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वसीम अकरम की कवितायें : आलू प्याज की बोरियां हैं लडकियां

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वसीम अकरम

वसीम अकरम युवा पत्रकार हैं . इन दिनों प्रभात खबर में कार्यरत हैं. संपर्क : ई -मेल : talk2wasimakram@gmail.com : 9899170273 

आलू प्याज की बोरियां हैं लडकियां
सही कहा तुमने
अब कोई जोधाबाई
किसी अकबर के घर नहीं जायेगी
और न फिर से
कोई दीन-ए-इलाही पैदा होगा
जहां धर्मों से ऊपर होता है एक इंसान।
मगर मेरे दोस्त, तुम यह भूल गये
के फिर कोई हुमायूं
किसी कर्मावती की हिफाजत की
कसम नहीं खायेगा कोई
और न फिर कहीं किसी
रक्षाबंधन की बुनियाद ही पड़ेगी…
सही कहा कि अब कोई जोधाबाई
किसी अकबर के घर नहीं जायेगी।
सिकंदर अपनी बेटी तुम्हें दे जायेगा या नहीं
यह तो मुझे नहीं मालूम
पर इतना जरूर मालूम है कि तुम्हारी बेटियां
भले ही आसाराम जैसों की शिकार हो जायें
उन्हें उस राक्षस के पास भेजने में
तुम्हें कोई ऐतराज नहीं होगा
क्योंकि वह नुमाइंदा है तुम्हारे धर्म का।
बलत्कृत हो रही हैं
तो होती रहें ये लड़कियां
तुम्हारे मंदिर-ओ-मस्जिद तो सलामत हैं!
खुदकुशी कर रही हैं, तो करती रहें
तुम्हारे दीन-ओ-धरम तो सालिम हैं!
तुम्हारे खुद के हाथों
अगर वो मर रही हैं, तो मरती रहें
तुम्हारे किताबों पर तो कोई आंच नहीं!
उनके मरने, लुट जाने से
तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़नेवाला
क्योंकि यह तुम्हारे धर्म का मामला नहीं है।
दरअसल, गलती तुम्हारी नहीं है
क्योंकि, तुम्हारी धर्म की ठेकेदारी
औरत की इज्जत पर ही टिकी है
तुम्हारे लिए औरतें और लड़कियां
महज आलू-प्याज की ऐसी बोरियां हैं
जिन्हें तुम अपने मन-भाव में
धर्म-जाति, शरिया-गोत्र की मंडियों में
बेझिझक बेच सकते हो
जो चाहे, कीमत लगा सकते हो उनकी
और इसी कीमत से तुम
पुरुष सत्ता के भुरभुरे खंभों को
मजबूत बनाते रहने की
नाकाम कोशिशें करते रहते हो।
कितने ओछे और कमजोर हैं तुम्हारे धर्म
जो मासूम प्रेम की चुनौती भी स्वीकार नहीं कर पाते
और गिरने लगते हैं भरभराकर
तुम इसमें दब के मर न जाओ
इसलिए औरत का सहारा लेते हो
कितनी कमजर्फ है तुम्हारी मर्दानगी
जिसकी इज्जत की हिफाजत भी नहीं कर सकती
उसी के सहारे
तुम अपने धर्मों की ठेकेदारी करते हो।
बिल्कुल सही कहते हो तुम मेरे दोस्त
अब कोई जोधाबाई
किसी अकबर के घर नहीं जायेगी…

लोकतंत्र में लोक

तुम अनाज उगाओगे
तुम्हे रोटी नहीं मिलेगी,
तुम ईंट पत्थर जोड़ोगे
तुम्हें सड़क पर सोना होगा,
तुम कपड़े बुनोगे
और तुम नंगे रहोगे,
क्योंकि अब लोकतंत्र
अपनी परिभाषा बदल चुका है
लोकतंत्र में अब लोक
एक कोरी अवधारणा मात्र है,
सत्ता तुम्हारे हाथ में नहीं
पूंजी के हाथ में है
और पूंजी
नीराओं, राजाओं
कलमाडियों और टाटाओं के हाथ में है,
तुम्हारी जबान, तुम्हारी मेहनत
तुम्हारी स्वतंत्रता, तुम्हारा अधिकार
सिर्फ संवैधानिक कागजों में है
हकीकत में नहीं,
तभी तो,
तुम्हारी चंद रुपये की चोरी
तुम्हें जेल पहुंचा देती है
मगर,
उनकी अरबों की हेराफेरी
महज एक
राजनितिक खेल बनकर रह जाती है।

 बाबा जी का लोटा

याद है न महाराज
बाबा जी का वह लोटा
हां-हां वही, शौच जाने वाला लोटा
एक दलित के छू जाने भर से ही
जो अशुद्ध हो गया था
अब उसमें गौमुत्र भरकर
बेचा जा रहा है बाजार में
अगर कोई बाजार हो भी तो वहां
विष्ठा का कोई मूल्य न हो शायद
लेकिन यह तो
धर्म का बाजार है महाराज
जहां इंसानों से भी
कहीं ज्यादा पवित्र होता है गौमुत्र
क्योंकि सैकड़ों देवी-देवताओं का वास है उसमें
इस देवत्व की विडम्बना देखिए कि
सर्वोपरि हो गयी है विष्ठा की निष्ठा
और गाय हमारी माता हो गयी है
मगर ईश्वर के बनाये
संबंधों की यह कैसी विद्रूपता है कि
बेचारा बैल, हमारा बाप न हो सका
जिसकी मजबूत खुरों ने
धरती की छाती चीरकर
मुंह के निवाले पैदा किये हमारे लिए….
क्यों, सही कहा न महाराज….

लेकिन सुबह तो हो

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नेह भारती

अनु अब भी कुछ समझाना चाह रही थी। लेकिन मैं नहीं रुकी। लगभग झटके से हाथ छुड़ाकर तेजी से सड़क की तरफ बढ़ी। एक आॅटोरिक्शा  सामने ही दिखा।
“सादतपुर चलोगे?“
आॅटोरिक्शा  ड्राइवर ने सहमति में सिर हिलाया तो मैं पीछे की सीट में धंस गयी। किक की आवाज हुई और इक्का-दुक्का वाहनों के बीच दिल्ली की सड़कों पर अंधेरे और सन्नाटे को चीरता हुआ आटोरिक्शा  हवा से बातें करने लगा। तेज ठंडी हवा से कंपकपी छूट रही थी, लेकिन दिमाग में मानो अब भी गरम सलाखें गड़ी हों।
“कम्प्रो, ये भी कोई बात हुई… कैसे-कैसे शब्द इजाद कर लेते हैं लोग, कुछ भी मतलब निकाल लो…“ मुझे अपने शब्द अब भी बार-बार याद आ रहे थे। अनु का चेहरा भी बार-बार आंखों के सामने आ रहा था। मेरी अच्छी दोस्त। मुझे कभी मिसगाइड नहीं कर सकती। न कभी डेमेारलाइज। शायद मैंने ही उसका मतलब गलत निकाला हो। या शायद वह मुझे किसी खतरे से आगाह कर रही हो। या फिर यूं ही सुनी-सुनाई बातें कर रही हो।
शाम तक कितनी खुश  थी मैं। पहली बार कायदे की नौकरी का आॅफर मिला था। कल ही सुबह ज्वाइन करने का आफर। ऐसी बात सबसे पहले अनु से ही शेयर करती हूं। लेकिन उससे मिलना मानो पहाड़ हो गया। उसके शब्द अब भी हथौड़े की तरह गूंज रहे हैं कानों में – “हां, अच्छा आॅफर है, लेकिन पहले पता लगा लो, सुना है कि इस कंपनी में कंप्रो ही टिक पाते हैं।”

“ये क्या है?“ मैं चैंकी।
“अरे नहीं जानती, कंप्रोमाइज। सुना है कि आजकल कई जगहों पर कंप्रो टाइप या कंप्रो नेचर लड़कियां ही टिक पाती हैं। कुछ सरकारी दफ्तरों में भी ये बीमारी आ गयी है।“
अनु अपने सामान्य ज्ञान का परिचय दिये जा रही थी। लेकिन मैं हतप्रभ। क्या मतलब है इसका? किस तरह का कंप्रोमाइज? कैसा समझौता? किससे? क्यों?
मुझे विचलित देख अनु भी थोड़ा परेशान हो उठी। मानो उसने ऐसा कहकर कोई अपराध कर दिया हो। लगी समझाने – “अरे, मुझे कोई उतना ठीक-ठीक मालूम नहीं। हो सकता है सब सुनी-सुनाई हो। हो सकता है तुम्हें सब ठीक-ठाक मिल जाये। इस कंपनी का मैंने कहीं सुना था तो बता दिया। इन  वालों के हाथ में तो बहुत पावर होते हैं न। देर रात तक रुकने को कह सकते हैं, दूसरे शहरों में टूर पर भेज सकते हैं। कुछ भी ऐसा करने को कह सकते हैं जिसे तुम्हारा दिल या दिमाग पसंद न करे। लेकिन इनका रहता है कि हर एम्प्लाई हर वक्त हर चीज के लिए तैयार रहे। यस बाॅस कहता रहे। बस इतना ही। यही है कंप्रो टाइप या कंप्रो नेचर।“

क्या वाकई बस इतना ही? लड़कियों के लिए भी इसका मतलब बस इतना ही होता होगा? किस तरह के कंप्र्रोमाइज करने पड़ते होंगे? भला कोई क्यों बताये अगर करने भी पड़ते हों तो? आॅफर की खुशी  काफूर हो चुकी थी। मैं किसी भी तरह जल्द-से-जल्द घर जाकर मम्मी के कंधे से चिपककर रोना चाहती थी।
दिल्ली की सड़कों के अंधेरे सन्नाटे को चीरता आॅटो रिक्शा  भागा जा रहा था। ड्राइवर एफएम रेडियो के चैनल बदल-बदलकर गाने सुन रहा था। बीच-बीच में गाने की कुछ पंक्तियां भी गुनगुना रहा था। इस बीच रेडियो जाॅकी ने दिल्ली की सड़कों पर लड़कियों के साथ घटनाओं को जोक्स के अंदाज में पेश  करना शुरू किया, बोला- “निर्भया कांड के बाद अब कैब कांड… लडकियां सीखें कराटे, गुंडों  को मारो चांटे…“
इसी वक्त मोबाइल के मैसेज बाॅक्स में पापा का एसएमएस आया- “वेयर आर यू बेटे, आॅल इज  वेल?“
“यस, आॅन वे टू होम।“ जवाब भेजकर मैं फिर ख्यालों में डूब गयी। आखिर किस बात की चिंता रहती है पापा को? देश  की राजधानी है दिल्ली। बच्ची नहीं हूं मैं। आखिर क्यों परेशान रहते हैं मम्मी-पापा? क्या निर्भया कांड से इतना डर गये हैं सब लोग? क्या कैब कांड के बाद लड़कियों को घर से निकलना बंद कर देना चाहिए इस गालिब और मीर की दिल्ली में?
अचानक आॅटो रिक्शा  दाहिनी सड़क की तरफ मुड़ा। मैं लगभग चीख उठी- “उधर कहां, सादतपुर तो बाईं तरफ से जाते हैं न, रोको आॅटो।“
आॅटो ड्राइवर चाल धीमी करता बोला- “उधर रोड पर काम चल रहा है मैडम जी, डायवर्सन से जाना होगा।“
रेडियो जाॅकी अब भी मजे ले-लेकर दिल्ली की सड़कों की कहानियां सुना रहा था। लड़कियों को कराटे के गुर सिखा रहा था। मैं बदहवास सी बोली- “रोको आॅटो, मैं खूब समझती हूं तुम सबकी चालबाजी।“
आॅटो रुक गया। मैं झटके से उतरी और तेजी से सड़क किनारे खड़े एक आॅटो की ओर लपकी।
“सादतपुर जाओगे?“
“हां मैडम, लेकिन रोड बन रहा है, डायवर्सन से जाना होगा।“ इस आॅटो का ड्राइवर बोला। मैंने असहाय भाव से पलटकर देखा। जिस आॅटो से आ रही थी, उसका ड्राइवर बेहद मासूमियत के साथ बुला रहा था- “आप चिंता न करो मैडम, हम वैसे नहीं हैं, चलो आपको पहुंचा देता हूं।“

पहली बार नजर पड़ी उसके उम्रदराज चेहरे पर। पकी दाढ़ी। झुर्रियों पड़े चेहरे पर अभिभावक जैसा भाव। मैं थोड़ी शर्मिंदा होती वापस आॅटो में बैठ गयी। आॅटो ड्राइवर मानो मेरे मनोभाव समझ रहा हो। सांत्वना के अंदाज में बोला- “आपका कसूर नहीं मैडम जी, आजकल दिल्ली में औरतजात कहीं सुरक्षित नहीं, न घर में, न आॅफिस, न सड़क पर। दुनिया कहां जा रही है और हम कहां भटके पड़े हैं।“
मैं चुपचाप सुनती रही। गुमसुम।
घर पहुंची तो पापा ने दरवाजा खोलते ही पूछा- “आओ बेटे, सब ठीक है न?“
“हां पापा, आॅफर तो अच्छा मिला है। कल ही फाइनल करना होगा। लेकिन समझ नहीं पा रही क्या करना है।“ मेरी आवाज में रुलाई थी। पापा ऐसे मौकों पर ज्यादा बात करने की बजाय खामोशी  पसंद करते हैं। ज्यादा कुछ पूछते भी नहीं। बोले- “डोंट वरी, डिनर लेकर आराम से सो जाओ बेटे, सुबह सोचना क्या करना है।”

पापा अक्सर ऐसा ही करते। किसी मामले पर सोच-विचार करने की नौबत आने पर कुछ समय के लिए टाल देते। कहते, अभी छोड़ दो। कल खुद समझ में आ जायेगा। कोई सामान गुम जाये तो कहते, अभी खोजना बंद करो, घंटे-दो-घंटे में खुद मिल जायेगा। मजे की बात यह कि प्रायः यह फार्मूला काम भी कर जाता।
मम्मी ने खाना परोसा। मैं गुमसुम एक-एक कौर टूंगती रही। बीच-बीच में मम्मी कुछ पूछती। कहां का आॅफर है, कितना मिलेगा, कैसी कंपनी है, क्या समझ में नहीं आ रहा, लोग तो अच्छे होंगे न….। मैं कुछ-कुछ जवाब देती रही। फिर जाकर बिस्तर पर लेट गयी। लेकिन नींद कहां? आंखें बार-बार खुल जातीं, कमरे की छत से टंग जाती।

सुबह सोचना क्या करना है। पापा का फार्मूला राहत देने वाला था। लेकिन सुबह तो हो। कल जो करना है सो तो अलग, लेकिन आज जो किया, वह भी तो नहीं भूलता। क्या आज ओवर रिएक्ट कर रही थी मैं। क्या अनु के साथ मेरा बर्ताव ठीक था? क्या आॅटो ड्राइवर को बुरा नहीं लगा होगा मेरे व्यवहार से? पापा क्यों परेशान रहते हैं मेरे लिए? मम्मी क्यों पूछती है कि कंपनी वाले लोग अच्छे तो होंगे न? रेडियो जाॅकी मजे ले रहा था कि आगाह कर रहा था? आॅटो ड्राइवर क्यों कह रहा था कि औरत जात के लिए डरावनी होती जा रही है दिल्ली।
दिल्ली। बेदिल दिल्ली? गालिब और मीर की दिल्ली? लुटियंस की दिल्ली? सत्तालोलुपों और कारपारेट दलालों की दिल्ली? किसकी दिल्ली? कैसी दिल्ली?
हर देल्हाइट  के लिए इसके अलग मायने हैं। पापा के लिए भी अलग। वह अक्सर गुनगुनाते- “गालिब-ओ-मीर की दिल्ली देखी, देख के हम हैरान हुए। उनका शहर लोहे से बना है, फूलों से कटता जाए है।”
मुझे काफी अच्छा लगता ऐसी चीजें सुनना। एक बार मैंने पूछा था- “पापा, ये आखिरी वाली लाइन समझाइये जरा। फूलों से कटता जाये है, इसका क्या मतलब? कटने यानी क्या? दूर होना? कि ये दिल्ली फूलों से दूर हो रही है?“
“अरे नहीं बेटी, यही तो कमाल है गोरख पांडे का। वो कहते हैं कि ये जो दिल्ली है, यह भले बनी हो लोहे की, लेकिन फूल इस लोहे को काट रहे हैं। कटने का मतलब दूर होना नहीं है बल्कि कटने का मतलब कटना ही है। यानी फूल से कट रहा है लोहे का शहर। समझो कि फूल की कोमलता से परास्त हो रही है ये दिल्ली।“ समझाते हुए पापा की आंखें चमक रही थीं।

फूलों से पराजित होती लोहे की दिल्ली। कमाल की बात। कवि की कल्पना। दार्शनिक  बात। लेकिन जो अनु कह रही थी, रेडियो जाॅकी और आॅटो ड्राइवर कह रहा था, वो सब क्या है? पापा जो वक्त-बेवक्त पूछते रहते हैं खैरियत, वो क्या है? किस दिल्ली की बात हो रही है यहां? किसकी दिल्ली? और ये जो कंप्रो है वो क्या है? हू विल कंप्रोमाइज? लोहा कि फूल?
सुबह सोचना क्या करना है। पापा का फार्मूला राहत देने वाला था। लेकिन सुबह तो हो। रह-रहकर कोई ख्याल आ रहा है। कभी किसी का चेहरा, कभी किसी की बात।
अनु ने ऐसा कुछ तो कहा नहीं था। कोई स्पेसिफिक बात नहीं थी। बस एक जनरल टाइप बात। एक अच्छी दोस्त की सदिच्छा से जन्मी आशंका भर। क्या यह वही बात नहीं हो मम्मी पूछती है, और जिसकी पापा को चिंता रहती है। आखिर क्यों हर वक्त डरना पड़े मुझे? क्यों चिंता करें मेरे दोस्त, मम्मी, पापा? लोहे और फूलों का यह कैसा रिश्ता  है दिल्ली में?

सब मुझे कहते हैं तुम देर से आयी दिल्ली। छोटे कस्बे में पढ़ाई के बदले पहले ही आ गयी होती तो आज दिल्ली में इतना स्ट्रगल नहीं करना पड़ता। मैं तो खुद आना चाहती थी दिल्ली। लेकिन पापा अकेले भेजने को तैयार नहीं थे। यूपी के जिस जिले या कस्बे में उनका तबादला होता रहा, वहीं से पढ़ाई। रिटायरमेंट के बाद दिल्ली आ बसे पापा, तो मुझे भी राजधानी में अपने पंख फैलाने मौका मिला है। लेकिन वह कौन सा डर था जिसके कारण मैं पहले नहीं आ सकी? आखिर वह क्या है जिसके लिए आज भी अनु कह रही है कि आजकल ये लोग कंप्रो नेचर को ज्यादा पसंद करते हैं?
आंखों से अब भी गायब है नींद। दूर कहीं एफएम रेडियो से पुराने गीत की धुन आ रही थी- आज की रात मुझे नींद नहीं आएगी, सुना है तेरी महफिल में रतजगा है।
उफ् ये उलझन, ये ख्याल। कैसी महफिल है ये और कैसा रतजगा। पापा कहते हैं सुबह सोचना क्या करना है। लेकिन सुबह तो हो।

अनु एकदम बिंदास है। साफ-साफ बोलने वाली। सामान्य ज्ञान जबरदस्त। ग्रेजुएशन करके किसी बीएड काॅलेज में नाम लिखाया था। लेकिन दो साल पढ़ाई के बाद पता चला कि काॅलेज की मान्यता ही गलत मिली थी। केस-मुकदमे में मामला उलझता गया। लेकिन इस झमेले ने अनु को दुनियादारी सिखा दी। उसकी बातों में व्यंग्य की मात्रा बढ़ती गयी। देश , दुनिया और समाज पर उसके कटाक्ष सुनने लायक होते। मैं करियर को लेकर जितना परेशान होती, वह भविष्य को लेकर उतनी ही बेपरवाह। दार्शनिक  अंदाज में कहती- “फिकर नहीं करते मेरी दोस्त, ये दुनिया एक संसार है। जब तक दुख है, तब तक तकलीफ है.”

अनु शब्दों की बाजीगरी करती। मैं असल सवाल पर टिकी रहती। क्या सारी चिंताएं हम लड़कियों के लिए ही हैं?
एक बार अनु अचानक गंभीर होकर बोलने लगी थी- “अरे नहीं पगली, असल चिंता तो हर उसकी है जो मेहनत-मजूरी की कमाई करे, ईमानदारी से जीना चाहे। भले वो औरत हो या मर्द। ये मामला सिस्टम का है। ज्यादा कमजोर लोगों के सामने ये सिस्टम जल्दी एक्सपोज होता है। जैसे महिलाओं के मामले में।“
मैं चुपचाप सुनती रहती। इन पहेलियों के बीच आखिर कहां है मेरे लायक एक सुरक्षित कैरियर? मेरे पापा कब होंगे मेरे व्हेयर-अबाउट को लेकर चिंतामुक्त?

“तुम सुरक्षा की बात करती हो? जब दिल्ली की सड़कों पर चलती बसों और कैब में हम लुट रही हैं तो हमारी सुषमा जी गीता को राष्ट्रग्रंथ बनाने को बेचैन हैं। बना दीजिये, आपकी सरकार है, किसने रोका है? लेकिन ये भी नहीं करना है, बस हमें असल सवालों से भटकाना मकसद है इनका।“ अनु ऐसे मौकों पर ऐसी ही उत्तेजना में बातें किया करती। फिर कहती- “अच्छा छोड़ो, तुम वो सुनाओ रघुवीर सहाय ने जो लिखा था गीता वाली पोएम में।“
मैं उत्साह के साथ सुनाती- “पढि़ये गीता, बनिये सीता, फिर इन सबमें लगा पलीता, किसी मूर्ख की हो परिणीता, निज घर बार बसाइये…। होंय कंटीली, आंखें गीली, लकड़ी सीली, तबियत  ढीली, घर की सबसे बड़ी पतीली, भरकर भात पसाइए।“
“हा-हा-हा, किसी मूर्ख की परिणीता बन जाओ, शत-प्रतिशत सुरक्षा की संपूर्ण गारंटी।“ अनु छेड़ती।
लेकिन क्या सचमुच? विवाह क्या महिलाओं की सुरक्षा की गारंटी लेता है? उन औरतों का क्या जो तरह-तरह के दबावों में जीती हैं? और ये कंप्रो टाइप होने की परोक्ष मांग?
ऐसे सवालों के जवाब अनु के पास हर वक्त तैयार मिलते। कहती- “इस सिस्टम का महिलाओं को लेकर नजरिया देख लो, सब समझ जाओगी।“
कई बार वह तरह-तरह के उदाहरणों और नवीनतम सूचनाओं के साथ ऐसी बातें  करती। मैं हंसकर कहती- “तुम तो मानो कोई आंदोलन खड़ा कर दोगी।“
“अरे नहीं, उतना तो नहीं, हां लेकिन जो समझ में आयेगा सही-गलत, वो बोलूंगी जरूर।“ कहकर अनु किसी नौटंकी की तरह अभिनय पूर्वक कहती- “और हां, सच बोलने के कारण फांसी चढ़ जाऊंगी लेकिन यह नहीं कहूंगी कि हमसे भूल हो गयी, हमका माफी दई दो। मैं कहूंगी, हमने सच ही कहा है, हमका फांसी दई दो।“
और हम दोनों बेफिक्र खिलखिलातीं। इस बीच अनु तरह-तरह की सूचनाओं की फुलझडि़यां छोड़ती- “तुमने सुना, पचास करोड़ की गर्लफ्रेंड ? यह लेबल है पोलिटिक्स का। चुनाव की रैली में किसी की मंगेतर का ऐसा मजाक उड़ाने वाले लोग इस देश  को कहां ले जाना चाहते हैं?“

बाद में एक दिन अनु काफी उदास दिखी। बोली- “जानती हो, पचास करोड़ की वह गर्लफ्रेंड  अब इस दुनिया में नहीं है। यह भी नहीं मालूम कि मौत कैसे हुई।“ मैं चुपचाप समझने की कोषिष करती रही इन गुत्थियों को।
कुछ दिनों बाद एक बार फिर अनु ने यही बात निकाली- “जानती हो, उस पचास करोड़ की गर्लफ्रेंड  के लिए जिस राजनेता पर व्यंग्य किया गया था, वह अब उसी व्यंग्य करने वाले का चहेता बन गया है। झाडू टीम के नौरत्नों में एक। जिसे उस मौत का जवाब देना है, और जिसे उसका हिसाब लेना है, दोनों एक हो गये। कोई पूछने वाला नहीं कि उसकी मौत कैसे हुई। यही है एक औरत की औकात। भले ही वह पचास करोड़ की क्यों न हो।“
मैं हैरान होकर सुनती रहती। एक बात का दूसरी बात से संबंध जोड़ने के सूत्र तलाशती रहती।
एक बार अनु ने पूछा- “स्नूपगेट का नाम सुनी हो?“

“हां, आज ही टीवी समाचारों में देख रही थी। किसी महिला आर्किटेक्ट की कई महीनों तक जासूसी करायी गयी, व्यक्तिगत कारणों से सरकारी तंत्र का दुरुपयोग हुआ।“ मैंने अरुचिपूर्वक जवाब दिया। मुझे अंदेशा था कि अब अनु घंटों इस पर लेक्चर देगी। लेकिन उसने इतना ही कहा- “मैं तो पहले ही कह चुकी हूं कि इस सिस्टम का महिलाओं को लेकर नजरिया देख लो, सब समझ जाओगी।“

मेरी ऐसी बातों की गहराई में रुचि नहीं होती। लेकिन इन बातों में छिपे व्यंग्य-विनोद का आनंद लेती थी। जब वो गंभीर होकर बोलने लगती थी, तब मुझे परेशानी होती। अपना कैरियर याद आने लगता। अपने मम्मी-पापा की चिंताएं दिमाग में कौंधने लगती। इधर-उधर की बात करके मन हलका करती।लेकिन अनु कहां मानने वाली। एक बार बताने लगी- “यह देखो, गजब हो गया। प्रधानमंत्री की पत्नी ने आरटीआइ डाला है। सूचना मांग रही हैं कि उनकी सुरक्षा के नाम पर जिन लोगों को भेजा है, उनका कर्तव्य क्या है। वो बेचारी इन पुलिसवालों की आवभगत करके परेशान हैं। उन्हें तो इन सुरक्षाकर्मियों से ही डर है। क्या मजाक है, जब पीएम की पत्नी को न्याय नसीब नहीं तो हम जैसी अन्नु का क्या होगा धन्नो?“

गंभीर बात बोलते-बोलते हास्य का छौंकन लगाकर अनु हंस पड़ती। फिर हम तरह-तरह की बातों  में मशगूल हो जातीं। मुझे मेरा कैरियर पसंद, लेकिन उसका बस चले तो इस सिस्टम को मिनटों में बदल डाले। मेरी किसी भी समस्या का कोई तत्काल हल शायद ही उसके पास हो। हर चीज के लिए पहले बेचारे सिस्टम को दो गाली जरूर पड़ती। मैं तो यहां तक कह देती- “देख अनु, ऐसा न हो कभी मैं एक ग्लास पानी के लिए तड़फ रही होऊं तब तुम वाटर सप्लाई सिस्टम सुधारने का तरीका बताने लगो.”
अनु मेरा व्यंग्य ताड़कर कहती- “बिलकुल संबंध है मेरी दोस्त, तुम्हें  एक ग्लास पानी देने से पहले मैं जरूर देखूंगी कि तुम्हारा सिस्टम ठीक रहे।“
फिर कहती- “ये जो तुम हर वक्त कैरियर और पढ़ाई का रोना रोती हो न, यह सब तुम डिजर्व करती हो। जितना चाहती हो, उससे कई गुना ज्यादा डिजर्व करती हो। लेकिन ये सिस्टम उतनी भी इजाजत नहीं देता, जिस मामूली चीज के लिए तुम तैयार हो।“

क्या अनु की बातें मेरी चिंतनशैली का हिस्सा बन गयी हैं? मुझे क्यों न मिले वह सब कुछ जो मैं डिजर्व करती हूं। एक खुला आसमनान क्यों नहीं है मेरे लिए जहां मैं इतमिनान से पंख फैला सकूं। जिस कैरियर की इतने वक्त से तलाश  थी, उसका मिलना आज कोई राहत क्यों नहीं दे रहा? कल सुबह आखिर क्या जवाब दूंगी कंपनी को? सुबह सोचना क्या करना है। पापा का फार्मूला राहत देने वाला था। लेकिन सुबह तो हो। दिमाग में तरह-तरह के चेहरे आ रहे थे, तरह-तरह की बातें। रेडियोे जाॅकी की बातें और उम्रदराज आटो ड्राइवर के चेहरे की झुर्रियां। आखिर क्या कह रही थी अनु?

कुछ रातें ऐसी ही काली होती हैं।  ऐसे मौकों पर पापा याद आते हैं। गीतों, गजलों और रुबाइयों में अक्सर बात करने वाले पापा। हर बात के लिए कोई न कोई पंक्ति तैयार। इस उलझन वाली रात के लिए पापा की झोली में क्या होगा? मैं दिल बहलाने के लिए सोचने लगी। याद आया एक बार पापा को गुनगुनाते सुना था- काव-ए-काव ए सख्त जानिहा ए तन्हाई, न पूछ। सुबह करना शाम का, लाना है जू-ए-शीर का।
मैं कुछ समझ नहीं पाती थी। पूछने पर पापा खुश  होते। कहते- “चचा गालिब अपने अकेलेपन से परेशान हैं। उनके लिए शाम को सुबह करना यानी समझो रात काटना उतना ही मुश्किल  है, जितना पहाड़ को काटकर दूध की नहर निकालना।“
पापा इसकी सप्रसंग व्याख्या करते। इससे जुड़ा शीरीं और फरहाद का किस्सा सुनाते। फरहाद के सामने शर्त रखी गयी थी कि शीरीं चाहिए तो पहाड़ को काटकर दूध की नहर निकालनी होगी।

आज की रात ऐसी ही मुश्किल  क्यों बन गयी है मेरे लिए? आखिर किस पहाड़ से कैसी नहर निकालने की शर्त है मुझे अपना कैरियर पाने के लिए? कंप्रो? क्या वाकई ऐसी किसी शर्त का सामना करना होगा? या बस यूंही  एक काल्पनिक भय है? जैसे मम्मी जब पूछती है कि कंपनी के लोग सब अच्छे तो होंगे न, तो शायद वो समझती हो कि मुझे दरिंदों से निपटना पड़ेगा। जैसे पापा जब एसएमएस करते हैं कि सब ठीक तो है न, तो गोया किसी ने मुझे किडनैप कर लिया हो। अगर यह सारा डर काल्पनिक  है तो क्यों ऐसी डरी रहती है यह दिल्ली? किसकी दिल्ली है यह, कैसी दिल्ली?

कई बार मैं सोचती कि पापा को मेरी ऐसी चिंता क्यों रहती है आखिर? कई बार कहती- पापा, ये दिल्ली है, देश  की राजधानी है, महानगर है। सब ठीक तो है। आप क्यों परेशान होते हैं। लेकिन पापा को परेशानियों के मौके मिल ही जाते। किसी सुबह अखबार की हेडलाइन उन्हें परेशान करती। कभी टीवी के ब्रेकिंग न्यूज काटने को दौड़ते। बल्कि मैंने तो कई बार देखा कि पापा से ज्यादा बोल्ड मम्मी हैं। वो कहती, आप इतनी चिंता क्यों करते हैं, कुछ नहीं होगा मेरी बेटी को। पापा चुपचाप सुनते रह जाते हैं इन बातों को।
हालांकि जानती हूं कि पापा के स्वभाव में दब्बूपन नहीं है। उनकी कई बातों में बेफिक्राना झलकता। कई बार वह अनु जैसा बोलने लगते। एक दफे किसी बात पर दार्शनिक  अंदाज में गुनगुनाए- कहें क्या जो पूछे कोई हमसे मीर, जहां में तुम आए थे, क्या कर चले?
क्या मतलब? मैंने दिलचस्पी दिखाते हुए पूछा तो पापा खुश होकर बोले- “मीर तकी मीर यह सोचकर परेशान हैं कि अगर कोई यह पूछ ले कि इस दुनिया में आकर तुमने क्या किया, तो इसका क्या जवाब देंगे। यानी हर आदमी को कुछ ऐसा करना चाहिए कि उसका होना सार्थक हो।“
मैं क्या जवाब दूंगी, अगर कोई मुझसे यही बात पूछ ले? मन ही मन सोचा मैंने। इस महानगर में एक ऐसी लड़की, जो अपने मामूली कैरियर के लिए जूझ रही हो, वह भला क्या जवाब दे अपने होने का? जिसे कंप्रो जैसे नये शब्दों का मतलब समझना पड़ रहा हो, वह क्या कर जाये इस दुनिया से?
लेकिन मुझे ऐसे सवालों पर पापा को उकसाने में मजा आता। पूछती- “वो तो मीर साहब की चिंता थी पापा, आप अपना भी तो जवाब तैयार कर लीजिये।“

“हर आदमी का यही सपना होता है कि अपने बच्चों के लिए एक बेहतर दुनिया छोड़कर जाये। लेकिन इसके लिए हम कर कहां कुछ पाते हैं।“ पापा का स्वर रुंआसा हो जाता ऐसी बातें करते वक्त। लेकिन वे इसका एहसास नहीं होने देते। मैं भी यह जाहिर नहीं होने देती कि उनकी मनोदषा समझ में आ गयी है। बात बदल देती।
लेकिन आज की रात बात बदलने का समय नहीं। अब फैसला लेना होगा। कंपनी के आॅफर पर कल ही जवाब देना है। यह ठीक है कि संदेह की स्थिति में आफर ठुकरा देना बेहद आसान है। लेकिन सिर्फ संदेह के आधार पर अवसर गंवाने से क्या मिलेगा? और अगर ज्वाइन करने के बाद कोई परेषानी आयी तो क्या रास्ता निकलेगा। ऐसे सवालों से पापा को तो कभी नहीं गुजरना पड़ा होगा। महिलाओं के लिए ही इतनी जटिलता क्यों बना दी गयीं?

सुबह सोचना क्या करना है। पापा का फार्मूला राहत देने वाला था। लेकिन सुबह तो हो। इस पहाड़ जैसी काली रात को सुबह कैसे करे कोई? क्या सोचता होगा बेचारा शरीफ आॅटोवाला जब मैं चिल्लाई थी उस पर? अनु जब कहती है कि आजकल कंप्रो की ज्यादा पूछ है तो क्या मतलब है इसका? और फिर वो लोग कहां जाएं जिन्हें समझौते पसंद नहीं?

उफ्। नींद तो आने का नाम ही नहीं ले रही। आंखें मूंदने की कोशिश करूं तो कई चेहरे एक-एक कर विशाल  छाया बनकर दिखने लगते हैं। कभी निर्भया आकर पूछती है कहां है सुरक्षित दिल्ली का वादा, तो कभी कैब से गूंजती चीख सुनाई देती है। कभी पचास करोड़ की गर्लफे्रंड आकर पूछती है कि मेरे लिए यह दुनिया इतनी निर्मम क्यों हो गयी, तो कभी कोई युवती आकर कहती है कि जासूसी कांड के बाद मेरे लिए क्या बचा इस दुनिया में? कभी हिन्दी फिल्मों में सदैव दुखियारी की भूमिका निभाने जैसी मां का चेहरा उभरता है जो अपनी सुरक्षा से जुड़े मामूली सवालों के बहाने तमाम उम्र का हिसाब मांगती है। इन सभी महिलाओं के सवालों का कोई आपसी संबंध है या नहीं? क्या कभी किसी ने इन अलग-अलग दिखने वाले टुकड़ों को जोड़कर एक मुकम्मल तसवीर बनायी? किसने बनाया ऐसा निजाम जो औरतजात के लिए एक डरावने सपने जैसा हो? अनु ऐसा क्यों कहती है कि इस सिस्टम का महिलाओं को लेकर नजरिया देख लो, सब समझ जाओगी? क्या है इस सिस्टम की असलियत?

लगता है, आज की रात मुझे नींद नहीं आएगी। रात के सन्नाटे में कहीं दूर से पायल की आवाज देगी। झुन, झुन, झुन। दूर कहीं एक बच्ची अपने नन्हें पैरों में पीतल की छोटी-सी पायल पहने दौड़ती हुई आएगी और पापा की बांहों के सहारे कंधे पर जा बैठेगी। बिलकुल निडर। इस ऊंचाई पर पहुंचने ने का गर्व। पूर्ण सुरक्षा का एहसास। लेकिन वही बच्ची आज इतना पढ़-लिखकर, बड़ी होकर ऐसी डरी-सहमी क्यों है? हर वक्त किस बात का डर है जबकि कोई डर नहीं है?

रह-रहकर बगल के कमरे में सोये पापा के खांसने की आवाज आ रही है। मन करता है जाऊं, और झकझोर कर जगा दूं। कहूं कि उठा लें अपने मजबूत कंधों पर। दें एक सुरक्षा का एहसास। या फिर लोरी सुनाकर सुला दें। वही लोरी, जो मुझे सुलाने के लिए अक्सर सुनाया करते थे- चुपके से नैनन की बगियन में, निंदिया आ-जा, रे आ-जा। आंखें तो सबकी, हैं इक जैसी, जैसे अमीरों की, गरीबन की वैसी। दम भर गरीबन की अंखियन में, निंदिया आ-जा रे आ-जा…।
क्या यह किसी गरीब की आंखों में महज निंदिया लाने भर की बात है? या कि इसमें उसके सपनों की बात है? यहां कौन अमीर है और कौन गरीब? क्या इसमें अमीरों का मतलब महिला उत्पीड़क सिस्टम से भी है? गरीब क्या उस डरी-सहमी लड़की को भी कहा गया है? क्या महिला मुक्ति और निर्धनता मुक्ति में कोई रिश्ता  बनाती है ये पंक्तियां?

मन करता है जाकर पापा से साफ-साफ मीर साहब वाला सवाल पूछ ही लूं- “पापाजी, आप ही बता दो कि जहां में तुम आए थे, क्या कर चले? आखिर क्यों छोड़ जाओगे तुम अपनी बिटिया के लिए एक ऐसी दुनिया, जो उसे कदम-कदम पर किन्हीं अज्ञात समझौतों का डर दिखाये?“
नींद नहीं आ रही। मन करता है, पापा से उनका कोई पसंदीदा गीत गुनगुनाने को कहूं। शायद वो मखदूम मोइउद्दीन की ये पंक्तियां सुना दें – कोई दीवाना गलियों में फिरता रहा, कोई आवाज आती रही रात भर।
क्या सचमुच कोई दीवाना है, जिसकी आवाज सुनने को जी चाहे? पापा जब कहते हैं कि बदलाव तो प्रकृति का नियम है, तब वो ऐसे किसी दीवाने की भी राह देख रहे होते हैं। पापा जब कहते हैं कि हर दौर में बदलाव का कोई-न-कोई नायक जरूर उभरकर आता है, तो क्या उन्हें ऐसी कोई उम्मीद दिखती है?
याद आया, एक बार पापा ने बताया था कि मखदूम साहब के उस गीत को आगे बढ़ाते हुए फैज अहमद फैज ने लिखा- एक उम्मीद से दिल बहलता रहा, इक तमन्ना सताती रही रात भर।
किस उम्मीद ने दिल बहलाया फैज साहब का? रात भर सताने वाली किस तमन्ना की बात कर रहे थे वह? आज क्या कोई उम्मीद है जो दिल बहला सके? अब किस तमन्ना ने रात को सुबह करना मुश्किल  रखा है? कहां हैं वो फूल जिनसे दिल्ली का लोहापन कटता हो? गालिब और मीर की इस दिल्ली में ऐसा क्या है जो हमें हैरान किए देता है?
सवाल-दर-सवाल मेरे दिमाग में चकरघिन्नी काट रहे हैं। उफ्। नींद तो आने का नाम ही नहीं ले रही। सुबह सोचना क्या करना है। पापा का फार्मूला राहत देने वाला था। लेकिन सुबह तो हो।

आशा पाण्डे ओझा की कवितायें

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आशा पांडे ओझा


कवयित्री आशा पांडे ओझा साहित्य ,पेंटिंग और फोटोग्राफी में रुचि रखती हैं. संपर्क :asha09.pandey@gmail.com

 वो तिलचट्टा

मैं उसें जानती नहीं
मैं उससें मुहब्बत नहीं करती
न ही पसंद भी
नापसंद भी नहीं करती
नापसंद उसें  किया जाता है
जो कभी पसंद भी आया हो
जिससें कभी कोई वास्ता ही ना रहा
ना तन का,,ना मन का ना जीवन का
किसी बस स्टॉप ,रेल्वे स्टेशन ,
बाजार, राह चलते शहर , ऑफिस या  कॉलेज में
बार-बार उसकी आँखें
अंधेरे में, गर्म स्थान खोजती हुई
तिलचट्टों सी रेंगती है जब मुझ पर
या बार बार छूने का करती है यत्न
भोजन ढूंढती फिरती  तिलचट्टे के
एक जोड़ी संवेदी श्रृंगिकाएँ  सी
उसकी वासना के कीच से लिपटी गंदी उँगलियाँ मुझे
तब मैं खूबसूरत नहीं लगती खुद को
बल्कि लगता है
गंदी चिकनाई सी कुछ काइयां
उतर आई है मेरे बदन पर कहीं न कहीं
या कुछ उघड़ा छुट गया है मेरा सोचकर
बचा बचा कर नजर जांचती  हूँ अपने अंगों को  बार बार
सब कुछ ठीक है की तसल्ली के बावजूद
कुछ गड्ढे से हो आये हों  मेरे जिस्म पे
उसकी पैनी नजर से होता है यह आभास
और तब अचानक
मेरे बदसूरत हो जाने का अहसास होने लगता है मुझे
बड़ी सिद्दत से
मिचलाने  लगता है मन
जी करता है अपने पैरों तले कुचल दूँ
उसकी उँगलियों के श्वासरंध्र
तब मेरे अंदर जरा  नहीं बचते
नारी वाले कोमल अहसास
तुम अक्सर जिसें  कहा करते हो
चंडी या दुर्गा या चाहे फूलन भी
वैसा ही कुछ  कुछ अहसास होने लगता है मुझे
मेरी सहन शक्ति देने लगती है जबाब
हाँ  तब मैं पीटती हूँ उसें फिर जानवरों की तरह
खो कर अपना आपा , कभी कभी बीच  बाजार

संभावना  प्रतिकार की

जाने कैसे अपने मन की  घुटन
अपना आक्रोश
अपनी आँखों से पीस कर
आंसुओं में बहा देती है स्त्री
अपनी छाती में दबाकर
चिंगारियां विरोध की
कैसे शांत बह लेती है
नीर की तरह
सागर मिले या सहरा
सम्पूर्ण समर्पण से मिल जाती है उसमे
हो जाती एकाकार
हर अच्छा बुरा उसें सहर्ष स्वीकार
क्या प्रतिकार  करना नहीं जानती स्त्री
या नहीं है उसमें  आत्मा
अगर वो  आत्मा होती तो निश्चय ही
बनी रहती संभावना  प्रतिकार की
तब डरता पुरुष भी कहीं न कहीं हावी होने से

 जीवन या आत्म हत्या 

भोगते हुवे सारे सुख वैभव ऐश्वर्य
चलाते हुवे मंहगी कारें
खा कर महंगे रेस्तरां में
दिखाते हुवे महंगे विलायती  परफ्यूम
चश्मे ,घड़ियाँ ,मोबाइल
काँधे पर लटकता
भर कर हरे लाल नोटों से इम्पोर्टेड  पर्स
बन कर किसी किट्टी क्लब की अध्यक्ष
मुस्कराते हुवे कुटिल मुस्कानें
गिरा गिरा कर पल्लू सँभालते हुए
दिखाना  बेशक़ीमती साड़ियाँ
बोलना अंग्रेजी में अनावश्यक गिटर पिटर
याद दिलाना  बार बार सबको अपनी डिग्रियां
दुःख आभावों से सेंकडों मील दूर
इन सबका मतलब यह नहीं कि
मैं जी रही हूँ जीवन
बैठकर ग़रीबों के बीच
कभी चलते हुवे दुर्गम पथ पर पैदल
टूट जाती साधारण चप्पलें
खिलाकर अपनी सीमित आय से
कभी कभी जरुरतमंदों को रोटी
जीर्ण-शीर्ण कायाओं के बीच
लगभग उन्हीं सी होती प्रतीत
संव्य के जीवन का हिस्सा ना होते हुवे भी
महसूस करते रहना दुःख दर्द अभाव
कभी कभार बिता लेना इन्हीं आभावों में रात
नहीं बनी किसी हाई प्रोफाइल सोसायटी का हिस्सा
होते हुए भी डिग्रियां नहीं कर पाती प्रदर्शन
बोलती इन्हीं के साथ ठेठ वो ही देहाती भाषा
इन सबका मतलब यह नहीं है कि
मैं कर रही हूँ आत्म हत्या

पहला पुरुष देवता
कब कौन प्रतिष्ठित हुआ होगा
पहला पुरुष देवता
कब कौन पहली स्त्री
बनी होगी पहली  पुजारिन दास
पूजते-पूजते पत्थर न पा कर प्रत्युत्तर
हुई होगी प्रबल उत्कंठा
देखने की साक्षात ईश्वर
अथाह अंध आस्था में डूबकर
थोप दिया होगा उसने
पहला पति परमेश्वर
छोड़ उसके हाथों में
निज जीवन-मरण की आस
भावना और समर्पण की भूखी
बन गई निष्ठुर हाथों की दास
ओ भोली, ओ बावली
पूजती ही रहती तूँ पत्थरों को काश !
आज तेरी वजह से न सहना पड़ता
अगिनत स्त्रियों को यह संत्रास

सुल्ताना का सपना

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रुकैया सखावत हुसैन 
अंग्रेजी से अनुवाद : संज्ञा उपाध्याय


( पिछले 9 दिसंबर को हमने रुकैया सखावत हुसैन की रचना ‘ अबरोध बासिनी’ का अनुवाद प्रकाशित किया था , जिसका मूल बांग्ला से अनुवाद किया था वरिष्ठ पत्रकार नासिरुद्दिन हैदर खां ने . रुकैया की सर्वाधिक चर्चित रचना है ‘ सुल्ताना का सपना’ ( 1905) ,जो अंग्रेजी में ‘सुल्तानाज ड्रीम’ के नाम से प्रकाशित और चर्चित है. पाठकों के लिए अंग्रेजी से हिन्दी में अनुदित यह मह्त्वपूर्ण कृति . अनुवाद ‘ कथन’ के सम्पादन से जुडी संज्ञा  उपाध्याय ने किया है . ‘अबरोध बासिनी’ पढने के लिए लिंक पर क्लिक करें .) 


अबरोध बासिनी   

एक शाम मैं अपने शयनकक्ष में एक आरामकुर्सी पर पड़ी थी और सुस्ताते हुए भारतीय स्त्री की दशा के बारे में सोच रही थी। मैं यकीन के साथ नहीं कह सकती कि मेरी आँख लग गयी थी या नहीं। लेकिन जहाँ तक मुझे याद है, मैं भरपूर जागी हुई थी। मैंने साफ देखा कि चाँदनी में नहाया आसमान हीरों जैसे हजारों तारों से जगमगा रहा था। अचानक मैंने देखा, एक भद्र महिला मेरे सामने खड़ी थी। मैं नहीं जानती कि वह अंदर कैसे आयी। मैंने उसे अपनी मित्र सारा बहन समझ लिया।

‘‘सुप्रभात।’’ सारा बहन ने कहा। मैं मन ही मन हँसी, क्योंकि मैं जानती थी कि यह सुबह नहीं, बल्कि तारों भरी रात है। फिर भी, मैंने उन्हें जवाब दिया और पूछा, ‘‘आप कैसी हैं?’’
‘‘मैं ठीक हूँ, शुक्रिया! क्या तुम बाहर आओगी और हमारा उद्यान देखोगी?’’

मैंने खुली हुई खिड़की से एक बार फिर चाँद को देखा और सोचा कि इस समय बाहर जाने में कोई हर्ज नहीं है। नौकर-चाकर उस वक्त बाहर गहरी नींद सो रहे थे और मैं सारा बहन के साथ एक सुहानी सैर को जा सकती थी।
जब हम दार्जिलिंग में थे, मैं सारा बहन के साथ सैर को जाया करती थी। बहुत बार हम वहाँ के वनस्पति-उद्यानों में हाथ में हाथ डाले हल्की-फुल्की बातें करते टहलते थे। मैंने सोचा, शायद सारा बहन मुझे वैसे ही किसी उद्यान में ले जाने आयी हैं और मैंने सहर्ष उनका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और उनके साथ बाहर निकल गयी।

चलते हुए मैंने आश्चर्यजनक रूप से पाया कि यह एक बढि़या सुबह थी। नगर पूरी तरह जाग चुका था और सड़कें हलचल भरी भीड़ से गुलजार थीं। मुझे यह सोचकर बड़ा संकोच हो रहा था कि मैं दिन के ऐसे खुले उजाले में सड़क पर चल रही हूँ। लेकिन वहाँ एक भी पुरुष दिखायी नहीं दे रहा था। पास से गुजरते कुछ लोगों ने मेरा परिहास किया। हालाँकि मैं उनकी भाषा तो नहीं समझ पायी, लेकिन मैंने महसूस किया कि वे निश्चित ही मेरा मजाक उड़ा रहे हैं। मैंने अपनी मित्र से पूछा, ‘‘ये लोग क्या कह रहे हैं?’’
‘‘इन स्त्रियों का कहना है कि तुम बड़ी मर्दाना लगती हो।’’
‘‘मर्दाना?’’ मैंने कहा, ‘‘इससे उनका क्या तात्पर्य है?’’
‘‘उनका मतलब है कि तुम पुरुषों की तरह शर्मीली और संकोची हो।’’
‘‘पुरुषों की तरह शर्मीली और संकोची?’’ यह तो वाकई मजाक था। मैं यह देखकर बेहद घबरा गयी कि मेरी संगिनी सारा बहन नहीं, बल्कि कोई अजनबी स्त्री है। ओह, मैं कितनी मूर्ख थी, जो इसे अपनी पुरानी मित्र सारा बहन समझने की भूल कर बैठी!
चूँकि हम एक-दूसरे का हाथ थामे चल रहे थे, इसलिए उसने अपने हाथ में मेरी उँगलियों का काँपना महसूस कर लिया।
‘‘क्या बात है, प्रिय?’’ उसने बहुत स्नेह के साथ पूछा।
‘‘मुझे कुछ अजीब-सा लग रहा है।’’ मैंने खेदसूचक स्वर में कहा, ‘‘एक परदानशीं स्त्री होने के नाते मैं इस तरह अनावृत घूमने की आदी नहीं हूँ।’’
‘‘तुम्हें किसी पुरुष से सामना हो जाने का भय करने की जरूरत नहीं है। यह स्त्री-देश है, पाप और बुराई से मुक्त। पवित्रता यहाँ स्वयं विराजती है।’’

कुछ देर बाद मैं दृश्यावली का आनंद ले रही थी। वह सब वास्तव में बेहद भव्य था। हरी घास के एक टुकड़े को मैंने गलती से मखमल का गद्दा समझ लिया। ऐसा लग रहा था, मानो मैं एक नर्म कालीन पर चल रही हूँ। मैंने नीचे देखा और पाया कि रास्ता घास और फूलों से ढँका हुआ है।
‘‘कितना अच्छा है यह।’’ मैंने कहा।
‘‘तुम्हें पसंद आया?’’ सारा बहन ने पूछा। (मैंने उसे ‘सारा बहन’ कहना जारी रखा और वह मुझे मेरे नाम से संबोधित करती रही।)
‘‘हाँ, बहुत, लेकिन इन नाजुक और सुंदर फूलों को कुचलना मुझे अच्छा नहीं लग रहा।’’
‘‘चिंता न करो, प्रिय सुल्ताना। तुम्हारे चलने से इन्हें कुछ नुकसान नहीं होगा। ये सड़क के फूल हैं।’’
‘‘समूची जगह ही एक उद्यान जैसी लग रही है।’’ मैंने प्रशंसा के भाव से कहा, ‘‘हर पौधे को आप लोगों ने बड़ी कुशलता से व्यवस्थित किया है।’’
‘‘तुम्हारा कलकत्ता इससे भी सुंदर उद्यान बन सकता था, यदि तुम्हारे देश के लोग उसे ऐसा बनाना चाहते।’’
‘‘वे तो यह सोचते कि जब करने को इतने और काम पड़े हैं, तो बागवानी पर इतना ध्यान देना व्यर्थ है।’’
‘‘इससे बेहतर बहाना उन्हें न सूझता।’’ उन्होंने मुस्कराते हुए कहा।
मैं यह जानने को बेहद उत्सुक हो उठी कि आखिर पुरुष हैं कहाँ। वहाँ चलते हुए मुझे सौ से अधिक स्त्रियाँ मिल चुकी थीं, लेकिन पुरुष एक भी नहीं।
‘‘पुरुष कहाँ हैं?’’ मैंने उनसे पूछा।
‘‘अपनी सही जगह पर, जहाँ उन्हें होना चाहिए।’’
‘‘कृपया मुझे बताइए, ‘अपनी सही जगह’ से आपका क्या तात्पर्य है?’’
‘‘ओह, गलती मेरी है। तुम पहले यहाँ कभी नहीं आयीं, इसलिए तुम्हें हमारे तौर-तरीके कैसे मालूम होंगे। हम अपने पुरुषों को घर में बंद रखते हैं।’’
‘‘जिस तरह हमें जनाने में रखा जाता है?’’
‘‘हाँ, ठीक उसी तरह।’’
‘‘क्या मजेदार बात है।’’ मैं ठठाकर हँस पड़ी। सारा बहन भी हँसीं।
‘‘लेकिन, प्रिय सुल्ताना, किसी को हानि न पहुँचाने वाली स्त्रियों को बंद करके रखना और पुरुषों को खुला छोड़ देना कितना अन्यायपूर्ण है।’’
‘‘क्यों? हमारे लिए जनाने से बाहर निकलना सुरक्षित नहीं है, क्योंकि हम तो स्वाभाविक रूप से कमजोर हैं।’’
‘‘हाँ, जब तक पुरुष जहाँ-तहाँ सड़कों पर हों, तब बाहर निकलना सुरक्षित नहीं और न ही तब, जब भरे बाजार में कोई जंगली जानवर घुस आये।’’
‘‘नहीं, ऐसा नहीं है।’’
‘‘मान लो, कुछ पागल पागलखाने से भाग निकलें और लोगों को, घोड़ों को तथा अन्य प्राणियों को तमाम तरह से तंग करने लगें, तो ऐसी स्थिति में तुम्हारे देश के लोग क्या करेंगे?’’
‘‘वे उन्हें पकड़ने और फिर से पागलखाने में बंद कर देने का प्रयास करेंगे।’’
‘‘दुरुस्त! और तुम यह भी नहीं मानती न कि समझदारों को कैद करना और पागलों को छुट्टा छोड़ देना बुद्धिमानी का काम है?’’
‘‘बिलकुल नहीं।’’ मैंने हल्के से हँसते हुए कहा।

रुकैया

‘‘तो बात दरअसल यह है कि तुम्हारे देश में ठीक यही किया जा रहा है! पुरुषों को, जो दुष्टता करते हैं या दुष्टता की किसी भी हद तक जा सकते हैं, उन्हें तो छुट्टा छोड़ दिया गया है और भोली-भाली निरीह स्त्रियों को जनाने में कैद कर दिया गया है। बाहर खुले छोड़ दिये गये उन अप्रशिक्षित पुरुषों पर कैसे भरोसा किया जा सकता है?’’
‘‘हमारे यहाँ के सामाजिक मसलों में न हम हस्तक्षेप कर सकती हैं और न कुछ कह सकती हैं। भारत में पुरुष ही देवता और स्वामी है। उसने सारी सत्ता और समस्त अधिकार स्वयं हथिया लिये हैं और स्त्रियों को जनाने में बंद कर दिया है।’’
‘‘तुम लोग स्वयं को बंद होने क्यों देती हो?’’
‘‘क्या करें, वे स्त्रियों से शक्तिशाली जो हैं।’’
‘‘शेर मनुष्य से अधिक शक्तिशाली है, लेकिन इससे वह समूची मनुष्य जाति पर आधिपत्य जमाने में समर्थ नहीं हो जाता। तुम्हारा अपने प्रति जो कर्तव्य है, उसकी तुमने उपेक्षा की है और अपने हितों की ओर से आँखें मूँदकर अपने स्वााभाविक अधिकारों को खो दिया है।’’
‘‘लेकिन, मेरी प्यारी सारा बहन, यदि सब कुछ हम ही स्वयं करेंगी, तो पुरुष क्या करेंगे?’’
‘‘क्षमा चाहती हूँ, लेकिन उन्हें तो कुछ करना ही नहीं चाहिए। वे किसी लायक नहीं हैं। उन्हें तो बस, पकड़ो और जनाने में डाल दो।’’
‘‘लेकिन क्या उन्हें पकड़कर चारदीवारी में डाल देना इतना आसान है?’’ मैंने कहा, ‘‘और यदि ऐसा कर भी लिया जाये, तो उनके तमाम राजनीतिक और व्यावसायिक काम भी क्या उनके साथ जनाने में चले जायेंगे?’’
सारा बहन ने कोई उत्तर नहीं दिया। वे बस प्यार से मुस्करायीं। शायद उन्होंने सोचा कि मुझ जैसी कूपमंडूक से बहस करना व्यर्थ है।

तब तक हम सारा बहन के घर पहुँच गये। उनका मकान एक सुंदर, हृदयाकार बगीचे में स्थित था। वह नालीदार टीन की छत वाला एक बंगला था। हमारी किसी भी आलीशान इमारत की अपेक्षा वह कहीं अधिक ठंडा और सुंदर था। मैं बयान नहीं कर सकती कि वह कितना साफ-सुथरा और बढि़या साज-सामान से लैस था और कितने सुरुचिपूर्ण ढंग से सजा-सँवरा था।
हम अगल-बगल बैठ गये। वे वहीं अपना कढ़ाई का काम ले आयीं और एक नया आकार काढ़ने लगीं।
‘‘तुम सिलाई-बुनाई जानती हो?’’
‘‘हाँ, जनाने में हमारे पास करने को और होता ही क्या है।’’
‘‘लेकिन हम अपने जनाने के सदस्यों पर उन्हें कढ़ाई का काम सौंपने तक का भरोसा नहीं करते!’’ उन्होंने हँसते हुए कहा, ‘‘क्योंकि पुरुष के भीतर सुई में धागा पिरोने तक का धैर्य नहीं होता।’’
‘‘यह सब आपने स्वयं किया है?’’ मैंने तिपाइयों पर सजे विविध प्रकार के कढ़ाईदार कपड़ों की ओर संकेत करते हुए पूछा।
‘‘हाँ।’’
‘‘आपको यह सब करने का वक्त मिल जाता है? आपको तो अपने दफ्तर का काम भी करना होता होगा, नहीं?
‘‘हाँ, लेकिन मैं सारे दिन प्रयोगशाला में ही नहीं लगी रहती। मैं दो घंटे में अपना काम पूरा कर लेती हूँ।’’
‘‘दो घंटे में! ऐसा कैसे कर लेती हैं आप? हमारे यहाँ तो अफसर, जैसे कि न्यायाधीश, रोज सात घंटे काम करते हैं।’’
‘‘मैंने उनमें से कुछ को काम करते देखा है। क्या तुम्हें लगता है कि वे पूरे सात घंटे काम करते हैं?’’
‘‘यकीनन करते हैं।’’
‘‘नहीं, प्यारी सुल्ताना, नहीं करते। वे अपना वक्त धूम्रपान में गँवाते हैं। कुछ लोग दफ्तर के समय में दो या तीन चुरुट पीते हैं। वे काम के बारे में बातें ज्यादा बनाते हैं, करते बहुत कम हैं। मान लो, एक चुरुट आधे घंटे चलती है और एक पुरुष रोज बारह चुरुट पीता है; तो देखो, सिर्फ धुआँ उड़ाने में ही वह प्रति दिन छह घंटे बर्बाद कर देता है।’’

हमने बहुत-से विषयों पर बातचीत की और मैंने जाना कि वहाँ किसी प्रकार की महामारी नहीं थी और न ही वे हमारी तरह मच्छरों के काटने से पीडि़त थे। मुझे यह सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि स्त्री-देश में विरले घट जाने वाली दुर्घटनाओं में मर जाने के अलावा कोई भी युवावस्था में नहीं मरता।
‘‘क्या तुम हमारा रसोईघर देखना चाहोगी?’’ उन्होंने पूछा।
‘‘बड़ी खुशी से।’’ मैंने कहा और हम रसोईघर देखने गये। जब मैं वहाँ जा रही थी, पुरुषों को वहाँ से हट जाने के लिए कह दिया गया था। रसोईघर सब्जियों के एक सुंदर बगीचे में था। प्रत्येक बेल, टमाटर का प्रत्येक पौधा अपने में एक आभूषण की तरह था। मुझे रसोईघर में न धुआँ नजर आया और न कोई चिमनी। वह साफ-सुथरा और चमचमाता हुआ था। खिड़कियों को फूलमालाओं से सजाया गया था। वहाँ कोयले या आग का कोई चिह्न नहीं था।
‘‘आप लोग भोजन कैसे पकाते हैं?’’ मैंने पूछा।
‘‘सूर्य के ताप से।’’ वे बोलीं और साथ ही मुझे वे पाइप दिखाये, जिनके जरिये संकेंद्रित किया गया सूर्य का प्रकाश और ताप लाया जाता था। और मुझे सारी प्रक्रिया दिखाने के लिए उन्होंने उसी समय वहीं कुछ पकाया।
‘‘आपने सौर ऊर्जा संचय करने और उसका भंडारण करने की व्यवस्था कैसे की?’’ मैंने चकित होते हुए पूछा।
‘‘उसके लिए मुझे तुम्हें अपना थोड़ा-सा इतिहास बताना पड़ेगा। हमारी रानी ने तीस वर्ष पूर्व, जब वे तेरह वर्ष की थीं, उत्तराधिकार के रूप में गद्दी सँभाली। वे सिर्फ नाम की रानी थीं। वास्तव में प्रधानमंत्री देश पर शासन कर रहे थे।
‘‘हमारी भली रानी की विज्ञान में बहुत रुचि थी। उन्होंने आदेश जारी किया कि उनके देश की हर स्त्री को शिक्षित होना चाहिए। आदेश के अनुसार बहुत-से विद्यालय लड़कियों के लिए खोले गये और उन्हंे सरकारी सहयोग दिया गया। स्त्रियों में शिक्षा का खूब प्रसार हुआ। बाल विवाह पर भी रोक लगा दी गयी। इक्कीस वर्ष की आयु से पूर्व किसी लड़की को विवाह करने की आज्ञा नहीं थी। तुम्हें बता दूँ कि इस परिवर्तन से पहले हमें सख्त परदे में रखा जाता था।’’

‘‘कैसी बाजी पलटी है!’’ मैंने हँसते हुए बीच में टोका।
‘‘लेकिन विभाजन अब भी वही है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘कुछ वर्षों में ही हमारे अलग विश्वविद्यालय बन गये, जिनमें किसी पुरुष को प्रवेश नहीं मिलता था।
‘‘हमारी राजधानी में, जहाँ हमारी रानी रहती हैं, दो विश्वविद्यालय हैं। इनमें से एक ने एक अद्भुत गुब्बारे का आविष्कार किया, जिसमें ढेर सारे पाइप जोड़े गये। नीचे से बँधे इस गुब्बारे को उन्होंने ऊपर आकाश में बादल-प्रदेश में तैरते रहने की व्यवस्था की और इसके जरिये वे वायुमंडल से जितना चाहे, उतना पानी खींच सकते थे। चूँकि विश्वविद्यालय के लोगों द्वारा पानी निरंतर खींचा जाता रहता था, इसलिए बादल घिर नहीं पाते थे। इस तरह योग्य महिला प्राचार्य ने वर्षा और तूफानों को पूरी तरह रोक दिया।’’
‘‘वाकई! अब मेरी समझ में आया कि यहाँ जरा भी कीचड़ क्यों नहीं है!’’ मैंने कहा। लेकिन मेरी समझ में यह नहीं आया कि पाइपों में पानी जमा करके रखना कैसे संभव है। उन्होंने मुझे समझाया कि यह कैसे किया जाता है, लेकिन विज्ञान का मेरा ज्ञान इतना कम था कि मैं उनकी बात समझने में असमर्थ थी। फिर भी, वे बताती गयीं:
‘‘जब दूसरे विश्वविद्यालय को इसकी जानकारी मिली, तो वहाँ की स्त्रियाँ बेहद ईष्र्यालु हो उठीं और उन्होंने इससे भी बढ़कर कुछ असाधारण करने का प्रयास किया। उन्होंने एक ऐसे यंत्र का आविष्कार किया, जिसके जरिये वे जितनी चाहें, उतनी सौर ऊर्जा जमा कर सकती थीं। उन्होंने इस ऊर्जा का भंडारण करके रखा, ताकि औरों की जरूरत के मुताबिक इसे वितरित किया जा सके।
‘‘जिस समय स्त्रियाँ वैज्ञानिक शोध में लगी थीं, इस देश के पुरुष उस समय अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने में व्यस्त थे। जब उन्हें पता चला कि महिला विश्वविद्यालयों ने वायुमंडल से पानी खींचने और सूर्य से ताप संग्रह करने की सामथ्र्य पा ली है, तो वे विश्वविद्यालयों की स्त्रियों पर खूब हँसे और इसका उन्होंने ‘भावुकतापूर्ण दुःस्वप्न’ कहकर मजाक उड़ाया!’’
‘‘निश्चय ही आप लोगों की उपलब्धियाँ असाधारण हैं! लेकिन मुझे यह बताइए कि आपने अपने देश के पुरुषों को जनानखाने में कैसे डाला? पहले आप लोगों ने उन्हें पकड़ा?’’
‘‘नहीं।’’
‘‘यह तो संभव नहीं कि उन्होंने स्वेच्छा से अपनी स्वतंत्रता को त्याग दिया होगा और स्वयं को जनाने की चारदीवारियों में कैद कर लिया होगा! उन्हें निश्चित ही ताकत के बल पर परास्त करना पड़ा होगा।’’
‘‘हाँ, उन्हें  परास्त किया गया।’’
‘‘किसने किया? महिला योद्धाओं ने?’’
‘‘नहीं, हथियारों के बल पर नहीं।’’
‘‘हाँ, यह तो हो नहीं सकता। पुरुषों के हथियार तो स्त्रियों के हथियारों से अधिक मजबूत होते हैं। तब फिर?’’
‘‘बुद्धि के बल पर।’’
‘‘उनका दिमाग भी तो स्त्रियों के दिमाग से अधिक विशाल और वजनी होता है। है न?’’
‘‘हाँ, लेकिन उससे क्या होता है? हाथी का दिमाग भी तो मनुष्य के दिमाग से बड़ा और वजनी होता है; फिर भी मनुष्य हाथी को जंजीरों में जकड़कर अपने हुक्म का गुलाम बना सकता है।’’
‘‘खूब कहा! लेकिन कृपया यह बताइए कि यह सब वास्तव में हुआ कैसे? मैं जानने को बेचैन हूँ!’’
‘‘स्त्रियों का दिमाग पुरुषों के दिमाग से कहीं अधिक तेज चलता है। दस वर्ष पूर्व, जब सैन्य अधिकारियों ने हमारे वैज्ञानिक आविष्कारों को ‘भावुकतापूर्ण दुःस्वप्न’ कहा था, कुछ युवा महिलाएँ उस टिप्पणी के जवाब में कुछ कहना चाहती थीं। लेकिन दोनों महिला प्राचार्यों ने उन्हें रोका और कहा कि उन्हें बोलकर नहीं, बल्कि अवसर मिलने पर कुछ करके इसका जवाब देना चाहिए। और उन्हें उस अवसर के लिए अधिक देर प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी।’’
‘‘बहुत खूब!’’ मैंने खुशी से ताली बजायी।
‘‘और अब वे अहंकारी पुरुष स्वयं भावुकतापूर्ण स्वप्न देख रहे हैं।
‘‘कुछ समय बाद ही पड़ोस के एक देश के कुछ विशेष लोगों ने हमारे यहाँ आकर शरण ली। किसी राजनीतिक अपराध के चलते वे संकट में थे। उनके राजा ने, जिसे शासन अच्छा चलाने के बजाय अपनी सत्ता की अधिक चिंता थी, हमारी दयालु रानी से कहा कि वे उन लोगों को उसके अधिकारियों को सौंप दें। रानी ने ऐसा करने से इनकार कर दिया, क्योंकि शरणार्थियों को लौटा देना उनके सिद्धांत के विरुद्ध था। इस इनकार के कारण राजा ने हमारे देश के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी।
‘‘हमारी सेनाएँ तुरंत उठ खड़ी हुईं और शत्रु से भिड़ने चल दीं।
‘‘लेकिन शत्रु उनके मुकाबले कहीं अधिक शक्तिशाली था। निस्संदेह, हमारे सैनिक बहादुरी से लड़े, लेकिन उनकी तमाम बहादुरी के बावजूद विदेशी सेना कदम-दर- कदम हमारे देश पर आक्रमण करने बढ़ी चली आ रही थी।
‘‘लगभग सभी पुरुष युद्ध पर चले गये थे; यहाँ तक कि सोलह वर्ष के एक भी लड़के को पीछे नहीं छोड़ गया था। हमारे अधिकतर योद्धा मारे गये, बाकियों को वापस खदेड़ दिया गया और शत्रु राजधानी में पच्चीस मील भीतर तक घुस आया।
‘‘देश को बचाने के लिए क्या किया जाये, इस पर सलाह करने के लिए बहुत-सी बुद्धिमान स्त्रियों की बैठक रानी के महल में बुलायी गयी।
‘‘कुछ ने सुझाया कि सैनिकों की भाँति लड़ा जाये; दूसरों ने इस पर आपत्ति करते हुए कहा कि स्त्रियों को तलवारों तथा बंदूकों से लड़ने का प्रशिक्षण नहीं दिया गया है और न ही वे किसी अन्य हथियार से लड़ना जानती हैं। एक तीसरे समूह ने खेद व्यक्त करते हुए कहा कि स्त्रियाँ शारीरिक रूप से एकदम कमजोर हैं।
‘‘तब रानी ने कहा कि यदि आप लोग शारीरिक ताकत के अभाव में अपने देश को नहीं बचा सकतीं, तो बौद्धिक ताकत से यह काम कीजिए।
‘‘कुछ क्षण के लिए मृत्यु की-सी खामोशी छा गयी। महामहिम रानी ने फिर कहा, ‘‘यदि मेरी इज्जत और मेरा देश न रहा, तो मैं निश्चित ही आत्महत्या कर लूँगी!’’
‘‘तब दूसरे विश्वविद्यालय (जिसने सूर्य के ताप का संग्रह किया था) की प्राचार्या, जो मंत्रणा के दौरान खामोशी से कुछ सोच रही थीं, बोलीं कि हम लगभग हार चुके हैं और हमारे लिए बहुत थोड़ी ही उम्मीद बची है। लेकिन एक योजना है, जिसे वे आजमाना चाहती हैं और यह उनकी पहली तथा आखिरी कोशिश होगी। यदि वे असफल हो जाती हैं, तो सबके लिए आत्महत्या के सिवा कोई रास्ता बाकी नहीं रहेगा। सभी ने एक स्वर से प्रण किया कि चाहे कुछ भी हो जाये, हम स्वयं को गुलाम नहीं होने देंगे।
‘‘रानी ने सभी का हृदय से आभार व्यक्त किया और प्राचार्या से उनकी योजना आजमाने के लिए कहा।
‘‘प्राचार्या एक बार फिर खड़ी हुईं और बोलीं, ‘हम बाहर जायें, इससे पहले जरूरी है कि पुरुषों को जनाने में भेज दिया जाये। मैं परदे का खयाल करके ही यह प्रार्थना कर रही हूँ।’ ‘हाँ, निश्चय ही।’ महामहिम रानी ने कहा।
‘‘अगले दिन रानी ने सभी पुरुषों को बुलाकर उन्हें सम्मान तथा स्वतंत्रता की खातिर जनाने में चले जाने को कहा।
‘‘जिस कदर वे घायल और थके हुए थे, उन्हें रानी का यह आदेश वरदान की तरह लगा! उन्होंने नीचे तक झुककर प्रणाम किया और विरोध का एक भी शब्द कहे बिना जनाने में प्रवेश कर गये। उन्हें पक्का यकीन था कि अब इस देश के बचने की कोई उम्मीद नहीं।
‘‘तब प्राचार्या ने अपनी दो हजार शिष्याओं के साथ युद्ध के मैदान की ओर कूच किया। वहाँ पहुँचकर उन्होंने सूर्य के संकेंद्रित प्रकाश और ताप की किरणें शत्रुओं की ओर फेंकीं।
‘‘इतने अधिक ताप और प्रकाश को वे सह नहीं पाये। वे सब संत्रस्त होकर भागे। बदहवासी में उन्हें सूझ नहीं रहा था कि जला डालने वाले इस भीषण ताप को कैसे प्रभावहीन किया जाये। जब वे अपनी बंदूकें और गोला-बारूद छोड़कर भाग गये, तो उस सबको उसी सूर्य-ताप से जला दिया गया।
‘‘तब से किसी ने हमारे देश पर आक्रमण करने का प्रयास नहीं किया।’’
‘‘और तभी से आपके देश के पुरुषों ने जनाने से बाहर आने का कभी प्रयास नहीं किया?’’
‘‘नहीं, वे स्वतंत्र होना चाहते थे। कुछ पुलिस आयुक्तों और जिलाधीशों ने इस आशय के संदेश रानी के पास भेजे कि सैन्य अधिकारी अपनी असफलता के लिए निश्चय ही कैद में डाले जाने लायक हैं; लेकिन उन्होंने तो कभी अपने कर्तव्य की अनदेखी नहीं की, अतः उन्हें सजा नहीं दी जानी चाहिए। और उन्होंने उनके पद पुनः सौंप दिये जाने की प्रार्थना की।
‘‘महामहिम रानी साहिबा ने उन्हें एक परिपत्र भेजकर सूचित किया कि यदि उनकी सेवाओं की कभी आवश्यकता पड़ी, तो उन्हें बुला भेजा जायेगा, और यह कि तब तक वे वहीं रहें, जहाँ वे हैं।
‘‘अब जबकि वे परदा व्यवस्था के अभ्यस्त हो गये हैं और उन्होंने खुद को अलगाये जाने की शिकायत करना बंद कर दिया है, हम इस व्यवस्था को जनाना के बजाय मर्दाना कहने लगे हैं।’’
‘‘लेकिन चोरी या हत्या के मामले आप बिना पुलिस या न्यायाधीशों के कैसे निपटाते हैं?’’ मैंने सारा बहन से पूछा।
‘‘जब से मर्दाना प्रथा स्थापित हुई है, तब से अपराध और पाप यहाँ रहे ही नहीं। अतः हमें अपराधी को ढूंढ  निकालने के लिए पुलिस और आपराधिक मुकदमा निपटाने के लिए न्यायाधीश की जरूरत नहीं है।’’
‘‘यह तो बहुत अच्छी बात है। यदि कोई बेईमानी करता भी होगा, तो आप लोग उसे खुद ही आसानी से सजा दे देती होंगी। आखिर जब आपने एक बूँद रक्त बहाये बिना एक निर्णायक विजय प्राप्त कर ली, तो अपराध तथा अपराधी से निपटने में आपको कोई खास कठिनाई नहीं होती होगी।’’
‘‘प्रिय सुल्ताना, अब तुम यहाँ बैठोगी या मेरी बैठक देखने चलोगी?’’
‘‘आपका रसोईघर ही किसी रानी की निजी बैठक से कम नहीं है!’’ मैंने खुशी से मुस्कराते हुए उत्तर दिया, ‘‘लेकिन अब हमें यहाँ से चलना चाहिए। पुरुष मुझे कोस रहे होंगे कि इतनी देर से मैंने उन्हें रसोई के कामकाज से दूर रखा हुआ है।’’ हम दोनों खूब हँसीं।
‘‘मेरे मित्र कितने खुश और चकित होंगे, जब मैं लौटकर उन्हें बताऊँगी कि सुदूर स्त्री-देश में स्त्रियाँ देश पर राज करती हैं और सभी सामाजिक मसलों को नियंत्रित करती हैं, जबकि पुरुषों को बच्चों की देखभाल करने, भोजन पकाने और सभी तरह का घरेलू काम करने के लिए मर्दाने में रखा जाता है; और यह कि खाना पकाना कितना आसान है कि पकाने में आनंद आता है।’’
‘‘हाँ, यहाँ तुम जो भी देख रही हो, उन्हें सब बताना।’’

संज्ञा उपाध्याय

‘‘कृपया मुझे यह बताइए कि आप लोग खेती कैसे करती हैं? खेत में हल कैसे चलाती हैं और कठिन शारीरिक श्रम वाले काम कैसे करती हैं?’’
‘‘हमारे खेत बिजली के साधनों द्वारा जोते जाते हैं। बिजली ही हमारे अन्य श्रमसाध्य कार्यों की भी चालक शक्ति है। अपने हवाई वाहनों को भी हम बिजली से ही चलाते हैं। हमारे यहाँ न रेलमार्ग है और न ही खडंजेदार सड़कें।’’
‘‘तभी यहाँ न सड़क दुर्घटनाएँ होती हैं और न रेल दुर्घटनाएँ।’’ मैंने कहा और पूछा, ‘‘क्या आप लोगों को कभी बारिश की कमी नहीं महसूस होती?’’
‘‘नहीं, जब से ‘पानी का गुब्बारा’ लगाया है, तब से कमी नहीं महसूस होती। तुमने वह बड़ा गुब्बारा और उससे जुड़े पाइप देखे ही हैं। उनकी सहायता से हम अपनी जरूरत के मुताबिक जितना चाहें, उतना बरसात का पानी खींच सकते हैं। और हमें बाढ़, मूसलाधार बारिश या तूफानों का सामना भी नहीं करना पड़ता। प्रकृति हमें जितना दे सकती है, हम वह सब प्राप्त करने में बेहद व्यस्त हैं। हम कभी बेकार नहीं बैठते, इसलिए हमें एक-दूसरे से झगड़ने का वक्त ही नहीं मिलता। हमारी महान रानी को वनस्पति विज्ञान से बेहद लगाव है। उनकी इच्छा है कि समूचे देश को एक भव्य उद्यान में बदल दिया जाये।’’
‘‘बहुत बढि़या विचार है। आप लोगों का मुख्य भोजन क्या है?’’
‘‘फल।’’
‘‘गर्मियों के मौसम में आप अपने यहाँ ठंडक के लिए क्या करती हैं? हमारे यहाँ तो गर्मियों में बरसात को स्वर्ग का वरदान मानते हैं।’’
‘‘जब गर्मी असह्य हो जाती है, तो हम जमीन पर कृत्रिम फव्वारों के जरिये ढेर सारे पानी का छिड़काव करते हैं। सर्दियों में हम कमरों को सूर्य के ताप से गर्म रखते हैं।’’
उन्होंने मुझे अपना स्नानघर दिखाया, जिसकी छत हटायी जा सकने वाली थी। वे जब चाहें, तब स्नान का आनंद ले सकती थीं। इसके लिए बस छत को (जो किसी डिब्बे के ढक्कन के समान थी) हटा देना होता था और फव्वारे के पाइप का नल घुमा देना होता था।
‘‘आप लोग कितने भाग्यशाली हैं!’’ मैं बोल उठी, ‘‘अभाव क्या होता है, आप जानते ही नहीं। क्या मैं पूछ सकती हूँ कि आप लोगों का धर्म क्या है?’’
‘‘हमारा धर्म प्रेम और सच्चाई पर आधारित है। हर किसी से प्रेम करना और पूरी तरह सच्चे रहना हमारा धार्मिक कर्तव्य है। यदि कोई स्त्री या पुरुष झूठ बोलता है, तो उसे…’’
‘‘मृत्युदंड दिया जाता है?’’
‘‘नहीं, मृत्युदंड नहीं। ईश्वर के बनाये प्राणी,विशेष रूप से मनुष्य,की हत्या में हमें कोई आनंद नहीं मिलता। झूठ बोलने वाले को सदा के लिए देश छोड़कर चले जाने और फिर कभी न लौटने को कहा जाता है।’’
‘‘क्या किसी अपराधी को कभी क्षमा नहीं मिलती?’’
‘‘हाँ, यदि वह सच्चे हृदय से पश्चात्ताप करे।’’
‘‘क्या आपको अपने संबंधियों के अतिरिक्त अन्य किसी पुरुष से मिलने की अनुमति नहीं है?’’
‘‘पवित्र संबंधों के अतिरिक्त किसी से नहीं।’’
‘‘हमारा पवित्र संबंधों का दायरा बड़ा सीमित है। यहाँ तक कि सगे ममेरे-चचेरे भाई-बहन के संबंध भी पवित्र नहीं हैं।’’
‘‘लेकिन हमारा दायरा बहुत विस्तृत है। बेहद दूर के रिश्ते का भाई भी भाई ही होता है।’’
‘‘यह तो बहुत अच्छा है। आपके देश में पवित्रता का राज है। मैं आपकी भली रानी से मिलना चाहूँगी, जो इतनी दूरदर्शी हैं और जिन्होंने ये नियम बनाये हैं।’’
‘‘ठीक है।’’ सारा बहन ने कहा।

उन्होंने एक चैकोर तख्ते पर दो आसन कसे। तख्त में उन्होंने दो चिकने और चमकदार गोले जोड़े। मैंने पूछा कि ये गोले किसलिए हैं, तो उन्होंने बताया कि ये हाइड्रोजन के गोले हैं, जिनका उपयोग गुरुत्वाकर्षण बल से पार पाने के लिए किया जाता है। ये गोले अलग-अलग क्षमताओं वाले होते हैं। अलग-अलग वजन उठाने के हिसाब से इन गोलों का उपयोग किया जाता है। फिर उन्होंने हवाई कार में पंखनुमा दो पत्तियाँ कसीं। उन्होंने बताया कि ये बिजली से काम करती हैं। जब हम आराम से बैठ गये, तो उन्होंने एक घुंडी दबायी और पंखनुमा पत्तियाँ घूमने लगीं। हर क्षण उनकी गति तीव्र से तीव्रतर होती गयी। पहले हम धरती से छह-सात फुट ऊपर उठे और फिर उड़ चले। और जब तक मैं महसूस करती कि हमने उड़ना शुरू किया है, हम रानी के बाग में पहुँच चुके थे।
मेरी मित्र ने यंत्र की प्रक्रिया उलटकर हवाई कार को नीचे उतारा और जैसे ही कार ने जमीन को छुआ, यंत्र बंद हो गया और हम कार से उतर गये।
मैंने हवाई कार से देख लिया था कि रानी बाग में बने पथ पर अपनी चार वर्ष की नन्ही बिटिया और महल की दासियों के साथ टहल रही थीं।
‘‘अरे! तुम यहाँ!’’ रानी ने सारा बहन से कहा।

मेरा रानी से परिचय कराया गया और उन्होंने बिना किसी दिखावे के हार्दिकता के साथ मेरा स्वागत किया।
मैं बेहद आनंदित थी कि मेरी जान-पहचान रानी के साथ हो रही है। बातचीत के दौरान उन्होंने मुझे बताया कि अन्य देशों के साथ व्यापार करने की अनुमति अपने लोगों को देने में उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। ‘‘लेकिन,’’ उन्होंने जोड़ा, ‘‘उन देशों के साथ कोई व्यापार संभव ही नहीं, जहाँ औरतों को जनाने में रखा जाता है, जिसके चलते वे हमसे व्यापार करने नहीं आ सकतीं। और हमने पाया है कि पुरुष नैतिक रूप से कमतर होते हैं, इसलिए हम उनसे किसी प्रकार का लेन-देन पसंद नहीं करते। हम दूसरों की जमीन नहीं हथियाते, न हम हीरे के एक टुकड़े के लिए झगड़ते हैं, भले ही वह कोहिनूर से हजार गुना अधिक चमकदार क्यों न हो, और न ही हम किसी राजा से उसके मयूर सिंहासन के लिए ईष्र्या करते हैं। हम तो ज्ञान के समुद्र में गहरे गोते लगाते हैं और वे कीमती हीरे खोजने का प्रयास करते हैं, जो प्रकृति ने हमारे लिए रख छोड़े हैं। हम तो प्रकृति के उपहारों का यथासंभव आनंद उठाते हैं।’’
रानी से विदा लेकर मैंने दोनों प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों का दौरा किया। वहाँ उन्होंने मुझे अपने कुछ कारखाने, कुछ प्रयोगशालाएँ और पर्यवेक्षणशालाएँ दिखायीं। इन दिलचस्प जगहों को देखने के बाद हम पुनः हवाई कार में सवार हो गये, लेकिन ज्यों ही वह चलनी शुरू हुई, मैं किसी तरह नीचे फिसल पड़ी और गिरने से चैंककर मैं अपने स्वप्न से बाहर आ गयी। और आँखें खोलने पर मैंने स्वयं को अपने शयनकक्ष में पाया, आरामकुर्सी में ही पड़े हुए!

अनिता भारती की कवितायें : हमें तुम्हारी बेटियां पसंद हैं और अन्य

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अनिता भारती


दलित स्त्रीवाद की सैद्धंतिकी की अनिता भारती की एक किताब, समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रतिरोध प्रकाशित हो चुकी है. कविता , कहानी के इनके अलग -अलग संग्रहों के अलावा बजरंग बिहारी तिवारी के साथ संयुक्त  सम्पादन में दलित स्त्री जीवन पर कविताओं , कहानियों के संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं. सम्पर्क : मोबाइल न. 09899700767.

(अनिता भारती को रमणिका फाउंडेशन की ओर से स्त्री मुद्दों पर सक्रियता और लेखन के लिए ‘ सावित्री बाई फुले सम्मान से सम्मानित किया गया है . स्त्रीकाल की ओर से उन्हें बधाई देते हुए  पाठकों के लिए  उनकी कवितायें. अनिता जी साहित्य की विविध विधाओं में जितना लिखती हैं , उतना ही या उससे अधिक सामाजिक मोर्चों पर डंटी रहती हैं – खासकर दलित और स्त्री मुद्दों पर. स्त्रीकाल का ‘ दलित स्त्रीवाद अंक’  इन्होंने अतिथि सम्पादक के रूप में सम्पादित किया है और दलित स्त्रीवाद की सैद्धंतिकी की इनकी एक किताब, ‘समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रतिरोध ‘ प्रकाशित हो चुकी है.)

हमें तुम्हारी बेटियां पसंद हैं

सुनो,
श्यामा गौरी
पार्वती ओमवती
निर्मला कमला बिमला
सुनीता बबीता गुड्डो गुड्डी
धन्नो बिल्लो रानी मुन्नी
बबली पिंकी शन्नो रानों

हमें पसंद है
तुम्हारी बचपना लांघती बेटियां
स्पष्ट कहें तो
तुम्हारी जवानी की दहलीज पर खड़ी
बेटियां हमें बहुत भाती है
ठीक वैसे ही
जैसे खेत में कटने को तैयार खड़ी
दानों से भरपूर फसल

दुधारू गाय खरीदने-बेचने से पहले
तय होता है मोल-भाव
उसके दूध से
हमें भी करना है तुमसे
खरा-खरा मोल-भाव

सुनो….
हमें करने दो न मोल-भाव
यह जरूरी भी है
हमारे बच्चों के साथ जो रहना है इन्हे
मिटाने दो हमें हमारे सारे संशय
कर लेने दो पूरी छानबीन हमें

किस जात
और नस्ल की हो तुम ?
तुम्हारे पुरखों का क्या इतिहास है ?
तुम्हारी बेटियां स्वस्थ तो है न ?
उन्हें कोई बीमारी तो नहीं ?
अब तक कुंआरी ही होगी न?

बताओ, तुम्हारी बेटियां
काम करने में कैसी हैं ?
कामचोर तो नहीं ?
साफ-सुथरे रहने की आदत है या नहीं ?
लालची तो नहीं खाने की ?
शौकीन तो नहीं हैं ना
मोबाइल लिपस्टिक टेलीविजन की ?

हमें जरूरत है
ऐसी ही लड़कियों की
जो हों अल्प वयस्क
जो मन लगाकर काम कर सकें सारे

अब हम करें भी तो
क्या करे ?
हमारे अपने बच्चे ठहरे
निपट निकम्मे
एक गिलास पानी तक
खुद नहीं पी सकते
अपने गंदे कपड़े उतार
फेंकने की आदत है उन्हें इधर-उधर
उठाती रहती हैं हम दिन भर उन्हें
रात-दिन खाने की फरमाईशें
पूरी करते करते थक जातीं हैं हम !

फिर तुम्हारे साहब के काम
सो अलग
प्रैस कपड़े, पॉलिश किए चमकते जूते
मोबाइल, घड़ी
अंगूठियां, वर्क-डायरी
सब सामान रहे व्यवस्थित
चुटकियों में
मांगने पर मिल जाये बजाते
जिनके न मिलने पर सुनने पड़ते है कटुवचन
पहले बजा लेती थी सारे हुक्म
अब नहीं कर पाती मैं
यह सब
घुटने भी तो जबाब दे चुके हैं हमारे

सुनो मुझे तुम्हारी बेटी चाहिए
जो कर सके मुझे भारमुक्त
संभाल ले मेरा घर-बार
अच्छा पैसा दूंगी मैं
उनसे ज्यादा, जो पहले दे रहीं है तुम्हें

सुबह की चाय
दोपहर की दो रोटी
शाम की चाय वह हमारे यहाँ ही पियेगी
दो बिस्कुट के साथ
साल में दो जोड़ी कपड़े बोनस के तौर पर
जितना मैं दे रही हूँ कोई नहीं देगा

देखो,
तुम अब ज्यादा जिद्द मत करो
कल से भेज देना बिटिया को मेरे घर

 जहांगीरपुरी की औरतें : १

जहांगीरपुरी की औरतें
मेहनत की धूप में
तपकर
फीकी हो चुकी अरगनियों पर

झूलती कपड़ों- सी
लचक-लपक-झपक
लम्बे-लम्बे डग भरती
जल्दी-जल्दी
घरों में, दुकानों में, कारखानों में
काम करने के लिए खप जाती हुई

किसी दिन
मुश्किल से मिली छुट्टी में
कभी-कभी अपने नन्हें मुन्नों को
गोद में लादे
छाती से चिपकाये, उंगली थामे
खुशी से गालों में हजारों गुलाब समेटे
ले जाती हैं दिखाने
मैट्रो में लालकिला या कुतुब मीनार

जहांगीरपुरी की औरतें
रोटी सेंकने के बाद
बुझे चूल्हे सी
मन में अंगार दबाये धधकती
हाथ लगाओ तो जल जाओ

जहांगीरपुरी की औरतें
बार-बार धुलने से फीकी हुई
गली साड़ी सी
जो बार- बार सिलने पर भी
फट-फट पडे

जहांगीरपुरी की औरतें
सुबह-सुबह
ताजा सब्जी- सी दमकती
पर शाम होते ही
मुरझायी बासी सब्जी- सी
जिनकी कीमत शाम होते होते
कम हो जाती है

जहांगीरपुरी की औरतें
सर्दियों की रात में
सुनसान पडी सड़क की तरह
जिसमें चलना न चाहे कोई

पर वे चलती है उन पर
निड़र बेखौफ
पार करती है उन्हें
हँसते-हँसते
जिन्दगी के अन्त से बेखबर

 जहांगीरपुरी की औरतें : २

जहांगीरपुरी की औरतें
चल पडती है निन्हेबासी
और बच्चियां
झुग्गियों के अंधेरे कुएं से निकल
फैल जाती हैं
आस-पास की पॉश कलोनियों में

महज झाडू-पोछा ही नहीं करतीं
करने निकलती है
मल की सफाई भी
पन्नी चुगने
और फैक्ट्रियों में ठुसने

ये काली गोरी पतली छोटी लम्बी
चेहरे पर वीरभाव रुआंसापन मुर्दानापन
तटस्थ- सा पीलापन लिए
बैठती हैं बस में
एक-एक रुपये के लिए
खाती हैं कंडक्टर से घुड़कियां
पहुँचती हैं अपने-अपने गंतव्य

सुबह से निकली
लौटेंगी शाम को
धूल-धूसरित सूरज के साये में
अलसायी, थकी टूटी देह लिए।

मिट्टी 

तुमने हमेशा वही किया
अपने अधिकारों को खूब भोगा
दूसरों के अधिकारों पर
लगा दी पाबंदी

न चले सड़क पर हम
न अच्छा पहनें
और न तो पढ़ पायें
रहें बस गंदी कोठरियों में

हमारे बच्चे हमारे तालाब
हमारे कुएँ
कुछ भी तुम्हें बर्दाश्त नहीं
तुम्हारी आंखों की
किरकिरी हैं हम
तुम्हारी आँखों में पड़ी
मिट्टी हैं हम

यही मिट्टी
जब लेती है आकार
गढ़ती है सपने
बनाती है घरौंदे
देती है समता, बंधुत्व का संदेश
करती है नवसृजन
उगाती है पौधे

जब भरती है हुंकार
उड़ाती है मीनारें
गिराती है महल
माना मिट्टी मूक है
पर मिट्टी की ताकत असीम है

    फर्क 

अरी सुनो बहनों,
थोड़ा पास आओ
मत शरमाओ
शरमा जाने से
किसी के गुनाह कम नही हो जाते

अरी सुनो,
तुम्हे पसंद है
गोरा-गोरा गोल-गोल
सुंदर चांद
और उसकी चांदनी को पीना

हमें पसंद है
परिश्रम की आग में तपे
लाल तवे पर सिकती
रोटी की गंध

तुम्हे पसंद है
तुम्हारे भव्य मंदिर में रखे
दिव्य देव
और हमें पसंद है
उन पर उंगली उठाना

तुम्हे पसंद है
शब्दों के खेल में
जीवन के पर्याय बताना
प्यार सेक्स बलात्कार
यौनिकता पर थोड़ा
रुमानी होते हुए चर्चा छेड़ना
और हमें पसंद है
इस खेल के व्यापार को
एक विस्फोटक डिब्बे में
बंद कर
एक तिल्ली से उड़ा देना

अब बताओ
कितना फ़र्क है
तुम में और हम में ?

6. भेददृष्टि

सच बताओ तुम
क्या सच हमारी जमात
स्त्री विरोधी है ?
स्त्री एकता, स्त्री आंदोलन को
तोड़ने वाली
या फिर उसे विभाजित कर
भटकाने वाली ?

तुम्हारी जमात ने कहा
हमें स्वतंत्रता चाहिए
हमारी जमात ने कहा
स्वतंत्रता हमें भी चाहिए
तुमसे और
तुम्हारे जाति आधारित समाज से

तुम्हारी जमात ने कहा
हमें समानता चाहिए
हमारी जमात ने कहा
समानता सिर्फ़
स्त्री की पुरुष से ही क्यों ?
दलित की सवर्ण से क्यों नहीं ?

तुम्हारी जमात ने कहा
लम्बे संधर्ष के बाद
हम अब
उस मुकाम पर आ गये हैं
कि जहां हम अपनी देह
एक्प्लोर कर सके
हमारी जमात ने कहा
बेशक देह एक्सप्लोर करो
पर उस झाडू लगाती
खेत रोपती पत्थर तोडती
रोज बलत्कृत होने को मजबूर
देह को भी मत भूलो

तुम्हारी जमात ने कहा
अब हम उनकी बराबरी करेंगे
जो हमेशा हमें दबाते आये है
हमारी जमात ने कहा कि
पहले उनको बराबर लाओ
जिनको हमेशा से
सब दबाते आए है

तुमने कहा पितृसत्ता
हमने कहा
ब्राह्मणवादी पितृसत्ता

तुम्हारी जमात ने कहा
बस याद रखो
स्त्री तो स्त्री होती है—-
न वह दलित होती है न ही सवर्ण
हमारी जमात ने कहा
समाज में वर्ग है श्रेणी है जाति है
इसलिए स्त्री
दलित है ब्राहमण है
क्षत्रिय है वैश्य है शूद्र है

और बस इस तरह
तुम्हारी और हमारी जमात की
सतत लड़ाई चलती है
अब तुम्हीं बताओ
क्या हम स्त्री विरोधी हैं ?

अबरोध बासिनी

रुकैया सखावत हुसैन
सम्पादन,  अनुवाद और प्रस्तुति नासिरूद्दीन हैदर खाँ

(  आज, ( 9 दिसम्बर )   के ही दिन  19वीं और 20 वीं सदी की प्रसिद्ध लेखिका रुकैया सखावत हुसैन का इंतकाल हुआ था . वरिष्ठ पत्रकार और अनुवादक नासिरुद्दिन हैदर खां ने  रुकैया की किताब ‘अबरोध बासिनी’ का मूल बांग्ला से हिन्दी में अनुवाद किया है. स्त्रीकाल के पाठकों के लिए उसकी प्रस्तुति नासिरुद्दिन के द्वारा. रुकैया यहां अफसाने नहीं पर्दॆ की बेबसी  में जीती महिलाओं की हकीकतें बता रही हैं .  )

सम्पादक /अनुवादक  की टिप्पणी

हिन्दी का अवरोध बांग्ला का ‘अबरोध’ है। ‘अबरोध बासिनी’ यानी ऐसी महिलाएं जो हर तरह के अवरोध के बीच जिंदगी जी रही हैं। वह अवरोध सिर्फ पर्दानुमा कोई कपड़ा नहीं है। इसमें हर वह चीज शामिल है, जो महिलाओं की जिंदगी को किसी खास दायरे में कैद करती है। रुकैया ने इसे बहुत अच्छे तरीके से समझा और महसूस किया था। वह खुद अवरोधों के बीच रहीं लेकिन उससे जद्दोजहद भी करती रहीं।

रुक़ैया सखावत हुसैन (1880-1932) ने अवरोध में रहने वाली महिलाअों की जिंदगी के किस्से हमारे सामने ‘अबरोध बासिनी’ के रूप में 1931 में पेश किए। इसकी भूमिका में वह लिखती हैं, ‘कई ऐतिहासिक और आंखन देखी सच्ची घटना के आधार पर हंसने- रुलाने वाली अबरोध बासिनी रची गई।’ एकबारगी यह भले ही लगे कि यह उस वक्त की बात है पर ऐसा है नहीं। मुमकिन है, यह  ठीक उसी शक्ल में आज न हो पर महिलाओं की जिंदगी में अवरोध की निशानी आज भी देखी जा सकती है। इसीलिए आज भी इसे पढ़े जाने की जरूरत है। 

रुकैया

महिलाओं की आवाज

आज से 80 साल पहले यानी 9 दिसम्बर 1932 की सुबह एक ऐसी महिला इस दुनिया से अलविदा कह गई जिसकी चिंता में भारतीय महिला, खासकर मुसलमान महिला की जिंदगी आखिरी वक्त तक थी। जिंदगी के आखिरी लम्हे के चंद घंटे पहले वह ‘महिलाओं के ह़क’ पर एक लेख की शुरुआत कर रही थी। यह महिला भारतीय नारीवादी आंदोलन की अगुआ लोगों में थी। मुसलमानों में तो ये जाहिर तौर पर पहली पांत की विचारक थीं।महिलाओं की जिंदगी का आईना दिखाने और बेहतर दुनिया बनाने के लिए उसने लेख लिखे, कहानियाँ लिखीं, उपन्यास लिखें, व्यंग्य रचनाएं लिखीं, संगठन बनाया और मुसलमान लड़कियों के लिए सौ साल पहले एक स्कूल भी कायम किया।

यह महिला रुकैया खातून उर्फ रुकैया सखावत हुसैन थीं। रुकैया पैदा भले ही जमीदार घर में हुईं पर उनकी जिंदगी में यह खानदानी विरासत ढाल नहीं बना। महिलाओं के लिए आवाज उठाने वालों को जिन समाजी झंझावत से गुजरना पड़ता है, रुकैया को उन सबसे गुजरना पड़ा। उस समाज में जहां न कोई राम मोहन राय था न ईश्वरचंद विद्यासागर, रुकैया एक मशाल की तरह जलीं और खुद को होम कर दिया।

रुकैया की एक-आध रचनाएं हिन्दी में मिलती हैं और उनका स्रोत भी अंग्रेजी है। रुकैया का बड़ा रचना संसार बंगला में है। शायद यही वजह है कि दुनिया भर के नारीवाद की  चर्चा तो होती है लेकिन जितनी शिद्दत से रुकैया की चर्चा होनी चाहिए वह बंग्लादेश और थोड़ा बहुत अपने बंगाल को छोड़ कहीं और नहीं दिखती। यह भी चर्चा उनके जन्म और कायमशुदा स्कूल के शताब्दी साल में हुई। उनकी रचनाओं में विचार है। ख्वाब है। भविष्य की दुनिया के बीज हैं। 1903-4 में वह एक लेख में पूछती हैं, ‘इसे पढ़ने वाली मेरी प्यारी बहनो। क्या आपने कभी अपनी बुरी हालत के बारे में फिक्र  किया है? बीसवीं शताब्दी के इस तहज़ीब व तमद्दुन वाले समाज में हमारी क्या हैसियत है? दासी यानी ग़ुलाम! हम सुनते हैं कि धरती से ग़ुलामी का निज़ाम ख़त्म हो गया है लेकिन क्या हमारी ग़ुलामी ख़त्म हो गई है? ना। हम दासी क्यों हैं?’

2.

अंग्रेजों का राज। उन्नीसवीं शताब्दी का आखिरी दौर। बंगाल में नवजागरण की मुहिम उरुज पर लेकिन इसकी रोशनी सब पर एक समान नहीं थी। समुदाय में यह हिन्दुओं पर असर डाल रही थी और हिन्दू महिलाओं की जिंदगी पर खुलकर चर्चा हो रही थी। नवजागरण के अगुआ भी इसी समुदाय से थे। मुसलमान और खासकर मुसलमान महिलाएं इससे अछूती थीं। मुसलमान मर्दों पर धीरे-धीरे नवजागरण का असर तो दिखने लगा लेकिन महिलाएं घर के चहारदीवारी में ही सांस लेने के लिए जद्दोजेहद कर रही थीं।

इसी माहौल में भारत के उत्तरी बंगाल के रंगपुर जिले के पैराबंद में एक जमीदार जहीरुद्दीन मोहम्मद अबू अली हैदर साबिर रहते थे। घर में किसी चीज की कमी नहीं। खुद पढ़ने लिखने के शौकीन। अरबी, फारसी, उर्दू, पश्तो, अंग्रेजी और बांग्ला जानते थे। उस वक्त बंगाल के भद्र मुसलमानों की जबान उर्दू थी। बंगला आमजन की जबान थी। इसलिए उन्हें बंगला बोलने और पढ़ने में हेठी का अहसास होता था।

सी जमीदार के घर 1880 में एक बच्ची का जन्म होता है। बच्ची को रुकु यानी रुकैया खातून नाम दिया गया। बाद में वही रुकैया सखावत हुसैन के नाम से मशहूर हुई। बंगाल में रहते हुए भी जमीदार साहेब के घर की जबान उर्दू थी। बेटों के लिए उन्होंने ऊंची तालीम का इंतजाम किया। वह बेटियों को तालीम दिए जाने के खिलाफ नहीं थे पर जमाना उनके साथ नहीं था। उस वक्त अमीर कुल की बेटियों को पढ़ाने की कोई व्यवस्था नहीं थी। जो पढ़ाना चाहता तो उसका विरोध होता। रुकैया में भी पढ़ने की जबरदस्त ललक थी। उसकी इस ललक को बड़ी बहन और भाई ने समझा। भाई ने बहन को सबकी नजरों से छिपाकर पढ़ाया। सोलह साल की उम्र में रुकैया की शादी 1896 में उम्र में काफी बड़े पर एक जहीन, पढ़े-लिखे, तरक्कीपसंद और अंग्रेज सरकार के अफसर सखावत हुसैन से हो गई। सखावत हुसैन बिहार के भागलपुर के रहने वाले थे। 1909 में सखावत हुसैन की मौत तक रुकैया यहीं रहीं।

ये चौदह साल एक ऐसी नारीवादी विचारक महिला के बनने के थे जो महिलाओं और खासकर मुसलमान महिलाओं को बराबरी का हक दिलाने के लिए जमीन तैयार कर रही थी। रुकैया इस मामले में पहली खातून हैं जसने शिद्दत के साथ महिलाओं के हक में न सिर्फ लिखा बल्कि  पति की मौत के बाद पहले भागलपुर और फिर कोलकाता में मुसलमान लड़कियों के लिए एक स्कूल की स्थापना की। रुकैया की रचनाएं ज्यादातर बंगला में और कुछ अंग्रेजी में हैं। रुकैया की रचनाएं बंगला की ढेरों पत्र-पत्रिकाओं में छपीं और उसने उस वक्त के समाज में खासी हलचल पैदा कर दी थी। रुकैया का इंतकाल 9 दिसम्बर 1932 को कोलकाता में हुआ। यह साल उसकी 80वीं बरसी का है।

रचनाएं

सुलतानाज ड्रीम (अंग्रेजी में लघु विज्ञान उपन्यास), मोतीचूर, खण्ड-1 और 2 (लेखों का दो संग्रह), पदमराग (उपन्यास), अबरोध बासिनी (व्यंग्य रचना संग्रह), कई कविताएं, कहानियां, अंग्रेजी और बंगला में ढेरों लेख ‘रुकैया रचनावली’ में हैं।

अबरोध बासिनी : रुकैया सखाबत हुसैन 

निवेदन

कई ऐतिहासिक और आँखन देखी सच्ची घटना के आधार पर हँसने-रुलाने वाली ‘अबरोध-बासिनी’ रची गई। पाठक-पाठिकागण ज़्यादातर जगहों पर हँसेंगे/हँसेंगी, इसमें कोई शक नहीं है। हालाँकि किसी-किसी जगह पर उनके मन में हमदर्दी जागेगी और मुझे य़कीन है कि वे ‘ताहेरा’ मरहूम की अकाल मौत पर दो बूँद आँसू गिराने से अपने आपको रोक नहीं पाएँगी/पाएँगे।

मौलवी मोहम्मद ख़ैरूल अनाम खाँ साहेब ने ख़ास जोश दिखाते हुए ‘अबरोध बासिनी’ को छापने का पूरा भार उठाया है। और क्या बोलूँ, उनकी ही गुज़ारिश पर यह किताब की शक़्ल में छप रहा है। उन्हें दिल से शुक्रिया अदा करती हूँ।

रिटायर स्कूल इंस्पेक्टर परम भक्तिभाजन काबिल ज्ञानी मौलवी अब्दुल करीम साहेब, बी.ए. एम.एल.सी. ने मुझ पर बड़ा एहसान करते हुए ‘अवरोध बासिनी’ की भूमिका लिखी है। मैं दिल से उनकी एहसानमंद हूँ।

मैं जब कार्सियांग और मधुपुर घूमने गई तो वहाँ से ख़ूबसूरत पत्थर इकट्ठे (जमा) कर लाई, जब उड़ीसा और मद्रास के सागर तट पर घूमने गई तो अलग-अलग रंग और आकार के शंख-सीप इकट्ठे (जमा) कर ले आई। … और अब जिंदगी के 25 साल समाजी ख़िदमत में लगाते हुए कठमुल्लाओं की गालियाँ और लानत-मलामत इकट्ठा (जमा) कर रही हूँ।

हज़रत राबिया बसरी ने कहा है, ‘या अल्लाह! अगर मैं दोज़ख़ के डर से इबादत करती हूँ तो मुझे दोज़ख़ में ही डाल देना। और अगर बहिश्त यानी जन्नत की उम्मीद में इबादत करूँ तो मेरे लिए बहिश्त हराम हो।’ अल्लाह के फजल से अपनी समाजी ख़िदमत के बारे में मैं भी यहाँ यही बात कहने की हिम्मत कर रही हूँ।

मेरा तो रोम-रोम गुनाहगार है। इसीलिए इस किताब की ग़लतियों और कमियों के लिए इस बार पाठक-पाठिकागण से मा़फी की गुजारिश नहीं की है।

विनीता
ग्रंथकर्त्री

अबरोध-बासिनी

सालों-साल पर्दे में रहते-रहते अब हम इसके आदी हो चुके हैं। इसलिए पर्दे के ख़िला़फ बोलने के लिए हमारे और ख़ासकर मेरे पास कुछ नहीं है। अगर किसी मछुआरन से यह पूछा जाए कि, ‘सड़ी हुई मछली  की बदबू अच्छी लगती है या ख़राब?’- तो वह क्या जवाब देगी?

यहाँ मैं अपनी बहनों को जाती तज़ुर्बे वाले कई वा़कये का तोह़फा दूँगी। उम्मीद करती हूँ, उनको ये दिलचस्प लगेगा।

यहाँ यह भी सा़फ करना बहुत ज़रूरी है कि सारे भारत में इज़्ज़तदार घरों की शरी़फ बेटियों का पर्दा सि़र्फ मर्दों से नहीं है। इनका पर्दा तो महिलाओं से भी है। जिन लड़कियों की शादी नहीं हुई है, उनका पर्दा तो ऐसा होता है कि उन्हें काफी नज़दीकी महिला रिश्तेदार और घर की नौकरानी को छोड़, कोई दूसरी महिलाएँ देख नहीं पाएँ।

शादीशुदा महिलाएँ भी तमाशा दिखाने वाली या इन जैसी और महिलाओं से भी पर्दा करती हैं। जो जितना पर्दा करती हैं, घर के अंदर उल्लू की तरह जो जितना कोने में छिपी रहती हैं, वे उतनी ज़्यादा शरी़फ हैं।

शहर में रहने वाली बीबियाँ तो मिशनरी मेम को देखते ही हड़बड़ाकर भाग खड़ी होती हैं। मेम तो मेम- ये तो साड़ी पहने वाली ईसाई और बंगाली महिलाओं को देखते ही अपने कमरे में भाग जाती हैं और दरवाज़ा बंद कर लेती हैं।

एक.

यह काफी पुराना वा़कया है- रंगपुर ज़िले के पैराबंद गाँव के ज़मीदार का घर। दोपहर के करीब एक-दो बज रहे हैं। ज़मीदार की बेटियां ज़ोहर का नमाज़ पढ़ने के लिए वज़ू कर रही थीं। बा़की सभी ने तो वज़ू कर लिया था सिर्फ ‘आ’ खातून नाम की साहेबज़ादी अब भी आँगन में वज़ू कर रही थी। आलता की माँ यानी मामा बदना हाथ में लिए वज़ू के वास्ते पानी गिरा रही थी। ठीक उसी वक्त एक मस्त लम्बी चौड़ी काबूली स्त्री आँगन में पहुँच गई!

हाय, हाय, यह कौन सी आ़फत है! आलता की माँ के हाथ से बदना छूट कर गिर पड़ा। वह चिल्लाने लगी- ‘अरे, अरे! ये मर्द यहाँ कैसे आ गया!’

वह औरत हँसते हुए बोली, ‘हे, मर्दाना! हम मर्दाना है?’

उसकी आवाज सुनते ही ‘आ’ साहेबज़ादी की तो जैसे जान ही निकल गई। वह पूरी ता़कत से अपनी चाची जान के पास भागी। लड़की ने हाँफते-हाँफते और काँपते-काँपते कहा, ‘चाची अम्मा! शलवार पहने एक औरत आई है!!’

चाची जान चौंकी और घबराकर पूछा, ‘क्या उसने तुम्हें देख लिया?’

‘आ” ने सुबुकते हुए सिर हलाकर कहा, ‘हाँ!’

यह सुनते ही बाकी लड़कियों ने घबराकर नमाज बीच में ही छोडा़ और दरवाजा बंद कर दिया- ताकि काबूली औरत इन कुँवारी लड़कियों को देख न सके।

शायद कोई बाघ-भालू के डर से भी इस तरह घबराकर दरवाज़ा बंद नहीं करेगा!

दो.

यह भी एक ऐतिहासिक घटना है। पटना के एक बड़े आदमी के घर शादी है। इस मौ़के पर कई मेहमान ख़ातून आ रही हैं। बहुत सारी ख़ातून शाम के वक्त भी आ रही हैं। इन्हीं में एक मेहमान हशमत बेगम भी हैं।

पालकियों के आने का सिलसिला चल रहा है। मामा आने वाली हर पालकी के दरवाज़े खोलती हैं। बेगम साहिबाओं का हाथ पकड़ कर पालकी से उतारकर उन्हें घर के अंदर ले जा रही है। इसके बाद कहार खाली पालकी को हटाकर एक ओर ले जा रहे हैं। एक-एक करके पालकियों के आने का सिलसिला जारी है। इसी बीच एक कहार ने आवाज लगाया- ‘मामा! सवारी आया।’ मामा धीरे-धीरे चलते हुए बाहर आ रही है। जब तक मामा हशमत बेगम की पालकी तक पहुँचती, कहारों ने सोचा ‘सवारी’ तो नीचे उतर चुकी होगी। उन्होंने पालकी उठाई और ले जाकर एक किनारे रख दिया। इसके बाद एक और पालकी आई। मामा ने पालकी का दरवाज़ा खोला और मेहमान को अंदर ले गई। यह सिलसिला चलता रहा।

जाड़े का दिन। कहार ‘सवारियों’ को उतारने के बाद ख़ाली पालकियों को एक किनारे बड़े से बरगद के पेड़ के नीचे रख दे रहे हैं। वहीं पास में ही कहार मस्ती करते हुए खाना बना रहे हैं। शादी वाले घर से उन्हें जमकर बख्शीश मिली है। रात में उन्हें और ‘सवारी’ ढोने की भी ि़फक्र नहीं है। इसलिए वे ख़ूब मस्ती में हैं- कोई  गाना गा रहा हैं, कोई हुक्का पी रहा, कोई खैनी खा रहा- इस तरह मस्ती करते, खाते-पीते रात के दो बज गए।

इस बीच जब मेहमान बेगम साहिबा खाने के लिए बैठीं तो पाया कि हशमत बेगम अपने छह महीने के बच्चे के साथ कहीं नज़र नहीं आ रहीं। किसी ने कहा, बच्चा छोटा है इसी वजह से नहीं आई होंगी। किसी ने कहा, उन्हें यहाँ आते हुए तो देखा था। जितनी मुँह उतनी बातें।

दूसरे दिन सुबह एक-एक कर मेहमानों की विदाई होने लगी। ख़ाली पालकी एक-एक कर आती और अपनी-अपनी ‘सवारी’ को लेकर चली जाती। कुछ पल बाद एक और ‘खाली’ पालकी आकर दरवाज़े पर खड़ी हुई। पालकी का दरवाज़ा खोला गया तो देखा गया कि हशमत बेगम बेटे को गोद में लिए बैठी हैं। पूस की सर्द लम्बी रात उन्होंने इसी तरह पालकी में बैठे-बैठे काटी थी!

हुआ यों कि हशमत बेगम पालकी से बाहर निकलतीं, इससे पहले ही कहार पालकी उठाकर ले गए- लेकिन उन्होंने इस डर से अपने मुँह से एक ल़फ्ज़ नहीं निकाले कि कहीं कहार उनकी आवाज़ न सुन लें। बच्चे को भी अपनी छाती से चिपटाकर रखा ताकि वह रोए नहीं- ताकि ऐसा न हो कि कहीं बच्चे का रोना सुनकर कोई पालकी का दरवाज़ा ही खोल कर न देख ले!

ख़ैर, जो तकली़फ न बर्दाश्त कर सके तो फिर उस ‘अबरोध वासिनी’ की बहादुरी ही क्या!

तीन.
लगभग 40-45 साल पुरानी घटना है।
कुछ घरों की बंगाली ज़मीदारों की माँ, खाला, बुआ, बेटी और कई लोग एक साथ हज करने जा रहे थे। उनकी तादाद 20-25 के करीब थी। वे कलिकता रेलवे स्टेशन पहुँचे। इसके बाद साथ आए मर्द किसी काम के वास्ते स्टेशन से कहीं बाहर चले गए। लेकिन ज़मीदार साहब अपने एक ख़ास और भरोसेमंद मर्द को बेगम साहिबाओं की हि़फाज़त के लिए छोड़ गए। इन शरी़फ साहब को लोग हाजी साहब बोलते थे। हम भी यही बोलेंगे। हाजी साहब बेगम साहिबाओं को वेटिंग रूम में बिठाने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। उनके समझाने-बुझाने और सलाह के बाद सभी बीबी साहिबा मोटे-मोटे काले कपड़े का बुर्का पहने हुए प्लेटफार्म पर ही उकड़ू होकर बैठ गईं। हाजी साहब ने एक ख़ूबसूरत शतरंजी (मोटा और भारी रंगीन दरी जैसा) उनके ऊपर डाल कर उन्हें ढक दिया। इस हालत में ये सब बेचारी बड़े-बड़े सामान की गठरी या ढेर सारे पार्सल की तरह दिख रही थीं। इन लोगों को इस तरह ढक कर रखने के बाद हाजी साहेब एक कोने में खड़े हो कर पहरा दे रहे थे। सि़र्फ अल्लाह ही जानता है कि हज के लिए निकलीं ये बीबियाँ इस हालत में कितने घंटे तक इंतज़ार करती रहीं। … और यह भी सि़र्फ अल्लाह ताला का ही करम रहा कि इनका दम घुटने से नहीं निकला।

जब ट्रेन आने का व़क्त हुआ तो कई अंग्रेज़ मुलाज़िम वहाँ पहुँचे और टूटी-फूटी हिन्दी में हाजी साहब से बोले, ‘मुंशी! तोमारा असबाब हियासे हाटा लो। अभी ट्रेन आवेगा। प्लेटफार्म पर ख़ाली आदमी रहेगा। आसबाब नहीं रहेगा।’ हाजी साहब हाथ जोड़ कर बोलें, ‘हुजूर, एइ सब आसबाब नाही- औरत है।’ एक मुलाज़िम को य़कीन नहीं हुआ। उसने एक ‘असबाब’ को जूते से ठोकर मारते हुए कहा, ‘हा, हा-एइ सब आसबाब हटा लो।’

बीबी साहिबाओं ने पर्दे की लाज रखते हुए जूते की ठोकर खाना कुबूल किया लेकिन मुँह से एक ल़फ्ज़ नहीं निकाला।

छह.

ढाका जिले के एक ज़मीदार के बड़े शानदार घर में भरी दुपहरिया आग लग गई। घर का सामान जल कर राख़ हो गया- तब भी कोशिश कर घर के कई सामान, फर्नीचर वग़ैरह निकाल लिए गए। तब ही लोगों को घर की औरतों को भी  बाहर करने का ख़्याल आया। अब अचानक पालकी की ज़रूरत आन पड़ी। पूरे गाँव में भी एक साथ दो-चार पालकी कहाँ मिलेगी? आख़िर में तय पाया कि एक बड़ी रंगीन मसहरी (मच्छरदानी) के अंदर बीबी लोग रहेंगी। मसहरी के चार कोने को बाहर से चार लोग पकड़कर ले कर चलेंगे। यही हुआ- आग के बीच मसहरी को पकड़कर चार जन दौड़ने लगे। मसहरी के अंदर चल रही बीबियाँ उसी तेज़ी से नहीं दौड़ पाईं और लड़खड़ाकर गिर पड़ीं। दाँत और नाक टूट गई। कपड़े फट गए। आख़िरकार, धान के खेत और काँटों के बीच भागते-भागते मसहरी भी तार-तार हो गई।

अब और कोई चारा नहीं बचा था। बीबियाँ धान के एक खेत में छिप कर बैठ गईं। शाम में आग बुझ गई। तब पालकी से एक-एक कर उन्हें घर लाया गया।

नौ.

एक मौलवी साहब का इंत़काल हो चुका था। घर में अब सि़र्फ एक बेटा और उनकी पत्नी बची थीं। मौलवी साहब कुछ जमा पूँजी छोड़कर नहीं गए थे। इसीलिए उनकी पत्नी का़फी तकली़फ से घर-बार चलातीं। बेटे की शादी के लिए उसने का़फी कष्ट करके कुछ ज़ेवर इकट्ठा किए। ज़ेवर बनवाने में का़फी पैसा खर्च हो गया। शादी से दो-तीन दिन पहले सेंध काटकर कुछ चोर घर में घुस गए। उस कमरे में उनके साथ एक नौकरानी भी सो रही थी। चोर की आहट पाकर वह उठकर बैठ गईं और धीरे-धीरे नौकरानी को जगाया। चोर ने सोचा, सर्वनाश- अब यहाँ से भागा जाए!

लेकिन चोर का एक साथी बोला, अच्छा, थोड़ी देर रुक कर देखा जाए कि क्या होता है? हुआ तो बहुत मज़ा-

बीबी साहिबा का इशारा पाकर नौकरानी ने एक कपड़े से उनके खाट के सामने में पूरी तरह पर्दा बनाकर टाँग दिया। इसके बाद चाबी का गुच्छा दिखाते हुए चोरों को बोली, ‘भई। तुम सब पर्दे के इस तऱफ न आना। तुम्हें जो चाहिए ले लो, मैं संदूक खोलकर बाहर कर दे रही हूँ।’ फिर उसने सभी ़कीमती कपड़े और ज़ेवर निकाल कर चोरों के हवाले कर दिए। चोरों ने गहनों को उलट-पुलट कर देखने के बाद पूछा, ‘नथ कहाँ है?- लगता है संदूक में ही रह गया है?’ मालकिन का इशारा पाकर नौकरानी बोली, ‘दुहाई! दुहाई! तुमलोग इस तऱफ नहीं आना- अम्मा सा’ब ने सि़र्फ नथ ही रखी है। परसों ही तो शादी है। अब कोई गहना तो बचा नहीं- नथ भी नहीं रहेगा तो ब्याह कैसे होगा? इसके बाद भी अगर तुम्हारी इच्छा है तो ले जाओ – नथ भी ले जाओ- पर्दे के इस तऱफ नहीं आना।’

चोर ख़ुशी से लबरेज़ आपस में बातचीत करते-करते चले गए। उस वक़्त रात के तीन-चार बजे थे। इतनी आसानी से इतना माल मिलने की ज़बरदस्त ख़ुशी में चोर का़फी ज़ोर-जोर से बात करने लगे। रास्ते में चौकीदार ने उनकी बात सुन ली और पकड़ने के लिए उनके पीछे दौड़ा। चोर भागे। एक चोर ठोकर खाकर गिर पड़ा। चौकीदार ने उसे पकड़ लिया। जब कोई चारा नहीं बचा तो वह चौकीदार के साथ वह घर दिखाने के लिए चल पड़ा, जहाँ से चोरी की थी। तब तक भोर हो चुका था। चौकीदार जब पहुँचा तो पाया कि बीबी साहिबा उस वक्त भी पर्दे के अंदर से बाहर नहीं निकली थीं- ‘अगर वे बदमाश कहीं फिर आ गए’ तब भी वे उनको देख लेते तो! नौकरानी को भी उन्होंने शोर मचाने नहीं दिया। क्योंकि कहीं ऐसा न हो कि शोरगुल सुनकर कोई मर्द उनके घर में न घुस जाए! चोरों के हाथों अपना सब कुछ गँवाकर भी उन्होंने पर्दे के इज्ज़त की हि़फाज़त करना ज़रूरी समझा!

दस.

किसी ज़मीदार के घर की बड़ी बहू अचानक छोटे भाई की बीबी को लाने उसके ससुराल गई। अचानक पहुँची तो देखा कि नई नवेली बहू की भाभी उसे भात खिला रही है। थाली में भात के साथ एक हरी मिर्च भी थी। उसने बड़े ही मासूमियत से पूछा, ‘हमारी बहू को तीता खाना अच्छा लगता है क्या?’ बहू की भाभीजान ने जवाब दिया, ‘हाँ, बहुत ही तीता खाती है।’

दूसरे दिन वह बहू को लेकर नौका से कलिकाता चली। रास्ते में तीन-चार दिन नाव में ही रहना पड़ा। इस दौरान वह जो कुछ भी खाना पकवातीं, उसमें ज़्यादा मिर्चा डलवा देतीं। हालाँकि असल बात तो ये थी कि बहू बिल्कुल ही तीता खाने की आदी नहीं थी। खाते व़क्त हरी मिर्च की खुशबू सूँघ-सूँघ कर भात खाने की आदत थी। इसी वजह से हँसी-ठिठोली में उसकी भाभी ने तीता खाने की बात कह दी थी। नतीजतन बेचारी के जान पर बन आई।

भाई-बहू के आदर में जेठानी हरी मिर्च के साथ अपने पास बैठाकर उसे खाना खिलाती। बहू की दोनों आँखों से झर-झर कर पानी बहता- मुँह और ज़बान जल जाते- तब भी बड़ी जेठानी को बोलने के लिए मुँह से बोल नहीं फूटे कि वह तीता नहीं खाती!! ओह… सत्यानाश! एक तो नई नवेली बहू- उस पर से बड़ी जेठानी- जान जाए पर मुँह से बोल नहीं फूटे।

ग्यारह.

सन् 1924 में मैं आरा गई थी। मेरी दो नातिनों की शादी एक साथ हो रही थी। उसी शादी के लिए बुलावा आया था। मेरी नातिनों के घर का नाम मंगू और सबू है। ये बेचारी उस व़क्त ‘माईया ख़ाना’ में थीं। कलकत्ता में तो शादी के सिर्फ 5-6 दिन पहले लड़कियों को ‘माईया ख़ाना’ नाम के बंदीख़ाना में रखते हैं। लेकिन बिहार मेें 5-7 महीने तक लड़कियों को इस तरह एक कोने में जेल की बंदी की तरह रखकर अधमरा किया जाता है।

मैं मंगू के जेलख़ाना में गई लेकिन बहुत ज़्यादा देर वहाँ नहीं बैठ पाई – उस अँधेरी बंद कोठरी में मेरा दम घुटने लगा। आखि़रकार एक दिन एक जंगला खुलवा दिया। दो मिनट में ही एक समझदार बीबी आईं और बोलने लगीं- ‘दुल्हिन को हवा लगेगी।’ उन्होंने जंगला बंद करवा दिया। मैं वहाँ और रुक नहीं पाई और उठकर चली आई। मैं सबू के जेलख़ाना में भी गई, वहाँ भी बैठ नहीं पाई।  लेकिन वे बेचारी छह महीने से इन्हीं अंधेरे जेल में बंद थीं। आखि़र में सबू को हिस्टीरिया रोग हो गया। इसी तरह हमलोगों को पर्दे (अवरोध) में रहने का आदी बनाया जाता है।

बारह.

पश्चिम देश की एक हिन्दू बहू अपनी सास और शौहर के साथ गंगा स्नान करने गई। स्नान करने के बाद जब लौटने की बारी आई तो उसे भीड़-भाड़ में अपने शौहर और सास कहीं दिखाई नहीं पड़े। अंत में वह एक साहब के पीछे-पीछे चल दी। कुछ देर बाद पुलिस का हल्ला हुआ। – उस साहब को कांस्टेबिल ने पकड़ा और  कहा- ‘तुम फलाँ शख़्स की बीबी को भगा कर ले जा रहे हो।’ उन्होंने चौंकते हुए पीछे मुड़कर देखा: अरे, यह किसकी बीबी मेरी धोती का कोना पकड़े चली आ रही है। – पूछने पर बहू ने जवाब दिया, वह हमेशा घूँघट में रहती है। उसने अपने शौहर को आज तक अच्छे तरीके से देखा नहीं है।  शौहर ने पीले पार वाली धोती पहन रखी है, यही देखा था। इन साहब की धोती की पार भी पीले रंग की है, यही देखकर उनके साथ चल दी।

पन्द्रह.

हुगली में एक अमीर आदमी के घर में शादी के मौ़के पर एक कमरे में ढेर सारी बीबियाँ इकट्ठा थीं। रात करीब 12 बजे उन्हें लगा कि कोई बाहर से कमरे का दरवाज़ा ठेल रहा है। कभी ज़ोर से तो कभी आहिस्ता। तरह-तरह से दरवाज़ा ठेलने की कोशिश हो रही है। सभी बीबियाँ जाग गईं और डर के मारे थर-थर काँपने लगीं। उन्हें पक्का य़कीन हो गया कि चोर दरवाज़ा तोड़ कर अंदर घुस आएगा और सभी बीबियों को देख लेगा। तब ही एक चालाक बीबी भी ने सभी ज़ेवर उतार कर एक पोटली में बाँधा और छिपा कर रख दिया। फिर बुर्का पहन कर दरवाज़ा खोला। दरवाज़े के बाहर थी- एक कुतिया! उसके दो बच्चे किसी तरह कमरे में रह गए थे और वह बाहर थी। बच्चों के पास आने के लिए वह कुतिया दरवाज़ा ठेल रही थी।

सोलह.

बिहार शरी़फ के एक बड़े आदमी दार्जीलिंग जा रहे थे। उनके साथ एक दर्जन ‘आदमियों का बोझा’ यानी ख़ाला, फूफू सहित सात महिलाएँ और 6 से 17 साल की पाँच लड़कियाँ भी थीं। वह ट्रेन और स्टीमर बदलने के दौरान हर जगह पालकी का इंतज़ाम करते। मनिहारी घाट, सकरीगली घाट वगैरह जगहों पर पालकी  का इंतज़ाम था। बीबी लोगों को पालकी में भर कर स्टीमर के डेक पर रखा जाता। फिर ट्रेन पर चढ़ते व़क्त उन लोगों को पालकी के साथ माल गाड़ी पर रखा जाता। लेकिन ई.बी. रेलवे लाइन पर और पालकियाँ नहीं मिलीं। तब वे ट्रेन रिजर्व कराकर सेकेण्ड क्लास डिब्बे में बैठने पर मजबूर हुए।

सिलीगुड़ी स्टेशन पर भी पालकी ढोने वाले कहार नहीं मिले। बड़ी ही मुसीबत थी- बीबी लोग दार्जीलिंग की ट्रेन में कैसे चढ़ेंगी? इसके बाद दो चादरों को चार जन ने दो तरफ से पकड़ा- इस चादर के बीच-बीच में बीबी लोग चलीं। बदनसीब पर्दानशीं पहाड़ों के उबड़-खाबड़ रास्ते पर नौकरों के ताल में ताल मिलाकर नहीं चल पा रही थीं। कभी दाहिने तऱफ का पर्दा आगे जाता तो बायाँ वाला पर्दा पीछे रह जाता। कभी बाएँ तऱफ का पर्दा आगे खिसक जाता और दाहिने का पर्दा पीछे। बेचारी बीबियाँ तो चलने में और ही ना़काबिल- वे कभी पर्दा से निकलकर आगे जातीं तो कभी पीछे रह जातीं! किसी का जूता बाहर निकल गया तो किसी का दोपट्टा उड़ गया!

सत्रह.

करीब 14 साल पहले हमारे स्कूल में लखनऊ की एक टीचर थी- अख़्तर जहाँ। उनकी तीन बेटियाँ इसी स्कूल में पढ़ती थीं। एक दिन वह आजकल की लड़कियों की बेशर्मी की शिकायत करते-करते अपनी बेटियोकी बेशर्मी के बारे में बताने लगीं। वह का़फी तकलीफ में थीं। बात-बात में उन्होंने अपनी ब्याहता ज़िंदगी का एक वा़कया सुनाया- 11 साल की उम्र में उनकी शादी हो गई थी। जब वह ससुराल गईं तो उन्हें घर के एक कोने की कोठरी में रखा गया। छोटी ननद दिन में तीन-चार बार उनके पास आती और जरूरी काम निपटाने के लिए बाथरूम ले जाती। एक दिन न जाने क्या वजह हुई, वह का़फी देर तक उनका हालचाल लेने नहीं आई। इस बीच नई नवेली दुल्हन बेचारी बाथरूम जाने के लिए बेचैन हो रही थी। लखनऊ की तऱफ लड़कियों को दहेज में ताँबे के बड़े-बड़े पानदान मिलते हैं। उनके शानदार पानदान में कई ख़ाने थे। उन्होंने पानदान खोला। सुपारी वाला डिब्बा बाहर निकाला और सारी सुपारी को एक रूमाल में बाँध दिया। इसके बाद उन्होंने जिस चीज से उस खाली डिब्बे को भरकर खाट के नीचे रख दिया, वह यहाँ लिखने लायक नहीं है! शाम के व़क्त उनके नैहर से एक नौकरानी बिछौना ठीक-ठाक करने आई। उन्होंने भर्राए गले से नौकरानी से डिब्बे की बुरी हालत की कहानी बयान की। वह उन्हें दिलासा देते हुए बोली, ‘ठीक है, तुम रो मत। मैं कल ही डिब्बे पर फिर से कलाई चढ़वा कर ले आऊँगी। सुपारी को अभी उसी तरह रूमाल में ही रखो।’

बीस.

एक पंजाबी बेगम साहिबा ने ये किस्सा किसी उर्दू अख़बार में लिखा था: मैं कभी किसी गाँव में कुछ दिन के लिए गई थी। एक बार वहाँ के एक अमीर शख़्स के घर से मुझे बुलावा आया। वहाँ गई तो कुँवारी लड़कियों को का़फी ‘मज़लूम’ देखा। उनकी हालत देखकर मेरे दिल को गहरा सदमा पहुँचा।

मैं ठीक व़क्त पर उनके घर पहुँच गई। मैंने जानना चाहा, घर की बेटियाँ कहाँ हैं? सुनते ही किसी ने जवाब दिया कि सभी बावर्चीख़ाना में बैठी हैं। मैंने उनसे मिलने की ख़्वाहिश ज़ाहिर की। मुझे सिर्फ अकेले वहाँ बुलाकर ले जाया गया। बावर्चीख़ाना में ज़बरदस्त गर्मी थी और जगह भी छोटी सी। लेकिन कोई और उपाय न देखकर वहीं बैठ गई और इन ‘मज़लूम’ मीठे बोल बोलने वाली लड़कियों के साथ बात करने लगी।

एक बीबी ने हम पर नरमदिली दिखाते हुए कहा, ‘तुमलोग होशियारी से छिपते हुए ऊपर चली जाओ।’

मैंने मन ही मन सोचा, मुमकिन है मर्दों के सामने आ जाने का डर हो तब ही उन्होंने होशियारी से छिपते हुए जाने को कहा। लेकिन बाद में पता चला, यह पर्दा तो घर में आने वाली आम महिलाओं से था। उन बीबी साहब का हु़क्म पाकर दो महिलाओं ने मोटा चादर पकड़कर पर्दा किया। हम सब इस चादर के बीच से होते हुए ऊपर चले गए।

ऊपर जाने पर मैं बड़े ही आ़फत में पड़ गई। मुझे लगा था कि छत के ऊपर आराम से बैठने के  लिए कोई कमरा होगा या बारिश से बचने के लिए कोई छज्जा ही होगा। लेकिन वहाँ तो कुछ नहीं था। एक तो कड़ी धूप, दूसरा बैठने के लिए कुछ भी नहीं। पूरी छत पर गीला गोईंठा छितरा पड़ा था। उसकी बदबू से तो जान निकली जा रही थी। बहुत तकली़फ कर एक नौकरानी ने एक खटिया ला दी। मरती क्या न करती, हम उसी पर बैठ गए। नीचे ढोल ताशे बज रहे थे। महि़फल जमी थी। लेकिन ये बदि़कस्मत लड़कियाँ किसी मुजरिम की तरह तेज़ धूप में बैठी गोईंठे के बदबू में साँस ले रही थीं। कोई भी इनके आराम के वास्ते ज़रा भी ख़्याल नहीं कर रहा था।

इक्कीस.

बंगदेश के एक ज़मीदार के घर किसी ख़ास शुभ मौ़के पर नाच-गाना हो रहा था। नर्तकियाँ बाहर लगे शामियाने के नीचे जहाँ नाच रही थीं, वह जगह घर की ड्योढ़ी के पास बने कमरे से दिखाई देता था। लेकिन घर की बीबियाँ ड्योढ़ी के पास बने इस कमरे में नहीं जाती थीं। बीबियों के लिए इस धरती पर नाच देखने और संगीत सुनने की जगह नहीं थी।

ज़मीदार साहब की तीन साल की उम्र की एक बेटी थी। लड़की ख़ूब गोरी थी। कोई उसे प्यार से चीनी गुडि़या कहता तो कोई मोम की नाज़ुक गुडि़या। नाम था साबेरा। भोर के व़क्त जब भैरवी की अलाप सुनकर सोते पक्षियों ने जागकर चहचहाना शुरू कर दिया तब ही साबेरा की खेलाई (आधुनिक जबान में ‘आया’) भी जागकर उठ गई। उसकी ख़्वाहिश हुई कि ज़रा नाच देख लिया जाए। लेकिन साबेरा तब भी सो ही रही थी। इसलिए खेलाई ने सोते हुए बच्चे को गोदी में लिया और नाच देखने के लिए ड्योढ़ी की ओर चली गई।

जब मुसीबत आती है तो कई तऱफ से आती है! ज़मीदार साहब इसी व़क्त बाहर के कमरे से होते हुए अंदर अपने कमरे में जा रहे थे। उन्होंने देखा, साबेरा को गोदी में लिए खेलाई गेट के पास खड़ी तमाशा देख रही थी। उनके हाथ में एक मोटी लाठी थी। उन्होंने उसी लाठी से खेलाई को पीटना शुरू कर दिया। खेलाई के चिल्लाने की आवाज़ सुनकर बीबियाँ ड्योढ़ी घर में भागी आईं। एक लाठी साबेरा के जाँघ पर भी लगी। तब भी जमीदार साहब के भाई के दोस्त दौड़ते हुए आए और कहा, ‘छोटे साहब, क्या कर रहे हैं। क्या कर रहे हैं। बेटी को मार डालेंगे?’ तुरंत ही लाठी का वार थम गया। गुस्से में ज़मीदार साहब ने कहा, ‘मनहूस, तुझे नाच देखना है तो देख न। लेकिन मेरी बेटी को नाच दिखाने के लिए यहाँ क्यों लाई?’

हालाँकि असलियत तो यह थी कि बच्ची खेलाई के कँधे पर सर रखकर नींद में मग्न थी। उस बेचारी ने तो कुछ देखा ही नहीं। घर में कोहराम मच गया।

साबेरा के दूध जैसे झक सफेद जाँघ पर लाठी की चोट से एक काला भद्दा दाग बन गया था। इसे देखकर ज़मीदार साहब के दिल में गहरी चोट लगी। जैसे जीते जी मर गए हों।

इस तरह लाठी के ज़ोर पर हमें अवरोध के जेल में बंदी बनाया जाता है!

बाईस.

शाम का व़क्त था। सियालदह स्टेशन पर ट्रेन के इंतज़ार में एक साहेब प्लेटफार्म पर चहलकदमी कर रहे थे। कुछ ही दूर पर एक और साहेब खड़े थे। उनके पीछे गद्दा-बिछौना और दूसरी चीज़ें रखी थीं। पहले वाले साहेब को जब थोड़ी थकान महसूस हुई तो वह उस गद्दे के ऊपर बैठने के लिए बढ़े। उनके बैठते ही बिछौना हिलने-डुलने लगा- वह तुरंत हड़बड़ा कर उठ गए। इसी व़क्त दूसरे साहब जो खड़े थे, दौड़ते हुए आए और गुस्से में बोले- ‘मोशाय, यह क्या कर रहे हैं? आप स्त्रियों के सिर के ऊपर कैसे बैठने गए? बोलिए?’ वह बेचारे चौंकते हुए बोले, ‘माफ कीजिए, मोशाय! शाम के अँधेरे में मैं ठीक से देख नहीं पाया। इसलिए बिछौना-गद्दा समझ कर बैठ गया था। बिछौना जब हिलने-डुलने और चलने लगा तो मैं डर गया कि आख़िर ये माज़रा क्या है!’

चौबीस.

बिहार अंचल की शरी़फ घरानों की महिलाएँ आमतौर पर रेल के रास्ते जाते व़क्त ट्रेन पर नहीं चढ़ती हैं। उन लोगों को बड़े से कपड़े से ढके पालकी के अंदर ठूँस दिया जाता है और यही पालकी ट्रेन के मालगाड़ी में चढ़ा दिया जाता है। नतीजतन, ये बीबियाँ रास्ते में पड़ने वाले किसी नज़ारे को नहीं देख पातीं। वे लोग ब्रुकबॉण्ड चाय के डिब्बे की तरह खाली टिन में पैक होकर देश का स़फर करती हैं।

लेकिन इसी कलिकाता का एक नामी-गिरामी ख़ानदान तो इससे भी आगे है। उनके घर की बीबियों को अगर रेल के रास्ते कहीं जाना होता है तो सबसे पहले हर एक की पालकी में एक छोटा बिछौना रखा जाता है। साथ में ताड़ के पत्ते का हाथ पंखा और गिलास के साथ एक सुराही पानी भी। फिर उन्हें इन पालकियों में बंद कर दिया जाता है। इसके बाद, इन पालकियों को इनके बाप या बेटे के सामने नौकर ऐसे बंद करते हैं- (1) बड़े से कपड़े के पर्देसे पैक करते हैं। (2) उसके ऊपर मोम लगे कपड़े से सिलाई करते हैं (3) उसके ऊपर खारुआर कपड़े से घेर कर सिलाई करते हैं। (4) उसके ऊपर बम्बइया चादर से सिलाई करते हैं। (5) आख़िर में चट से ढक कर सिलाई करते हैं। सिलाई का यह काम तीन-चार घंटे तक चलता रहता है। …और चार घंटे तक घर के मालिक साहब एक पाँव पर खड़े होकर पहरा देते हैं।

इसके बाद कहारों को बुलाया जाता है। कहार पालकियों को ट्रेन के ब्रेकवैन में चढ़ाते हैं। फिर जहाँ इन्हें जाना होता है, पालकियाँ वहाँ पहुँचती हैं। किसी मर्द गार्जियन के सामने एक-एक करके पालकियों की सिलाई खोली जाती है। सिलाई खोलने के बाद नौकर पालकियों को कपड़े के पर्दे से ढक कर चले जाते हैं। इसके बाद मालिक ख़ुद और कोई रिश्तेदार और दूसरी महिलाएँ आकर पालकी का दरवाज़ा खोलती हैं। मरी हालत में बेहोश पड़ी बंदिनियों को बाहर निकालती हैं। उनके सिर पर गुलाबजल और ब़र्फ रखा जाता है। चम्मच से मुँह में पानी डाला जाता है। आँख और चेहरे पर पानी के छींटे मारे जाते हैं। पंखे झले जाते हैं। दो घंटा और कभी-कभी तो इससे भी ज़्यादा, ख़िदमत के बाद तब कहीं जाकर बीबियों की हालत सुधर पाती है।

पच्चीस.

‘अबरोध बासिनी’ के11वें नम्बर पर मैंने लिखा है कि 1924 में मैं अपनी दो नातिनों की शादी के मौके पर आरा गई थी। लेकिन मैंने आरा शहर में उस घर और वहाँ से दिखने वाले आसमान को छोड़ और कुछ नहीं देखा। मेरी ‘बेटी’ (यानी बेटी की मौत के बाद दामाद की दूसरी स्त्री) की भी यही कहानी थी। उसने बहुत ही मिन्नत करते हुए मुझसे कहा, ‘अम्मा, अगर आप शहर देखना चाहती हैं तो रहम करके हमें भी ले चलिए। आपकी जूती के बरकत से हम भी ज़रा शहर देख लेंगे। मुझे यहाँ आए हुए सात साल हो गए हैं लेकिन आज तक शहर में कुछ नहीं देखा।’ नई नवेली दुल्हन मजू और सबू ने भी इल्तिजा भरी नज़रों से कहा, ‘हाँ, नानी अम्मा। आप ही अब्बा को बोलेंगी तो होगा।’

मैं लगातार कई दिनों तक जमाई राजा को एक गाड़ी का इंतज़ाम करने के लिए कहती और वह हर रोज़ का़फी मुलायमियत से जवाब देते कि गाड़ी तो मिली नहीं! आख़िर एक दिन सुबह-सुबह उनका 11 साल का बेटा हमारे पास ख़बर लेकर आया कि भाड़े की एक गाड़ी तो आ रही है लेकिन उसकी खिड़की का एक हिस्सा टूटा है। मजू ने इल्तिज़ा करते हुए कहा, ‘उस जगह तो हम पर्दा कर लेंगे- अल्लाह के वास्ते तुम गाड़ी वापस न करना।’ सबू फुसफुसाते हुए बोली, ‘अच्छा ही तो है। ऊ टूटी हुई खिड़की से सब कुछ साफ-साफ दिखेगा।’ हम सब बे़करार थे। जितनी बार गाड़ी में बैठने के लिए उठते उतनी बार आवाज़ सुनाई देती- सब्र कीजिए, बाहर अभी पर्दा नहीं हुआ है।

कुछ पल बाद जब हम गाड़ी में बैठने के लिए गए तो देखा, सुबहान अल्लाह! दो-तीन बम्बइया चादर से पूरी गाड़ी को चारों ओर से ढक दिया गया था। दामाद साहब ने ख़ुद ही दरवाज़ा खोला। गाड़ी में हमारे बैठने के बाद उन्होंने खुद अपने हाथों से दरवाज़े को कपड़े से बाँध दिया। गाड़ी कुछ ही दूर गई होगी कि मजू ने सबू से कहा, ‘देखो-देखो टूटी हुई खिड़की यहाँ है।’ उस पर्दे में एक जगह छेद था। मजू, सबू और उनकी माँ उस छेद से झाँकते हुए बाहर की दुनिया देखने लगीं। और मैंने उस छेद से बाहर देखने के लिए उनसे कोई जद्दोजेहद नहीं की।

उनतीस.

एक बार मैं किसी लेडीज़ कांफ्रेंस में शामिल होने के लिए अलीगढ़ गई थी। वहाँ आईं महिलाओं के पास मैंने तरह-तरह के बु़र्का देखे। एकजन का बु़र्का एकदम अलग फैशन का था। उनके साथ मेलजोल हुई। बातचीत बढ़ी तो मैंने उनके बु़र्के की तारी़फ की। बु़र्के की तारी़फ सुन कर वह बोलीं, ‘अरे मत बोलिए, इस बु़र्के की वजह से मुझे कितनी शर्मिंदगी उठानी पड़ती है।’ बाद में उन्होंने शर्मिंदगी और बेइज़्ज़ती के जो ि़कस्से सुनाए, उन्हें आप भी सुनिए:

वह किसी बंगाली भद्रलोक के घर शादी में गई हुई थीं। (बु़र्के के साथ) उन्हें देखकर वहाँ मौजूद बच्चे-बच्चियाँ चिल्लाने लगे। इधर-उधर भागने लगे। जिसे जहाँ जगह मिली, वहाँ छिप गए। उनके स्वामी की कई और बंगाली भद्रलोक के साथ दोस्ती थी। स्वामी के संग वह उनके घर आया-जाया करती थीं। मगर वह जितनी बार उनके घर गईं, बच्चे डर के मारे रोने-चिल्लाने लगते। बच्चे डर के मारे थर-थर काँपते।

वह एक बार कलिकाता आईं। चार-पाँच महिलाओं के संग वह एक खुली मोटरगाड़ी में घूमने निकलीं। सभी ने बु़र्का पहन रखा था। राह चलते बच्चों ने जब उन्हें देखा तो बोल उठे, ‘उई माँ! ये क्या है?’ एक लड़के ने बाि़कयों से कहा, ‘चुप कर!- रात में तो यही सब भूत हो जाता है न।’ तेज हवा के झोंके से बु़र्का के आगे का हिस्सा ऊपर-नीचे होते देख एक बोला, ‘देखोगे, देखो! भूत सब अपना सूँड हिला रहा है! बाबा रे! भाग रे!’

वह एक बार दार्जीलिंग गई थीं। गाड़ी जब एक स्टेशन पर रुकी तो देखा, ढेर सारे लोग एक वामन (छोटे कद-काटी का शख़्स) को घेरे खड़े उसे देख रहे हैं। वामन की लम्बाई यही कोई 7-8 साल के बच्चे के बराबर होगी लेकिन चेहरा एक बड़े नौजवान का था। चेहरे पर दाढ़ी-मूँछ भी थी। अचानक उन्होंने देखा कि सारे लोग आँखे फाड़े उनकी ओर नज़र गड़ाए हैं! तमाशबीन उस वामन को छोड़ बुर्का पहनी मुझ महिला को देखने लगे!

इसके बाद वह दार्जीलिंग पहुँची और खाना खाने के बाद बाहर घूमने निकलीं। यानी रिक्शागाड़ी से जा रही थीं। मॉल रोड पहुँचने पर देखा, वहाँ भीड़ जमा थी। उस दिन तिब्बत से फौज़ वापस आ रही थी। उसी को देखने के लिए भीड़ जमा थी। रिक्शेवाला ने अपना रिक्शा सड़क के एक किनारे खड़ा किया और वह भी देखने लगा कि क्या हो रहा है? थोड़ी देर बाद उन्होंने ध्यान दिया, वहाँ खड़े सभी लोग बारी-बारी से रिक्शा के अंदर झाँक कर उन्हें देखते हुए आगे बढ़े जा रहे थे।

जब वह घूमने के लिए पैदल बाहर निकलती तो गली के कुत्ते घेऊघेऊ करते हुए उन पर हमला करने के लिए दौड़ते। पहाड़ पर चढ़ने वाले एक-दो घोड़े तो उनको देखकर डर के मारे इधर-उधर भागना शुरू कर देते। एक बार वह चाय बग़ान घूमने पहुँची तो देखा कि एक तीन-चार साल की बच्ची उनको मारने के लिए पत्थर का टुकड़ा उठाई हुई है। * (* बांगाली और गोरखा लोगों का ़फ़र्क देखिए। जिस उम्र में बंगाली बच्चे डर के मारे चिल्लाते इधर-उधर भागते फिरते हैं, उसी उम्र के गोरखा बच्चे अपनी हि़फाज़त के लिए पत्थर का टुकड़ा उठाकर उस डरावनी चीज़ को मारते हैं!)

एक बार उनकी कोई मिलने जुलने वाली चार-पाँच और बीबियों के साथ घूमते हुए एक छोटे से झरने तक पहुँच गईं। झरने की धार के पास कंकड़-पत्थर और कीचड़ था। उनके बुर्के उनमें लटपटा गए और वे गिर गईं। पास में ही एक चाय बाग़ान था। वहाँ काम कर रहे मज़दूरों ने इन्हें देखा तो दौड़ते हुए आए और इन्हें बाहर निकाला। मज़दूरों ने प्यार से ही डाँटते हुए कहा, ‘एक तो जूता पहना और उसके ऊपर इतना बड़ा लबादा ओढ़ लिया। इस हालत में तुम सब गिरोगी नहीं तो क्या होगा?’ अहा, बीबियों का शानदार कढ़ाई किया हुआ दोपट्टा कीचड़ में लतड़-पतड़ और बु़र्का भीग कर तर-बतर। सि़र्फ यही नहीं, रास्ते में आते-जाते लोग अपने रोते बच्चे को चुप कराने के लिए इन्हें दिखाते हुए कहते, ‘चुप कर, एई देख मक्का-मदीना जा रहा है, ए देख! काला कपड़ा ओढ़े कौआ हकनी (बिजूका) – वही तो मक्का मदीना‼’


तैंतीस.

लगभग 18 साल पहले की बात है। कलिकाता में रहने वाली डेढ़ साल की एक बच्ची को बुख़ार हुआ। उसके घर में पर्दे का बड़ा ज़बरदस्त रिवाज़ था। इतना कड़ा रिवाज की इस छोटी सी बच्ची को किसी ‘ही-डॉक्टर’ से दिखाने को घर वाले राज़ी नहीं थे। इसलिए ‘शी-डॉक्टर’ आई थीं। घर में महिलाओं की कमी नहीं थी। लेकिन शरा़फत छोड़, उनके पास कोई और गुण नहीं था। ये सब महिलाएँ लेडी डॉक्टर गुप्त को घेर कर खड़ी थीं। मिस गुप्त ने रोगी की कैि़फयत देखने-सुनने के बाद बच्ची को गर्म पानी से नहलाना चाहा। शी-डॉक्टर मिस गुप्त चाहीं गर्म पानी- बीबियों ने एक-दूसरे का मुँह निहारना शुरू कर दिया! वह चाहीं ठंडा पानी- बीबियों ने कहा, ‘बाप रे! ठंडे पानी से नहलाएँगी तो लड़की का बुख़ार और बढ़ जाएगा।’ नतीजतन, बेचारी मिस गुप्त अपनी कोई भी बात इन लोगों को समझा नहीं पाईं। उन्होंने बाहर आकर घर के मालिक के नायब साहब को सारी बात बताई और जाते वक्त बोलीं, वह इस घर में अब आगे नहीं आएँगी। नायेब साहब ने बहुत मिन्नत की। उनके हाथ में बतौर फीस 16 रुपए दिए और दूसरे दिन फिर आने को कहा।

दूसरे दिन भी शी-डॉक्टर मिस गुप्त के आने पर घर की महिलाओं के बीच काना़फूसी शुरू हो गई। घर का माहौल देखकर नायब साहेब ने अपनी एक मुला़काती महिला को बुलाया और मिस गुप्त के पास भेज दिया। वीणापाणी (नायेब साहेब की मुला़काती वह बंगाली महिला) आईं तो देखा, लेडी डॉक्टर गुस्से के मारे भूत हो रही थीं। और सारी बीबियाँ खड़ी डर के मारे थर-थर काँप रही थी- ताँहादेर मुखे धान दिले खोई फोटे! ऐसे तो हँसी-ठिठोली और ज़बान चलाने में वे काफी माहिर थीं। आख़िर में मिस गुप्त गरजते हुए बोलीं, ‘मैं तमाशा देखने नहीं आई हूँ।’

वीणापाणी ने चुपके से बीबियों से जानना चाहा कि आख़िर माज़रा क्या है? उन्होंने कहा, ‘हम भी नहीं समझ पा रहे- उन्होंने तौलिया चाहा, टब चाहा, लेकिन जब हमने ये सारा ला कर दिया तो इन सबको दूर फेंक दिया।’

इसके बाद उन्होंने मिस गुप्त से गुस्से की वजह पूछी तो उन्होंने कलाई पर बँधी घड़ी देखते हुए बोलीं, ‘देखिए, देखिए! आधा घंटा से ऊपर होने को आया, अब तक लड़की को नहलाने के लिए कोई सामान मुझे नहीं मिला।’ वीणा डरते-डरते बोलीं, ‘इन लोगों ने जो सामान दिया, क्या आपको वह पसंद नहीं आया?’

मिस गुप्त बोलीं, ‘देखिए तो इसमें पसंद की क्या बात है? मैंने माँगा एक बाथ-टब, जिसमें बैठाकर बच्ची को नहलाऊँगी। इन लोगों ने मुझे दी इत्ती सी एक सेरा देगची- उसको मैंने फेंक दिया। आप ही बताइए कि इत्ती सी देगची के अंदर मैं बच्ची को कैसे बैठाऊँगी? मैंने बच्ची का बदन पोंछने के लिए माँगा नरम पुराना कपड़ा। इन लोगों ने मुझे लाकर दिया नया कड़कड़कदार तौलिया-उसको भी इसीलिए मैंने फेंक दिया! ये लोग मुझे अपनी अमीरी दिखा रही हैं कि इनके पास नई तौलिया है। यह अपने आपको पीर समझ रही हैंऔर इसलिए सबको इनकी इबादत करनी चाहिए!’

आख़िर में, वीणा ने ये सभी सामान जुगाड़ कर उन्हें दिया। बच्ची को नहलाने में मिस गुप्त की मदद की। तब जाकर उनके चेहरे पर गुस्से की जगह हँसी फूटी। तब बीबी जनों ने भी राहत की साँस ली।

छत्तीस.

जाड़े का दिन। वह भी माघ महीने का जाड़ा। उस व़क्त गाँव में कहीं से भालू का नाच दिखाने वाला आया। गाँव में नया कुछ भी आता तो उसे सबसे पहले ज़मीदार के घर हाज़िरी देनी होती। भालू वाले ने भी ऐसा ही किया और वह ज़मीदार के घर मेहमान बन गया। बड़े से दालान के उत्तर में मैदान पर भालू का नाच होता- पूरे गाँव के लोग आते और नाच देखते। लेकिन घर की बहू-बेटी वह नाच देखने से वंचित रहतीं।

छोटे बच्चे और बूढ़ी नौकरानियाँ महिलाओं के पास आकर नाच के बारे में बात करतीं- भालू कैसे हवा में उछलकर नाचता है… ठुमक-ठुमक कर कैसे नाचता है… इस तरह से भालूवाले के साथ कुश्ती लड़ता है… इस तरह से पीछे से पकड़ता है… वग़ैरह… वगैरह। ये बातें सुन-सुन कर ज़मीदार की दो नाबालिग बहुओं को भी ख़्वाहिश हुई कि एक बार नाच देखा जाए। ज़्यादा दूर नहीं जाना होगा। छोटी बहू बेग़म के कमरे के उत्तर में एक झरोखा है। वहाँ से झुककर देखने पर सा़फ दिखाई देगा।

ये दोनों बहुए झुकी नाच देख रही थीं, तब ही उनकी चार बरस की ननद ज़ोहरा दौड़ती आई और बोली, वह भी देखेगी। एक जन ने उसे गोदी में उठाया और झाँककर देखने लगी। ज़ोहरा ने आज तक घर के बरामदे के बाहर कुत्ता-बिल्ली भी नहीं देखा था- यहाँ उसने सीधे भालू ही देख लिया। भालू कुश्ती लड़ रहा था। उसे लड़ते देख ज़ोहरा डर के मारे चिल्लाई और बेहोश हो गई। भालू का नाच तो रह गया- वे दोनों ज़ोहरा को सम्हालने में लग गईं।

ज़ोहरा को होश तो आया लेकिन उसका डर नहीं गया। रात में वह अचानक चिल्लाकर जाग उठती। डर के मारे थर-थर काँपने लगती। उसकी ख़राब हालत को देखते हुए दूर सदर ज़िले से का़फी पैसा ख़र्च एक डॉक्टर को बुलाया गया। डॉक्टर साहब ने सारी बात सुनने और जानने के बाद पूछा, बच्ची किसी बात से डरी तो नहीं है? बात छिपी नहीं रही, पता चला कि भालू का नाच देखने से डर गई है।

अब ज़मीदार साहब ने पूछताछ शुरू की, ज़ोहरा को भालू का नाच दिखाया किसने? खेलाई, अन्ना जैसियों ने एक लाइन में मना कर दिया कि उन्होंने ज़ोहरा साहेबज़ादी को भालू का नाच दिखाया है। आख़िर में पता चला कि बहू बेग़मों ने दिखाया था। यह सुनते ही उनका गुस्सा साँतवें आसमान पर चढ़ गया। ज़ोहरा मरे तो मरे, ज़मीदार साहब को इस बात की फिक्र  नहीं थी लेकिन ये जो घर में सबको पता लग गया कि उनकी बहुएँ बेगाना मर्द का तमाशा देखने गई थीं, वह इस शर्मिंदगी को कहाँ और कैसे छिपाएँगे? छी! छी! दूसरे मज़हब वाले सिविल सर्जन यह सब सुनकर मंद-मंद मुस्कुराए कि बहुएँ भालू का नाच देखने गई थीं।

शर्म, पछतावा और ग़ुस्से से भरे ज़मीदार साहब ने बहुओं को तलब किया। सर पर एक हाथ लम्बा घूँघटा टाने ससुर के सामने खड़ी दोनों बहुएँ शर्म और डर के मारे थर-थर काँप रही थीं। (माघ महीने की ठंड थी) पसीने-पसीने हो रही थीं और पैर के नीचे पत्थर के फर्श को शायद घिसते हुए बोल रही थीं- हे धरती माता जल्दी से फट जा और हम तुम में ही समा जाएँ।

सही है, पर्दानशीनों को धरती पर रहने का मतलब ही क्या है? बऊ माँ सुनो तो- दाँत पीसते हुए ज़मीदार साहब ने इतना कहा कि ग़ुस्से से उनकी आवाज़ ही फँस गई। उस व़क्त ग़ुस्से से उनका पूरा बदन काँप रहा था और आँखें लाल हो रही थीं। वह  ठीक-ठीक समझ नहीं पा रहे थे कि इनका क्या करें- बिना नमक इन्हें चबा कर खा जाएँ या पूरा का पूरा निगल जाएँ!

उनतालिस.

समाज हमें सि़र्फ अवरोध-कारागार में कैद करके ही चुप नहीं बैठता। ऐसा कहा जाता है कि हज़रता आयेशा सिद्दिका 9 साल की उम्र में बालिग़ हो गई थीं। इसी वास्ते अमीर मुसलमानों के घरों में लड़की की उम्र आठ साल हुई नहीं कि उसके ज़ोर से हँसने पर पाबंदी। ऊँची आवाज़ में बोलने पर पाबंदी। दौड़ने-कूदने वग़ैरह सभी चीज़ों पर पाबंदी। और तो और… उनके इधर-उधर जाने पर भी रोक। वे घर के किसी कोने में सिर झुकाए महज़ सीना-पिरोना ही कर सकतीं। और तो और तेज़-तेज़ चल भी नहीं सकतीं।

किसी अमीर घर में आठ साल की एक बच्ची थी। एक दिन वह का़फी सुबह उठी और बावर्चीख़ाने की तऱफ गई। उसने देखा कि बावर्चीखाने में एक छोटी सी सीढ़ी है। ताहिरा (वह बच्ची) के मन में न जाने क्या आया, वह अनमने ढँग से इस सीढ़ी के ऊपर दो कदम चढ़ गई। ठीक उसी व़क्त ताहिरा के अब्बा वहाँ पहुँच गए। उन्होंने एक झटके से ताहिरा को नीचे खींचकर उतार दिया।

ताहिरा अब्बा की बहुत दुलारी इकलौती बेटी- अब्बा ने उसे हमेशा लाड़-प्यार ही किया। कभी भी उसने अब्बा का गुस्से से भरा चेहरा नहीं देखा था। अब जो उसने अब्बा को गुस्से में देखा और जिस तरह उन्होंने ज़ोर से उसे खींचा तो वह बहुत ज़्यादा डर गई। वह अपना आपा खो बैठी और कपड़े नोंच कर फेंकने लगी।

ग़लत व़क्त नहला देने और बहुत ज़्यादा डर जाने की वजह से उस रात ताहिरा को बुख़ार चढ़ गया। एक अमीर बड़े घर की बेटी और उस पर से बहुत ही दुलारी बेटी, इसलिए इलाज में कोई कसर नहीं रखी गई। दूर सदर ज़िला से सिविल सर्जन डॉक्टर बुलाए गए। उस व़क्त (यानी 40-45 साल पहले) डॉक्टर को बुलाना आसान काम नहीं था। डॉक्टर साहब की चार गुना फीस, पालकी भाड़ा, इसके अलावा बत्तीस कहारों का खाना-पीना, तम्बाकू का ख़र्च- यह बड़ा काम था।

इतना सब उपाय करने के बाद भी ताहिरा का बुख़ार तीसरे दिन भी कम नहीं हुआ। डॉक्टर साहब कुछ उपाय होते न देख निराश हो विदा हुए। अब्बा के रूखे बर्ताव का कड़ा जवाब देते हुए ताहिरा हमेशा हमेशा के लिए आज़ाद होकर चली गई। (इन्नालिल्लाही व इन्ना इलाही राज़ीउन)

चालीस.

एक अमीर घर की लड़की की शादी के मौ़के पर का़फी धूमधड़ाका हो रहा था। मेहमानों और रिश्तेदारों के शोरगुल से घर गुलज़ार था- किसी तरह की कोई कमी नहीं थी। मेहमानों में से कई को नए-नए बने कुटिया में ठहराया जा रहा था। एक दिन भरी शाम में क्या हुआ कि फूस की एक नई कुटिया में आग लग गई। शोरगुल सुनकर बाहर से नौकर-चाकर, दूसरे लोग दौड़े आए और ड्योढ़ी के पास पहुँच कर रुक गए और इंतज़ार करने लगे। वे बार-बार चिल्लाकर पूछते जाते, पर्दा हुआ कि नहीं- वे अंदर आ सकते हैं या नहीं? मगर जनाना से जवाब दे तो कौन? आग देखकर तो जैसे उनके होश ही उड़ गए थे। एक ओर आग लगी थी और घर के अंदर बीबियाँ एक-दूसरे से पूछ रही थीं कि बाहर पर्दा है कि नहीं- अगर बाहर गई और कोई लड़का उन्हें बाहर खड़ा मिला तो क्या करेंगी?

आख़िर में एक बुज़ुर्ग बीबी मारे डर के परेशान होकर बोली, ‘अरे कोई लड़का है! आग बुझाने आ न! इस व़क्त भी पूछ रहा है कि पर्दा है कि नहीं?’

तब सभी हाँफते हुए आग बुझाने के लिए भागे आए। मगर जिस घर में आग लगी थी, जब वहाँ से बीबियाँ बाहर निकलीं तो देखा, बाहर तो मर्द भरे पड़े हैं। अब वे फिर घर के अंदर जाकर छिप गईं। ख़ुशि़कस्मती थी कि वहाँ मौजूद कई हिम्मती नौजवान खींचतान कर बीबियों को बाहर निकाल लाए। वरना ये सब आग में जलकर पसंदा कबाब बन जातीं।

सैंतालीस.

किसी शायर की ज़बान में बोलने की ख़्वाहिश हो रही है,

”काव्य उपन्यास नोहे, ऐ मम जीबन,

नाट्यशाला नोहे, इहा प्रकृत भवन”

शायरी या फसाना नहीं, ये हमारी ज़िंदगी है

रंगमंच नहीं, यही मेरा असली घर है

करीब तीन साल पहले का वा़कया है। हमारी पहली मोटर बस आने वाली थी। इससे एक दिन पहले स्कूल की एक टीचर मेम साहिबा गैराज गईं और बस देख कर आईं। उन्होंने आते ही बताया कि मोटर के अंदर तो भयानक अँधेरा है … ”ना बाबा! मैं तो कभी इस मोटर से नहीं जानेवाली।”

बस जब आ गई तो देखा गया- बर्स के पिछले दरवाज़े के ऊपर एक जाल लगा है और सामने भी ऊपर की ओर एक जाल है। अगर तीन इंच चौड़े और डेढ़ फुट लम्बे जाल के ये दो टुकड़े न होते तो बस को आराम से ”एयर टाइट” कहा जा सकता था।

पहले दिन नई मोटर गाड़ी लड़कियों को घर पहुँचाने के लिए गई। उनके साथ गई स्कूल की आया ने लौटते ही बताया, – गाड़ी बड्ड गर्म है। घर जाते व़क्त लड़कियाँ का़फी बेचैन हो रही थीं। कुछ ने तो उलटी भी कर दी। छोटी लड़कियाँ तो अँधेरे के मारे डर से रोने लगीं।

दूसरे दिन लड़कियों को लाने के लिए जब मोटर निकलने लगी तो उस टीचर मेम साहिबा ने दरवाज़े के शटर को निकालकर एक रंगीन कपड़े का पर्दा टाँग दिया। फिर भी बस जब लौट कर स्कूल आई तो देखा गया कि दो-तीन लड़कियाँ बेहोश हो रही हैं। दो-चार उलटी कर रही हैं। कई तो सर पकड़कर बैठी हैं… वगैरह वगैरह। शाम में मेम साहिबा ने बस के पीछे लगी दो और खिड़कियों को खोला और उनकी जगह कपड़े के दो पर्दे टाँग दिए। फिर लड़कियों को घर पहुँचाया गया।

उस दिन शाम में मेरी एक पुरानी दोस्त मिसेज मुखर्जी मुझसे मिलने आईं। स्कूल की तरक्की की कहानी पर ख़ुशी ज़ाहिर करते हुए बोलीं- ”आपकी मोटर बस तो बहुत ही शानदार हो गई है! पहली बार जब सड़क पर देखी तो लगा कि कोई आलमारी तो नहीं चली जा रही- चारों तऱफ से एक बार में ही बंद, इससे तो बड़ी आलमारी का भ्रम होता है! मेरा भतीजा तो बोलने लगा, अरे बुआ! देखो…देखो वह “moving Black Hole” (घूमता हुआ अंधा कुआँ) जा रहा। .. और, उसके अंदर लड़कियाँ बैठती कैसे हैं?”

तीसरे दिन दोपहर बाद चार-पाँच लड़कियों की माएँ मुझसे मिलने पहुँचीं। आते ही शुरू हो गईं, ”आपका मोटर तो ख़ोदा का पनाह! आप लड़कियों को जीते जी कब्र में भर रही हैं!” मैंने का़फी बेबसी से कहा, क्या करती? अगर इस तरह न होता तो आप लोग ही बोलतीं, ”बे-पर्दा गाड़ी।” तब वे सब का़फी ग़ुस्से में बोलीं, ”तब क्या आप जान मारकर पर्दा करेंगी? कल से हमारी लड़कियाँ स्कूल नहीं आएँगी।” उस दिन भी दो-तीन लड़कियाँ बेहोश हो गई थीं। हर घर से आया के मा़र्फत फरियाद आ रही थी कि लड़कियाँ मोटर बस से अब और नहीं आएँगी।

उसी शाम डाक से चार ख़त मिले। इनमें भेजने वाले का पता नहीं था।  अंग्रेजी में चिट्ठी लिखने वाले ने नाम की जगह “Brother-In-Islam” (ब्रदर इन इस्लाम यानी एक ही मज़हब इस्लाम को मानने वाले) लिखा था। बा़की तीन चिट्ठियाँ उर्दू में थीं। इनमें दो बेनामी और चौथी पर पाँच जनों ने अपने नाम लिखे थे। सभी ख़त के मज़मून एक जैसे ही थे- सभी ने रहम की बरसात करते हुए मेरे स्कूल की भलाई की दुआ की थी। साथ ही लिखा था, मोटर के दो हिस्से में जो पर्दा लटकाया गया है, वे हवा के झोंके से उड़ते रहते हैं। इससे गाड़ी बे-पर्दा होती है। अगर कल तक मोटर में पर्दे का अच्छी तरह से इंतजाम न हुआ तो वे और रहम की बरसात करेंगे और ‘खबीछ’ , ‘पलीद’ जैसे उर्दू अख़बार में स्कूल के ख़िलाफ लिखेंगे। यह भी लिखा था- देख लेंगे कि इस तरह बे-पर्दा गाड़ी से लड़कियाँ कैसे आती हैं।

यह तो बड़ी भारी मुश्किल है-

न धरिले राजा बधे, धरिले भुजंग।

राजा का आदेश है, साँप पकड़ो। न पकड़ो तो राजा मार डालेगा और पकड़ा तो साँप। यानी किया तो मुसीबत न किया तो मुसीबत।

राजा का हुक्म इस तरह मानने का मतलब है, जिंदा साँप पकड़ना। है न!

अबरोध -बंदिनी की तऱफ से बोलने की ख़्वाहिश हो रही है-

”केन आसिलाम हाय! ऐ पोड़ा संसारे,

केन जनम लभिलाम पर्दा-नशीन घरे!”

हाय, मैं क्यों आई इस बदनसीब दुनिया में

क्यों पैदा हुई पर्दा-नशीन घर में।

(हिन्दी में अबरोध बासिनी के कुछ अंश सबसे पहले हिन्दुस्तान और हाल ही में वर्तमान साहित्य में छपे। ये अंश इन्हीं दोनों जगहों से साभार लिया गया है।)

अपने ही घर में खतरों से घिरी बेटियां

अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com

( अरविन्द जैन ने अपनी कलम से लगातार स्त्रियों के लिए बेह्तर कानून और बेह्तर समाज की जंग लडी है . अपनी पहली किताब औरत होने की सजा में उन्होंने न्याय की प्रणाली , उसकी भाषा और उसके निर्णयों मे जेंडर भेद की विस्तृत विवेचना की. तब से वे लगातार कानून और साहित्य की स्त्रीवादी आलोचना में सक्रिय हैं. आज उनका जन्मदिन है . आयें इस स्त्रीवादी पुरुष को जन्मदिन की बधाई देते हुए उनके इस लेख मे व्यक्त उनकी चिंता ( अपने घरों में ही महिलायें असुरक्षित हैं )  शरीक हों और बेहतर समाज के लिए प्रबिद्ध सक्रियता के लिए संकल्पबद्ध भी हों . ) 


नाबालिग बेटियों-सौतेली बेटियों के साथ पिता द्वारा बलात्कार और यौन शोषण के मामले भारतीय समाज में भी लगातार बढ़ते जा रहे हैं, जो बेहद चिंताजनक और शर्मनाक है। किशोरियों के विरुद्ध लगातार बढ़ रहे यौन हिंसा के कारणों की विस्तार से खोजबीन अनिवार्य है। एक तरफ मीडिया में बढ़ते यौन चित्रण, पारिवारिक विखंडन, लचर कानून और न्याय व्यवस्था, ज्यादातर अपराधियों का बाइज्जत बरी हो जाना अपराधियों को बेखौफ बनाती है, दूसरी तरफ फैसले होने में बरसों की देरी और महंगी कानूनी सेवा चुप रहने को मजबूर। पीड़ित युवा स्त्री विरोध-प्रतिरोध कर सकती है, इसलिए भी अबोध बच्चियों पर हिंसा (हत्या) बढ़ रही है। नाबालिग लड़कियां अपने ही पिता या संबंधियों के खिलाफ न्याय की लड़ाई लड़ने की हिम्मत भी करें, तो आखिर किसके सहारे? कानून और रिश्तों की किसी भी छत के नीचे स्त्री, अपने आपको सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रही।
बलात्कार की शिकार सौतेली बेटियां

कुछ ही दिन पहले अखबारों में समाचार छपा था कि ‘राजधानी दिल्ली के मंगोलपुरी इलाके में 14 वर्षीय सौतेली बेटी से बलात्कार करने के आरोप में, पिता को गिरफ्तार किया गया’। वह छह महीने से सौतेली बेटी का यौन उत्पीड़न कर रहा था’। खबर रेखांकित करती है कि वह उसकी अपनी नहीं, ‘सौतेली बेटी‘ थी। ‘सौतेली बेटी‘ से बलात्कार, क्या बलात्कार नहीं है? या ‘सौतेली बेटी‘ से बलात्कार, अपनी ही बेटी से बलात्कार से कमतर घिनौना अपराध है? अक्सर सौतेली बेटियां ही, बलात्कार की अधिक शिकार होती हैं।

शाहजहांपुर के कटरा इलाके में एक पिता ने अपनी बेटी को हवस का शिकार बनाया और राज तब खुला, जब वह गर्भवती हो गयी। अमृतसर की एक 20 वर्षीय कॉलेज छात्रा ने स्थानीय नेता व अपने पिता के खिलाफ पिछले आठ बरसों से बलात्कार करने का आरोप लगाया। पिता को गिरफ्तार किया गया, मगर हृदय की परेशानी और असामान्य महसूस करने के कारण अस्पताल में भर्ती करा दिया गया। रिश्तों को कलुषित और कलंकित करने का यह पहला और अंतिम मामला नहीं है। फिल्लौर-जालंधर में रक्त-संबंधों की तमाम मर्यादाओं को धूल में मिला, अपनी ही 13 वर्षीय बेटी के साथ बलात्कार करने वाले, प्रवासी पिता को पंजाब पुलिस ने गिरफ्तार किया, मगर आरोपी पिता का कहना है- ‘वह बिल्कुल निर्दोष है और उसे पैसे के मामले में विवाद होने के कारण, कुछ लोगों ने साजिश के तहत फंसाया है’।

पिता-पुत्री: रिश्तों की पवित्रता
हरियाणा के सोनीपत जिले के नीलोखेड़ी गांव में एक व्यक्ति ने पिता-पुत्री के रिश्ते की पवित्रता को खंडित करते हुए, अपनी ही 14 वर्षीय नाबालिग बेटी के साथ डेढ़ साल तक बलात्कार और यौन उत्पीड़न करता रहा। ऊपर से धमकी यह कि अगर किसी से भी शिकायत की तो, उसे जान से मार डालेगा। किसी तरह लड़की घर से भाग निकली और अपने ताऊ के पास जाकर अपनी ‘आपबीती‘ सुनाई, तो ताऊ ने पुलिस थाने में जाकर मुकदमा दर्ज करवाया। लड़की की मां का कई साल पहले देहांत हो चुका है, एक भाई और एक बहन अनाथालय में रहते हैं। वह भी पहले अनाथालय में रहती थी, लेकिन डेढ़ साल पहले उसके पिता उसे वहां से ले आये और तब से आए दिन वह अपने पिता की हवस का शिकार होती रही। आरोपी पिता फरार है..। पीड़िता को मेडिकल चेकअप के लिए भेज दिया गया है और पुलिस बलात्कारी पिता की तलाश में इधर-उधर घूम रही है।

थाना न्यू आगरा क्षेत्र में एक पिता पर अपनी 11 वर्षीय बेटी के साथ बलात्कार करने का आरोप है, मगर पिता घटना के बाद से फरार है और बेटी की मां डीआईजी ऑफिस के चक्कर काट रही है। उड़ीसा के मलकानगिरी के कुडुमुलुगुमा गांव में रहने वाले 37 वर्षीय भागबान दाकु को, अपनी 14 वर्षीय पुत्री के साथ बलात्कार करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। जब ग्रामीणों ने उसकी बड़ी लड़की को गर्भवती अवस्था में पाया, तो भागबान  की जमकर पिटाई की और उसे पुलिस के हवाले कर दिया।

मुंबई ट्रैफिक कांस्टेबल गणोश तुकाराम पर, अपने ही सहयोगी पुलिसकर्मी की नाबालिग बेटी के साथ बलात्कार का आरोप लगा था। वह नवीं कक्षा में पढ़ने वाली लड़की को घुमाने के बहाने, गणोश विरार के पाटिल रिसॉर्ट ले गया था। पुलिस ही बलात्कारी हो जाए और औरतों की अस्मत से खिलवाड़ करने लगे, तो आम जनता की बहू-बेटियों की सुरक्षा कौन करेगा?

पोर्नोग्राफी और यौन अपराध  
रांची से सौ किलोमीटर दूर हजारीबाग जिले में पुलिस ने अपनी किशोरी बेटी (साइंस की इंटर की छात्रा) से कई वर्षो से कथित रूप से बलात्कार कर रहे पिता (सरकारी डॉक्टर) को गिरफ्तार किया। पिता उसे बचपन से ही ‘ब्लू फिल्में’ दिखाकर, अपने साथ सेक्स करने के लिए उकसाता रहा, मगर इस बात की शिकायत करने पर मां ने भी मामले में चुप रहने की सलाह दी। पिता के कथित यौन उत्पीड़न से हालत गंभीर होने पर एक बार उसे रांची के अपोलो अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था, लेकिन वहां से घर वापस आने पर पिता उसके साथ बलात्कार करता रहा। गिरफ्तारी के बाद पिता ने कहा ‘बेटी मानसिक रूप से बीमार है’।

मार्च 2009 में ऑस्ट्रिया के सांक्ट पोएल्टेन शहर की अदालत ने, फ्रीत्ज्ल को अपनी बेटी को ‘सेक्स गुलाम’ बनाने और 24 साल तक अपने घर के तहखाने में कैद कर, उसके साथ व्यभिचार करने के अपराध में उम्रकैद और बाकी उम्र किसी पागलखाने में गुजारने की सजा सुनाई थी। मानसिक रोग विशेषज्ञ के अनुसार ‘73 साल का फ्रीत्ज्ल महसूस करता है कि उसका जन्म बलात्कार करने के लिए ही हुआ है’। ऑस्ट्रिया के जोसफ फ्रिट्जल के समान ही 2004 में एक मामला भोपाल में भी सामने आया था, जहां 13 साल की बेटी के साथ, उसका पिता बलात्कार करता था। अप्रैल-2005 में ऐसा ही अपराध हैदराबाद में भी हुआ, जहां 14 साल की बेटी पिता द्वारा बलात्कार के कारण गर्भवती हो गई थी। अक्टूबर-2006 में 25 साल की एक महिला ने भी अपने पिता (कानपुर में एसडीएम) पर आरोप लगाया था कि वह करीब एक साल से ज्यादा समय से उसके साथ बलात्कार कर रहा था। जून-2010 में मेरठ में ‘अपनी ही बेटी‘ से बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार, एक पिता ने हवालात में रोशनदान की खिड़की से अपनी कमीज बांध फांसी लगाकर खुदखुशी कर ली। यहां आत्महत्या ‘अपनी ही बेटी‘ से बलात्कार के अपराध-बोध का परिणाम है या उम्रकैद की सजा और समाज में बदनामी का भय?

मुंबई पुलिस ने 60 साल के व्यापारी को ‘अपनी ही दो बेटियों के साथ बलात्कार‘ के आरोप में गिरफ्तार किया। इस कुकृत्य में बाप ही नहीं, लड़कियों की मां भी शामिल थी और दोनों पति-पत्नी ऐसा इसलिए कर रहे थे क्योंकि तांत्रिक ने कहा था- ‘ऐसा करने से उनके घर की उन्नति होगी’। व्यापारी ने पहले अपनी बड़ी बेटी के साथ 11 साल की उम्र से ही बलात्कार करना शुरू किया और कुछ महीने पहले 15 साल की बेटी को भी अपनी हवस का शिकार बना डाला।

कानूनी बारीकियां और अदालती सहानुभूति
अक्टूबर-2009 में ‘अपनी नाबालिग बेटी‘ से बलात्कार के दोषी एक व्यक्ति को मुंबई की अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनायी, मगर अपराध में मदद करने और उकसाने की आरोपी उसकी पत्नी को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया। सत्र न्यायाधीश पी.ए वाघेला ने भरत राठौड़ को उम्रकैद की सजा सुनाते हुए कहा- ‘यह जघन्य और शर्मनाक घटना है और दोषी अधिकतम सजा पाने का हकदार है’। दरअसल, पिता से तो अपने बच्चों की सुरक्षा करने की उम्मीद की जाती है, परंतु वह ही शिकारी बन जाए, तो बच्चों की हिफाजत कौन करेगा? जनवरी, 2011 में मेरठ के अतिरिक्त जिला और सत्र न्यायाधीश श्याम विनोद ने एक पिता को ‘अपनी सात वर्षीय बेटी से बलात्कार‘ करने और बाद में हत्या कर देने के जुर्म में, मौत की सजा सुनाई। ऐसे ‘जघन्य’अपराधों में अभियुक्त के साथ किसी भी तरह की ‘सहानुभूति‘ समाज के लिए बेहद खतरनाक ही साबित होगी।

‘उम्र कैद‘ या ‘सजा-ए-मौत‘ के फैसले, अपीलों में अदालती सहानुभूति या कानूनी बारीकियों का फायदा उठाकर, सजा कम करवाने या छूट जाने में भी बदल सकते हैं।  छोटी बच्चियों से बलात्कार और हत्या के अनेक फैसले गवाह हैं। सो, गिनाने की जरूरत नहीं। अबोध-निर्दोष बच्चियों की (घर-बाहर-स्कूल-अस्पताल) सुरक्षा के लिए, नए सिरे से सोचना बहुत जरूरी है। सरकार, राष्ट्रीय महिला आयोग और महिला संगठन ही नहीं, बल्कि संपूर्ण समाज को इस विषय पर गंभीरतापूर्वक ठोस कदम उठाने होंगे। हालांकि अब भी काफी देर हो चुकी है।

खूबसूरत हर्फों की गवाही

निवेदिता


निवेदिता पेशे से पत्रकार हैं. सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों में भी सक्रिय रहती हैं. हाल के दिनों में वाणी प्रकाशन से एक कविता संग्रह ‘ जख्म जितने थे’ के साथ इन्होंने अपनी साहित्यिक उपस्थिति भी दर्ज कराई है. सम्पर्क : niveditashakeel@gamail.com

( निवेदिता किस्तों मे अपना जीवन और गुजरते समय को दर्ज कर रही हैं अपने संस्मरणों में . इस किस्त में वे साक्षी भाव में अपने जन्म से लेकर अपने किशोर होने की कहानी कह रही हैं . कहानी में एक लडकी के  मन के और उसके समय की सांस्कृतिक हलचल के किस्से दर्ज हैं . स्त्रीकाल में इनके संस्मरणों के अन्य किस्त पढ़ने के लिए नीचे के लिंक क्लिक करें :  )

जब ज़रा गर्दन झुका ली देख ली तस्वीरे यार 
यही फ़िज़ा थी , यही रुत यही ज़माना था 

वह सुबह भी हमेशा  की तरह आम सी सुबह थी, जब डाक्टर ने कहा कि बेटी हुई है। घड़ी उसी तरह टिक- टिक कर रही थी। अप्रैल के महीने की चार तारीख को वह पैदा हुई। कमरे में रौशनी  कुछ धुधंली थी। नर्स ने बताया बच्ची खूब स्वस्थ्य है। नाजुक-नाजुक हाथ-पांव, पेट के ही बाल इतने घने और घुंघराले कि लगता था काले -काले बादल पिघले पिघले घूम रहे हैं !

जब वह पैदा हुई तो उसकी मां की उम्र 16 साल थी। डाक्टर ने कहा मां कमजोर है, खून की कमी है। ख्याल रखना होगा। पिता की पोस्टिंग किसी दूसरे शहर में थी । उन दिनों टेलिफोन का जमाना नहीं था। जबतक उनको खबर हुई वो पैदा हो चुकी थी। बड़े काका ने मां की हालत देखते हुए छोटे काका को बुला भेजा था। वे डाक्टर हैं इसलिए उनके रहने से सबको भरोसा होता है। काका का घर अस्पताल से पास में ही है। अस्पताल से सीधी सड़क घर की ओर जाती है। दाएं हाथ को जाने वाला रास्ता हर के बाहर खेतों की ओर चला जाता है। दूर तक फैले लहलहाते खेत और पीछे पहाड़ों की श्रृखंला। गया पहाड़ों का  शहर है। बाएं मुड़ने पर एक चैड़ी सड़क सीधे घर की तरफ जाती है।  घर पहुंचे  तो काकी इंतजार में थी। क्या हुआ?  हंसते हुए काका ने कहा लक्ष्मी आयी है। काकी खुश  हो गयी, पूछा  फूलो को खबर किया। हां, टेलिग्राम भेजा है। फूलो भागे-भागे पहुंचे। इन्दू की हालत बेहतर हुई तो सुधीर  पटना के लिए रवाना हुए। रास्ते में ही थे कि  बेटी के जन्म की खबर मिली। चार दिन पहले फूलों की बेटी जन्मी और चार दिन बाद सुधीर की। दोनों बेटी। एक का दुधिया सफेद रंग में गुलाल मिला हुआ। दूसरी तांबाई रंग। तराशे  हुए नैन -नक्ष। दोनों लड़कियां बड़ी हो रही हैं। एक फूल सी नाजूक दूसरी खुलता  हुआ गेहुंआ रंग,बड़ी बड़ी जामुनी आंखें। तराशे हुए नाक और गर्दन उंची,  घने धुधराले बाल। दोनों बहनें जब साथ होती लोग तुलना करने लगते। दुधिया रंग के सामने गेहुंआ रंग। आहें भरते काश , अगर इसका भी रंग दुधिया होता तो कयामत होती। वह नाराज होती । मुझे अपना रंग पसंद है। नहीं होना है उसकी रंग का।

 मां कहती,  ‘ दूध पी जाओ तो उसी की तरह गोरी होगी।’ वह गुस्से में पूरा गिलास खाली कर देती पर रंग ताबांई ही रहता।  धीरे-धीरे उसे पता चलने लगा कि उसके रंग में गजब का जादू है। लोग कहते उसकी आंखें ऐसी जैसे राधा के नीमबाज आंखें। वह सोचती राधा कौन है। एक दिन उसने मां से पूछा , मां ये राधा कौन है?
मां ने कहा , ‘ कृष्ण की प्रेमिका।’
मां सब कहते हैं, ‘ मेरी आंखें  राधा की तरह है।’
मां खिलखिलाई। विद्यापति के गीत में है ऐसी आंखों का वर्णन-राधा की अधखुली आंखें जैसे कमल के फूल पर भंवरा बैठा हो।

दो साल गुजरते गुजरते भाई आ गया। फिर तीन बहनें और एक भाई। मां को छोटे बच्चों से फुरसत नहीं मिलती। उसे अकेलापन लगता। कभी बागान में टहलती। कभी किचन में जाकर मां का हाथ बंटाती। रात में एक बड़े पलंग पर मां के साथ सारे बच्चे सोते। मां काफी सफाई पसंद करती थी। बच्चे बिस्तर गीला करते थे। बिस्तर पर बड़ा सा प्लास्टिक बिछाया जाता। उसके उपर मोटी सी चादर। उसे प्लास्टिक पर सोना पसंद नहीं।  पांच भाई-बहनों के बाद पलंग पर जगह बचती भी नहीं थी। वह मां के पायताने सोती। रात में कई बार डर लगता। मां अपना पांव बढ़ा देती। मां के पांव को सीने में चिपकाए वह सुकून की नींद सो जाती। 6 बच्चों को मां अकेले संभाल नहीं पाती। इसलिए नानी अक्सर मां को गांव ले आती।

निवेदिता के मां और पिता

नानी का घर सहरसा में है। सहरसा तक सब रेलगाड़ी से आते फिर वहां से सिमराही तक बस से। नाना सिमराही में बैलगाड़ी भेज देते। उसे बैलगाड़ी पर बैठना खूब पसंद था। बैलों के गले में लगी घंटी बजती रहती। धीमी-धीमी सुरीली। रास्ते में धान की पीली बालियां लहलहाती। उसकी पत्तीयां इतनी हल्की और इस कदर बारीक होती कि हवा के हल्के झोके से भी लचकती रहती।

गांव हमेशा  से उसे पसंद है। हरे भरे बागान। सामने आम का बगीचा। घर के पिछवाड़े साग-सब्जी उपजती थी। नानी के साथ उनकी मां भी रहती थीं। जिसे सब बड़ी नानी बुलाते। जबसे उन्हें देखा सफेद बाल और सफेद साड़ी में ही देखा.  उनके बाल कभी लंबे नहीं देखे। बाद में पता चला कि विधवाएं ऐसे ही रहती हैं। नानी बगीचे में ले जाती, ‘ देखों ये नेनुआ का बत्ती है और ये कटहल का पेड़। ‘ उसे लगता नानी को गांव के सारे गाछ के रहस्यों का पता है। नानी के साथ मिलकर घर के पिछवाडे में वह सब्जियां रोपती। नानी कहती किसानों के खेत से सब उपजना चाहिए नहीं तो खेत बांझ औरत की तरह लगते हैं। वह पूछ्ती ,  ‘नानी बांझ औरत क्या होती है?’  नानी हंसती अभी ही सब जान लोगी बिटिया। अच्छा चलों हम धनिया बो दें। वो क्यारियों में धनियां बोती। घर में रोज धनिया की चटनी बनती। आम के मौसम में धनिया में आम मिलाकर पीसा जाता। उसकी खुशबू से  गम-गम करता आंगन।  उसे बड़ी हैरानी होती की एक नन्हें से बीज से इतनी घनी-घनी हरी पत्तीयां फूटती कैसे हैं? आंखें खुलते ही भागती कि क्यारियों में धनिया बोया वह फूटा या नहीं। देखा तो बारीक-बारीक हरी हरी पत्तियां निकल आयीं थीं। चिकने -चिकने हरे रंग की  नन्हीं -नन्हीं पत्तीयां लहलहा रही हैं

नानी के घर में रहते हुए पढ़ाई का नुकसान हो रहा था यह सोच कर पापा उसे और छोटे भाई प्रियरंजन को पटना ले आए। मां के बगेर बच्चे अनाथ से ही रहते हैं। घर से दो किलोमीटर दूर स्कूल था। दोनों भाई-बहन ‘ बस्ता’ ( स्कूल बैग ) उठाए निकल पड़ते। उसके घर के पास एक बड़ा सा नाला बहता। नाले के किनारे-किनारे संकरी सी सड़क। चाॅय टोला के नाम से वह मुहल्ला जाना जाता था।  रास्ते में जितने पेड़ मिलते  वे गिनते जाते। दरख्तों पर फैली हुई बेलें। केले और ताड़ के पत्ते। नीम,पीपल ,कदंब, कटहल। कदंब के पेड़ को देखकर लगता जैसे कोई समाधी में लीन हों । पीपल की घनी छाया के बीच से सूरज की किरनें झरती। पेड़ों को छूते हुए दोनों भाई-बहन स्कूल पहुंच जाते।

टिफीन का समय उसके और भाई के लिए परेशान करने वाला होता। वह चाहती कि उसका टिफीन कोई ना देखे। उन दिनों उसकी मां नहीं रहती थीं। टिफीन अक्सर उसके चचरे भाई दिया करते थे। भात,दाल सब्जी और चीनी। चीनी दाल में धुल जाता और उसका मजा बेकार हो जाता। कभी सत्तु देते। बच्चे मजाक उड़ाते कि वे टिफीन में भात लाते हैं या सत्तू लाते हैं। कई बार शर्म से दोनों भाई-बहन छुप कर जल्दी जल्दी खाते। इस चक्कर में सत्तू बिना पानी मिलाए खाते। उनका पूरा मुंह उजला हो जाता। बच्चे हो-हो कर हंसने लगते। भाई के सारे दोस्त उसके दोस्त थे। सब सारे दिन छत पर पतंग उड़ाए फिरते। उनकी पतंग बादलों को छूती। कभी-कभी सूरज की किरणें बादलों के बीच से निकलती। उसमें नीलमी हीरे जैसी बुंदकियां चमकती। गहरे नीले रंग के आसमान पर हल्की-हल्की सूरज की किरणें पतंग पर फैल जाती। उसे लगता कि वह सूरज को छू रही है। पतंग उड़ाते हुए बचपन में पढ़ी एक कहानी ‘काकी’ की याद आती। जिसमें बच्चा पतंग के लिए पिता की जेब से पैसा चुराता है। उसे किसी ने बताया कि उसकी मां जो आसमान में रहती है उसतक वह पतंग के जरिये पहुंच  सकता है। वे दोनों भी उस कहानी की तरह मां के पास अपनी पतंग भेजेना चाहते । कई बार सोचते काश  कितना अच्छा होता अगर मां पतंग की डोर पकड़-पकडे़ हमारे पास आ जाती।   मां कि चिठ्ठियां आती, वे खुशी से भर जाते। जैसे उनके हाथ खजाना लग गया हो।  खत पढ़ते ही नन्हें भाई-बहनों की सूरतें साफ-साफ नजर आती।
बचपन की यादें मलगजी-मलगजी,धुंधली हैं ,लेकिन उन यादों में कहीं कोई अजनबीपन नहीं है। कभी-कभी नींद में ऐसे मंजर दिखाई पड़ते की वह बेचैन होकर जाग जाती।  निगाहों की हद के पास,मां बाहें फैलाए दिखतीं। जब वह करीब जाती तो मां गायब हो जाती। वह घबरा कर उठ जाती । फिर परेशान रहती कि इस ख्वाब का मतलब क्या है?

निवेदिता अपनी मां के साथ

कुछ दिनों बाद पिता मां को  ले आए। उन दिनों वे राजेन्द्र नगर  में रहते थे। उसका दाखिला 9वीं कक्षा में रवीन्द्र  बालिका विधालय में हुआ। स्कूल से लौटकर घर के पास के मैदान में सारी लड़किया जुटतीं और उनकी खिलखिलाहट से मुहल्ला गूंजता । ये उम्र ही ऐसी थी जिसमें बेवजह हंसना, इतराना चलता रहता था। सामने के घर में रज्जी रहता था। वे लोग इसाई थे। रज्जी के घर के उपर में शबनम चाचा। मुहल्ले में लड़कियों की पूरी फौज थी। उनके मजे थे। ईद-बकरीद में शबनम चाचा के यहां सारे बच्चे जमे  रहते। एक से एक लजीज गोश्त  और सेवैयां खाने को मिलती। क्रिसमस में सब मिलकर क्रिसमस ट्री सजाते। केक और मिटाईयां खा-खा कर अघा जाते। क्या होली, क्या दशहरा पूरा मुहल्ला इस तरह जीता जैसे सारे पर्व पर उनका हक हो। उसने कभी नहीं जाना की ईद मुसलमानों का पर्व है और क्रिसमस ईसाईयों का। मुहल्ले के लड़के-लड़कियों की टोली सारे दिन आवारागर्दी करती। इश्क  के किस्से चटकारे ले लेकर हम सुनते। आज कौन हलाल हुआ? किसकी नजरें चार हुई जैसे जुमले लोगों की जुबान पर होता। प्रेम पहले खिड़कियों के रास्ते आता । प्रेम पत्र भेजने के नए-नए तरीके ईजाद किये जाते।

पहली बार उसे वहीं देखा था। खाक और धूल से सने कपड़े। रुपहली बालों पर घनी घनी लटें कानों तक झूल रही थी। धूप से रंग कुछ और झुलसकर शोख हो गया था। होठों के दरमियान सितारों की लडि़या चमकी। दोनों ने एक -दूसरे को देखा। दिल में बादल फटे। बिजलियां चमक गयीं। उसके लिए दिल धड़का। फिर बाद में पता नहीं कितनों के लिए धड़का। हर दिन की तरह वह स्कूल जा रही थी। उसने महसूस किया कि कोई उसके पीछे चला आ रहा है। मुड़कर देखा तो वही था। उनकी नजर मिली । वह ठिठक गया। वह आगे बढ़ गयी। कई दिनों तक ये सिलसिला चलता रहा। उसे बुरा लगता । इस तरह पीछा करना बेवकूफी लगती। लोग क्या सोचेंगे? एक दिन उसने हिम्मत कर कहा -इस तरह पीछा क्यों कर रहे हो? वो खामोशी  से सर झुकाए खड़ा रहा। उसे वहीं छोड़ वह तेज कदमों से निकल गयी। उस दिन के बाद वह कई दिनों तक दिखा नहीं। उसे बुरा लग रहा था उसके लिए।
एक दिन वह छत पर थी। जाड़े का दिन था। गुनगुनी धूप फैली हुई थी। सामने ताड़ के बड़े बडे़ दरख्त उंचे होकर सुर्ख आसमान से जा लगे थे। वह किताब में डूबी हुई थी कि अचानक जोर से आवाज हुई। उसके सामने पत्थर में लिपटा कागज का दुकड़ा फड़फड़ा रहा था। उसने इधर-उधर नजर दौड़ाई तो देखा वह छत पर खामोश  खड़ा है। दिल में खलबली मच गयी। खत लेकर उसके हाथ कांपने लगे। उसने नजर बचा कर खत को जल्दी से स्वेटर के अंदर छिपा लिया। वह भागी -भागी जयश्री के पास गयी। जयश्री उसके साथ स्कूल में थी। दोनों गहरे दोस्त हैं। हमराज, हमख्याल। जयश्री समझ गयी। आज कोई खास बात है, निवेदिता सुबह-सुबह पंहुची है। दोनों ने कमरा बंद किया, और एक स्वास  में खत पढ़ गयी। पहला खत बड़ा फिल्मी था। जिसे पढ़कर दोनों सहेलियां देर तक हंसती रहीं । सफेद कागज पर खूबसूरत हर्फ चमक रहे थे-‘माना की तुम बेहद हंसीं इतने बुरे हम भी नहीं।’ बदले में उसने फैज की नज्म भेज दी। फिर ये सिलसिला चलता रहा। उसे देखकर उसका दिल उसकी तरफ खींचने लगता। वह कहीं भी होतीं, उसके वजूद का एहसास नब्ज की तरह धड़कता।  पहली बार वह उससे एक दोस्त के छत पर मिली। दोनों पर मुकम्मल खामोशी तारी थी। आसमान का रंग सूर्ख  था। उसने उसका हाथ अपने हाथ में लिया। सूरज पूरी तरह डूब चुका था। उसकी लाली रात की स्याही में तब्दील हो गयी। उसने चोर नजरों से उसे देखा। कद निहायत बुलंद ,पेशानी उंची,आंखें रौशन,सीना चैड़ा। सांवला रंग, घनी भवें, लंबी पलकें। एक लम्हें के लिए उसकी निगाहें उसके चेहरे पर टिक कर रह गयी। उसने देखा वह उसे देख रहा है अपलक। शर्म से उसका चेहरा लाल हो गया। धीमी-धीमी चांदनी फैली हुई खामोशी  को और भी पुरइसरार बना रही थी। बगैर  कुछ कहे वे एक-दूसरे से विदा हुए। उनकी आंखें कहती रहीं। प्रेम जब भी होता है तो इसी एहसास के साथ। वह दिन भी आया जब वे अलग हो गए। जानें कितनी रातें आसूंओं से तर होती रहीं।

जिन्दगी की खूबसूरती यही है कि वह अतीत में पड़ी नहीं रहती। उन मुश्किल   दिनों में फैज की नज्म खूब काम आयी। ‘राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा।’ वह स्कूल से काॅलेज में पहुंच  गयी। छात्र आंदोलन और इप्टा जैसे संगठनों से जुड़ाव ने जिन्दगी के नए मायने समझाए। उन्हीं दिनों पटना में प्रगतिशील  लेखकों की ओर से बड़ा मुशायरा का आयोजन किया गया था। देश  के बड़े नामी कलाकार,शायर जमा हुए थे। यह वह दौर था जब पटना की रचनात्मक सरगर्मियां बढ़ी हुई थीं। ऐसा लगता था जैसे शहर के रगों में रचनात्मकता दाखिल हो।  पहली बार वह कैफी और शौकत आजमी से यहीं मिली थी। एक बेहद खूबसूरत इंसान। बदन पर बारीक रेशमी कुर्ता। रंग निहायत गोरा। बड़ी-बड़ी आंखें। नाजुक-नाजुक होठ पर हल्की सी मुस्कान।  उनका चेहरा इस कदर पुरकशिश  कि देखते रहिए। उनकी आवाज में अजब लोच और दिलकशी  थी। निहायत साफ और खुली आवाज। मिठास ऐसी जैसे शब्द  श हद में लिपटे हों।

कैफी आज़मी  बेटी शबाना आज़मी के साथ

कैफी आजमी की देख-रेख का जिम्मा उसे और उसकी बहन जोना को सौपा गया। दोनों बहनें पहुंच गयीं। आदाब किया। इधर आओ बिटिया। जी हमें आप दोनों की देखभाल के लिए भेजा गया। वे हंसे। शौकत आजमी ने प्यार से उनके माथे पर हाथ फेरा, ‘  बैठ जाओ बिटिया। तुम्हें पता है शबाना भी हमदोनों का इसी तरह ख्याल रखती है।’
‘ जी वो तो बड़ी अदाकारा हैं।’
‘  हां वो तो है। आज हिन्दुस्तान को इतनी बड़ी अदाकारा नहीं मिलती अगर मैंने फैसला नहीं लिया होता। दोनों की आंखे चमकी।

शौकत आजमी अपनी रौ में बह रहीं थीं,  ‘ अब क्या बताएं वह जमाना ही कुछ और था। 1950 के आस-पास की बात है। कैफी साहब सारे दिन पार्टी के कामों में लगे रहते। न रहने का ठिकाना न खाने का। हम दोनों ने जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखें हैं। शबाना पेट में थी। मुझ से मारे मारे फिरना अब मुमकिन नहीं लग रहा था। मुझे ठीक ठीक याद नहीं शायद उनदिनों बी.टी रणदिबे पार्टी के महासचिव थे। उन्होंने इन्हें बुलाया । हाल चाल पूछा । ये जानकर परेशान हुए की मैं गर्भवती हूं। उन्होंने कैफी से कहा तुम्हारी ये हालत नहीं कि अभी बच्चे पैदा कर सको। कैफी लौटकर आए तो उदास थे। उन्होंने मुझसे कहा कि हमलोग अभी बच्चे की जिम्मेदारी नहीं ले सकते। मुझे काफी गुस्सा आया । मैंने कहा  उन्हें झाडू मारुंगी। बच्चा मेरा है उसे पैदा करने की इजाजत पार्टी से नहीं लेना है। जैसे भी होगा हम पालेंगे। ‘

यह  किस्सा बताते हुए हंसने लगी, ‘  बिटिया अगर मैंने उस वक्त ये फैसला नहीं लिया होता तो देश  एक संवेदनशील अभिनेत्री से वंचित रह जाता।’

कैफी ने मजे ले-लेकर किस्सा सुना। फिर गंभीर होकर बोले, ‘  देखो इससे ये मत समझना की पार्टी हमारी जिन्दगी के निजी  फैसले भी तय करती है। वे मुश्किल  भरे दिन थे। हम अपने काॅमरेड के सुख-दुख के हिस्सेदार थे।  एक-दूसरे के जीवन में रचे-बसे रहते थे।’  पर आज न तो पार्टी वैसी रही न ही पार्टी कामरेड।
कैफी उस दौर के कम्युनिस्ट थे जो ये मानते थे कि पार्टी का उनपर पूरा इख्तियार है। वे लंबे समय तक कम्युनिस्ट पार्टी के होलटायमर रहे। कैफी की उबड़-खाबड़ संकटों और चुनतियों भरी जिन्दगी में एक अन्तर्निहित लय है। शायद इसलिए उनकी शायरी इनसान और इनसानियत के हक में आवाज उठाती रही है। उन्होंने एक मुसलसल लड़ाई लड़ी। दिल की गहराईयों में डूब कर लिखा। कैफी और उनके पाठकों के बीच गहरे संबंध हैं। वे उनकी नज्मों में सीधे उतरते हैं। कैफी की शायरी हिन्दी-उर्दू की साझी सांस्कृतिक विरासत का सबसे अहम सबूत है।

दोनों बहनों ने पूरा दिन उनके साथ गुजारा था। उनकी स्मृतियों में वे दिन आज भी हरे हैं। उनकी बातें खत्म ही नहीं हो रही थीं। शाम हो गयी थी। उन्हें मुशायरा के लिए जाना था। वे बाहर निकल आयीं। आसमान पर सूरज की पीली परत फैली थी। हवा में हल्की खूंनकी थी। दोनों बहने हाॅल पहुंच कर उनका इतंजार करने लगीं। एक बड़े से कमरे में कालीनों पर कोई 15-20 का मजमा लगा था। कमरे की रौशनी कुछ धुंधली  थी, मगर संदल और इत्र की गाढ़ी खुशबू हवा में तैर रही थी। बहुत बारीक धुंए की लकीरों के साथ शम्मा धीमें-धीमें जल रही थी। कैफी आए। महफिल में जान आ गयी। अजीजजाने-गिरामी,इरशाद फरमाएं-सब सुनने को तैयार हैं। अब इंतजार की ताब नहीं। कैफी बड़ी अदा से मुस्करये। भई पहले हम इन बच्चियों का शुक्रिया अदा करते हैं। सारे दिन दोनों ने मिलकर हमारी खितमत की। फिर वे लोगों  की तरफ मुखातिब हुए और निहायत दिलकश , अंदाज में नज्म पढ़ी……….

शौकत आज़मी

आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है
आज की रात न फ़ुटपाथ पे नींद आएगी
सब उठो, मैं भी उठूँ तुम भी उठो तुम भी उठो
कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जाएगी ।
ये जमीं तब भी निगल लेने को आमादा थी
पाँव जब टूटती शाखों से उतारे हमने
इन मकानों को ख़बर है न मकीनों को ख़बर
उन दिनों की जो गुफ़ाओं में गुज़ारे हमने ।

हाथ ढलते गए साँचों में तो थकते कैसे
नक़्श के बाद नए नक़्श निखारे हमने
की ये दीवार बुलन्द और बुलन्द और बुलन्द
बाम.ओ.दर और ज़रा और निखारे हमने ।

आँधियाँ तोड़ लिया करतीं थीं शामों की लौएँ
जड़ दिए इस लिए बिजली के सितारे हमने
बन गया कस्र तो पहरे पे कोई बैठ गया
सो रहे ख़ाक पे हम शोरिश ए.तामीर लिए ।

अपनी नस.नस में लिए मेहनत.ए.पैहम की थकन
बन्द आँखों में इसी कस्र की तस्वीर लिए
दिन पिघलता है इसी तरह सरों पर अब तक
रात आँखों में खटकती है सियाह तीर लिए ।

उनकी नन्म पर कुछ सिर झुकाए, कुछ निगाहें उठाए वल्लाह, सुब्हानल्लाह, वाह-वाह कह रहे थे। दोनों बच्चियां सुन रही थीं, भीग रही थीं, डूब रही थीं। विदा होते समय कैफी ने उनकी डायरी में लिखा बिटिया निवेदिता और जोना के लिए…..चंद कतरे। आज भी वो डायरी उसके पास सुरक्षित है। पुखराजी सुनहरी  रौशनाई, में खूबसूरत हर्फ उन दिनों के गवाह हैं।

महाभूत ( चन्दन राय ) की कवितायें

महाभूत चन्दन राय


कविताओं मे अपने बिम्ब और कथन के साथ उपस्थित युवा कवि महाभूत चन्दन राय युवा पीढी के कवियों मे एक मह्त्वपूर्ण नाम है. संपर्क :rai_chandan_81@yahoo.co.in

[ तुम्हारी नथ ]

मैं अपनी तलब और तुम्हारे बहक जाने के भरोसे के बीच
गुलाबी प्यास की तपस्या पर बैठा हूँ
पर कमबख्त इतनी हठीली है तुम्हारी नथ
की  अड़ी खड़ी  है तुम्हारे होठों की किवाड़ पर सांकल चढ़ाए
तनी हुई है मेरी सांसों पर भी / मुँह चिढ़ाती पहरा लगाएकोतवाल सी पूछती है  मुझसे  मेरे इरादे   ..
इन्हे उतार फेकों की इनका चाल-चलन कुछ ठीक नहीं…
ये मुझे तुम्हारी अम्मा  लगती हैं !

[ दिसंबर की सर्दियों सी तुम ]

तुम अपनी आँखों से…
खर्च करती हो जितनी मुहब्बत,
उनसे रजाइयाँ बनाकर
मैं कई सर्दियाँ बिता सकता था !!
तुम भाप बना कर उड़ा देती हो…
अपने होंठों से जितनी गर्मियां
मैं उससे चाय पकाया करता
इस कमर तोड़ महंगाई में !
इन कंपकपाती सर्दियों में
यूँ हुस्न खर्चना ठीक नहीं
बिस्तर पर यूँ तो अलाव बहुत है
बस थोड़ी सी शक्कर और जुटा लें

दिसंबर की सर्दियों सी तुम !!

[ शायद तुम्हे प्यार है… ]

शायद तुम्हे प्यार है इन फूलों से
जिनकी सांसो से तुम्हे अपने प्रेम की खुशबू की महक आती है

शायद तुम्हे प्यार है उस आईने से
जिसकी आँखों में तुम्हे अपनी सूरत नजर आती है

शायद तुम्हे प्यार है उस रात से
जिसकी गोद में तुम अक्सर अपना सर रख कर सोती हो

शायद तुम्हे प्यार है उस खुदा से
जिसकी तस्वीर भर पर तुम दुनिया में सबसे ज्यादा यकीन करती हो

शायद तुम्हे प्यार है मुझसे
जिसकी एक आहट भर भंग कर देती है तुम्हारी सारी साधना..

मैं इस यकीन पर रोज माँजता हूँ अपनी काया
रोज नई-नई छब बनाता हूँ
जाने तुम्हे कौन सा रूप सोहे !!

[ मुझे तुमसे प्रेम है ]

बहुत आसान है प्रिय
गर तुम समझना चाहती हो
तो मेरे सीधे-साधे सरल शब्द प्रभावशाली है
“मुझे तुमसे प्रेम है”
मैं अपनी  देह में तुम्हारा नाम
लिख-लिख कर तुम्हारी निशानदेही करता हूँ !

..और बहुत मुश्किल लगभग असम्भव
मेरा कहा कोई भी शब्द अपने प्रेम के प्रदर्शन में
अपने समर्पण की अभ्यर्थना में निरर्थक ही रहेगा
गर तुम समझना ही नहीं चाहती
“मुझे तुमसे प्रेम है” !!

कुह रिश्ते दुनिया की भीड़ में भी नहीं खोते
गर तुम्हे समझ आता है तो समझ लेना
अन्यथा समझ लेना हमारे बीच
कभी कोई रिश्ता था ही नहीं

बहुत आसान है प्रिय
गर तुम समझना चाहती हो
और बहुत मुश्किल लगभग असम्भव
गर तुम समझना ही नहीं चाहती
“मुझे तुमसे प्रेम है … !!

[ प्रिय तुम्हारा चेहरा ]


ऩऱम ऩऱम मख़मऴ सी मुलायम  ,
भीजे चाँद क़ी भीगी चाँदनी सी
सोकर उठी सुबह सी उज्जवल ,
ऩऩ्हे फूलो की हसँती क्यारी सी
साँझ के आक़ाश सी कुछ कुछ,
कुछ कच्ची माटी की पावऩ मूरत सी
निम॑ल ओस सी ताजा ,
मन्दिर की अलौकिक सजावट सी  !
सोने के तारो से मढ़ी भौंहों के नीचे
खुदा की जिन्दगी भर की कमाई…
ईश्वर का रूप है
“प्रिय तुम्हारा चेहरा” !

[ तुम जरा सा साथ दे देना ]

तुम जरा सा कहोगी
और मै तुम्हारे शब्दों के स्नान में
गंगा सा पवित्र हो जाऊँगा

तुम जरा सा हंसोगे
और चाँद से गिर रही इस मीठी ठंडी हंसी से
मै कुबेर धनी हो जाऊँगा

तुम्हारा घूँघट जरा सा ढलेगा
और तुम्हारे रूप के टपकते नूर से
मै मोतियों सा धुल जाऊँगा

तुम जरा सा साथ दे देना..
मै सच कहता हूँ
जन्मो-जन्मो तक संवर जाऊँगा !!

[ अपरिचित ]

तुमको देखा नहीं
पर शायद तुम्हे चाँद कहते हैं

तुमको सुना नहीं कभी
पर शायद तुम्हे गजल कहते हैं

तुमसे मिला भी नहीं कभी
पर शायद तुम्हे खुदा कहते है

अपरिचित इस दिल का हिर्स-ए-रजा हो तुम
तुम्हे दिल की वफ़ा हम कहते है !

कार्बाइड का कलंक : औरतों की आपबीतियां

स्वाति तिवारी


लेखन की कई विधाओं में सक्रिय स्वाति तिवारी मध्यप्रदेश सरकार की एक अधिकारी हैं.   संपर्क : stswatitiwari@gmail.com

 ( ३० साल हो गए हैं उस  हादसे के जब यूनियन कार्बाइड ने भोपाल में हजारो
लोगों को तबाह कर दिया , देखते -देखते एक शहर मुर्दों के टीले में बदल गया
था. स्वाति तिवारी ने इस हादसे की शिकार परिवारों की औरतों का दर्द दर्ज
किया है , अपनी पुस्तक  ‘ सवाल आज भी ज़िंदा हैं’ में. दो दिसंबर को भोपाल
त्रासदी की बरसी है , स्त्रीकाल के पाठकों के  लिए स्वाति तिवारी की किताब
से दो अंश . कल ( एक  दिसंबर ) का  अंश  पढ़ने के लिए क्लिक लिंक पर करें  )


कार्बाइड का कलंक

तय वक्त से पहले ही रविवार को मैं पार्क जा पहुंची। पार्क में बने एक चबूतरे पर कुछ महिलाएं नजर आईं। बालकृष्ण नामदेव वहीं थे। महिलाएं उन्हें पिछले हफ्ते की अपडेट दे रही थीं। अपनी ताजा समस्याएं गिना रही थीं।मुन्नी बी से मेरी मुलाकात यहीं हुई। उम्र करीब  सत्तर साल। अब वह अर्जुन नगर में रहती हैं, पर हादसे के वक्त सेठी नगर कॉलोनी में थीं।  एक झुग्गी में। घर में सब कुछ था। भरापूरा घर था, शौहर शेरखां इतना कमाते थे कि दो बीवियों का खर्चा बिना तंगी के चल जाता था।  मुन्नी पहली किरदार थी, जिससे मेरा आमना-सामना हुआ। सालों से लोग आकर इन लोगों से मिलते रहे। उनके जख्मों को कुरेदते रहे। किसी ने कहीं लिखा, किसी ने तस्वीर छापी, कोई फिल्म बनाकर ले गया। लेकिन सबको आते-जाते हुए ये किरदार सालों से एक ही तरह के सवालों को सुनते रहे हैं और एक ही तरह के सवालों से अपनी निजी जिंदगी में घिरे रहे हैं। बाहर से आए लोगों के सवालों के जवाब तो इन्होंने दिए, लेकिन इनके सवालों के जवाब इन्हें अब तक नहीं मिले। ये औरतें हर जाति और मजहब की हैं। लेकिन इन्हें इस निगाह से देखना बेमानी है। इन्हें सिर्फ एक औरत की शक्ल में देखिए। वो मां हो सकती है, बीवी, बेटी या बहन। लेकिन उसका नसीब हर किरदार में एक जैसा है। चाहे किसी मजहब की हो। कुछ कम या ज्यादा। लेकिन हाल एक जैसे हैं। गैस हादसे ने इनकी जिंदगी किस कदर बरबाद की, अब हम सीधे इनके बीच चलते हैं। सबसे पहले मुन्नी बी…

मुन्नी से मैं सब कुछ जानना चाहती थी। मैं महसूस करना चाहती थी कि उस रात का दर्द किस तरह कहर बनकर इनके घरों में आया। मैं जानती थी कि मैं भी उनके जख्मों को हरा ही करूंगी, लेकिन एक औरत के लिए यह हादसा किस तरह पेश आया, इसे मैं तफसील से जानने को उत्सुक थी। मुन्नी ने बताया कि एक ही चूल्हे पर दोनों मिलकर रोटियां पकाती थीं। पर परवर दिगार ने जाने कैसा नसीब लिखा कि सब कुछ बर्बाद हो गया। जिस घर में दूध का धंधा चलता था उस घर का मालिक रोटी-पानी तक को मोहताज हो गया।उस रात हम अपने घरों में सोए थे, पड़ोस में शादी थी। हल्ले-गुल्ले में देर से ही नींद लगी थी कि अचानक लगा किसी ने चूल्हे में मिर्चें झोंक दी हैं। धुंआ नाक-कान गले में लगा और तेज जलन होने लगी। बाहर देखा तो शादी के पंडाल से लोग भाग रहेथे।चारों तरफ अफरा-तफरी। हम भी भागे। हमारे शौहर, हम दोनों बीवियां और हमारे बच्चे । वह अंधेरी रात गुजर गई। शेर खां फिर कभी खाट से उठ नहीं पाए। पेट में पानी भर जाता था। उस सुबह के बाद जिंदगी का नक्शा ही बदल गया। रोज पेट का पानी निकलवाने के लिए अस्पतालों की अंतहीन दौड़भाग हमारे हिस्से में आ गई। रोज पानी पेट में भरता, रोज अस्पताल जाते। एक साल बाद मेरे शौहर का इंतकाल हो गया।  सुगरा बी पहले ही गुजर गई थी। मेरा अपना बच्चा नहीं था पर सुगरा बी का बेटा मेरे साथ था। उसी के पास रहती थी। बाद में गैस के असर से बेटा बहू भी खत्म हो गए। तेरह साल का एक पोता है मेरा। वही संभालता है मुझे। हादसा याद करती हूं तो पड़ोस की बीबी जान का घर भी याद आता है। उस दिन उनके घर से चार-चार जनाज़े निकले थे। इतना कुछ देखा था.

 
उस हादसे में कि बताना मुश्किल है। सडक़  पर इंसानों की लाशों का ऐसा मंजर कभी देखा नहीं था। कभी जानवरों को भी इस बुरी हालत में मरते नहीं देखा। मुन्नी ने कहा, हमें जीते-जी बहुत इज्जत का अहसास जिंदगी में कभी नहीं हुआ था। मुश्किल हालातों में दो वक्त की रोटी कमा खा लेते थे। इज्जत से जीना क्या होता है, यह शायद ही हमारे आसपास के लोगों ने जाना हो। लेकिन मौत इतनी जलालत और बेइज्जती के आलम में आएगी, यह सोचकर भी आज रूह कांप जाती है…उस रात की याद मत दिलाइए। हमने न जाने कितनी रातें उसकी कड़वी यादों के साथ गुजारी हैं। अल्लाह रहम कर …..लाशें देखकर भागते हुए कोई रुकना ही नहीं चाहता था। कहां-कहां रुकता? जो भागते-भागते गिरा उसे वहीं छोडक़र लोग भाग रहे थे। ऐसा तो कभी किस्से कहानियों में भी नहीं सुना था। पर उस कहर बरपाती रात को सब कुछ देखा है इन आंखों ने। आज भी भूल नहीं पाती हूं। जब हालात काबू में हुए तो वापस लौटने पर घर के खूंटे में बंधी बेबस गाय और भैंस की फूली हुई लाशें आंखों के सामने थीं। एक हद के बाद दर्द के अहसास भी पथरा जाते हैं। घर लौटकर उस सन्नाटे में मैं इसी हाल में थी…
मुआवजे में पच्चीस हजार मिले थे। बैंक में रखे हैं। इसे मैं हज के लिए इस्तेमाल करना चाहती हूं। ताकि वहीं जाकर परवरदिगार से पूछूं कि यह कैसी तेरी दुनिया है? कैसा इंसाफ है? और कौन सा गुनाह था मेरा? इस उम्र में १३ साल के पोते को मजदूरी करते हुए देखती हूं तो सीने पर पहाड़ सा बोझ मालूम चलता है। हमारी दुनिया ही तबाह हो गई। लेकिन हम अकेले नहीं थे…

मुन्नी अपनी आपबीती सुनाती जाएगी। उसकी कहानी उस रात की अगली जहर से भरी सुबह के साथ खत्म नहीं होती। असल कहानी तो उस सुबह के बाद ही शुरू होती है। तकलीफों की एक अंतहीन दास्तान। अब नाम बदलते जाइए। मुन्नी की जगह कोई और नाम ले आइए। तारा, कलावती, कुसुम, चंपा, रानी, रशीदा…सिर्फकिरदार बदलते जाएंगे। लेकिन कड़वी यादें कम नहीं पड़ेंगी। इन कहानियों में दर्द का विस्तार पिछले पूरे 26 साल तक फैला हुआ है। जबकि जिंदगी है कि खत्म होने का नाम ही नहीं लेती…तारा बाई के पास चलिए। उम्र है करीब पैंतालीस साल। दिखने में सेहतमंद मगर भीतर शरीर बीमारियों का घर। दो साल पहले पति का देहांत हो गया। जब तक वे साथ रहे, दोनों मिलकर तकलीफों के हिस्सेदार बने रहे। अब सारी तकलीफें अकेले ढो रही हैं। क्या हुआ था उस दिन? यह सवाल अनगिनतबार पूछा गया है। जोर से एक पत्थर सा पड़ता है और यादों का दरिया फूट पड़ता है। सुनिए-वही हुआ था जो नहीं होना चाहिए था। तब मेरी शादी को तीन साल हुए थे। चार महीने का गर्भ था, नींद नहीं आ रही थी उस दिन। बीड़ी लपेट रही थी बैठे-बैठे। पड़ोस में शादी थी। हम भी शादी में खाना खाकर आए थे। पति सो गए थे। मुझे खांसी आई। लगा कि जैसे मिर्च जल रही है कहीं आसपास। दरवाजा खोलकर देखा तो भगदड़ मची थी। पति को उठाया और दोनों चूना-भट्टी की तरफ भागने लगे। रास्ते में हमने  लोगों से सुना कि कारखाने से जहरीली गैस निकली है – भागने में दम फूलने लगा। रास्ते में गिर पड़ी, पति ने उठाया पर अगले दिन अस्पताल में बच्चा गिर गया। वह कोख में ही मर गया था। बस मैं फिर मां नहीं बन पाई।

पति ने दूसरी शादी तो नहीं की। गैस ने बीमार  कर दिया और बीमारी झेलते-झेलते एक दिन वो भी चले गए।  सोचती हूं मैं जिन्दा हूं पर किसके लिए? कभी-कभी सुखद सपने देखती हूं। जागी आंखों से। सोचती हूं कि अगर बच्चा होता तो अब कितना बड़ा हो गया होता…कैसा दिखता वह? तारा की सूनी आंखों में अतीत की काली परछाइयां तैरने लगती हैं। वह सवालों के जवाब देती जाती है। हर जवाब के साथ वह भीतर ही भीतर पिघलने लगती है। आंखें बह निकलती हैं। फिर खामोशी घेर लेती है। वह मुंह छिपा लेती है। जैसे अपनी कड़वी यादों पर परदा डाल रही हो। हमेशा के लिए…उसे देखिए। कलावती बाई नाम है उसका। उम्र करीब 75 साल।  कुछ पूछती इसके पहले ही वह अपना आपा खो बैठी। चेहरा बोलने से पहले ही तमतमा उठा था। वह किसी सवाल का सामना करना नहीं चाहती थी। जोर से चिल्लाई,  नहीं बताती कुछ…। वो उठकर जाने लगी…। बालकृष्ण नामदेव बीच में आए। उसे प्यार से मनाया।  कहा, अरे बताओ अपने बारे में। दर्द बांटने से कम होता है। दुनिया को भी पता चलना चाहिए कि कलावती कितनी हिम्मतवालीऔरत है। किन-किन मुसीबतों को झेलकर भी गैस हादसे के शिकार लोगों के हक के लिए दम से दुनिया के सामने खड़ी है। बताओ। जो कुछ याद है कहो इनसे…कलावती सोच में पड़ गई। ठहरी। गहरी सांस ली। जैसे दिल से आह निकली हो। धीमी आवाज सुनाई दी, क्या बताऊं? कितनी बार बताऊं? ऐसा लगता है कि २६ बरस से सिर्फ बता ने के लिए ही हम जिन्दा हैं। लेकिन बार-बार दोहराने से मिला क्या है? उपेक्षा, बदहाली और बदकिस्मती?

फिर वो उतरती हुई धूप के टुकड़े  देखने लगी। फिर उसी पर जाकर बैठ गई। हल्के से मुस्कुराई। बोली, बेटा क्या बताऊं? पति पूरनचंद चालीस साल पहले ही मर गए थे। तीन बेटे थे मेरे। अब दो हैं, एक गैस की चपेट में आकर मर गया…उस रात सारा बरखेड़ी भाग खड़ा हुआ था और जब हम अपने घरों में वापस लौटे तो गैस बाहर नहीं फेफड़ों में भरी थी…आंखों में भरी थी…अब तक अंदर अपना असर दिखा रही है यह देखो, कैसी गिल्टी बन गई है।  छाती के पास। क्रोध से भरा चेहरा करुणा से कराह उठा। कहने लगी- मेरी नातिन १८ साल की उम्र में चली गई। एक बेटा भी गया। बचपन में मां मर गई थी। सौतेली मां ने मजदूरी कराई। तगारी उठाते बचपन से शादी ने मुक्ति दी तो बीच मझधार में छोडक़र पति भी चल बसे। तगारी फिर उठा ली। तगारी उठा-उठाकर पाले अपने  बच्चे की अर्थी उठते देखी तो मैं जीते जी मर गई। खूब चाहती कि बच्चे पढ़ते-लिखते। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया।  मेरी तगारी उनके हिस्से में आ गई। मेरे बच्चे आज भी मजदूरी करते हैं। अब तो दिखता भी नहीं है मुझे…पर देखने को बचा भी क्या है? डॉक्टर दिखाई गिल्टी? बताती हैं, दवा मिले और लगे तभी तो फायदा है दिखाने का। मुआवजे के पच्चीस-पच्चीस हजार रुपए तो जाने कब इलाज पर ही खत्म हो गए। यहां तक क्यों आई हैं?  वह एक कार्ड दिखाती है – पेंशन कार्ड। मैंने देखा उस पर लिखा था-नाम कलावती, उम्र ७५ साल, पति का नाम स्व. पूरनचन्द।

कलावती की हथेली पर कार्ड वापस रखती हूं तो एक और महिला आगे आकर अपना कार्ड मेरे हाथ में रख देती है। उस पर लिखा है-प्रेमबाई, उम्र ५० साल, ग्राम बरखेड़ी। वह आगे बढक़र बताने लगती है, उस रात जो मेरे साथ हुआ था मैडम, वो तो सिनेमा में भी नहीं देखा होगा आपने? अच्छा!’ उस रात जब गैस रिसी, हम सब भागे…. रास्ते में उल्टी हुई और मेरी तीन महीने की छोरी छूट गई और गिर कर मर गई। सास, ससुर, पति, ननद, देवर भरा पूरा कुनबा था हमारा। सब विधानसभा वाली सडक़ की तरफ भाग रहे थे। दूसरी लडक़ी भी हादसे के बाद मर गई। अब कोई औलाद नहीं है मेरी..मुआवजा मिला? प्रेमबाई कहती हैं, उसी के लिए आज तक लड़ रही हूं, पर नहीं मिला। पति ने दूसरी औरत को रख लिया था। उसी को मेरी जगह खड़ा कर दिया, पैसा उसे मिला। भगवान दास की वह दूसरी पत्नी भी अब नहीं रही। केन्द्र सरकार के विभागीय कर्मचारी की इस परेशानहाल पत्नी का कहना है कि रिश्तेदार देवर वगैरह अब मुझे फिर परेशान करते हैं, क्योंकि प्रापर्टी की एक मात्र दावेदार हूं मैं, फिर पति की पेंशन और नौकरी के पैसे भी मिलेंगे। संतान नहीं है, तो देवर सब हड़पना चाहता है। मुआवजा भले ही नहीं मिला हो पर मैं आखरी दम तक संगठन के साथ मिलकर न्याय के लिए लड़ती रहूंगी। मेरे पास अपने लिए जीने के लिए कुछ नहीं बचा। इसलिए संगठन के लिए सक्रिय हूं। गैस ने सिर्फ लोगों को फौरन ही नहीं मारा। न ही हमेशा के लिए बीमारियों ने घर किया। आप सोच नहीं सकते कि मुआवजे और संपत्तियों के लिए हम किस तरह की मुसीबतों में पड़ गए। घरों में रिश्ते-नाते सब चकनाचूर हो गए…

किरदारों की यह एक अंतहीन कतार है। सबके पास सुनाने के लिए अपनी कोई न कोई दर्द भरी दास्तान है। सबके ह्दय भरे हुए हैं। जरा सी बात छेडि़ए या किसी के पास बैठकर उसे सुनिए। आसपास से न जाने कितने चेहरे जमा हो जाएंगे। सबके पास अपनी कहानी है। ये वो औरतें हैं, जो अब तक आंदोलनों में शामिल होने वाली भीड़ का हिस्सा रही हैं। अखबारों में छपने वाली तस्वीरों की भीड़। अनाम चेहरे। प्रेमबाई अपनी बात खत्म करे इसके पहले ही एक और चेहरा सामने आ जाता है। यह लक्ष्मीबाई है। करोंद की रहने वाली। नाम की लक्ष्मी है। दौलत की देवी का नाम ही है उसके पास।  वह अपनी आपबीती लेकर सामने आ जाती है। बताती है, ये देखिए गैस  शरीर पर जाने कौन-सा रोग छोड़ गई जो कुष्ठ रोग की तरह दिखाई देता है। गनीमत है हम बच गए थे, लेकिन देह पर यह निशान उभर आए। इसके बाद पति ने भी छोड़ दिया।  यह तो गैस का असर नहीं था। यह कैसे रिश्ते हैं? मैं दो दिसंबर की शाम तक यह सोच भी नहीं सकती थी कि मेरे पति कभी मुझे छोड़ देंगे। हम मिलजुलकर   रहते थे। सुख-दु:ख के साझीदार थे। गैस ने जान से तो नहीं मारा लेकिन इंसानी रिश्तों की परतें इतनी जल्दी छीलकर रख दीं और यह नंगी सच्चाई मेरे हिस्से में भोगने के लिए आई। भोपाल की जो औरतें गैस हादसे में चल बसे अपने पति के लिए रो रही हैं, उन्हें जरा मेरी हालत भी देखनी चाहिए…पचपन साल की आमना बी। कभी संगठन में सबसे आगे चलती थीं। लेकिन शरीर में कैंसर की शक्ल में मौत ने दस्तक दी और अपने साथ ले गई। इन औरतों के हक के लिए 26 साल से लड़ रहे नामदेव आमना को याद करके भावुक हो जातेहैं

कुछ बताने लगते हैं तभी उनका ध्यान पार्क के गेट पर जाता। वो देखिए इमली के नीचे शायद मस्जिद वाली बीबी खड़ी है ! मैंने देखा एक नाजुक सी औरत को। ७५ साल से कम क्या होगी उसकी उम्र। बुरके में थी वह। इमली और बरगद के दो बड़े घने पेड़ इस पार्क में इन औरतों की बातचीत सालों से सुन रहे हैं। हादसे के समय की भागमभाग भी इसी खामोशी से इन्होंने देखी होगी। जिसे नामदेव ने मस्जिद वाली बीबी कहा, वह इन्हीं दरख्तों के नीचे अपने संगठन के साथियों को तलाश रही थी। उनकी तस्वीर लेने के लिए मैं कैमरा खोलती हूं। पर बैटरी जवाब दे गई है। एक पल को मुझे कोफ्त होती है। मैं झुंझला जाती हूं अपनी लापरवाही पर। मुझे यहां आने की जल्दी थी। महीनों से सोचती रही थी इन औरतों के बारे में। इसलिए जब मिलने का वक्त आया तो ख्याल ही नहीं रहा।मैंनें देखा कि मस्जिद वाली बीबी वहीं बरगद के नीचे बैंच पर बैठ गई थीं। प्रेमबाई मुझसे कहती है वहीं चलना पड़ेगा आपको। चार कदम चलकर हम वहां पहुंचे। सामने हैं राशिदा सुल्ताना।  मरहूम अब्दुल मनान की बेसहारा बीबी। मस्जिद के पीछे इमली का पेड़ है। उसी के नीचे एक घर है। राशिदा का आशियाना। इसीलिए उन्हें उनके नाम से नहीं मस्जिद वाली बीबी के नाम से ही पहचाना जाता है। पास आते ही खुश होकर हाथ मिलाती हैं। फिर बताती हैं चेहरे पर आंखों के पास लगी चोट। आंखों से साफ दिखाई नहीं देता। रास्ते के पत्थर से टकराकर गिर गयी थी। कहती हैं, दवाइयों ने पीछा पकड़ लिया था, अब मैंने ही दवाई लेना छोड़ दिया है। कितना खाती?

मैं बाहर से मिलने आई हूं। इसका रशिदा को ख्याल है। वे शिष्टाचार निभाने का ख्याल नहीं भूलतीं। आसपास किसी को देखती हंै। चाय लेने का हुक्म देती हैं। मैं उनसे अदब से मना करती हूं। चाय की क्या जरूरत है? आपके साथ थोड़ा वक्त गुजार लूं।  आप कुछ बता दें। मेरे लिए आज इतना ही काफी है। चाय फिर कभी। लेकिन वे मानी नहीं। उनके लिए यह तहजीब का तकाजा था। चाय मंगाकर ही दम ली।  अब हमारे बीच एक मीठा रिश्ता बन गया था। हम काफी देर तक गुफ्तगू करते रहे। वे सुनाती रहीं। मैं सुनती रही। नोट्स लेती रही। अखबारों में अब तक इन बेसहारा औरतों की तस्वीरें देखी थीं। एक तस्वीर में अनगिनत चेहरे। लेकिन इनकी तस्वीरें अलग-अलग थीं। जितने चेहरे उतनी तस्वीरें। हर चेहरे की कई तस्वीरें। दर्द की परछाइयां। अपनों के खोने, रिश्तों के तार-तार होने, मुआवजे के लिए भटकने के अंतहीन किस्से। ये औरतें चलती-फिरती सजा से कम नहीं बची थीं। उस दिन घर लौटते हुए यही ख्याल दिलो-दिमाग में घूम रहा था कि इनके इस हालात के लिए कौन जिम्मेदार है?अब मुझे अगले गुरुवार का इंतजार था। एक-एक दिन इंतजार के बाद वह आ ही गया। बालकृष्ण बोले कि आज आप थोड़ा सा लेट हो गईं, वो अभी-अभी चली गईं।‘कौन?’

शांतिनगर में गांधीनगर स्कूल के पास रहती हैं भूरिया बाई। वहीं से आई थीं। गले का कैंसर है और इलाज को तरस रही हैं। भोपाल में गैस पीडि़तों के लिए ३३ चिकित्सा केन्द्र स्थापित किए गए। फिर इलाज के लिए तरसने का मतलब मेरी समझ में नहीं आया। मुझे मालूम था कि इस समय ६ चिकित्सालय, ९ डे-केयर यूनिट कार्यरत हैं। इसके अतिरिक्त देशी चिकित्सा पद्धति के अन्तर्गत आयुर्वेद, होम्योपैथी एवं यूनानी के तीन-तीन कुल नौ औषधालय भी हैं। भोपाल मेमोरियल हॉस्पिटल ट्रस्ट का एक मुख्य चिकित्सालय और इसकी ८ मिनी यूनिट, गैस पीडि़तों के लिए संचालित हैं। गैस राहत चिकित्सालयों में हर रोज करबी साढ़े तीन हजार मरीज आते हैं। गैस पीड़ितों की जांच एवं उपचार मुफ्त। फिर भूरिया बाई इलाज के लिए क्यों तरस रही है? वहां मौजूद संगठन के एक कार्यकर्ता ने आंकड़े और असलियत में अंतर को साफ करते हुए बताया कि आपकी जानकारी सरकारी आंकड़ों सहित एकदम सही है, पर समस्या यह है कि वहां वे लोग इलाज कराने आते हैं जो असल में गैस पीडि़त नहीं हैं। दवाइयों का तो सरकारी दवाखानों में सदा टोटा ही रहता है। उस पर ओ.पी.डी. चालू कर देने से सामान्य मरीजों को ही फायदा हुआ है। आप कभी गई हैं वहां? उन्होंने प्रश्न किया।‘नहीं।’
तो फिर आपको समझना होगा कि एक शानदार इमारत, आधुनिक और महंगी मशीनों के बावजूद गैस पीडि़तों के इलाज  के ऐसे हाल क्यों हैं? दवाइयां कई बार नहीं मिलतीं। ज्यादातर बाहर से ही लानी होती हैं। पांच रुपए की पर्ची बनवानी पड़ती है? एक लम्बी प्रक्रिया है। सब कुछ उतना आसान नहीं है, जितना दूर से दिखता  है।

आंकड़े बताते हैं कि केंद्र सरकार द्वारा चिकित्सा पुनर्वास हेतु प्रथम कार्ययोजना में १५०.३५ करोड़ रुपए मंजूर किए गए थे। अक्टूबर २०१० तक ४.२४ करोड़ रुपए खर्च भी हुए। २७३.७८ करोड़ रुपए राज्य सरकार ने किए। नई नीति के अनुसार अक्टूबर  २०१० तक कुल २३५ मरीजों को जवाहरलाल नेहरू कैंसर हॉस्पिटल में इलाज के लिए भेजा गया है। अब तक कुल दो हजार ६२८ गैस पीडि़त कैंसर मरीजों को इलाज के लिए इस अस्पताल में रैफर किया गया है। १४.७८ रुपए का भुगतान कैंसर चिकित्सा के लिए किए जाने के बावजूद भूरिया बाई के हाल ये थे। ऐसी न जाने कितनी औरतों को यह जिल्लत भोगनी पड़ रही थी। ऐसा क्यों है?एक औरत सहमकर कहती हैं, सुविधाओं का फायदा संपन्न तबके के लोगों ने लिया है। आम आदमी तो लम्बी लाइन में पर्ची कटवाने में ही लस्त-पस्त होकर लौट जाता है या लौटा दिया जाता है। आप समझ रही हैं ना मैं क्या कहना चाहती हूं? समस्या एक हो तो बताएं आपको, यहां तो हर रोज एक नई समस्या सामने आती है। सामाजिक सुरक्षा पेंशन को ही ले लो।‘क्यों उसमें क्या गड़बड़ है?’आपको पता है १९८४ तक वह सिर्फ साठ रुपए थी, हम तब से लड़ रहे हैं। नामदेव बताते हैं कि उन्होंने एक नारा दिया था, ‘साठ नहीं, डेढ़ सौ दो, भीख नहीं, पेंशन दो’, वे कहते हैं फार्म भरने की प्रक्रिया ही इतनी जटिल थी कि ये अनपढ़ निराश्रित महिलाएं क्या आवदेन कर सकती हैं!

फार्म पर १२५० स्थित जेपी अस्पताल में डॉक्टर से दस्तखत कराना होते थे और डॉक्टर के पास फीस लेकर इलाज का तो समय नहीं है। वहां गरीबों के फार्म पर दस्तखत आसान काम लगता है आपको? आपको पता है सामाजिक सुरक्षा पेंशन अब एकीकृत वृद्धावस्था पेंशन है, जो १५० रुपए के लगभग मिलती है। इसे लेने में हजार पापड़ बेलने पड़ते हैं। इसका नाम सुरक्षा नहीं, समस्या पेंशन होना चाहिए।  नामदेव बेहद संयत और शांत प्रकृति के इंसान हैं, लेकिन बदइंतजामी पर बोलते हुए वे गुस्से को अपने चेहरे पर आने से रोक नहीं पाते। वे बताते हैं, २६ साल गुजर गए हादसे को। एक पीढ़ी बीत जाती है इतने वालों में। कितने लोग मर खप गए यहां मुआवजा और पेंशन मांगते-मांगते।एक महिला ने बताया कि कोई डॉ. अमर डूमर सिंह तोमर ४८ साल की उम्र में डॉक्टर होकर भी जिंदा नहीं रह पाए। उनकी दोनों किडनी खराब हो गई थीं गैस के असर से। फिर आम मरीजों की कल्पना ही कर लीजिए।एक और चेहरा उभरता है। रामकली बाई। उम्र पचपन साल।  पैरों में सूजन रहती है, सिर चकराता है। यह रोना हमेशा का है। वह बताती है, गैस ने उसके पति का लीवर खराब कर दिया था, वे नहीं बचे। मुआवजे के पैसों से इलाज हुआ और बेटों की शादी भी। अब उन्हें दवाई की दिक्कत है। कार्ड गुम हो गया है। पर्चा बनवाने में पाँच रुपये लगते हैं और ऊपर से दवाई भी बाहर से ही लाइए। कार्ड नया बने तो शायद कुछ हो।

रामकली के पास ही है एक और लक्ष्मीबाई, जिन्हें सब गहना भाभी बुलाते हैं। 65 साल की लक्ष्मी बताती हैं, उस रात बाजू वाले घर में राम प्रसाद की बेटी की बारात आई थी। भांवरें पड़ रही थीं। आधे फेरों में अचानक सबका जी मचलाने लगा। थोड़ी ही देर में हाल बुरे हो गए। दूल्हा-दुल्हन भी हाथ पकड़ कर भागने लगे। सडक़ का यह हाल था कि उस पर कंकड-पत्थर की तरह लाशें पड़ी थी। स्कूटर, सायकल, सामान, मवेशी..जिसके साथ जो था भागते हुए या गिरते हुए सडक़ पर ही छूट गया। किसी को घर, जायदाद, रुपया-पैसा, गहनों की चिन्ता नहीं थी। कई लोग सोते बच्चे छोडक़र भाग रहे थे। मौत की दस्तक घर-घर के दरवाजे पर थी। कहीं वह गैस का बादल बन कर उतरी तो कहीं सफेद जहरीला धुंआ बन कर। किसी को उबली बन्द गोभी की तीखी गंध लगी तो किसी को ताजी कटी घास की पर असर उसका जलती लाल मिर्च जैसा था। आंखों को जला देने वाला। भागते-भागते लोग सार्वजनिक नल खोल कर पानी के नीचे जमीन पर लोट रहे थे। छटपटा रहे थे। दिसम्बर की सर्द रात और शरीर के भीतर आग लगी हुई थी, जहर भरे धुएं के साथ।  लक्ष्मी पूछती है कि कहां हैं वे भविष्यवक्ता, जो सबका अलग-अलग भाग्य बांचते फिरते हैं…कोई बताये कि उस दिन उन सबकी राशियां और ग्रह दशाएं क्या एक जैसी ही थीं? इतनी शादियां थीं शहर में। हर गली में रात शहनाइयां बज रहीं थीं, जो मातम की खामोशियों में बदल गईं। क्या कुण्डलियों के मिलान करने वालों ने कुण्डलियां सही मिलाई थीं? कहां थे भाग्य के शनि-मंगल? क्या सब धरती पर उतर आए थे? अगर सितारे हमारे तकदीर के फैसले करते हैं तो उस रात पूरे

भोपाल के सितारे गर्दिश में थे। ज्योतिषियों को वॉरेन एंडरसन की कुण्डली भी देखना चाहिए और हमारे नेता-अफसरों की भी। क्या वे सब राजयोग लिखाकर लाए हैं? हमने क्या पाप किए थे, जो यह फल भोगे?  लक्ष्मी के पास तमाम सवाल हैं। वह रोकर अपनी बात नहीं कहती। तैश में आ जाती है। उसकी मुट्ठियां भिंच जाती हैं। आंखों से आग सी बरसने लगती है। वह सिर्फ यह जानना चाहती है कि उसका कुसूर क्या था, जो अपनी आंखों के सामने अपनी दुनिया उजड़ती देखी…
भोपाल के कवि राजेंद्र अनुरागी की पंक्तियां हैं-
एक और… एक और…
वे खरीदार हैं, थैली फुलाने वाले
और यह हालात हैं
हम सबको रुलाने वाले
कराहती पड़ी है यह
बूढी़ बीसवीं सदी
घाव सी कसकती है
भोपाल गैस त्रासदी

जेपी नगर कार्बाइड के एकदम सामने ही है, वह बस्ती जहां गैस ने सबसे ज्यादा कहर बरपाया था। उस रात यह मौत के मुहाने पर थी। गैस में मरने वाले अभागे सबसे ज्यादा इसी और इससे सटी दूसरी बस्तियों से ताल्लुक रखते हैं। बरबादी के सबसे पहले और सबसे ज्यादा हकदारों की बस्ती। ऐसा शायद ही कोई घर हो, जहां गैस से बीमार कोई न कोई न मिले।  एक दो नहीं सैकड़ों लोग गैस जनित बीमारियों से पीडि़त हैं। इनमें कुछ की उम्र तो पांच से २५ साल तक है यानी घटना के बाद पैदा हुए बच्चों को बीमारी विरासत में मिली। इनकी और इन्हें जन्म देने वाली महिलाओं की अजीब सी दिक्कत यह है कि कोई भी सरकारी फार्मूला इन्हें गैस पीडि़त मानने को तैयार नहीं है। मुआवजा तो बहुत दूर, दवाई तक के लिए पैसे नहीं मिलते। कैंसर पीडि़त  ६५ वर्षीय बाबू खां की बेटी सुरैया को दमा है। उनकी १६ वर्षीय नातिन गुलफशा को पेट की गंभीर बीमारी है। सुरैया बताती हैं, दस साल का अरबाज विक्षिप्त है। यहीं के बलराम और लीलाबाई का २३ वर्षीय बेटा जगदीश शारीरिक विकास रुकने की वजह से दस साल से ज्यादा का नहीं दिखता। लीला बाई की शादीशुदा बेटी गैस प्रभावित थी।

राजकुमारी के फेंफड़े खराब हुए। वह अंतत: मर गई। पचास वर्षीय रशीदा बेगम के पैरों में सूजन स्थाई घर बना चुकी है। पैर सुन्न हो जाते हैं। पर जिन्दगी उन्हीं के सहारे घिसट रही है। प्रमिला का दर्द यह है कि बीमारी ने उसका सुसराल से नाता ही तोड़ दिया है। वह जब करीब दस साल की थी तब हादसा हुआ था। प्रमिला ने भी अपने लोगों को खोया था। वक्त गुजरने के साथ प्रमिला पर भी बीमारी ने अपना असर दिखाया। इसके बावजूद वह जब १८ वर्ष की उम्र पार कर गई तो उसका विवाह हो गया। पति सरकारी कर्मचारी था और जिन्दगी पटरी पर चलती मालूम चलने लगी।  पर बढ़ती खांसी और आंखों की कम होती रोशनी के कारण बार-बार इलाज कराना पड़ता। इलाज पर होने वाला खर्च ससुराल वालों को खटकने लगा। उसे परेशान करने का एक  सिलसिला अनायास शुरू हो गया। वह घर के लोगों को खर्चीली साबित होने लगी। अब गुजारा मुश्किल था।  रात दिन  ताने सुन-सुन कर वह दुखी थी ही और आखिर में उसे इलाज के नाम पर मायके भेज दिया गया। तब से आज तक वह मायके में ही है। किसी ने आकर हाल पूछने की जहमत भी उसके बाद नहीं की। वह पूछती है
कि सरकारी बदइंतजामी को कोसना आसान है, लेकिन इन रिश्तों में इंसानियत को मैं जाकर तलाश करूं?
जन्म लेते ही थमी सांसें सफेद बाल। दुबली-पतली देह। लेकिन नाम है-शोभा। हादसे से जुड़े किसी भी सवाल पर

आज भी सदमे की हालत में पहुंच जाती हैं। गैस कांड के समय छोला मंदिर के पीछे शोभा का परिवार रहता था। तब उन्हें सात महीने का गर्भ था और पूरा घर आने वाले मेहमान की तैयारी में जुटा था। अचानक हादसे की चपेट में आने के बाद शोभा की हालत दिन-ब-दिन बिगडऩे लगी। हादसे के तीन महीने बाद एक दिन के अंतराल से जुडवां बेटों का जन्म हुआ, लेकिन दोनों ही बीमारियों की चपेट में आ गए थे। दोनों जन्म के तुरंत बाद ही चल बसे। सदमे से शोभा आज तक नहीं निकल पाईं। सांस की बीमारी ने इतना कमजोर कर दिया है कि ज्यादा दूर तक चल भी नहीं सकतीं। उसे मुआवजे के लिए तमाम मेडिकल जांचों के साथ मामला पेश होने पर सब कुछ मिलाकर महज एक लाख रुपए मिले। इलाज के अलावा काम नहीं कर पाने और जर्जर आर्थिक स्थिति के कारण परेशान शोभा को इतने साल बाद अब कोई उम्मीद नहीं बची है। सवालिया लहजे में वह कहती हैं कि अब बची-खुची ङ्क्षजदगी किस बूते काटूं, बुढ़़ापे के सहारे तो पैदा होते ही छिन गए। अदालत कहती है कि अगर दुर्घटना दोनों बेटे नहीं बचे तो इसकी एवज में हम क्या करें?

इन्हीं दिनों केन्द्र सरकार द्वारा गठित मंत्री समूह ने करीब ४८ हजार पीडि़तों को अतिरिक्त मुआवजा देने की घोषणा की है, लेकिन उसने ५ लाख २१ हजार गैस पीडि़तों को मुआवजे से वंचित कर दिया, जो त्रासदी के बाद स्थाई या अस्थाई रूप से विकलांग हुए थे। फेफड़ों और पेट संबंधी बीमारियों, आंखों की रोशनी पूरी तरह चली जाना और न्यूरोलॉजीकल या साइकेट्रिक समस्याओं से बेजार लोगों को सरकार ने अपने हाल पर छोड़ दिया है। सरकार का यह फरमान पीडि़तों के लिए एक और हादसे से कम नहीं है। ऐसे हजारों गैस पीडि़त हैं, जिन्हें पहले सामान्य श्रेणी में २५ हजार रुपए मुआवजा मिला, लेकिन बाद में वह घातक बीमारियों के शिकार हो गए। आईसीएमआर और कई रिसर्च एजेंसियों की रिपोर्ट बताती हैं कि एक लाख से ज्यादा गैस मरीजों को लगातार निगरानी और उपचार की आवश्यकता है, लेकिन उन्हें केन्द्र सरकार ने मुआवजे के रूप में कोई राहत नहीं दी है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि कुल गैस पीडि़तों में से २० से २५ प्रतिशत न्यूरोलॉजीकल डिसऑर्डर के शिकार हैं। सेंटर फार रिहेबिलीटेशन स्टडीज की रिपोर्ट बताती है कि गैस पीडि़तों में श्वसन, नेत्र, पेट रोग और सामान्य बीमारियों की दर अप्रभावित लोगों के मुकाबले ४ से ५ गुना ज्यादा है। केन्द्र सरकार द्वारा गठित मंत्री समूह ने इन रिपोट्र्स पर ध्यान दिए बिना मुआवजे की राशि और मुआवजे की श्रेणियां घोषित कर दीं। मंत्री समूह ने १९८७ के आंकड़ों के हिसाब से मुआवजे की घोषणा की है, जबकि तब से लेकर अब तक मरीजों की तादाद तीन गुना बढ़ गई है।

हशमत बी को ही लीजिए। उसे सामान्य श्रेणी का मुआवजा २५ हजार रुपए मिला था, लेकिन बाद में वह गैस जनित कई बीमारियों में जकड़ गईं। उनकी आंखों की रोशनी अब पूरी तरह जा चुकी है। उनके अंधियारे जीवन में सरकारी फैसलों ने अंधेरे को और गहरा दिया है। बीबी जान को पहले तो कोई समस्या नहीं थी, लेकिन बाद में वह और उनके पति दोनों टीबी के मरीज बन गए। चांदबड़ निवासी रफीया ने जन्मजात विकृत बच्ची को जन्म दिया। काफी इलाज कराने के बावजूद वह बच नहीं पाई। रफीया को भी २५ हजार रुपए ही मिले। महामाई का बाग निवासी साजिदा बी को उस समय सामान्य श्रेणी में २५ हजार रुपए मुआवजा मिला, लेकिन वक्त बीता तो वह कई बीमारियां उभर आईं। अब उनसे जूझ रही हैं। उन्हें पथरी है, जिसका ऑपरेशन उन्होंने हाल ही में कराया है।  पसलियों में पानी भर जाने की समस्या से लड़ते हुए सालों गुजर गए। पति भी बीमार। मौत से बदतर जिंदगी जी रहे इन लोगों को कोई राहत नहीं है !यादगारे शाहजहांनी पार्क  सुल्तानिया अस्पताल के ठीक सामने यादगारे शाहजहांनी पार्क। यहां गैस पीडि़तों की आवाज हादसे के बाद से ही लगातार गूंज रही है। यह अनगिनत आंदोलनों का गवाह है। जब मैं कई सालों से यहां आती रही औरतों से मिलने पहुंची तब होली के दिन थे। पार्क में चारों तरफ बैनर लगे हुए थे। माइक पर एक महिला अपने हकों के लिए अपना और अपने संगठन का पक्ष रख रही थी। बड़ी तादाद में गैस पीड़ित एकत्र थे। मुझे लग रहा था कि होली जैसे त्योहार के वक्त कौन आएगा वहां? लेकिन जो लोग यहां जमा हुए थे, उनके लिए त्योहारों की अहमियत सालों पहले खत्म हो चुकी थी।

हर शनिवार की दोपहर बारह बजे ये यहीं एकत्र होते रहे हैं। कोई भी मौसम हो, त्योहार हो, कोई फर्क नहीं पड़ता। सभा समाप्त होते ही मैं उन औरतों तक पहुंची, जो न जाने शहर के किस-किस कोने से यहां आई थीं। जैसा छोला रोड पर फूटा मकबरा की रहने वाली नजबून बी। चलना-फिरना तक मुहाल है।  गैस ने पैरों में गठानें पैदा कर दीं। अब वे गठानें बड़ी हो गई हैं। शौहर आठ साल पहले करोंद अस्पताल में बीमारियों से लड़ते-लड़ते चल बसे। नजबून बी का एक बेटा है। वह भी हार्ट पेशेंट है। हादसे के बाद जिंदगी की हर सुबह-शाम घर और अस्पताल के बीच ही कटती रही है। लाचारी से कहती हैं, इससे तो वे लोग ठीक थे, जो हादसे की रात मर गए। कम से कम रोज-रोज की इस जिल्लत भरी जिंदगी से तो बच गए। यह मौत से बदतर है।
टीला जमालपुरा की एक और औरत।  हादसे के वक्त उसकी शादी हो चुकी थी। एक बेटा था तब। अब तीन बच्चे हैं। उम्र पैंतालिस साल है। गले और पेट में स्थाई छाले गैस के सबूत हैं। आंखों से भी पानी आता रहता है, जिसका आपरेशन हो चुका है। ये इलाज नाकाफी साबित हुए, क्योंकि आंखों से पानी का बहना बंद नहीं हुआ…   शमशाद बेगम जे.पी. नगर की हैं। गली नम्बर तीन, मकान नम्बर ८५/१। मौत का मंजर सबसे करीब से देखने वाले लोगों में वे भी हैं। उस रात के बारे में सोचकर आज भी आंखों में अंधेरा छा जाता है। पांच साल का मेरा बेटा उसी रात खोया था। दोजख जैसी जिंदगी जीते-जीते सात साल पहले शौहर भी चल बसे। नेहरू चिकित्सालय में इलाज चलता रहा उनका…

पुतलीघर के पीछे शाहजहांनाबाद की सईसा बी के पति और दो बच्चे हादसे के शिकार हुए। दोनों का आठ माह तक इलाज चलता रहा पर बेटे के दिमाग का संतुलन बिगड़ा हुआ है। कमाने वाले दोनों हाथ लाचार हो गए। ब्लूकार्ड है। राशनपानी का नाममात्र का जरिया…  जहांगीराबाद की रईसा बी। बरगद के नीचे ओटले पर बैठी थी। गैस ने इस औरत की आंखों की रोशनी मंद कर दी और सांसों को बेदम कर दिया। सुबह के उजाले में भी सुई नहीं दिखती। हादसे से पहले सिलाई करते थकती नहीं थी पर हाथों का यह काम तो जाता ही रहा। इलाज और दवाएं मुफ्त में मिलती रहीं हैं। धीरे-धीरे जिंदगी इसी के लिए बची रह गई कि अस्पताल जाना है। जांच करानी है। दवा लाना है।  सिर्फ 25 हजार रुपए पल्ले पड़े थे। उम्र के इस मोड़ पर पेंशन का इंतजार है..बिरजिश खातून। हादसे के वक्त 45 साल की थीं। अब ७१ की हैं। उम्र के इस फासले में दो बार दिल का दौरा पड़ा। शरीर के सारे जोड़ दुखते हैं। गुर्दे में गैस का असर ज्यादा हुआ था। वे हमेशा के लिए संक्रमित हो गए। गैस के तरह-तरह के असर दिखाई देते हैं। बिरजिश की जीभ आधी पतली, आधी मोटी हो गई। गला  इतना खराब रहता है कि पानी की घूंट भी रुक-रुककर पेट तक जाती है। बीमारियों का जखीरा सिर्फ उनके ही हिस्से में नहीं आया। शौहर मोहम्मद को कैंसर हुआ और बेटे को टी.बी.। दोनों इन घातक बीमारियों के कारण मारे गए। इस हाल में ये 26 साल बिताए हैं। इनके बारे में बताते हुए आज भी गश आ जाता है…

रानी राजपूत, टीला जमालपुरा की रहने वाली हैं। वे और उनके परिजन भागे नहीं थे उस रात। घर को बंद करके एक कमरे में बन्द हो गए थे। गैस के असर में आए ससुर की मृत्यु हो गई है। एक साथी राधा शर्मा की तब शादी हुई थी और छ: माह का बेटा था। गैस से बचने के लिए वे जरूर कहीं चले गए थे। इस बीच जो गैस लगी उसका नतीजा बीमारियों की शक्ल में सामने आया। हफिजा बी…कनीजा बी…कुरैशा बी…एक के बाद एक कई चेहरे। परदे के ये किरदार अपनी कहानियों से परदा उठाते गए। दिल दहलाने वाले किस्से।तार-तार हुए रिश्ते ! एक हिंदू औरत मिली। नाम नहीं दे रही हूं। कुछ भी हो सकता है। लीला या कला। क्या फर्क पड़ता है? इस औरत की मानसिक स्थिति इस कदर बिगड़ी कि वह आज भी खुद को पागल ही कहती है। इनके इलाज के लिए भोपाल में जगह नहीं थी। मानसिक संतुलन बिगड़ा तो ग्वालियर भेजा था समाज के लोगों ने। जब इलाज पूरा हो गया तो वापस आ गईं। गैस रिसी तब  बारह वर्ष की थी। भाई के साथ रहती थी। भाई भी पच्चीस एक साल का होगा तब।  पिता बचपन में ही गुजर गए थे। कुछ सालों बाद मां भी चली गईं। तब भाई का ही सहारा था। उस रात भाई गैस का शिकार हो गया। कहती हैं कि मेरा भाई अपनी जान की परवाह किए बगैर ढूंढता रहा मुझे और उसी रात मर गया। भाई के नाम पर मकान मिला और कुल दस लाख का मुआवजा भी। भावुक होकर कहती हैं कि मेरे भाई ने मेरे पालनपोषण के लिए शादी तक नहीं की थी। वह मां-पिता दोनों की भूमिका में था। तब भी और मरने के बाद भी उसी के नाम पर जिंदा रहने लायक रह पाई हूं।

भाई के गुजरने के बाद समाज के शुभचिंतकों ने एक फौजी से सात फेरे कराए। एक बेटा भी हुआ जो आर्मी के बोर्डिंग स्कूल में है। पति भी है और बेटा भी है पर भाग्य में सुख नहीं था। गैस का असर दिमाग पर हुआ था। अक्सर दौरे पड़ते थे। शरीर बेजान था। खून की कमी थी। वजन बढ़ता नहीं था। इस हाल में पति ने भी नजरें फेर लीं। उनकी अपनी जरूरतें थीं। एक दिन मैंने एक औरत के साथ उन्हें घर में देखा। मैं काबू में नहीं रह पाई। मेरे भाई के नाम पर मिली मुआवजे की रकम पति ने उड़ाई। वह औरत भी गैस पीडि़तों में थी। उसे पैसे चाहिए थे। जब पति ने सब पैसे उड़ा दिए तो उस औरत ने भी आंखेें फेर लीं। यह सब मैं देखती-भोगती रही। लेकिन मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं। जब मैं ग्वालियर के अस्पताल से लंबे इलाज के बाद लौटी तो देखा कि पति ने दूसरी लडक़ी से शादी कर ली। वे भोपाल छोडक़र चले गए। अब उनका अलग परिवार है। उनके दूसरी पत्नी से भी दो बच्चे हैंै। मैं किराए के मकान में रह रही हूं अकेली। एक डॉक्टर के घर खाना बनाकर गुजारा चलता है। गनीमत यह रही कि मुआवजे की बड़ी रकम आठ लाख रुपए अब मिली। इसी से एक घर खरीद लिया। सेहत बिल्कुल ठीक नहीं। यह औरत हिम्मत से कहती है कि मेरी कहानी पूरी लिखना। काट-छांट मत करना। ताकि दुनिया को यह पता चले कि गैस से लोग मरे ही नहीं, न ही बीमार पड़े, हम जैसों की जिंदगी में हालात ऐसे बने कि रिश्ते तार-तार हो गए, सब कुछ बरबाद ही बरबाद होता गया।

सब कुछ उजड़ते देखा

सुमन कहती है मेरी आंखों में दिल दहला देने वाले वे दृश्य हमेशा के लिए ठहर गए हैं, ऐसे दृश्य हैं वे जो आंखें बंद करती हूं तो दिखाई देते हैं और आंखें खोलती हूं तो याद आ जाते हैं। सारे के सारे चेहरे इतने सालों बाद भी मेरे जेहन में ज्यों के त्यों हैं। होंगे भी क्यों नहीं? वह मेरा बचपन था और बचपन का हर दृश्य अपने मां-बाप और भाई बहनों से जुड़ा होता है, उनके सुख-दुख सब साझा होते हैं। स्वार्थ से परे का जीवन होता है बचपन, तब मैं सात साल की थी। तीसरी में पढ़ती थी। कैंची छोला में था घर हमारा। वह घर जहां मैं अपने माता-पिता, और तीन भाईयों की अकेली बहन लाड़-प्यार से रहती थी। भाई तीनों मुझसे छोटे उनकीउम्र क्रमश: ड़ेढ साल, तीन साल और पांच साल थी। मां गर्भवती थी। मेरे पिता नाथूराम कुशवाह रेलवे में ड्रायवर थे! बदकिस्मती ही थी कि वे उस दिन ट्रेन की ड्यूटी पर नहीं गए थे और उस रात मेरे बचपन ने एक नई अंधेरी गली देखी। एक भयावह दृश्य था, हम सब उनींदे से उठकर रेलवे स्टेशन की तरफ भागे। भीड़ उसी तरफ भाग रही थी।पर अगली सुबह सात बजे माँ ने दम तोड़ा, दस बजे भाई ने और दूसरे दिन पिता ने भी। सात साल की एक बच्ची और दो नन्हें भाई? आज भी सिर्फ जिक्र करने भर से आंसुओं की धाराएं बहने लगती हैं।                  

शिवनगर की एक पतली गली में रहने वाली सुमन कुशवाह का दर्द है यह। आज उनके पास पक्का मकान है परवाह करने वाला पति है और हंसती खेलती दो बेटियां हैं। घर में जरूरत का सब सामान है। एक व्यवस्थित गृहस्थी। सुमन कहती है यूं तो सब सामान्य है पर मेरे भीतर जो सन्नाटा विगत २६ सालों से सांय-सांय करता है, उसका अन्दाजा बाहर कोई नहीं लगा सकता। गैस ने शरीर पर और परिजनों की मौत ने मन पर इतना असर डाला है कि सरदर्द से परेशान रहती हूं। यहां तक कि बालों को तक बांध नहीं सकती। बुआ ललिताबाई ने ही तब से लेकर आज तक मां-बाप बन कर पाला पोसा। बी. ए. तक पढ़ाया और स्कूल टीचर चन्द्रकिशोर कुशवाह के संग सात फेरे हो गए। लेकिन मां-बाप और भाई-बहनों के लाचार चेहरे अब भी आंखों में कौंधते हैं। काश यह सब न हुआ होता! ऐसा भी हुआ उस रातमनोहर लाल अंतिम संस्कार का सामान बेचते हैं। वे उस दिन सुबह आठ बजे तक दुकान पहुंचे ही थे लोगों की कतार लग गई। क्या हिन्दू और क्या मुसलमान। इस शख्स ने अपना कारोबार बेहतर चलाने के लिए ऐसी दुआएं कभी ईश्वर से मांगी थीं। उस दिन एक औरत आई, जिसकी आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे।  उसका इकलौता बेटा गैस से मारा गया था।  बेटे ने अपने होने का फर्ज निभाया था।  

जब गैस रिसी तो बेटे ने मां को बचाने के लिए कपड़ों से ढक दिया और खुद ढेर से लिपटकर बैठ गया। गैस उसे लगती रही। आखिरी सांस तक भी वह अपनी मां की जान बचाने के लिए ही जिंदा रहा। फिर दम तोड़ दिया। वह रात बीत चुकी थी और वह औरत सुबह अपने उसी बेटे के लिए कफन मांग रही थी। दर्द कहीं कम नहीं शायद डॉक्टर भी सालों से पीडि़तों को देखते-देखते तंग आ गए हैं। अस्पतालों के चक्कर लगा रही औरतें कहती हैं कि संवेदनहीन ही है कि डॉक्टर अब पीडि़तों को देखते तक नहीं हैं। बेमन से टरका देते हैं। हादसे के वक्त नौ साल की थी रानी यादव। पांच भाई-बहन थे। सबसे छोटी बहन जो एक साल नौ माह की थी उसी वक्त मर गई। जे.पी. नगर गली नम्बर दस में रहते थे। आज भी वहीं हैं। त्रासदी के तेरह साल बाद रानी की शादी हो गई। गैस पीडि़त गरीब लडक़ी की गाँव के किसी मंद बुद्धि लडक़े से शादी हुई। पर रानी की किस्मत ही खराब थी कि वह भी पिछले कई सालों से गायब है। कोई नहीं जानता कहां चला गया। इसलिए मां-बाप के घर में ही रहती है। भाई के दो बच्चे हुए, दोनों विकलांग हैं। भाभी भी गैस पीडि़त है। दवाई के बगैर चार कदम नहीं चल सकती। छोटी बहन के बच्चे के हार्ट में छेद है। दो बच्चे हैं जिन्हें रोज ही ‘फिट’ (मिर्गी) आते हैं। रानी कहती है, बीमारियां हमारे चारों तरफ पसरी हुई हैं। यह एक अंतहीन संघर्ष है। सिवाय बीमारियों के हमारे घरों में बातचीत का कोई दूसरा विषय ही नहीं बचा। सरकारी दवाखाने को लेकर रानी का गुस्सा सातवें आसमान पर  है। वह कहती हैं कि डॉक्टर नजर उठाकर देखता भी नहीं है।

एक वरिष्ठ डॉक्टर ने बताया कि हर मरीज अपने लिए खास तवज्जो चाहता है। हमारे पास दिन भर मरीजों की कतारें रहती हैं। यह सिलसिला थोड़े समय का नहीं है। ढाई दशक से ज्यादा वक्त गुजर गया। यह रोज का काम है। साधन और समय सीमित है। स्टाफ भी इनकी तादाद के आगे नाकाफी है। ऐसे में संवेदनहीन होने का आरोप गलत है। हमारी मजबूरियां भी देखिए। हमें सिर्फ दो चार मरीजों को ही नहीं देखना है। दिन भर अंतहीन कतारें हैं। रानी मुझे ङ्क्षचगारी ट्रस्ट के म्यूजियम में ले जाती है। वह पांच साल से ट्रस्ट से जुड़ी है। इस म्युजियम में हादसे के शिकार हुए लोगों की निशानियां सहेज कर रखी गई हैं। किसी बच्चे के गरम कपड़े, किसी की शादी का जोड़ा, किसी का चश्मा तो किसी बच्चे की सायकल। एक सिलाई मशीन, बच्चों के खिलौने हैं, चप्पलें हैं। यादों का एक अजीब सा अजायबघर। कवि प्रो. सरोजकुमार ने लिखा था-
वैसे ही नहीं रही जिन्दगी कभी निरापद।
अब तो व्यवस्थाओं से डर लगता है।
शिराओं में बहती है बदबू भरी नदियां
किडनियां सूजी हैं शहर की।
अणुबम की रिहर्सल हो गई भोपाल में!