महिला आरक्षण को लेकर संसद में बहस :तीसरी क़िस्त

महिला आरक्षण को लेकर संसद के दोनो सदनों में कई बार प्रस्ताव लाये गये. 1996 से 2016 तक, 20 सालों में महिला आरक्षण बिल पास होना संभव नहीं हो पाया है. एक बार तो यह राज्यसभा में पास भी हो गया, लेकिन लोकसभा में नहीं हो सका. सदन के पटल पर बिल की प्रतियां फाड़ी गई, इस या उस प्रकार से बिल रोका गया. संसद के दोनो सदनों में इस बिल को लेकर हुई बहसों को हम स्त्रीकाल के पाठकों के लिए क्रमशः प्रकाशित करेंगे. पहली क़िस्त  में  संयुक्त  मोर्चा सरकार  के  द्वारा  1996 में   पहली बार प्रस्तुत  विधेयक  के  दौरान  हुई  बहस . पहली ही  बहस  से  संसद  में  विधेयक  की  प्रतियां  छीने  जाने  , फाड़े  जाने  की  शुरुआत  हो  गई थी . इसके  तुरत  बाद  1997 में  शरद  यादव  ने  'कोटा  विद  इन  कोटा'  की   सबसे  खराब  पैरवी  की . उन्होंने  कहा  कि ' क्या  आपको  लगता  है  कि ये  पर -कटी , बाल -कटी  महिलायें  हमारी  महिलाओं  की  बात  कर  सकेंगी ! ' हालांकि  पहली   ही  बार  उमा भारती  ने  इस  स्टैंड  की  बेहतरीन  पैरवी  की  थी.  अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद पूजा सिंह और श्रीप्रकाश ने किया है. 
 संपादक
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महिला आरक्षण को लेकर संसद में बहस :पहली   क़िस्त

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महिला आरक्षण को लेकर संसद में बहस: दूसरी क़िस्त   


श्रीमती सुमित्रा महाजन : हम अपने देश में तो आरक्षण की बात करते हैं ... (व्यवधान)

श्रीमती भावना कर्दम दवे : क्या हम दूसरे देशों का अनुकरण ही करते रहेंगे या फिर अपनी प्रतिभा को सम्पन्न करेंगे ?

श्री मोतीलाल वोरा (राजनांदगांव): उपाध्यक्ष महोदय, आज अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर मैं अपनी बहनों को मुबारकबाद देता हूं. दुनिया में सारी महिलाएं संगठित होकर रहें, आज इस अवसर पर मैं कहूंगा कि महिलाओं को सुविधाएं मिलनी चाहिए. जो महिलाएं अत्याचार से पीड़ित हैं, उनके ऊपर जिस प्रकार के अत्याचार होते हैं, उसके लिए हमें देश के अंदर इस प्रकार का कानून बनाना चाहिए कि महिलाओं पर अत्याचार करने वालों के विरुद्ध कड़ी से कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए.  माननीय मंत्री जी और आडवाणी जी ने हाल ही में इस बात को कहा है कि जो महिलाओं के साथ दुर्व्यवाहर  करते हैं या बलात्कार की घटनाएं होती हैं, उन्हें फांसी की सजा दी जानी चाहिए. उन्होंने जो कुछ कहा है मैं समझता हूं कि जब तक वह कानून के रूप में नहीं आएगा तब तक इस प्रकार की घटनाएं बढ़ती जाएंगी और सब लोग कहते ही रहेंगे. धन्यवाद.


श्री बूटा सिंह (जालोर): महोदय, सरकार को यह पक्ष भी सुनने दीजिए ... (बाधा)। हमें भी सुना जाए. हमें कुछ समय दीजिए ... (बाधा)। बस आधा मिनट का वक्त दीजिए. हमें भी सुनिए महोदय ... (बाधा)  सर महिलाओं की आजादी के मसले पर पूरा सदन सर्वसम्मत है. महिलाएं हमारी राष्ट्रीय राजनीति में बहुत अहम भूमिका निभा सकती हैं. हम माननीय महिला सदस्यों की मांग का खुले दिल से स्वागत करते हैं, लेकिन साथ ही मैं माननीय सदन को यह भी ध्यान दिलाना चाहूंगा कि पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति-जनजाति की महिलाओं एवं अल्पसंख्यक वर्ग की महिलाओं को एक खास सम्मान से नवाजा जाना चाहिए. राजधानी दिल्ली में गुरुतेगबहादुर मेडिकल कॉलेज में पढऩे वाले अनुसूचित जाति एवं जनजाति के बच्चों को पीटा गया. बच्चे भूख हड़ताल पर बैठे हैं. उनकी बात सुनने वाला कोई नहीं है न तो पुलिस, न ही दिल्ली प्रशासन और न यह सरकार. उनकी रक्षा की जानी चाहिए. ये बच्चे-बच्चियां भूख हड़ताल पर हैं. उनको केवल इसलिए पीटा गया क्योंकि वे अनुसूचित जाति-जनजाति से आते हैं. यह राजधानी दिल्ली का सबसे घृणित अपराध है. उनकी बात सुनी जानी चाहिए और सरकार को उनकी दिक्कत दूर करने के लिए जरूरी कदम उठाने चाहिए.

श्री शिवराज वी.पाटील (लाटूर) : उपाध्यक्ष महोदय, आज हमें इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि हम संसार की आधी मानव संख्या के प्रति अपना आदर व्यकत करने के लिए यह दिन मना रहे हैं. हमारे देश में और संसार में भी महिलाओं का आदर किया जाता है, महिलाओं के प्रति प्रेम की भावनाएं व्यकत की जाती हैं. इसमें कोई दो राय नहीं हैं. मगर हमारे देश में और संसार में भी जब महिलाओं को अधिकार देने की बात की जाती है तो सब के सब पीछे हट जाते हैं. यहां तक कि कुछ महिलाओं का भी उनको समर्थन नहीं मिलता है. कुछ पुरुष आगे जरूर आते हैं लेकिन बहुत सारे ऐसे कारण दे देते हैं जिनका एक ही उद्देश्य होता है कि आदर मिले, प्रेम मिले लेकिन उनको अधिकार न मिलें - इस बात को भी हमें इस दिन ध्यान में रखना पड़ेगा. यह शताब्दी अधिकार देने वाली शताब्दी है. जो सर्वसाधारण लोग हैं, समाज के अंदर कमजोर लोग हैं, उनको अधिकार देने वाली यह शताब्दी है. यह शताब्दी हमारी माताओं, बहनों और बेटियों को अधिकार देने वाली शताब्दी है. इसलिए हमारे भाई लोग कुछ ऐसे कारण बताकर पीछे न हटें जिसकी वजह से लोग यह न कहें कि दिल में बात एक है और दूसरी तरह से यहां पर रखने की यह कोशिश कर रहे हैं. मैं बड़े आदर से यहां पर कहना चाहता हूं कि बहुत ही सोच-समझकर कहने वाले, दूरदृष्टि  रखने वाले नेता हैं, उनकी बातों को काटना बड़ा मुश्किल है . उनकी बात काटते समय या उनके खिलाफ कहते समय मन में दुख होता है. इसलिए पहले ही हम क्षमा-याचना करना चाहते हैं. मगर यहां पर कहा गया कि संसार में ऐसी कोई चीज नहीं हुई है, इसलिए यहां पर क्यों  होना चाहिए ? क्या  हम दूसरों के पीछे ही चलते रहेंगे ? क्या  हम दूसरों को कोई रास्ता नहीं बताएंगे ? अगर संसार में कहीं नहीं हुआ है  तो क्या  हमारे देश में वह बात नहीं होनी चाहिए ? हमारे देश की कोई बात हो और दूसरे लोगों ने अगर उसे अपनाया तो उसमें कौन सी बुरी बात है ? दक्षिण एशिया ने बताया कि सबसे पहले हिन्दुस्तान में महिला प्राइम मिनिस्टर  हुई और वह श्रीलंका, पाकिस्तान और बंगलादेश में भी हुई. यहां महिला पार्टी अध्यक्ष और प्राइम मिनिस्टर हुई हैं. यहां महिला प्रधान मंत्री और अध्यक्ष दूसरी जगहों के मुकाबले कहीं ज्यादा संख्या में हुई है. क्या  हमें यह चीज नहीं अपनानी चाहिए ? हम जानते हैं कि मुख्यमंत्री भी महिलाएं हैं, महिला मुख्यमंत्री और प्रधान मंत्री ने अपने-अपने तरीके से यहां काम किया. एक सवाल यह पूछा और उठाया जा रहा है कि क्या ऐसा होने पर पिछड़ी जाति की महिलाओं को हिस्सा मिलने वाला है? मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि जो पिछड़ी सो-कॉल्ड बैकवर्ड क्लासेज की महिलाओं की बात की जा रही है तो सो-कॉल्ड मैन के बारे में भी कहा जाए. कितने फारवर्ड क्लास के लोग और जैंटलमैन यहां चुन कर आते हैं ? फारवर्ड क्लास की महिला हो या जैंटलमैन हो, वे टिकट मांग सकते हैं और चुनाव लड़ सकते हैं लेकिन फारवर्ड क्लास के वोट देने वाले लोगों की संख्या ज्यादा नहीं है. वोट देने वालों में बैकवर्ड क्लास के लोगों की ज्यादा संख्या है। वोट देने वालों में बैकवर्ड क्लास के लोगों की संख्या ज्यादा होने से बैकवर्ड क्लास के लोग ही चुन कर आ जाएंगे और फारवर्ड क्लास के चुन कर नहीं आएंगे. हमें यह बात ध्यान में रखनी पड़ेगी. श्री रघुवंश प्रसाद सिंह (वैशाली): इसका बंटवारा हो जाए। (व्यवधान)इसका हिसाब होना चाहिए। हम यह बात बर्दाश्त नहीं करेंगे ... (व्यवधान)

श्री शिवराज वी. पाटील : पूछा जाता है कि इसके पीछे क्या लॉजिक है? लॉजिक यह है कि जो सामाजिक न्याय की बात कर रहे हैं, वे अपनी बहनों, बेटियों, मां और अर्दधांगिनी को सामाजिक न्याय नहीं देते हैं. ऐसे में वे किस सामाजिक न्याय की बात करते हैं. वे अपने घर वालों को सामाजिक न्याय नहीं देते हैं और बाहर के लोगों को सामाजिक न्याय देने की बात करते हैं. ऐसी चीजों पर कौन भरोसा करने वाला है? अगर आपको नहीं करना है तो मत करिए लेकिन समाज और देश को बांटने की कोशिश मत कीजिए. अगर आपने महिलाओं को बांट कर इस प्रकार से टिकट दिए तो जैंटलमैन को किस आधार पर नहीं कहने वाले हैं. हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जाने के बाद किस आधार पर नहीं देने वाले हैं। कया आपका संविधान सैकुलर रहने वाला है ? आप कह दें कि हमें यह नहीं करना है. यहां आप कह दीजिए कि आपको यही डर है कि महिलाओं को अधिक संख्या में सीटें देने के बाद हमारी सीटें चली जाएंगी. अगर ऐसा डर है तो वह डर खत्म करने की दवा लोगों और सोचने वालों के पास है. वे उसे देंगे और इसे करेंगे. आप इस डर को छुपाने के लिए सामाजिक न्याय की बात कर रहे हैं तो मेरी दृष्टि  से ऐसा करके आप खुद को धोखा दे रहे हैं और दूसरों को धोखा दे रहे हैं. अंत में इतना ही कहना चाहता हूं कि अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर समाज के आधे हिस्से के लोगों को अगर न्याय देने के लिए आगे नहीं आए तो दूसरों को न्याय देने की बात पर लोग बहुत कम भरोसा करेंगे, ऐसा मुझे लगता है. ... (व्यवधान)


श्री लालू प्रसाद (मधेपुरा) : उपाध्यक्ष महोदय, हम लोगों को भी यह मामला उठाने की इजाजत दी जाए.

श्री अजित कुमार पांजा: अब तक इस सदन में जो बहस हो रही है वह विश्व महिला दिवस और उससे संबंधित बातों पर ही आधारित है. इस मामले में एक या दो वक्ताओं को छोड़कर मैं अधिकांश की बातों से सहमत हूं. मेरी असहमति उन इक्का-दुक्का वक्ताओं से है, जिन्होंने कहा कि दुनिया में किसी अन्य देश में ऐसा आरक्षण नहीं दिया गया है. मैं अपने ठीक पहले वाले वक्ता की बातों का समर्थन करता हूं कि भारत को दूसरों को रास्ता दिखाना चाहिए. क्या हम अपने भारत देश को 'मां' कहकर नहीं पुकारते ? क्या दुनिया में कोई और देश है जहां के लोग उसे 'मां' कहते हैं ? क्या हम वंदे मातरम नहीं गाते ? हम वंदे मातरम कह कर अपनी मां की सराहना और उपासना करते हैं. इसलिए महोदय यह आवश्यक है और लंबित विधेयक को इसी सत्र में पारित किया जाए।.इसका लंबित रहना न केवल महिलाओं का, हमारी मांओं का बल्कि सभी भारतीयों का अपमान है.
इन परिस्थितियों में श्रीमान, मैं आपसे अपील करता हूंकि इसे सदन में पेश किया जाए तथा आगे बिना किसी बहस के इसे पारित किया जाए. क्योंकि पहले ही काफी बहस हो चुकी है. मैं मुक्त हृदय से शिवराज पाटिल की एक एक बात का समर्थन करता हूं. भारत इसी तरह के मूल्यों में यकीन करता है. इस मोड़ पर मैं उस शत्रुतापूर्ण  भेदभाव का भी जिक्र करूंगा जो बंगाल में महिला वर्ग के साथ हुआ. बंगाल में हजारों शिक्षित महिलाएं हैं,  लेकिन आपको यह जानकर अचरज होगा कि कब एक महिला  को कलकत्ता विश्वविद्यालय का कुलपति बनाया गया .. (बाधा)

डा असीम बाला, (एनएबीएडीडब्ल्यूआईपी) : क्या यह मंच इस तरह की बातों के लिये है?

श्री अजित कुमार पांजा: जब बंगाल में इतनी बड़ी संख्या में शिक्षित महिलाएं हैं तो वहां इस प्रकार का भेदभाव क्यों ?   (बाधा) यह खबर अखबारों में आई है. बंगाल में बड़ी संख्या में शिक्षित महिलाएं हैं .. (बाधा) बंगाल में महिलाओं के साथ शत्रुतापूर्ण भेदभाव के मामले निपटाए जाने चाहिए और इस अवैध गतिविधि पर अंकुश लगाया जाना चाहिए .. (बाधा)

श्री हन्नन मुल्ला (उलूबेरिया): यह क्या है?

श्री वासुदेव आचार्य (बांकुड़ा): वह ऐसी टिप्पणी कैसे कर सकते हैं? .. (बाधा)

पीठासीन साभापति : यह इतना संवेदनशील विषय है कि इस पर पहले ही एक घंटे 25 मिनट से अधिक वक्त खर्च हो चुके. माननीय मंत्री महोदय को इस पर प्रतिक्रिया देनी होगी.

श्री अजित कुमार पांजा: बंगाल में महिलाओं के साथ शत्रुतापूर्ण भेदभाव है. यह कोई कचरा नहीं है.

पीठासीन साभापति श्री हन्नान मुल्ला मुझे टोकिए मत.

पीठासीन साभापति: कृपया अपने सदस्य से कहें कि ऐसे व्यवहार न करें. मैंने श्री फातमी को बोलने का अवसर दिया है.

पीठासीन साभापति: श्री वासुदेव आचार्य, मैंने श्री फातमी का नाम पुकारा है.

श्री वासुदेव आचार्य: महोदय मैंने भी नोटिस दिया है.

पीठासीन साभापति: मैंने आपसे कहा कि मैं आपको पुकारूंगा. श्री वासुदेव आचार्य, मैंने श्री फातमी को पुकारा है.
श्री वरकाला राधाकृष्णन: मैंने भी नोटिस दिया है.

पीठासीन साभापति मैं आप सबको एक साथ नहीं बुला सकता।

श्री वलकारा राधाकृष्णन: आप मुझे नहीं बुला रहे .. (बाधा)।

पीठासीन साभापति: यहां हो क्या रहा है? मैंने उन्हें बोलने का अवसर दिया है, मैं आपके पास वापस आऊंगा.
अध्यक्ष के आदेश से हटाया गया.

पीठासीन साभापति: मैंने किसी से कोई वादा नहीं किया है।

श्री वी सत्यमूर्ति (रामनाथपुरम): महोदय, आप हमें कोई मौका क्यों नहीं दे रहे? एआईडीएमके भी सदन का एक दल है.

पीठासीन साभापति: आपको अवसर मिलेगा लेकिन यह कोई तरीका नहीं है व्यवहार करने का. आपको खड़े होकर चिल्लाना नहीं चाहिए. अब मैं मंत्री को बुलाऊंगा.

श्री मोहम्मद अली अशरफ फातमी (दरभंगा): उपाध्यक्ष महोदय, आपने मुझे बोलने के लिये समय दिया, उसके लिये धन्यवाद।

पीठासीन साभापति: आपको जल्दी समाप्त करना है कयोंक I will call the Minister now.>

श्री मोहम्मद अली अशरफ फातमी : उपाध्यक्ष जी, मैं दो मिनट में खत्म कर दूंगा. आज इंटरनैशनल वुमैन डे पर महिलाओं को आगे बढ़ाने के लिये जो कदम उठाये जायेंगे, उसमें हम और हमारी पार्टी पूरा पूरा समर्थन देने का काम करेंगी. आज इंटरनैशनल वुमैन डे की अलग बात है और हिन्दुस्तान की महिलाओं का चैप्टर अलग है. जब इस सदन के अंदर महिलाओं के लिये रिजर्वेशन की बात होती है, उस समय बहुत सारी सामाजिक चीजों को पीछे छोड़ दिया जाता है. हमारा और हमारी पार्टी के लोगों का सीधा मानना है कि जब भी इस पर विचार हो तो इसमें शैडयूल्ड कास्टस एंड शैडयूल्ड ट्राइब्स और अदर बैकवर्ड कलासेज का प्रावधान हो. उस वक़्त निश्चित  रूप से जो हिन्दुस्तान के अंदर २० प्रतिशत अल्पसंख्यक लोग बसते हैं, पहले उनके बारे में सोचा जाना चाहिए. इसलिए कि आज अगर आप नक्शा  उठाइए लोक सभा का और आज़ादी के बाद से आज तक के आंकड़े उठाकर देखें तो जो मुसलमानों की १२ परसेंट आबादी है, उस हिसाब से आप देखिये कि कम से कम ६५ सांसद चुनकर इस लोक सभा में आने चाहिए लेकिन आज इस सदन के अंदर सिर्फ २७-२८ मेम्बर हैं. न जाने कितने राज्य ऐसे हैं जहां पर एक भी विधायक नहीं है. आप अगर रिज़र्वेशन विमेन्स का करते हैं तो हमारी मांग है कि उनकी आबादी के अनुपात में आरक्षण किया जाए, ५० परसेंट रिज़र्वेशन किया जाए. हम पाटिल जी से ऐग्री करते हैं कि उनको ५० परसेंट आरक्षण मिलना चाहिए जितनी उनकी आबादी है, लेकिन उसके अंदर जो ४३ प्रतिशत बैकवर्ड क्लासेज़ के लोग हैं, उनको आरक्षण मिलना चाहिए, जो २५ प्रतिशत शेडयूल्ड कास्टस और ट्राइब्ज़ के लोग हैं, उनको आरक्षण मिलना चाहिए और जो अल्पसंख्यक और खास तौर से १२ प्रतिशत मुसलमान हैं, उस ५० प्रतिशत में उनकी महिलाओं को उतना हिस्सा मिलना चाहिए. तभी इस मुल्क के अंदर समान न्याय मुमकिन होगा और समाज के हर तबके के लोग इस सदन के अंदर पहुंच पाएंगे.


पीठासीन साभापति: श्री रावले, कृपया मंत्री की बात सुनिए. अगर कोई प्रश्न हो तो आप बाद में पूछ सकते हैं. उनको अपनी बात पूरी करने दीजिए.

श्री पी आर कुमारमंगलम: महोदय, तय है कि मेरी बात नहीं सुनी गई होगी। मैं दोहराऊंगा।

पीठासीन साभापति: हां, मेरा धैर्य भी समाप्त हो रहा है.


श्री पी आर कुमारमंगलम: सर, आज का दिन बहुत अहम है. यह वह दिन है जिसे पूरी दुनिया महिला दिवस के रूप में मनाती है. यह अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है. न केवल अब बल्कि ऐतिहासिक रूप से महिलाओं का सम्मान करना हमारा मूल्य रहा है. चाहे वे मां हों, बहन हों या पत्नी, हम हर रूप में उनका सम्मान करते हैं, उन्हें बराबरी का नहीं बल्कि उससे कहीं श्रेष्ठ का दर्जा देते हैं. महिला सशक्तीकरण का मूल्य हमारी संस्कृति का, हमारे इतिहास का हिस्सा है. हम इस बात में यकीन करते हैं कि महिलाओं का न केवल हमारे समाज में उचित स्थान होना चाहिए बल्कि हर तरह की व्यवस्था में उनकी आवाज सुनी जानी चाहिए और उनका अधिकार नजर आना चाहिए. हमारी सरकार यह विधेयक लाई है. सदन के सदस्यों के विचार सुनने के बाद मुझे यह कहना ही होगा कि मैं और मेरी सरकार यह मानती है कि संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के आरक्षण का मुद्दा एक मूलभूत विषय है जिसपर सबकी सहमति बननी ही चाहिए. मैं श्रीमती गीता मुखर्जी की बातों से सहमत हूं. विधेयक सदन में लंबित है. मेरी कामना है कि हमारी सरकार इस बात को लेकर गंभीर है कि सदन विधेयक को अंगीकृत करे. लेकिन चूंकि यह संविधान संशोधन विधेयक है और अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है इसलिए हमें इस पर सहमति बनानी होगी. इसे लड़ाई-झगड़े या कटुता के बीच नहीं पारित किया जा सकता. हमें सहमति बनानी होगी. हम उन महिलाओं के बारे में बात कर रहे हैं जिनको हमारा समाज देवी मानता है. इसे ऐसे नहीं किया जा सकता. हम इस मसले को मतभेद और कटुता के स्तर पर नहीं ला सकते.
क्रमशः

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