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वह इतिहास, जो बन न सका : राज्यसभा में महिला आरक्षण : चौथी क़िस्त

 महिला आरक्षण को लेकर संसद के दोनो सदनों में कई बार प्रस्ताव
लाये गये. 1996 से 2016 तक, 20 सालों में महिला आरक्षण बिल पास होना संभव
नहीं हो पाया है. एक बार तो यह राज्यसभा में पास भी हो गया, लेकिन लोकसभा
में नहीं हो सका. सदन के पटल पर बिल की प्रतियां फाड़ी गई, इस या उस प्रकार
से बिल रोका गया. संसद के दोनो सदनों में इस बिल को लेकर हुई बहसों को हम
स्त्रीकाल के पाठकों के लिए क्रमशः प्रकाशित करेंगे. पहली क़िस्त  में
संयुक्त  मोर्चा सरकार  के  द्वारा  1996 में   पहली बार प्रस्तुत  विधेयक
के  दौरान  हुई  बहस . पहली ही  बहस  से  संसद  में  विधेयक  की
प्रतियां  छीने  जाने  , फाड़े  जाने  की  शुरुआत  हो  गई थी . इसके  तुरत
बाद  1997 में  शरद  यादव  ने  ‘कोटा  विद  इन  कोटा’  की   सबसे  खराब
पैरवी  की . उन्होंने  कहा  कि ‘ क्या  आपको  लगता  है  कि ये  पर -कटी ,
बाल -कटी  महिलायें  हमारी  महिलाओं  की  बात  कर  सकेंगी ! ‘ हालांकि
पहली   ही  बार  उमा भारती  ने  इस  स्टैंड  की  बेहतरीन  पैरवी  की  थी.
अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद पूजा सिंह और श्रीप्रकाश ने किया है. 

संपादक
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महिला आरक्षण को लेकर संसद में बहस :पहली   क़िस्त

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महिला आरक्षण को लेकर संसद में बहस :तीसरी   क़िस्त

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की सौंवी वर्षगांठ ( 8 मार्च 2010) 

सभापति – आज 8 मार्च 2016 को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के सौ वर्ष पूरे हो रहे हैं. और समाज के सभी क्षेत्रों में समानता हासिल करने के प्रति उनकी दृढ़प्रतिज्ञ और रचनात्मक प्रतिबद्धता के लिए भारत की महिलाओं और पूरे विश्व के महिला समुदाय को मैं अपनी तरफ से हार्दिक बधाई देता हूं. 1945 में सैन फ्रांसिस्को में हस्ताक्षरित संयुक्त राष्ट्र चार्टर, आधुनिक समय में एक बुनियादी मानव अधिकार के रूप में जेंडर समानता का प्रचार करने के लिए किया गया पहला अंतरराष्ट्रीय समझौता था. भारत का संविधान समानता की गारंटी देता है और लिंग के आधार पर भेदभाव को वर्जित करता है. आज हमारी महिल अग्रदूतों और अन्य लोगों को याद करने का दिन है, जिन्होंने शांति, स्वतंत्रता और समानता के लिए अपने जीवन का बलिदान किया था. नई सहस्राब्दी महिलाओं की क्षमता और मुक्ति के लिए उनके संघर्ष को स्वीकार करने में एक महत्वपूर्ण बदलाव और व्यवहारगत परिवर्तन की गवाह है. अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का महत्व महिलाओं की स्थिति, विशेष रूप से हमारे समाज के हाशिये पर खड़ी महिलाओं की स्थिति में सुधार, और समाज में अपनी सही जगह हासिल करने के लिए उन्हें सशक्त बनाने के प्रति हमारे पुनर्समथन और हमारी प्रतिबद्धता में निहित है. आज महिलाओं से संबंधित घरेलू हिंसा, महिलाओं से संबंधित सामाजिक बुराइयों, निरक्षरता, भेदभाव, स्वास्थ्य एवं कुपोषण और महिलाओं, विशेष रूप से ग्रामीण पृष्ठभूमि वाली महिलाओं के लिए राजनीतिक और आर्थिक अवसरों की कमी के मुद्दों ध्यान केंद्रित करना हमारा कर्तव्य है. हमारा प्रयास जेंडर समानता और विकास को सुरक्षित करने का होना चाहिए.  इस अवसर पर, मुझे यकीन है कि हमारे समाज में सभी महिलाओं के लिए समान अधिकार, समान अवसर और प्रगति लाने में स्वयं को पुनर्समर्पित करने में सभी सदस्य मेरा साथ देंगे. हमारे देश की निर्णय लेने की प्रक्रिया में महिलाओं को शामिल किया जाना है और हमारे देश की निरंतर प्रगति और उसका उज्ज्वल भविष्य सुनिश्चित करने के लिए महिलाओं के अधिकारों का सम्मान करने और किसी भी स्थिति में उनकी रक्षा करने की जरूरत है.

कृष्णा तीरथ ( महिला एवं बाल विकास मंत्रालय में राज्यमंत्री) : पूरे देश में खुशी की लहर है  इस अवसर पर मैं अपने मंत्रालय की ओर से एक वक्तव्य देना चाहती हूं.”समान अधकार, समान अवसर: सभी की प्रगति” विषय के साथ आज हम  अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मना रहे हैं. वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार, देश की कुल जनसंख्या में 48% महिलाएं हैं. महिलाओं को महत्वपूर्ण  मानव संसाधान मानते हुए, संविधान ने उन्हें न केवल बराबरी का दर्जा दिया बल्कि उनके पक्ष में सकारात्मक भेदभाव के उपाय करने के अधिकार भी सरकार को दिए. संविधान से प्रेरणा पाकर, भारत सरकार महिलाओं का चहुँमुखी कल्याण, विकास और सशक्तिकरण सुनिश्चित करने के लिए निरंतर प्रयास करती रही है. राष्ट्रीय न्यूनतम साझा  कार्यक्रम में निर्धारित शासन के  6 आधारभूत सिद्धांतों में महिलाओं को राजनैतिक, शैक्षणिक, आथिक और कानूनी रूप से सशक्त बनाने का सिद्धांत भी शामिल है. महिला एवं बाल विकास विभाग को महिला एवं बाल विकास राज्य मंत्री के स्वतंत्र प्रभार के अधीन 30.01.2006 से मंत्रालय का दर्जा दिया जाना इस दिशा में उठाया गया ऐतिहासिक कदम है. महिलाओं के लिए नोडल मंत्रालय होने के नाते, यह मंत्रालय महिलाओं के प्रति भेदभावों को समाप्त करने के लिए कानूनों की समीक्षा करके, महिलाओं के साथ न्याय सुनिश्चित करने के उद्देश्य से नये कानून  बनाकर और महिलाओं के सामाजिक एवं आथिक सशक्तिकरण के लिए विभिन्न कार्यक्रम चलाकर महिलाओं का सर्वागीण सशक्तिकरण करने के प्रयास कर रहा है. गरीबी मानव जाति के लिए अभिशाप है और गरीबों में भी महिलाओं को ही पुरुषों  की अपेक्षा अधिक तकलीफें झेलनी पड़ती हैं. हाल ही तक अर्थात् 31.03.2008 तक महिला एवं बाल विकास मंत्रालय स्व-सहायता दलों  के माध्यम से महिलाओं के सर्वागीण सशक्तिकरण के उद्देश्य से ‘स्वयंसिद्धा कार्यक्रम’ चला रहा था. इस स्कीम के अंतर्गत, 650 ब्लॉकों में 10.02 लाख लाभाथियों  के 69,774 स्व-सहायता दल गठित किए गए. इस कार्यक्रम के मूल्यांकन के निष्कर्ष और इसके कार्यान्वयन के दौरान प्राप्त अनुभवों के आधार पर इस स्कीम के विस्तार का मंत्रालय का प्रस्ताव है. चूंकि अधिकांश कामकाजी महिलाएं अनौपचारिक क्षेत्रों में कार्य कर रही हैं, इसलिए इन महिलाओं हेतु आय-अर्जन, कल्याण, सहायता सेवाएं, प्रशिक्षण, कौशलों के उन्नयन जैसी सुविधाएं सुनिश्चित करने वाली स्कीम की जरूरत महसूस की गई. महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाने पर जोर देते हुए अनौपचारिक क्षेत्र में कार्य कर रही महिलाओं का कल्याण सुनिश्चित करने के लिए 7वें योजना अवधि के दौरान “प्रशिक्षण एवं रोजगार कार्यक्रम को सहायता (स्टेप)” स्कीम शुरू की गई, जो सफलतापूर्वक चलाई जा रही है. केवल महिलाओं के सामाजिक एवं आथिक विकास के लिए शीर्ष वित्त-पोषक संगठन के रूप में सरकार ने वर्ष 1993 में राष्ट्रीय महिला कोष नाम से महिलाओं हेतु राष्ट्रीय ऋण कोष की स्थापना की. अब तक राष्ट्रीय महिला कोष ने 66,867 स्व-सहायता दलों  को 236.50 करोड़ रुपये के ऋण संवितरित किए हैं, जिनसे 6,68,650 महिलाएं लाभान्वित   हुई, राष्ट्रीय महिला कोष की लाभार्थियों पर कराए गए प्रभाव अध्ययनों से पता चला है कि कोष से प्राप्त ऋणों से लाभार्थ  महिलाओं के जीवन-स्तर में सुधार आया है. इन अध्ययनों से यह जानकारी भी मिली है कि अब स्कूल भेजी जाने वाली बालिकाओं की  संख्या बढ़ी है और स्कूली शिक्षा बीच में छोड़ने वाली बालिकाओं की संख्या में भी कमी आई है. महिला लाभार्थियों  में साक्षरता बढ़ी है. यह पाया गया है कि कोष की लाभार्थियों  में उद्यम चलाने, कामकाज के लिए अकेले घर से बाहर जाने का आत्मविश्वास बढ़ा है और यह प्रविर्तित  भी देखने में आई है कि महिलाएं खेतों में मजदूरी छोड़कर पशुओं की देखरेख, उजरती कार्य जैसे काम करने लगी हैं और आय पर उनके नियंत्रण एवं पारिवारिक निर्णयों में उनकी भागीदारी बढ़ी है. घरेलू हिंसा की घटनाओं में भी कमी आई  है. इससे यह पता चलता है कि स्व-सहायता दलों के माध्यम से गरीब महिलाओं के सामाजिक एवं आथिक उत्थान के लिए राष्ट्रीय महिला कोष का लघु वित्त कार्यक्रम भारत का सधिक सफल कार्यक्रम है. ऋण प्राप्त करने वाले महिला स्व-सहायता दलों की संख्या में तेजी से होती बढ़ोतरी को ध्यान में रखकर कोष की अधिकृत पूंजी में वृद्धि करके इसे सुदृढ़ बनाया जा रहा है. केन्द्रीय समाज कल्याण बोर्ड महिलाओं के विकास और सशक्तिकरण के लिए अनेक कार्यक्रम चलाने के अतिरिक्त जागरूकता विकास कार्यक्रम भी चलाता है. इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य महिलाओं में उनके अधिकारों  सि्थति और समस्याओं तथा अन्य सामाजिक सरोकारों के विषय में जागरूकता पैदा करना है. इस कार्यक्रम से महिलाओं को संगठित होने तथा सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक प्रकि्रयाओं में अपनी भागीदारी बढ़ाने में सहायता मिलती है. सरकार महिलाओं के सामाजिक एवं आथिक सशक्तिकरण हेतु राष्ट्रीय मिशन शुरू करने के लिए वचनबद्ध है. इस मिशन के अंतर्गत सरकार के विभिन्न महिला केंद्रित और महिलाओं से संबंधित कार्यक्रम समेकित रूप में चलाए जाएंगे. महिलाओं के सामाजिक, आथिक एवं शैक्षणिक सशक्तिकरण पर विशेष जोर दिया जाएगा. यह मिशन विभिन्न मंत्रालयों / विभागों  की स्कीमों /कार्यक्रमों का संकेंद्रण सुनिश्चित करके उक्त सभी मोर्चाí पर महिलाओं के सशक्तिकरण का प्रयास करेगा. महिलाओं की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति  का अध्ययन करने के लिए सरकार उच्च-स्तरीय समिति नियुक्त करने का प्रस्ताव भी कर रही है. इस समिति के निष्कर्ष के आधार पर सरकार भारतीय महिलाओं के सर्वागीण सशक्तिकरण के लिए जरूरी उपायों का निर्धारण करेगी. हमें विश्वास है कि इन प्रयासों से भारतीय महिलाओं की सामाजिक एवं आर्थिक  स्थिति  में स्पष्ट सुधार होगा और भारतीय समाज में महिलाओं के साथ भेदभाव अतीत की बात बनकर रह जाएगी.

9 मार्च 2010

अरुण जेटली : ( विपक्ष के नेता) : श्रीमान सभापति महोदय, आज सुबह जब मैं सदन में आया तो इस सदन के अन्य सदस्यों सहित मैंने भी सोचा कि मैं भी एक बनते हुए महान इतिहास का एक हिस्सा बनूंगा क्योंकि हम सभी हाल ही में सबसे प्रगतिशील कानूनों में से एक कानून बनाने में सहयोग देकर एक ऐतिहासिक जिम्मेदारी का निर्वहन कर रहे हैं. मेरी पार्टी की ओर से,  मैं आरंभ में ही बताना चाहता हूं कि हम सभी इस कानून का स्पष्ट समर्थन करते हैं. लेकिन, फिर,  सभापति महोदय, यह विशेषाधिकार, जो हम सबको मिला हुआ है, आज काफी हद तक कमजोर हो गया है. इस सदन में हमने एक नहीं,  बल्कि दो इतिहास देखा है. पहला, ज़ाहिर है, सौभाग्य की बात होगी कि हम सबसे प्रगतिशील कानूनों में से एक को अधिनियमित कर रहे हैं। दूसरा, और मुझे कोई संदेह नहीं है कि, हम सभी का सिर शर्म से झुक जाएगा क्योंकि हमने भारत के संसदीय लोकतंत्र के कुछ सबसे शर्मनाक घटनाओं को देखा है. मैं केवल यही सोचता हूं कि सभी संबंधित पक्षों द्वारा स्थिति को काफी परिपक्वता और नियंत्रण से संभाला जाना चाहिए था. इस प्रकार, इस विशेष कानून बनाने का विशेषाधिकार हम सभी के लिए कहीं अधिक सुखद हो गया होता. एक संवैधानिक संशोधन के जरिये महिला आरक्षण पर यह बहस डेढ़ दशक पुरानी हो चुकी है. एक मिथक है कि आरक्षण समाज में एक विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग बनाता है. सच्चाई यह है कि प्रकृति ने हम सभी को एक समान मानते हुए बनाया है.

 हमारा संविधान समानता प्रदान करता है, लेकिन हमारे समाज में स्थिति कुछ इस तरह की थी कि हमारी कुछ समानताएं, असमानताएं बन गईं  और इस असमानता का सबसे अच्छा सबूत यह है कि आजादी के 63 साल बाद भी हमारे समाज के  50 प्रतिशत भाग को लोकसभा में अधिकतम 10 प्रतिशत प्रतिनिधित्व मिला हुआ है. राज्य विधानसभाओं भी स्थिति इससे बहुत अलग नहीं है. महोदय, आज हम सब यहां एक कानून बनाने के लिए या एक कानून बनाने की प्रक्रिया आरंभ करने की सकारात्मक कार्रवाई के लिए इकट्ठे हुए हैं. आरक्षण कोटा जो हम लोकसभा में, और राज्य विधानसभाओं में भी, महिलाओं के लिए प्रदान करने जा रहे हैं वह समानता के उद्देश्य के लिए सक्रियता बढ़ाने में एक जरूरी औजार बनेगा, जिसकी परिकल्पना इस देश ने हमेशा की है. महोदय, हमने 15वीं लोकसभा आम चुनाव कराया था. पहले 15 चुनावों में देखा गया है कि 7 से 11 प्रतिशत महिलाएं लोकसभा के लिए निर्वाचित होती हैं. वह संख्या जिसमें महिलाएँ चुन कर आती रही हैं, वह इन 15 चुनावों में सात फीसदी से लेकर 11 फीसदी तक रही है. ..(व्यवधान).. आज 63 साल बाद भी यह आंकड़ा मौजूदा लोक सभा में भी 10.7 परसेंट पहुँचा है. यह जो तर्क दिया जाता है कि बिना आरक्षण के स्वाभाविक रूप से समाज जो आगे बढ़ रहा है तो महिलाओं का प्रतिनिधित्व भी अपने-आप बढ़ता चला जाएगा, 63 वर्ष तक हमारे सामने जो अनुभव आया है, उसमें हमने देखा है कि 63 वर्ष  तक यह परिस्थिति  नहीं बदली और अगर यह कानून नहीं आता तो हम यह सम्भावना भी मान लें कि शायद अगले 63 वर्ष  तक भी यह परिस्थिति  नहीं बदलने वाली है. इसीलिए, आज यह आवश्यक हो चुका है कि भारत की संसद और विधान सभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व भी पूर्ण मात्रा के रूप में सामने आये. सभापति जी, हम देश को एक बहुत बड़ी आथिक शक्ति के रूप में बनाना चाहते हैं. आज हम वह देश हैं जिसकी अपनी परमाणु शक्ति है,  but two-third of Indian children are born to women without medical help. आज जितनी कन्याएँ स्कूल छोड़ती हैं, who drop out, उनकी संख्या male child की तुलना में आ गयी है. अगर हम आज की परिस्थिति  को देखते हैं, सभापति जी, जो संविधान संशोधन पेश किया गया है, उसका जो सार है, वह बिल्कुल स्पष्ट है. इस संविधान संशोधन में प्रावधान है कि 15 वर्ष के लिए देश की लोक सभा में और विधान सभाओं में महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण प्रदान किया जाएगा.

जनसंख्या की दृष्टि से, बताया जाता है कि भारत में प्रत्येक 1000 पुरुषों पर 953 महिलाएं हैं. हमारे कानून, जिनमें से कुछ लागू भी हैं, जहां तक समाज के एक हिस्से का संबंध है, आज भी भेदभावपूर्ण हैं. महोदय, यदि आप हमारे पर्सनल कानूनों की स्थिति पर नजर डालें तो हमारे बहुत सारे पर्सनल कानूनों में अभी भी असमानता निहित है. मेरा हमेशा मानना रहा है कि हमारे संसद और विधान सभाओं में महिलाओं की कमतर उपस्थिति से ही आज भी भेदभावपूर्ण स्थिति बनी हुई है, जिससे हममें यह कहने का भी साहस नहीं है कि राज्य व्यवस्था और गरिमा का उल्लंघन करने वाले पर्सनल लॉ को …..महोदय, जहां तक सिस्टम का मामला है, हमने टोकनिज्म की पर्याप्त राजनीति कर ली है. टोकनिज्म की इस राजनीति से पता चलता है कि हमने विचारों की राजनीति को कैसे प्रतिस्थापित कर दिया है.

 इससे जहां तक महिलाओं का संबंध है, अब प्रतिनिधित्व की राजनीति में प्रतिस्थापित होना होगा. आपके पास कोई अधिकार नहीं है. विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में महिलाओं की सक्रियता और महिलाओं के उम्मीदवार के रूप में उभरने में एक क्षैतिज फैलाव आया है और प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र का वर्ष में किसी एक समय महिला उम्मीदवारों द्वारा प्रतिनिधित्व किया जाना चाहिए था. अब,  इसे विधानसभाओं,  स्थानीय निकाय सरकारों और पंचायतों के साथ जोड़कर इस संशोधन के बाद लागू कर दिया गया है. आज से 15 साल बाद यह संशोधन लाखों महिला कार्यकर्ताओं को सामने लायेगा, जो चुनाव लड़ने के लिए विभिन्न राजनीतिक दलों के लिए उपलब्ध होंगी.

अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को छोड़कर संसदीय और विधायी सीटों के लिए किसी अन्य आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है. इन महिला निर्वाचन क्षेत्रों में जो सीटें पहले से ही आरक्षित भी हैं तो वे अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए हैं.

यह जेंडर न्याय का एक नया इतिहास है जो हम लिख रहे हैं और इसलिए, हम सबको उत्साह से इसका समर्थन करना चाहिए. लेकिन, उसी समय में, जो घटनाएं घटी हैं और जिनमें  बड़ी संख्या में लोगों ने योगदान दिया है, मुझे लगता है कि उसने इस कानून का समर्थन करके हमारी भावना में खटास पैदा कर दी है. जब मैं इस कानून का स्पष्ट समर्थन करता हूं तो जो कुछ आज सदन में हुआ है, उसकी स्पष्ट निंदा भी कर सकता हूं. हम इस सदन में इसलिए नहीं आये थे. हम अपने कुछ सहयोगियों के साथ शारीरिक रूप से की जाने वाली हाथापाई और उनको इस सदन से बाहर किये जाना देखने नहीं आये थे. अगर हम इसे अधिक सौहार्दपूर्ण तरीके से कर पाते यह बेहतर होता.

महोदय, हमें नहीं भूलना चाहिए कि इस देश ने एक समय संविधान के 42वें संशोधन का विरोध करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को जेल में डाल कर 42वें संशोधन को पारित कर दिया था. जो लोग 42वें संशोधन के विरोध में थे, वे इसका विरोध कर सकते थे, लेकिन इमरजेंसी के दौरान वे जेल में बंद थे. जिसका असर यह हुआ कि इमरजेंसी हटा ली गई और उस को संशोधन काफी हद तक निरस्त करना पड़ा था. इसलिए, हमारा अनुभव रहा है कि भले ही इसका विरोध करने वाले मित्रों से मैं असहमत हूं, लेकिन हमें उनकी आवाज सुननी चाहिए और इस कानून के खिलाफ उन्हें वोट करने का अधिकार देना चाहिए. मुझे लगता है कि हममें से 85 से 90 प्रतिशत का एक भारी बहुमत इस विधेयक के समर्थन में है. इसका विरोध करने वाले अपने मित्रों से मैं इसका समर्थन करने का अपील भी करूंगा क्योंकि इस सदन में एक विशाल बहुमत विधेयक का समर्थन कर रहा है.

आपको लोकतंत्र की भावना का भी सम्मान करना चाहिए. अगर 85-90 प्रतिशत सदस्य इसका समर्थन कर रहे हैं,  तो उन्हें बहुमत के अधिकार का प्रयोग करने की अनुमति दें. एक छोटा सा अल्पसंख्यक समूह उन्हें कार्यवाही चलने देने के लिए अनुमति नहीं देने का दबाव नहीं डाल सकता है, और, इसलिए, आप अपने उन सहयोगियों को समझायें जिनको सदन से बाहर जाने के लिए कहा गया है, कि इस सदन के चलने के लिए एक सौहार्दपूर्ण  माहौल बनायें. आपके पास इस विधेयक के खिलाफ बोलने का अधिकार है; आपके पास इससे असहमत होने का अधिकार है; लेकिन, निश्चित रूप से, बहुमत के जनादेश को बाधित करने का आपको कोई अधिकार नहीं है. अगर हम एक-दूसरे का सम्मान करें तो मुझे यकीन है कि यह विधेयक जिस भावना के साथ हम इसे पारित करना चाहते हैं, वैसे ही पारित हो जाएगा.  महोदय,  जब हम इस कानून को स्पष्ट समर्थन दे ही रहे हैं तो हमें उन तरीकों के बारे में सोचना चाहिए जिसकी आप पहलकदमी ले सकें, ताकि इस सदन में एक सौहार्दपूर्ण माहौल बनाया जा सके; और जो हमारे खिलाफ हैं, जहां तक इस सदन का सवाल है, उनकी आवाज सुनी जानी चाहिए. इन शब्दों के साथ, मैं इस कानून का समर्थन करता हूं. धन्यवाद…

अरुण जेटली : सभापति जी, इस एक-तिहाई आरक्षण के सिद्धांत को लागू करने के लिए एक रोटेशन की प्रक्रिया  लागू की जाएगी. हर विधान सभा में और लोक सभा में एक-तिहाई सीटें हर आम चुनाव के अंदर आकर्षित की जाएंगी और अगले चुनाव के अंदर वे बदली जाएंगी. हम देखते हैं कि संविधान में 73वें और 74वें संशोधन के बाद ग्राम पंचायतों में और अन्य पंचायतों में तथा local self bodies में जब से महिलाओं की भागीदारी आरंभ हुई है, उसका प्रत्यक्ष असर आज यह है कि इन 15-17 वर्ष के बाद हालांकि कानून में उनके लिए केवल 33 फीसदी आरक्षण है, लेकिन वास्तविकता में इन 15 वर्ष  के बाद करीब 48 प्रतिशत महिलाएं आज ग्राम पंचायतों में चुने हुए पदों पर कायम हैं.  सभापति जी, अगर हम दूसरे देशों का अनुभव देखते हैं, तो आज यह कानून केवल भारत में नहीं आ रहा है, दुनिया के विभिन्न देशों के अंदर यह प्रयोग में लाया गया है और दुनिया के विभिन्न देशों में इसको तीन अलग-अलग प्रक्रियाओं के माध्यम से लागू करने का प्रयास किया गया है। पहला सुझाव यह रहा कि कुछ देश राजनीतिक दलों  के लिए एक पोलिटिकल पार्ट कोटा फिक्स कर लेते हैं. राजनीतिक दलों के लिए जो कोटा फिक्स होता है, उसके माध्यम से आरक्षण लेने का प्रयास करते हैं. कुछ देशों के अंदर लिस्ट सिस्टम के माध्यम से हुआ और कुछ देशों के अंदर ऐसे चुनाव क्षेत्र हैं, जिनको आकर्षित  किया जाता है. जब हम इसका अध्ययन करते हैं और इन व्यवस्थाओं को अपने देश में लागू करने का प्रयास करते हैं, तो अनुभव में यह आया कि जिन देशों के अंदर चुनाव क्षेत्रों  को आकर्षित  किया गया है, यह प्रयोग सबसे ज्यादा उन्हीं देशों के अंदर सफल हो पाया है. दुनिया के जो पिछड़े देश हैं, अफ्रीका के देश हैं. युवाना जैसे देश में वहां की संसद के अंदर महिलाओं का प्रतिनिधित्व दुनिया में सबसे अधिक हो गया है, क्यों कि वहां चुनाव क्षेत्रों  का आरक्षण किया गया था. अफगानिस्तान और पाकिस्तान जैसे देश, जहां चुनाव क्षेत्रों  का आरक्षण किया गया था, उन देशों के अंदर भी आरक्षण की  प्रक्रिया  सफल हुई. इस प्रयोग को जब हम अपने देश के ऊपर लागू करने का प्रयास करते हैं, तो इसके जितने भी आलोचक हैं और मेरे मित्र, जिनके अन्यथा विचार हैं, मैं उनसे आग्रह करूंगा कि इस पर हमारी जो धारणा है और उसका जो विश्लेषण है, वे उसे भी एक बार समझाने का प्रयास करें. राजनीतिक दलों  के ऊपर कोटा बन जाए, यह सुझााव आता रहा है. शायद आज का जो संविधान है, उस संविधानकी धाराएं जब मैं पढ़ता हूं, तो बिना उसको तब्दील किए हुए यह अपने देश में संभव नहीं हो सकता.

लेकिन जिन देशों ने लागू किया है, उनमें एक युनाइटेड किंगडम का उदाहरण है. आज युनाइटेड किंगडम के अंदर, राजनीतिक दलों  के ऊपर कोटा लागू है. वे चुनाव क्षेत्रों के अंदर महिला उम्मीदवार उतारते हैं. उस कानून के अंदर कितनी संख्या है, इसका उसमें प्रावधान है. यदि आज हम वहां का अनुभव देखें, तो ब्रिटेन  में पाकिस्तान और अफगानिस्तान की तुलना में कम फीसदी महिलाएं हैं, जो उस प्रक्रिया  के माध्यम से हाउस ऑफ कॉमन्स के अंदर जीतकर आई हैं..(व्यवधान).. पाकिस्तान में चुनाव क्षेत्रों में लागू करना, अफगानिस्तान में चुनाव क्षेत्रों में लागू करना  जहां की महिलाओं को हम पिछड़ा मानते हैं, उनको अधिक प्रतिनिधित्व मिल पाया है, बनिस्पत युनाइटेड किंगडम जैसे देश में, जहां राजनीतिक दलों  के ऊपर एक कोटा लागू हुआ था. इसलिए मैं मानता हूं कि चुनाव क्षेत्रों  द्वारा.. यह निश्चित करना इस देश की वर्तमान भूमिका के अंदर ज्यादा सफल रहने वाला है. सभापति जी, यह आलोचना की जाती है कि जो रोटेशन की प्रक्रिया  है, उस रोटेशन की प्रक्रिया को नहीं रखना चाहिए. यह कानून पंद्रह वर्ष के लिए है. पंद्रह वर्ष में अगर तीन आम चुनाव होते हैं और हर चुनाव के अंदर अगर एक तिहाई सीटें आकर्षित  रहती हैं, तो पंद्रह वर्ष के बाद महिला आरक्षण देश के माध्यम से हर चुनाव क्षेत्र तक पहुंच चुका होगा.  सभापति जी, यह भी आलोचना की गई कि यह आरक्षण देते वक्त समाज में कुछ और वर्ग हैं, जिनके लिए सब-कोटा रखना चाहिए आज हमारी संवैधानिक व्यवस्था के तहत जो एस.सी. और एस.टी. समुदाय हैं, उनके लिए चुनाव क्षेत्रों  में आरक्षण की व्यवस्था है, किसी अन्य के लिए व्यवस्था नहीं है
आज देश की विभिन्न विधानसभाएं कानून बना रही हैं. एक तिहाई के स्थान पर, पचास फीसदी तक महिलाओं को ग्राम पंचायतों में लोकल सेल्फ गवर्नमेंट में आरक्षण दिया जा रहा है .कई विधान सभाओं में बहुत सफलता से कई राज्यों  में लागू हुआ है, लेकिन जहां आपको पसंद नहीं आता..(व्यवधान)..गुजरात का उदाहरण है , चार महीने पहले कानून पारित हुआ था, लेकिन आज तक उस कानून को वहां के राज्यपाल स्वीकृति नहीं दे रहे..(व्यवधान)..इस प्रकार के दोहरे मापदंड कांग्रेस पार्टी  द्वारा भी नहीं चल पाएंगे ..(व्यवधान)..सभापति जी, मैं यह मानता था, जो मैंने आरंभ में कहा..(व्यवधान)..कि आज हम इतिहास बनाने जा रहे हैं.

क्रमशः

शुभम श्री की पुरस्कृत और अन्य कविताएं : स्त्रीकाल व्हाट्सअप ग्रूप की टिप्पणियाँ

शुभम श्री की ‘पोएट्री मैनेजमेण्ट’ कविता को इस वर्ष का  भारत भूषण अग्रवाल सम्मान देने की घोषणा हुई है.  कहानीकार और कवि उदय प्रकाश इस बार इस सम्मान के निर्णायक थे.  इस कविता को सम्मान दिये जाने पर सोशल मीडिया में काफी आपत्तियां दिखीं . मैंने स्त्रीकाल व्हाट्स अप ग्रूप में सदस्यों की राय माँगी, अपनी ओपन कमेंट्री के साथ कि  मुझे यह कविता अच्छी लगी. ग्रूप की साथी और कवयित्री आरती मिश्रा ने बताया कि इसी दौरान शुभम की एक और कविता बहस के केंद्र में है. उन्होंने
“मेरे हॉस्टल के सफाई कर्मचारी ने सेनिटरी नैपकिन फेंकने से इनकार कर दिया है” कविता ग्रूप में पोस्ट की. प्रस्तुत है स्त्रीकाल व्हाट्स अप ग्रूप की टिप्पणियाँ और दोनो कविताएं. 
संपादक

पुरस्कृत कविता अच्छी लगी. नयी शैली, नये बिम्ब कविता के पारम्परिक मानदंडों से अलग हैं इसलिए हल्ला हो रहा है. फिर सवाल यह भी है कि कविता क्या है यह कौन तय करेगा? पिछले 1000 साल या ज्यादा समय में कविता ने कितने रूप बदल लिए ऐसे में यह सवाल बेमानी है कि यह कविता है या नहीं. रही बात हाय तौबा की तो वह हर मौके पर मचती है. उदय जी को और शुभम श्री दोनों को बधाई.
पूजा सिंह ( साहित्यिक -सांस्कृतिक पत्रकार)
ये तो सिरे से ही गलत है कि ये कविता नहीं है. उस पर से दोनों कविताएं असर कारक हैं. बेहद प्रभावी.
मजकूर आलम ( लेखक)
मुख्य जो कविता है वह अपनी शैली और प्रयोग में नई तरह की मुद्रा निर्माण करती है. जिस तरह पत्रकारिता में सूचनाओं व अहवाल की पद्धति होती है ऐसी पद्धति से कथन के बिखराव के साथ, कहन के एक दूसरे को काटते फैले हुए टुकड़ों के साथ समाज और जीवन के कितने सारे कोनों से भाषा पैटर्न्स आई है इस रचना में. कुल मिलाकर आज के विवरिंग समय और मूल्यबोध के प्रति भाषा की ये पैटर्न्स कटाक्ष भरे सेटायर में तब्दील हो जाती है. कथन और सामग्री के बिखराव की पद्धति के कारण यह कविता बहस में फंस गई होगी.
फारूक शाह ( कवि/ आलोचक ) 

पुरस्कृत कविता : 

पोएट्री मैनेजमेण्ट

कविता लिखना बोगस काम है !
अरे फ़ालतू है !
एकदम
बेधन्धा का धन्धा !
पार्ट टाइम !
साला कुछ जुगाड़ लगता एमबीए-सेमबीए टाइप
मज्जा आ जाता गुरु !
माने इधर कविता लिखी उधर सेंसेक्स गिरा
कवि ढिमकाना जी ने लिखी पूँजीवाद विरोधी कविता
सेंसेक्स लुढ़का
चैनल पर चर्चा
यह अमेरिकी साम्राज्यवाद के गिरने का नमूना है
क्या अमेरिका कर पाएगा वेनेजुएला से प्रेरित हो रहे कवियों पर काबू?
वित्त मन्त्री का बयान
छोटे निवेशक भरोसा रखें
आरबीआई फटाक रेपो रेट बढ़ा देगी
मीडिया में हलचल
समकालीन कविता पर संग्रह छप रहा है
आपको क्या लगता है आम आदमी कैसे सामना करेगा इस संग्रह का ?
अपने जवाब हमें एसएमएस करें
अबे, सीपीओ (चीफ़ पोएट्री ऑफ़िसर) की तो शान पट्टी हो जाएगी !
हर प्रोग्राम में ऐड आएगा
रिलायंस डिजिटल पोएट्री
लाइफ  बनाए पोएटिक
टाटा कविता
हर शब्द सिर्फ़ आपके लिए
लोग ड्राइँग रूम में कविता टाँगेंगे
अरे वाह बहुत शानदार है
किसी साहित्य अकादमी वाले की लगती है
नहीं जी, इम्पोर्टेड है
असली तो करोड़ों डॉलर की थी
हमने डुप्लीकेट ले ली
बच्चे निबन्ध लिखेंगे
मैं बड़ी होकर एमबीए करना चाहती हूँ
एलआईसी पोएट्री इंश्योरेंस
आपका सपना हमारा भी है
डीयू पोएट्री ऑनर्स, आसमान पर कटऑफ़
पैट (पोएट्री एप्टीट्यूड टैस्ट)
की परीक्षाओं में फिर लड़ियाँ अव्वल
पैट आरक्षण में धाँधली के ख़िलाफ़ विद्यार्थियों ने फूँका वीसी का पुतला
देश में आठ नए भारतीय काव्य संस्थानों पर मुहर
तीन साल की उम्र में तीन हज़ार कविताएँ याद
भारत का नन्हा अजूबा
ईरान के रुख  से चिन्तित अमेरिका
फ़ारसी कविता की परम्परा से किया परास्त
ये है ऑल इण्डिया रेडियो
अब आप सुनें सीमा आनन्द से हिन्दी में समाचार
नमस्कार
आज प्रधानमन्त्री तीन दिवसीय अन्तरराष्ट्रीय काव्य सम्मेलन के लिए रवाना हो गए
इसमें देश के सभी कविता गुटों के प्रतिनिधि शामिल हैं
विदेश मन्त्री ने स्पष्ट किया है कि भारत किसी क़ीमत पर काव्य नीति नहीं बदलेगा
भारत पाकिस्तान काव्य वार्ता आज फिर विफल हो गई
पाकिस्तान का कहना है कि इक़बाल, मण्टो और फैज से भारत अपना दावा वापस ले
चीन ने आज फिर नए काव्यालंकारों का परीक्षण किया
सूत्रों का कहना है कि यह अलंकार फिलहाल दुनिया के सबसे शक्तिशाली
काव्य संकलन पैदा करेंगे
भारत के प्रमुख काव्य निर्माता आशिक  आवारा जी का आज तड़के निधन हो गया
उनकी असमय मृत्यु पर राष्ट्रपति ने शोक ज़ाहिर किया है
उत्तर प्रदेश में फिर दलित कवियों पर हमला
उधर खेलों में भारत ने लगातार तीसरी बार
कविता अंत्याक्षरी का स्वर्ण पदक जीत लिया है
भारत ने सीधे सेटों में ‍‍६-५, ६-४, ७-२ से यह मैच जीता
समाचार समाप्त हुए
आ गया आज का हिन्दू, हिन्दुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण, प्रभात खबर
युवाओं पर चढ़ा पोएट हेयरस्टाइल का बुखार
कवियित्रियों से सीखें हृस्व दीर्घ के राज़
३० वर्षीय एमपीए युवक के लिए घरेलू, कान्वेण्ट एजुकेटेड, संस्कारी वधू चाहिए
२५ वर्षीय एमपीए गोरी, स्लिम, लम्बी कन्या के लिए योग्य वर सम्पर्क करें
गुरु मज़ा आ रहा है
सुनाते रहो
अपन तो हीरो हो जाएँगे
जहाँ निकलेंगे वहीं ऑटोग्राफ़
जुल्म हो जाएगा गुरु
चुप बे
थर्ड डिविज़न एम० ए०
एमबीए की फ़ीस कौन देगा?
प्रूफ  कर बैठ के
खाली पीली बकवास करता है !

बहस में दूसरी कविता

“मेरे हॉस्टल के सफाई कर्मचारी ने सेनिटरी नैपकिन फेंकने से इनकार कर दिया है”

ये कोई नई बात नहीं
लंबी परंपरा है
मासिक चक्र से घृणा करने की
‘अपवित्रता’ की इस लक्ष्मण रेखा में
कैद है आधी आबादी
अक्सर
रहस्य-सा खड़ा करते हुए सेनिटरी नैपकिन के विज्ञापन
दुविधा में डाल देते हैं संस्कारों को…
झेंपती हुई टेढ़ी मुस्कराहटों के साथ खरीदा बेचा जाता है इन्हें
और इस्तेमाल के बाद
संसार की सबसे घृणित वस्तु बन जाती हैं
सेनिटरी नैपकिन ही नहीं, उनकी समानधर्माएँ भी
पुराने कपड़ों के टुकड़े
आँचल का कोर
दुपट्टे का टुकड़ा
रास्ते में पड़े हों तो
मुस्करा उठते हैं लड़के
झेंप जाती हैं लड़कियाँ
हमारी इन बहिष्कृत दोस्तों को
घर का कूड़ेदान भी नसीब नहीं
अभिशप्त हैं वे सबकी नजरों से दूर
निर्वासित होने को
अगर कभी आ जाती हैं सामने
तो ऐसे घूरा जाता है
जिसकी तीव्रता नापने का यंत्र अब तक नहीं बना…
इनका कसूर शायद ये है
कि सोख लेती हैं चुपचाप
एक नष्ट हो चुके गर्भ बीज को
या फिर ये कि
मासिक धर्म की स्तुति में
पूर्वजों ने श्लोक नहीं बनाए
वीर्य की प्रशस्ति की तरह
मुझे पता है ये बेहद कमजोर कविता है
मासिक चक्र से गुजरती औरत की तरह
पर क्या करूँ
मुझे समझ नहीं आता कि
वीर्य को धारण करनेवाले अंतर्वस्त्र
क्यों शान से अलगनी पर जगह पाते हैं
धुलते ही ‘पवित्र’ हो जाते हैं
और किसी गुमनाम कोने में
फेंक दिए जाते हैं
उस खून से सने कपड़े
जो बेहद पीड़ा, तनाव और कष्ट के साथ
किसी योनि से बाहर आया है
मेरे हॉस्टल के सफाई कर्मचारी ने सेनिटरी नैपकिन
फेंकने से कर दिया है इनकार
बौद्धिक बहस चल रही है
कि अखबार में अच्छी तरह लपेटा जाए उन्हें
ढँका जाए ताकि दिखे नहीं जरा भी उनकी सूरत
करीने से डाला जाए कूड़ेदान में
न कि छोड़ दिया जाए
‘जहाँ तहाँ’ अनावृत …
पता नहीं क्यों
मुझे सुनाई नहीं दे रहा
उस सफाई कर्मचारी का इनकार
गूँज रहे हैं कानों में वीर्य की स्तुति में लिखे श्लोक….

इस कविता के कंटेंट को यदि कचरा उठाने वाले के नजरिये से देखा जायेगा तो
गलत लगेगी, लेकिन यदि धर्माचार्यों के  मासिक चक्र के अपवित्र  घोषणा और
सामाजिक मान्यताओं की जिल्लातो के मद्देनजर रखकर देखा जाय तो कविता काफी
सच  कहती है.
आरती मिश्रा ( कवयित्री)
शुभम श्री की दोनों ही
कविताएँ एक नया कोण हैं. अपनी गद्यात्मकता में भी ख़ासा पैनापन है.
व्यंजना कथ्य का नया आसमान दिखाती है. मेरे विचार में मार्मिक, कटु सत्य का
उद्घाटन करने वाली कविताएँ हैं दोनों.
हेमलता माहिश्वर ( कवयित्री/ आलोचक)
कई
बार कविता एक विभ्रम की तरह होती है..नजरिये और पुनर्पाठ में यह एक नए
उद्दबोध के साथ पुनर्स्थापित करने का प्रयास करती है…कविता की रूहानी रूह
अलग-अलग होती है पर थोड़े बहुत ही सही हरेक कविता में यह एक तत्व के रूप
में मौजूद अवश्य रहता है..आज जो प्रत्यक्ष  दिखने वाला संसार है न दरअसल वह
आभासी यथार्थ का संसार है . यहाँ आदर्शों , आदर्शवाक्यों  , घोषणापत्रों
,सजावटों , पच्चीकारियों , नकाबों , बहुरूपों , विभ्रमों, व्यंग्यों, और
कपट अलग-अलग रूप में व्यक्त होता है… जब आप कविता पढ़ रहे होते है तो साथ
साथ इन मानकों पर हम कविता को तौल भी रहे होते है…
शुभम श्री जी
की कविता को विवाद को देखकर मैंने कई मानकों पर खलने का प्रयास किया. कविता
की आंत्रगता उलझे अर्थों के साथ अलग हो रही थी..कई स्थानों पर कविता का
मूल तत्व हमें छीज रहा था..और हम सहज नहीं थे इसके मूल को पकड़ने
में…कविता का हर स्टेन्जा पिछले के साथ पूरी तरह से अटैच्ड नहीं था . यह
एक तरह से विडाउट कैरेक्टर Nincompoop की तरह विभ्रम लगा. हा शुभम श्री की
दूसरी कविता कथ्य और तथ्य दोनों में ध्यान खींचती है…एक पाठकीय मिज़ाज
वालों के लिए और स्त्री विमर्श को काफी स्पेस देती है वशर्ते इसे घृणादिक
मानकर न पढ़ा जाये…यह मुकम्मल कविता है.
राकेश पाठक ( कवि)
मुझे
अच्छी लगी दोनों ही कवितायें. क्या चाँद ,तारों और प्रेम का पालागन ही
कवितायेँ होती है .कविता केशब्द सहजता से सम्प्रेषित हो और सार आपको झिझोड़
दे ,सही अर्थो में वही सच्ची कविता है .
प्रवेश सोनी ( लेखिका/ चित्रकार)

दास्तान ए सोती सुंदरी वाया परीदेश की राजकुमारियां

अल्पना मिश्र

एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय
संपर्क : alpana.mishra@yahoo.co.in

क्या आप सोती सुंदरी को जानते हैं ? क्या उसकी कहानी आपको याद है ? वही, जो अंग्रेजी के ‘फेयरी टेल्स’ से निकल कर हिंदुस्तानी परी देश के इलाके से होते हुए हमारे जीवन में धंस जाती है. लगता ही नहीं कि यह एक अंग्रेजी अनुवाद के रूप में हमारे पास आई थी, यह तो हमारी परियों वाली कहानी से ‘सिस्टरहुड’ की तरह जुड़ी हुई है. ‘सिंड्रेला’ और ‘लम्बे सुनहरे बालों वाली राजकुमारी’, इसी का विस्तार जैसे हैं. तो क्या दुनिया के तमाम देशों में बच्चों के लिए ऐसी ही कहानियाॅ रची गईं ?
इसे दूसरी तरह से भी कहा जा सकता है. मसलन, हममें से ज्यादातर को अपने बचपन में सुनी परी देश की राजकुमारियों या अन्य राजकुमारियों की कहानियां   याद होंगी, कितनी सुंदर थीं वे, कि कोई भी देखता रह जाए, कितनी नाजुक थी वे, कि फूल भी शर्मा जाएं, कितनी गुणवंती कि कितना भी काम करवा लो, कितनी नेक, कि कोई भी बहला फुसला कर राह भटका दे !


 हमारे मन मस्तिष्क में स्त्री के सौंदर्य का पहला बिम्ब उन्हीं से तैयार होता है और इतने गहरे पैठता है कि उससे मुक्त होना आसान नहीं रह जाता. तब भी नहीं, जब कि आप एक लेखक बन चुके होते हैं! स्त्री असमानता को लेकर रचे गए इस मोहक पाठ से मुक्त होना तब भी मुश्किल ही होता है, इसलिए अधिकतर लेखक इस गड़बड़झाले के शिकार होते हैं और स्त्री पात्रों के आते ही अपने लेखन में चुपके से असमानता के इसी पाठ के प्रमोटर बन जाते हैं. जाहिर है कि नानी की कहानियों ने हमारी कल्पनाशक्ति बढ़ाने में मदद की है, जो कि कहानी सुनाने के पीछे सदा एक उद्देश्य की तरह रहा ही है. नतीजा, बचपन में कई बार हम खुद भी इन कहानियों को आगे बढ़ाने में बढ़ चढ़ कर भाग लेने लगते रहे हैं, कुछ न कुछ जोड़ते जाते, कहानी खिलती जाती, इस तरह कहानी कहने का हमारा भी एक हुनर प्रशंसा पा जाता. लेकिन बिना यह जाने कि आगे बढ़ाने की इस प्रक्रिया में हम कौन सी चीजें, कौन से विचार आगे बढ़ा रहे हैं! कौन सी थाती हमें ऐसे अनजाने थमा दी गई है, जिसे आगे ट्रांसफर करते जाने की जिम्मेदारी बिना किसी के कहे हँसते हँसते  हम उठाते चले जाते हैं !


दिल पर हाथ रख कर कहिए कि क्या इन कहानियों ने बचपन में आपको दुखी नहीं किया ? मुझे तो बचपन में इन कहानियों ने खूब रूलाया था, कितने रातों की नींद छीनी थी, कितने प्रश्नों ने मथा था, कितना बेचैन और असंतुष्ट बनाया था, लेकिन न किसी को इसकी फिक्र थी, न प्रश्नों के उत्तर ही थे. ‘कहानी गई वन में, सोचो अपने मन में’ वाले अंदाज में सिर्फ सोचना ही हाथ आता. सोचने में बड़ा दुख होता, जब दिखता कि परी देश की राजकुमारियां  हों या अन्य राजकुमारियां  जब भी अकेले बाहर निकली हैं, राक्षसों या असामाजिक तत्वों ने उन्हें कैद कर लिया है. उनका अकेले बाहर निकलना निषिद्ध है, यह बात कितने प्यार से समझा दी गई है. जो नहीं मानता, ‘वो रोये अपने मन में, कलसे अपने घर में !’ तेा ये प्यारी प्यारी राजकुमारियां अकेले सैर पर निकलने का या दुनिया जान लेने के लिए घर से बाहर निकलने का जोखिम लेती हैं और पकड़ी जाती हैं, दंडित तो होना होगा, नियम जो तोड़ा है उन्होंने. ‘दुस्साहस’ शब्द स्त्री के लिए नहीं बनाया गया था ! ये कहानियां लड़कियों के मन में डर भरने का बारीक मनोविज्ञान है. जब भी लड़कियां  बाहर निकलेंगी, उन्हें वह डर याद आयेगा, जो बचपन में ही समझा दिया गया था. इतने मोहक तरीके से समझा देने का कोई और माध्यम शायद है भी नहीं ! और अब, जब कि वे कैद में हैं तो उन्हें उस दिए गए जबरदस्त फार्मूले को याद करना होगा- किस्मत ! किस्मत है, तो कोई राजकुमार आएगा और उन्हें मुक्त करायेगा ! न आया तो फिर उसी किस्मत का दोष !



पता नहीं हजारों मामलों में किसी एक में राजकुमार आ भी जाता हो ! फिलहाल उसके बाद की कहानी की जरूरत नहीं होती. क्योंकि राजकुमार के हाथों मुक्त होने के बाद और क्या चाहिए ? सोती सुंदरी की कहानी बहुत प्यार से बताती है कि एक राजा रानी के यहां बहुत समय से संतान नहीं हुई. फिर कन्या हुई, जिसे पाकर वे खुश हुए, कम से कम किन्हीं परिस्थितियों में तो कन्या को पा कर खुश होना है. राजा ने दावत में सात परियों को बुलाया लेकिन बूढ़ी परी छूट गई. बूढ़ी हो कर वह इतनी उपेक्षित हुई कि दावत के निमंत्रण के समय राजा उसे भूल गए! बूढ़ी स्त्री अपनी उपादेयता खो कर चिड़चिड़ी हो जाए तो कुछ अस्वाभाविक भी नहीं. लेकिन वह तो प्रतिशोध पर उतर आई. यानी जो इस समाज के काम का नहीं, उसे निमंत्रित करने में भूल होना बड़ी बात नहीं, दूसरे वह खल पात्र ही होगा, स्त्री हुई तो कुटिल कुटनी. बूढ़ी परी भी ऐसी ही दिखती है, न्याय पक्ष को समलत बनाती हुई. वह शाप देती है कि नन्ही राजकुमारी की उंगली में तकुआ चुभ जाएगा और वह मर जायेगी. हॅलाकि सातवीं परी उसके शाप को कुछ कमजोर कर देती है तथापि समाज के उपेक्षित हिस्से का शाप भय तो पैदा करता ही है, तभी तो राजा उससे डरता है, कहानी भी यही बताती है. इसलिए राजा पूरे राज्य में चरखे पर बैन लगा देता है.  प्रश्न यह उठता है कि चरखा बंद करा कर राजा ने कितने बड़े हिस्से को बेरोजगारी की सौगात दी ? उन लोगों का खर्चा पानी कैसे चलता रहा, जिनके व्यवसाय बंद करा दिए गए ?

इसका जवाब मुझे आज तक नहीं मिला. फिर भी राजकुमारी के सोलह वर्ष के होते ही उसके हाथ में तकुआ चुभा और वह बेहोश हुई. इसका मतलब चुपके चुपके चरखा चलाया जा रहा था, लोग कपड़े तब बुने हुए ही पहनते थे, तो बुनाई कताई जारी थी, ठीक राजा के नाक के नीचे, उन्हीं के महल में चरखा था ! यानी राजा ने अपनी सुविधा नहीं खोई थी. महलवालों के कपड़े तैयार किए जा रहे थे ! दोस्तों, जादू से चरखा आ गया, जैसी बात बेकार होगी. लेकिन राजकुमारियों के लिए यह सीख जरूर है कि रोजगार सीखने की कोशिश न करना, वरना ऐसे ही सौ वर्ष तक सुला दी जाओगी. तो राजकुमारी सो गई, वह भी सौ वर्षों के लिए. सौ वर्ष कोई मामूली समय नहीं होता. यह समय बच्चों को कितना बेचैन बनाता है. यह कुछ ज्यादा लम्बा है, पर समाज को देखें तो बिल्कुल लम्बा नहीं ! समाज में स्त्री के लिए तय भूमिकाओं में परिवर्तन की यही गतिकी है शायद ! सौ वर्ष की नींद है या दिमाग का बंद कर दिया जाना है ! सारा महल राजकुमारी की नींद के साथ ही नींद में चला गया है. या राजकुमारी के लिए ‘सो गए’ जैसा हो गया है. नींद में कही गई, सुनी गई बातों का क्या अर्थ ! ध्यान रहे कि राजकुमारी उस उम्र में सुला दी गई है, जो संभावनाओं की सबसे चमकती उम्र है. इसके बाद नींद ही है, जहां  से व्यवस्था जारी रखी जा सकती है. चलिए,

आखिर सौ साल बाद ही सही, एक राजकुमार शिकार खेलता, महल के जंगल, झाड़ियाॅ साफ करता, रास्ता बनाता, शौर्य के भरपूर प्रदर्शन के साथ दाखिल होता है. इस सोती सुंदरी का जीवन भी बिना राजकुमार के आए नींद से नहीं जग पाता ! जैसा कि भारतीय राजकुमारियों के साथ था. इनके पास अपने को बचाने की न कोई तरकीब है, न तैयारी, न दिशा, सिर्फ दंड का भय है ! और एक सपना, यह सपना कितनी कोमलता से इन्हें थमाया गया है, यही एकमात्र तय रास्ता है- किसी राजकुमार की प्रतीक्षा ! यह प्रतीक्षा भी किस्मत से जुड़ी हुई है. ‘किस्मत’ एक फार्मूला है, जो नींद में पंहुचाने और फिर जगाने, दोनों स्थितियों में काम का है. आज बड़ों की शिकायत यह है कि बच्चे कहानियां  सुने बिना बड़े हो रहे हैं. शायद यह भला ही है कि वे इन कहानियों को नहीं सुन रहे. कम से कम उनके दिमाग को अनुकूलित किए जाने का यह एक रास्ता कुछ कमजोर पड़ा है, हंलाकि दूसरी तमाम चीजें इसका स्थानापन्न बनाती हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

जनसत्ता  से साभार

प्रत्यूष चन्द्र मिश्रा की कवितायें

प्रत्यूष चन्द्र मिश्रा


युवा कवि. विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं में कवितायें प्रकाशित. संपर्क :9122493975,pcmishra2012@gmail.com

तीन बेटियों वाला घर 

विदा हो रही है घर की बड़ी बेटी आई थी
पिछले महीने गर्मी की छुट्टियों में
डूब उतरा रहा है घर
माँ की हिचकियों और बेटी की रुलाइयों में
फिर आऊंगा माँ
छुटकी की शादी में
ये भी आतुर रहते हैं हर बार
कहते हैं आराम मिल जाता है काम से
कुछ दिनों के लिए
और हाँ माँ  तुम भी अब ज्यादा काम मत करना
और छुटकी के बाद बड़े की शादी भी जल्दी कर देना
रोना नहीं माँ
पूरी जिंदगी तो रोती ही रही तुम
अब क्यों करती हो चिंता
मुझसे और मंझली से तो निश्चिन्त ही हो गयी तुम
छुटकी भी लग ही जाएगी पार इस साल
तू क्यों रोती है माँ
मैं खुश हूँ वहां
किसी चीज की कमी नहीं है मुझे
सभी तो मानते हैं मुझे
आ ही जाती हूँ साल में एक बार
और झगड़ा मत करना बाबूजी से
वे भी तो पड़ जाते हैं अकेले
मन न लगे तो चले जाना बड़े के पास
और ये जो पैसे दिए है तुमने
इसे अपने पास ही रखो
वक्त बेवक्त काम आयेंगे
और ये बोरी में क्या डाल दिया है इतना-सा
थोडा सा सत्तू और अचार ही काफी था
पिछले बार की कोह्डौरी सबने पसंद की थी
मैं चाहती हूँ तुम्हे बुलाना

पर बुला नही सकती मां
वैसे भी तुम कहाँ आओगी बेटी के घर
आखिर मेरी सास भी हैं थोड़ी
ज्यादा सास
पति भी हैं थोड़े ज्यादा पति
घर ज़रूर बदला है उन लोगों का माँ
पर मन नहीं बदला
पर अब कोई तकलीफ नहीं होती माँ
मैंने एडजस्ट कर लिया है खुद को अच्छी तरह
बाबूजी को कहना इस बार दशहरे में आने के लिए
मैं भेजूंगी सबके लिए कपड़े
कहना माँ किसी के झगड़े में न पड़ें वे
और शुरू कर दे तैयारियां छुटकी की शादी की
मैं आ जाउंगी समय से पहले ही
अच्छा माँ अब जा रही हूँ
चिंता मत करना
पहुँचते ही फोन करूंगी
अच्छा माँ विदा /अलविदा माँ.

सामान बेचती लड़की

सरकारी दफ्तरों मे लंच का समय था
चाय की चुस्कियों के साथ सरकारी नीतियों और क्रिकेट
की चर्चा चल रही थी
एक ठहरा हुआ समय यहाँ पसर रहा था
एक विरानी दिख रही थी
और दिख रही थी वह लडकी
अपने बैग में मसाज करने वाला यंत्र लिए
बाबूओं को थकान मिटाने के गुर बताते हुए
वह लडकी बताती है यंत्र की खूबियों के बारे में
थकान तो मिटेगा ही
यदि कोई दर्द रहा यहाँ-वहां
तो वह भी ठीक  हो जायेगा तुरंत
शरीर दुरुस्त रहेगा इसकी तो गारंटी है
वह बाबुओं के शरीर पर फिराती है यंत्र को
और एक सिहरन,एक रोमांच उनकी शिराओं में तैर जाता है
सुप्त कामनाओं के द्वार खुलते हैं उनकी नसों में
लड़की बेच ले जाती है तीन-चार यंत्र
अब वह यही कारनामा दोहरा रही है
दुसरे दफ्तर,कुछ दुसरे बाबुओं के संग
लड़की रोज आती है लंच के समय,
मुस्कान फेंकती,ग्राहकों को रिझाती
अब यह उसकी आदत में तब्दील हो चुकी है
वह भूल चुकी है किस मजबूरी में शुरू किया था यह काम
वह अक्सर पढ़ती है मार्केटिंग से जुडी कोई किताब
और चढ़ती जाती है सफलता के सोपान पर.

हांक

एक हांक पडती है गली में
जमा होती है चार औरतें
बैठ जाता है टिकुलहारा
सजा लेता है बाजार
किसी को बिंदी पसंद आता है
किसी को  चूड़ियाँ
किसी को नेलपौलिस किसी को झुमका
सबको चाहिए खुशियाँ
यह एक पल है जहाँ वे खुद हैं
थाली में पसरा चावल नहीं है उनके पास
न ही बर्तनों का ढेर
न पति और बच्चों की चिंता
न शिकायतों और नाराजगियों की फेहरिश्त
सिर्फ खिलखिलाहटें हैं उनके चेहरों पर
एक चमक एक चुहल जो बमुश्किल आता है उनके हिस्से
वे जो घरों से निकलकर आई हैं दरवाजे के इस पार
उन्होंने सिर्फ दरवाजा ही पार नहीं किया है.



स्त्री 

एक स्त्री होना दो संसारों में होना है
एक स्त्री होना दुःख की नदी में गोते लगाना है
एक स्त्री होना जीवन रचना है
एक स्त्री होना घर होना है
एक स्त्री होना इच्छाओं की अतृप्त नदी में गोते लगाना है
एक स्त्री होना नदी होना है
पहाड़ से समंदर तक की यात्रा करते
दूर आकाश में तारे की तरह टिमटिमाते रहना है.

बेटी की मुस्कान

अभी वह बहुत छोटी है
अपनी तुतलाती भाषा में कहती है-पापा-मम्मा
वह जब कमरे में हंसती है तो लगता है
खिड़की में चाँद निकल आया है
दिन भर की थकान हवा हो गई है बेटी की हंसी से
मेरा जन्म ऐसे घर में हुआ
जो स्त्रियों से भरा हुआ था
चाची,बुआ और बहनों के ठहाकों से गूंजता रहता था घर
इन ठहाको में उनका दुःख कपूर की तरह उड़ जाता
तब घर एक बड़े पेड़ की तरह लगता
जिस पर सुबह से शाम तक पक्षियों का कलरव होता
उसी समय मैंने जाना कि स्त्रियों के बिना नहीं होता घर
वो देखीए अभी फिर से बेटी के चेहरे पर हंसी आई
उसकी तुतलाती भाषा में उसकी शरारत में
लौट आई है चाची,बुआ और बहनों की सारी बातें
इस समय की उसकी मुस्कान सदियों तक पृथ्वी पर गूंजती रहे
एक मनुष्य,एक पिता,एक कवि की यह.

सावित्रीबाई फुले वैच्रारिकी सम्मान के बाद लेखिका अनिता भारती का वक्तव्य

स्त्रीवादी पत्रिका स्त्रीकाल, स्त्री का समय और सच ने डा. आंबेडकर के
नेतृत्व में नागपुर में 20 जुलाई 1942 को हुए महिला सम्मेलन के 75वें साल
पर एक आयोजन जेएनयू में किया. उक्त सम्मेलन में 25 हजार दलित महिलाओं ने
भागीदारी की थी और कई मह्त्वपूर्ण निर्णय लिये थे. जेएनयू में 29 जुलाई की
देर शाम को खत्म हुए इस आयोजन में तीन सत्रों में विभिन्न विषयों पर विमर्श
और महिला अधिकार विषय पर प्रसिद्ध नृत्यांगना रचना यादव का कथक नृत्य
आयोजित हुआ तथा चर्चित दलित लेखिका और विचारक अनिता भारती को उनकी किताब
‘समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रतिरोध’ को स्त्रीकाल के द्वारा
सावित्रीबाई फुले वैचारिकी सम्मान (2016) दिया गया. इसके पूर्व 2015 में यह
सम्मान शर्मिला रेगे को उनकी किताब ‘मैडनेस ऑफ़ मनु: बी आर आंबेडकरस
राइटिंग ऑन ब्रैह्मनिकल पैट्रिआर्की’ को दिया गया था. इस सम्मान की शुरुआत
2015 में स्त्रीकाल ने स्त्रीवादी न्यायविद अरविंद जैन के आर्थिक सहयोग से
शुरू किया था. कार्यक्रम का आयोजन स्त्रीकाल, आदिवासी साहित्य और यूनाइटेड
ओबीसी फोरम’ के संयुक्त तत्वावधान में हुआ.

अनिता भारती के वक्तव्य का वीडियो लिंक :

महिला आयोग को ताला लगा दें : विमल थोराट

स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन ने बताया कि ‘नागपुर सम्मलेन इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि महिलाओं ने तब राजनीतिक आरक्षण की मांग की थी, और इसलिए भी कि उनके प्रस्ताव काफी क्रांतिकारी और स्पष्ट थे, जबकि 1975 में जारी ‘ टुवर्ड्स इक्वलिटी रिपोर्ट’, जो सातवें-आठवें दशक में महिला आन्दोलन का संदर्भ बना, राजनीतिक अधिकारों को लेकर उतना स्पष्ट नहीं था. इसलिए आज हमने महिला आरक्षण पर भी बातचीत रखी है.’ महिला आरक्षण पर सत्र में दलित अधिकार आन्दोलन की संयोजकों में से एक और लेखिका रजनीतिलक ने कहा कि ‘महिलाओं के लिए सारे अधिकार समानुपातिक प्रतिनिधित्व के साथ होने चाहिए.’ राष्ट्रीय महिला महिला आयोग की सदस्य सुषमा साहू ने कहा कि ‘महिला आरक्षण के लिए हम बाहर की महिलाओं से ज्यादा संसद में बैठी महिलाओं को पहल लेनी चाहिए. उन्होंने महिलाओं को महिलाओं के शोषण में न शामिल होने का भी आह्वान किया.’ स्त्रीवादी न्यायविद और सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद जैन ने कहा कि ‘जबतक 25 लाख महिलायें संसद को घेरकर बैठ नहीं जायेंगी, तब तक महिला आरक्षण संभव नहीं है. जो हालात है उससे लगता है कि महिला आरक्षण और समान आचार संहिता पास होने में 100 साल लग जायेंगे.’ दलित और महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली लेखिका कौशल पंवार ने कहा कि ‘हमें स्वाती सिंह जैसी महिलाओं से भी समस्या है, जो बेटी की सम्मान में अभियान चलाती है और अपनी ही भाभी, जो किसी की बेटी है की प्रताड़ना में शामिल पाई जाती है.’  दलित एवं महिला अधिकार के लिए काम करने वाली लेखिका विमल थोराट ने कहा कि ऐसे महिला आयोग को बंद हो जाना चाहिए, जो  महिला आरक्षण को अपना  विषय नहीं  मानता  और  दलित महिलाओं  के उत्पीड़न पर  एक  नोटिस  तक  जारी नहीं करता – महिला आयोग को ताला लगा देना चाहिए.  सत्र की अध्यक्षता करते हुए नेशनल फेडरेशन ऑफ़ इन्डियन वीमेन की महासचिव एनी राजा ने कहा कि ‘ महिला आयोग जैसी संस्थाओं को यह स्पष्ट करना चाहिए कि महिला आरक्षण पर उनकी क्या पोजीशन है. उन्होने कहा कि महिला आरक्षण के पिछले दो दशकों से संसद में पेंडिंग होने की वजह संसद का पितृसत्ताक नियन्त्रण में होना है.’

नागपुर महिला सम्मेलन के 75 वे साल पर हुआ आयोजन, सम्मानित की गई लेखिका अनिता भारती, महिला आरक्षण पर जोर

दूसरे -तीसरे सत्र में बातचीत



स्त्रीवादी पत्रिका स्त्रीकाल, स्त्री का समय और सच ने डा. आंबेडकर के नेतृत्व में नागपुर में 20 जुलाई 1942 को हुए महिला सम्मेलन के 75वें साल पर एक आयोजन जेएनयू में किया. उक्त सम्मेलन में 25 हजार दलित महिलाओं ने भागीदारी की थी और कई मह्त्वपूर्ण निर्णय लिये थे. जेएनयू में 29 जुलाई की देर शाम को खत्म हुए इस आयोजन में तीन सत्रों में विभिन्न विषयों पर विमर्श और महिला अधिकार विषय पर प्रसिद्ध नृत्यांगना रचना यादव का कत्थक नृत्य आयोजित हुआ तथा चर्चित दलित लेखिका और विचारक अनिता भारती को उनकी किताब ‘समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रतिरोध’ को स्त्रीकाल के द्वारा सावित्रीबाई फुले वैचारिकी सम्मान (2016) दिया गया. इसके पूर्व 2015 में यह सम्मान शर्मिला रेगे को उनकी किताब ‘मैडनेस ऑफ़ मनु: बी आर आंबेडकरस राइटिंग ऑन ब्रैह्मनिकल पैट्रिआर्की’ को दिया गया था. इस सम्मान की शुरुआत 2015 में स्त्रीकाल ने स्त्रीवादी न्यायविद अरविंद जैन के आर्थिक सहयोग से शुरू किया था. कार्यक्रम का आयोजन स्त्रीकाल, आदिवासी साहित्य और यूनाइटेड ओबीसी फोरम’ के संयुक्त तत्वावधान में हुआ.

सावित्रीबाई फुले वैचारिकी सम्मान, 2016 के साथ अनिता भारती, साथ में लेखिका नूर जहीर, अर्चना वर्मा, लेखक और हंस के सम्पादक संजय सहाय

इस अवसर पर पहले सत्र में ‘नागपुर महिला सम्मलेन: मील का पत्थर’ विषय पर बोलते हुए अमरावती विश्वविद्यालय में स्त्री अध्ययन की प्राध्यापक निशा शेंडे ने कहा कि ‘ हमें मूल्यांकन करना चाहिए कि इतनी लम्बी यात्रा करके हम कहां तक पहुंचे. तब हम 25 हजार महिलाओं के साथ नागपुर में इकट्ठे हुए थे और आज हम 25 महिलाओं के साथ भी किसी बड़े संघर्ष की रूपरेखा नहीं बना पा रहे हैं, जबकि उन 25 हजार महिलाओं ने महिला मुक्ति का घोषणा पत्र तब लिख दिया था.’  यह सम्मलेन आल इंडिया डिप्रेस्ड क्लासेज के बैनर तले हुआ था, जिसमें राजनीतिक, शैक्षणिक अधिकारों के प्रस्ताव पारित किये गये थे, साथ ही श्रमिकों के अधिकार के प्रस्ताव भी. ‘अपने अध्यक्षीय वकतव्य में आलोचक/ लेखिका हेमलता माहिश्वर ने नागपुर सम्मलेन के प्रस्तावों को और उस दौरान डा. आंबेडकर के द्वारा दिये गये भाषण के अंश बताये.

सावित्री फुले वैचारिकी सम्मान के दौरान लेखिका/ विचारक विमल थोराट अनिता भारती को शाल ओढाकर  सम्मानित करते हुए

उन्होंने कहा कि ‘इस अवसर पर डा. आंबेडकर ने उपस्थित महिलाओं से कहा कि वे अपने बच्चों में महान बनने के सपने का बीज डालें और उन्हें किसी भी तरह की हीनता से मुक्त करें.’ उन्होंने बताया कि इस सम्मलेन में बहुपत्नीत्व के खिलाफ पारित प्रस्ताव बाद में हिन्दू कोड बिल का अंश बना.’ इस सत्र में डा. एस.एन गौतम ने भी संबोधित किया.

पहले सत्र में नागपुर महिला सम्मलेन पर बोलते हुए  प्रोफ़ेसर निशा शेंडे और हेमलता माहिश्वर

स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन ने बताया कि ‘नागपुर सम्मलेन इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि महिलाओं ने तब राजनीतिक आरक्षण की मांग की थी, और इसलिए भी कि उनके प्रस्ताव काफी क्रांतिकारी और स्पष्ट थे, जबकि 1975 में जारी ‘ टुवर्ड्स इक्वलिटी रिपोर्ट’, जो सातवें-आठवें दशक में महिला आन्दोलन का संदर्भ बना, राजनीतिक अधिकारों को लेकर उतना स्पष्ट नहीं था. इसलिए आज हमने महिला आरक्षण पर भी बातचीत रखी है.’ महिला आरक्षण पर सत्र में दलित अधिकार आन्दोलन की संयोजकों में से एक और लेखिका रजनीतिलक ने कहा कि ‘महिलाओं के लिए सारे अधिकार समानुपातिक प्रतिनिधित्व के साथ होने चाहिए.’ राष्ट्रीय महिला महिला आयोग की सदस्य सुषमा साहू ने कहा कि ‘महिला आरक्षण के लिए हम बाहर की महिलाओं से ज्यादा संसद में बैठी महिलाओं को पहल लेनी चाहिए. उन्होंने महिलाओं को महिलाओं के शोषण में न शामिल होने का भी आह्वान किया.’ स्त्रीवादी न्यायविद और सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद जैन ने कहा कि ‘जबतक 25 लाख महिलायें संसद को घेरकर बैठ नहीं जायेंगी, तब तक महिला आरक्षण संभव नहीं है. जो हालात है उससे लगता है कि महिला आरक्षण और समान आचार संहिता पास होने में 100 साल लग जायेंगे.’ दलित और महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली लेखिका कौशल पंवार ने कहा कि ‘हमें स्वाती सिंह जैसी महिलाओं से भी समस्या है, जो बेटी की सम्मान में अभियान चलाती है और अपनी ही भाभी, जो किसी की बेटी है की प्रताड़ना में शामिल पाई जाती है.’  सत्र की अध्यक्षता करते हुए नेशनल फेडरेशन ऑफ़ इन्डियन वीमेन की महासचिव एनी राजा ने कहा कि ‘ महिला आयोग जैसी संस्थाओं को यह स्पष्ट करना चाहिए कि महिला आरक्षण पर उनकी क्या पोजीशन है. उन्होने कहा कि महिला आरक्षण के पिछले दो दशकों से संसद में पेंडिंग होने की वजह संसद का पितृसत्ताक नियन्त्रण में होना है.’

नृत्यांगना रचना यादव के साथ

सावित्रीबाई फुले सम्मान की अध्यक्ष विमल थोराट ने अपने सत्र ‘समकालीन महिला आंदोलन और हाशिये के प्रश्न’ में अपनी बात रखते हुए कहा कि महिला आंदोलन में जबतक हाशिये की महिलाओं की चिंताओं और मुद्दों को शामिल नहीं किया जायेगा तबतक महिला आंदोलन का स्वरुप समग्र नहीं हो पायेगा. इसी सत्र में हंस के संपादक संजय सहाय ने कहा कि ‘ महिलायें जबतक धर्म के जकड़न से मुक्त नहीं होंगी तबतक वे नारे भले लगाते रहें मुक्त नहीं हो सकतीं. उन्होंने शादी आदि संस्थाओं में धार्मिक प्रभावों के कारण उससे मुक्ति की भी बात की.’

रचना यादव महिला अधिकार विषय पर कत्थक नृत्य करती हुई नृत्यांगना रचना यादव

लेखिका और महिला अधिकार एक्टिविस्ट नूर जहीर ने मुसलमान महिलाओं, खासकर पसमांदा मुसलमान महिलाओं पर मौलवियों के प्रभाव पर चिंता जताई तथा कॉमन सिविल कोड के बनने में महिलाओं की भागीदारी की आवश्यकता पर जोर दिया.’ दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी की प्राध्यापिका मेधा ने सवाल किया कि क्या कारण है कि हम ‘मीराबाई के लेखन पर तो बात करते हैं, लेकिन गैर द्विज कवयित्री सहजोबाई की चर्चा नहीं होती.’ आदिवासी अधिकारों के कार्यकर्ता और दिल्ली विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्राध्यापक गणेश मांझी ने महिलाओं के आर्थिक शोषण के विभिन्न पहलुओं को चिह्नित किया. यूनाइटेड ओबीसी फोरम से जुडी जेएनयू की शोधछात्रा सरिता माली ने भी अपनी बात रखी. सत्र के प्रारम्भ में लेखिका अनिता भारती को उनकी किताब के लिए सम्मानित किया गया. सम्मान वरिष्ठ लेखिका और विचारक विमल थोराट ने शाल ओढाकर और स्मृति चिह्न देकर किया. सम्मान के लिए मानपत्र और 12 हजार रुपये की राशि का चेक हंस के सम्पादक और कथाकार संजय सहाय ने अपने हाथों से अनिता भारती को सौपा. लेखिका अनिता भारती ने कहा कि ‘ स्त्री अधिकारों के लिए और खासकर दलित तथा हाशिये की स्त्री के अधिकारों के लिए समर्पित हम स्त्रियों की अपनी पत्रिका स्त्रीकाल के द्वारा सावित्रीबाई फुले सम्मान पाकर मैं गौरवान्वित महसूस कर रही हूँ, खासकर इसलिए की इस सम्मान से हमसब की प्रेरक ‘सावित्रीबाई फुले’ का नाम जुड़ा है. निर्णायक मंडल की और से अपनी बात कहते हुए अर्चना वर्मा ने कहा कि ‘ अनिता भारती ने अपनी किताब में जाति-शोषण से पीड़ित दलित लेखकों के द्वारा दलित स्त्रियों के खिलाफ लेखन की निंदा की है तथा स्त्रीवाद के भीतर एक अलग धारा दलितस्त्रीवाद को व्याख्यायित करने की कोशिश की है.’ इस सम्मान के निर्णयाक मंडल में अर्चना वर्मा, सुधा अरोड़ा, अरविंद जैन, सुजाता पारमिता, हेमलता माहिश्वर और परिमला आंबेकर शामिल थे.

द मार्जिनलाइज्ड प्रकाशन से प्रकाशित फॉरवर्ड प्रेस सीरीज की तीन किताबों का लोकार्पण

इस अवसर पर ‘द मार्जिनलाइज्ड प्रकाशन’ द्वारा फॉरवर्ड प्रेस बुक्स सीरीज में छापी गई तीन किताबों ‘बहुजन साहित्य की प्रस्तावना’, ‘महिषासुर’ और ‘चिंतन के जनसरोकार’ का लोकार्पण भी किया गया. अंतिम सत्र में प्रसिद्ध नृत्यांगना रचनायादव ने महिला अधिकार पर कत्थक नृत्य की प्रस्तुति की. उन्हें स्त्रीकल की ओर से एनी राजा और विमलथोराट ने सम्मानित किया.

कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापन यूनाइटेड ओबीसी फोरम की ओर से मुलायम सिंह यादव तथा आदिवासी साहित्य के संपादक गंगा सहाय ने किया. मंच संचालन धर्मवीर सिंह ने किया.

कश्मीरी सेब

प्रेमचंद


कल शाम को चौक में दो-चार जरूरी चीजें खरीदने गया था. पंजाबी मेवाफरोशों की दूकानें रास्ते ही में पड़ती हैं. एक दूकान पर बहुत अच्छे रंगदार,गुलाबी सेब सजे हुए नजर आये. जी ललचा उठा. आजकल शिक्षित समाज में विटामिन और प्रोटीन के शब्दों में विचार करने की प्रवृत्ति हो गई है. टमाटो को पहले कोई सेंत में भी न पूछता था. अब टमाटो भोजन का आवश्यक अंग बन गया है. गाजर भी पहले ग़रीबों के पेट भरने की चीज थी. अमीर लोग तो उसका हलवा ही खाते थे; मगर अब पता चला है कि गाजर में भी बहुत विटामिन हैं, इसलिए गाजर को भी मेजों पर स्थान मिलने लगा है और सेब के विषय में तो यह कहा जाने लगा है कि एक सेब रोज खाइए तो आपको डाक्टरों की जरूरत न रहेगी. डाक्टर से बचने के लिए हम निमकौड़ी तक खाने को तैयार हो सकते हैं. सेब तो रस और स्वाद में अगर आम से बढक़र नहीं है तो घटकर भी नहीं. हाँ, बनारस के लंगड़े और लखनऊ के दसहरी और बम्बई के अल्फाँसो की बात दूसरी है. उनके टक्कर का फल तो संसार में दूसरा नहीं है मगर; मगर उनमें विटामिन और प्रोटीन है या नहीं, है तो काफी है या नहीं, इन विषयों पर अभी किसी पश्चिमी डाक्टर की व्यवस्था देखने में नहीं आयी. सेब को यह व्यवस्था मिल चुकी है. अब वह केवल स्वाद की चीज नहीं है, उसमें गुण भी है. हमने दूकानदार से मोल-भाव किया और आध सेर सेब माँगे.

दुकानदार ने कहा-बाबूजी बड़े मजेदार सेब आये हैं, खास कश्मीर के. आप ले जाएँ, खाकर तबीयत खुश हो जाएगी. मैंने रूमाल निकालकर उसे देते हुए कहा-चुन-चुनकर रखना. दूकानदार ने तराजू उठाई और अपने नौकर से बोला-लौंडे आध सेर कश्मीरी सेब निकाल ला.  चुनकर लाना.लौंडा चार सेब लाया. दूकानदार ने तौला, एक लिफाफे में उन्हें रखा और रूमाल में बाँधकर मुझे दे दिया. मैंने चार आने उसके हाथ में रखे. घर आकर लिफ़ाफा ज्यों-का-त्यों रख दिया. रात को सेब या कोई दूसरा फल खाने का कायदा नहीं है. फल खाने का समय तो प्रात:काल है. आज सुबह मुँह-हाथ धोकर जो नाश्ता करने के लिए एक सेब निकाला, तो सड़ा हुआ था.
एक रुपये के आकार का छिलका गल गया था. समझा, रात को दूकानदार ने देखा न होगा. दूसरा निकाला. मगर यह आधा सड़ा हुआ था. अब सन्देह हुआ, दुकानदार ने मुझे धोखा तो नहीं दिया है. तीसरा सेब निकाला. यह सड़ा तो न था; मगर एक तरफ दबकर बिल्कुल पिचक गया. चौथा देखा. वह यों तो बेदाग था; मगर उसमें एक काला सूराख था जैसा अक्सर बेरों में होता है. काटा तो भीतर वैसे ही धब्बे, जैसे किड़हे बेर में होते हैं. एक सेब भी खाने लायक नहीं. चार आने पैसों का इतना गम न हुआ . जितना समाज के इस चारित्रिक पतन का. दूकानदार ने जान-बूझकर मेरे साथ धोखेबाजी का व्यवहार किया.  एक सेब सड़ा हुआ होता, तो मैं उसको क्षमा के योग्य समझता. सोचता, उसकी निगाह न पड़ी होगी. मगर चार-के-चारों खराब निकल जाएँ, यह तो साफ धोखा है.

मगर इस धोखे में मेरा भी सहयोग था. मेरा उसके हाथ में रूमाल रख देना मानो उसे धोखा देने की प्रेरणा थी. उसने भाँप लिया कि महाशय अपनी आँखों से काम लेने वाले जीव नहीं हैं और न इतने चौकस हैं कि घर से लौटाने आएँ. आदमी बेइमानी तभी करता जब उसे अवसर मिलता है. बेइमानी का अवसर देना, चाहे वह अपने ढीलेपन से हो या सहज विश्वास से, बेइमानी में सहयोग देना है. पढ़े-लिखे बाबुओं और कर्मचारियों पर तो अब कोई विश्वास नहीं करता. किसी थाने या कचहरी या म्यूनिसिपिलटी में चले जाइए, आपकी ऐसी दुर्गति होगी कि आप बड़ी-से-बड़ी हानि उठाकर भी उधर न जाएँगे. व्यापारियों की साख अभी तक बनी हुई थी. यों तौल में चाहे छटाँक-आध-छटाँक कस लें; लेकिन आप उन्हें पाँच की जगह भूल से दस के नोट दे आते थे तो आपको घबड़ाने की कोई जरूरत न थी. आपके रुपये सुरक्षित थे. मुझे याद है, एक बार मैंने मुहर्रम के मेले में एक खोंचे वाले से एक पैसे की रेवडिय़ाँ ली थीं और पैसे की जगह अठन्नी दे आया था. घर आकर जब अपनी भूल मालूम हुई तो खोंचे वाले के पास दौड़ा गये. आशा नहीं थी कि वह अठन्नी लौटाएगा, लेकिन उसने प्रसन्नचित्त से अठन्नी लौटा दी और उलटे मुझसे क्षमा माँगी. और यहाँ कश्मीरी सेब के नाम से सड़े हुए सेब बेचे जाते हैं ? मुझे आशा है, पाठक बाज़ार में जाकर मेरी तरह आँखे न बन्द कर लिया करेंगे. नहीं उन्हें भी कश्मीरी सेब ही मिलेंगे ?

क्यों चुनी गई अनिता भारती की किताब ‘समकालीन नारीवाद : दलित स्त्री का प्रतिरोध” ‘सावित्रीबाई फुले वैचारिकी सम्मान’, 2016 के लिए

निर्णायक मंडल की ओर से अर्चना वर्मा 

निर्णायक मंडल ( 2016)  के सदस्य : 
अर्चना वर्मा, सुधा अरोड़ा, अरविंद जैन, सुजाता पारमिता, हेमलता माहिश्वर, परिमला आंबेकर

यह सम्मान हर वर्ष स्त्रीवादी वैचारिकी की किताब को स्त्रीकाल के द्वारा, स्त्रीवादी न्यायविद अरविंद जैन के आर्थिक सहयोग से दिया जाता है. 

वरिष्ठ लेखिका और विचारक विमल थोराट अनिता भारती को शाल ओढाकर सम्मानित करते हुए

‘सावित्रीबाई फुले वैचारिकी सम्मान’ के लिये अनिता भारती की किताब ‘समकालीन नारीवाद : दलित स्त्री का प्रतिरोध” का चुनाव करते समय हमे यह अहसास था कि हिन्दी का स्त्री-विमर्श रचनात्मक तौर पर जितना समृद्ध है, सैद्धान्तिकी के लिहाज से उतना नहीं। स्त्री-काल हाशियागत समुदाय के रूप में समूचे स्त्री-विमर्श को अपने भीतर समेटता है लेकिन हाशिये के उस तरफ़ भी अति-हाशियागत समूह के प्रतिनिधि के रूप में लेखिका का दलित-विमर्श का अभ्यन्तर-अंग होना भी इस चुनाव में विशेष महत्त्व रखता था। तो चुनाव में हमारी एक प्राथमिकता तो वैचारिकी से जुड़ी थी और दूसरी प्राथमिकता यह थी कि उसे अपने समाज की अन्तरंग उपज होना चाहिये। अनीता भारती की यह किताब दोनो कसौटियों पर खरी उतरी.

अनिता भारती का मानना है कि “समाज परिवर्तन में साहित्य की अपनी अमिट भूमिका है। साहित्य समाज में व्याप्त कुरीतियों, पुरातन मान्यताओं से लड़ना सिखाता है। यदि साहित्य की भूमिका समाज की सकारात्मक सोच बनाने की न होकर नकारात्मक होने लगे तो उसका दहन कर दिया जाना चाहिए।…आज दलित लेखकों और दलित साहित्य को चिंतन मनन करके फैसला करना है कि मूल्य, सिद्धांतों के साथ समझौता किसी भी हद पर नहीं किया जा सकता। दलित साहित्य को दलित आंदोलन को तोड़ने वाले जातिवादी असमानता मूलक, लिंगभेद पर आधारित पितृसत्तात्मक और ब्राह्मणवादी तत्वों से संघर्ष कर अपनी स्वतंत्र और प्रगतिशील राह बनानी होगी।”

मानपत्र और चेक देते हुए  हंस के संपादक संजय सहाय, लेखिका नूर जहीर

कफ़न और गोदान पर विचार करते हुए वे साहित्यिक मूल्यांकन में केवल प्रतिक्रयामूलक रूख से ऊपर उठकर एक तटस्थ दृष्टि और सम्यक् सन्तुलन का परिचय देती हैं। थेरी-गाथा में वे नारी-मुक्ति के स्वर के इतिहास की निशानदेही करती हैं, ‘कफ़न’ और ‘गोदान’ के सन्दर्भ में दलित आलोचना द्वारा उठाये गये विवादों की भी समीक्षा करती हैँ व रचना को समग्रतापूर्वक देखने की वकालत करती हैं। थेरी गाथा और कफ़न पर विचार करते हुए वे इसको कोरा साहित्यिक विवाद नहीं रहने देतीं बल्कि वस्तुतः धर्मवीर और दलित-विमर्श के अन्य सिद्ध-प्रसिद्ध और स्थापित नामों की स्त्री-विरोधी अवधारणाओं के साथ लोहा लेती हैँ। डॉ. धर्मवीर की स्त्री विरोधी, अम्बेडकर बुद्ध विरोधी वैचारिकी के खिलाफ अपनी टिप्पणी करते हुए वे दलित पत्र-पत्रिकाओं के इस रुख पर चिन्ता प्रकट करती हैँ कि वे दलित समाज का मुख-पत्र होने के दावे के बावजूद धर्मवीर की ऐसी सोच पर कोई हस्तक्षेप या कोई टिप्पणी नहीं करती हैं।

सम्मान के बाद

अपने संकल्प को व्यावहारिक जामा पहनाने के लिये एक तरफ़ उचित आक्रोश, धारदार तर्क और प्रखर प्रतिवाद के साथ दलित-विमर्श के मैदान में स्त्री-पक्ष से मोर्चा खोलती हैँ, “ वे कहती हैँ ” हमारे दलित साथियों की राय है कि दलित समाज में दलित महिला पुरुष दोनों की एक सी स्थिति है अर्थात दोनों ही गुलाम है इसलिए पहले हमें सामूहिक होकर जाति मुक्ति की लडाई लडनी है जब हमें जाति से मुक्ति मिल जाएंगे तब हम दलित महिलाओं के लिए लड लेगे। परन्तु एक दलित एक्टिविस्ट होने के नाते मेरा हमेशा यह मानना रहा है कि हमें एक साथ सामूहिक लडाई के साथ दलित स्त्री अधिकारों की लडाई भी साथ-साथ ही लडनी पडेगी। लेकिन हमारे पुरुष साथियों को यह बात बिल्कुल गले नही उतर रही है। ” … “ जैसे ही स्त्री अपनी अस्मिता की बात करती है धर्मवीर जैसे ब्राह्मणवादी सकीर्ण विचारधारा वाले लोगों के पैरो तले जमीन खिसकने लगती है। उन्हें अपने अधिकार छीनने का भय सताने लगता है। उन्हे लगता है कि अगर नारी हमारे बराबर आ गई तो हमारा हुक्म कौन मानेगा? वे अपना गुलाम किसको बनायेंगे। इसलिए वे मनु की तरह ही स्त्री को घर में रखने की हामी है और वे बिल्कुल मनु महाराज की तरह औरतों का गठन चाहते है।” दूसरी तरफ़ वे स्त्री-विमर्श के मोर्चे पर सवर्ण स्त्री के साथ और साझेदारी की विडम्बनाओं पर दृढ़तापूर्वक सोदाहरण उँगली उठाती है। छिनाल-प्रकरण में अपनी भागीदारी की बात करते हुए वे याद करती हैं, – “पर मेरे मन के अंदर कुछ सवाल मुझे व्यथित कर रहे थे। सवाल यही थे कि क्या दलित स्त्रियों की अस्मिता किसी गैर-दलित स्त्री की अस्मिता से कम होती है? जब एक सवर्ण लेखिका पर हमला हुआ तो सारी लेखक बिरादरी इकट्ठी हो गई , पर जब दलित लेखिकाओं पर हमले हो रहे है तो सब चुप्पी मार कर बैठे रहे? दलित महिलाएं हमेशा समाज में अन्य महिलाओं के साथ जुडकर उनके मुद्दों के साथ सहानुभूति व बहनापा दिखाती रही है परन्तु दलित महिलाओं अपने मुद्दों के साथ हमेशा अकेली खडी दिखाई और लडती नजर आती है।

दलित स्त्री लेखन की दो पीढियां

अनिता भारती के व्यक्तित्व का सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण पक्ष उनका ऐक्टिविज़्म है। यह उनके चिन्तक व्यक्तित्व के लिहाज से भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि उसकी वजह से उनके चिन्तन को एक निजी अनुभव की धार मलती है, एक ठोस आधार मिलता है और वह हमारे अपने जमीनी यथार्थ से जुड़ता है। उनका ऐक्टिविज़्म छात्र-जीवन के साथ शुरू हुआ जिसके विषय में वे बताती हैँ कि – ” लडकियां इन छात्र संगठनों में अपने अस्तित्व के होने के अहसास की एक मृग मरीचिका में जी रही होती है,…हर साल नयी-नयी लडकियों के तरह-तरह के छात्र-संगठनों में जुडने के बाबजूद बाद में उनकी किसी भी तरह के आंदोलनों में चाहे वे महिला आंदोलन हो, अथवा जनआंदोलन या फिर सामाजिक व दलित आंदोलन, इन सबमें उनकी संख्या के हिसाब से हिस्सेदारी नही दिखती।”

सावित्रीबाई फुले वैचारिकी सम्मान के लिए स्मृतिचिह्न अशोक स्तम्भ के साथ लेखिका

तबका उनका यह अनुभव बाद के जीवन तक भी उनके साथ आता है और अपनी भूमिका तय करने में उनकी मदद करता है – ” मेरे अपने जीवन में लिए गए मेरे फैसले ही मेरे जीवन की पोलिटिक्स को स्पष्ट करते है… हमारे जैसे लोग जो सामाजिक कार्यकर्ता का जीवन जीते हुए समाज बदलाव का कार्य करना चाहते है उनके फैसले अपने साथ-साथ बाकी समाज को भी कही ना कही गहराई से प्रभावित और प्रेरित करते हैं।
स्त्री-विमर्श और दलित-विमर्श के बीच की खाली जगह को भरने वाली अनुभवसम्मत एवं प्रामाणिक वैचारिकी के सृजन के लिये उनकी किताब पुरस्कार के लिये चुनी गयी। मैं निर्णायक मण्डल की ओर से उनको बधाई देती हूँ।

वे ‘हजार चौरासी की मां’ थीं !

अनुवाद : अरुण माहेश्वरी



महाश्वेता देवी की लिखने की टेबुल कभी भी बदली नहीं. बालीगंज स्टेशन रोड में ज्योतिर्मय बसु के मकान में लोहे की घुमावदार सीढ़ी वाली छत के घर, गोल्फ ग्रीन या राजाडांगा कहीं भी क्यों न रहे, टेबुल हमेशा एक ही. ढेर सारे लिफाफे, निवेदन पत्र, सरकारी लिफाफे, संपादित ‘वर्तिका’ पत्रिका की प्रूफकापियां बिखरी हुई. एक कोने में किसी तरह से उनके अपने राइटिंग पैड और कलम की बाकायदा मौजूदगी. सादा बड़े से उस चौकोर पैड पर डाट पेन से एकदम पूरे-पूरे अक्षरों में लिखने का अभ्यास था उनका. लिखना, साहित्य बहुत बाद में आता है. कौन से शबरों के गांव में ट्यूबवेल नहीं बैठा है, बैंक ने कौन से लोधा नौजवान को कर्ज देने से मना कर दिया है.सरकारी कार्यालयों में लगातार चिट्ठियां लिखना ही जैसे उनका पहला काम था. ज्ञानपीठ से लेकर मैगसेसे पुरस्कार से विभूषित महाश्वेता जितनी लेखक थी, उतनी ही एक्टिविस्ट भी थी. 88 साल की उम्र में अपने हाथ में इंसुलिन की सूईं लगाते-लगाते वे कहती थी, ‘‘तुम लोग जिसे काम कहते हो, उनकी तुलना में ये तमाम बेकाम मुझे ज्यादा उत्साहित करते हैं.’’

इसीलिये महाश्वेता को सिर्फ एक रूप में देखना असंभव है. वे ‘हजार चौरासी की मां’ है. वे ‘अरण्य के अधिकार’ की उस प्रसिद्ध पंक्ति, ‘नंगों-भूखों की मृत्यु नहीं है’  की जननी है. दूसरी ओर वे सिंगुर-नंदीग्राम आंदोलन का एक चेहरा थी. एक ओर उनके लेखन से बिहार-मध्यप्रदेश के कुर्मी, भंगी, दुसाध बंगाली पाठकों के दरवाजे पर जोरदार प्रहार करते हैं. और एक महाश्वेता आक्साफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से दिल्ली बोर्ड के विद्यार्थियों के लिये ‘आनन्दपाठ’ शीर्षक संकलन तैयार करती है, जिम कार्बेट से लू शुन, वेरियर एल्विन का अनुवाद करके उन्हें बांग्ला में लाती है. उनके घर पर गांव से आए दरिद्रजनों का हमेशा आना-जाना लगा रहता है. दो साल पहले की बात है. किसी काम के लिये कोलकाता आया एक शबर नौजवान महाश्वेता के घर पर टिका हुआ था. नहाने के बाद आले में रखी महाश्वेता की कंघी से ही अपने बाल संवार लिये. इस शहर में अनेक वामपंथी जात-पातहीन, वर्ग-विहीन, शोषणहीन समाज के सपने देखते हैं. लेकिन अपने खुद के तेल-साबुन, कघी को कितने लोग बेहिचक दूसरे को इस्तेमाल करने के लिये दे सकते हैं ? कैसे उन्होंने यह स्वभाव पाया ?


सन् 2001 में गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक को महाश्वेता ने कहा था, ‘जब शबरों के पास गई, मेरे सारे सवालों के जवाब मिल गये. आदिवासियों पर जो भी लिखा है, उनके अंदर से ही पाया है.’सबाल्टर्न इतिहास लेखन की प्रसिद्धी के बहुत पहले ही तो महाश्वेता के लेखन में वे सब अनसुने सुने जा सकते थे. 1966 में प्रकाशित हुई थी ‘कवि बंध्यघटी गात्री का जीवन और मृत्यु’. उसमें उपन्यासकार ने माना था, ‘बहुत दिनों से इतिहास का रोमांस मुझे आकर्षित नहीं कर रहा था. एक ऐसे नौजवान की कहानी लिखना चाहती थी जो अपने जन्म और जीवन का अतिक्रमण करके अपने लिये एक संसार बनाना चाहता था, उसका खुद का रचा हुआ संसार.’ ‘चोट्टी मुण्डा और उसका तीर’ वही अनश्वर स्पिरिट है. ‘चोट्टी खड़ा रहा. निर्वस्त्र। खड़े-खड़े ही वह हमेशा के लिये नदी में विलीन हो जाता है, यह किंवदंती है. जो सिर्फ मनुष्य ही हो सकता है.’ सारी दुनिया के सुधीजनों के बीच महाश्वेता इस वंचित जीवन की कथाकार के रूप में ही जानी जायेगी. गायत्री स्पिवाक महाश्वेता के लेखन का अंग्रेजी अनुवाद करेगी. इसीलिये महाश्वेता को बांग्ला से अलग भारतीय और अन्तरराष्ट्रीय साहित्य के परिप्रेक्ष्य में देखना होगा.

विश्व चिंतन से महाश्वेता का परिचय उनके जन्म से था. पिता कल्लोल युग के प्रसिद्ध लेखक युवनाश्व या मनीश घटक. काका ऋत्विक घटक. बड़े मामा अर्थशास्त्री, ‘इकोनोमिक एंड पोलिटिकल वीकली’ के संस्थापक सचिन चौधुरी. मां के ममेरे भाई कवि अमिय चक्रवर्ती. कक्षा पांच से ही शांतिनिकेतन में पढ़ाई.वहां बांग्ला पढ़ाते थे रवीन्द्रनाथ.  नंदलाल बोस, रामकिंकर बेज जैसे शिक्षक मिलें.  देखने लायक काल था. 14 जनवरी 1926 के दिन बांग्लादेश के पाबना (आज के राजशाही) जिले के नोतुन भारेंगा गांव में महाश्वेता का जन्म. इसके साल भर बाद ही ‘आग का दरिया’ की लेखिका कुर्रतुलैन हैदर जन्मी थी. दोनों के लेखन में ही जात-पात, पितृसत्ता का महाकाव्य-रूपी विस्तार दिखाई दिया. इसी चेतना की ही तो उपज थी – ‘स्तनदायिनी’ का नाम यशोदा. थाने में बलात्कृत  द्रौपदी मेझेन द्रौपदी का ही आधुनिक संस्करण है. भारतीय निम्नवर्ग एक समान पड़ा हुआ पत्थर नहीं, उसमें भी दरारे हैं, वह क्या ‘श्री श्री गणेश महिमा’ में दिखाई नहीं देता है : ‘‘भंगियों की होली खत्म होती है दो सुअरों को मार कर, रात भर मद-मांस पर  हल्ला करते हैं. दुसाध यहां अलग-थलग थ.। फिर दो साल हुए वे भी भंगियों के साथ होली में शामिल है.’’

अपनी साहित्य यात्रा के इस मोड़ पर आकर महाश्वेता एक दिन रुक नहीं गई. उसके पीछे उनकी लंबी परिक्रमा थी. ‘46 में विश्वभारती से अंग्रेजी में स्नातक हुई. एमए पास करने के बाद विजयगढ़ के ज्योतिष राय कालेज में अध्यापन. उसके पहले 1948 से ‘रंगमशाल’ अखबार में बच्चों के लिये लिखना शुरू किया. आजादी के बाद ‘नवान्नो’ के लेखक विजन भट्टाचार्य से विवाह. तब कभी ट्यूशन करके, कभी साबुन का पाउडर बेच कर परिवार चलाया. बीच में एक बार अमेरिका में बंदरों के निर्यात की योजना भी बनाई, लेकिन सफल नहीं हुई. 1962 में तलाक, फिर असित गुप्त के साथ दूसरी शादी. 1976 में उस वैवाहिक जीवन का भी अंत. इसी बीच, पचास के दशक के मध्य एकमात्र बेटे नवारुण को उसके पिता के पास छोड़ कर एक कैमरा उठाया और आगरा की ट्रेन में बैठ गई. रानी के किले, महलक्ष्म मंदिर का कोना-कोना छान मारा. शाम के अंधेरे में आग ताप रही किसान औरतों से तांगेवाले के साथ यह सुना कि ‘रानी मरी नहीं. बुंदेलखंड की धरती और पहाड़ ने उसे आज भी छिपा रखा है.’

इसके बाद ही ‘देश’ पत्रिका में ‘झांसी की रानी’ उपन्यास धारावाहिक प्रकाशित हुआ. और इस प्रकार, अकेले घूम-घूम कर उपन्यास की सामग्री जुटाने वाली क्रांतिकारी महाश्वेता अपनी पूर्ववर्ती लीला मजुमदार, आशापूर्णा देवी से काफी अलग हो गई. उनका दबंग राजनीतिक स्वर भी अलग हो गया. ‘अग्निगर्भ’ उपन्यास की वह अविस्मरणीय पंक्ति, ‘‘जातिभेद की समस्या खत्म नहीं हुई है. प्यास का पानी और भूख का अन्न रूपकथा बने हुए है. फिर भी कितनी पार्टियां, कितने आदर्श, सब सबको कामरेड कहते हैं.’’ कामरेडों ने तो कभी भी ‘रूदाली’, ‘मर्डरर की मां’ की समस्या को देखा नहीं है. ‘चोली के पीछे’ की स्तनहीन नायिका जिसप्रकार ‘लॉकअप में गैंगरेप…ठेकेदार ग्राहक, बजाओ गाना’ कहती हुई चिल्लाती रहती है, पाठक के कान भी बंद हो जाते हैं. कुल मिला कर महाश्वेता जैसे कोई प्रिज्म है. कभी बिल्कुल उदासीन तो कभी बिना गप्प किये जाने नहीं देगी. अंत में, बुढ़ापे की बीमारियों, पुत्रशोक ने उन्हें काफी ध्वस्त कर दिया था. फिर भी क्या महाश्वेता ही राजनीति-जीवी बहुमुखी बंगालियों की अंतिम विरासत होगी ? ममता बंदोपाध्याय की सभा के मंच पर उनकी उपस्थिति को लेकर बहुतों ने बहुत बातें कही थी. महाश्वेता ने परवाह नहीं की. लोगों की बातों की परवाह करना कभी भी उनकी प्रकृति नहीं रही.

(आनंदबाजार पत्रिका’ दैनिक के 29 जुलाई 2016 के अंक से साभार)