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बलात्कार-बलात्कार में फर्क होता है साहेब !

पूजा सिंह

पत्रकार. पिछले १० वर्षों में तहलका , शुक्रवार, आई ए एन एस में पत्रकारिता . संपर्क :aboutpooja@gmail.com

महमूद फारूकी को बलात्कार के मामले में हुई सजा कई मायनों में ऐतिहासिक है. यह पहला मौका है जब देश में किसी को ओरल के लिए बलात्कार का दंड मिला है. लेकिन इस एक घटना से कई अन्य सच सामने आये हैं. फिल्म पीपली लाइव के सह-निर्देशक महमूद फारूकी को पिछले दिनों एक अमेरिकी छात्रा के साथ बलात्कार करने के इल्जाम में सात वर्ष कैद की सजा सुनायी गयी. यह मामला कई मायनों में ऐतिहासिक रहा. पहली बात यह कि देश में यह पहला मामला था जब ओरल सेक्स को बलात्कार मानकर सजा सुनायी गयी. दूसरी बात, यह उन अंगुलियों पर गिने जा सकने वाले मामलों में से एक है जहां देश के उस उच्च वर्ग के किसी व्यक्ति को बलात्कार के आरोप में सजा हुई. यह वह वर्ग है जो अन्यथा अपने आप को देश की कानून व्यवस्था से परे मानकर चलता है.

कुछ वर्ष पूर्व वरिष्ठ पत्रकार तरुण तेजपाल द्वारा अपनी एक कनिष्ठ पत्रकार के साथ डिजिटल रेप का मामला चर्चा में आया था जिसकी सुनवायी अभी जारी है. महत्त्वपूर्ण बात यह है कि ये दोनों ही मामले बलात्कार कानून में बदलाव के बाद के हैं. शायद इसके पहले इन्हें पूरी तरह बलात्कार माना ही नहीं जाता. दरअसल दिसंबर 2012 के निर्भया सामूहिक बलात्कार कांड के बाद वर्ष 2013 में बलात्कार संबंधी कानून में बदलाव लाया गया. पहली बार कानून ने यह माना कि स्त्री के संपूर्ण शरीर पर पूरी तरह उसका अधिकार है और उसका किसी भी प्रकार अतिक्रमण करना उसके साथ जबरदस्ती माना जायेगा. हमारे देश में इससे पहले बलात्कार की जो परिभाषा थी उसके तहत केवल वजाइनल रेप को ही मान्यता थी. यानी बलात्कार सिद्ध होने के लिए यह आवश्यक था कि जबरन संभोग किया गया हो.

फारूकी मामले में पीडि़ता की अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर कहती हैं कि इस मामले में फारूकी ने पीडि़ता के साथ जबरन ओरल सेक्स किया. यानी 2013 के पहले की स्थिति में यह बलात्कार नहीं था. विडंबना है कि ऐसी घटनायें कानून में परिभाषित ही नहीं थीं. वहीं तरुण तेजपाल पर लगे आरोप की बात करें तो डिजिटल रेप भी पहले हमारे कानून में अपरिभाषित था. इस मामले में पीडि़ता का आरोप है कि तेजपाल ने उसके निजी अंगों पर अपनी अंगुलियों से हमला किया. नये कानून के तहत इन दोनों तरह की घटनाओं को बलात्कार माना गया है और इसमें उतनी ही सजा होती है जो आमतौर पर फोर्स्ड इंटरकोर्स के मामलों में होती है.  यह बहुत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि देश के विभिन्न हिस्सों में बहुत बड़ी संख्या में ऐसे मामले होते हैं जिन्हें इस कदर गंभीरता से नहीं लिया जाता.

मुझे याद है अपने गांव के पड़ोस के एक परिवार का किस्सा जहां एक सात-आठ साल की बच्ची ने करीब 60 साल के बुजुर्ग पड़ोसी के बारे में अपनी मां को रोते हुए बताया था कि वह जबरदस्ती अपना लिंग उसके हाथ में पकड़ा रहे थे. यह मामला गांव में थोड़ी चीख चिल्लाहट और मारपीट की धमकियों के साथ खत्म हो गया. थानेदार ने बुजुर्ग को सार्वजनिक रूप से दो थप्पड़ मारकर बच्ची से दूर रहने की ताकीद कर दी. आज अगर कोई व्यक्ति ऐसा करता है तो शायद वह बलात्कार की सजा पायेगा. वृंदा ग्रोवर कहती हैं कि उनकी जानकारी में यह देश में पहला मामला है जहां ओरल सेक्स के लिए किसी को बलात्कार की सजा हुई है. वह कहती हैं कि ऐसे अपराध समाज में हमेशा से मौजूद हैं लेकिन अपरिभाषित होने के कारण इनको हल्का अपराध माना जाता था.

फारूकी मामले में पीड़िता की एक बात काबिलेगौर है. उसने अपने बयान में कहा कि वह बलात्कार के दौरान प्रतिरोध इसलिए नहीं कर पायी क्योंकि उसे निर्भया कांड के बाद बनी डाक्युमेंटरी याद आ गयी, जिसमें निर्भया के अपराधी ने कहा था कि अगर वह प्रतिरोध नहीं करती तो उसे जिंदा छोड़ देते. सोशल मीडिया को अगर बेंचमार्क मानें तो फारूकी प्रकरण एक स्पष्ट रेखा खींचता है. बलात्कार के चुनिंदा मामलों पर अन्यथा उबल पड़ने वाला, फेसबुक पर स्टेटस की बाढ़ ला देने वाला मध्य वर्ग इस बार अन्यथा खामोश नजर आया. पालिटिकली करेक्ट होने की कोशिश लोगों ने इस मामले की अनदेखी की. बहुत कम लोग होंगे जिन्होंने सोशल मीडिया पर इस विषय पर अपनी राय रखी हो. गनीमत तो यह है कि किसी ने फारूकी के बचाव का प्रयास नहीं किया.

मथुरा कांड : जब न्याय शर्मिंदा हुआ

मार्च 1972 में महाराष्ट के चंद्रपुर जिले में एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना में मथुरा नामक एक 14 वर्षीय किशोरी के साथ दो पुलिसकर्मियों ने थाने में बलात्कार किया. देश की सबसे बड़ी अदालत ने यह कहकर उनको रिहा कर दिया कि मथुरा सेक्स संबंधों की आदी थी. चूंकि उसके शरीर पर चोट के कोई निशान नहीं थे इसलिए बहुत संभव है उसने ही दोनों पुलिसवालों को यौन संबंध बनाने के लिए उकसाया हो. सन 1974 में आये इस फैसले पर उस वक्त ध्यान नहीं दिया गया. सितंबर 1979 में दिल्ली विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों उपेंद्र बख्शी, लोकिता सरकार व रघुनाथ केलकर तथा पुणे निवासी वसुधा धगंवर ने सुप्रीम कोर्ट को एक खुला खत लिखा. इसके बाद फैसले की समीक्षा करने की मांग शुरू हो गयी. इसकी मीडिया कवरेज के बाद जबरदस्त आक्रोश पैदा हुआ.

इसके बाद अंतत: कानून में परिवर्तन किया गया. एविडेंस एक्ट में परिवर्तन करके यह प्रावधान किया गया कि अगर पीड़िता कहती है कि उसने यौन संबंध की सहमति नहीं दी है तो अदालत द्वारा इस बात को माना जाना चाहिये. इसके अलावा बलात्कार कानूनों में संशोधन कर हिरासत में बलात्कार को परिभाषित किया गया, इसे दंडनीय बनाया गया व दोषमुक्ति सिद्ध करने का दायित्व आरोप लगाने वाले के बजाय आरोपी पर डज्ञल दिया गया. इसके अलावा पीड़ित की पहचान जाहिर न करने, कैमरे के सामने सुनवायी तथा कड़े दंड का प्रावधान भी मथुरा कांड के बाद ही किया गया.

निर्भया कांड के बाद हुए बदलाव

दिल्ली में हुए इस भयंकर कांड के बाद तत्काल एक न्यायिक जांच समिति गठित की गयी. आम जनता ने उसके समक्ष कानून में बदलाव लाने के 80,000 से अधिक सुझाव भेजे. समिति ने अपनी जांच में महिला अपराधों के लिए पुलस व प्रशासन को जिम्मेदार बताया.इसके बाद कानून में कुछ अहम बदलाव किये गये. मसलन बलात्कार के मामलों की सुनवायी के लिए छह नई अदालतें. ईव टीजिंग, एसिड अटैक, पीछा करने, ताक झांक करने आदि को लेकर कड़े कानून बनाये गये. जुवेनाइल कानून में बदलाव करके जघन्य अपराधों के मामले में 16 साल की उम्र के किशोर को वयस्क की तरह सजा देने की बात कही गयी.

मैं अपनी पीढ़ियों में कायम हूँ, मैं इरोम हूँ

कर्मानन्द आर्य

कर्मानन्द आर्य मह्त्वपूर्ण युवा कवि हैं. बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय में हिन्दी पढाते हैं. संपर्क : 88630093492

शर्मिला इरोम के नये निर्णय का स्वागत करते हुए  आइये पढ़ते हैं यह कविता :
( शर्मिला इरोम के लिए जिसने मृत्यु का मतलब जान लिया है)

लड़ रही हूँ की लोगों ने लड़ना बंद कर दिया है
एक सादे समझौते के खिलाफ
कि “क्या फर्क पड़ता है”
मेरी आवाज तेज और बुलंद हुई है इन दिनों
घोड़े की टाप से भी खतरनाक
मुझे जिन्दगी से बहुत प्यार है
मैं मृत्यु की कीमत जानती हूँ
इसलिए लड़ रही हूँ
लड़ रही हूँ की बहुत चालाक है घायल शिकारी
मेरे बच्चों के मुख में मेरा स्तन है
लड़ रही हूँ जब मुझे चारो तरफ से घेर लिया गया है
शिकारी को चाहिए मेरे दांत, मेरे नाख़ून, मेरी अस्थियाँ
मेरे परंपरागत धनुष-बाण
बाजार में सबकी कीमत तय है
मेरी बारूदी मिट्टी भी बेच दी गई है
मुझे मेरे देश में निर्वासन की सजा दी गई है
मैं वतन की तलाश कर रही हूँ
जब मैं फरियाद लिए दिल्ली की सड़को पर घूमती हूँ
तो हमसे पूछा जाता है हमारा देश
और फिर मान लिया जाता है
कि हम
उनकी पहुँच के भीतर हैं
वो जहाँ चाहें झंडें गाड़ दे   हमारी हरी देहों का दोहन  शिकारी को बहुत लुभाता है
कुछ कामुक पुरुषों को दिखती नहीं हमारी टूटी हुई अस्थियाँ
सेना के टापों से हमारी नींद टूट जाती है
उन्होंने हमें रण्डी मान लिया है  उन्हें हमारे कृत्यों से घृणा नहीं होती है
उन्हें भाता है हमारा लिजलिजापन
वह कम प्रतिक्रिया देता है सोचता है मैं हार जाउंगी
घायल शिकारिओं आओ देखो मेरा उन्नत वक्ष
तुम्हारे हौसले से भी ऊँचा और कठोर
तुम मेरा स्तन पीना चाहते थे न  आओ देखो मेरा खून कितना नमकीन और जहरीला है
आओ देखो राख को गर्म रखने वाली रात मेरे भीतर जिन्दा है

आओ देखो ब्रह्मपुत्र कैसे हंसती है
आओ देखो वितस्ता कैसे मेरी रखवाली करती है
देखो हमारे दर्रे से बहने वाली रोसनाई  कितनी लाल और मादक है
क्या सोचते हो मेरा पुनर्जन्म नहीं होगा
मैं अपनी पीढ़ियों में कायम हूँ  मैं इरोम हूँ
इरोम इरोम शर्मिला चानू

महिला संगठनों, आंदोलनों ने महिला आरक्षण बिल को ज़िंदा रखा है : वृंदा कारत: पांचवी क़िस्त

महिला आरक्षण को लेकर संसद के दोनो सदनों में कई बार प्रस्ताव
लाये गये. 1996 से 2016 तक, 20 सालों में महिला आरक्षण बिल पास होना संभव
नहीं हो पाया है. एक बार तो यह राज्यसभा में पास भी हो गया, लेकिन लोकसभा
में नहीं हो सका. सदन के पटल पर बिल की प्रतियां फाड़ी गई, इस या उस प्रकार
से बिल रोका गया. संसद के दोनो सदनों में इस बिल को लेकर हुई बहसों को हम
स्त्रीकाल के पाठकों के लिए क्रमशः प्रकाशित करेंगे. पहली क़िस्त  में
संयुक्त  मोर्चा सरकार  के  द्वारा  1996 में   पहली बार प्रस्तुत  विधेयक
के  दौरान  हुई  बहस . पहली ही  बहस  से  संसद  में  विधेयक  की
प्रतियां  छीने  जाने  , फाड़े  जाने  की  शुरुआत  हो  गई थी . इसके  तुरत
बाद  1997 में  शरद  यादव  ने  ‘कोटा  विद  इन  कोटा’  की   सबसे  खराब
पैरवी  की . उन्होंने  कहा  कि ‘ क्या  आपको  लगता  है  कि ये  पर -कटी ,
बाल -कटी  महिलायें  हमारी  महिलाओं  की  बात  कर  सकेंगी ! ‘ हालांकि
पहली   ही  बार  उमा भारती  ने  इस  स्टैंड  की  बेहतरीन  पैरवी  की  थी.
अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद पूजा सिंह और श्रीप्रकाश ने किया है. 

संपादक

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की सौंवी वर्षगांठ ( 8 मार्च 2010)

 जयंती नटराजन:  महोदय, मैं संविधान (संशोधन) विधेयक का समर्थन करती हूं. महोदय,  मैं इस देश की सभी महिलाओं की तरफ से अपनी बात शुरू करना चाहूंगी, जो इस संसद में न्याय के लिए, आरक्षण के लिए, इस देश के विकास के लिए उठने वाली बराबर की आवाज के लिए 62 से अधिक वर्षों के लिए इंतज़ार कर रही हैं, मैं कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह और पूरे यूपीए को इस ऐतिहासिक कानून को मतदान के लिए लाने के लिए धन्यवाद देना चाहूंगी – जिसे भारतीय जनता को देने का साहस या राजनीतिक इच्छाशक्ति 62 वर्षों में किसी अन्‍य पार्टी में नहीं हुई. महोदय, जो दो मिनट मुझे दिये गये हैं उनमें मैं बताना चाहूंगी कि यह राजीव गांधी के उस सपने का ही एक तार्किक विस्तार है,  जिसके द्वारा स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित थी. जिसके परिणाम स्‍वरूप आज देश के हर गांव में स्थानीय सरकारी निकायों में 10-12 लाख से अधिक महिलाएं मौजूद हैं. 50 लाख से अधिक महिलाओं ने उन सीटों के लिए चुनाव लड़ा है; और गांवों में एक बड़ी संख्या में महिलाएं अब राजनीतिक सत्ता के फल का स्‍वाद ले रही हैं. साथ ही, महोदय, उस समय ऐसे लोग भी थे जो महिलाओं के आरक्षण और उनके द्वारा राजनीतिक अवसरों में साझेदारी के विरोध में खड़े थे. लेकिन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, कांग्रेस अध्यक्ष और प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह हमारे घोषणा पत्र में किये गये वादे को पूरा करने में कभी पीछे नहीं रहे. यह हमारा सत्‍यनिष्‍ठ एवं विधिसम्‍मत वादा था. हालांकि कल भी,  पूरे समय, सदन के भीतर और बाहर, सहकर्मियों ने इस सरकार की प्रतिबद्धता पर संदेह किया और हमारे खिलाफ संगदिल होकर आरोप लगाए. हम सही साबित हुए. हमने इस देश की महिलाओं से किया गया अपना वादा पूरा किया है. महोदय, यह यूपीए का वादा है कि महिलाओं को न्याय मिलेगा और महिलाओं को इस देश के विकास और राजनीतिक अवसरों और राजनीतिक निर्णय लेने में हिस्‍सेदारी मिलेगी. महोदय, मैं यह कहना चाहूंगी. श्री जेटली ने पहले ही यह बात कह दी है. एक गलत अफवाह फैलाई  जा रही है. यहाँ तक कि जो लोग बिल का तीखा विरोध कर रहे हैं, वे दलितों के लिए आरक्षण के बारे में बात जारी रखे हुए हैं. मैं उन्हें विधेयक को पढ़ने की सलाह दूंगी. संविधान (संशोधन) विधेयक में दलित महिलाओं के लिए आरक्षण है और आदिवासियों के लिए भी है. और यह आरक्षण भारत के संविधान द्वारा अधिकृत कर दिया गया है. मैं यह भी कहना चाहूंगी कि मेरी पार्टी पहली पार्टी है जिसने पार्टी ढांचे के सभी स्तरों पर महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित की है. इस तरह, हम पूरी तरह से लैंगिक समानता के लिए प्रतिबद्ध हैं. महोदय, मैं यह भी कहना चाहूंगी कि यह हमारे प्रधानमंत्री ही हैं, जिन्‍होंने कानून के इस हिस्‍से को प्रस्‍तुत किया था. और 50 फीसदी करने के लिए स्थानीय निकाय स्तर पर आरक्षण की 33 प्रतिशत उठाया, और अब स्थानीय सरकार के स्तर पर, कोटा को 33 प्रतिशत से बढ़ाकर 50 फीसदी तक कर दिया गया है. इस तरह, महोदय,  हमने इस देश की महिलाओं के लिए अपनी प्रतिबद्धता और जनादेश को पूरा किया है. महोदय, मैं सिर्फ दो बातें रखते हुए समाप्त करना चाहूंगी.

जयंती नटराजन (जारी) : लोग समानता के बारे में बात करते हैं. लेकिन उसमान लोगों  के बीच कोई समानता नहीं हो सकती है. जेंडर समानता जिसके बारे में संविधान में उल्लेख किया गया है, जमीनी स्‍तर पर पूरी तरह से अर्थहीन है. महोदय, भारतीय महिलाओं ने आजादी के लिए महात्मा गांधी आह्वान पर पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ाई लड़ी है. भारतीय महिलाएं जेल गईं; भारतीय महिलाओं ने घर को भी संभाले रखा; और फिर भी, महोदय, आजादी के बाद, हालांकि संविधान समानता की गारंटी देता है, भारतीय महिलाएं शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास के कई अन्य मानकों में काफी पीछे हैं. जिस तरह से स्थानीय सरकार के स्तर पर मार्गदर्शकों ने राह दिखाई है, जहां स्‍थानीय सरकार में चुनी गईं महिलाओं ने स्वच्छता, शिक्षा, बाल स्वास्थ्य और हर बुनियादी मुद्दों में जबरदस्त रुचि दिखाई है, इस देश के विकास के लिए उस पर ध्यान देने की जरूरत है. इसलिए, महोदय, जब संवैधानिक संशोधन को अधिनियमित किया जाता है और भारतीय महिलाओं को निर्णय लेने में बराबर का स्थान मिलता है, तो संसद में हमारी महिलाओं की चिंताओं को पर्याप्त रूप से प्रतिनिधित्व दिया जाएगा और, मैं यह भी कहूंगी कि जो दृश्‍य हमने  आज क्या देखा है, जिसके लिए हम सभी आपसे स्‍पष्‍ट रूप से माफी माँगते हैं कि फिर कभी ऐसा नहीं होगा और क्‍योंकि सभी समुदाय की महिलाओं का मामला है, हमारा लोकतंत्र जेंडर समानता के पथ पर, विकास के रास्ते पर और सच्चे सामाजिक न्याय की राह पर, अच्‍छी तरह स्थापित किया जाएगा. महोदय, महिलाएं हर समुदाय में सबसे अधिक वंचित हैं और अंतत: सबसे निचले स्‍तर को न्‍याय मिलेगा. धन्‍यवाद, महोदय.

 वृंदा  कारत : महोदय, इससे पहले कि मैं बात रखूं, मेरे सहयोगी सिर्फ एक बात रखना चाहते हैं।

 सीताराम येचुरी: सर, वह मेरी पार्टी की तरफ से कुछ ठोस कहना चाह रही हैं, लेकिन, मैं अपनी पार्टी सीपीआई (एम) की ओर से सिर्फ एक टिप्पणी करना चाहता हूं.

सभापति: आप यहाँ सूचीबद्ध नहीं हैं.

सीताराम येचुरी: महोदय, आपकी अनुमति से मैं उनके समय का दो मिनट लूंगा.

सभापति: ठीक है.

सीताराम येचुरी (पश्चिम बंगाल): महोदय, सीपीआई (एम) की ओर से, हम बहुत सम्मानित महसूस कर रहे हैं कि हम अपने देश में इस विधेयक को कानून बना कर एक इतिहास बनाने में इस सम्मानित सदन का हिस्सा रहे हैं. महोदय, मैं यह बात कहने के लिए खड़ा हुआ हूं कि यह केवल महिलाओं की मांगों को स्वीकार करना नहीं है, बल्‍कि हम इस जिम्मेदारी को देकर हम देश के प्रति अपने सामाजिक कर्तव्‍य को भी पूरा कर रहे हैं और हम एक बेहतर भारत बनाने के लिए अपने देश में मौजूद छिपी हुई व्‍यापक क्षमता को उभारने जा रहे हैं, जो अब तक दबी हुई है. इसी भावना के साथ, महोदय, इस  तथ्य के बावजूद कि सत्तारूढ़ गठबंधन को इस सदन में दो तिहाई बहुमत नहीं है, हम सब एक साथ मिलकर इस कानून को अधिनियमित करने और हमारे देश में एक इतिहास रचने के लिए इसका समर्थन कर रहे हैं.

वृंदा कारत  (पश्चिम बंगाल): महोदय, गहरी संतुष्टि की भावना के साथ, मैं अपनी पार्टी और महिला संगठनों का, जिनके साथ मैं पिछले कई दशकों से इस संवैधानिक संशोधन के समर्थन में काम कर रही हूं, निर्बाध  और स्पष्ट समर्थन देती हूं. यह संशोधन बहुत ही ऐतिहासिक कानून है जो निश्चित रूप से भारतीय राजनीति का चेहरा बदलने जा रहा है. और, मुझे विश्वास है, यह परिवर्तन बेहतर के लिए है. यह एक ऐसा परिवर्तन है जो न केवल भारत में महिलाओं के साथ राजनीतिक दायरे में लंबे समय से हो रहे भेदभाव को संबोधित करेगा, बल्‍कि महोदय, मुझे विश्‍वास है कि है कि यह नई राह दिखाने वाला भी होगा, क्योंकि यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया को गहरा करने जा रहा है. यह एक ऐसा कानून है जो यह सुनिश्चित करता है कि समावेशीकरण का नारा बयानबाजी से गारंटी – विधायी और संवैधानिक गारंटी – में बदले, और वह यहीं इस कानून का महत्व निहित है. महोदय, 13 वर्ष या उससे अधिक समय से, इस देश की महिलाएं ऐसे एक कानून के लिए लड़ रही हैं. और हमने इस कानून के खिलाफ सबसे अपमानजनक तर्क सुना है. हम समझते हैं कि जहां भी सामाजिक सुधार के नई राह खोलने वाले उपाय सामने आये हैं, वहाँ इसका विरोध भी हुआ है. मैं आज गर्व के साथ बाबा साहेब आंबेडकर के शब्दों को याद करना चाहूंगी, जब लोकसभा में हिंदू सुधार विधेयक पर इस तरह की एक लंबी बहस हुई थी, उसका ऐसा ही कड़ा विरोध हुआ था. उन्होंने कहा भी था कि कोई भी देश महिलाओं को पीछे छोड़ कर आगे नहीं बढ़ सकता है. और, इसलिए, महोदय, आज मुझे विश्वास है, यह हमारे पुरुष सुधारकों की एक स्मृति है, हालांकि जहां डॉ आंबेडकर का संबंध है मैं पुरुष कहना पसंद नहीं करूंगी.

 

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महिला आरक्षण को लेकर संसद में बहस :पहली   क़िस्त

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महिला आरक्षण को लेकर संसद में बहस: दूसरी क़िस्त 

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महिला आरक्षण को लेकर संसद में बहस :तीसरी   क़िस्त


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 वह इतिहास, जो बन न सका : राज्यसभा में महिला आरक्षण

वृंदा कारत  (जारी): लेकिन जहाँ तक जेंडर का संबंध है,  यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि भारत में यह पुरुष बनाम महिला, और महिला बनाम पुरुष नहीं रहा है. लेकिन हमारे देश में कुछ सबसे बड़े समाज सुधारक पुरुष रहे हैं, और हम मानते हैं कि यह भूमिका लोकतांत्रिक पुरुष, लोकतांत्रिक विचारधारा वाले पुरुष के कारण बनी रह सकती है, और इसलिए मेरा मानना ​​है कि आज इस सदन में मौजूद सभी पुरुषों, देश के सभी पुरुषों जिन्‍होंने विधेयक का समर्थन किया है मैं बधाई देती हूं जोकि आज बिल्‍कुल उपयुक्‍त है. मैं गंभीर हूँ क्योंकि मैं कहना चाहती हूं कि यह महिलाएं बनाम पुरुष वाला कोई संकीर्ण दृष्टिकोण नहीं है. महोदय, दो, तीन अन्‍य  बातें हैं जिनको मैं यहां रखना चाहूंगी, और जो मुझे बहुत जरूरी लगती हैं. मैं सोचती हूं कि हमारी राजनीति में पिछले दो दशकों में भारतीय राजनीति में सबसे ऐतिहासिक अनुभवों में से एक पंचायतों में जमीनी स्‍तर पर महिलाओं द्वारा निभायी गई भूमिका है. आज हम देखते हैं कि हिन्दुस्तान की पंचायतों में जो सबसे गरीब औरतें हैं, उन गरीब औरतों को जब यह मौका मिला तो इस मौके का फायदा उठाकर उन्होंने  गाँव के लिए, पंचायत के लिए, जिला के लिए और ब्लॉक लेवल पर किस रूप में काम किया. उन्होंने  यह अपने उत्थान के लिए नहीं किया बल्कि पूरे गाँव के उत्थान लिए किया. यह एक रिकार्ड है। लोग कहते हैं कि इसमें प्रॉक्सी पॉलिटिक्स दिखाई देती है. मुझे  पता है, मैं सुनती हूँ कि लोग कहते हैं कि सारे हिन्दुस्तान की पंचायत में एक नया phenomenon, प्रधान पति पैदा हो गया है. आज मैं चुनौती देती हूँ, अगर प्रधान पति होते हैं तो प्रधान पति का जो .  जी?

 सीताराम येचुरी: पति-प्रधान…

 वृंदा कारत: अब पति प्रधान हो या प्रधान पति हो..(व्यवधान).. क्यों कि प्रधान तो महिला ही होती है. उसका पति तो केवल माला लगा कर पंचायतों में जाकर काम करता है. यह  मैं सही कह रही हूँ. इसीलिए मैं यह कहती हूँ कि आज हम सब लोगों  को यह समझाना है कि प्रॉक्सी पॉलिटिक्स भी पुरुष प्रधान मानसिकता का एक reflection है. औरत काम करना चाहती है, लेकिन जब उसका पति वहाँ खड़ा हो जाता है और बी.डी.ओ. खड़ा होकर उसका हस्ताक्षर घर में ही करवा कर कहता है कि तुम्हें आने की जरूरत नहीं है तो उसके खिलाफ औरतें खड़ी होती हैं. इसीलिए मैं कहती हूँ कि आज हम उन लाखों  औरतों को सलाम करते हैं, क्योंकि अगर उन्होंने इस प्रकार का सही काम पंचायतों में नहीं किया होता तो आज हम लोगों  को यह हिम्मत नहीं होती कि हम इस विधेयक को पास करते. इसलिए पंचायत की औरतों की भी इसमें एक जबर्दस्त भूमिका है, जिसे हमें स्वीकार करना चाहिए. सर, मैं एक और बात कहना चाहती हूँ. मैं इसकी पॉलिटिक्स में नहीं जाना चाहती हूँ कि किसको श्रेय मिलना चाहिए इत्यादि, लेकिन मैं यह जरूर कहना चाहती हूँ और जयन्ती जी को यह सुन कर शायद अच्छा लगेगा कि 1988 में जब महिलाओं के लिए National Prospective Plan बना था तो उस समय ruling party की तरफ से एक सुझाव आया कि हम एक-तिहाई nomination के रू प में पंचायतों में देना चाहते हैं. सर, उस समय National Prospective Plan की debate में महिला संगठनों ने कहा कि हम किसी भी संस्था में backdoor से नहीं जाना चाहते हैं  और ये वे महिला संगठन थे, जिन्होंने कहा कि हम नामांकन नहीं चाहते, हम चुनाव चाहते हैं. तो, जब आज हम विभिन्न व्यक्तियों और हस्तियों के योगदान की बात करते हैं,  तो कृपया मत भूलिए कि आज अगर बिल जीवित है, तो वह महिला संगठनों, महिलाओं के आंदोलनों की वजह से है , जिसने राजनीतिक पार्टियों को इसे भूलने नहीं दिया, और यही हैं वे जिनको आज हमें सलाम करना है. मैं इसे रिकॉर्ड में दर्ज करना चाहती हूं, और मुझे आशा है, अगर प्रधानमंत्री आज बोलेंगे, यह तो बहुत अच्छा होगा अगर वह भी उन महिला संगठनों और आंदोलनों को सलाम करें,  जिन्होंने विधेयक को जिंदा रखना सुनिश्चित किया. महोदय, मैं दो, तीन और मुद्दों,  मुझे  इस बात को सुन कर बहुत दु:ख होता है जब यह कहा जाता है कि यह बिल केवल एक वर्ग की महिलाओं के लिए है. अगर हम अनुभव को देखते हैं तो हकीकत यह है कि जब हम आज भी बिहार और उत्तर प्रदेश के अंदर महिलाओं की संख्या को देखते हैं तो यह स्पष्ट होता है कि राजनीति में ओ.बी.सी. की बेटी होना कोई disadvantage नहीं है.

वृंदा कारत (क्रमागत) : आज बिहार के अंदर 24 महिलाओं में से 60% से अधिक पिछड़ी जातियों
से हैं। उत्तर प्रदेश के अंदर 423 MLA हैं ..

 सतीश चन्द्र मिश्र : 403 हैं.

 वृंदा कारत : सॉरी, बिहार में 243 हैं, जिनमें से अगर आप संख्या को देखें, क्यों कि यह जो मिथ क्रियट हो रहा है कि SC, ST और OBC को नहीं मिलेगा, मैं कहना चाहती हूं कि यू0पी0 में 23 महिलाओं में से over 65% SC, ST, OBC और हमारी माइनॉरिटी की बहनें हैं. अगर हम बिहार में देखते हैं तो 243 सीटों में से केवल 24 महिलाएं हैं, जिनमें से वहां भी 70.8% या तो OBC, SC या हमारी मुस्लिम  महिलाएं हैं. इसलिए यह कहना कि केवल जनरल कॉस्ट की महिलाएं, जो बहुत सम्पन्न वर्ग  से आती हैं, उन्हीं का यहां फायदा होता है, यह बात बिल्कुल गलत है. आंकड़े यह दिखाते हैं कि जहां महिला रिजर्वेशन  होता है, वहां निश्चित रूप से ये जो हमारी बहनें हैं, उनको और मौका मिलेगा, वे और आगे आएंगी. मैं मानती हूं कि मंडल कमीशन के बाद हिन्दुस्तान की पॉलिटिक्स में एक बुनियादी परिवर्तन हुआ जिनकी अपर कास्ट मोनोप्लीज़ थी, OBCs की सेल्फ मोबलाइजेशन से वह टूटा. यह एक सकारात्मक चीज थी, लेकिन उसमें OBC महिलाओं को वह हिस्सा नहीं मिला. आज हम यह गारंटी के साथ कहते हैं कि अगर आरक्षण होगा, महिला सीट अगर आप आकर्षित  करेंगे तो जो पार्टियां कास्ट के आधार पर सीट देंगी, उसमें फर्क होगा – जाति का फर्क नहीं होने वाला है, कास्ट का फर्क होगा, भाई की बजाए बहन आएगी, लेकिन कोई परिवर्तन होगा, कास्ट कम्प्लेक्शन में कुछ परिवर्तन होकर कोई कन्वर्जन होगा कांसि्टटयूशन गेरंटी आफ इक्वेलिटी का, यह होने वाला नहीं है, यह हकीकत है. मैं यह मानती हूं आज कि हिन्दुस्तान की जनवादी प्रणाली में सबसे बड़ी कमजोरी है कि हमारे माइनॉरिटीज़ की, हमारी संख्या बहुत कम है, हम मानते हैं. यह हमारे लिए, हरेक के लिए यह शर्म की बात है. क्यों हमारी माइनॉरिटीज़ इतनी कम हैं? क्यों  आबादी के मुताबिक उनकी संख्या पार्लियामेंट में, स्टेट असैम्बलीज़ में नहीं हैं ? निश्चित रूप पर यह हमारी कमजोरी है, कहीं न कहीं हमारे जनवाद में यह एक कमजोरी है. इस कमजोरी को हम कैसे दूर करें ? अगर कोई सोचे कि इस कमजोरी को दूर करने के लिए महिला बिल एक जादू की छड़ी है, जिसे घुमाकर हिन्दुस्तान की जनवादी प्रणाली में जितनी भी कमजोरियां हैं, सब खत्म हो जाएंगी, यह होने वाला नहीं है. लेकिन मैं अपने अनुभव से जानती हूं कि जहां महिला आरक्षण है, लोकल लेवल पर, हमारी माइनॉरिटी कम्युनिटी की बहनों को मौका मिला. सर, आप हैदराबाद को ही लीजिए. हैदराबाद में कॉरपोरेशन में 150 सीट्स हैं,
वहां 50 सीट्स आकर्षित  हैं महिलाओं के लिए. उन 50 सीटों में 10 सीटों पर हमारी मुस्लिम  बहनें चुनाव लड़कर जीतकर आई हैं. क्यों  जीतकर आई हैं? क्यों कि वे सीटें महिलाआकर्षित सीटें थी. इसलिए, महिला रिजर्वेशन का फायदा उठाकर हमारी बहनें खड़ी हो सकती हैं, जीत सकती हैं और आज मैं यह उम्मीद जताती हूं कि महिला आरक्षण के बाद निश्चित रूप से जो हमारी गरीब महिलाएं हैं, पिछड़ी हैं, माइनॉरिटीज़ हैं, SC हैं, ST हैं, निश्चित रूप से उनको इसका फायदा मिलेगा और मैं पोलिटिकल पार्टियों से भी यह अपील करना चाहूंगी कि इस आरक्षण का फायदा उठाकर उन महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान करना अनिवार्य है, मैं यह भी कहना चाहती हूं. सर, रोटेशन के बारे में लोगों  ने कहा कि यह रोटेशन क्या है, यह रोटेशन बिल्कुल गलत है, लेकिन हम यह पूछना चाहते हैं कि एक कांसि्टच्युएंसी में जहां ढ़ाई या तीन लाख वोटर हैं, वहां क्या एक ही प्रतिनिधि है, जो जिंदगी भर, जब तक जीएगा, वहीं प्रतिनिधित्व करेगा. क्या वहां और कोई नहीं है, और कोई काबिल नहीं है? यह बिल्कुल गलत समझा है. हम लोगों की पार्टी में, हम लोगों  ने कोशिश की कि हम कम से कम दो टर्म, राज्य सभा में तो दो टर्म हमने लागू कर लिया, लेकिन लोक सभा में भी जो चुने हुए प्रतिनिधि हैं, हमारा यह प्रयास है कि कम से कम दो या तीन टर्म के बाद कोई और साथी आए और करे. चूंकि हम यह नहीं मान सकते, मोनार्की के खिलाफ है .लेकिन इनडायरेक्ट मोनार्की है कि भइया, हम एक बार जीते तो हम कभी नहीं इससे हट सकते और अगर हटेंगे तो लोग कहेंगे कि इनस्टेबि्लटी होगी.That is the stability of democracy that you have more and more people who can take the responsibility. मैं बता रही हूं, मैंने “प्रयास” शब्द का इस्तेमाल किया है और इसीलिए मैं कहती हूं कि यह अनिवार्य है और यह बात सही है, जो अरुण जेटली जी ने कही कि
आरक्षण के समस्‍तरीय प्रसार के बारे में कहना चाहती हूं. हम एकाधिकार को बढ़ाना नहीं चाहते कि केवल एक निर्वाचन क्षेत्र में आरक्षण हो और केवल एक निर्वाचन क्षेत्र की महिलाएं विकास कर सकें. हम महिला नेताओं के समस्‍तरीय विकास की ताकत चाहते हैं, जैसाकि सिर्फ पंचायतों में हुआ है जहां योग्यता की वजह से – कृपया जो मेरिट की बात करते हैं वे ध्‍यान दें – हम 33 फीसदी अधिक हैं। कई पंचायतों में,  हम 40 प्रतिशत हैं. मैं आपको बहुत ज्यादा डराना नहीं चाहती. मेरा पूरी उम्‍मीद है कि विधानसभाओं और संसद में भी बहुत जल्द ही महिलाएं, अपने काम, क्षमता और बलिदान के कारण, 33 प्रतिशत को पार कर जाएंगी और 40 प्रतिशत या 50 प्रतिशत तक पहुंच जाएंगी. यह एक वादा है.

सभापति: कृपया घड़ी पर नजर रखें.

वृंदा करात:
मैं घड़ी पर नजर रख रही हूँ. I am keeping an eye on the watch. मैं चेयर को भी address कर रही हूं और मैं बाकी सदस्यों  को भी address कर रही हूं.SHRI SITARAM YECHURY: Should we keep a watch on the time or on the numbers, Sir?


वृंदा कारत : सभापति जी, मैं इस बारे में एक बात और कहना चाहती हूं कि लोग पूछते हैं कि बिल के बाद क्या होगा, क्या पूरी पोलिटिक्स बदल जाएगी, क्या करप्शन खत्म हो जाएगा, क्या सब कुछ हो जाएगा? हम कहते हैं कि औरत कोई super woman नहीं है कि वह पार्लियामेंट में आएगी और पूरी दुनिया और देश को बदल देगी, हालांकि उसमें ताकत है बदलने के लिए। मैं यह कहना चाहती हूं कि

 वृंदा करात: महिलाओं से ऐसा व्‍यवहार नहीं करें जैसे कि वे राजनीति में भेदभाव के खिलाफ लड़ने वाली सुपरवुमन हों. मुझे नहीं लगता कि 33 प्रतिशत को फिक्‍स करके हमें यह साबित करना जरूरी है कि वे वहाँ तक नहीं पहुँचना चाहती हैं. हालांकि, मुझे विश्वास है कि चुनावी राजनीति में उनका प्रवेश निश्चित रूप से अधिक संवेदनशील राजनीति की तरफ ले जाऐगा और हमें विश्वास है कि ये हमारे प्रयास ही होंगे कि मुख्‍य राजनीतिक एजेंडे, तथाकथित बड़े मुद्दे और हल्‍के मुद्दे …

सभापति: कृपया समाप्त करें.



वृंदा करात: महोदय, यही समस्या है. कठिनाइयां क्या हैं? मुख्‍य राजनीतिक मुद्दे क्या हैं? महिलाओं के खिलाफ हिंसा क्‍या एक मुख्‍य राजनीतिक मुद्दा नहीं है? कन्या भ्रूण हत्या क्‍या एक मुख्‍य राजनीतिक मुद्दा नहीं है? फिर भी, जब इन पर विचार-विमर्श होता है,  तो इनको मुख्‍य  राजनीतिक एजेंडा नहीं माना जाता है. कई लोगों ने पूछा: केवल एक तिहाई ही क्यों है? यह एक दहलीज है. यह एक आवश्‍यक मात्रा है जो नीति को प्रभावित करेगी, इसलिए मेरा मानना ​​है कि यह बदल जाएगा. अन्त में, महोदय, …

सभापति: नहीं, श्रीमती करात, आपका समय समाप्‍त हो चुका है.

 वृंदा करात: जी, हां महोदय, बस आप इतना समायोजन करते हैं तो थोड़ी कृपा और एक और बात. मुझे विश्वास है, यह सब संस्कृति को बदलने जा रहा है क्योंकि आज महिलाएं, चाहे हम इसे स्वीकार करें या नहीं, अधिकतर आधुनिक समाजों में, अभी भी एक सांस्कृतिक प्रिज्‍म में फंसी हुई हैं. एक समान रूप से स्वतंत्र नागरिक होने के लिए हमें हर दिन लड़ना होगा…. हमारे देश में, परंपरा के नाम पर, संस्कृति के नाम पर, रूढियों को थोपा जाता है और मुझे विश्वास है, जब इतनी सारी महिलाएं सार्वजनिक जीवन में हैं, महिलाओं को कैद करने वाली रूढ़ियां और संस्कृतियां, वे सलाखें, भी टूटेंगी.

सभापति: धन्यवाद।

 वृंदा करात: इसलिए, मैं एक बार फिर से सदन को बधाई देती हूं और मैं अपनी निराशा जाहिर करती हूं कि कल फ्लोर मैनेजमेंट कल बहुत खराब था.

सभापति: कृपया समाप्त करें.

 वृंदा करात: आपने हर व्‍यक्‍ति को विश्वास में नहीं लिया था. मुझे विश्वास है,  महोदय, कि जब …

सभापति: कृपया समाप्त करें. मुझे लगता है कि मैं आपको अब और अधिक समय की अनुमति नहीं दे सकता हूँ.

 वृंदा करात: मुझे यह भी उम्मीद है कि लोकसभा में भी इसे पारित करने में कोई देर नहीं होगी. यह न करें कि नाम के वास्‍ते राज्‍य सभा में कर लिया भइया, लेकिन लोकसभा में क्‍या दिया?


सभापति: कृपया समय पर ध्‍यान दें.


वृंदा करात: कृपया ऐसा नहीं करें. हम इस विधेयक को इस सत्र में ही लोकसभा में पारित देखना चाहते हैं. धन्यवाद.

क्रमशः

औरतें – क़िस्त दो

एदुआर्दो गालेआनो / अनुवादक : पी. कुमार  मंगलम 

अनुवादक का नोट 

“Mujeres” (Women-औरतें) 2015 में आई थी। यहाँ गालेआनो की
अलग-अलग किताबों और उनकी लेखनी के वो हिस्से शामिल किए गए जो औरतों की
कहानी सुनाते हैं। उन औरतों की, जो इतिहास में जानी गईं और ज्यादातर उनकी
भी जिनका प्रचलित इतिहास में जिक्र नहीं आता।  इन्हें  जो चीज जोड़ती है वह
यह है कि  इन सब ने अपने समय और स्थिति में अपने लिए निर्धारित भूमिकाओं को
कई तरह से नामंजूर किया।



तितुबा 


बहुत पहले ,बचपन में ही उसे दक्षिणी अमरीका में पकड़ लिया गया था. फिर एक बार और बार-बार बिकते तथा  एक-के-बाद दूसरे मालिक को  देखते हुए वह आखिरकार उत्तरी अमरीका के सालेम कस्बे जा पहुंची थी.
वहाँ सालेम में, जो शुद्धतावादी प्यूरिटन (“प्यूर” अर्थात “शुद्ध”) ईसाईयों का डेरा था, वह पादरी सैमुएल पार्रिस के घर की दासी मुक़र्रर की गई थी. पादरी की बेटियाँ उसे बहुत चाहती थी. तितुबा जब उन्हें चमत्कार से प्रकट हुए लोगों की कहानियाँ सुनाती या अंडे की घुली हुई जर्दी में उनका भाग्य पढ़ती, तब वे खुली आंखों से सपना देख रही होती. 1692   की सर्दियों में, जब इन लड़कियों पर शैतान का साया पड़ा और वे जमीन पर उलट-पलट पड़ रही थीं, चीख-चिल्ला रही थीं, तब सिर्फ तितुबा ही उन्हें शांत कर सकी थी. उसने उन्हें प्यार किया, उनके कान में तब तक कहानियां फुसफुसाती रही जब तक कि वे उसकी गोद में सो न गई. बस, इसने उसे गुनाहगार बना दिया. अब यह तितुबा ही थी जिसने ईश्वर के चुने हुए लोगों की आदर्श नगरी में नरक की आहट सुना दी थी.

फिर कहानियों की इस जादूगरनी को भरे चौराहे पर, फांसी के तख्ते से बांध दिया गया. और उसने अपने सारे गुनाह कबूल किए: उसपर यह इल्ज़ाम लगा कि वह शैतानी टोटके लगाकर केक-मिठाइयाँ बनाया करती है. और फिर उसे तब तक कोड़े लगाए गए जब तक कि उसने हाँ नहीं कह दिया. इल्जाम यह था कि वह रात को जुटने वाली चुड़ैलों की महफिल में नंगा नाचती है और इस बार भी कोड़े उसके गुनाह कबूल लेने  पर ही रूके. इल्ज़ाम यह भी था कि वह शैतान के साथ सोती है. कोड़ों ने इस बार भी अपना काम मुकम्मल पूरा किया,और फिर उसे यह कहा गया कि जुर्म में उसकी साथी कभी चर्च न जाने वाली वो दो बूढ़ी औरतें थी. तितुबा अब  इल्ज़ाम लगाने वाली बन गई थी. अपनी उंगलियाँ उसने शैतान का कहा मानती उन दो औरतों की तरफ मोड़ दी थी. बस इसके बाद उसपर कोड़े चलना बंद हो गए. इसी तरह और गुनाहगारों ने औरों को गुनाहगार बताया. फाँसी का फंदा इसके बाद लगातार चढ़ता-उतरता रहा.

औरतें सीरीज की इन कहानियों की पहली क़िस्त पढ़ने के लिए क्लिक करें:

औरतें

ईश्वर की औरतें


1939 सान साल्वादोर दे बाहिया उत्तर अमरीकी मानवविज्ञानी रूथ लैंड्स ब्राजील आई थी. वह एक ऐसे देश में काले लोगों का हाल जानना चाहती थी, जिसके बारे में यह मान लिया गया था कि वह रंगभेद से मुक्त है (खासकर 1889 में गुलामी प्रथा पर सरकारी रोक के बाद-अनुवादक). रियो दी जानेइरो में उनकी आवभगत सरकार के मंत्री ओस्वाल्दो आरान्या ने की. मंत्री महोदय ने उन्हें यह समझाया कि सरकार की योजना काले खून से गंदे हुए ब्राजीली नस्ल की सफाई की है. वही काला खून, जो देश के पिछड़ेपन का गुनहगार है.  रियो के बाद रूथ बाहिया गई. अश्वेत इस शहर की सबसे बड़ी आबादी हैं, जहां कभी चीनी और गुलामों के कारोबार में पैसे से नहाए वायसरायों का राज चलता था. यहाँ धर्म से लेकर खान-पान तथा बीच में कहीं आते संगीत तक हर वो चीज जो नाम लेने और चाहे जाने के लायक है, काले रंग की विरासत है. इस सबके बावजूद, बाहिया के सारे लोग और अश्वेत भी यह मानते हैं कि चमड़े का साफ़ रंग चीजों के बढ़िया होने की तस्दीक है. सारे लोग नहीं. अफ्रीकी मंदिरों की औरतों में रूथ ने काले होने का गर्व और आत्मसम्मान देखा था.

इन मंदिरों में लगभग हमेशा ये औरतें, ये काली पुजारिनें ही होती हैं, जो अफ्रीका से आए देवताओं को अपने शरीर में ठीया देती हैं. किसी तोप की नली की तरह चमकदार और गोल ये औरतें अपना भरा-पूरा शरीर इन देवताओं को अर्पित करती हैं. इनकी देह तब उस घर की तरह होती है, जहाँ आना और ठहर जाना अच्छा लगता है. देवता इनके अंदर रमते हैं, इनके अंदर नृत्य करते हैं. शहर के लोग देवताओं का घर बनी इन पुजारिनों से अपने लिए हौसला और संबल पाते हैं; इनके मुँह से वे अपनी किस्मत की आवाज़े सुना करते हैं. बाहिया की काली पुजारिनें अपने लिए पति नहीं प्रेमी चाहती हैं. शादी देती होगी इज्जत  और नाम, लेकिन यह आज़ादी और खुशी छीन लेती है. इनमें से किसी को भी किसी पुजारी या जज के सामने शादी रचाने में कोई दिलचस्पी नहीं है. कोई भी बँधी-बँधाई पत्नी, किसी की श्रीमती नहीं बनना चाहती. तने हुए सिर और मंथर मस्तानी चाल के साथ ये पुजारिनें पूरी कायनात की मलिकाओं की तरह चलती हैं. अपने प्रेमियों को वे देवताओं से ईर्ष्या करने का वह संत्रास देती हैं, जो कहीं किसी और के हिस्से नहीं आया होगा.



शब्दों की ओर एक खिड़की

माग्दा लेमोनिएर अखबारों से शब्दों की कतरनें काटती हैं. हर रूप और आकार के इन शब्दों को वह कुछ बक्सों में सहेजा करती हैं. लाल बक्से में वह गुस्से से चीखते शब्दों को रखती हैं. हरे बक्से में प्यार करने वाले, तो नीले वाले में इन भावों से तटस्थ शब्दों की बचत होती है. पीला वाला उन शब्दों को संजोता है, जो दुख की बाते बताते हैं. और उस पारदर्शी बक्से में वह उन शब्दों को छुपाती हैं, जिनमें जादू भरा होता है. कभी-कभी माग्दा इन बक्सों को खोलती हैं और उन्हें मेज़ पर उलट देती हैं, ताकि ये शब्द चाहे जैसे मन हो, एक-दूसरे में मिल जाएं. तब, ये शब्द माग्दा को वह बताते है जो हो रहा है, और उसकी खबर देते हैं जो होने वाला है.

लेखक के बारे में

एदुआर्दो गालेआनो (3 सितंबर, 1940-13 अप्रैल, 2015, उरुग्वे) अभी के
सबसे पढ़े जाने वाले लातीनी अमरीकी लेखकों में शुमार किये जाते हैं।
साप्ताहिक समाजवादी अखबार  एल सोल  (सूर्य) के लिये कार्टून बनाने से शुरु
हुआ उनका लेखन अपने देश के समाजवादी युवा संगठन  से गहरे जुड़ाव के साथ-साथ
चला। राजनीतिक संगठन से इतर भी कायम संवाद से विविध जनसरोकारों को उजागर
करना उनके लेखन की खास विशेषता रही है। यह 1971 में आई उनकी किताब लास
बेनास आबिएर्तास दे अमेरिका लातिना (लातीनी अमरीका की खुली धमनियां) से
सबसे पहली बार  जाहिर हुआ। यह किताब कोलंबस के वंशजों की  ‘नई दुनिया’  में
चले दमन, लूट और विनाश का बेबाक खुलासा है। साथ ही,18 वीं सदी की शुरुआत
में  यहां बने ‘आज़ाद’ देशों में भी जारी रहे इस सिलसिले का दस्तावेज़ भी।
खुशहाली के सपने का पीछा करते-करते क्रुरतम तानाशाहीयों के चपेट में आया तब
का लातीनी अमरीका ‘लास बेनास..’ में खुद को देख रहा था। यह अकारण नहीं है
कि 1973 में उरुग्वे और 1976 में अर्जेंटीना में काबिज हुई सैन्य
तानाशाहीयों ने इसे प्रतिबंधित करने के साथ-साथ गालेआनो को ‘खतरनाक’ लोगों
की फेहरिस्त में रखा था। लेखन और व्यापक जनसरोकारों के संवाद के अपने अनुभव
को साझा करते गालेआनो इस बात पर जोर देते हैं कि “लिखना यूं ही नहीं होता
बल्कि इसने कईयों को बहुत गहरे प्रभावित किया है”।

अनुवादक का परिचय : पी. कुमार. मंगलम  जवाहर लाल नेहरु विश्विद्यालय से लातिनी अमरीकी साहित्य में रिसर्च कर रहे हैं .  आजकल फ्रांस में हैं. 

क्रमशः

वह इतिहास, जो बन न सका : राज्यसभा में महिला आरक्षण : चौथी क़िस्त

 महिला आरक्षण को लेकर संसद के दोनो सदनों में कई बार प्रस्ताव
लाये गये. 1996 से 2016 तक, 20 सालों में महिला आरक्षण बिल पास होना संभव
नहीं हो पाया है. एक बार तो यह राज्यसभा में पास भी हो गया, लेकिन लोकसभा
में नहीं हो सका. सदन के पटल पर बिल की प्रतियां फाड़ी गई, इस या उस प्रकार
से बिल रोका गया. संसद के दोनो सदनों में इस बिल को लेकर हुई बहसों को हम
स्त्रीकाल के पाठकों के लिए क्रमशः प्रकाशित करेंगे. पहली क़िस्त  में
संयुक्त  मोर्चा सरकार  के  द्वारा  1996 में   पहली बार प्रस्तुत  विधेयक
के  दौरान  हुई  बहस . पहली ही  बहस  से  संसद  में  विधेयक  की
प्रतियां  छीने  जाने  , फाड़े  जाने  की  शुरुआत  हो  गई थी . इसके  तुरत
बाद  1997 में  शरद  यादव  ने  ‘कोटा  विद  इन  कोटा’  की   सबसे  खराब
पैरवी  की . उन्होंने  कहा  कि ‘ क्या  आपको  लगता  है  कि ये  पर -कटी ,
बाल -कटी  महिलायें  हमारी  महिलाओं  की  बात  कर  सकेंगी ! ‘ हालांकि
पहली   ही  बार  उमा भारती  ने  इस  स्टैंड  की  बेहतरीन  पैरवी  की  थी.
अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद पूजा सिंह और श्रीप्रकाश ने किया है. 

संपादक
पहली क़िस्त के लिए क्लिक करें: 
महिला आरक्षण को लेकर संसद में बहस :पहली   क़िस्त

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महिला आरक्षण को लेकर संसद में बहस: दूसरी क़िस्त 

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महिला आरक्षण को लेकर संसद में बहस :तीसरी   क़िस्त

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की सौंवी वर्षगांठ ( 8 मार्च 2010) 

सभापति – आज 8 मार्च 2016 को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के सौ वर्ष पूरे हो रहे हैं. और समाज के सभी क्षेत्रों में समानता हासिल करने के प्रति उनकी दृढ़प्रतिज्ञ और रचनात्मक प्रतिबद्धता के लिए भारत की महिलाओं और पूरे विश्व के महिला समुदाय को मैं अपनी तरफ से हार्दिक बधाई देता हूं. 1945 में सैन फ्रांसिस्को में हस्ताक्षरित संयुक्त राष्ट्र चार्टर, आधुनिक समय में एक बुनियादी मानव अधिकार के रूप में जेंडर समानता का प्रचार करने के लिए किया गया पहला अंतरराष्ट्रीय समझौता था. भारत का संविधान समानता की गारंटी देता है और लिंग के आधार पर भेदभाव को वर्जित करता है. आज हमारी महिल अग्रदूतों और अन्य लोगों को याद करने का दिन है, जिन्होंने शांति, स्वतंत्रता और समानता के लिए अपने जीवन का बलिदान किया था. नई सहस्राब्दी महिलाओं की क्षमता और मुक्ति के लिए उनके संघर्ष को स्वीकार करने में एक महत्वपूर्ण बदलाव और व्यवहारगत परिवर्तन की गवाह है. अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का महत्व महिलाओं की स्थिति, विशेष रूप से हमारे समाज के हाशिये पर खड़ी महिलाओं की स्थिति में सुधार, और समाज में अपनी सही जगह हासिल करने के लिए उन्हें सशक्त बनाने के प्रति हमारे पुनर्समथन और हमारी प्रतिबद्धता में निहित है. आज महिलाओं से संबंधित घरेलू हिंसा, महिलाओं से संबंधित सामाजिक बुराइयों, निरक्षरता, भेदभाव, स्वास्थ्य एवं कुपोषण और महिलाओं, विशेष रूप से ग्रामीण पृष्ठभूमि वाली महिलाओं के लिए राजनीतिक और आर्थिक अवसरों की कमी के मुद्दों ध्यान केंद्रित करना हमारा कर्तव्य है. हमारा प्रयास जेंडर समानता और विकास को सुरक्षित करने का होना चाहिए.  इस अवसर पर, मुझे यकीन है कि हमारे समाज में सभी महिलाओं के लिए समान अधिकार, समान अवसर और प्रगति लाने में स्वयं को पुनर्समर्पित करने में सभी सदस्य मेरा साथ देंगे. हमारे देश की निर्णय लेने की प्रक्रिया में महिलाओं को शामिल किया जाना है और हमारे देश की निरंतर प्रगति और उसका उज्ज्वल भविष्य सुनिश्चित करने के लिए महिलाओं के अधिकारों का सम्मान करने और किसी भी स्थिति में उनकी रक्षा करने की जरूरत है.

कृष्णा तीरथ ( महिला एवं बाल विकास मंत्रालय में राज्यमंत्री) : पूरे देश में खुशी की लहर है  इस अवसर पर मैं अपने मंत्रालय की ओर से एक वक्तव्य देना चाहती हूं.”समान अधकार, समान अवसर: सभी की प्रगति” विषय के साथ आज हम  अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मना रहे हैं. वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार, देश की कुल जनसंख्या में 48% महिलाएं हैं. महिलाओं को महत्वपूर्ण  मानव संसाधान मानते हुए, संविधान ने उन्हें न केवल बराबरी का दर्जा दिया बल्कि उनके पक्ष में सकारात्मक भेदभाव के उपाय करने के अधिकार भी सरकार को दिए. संविधान से प्रेरणा पाकर, भारत सरकार महिलाओं का चहुँमुखी कल्याण, विकास और सशक्तिकरण सुनिश्चित करने के लिए निरंतर प्रयास करती रही है. राष्ट्रीय न्यूनतम साझा  कार्यक्रम में निर्धारित शासन के  6 आधारभूत सिद्धांतों में महिलाओं को राजनैतिक, शैक्षणिक, आथिक और कानूनी रूप से सशक्त बनाने का सिद्धांत भी शामिल है. महिला एवं बाल विकास विभाग को महिला एवं बाल विकास राज्य मंत्री के स्वतंत्र प्रभार के अधीन 30.01.2006 से मंत्रालय का दर्जा दिया जाना इस दिशा में उठाया गया ऐतिहासिक कदम है. महिलाओं के लिए नोडल मंत्रालय होने के नाते, यह मंत्रालय महिलाओं के प्रति भेदभावों को समाप्त करने के लिए कानूनों की समीक्षा करके, महिलाओं के साथ न्याय सुनिश्चित करने के उद्देश्य से नये कानून  बनाकर और महिलाओं के सामाजिक एवं आथिक सशक्तिकरण के लिए विभिन्न कार्यक्रम चलाकर महिलाओं का सर्वागीण सशक्तिकरण करने के प्रयास कर रहा है. गरीबी मानव जाति के लिए अभिशाप है और गरीबों में भी महिलाओं को ही पुरुषों  की अपेक्षा अधिक तकलीफें झेलनी पड़ती हैं. हाल ही तक अर्थात् 31.03.2008 तक महिला एवं बाल विकास मंत्रालय स्व-सहायता दलों  के माध्यम से महिलाओं के सर्वागीण सशक्तिकरण के उद्देश्य से ‘स्वयंसिद्धा कार्यक्रम’ चला रहा था. इस स्कीम के अंतर्गत, 650 ब्लॉकों में 10.02 लाख लाभाथियों  के 69,774 स्व-सहायता दल गठित किए गए. इस कार्यक्रम के मूल्यांकन के निष्कर्ष और इसके कार्यान्वयन के दौरान प्राप्त अनुभवों के आधार पर इस स्कीम के विस्तार का मंत्रालय का प्रस्ताव है. चूंकि अधिकांश कामकाजी महिलाएं अनौपचारिक क्षेत्रों में कार्य कर रही हैं, इसलिए इन महिलाओं हेतु आय-अर्जन, कल्याण, सहायता सेवाएं, प्रशिक्षण, कौशलों के उन्नयन जैसी सुविधाएं सुनिश्चित करने वाली स्कीम की जरूरत महसूस की गई. महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाने पर जोर देते हुए अनौपचारिक क्षेत्र में कार्य कर रही महिलाओं का कल्याण सुनिश्चित करने के लिए 7वें योजना अवधि के दौरान “प्रशिक्षण एवं रोजगार कार्यक्रम को सहायता (स्टेप)” स्कीम शुरू की गई, जो सफलतापूर्वक चलाई जा रही है. केवल महिलाओं के सामाजिक एवं आथिक विकास के लिए शीर्ष वित्त-पोषक संगठन के रूप में सरकार ने वर्ष 1993 में राष्ट्रीय महिला कोष नाम से महिलाओं हेतु राष्ट्रीय ऋण कोष की स्थापना की. अब तक राष्ट्रीय महिला कोष ने 66,867 स्व-सहायता दलों  को 236.50 करोड़ रुपये के ऋण संवितरित किए हैं, जिनसे 6,68,650 महिलाएं लाभान्वित   हुई, राष्ट्रीय महिला कोष की लाभार्थियों पर कराए गए प्रभाव अध्ययनों से पता चला है कि कोष से प्राप्त ऋणों से लाभार्थ  महिलाओं के जीवन-स्तर में सुधार आया है. इन अध्ययनों से यह जानकारी भी मिली है कि अब स्कूल भेजी जाने वाली बालिकाओं की  संख्या बढ़ी है और स्कूली शिक्षा बीच में छोड़ने वाली बालिकाओं की संख्या में भी कमी आई है. महिला लाभार्थियों  में साक्षरता बढ़ी है. यह पाया गया है कि कोष की लाभार्थियों  में उद्यम चलाने, कामकाज के लिए अकेले घर से बाहर जाने का आत्मविश्वास बढ़ा है और यह प्रविर्तित  भी देखने में आई है कि महिलाएं खेतों में मजदूरी छोड़कर पशुओं की देखरेख, उजरती कार्य जैसे काम करने लगी हैं और आय पर उनके नियंत्रण एवं पारिवारिक निर्णयों में उनकी भागीदारी बढ़ी है. घरेलू हिंसा की घटनाओं में भी कमी आई  है. इससे यह पता चलता है कि स्व-सहायता दलों के माध्यम से गरीब महिलाओं के सामाजिक एवं आथिक उत्थान के लिए राष्ट्रीय महिला कोष का लघु वित्त कार्यक्रम भारत का सधिक सफल कार्यक्रम है. ऋण प्राप्त करने वाले महिला स्व-सहायता दलों की संख्या में तेजी से होती बढ़ोतरी को ध्यान में रखकर कोष की अधिकृत पूंजी में वृद्धि करके इसे सुदृढ़ बनाया जा रहा है. केन्द्रीय समाज कल्याण बोर्ड महिलाओं के विकास और सशक्तिकरण के लिए अनेक कार्यक्रम चलाने के अतिरिक्त जागरूकता विकास कार्यक्रम भी चलाता है. इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य महिलाओं में उनके अधिकारों  सि्थति और समस्याओं तथा अन्य सामाजिक सरोकारों के विषय में जागरूकता पैदा करना है. इस कार्यक्रम से महिलाओं को संगठित होने तथा सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक प्रकि्रयाओं में अपनी भागीदारी बढ़ाने में सहायता मिलती है. सरकार महिलाओं के सामाजिक एवं आथिक सशक्तिकरण हेतु राष्ट्रीय मिशन शुरू करने के लिए वचनबद्ध है. इस मिशन के अंतर्गत सरकार के विभिन्न महिला केंद्रित और महिलाओं से संबंधित कार्यक्रम समेकित रूप में चलाए जाएंगे. महिलाओं के सामाजिक, आथिक एवं शैक्षणिक सशक्तिकरण पर विशेष जोर दिया जाएगा. यह मिशन विभिन्न मंत्रालयों / विभागों  की स्कीमों /कार्यक्रमों का संकेंद्रण सुनिश्चित करके उक्त सभी मोर्चाí पर महिलाओं के सशक्तिकरण का प्रयास करेगा. महिलाओं की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति  का अध्ययन करने के लिए सरकार उच्च-स्तरीय समिति नियुक्त करने का प्रस्ताव भी कर रही है. इस समिति के निष्कर्ष के आधार पर सरकार भारतीय महिलाओं के सर्वागीण सशक्तिकरण के लिए जरूरी उपायों का निर्धारण करेगी. हमें विश्वास है कि इन प्रयासों से भारतीय महिलाओं की सामाजिक एवं आर्थिक  स्थिति  में स्पष्ट सुधार होगा और भारतीय समाज में महिलाओं के साथ भेदभाव अतीत की बात बनकर रह जाएगी.

9 मार्च 2010

अरुण जेटली : ( विपक्ष के नेता) : श्रीमान सभापति महोदय, आज सुबह जब मैं सदन में आया तो इस सदन के अन्य सदस्यों सहित मैंने भी सोचा कि मैं भी एक बनते हुए महान इतिहास का एक हिस्सा बनूंगा क्योंकि हम सभी हाल ही में सबसे प्रगतिशील कानूनों में से एक कानून बनाने में सहयोग देकर एक ऐतिहासिक जिम्मेदारी का निर्वहन कर रहे हैं. मेरी पार्टी की ओर से,  मैं आरंभ में ही बताना चाहता हूं कि हम सभी इस कानून का स्पष्ट समर्थन करते हैं. लेकिन, फिर,  सभापति महोदय, यह विशेषाधिकार, जो हम सबको मिला हुआ है, आज काफी हद तक कमजोर हो गया है. इस सदन में हमने एक नहीं,  बल्कि दो इतिहास देखा है. पहला, ज़ाहिर है, सौभाग्य की बात होगी कि हम सबसे प्रगतिशील कानूनों में से एक को अधिनियमित कर रहे हैं। दूसरा, और मुझे कोई संदेह नहीं है कि, हम सभी का सिर शर्म से झुक जाएगा क्योंकि हमने भारत के संसदीय लोकतंत्र के कुछ सबसे शर्मनाक घटनाओं को देखा है. मैं केवल यही सोचता हूं कि सभी संबंधित पक्षों द्वारा स्थिति को काफी परिपक्वता और नियंत्रण से संभाला जाना चाहिए था. इस प्रकार, इस विशेष कानून बनाने का विशेषाधिकार हम सभी के लिए कहीं अधिक सुखद हो गया होता. एक संवैधानिक संशोधन के जरिये महिला आरक्षण पर यह बहस डेढ़ दशक पुरानी हो चुकी है. एक मिथक है कि आरक्षण समाज में एक विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग बनाता है. सच्चाई यह है कि प्रकृति ने हम सभी को एक समान मानते हुए बनाया है.

 हमारा संविधान समानता प्रदान करता है, लेकिन हमारे समाज में स्थिति कुछ इस तरह की थी कि हमारी कुछ समानताएं, असमानताएं बन गईं  और इस असमानता का सबसे अच्छा सबूत यह है कि आजादी के 63 साल बाद भी हमारे समाज के  50 प्रतिशत भाग को लोकसभा में अधिकतम 10 प्रतिशत प्रतिनिधित्व मिला हुआ है. राज्य विधानसभाओं भी स्थिति इससे बहुत अलग नहीं है. महोदय, आज हम सब यहां एक कानून बनाने के लिए या एक कानून बनाने की प्रक्रिया आरंभ करने की सकारात्मक कार्रवाई के लिए इकट्ठे हुए हैं. आरक्षण कोटा जो हम लोकसभा में, और राज्य विधानसभाओं में भी, महिलाओं के लिए प्रदान करने जा रहे हैं वह समानता के उद्देश्य के लिए सक्रियता बढ़ाने में एक जरूरी औजार बनेगा, जिसकी परिकल्पना इस देश ने हमेशा की है. महोदय, हमने 15वीं लोकसभा आम चुनाव कराया था. पहले 15 चुनावों में देखा गया है कि 7 से 11 प्रतिशत महिलाएं लोकसभा के लिए निर्वाचित होती हैं. वह संख्या जिसमें महिलाएँ चुन कर आती रही हैं, वह इन 15 चुनावों में सात फीसदी से लेकर 11 फीसदी तक रही है. ..(व्यवधान).. आज 63 साल बाद भी यह आंकड़ा मौजूदा लोक सभा में भी 10.7 परसेंट पहुँचा है. यह जो तर्क दिया जाता है कि बिना आरक्षण के स्वाभाविक रूप से समाज जो आगे बढ़ रहा है तो महिलाओं का प्रतिनिधित्व भी अपने-आप बढ़ता चला जाएगा, 63 वर्ष तक हमारे सामने जो अनुभव आया है, उसमें हमने देखा है कि 63 वर्ष  तक यह परिस्थिति  नहीं बदली और अगर यह कानून नहीं आता तो हम यह सम्भावना भी मान लें कि शायद अगले 63 वर्ष  तक भी यह परिस्थिति  नहीं बदलने वाली है. इसीलिए, आज यह आवश्यक हो चुका है कि भारत की संसद और विधान सभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व भी पूर्ण मात्रा के रूप में सामने आये. सभापति जी, हम देश को एक बहुत बड़ी आथिक शक्ति के रूप में बनाना चाहते हैं. आज हम वह देश हैं जिसकी अपनी परमाणु शक्ति है,  but two-third of Indian children are born to women without medical help. आज जितनी कन्याएँ स्कूल छोड़ती हैं, who drop out, उनकी संख्या male child की तुलना में आ गयी है. अगर हम आज की परिस्थिति  को देखते हैं, सभापति जी, जो संविधान संशोधन पेश किया गया है, उसका जो सार है, वह बिल्कुल स्पष्ट है. इस संविधान संशोधन में प्रावधान है कि 15 वर्ष के लिए देश की लोक सभा में और विधान सभाओं में महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण प्रदान किया जाएगा.

जनसंख्या की दृष्टि से, बताया जाता है कि भारत में प्रत्येक 1000 पुरुषों पर 953 महिलाएं हैं. हमारे कानून, जिनमें से कुछ लागू भी हैं, जहां तक समाज के एक हिस्से का संबंध है, आज भी भेदभावपूर्ण हैं. महोदय, यदि आप हमारे पर्सनल कानूनों की स्थिति पर नजर डालें तो हमारे बहुत सारे पर्सनल कानूनों में अभी भी असमानता निहित है. मेरा हमेशा मानना रहा है कि हमारे संसद और विधान सभाओं में महिलाओं की कमतर उपस्थिति से ही आज भी भेदभावपूर्ण स्थिति बनी हुई है, जिससे हममें यह कहने का भी साहस नहीं है कि राज्य व्यवस्था और गरिमा का उल्लंघन करने वाले पर्सनल लॉ को …..महोदय, जहां तक सिस्टम का मामला है, हमने टोकनिज्म की पर्याप्त राजनीति कर ली है. टोकनिज्म की इस राजनीति से पता चलता है कि हमने विचारों की राजनीति को कैसे प्रतिस्थापित कर दिया है.

 इससे जहां तक महिलाओं का संबंध है, अब प्रतिनिधित्व की राजनीति में प्रतिस्थापित होना होगा. आपके पास कोई अधिकार नहीं है. विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में महिलाओं की सक्रियता और महिलाओं के उम्मीदवार के रूप में उभरने में एक क्षैतिज फैलाव आया है और प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र का वर्ष में किसी एक समय महिला उम्मीदवारों द्वारा प्रतिनिधित्व किया जाना चाहिए था. अब,  इसे विधानसभाओं,  स्थानीय निकाय सरकारों और पंचायतों के साथ जोड़कर इस संशोधन के बाद लागू कर दिया गया है. आज से 15 साल बाद यह संशोधन लाखों महिला कार्यकर्ताओं को सामने लायेगा, जो चुनाव लड़ने के लिए विभिन्न राजनीतिक दलों के लिए उपलब्ध होंगी.

अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को छोड़कर संसदीय और विधायी सीटों के लिए किसी अन्य आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है. इन महिला निर्वाचन क्षेत्रों में जो सीटें पहले से ही आरक्षित भी हैं तो वे अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए हैं.

यह जेंडर न्याय का एक नया इतिहास है जो हम लिख रहे हैं और इसलिए, हम सबको उत्साह से इसका समर्थन करना चाहिए. लेकिन, उसी समय में, जो घटनाएं घटी हैं और जिनमें  बड़ी संख्या में लोगों ने योगदान दिया है, मुझे लगता है कि उसने इस कानून का समर्थन करके हमारी भावना में खटास पैदा कर दी है. जब मैं इस कानून का स्पष्ट समर्थन करता हूं तो जो कुछ आज सदन में हुआ है, उसकी स्पष्ट निंदा भी कर सकता हूं. हम इस सदन में इसलिए नहीं आये थे. हम अपने कुछ सहयोगियों के साथ शारीरिक रूप से की जाने वाली हाथापाई और उनको इस सदन से बाहर किये जाना देखने नहीं आये थे. अगर हम इसे अधिक सौहार्दपूर्ण तरीके से कर पाते यह बेहतर होता.

महोदय, हमें नहीं भूलना चाहिए कि इस देश ने एक समय संविधान के 42वें संशोधन का विरोध करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को जेल में डाल कर 42वें संशोधन को पारित कर दिया था. जो लोग 42वें संशोधन के विरोध में थे, वे इसका विरोध कर सकते थे, लेकिन इमरजेंसी के दौरान वे जेल में बंद थे. जिसका असर यह हुआ कि इमरजेंसी हटा ली गई और उस को संशोधन काफी हद तक निरस्त करना पड़ा था. इसलिए, हमारा अनुभव रहा है कि भले ही इसका विरोध करने वाले मित्रों से मैं असहमत हूं, लेकिन हमें उनकी आवाज सुननी चाहिए और इस कानून के खिलाफ उन्हें वोट करने का अधिकार देना चाहिए. मुझे लगता है कि हममें से 85 से 90 प्रतिशत का एक भारी बहुमत इस विधेयक के समर्थन में है. इसका विरोध करने वाले अपने मित्रों से मैं इसका समर्थन करने का अपील भी करूंगा क्योंकि इस सदन में एक विशाल बहुमत विधेयक का समर्थन कर रहा है.

आपको लोकतंत्र की भावना का भी सम्मान करना चाहिए. अगर 85-90 प्रतिशत सदस्य इसका समर्थन कर रहे हैं,  तो उन्हें बहुमत के अधिकार का प्रयोग करने की अनुमति दें. एक छोटा सा अल्पसंख्यक समूह उन्हें कार्यवाही चलने देने के लिए अनुमति नहीं देने का दबाव नहीं डाल सकता है, और, इसलिए, आप अपने उन सहयोगियों को समझायें जिनको सदन से बाहर जाने के लिए कहा गया है, कि इस सदन के चलने के लिए एक सौहार्दपूर्ण  माहौल बनायें. आपके पास इस विधेयक के खिलाफ बोलने का अधिकार है; आपके पास इससे असहमत होने का अधिकार है; लेकिन, निश्चित रूप से, बहुमत के जनादेश को बाधित करने का आपको कोई अधिकार नहीं है. अगर हम एक-दूसरे का सम्मान करें तो मुझे यकीन है कि यह विधेयक जिस भावना के साथ हम इसे पारित करना चाहते हैं, वैसे ही पारित हो जाएगा.  महोदय,  जब हम इस कानून को स्पष्ट समर्थन दे ही रहे हैं तो हमें उन तरीकों के बारे में सोचना चाहिए जिसकी आप पहलकदमी ले सकें, ताकि इस सदन में एक सौहार्दपूर्ण माहौल बनाया जा सके; और जो हमारे खिलाफ हैं, जहां तक इस सदन का सवाल है, उनकी आवाज सुनी जानी चाहिए. इन शब्दों के साथ, मैं इस कानून का समर्थन करता हूं. धन्यवाद…

अरुण जेटली : सभापति जी, इस एक-तिहाई आरक्षण के सिद्धांत को लागू करने के लिए एक रोटेशन की प्रक्रिया  लागू की जाएगी. हर विधान सभा में और लोक सभा में एक-तिहाई सीटें हर आम चुनाव के अंदर आकर्षित की जाएंगी और अगले चुनाव के अंदर वे बदली जाएंगी. हम देखते हैं कि संविधान में 73वें और 74वें संशोधन के बाद ग्राम पंचायतों में और अन्य पंचायतों में तथा local self bodies में जब से महिलाओं की भागीदारी आरंभ हुई है, उसका प्रत्यक्ष असर आज यह है कि इन 15-17 वर्ष के बाद हालांकि कानून में उनके लिए केवल 33 फीसदी आरक्षण है, लेकिन वास्तविकता में इन 15 वर्ष  के बाद करीब 48 प्रतिशत महिलाएं आज ग्राम पंचायतों में चुने हुए पदों पर कायम हैं.  सभापति जी, अगर हम दूसरे देशों का अनुभव देखते हैं, तो आज यह कानून केवल भारत में नहीं आ रहा है, दुनिया के विभिन्न देशों के अंदर यह प्रयोग में लाया गया है और दुनिया के विभिन्न देशों में इसको तीन अलग-अलग प्रक्रियाओं के माध्यम से लागू करने का प्रयास किया गया है। पहला सुझाव यह रहा कि कुछ देश राजनीतिक दलों  के लिए एक पोलिटिकल पार्ट कोटा फिक्स कर लेते हैं. राजनीतिक दलों के लिए जो कोटा फिक्स होता है, उसके माध्यम से आरक्षण लेने का प्रयास करते हैं. कुछ देशों के अंदर लिस्ट सिस्टम के माध्यम से हुआ और कुछ देशों के अंदर ऐसे चुनाव क्षेत्र हैं, जिनको आकर्षित  किया जाता है. जब हम इसका अध्ययन करते हैं और इन व्यवस्थाओं को अपने देश में लागू करने का प्रयास करते हैं, तो अनुभव में यह आया कि जिन देशों के अंदर चुनाव क्षेत्रों  को आकर्षित  किया गया है, यह प्रयोग सबसे ज्यादा उन्हीं देशों के अंदर सफल हो पाया है. दुनिया के जो पिछड़े देश हैं, अफ्रीका के देश हैं. युवाना जैसे देश में वहां की संसद के अंदर महिलाओं का प्रतिनिधित्व दुनिया में सबसे अधिक हो गया है, क्यों कि वहां चुनाव क्षेत्रों  का आरक्षण किया गया था. अफगानिस्तान और पाकिस्तान जैसे देश, जहां चुनाव क्षेत्रों  का आरक्षण किया गया था, उन देशों के अंदर भी आरक्षण की  प्रक्रिया  सफल हुई. इस प्रयोग को जब हम अपने देश के ऊपर लागू करने का प्रयास करते हैं, तो इसके जितने भी आलोचक हैं और मेरे मित्र, जिनके अन्यथा विचार हैं, मैं उनसे आग्रह करूंगा कि इस पर हमारी जो धारणा है और उसका जो विश्लेषण है, वे उसे भी एक बार समझाने का प्रयास करें. राजनीतिक दलों  के ऊपर कोटा बन जाए, यह सुझााव आता रहा है. शायद आज का जो संविधान है, उस संविधानकी धाराएं जब मैं पढ़ता हूं, तो बिना उसको तब्दील किए हुए यह अपने देश में संभव नहीं हो सकता.

लेकिन जिन देशों ने लागू किया है, उनमें एक युनाइटेड किंगडम का उदाहरण है. आज युनाइटेड किंगडम के अंदर, राजनीतिक दलों  के ऊपर कोटा लागू है. वे चुनाव क्षेत्रों के अंदर महिला उम्मीदवार उतारते हैं. उस कानून के अंदर कितनी संख्या है, इसका उसमें प्रावधान है. यदि आज हम वहां का अनुभव देखें, तो ब्रिटेन  में पाकिस्तान और अफगानिस्तान की तुलना में कम फीसदी महिलाएं हैं, जो उस प्रक्रिया  के माध्यम से हाउस ऑफ कॉमन्स के अंदर जीतकर आई हैं..(व्यवधान).. पाकिस्तान में चुनाव क्षेत्रों में लागू करना, अफगानिस्तान में चुनाव क्षेत्रों में लागू करना  जहां की महिलाओं को हम पिछड़ा मानते हैं, उनको अधिक प्रतिनिधित्व मिल पाया है, बनिस्पत युनाइटेड किंगडम जैसे देश में, जहां राजनीतिक दलों  के ऊपर एक कोटा लागू हुआ था. इसलिए मैं मानता हूं कि चुनाव क्षेत्रों  द्वारा.. यह निश्चित करना इस देश की वर्तमान भूमिका के अंदर ज्यादा सफल रहने वाला है. सभापति जी, यह आलोचना की जाती है कि जो रोटेशन की प्रक्रिया  है, उस रोटेशन की प्रक्रिया को नहीं रखना चाहिए. यह कानून पंद्रह वर्ष के लिए है. पंद्रह वर्ष में अगर तीन आम चुनाव होते हैं और हर चुनाव के अंदर अगर एक तिहाई सीटें आकर्षित  रहती हैं, तो पंद्रह वर्ष के बाद महिला आरक्षण देश के माध्यम से हर चुनाव क्षेत्र तक पहुंच चुका होगा.  सभापति जी, यह भी आलोचना की गई कि यह आरक्षण देते वक्त समाज में कुछ और वर्ग हैं, जिनके लिए सब-कोटा रखना चाहिए आज हमारी संवैधानिक व्यवस्था के तहत जो एस.सी. और एस.टी. समुदाय हैं, उनके लिए चुनाव क्षेत्रों  में आरक्षण की व्यवस्था है, किसी अन्य के लिए व्यवस्था नहीं है
आज देश की विभिन्न विधानसभाएं कानून बना रही हैं. एक तिहाई के स्थान पर, पचास फीसदी तक महिलाओं को ग्राम पंचायतों में लोकल सेल्फ गवर्नमेंट में आरक्षण दिया जा रहा है .कई विधान सभाओं में बहुत सफलता से कई राज्यों  में लागू हुआ है, लेकिन जहां आपको पसंद नहीं आता..(व्यवधान)..गुजरात का उदाहरण है , चार महीने पहले कानून पारित हुआ था, लेकिन आज तक उस कानून को वहां के राज्यपाल स्वीकृति नहीं दे रहे..(व्यवधान)..इस प्रकार के दोहरे मापदंड कांग्रेस पार्टी  द्वारा भी नहीं चल पाएंगे ..(व्यवधान)..सभापति जी, मैं यह मानता था, जो मैंने आरंभ में कहा..(व्यवधान)..कि आज हम इतिहास बनाने जा रहे हैं.

क्रमशः

शुभम श्री की पुरस्कृत और अन्य कविताएं : स्त्रीकाल व्हाट्सअप ग्रूप की टिप्पणियाँ

शुभम श्री की ‘पोएट्री मैनेजमेण्ट’ कविता को इस वर्ष का  भारत भूषण अग्रवाल सम्मान देने की घोषणा हुई है.  कहानीकार और कवि उदय प्रकाश इस बार इस सम्मान के निर्णायक थे.  इस कविता को सम्मान दिये जाने पर सोशल मीडिया में काफी आपत्तियां दिखीं . मैंने स्त्रीकाल व्हाट्स अप ग्रूप में सदस्यों की राय माँगी, अपनी ओपन कमेंट्री के साथ कि  मुझे यह कविता अच्छी लगी. ग्रूप की साथी और कवयित्री आरती मिश्रा ने बताया कि इसी दौरान शुभम की एक और कविता बहस के केंद्र में है. उन्होंने
“मेरे हॉस्टल के सफाई कर्मचारी ने सेनिटरी नैपकिन फेंकने से इनकार कर दिया है” कविता ग्रूप में पोस्ट की. प्रस्तुत है स्त्रीकाल व्हाट्स अप ग्रूप की टिप्पणियाँ और दोनो कविताएं. 
संपादक

पुरस्कृत कविता अच्छी लगी. नयी शैली, नये बिम्ब कविता के पारम्परिक मानदंडों से अलग हैं इसलिए हल्ला हो रहा है. फिर सवाल यह भी है कि कविता क्या है यह कौन तय करेगा? पिछले 1000 साल या ज्यादा समय में कविता ने कितने रूप बदल लिए ऐसे में यह सवाल बेमानी है कि यह कविता है या नहीं. रही बात हाय तौबा की तो वह हर मौके पर मचती है. उदय जी को और शुभम श्री दोनों को बधाई.
पूजा सिंह ( साहित्यिक -सांस्कृतिक पत्रकार)
ये तो सिरे से ही गलत है कि ये कविता नहीं है. उस पर से दोनों कविताएं असर कारक हैं. बेहद प्रभावी.
मजकूर आलम ( लेखक)
मुख्य जो कविता है वह अपनी शैली और प्रयोग में नई तरह की मुद्रा निर्माण करती है. जिस तरह पत्रकारिता में सूचनाओं व अहवाल की पद्धति होती है ऐसी पद्धति से कथन के बिखराव के साथ, कहन के एक दूसरे को काटते फैले हुए टुकड़ों के साथ समाज और जीवन के कितने सारे कोनों से भाषा पैटर्न्स आई है इस रचना में. कुल मिलाकर आज के विवरिंग समय और मूल्यबोध के प्रति भाषा की ये पैटर्न्स कटाक्ष भरे सेटायर में तब्दील हो जाती है. कथन और सामग्री के बिखराव की पद्धति के कारण यह कविता बहस में फंस गई होगी.
फारूक शाह ( कवि/ आलोचक ) 

पुरस्कृत कविता : 

पोएट्री मैनेजमेण्ट

कविता लिखना बोगस काम है !
अरे फ़ालतू है !
एकदम
बेधन्धा का धन्धा !
पार्ट टाइम !
साला कुछ जुगाड़ लगता एमबीए-सेमबीए टाइप
मज्जा आ जाता गुरु !
माने इधर कविता लिखी उधर सेंसेक्स गिरा
कवि ढिमकाना जी ने लिखी पूँजीवाद विरोधी कविता
सेंसेक्स लुढ़का
चैनल पर चर्चा
यह अमेरिकी साम्राज्यवाद के गिरने का नमूना है
क्या अमेरिका कर पाएगा वेनेजुएला से प्रेरित हो रहे कवियों पर काबू?
वित्त मन्त्री का बयान
छोटे निवेशक भरोसा रखें
आरबीआई फटाक रेपो रेट बढ़ा देगी
मीडिया में हलचल
समकालीन कविता पर संग्रह छप रहा है
आपको क्या लगता है आम आदमी कैसे सामना करेगा इस संग्रह का ?
अपने जवाब हमें एसएमएस करें
अबे, सीपीओ (चीफ़ पोएट्री ऑफ़िसर) की तो शान पट्टी हो जाएगी !
हर प्रोग्राम में ऐड आएगा
रिलायंस डिजिटल पोएट्री
लाइफ  बनाए पोएटिक
टाटा कविता
हर शब्द सिर्फ़ आपके लिए
लोग ड्राइँग रूम में कविता टाँगेंगे
अरे वाह बहुत शानदार है
किसी साहित्य अकादमी वाले की लगती है
नहीं जी, इम्पोर्टेड है
असली तो करोड़ों डॉलर की थी
हमने डुप्लीकेट ले ली
बच्चे निबन्ध लिखेंगे
मैं बड़ी होकर एमबीए करना चाहती हूँ
एलआईसी पोएट्री इंश्योरेंस
आपका सपना हमारा भी है
डीयू पोएट्री ऑनर्स, आसमान पर कटऑफ़
पैट (पोएट्री एप्टीट्यूड टैस्ट)
की परीक्षाओं में फिर लड़ियाँ अव्वल
पैट आरक्षण में धाँधली के ख़िलाफ़ विद्यार्थियों ने फूँका वीसी का पुतला
देश में आठ नए भारतीय काव्य संस्थानों पर मुहर
तीन साल की उम्र में तीन हज़ार कविताएँ याद
भारत का नन्हा अजूबा
ईरान के रुख  से चिन्तित अमेरिका
फ़ारसी कविता की परम्परा से किया परास्त
ये है ऑल इण्डिया रेडियो
अब आप सुनें सीमा आनन्द से हिन्दी में समाचार
नमस्कार
आज प्रधानमन्त्री तीन दिवसीय अन्तरराष्ट्रीय काव्य सम्मेलन के लिए रवाना हो गए
इसमें देश के सभी कविता गुटों के प्रतिनिधि शामिल हैं
विदेश मन्त्री ने स्पष्ट किया है कि भारत किसी क़ीमत पर काव्य नीति नहीं बदलेगा
भारत पाकिस्तान काव्य वार्ता आज फिर विफल हो गई
पाकिस्तान का कहना है कि इक़बाल, मण्टो और फैज से भारत अपना दावा वापस ले
चीन ने आज फिर नए काव्यालंकारों का परीक्षण किया
सूत्रों का कहना है कि यह अलंकार फिलहाल दुनिया के सबसे शक्तिशाली
काव्य संकलन पैदा करेंगे
भारत के प्रमुख काव्य निर्माता आशिक  आवारा जी का आज तड़के निधन हो गया
उनकी असमय मृत्यु पर राष्ट्रपति ने शोक ज़ाहिर किया है
उत्तर प्रदेश में फिर दलित कवियों पर हमला
उधर खेलों में भारत ने लगातार तीसरी बार
कविता अंत्याक्षरी का स्वर्ण पदक जीत लिया है
भारत ने सीधे सेटों में ‍‍६-५, ६-४, ७-२ से यह मैच जीता
समाचार समाप्त हुए
आ गया आज का हिन्दू, हिन्दुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण, प्रभात खबर
युवाओं पर चढ़ा पोएट हेयरस्टाइल का बुखार
कवियित्रियों से सीखें हृस्व दीर्घ के राज़
३० वर्षीय एमपीए युवक के लिए घरेलू, कान्वेण्ट एजुकेटेड, संस्कारी वधू चाहिए
२५ वर्षीय एमपीए गोरी, स्लिम, लम्बी कन्या के लिए योग्य वर सम्पर्क करें
गुरु मज़ा आ रहा है
सुनाते रहो
अपन तो हीरो हो जाएँगे
जहाँ निकलेंगे वहीं ऑटोग्राफ़
जुल्म हो जाएगा गुरु
चुप बे
थर्ड डिविज़न एम० ए०
एमबीए की फ़ीस कौन देगा?
प्रूफ  कर बैठ के
खाली पीली बकवास करता है !

बहस में दूसरी कविता

“मेरे हॉस्टल के सफाई कर्मचारी ने सेनिटरी नैपकिन फेंकने से इनकार कर दिया है”

ये कोई नई बात नहीं
लंबी परंपरा है
मासिक चक्र से घृणा करने की
‘अपवित्रता’ की इस लक्ष्मण रेखा में
कैद है आधी आबादी
अक्सर
रहस्य-सा खड़ा करते हुए सेनिटरी नैपकिन के विज्ञापन
दुविधा में डाल देते हैं संस्कारों को…
झेंपती हुई टेढ़ी मुस्कराहटों के साथ खरीदा बेचा जाता है इन्हें
और इस्तेमाल के बाद
संसार की सबसे घृणित वस्तु बन जाती हैं
सेनिटरी नैपकिन ही नहीं, उनकी समानधर्माएँ भी
पुराने कपड़ों के टुकड़े
आँचल का कोर
दुपट्टे का टुकड़ा
रास्ते में पड़े हों तो
मुस्करा उठते हैं लड़के
झेंप जाती हैं लड़कियाँ
हमारी इन बहिष्कृत दोस्तों को
घर का कूड़ेदान भी नसीब नहीं
अभिशप्त हैं वे सबकी नजरों से दूर
निर्वासित होने को
अगर कभी आ जाती हैं सामने
तो ऐसे घूरा जाता है
जिसकी तीव्रता नापने का यंत्र अब तक नहीं बना…
इनका कसूर शायद ये है
कि सोख लेती हैं चुपचाप
एक नष्ट हो चुके गर्भ बीज को
या फिर ये कि
मासिक धर्म की स्तुति में
पूर्वजों ने श्लोक नहीं बनाए
वीर्य की प्रशस्ति की तरह
मुझे पता है ये बेहद कमजोर कविता है
मासिक चक्र से गुजरती औरत की तरह
पर क्या करूँ
मुझे समझ नहीं आता कि
वीर्य को धारण करनेवाले अंतर्वस्त्र
क्यों शान से अलगनी पर जगह पाते हैं
धुलते ही ‘पवित्र’ हो जाते हैं
और किसी गुमनाम कोने में
फेंक दिए जाते हैं
उस खून से सने कपड़े
जो बेहद पीड़ा, तनाव और कष्ट के साथ
किसी योनि से बाहर आया है
मेरे हॉस्टल के सफाई कर्मचारी ने सेनिटरी नैपकिन
फेंकने से कर दिया है इनकार
बौद्धिक बहस चल रही है
कि अखबार में अच्छी तरह लपेटा जाए उन्हें
ढँका जाए ताकि दिखे नहीं जरा भी उनकी सूरत
करीने से डाला जाए कूड़ेदान में
न कि छोड़ दिया जाए
‘जहाँ तहाँ’ अनावृत …
पता नहीं क्यों
मुझे सुनाई नहीं दे रहा
उस सफाई कर्मचारी का इनकार
गूँज रहे हैं कानों में वीर्य की स्तुति में लिखे श्लोक….

इस कविता के कंटेंट को यदि कचरा उठाने वाले के नजरिये से देखा जायेगा तो
गलत लगेगी, लेकिन यदि धर्माचार्यों के  मासिक चक्र के अपवित्र  घोषणा और
सामाजिक मान्यताओं की जिल्लातो के मद्देनजर रखकर देखा जाय तो कविता काफी
सच  कहती है.
आरती मिश्रा ( कवयित्री)
शुभम श्री की दोनों ही
कविताएँ एक नया कोण हैं. अपनी गद्यात्मकता में भी ख़ासा पैनापन है.
व्यंजना कथ्य का नया आसमान दिखाती है. मेरे विचार में मार्मिक, कटु सत्य का
उद्घाटन करने वाली कविताएँ हैं दोनों.
हेमलता माहिश्वर ( कवयित्री/ आलोचक)
कई
बार कविता एक विभ्रम की तरह होती है..नजरिये और पुनर्पाठ में यह एक नए
उद्दबोध के साथ पुनर्स्थापित करने का प्रयास करती है…कविता की रूहानी रूह
अलग-अलग होती है पर थोड़े बहुत ही सही हरेक कविता में यह एक तत्व के रूप
में मौजूद अवश्य रहता है..आज जो प्रत्यक्ष  दिखने वाला संसार है न दरअसल वह
आभासी यथार्थ का संसार है . यहाँ आदर्शों , आदर्शवाक्यों  , घोषणापत्रों
,सजावटों , पच्चीकारियों , नकाबों , बहुरूपों , विभ्रमों, व्यंग्यों, और
कपट अलग-अलग रूप में व्यक्त होता है… जब आप कविता पढ़ रहे होते है तो साथ
साथ इन मानकों पर हम कविता को तौल भी रहे होते है…
शुभम श्री जी
की कविता को विवाद को देखकर मैंने कई मानकों पर खलने का प्रयास किया. कविता
की आंत्रगता उलझे अर्थों के साथ अलग हो रही थी..कई स्थानों पर कविता का
मूल तत्व हमें छीज रहा था..और हम सहज नहीं थे इसके मूल को पकड़ने
में…कविता का हर स्टेन्जा पिछले के साथ पूरी तरह से अटैच्ड नहीं था . यह
एक तरह से विडाउट कैरेक्टर Nincompoop की तरह विभ्रम लगा. हा शुभम श्री की
दूसरी कविता कथ्य और तथ्य दोनों में ध्यान खींचती है…एक पाठकीय मिज़ाज
वालों के लिए और स्त्री विमर्श को काफी स्पेस देती है वशर्ते इसे घृणादिक
मानकर न पढ़ा जाये…यह मुकम्मल कविता है.
राकेश पाठक ( कवि)
मुझे
अच्छी लगी दोनों ही कवितायें. क्या चाँद ,तारों और प्रेम का पालागन ही
कवितायेँ होती है .कविता केशब्द सहजता से सम्प्रेषित हो और सार आपको झिझोड़
दे ,सही अर्थो में वही सच्ची कविता है .
प्रवेश सोनी ( लेखिका/ चित्रकार)

दास्तान ए सोती सुंदरी वाया परीदेश की राजकुमारियां

अल्पना मिश्र

एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय
संपर्क : alpana.mishra@yahoo.co.in

क्या आप सोती सुंदरी को जानते हैं ? क्या उसकी कहानी आपको याद है ? वही, जो अंग्रेजी के ‘फेयरी टेल्स’ से निकल कर हिंदुस्तानी परी देश के इलाके से होते हुए हमारे जीवन में धंस जाती है. लगता ही नहीं कि यह एक अंग्रेजी अनुवाद के रूप में हमारे पास आई थी, यह तो हमारी परियों वाली कहानी से ‘सिस्टरहुड’ की तरह जुड़ी हुई है. ‘सिंड्रेला’ और ‘लम्बे सुनहरे बालों वाली राजकुमारी’, इसी का विस्तार जैसे हैं. तो क्या दुनिया के तमाम देशों में बच्चों के लिए ऐसी ही कहानियाॅ रची गईं ?
इसे दूसरी तरह से भी कहा जा सकता है. मसलन, हममें से ज्यादातर को अपने बचपन में सुनी परी देश की राजकुमारियों या अन्य राजकुमारियों की कहानियां   याद होंगी, कितनी सुंदर थीं वे, कि कोई भी देखता रह जाए, कितनी नाजुक थी वे, कि फूल भी शर्मा जाएं, कितनी गुणवंती कि कितना भी काम करवा लो, कितनी नेक, कि कोई भी बहला फुसला कर राह भटका दे !


 हमारे मन मस्तिष्क में स्त्री के सौंदर्य का पहला बिम्ब उन्हीं से तैयार होता है और इतने गहरे पैठता है कि उससे मुक्त होना आसान नहीं रह जाता. तब भी नहीं, जब कि आप एक लेखक बन चुके होते हैं! स्त्री असमानता को लेकर रचे गए इस मोहक पाठ से मुक्त होना तब भी मुश्किल ही होता है, इसलिए अधिकतर लेखक इस गड़बड़झाले के शिकार होते हैं और स्त्री पात्रों के आते ही अपने लेखन में चुपके से असमानता के इसी पाठ के प्रमोटर बन जाते हैं. जाहिर है कि नानी की कहानियों ने हमारी कल्पनाशक्ति बढ़ाने में मदद की है, जो कि कहानी सुनाने के पीछे सदा एक उद्देश्य की तरह रहा ही है. नतीजा, बचपन में कई बार हम खुद भी इन कहानियों को आगे बढ़ाने में बढ़ चढ़ कर भाग लेने लगते रहे हैं, कुछ न कुछ जोड़ते जाते, कहानी खिलती जाती, इस तरह कहानी कहने का हमारा भी एक हुनर प्रशंसा पा जाता. लेकिन बिना यह जाने कि आगे बढ़ाने की इस प्रक्रिया में हम कौन सी चीजें, कौन से विचार आगे बढ़ा रहे हैं! कौन सी थाती हमें ऐसे अनजाने थमा दी गई है, जिसे आगे ट्रांसफर करते जाने की जिम्मेदारी बिना किसी के कहे हँसते हँसते  हम उठाते चले जाते हैं !


दिल पर हाथ रख कर कहिए कि क्या इन कहानियों ने बचपन में आपको दुखी नहीं किया ? मुझे तो बचपन में इन कहानियों ने खूब रूलाया था, कितने रातों की नींद छीनी थी, कितने प्रश्नों ने मथा था, कितना बेचैन और असंतुष्ट बनाया था, लेकिन न किसी को इसकी फिक्र थी, न प्रश्नों के उत्तर ही थे. ‘कहानी गई वन में, सोचो अपने मन में’ वाले अंदाज में सिर्फ सोचना ही हाथ आता. सोचने में बड़ा दुख होता, जब दिखता कि परी देश की राजकुमारियां  हों या अन्य राजकुमारियां  जब भी अकेले बाहर निकली हैं, राक्षसों या असामाजिक तत्वों ने उन्हें कैद कर लिया है. उनका अकेले बाहर निकलना निषिद्ध है, यह बात कितने प्यार से समझा दी गई है. जो नहीं मानता, ‘वो रोये अपने मन में, कलसे अपने घर में !’ तेा ये प्यारी प्यारी राजकुमारियां अकेले सैर पर निकलने का या दुनिया जान लेने के लिए घर से बाहर निकलने का जोखिम लेती हैं और पकड़ी जाती हैं, दंडित तो होना होगा, नियम जो तोड़ा है उन्होंने. ‘दुस्साहस’ शब्द स्त्री के लिए नहीं बनाया गया था ! ये कहानियां लड़कियों के मन में डर भरने का बारीक मनोविज्ञान है. जब भी लड़कियां  बाहर निकलेंगी, उन्हें वह डर याद आयेगा, जो बचपन में ही समझा दिया गया था. इतने मोहक तरीके से समझा देने का कोई और माध्यम शायद है भी नहीं ! और अब, जब कि वे कैद में हैं तो उन्हें उस दिए गए जबरदस्त फार्मूले को याद करना होगा- किस्मत ! किस्मत है, तो कोई राजकुमार आएगा और उन्हें मुक्त करायेगा ! न आया तो फिर उसी किस्मत का दोष !



पता नहीं हजारों मामलों में किसी एक में राजकुमार आ भी जाता हो ! फिलहाल उसके बाद की कहानी की जरूरत नहीं होती. क्योंकि राजकुमार के हाथों मुक्त होने के बाद और क्या चाहिए ? सोती सुंदरी की कहानी बहुत प्यार से बताती है कि एक राजा रानी के यहां बहुत समय से संतान नहीं हुई. फिर कन्या हुई, जिसे पाकर वे खुश हुए, कम से कम किन्हीं परिस्थितियों में तो कन्या को पा कर खुश होना है. राजा ने दावत में सात परियों को बुलाया लेकिन बूढ़ी परी छूट गई. बूढ़ी हो कर वह इतनी उपेक्षित हुई कि दावत के निमंत्रण के समय राजा उसे भूल गए! बूढ़ी स्त्री अपनी उपादेयता खो कर चिड़चिड़ी हो जाए तो कुछ अस्वाभाविक भी नहीं. लेकिन वह तो प्रतिशोध पर उतर आई. यानी जो इस समाज के काम का नहीं, उसे निमंत्रित करने में भूल होना बड़ी बात नहीं, दूसरे वह खल पात्र ही होगा, स्त्री हुई तो कुटिल कुटनी. बूढ़ी परी भी ऐसी ही दिखती है, न्याय पक्ष को समलत बनाती हुई. वह शाप देती है कि नन्ही राजकुमारी की उंगली में तकुआ चुभ जाएगा और वह मर जायेगी. हॅलाकि सातवीं परी उसके शाप को कुछ कमजोर कर देती है तथापि समाज के उपेक्षित हिस्से का शाप भय तो पैदा करता ही है, तभी तो राजा उससे डरता है, कहानी भी यही बताती है. इसलिए राजा पूरे राज्य में चरखे पर बैन लगा देता है.  प्रश्न यह उठता है कि चरखा बंद करा कर राजा ने कितने बड़े हिस्से को बेरोजगारी की सौगात दी ? उन लोगों का खर्चा पानी कैसे चलता रहा, जिनके व्यवसाय बंद करा दिए गए ?

इसका जवाब मुझे आज तक नहीं मिला. फिर भी राजकुमारी के सोलह वर्ष के होते ही उसके हाथ में तकुआ चुभा और वह बेहोश हुई. इसका मतलब चुपके चुपके चरखा चलाया जा रहा था, लोग कपड़े तब बुने हुए ही पहनते थे, तो बुनाई कताई जारी थी, ठीक राजा के नाक के नीचे, उन्हीं के महल में चरखा था ! यानी राजा ने अपनी सुविधा नहीं खोई थी. महलवालों के कपड़े तैयार किए जा रहे थे ! दोस्तों, जादू से चरखा आ गया, जैसी बात बेकार होगी. लेकिन राजकुमारियों के लिए यह सीख जरूर है कि रोजगार सीखने की कोशिश न करना, वरना ऐसे ही सौ वर्ष तक सुला दी जाओगी. तो राजकुमारी सो गई, वह भी सौ वर्षों के लिए. सौ वर्ष कोई मामूली समय नहीं होता. यह समय बच्चों को कितना बेचैन बनाता है. यह कुछ ज्यादा लम्बा है, पर समाज को देखें तो बिल्कुल लम्बा नहीं ! समाज में स्त्री के लिए तय भूमिकाओं में परिवर्तन की यही गतिकी है शायद ! सौ वर्ष की नींद है या दिमाग का बंद कर दिया जाना है ! सारा महल राजकुमारी की नींद के साथ ही नींद में चला गया है. या राजकुमारी के लिए ‘सो गए’ जैसा हो गया है. नींद में कही गई, सुनी गई बातों का क्या अर्थ ! ध्यान रहे कि राजकुमारी उस उम्र में सुला दी गई है, जो संभावनाओं की सबसे चमकती उम्र है. इसके बाद नींद ही है, जहां  से व्यवस्था जारी रखी जा सकती है. चलिए,

आखिर सौ साल बाद ही सही, एक राजकुमार शिकार खेलता, महल के जंगल, झाड़ियाॅ साफ करता, रास्ता बनाता, शौर्य के भरपूर प्रदर्शन के साथ दाखिल होता है. इस सोती सुंदरी का जीवन भी बिना राजकुमार के आए नींद से नहीं जग पाता ! जैसा कि भारतीय राजकुमारियों के साथ था. इनके पास अपने को बचाने की न कोई तरकीब है, न तैयारी, न दिशा, सिर्फ दंड का भय है ! और एक सपना, यह सपना कितनी कोमलता से इन्हें थमाया गया है, यही एकमात्र तय रास्ता है- किसी राजकुमार की प्रतीक्षा ! यह प्रतीक्षा भी किस्मत से जुड़ी हुई है. ‘किस्मत’ एक फार्मूला है, जो नींद में पंहुचाने और फिर जगाने, दोनों स्थितियों में काम का है. आज बड़ों की शिकायत यह है कि बच्चे कहानियां  सुने बिना बड़े हो रहे हैं. शायद यह भला ही है कि वे इन कहानियों को नहीं सुन रहे. कम से कम उनके दिमाग को अनुकूलित किए जाने का यह एक रास्ता कुछ कमजोर पड़ा है, हंलाकि दूसरी तमाम चीजें इसका स्थानापन्न बनाती हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

जनसत्ता  से साभार

प्रत्यूष चन्द्र मिश्रा की कवितायें

प्रत्यूष चन्द्र मिश्रा


युवा कवि. विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं में कवितायें प्रकाशित. संपर्क :9122493975,pcmishra2012@gmail.com

तीन बेटियों वाला घर 

विदा हो रही है घर की बड़ी बेटी आई थी
पिछले महीने गर्मी की छुट्टियों में
डूब उतरा रहा है घर
माँ की हिचकियों और बेटी की रुलाइयों में
फिर आऊंगा माँ
छुटकी की शादी में
ये भी आतुर रहते हैं हर बार
कहते हैं आराम मिल जाता है काम से
कुछ दिनों के लिए
और हाँ माँ  तुम भी अब ज्यादा काम मत करना
और छुटकी के बाद बड़े की शादी भी जल्दी कर देना
रोना नहीं माँ
पूरी जिंदगी तो रोती ही रही तुम
अब क्यों करती हो चिंता
मुझसे और मंझली से तो निश्चिन्त ही हो गयी तुम
छुटकी भी लग ही जाएगी पार इस साल
तू क्यों रोती है माँ
मैं खुश हूँ वहां
किसी चीज की कमी नहीं है मुझे
सभी तो मानते हैं मुझे
आ ही जाती हूँ साल में एक बार
और झगड़ा मत करना बाबूजी से
वे भी तो पड़ जाते हैं अकेले
मन न लगे तो चले जाना बड़े के पास
और ये जो पैसे दिए है तुमने
इसे अपने पास ही रखो
वक्त बेवक्त काम आयेंगे
और ये बोरी में क्या डाल दिया है इतना-सा
थोडा सा सत्तू और अचार ही काफी था
पिछले बार की कोह्डौरी सबने पसंद की थी
मैं चाहती हूँ तुम्हे बुलाना

पर बुला नही सकती मां
वैसे भी तुम कहाँ आओगी बेटी के घर
आखिर मेरी सास भी हैं थोड़ी
ज्यादा सास
पति भी हैं थोड़े ज्यादा पति
घर ज़रूर बदला है उन लोगों का माँ
पर मन नहीं बदला
पर अब कोई तकलीफ नहीं होती माँ
मैंने एडजस्ट कर लिया है खुद को अच्छी तरह
बाबूजी को कहना इस बार दशहरे में आने के लिए
मैं भेजूंगी सबके लिए कपड़े
कहना माँ किसी के झगड़े में न पड़ें वे
और शुरू कर दे तैयारियां छुटकी की शादी की
मैं आ जाउंगी समय से पहले ही
अच्छा माँ अब जा रही हूँ
चिंता मत करना
पहुँचते ही फोन करूंगी
अच्छा माँ विदा /अलविदा माँ.

सामान बेचती लड़की

सरकारी दफ्तरों मे लंच का समय था
चाय की चुस्कियों के साथ सरकारी नीतियों और क्रिकेट
की चर्चा चल रही थी
एक ठहरा हुआ समय यहाँ पसर रहा था
एक विरानी दिख रही थी
और दिख रही थी वह लडकी
अपने बैग में मसाज करने वाला यंत्र लिए
बाबूओं को थकान मिटाने के गुर बताते हुए
वह लडकी बताती है यंत्र की खूबियों के बारे में
थकान तो मिटेगा ही
यदि कोई दर्द रहा यहाँ-वहां
तो वह भी ठीक  हो जायेगा तुरंत
शरीर दुरुस्त रहेगा इसकी तो गारंटी है
वह बाबुओं के शरीर पर फिराती है यंत्र को
और एक सिहरन,एक रोमांच उनकी शिराओं में तैर जाता है
सुप्त कामनाओं के द्वार खुलते हैं उनकी नसों में
लड़की बेच ले जाती है तीन-चार यंत्र
अब वह यही कारनामा दोहरा रही है
दुसरे दफ्तर,कुछ दुसरे बाबुओं के संग
लड़की रोज आती है लंच के समय,
मुस्कान फेंकती,ग्राहकों को रिझाती
अब यह उसकी आदत में तब्दील हो चुकी है
वह भूल चुकी है किस मजबूरी में शुरू किया था यह काम
वह अक्सर पढ़ती है मार्केटिंग से जुडी कोई किताब
और चढ़ती जाती है सफलता के सोपान पर.

हांक

एक हांक पडती है गली में
जमा होती है चार औरतें
बैठ जाता है टिकुलहारा
सजा लेता है बाजार
किसी को बिंदी पसंद आता है
किसी को  चूड़ियाँ
किसी को नेलपौलिस किसी को झुमका
सबको चाहिए खुशियाँ
यह एक पल है जहाँ वे खुद हैं
थाली में पसरा चावल नहीं है उनके पास
न ही बर्तनों का ढेर
न पति और बच्चों की चिंता
न शिकायतों और नाराजगियों की फेहरिश्त
सिर्फ खिलखिलाहटें हैं उनके चेहरों पर
एक चमक एक चुहल जो बमुश्किल आता है उनके हिस्से
वे जो घरों से निकलकर आई हैं दरवाजे के इस पार
उन्होंने सिर्फ दरवाजा ही पार नहीं किया है.



स्त्री 

एक स्त्री होना दो संसारों में होना है
एक स्त्री होना दुःख की नदी में गोते लगाना है
एक स्त्री होना जीवन रचना है
एक स्त्री होना घर होना है
एक स्त्री होना इच्छाओं की अतृप्त नदी में गोते लगाना है
एक स्त्री होना नदी होना है
पहाड़ से समंदर तक की यात्रा करते
दूर आकाश में तारे की तरह टिमटिमाते रहना है.

बेटी की मुस्कान

अभी वह बहुत छोटी है
अपनी तुतलाती भाषा में कहती है-पापा-मम्मा
वह जब कमरे में हंसती है तो लगता है
खिड़की में चाँद निकल आया है
दिन भर की थकान हवा हो गई है बेटी की हंसी से
मेरा जन्म ऐसे घर में हुआ
जो स्त्रियों से भरा हुआ था
चाची,बुआ और बहनों के ठहाकों से गूंजता रहता था घर
इन ठहाको में उनका दुःख कपूर की तरह उड़ जाता
तब घर एक बड़े पेड़ की तरह लगता
जिस पर सुबह से शाम तक पक्षियों का कलरव होता
उसी समय मैंने जाना कि स्त्रियों के बिना नहीं होता घर
वो देखीए अभी फिर से बेटी के चेहरे पर हंसी आई
उसकी तुतलाती भाषा में उसकी शरारत में
लौट आई है चाची,बुआ और बहनों की सारी बातें
इस समय की उसकी मुस्कान सदियों तक पृथ्वी पर गूंजती रहे
एक मनुष्य,एक पिता,एक कवि की यह.

सावित्रीबाई फुले वैच्रारिकी सम्मान के बाद लेखिका अनिता भारती का वक्तव्य

स्त्रीवादी पत्रिका स्त्रीकाल, स्त्री का समय और सच ने डा. आंबेडकर के
नेतृत्व में नागपुर में 20 जुलाई 1942 को हुए महिला सम्मेलन के 75वें साल
पर एक आयोजन जेएनयू में किया. उक्त सम्मेलन में 25 हजार दलित महिलाओं ने
भागीदारी की थी और कई मह्त्वपूर्ण निर्णय लिये थे. जेएनयू में 29 जुलाई की
देर शाम को खत्म हुए इस आयोजन में तीन सत्रों में विभिन्न विषयों पर विमर्श
और महिला अधिकार विषय पर प्रसिद्ध नृत्यांगना रचना यादव का कथक नृत्य
आयोजित हुआ तथा चर्चित दलित लेखिका और विचारक अनिता भारती को उनकी किताब
‘समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रतिरोध’ को स्त्रीकाल के द्वारा
सावित्रीबाई फुले वैचारिकी सम्मान (2016) दिया गया. इसके पूर्व 2015 में यह
सम्मान शर्मिला रेगे को उनकी किताब ‘मैडनेस ऑफ़ मनु: बी आर आंबेडकरस
राइटिंग ऑन ब्रैह्मनिकल पैट्रिआर्की’ को दिया गया था. इस सम्मान की शुरुआत
2015 में स्त्रीकाल ने स्त्रीवादी न्यायविद अरविंद जैन के आर्थिक सहयोग से
शुरू किया था. कार्यक्रम का आयोजन स्त्रीकाल, आदिवासी साहित्य और यूनाइटेड
ओबीसी फोरम’ के संयुक्त तत्वावधान में हुआ.

अनिता भारती के वक्तव्य का वीडियो लिंक :

महिला आयोग को ताला लगा दें : विमल थोराट

स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन ने बताया कि ‘नागपुर सम्मलेन इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि महिलाओं ने तब राजनीतिक आरक्षण की मांग की थी, और इसलिए भी कि उनके प्रस्ताव काफी क्रांतिकारी और स्पष्ट थे, जबकि 1975 में जारी ‘ टुवर्ड्स इक्वलिटी रिपोर्ट’, जो सातवें-आठवें दशक में महिला आन्दोलन का संदर्भ बना, राजनीतिक अधिकारों को लेकर उतना स्पष्ट नहीं था. इसलिए आज हमने महिला आरक्षण पर भी बातचीत रखी है.’ महिला आरक्षण पर सत्र में दलित अधिकार आन्दोलन की संयोजकों में से एक और लेखिका रजनीतिलक ने कहा कि ‘महिलाओं के लिए सारे अधिकार समानुपातिक प्रतिनिधित्व के साथ होने चाहिए.’ राष्ट्रीय महिला महिला आयोग की सदस्य सुषमा साहू ने कहा कि ‘महिला आरक्षण के लिए हम बाहर की महिलाओं से ज्यादा संसद में बैठी महिलाओं को पहल लेनी चाहिए. उन्होंने महिलाओं को महिलाओं के शोषण में न शामिल होने का भी आह्वान किया.’ स्त्रीवादी न्यायविद और सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद जैन ने कहा कि ‘जबतक 25 लाख महिलायें संसद को घेरकर बैठ नहीं जायेंगी, तब तक महिला आरक्षण संभव नहीं है. जो हालात है उससे लगता है कि महिला आरक्षण और समान आचार संहिता पास होने में 100 साल लग जायेंगे.’ दलित और महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली लेखिका कौशल पंवार ने कहा कि ‘हमें स्वाती सिंह जैसी महिलाओं से भी समस्या है, जो बेटी की सम्मान में अभियान चलाती है और अपनी ही भाभी, जो किसी की बेटी है की प्रताड़ना में शामिल पाई जाती है.’  दलित एवं महिला अधिकार के लिए काम करने वाली लेखिका विमल थोराट ने कहा कि ऐसे महिला आयोग को बंद हो जाना चाहिए, जो  महिला आरक्षण को अपना  विषय नहीं  मानता  और  दलित महिलाओं  के उत्पीड़न पर  एक  नोटिस  तक  जारी नहीं करता – महिला आयोग को ताला लगा देना चाहिए.  सत्र की अध्यक्षता करते हुए नेशनल फेडरेशन ऑफ़ इन्डियन वीमेन की महासचिव एनी राजा ने कहा कि ‘ महिला आयोग जैसी संस्थाओं को यह स्पष्ट करना चाहिए कि महिला आरक्षण पर उनकी क्या पोजीशन है. उन्होने कहा कि महिला आरक्षण के पिछले दो दशकों से संसद में पेंडिंग होने की वजह संसद का पितृसत्ताक नियन्त्रण में होना है.’