महिला आरक्षण को लेकर संसद में बहस :दूसरी क़िस्त

महिला आरक्षण को लेकर संसद के दोनो सदनों में कई बार प्रस्ताव लाये गये. 1996 से 2016 तक, 20 सालों में महिला आरक्षण बिल पास होना संभव नहीं हो पाया है. एक बार तो यह राज्यसभा में पास भी हो गया, लेकिन लोकसभा में नहीं हो सका. सदन के पटल पर बिल की प्रतियां फाड़ी गई, इस या उस प्रकार से बिल रोका गया. संसद के दोनो सदनों में इस बिल को लेकर हुई बहसों को हम स्त्रीकाल के पाठकों के लिए क्रमशः प्रकाशित करेंगे. पहली क़िस्त  में  संयुक्त  मोर्चा सरकार  के  द्वारा  1996 में   पहली बार प्रस्तुत  विधेयक  के  दौरान  हुई  बहस . पहली ही  बहस  से  संसद  में  विधेयक  की  प्रतियां  छीने  जाने  , फाड़े  जाने  की  शुरुआत  हो  गई थी . इसके  तुरत  बाद  1997 में  शरद  यादव  ने  'कोटा  विद  इन  कोटा'  की   सबसे  खराब  पैरवी  की . उन्होंने  कहा  कि ' क्या  आपको  लगता  है  कि ये  पर -कटी , बाल -कटी  महिलायें  हमारी  महिलाओं  की  बात  कर  सकेंगी ! ' हालांकि  पहली   ही  बार  उमा भारती  ने  इस  स्टैंड  की  बेहतरीन  पैरवी  की  थी.  अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद पूजा सिंह और श्रीप्रकाश ने किया है. 
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महिला आरक्षण को लेकर संसद में बहस :पहली   क़िस्त


शीर्षक: अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर महिला आरक्षण से संबंधित 84वां संविधान संशोधन विधेयक पारित करने का मुद्दा ( 8 मार्च 1999)

श्रीमती गीता मुखर्जी (पनसुकरा): महोदय, आज 8 मार्च है, अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस. इसलिए मैं यह मानकर चल रही हूं कि सबसे पहले हमारी संसद दुनिया भर में सही मुद्दों के लिए संघर्ष कर रही महिलाओं के साथ एकजुटता दिखाएगी. दूसरी बात, आज देश भर में कई सेमिनार, रैलियां और तमाम अन्य आयोजन किए जा रहे हैं, जहां महिलाएं कई चीजों की मांग कर रही हैं. इनमें हाल में की गई अनिवार्य जिंसो की कीमत कम करने की मांग से लेकर, अल्पसंख्यकों पर अत्याचार रोकने, सांप्रदायिकता के विविध रूपों से लड़कर राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने आदि जैसी मांगें शामिल हैं.  इन रैलियों और सेमीनारों में भी 84वें संविधान संशोधन विधेयक को पारित करने की मांग की जा रही है ताकि लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण मिल सके. महोदय, मैं आपका ध्यान और आपके जरिऐ सरकार और तमाम राजनीतिक दलों के सदस्यों का ध्यान देश भर की महिलाओं की मांग की ओर दिलाना चाहती हूं और कहना चाहती हूं कि विधेयक को इसी सत्र में पारित कर दिया जाए.


श्री इंदर कुमार गुजराल (जालंधर): महोदय, माननीय महिला सदस्य ने उचित ही यह ध्यान दिलाया है कि 8 मार्च हमारे राष्ट्रीय जीवन में एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण तिथि है. मैं इसमें एक सकारात्मक बात यह जोडऩा चाहता हूं कि यह मांग केवल भारतीय महिलाओं की नहीं है. यह मांग देश के तमाम लोकतांत्रिक नागरिको की है कि महिलाओं को संसद और विधानसभा में उनका दाय मिलना चाहिए यानी 33 प्रतिशत आरक्षण. जो मुद्दा मेरी मित्र ने उठाया है,  मैं उसमें अपना स्वर मिलाना चाहता हूं. मैं उम्मीद करता हूं कि यह आवाज इस सदन में सर्वसम्मति से उठेगी। महिला सशक्तीकरण के लिहाज से देखा जाए तो यह मसला अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। हमारे जीवन में महिलाओं की अत्यंत अहम भूमिका है. ऐसे में हम सब उनके साथ हैं. हमारे राष्ट्रीय और राजनीतिक जीवन में महिलाओं की भूमिका और सशक्त होनी चाहिए.

श्री मुलायम सिंह यादव (सम्भल) : हम भी इस पर बोलेंगे. यह हमारा मामला है ... (व्यवधान) उपाध्यक्ष महोदय : आपको मैं चान्स दूंगा पर ऐसे नहीं बोलिये. (व्यवधान)

श्री मुलायम सिंह यादव : आप मुझे नहीं बोलने देते तो मुझे निकाल दीजिए. ... (व्यवधान)

पीठासीन  अध्यक्ष  : मुलायम जी, मैं आपको कह रहा हूं कि श्रीमती कृष्णा बोस ने नोटिस दिया है और उनका नाम लिस्ट में है इसलिए वह पहले बोलेंगी....(व्यवधान)

 श्री मुलायम सिंह यादव : हमारी लड़ाई है इस पर....(व्यवधान) ये प्रधान मंत्री रह चुके हैं इसलिए इन्हें बुलाया, हमें नहीं बुलाएंगे? ... (व्यवधान)

 पीठासीन अध्यक्ष : आप सीनियर लीडर हैं. क्या मैंने आपको कभी चान्स नहीं दिया ? (व्यवधान)

पीठासीन अध्यक्ष  : श्री मुलायम सिंह जी, यह आप कया कर रहे हैं क्या  मैंने कहा कि आपको बोलने का चान्स नहीं देंगे. आप कम्पैल नहीं कर सकते हैं. आपको बिहेव करना आना चाहिए, आप एक सीनियर लीडर हैं. क्या मैंने आपको चान्स नहीं दिया, मैं आपको भी चान्स दूंगा. आप इस तरह से मत करिये ... (व्यवधान)

श्री लालू प्रसाद (मधेपुरा) : यह राबड़ी देवी की गरदन काटने वाले लोग हैं. यह महिलाओं को क्या  प्रधानता देंगे. बैकवर्ड क्लासेज  और माइनोरिटीज सोसाइटीज को जब तक प्रधानता नहीं मिलेगी, इस पर हमारी सहमति नहीं है.
श्री बूटा सिंह : उपाध्यक्ष महोदय, इस पर सदन को ऑब्जेकशन है ... (व्यवधान)

श्री मुलायम सिंह यादव : उपाध्यक्ष महोदय, आप इनकी कया सुनेंगे, यह गला काटने वाले लोग हैं ... (व्यवधान

श्री मुलायम सिंह यादव : हम बहुत सुन चुके हैं ... (व्यवधान) उपाध्यक्ष महोदय : आपकी बात भी सुनी जायेगी, पहले उनकी बात खत्म होने दीजिए.. (व्यवधान)

पीठासीन अध्यक्ष : आप इतने सीनियर लीडर हैं, आप बीच में कयों खड़े होते हैं, यह कोई तरीका नहीं है। श्री लालू प्रसाद : सर, जब आप खड़े होते हैं तो हम लोग डर जाते हैं ... (व्यवधान) यह दंगाई खड़े हैं ... (व्यवधान)यह एंटी दलित हैं, एंटी माइनोरिटीज हैं ... (व्यवधान)

 पीठासीन अध्यक्ष : ऑर्डर प्लीज.


श्रीमती कृष्णा बोस: उपाध्यक्ष महोदय, सबसे पहले मैं चाहती हूं कि कम से कम मेरे पुरुष सहयोगी मेरी बात सुनें. श्री गुजराल ने कहा कि यह संसद और तमाम अन्य लोकतांत्रिक लोग हमारा समर्थन कर रहे हैं लेकिन मुझे यह कहते हुए दुख हो रहा है कि मेरी नजर में यह संसद पुरुषों का क्लब है और मैं इस क्लब में एक अवांछित घुसपैठिए सा महसूस करती हूं. मुझे अभी यहां खड़े होकर भी यही महसूस हो रहा है. मैं यहां ठीक से बोल भी नहीं सकती. क्या मैं बोल सकती हूं महोदय ? अच्छा ऐसा मुझे लगता है ...(बाधा)

पीठासीन अध्यक्ष : श्री रावले उनको बोलने दीजिए.

श्रीमती कृष्णा बोस: मैं सदन का ध्यान एक या दो अहम मुद्दों की ओर आकर्षित करना चाहती हूं. आज महिला दिवस है. जैसा कि श्रीमत गीता मुखर्जी पहले ही कह चुकी हैं. मुझे पता है कि सरकार महिलाओं के लिए एक राष्ट्रीय नीति लाने पर विचार कर रही है जो कुछ समय से कैबिनेट के समक्ष विचाराधीन है. आज मैं यह जानना चाहती हूं कि वे इसका क्या करना चाहते हैं. यह मेरा पहला बिंदु है.  दूसरी बात, तीन साल पहले मैंने यहीं इसी जगह खड़े होकर तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री देवेगौड़ा से पूछा था कि महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने वाला विधेयक कब आएगा और कब पारित किया जाएगा. प्रधानमंत्री ने वादा किया था कि सन 1996 के आरंभ में उसी सत्र में यह पारित हो जाएगा. अब तीन वर्ष बीत चुके हैं. गंगा में जाने कितना पानी बह चुका है. हमने कई प्रधानमंत्री बदलते देखे. लोगों ने नई लोकसभा चुन ली. मैं जानना चाहती हूं कि यह संशोधन कब पेश किया जा रहा है और क्या हमारे नीति निर्माण क्षेत्र में इसके लिए समुचित जगह है. मैं ऐसा इसलिए कह रही हूं क्योंकि हम बहुत उपेक्षित महसूस कर रहे हैं. मैंने अपनी भावनाएं मजबूती से जाहिर कर दी हैं. लेकिन लोग जिस तरह व्यवहार कर रहे हैं,मुझे कहना पड़ा रहा है कि मैंने पूरी तरह अवांछित महसूस किया.  (बाधा) मैं इन दो मसलों पर सरकार की प्रतिक्रिया जानना चाहती हूं. राष्ट्रीय महिला नीति पर क्या हो रहा है और उस संशोधन की क्या स्थिति है जो पहले से पारित होने के लिए लंबित है ?

श्रीमती भावना देवराजभाई चिखलिया (जूनागढ़) : माननीय उपाध्यक्ष जी, आज ८ मार्च, अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस है और जिस तरीके से हाउस में, खासतौर से लालू जी और मुलायम सिंह जी ने व्यवहार किया है, वह बिलकुल सराहनीय नहीं है. आप कहते हैं कि श्रीमती राबड़ी देवी जी भी महिला हैं, हम इस बात को मानते हैं और अगर कोई महिला अच्छा शासन करती है, तो सारा देश उसकी सराहना करता है और उसे स्वीकार करता है, लेकिन जिस महिला के राज में अच्छा शासन नहीं हुआ, उसकी हम सराहना नहीं कर सकते और उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता. उपाध्यक्ष महोदय, आज के दिन महिला अन्तर्राष्ट्रीय दिवस के अवसर पर मैं सभी महिलाओं की तरफ से देश के प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी का अभिनन्दन करती हूं क्योंकि महिलाओं के लिए अटल जी ने अपने नेतृत्व में बहुत सारे ऐसे निर्णय किए हैं और करने जा रहे हैं जिनके कारण सम्मान जनक रूप से इस देश में महिलाएं जी सकती हैं. मैं आपके माध्यम से स्पष्ट कहना चाहती हूं कि आज के दिन महिलाओं को आर्थिक दृष्टी से समर्थ बनाने के लिए महिला विकास बैंक की स्थापना, महिला उद्यमियों को प्रोत्साहन की योजना और महिलाओं के लिए पार्ट-टाइम जॉब के लिए सकारात्मक रूप से विचार करने की बात अटल जी ने कही है. इसके लिए मैं उनकी सराहना करती हूं. उपाध्यक्ष महोदय, इस सदन में महिलाओं के लिए ३३ प्रतिशत आरक्षण का बिल पूर्व में ही प्रस्तुत किया जा चुका है, लेकिन अभी तक पास नहीं किया गया है. इसलिए मैं आज महिला अन्तर्राष्ट्रीय दिवस के अवसर पर अपने सभी सांसद भाइयों से अपील करती हूं कि उसे सर्वसम्मति से पारित किया जाए. धन्यवाद...

श्री मुलायम सिंह यादव : उपाध्यक्ष महोदय, मेरी आपसे एक प्रार्थना है कि आप कभी गुस्सा न करें. कभी टैंशन मत रखिये.(व्यवधान)

पीठासीन अध्यक्ष  : जीरो ऑवर में थोड़ी टैंशन तो होनी चाहिए.


 श्री मुलायम सिंह यादव (सम्भल): पीठासीन महोदय, जहां तक महिला दिवस का सवाल है तो मैं सारे हिन्दुस्तान और सारी दुनिया की महिलाओं को इसकी शुभकामनायें देता हूं. वे तर्रकी  करें, आगे बढ़ें और उनको उनका हक मिले. जहां तक महिला आरक्षण का सवाल है तो मेरी राय यह है कि आज हमें इस विवाद में नहीं पड़ना चाहिए. जब महिला दिवस मनाया जा रहा है तो हमारी भी उनको शुभकामनायें हैं. इसको विवाद में नहीं डालना चाहिए. जहां तक महिला आरक्षण का सवाल है तो शुरू से लेकर आज तक हम प्रधानमंत्री जी से दो बार मिले और उनको चिट्ठी भी लिखी. हमारी स्पष्ट राय है कि इस विधेयक का जो वर्तमान स्वरूप है, उसको उसी तरह से पास करने से हमारे देश के अंदर जो अल्पसंख्यक हैं विशेषकर मुसलमान हैं, दलित हैं, पिछड़े हैं, उनके साथ गैरबराबरी होगी. उनका और अधिक शोषण व अपमानजनक जीवन होगा इसलिए हमारी शुरू से यही राय है कि वर्तमान विधेयक तब तक नहीं आना चाहिए जब तक अल्पसंख्यक, दलित, पिछड़े विशेषकर मुसलमानों की जनसंख्या के अनुसार उनकी महिलाओं को आरक्षण मिले. दूसरा हमारा यह कहना है कि जहां से लोकतंत्र आया है, हम महिलाओं के आगे बढ़ने के विशेष अवसर की नीति को इस सदन में कहना चाहते हैं कि हमारी समाजवादी पार्टी ने आज से नहीं बल्कि  १९५४ से ही अमेरिका और इंग्लैंड की महिला आरक्षण की नीति का अनुसरण किया है. अमेरिका और इंग्लैंड की पार्लियामेंट  में अभी तक नौ फीसदी से ज्यादा निरक्षर महिलायें नहीं आ सकी हैं. हमारे यहां जो निरक्षर महिलायें हैं, दलित हैं, गरीब हैं, दबी-कुचली हैं, वे इस सदन में वर्तमान विधेयक के चलते नहीं आ सकती हैं. मैं महिलाओं के ३३ फीसदी आरक्षण के पक्ष में नहीं हूं. इसे कम किया जाये. इसे ज्यादा से ज्यादा १० फीसदी किया जाये. श्री गुजराल साहब अभी खड़े हुए थे. जब वे प्रधान मंत्री थे तब भी हमने इसका डटकर विरोध किया था. (व्यवधान)आप जानते हैं क्योंकि आप उस समय यहां थे. हमारी संयुक्त मोर्चा सरकार के प्रधानमंत्री श्री देवेगौड़ा थे तब भी हमने इस हाउस के अंदर अपने साथियों को खड़ा करके जो नहीं करना चाहिए था, उस वक़्त  भी कराने की कोशिश  करवाई थी. इसलिए हम चाहते हैं कि इस विधेयक को तब तक नहीं आना चाहिए जब तक मुसलमान, पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यकों चाहे ईसाई ही क्यों  न हो , उनका आरक्षण न हो. अभी तक जो अध्ययन किया गया है कि बाद में संशोधन किया जायेगा, वह संशोधन नहीं हो सकता है. वह धोखा है, चतुराई है. पिछड़े और अल्पसंख्यकों के बारे में संविधान के अंदर कोई प्रवाधान नहीं है. हम संशोधन दे भी देंगे तो वह  संशोधन अमल होगा,  आप बताइये क्योंकि  आप खुद भुक्तभोगी हैं. आज आधे हिन्दुस्तान में से कोई भी मुसलमान लोक सभा का सदस्य नहीं है. आज गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश आदि आधे हिन्दुस्तान में से एक भी मुसलमान लोक सभा में नहीं है ... (व्यवधान) हमारी राय है कि इस विधेयक को पेश नहीं किया जाना चाहिए.

... (व्यवधान)वर्तमान नौकरशाही के चलते दूसरे दल की सरकार बनने पर, एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए सीट आरक्षित कर दी जाएगी. हमारी राय है कि इसका अधिकार पार्टी को मिलना चाहिए, चुनाव आयोग को अधिकार नहीं देना चाहिए. पार्टी को अधिकार देना चाहिए कि कितना आरक्षण है और महिलाओं को कहां आरक्षण देना है. यदि कोई पार्टी उसका पालन न करे तो उस पार्टी की मान्यता खत्म कर दी जाए, इसमें ऐसा प्रावधान कीजिए. इलेक्श न  कमीशन को आरक्षण का अधिकार नहीं मिलना चाहिए, यह हमारी राय है. जब तक इस विधेयक में संशोधन नहीं होता तब तक हम इसका हर तरह से विरोध करेंगे.

श्री सोमनाथ चटर्जी: श्रीमती गीता मुखर्जी ने सदन में जो कुछ कहा है मैं उसका पूरा समर्थन करता हूं. यह एक महत्त्वपूर्ण दिन है. महिलाओं से जुड़े अनेक मुद्दे हैं. इन्हें पूरे देश का समर्थन चाहिए. जाहिर सी बात है कि देश का प्रतिनिधित्व करने वाले सदन को अपना नजरिया एकदम स्पष्ट ढंग से और गंभीरता से उजागर करना चाहिए. संबंधित कदम भी उठाए जाने चाहिए. जहां तक आरक्षण विधेयक की बात है, हम जानते हैं कि इसे लेकर अलग-अलग दलों का नजरिया अलग-अलग है. मेरा विचार यही है कि इसे मौजूदा स्वरूप में पारित किया जाना चाहिए. अब अन्य दलों को उनका विचार प्रकट करने का अवसर दिया जाए. सदन को सही समय पर इस संबंध में निर्णय लेना होगा. फिलहाल इसका वक्त नहीं आया है. मैं यहां यह कहने की कोशिश नहीं कर रहा हूं कि इसे मौजूदा स्वरूप में क्यों पारित किया जाए ? आज सबसे अहम मसला यह है कि देश में महिलाओं का प्रश्न और संसदीय लोकतंत्र का प्रश्न, दोनों ही अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं. बिहार में क्या हुआ ? इस सरकार ने क्या कदम उठाया ? इस बात का प्रचार यहां बहुत जोर-शोर और अतिरेक के साथ किया गया वह पारित भी हुआ. किसी चीज का प्रतिनिधित्व नहीं हुआ ? इसमें देश के लोगों का विचार कुछ इस तरह शामिल है मानो संविधान के अधीन राज्यसभा की कोई प्रासांगिकता ही नहीं. इसलिए आज, यह जानते हुए कि राज्यसभा में उनका बहुमत नहीं है, वहां इसे पारित नहीं कर सकता, लेकिन फिर भी उन्होंने तमाम बातें कीं और जरूरी कदम उठाने के लिए अदालत जा रहे हैं. यहां तक कि प्रधानमंत्री तक को जाकर कांग्रेस पार्टी के नेता को आमंत्रित करना पड़ा... (बाधा)। मुझे ऐसा कहने का अधिकार है.


श्रीमती सुमित्रा महाजन : माननीय उपाध्यक्ष जी, मुझे थोड़ा दुख हो रहा है. सोमनाथ दादा जैसे जिन लोगों से हम रूल सीखते हैं, मुझे ऐसा लगा था कि वे अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर गीता दीदी की बात का और समर्थन करने के लिए खड़े हैं, लेकिन बीच में जिस तरीके से बात हुई, उससे मुझे थोड़ा सा दुख हुआ, क्योंकि हम इन्हीं लोगों से सीखते हैं। (व्यवधान)उन्होंने एक प्रकार से मंत्री की बात पर आज जो चर्चा छेड़ी, वह नहीं छेड़नी चाहिए थी, ऐसा मुझे लगता है. आज अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस है, मेरा यह मानना है कि ऐसा नहीं है आज महिला दिवस है, इसलिए महिलाओं के सम्मान की कुछ बात कहें. वास्तव में अच्छी तरह से इस पर चर्चा होनी चाहिए थी, लेकिन उसमें भी जिस प्रकार से खलल डाला जा रहा है, वह एक दुखदायक बात है. उपाध्यक्ष महोदय, मैं आज इस महिला दिवस के उपलक्ष्य  में प्रधान मंत्री जी को भी धन्यवाद देना चाहूंगी कि उनके मन में महिलाओं के लिए सम्मान है. जिस दिन उन्होंने प्रधान मंत्री पद की शपथ ली थी, उसके तुरंत बाद उन्होंने सम्पूर्ण देश की महिलाएं शिक्षित बनें, समझदार बनें, इस बात को दृष्टी  में रखते हुए महिलाओं को सभी प्रकार की शिक्षा फ्री देने का, उच्च शिक्षा तक फ्री दिए जाने का ऐलान किया था. इतना ही नहीं उनको व्यावसायिक शिक्षा देने के बारे में भी सोचने की बात जो कही थी, मैं चाहूंगी कि सरकार इस बारे में जल्द ही कुछ योजना लाए. इसी प्रकार महिलाओं के आत्मसम्मान और सुरक्षा की दृष्टि से जो भाव हमारे प्रधान मंत्री जी के मन में है, इस सदन में भी कई बार इस बात की चर्चा हो चुकी है. जब-जब भी दो जातियों में या कहीं भी झगड़े होते हैं तो वास्तव में भुगतना स्त्री को ही पड़ता है, अत्याचार होता है तो उस जाति की महिलाओं पर ही होता है, मातृत्व पर आघात होता है, इस बात को दृष्टि  में रखना चाहिए. इसीलिए प्रधान मंत्री जी ने और गृहमंत्री जी ने जो यह बात बार-बार कही है कि बलात्कारियों को फांसी तक की सजा दी जानी चाहिए, मैं उनका इस बात के लिए अभिनन्दन करना चाहती हूं. मैं चाहूंगी कि महिलाओं के हित में जो कानून हैं, उनके बारे में सोचा जाए और आवश्यक संशोधन किए जाएं तथा महिलाओं के लिए ३३ प्रतिशत आरक्षण वाला जो बिल है उसके बारे में भी सोचा जाए ... (व्यवधान)

श्रीमती सुमित्रा महाजन : उपाध्यक्ष महोदय, मैं केवल इतना ही निवेदन करना चाहूंगी कि ३३ प्रतिशत आरक्षण देकर हम इतना ही चाहते हैं कि निर्णय की प्रक़िया में महिलाओं का भी ज्यादा से ज्यादा सहभाग हो. हो सकता है इस पर किसी के विचार अलग हों, लेकिन बिल पर चर्चा के समय वे उसमें संशोधन दे सकते हैं. अगर मित्रता के नाते, सर्वानुमति से यह बात हो जाती है तो महिलाओं का सम्मान रखने के लिए जो हम अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मना रहे हैं, उसको मनाने में ज्यादा खुशी होगी. मेरा पूरे सदन से निवेदन है कि महिलाओं को कृप्या जाति में न बांटे. स्त्री की एक ही जाति होती है और वह मातृत्व की जाति होती है. वैसे भी स्त्री देश में पिछड़ी हुई है, उस पर अत्याचार हो रहे हैं, वह आगे नहीं बढ़ पा रही है. इसलिए निर्णय की प्रक़िया में अधिकार दिलाने की दृष्टि  से अगर कोई महिला बात करती है तो वह पूरे महिला समाज की बात करेगी. इस सदन में भी अगर वह बोलने के लिए खड़ी होगी तो मुस्लिम , दलित या अगड़े-पिछड़े की बात न करके पूरे स्त्री समाज की बात करेगी. इसलिए जब वह प्रतिनधित्व करेगी तो पूरे महिला समाज का करेगी. मेरा पूरे सदन से निवेदन है कि इस दृष्टि  से इस पर सोचें और महिलाओं के लिए ३३ प्रतिशत आरक्षण वाले बिल पर भी सर्वानुमति होनी चाहिए.

श्री चन्द्रशेखर (बलिया) (उ.प्र.): उपाध्यक्ष जी, आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है. महिलाओं के लिए जितना भी किया जाए, वह कम है. मैं बधाई दूंगा सरकार को कि इन्होंने बहुत अच्छी इच्छा व्यक्त  की है महिलाओं को शिक्षा देने के लिए और उनके उत्थान के लिए. मैं उस पर नहीं जाऊंगा कि यह कितनी क्रियान्वित  होगी, यह तो अगले एक साल में देखा जाएगा. उसके लिए जो श्रीमती महाजन ने बधाई दी है प्रधान मंत्री जी को, मैं भी देता हूं. लेकिन दो बातें मैं और कहना चाहता हूं. अभी मुलायम सिंह जी ने जो बातें कहीं, उनका अपना महत्व है. उनकी भावनाओं को भी समझना चाहिए. यह भी समझना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के दिन हम लोग एक राष्ट्रीय कार्यक़म, जो अपने में अनोखा है, लागू करना चाहते हैं. मैं अपने मित्र गुजराल जी से पूछ रहा था कि जिस दिन आप यह बिल यहां लाए थे, उस दिन आपने क्या  सोचकर ऐसा किया था, कयोंकि थोड़ा बहुत दुनिया के बारे में मुझे भी ज्ञान है, मैं दुनिया के देशों में ज्यादा नहीं गया हूं, लेकिन भारत निराला देश होगा. जहां इस तरह का बिल पार्लियामेंट  में लाया जाएगा और क्यों लाया जा रहा है, इसका कारण हमारे मित्र गुजराल साहब को भी नहीं मालूम है। उन्हें सिर्फ यह मालूम है कि उस समय कोई कोर कमेटी थी, उसने कहा कि यह बिल ले आओ और उसी दिन उसको सर्वसम्मति से पास कर दो। उमा भारती जी आज यहां हैं या नहीं, उन्होंने भी उस दिन यही सवाल उठाया था जो आज मुलायम सिंह जी उठा रहे हैं .. (व्यवधान)मैं कहना चाहता हूं लोगों के मन में आशंका है. जो गरीब, पिछड़े, दलित और अल्पमत के लोग हैं, उनकी महिलाएं ज्यादा पिछड़ी हुई हैं. चुनाव आज जिस तरह से हो रहे हैं, उनका भी हमें रूप मालूम है, इसलिए हम समझते हैं कि उनका इतना प्रतिनिधित्व इस सदन में कम हो जाएगा, इसलिए यह भेद मत पैदा करें. यह सही है कि पिछड़े और अगड़ों में इस सदन में अंतर नहीं करना चाहिए. मैं सुमित्रा महाजन जी से यह कहूंगा कि पुरुषों और औरतों में अंतर करना भी उतना ही बुरा है जितना इस तरह की बातें करना बुरा है. इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि यह जो बिल लाया गया, बिना सोचे-समझे, बिना जाने-बूझे और केवल भावनाओं, ज्जबातों में बहकर लाया गया. इसके क्या परिणाम होंगे, उसके बारे में कभी नहीं सोचा गया. अगर कोई माननीय सदस्य यह बता दे कि दुनिया के किसी देश  में क्या  एक तिहाई रिजर्वेशन महिलाओं के लिए किया गया है?
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