वह इतिहास, जो बन न सका : राज्यसभा में महिला आरक्षण : चौथी क़िस्त

 महिला आरक्षण को लेकर संसद के दोनो सदनों में कई बार प्रस्ताव लाये गये. 1996 से 2016 तक, 20 सालों में महिला आरक्षण बिल पास होना संभव नहीं हो पाया है. एक बार तो यह राज्यसभा में पास भी हो गया, लेकिन लोकसभा में नहीं हो सका. सदन के पटल पर बिल की प्रतियां फाड़ी गई, इस या उस प्रकार से बिल रोका गया. संसद के दोनो सदनों में इस बिल को लेकर हुई बहसों को हम स्त्रीकाल के पाठकों के लिए क्रमशः प्रकाशित करेंगे. पहली क़िस्त  में  संयुक्त  मोर्चा सरकार  के  द्वारा  1996 में   पहली बार प्रस्तुत  विधेयक  के  दौरान  हुई  बहस . पहली ही  बहस  से  संसद  में  विधेयक  की  प्रतियां  छीने  जाने  , फाड़े  जाने  की  शुरुआत  हो  गई थी . इसके  तुरत  बाद  1997 में  शरद  यादव  ने  'कोटा  विद  इन  कोटा'  की   सबसे  खराब  पैरवी  की . उन्होंने  कहा  कि ' क्या  आपको  लगता  है  कि ये  पर -कटी , बाल -कटी  महिलायें  हमारी  महिलाओं  की  बात  कर  सकेंगी ! ' हालांकि  पहली   ही  बार  उमा भारती  ने  इस  स्टैंड  की  बेहतरीन  पैरवी  की  थी.  अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद पूजा सिंह और श्रीप्रकाश ने किया है. 

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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की सौंवी वर्षगांठ ( 8 मार्च 2010) 

सभापति – आज 8 मार्च 2016 को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के सौ वर्ष पूरे हो रहे हैं. और समाज के सभी क्षेत्रों में समानता हासिल करने के प्रति उनकी दृढ़प्रतिज्ञ और रचनात्मक प्रतिबद्धता के लिए भारत की महिलाओं और पूरे विश्व के महिला समुदाय को मैं अपनी तरफ से हार्दिक बधाई देता हूं. 1945 में सैन फ्रांसिस्को में हस्ताक्षरित संयुक्त राष्ट्र चार्टर, आधुनिक समय में एक बुनियादी मानव अधिकार के रूप में जेंडर समानता का प्रचार करने के लिए किया गया पहला अंतरराष्ट्रीय समझौता था. भारत का संविधान समानता की गारंटी देता है और लिंग के आधार पर भेदभाव को वर्जित करता है. आज हमारी महिल अग्रदूतों और अन्य लोगों को याद करने का दिन है, जिन्होंने शांति, स्वतंत्रता और समानता के लिए अपने जीवन का बलिदान किया था. नई सहस्राब्दी महिलाओं की क्षमता और मुक्ति के लिए उनके संघर्ष को स्वीकार करने में एक महत्वपूर्ण बदलाव और व्यवहारगत परिवर्तन की गवाह है. अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का महत्व महिलाओं की स्थिति, विशेष रूप से हमारे समाज के हाशिये पर खड़ी महिलाओं की स्थिति में सुधार, और समाज में अपनी सही जगह हासिल करने के लिए उन्हें सशक्त बनाने के प्रति हमारे पुनर्समथन और हमारी प्रतिबद्धता में निहित है. आज महिलाओं से संबंधित घरेलू हिंसा, महिलाओं से संबंधित सामाजिक बुराइयों, निरक्षरता, भेदभाव, स्वास्थ्य एवं कुपोषण और महिलाओं, विशेष रूप से ग्रामीण पृष्ठभूमि वाली महिलाओं के लिए राजनीतिक और आर्थिक अवसरों की कमी के मुद्दों ध्यान केंद्रित करना हमारा कर्तव्य है. हमारा प्रयास जेंडर समानता और विकास को सुरक्षित करने का होना चाहिए.  इस अवसर पर, मुझे यकीन है कि हमारे समाज में सभी महिलाओं के लिए समान अधिकार, समान अवसर और प्रगति लाने में स्वयं को पुनर्समर्पित करने में सभी सदस्य मेरा साथ देंगे. हमारे देश की निर्णय लेने की प्रक्रिया में महिलाओं को शामिल किया जाना है और हमारे देश की निरंतर प्रगति और उसका उज्ज्वल भविष्य सुनिश्चित करने के लिए महिलाओं के अधिकारों का सम्मान करने और किसी भी स्थिति में उनकी रक्षा करने की जरूरत है.


कृष्णा तीरथ ( महिला एवं बाल विकास मंत्रालय में राज्यमंत्री) : पूरे देश में खुशी की लहर है  इस अवसर पर मैं अपने मंत्रालय की ओर से एक वक्तव्य देना चाहती हूं."समान अधकार, समान अवसर: सभी की प्रगति" विषय के साथ आज हम  अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मना रहे हैं. वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार, देश की कुल जनसंख्या में 48% महिलाएं हैं. महिलाओं को महत्वपूर्ण  मानव संसाधान मानते हुए, संविधान ने उन्हें न केवल बराबरी का दर्जा दिया बल्कि उनके पक्ष में सकारात्मक भेदभाव के उपाय करने के अधिकार भी सरकार को दिए. संविधान से प्रेरणा पाकर, भारत सरकार महिलाओं का चहुँमुखी कल्याण, विकास और सशक्तिकरण सुनिश्चित करने के लिए निरंतर प्रयास करती रही है. राष्ट्रीय न्यूनतम साझा  कार्यक्रम में निर्धारित शासन के  6 आधारभूत सिद्धांतों में महिलाओं को राजनैतिक, शैक्षणिक, आथिक और कानूनी रूप से सशक्त बनाने का सिद्धांत भी शामिल है. महिला एवं बाल विकास विभाग को महिला एवं बाल विकास राज्य मंत्री के स्वतंत्र प्रभार के अधीन 30.01.2006 से मंत्रालय का दर्जा दिया जाना इस दिशा में उठाया गया ऐतिहासिक कदम है. महिलाओं के लिए नोडल मंत्रालय होने के नाते, यह मंत्रालय महिलाओं के प्रति भेदभावों को समाप्त करने के लिए कानूनों की समीक्षा करके, महिलाओं के साथ न्याय सुनिश्चित करने के उद्देश्य से नये कानून  बनाकर और महिलाओं के सामाजिक एवं आथिक सशक्तिकरण के लिए विभिन्न कार्यक्रम चलाकर महिलाओं का सर्वागीण सशक्तिकरण करने के प्रयास कर रहा है. गरीबी मानव जाति के लिए अभिशाप है और गरीबों में भी महिलाओं को ही पुरुषों  की अपेक्षा अधिक तकलीफें झेलनी पड़ती हैं. हाल ही तक अर्थात् 31.03.2008 तक महिला एवं बाल विकास मंत्रालय स्व-सहायता दलों  के माध्यम से महिलाओं के सर्वागीण सशक्तिकरण के उद्देश्य से 'स्वयंसिद्धा कार्यक्रम' चला रहा था. इस स्कीम के अंतर्गत, 650 ब्लॉकों में 10.02 लाख लाभाथियों  के 69,774 स्व-सहायता दल गठित किए गए. इस कार्यक्रम के मूल्यांकन के निष्कर्ष और इसके कार्यान्वयन के दौरान प्राप्त अनुभवों के आधार पर इस स्कीम के विस्तार का मंत्रालय का प्रस्ताव है. चूंकि अधिकांश कामकाजी महिलाएं अनौपचारिक क्षेत्रों में कार्य कर रही हैं, इसलिए इन महिलाओं हेतु आय-अर्जन, कल्याण, सहायता सेवाएं, प्रशिक्षण, कौशलों के उन्नयन जैसी सुविधाएं सुनिश्चित करने वाली स्कीम की जरूरत महसूस की गई. महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाने पर जोर देते हुए अनौपचारिक क्षेत्र में कार्य कर रही महिलाओं का कल्याण सुनिश्चित करने के लिए 7वें योजना अवधि के दौरान "प्रशिक्षण एवं रोजगार कार्यक्रम को सहायता (स्टेप)" स्कीम शुरू की गई, जो सफलतापूर्वक चलाई जा रही है. केवल महिलाओं के सामाजिक एवं आथिक विकास के लिए शीर्ष वित्त-पोषक संगठन के रूप में सरकार ने वर्ष 1993 में राष्ट्रीय महिला कोष नाम से महिलाओं हेतु राष्ट्रीय ऋण कोष की स्थापना की. अब तक राष्ट्रीय महिला कोष ने 66,867 स्व-सहायता दलों  को 236.50 करोड़ रुपये के ऋण संवितरित किए हैं, जिनसे 6,68,650 महिलाएं लाभान्वित   हुई, राष्ट्रीय महिला कोष की लाभार्थियों पर कराए गए प्रभाव अध्ययनों से पता चला है कि कोष से प्राप्त ऋणों से लाभार्थ  महिलाओं के जीवन-स्तर में सुधार आया है. इन अध्ययनों से यह जानकारी भी मिली है कि अब स्कूल भेजी जाने वाली बालिकाओं की  संख्या बढ़ी है और स्कूली शिक्षा बीच में छोड़ने वाली बालिकाओं की संख्या में भी कमी आई है. महिला लाभार्थियों  में साक्षरता बढ़ी है. यह पाया गया है कि कोष की लाभार्थियों  में उद्यम चलाने, कामकाज के लिए अकेले घर से बाहर जाने का आत्मविश्वास बढ़ा है और यह प्रविर्तित  भी देखने में आई है कि महिलाएं खेतों में मजदूरी छोड़कर पशुओं की देखरेख, उजरती कार्य जैसे काम करने लगी हैं और आय पर उनके नियंत्रण एवं पारिवारिक निर्णयों में उनकी भागीदारी बढ़ी है. घरेलू हिंसा की घटनाओं में भी कमी आई  है. इससे यह पता चलता है कि स्व-सहायता दलों के माध्यम से गरीब महिलाओं के सामाजिक एवं आथिक उत्थान के लिए राष्ट्रीय महिला कोष का लघु वित्त कार्यक्रम भारत का सधिक सफल कार्यक्रम है. ऋण प्राप्त करने वाले महिला स्व-सहायता दलों की संख्या में तेजी से होती बढ़ोतरी को ध्यान में रखकर कोष की अधिकृत पूंजी में वृद्धि करके इसे सुदृढ़ बनाया जा रहा है. केन्द्रीय समाज कल्याण बोर्ड महिलाओं के विकास और सशक्तिकरण के लिए अनेक कार्यक्रम चलाने के अतिरिक्त जागरूकता विकास कार्यक्रम भी चलाता है. इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य महिलाओं में उनके अधिकारों  सि्थति और समस्याओं तथा अन्य सामाजिक सरोकारों के विषय में जागरूकता पैदा करना है. इस कार्यक्रम से महिलाओं को संगठित होने तथा सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक प्रकि्रयाओं में अपनी भागीदारी बढ़ाने में सहायता मिलती है. सरकार महिलाओं के सामाजिक एवं आथिक सशक्तिकरण हेतु राष्ट्रीय मिशन शुरू करने के लिए वचनबद्ध है. इस मिशन के अंतर्गत सरकार के विभिन्न महिला केंद्रित और महिलाओं से संबंधित कार्यक्रम समेकित रूप में चलाए जाएंगे. महिलाओं के सामाजिक, आथिक एवं शैक्षणिक सशक्तिकरण पर विशेष जोर दिया जाएगा. यह मिशन विभिन्न मंत्रालयों / विभागों  की स्कीमों /कार्यक्रमों का संकेंद्रण सुनिश्चित करके उक्त सभी मोर्चाí पर महिलाओं के सशक्तिकरण का प्रयास करेगा. महिलाओं की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति  का अध्ययन करने के लिए सरकार उच्च-स्तरीय समिति नियुक्त करने का प्रस्ताव भी कर रही है. इस समिति के निष्कर्ष के आधार पर सरकार भारतीय महिलाओं के सर्वागीण सशक्तिकरण के लिए जरूरी उपायों का निर्धारण करेगी. हमें विश्वास है कि इन प्रयासों से भारतीय महिलाओं की सामाजिक एवं आर्थिक  स्थिति  में स्पष्ट सुधार होगा और भारतीय समाज में महिलाओं के साथ भेदभाव अतीत की बात बनकर रह जाएगी.

9 मार्च 2010

अरुण जेटली : ( विपक्ष के नेता) : श्रीमान सभापति महोदय, आज सुबह जब मैं सदन में आया तो इस सदन के अन्य सदस्यों सहित मैंने भी सोचा कि मैं भी एक बनते हुए महान इतिहास का एक हिस्सा बनूंगा क्योंकि हम सभी हाल ही में सबसे प्रगतिशील कानूनों में से एक कानून बनाने में सहयोग देकर एक ऐतिहासिक जिम्मेदारी का निर्वहन कर रहे हैं. मेरी पार्टी की ओर से,  मैं आरंभ में ही बताना चाहता हूं कि हम सभी इस कानून का स्पष्ट समर्थन करते हैं. लेकिन, फिर,  सभापति महोदय, यह विशेषाधिकार, जो हम सबको मिला हुआ है, आज काफी हद तक कमजोर हो गया है. इस सदन में हमने एक नहीं,  बल्कि दो इतिहास देखा है. पहला, ज़ाहिर है, सौभाग्य की बात होगी कि हम सबसे प्रगतिशील कानूनों में से एक को अधिनियमित कर रहे हैं। दूसरा, और मुझे कोई संदेह नहीं है कि, हम सभी का सिर शर्म से झुक जाएगा क्योंकि हमने भारत के संसदीय लोकतंत्र के कुछ सबसे शर्मनाक घटनाओं को देखा है. मैं केवल यही सोचता हूं कि सभी संबंधित पक्षों द्वारा स्थिति को काफी परिपक्वता और नियंत्रण से संभाला जाना चाहिए था. इस प्रकार, इस विशेष कानून बनाने का विशेषाधिकार हम सभी के लिए कहीं अधिक सुखद हो गया होता. एक संवैधानिक संशोधन के जरिये महिला आरक्षण पर यह बहस डेढ़ दशक पुरानी हो चुकी है. एक मिथक है कि आरक्षण समाज में एक विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग बनाता है. सच्चाई यह है कि प्रकृति ने हम सभी को एक समान मानते हुए बनाया है.


 हमारा संविधान समानता प्रदान करता है, लेकिन हमारे समाज में स्थिति कुछ इस तरह की थी कि हमारी कुछ समानताएं, असमानताएं बन गईं  और इस असमानता का सबसे अच्छा सबूत यह है कि आजादी के 63 साल बाद भी हमारे समाज के  50 प्रतिशत भाग को लोकसभा में अधिकतम 10 प्रतिशत प्रतिनिधित्व मिला हुआ है. राज्य विधानसभाओं भी स्थिति इससे बहुत अलग नहीं है. महोदय, आज हम सब यहां एक कानून बनाने के लिए या एक कानून बनाने की प्रक्रिया आरंभ करने की सकारात्मक कार्रवाई के लिए इकट्ठे हुए हैं. आरक्षण कोटा जो हम लोकसभा में, और राज्य विधानसभाओं में भी, महिलाओं के लिए प्रदान करने जा रहे हैं वह समानता के उद्देश्य के लिए सक्रियता बढ़ाने में एक जरूरी औजार बनेगा, जिसकी परिकल्पना इस देश ने हमेशा की है. महोदय, हमने 15वीं लोकसभा आम चुनाव कराया था. पहले 15 चुनावों में देखा गया है कि 7 से 11 प्रतिशत महिलाएं लोकसभा के लिए निर्वाचित होती हैं. वह संख्या जिसमें महिलाएँ चुन कर आती रही हैं, वह इन 15 चुनावों में सात फीसदी से लेकर 11 फीसदी तक रही है. ..(व्यवधान).. आज 63 साल बाद भी यह आंकड़ा मौजूदा लोक सभा में भी 10.7 परसेंट पहुँचा है. यह जो तर्क दिया जाता है कि बिना आरक्षण के स्वाभाविक रूप से समाज जो आगे बढ़ रहा है तो महिलाओं का प्रतिनिधित्व भी अपने-आप बढ़ता चला जाएगा, 63 वर्ष तक हमारे सामने जो अनुभव आया है, उसमें हमने देखा है कि 63 वर्ष  तक यह परिस्थिति  नहीं बदली और अगर यह कानून नहीं आता तो हम यह सम्भावना भी मान लें कि शायद अगले 63 वर्ष  तक भी यह परिस्थिति  नहीं बदलने वाली है. इसीलिए, आज यह आवश्यक हो चुका है कि भारत की संसद और विधान सभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व भी पूर्ण मात्रा के रूप में सामने आये. सभापति जी, हम देश को एक बहुत बड़ी आथिक शक्ति के रूप में बनाना चाहते हैं. आज हम वह देश हैं जिसकी अपनी परमाणु शक्ति है,  but two-third of Indian children are born to women without medical help. आज जितनी कन्याएँ स्कूल छोड़ती हैं, who drop out, उनकी संख्या male child की तुलना में आ गयी है. अगर हम आज की परिस्थिति  को देखते हैं, सभापति जी, जो संविधान संशोधन पेश किया गया है, उसका जो सार है, वह बिल्कुल स्पष्ट है. इस संविधान संशोधन में प्रावधान है कि 15 वर्ष के लिए देश की लोक सभा में और विधान सभाओं में महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण प्रदान किया जाएगा.

जनसंख्या की दृष्टि से, बताया जाता है कि भारत में प्रत्येक 1000 पुरुषों पर 953 महिलाएं हैं. हमारे कानून, जिनमें से कुछ लागू भी हैं, जहां तक समाज के एक हिस्से का संबंध है, आज भी भेदभावपूर्ण हैं. महोदय, यदि आप हमारे पर्सनल कानूनों की स्थिति पर नजर डालें तो हमारे बहुत सारे पर्सनल कानूनों में अभी भी असमानता निहित है. मेरा हमेशा मानना रहा है कि हमारे संसद और विधान सभाओं में महिलाओं की कमतर उपस्थिति से ही आज भी भेदभावपूर्ण स्थिति बनी हुई है, जिससे हममें यह कहने का भी साहस नहीं है कि राज्य व्यवस्था और गरिमा का उल्लंघन करने वाले पर्सनल लॉ को …..महोदय, जहां तक सिस्टम का मामला है, हमने टोकनिज्म की पर्याप्त राजनीति कर ली है. टोकनिज्म की इस राजनीति से पता चलता है कि हमने विचारों की राजनीति को कैसे प्रतिस्थापित कर दिया है.

 इससे जहां तक महिलाओं का संबंध है, अब प्रतिनिधित्व की राजनीति में प्रतिस्थापित होना होगा. आपके पास कोई अधिकार नहीं है. विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में महिलाओं की सक्रियता और महिलाओं के उम्मीदवार के रूप में उभरने में एक क्षैतिज फैलाव आया है और प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र का वर्ष में किसी एक समय महिला उम्मीदवारों द्वारा प्रतिनिधित्व किया जाना चाहिए था. अब,  इसे विधानसभाओं,  स्थानीय निकाय सरकारों और पंचायतों के साथ जोड़कर इस संशोधन के बाद लागू कर दिया गया है. आज से 15 साल बाद यह संशोधन लाखों महिला कार्यकर्ताओं को सामने लायेगा, जो चुनाव लड़ने के लिए विभिन्न राजनीतिक दलों के लिए उपलब्ध होंगी.

अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को छोड़कर संसदीय और विधायी सीटों के लिए किसी अन्य आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है. इन महिला निर्वाचन क्षेत्रों में जो सीटें पहले से ही आरक्षित भी हैं तो वे अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए हैं.


यह जेंडर न्याय का एक नया इतिहास है जो हम लिख रहे हैं और इसलिए, हम सबको उत्साह से इसका समर्थन करना चाहिए. लेकिन, उसी समय में, जो घटनाएं घटी हैं और जिनमें  बड़ी संख्या में लोगों ने योगदान दिया है, मुझे लगता है कि उसने इस कानून का समर्थन करके हमारी भावना में खटास पैदा कर दी है. जब मैं इस कानून का स्पष्ट समर्थन करता हूं तो जो कुछ आज सदन में हुआ है, उसकी स्पष्ट निंदा भी कर सकता हूं. हम इस सदन में इसलिए नहीं आये थे. हम अपने कुछ सहयोगियों के साथ शारीरिक रूप से की जाने वाली हाथापाई और उनको इस सदन से बाहर किये जाना देखने नहीं आये थे. अगर हम इसे अधिक सौहार्दपूर्ण तरीके से कर पाते यह बेहतर होता.

महोदय, हमें नहीं भूलना चाहिए कि इस देश ने एक समय संविधान के 42वें संशोधन का विरोध करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को जेल में डाल कर 42वें संशोधन को पारित कर दिया था. जो लोग 42वें संशोधन के विरोध में थे, वे इसका विरोध कर सकते थे, लेकिन इमरजेंसी के दौरान वे जेल में बंद थे. जिसका असर यह हुआ कि इमरजेंसी हटा ली गई और उस को संशोधन काफी हद तक निरस्त करना पड़ा था. इसलिए, हमारा अनुभव रहा है कि भले ही इसका विरोध करने वाले मित्रों से मैं असहमत हूं, लेकिन हमें उनकी आवाज सुननी चाहिए और इस कानून के खिलाफ उन्हें वोट करने का अधिकार देना चाहिए. मुझे लगता है कि हममें से 85 से 90 प्रतिशत का एक भारी बहुमत इस विधेयक के समर्थन में है. इसका विरोध करने वाले अपने मित्रों से मैं इसका समर्थन करने का अपील भी करूंगा क्योंकि इस सदन में एक विशाल बहुमत विधेयक का समर्थन कर रहा है.


आपको लोकतंत्र की भावना का भी सम्मान करना चाहिए. अगर 85-90 प्रतिशत सदस्य इसका समर्थन कर रहे हैं,  तो उन्हें बहुमत के अधिकार का प्रयोग करने की अनुमति दें. एक छोटा सा अल्पसंख्यक समूह उन्हें कार्यवाही चलने देने के लिए अनुमति नहीं देने का दबाव नहीं डाल सकता है, और, इसलिए, आप अपने उन सहयोगियों को समझायें जिनको सदन से बाहर जाने के लिए कहा गया है, कि इस सदन के चलने के लिए एक सौहार्दपूर्ण  माहौल बनायें. आपके पास इस विधेयक के खिलाफ बोलने का अधिकार है; आपके पास इससे असहमत होने का अधिकार है; लेकिन, निश्चित रूप से, बहुमत के जनादेश को बाधित करने का आपको कोई अधिकार नहीं है. अगर हम एक-दूसरे का सम्मान करें तो मुझे यकीन है कि यह विधेयक जिस भावना के साथ हम इसे पारित करना चाहते हैं, वैसे ही पारित हो जाएगा.  महोदय,  जब हम इस कानून को स्पष्ट समर्थन दे ही रहे हैं तो हमें उन तरीकों के बारे में सोचना चाहिए जिसकी आप पहलकदमी ले सकें, ताकि इस सदन में एक सौहार्दपूर्ण माहौल बनाया जा सके; और जो हमारे खिलाफ हैं, जहां तक इस सदन का सवाल है, उनकी आवाज सुनी जानी चाहिए. इन शब्दों के साथ, मैं इस कानून का समर्थन करता हूं. धन्यवाद...

अरुण जेटली : सभापति जी, इस एक-तिहाई आरक्षण के सिद्धांत को लागू करने के लिए एक रोटेशन की प्रक्रिया  लागू की जाएगी. हर विधान सभा में और लोक सभा में एक-तिहाई सीटें हर आम चुनाव के अंदर आकर्षित की जाएंगी और अगले चुनाव के अंदर वे बदली जाएंगी. हम देखते हैं कि संविधान में 73वें और 74वें संशोधन के बाद ग्राम पंचायतों में और अन्य पंचायतों में तथा local self bodies में जब से महिलाओं की भागीदारी आरंभ हुई है, उसका प्रत्यक्ष असर आज यह है कि इन 15-17 वर्ष के बाद हालांकि कानून में उनके लिए केवल 33 फीसदी आरक्षण है, लेकिन वास्तविकता में इन 15 वर्ष  के बाद करीब 48 प्रतिशत महिलाएं आज ग्राम पंचायतों में चुने हुए पदों पर कायम हैं.  सभापति जी, अगर हम दूसरे देशों का अनुभव देखते हैं, तो आज यह कानून केवल भारत में नहीं आ रहा है, दुनिया के विभिन्न देशों के अंदर यह प्रयोग में लाया गया है और दुनिया के विभिन्न देशों में इसको तीन अलग-अलग प्रक्रियाओं के माध्यम से लागू करने का प्रयास किया गया है। पहला सुझाव यह रहा कि कुछ देश राजनीतिक दलों  के लिए एक पोलिटिकल पार्ट कोटा फिक्स कर लेते हैं. राजनीतिक दलों के लिए जो कोटा फिक्स होता है, उसके माध्यम से आरक्षण लेने का प्रयास करते हैं. कुछ देशों के अंदर लिस्ट सिस्टम के माध्यम से हुआ और कुछ देशों के अंदर ऐसे चुनाव क्षेत्र हैं, जिनको आकर्षित  किया जाता है. जब हम इसका अध्ययन करते हैं और इन व्यवस्थाओं को अपने देश में लागू करने का प्रयास करते हैं, तो अनुभव में यह आया कि जिन देशों के अंदर चुनाव क्षेत्रों  को आकर्षित  किया गया है, यह प्रयोग सबसे ज्यादा उन्हीं देशों के अंदर सफल हो पाया है. दुनिया के जो पिछड़े देश हैं, अफ्रीका के देश हैं. युवाना जैसे देश में वहां की संसद के अंदर महिलाओं का प्रतिनिधित्व दुनिया में सबसे अधिक हो गया है, क्यों कि वहां चुनाव क्षेत्रों  का आरक्षण किया गया था. अफगानिस्तान और पाकिस्तान जैसे देश, जहां चुनाव क्षेत्रों  का आरक्षण किया गया था, उन देशों के अंदर भी आरक्षण की  प्रक्रिया  सफल हुई. इस प्रयोग को जब हम अपने देश के ऊपर लागू करने का प्रयास करते हैं, तो इसके जितने भी आलोचक हैं और मेरे मित्र, जिनके अन्यथा विचार हैं, मैं उनसे आग्रह करूंगा कि इस पर हमारी जो धारणा है और उसका जो विश्लेषण है, वे उसे भी एक बार समझाने का प्रयास करें. राजनीतिक दलों  के ऊपर कोटा बन जाए, यह सुझााव आता रहा है. शायद आज का जो संविधान है, उस संविधानकी धाराएं जब मैं पढ़ता हूं, तो बिना उसको तब्दील किए हुए यह अपने देश में संभव नहीं हो सकता.


लेकिन जिन देशों ने लागू किया है, उनमें एक युनाइटेड किंगडम का उदाहरण है. आज युनाइटेड किंगडम के अंदर, राजनीतिक दलों  के ऊपर कोटा लागू है. वे चुनाव क्षेत्रों के अंदर महिला उम्मीदवार उतारते हैं. उस कानून के अंदर कितनी संख्या है, इसका उसमें प्रावधान है. यदि आज हम वहां का अनुभव देखें, तो ब्रिटेन  में पाकिस्तान और अफगानिस्तान की तुलना में कम फीसदी महिलाएं हैं, जो उस प्रक्रिया  के माध्यम से हाउस ऑफ कॉमन्स के अंदर जीतकर आई हैं..(व्यवधान).. पाकिस्तान में चुनाव क्षेत्रों में लागू करना, अफगानिस्तान में चुनाव क्षेत्रों में लागू करना  जहां की महिलाओं को हम पिछड़ा मानते हैं, उनको अधिक प्रतिनिधित्व मिल पाया है, बनिस्पत युनाइटेड किंगडम जैसे देश में, जहां राजनीतिक दलों  के ऊपर एक कोटा लागू हुआ था. इसलिए मैं मानता हूं कि चुनाव क्षेत्रों  द्वारा.. यह निश्चित करना इस देश की वर्तमान भूमिका के अंदर ज्यादा सफल रहने वाला है. सभापति जी, यह आलोचना की जाती है कि जो रोटेशन की प्रक्रिया  है, उस रोटेशन की प्रक्रिया को नहीं रखना चाहिए. यह कानून पंद्रह वर्ष के लिए है. पंद्रह वर्ष में अगर तीन आम चुनाव होते हैं और हर चुनाव के अंदर अगर एक तिहाई सीटें आकर्षित  रहती हैं, तो पंद्रह वर्ष के बाद महिला आरक्षण देश के माध्यम से हर चुनाव क्षेत्र तक पहुंच चुका होगा.  सभापति जी, यह भी आलोचना की गई कि यह आरक्षण देते वक्त समाज में कुछ और वर्ग हैं, जिनके लिए सब-कोटा रखना चाहिए आज हमारी संवैधानिक व्यवस्था के तहत जो एस.सी. और एस.टी. समुदाय हैं, उनके लिए चुनाव क्षेत्रों  में आरक्षण की व्यवस्था है, किसी अन्य के लिए व्यवस्था नहीं है
आज देश की विभिन्न विधानसभाएं कानून बना रही हैं. एक तिहाई के स्थान पर, पचास फीसदी तक महिलाओं को ग्राम पंचायतों में लोकल सेल्फ गवर्नमेंट में आरक्षण दिया जा रहा है .कई विधान सभाओं में बहुत सफलता से कई राज्यों  में लागू हुआ है, लेकिन जहां आपको पसंद नहीं आता..(व्यवधान)..गुजरात का उदाहरण है , चार महीने पहले कानून पारित हुआ था, लेकिन आज तक उस कानून को वहां के राज्यपाल स्वीकृति नहीं दे रहे..(व्यवधान)..इस प्रकार के दोहरे मापदंड कांग्रेस पार्टी  द्वारा भी नहीं चल पाएंगे ..(व्यवधान)..सभापति जी, मैं यह मानता था, जो मैंने आरंभ में कहा..(व्यवधान)..कि आज हम इतिहास बनाने जा रहे हैं.
क्रमशः
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