिया , अरविंद जैन के आलेखों  को पढ़ते हुए लिखा है , साथ ही उन्होंने स्त्रीकाल में प्रकाशित रेहाना के पत्र के हवाले से भी अपनी बात कही है . स्त्रीकाल के पाठकों से आग्रह है कि इस तरह की आलोचनात्मक टिप्पणी के साथ यहां प्रकाशित अन्य आलेखों और रचनात्मक साहित्य पर अपनी राय ‘ themarginalised@gmail.com पर भेजें . 2015 में हम आपकी अपेक्षाओं पर और अधिक खरे उतरने की कोशिश करेंगे.  ) 


नामों को क्लिक करने पर संबंधितों के आलेख पढ़ सकते हैं 


स्त्रीकाल के ऑनलाइन एडिशन में स्त्रीवादी आलेखों , चिंतन और वैचारिकी को पढ़ना हमेशा विचारोत्तेजक रहा  पिछले साल यहाँ अकादमिक आलेख , और स्त्री मुद्दों पर चर्चा का निरंतर प्रकाशित होते रहे . सुधा अरोड़ा , अर्चना वर्मा , अनीता भारती , अरविंद जैन , निवेदिता आदि जहां नियमित कंट्रीब्युट करते  रहे  हैं वहीं दर्जनो शोध और विचार आलेख यहाँ पढ़ने को मिले . मैं अपनी इस टिप्पणी में कुछ आलेखों पर बात कर रही हूँ , छोटी टिप्पणी की अपनी सीमा है .

यहाँ वसीम अकरम का एक आलेख है ‘ धर्म की खोखली बुनियाद में दबी स्त्री ’ वसीम ने अपने इस लेख में मुस्लिम समाज में तलाक से पैदा हुई समस्याओं का एक भावुक लेकिन संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है |इस आलेख में अकरम उत्तरप्रदेश के गाजीपुर जिले के एक कस्बे बहादुरगंज की मुस्लिम महिलाओं की तलाक के बाद पैदा हुई बद से बदतर परिस्थितियों का वर्णन किया है |ये वो स्त्रियाँ है जिन्हें शादी के बाद पति द्वारा या तो छोड़ दिया गया है या तलाक दे दिया गया है| अकरम ने इस आलेख में मुस्लिम समाज की खोखली धार्मिक सामजिक और सांस्कृतिक कुरीतियों का  बहुत कड़े और सधे शब्दों में खंडन किया है |मुफ़्ती मुल्ले धार्मिक ज्ञान के नाम पर क़ुरान और शरियत का हवाला देकर धार्मिक कट्टरता का प्रचार प्रसार तो करते है लेकिन अपनी स्त्रियों की दुर्दशा के प्रति आँखें मूंदे रहते हैं |मुस्लिम नेता भी अपने धर्म और उनके मानने वालों की  गिरती आर्थिक और सामजिक स्थितियों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़े हुए हैं |

‘ स्त्री एवं भाषा : तीसरी परम्परा की खोज एवं वैकल्पिक भाषावैज्ञानिक अध्ययन’ के लेखक प्रोफ. शैलेन्द्र सिंह ने भाषा को किसी दैवीय उत्पत्ति से अलग एक विशुद्ध सामाजिक वस्तु माना है,  जिसके निर्माण में स्त्री एवं पुरुष दोनों की बराबर की सहभागिता होती है |जिस प्रकार समाज निर्माण में दोनों की भूमिका अनिवार्य है उसी प्रकार भाषा निर्माण भी  स्त्री पुरुष दोनों में से किसी एक की उपस्थति और अभिव्यक्ति के अभाव में असंभव है | भाषा दोनों के साथ समान रूप से कार्य करती है किसी विशिष्ट भाषा की रचना ना तो स्त्री  की होती है और ना ही पुरुष की |लेखक ने स्त्री भाषा एवं सैद्धांतिकी को  अनेक भागों में विभाजित कर समझाने का प्रयास किया है | मूल सिद्धांत ,अतिवादी सिद्धांत  एवं वैकल्पिक सिद्धांत |लेखक मानता है कि स्त्री अध्ययन का उद्देश्य संसाधन निर्माण है तो मूल्य मानवीय और सीमा सार्वभौम है | स्त्री विमर्श को अकादमिक दायरों से निकाल कर सामाजिक यथार्थ के रूप में देखे जाने की जरूरत है |और इसी यथार्थ के साथ नए नए विषयों और नयी भूमिकाओं के लिए नयी स्त्री भाषा गढ़नी होगी

रजनी दिसौदिया ने अपने आलेख ‘शिक्षा में जातिगत और लिंगगत असमानता’ में कॉलेज की लड़कियों के बीच इस मुद्दे पर कराई गई  चर्चा के निष्कर्ष हमारे सम्मुख रखा है | वे लिखती हैं कि लडकियां लिंगगत असमानता पर मुखर होकर आवाज उठाती है | इस से जुड़े हर आयाम पर इन लड़कियों की  पैनी नजर है |इसके कई कारण भी वे गिनाती हैं जैसे ‘लड़कियों को लड़कों के मुकाबले स्कूलों में कम भेजा जाना’, ‘स्त्रियों और पुरुषों के बीच कामों का बँटवारा’ , सार्वजनिक स्थानो पर होने वाली छेड़छाड़ से लेकर बलात्कार तक’  आदि | लेकिन जातिगत असमानता के मूद्दे पर उनमें एक  ख़ास तरह की उदासीनता है  जिससे भविष्य में विशिष्ट प्रकार की स्थ्तियाँ पैदा होने की संभावना दिखती है | रजनी ने इस आलेख में जातिगत असमानता के कई पहलुओं को सामने रखा है  |उनके अनुसार “ ब्राह्मणवादी परम्परा ने सायास और अनायास : प्रत्येक भारतीय को यह सिखाया है कि ब्राह्मण, बनिया या ठाकुर होना कोई कमाल की बात है और चमार, चूहड़ा या धानुक होना कोई शर्मसार होने वाली बात है” | उन्होंने शिक्षा और अन्य सामाजिक समस्याओं के प्रति भी ब्राह्मणवादी मानसिकता पर कुठाराघात किया है | उच्च जातियों की राजनैतिक सांस्कृतिक अवसरवादिता को बहुत स्पष्ट रूप से पाठक के सम्मुख रखा साथ ही उनके द्वारा  निम्न और गैर सवर्ण जातियों को अलग अलग प्रकार से दबाने की कोशिशों को सामने लाने का प्रयास किया है  |अपने इस आलेख में आरक्षण पर सवर्णों की दया दृष्टि से लेकर निम्न जातियों की श्रम संस्कृति के अपमान आदि पर विस्तार से चर्चा की |

26 वर्षीय ईरानी महिला रेहाना जब्बारी को  आख़िरकार फांसी दे दी गयी |अपने साथ जबरदस्ती करने वाले की ह्त्या के आरोप में लभग सात साल की सजा काटकर 25 अक्टूबर को उसे फंसी दे दी गयी |अंतर्राष्ट्रीय हलकों में इस मामले की कड़ी भर्त्सना की गयी | । रेहाना की मां ने जज के सामने पूर्व खुफिया एजेंट मुर्तजा अब्दोआली सरबंदी की हत्या के आरोप में अपनी बेटी रेहाना की जगह खुद को फांसी दे दिए जाने की गुहार लगाईजिसे वहां की सरकार ने अनसुना कर दिया | उसने अंतिम समय में अपनी माँ के लिए एक पत्र लिखा जिसमें उसने अपनी माँ से कुछ बातें साझा की | स्त्रीकाल में वह पत्र पढ़ा जा सकता है .

उस पत्र के माध्यम से रेहाना को और उसकी मानसिक स्थिति को समझने में एक नयी दृष्टि मिलती है | रेहाना चली गयी लेकिन जाते जाते वो एक सवाल उठा गयी| स्त्रियों के लिए क्या जरूरी है जीना या सर उठाकर जीना | अपने पत्र में ये सवाल उठाती है कि कैसा होगा वो समाज जो एक स्त्री को उस पर यौन हमला करने वाले को मारने पर उस स्त्री को ही फाँसी की सजा देता होगा |इस तरह की सजा का प्रावधान रखने वाला समाज सीधे सीधे स्त्रियों को ये सन्देश देता हैं  कि गलती से भी वे  अपने दोयम दर्जे को न भूलें और अगर वे इस पुरातन पंथी समाज से किसी तरह की प्रगतिशील और आधुनिक समझ की अपेक्षा रखती हैं तो उन्हें इस तरह की सजाओं के लिए तैयार रहना होगा |

रेहाना की फांसी के बाद कानूनी सुधारों पर बात आरम्भ हो गयी है लेकिन यह  स्पष्ट है कि बात सिर्फ इरानी कानूनों पर बहस करने से पूरी नहीं होगी |भारत में भी तो इसी तरह के तथाकथित कानूनों से भरा समाज है जो स्त्रियों को बचपन से ही बलात्कारियों से लड़ने के बजाए उनसे भागने, बचने और डरने की सीख ( ट्रेनिंग या प्रशिक्षण ) देता है | बचपन से हम अपनी बच्चियों के दिमाग में ये बात दाल देते हैं कि रात  में बाहर नहीं निकलना चाहिए| हर बार किसी बलात्कार पर हमारा दिमाग हम बिना एक क्षण गँवाए ये सोचने के इस बात के लिए प्रशिक्षित कर दिया गया है कि हम उस बलात्कार के लिए जिम्मेदार एक कारण खोज लें |

प्रसिद्ध लेखक एवं कानूनविद अरविन्द जैन के आलेख शादी का झूठा आश्वासन यौन शौषण हमें कई कानूनी प्रावधानों और अड़चनों से वाकीफ कराता है . आज के दौर में लड़कियों की सुरक्षा एक बहुत बड़ी जरूरत है जिसके अंतर्गत उन्हें कानूनी सूचनाओं से वाकिफ कराना बहुत जरूरी है |अरविन्द जी का ये आलेख इसी तरह की महत्वपूर्ण जानकारियाँ देता है | इस आलेख में अरविन्द जी ने  शादी का झांसा देकर किसी लड़की के साथ शारीरिक रिश्ते बनाने और बाद में शादी से मना करने को बलाकार  के दायरे में लाने जैसी महत्वपूर्ण कानूनी सूचना विस्तार के साथ  पाठकों के साथ साझा की है| लेखक ने बलात्कार से पहले बलात्कार करने के कारणों में कामुक फ़िल्मी छवियों, उद्दाम फैंटसी ,और कई बार खानदान की इज्जत के नाप पर भी बलात्कार आदि को गिनाया है| कई ऐसे मामले सामने आते रहे हाँ जिनमें लड़की को शादी का झांसा देकर शारीरिक सम्बन्ध बनाए जाते हैं और ये सिलसिला तब तक चलता रहता है जब तक लड़की गर्भवती नहीं हो जाती  |चूँकि भारतीय अदालत कई बार इस तरह के सवाल उठाती रही हैं शादी के झाओठे वायदे करके  बनाये गए शारीरिक संबंधों को बलात्कार जैसे आपराधिक मामले में लाया जाए या नहीं |जयंती रानी पांडा बनाम पश्चिम बंगाल सरकार वाले मामले में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने भी  माना “अगर कोई बालिग लड़की शादी के वादे के आधार पर, शारीरिक रिश्ते को राजी होती है और तब तक इस गतिविधि में लिप्त रहती है, जब तक कि वह गर्भवती नहीं हो जाती, तो यह उसकी ओर से ‘स्वच्छंद संभोग’ के दायरे में आएगा |” “साथ ही बंबई उच्च न्यायालय ने  भी कहा भारतीय दंड संहिता की धारा-415 में ‘धोखाधड़ी’ के अपराध को परिभाषित किया गया है।  शादी का झूठा वायदा कर, जानबूझकर दिए गए प्रलोभन के बाद शारीरिक रिश्ते बनाना, ‘धोखाधड़ी’ की परिभाषा के तहत ‘शरारत’ के दायरे में आते हैं और दंडनीय अपराध है। (आत्माराम महादू मोरे बनाम महाराष्ट्र राज्य (1998 (5) बीओएम सीआर 201)”

इस तरह के कई मामले उच्चतम न्यायालय में भी सामने आये जिनमें लड़की की सहमती सिद्ध करके इस तरज के कुकृत्य को सिर्फ धोखाधड़ी माना गया लेकिन एक मामले में उच्चतम न्यायालय में न्यायमूर्ति ए.के माथुर और अल्तमस कबीर ने 2006 में एक अलग फैसला सुनाया जिसके अंतर्गत उन्होंने एक तार्किक किन्तु संवेदलशील धरातल पर माना किआरोपी ने  पीड़ित लड़की को राजी करते हुए सब किया लेकिन ये सब उसने उसे शादी के लालच में करवाया | और गवाहों की गवाही से पूरी तरह स्पष्ट होता है कि गवाह पंचायत की तरह काम कर रहे थे। आरोपी ने पंचायत के समक्ष स्वीकार किया कि उसने लड़की के साथ शादी करने का वायदा कर उसके साथ शारीरिक रिश्ते बनाये लेकिन पंचायत के सामने वायदे के बावाजूद वह पलट गया इससे साफ़ पता चलता है कि उसका शुरू से ही लड़की से विवाह करने का कोई इरादा नहीं था | न्यायालय भी अब ये मानते हैं कि इस तरह के मामले  ‘न सिर्फ घोर निंदनीय कृत्य है बल्कि प्रकृति से भी आपराधिक है |” इस तरह से शादी को धोखाधड़ी के लिए एक आधार मिलेगा और आर्थिक सामजिक वर्ग की लड़कियों पर एक दबाव बनाकर उनका शौषण किया जाता रहेगा  | लेखक का मानना है कि इस तरह के मामलों में न्याय प्रक्रिया और न्यायाधीश भी बंटे हुए दिखते हैं |ऐसे मामले सिर्फ आपसी समझ और सामजिक भागेदारी के साथ कानूनों में संशोधन से ही सुलझ सकते है |

बदलते समय की कवितायें

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गुलज़ार हुसैन


गुलज़ार हुसैन जितने संवेदनशील और बेहतरीन कवि हैं उतने ही अच्छे रेखा -चित्रकार. मुम्बई में पत्रकारिता करते हैं . संपर्क: मोबाईल न. 9321031379

( स्त्रीकाल , स्त्री का समय और सच , प्रिंट के बाद ऑनलाइन रूप में भी लोकप्रिय है . अप्रैल 2014 के से हम यहाँ स्त्रीवादी विचार , आलोचना , साहित्य प्रकाशित कर रहे हैं. साल के अंत होते -होते इसे अब तक 1 लाख हिट मिल चुके हैं. औसतन एक पोस्ट प्रतिदिन के साथ . इसके फेसबुक पेज को अब तक 1700 से अधिक लाइक मिल चुके हैं  . इस बीच हमने कुछ लेखकों , कवियों , आलोचकों से , स्त्रीकाल में प्रकाशित रचनाओं , आलेखों में से उनकी पसंद के कुछ (कम से कम 5 ) पोस्ट पर  आलेख मंगवाये हैं . गुलज़ार हुसैन ने इस कड़ी में पांच कविता -पोस्ट पर लिखा है .  इनमें आशा पांडे ओझा , सोनी पाण्डेय , रजनी अनुरागी ,  अनिता भारती , सुजाता तेवतिया और अवनीश गौतम की कवितायें शामिल हैं . यह गुलजार हुसैन , जो स्वयं कवि हैं और स्त्रीकाल में जिनकी कवितायें प्रकाशित हैं , के अपने चुनाव हैं , किसी सर्वोत्तम की सूची बनाने का यह प्रयास नहीं है . गुलज़ार के अनुसार वर्तमान में जिन समस्याओं से स्त्रियाँ सबसे अधिक जूझ रही हैं , उन्हीं विवध विषयों पर  आधारित कविताओं को उन्होंने प्राथमिकता दी है . स्त्रीकाल के पाठकों से आग्रह है कि इस तरह की आलोचनात्मक टिप्पणी के साथ यहां प्रकाशित अन्य आलेखों और रचनात्मक साहित्य पर अपनी राय ‘ themarginalised@gmail.com पर भेजें . 2015 में हम आपकी अपेक्षाओं पर और अधिक उतरने की कोशिश करेंगे.  )
इनकी कवितायें पढने के लिए ऊपर इनके नामों पर क्लिक करें :


‘स्त्री काल’ (वेबसाइट ) पर प्रकाशित कविताएं बदलते समय में करवट लेती हुईं नई पीढ़ी की आवाज़ हैं। इन कविताओं में स्त्री नए तेवर के साथ उपस्थित है। वह आँखों में आँखें डालकर बिना विचलित हुए सवाल करती है। इन नई कविताओं से लगभग गायब हो चुकी ‘प्रेम- पंक्तियों’ की जगह स्त्री-पुरुष के रिश्तों की नई पड़ताल है। पुरुषों को नई कसौटी पर कसती ये कविताएं स्पष्ट रूप से दुनिया को दो हिस्सों में बांटती हैं। एक वह हिस्सा है, जहां स्त्री अपने स्वाभिमान और अधिकारों के साथ स्वतंत्र है और दूसरा वह हिस्सा है, जहां वह पुरुषवादियों के जाल में फंसी हुई मुक्ति के लिए आंदोलित है। इन दोनों हिस्सों की कविताओं में पुरुषवाद पर कड़ा प्रहार है।

आशा पांडेय ओझा

आशा पांडे ओझा की कविता ‘ वो तिलचट्टा’ पुरुष के अंतर्मन की क्रूर वासनात्मक कुंठा को सामने लाती है। इस कविता में पुरुषों की यौन अभिव्यक्ति में छुपी संकीर्णता को सफल रूप से सामने लाया गया है। आशा लिखती हैं – ” किसी बस स्टॉप, रेलवे स्टेशन/ बाजार, राह चलते शहर, ऑफिस या कॉलेज में / बार- बार उसकी आँखें/  अँधेरे में, गर्म स्थान खोजती हुई/ तिलचट्टों सी रेंगती है जब मुझ पर/ या बार -बार छूने का करती है यत्न/भोजन ढूंढती फिरती तिलचट्टे के/ एक जोड़ी संवेदी श्रृंगिकाएं सी/ उसकी वासना के कीच से लिपटी गन्दी उँगलियाँ मुझे/ तब मैं खूबसूरत नहीं लगती खुद को/”
इन पंक्तियों में स्त्रियों को केवल देह और भोग की वस्तु समझने वाले पुरुषों के खिलाफ स्त्री मन का आक्रोश उभरा है। यह कविता वर्तमान में स्त्री विरोधी अपराधों के लिए जिम्मेदार पुरुषवादी मानसिकता पर चोट करती है।

इस कविता की कुछ और पंक्तिया देखिए-

” बचा -बचा कर नजर जांचती हूँ अपने अंगों को बार -बार/ सब कुछ ठीक है की तसल्ली के बावजूद/ कुछ गड्ढे से हो आए हों जिस्म पे/ उसकी पैनी नज़र से होता है यह आभास/ और तब अचानक/ मेरे बदसूरत हो जाने का एहसास होने लगता है मुझे/

इन पंक्तियों में घर से बाहर निकल कर काम काज करने वाली स्त्रियों की सबसे बड़ी समस्या को रेखांकित किया गया है। यहाँ स्त्री ताड़ती है पुरुष की दृष्टि और स्पर्श में घुली -मिली कुंठित मानसिकता को। स्त्री के मन में उपजी पुरुषवादियों के प्रति घृणा उसे स्वयं सुन्दर से बदसूरत में बदल देती है। इस कविता का चरम वहां है जहां स्त्री कह उठती है- ” तब मेरे अंदर जरा नहीं बचते/ नारी वाले कोमल एहसास/”
यहां स्त्री की घृणा के हिंसा में बदलने की जो प्रक्रिया है, वह कविता को प्रासंगिक और जरूरी बना देती है। इस कविता की अंतिम दो पंक्तियां बदलते समय की आक्रोशित स्त्री का चेहरा सामने लाती है। ये पंक्तियाँ हैं- ” हाँ, तब मैं पीटती हूँ उसे फिर जानवरों की तरह/ खो कर अपना आपा कभी- कभी बीच बाज़ार.”

अनिता भारती

धर्मों, संस्कारों और परम्पराओं के नाम पर बांधी गई स्त्री का विद्रोह सोनी पांडे की कविता ‘ ये जो पर्दा है…” में ज्वालामुखी के लावे सा फूट पड़ा है। यह कविता स्त्री के पुरूष की दासी बने रहने का पूर्ण अस्वीकार है। यहां स्त्री मन में स्वतंत्रता की आकांक्षा का प्रबल स्वर पुरुषवादियों की ओर से थोपी गई लिजलिजी परम्पराओं को धिक्कारता है। कुछ पंक्तियाँ देखिए- ” नैतिकता के साँचे में/ संस्कारों की सूई से/ सिली गई चादर/ और धर्म, कर्म पाखण्ड के/ सैंकड़ों बूटे टाँके गए/ मेरी सीमा रेखा से सटे पर्देे में/ इस पर्दे के बाहर पाँव रखते ही/ मैं घोषित कर दी जाउंगी/ बे-पर्दा औरत…”

सोनी की कविता में परम्पराओं की ड्योढ़ी लांघने  और नया पर्दा बुनने की जद्दोजहद स्त्री के जीवन संघर्ष को नया मोड़ देने की जिद का नाम है। यहां स्त्री केवल अपने अस्तित्व को बचाए- बनाए रखने के अलावा थोपे गए संस्कारों के तटबंध को तार- तार करने को व्याकुल है। पुरुषवाद के उस डोर को तोड़ने की कोशिश है यह कविता, जिस डोर के सहारे टिक कर पुरुष सदियों से विजय पताका लहराता रहा है।

कविता की कुछ पंक्तियों को देखिए, ” बह सकती है /अविरल, उन्मुक्त/ परम्पराओं की ड्योढ़ी उलाँघ/ बुन सकती है/ एक नया पर्दा/ जिसे सदियों से अपनी विजय पताका बना/ लहराता रहा पुरुष…”

कविता के अंत में पुरुष को ललकारती हुई स्त्री सवाल करती है। यह सवाल ही पुरुषवाद के लिए वर्तमान समय का सबसे बड़ा प्रश्न भी है। सदियों से बिछाए जाल को हटाती हुई स्त्री पूछती है- ” कहो पुरुष/ तुम क्यों नहीं रखते कल्याण कामना के लिए / असंख्य निर्जला व्रत?/ क्या ये सारे ठेके/ केवल मेरे हिस्से हैं?…”

सोनी पांडेय


अनिता भारती की कविता ‘हमें तुम्हारी बेटियां पसंद हैं ‘ दलित समाज से जुड़ी सबसे गंभीर समस्या की ओर इशारा करती है। इस कविता में दलित स्त्री को लगातार हाशिए पर करते चले जाने का रोंगटे खड़े करने वाला वर्णन है। यहां जवानी की दहलीज पर खड़ी दलित किशोरियों को किस तरह सवर्णवादी घरों में जानवरों की तरह जांच-परख कर कर रखा जाता है उसका मार्मिक चित्रण है। यहां सवर्ण स्त्री किसी ऐसी दलित लड़की को काम पर रखना चाहती है, जो केवल मन लगा कर काम कर सके।

कविता की कुछ पंक्तियाँ देखिए- ” बताओ तुम्हारी बेटियां/ काम करने में कैसी हैं?/ कामचोर तो नहीं?/साफ- सुथरे रहने की आदत है या नहीं?/ लालची तो नहीं खाने की?/ शौक़ीन तो नहीं ना/ मोबाइल, लिपस्टिक, टेलीविजन की?/ हमें जरूरत है/ ऐसी ही लड़कियों की/ जो हों अल्प वयस्क/ जो मन लगाकर काम कर सकें सारे…”

इस कविता से सवर्ण परिवारों की महिलाओं की दलित लड़कियों के प्रति गैर जिम्मेदारी से भरी सोच का पता चलता है। कविता इस समय के सबसे बड़े सवाल को उठाने में सफल रही है कि क्या दलित परिवार के आर्थिक रूप से कमजोर होने का खामियाज़ा दलित लड़की को एक गुलाम बनकर भुगतना पड़ता है? यह कविता वृद्ध होती सवर्ण स्त्री को उसके घरेलू कार्यों से छुटकारा पाने की मनःस्थिति को भी दर्शाती है।

रजनी अनुरागी की कविता ‘माँ ‘ बेटी और माँ के रिश्ते को बहुत अलग तरीके से सामने रखती है।  इस कविता में एक वृद्ध माँ के बारे में सोचती स्त्री थोड़ी सी सशंकित भी है कि क्या मैं खुद एक दिन माँ की तरह हो जाउंगी? यहां माँ के सब कुछ संभाल कर रखने का बहुत भावुक चित्रण हुआ है।
कुछ पंक्तियां देखिए- ” आज तक नहीं फेंकी मेरी छोटी फ्रॉक/ मेरा लिखा पहला अक्षर उसके संग्रहालय में / आज भी सुरक्षित है…”

रजनी अनुरागी


माँ- बेटी के बीच का यह मौन -संवाद मन को गहरे छू जाता है। यहां वृद्धावस्था के कारण माँ की आँखों की कम होती रोशनी, सुनने की कम होती क्षमता को लेकर चिंतित बेटी की मनःस्थिति कहीं से भी ख़ुशी ढूंढ लाने की है। माँ तो बेटी का हर दर्द महसूस कर ही लेती है- ” वह मुझे ठीक से नहीं देख पाती/ हाथों से देखती है मेरा चेहरा/ महसूसती है मेरा दर्द/ पोछती है अपने आंसू…”

माँ की पुराने चीजों को सहेजने की आदत एक बेटी की नजरों में एक बड़ी बात है, लेकिन बेटी उस तरह कहाँ से हो सकती है । कविता में बेटी कहती है- ” सोचती हूँ, क्या मैं भी एक दिन माँ जैसी हो जाउंगी/ लेकिन मुझमें इतनी सब्र कहाँ/ कि चीजों को संभाल कर रख पाऊँ/ मैं अभी से चीजों को भूलने लगी हूँ…”

 सुजाता तेवतिया

 सुजाता तेवतिया की कविता ‘ अगर नहीं होती गुफा मैं’ स्त्री के अंतर्मन के जटिल गांठों को खोलती है। यहाँ स्त्री- मन हवा में बदल जाने के उल्लास से भरा है। यहां निर्बंध, स्वतंत्र स्त्री कह रही है कि मैं प्यार सीखने लगूंगी फिर से।कविता में ‘आज’ का हर क्षण महत्वपूर्ण है । सुजाता लिखती हैं- ” कभी नहीं हो पाती मैं/ जैसे हो सकती हूँ आज!/ हवा हो जाती मैं शायद या बयार/ लेकिन सिर्फ बाढ़ हो पाती हूँ अक्सर!” इस कविता में ऊब को भूल आगे बढ़ने की बात है। यहाँ स्त्री के उत्साह से उसके सपने भी जुड़े हैं। वह पंख फैला कर उड़ना चाहती है। कुछ पंक्तियाँ देखिए- “तुम ऊब न जाओ/ चलो फिर से गाए वही कविता/ जिसमें मैं बन जाती थी चिड़ियाँ और तुम भंवरा..”

अवनीश गौतम

अवनीश गौतम की कविता ‘सफाई कार्यक्रम’ वर्तमान समय के राजनीतिक छल से पर्दा उठाती है। सियासी सत्ता से सम्मोहित नेताओं ने जिस तरह जन- समस्याओं से मुंह मोड़कर अपने फोटो छपवाने के लिए व्यर्थ नीतियों का सहारा लिया है, उससे उनकी कलई खुल गई है। गौतम की इस रोंगटे खड़ी देने वाली कविता में राजनीतिक दिशाहीनता पर बड़ा कटाक्ष है। कुछ पंक्तियाँ देखिए- ” सफाई कार्यक्रम जोरों पर है/ और ये कोई आज की बात नहीं/ यह तो सांस्कृतिक कार्यक्रम है/ जो चलता रहता है/ धार्मिक अनुष्ठानों के साथ- साथ..”
इस कविता में जहां एक ओर बिछी हुई लाशों का जिक्र है, वहीँ दूसरी ओर हत्यारों के नई चालों का जिक्र है. गौतम लिखते हैं – ” अब तो हत्यारों ने/ नए तंत्रों/ नए यंत्रों/ नए मन्त्रों से / वधस्थलों का ऐसा आधुनिकीकरण कर दिया है/  कि लाशें भी शामिल होती जा रही हैं/ अपनी मृत्यु के उत्सव में…”

इसके अलावा ‘स्त्री काल’ में प्रकाशित अन्य कविताएं भी पाठकों को झकझोरने में सफल हैं। इन कविताओं में स्त्री के विद्रोह, संघर्ष, आत्मसम्मान और अंतर्मन की उथल-पुथल के अलावा कई ‘रूप ‘ उपस्थित है। आशा है कि इसी तरह नव वर्ष में ‘स्त्री काल’ के इस ‘गुलदस्ते’ में नए समय की आहट और तेवर लिए कविताएं पढ़ने को मिलती रहेंगी।

अरुण चंद्र राय की कवितायें

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अरुण चंद्र राय

अरुण चंद्र राय प्रकाशक हैं. ‘ ज्योति पर्व’ प्रकाशन का संचालन करते हैं. संपर्क  : 9811721147

धान रोपती औरतों का प्यार


खेतों के बीच
घुटने भर कीच में
धान रोपती औरतों से पूछो
क्या होता है प्यार
मुस्कुराकर वे देखेंगी
आसमान में छाये बदरा की ओर
जो अभी बरसने वाला ही है
और प्रार्थना में
उठा देंगी हाथ
धान रोपती औरतों का प्यार
होता है अलग
क्योंकि होते हैं अलग
उनके सरोकार
उन्हें पता है
बरसेंगे जो बदरा
मोती बन जायेंगे
धान के गर्भ में समाकर
और मिटायेंगे भूख
उन्हें कतई फ़िक्र नहीं है
अपनी टूटी मडैया में
भीग जाने वाले
चूल्हे, लकड़ी और उपलों की
हां , उन्हें
फ़िक्र जरुर है
जो ना बरसे बदरा
सूख जायेंगी आशाएं

जब प्रेमी की याद आती हैं उन्हें
जोर जोर से गाती हैं वे
बारहमासा
और हंसती हैं बैठ
खेतों की मेढ़ पर
गुंजित हो उठता है
आसमान
ताल तलैया
इमली
खजूर
और पीपल
दूर ऊँघता बरगद भी
जाता है जाग
उनकी बेफिक्र हंसी से
फ़िक्र भरी आँखों
और बेफिक्र हंसी के
द्वन्द में जीता है
धान रोपती औरतों का प्यार

.
पानी लगे पैर

बचपन से
अब तक
सुनता आ रहा हूँ
पैरों में
पानी लगने के बारे में
सोचता भी आया
लेकिन कहाँ समझ पाया
मैं भी

औरतें
जो करती हैं
घरों/ खेतों में काम
उनके पैरों में
लगा होता है पानी
फैक्ट्री और दफ्तरों में
काम करने वाली औरतें भी
अछूती नहीं रहतीं

घुटने भर पानी लगे खेतों में
जो हरवाहे बनाते हैं हाल
जो मजूर बोते हैं धान
उनके पैरों में भी लगा होता है पानी
एक्सपोर्ट हाउस/एम् एन सी के कामगार
अपने सपनों के साथ
पैरों में लगाये होते हैं
अलग तरह का पानी
जो पैर
लक्ष्मी होते हैं
पूजे जाते हैं
उन पैरों में भी
लगा होता है पानी
बुरी तरह से
आज भी .

आँगन से घर
घर से दालान
दालान से खेतों तक
चकरघिन्नी खाती माँ के पैरों में भी
लगा होता था पानी
और लगा रहा वह
उमर भर
नहीं समझा गया
उसे या
उसके पानी लगे पैरों को
अलग बात है कि
उसके नहीं रहने के बाद सूना हो गया था
घर आँगन
अनाथ हो गए थे
खेत खलिहान, बैल-गोरु

जबकि
फटे हुए
विवाई भरे पैर
दिख भी जाते हैं
नहीं दिखता
पैरों में लगा हुआ पानी
चुपचाप लिपटा रहता है पानी
पैरों से किसी जोंक की तरह

आँखों के पानी की तरह
सुख-दुःख में
छलक नहीं उठता
पैरों में लगा पानी.

मजदूर औरतों की पीठ


मजदूर औरतों की पीठ
अक्सर दिख जाती है
पाथते हुए उपले
गढ़ते हुए ईट
उठाते हुए धान की बोरियां
हांकते हुए बैल , गाय
चराते हुए बकरी
एक्सपोर्ट हाउस में काटते हुए कपडे
सिलते हुए सपने
या फिर
गहराती रात में स्ट्रीट लाईट के नीचे
मजदूर औरतों की पीठ

शक्ति पीठ होती हैं
ये पीठ
जिन पर खुदा होता है
सृजन का इतिहास
तरक्की के राजमार्ग पर
नहीं होता कोई साथ
मजदूर औरतों की पीठ के लिए

अनुसन्धान होते हैं
सामाजिक और आर्थिक शोध
किये जाते हैं
इन पीठों के रंग पर
बनाई जाती हैं
नीतियां
लेकिन सब की सब
चली जाती हैं दिखा कर पीठ
मजदूर औरतों की पीठ को

जब दे रही होती हैं औरतें
धरने , ज्ञापन
लगा कर काले चश्मे
सनस्क्रीन लोशन
मजदूर औरतों की पीठ
दिखा रही होती हैं
सूरज को पीठ
और सूर्य का दर्प भी
पड़ जाता है मंद
मजदूर औरतों की पीठ के आगे

भले ही
दिख जाती हो
मजदूर औरतों की पीठ
कभी पीठ नहीं दिखाती हैं
ये मजदूर औरतें ।

सुजाता तेवतिया की कवितायें : अगर नहीं होती गुफा मैं और

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सुजाता तेवतिया

सुजाता तेवतिया चोखेरवाली ब्लॉग का संचालन करती हैं और दिल्ली वि वि के श्यामलाल कॉलेज में पढ़ाती हैं . संपर्क : ई-मेल : sujatatewatia@gmail.com

अगर नहीं होती गुफा मैं


अगर नहीं होती गुफा मैं
तो बन जाती नदी एक दिन।
जितना डरती रही
उतना ही सीखा प्यार करना
और गुम्फित हो जाना।
गुफाएँ कहीं चलती नहीं
इसलिए अगर नहीं होती लता मैं
तो बाढ हो जाती क्या एक दिन?
एक परी या तितली या पंखुरी
सूने गर्भगृह की पवित्र देहरी पर पड़ी हुई।
कभी नहीं हो पाती मैं
जैसे हो सकती हूँ आज !
हवा हो जाती मैं शायद या बयार ।
लेकिन सिर्फ बाढ हो पाती हूँ अक्सर !
एक भी अच्छा शब्द,
क्या करूँ ,
छूटा नहीं है मेरे लिए।
तुम ऊब न जाओ
चलो फिर से गाएँ वही कविता
जिसमें मैं बन जाती थी चिड़िया और तुम भँवरा।
तुम्हारी गुन गुनाहट से
मैं प्यार सीखने लगूँगी फिर से।
इसलिए शब्दसाज़ होना होगा
मुझे ही
अबकी बार।
अगर नहीं होते तुम भ्रमर तो
मैं नहीं गाती कभी कविता
मैं गद्य रचती।
मुझे फिर से तलाशने हैं
वे छंद जो गुफासरिता से बहते हैंं।
शापित आस्थाएँ अब भी वहाँ
दिया जलाती हैं
कि गुफाएँ पवित्र ही रहें ।
और चिड़िया – या जो भी कुछ
मैं बनूँगी इस बार-
जब तक बेदखल है
तब तक बार बार पढनी होगी वही कविता
जिसमें तुम बादल बनते थे और
धरा बन जाती थी मैं।

नहीं हो सकेगा प्यार

नहीं हो सकेगा
प्यार तुम्हारे-मेरे बीच
ज़रूरी है एक प्यार के लिए
एक भाषा …
इस मामले में
धुरविरोधी हैं
तुम और मैं।
जो पहाड़ और खाईयाँ हैं
मेरी तुम्हारी भाषा की
उन्हें पाटना समझौतों की लय से
सम्भव नहीं दिखता मुझे
किसी भी तरह अब।
इसलिए तुम लौटो
तो मैं निकलूँ खंदकों से
आरम्भ करूँ यात्रा
भीतर नहीं ..बाहर ..
पहाड़ी घुमावों और बोझिल शामों में
नितांत निर्जन और भीड़-भड़क्के में
अकेले और हल्के ।
आवाज़ भी लगा सकने की  तुम्हें
जहाँ नहीं हो सम्भावना ।
न कंधे हों तुम्हारे
जिनपर मेरे शब्द
 पिघल जाते हैं सिर टिकाते ही और
फिर  आसान होता है उन्हें ढाल देना
प्यार में …
नहीं हो सकता प्यार
तुम्हारे मेरे बीच
क्योंकि कभी वह मुकम्मल
 नहीं आ सकता मुझ तक
जिसे तुम कहते हो
वह आभासी रह जाता है
मेरा दिमाग प्रिज़्म की तरह
तुम्हारे शब्दों को
हज़ारों रंगीन किरनों में बिखरा देता है।

पाँव भर  जगह 

उसे अक्सर देखा
शाम के छह बजे छूटती है जब
भागती है मेट्रो की ओर
सिर्फ माँ होती है वह उस वक़्त
जिसके बच्चे अकेले हैं घर पर
नाम पूछो तो वह भी नही बता पाएगी।
पाँव-भर खड़े रहने की जगह खचाखच भीड़ में
बचाए रखना सिर्फ
उसका प्रयोजन है
किसी रॉड के सहारे से वह जमी रहती है
बेपरवाह धक्कों,रगड़ों और कोलाहल से
बस कुछ पल और
अगले स्टेशन पर मिल ही जाएगी सीट
और बस कुछ ही सालों में बड़े हो जाएंगे बच्चे
लग ही जाएगी नैया पार
फिर सो जाएगी कुछ देर आराम से सीट पर
यूँ भी आँख बंद करने भर की दूरी पर रहती है नींद।
शहर में नौकरी के बिना चलता भी नहीं है।
कभी तो मिलती ही नहीं सीट घर आने तक भी।
माँ कमातीं अगर कुछ पढी लिखी होतीं
जद्दोजहद मेरी कुछ कम हो जाती।
चलो अच्छा है जो जैसा है।
ग्यारहवीं में पढती बड़ी बेटी
पढती है बेफिक्र मन लगाकर
शायद वह जान पाएगी जल्दी ही कि
सारी कोशिश माँ की
पाँव-भर जगह बचाने की नहीं
आने वाली कई पीढियों को बचा लेने की कोशिश थी।

जो आएगा बीच में उसकी हत्या होगी 

तुमने कहा
बहुत प्यार करता हूँ
अभिव्यक्ति हो तुम
जीवन हो मेरा
नब्ज़ हो तुम ही
आएगा जो बीच में
हत्या से भी उसकी गुरेज़ नहीं
संदेह से भर गया मन मेरा
जिसे भर जाना था प्यार से
क्योंकि सहेजा था जिसे मैंने
मेरी भाषा
उसे आना ही था और
वह आई निगोड़ी बीच में
तुम निश्शंक उसकी
कर बैठे हत्या
फिर कभी नहीं पनपा
प्यार का बीज मेरे मन में
कभी नहीं गाई गई
मुझसे रुबाई
सोचती हूँ
इस भाषा से खाली संबंध में
फैली ज़मीन पर
किन किंवदंतियों की फसल बोऊँ
कि जिनमें
उग आएँ आइने नए किस्म के
दोतरफा और पारदर्शी
क्योंकि तुमने कहा था
जो आएगा बीच में
उसकी हत्या होगी ।

भागना था मुझे बहुत पहले 

भागना था मुझे बहुत पहले
लगभग उन्हीं वक़्तों में
जब सोचती थी -‘भागना कायरता है’
लेकिन ,भागना हिम्मत भी होती है
उन वक़्तों में
जब भागा जाता है
असह्य व्यवस्थाओं के निर्मम मकड़जाल से बचकर
जब भाग निकलते हैं हम
उनके पास से
जिनकी कुण्ठाएँ धीरे- धीरे
ग्रस लेंगी हमारे व्यक्तित्व को
भाग जाना बहुत बहादुरी है
उन कमज़ोर पलों में जब
अत्याचारी के चरणों में शीश
झुकाए रखने की आदत पड़ने लगी हो
और उस हिम्मत के पल में भी
जब अत्याचारी को बदल देने का मूर्ख दम्भ जागने लगा हो
गढ्ने के लिए अपने मुहावरे हर एक को
भागने की कायरता या हिम्मत का निर्णय
अपनी पीठ पर उठाना होता है
इसलिए भागना था मुझे बहुत पहले
अब इन वक़्तों में
जब कि उन खूँखार चेहरों से नकाब हट गए हैं
उनकी ढिठाई आ गई है सबके सामने
हद्द है
कि न भाग पाने की अपनी स्वार्थी कायरता को
मैंने उधारी शब्दों की परछाईं में अभी -अभी देख लिया है।

मनुस्मृति दहन के आधार : डा आम्बेडकर

( 25 दिसंबर को  ‘ मनुस्मृति दहन दिवस’  के रूप में भी मनाया जाता है , जिसे स्त्रीवादियों का एक समूह ‘ भारतीय महिला दिवस’  के रूप में मनाने का आग्रह भी रखता रहा है . मनुस्मृति शूद्रों -अतिशूद्रों के साथ -साथ स्त्रियों को भी अपने विधानों का शिकार बनाता है . मनुस्मृति से मुक्ति स्त्री की मुक्ति के लिए भी एक पहल है, जिसकी शुरुआत 25 दिसंबर 1927 को डा आम्बेडकर ने मनुस्मृति के दहन के साथ की थी.  डा आम्बेडकर ने अपने आलेख ‘ हिन्दू नारी का उत्थान और पतन ‘ में स्त्रियों की दुर्दशा का विधान रचाते मनु स्मृति की खबर ली है. पूरा आलेख स्त्रीकाल के दलित स्त्रीवाद अंक में पढ़ा जा सकता है . यहाँ हम आज मनुस्मृति दहन दिवस के अवसर पर इस आलेख का एक अंश प्रस्तुत कर रहे हैं . ) 
पूरा आलेख पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक करें : ‘ हिन्दू नारी का उत्थान और पतन ‘
प्राचीन काल की नारी की स्थिति से तुलना करने पर हमें दिखाई देता है कि आज की नारी घोर पतन की स्थिति में पहुँच गयी है. राजनीति में उनके योगदान के सम्बन्ध में भले ही कुछ संदेह हो, परन्तु बौद्धिक तथा सामाजिक क्षेत्र में उन्होंने ‘बहुत ही ऊँचा स्थान’ प्राप्त कर रखा था, इसमें कोई संदेह नहीं.  अथर्ववेद में आये इस प्रंसग से कि ब्रह्मचर्य-काल पूरा करने के उपरान्त कन्या विवाह के योग्य मानी जाये, यह स्पष्ट होता है कि उस काल की नारी उपनयन की भी अधिकारिणी थी.  श्रोत-सूत्र से हमें विदित होता है कि स्त्रियों को वेदाध्ययन कराया जाता था और वे वेद-मन्त्रों  का उच्चारण कर सकती थी .  और सबसे बड़ा प्रमाण तो पाणिनि का अष्टाध्यायी है, जिससे सिद्ध होता है कि स्त्रियाँ गुरुकुल में रहकर वेदों की विभिन्न शाखाओं का अध्ययन करती थी तथा मीमांसा में पारंगत होती थी.  पंतजलि का ‘महाभाष्य’ हमें बताता है कि स्त्रियाँ उस समय आचार्य भी थी और कन्याओं को वेद पढ़ाती थी. पुरुषों के साथ धर्म,दर्शन,अभ्यास आदि  गूढ़ विषयों पर स्त्रियों के शास्त्राथों के उदाहरण भी कम नहीं है.  जनक और सुलभा,याज्ञवल्क्य और गार्गी, याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी तथा शंकराचार्य और विद्धाधरी के शास्त्रार्थ यह दर्शाते है कि मनुस्मृति के पहले के युग में स्त्रियाँ ज्ञान व शिक्षा के क्षेत्र में, उच्चतम शिखर पर पहुँच सकती थी.

भारतीय इतिहास इस बात को निर्विवाद रूप से सिद्ध कर देता है कि एक युग ऐसा था, जिसमे स्त्रियाँ अत्यंत सम्मान की दृष्टि से देखी जाती थी.  डॉ.काशी प्रसाद जायसवाल की पुस्तक ‘हिन्दू राजतंत्र’ के अनुसार राजाओं के राज्याभिषेक में प्रमुख भाग लेने वाले रत्नों  में रानी भी एक होते थी.  और जिस प्रकार राजा अन्य रत्नों  का अर्चन –वंदन करता था, उसी प्रकार रानी का भी करता था.  यही नहीं, अपनी प्रधान रानी के अतिरिक्त अपनी नीची जातियों की पत्नियों की भी वह सम्मान पूजा करता था.  इसी प्रकार अभिषेक के पश्चात राजा श्रेणियों की प्रमुख महिला का भी वंदन करता था!विश्व के इतिहास की दृष्टी से भी नारियों की उपर्युक्त स्थिति अत्यंत गौरवपूर्ण थी.  इस स्थिति में उनके पतन के लिए कौन दोषी ठहराया जा सकता है ? निश्चय ही इसका श्रेय हिन्दुओं के विधायक मनु को प्राप्त है, इसमे की कोई गुन्जाइश नहीं है. प्रमाण-स्वरूप स्त्रियों के सम्बन्ध में,मनुस्मृति के कुछ विधान प्रस्तुत किये जा रहे है:
स्वभाव एष नारीणां  नराणामिहदूषणम .  
अतोर्थान्न प्रमाद्यन्ति, प्रमदासु विपश्चित: 
अविद्वामसमलं लोके,विद्वामसमापि  वा पुनः 
प्रमदा द्युतपथं नेतुं काम क्रोध वाशानुगम 
मात्रस्वस्त्रदुहित्रा वा न विविक्तसनो भवेत्  
बलवान इन्द्रिय ग्रामो विध्दांसमपि कर्षति !
अर्थात:-पुरुषों को अपने जाल में फंसा लेना तो स्त्रियों का स्वभाव ही है! इसलिए समझदार लोग स्त्रियों के साथ होने पर चौकन्ने रहते है, क्योंकि पुरुष वर्ग के काम क्रोध के वश में हो जाने की स्वाभाविक दुर्बलता को भड़काकर स्त्रियाँ, मूर्ख  ही नहीं विध्द्वान पुरुषों तक को विचलित कर देती है! पुरुष को अपनी माता,बहन तथा पुत्री के साथ भी एकांत में नहीं रहना चाहिए,क्योंकि इन्द्रियों का आकर्षण बहुत तीव्र होता है और विद्वान भी इससे नहीं बच पाते .
नैता रूपं परीक्षन्ते नासां वयसि संस्थिति:
सुरूपं व विरूपं वा,पुत्रनित्येव भुजन्ते 
पौंश्चल्याच्चलचित्ताच्च, नैस्नेह्याच्च स्वभावतः
 रक्षिता यत्नतोअपीह भर्तुष्वेता विकुवते
एवं स्वभावं ज्ञात्वाअअसां प्रजापति निसर्गजम 
 परमं यत्नमातिष्ठेत्पुरुषों रक्षणं प्रति 
श्य्यासनमलंकारं कामं क्रोधं अनार्जवम 
द्रोहभावं कुचर्या च स्त्रीभ्यो मनुरकल्पयत !
अर्थात:- पुरुषों में स्त्रियाँ  न तो रूप का विचार करती है, न उसकी आयु की परवाह करती है!सुरूप हो अथवा कुरूप,जैसा भी पुरुष मिल जाये उसी के साथ भोग-रत हो जाती है. सदा पुरुष-संग की इच्छा रखने वाली ,चंचल-चित्त तथा स्वभाव  से निष्ठुर होने के कारण,कितने भी यत्न  से क्यों न रखी जाये, स्त्रियाँ पतियों  के प्रति निष्ठावान नहीं रह जाती है.  ये दुर्गुण स्त्रियों में सृष्टि के आदि काल से ही विधमान है, अत:पुरुष को बड़े यत्न से रक्षा  करनी चाहिए . सृष्टिकर्ता ने,नारी की रचना करते समय ही उसमे अपनी शय्या,आसन ,आभूषण,के प्रति मोह तथा काम,क्रोध ,बेईमानी ,द्वेष -भाव एवं चरित्रहीनता से दुर्गुण कूट-कूट कर भर दिये .

मनु की दृष्टि में स्त्रियों का क्या स्थान था, वह उपर्युक्त उदाहरणों से स्पष्ट है. स्त्रियों के प्रति मनु के विधान का यह एक नमूनामात्र है. मनु के विचार से स्त्रियों को किसी भी  दशा में स्वतंत्र नहीं होने देना चाहिए, यथा:

अस्वतंत्रता: स्त्रियः  कार्या: पुरुषै स्वैदिर्वानिशम 
विषयेषु च सज्जन्त्य: संस्थाप्यात्मनो वशे
पिता  रक्षति कौमारे भर्ता यौवने 
रक्षन्ति  स्थाविरे पुत्र,न स्त्री स्वातान्त्रयमर्हति 
सूक्ष्मेभ्योपि प्रसंगेभ्यः स्त्रियों रक्ष्या विशेषत:
 द्द्योहिर कुलयो:शोक मावहेयुररक्षिता:
इमं हि सर्ववर्णानां पश्यन्तो  धर्ममुत्तमम
 यतन्ते भार्या भर्तारो  दुर्बला अपि
अर्थात:- पुरुषों को अपने घर की सभी महिलाओं को चौबीस घंटे नियन्त्रण में रखाना चाहिए और विषयासक्त स्त्रियों को तो विशेष रूप से वश में रखना चाहिए! बाल्य काल में स्त्रियों की रक्षा पिता करता है! यौवन काल में पति  तथा वृधावस्था में पुत्र उसकी रक्षा करता है! इस प्रकार स्त्री कभी भी स्वतंत्रता की अधिकारिणी नहीं है! स्त्रियों के चाल ढाल में ज़रा भी विकार आने पर उसका निराकरण करनी चाहिये ! क्योंकि बिना परवाह किये स्वतंत्र छोड़ देने पर स्त्रियाँ दोनों कुलों (पति व पिता ) के लिए दुखदायी सिद्ध हो सकती है! सभी वर्णों के पुरुष इसे अपना परम धर्म समझते है! और दुर्बल से दुर्बल पति भी अपनी स्त्री की यत्नपूर्वक रक्षा करते है!

बालया वा युवत्या वा वृदध्या वापि योषिता
 न स्वतंत्रयेन कर्तव्यं किंचित्कार्य गृहेश्वपी 
बाल्ये पितुर्वशे तिष्ठेत्पानि ग्राहस्य यौवने 
 पुत्राणां भर्तारि प्रेते न  भजेत्स्त्री स्वतंत्रताम !
 पित्र भर्त्र सुतैर्वापी नेच्छेद्विरहमात्मनः 
एषां हि विरहेण स्त्री  गर्ह्ये कुर्यादुभे कुले!
अर्थात: स्त्री को,  चाहे वह बालिका हो, युवती हो अथवा वृध्दा हो, अपने घर में भी कोई कार्य स्वंतंत्रतापूर्वक नहीं करनी चाहिए.  बाल्यावस्था में अपने पिता के,यौवनावस्था में अपने पति के और पिता के न रहने पर उसे अपने पुत्रों के अधीन बन कर रहना चाहिए कभी भी स्वतंत्र नहीं रहना चाहिए .  स्त्री को अपने पिता ,पति और पुत्रों से अलग कभी नहीं होना चाहिए. ऐसी स्वच्छंद स्त्रियाँ निश्चय ही दोनों (पिता व पति)के कुलों की भी बदनामी कराती है.  मनु के विधान में स्त्रियों को पति से सम्बन्ध –विच्छेद (तलाक) का अधिकार नहीं है:

एतावानेव पुरुषो यज्जयात्मा  प्रजेति  ह 
 विप्रा: प्राहुस्तथा चैतद्धोभर्ता  सा स्मृतांगना 
अर्थात: स्त्री और पुरुष मिलकर एक व्यक्तित्व बनाते है. विप्रों का कथन है कि जो पति है वही पत्नी है.

पति-पत्नी के रूप में स्त्री-पुरुष के अविच्छेद-सम्बन्ध-संबंधी मनु के विधान को बहुत से हिन्दू बड़ी श्रधा से देखते है और यह समझते है कि  विवाह-सम्बन्ध चूंकि आत्मा का मिलन होता है,इसलिए मनु ने उसे अविच्छेद बताया है, परन्तु मनु का विधान यहीं तक सीमित होता,तो कोई बात न थी.  आश्चर्य तो यह है कि  वह अविच्छेदता केवल स्त्री के लिए है, पुरुष के लिए नही . यह विधान स्त्री को तो पुरुष से बांधकर रखता है, परन्तु पुरुष को पूरी स्वतंत्रता प्राप्त है! इस विधान में पुरुष स्त्री को छोड़ने का अधिकार ही नहीं, उसको बेचने का भी अधिकारी है! यदि कोई बंधन है, तो यह है कि स्त्री स्वतंत्र  नहीं हो सकती,  भले ही वह बेच  दी जाए या त्याग दी जाये !देखिये इस सम्बधं में मनु की व्यवस्था:
न निष्क्रय विसर्गाभ्यांभर्तुभार्या विमुच्यते
  एवम धर्म विजानीम: प्राकप्रजापति  निर्मितं!
अर्थात:  पति द्वारा त्याग दिये जाने तथा किसी दूसरे के हाथ बेच दी जाने पर भी कोई स्त्री दूसरे की पत्नी नहीं कहीं जा सकती .  उसके विवाहित पति का उस पर आजन्म अधिकार बना रहेगा.
इससे बढ़कर  भी राक्षसी मनोवृति कोई हो  सकती है,इसमें संदेह है, परन्तु स्मृतिकार मनु का उद्देश्य तो बौद्ध -काल में स्त्रियों को मिली स्वतंत्रता का अपरहण करना था.  उन्हें अपने विधान के औचित्य अथवा अनौचित्य से क्या लेना देना था?उन्हें तो स्त्रियों की स्वतंत्रता से सिर में पीड़ा हो रही थी और इस पीड़ा के निवारण का एक ही उपचार,स्त्रियों की स्वतंत्रता का अपहरण था, उन्होंने किया. धन सम्पति के विषय में मनु ने पत्नी को एक दास से अधिक नहीं समझा ,यथा:
भार्या पुत्रश्य दासश्य त्रय एवाधना: स्मृता:
 यत्ते समधीगच्छन्ति  यस्य ते तस्य तद्धनम !
अर्थात :- स्त्री-पुत्र  तथा दास की अपनी कोई धन-संपत्ति  नहीं होती है! जो कुछ ये कमाते है, वह इनका अपना न होकर पति,पिता और स्वामी का ही माना जाएगा! आगे चलकर मनुस्मृति कार ने विधवा पर दया करके, उसे निम्नलिखित अधिकार दिये  है:
१.यदि स्वर्गीय पति संयुक्त परिवार का सदस्य था तो विधवा को गुजारा मिल सकता है!
२.यदि मृत पति अलग होकर रहता था,तो उसकी सम्पति में विधवा का हक तो है, परन्तु व्यवस्था व नियंत्रण में स्त्री का कोई हाथ नहीं रहेगा!
भार्या पुत्रश्च दासश्च प्रेष्यो भ्राता च सोदर:
 प्रप्तापराधास्ता डया: स्यू र  …. वा वेणुदलेन  वा !
अर्थात:- पत्नी ,पुत्र, दास, शिष्य तथा अपने रक्त-सम्बन्ध का भाई यदि अपराध करे, तो उसे रस्सी या फाटे बांस से मारा जा सकता है !इसप्रकार मनु के विधान में स्त्री को शारीरिक दंड देने का अधिकार भी पति को दिया गया है.  इसके अतिरिक्त मनु के विधान में स्त्रियों को ज्ञान प्राप्त करने अथवा वेदाध्ययन का अधिकार नहीं दिया गया है.

अमन्त्रिका तू कार्येयं स्त्रीणां भावृदशेषत:
संस्कारार्थ शरीरस्य यथाकालं यथा क्रमम्
अर्थात :-निर्धारित कालक्रम के अनुसार स्त्रियों के जो संस्कार किये जायें, उनमे वेद-मन्त्रों का पाठ न किया जाये . ब्राह्मण संस्कृति में यज्ञ –कर्म धर्म ही आत्मा माना गया है,परन्तु मनु ने स्त्रियों को इस धर्म-कार्य से भी वंचित रखा है .  इस संबन्ध  में उनका आदेश निन्मलिखित है:

न वै कन्या न युवतिर्नाल्प विद्धो बा बालिश:
 होता स्यादग्निहोत्रस्य नर्तोनासंस्कृतस्तथा!
नरके हि पतन्त्येते जुह्वतः  स च यस्य तत
तस्माद्वैता  न कुशलो होता स्याद्वेदपरागः 
अर्थात:- कन्याएँ युवतियां ,थोड़ा पढ़े -लिखे लोग,कुपढ,बीमार अथवा संस्कार-रहित व्यक्ति यज्ञ के होता न बनाये जायें, वरना होता और यजमान दोनों नरकगामी होंगे . धर्म लाभ से स्त्रियों को वंचित रखने के लिए उनको स्वयं तो यज्ञ करने के लिए अयोग्य ठहराया है,मनु ने ब्राह्मणों पर भी बंधन लगा दिया कि वे भी स्त्रियों के लिए यज्ञ न करे. इस प्रकार  न स्वयं  यज्ञ कर सकती है, न ब्राह्मणों के द्वारा करा सकती है. ब्राह्मणों पर रोक लगाने के लिए मनु ने निम्नलिखित विधान बनाया :

न श्रोति यतते ग्रामयाजिकृते तथा 
स्त्रिया क्लीबेन च हते भुन्जीत ब्राह्मण:क्वचित्
अश्लीलमेतत्साधूनां यत्र जुह्वत्यमी हवि:
 प्रतीप मेतद्देवानां तस्मात्तत्परिवर्जयेत!
अर्थात:- जिस यज्ञ में श्रोत्रिय आचार्य न हो, जिसमे समस्त ग्राम अध्वर्यु हो तथा जिसमे स्त्री  व नपुंसक होता हो,ऐसे यज्ञ को अश्लील माना जाता है,ब्राह्मण ऐसे यज्ञ में भोजन न करे .

और अब जरा स्त्रियों के लिए मनु द्वारा निर्धारित जीवन-आदर्श को भी देखिए:
यस्मैदद्धपित्तात्तात्वेनां भ्राता  चानुमते पितु:
 तं शुश्रुषेत जीवन्तं  संस्थितं च न लंघयेत
विशील: कामवृत्तो वा गुनैर्वा परिवर्जित:
 उपचर्य:स्त्रिया  साध्व्या सततं देववत्पति:
नास्ति स्त्रीणां प्रथग्यज्ञों न व्रतं नीप्युपोषितम
पतिं शुश्रुषते येन तेन स्वर्गे महीयते 
अर्थात :-स्त्री का पिता अथवा पिता की सहमति से इसका भाई जिस किसी के साथ उसका विवाह कर दे,जीवन-पर्यन्त वह उसकी सेवा में रत रहे और पति के  न रहने पर भी पति की मर्यादा का उल्लंघन कभी न करे . स्त्री का पति दु:शील, कामी तथा सभी गुणों से रहित हो तो भी एक साध्वी स्त्री को उसकी सदा देवता के सामान सेवा व पूजा करनी चाहिये . स्त्री को अपने पति से अलग कोइ यज्ञ ,व्रत या उपवास नहीं करनी चाहिए , क्योंकि उन्हें अपने पति की सेवा-शुश्रुषा से ही स्वर्ग प्राप्त हो जाता है.   यहाँ पर मनु की उन व्यवस्थाओं को दे देना भी उपयुक्त रहेगा, जिन्हें स्त्रियों के लिए हिन्दू, अत्यंत श्रेष्ठ व अनुकरणीय आदर्श घोषित करते है:

अनृतादृतुकाले  च मंत्र्संस्कारकृत्पति:
सुखस्य नित्यं दातेह परलोके च योषिच: 
सदा प्रह्ष्टया भाव्यं गृहकार्येषु दक्षया
 सुसंस्कृतोपस्करया  व्यये चामुक्तहस्तया 
अर्थात:-विधिवत मन्त्रों द्वारा गृहीत पति,स्त्री के लिए हर काल व ऋतु में सुखदायक है. लोक-परलोक दोनों में उससे सुख ही मिलता है. अत: उसे सदैव प्रसन्निचत्त रहना चहिएऔर गृह -कार्य को दक्षतापूर्वक करते हुए व घर के बर्तन आदि को साफ़ रखे तथा खर्च में मितव्ययिता बरते.  और आगे दिये जा रहे श्लोक में स्त्रियों के वध को एक हल्का अपराध (उप-पातक)बताकर मनु ने स्त्रियों की जड़ता पर मुहर ही लगा दी :
धान्य कुप्य पशुस्तेयं मद्यप  स्त्री-निषेवणम
 स्त्री शूद्र विटक्षत्र वधो नास्तिक्यं चोपपातकम !

पिछले दिनों पटना में मनु का पुतला जलाया गया

अर्थात:- धान्य,कुप्य ,पशुओं की चोरी, मद्दपान करने वाली स्त्री से प्रसंग, नास्तिकता तथा स्त्री,शूद्र  ,वैश्य तथा क्षत्रिय का वध करना,ये सब उप-पातक है. इस श्लोक में शूद्र ,वैश्य व क्षत्रियों के वध को उप-पातक की बात तो समझ में आ सकती है,क्योंकि मनु ब्राह्मण के वध को महापातक और उसकी तुलना में अन्य वर्ण के लोगों के वध को मामूली पातक  ठहराना चाहते थे, लेकिन इसके साथ सभी वर्णों के पूरे स्त्री समाज को घसीट लेना यही सिद्ध करता है की स्त्रियों के पूरे वर्ग को हेय  दृष्टि से देखते थे . इन उद्धरणों के उपरान्त भी कोई संदेह कर सकता है की भारत में स्त्रियों के अध्:पतन का कारण स्मृतिकार मनु नहीं थे ?अधिकांश लोग इस तथ्य को जानते हुए भी दो बातों से अभिज्ञ प्रतीत होते है. वे यहीं नहीं जानते की इसमें मनु का योगदान क्या है? स्त्रियों के प्रति मनुस्मृति में दी गई व्यवस्थाएओं  कोई नयी या मनु की इजाद की हुई नहीं है. ये सब ब्राह्मण एवं ब्राह्मणवाद की विचारधारा का प्रतिनिधित्व करती है. मनुस्मृति के पूर्व ये सब विचार सामाजिक मान्यताओं के रूप में विद्धमान थे.  मनुस्मृति में केवल उन सब मान्यताओं के रूप परिवर्तन करके धर्म-शास्त्र तथा राज्य-विधान बना दिया गया .

दूसरी बात, जो प्राय: लोग नहीं जानते, यह है कि मनुस्मृति में आखिर स्त्रियों  और शूद्रों पर इतनी अयोग्यताएं क्यों थोपी गयीं ?इसका स्पष्ट कारण है यही है कि बौद्ध –काल में समाज में दो वर्ग(स्त्रियाँ- शूद्र)बुद्ध-धर्म में अधिक श्रद्धा रखते थे और बड़ी संख्या में बुद्ध –धर्म को ग्रहण कर रहे थे,जिसके कारण ब्राह्मण धर्म की नींव ही हिली जा रही थी . अत: अपने धर्म की रक्षा के लिए मनुस्मृतिकार स्त्रियों का झुकाव बुद्ध-धर्म की ओर से मोड़ना चाहते थे . यही कारण है की मनु ने स्त्रियों पर इतनी पाबंदियां लगा दी की वह सदा के लिए पंगु हो जाये. प्रमाण –स्वरूप देखिये :
वृथा संकर जातानां प्रव्रज्यासु च तिष्ठताम 
आत्मन्स्त्यागिनाम चैव निवर्तेतोदकक्रिया 
पाषंडमाश्रितानाम च चरंतीनाम च कामतः 
गर्भ भतृदृर्हाम चैव सुरापीनाम च योषिताम 

अर्थात:-वर्ण-संकर,संन्यासी व आत्मघाती लोगों की पिण्डोदक क्रिया आवश्यक नहीं! इसी प्रकार उन स्त्रियों की भी पिण्डोदक क्रिया न की जाये, जो पाखंडी सम्प्रदाय का अनुसरण करती हों, स्वेच्छाचारिणी ,गर्भपात,पतिघात तथा सुरापान करने  वाली हो. इस व्यवस्था के लक्ष्य अन्य के अतिरिक्त निन्मलिखित दो लोग भी बनाये गये है:
१.प्रव्रज्यासु तिष्ठताम ,और
२.पाखण्डमाश्रीतानां योषितां
पहला शिकार प्रव्रज्या लेने वाले लोगों से तात्पर्य बौद्ध परिव्राजकों से है, जो गृह-त्याग कर संस्यासी का जीवन व्यतीत करते थे , दूसरी ओर पाखंडी सम्प्रदाय के संकेत से निश्चय ही  स्मृतिकार मनु का अभिप्राय बुद्ध-धर्म से है . इस प्रकार एक प्रकार से मनु ने यह प्रबंध कर दिया कि किसी परिवार का जो स्त्री या पुरुष बुद्ध-धर्म का अनुयायी बने , उसकी पिंडोदकक्रिया न की जाये . इसका प्रभाव यह पड़ता था की भयवश कोई स्त्री-पुरुष बुद्ध –धर्म ग्रहण ही नहीं करता और यदि कर लेता, तो परिवार के अन्य सदस्य उसे त्याग देते . स्मृतिकार मनु  बुद्ध-धर्म के सबसे बड़े विरोधी थे और उनका विचार था कि यदि घर-घर में बुद्ध –धर्म का प्रवेश  रोकना है,तो स्त्री समाज को अपनी मुट्ठी में रखना  आवश्यक है.  यही कारण है कि उन्होंने स्त्रियों पर इतने अधिक बंधन व अयोग्यताएं थोप दी.  इससे सिद्ध हो जाता है कि  नारियों के अधो:पतन का उतरदायित्व मनु पर है, न की बुद्ध पर.

सामूहिक नसबंदी के कारण भारतीय स्त्रियों की मौतें: लुटे हुए विकल्प व स्त्री गरिमा

 ( बिलासपुर में नसबंदी के कारण महिलाओं की मौत के कारणों की पड़ताल के लिए चार महिला -स्वास्थ्य संगठनों ने संयुक्त रूप से एक जांच दल बनाया . जाँच दल ने अपने बिलासपुर दौरे के बाद एक रिपोर्ट सौपी . रिपोर्ट की संक्षिप्त प्रस्तुति .)

सामुदायिक स्वास्थ्य  के क्षेत्र में कार्यरत चार संगठनों द्वारा निर्मित तथ्य अन्वेषी दल ने एक स्वतंत्र जांच समिति बनाने की पहल की ,जिससे बिलासपुर नसबंदी शिविर हादसे तथा १६ स्त्रियों की मृत्यु से जुड़े सवालों के जवाब मिल सकें! जाँच दल ने पाया कि इन स्त्रियों  में से अपोलो अस्पताल में भरती हुए कुछ गंभीर रोगियों में प्रो-केलिस्टोनिन का स्तर बढ़ा हुआ मिला जो सेप्टिसीमिया (रक्त-संक्रमण )की ओर इंगित करता है! पहली सात मौतों के बाद हुए शव विच्छेदन में पेरीटोनाइटिस (उदर झिल्ली में संक्रमण )तथा फेफड़ों व गुर्दों में भी संक्रमण के चिन्ह पाए गये! इनसे संकेत मिलता है कि शल्यक्रिया के दौरान या उसके पश्चात संक्रमण के कारण ये मौतें हुई ;न कि उन जाली दवाओं के कारण, जिनके बारे में काफी कुछ लिखा गया !

विष तथा न्याय –वैधक विशेषज्ञों के अनुसार किसी स्त्री के लिए जिंक फास्फाइड की प्राण घातक मात्रा ४-५ ग्राम होती है ,जो कि सिप्रोफ्लोक्सेसिंन की  ५०० मिली ग्राम की एक खुराक से कहीं ज्यादा है यह जानकारी भी इसी तर्क की पुष्टि करती है कि सिर्फ दवायें इन मौतों का कारण नहीं थी!   ‘ पापुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया’, ‘फैमिली प्लानिंग असोसिएसन  ऑफ इंडिया’ ,  ‘परिवार सेवा संस्थान’  और ‘ कॉमन हेल्थ’  इन चार संगठनों ने बिलासपुर शिविर स्थल का सर्वेक्षण किया,  सेवारत चिकित्सकों व अन्य कर्मचारियों  ,नसबंदी कराने वाली स्त्रियों तथा मृतकों के परिजनों के साक्षात्कार लिये !  जाँच दल ने छतीसगढ़ तथा समूचे भारत के लिए कुछ अनुशनासायें भी की हैं , जो हाल ही में दिल्ली में जारी की गई उनकी रिपोर्ट में शामिल है!    इसके बाद राज्य सरकार को भी शव विच्छेदन तथा दवाओं की प्रयोगशाला जांच की रिपोर्ट को सार्वजनिक करने को मजबूर होना पडा तथा मामले की जांच के लिए तुरंत राज्य समिति का गठन करना पडा!

जांच दल ने यह भी पाया की मृतकों के परिवार जनों को अस्पताल के केस –रिकार्ड तथा मृत्यु के संभावित कारणों की कोई जानकारी नहीं दी गई !  परिवार नियोजन पर सरकार दुवारा किये गये  खर्च का विश्लेषण करने से यह पता चला की वर्ष २०१३-१४ के लिए देश ने ३९६.९७ करोड़ रूपये महिला-नसबंदी पर खर्च किये, जो परिवार नियोजन पर कुल  खर्च का ८५% है! कुल ३९,२३९४५ स्त्रियों की नसबंदी की गई !इसका भी एक बड़ा हिस्सा यानि  ३२४.४९ करोड़ ,नसबंदी कराने वाली स्त्रियों को प्रोत्साहन राशि तथा हर्जाना देने में खर्च हो गया जबकि मात्र १४.४२ करोड़ शिविरों की व्यवस्था पर! हर्जाने में दी जाने वाली यह राशि प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों के बुनियादी ढांचे को मजबूत बनाने के लिए दी जाने वाली राशि  की ढाई गुना है!अब लगभग निष्क्रिय पडी,स्वास्थ्य के लिए जोखिम भरी निम्न श्रेणी की अस्पताल /शिविर सुविधा तक स्त्रियों को लुभा कर ले आने के लिए इतनी बड़ी धनराशि खर्च करना कहाँ की बुद्धिमत्ता है? यह गलत है और अस्वीकार्य भी!   वहीँ बच्चों के बीच अंतर रखने के तरीकों पर कुल वार्षिक बजट का १५%से भी कम खर्च किया गया !१.३%उपकरणों ,आवागमन ,IFC प्रक्रिया तथा कर्मचारियों के दैनिक भत्तों आदि पर खर्च हुआ! ठीक इसी प्रकार छतीसगढ़ राज्य के आंकड़े बताते है की परिवार नियोजन के मद के लिए निश्चित १५.५९ करोड़ का ८५% स्त्रियों के (१,१९,१०४  स्त्रियाँ ) नसबंदी मामलों के लिए खर्चा गया !१२,७६करोड क्षतिपूर्ति व प्रोत्साहन राशि पर तथा मात्र १% गर्भ निरोधक पर खर्च किया गया !

रिपोर्ट में विशेषत: इस बात पर जोर दिया गया है कि भारत सरकार  १९९४ में हुए ICPDकरार में एक हिस्सेदार है,जिसका मतलब है कि देश में परिवार नियोजन कार्यक्रम के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए  दम्पति को सभी विकल्पों की पूरी जानकारी देने के बाद परिवार नियोजन का अपना तरीका चुनने की आजादी होगी! हाल ही में सम्पन्न ‘लोकतांत्रिक लाभाशों में निवेश’ पर अंतररास्ट्रीय अंतर –मंत्रालयीन सम्मलेन के बाद हुई दिल्ली घोषणा में भारत सरकार ने ICPD-POA के प्रति अपनी प्रतिबद्धता एक बार फिर जाहिर की है!   तथ्य –अन्वेषी अभियान के परिणामों के बाद जांच दल ने निम्न सिफारिशें की है!

१.    स्वास्थ्य कर्मियों को दिए `जाने वाली प्रोत्साहन राशि पर रोक लगाई  जाए, जिनके लाभान्वितों में  चिकित्सक, नर्सो व अन्य सेवा कर्मी शामिल हैं ) . ये प्रोत्साहन राशियाँ चिकित्सकों को प्रेरित करती हैं कि  वे अस्पताल में उपलब्ध सुविधाओं की सीमा से आगे जाकर अधिक संख्या में नसबंदी करें !चाहे इसके लिए नियम  प्रक्रियाओं व गुणवत्ता नियमों को ताक पर ही क्यों न रख देना पड़ें !दल ने यह भी प्रस्ताव रखा की सिर्फ नसबंदी करवाने वाले व्यक्ति को दैनिक मजदूरी, क्षतिपूर्ति राशि व आवागमन के लिए पैसे दिए जाएँ !प्रोत्साहन राशि को स्वास्थ्य सुविधायें  सुदृढ़ करने व उपकरण खरीदने में उपयोग किया जाये!

२.    बच्चों के जन्म में अंतराल बढाने  के तरीकों जैसे ओरल पिल्स ,कंडोम व कॉपर टी को बढ़ावा दिया जाए और गर्भ निरोधन के नये साधन भी इनमें शामिल किये जाये . इनके अखंड व नियमित उपलब्धता पर जोर दिया जाये तथा इच्छुक दम्पतियों को उचित परामर्श देने का प्रशिक्षण भी स्वास्थ्य कर्मियों को मिले ,जिससे पूरी जानकारी के साथ स्वतंत्र चुनाव सुनिश्चित किया जा सकें !शल्य –क्रिया रहित पुरुष नसबंदी जैसे आसान व सुरक्षित तरीके को अधिकाधिक बढ़ावा देने पर जोर दिया जाय !

३.    बिलासपुर शिविर में शल्य –चिकित्सक ने ८३ शल्य क्रियाओं में से प्रत्येक में मात्र एक से डेढ़ मिनट का समय लगा. ऐसा उसने अपर्याप्त मूल सुविधाओं , कर्मचारियों की कम संख्या तथा एक बेकार पड़े गंदे अस्पताल परिसर के बावजूद किया .  जाँच दल ने पाया कि शिविर में भर्ती स्त्रियों की सहज गरिमा का भी कतई ख्याल नहीं रखा गया !शल्य क्रिया किसी फैक्ट्री की एसेम्बली लाइन की तरह हो रही थी, यहाँ तक की शल्यक्रिया के लिए इन स्त्रियों को नियत स्थिति में लाने का काम पुरुष कर्मियों दुवारा किया जा रहा था और शल्यक्रिया के पश्चात वे ही उन्हें पकड़ कर कक्ष से बाहर ले जा रहे थे ! शल्यक्रिया से पहले परिवार नियोजन के अन्य विकल्पों के बारे में बताने के लिए कोई परामर्श -सत्र आयोजित नहीं किया गया था ,न ही शल्यक्रिया के संभावित दुष्परिणामों की कोई जानकारी उन्हें दी गई थी !अर्थात इन स्त्रियों को चयन की स्वतंत्रता नहीं थी

४.    परिवार नियोजन सेवायें पूर्व निश्चित दिनों पर ,सरकारी अस्पताल में ही तथा पर्याप्त प्रशिक्षित चिकित्सकों एवं सेवाकर्मियों दुवारा दी जायें.  साथ ही मानक प्रक्रियाओं व गुणवत्ता को सुनिश्चित करने वाले निर्देशों का कड़ाई से पालन किया जाए.  सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों को सुदृढ़ बनाया जाये, मांग के अनुसार नियमित सेवा प्रदान करने के लिए जरुरी उपकरण व कर्मचारी उपलब्ध कराये जायें!

५.   ब्लॉक जिला व राज्य पर सभी अधिकारियों को नसबंदी प्रक्रियाओं व उनके गुणवत्ता मानकों के बारे में अवगत कराया जाना चाहिए ! सर्वोच्य न्यायालय के दिशा निर्देशों के अनुसार जिला गुणवत्ता  सुनिश्चयीकरण समितियों को सक्रिय बनाया जाये और परिवार नियोजन सेवाओं में गुणवत्ता सुनिश्चत करने में ख़ास भूमिका रहे! रोगी कल्याण समिति तथा ग्रामीण स्वास्थ्य ,स्वच्छता  व पोषण समितियों को समुदाय के लोगों की हिस्सेदारी द्वारा  सुदृढ़ किया जाये, जिससे स्वास्थ्य मामलों पर हमेशा नजर रखी जा सके !जांच दल ने पाया कि इस शिविर में स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय दुवारा जारी सेवा गुणवत्ता निर्देशों का प्रत्येक कदम पर उल्लंघन किया  गया! दरअसल समूचा कर्मचारी वर्ग सुरक्षा तथा गुणवत्ता मानकों से अनजान था.

६.    राज्य में चिकित्सकों के सभी रिक्त पदों को भरा जाये तथा ज्यादा से ज्यादा राज्यीय चिकित्सकों को नसबंदी शाल्यक्रिया का प्रशिक्षण दिया जाये! बिलासपुर जिले में मात्र तीन लेपेरोस्कोपिक (दूरबीन द्वारा शल्यक्रिया करने वाले)शल्य चिकित्सक हैं , जिनमें से एक अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं . जरुरत है कि जिला अस्पताल तथा सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर कार्यरत स्त्रीरोग विशेषज्ञों  व शल्य चिकित्सकों को दूरबीन द्वारा  शल्यचिकित्सा का प्रशिक्षण दिया जाये,जिससे मिनीलेप (लघु दूरबीन शल्य क्रिया) तथा शल्यक्रिया रहित पुरुष नसबंदी जैसे अधिक आसान व कम जोखिम वाले तरीकों को प्रचलन में लाया जा सके!

७.    औषधी  खरीद नीतियों में सुधार लाया जाए ताकि दवाओं की प्रभाव क्षमता विषाक्तता ,प्राणघातक  व उनके संघटकों के आधार पर उनकी गुणवत्ता पर नियमित रूप से दृष्टि  रखी जा सके. इस शिविर में जिन युवा माँओं की  मृत्यु हुई वे अपने पीछे नवजात शिशु और छोटे बच्चे छोड़ गई हैं .  इनमें से सबसे छोटा बच्चा मुश्किल से एक माह का है.  हालांकि राज्य सरकार  ने इन मातृ -विहीन बच्चों के लिए आर्थिक सहायता मुहैया  कराई है, फिर भी उनके समुचित पोषण व पालन के लिए उनके परिवारों को प्रशिक्षण की तत्काल आवश्यकता है. कई बच्चे अपने दादा- दादी या नाना –नानी की देखरेख में हैं, जिन्हें भी बोतल से दूध पिलाने में आवश्यक स्वच्छता व विसंक्रमण प्रक्रियाओं में मार्गदर्शन चाहिये .   दल ने प्रस्ताव रखा कि आंगनबाड़ी कर्मियों को इन बच्चों की नियमित देखरेख का जिम्मा व प्रशिक्षण दिया जाये !  चारों संगठनों का मानना है कि स्थिति को सुधारने के लिए तत्काल कदम उठाने की आवश्यकता है, क्योंकि बिलासपुर में हुआ दुखद हादसा पूरे देश में परिवार नियोजन कार्यक्रम को पटरी से उतार सकने की क्षमता रखता है(. राज्य में मीतानिं के नाम से जानी  जाने वाली ‘आशा’ कर्मियों में से एक के शब्दों में कहें तो “अब किस मुँह से लोगों को नसबंदी के लिए बोलेंगे ?अब तो वे सामने चल कर भी आयें तो भी हम हिचकिचायेंगे !
अनुवाद : डा अनुपमा गुप्ता

रवींद्र के दास की कवितायें : माँ ! पापा भी मर्द ही हैं न !

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रवींद्र के दास

रवींद्र के दास के दो काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. कालीदास के मेघदूत का उन्होंने हिन्दी काव्य रूपांतरण भी किया है . संपर्क :मोबाईल: 08447545320
ई-मेल : dasravindrak@gmail.com

माँ! पापा भी मर्द ही हैं न!
बड़ी हिम्मत जुटा कर
सहमते हुए पूछती है माँ से
युवती हो रही किशोरी-
माँ! पापा भी मर्द हैं न?
मुझे डर लगता है माँ! पापा की नज़रों से…
माँ! सुनो न! विश्वास करो माँ!
पापा वैसे ही घूरते हैं जैसे कोई अजनबी मर्द…
माँ! पापा मेरे कमरे में आए
माँ! उनकी नज़रों के आलावा हाथ भी अब मेरे बदन को टटोलते हैं
माँ! पापा ने मेरे साथ ज़बरदस्ती की
माँ! पापा की ज़बरदस्ती रोज़-रोज़…
माँ! मैं कहाँ जाऊँ!
माँ! पापा ने मुझे तुम्हारी सौत बना दिया
माँ! कुछ करो न!
माँ! कुछ कहो न!
माँ! मैं पापा की बेटी नहीं, बस एक औरत हूँ?
माँ! औरत अपने घर में भी लाचार होती है न!
माँ! मेरा शरीर औरताना क्यों है!
बोलो न! बोलो न! माँ!

स्त्रियाँ ईश्वर की शरण में 

इस बात पर कोई विवाद न था
कि स्त्रियाँ धुरी हैं सभ्यता की
स्त्रियाँ सौन्दर्य हैं, सेवा है, त्याग है
….. यानी सद्गुण का मूर्तरूप हैं स्त्रियाँ
ये वाक्य
मंदिर में स्थापित देव-मूर्ति की भांति स्थापित थे
हम मनुष्य बड़े हुए थे
इन्हीं पवित्र वाक्यों को सुनते हुए

या तो हम स्त्रियों से संवाद नहीं करते
या उनके शब्द रहस्यमय थे हमारे लिए
ये तय नहीं था
पर एक अनिवार्य दूरी थी
क्योंकि सभ्यता पर इसका कोई वैसा असर था नहीं
यद्यपि संस्कृति
इस दूरी से अक्सर बौखला उठती थी
संस्कृति का बौखलाना हमें
कविता के लिए प्रेरित करता था

हमें इस बात का ख्याल नहीं रहता
स्त्रियाँ ब-ख़ुद कोई शख्स है
हम उसे हरसत से देखते
और उसकी तस्वीरें बनाते
नाचती स्त्री, संवरती स्त्री, उदास स्त्री …
और सोचते कि हमने सभ्यता का ऋण उतार दिया

उस उतरे ऋण वाले मनोभाव से
स्त्रियों को देखते
और पाते कि स्त्रियाँ मुस्कुरा रही हैं

स्त्रियों के पास अपनी भाषा नहीं होती
वे आपस में भी
हमारी भाषा में बातें करतीं
हम उनकी बातचीत पर नज़र रखते
और व्याकरण की अशुद्धि सुधारते

स्त्रियों की आँखें
हमारी सुधार की कोशिश को न स्वीकारती
पर हिली गर्दन से हम संतुष्ट हो लेते
हम पुरुष
अपने कर्तव्य निभा रहे के भाव में व्यस्त रहते
हमारी इस व्यस्तता को भांप
स्त्रियाँ बहुधा चली जातीं
ईश्वर की शरण में

ईश्वर की शरण में गई स्त्रियाँ
क्या कहतीं ईश्वर से
हम नहीं जानते
पर कल्पना करते कि वे
हमारे लिए दुआ मांग रही होंगी
उन्हें जो भी चाहिए, हम तो दे ही रहे हैं
तभी तो हम आह्लादित हो उठते
जब जातीं
स्त्रियाँ ईश्वर की शरण में

कमाती हुई स्त्री
स्त्री सबलीकरण पर लम्बा लेख लिखने के बाद
कुछ था,
जो रह गया था कहने को
इसके पीछे यह डर था कि इससे कमजोर हो जाएंगे तर्क
जिनका इस्तेमाल मैंने लेख में किया
मैंने लेख लिखते हुए इन तीनों,
मुनिया, मिसेज़ वर्मा और दीक्षा को एक नज़र से देखा
मैं कन्फेस करता हूँ मैंने ईमानदारी नहीं बरती

कमाने का अर्थ नकद पैसा कमाना है
इस अर्थ में
ये तीनों स्त्रियाँ कमाऊ हैं
घर घर जाकर काम करने वाली मुनिया
परिवर्तन से प्रभावित हो शिक्षिका बनी मि. वर्मा
और विदेशों में मनेज़मेंट वगैरह ऊँची डिग्री ले चुकी दीक्षा
लगभग एक समय निकलती हैं काम पे
मुनिया तीन हजार, मि. वर्मा तीस हजार और दीक्षा तीन लाख

मुनिया घर की रोटी जुटाती है
अपनी गिरस्ती चलाती है, बच्चे को पढ़ाती है
मि.वर्मा अपनी शिक्षा का इस्तेमाल करती है
और पैसों से मदद करती है पति की
दीक्षा जॉब इम्ज्वोय करती है, लेटेस्ट लाइफ जीती है
एक्साईटमेंट के नए नए रास्ते खोजती है

ये तीनों एक जमाने की औरतें हैं
तीनों हिंदुस्तान की बेटियाँ हैं
मैं इन तीनों को एक नज़र से देखना चाहता हूँ
पर हरबार बदल जाती है मेरी नज़र
मैं बहुत शर्मिंदा हूँ
मैं इन तीनों में स्त्री सबलीकरण का अर्थ खोजता हूँ
ये तीनों ही तो हैं –
कमाती हुई स्त्रियाँ |

एक उम्र निकल जाने के बाद 

घर वाले निस्पृह हो जाते है
घर में रहती बेटी से
जैसे कि उसका होना कोई बात नहीं
और रात्रि निवास के लगभग
माना जाता है उसका हक़

गोया बेटियाँ घर में नहीं रहती हुई
समेटे रहती है समूचा घर
अपने अंतर में
और चलती है संभल कर
जल से भरे जलद की मानिंद

जिस दिन जन्म लेती है बेटियां
उसी दिन से
चौकन्ने माँ-बाप, पुरुख-पुरखिन
संवारने संजोने में हो जाते हैं व्यस्त
कि जतन से … थोड़ा ध्यान से
पराए घर जाए
तो नाक न कटवाए हमारी

और उनके केलेंडर के हिसाब से
जब नहीं चली जाती हैं बेटियाँ
अपने उस पराये घर
बेहाल हो उठते माँ-बाप, सगे-सहोदर
कि हे प्रभु !
किस पाप का दंड है यह …
यह रिकार्ड चलना हो जाता हैं
तब बंद
जब पराए घर जाने वाली बेटियां
उसी घर के रकबे में
रहकर तलाशने लगती है अपनी ज़िन्दगी
बूढ़े होते माँ बाप की नज़रों से
जब हो जाती हैं अभ्यस्त
तो बेटियां एक आशाहीन ठूंठ की तरह
हिलती रहती हैं अपनी समय सारणी से

शाम को जब आती हैं वापस घर
उनके आने से
नहीं डोलता है एक तिनका भी
खुद ही निकाल फ्रिज से पीती हैं ठंडा पानी
और एक सांस जी लेती हैं और
एक उम्र निकल जाने के बाद

विज्ञापनों में बढती स्त्रियों की मांग से 

उनमें आत्म-निर्भरता आई है
साहूकारों के नए मुंशी
इस की फाँक को समझता है ठीक से
मुस्कुराता है खुल कर
कि हमें तो बस खोलना है खूँटे से
आगे इनकी जिम्मेवारी है खुद की
जो हम काम लेते है
तो दिलवाते है पूरे दाम
इसी बूते जो
ये टकरा जाए जमाने से
सर इनका फूटेगा
हम तो मजबूर हैं पेशे से
चाहे टूटे परिवार या संसार
दुनिया तो मर्दों की है

सुनो नदी !

जहाँ पहुँच कर स्वयं को भूल गई नदी
वह सागर नहीं
कोई जन-संकुल बाज़ार था
नदी रम गई,
मानकर कि समुद्र है.
यह अवधारणाओं में जीने का नतीजा था
नदी के एक आइना है
जिसे वो मन कहा करती है
आस पास के मछुआरे
अपनी मीठी तानों से नदी का हौसला बढ़ाते
गदराई नदी चल पड़ती
बहकती, बलखाती
अपनी कमर लचकाती

नदी उन्मत्त थी,
सराबोर थी,
आत्मग्रस्त थी
शायद, किसी दुविधा से त्रस्त थी
कि जैसे कोई जल्दी हो दूर जाने की

ऊँघती नदी की जब नींद खुली
कई सारी नदियाँ
निढाल पड़ी थी वहीं कहीं
वहां समुद्र नहीं था
बाज़ार भी नहीं था वहां
एक काँपता उजाड़ था
कई रसहीन, निर्वाक नदियाँ अवसन्न पड़ी थी

सुनो नदी !
सिर्फ़ बहना ही नहीं होता है सबकुछ
चलना होता है संभलकर
अन्दर चाहे पानी हो
या भरी हों आग की ज्वालाएँ

बहेलिया जानता है 

कि उन चिड़ियों की हवस है इस मुंडेर पर आने की
यहाँ रखे दाने चुगने की
ऐसे नहीं है कि बहेलिए ने सुच्चे दाने नहीं डाले
डाले
कई दिनों तक डाले
कि जब चिड़ियों के परिजन समझाएँगे
उकसायेंगे चिड़ियों को
उसके खिलाफ़
तो चिड़ियाँ ही उन्हें समझाएंगी
यकीन दिलाएंगी कि ये बहेलिया नहीं हमारा मसीहा है
अब,
जब चिड़ियाँ अभ्यस्त हो चुकी हैं
और उनके परिजन आश्वस्त
बहेलिये ने दानों में मिलाना शुरू कर दी है सुरूर की दवा
गोया चिड़ियाँ अब देर तक करती हैं
इसी मुंडेर पर मटरगस्ती
कि आसपास के जीव जंतु इन्हें मुंडेर की चिड़ियाँ कहने लगे हैं.
शक तो हुआ
कुछ परिजनों को, कुछ चिड़ियों के बढ़ते अल्हड़पन देख
टोका भी इन्होंने
कि चालबाज़ है बहेलिया
चिड़ियों ने पुराने दिनों का हवाला देकर
कर दिया मुंह बंद
और कर दिया साफ़ कि हम तालीमयाफ्ता हैं
अच्छी नहीं बात बात पे टोका टाकी
बहेलिया जानता है
चिड़ियों की अभिलाषा
वह जो चिड़ियों में उन्मत्तता के बीज बो रहा था
हवस को हवा दे रहा था
इन दिनों
बहेलिया कुछ दूसरे मुंडेरों पर दाने बिखेर रहा है

इस दुनिया को जितनी जल्दी हो बदल देना चाहिए

सीमा आज़ाद

ये आंखें हैं तुम्हारी
तकलीफ का
उमड़ता हुआ समन्दर
इस दुनिया को
जितनी जल्दी हो
बदल देना चाहिए

गोरख पाण्डे की ये कविता 16 दिसम्बर से ही बार-बार जेहन में आ रही है। पेशावर के स्कूल में जिस तरह बच्चों को मारा गया उसने कड़े दिल वालों को भी ‘उफ’ कहने पर मजबूर कर दिया। यह अमानवीयता की इन्तेहां है। जब अमानवीयता यहां तक जा  पहुंचे कि बच्चों की हत्या की जाने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि अब ये दुनिया रहने लायक नहीं बची, और इसे जितनी जल्दी हो बदल देना चाहिए। इस दुनिया के कारोबार ने कुछ लोगों को इतना संवेदनहीन बना दिया है कि वे दुनिया की सबसे कोमल सबसे कीमती चीज को रौंदने में भी नहीं हिचकिचा रहे हैं। हालांकि पेशावर की घटना अब तक की सबसे बुरी और जघन्य आतंकवादी घटनाओं में एक है, जिसकी निन्दा के लिए सिर्फ शब्दों का इस्तेमाल करना कम है, लेकिन असंवेदनहीनता का यह कृत्य नया नहीं है। पूरी दुनिया में ही नहीं हमारे अपने देश के अन्दर इस तरह की घटनाऐं होती रहती हैं ये अलग बात हैं कि हमारे देश में इन घटनाओं में जो बच्चे मारे जा रहे हैं, मीडिया के लिए वे महत्वहीन बच्चे हैं, और इन बच्चों को मारने वाले लोग महत्वपूर्ण हैं। इसलिए उनकी हत्या खबर का रूप लेकर लोगों को उस तरह दहला नहीं पाती है, जिस तरह पेशावर की घटना ने लोगों को दहलाया। जिस तरह इन हत्याओं का एक मकसद होता है उसी तरह इसे खबर बनाने या न बनाने का भी मकसद होता है, एक राजनीति होती है।

पेशावर की इस ताजा घटना सहित ऐसी जघन्य घटनाओं को अन्जाम देने वाले लोग आखिर कौन हैं? इनमें कई तरह के लोग हैं। कुछ वे लोग हैं जो हर कीमत पर सिर्फ अपना धर्म बचाना चाहते हैं, दुनिया को पीछे ले जाना चाहते है, मासूमों के कत्ल की कीमत पर भी।कुछ वे लोग हैं, जो इस धर्म पर चढ़कर हत्यारी राजनीति करना चाहते हैं और इसमें शामिल वह सत्ता भी है जो अपने लोगों को डराने के लिए ऐसे कामों को अन्जाम देती है।
पेशावर में जो हुआ वह तथाकथित धर्म बचाने के लिए। क्योंकि रूढि़वादी कट्टर धार्मिक नेता ये नहीं चाहते, कि बच्चे ऐसी आधुनिक शिक्षा हासिल करे जो उन्हें सोचने के निए विवेक भी दे, जो दुनिया के तमाम रहस्यों से धर्म का पर्दा हटाये, और उन्हें वैज्ञानिक दृष्टि प्रदान करे। इसी लिए उन्होंने पहले मलाला को मारा और उसे नोबेल पुरस्कार मिलते ही पेशावर के इन बच्चों को मारा। दूसरे तरह के लोग हमारे अपने देश में ही मौजूद हैं और इस समय तो डंके की चोट पर मौजूद हैं। ये वो लोग हैं जिन्हें ऐसा लगता है कि अपने धर्म की रक्षा के लिए दूसरे धर्म का खात्मा जरूरी है। याद कीजिये गुजरात के 2002 के जनसंहार को जब मुसलमान औरतों के गर्भ में आराम से पल रहे उन मासूमों को भी नहीं छोड़ा गया जिन्होंने अभी दुनिया देखी ही नहीं थी। यदि सबकी बात न भी याद हो तो कौसर बी का मामला तो सबके सामने आ ही गया था, जिसमें हिन्दूवादी हत्यारों ने उसका आठ माह का गर्भ तलवार से चीरकर उसके अजन्में बच्चे को बाहर निकाल कर उसे आग में फेंक दिया। इस तांडव में उन्होंने कई अन्य महिलाओं के गर्भ के बच्चों को उछालकर तलवार के नेजे पर रोपा गया। छोटे बच्चों को ऐसे ही अनगिनत जघन्य तरीकांे को से इसलिए मारा गया ताकि उस धर्म के वंशजों का सफाया किया जा सके। हजारों बच्चों और महिलाओं को इस जनसंहार में मार दिया गया, जिसका दुखद समापन राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने यह शर्मनाक बयान देकर किया कि ‘यह क्रिया की प्रतिक्रिया थी।’ उसी मुख्यमंत्री के प्रधानमंत्री बनने के पहले मुजफ्फरनगर में फिर वैसा ही कत्लेआम हुआ, जिसमें फिर से सैकड़ों मासूम बच्चे सिर्फ इसलिए मारे गये क्योंकि वे एक खास धर्म में पैदा हुए हैं जो कि ‘राजधर्म’ नहीं है। इस जनसंहार का खामियाजा वहां के मासूम बच्चे आज भी उठा रहे हैं ,क्योंकि उनके सर से छत ही छीन ली गयी है और वे आज कड़कड़ाती ठंड में मरने के लिए मजबूर हैं, यह उसी हत्या का विस्तार है।

ये तो धर्म से जुड़े हत्यारें हैं, जिन्हें किसी न किसी रूप में शासन सत्ता का सहयोग प्राप्त है , कहीं प्रत्यक्ष तो कहीं अप्रत्यक्ष। लेकिन कई जगहों पर सत्ता खुद मासूमों की ऐसी हत्याओ में शामिल है। मैं अव्यवस्था से होने वाली बच्चों की मौत की बात नहीं कर रही, बल्कि सीधे-सीधे इन हत्याओं में उनके शामिल होने की बात कर रहीं हूं और इसका उदाहरण भी हमारे देश में ही मौजूद है। अगर आपको याद नहीं आ रहा तो सलवा जुडुम को याद कीजिये। यह उन आदिवासियों के खिलाफ चलाया गया सरकारी अभियान था, जिनके लिए यह कहा जाता है कि वे माओवादियों से मिले हुऐ हैं। माओवादियों से इन लोगों को दूर करने के लिए जब इस अभियान की शुरूआत हुई तो इसने भी अमानवीयता की सारी हदें पार कर दी। आदिवासियों के घर जलाना, सामान लूटना लोगों को मारना, औरतों से बलात्कार करना, उनके स्तन काट लेना जैसी कार्यवाहियों के अलावा सलवा जुडुम के सिपाहियों, वहां मौजूद पैरामिलिटरी और सीआरपीएफ के जवानों ने छोटे बच्चों को भी अपने गुस्से  का निशाना बनाया। कई जगह पर उन्होंने मांओ की गोद से उनका बच्चा छीनकर गेंद की तरह दीवार पर दे मारा था। कई जांच रिपोर्टों में वहां के लोगों ने ऐसी घटनाओं का भी जिक्र किया है। कई जगह पर सैनिकों ने छोटे बच्चों को ऊपर उछालकर अपने राइफल की नोक पर उन्हें रोपा। इन तथ्यों के लगातार बाहर आते रहने और इस पर सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद भी सरकार उन अभियान को बन्द करने की बजाय इसे कई अन्य नामों से देश भर में चला रही है। इसका नया नाम ‘आॅपरेशन ग्रीन हण्ट’ है। और नजर दौड़ाये तो उसी पेशावर में अमेरिका जो कि पाकिस्तान को आतंकवाद से बचाने के नाम पर डटा हुआ है के द्रोनों ने न जाने कितने बच्चों की जान ले ली। अमेरिका की शह ही पर कुछ ही महीने पहले इजरायल ने फिलीस्तीन के हजारों बच्चों की निर्मम तरीके से जान ले ली। खुद अमेरिका में कुछ ही दिनों पहले हजारों लोग इस लिए सड़क पर उतर आये क्योंकि वहां की नस्लभेदी सोच का एक नमूना नमूदार हो गया। एक गोरे सिपाही जिसने एक काले बच्चे की बिना वजह हत्या कर दी, को वहां की कोर्ट ने बरी कर दिया।

पेशावर की घटना इन घटनाओं का ही विस्तार है, जिसने हर किसी को विचलित कर दिया। इस पर दुख जताने के बाद अब गुस्सा जताने का समय है। जब कोई समाज इतना हिंसक हो जाय कि उसमें मासूम, कोमल, हर किसी को सिर्फ खुशी देने वाले बच्चों की भी हत्या होने लगे तो यह कहना ही होगा कि बस अब बहुत हो गया अब यह दुनिया रहने लायक नहीं बची, अब इस दुनिया को जितनी जल्दी हो बदल देना चाहिए।

स्त्रीकाल -अंक 8

( स्त्रीकाल के प्रिंट एडिशन का यह ८ वां अंक है . ‘ वैयक्तिक / राजनीतिक’ विशेषांक का अतिथि सम्पादन   कवयित्री और स्त्रीवादी चिन्तक अनामिका ने किया था , इस अंक में ‘कैरोल हैनीच’ के आलेख ‘ पर्सनल इज  पोलिटिकल’ के साथ -साथ कई संग्रहनीय आलेख हैं. अभय कुमार दुबे , सुधा अरोड़ा , अनिता भारती , निवेदिता अरविन्द जैन , अनामिका प्रिदार्शिनी , हेमलता माहिश्वर , वैभव सिंह, स्वतंत्र मिश्र आदि  के आलेख शामिल हैं . )
स्त्रीकाल अंक ८ , वैयक्तिक /राजनीतिक

स्त्रीकाल अंक 8 , वैयक्तिक /राजनीतिक